भारतकोश
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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

अनुवाद के विषय में

“भिषगः बुभ्रुषः शास्त्रमेवादितः परीक्षेत ।

विविधानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके ॥” चरक

सबसे प्रथम शास्त्र की परीक्षा करे, वैद्यों के बहुत से शास्त्र लोक में प्रचलित हैं। सुश्रुत के भी बहुत से अनुवाद बाजार में प्रचलित हैं। इनमें कुछ पूर्ण हैं, और कुछ अपूर्ण हैं। कोई अनुवाद इतने अधिक विस्तृत हैं कि साधारण बुद्धि का मनुष्य उनको पढ़ भी नहीं सकता, (इसी से चरक में कहा—त्रिविधशिष्यबुद्धिहितम्)। विद्यार्थी जीवन में कुछ तो बाल्यन तथा कुछ दूसरे विषयों के बोझ से कुछ थोड़े से विद्यार्थी ही इन विस्तृत व्याख्याओं का उपयोग करते हैं। इन व्याख्याओं का मुख्य आधार पाश्चात्यज्ञान रहता है। आयुर्वेद को स्पष्ट करने के लिये इनका सहारा प्रायः लिया जाता है, जो कि इनको बहुत विस्तृत कर देता है। यही विस्तार साधारण विद्यार्थी जीवन में रुचिकर नहीं होता। इसलिये इस अनुवाद में मैंने इन दोनों बातों से यथासम्भव बचने का प्रयत्न किया है। मैंने अनुवाद की विद्यार्थी की दृष्टि से न तो विस्तृत और न संक्षिप्त किया है। विषय को स्पष्ट करने या पृष्ठ करने के लिये आयुर्वेद के ही उद्धरण लिये हैं। जिस देश में आप हैं, उस देश के ज्ञान को उसी देश की आंखों से देखने से सत्य ज्ञान मिलता है। भारत का रसोई घर, उसके साधन इस देश की दृष्टि से विचारने होंगे। रसोई घर में टेबल-कुर्सी न देखकर उसे हीन कल्पना करना सत्यता नहीं होगी। बस, इसी दृष्टि से मैंने इस अनुवाद को लिखने का यत्न किया।

इस अनुवाद का एक खासा इतिहास भी है—जो कि प्लासी के युद्ध के इतिहास की तरह रुचिकर तथा हल्दी घाटी के युद्ध की तरह महत्वपूर्ण है। चरक संहिता का अनुवाद समाप्त करके सन् ३६ से सुश्रुत का अनुवाद शुरू किया था। उस समय यह शारीरस्थान तक ही लिखा था। बस, यह यहीं पड़ा रहा। फिर सन् ४७ में श्री सुन्दरलालजी, अध्यक्ष-मोतीलाल बनारसी दास-फर्म लाहौर वालों ने इसका प्रकाशन आरम्भ किया था। उसके लिये इसे फिर देखा और शेष अनुवाद पूरा किया। उन्होंने छापना भी शुरू किया। चिकित्सास्थान से आगे तक छप गया था। भारत का विभाजन हुआ। लाहौर पाकिस्तान में गया। सब वहाँ नष्ट हो गया। केवल निदान तक के प्रूफ मेरे पास आये थे, वह बचे, बस, उसके आगे सारा लिखना था।

यह लिखना पहाड़ या महाभारत था—दिल टूट गया था—प्रकाशक आर्थिक दृष्टि से किसी प्रकार की मदद देने में लज्जा अनुभव करते थे—उनकी भी कमर टूट गई थी। इस समय जीवन की साधिन शान्ति ने दाहस दिया, उसी की यह प्रोत्साहना थी कि इसको समाप्त कर सका। उसका यह बार-बार कहना कि लोग कहेंगे कि तुमने सुश्रुत नहीं लिखा, एक घन्ना रहेगा, जब चरक संहिता लिखी, अर्घांग संग्रह लिखा, अर्घांग हृदय लिखा, इसे भी पूरा कर दो। माननीय डाक्टर बालकृष्ण पाठक एम० बी० एस्० प्रिन्सिपल आयुर्वेदिक कालेज, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और आदरणीय डाक्टर प्राणजीवन मेहता एम० डी० एम० एस्० की कही एवं लिखी बात पूरी कर दी—कि अत्रिदेव ने बृद्धवयी का अनुवाद किया।

इस अनुवाद में तथा दूसरे अनुवादों में मुख्य प्रेरणा—बड़ा हाथ श्री यादवजी त्रिकमजी महाराज बम्बई का है। उनका यह कहना कि “लिखो, अपनी तरफ से शुद्ध लिखने का यत्न करो, परन्तु अशुद्धि के डर से न लिखना, यह ठीक नहीं। तुम सर्वश्रेष्ठ नहीं। गलती दूसरे सुधार लेंगे—ऐसे भी आदमी हैं, जो सुधार ही सकते हैं, लिख नहीं सकते। आज की ‘प्रेएनोटमी’ आज से तीस साल पहली ग्रे की एनोटमी से बहुत बड़ी है, उसमें संशोधनों से बढ़ती होती रही। इसी प्रकार तुम्हारे अनुवाद में भी संशोधन हो जायेगा। लिखो, मेहनत करो।” ये वाक्य थे, ये शब्द थे, जो सदा जामनगर के गैस्ट हाऊस में रात दिन कानों में पड़ते रहते थे—बस, इन शब्दों से बाहर में मिली प्रेरणा, घर में शान्ति का आग्रह, इन दो पाटों के बीच में पड़ने पर मुझसे यह कार्य हो गया है। कैसे हुआ यह मुझे स्वयं भी पता नहीं। सुश्रुत जैसी बड़ी पुस्तक का अनुवाद दो-तीन बार करना पड़े इसमें अर्वाचि, अनिच्छा, विमनस्कता अवश्य आ जायेगी। विशेषकर मुझ जैसे को जिसने एकबार प्रश्न पत्रों

( ५ )

का उत्तर लिखकर कभी भी दुबारा देखने का साहस नहीं किया। अस्तु, भगवान् की इच्छा गुरुजनों का आशीर्वाद, शान्ति का स्नेह भरा आग्रह, इन सबोंसे यह इच्छा भी पूर्ण हो गई, कि मुझे आयुर्वेद की बुद्धचयी का अनुवाद पूरा करना है।

अशुद्धि या शुद्धि के लिये मुझे कोई चिन्ता नहीं, अशुद्धियाँ तो होनी ही चाहिये, क्योंकि मैं मनुष्य हूँ। भूल होना ही मनुष्य की पहचान है। रामजी ने हिरण्य के भुग में भूल की, इसीसे हम लोग उनको मनुष्य मानते हैं। इसलिये अशुद्धियों को मनुष्य ही शुद्ध भी कर लेंगे। सोना तो अग्नि में ही शुद्ध होता है। यह अनुवाद भी विद्वानों की ज्ञानाग्नि में तपकर कुछ समय पीछे अवश्य कुन्दन बन जायेगा, इसका मुझे विश्वास है१।

अन्त में इसके प्रकाशक श्रीसुन्दरलालजी को धन्यवाद देता हूँ कि जिन्होंने फिर उसी उत्साह से इसका प्रकाशन इस संकटमय जीवन में शुरू किया है। और इसको पुनः नये खिरे से छापकर जनता के सामने उपस्थित किया।

इसके सिवाय इसके भूमिका लेखक डाक्टर श्री भास्कर गोविन्द जी घाणेकर का मैं बहुत कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार कर मुझे कृतार्थ किया। श्री घाणेकर जी सुश्रुत के अच्छे परखनेवाले हैं। उन्होंने स्वयं सुश्रुत की टीका हिन्दी में लिखी है, उसका सबसे अधिक प्रचार हुआ, विद्यार्थियों तथा वैद्य समाज में बहुत सम्मान उसने पाया है। वे भूमिका लिखें—यह वास्तव में अनुवादक और प्रकाशक दोनों के लिये गौरव की बात है, साथ ही भूमिका लेखन कार्य सबसे प्रथम इसी अनुवाद को उनकी लेखनी से प्राप्त हुआ है, यह तो वास्तव में सौभाग्य की बात है। हृदय से उनका धन्यवाद करके विदा लेता हूँ।

अन्तिम

१ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुर्वतेऽर्जुन ॥

न हि ज्ञातेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ॥ भगवद्गीता ।

2

सुश्रुतसंहिता के विषय में

वर्तमान समय में जो सुश्रुतसंहिता उपलब्ध है, उस पर केवल श्रीडल्हणाचार्य की टीका मिलती है। उस टीका में उन्होंने अपना सब परिचय दिया है। उसी में उन्होंने जेज्जट, गयदास, भास्कर आदि विद्वानों की टीका पंजिका का नाम कीर्तन किया है, स्थान-स्थान पर दूसरे आचार्यों के पाठ भी दिये हैं।

इसी प्रसंग में उन्होंने प्रतिसंस्कृता रूप में नागार्जुन का नाम भी दिया है; यथा:—“यत्र तत्र परोक्षे लिट् प्रयोगस्तत्र तत्रैव प्रतिसंस्कृत् सूत्रं ज्ञातव्यमिति। प्रतिसंस्कृत्ताऽपीह नागार्जुन एव।”

बस, इस एक स्थान के सिवाय और प्रमाण नागार्जुन के प्रतिसंस्कृता होने का नहीं मिलता। साथ ही नागार्जुन बौद्ध था। सब इतिहासकार इस बात को बिना विरोध के मानते हैं। इसके विपरीत सुश्रुत में स्थान स्थान पर ब्राह्मणों के लिये विशेष उपचार, ब्रह्मभोज आदि का वर्णन मिलता है।

ब्रह्मभोज की प्रथा आज भी इस देश में है, किसी भी पवित्र कार्य में वास्तु संस्कार या कोई मांगलिक कार्य होने पर ब्राह्मणों को भोज दिया जाता है, इसी प्रकार सुश्रुत में भी वर्णित है।

“छत्रं धारयेद् बालव्यजनैश्च वीजयेत्, ब्राह्मणसहस्रं भोजयेत् ॥” चि० अ० ४।२६

चरक में भी छत्र धारण, पंखा करना, उत्तम बस्तियों के सिद्ध करने में है, परन्तु वहाँ ब्रह्मभोज नहीं है। इसके सिवाय सुश्रुत में ब्राह्मण के लिये दूसरे वर्णों से चिकित्सा में तथा दूसरे कार्यों में भेद बताया है।

यथा—

(१) ब्राह्मणो वा शिलोऽञ्चवृत्तिभूत्वा ब्रह्मरथमुद्भरेत्, कृषेत् सततमितरः, खनेद्वा कूपम् ॥

(२) ‘तत्रारिष्टं ब्राह्मणश्चित्रियवेश्यशुद्राणां श्वेततरूपीतकृष्णेषु भूमिप्रदेशेषु बिल्वन्यग्रोधतिन्दुकभरुलातकनिर्मितसर्वागारं यथासंख्यं तन्मयपर्यङ्कम् ॥’ शा० अ० १०।

चरक में इस प्रकार का भेद चिकित्सा में नहीं है। वहाँ पर जातिस्त्रीय विधि में आसन का भेद वर्ण के अनुसार अवश्य है, यह प्रथा स्मृति काल से चालू है, परन्तु वर्णभेद से भूमिभेद नहीं है, अपि तु इसके विपरीत चरक में—

विद्यासमाप्तौ भिषजस्तृतीया जातिरुच्यते। अस्तुते वैद्यशब्दं हि न वैद्यः पूर्वजन्मना। विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सर्वस्वार्थमथापि वा, ध्रुवमाविशति ज्ञानात्समाद् वैद्यक्षिजः स्मृतः ॥

(*त्रिजः के स्थान पर द्विजः भी पाठ है)। चरक चि० अ० १।४।५२-५३

इससे स्पष्ट है कि चरक के पीछे सुश्रुत बना है, और सुश्रुत आज कल के रीतिरिवाजों से अधिक परिचित था।

सुश्रुत में बौद्ध समय के शब्दों का भी उल्लेख है, यथा—

विशिखा—“अथातो विशिखानुप्रवेशनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः।” विशिखा का अर्थ कर्म मार्ग या रथा दिया है। परन्तु जैन ग्रन्थों में (उत्तराध्ययनसूत्र में चूर्णिटीका) विशिखा शब्द मल्ल लोगों को आराम करने के स्थान के लिये आया है। कुश्ती करते-करते जब मल्ल थक जाता है, तब वह आराम लेने के लिये जिस स्थान पर जाता है, उस स्थान को विशिखा कहते हैं। आजकल भी बौक्स में ऐसा स्थान निश्चित होता है। वहाँ पर खड़े हुये व्यक्ति पर चोट नहीं की जा सकती। उत्तराध्ययन सूत्र में यह विशिखा शब्द दो मल्लों की कुश्ती के प्रसंग में ही आया है।१

१ तृतीया के स्थान पर द्वितीया भी पाठ है।

२ चरक में भी विशिखा शब्द है—वहाँ पर रथा बर्थ ठोक है, परन्तु सुश्रुत में कर्म मार्ग या घर बर्थ ठोक है।

( ७ )

भिल्लुसंधाटी१—यह दूसरा शब्द है। यथा—“जोगीं च भिल्लुसंधाटी धूपनायोपकल्पयेत् ॥” पुरानी भिल्लुसंधाटी (कन्या गुदडिया) का धुवाँ दे। जिन वस्तुओं के साथ इसको पढ़ा है उनको देख लीजिये, यथा—

“पुरीषं कौकुरुटं केशाश्चर्मसर्पत्वचं तथा” मुरे की बीठ, बाल, खाल, सर्प की केंचुली इनके साथ जोगी वस्त्र का धुवाँ देना कहा है। ये सब चीजें घृणित-निन्दित हैं। इन निन्दित वस्तुओं के साथ भिल्लुसंधाटी को भी गिना है, इससे स्पष्ट है कि यह कोई पवित्र वस्तु नहीं, अपितु घृणित वस्तु है। जब कि प्रब्राजित साधु सबसे बड़े—मान्य-पूज्य माने हैं। इसलिये टीकाकारों ने भिल्लुसंधाटी से शाक्यभिल्लु बौद्ध का ग्रहण किया है (यथा—भिल्लुरव शाक्यभिल्लुः बौद्धाख्यः—डल्हण)। नहीं तो अपने पूज्य आचार्य को प्रत्येक वस्तु को शिष्य महत्त्व की मानते हैं, जैसे लोग गांधी जी के चप्पल, फाउन्टेनपेन, उनके वस्त्र पूज्य समझते हैं। परन्तु सुश्रुत के समय बौद्धभिल्लु घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे, इसी से उनका जोगी वस्त्र घृणित मानकर घृणित वस्तुओं के साथ धूप कार्य में लिया गया है। ब्राह्मणों का और बौद्धों का परस्पर विरोध रहा, इसका साक्षी इतिहास आज भी है।

इसलिये वर्तमान सुश्रुत बौद्धकाल के उदय काल के पीछे जब पुनः पुष्यसिन्ध ने ब्राह्मणों का राज्य स्थापित किया, तब का बना होना चाहिये। चूँकि इसमें ब्राह्मणों की प्रधानता है।

इसके सिवाय ज्वर की चिकित्सा में रोगी को सम्पूर्ण विश्राम देने का इस सुश्रुत में विशेष विधान है। टाई फाईड रोगी को बिल्कुल हिलने-जुलने से मना करते हैं, सुश्रुत भी ऐसा ही बताते हैं, यथा—“ज्वरे प्रमोहो भवति स्वल्पैरप्यवचेष्टितैः। निषण्णं भोजयेत्समात् मूत्रोच्चारो च कारयेत् ॥ निषण्णम्—शय्याथामेव आसीनमुपविष्टम् ॥”

चरक में इस प्रकार का स्पष्ट वचन रोगी के लिये नहीं मिलता। बौद्धकाल में आयुर्वेद की उन्नति विशेष रूप में हुई। तक्षशिला का विश्वविद्यालय आयुर्वेद के लिये प्रसिद्ध था। जीवक ने यहाँ शिक्षा ली। जीवक—बौद्धग्रन्थों में प्रसिद्ध चिकित्सक रहा२। इसलिये सुश्रुत में ज्वर के इस मुख्य अङ्ग को स्पष्ट किया है। ज्वर में—विश्राम मुख्य वस्तु है।

इन सबके सिवाय उत्तरकुरु शब्द का सुश्रुत में आना है। यह उत्तरकुरु शब्द सुश्रुत के सिवाय और किसी आयुर्वेद-ग्रन्थ में नहीं है।

“वाह्निकाः शाद्वलाश्रीनाः मूलीका यवनाः शकाः। मांसगोधूममाध्वीकशन्त्रवैश्रनारोचिताः ॥

मत्स्यसात्यसत्था प्रान्याः क्षीरसात्यश्च सैन्धवाः। अश्मकावन्तिकानां तु तैलाम्लं सात्यमुच्यते ॥

कन्दमूलफलं सात्यं विद्यानमल्यवासिनाम्। सात्यं दक्षिणतः पेया मन्यश्चोत्तरपश्चिमे ॥

मध्यदेशे भवेत्सात्यं यवगोधूमगोरसाः ॥” चरक चि० अ० ३०-३१६-३१६ ॥

ये देश भारत के हैं, या उसके पास हैं। इनमें उत्तरकुरु का वर्णन नहीं है। सुश्रुत में उत्तरकुरु का वर्णन ऐसे स्थान पर है, जहाँ पर कि जाना सुगम नहीं, वहाँ पर रसायनसेवी ही जा सकता है, यथा—

“क्षीरोदं शकषदनमुत्तरांश्च कुरुनपि। यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥” सु० चि० अ० २६-१७

उत्तरकुरु शब्द महाभारत में भी नहीं आया, परन्तु किरातार्जुनीय में अर्जुन की विजय वर्णन में आया है, यथा—

विजित्य यः प्राञ्चमयन्च्छदुत्तरान् कुरुनकुप्यं वसु वासवोपमः।

सवल्कवासिंसि तवाधुना हरन् करोति मन्युं न कथं धनञ्जयः ॥भारवि

अर्जुन ने उत्तरकुरुओं को जीतकर बहुत सा सोना युधिष्ठिर को लाकर दिया था।

यह उत्तरकुरु—शकषदन—स्वर्ग के बराबर का स्थान है। प्राचीनकाल में जब-जब भी रावण या किसी राजा को (रघु आदि को) धन की जरूरत हुई, उन्होंने स्वर्गपर चढ़ाई की—ऐसी कयायें इस भारत देश में बहुत सी हैं। कुछ भी हो उत्तरकुरु स्थान-स्वर्ग के समान साधारण मनुष्यों से अगम्य था। उत्तरकुरु को वर्तमान ऐतिहासिक “थ्यन शान” कहते हैं। यह चीनी शब्द है, जिसका अर्थ देवताओं का पहाड़ है। जो ठीक भी

१ संधाटी—बौद्ध साधुओं का कटि से ऊपर का उत्तरीय वस्त्र है।

२ मेरा शल्यतंत्र इस विषय में सहायक होगा।

( ८ )

लगता है, इसका स्थान मध्य एशिया में मानते हैं। जब कि हम लोग स्वर्ग-त्रिविष्टप को वर्तमान तिब्बत कहते हैं। इसलिये उत्तरकुश-वर्तमान तिब्बत के पास का ध्यान शान पर्वत ही हो तो इसमें कोई आपत्ति नहीं।

इन सब से अधिक वर्तमान सुश्रुत में राम-कृष्ण का नाम भी आता है। राम और कृष्ण इस देशवासियों के पूज्य हैं। उनका सुश्रुत में नाम कथन होना—इसको ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में प्रबल युक्ति है। यथा—

“महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि। तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ॥ सु० चि० अ० ३०।२७

राम, कृष्ण का नाम होना, उत्तरकुश कथन, विशिखा, भिल्लुसंघाटी शब्दों का आना, ब्रह्मभोज आदि बातों का वर्णन—सुश्रुत संहिता को ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में पर्याप्त है। साथ ही इसका संस्कृत्ता नागार्जुन-बौद्ध हो, इसमें सन्देह उत्पन्न करता है। बौद्ध संस्कृत्ता-बौद्धों के लिये एक भी प्रतिपादक पंक्ति या उसकी झलक किसी रूप में न देवे, यह मुश्किल है, खासकर जब हम देखते हैं, कि अहिंसा के कारण हमारा शल्यशास्त्र (सर्जरी) पर्याप्त अधोगति में उतरा है, उसमें शल्यशास्त्र के इस प्रधान ग्रंथ का संस्कृत्ता बौद्ध हो, इसके मानने में सन्देह रहता है। यदि संस्कृत्ता नागार्जुन है तो वह बौद्ध नहीं था, और यदि बौद्ध नागार्जुन के सिवाय दूसरा कोई नागार्जुन नहीं मिलता तो इस सुश्रुत का प्रतिसंस्कृत्ता नागार्जुन नहीं है, कोई दूसरा होगा।

इसलिये डल्हन के वचन पर आँखें बन्द करके बैठने में सन्देह रहता है।

वर्तमान सुश्रुत में चरक संहिता के वाक्य बहुत से एक जैसे ही आते हैं। यथा—

सुश्रुत में

(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान् सु० चि० अ० ३६।१५०

(२) गुरुकावस्थिरावूरु न स्वाविव च मन्यते ॥

(३) गोधूमवेणुयवानुपयुञ्जति।

(४) मधु मधुरमामलकरसेन हरिद्रायुतं,

(५) स्थितं दशाहत्रयमेतदञ्जनम् कृष्णोरगास्यै कुशसंप्रवेष्टिते।

तन्मालतीकोरकसैनधवायुतं

सदाऽञ्जनं स्यात् तिमिरेऽथ रागिणे ॥

(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते।

अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्रादेककालं प्रवर्त्तते ॥

(७) मिथ्याचारेण यः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।

जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणुताः पुष्क ॥

उ० अ० ३८।५

(८) वातिकं बस्तिमिश्रापि पैत्तिकं तु विरेचनैः।

कफजं वमनैर्ध्यानपस्मारमुपाचरेत् ॥

(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते शुष्यति

चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्ये- तमपीनसेन ॥ सु० अ० २२।६

चरक में

(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान्। चरक० चि० अ० ३।१६

(२) अन्यनेयौ हि संमग्नावूरुपादौ च मन्यते ॥

(३) देयास्तथा वेणुयवा यवानां कल्पेन गोधूममयाश्च मद्याः ॥

(४) क्षौद्रेण युक्तामयवा हरिद्रां पिबेद् रसेनामलकीफ- लानाम्।

(५) वदने कृष्णसर्पस्य निहितं भासमञ्जनम्।

ततस्तस्मात्समुद्भूत्य सुशुष्कं चूर्णयैद् बुधः ॥

सुमनःकोरकैः शुष्कैरधीशैः सैन्यवेन च।

एतन्नेत्राञ्जनं कार्यं तिमिरन्मनुत्तमम् ॥

(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते ॥

चि० अ० ३।६३

(७) मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।

जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणु ताः पुष्क ॥

चि० अ० १३०

(८) वातिकं बस्तिभृषिष्ठैः पैत्तां प्रायो विरेचनैः।

शलैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् ॥

(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते धूप्यति

चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्येतमपीनसेन ॥ चरक चि० अ० २६।११४

अत्रिदेव

१ ‘पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थांयामसंज्ञायाम्’ पाणिनि के इस सूत्र को व्याख्या में ‘उत्तराः कुशरः’ यह उदाहरण है। इससे स्पष्ट है कि पाणिनि से पूर्व उत्तरकुश शब्द प्रसिद्ध था।

* सुश्रुतविषयानुक्रमणिका *

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
सूत्रस्थान२ वारीरिक रोग ✓पांचों स्थानों के अध्यायों की संख्या११
प्रथमोऽध्यायः३ मानसिक रोग ✓सूत्रस्थान के अध्यायों के नाम११
वेदोत्पत्ति अध्याय की व्याख्या४ स्वाभाविक रोग ✓निदानस्थान११
औपधेनव आदि ऋषियोंका धन्वन्तरि भगवान् के पास आयुर्वेद-अध्ययन के लिये आनारोगों का आश्रय ✓शारीरस्थान१२
धन्वन्तरि भगवान् द्वारा औपधेनव आदि ऋषियों का स्वागतरोगों का निग्रह ✓चिकित्सास्थान१२
आयुर्वेद अथर्व वेद का उपांग हैरोगों का संशोधन ✓कल्पस्थान१३
आयुर्वेद के शल्य आदि ८ अङ्गसंशमन के दो प्रकार ✓उत्तरस्थान१३
१ शल्य का लक्षणचार प्रकार का आहार आचारशालाक्यतंत्र१३
२ शालाक्य का लक्षणऔषधियों के दो प्रकारकुमारतंत्र१३
३ कायचिकित्सा का लक्षणस्थावर औषधियों के चार प्रकारकायचिकित्सा१३
४ भूतविद्या का लक्षणजंगम औषधियों के चार प्रकारभूतविद्या१३
५ कौमारभृत्य का लक्षणस्थावर औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयवतन्त्रभूषण१४
६ अगदतंत्र का लक्षणजंगम औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयवउत्तरतंत्र के नाम का कारण१४
७ रसायनतंत्र का लक्षणपार्थिव औषधियांआयुर्वेद के आठ अङ्ग१४
८ वाजीकरण का लक्षणकालकृत औषधनिरूपणवैद्यों का राजा से पूजित होने का कारण१४
शल्यशान को मुख्य रखते हुए सारे आयुर्वेद के उपदेश के लिये प्रार्थनाकालकृत औषधप्रयोजनवैद्यों का राजा से वध किये जाने का कारण१४
औपधेनव आदि का सुश्रुत को प्रश्न करने का अधिकारादेशशारीरिक रोगों के प्रकोप तथा शान्ति के कारणशास्त्र को न जाननेवाला वैद्य१४
आयुर्वेदशास्त्र का प्रयोजन ✓आगन्तुक रोगों के दो प्रकारआयुर्वेद किस प्रकार पढ़ना चाहिये१५
आयुर्वेद निरुक्ति ✓पुरुष, व्याधि, औषध, क्रियाकाल की संक्षिप्त व्याख्यापाठ करने की विधि१५
शल्यतंत्र का प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से अविरोधचिकित्सा शास्त्र का बीजअध्ययन के समय शिष्य का कर्तव्य१५
शल्यतंत्र का आदि रूपसुश्रुतके १२० अध्याय और ५ स्थानचतुर्थोऽध्यायः
आयुर्वेदतन्त्रों में शल्यतंत्र सर्व श्रेष्ठसुश्रुत से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार का सुख मिलता हैप्रभाषण नामक अध्याय की व्याख्या१५
शल्यतंत्र की प्रशंसाद्वितीयोऽध्यायःव्याख्या का प्रयोजन१५
आयुर्वेद की गुरुपरम्परा ✓शिष्योपनयनीय अध्याय का अवतरणव्याख्या की आवश्यकता१५
भगवान् धन्वन्तरि का आत्मपरिचयशिष्य परीक्षाआयुर्वेद से अतिरिक्त अन्य शास्त्रों को जानने का उपाय१६
आयुर्वेद के अधिष्ठानभूत पुरुष का निरूपणशिष्य की दीक्षा विधिवैद्य शब्द का अधिकारी१६
व्याधियों का साधारण रूपआयुर्वेद अध्ययन के अधिकारी१०अन्य शब्दतंत्र१६
व्याधियाँ चार प्रकार की हैं ✓शिष्य का कर्तव्य१०पंचमोऽध्यायः
१ आगन्तुक रोग ✓रोगी परिचर्या के लिये उपदेश११अग्निपहरणीय अध्याय की व्याख्या१६
अनध्याय काल११कर्म के तीन प्रकार१६
तृतीयोऽध्यायःशस्त्रकर्म के आठ प्रकार१६
अध्ययन सम्प्रदातीय अध्याय की व्याख्या११शस्त्रकर्म के पूर्व तैयार रखने योग्य उपकरण१७
११

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
शस्त्रक्रिया का उपदेश१७
शस्त्रकर्म में व्रण की प्रशस्त आकृति१७
शस्त्रकर्म करनेवाले वैद्य के गुण१८
एक व्रण से घाव पूरा साफ न होने से अन्य व्रण बनाने चाहिए१८
व्रण में जहाँ भी पूय की गति देखे अथवा पूय संचय हो गया हो व्रण कर देना चाहिये१८
तिरछा छेदन कहाँ करना चाहिये१८
अर्धचन्द्राकार छेदन कहाँ करना चाहिये१८
उपर्युक्त विधि से छेदन न करने पर दोष१८
किन रोगों में रोगी को बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये१८
शस्त्रकर्म के पश्चात् कर्म ✓१८
व्रण का धूपन१८
धूपन द्रव्य१८
राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षाकर्म१८
आहार विहार का उपदेश२०
व्रण को खोलने का समय२०
कषाय, लेपन, वन्धन आहार-विहार की विधि२०
व्रण का रोपण कब करना चाहिये ✓२०
ऋतु के अनुसार पट्टी करनी चाहिये ✓२०
इसमें अपवाद२०
शस्त्र क्रिया के कारण उत्पन्न हुई तीव्र वेदना को शान्त करने का उपाय२०

पष्टोऽध्यायः

ऋतुओं में किस प्रकार का आचरण करना चाहिये२०
काल की व्याख्या२०
संवत्सर रूपी धीरीर वाले काल का विभाग२१
छः ऋतुओं का विभाग२१
दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन विभाग२१
विषयपृष्ठ
चन्द्र सूर्य का आश्रय करके वायु प्रजा का पालन करती है२२
युग का वर्णन२२
ऋतुयें वातादि दोषों के संचित प्रकोप प्रशमन में कारण हैं२३
प्रकुपित हुए दोषों को दूर करने का उपदेश२३
कालस्वभाव के कारण वातपित्तादि दोषों की शान्ति कब होती है२३
सांवत्सरिक विधि को दिन रात में भी कहते हैं२३
अदूषित ऋतुओं में गेहूँ चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं२३
इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है२४
दूषित अन्न पान से महासारी आदि फैलती है२४
अन्य कारण जिनसे जनपद नष्ट होते हैं२४
इनकी सामान्य चिकित्सा२४
अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण२४
ऋतुओं के स्वभाविक गुणों में अत्यधिकता के कारण अथवा स्वभाविक गुणों में विपरीतता के कारण प्राणियों के वातादि दोष कुपित हो जाते हैं२५
रोगोत्पत्ति से पूर्व ही दोषों का शमन करना चाहिये२५

सप्तमोऽध्यायः ✓

यंत्रविधि अध्याय का वर्णन२६
यंत्रों की संख्या२६
यंत्र कैसे कहते हैं२६
यंत्रों के भेद२६
यंत्र किसके बनते हैं२६
यंत्रों की बनावट२६
उपसंहार२६
विषयपृष्ठ
स्वस्तिक यंत्रों का प्रमाण तथा आकार२६
संदेश यंत्र२७
ताल यंत्र२७
नाड़ी यंत्र२७
शलाका यंत्र२८
उपयन्त्र२८
यंत्रों के उपयोग२८
यंत्रों के कर्म२९
उपसंहार२९
यन्त्र दोष२९
कैसे यंत्र बरतने चाहियें३०
भिन्न भिन्न यंत्रों से क्या काम लेना चाहिये३०
कंकमुख यंत्र सब में प्रधान है३०

अष्टमोऽध्यायः ✓

शस्त्रावचारणीय अध्याय की व्याख्या३०
शस्त्रों की संख्या—(आकार नाम से स्पष्ट है)३०
शस्त्रों का उपयोग३०
शस्त्रों को पकड़ने की विधि३१
शस्त्रों के गुण३१
शस्त्रों के दोष३१
अधविध कार्य में धारका निश्चय३२
बद्धिश तथा एषणी यंत्र की धार३२
पायना कैसे कहते हैं और उसके प्रकार३२
शस्त्रों की तेज कैसे करना चाहिये३२
धार की पहिचान३३
अनुग्रन्थ और उनका उपयोग३३
शस्त्रों का परिचय अत्यावश्यक३३
नवमोऽध्यायः
योग्यास्त्रीय अध्याय की व्याख्या३३

विषयानुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
संपूर्ण शास्त्र पढ़े हुए को भी कर्माभ्यास करना चाहिये३४
छेदन के सब भेदों को दिखाना चाहिये३४
उपसंहार३४
दशमोऽध्यायः
विशिखानुप्रवेशनीय अध्याय की व्याख्या३४
शास्त्रकर्म के लिये वैद्य को किस प्रकार घर में प्रवेश करना चाहिये३५
रोग को जानने के लै प्रकार३५
रोग विज्ञान के उपाय३५
रोगों की परीक्षा कर लेने पर साधु रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये३६
किन व्यक्तियों में साधु रोग भी प्रायः करके अति कष्टसाध्य होते हैं३६
चिकित्सा के समय वैद्य के लिये नियम३६
एकादशोऽध्यायः ✓
क्षारपाकविधि की व्याख्या३६
शास्त्र तथा अनुशास्त्रों में क्षार ही प्रधान है३६
क्षारनियुक्ति३६
क्षार के गुण कर्म३७
क्षार के दो प्रकार३७
प्रतिसारणीय क्षार का विषय३७
पानीयक्षार३७
जिन रोगों में क्षार निषिद्ध है३७
पानीयक्षारपाक विधि३७
प्रतिसारणीय क्षारनिर्माण विधि३७
मृदु मध्यम तथा तीक्ष्ण क्षार३८
इन तीनों का व्याधि के अनुसार प्रयोग होना चाहिये३९
क्षार के गुण दोष३९
क्षारप्रतिसारण विधि३९
सम्यग दग्ध होने के लक्षण तथा उसके पश्चात् कृत्य४०
अग्न से क्षार की शान्ति के लिये प्रकार४०
सम्यक प्रकार से जलने पर४०
विषयपृष्ठ
कम जलने पर४०
अति जलने पर४०
किन के लिये क्षार कर्म उपयुक्त नहीं४०
प्रदेश विशेष से निषेध४१
साध्यरोगों में किन अवस्थाओं में क्षारकर्म सफल नहीं होता४१
द्वादशोऽध्यायः ✓
अग्निकर्म की व्याख्या४१
क्षार से अग्नि श्रेष्ठ है४१
दहन कार्य के साधन४१
शरद तथा ग्रीष्म ऋतु को छोड़४१
अग्निकर्म करना चाहिये४२
अग्निकर्म के दो प्रकार४२
स्वच्छा के जलने पर४२
शिर के रोगों तथा अधिमन्य४२
किनमें अग्निकर्म करना चाहिये४२
रोग के आश्रयभेद से अग्निकर्म चार प्रकार का है४३
अग्निकर्म में प्रवृत्ति निवृत्ति का निश्चय४३
किन पुरुषों में अग्निकर्म नहीं करना चाहिये४३
अन्य प्रकार से जले हुए व्यक्तियों के लक्षण४३
आग से जले हुये के ४ प्रकार४४
आग से जले हुये के चिकित्सा कर्म४४
धूम से पीड़ित व्यक्तियों के लक्षण४४
वमन के लिये४४
उष्णवात४४
त्रयोदशोऽध्यायः ✓
जलौकावचरणीय अध्याय की व्याख्या४५
जौक का उपयोग४५
विद्याम्य रक्त को निकालने के तीन तरीके—गाय का सींग, जौक, तथा तुम्बी कौन सा रक्त निकालने के लिये उपयुक्त है४५
जलायुका शब्द की नियुक्ति४६
जलायु के प्रकार४६
विषयुक्त जौके४७
निर्विषा जौके४७
निर्विष जलौकाओं के प्रशस्तक्षेत्र४७
विषयपृष्ठ
जौकों को क्षेत्त्र भेद से विष युक्त तथा निर्विष जौके४७
जौक को ग्रहण करने के उपाय४७
जौक को पालने के उपाय४८
यह जौके जिनका उपयोग नहीं करना चाहिये४८
जौकों को किस तरह लगाना चाहिये४८
जौक रक्त ले रही है अथवा नहीं यह जानना४८
जौक को विशुद्ध रक्त पीने न देने का उपाय४८
जौक के गिरने पर उसके रक्त को निकालने का उपाय४८
शोणितवासेचन होने पर ब्रणों को चिकित्सा४८
चतुर्दशोऽध्यायः
शोणितवर्णनीय अध्याय की व्याख्या४९
रस का वर्णन४९
रक्त तथा आर्तव की उत्पत्ति वर्णन४९
रक्त तथा आर्तव भेद४९
शोणित के स्वभाव में मतान्तररक्त पांचभौतिक है४९
शुक्र की उत्पत्ति तथा भाग४९
अन्नपान का सारभाग रस है४९
रस शब्द की निरुक्ति४९
एक धातु में रस का अवस्थानकाल५०
शरीर में रस की तीन प्रकार की गति५०
वाजीकरण औषधियों का शीघ्र शुक्र विरेचन५१
बालकों की शुक्र अदर्शन में युक्ति५१
अन्न रस का बुढ़ापे में पुष्ट न करना५२
धातुशब्दनिरुक्ति५२
विकृत शोणित का दोषभेद से लक्षण५२
शुद्ध शोणित का वर्णन५२
विद्याम्य रक्तों की व्याख्या५२
रक्तमोक्षण के अयोग्य रोगी५३
शास्त्रविद्यावण के प्रकार५३
रक्तखाव के अयोग्य हेतु५३
दुष्टरक्त के बाहर न निकलने से खाव से दोष५३

सुश्रुतसंहिता

विषय पृष्ठ

रक्त के अतियोग और उसके उपद्रव ५३

रक्तविखावण योग्य काल ५३

रक्तशुद्धि के लक्षण ५३

रक्तके सम्यक् प्रवाह के उपाय ५४

रक्तके अधिक प्रवाह रोकने के योग्य ५४

रक्तखावनिवारण के चार उपाय ५५

पंचदशोऽध्यायः

दोष धातु मलक्षय बुद्धि विज्ञानीय

अध्याय की व्याख्या ५५

स्वस्थों के वातादि का कर्म ५५

धातु रक्षा के उपदेश ५६

दोषों के क्षय की चिकित्सा रसक्षय ५६

मलक्षय ५७

आर्तव क्षय ५७

बढ़े हुए दोष धातु मलों के लक्षण और उनकी चिकित्सा ५७-५८

बल और बलक्षय के लक्षण ५८

ओज का क्षय ५८

ओज के तीन दोष और चिकित्सा ५८

स्थूलता और कृशता की

चिकित्सा ५९-६१

मध्य की श्रेष्ठता ६२

षोडशोऽध्यायः

कर्ण वेधन विधि की व्याख्या ६२

कर्ण वेधन विधि ६२

सिराओं के वेधन से क्या दोष होते हैं ६३

इन दोषों की चिकित्सा ६४

वेधन के पश्चात्कर्म ६५

दोष के शान्त होने पर कानों को लम्बा करना ६५

कानों के दो मार्ग हो जाने पर उनको जोड़ने की विधि ६६

पन्द्रह कर्णबन्धाकृतियाँ ६६

कपाट सन्धि तथा अर्ध कपाट सन्धिक बन्धन ६६

कर्ण पाली को बनाना ६६

कर्ण सन्धि ६६

कर्णबन्ध के समय परित्याग करने योग्य बातें ६६

विषय पृष्ठ

सन्धान न करने के कारण ६७

अदूषित कान को बढ़ाने के लिये अभ्यङ्ग ६७

उद्बर्तन ६७

असंख्य कर्ण बन्धन ६७

पाली के उपद्रवों के नाम और लक्षण ६७

उत्पाटक रोग में ६७

श्याम रोग में ६७

नासिका का शल्यकर्म ६७

ओष्ठ सन्धानविधि ६७

सप्तदशोऽध्यायः

आमपक्ववेणीय अध्याय की व्याख्या ६८

ग्रन्थि, विद्रधि, अलजी आदि रोगों का प्रधान कारण शोथ ६८

शोथ का लक्षण ६८

शोथ छे प्रकार का है ६८

आम शोथ के पकने के लक्षण ६९

शस्त्रकर्म से पूर्व कर्म ७०

कष्टसाध्य शोथ ७०

बाहर न निकली हुई पूय, मांस, शिरा स्नायुओं का भक्षण करता है ७०

अष्टादशोऽध्यायः

त्रणलेपनबन्धविधि की व्याख्या ७१

आलेप ही सब उपायों में प्रधानतम है ७१

आलेप को लोमों के अधिमुख लगाना चाहिये ७१

सूखा हुआ आलेप निरर्थक और दर्द करनेवाला होता है ७१

आलेप तीन प्रकार का है ७१

आलेप का प्रमाण ७१

रात्रि को आलेप नहीं करना चाहिये ७२

प्रदेह साध्य व्याधि में दिन में आलेप करना उत्तम है ७२

त्रणबन्धन द्रव्यों की व्याख्या ७३

पट्टियाँ ७३

शरीर के भिन्न २ प्रदेशों में कौन सी पट्टी बाँधना चाहिये ७३

औषधकल्क ७४

विषय पृष्ठ

त्रणके स्थानभेद से बन्ध भी तीन प्रकार का है

दोष विशेष से बन्ध ७४

कालविशेष से बन्ध विशेष ७४

क्षिथिलबन्ध के स्थान पर गाढ बन्ध नहीं बाँधना चाहिये ७४

त्रण पर पट्टी न बाँधने से त्रण जल्दी कैसे भरता है ७५

किन अवस्थाओं में बन्धन नहीं बाँधना चाहिये ७५

उपसंहार-यंत्रणा तीन प्रकार की है ७६

किन में बन्धन बाँधना आवश्यक है ७६

एकोनविंशोऽध्यायः

त्रणितोपासन्य की व्याख्या ७६

त्रणी पुरुष के लिए सबसे पहले क्या व्यवस्था करनी चाहिये ७६

प्रशस्त प्रदेश में बने घर से लाभ ७६

शय्या पर सोने से लाभ ७६

त्रणी पुरुष को कभी दिन में न सोना चाहिए ७६

त्रणी की चेष्टाएँ किस प्रकार होनी चाहिए ७६

गम्य ग्राम्यधर्म के योग्य स्त्रियों से दूर बचना चाहिए ७७

किस आहार का परित्याग करना चाहिये ७७

बाह्य आहार-विहार-जिनसे बचना चाहिये ७७

आधिदैविक रक्षा ७७

धूप कैसी देनी चाहिये ७८

किन औषधियों को सिर पर धारण करना चाहिये ७८

सेवन विधि ७८

विशतितमोऽध्यायः

हिताहितौय नामक अध्याय की व्याख्या ७९

द्रव्य स्वभाव से, संयोग से, पूर्णरूप में हित या अहित दोनों करने-वाले होते हैं ७९

विषयानुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
पूर्णरूप में हितकारी द्रव्य८०
प्राणियों का पथ्य-आहार८०
विहार८०
अन्य द्रव्य संयोग के आहार
विषवत् अतिकारी हो जाते हैं८०
अग्नि आदि पदार्थों को देखकर
एकान्त अहित पदार्थों का भी
उपयोग करें८०
अन्यसंयोगरूपी अहितकारी
द्रव्य८०
कर्मविरुद्धद्रव्य८१
मानविरुद्ध द्रव्य८१
रस, वीर्य और विपाक में विरुद्ध
द्रव्य८१
कोई द्रव्य दोष का प्रकोपक और
कोई द्रव्य दोष की शान्ति
करता है८१
रस आदि धातुओं में विकार
कैसे होता है८२
चिकित्सासूत्र८२
किन अवस्थाओं में विरुद्ध भोजन
निष्फल हो जाता है८२
दिशा के योग से वायु की हित्
कारिता और अहित कारिता८३
एकविंशतितमोऽध्यायः
व्रण प्रश्न नामक अध्याय की
व्याख्या८३
शरीर की उत्पत्ति में कारण८३
निरुक्ति८३
दोषों के स्थान८४
इनके पांचविभाग८४
पित्त के अतिरिक्त क्या कोई
और अग्नि शरीर में है८४
शरीर में पित्त के कार्य८४
पित्त के लक्षण८५
कफ के स्थान८५
कफ के गुण८५
दोषों के प्रकोपक कारण८६
विषयपृष्ठ
दोषों का प्रसार८६
रोग की उपलब्धि८८
व्रण शब्द की निरुक्ति८६
द्वविंशतितमोऽध्यायः
व्रणस्त्रावविज्ञानीय अध्याय की
व्याख्या९०
व्रण के आठ अधिष्ठान९०
त्वचा में स्थित व्रण सुख
साध्य है९०
व्रण की चार आकृतियाँ९०
दुष्ट व्रण के लक्षण९०
सब प्रकार के स्त्राव९१
वायु के कारण९१
असाध्य स्त्राव९१
सब व्रणों की वेदना९१
पैतिक व्रणों के लक्षण९१
कफजन्य व्रण के लक्षण९२
व्रण के रङ्ग९२
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
कृत्याकृत्य नामक अध्याय की
व्याख्या९२
अतिशय सुखसाध्यव्रण९३
कृच्छ्र साध्य व्रण९३
व्रण जो सुखपूर्वक रोहण हो जाते हैं९३
साध्य के भेद कृच्छ्रसाध्य व्रण९३
याप्य व्रण९३
याप्य का लक्षण९३
असाध्य रोग९३
शुद्धव्रण के लक्षण९४
रोहण होते हुये व्रण के लक्षण९४
सम्यग् रुद्ध के लक्षण९४
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
व्यापिसमुद्देशीय नामक अध्याय की
व्याख्या९५
रोग दो प्रकार के हैं९५
तीन प्रकार का दुःख९५
सात प्रकार की व्याधियाँ९५
दुष्ट शोणित बलजाता९५
विषयपृष्ठ
प्रहार शक्ति से उत्पन्न आगन्तु-
जरोग९५
कालवृल प्रवृत्ता९५
रसादि धातुओं के विकार९६
वात आदि दोषों का ज्वर आदि
रोगों के साथ सम्बन्ध सदा बना
रहता है अथवा नहीं९७
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
अष्टविध शस्त्रकर्मोपध्याय की
व्याख्या९७
छेदन करने योग्य रोग९७
भेदन करने योग्य रोग९८
लेखन करने योग्य रोग९८
वेधन करने योग्य रोग९८
शलाका द्वारा एषण करने
योग्य९८
स्त्रावण करने योग्य रोग९८
सीने योग्य रोग९८
किन अवस्थाओं में सीना नहीं
चाहिये९९
संशोधन करने योग्य९९
सीने की विधि९९
सीने के चार प्रकार९९
सूई के भेद९९
सीने के पश्चात् कर्म९९
आठ प्रकार के शस्त्र कर्म में चार
प्रकार की व्यापद है९९
किस वैद्य का परित्याग करना
चाहिये१००
शस्त्र के अतियोग से होनेवाले
लक्षण१००
सर्म्पविद्धशिशा आदि के
लक्षण१००
स्नायु के विद्ध होने पर१००
सन्धि के विद्ध होने पर१००
अस्थि के विद्ध होने पर१००
बिरादि सर्म्प के विद्ध होने पर१०१

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
वैद्य को रोगी की रक्षा कैसे करनी चाहिये और उसका फल१०१
षड्विंशतितमोऽध्यायः
प्रनष्टशल्यविज्ञानीय अध्याय की व्याख्या१०१
शल्य के प्रकार१०१
शारीरिक शल्य१०१
शल्य के प्रसिद्ध भेद१०१
छोटे बड़े शल्यों की पाँच प्रकार की गति१०२
शल्य का लक्षण१०२
वात आदि दोषों से अदूषित१०२
त्वचा में शल्य छिप जाने पर१०२
सामान्य विज्ञानीय उपाय१०३
निःशल्य के लक्षण१०३
अस्थि रूप शल्य१०४

सप्तविंशतितमोऽध्यायः

शल्योपनयनीय अध्याय की व्याख्या१०४
शल्य के दो प्रकार१०४
अनवबद्ध शल्य को निकालने के १५ उपाय१०४
सब प्रकार के शल्य निकालने की दो विधियाँ१०५
अर्वाचीन शल्य को निकालने का उपाय१०५
पराचीन शल्य निकालने का उपाय१०५
उत्तुषित मुखवाले शल्य को निकालने का उपाय१०५
कुखि, वक्ष आदि के शल्य को निकालने का उपाय१०५
शल्य को निकालने के पश्चात् कर्म१०५
हृदय के समीप शल्य निकालने का उपाय१०६
अस्थि छिद्र में प्रविष्ट को निकालने के उपाय१०६
विषयपृष्ठ
कर्णवाले शल्य को निकालने का उपाय१०६
लाख आदि वस्तु के गले में फँस जाने से उसे निकालने का उपाय१०७
मछली का शल्य आदि निकालने का उपाय१०७
पानी में डूबे हुए मनुष्य के पेट में से जल निकालना१०७
भोजन का प्राप्त गले में फँस जाने से निकालने का उपाय१०७
गला घोटने पर१०७
अष्टविंशतितमोऽध्यायः
विपरीत व्रण विज्ञानीय अध्याय१०८
रिष्टलक्षण मृत्यु को बता देता है१०८
किन अवस्थाओं में रिष्टलक्षण नहीं पता चलते१०८
रिष्टलक्षणों के निवारण के उपाय१०८
प्राकृतिक गन्ध१०८
वैकृतगन्ध१०८
किन व्रणों का परित्याग करना चाहिये१०८
शब्द वैकृत१०९
स्पर्श वैकृत१०९
आकृति विशेष वैकृत१०९
उपद्रव१०९

एकौनत्रिंशत्तमोऽध्यायः

विपरीताविपरीत-दूत-शकुन-स्वप्न निदर्शनीय नामक अध्याय की व्याख्या१०९
वैद्य की मानसिक चेष्टाओं से रोगी के शुभ अशुभ भाव पता लग जाते हैं१०९
विषयपृष्ठ
निन्दित दूत के लक्षण११०
चेष्टायेँ११०
वेला११०
नक्षत्र११०
तिथि११०
शुभ-अशुभ शकुन१११
शुभ तथा निन्दित वायु१११
वैद्य को इनकी निश्चित रूप से परीक्षा करनी चाहिये१११
स्वप्न११३
विफल स्वप्न११३
उत्तरतंत्र में पढ़े हुये रोगों के लिये अन्य स्वप्न११४
अशुभ स्वप्न में चिकित्सा११४
शुभ स्वप्न११४

त्रिंशत्तमोऽध्यायः

पंचेन्द्रियार्थ विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या११४
अरिष्ट के लक्षण११५
न बचनेवाले रोगी के लक्षण११५

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

छाया विप्रतिपत्ति अध्याय की व्याख्या११६
निश्चयात्मक मरनेवालों के लक्षण११६
मृत्यु के कारण११७

द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्वभाव विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या११८
प्रकृति से प्रसिद्ध-शरीर के एक भाग में स्थित अवयवों का दूसरे रूप में परिवर्तित होना मृत्यु के लिये होता है११८
असाध्य के लक्षण११८

त्रयत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अवार्णीय नामक अध्याय की | ---|---

विषयानुक्रमणिका

9

विषयपृष्ठ
व्याख्या१२०
आठ महारोग१२१
वैद्य को किन रोगियों का परित्याग करना चाहिये१२२
चतुर्विंशतिसप्तमोऽध्यायः
युक्तसेनीय नामक अध्याय की व्याख्या१२२
राजा की रक्षा वैद्य को किस प्रकार करनी चाहिये१२३
१०१ साल की काल मृत्यु१२३
पुरोहित वैद्य से श्रेष्ठ है१२४
राजा के व्यसनों में फँसने के कारण१२४
चिकित्सा कर्म की सफलता में चार कारण वस्तुएँ१२४
वैद्य के गुण१२४
रोगी मनुष्य के गुण१२४
क्षेपज के गुण१२४
परिचारक के गुण१२४
पञ्चत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
आतुरोपक्रमणीय अध्याय की व्याख्या१२४
चिकित्सा से पहले रोगी की आयु परीक्षा१२४
दीर्घायु के लक्षण१२५
मध्यमायु पुरुष के लक्षण१२६
जघन्य आयु के लक्षण१२६
आयु के विज्ञान के लिये अङ्ग प्रत्यंग का ज्ञान, प्रमाण एवं सार१२६
क्रिया का लक्षण१२८
अग्नि के चार प्रकार१२९
विषमार्गिन१२९
तीक्ष्णार्गिन१२९
समार्गिन१२९
जाठराग्नि१३०
वय तीन प्रकार की है१३०
बृद्धावस्था में बाल्यावस्था के समान औषध मात्रा१३०
देह परीक्षा१३१
देश तीन प्रकार का है१३१
विषयपृष्ठ
मुख साध्य रोग१३१
षट्त्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
भूमिप्रविभागीय नामक अध्याय की व्याख्या१३२
भूमि का दो प्रकार का विभाग१३२
विशेष भूमि परीक्षा१३२
गन्ध, वर्ण एवं रस से उक्त भूमि का प्रकार की है१३३
औषधियों को रखने का स्थान१३३
सप्तत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
मिश्रक अध्याय की व्याख्या१३४
सन्निपातजन्य शोथ को नष्ट करने के प्रलेप१३४
लेप का संस्कार१३४
पाचन द्रव्य१३४
दारण द्रव्य१३४
पीडन द्रव्य१३४
शोथन द्रव्य१३४
वर्ति१३५
कल्क१३५
संशोधनघृत१३५
तैल१३५
शोथन चूर्ण१३५
शोथनी रसक्रिया१३५
धूपन१३५
रोपणकषाय१३५
रोपणवर्ति१३५
व्रण के संरोहण के लिये कल्क१३५
सिद्ध घृत१३५
रोपण तैल१३५
रोपणचूर्ण१३६
रोपण कार्य के लिए रस क्रिया१३६
मांसवर्धन कार्य में प्रशस्त औषधियाँ१३६
उभरे हुए मांस को काटने के लिये१३६
अष्टत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
द्रव्यसंप्रहणीय अध्याय की व्याख्या१३६
विषयपृष्ठ
सैतीस द्रव्य समूह के नाम आरग्वधादिगण१३६
सालसारदिगण१३६
वीरतर्वादिगण१३७
लोब्रादिगण१३७
अर्कादिगण१३७
सुरसादिगण१३७
मुष्कादिगण१३७
पित्तक्यादिगण१३७
एलादिगण१३७
वचादि तथा हरिद्रादिगण१३८
श्यामादिगण१३८
बृहत्यादिगण१३८
पटोलादिगण१३८
काकोल्यादिगण१३९
ऊषकादिगण१३९
सारिवादिगण१३९
अञ्जनादिगण१३९
पुरुषादिगण१३९
अम्बुघादिगण१३९
न्यम्रोघादिगण१३९
गुड्द्यादिगण१३९
उत्पलादिगण१३९
मुस्तादिगण१३९
त्रिफला१३९
त्रिकटु१३९
आमलक्यादिगण१३९
त्रप्वादिगण१३९
पञ्चमूल१३९
महापञ्चमूल१३९
वक्षमूल१३९
वल्लीपञ्चमूल१४०
कण्टकपञ्चमूल१४०
तुष्ट्यपञ्चकमूल१४०
एकोनचत्वारिंशतिसप्तमोऽध्यायः
संशोधनसंशमनीय नामक अध्याय की व्याख्या१४१
दो प्रकार के संशोधन१४१
शिरीरविरचन द्रव्य१४२
संशमनद्रव्य१४२

सुश्रुतसंहिता

विषय पृष्ठ

उचित मात्रा में न दी हुई औषध क्या दोष करती है १४३

चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक विज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४३

द्रव्य ही प्रधान है ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं १४४

द्रव्य का लक्षण १४४

रस ही प्रधान है ऐसा दूसरे आचार्य कहते हैं १४४

वीर्य ही प्रधान है ऐसा तीसरे आचार्य का मत १४४

विपाक ही प्रधान है ऐसा चौथे आचार्यों का मत है १४५

पाक भी दो प्रकार का है १४५

विपाक के दो भेद १४६

रस, वीर्य, विपाक में द्रव्य को ही श्रेष्ठ समझना १४६

शास्त्र की प्रधानता १४६

एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

द्रव्यविशेष विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १४७

द्रव्य की उत्पत्ति १४७

पार्ष्व द्रव्य १४७

आप्य द्रव्य १४७

वायवीय द्रव्य १४७

आकाशीय द्रव्य १४७

द्रव्य की कार्यशीलता, काल तथा कर्म १४७

द्रव्य के दो भेद (अधोमार्गी, ऊर्ध्वमार्गी) १४७

संशमनगुणवाले द्रव्य संग्राहक, दीपन, आग्नेय, लेखन, बुद्धि १४७

वीर्यसंज्ञक गुण १४८

पंचमहामृतों के समान गुण- वाले द्रव्यों में रस की विलक्षणता १४८

द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

रसविशेषविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४९

विषय पृष्ठ

सब मृतों में परस्पर सम्बन्ध बृद्धि तथा ह्राससे जाना जाता है १४९

जलीयरस के छ प्रकार १४९

परस्पर एक दूसरे से मिलने पर ६३ प्रकार १४९

कई आचार्यों के मत से रसों के दो भेद १४९

पित्त १५०

कफ १५०

रस के लक्षण १५०

रस के गुण १५०

अम्ल रस १५१

लवण रस १५१

कटु रस १५१

तिक्त रस १५१

कषाय रस १५१

मधुरवर्ग १५१

अम्लवर्ग १५१

लवणवर्ग १५१

कटुवर्ग १५१

तिक्तवर्ग १५१

कषायवर्ग १५१

छः रसों के परस्पर संयोग से ६३ भेद १५१

त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १५३

मैनफलकल्प १५३

जीमूतकल्प १५३

कुटजकल्प १५३

कृतवेधनकल्प १५५

इन्द्राकुल्प १५५

धामागविकल्प १५५

वमन औषधियों का योजना प्रकार १५५

चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

विरेचन द्रव्यविकल्प विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १५५

विरेचन में प्रधान द्रव्य १५५

त्रिदूतकल्प १५५

पित्तजन्य तथा कफजन्य रोग १५५

वातकफजरोग १५५

विषय पृष्ठ

मोदक १५६

वैरेचनीयद्रव्य चूर्ण १५६

यूषविधि १५६

पुटपाक रूपत्रिदूतकल्प १५६

वैरेचन लेह १५६

वैरेचन मोदक १५६

वैरेचन लेह गुटिका प्रयोग १५७

वैरेचन चूर्ण १५७

वैरेचन आसव १५७

वैरेचन पैष्टी सुरा १५७

वैरेचन सौवीर (कांजी) १५७

वैरेचन तुषोदक १५७

वैरेचन त्रिदूतमूलविधि १५८

दन्ती द्रवन्ती कल्प १५८

दन्ती द्रवन्ती स्नेहयोग १५८

दन्त्यादिमोदक १५८

व्योषादिविरेचन १५८

तिलककल्प १५८

हरीतकीकल्प १५९

त्रिफलकल्प १५९

हरीतकी विधान १६०

चतुरङ्गुलकल्प १६०

ऐरण्डतैलकल्प १६०

स्तुहीक्षीरकल्प १६०

त्रिदूतमोदक १६१

औषधकल्पनाविधि १६१

पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

द्रव्यविधि की व्याख्या १६१

आन्तरिक्ष जल के गुण १६१

पानी के गिरने से स्थान विशेष के कारण भिन्न भिन्न रस को प्राप्त करता है १६१

लोहित, कपिल आदि भूमि में मधुर अम्ल आदि रस युक्त जल होते हैं १६२

अन्तरिक्ष जल के अभाव में आकाश गुण बहुल १६२

अन्तरिक्ष जल के चार प्रकार १६२

भूमि के पानी के सात प्रकार १६२

हर-श्रुतु में कौन सा जल लेना चाहिये १६३

न बरतने योग्य जल १६४

विषयानुक्रमणिका

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
ल प्रकार के दोष जो अन्तरिक्ष जल में नहीं१६४हथिनी का दूध१६८मधु के आठ भेद उनके गुणदोष
दूषित पानी को स्वच्छ करने के उपाय१६४प्रातःकाल का दूध१६८भिन्न प्रकार१७५
दूषित पानी को पीने से कौन रोग होते हैं१६४सायंकाल का दूध१६८इलुवर्ग के गुण दोष१७७
रात वस्तुयें जो मलिन जल को स्वच्छ करती हैं१६५कच्चा दूध१६८मध्य वर्ग के भिन्न प्रकार के गुण दोष१७८-१८२
पाँच वस्तुयें जिन पर पानी का बर्तन रखना चाहिये१६५स्त्री के दूध को छोड़ सब गरम पीने चाहिये१६९मूत्र के भिन्न प्रकार, गुण दोष१८२
पानी को ठण्डा करने के सात उपाय१६५धारोण दूध१६९षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
भूमि के पानी के गुण१६५त्यागने योग्य दूध१६९अन्नपानविधि की व्याख्या१८३
पृथक् पृथक् नदियों के जल के गुण-दोष१६५दही तीन प्रकार का है१६९शालिवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१८४
जिन अवस्थाओं में शीतल पानी का देना उत्तम है१६६मधुर दही१६९कुधान्यवर्ग के भिन्न प्रकार
जिन अवस्थाओं में शीतल जल नहीं देना चाहिये१६६मन्दजात दही१६९गुण दोष१८५
नदी, सरोवर, तङ्गा, वापी, कुण्ड का खारा पानी, चौण्ड्य, झरने, औद्भिद, वैकिर, खेतों का पानी, छोटे गड्ढों का पानी१६६गाय, बकरी, भैंस, ऊँटनी, भेड़, घोड़ी, स्त्री, हथिनी के दूध केमांसवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१८८
आनूप देश का पानी१६६दही के गुण दोष१६९फलवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१९४
गरम पानी१६६गाय के दूध का दही सर्वश्रेष्ठ वस्त्र में से छाना दही१६९शाकवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१९९
रात का वासी पानी१६६उबाल कर दूध से बनाई दही१७०पुष्पवर्ग के भिन्न प्रकार
नारियल का पानी१६६मलाई१७०गुण दोष२०४
किन अवस्थाओं में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिये१६७मलाई के बिना दही१७०कन्दवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष२०५
किस अवस्था में पानी धीरे धीरे पीना चाहिये१६७दही किस ऋतु में नहीं खाना चाहिए१७०लवणवर्ग के भिन्न प्रकार
दूध आठ प्रकार का है१६७मस्तु के गुण१७०गुण दोष२०६
गाय का दूध१६७तक्रवर्ग१७०मशियों के गुण२०७
बकरी का दूध१६८तक्र किस अवस्था में नहीं खाना चाहिए१७०सब वर्गों में श्रेष्ठ२०७
ऊँटनी का दूध१६८तक्र के गुण दोष१७०कृत्ताक्षवर्ग के भिन्न प्रकार
भेड़ का दूध१६८तुरन्त निकाला मक्खन१७०गुण दोष२०८
भैंस का दूध१६८दूध से निकाला मक्खन१७१भक्ष्यवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष२१३
घोड़ी का दूध१६८दूध की मलाई१७१अनुपानवर्ग२१६
स्त्रियों का दूध१६८घी का सामान्य गुण१७१सम्पूर्ण आहारविधि२२०
गाय, बकरी, भैंस, ऊँटनी, भेड़, घोड़ी, स्त्री, हथिनी का घी१७२निदानस्थान
दूध से निकाला घी१७२प्रथमोऽध्यायः
पुरातन घी१७२वातव्याधिनिदान की व्याख्या२२३
दस साल का पुराना घी१७२वायु के विषय में प्रश्न२२३
एक सौ ग्यारह साल का घी१७२वायु के स्वरूप का वर्णन२२३
तेल१७२वायु का शरीर में विरेचन का क्रम२२४
भिन्न २ प्रकार के तेल के गुण दोष१७३

१०

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
प्राण, उदान, समान, ध्यान, अपान वायु२२४
नाना स्थानों में आश्रित वायु के प्रकोप से होनेवाले रोग२२५
अवयवों में पहुँचकर वायु असंख्य रोग होते हैं२२५
प्राण वायु के पित्त के साथ मिलने पर२२६
वातरक्त रोग का कारण२२६
सम्प्राप्ति२२६
पूर्वरूप, असाध्य, आक्षेप२२७
असाध्य अपतानक२२७
पक्षाघात, अपतन्त्रक, मन्यास्तम्भ आदि, असाध्य, गुह्रसी विरवाची, क्रोष्टुक शीर्ष, खञ्ज और पंगु, कलाय खञ्ज, वाथ कण्टक, पाददाह, पादद्वर्ष अवबाहुक, बाधियं, कर्णशूल, तूनी-प्रतूनी, आध्मान, प्रत्याध्मान, अछीला, प्रत्यछीला, २२७-२३३
द्वितीयोऽध्यायः
अर्श निदान की व्याख्या२३३
अर्श छ प्रकार का है२३४
सामान्य कारण, गुदा, पूर्वरूप, सामान्यरूप, वातजन्य अर्श, पित्तजन्य अर्श२३५
कफजन्य अर्श, रक्तजन्य अर्श२३५
सन्निपातजन्य अर्श, सहजन्य अर्श२३५
मेढादि में अर्श,२३६
अनिमाम्नाय का कारण२३७
तृतीयोऽध्यायः
अश्मरी निदान२३७
अश्मरी रोग के चार प्रकार२३७
सामान्यलक्षण२३८
रुलेष्माश्मरी पैत्तिक अश्मरी, वातजन्य अश्मरी, शुक्राश्मरी२३८
शर्करा, रोगी के लक्षण२३९
अश्मरी के मूत्रमार्ग में पहुँचने पर उपद्रव२३९
विषयपृष्ठ
बस्ति का मूत्र द्वारा सदा भरना२३९
अश्मरी की उत्पत्ति२३९
वायु के प्रतिलोम होने पर नाना रोग२४१
चतुर्थोऽध्यायः
भगन्दर निदान२४१
भगन्दर के पाँच प्रकार२४१
भगन्दर का पूर्वरूप२४१
शतपोनक भगन्दर२४१
उष्ट्रग्रीव भगन्दर२४१
परिखावि भगन्दर२४१
शम्बूकार्त भगन्दर२४२
उन्मार्गगामि भगन्दर२४२
सृजन के कारण गुदा के समीप पिङ्का२४२
असाध्यभगन्दर२४२
पञ्चमोऽध्यायः
असाध्य कुष्ठरोग निदान२४३
कुष्ठ के कारण२४३
कुष्ठ का पूर्वरूप२४३
सात महाकुष्ठ और ११ लुद्र
कुष्ठ के नाम२४३
महाकुष्ठ के लक्षण२४३
लुद्रकुष्ठों के लक्षण२४४
क्षुद्रकुष्ठों में कफ, वायु
पित्तजन्य२४४
किलास का वर्णन२४४
त्वचा में कुष्ठ के लक्षण२४५
कुष्ठ के रक्त में होने पर२४५
मेद में कुष्ठ के पहुँचने पर२४५
माता पिता में कुष्ठ दोष के कारण
संतान पर प्रभाव२४५
जितेन्द्रिय पुरुष का साध्य तथा
असाध्य कुष्ठ रोग२४६
कर्मजन्य कुष्ठ२४६
कुष्ठ से अधिक दुःखदाई कोई नहीं२४६
कुष्ठरोग से मुक्ति२४६
विषयपृष्ठ
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में यह रोग आ जाता है२४६
षष्ठोऽध्यायः
त्रिदोषजन्य प्रमेह निदान२४६
प्रमेह के कारण२४६
प्रमेह के पूर्वरूप२४६
कफ के कारण दस प्रमेह२४६
पित्त के कारण छ प्रमेह२४६
वायु के कारण चार प्रमेह२४७
कफजन्य प्रमेह की व्याख्या२४८
पित्त " "२४८
वायु " "२४८
उपद्रव२४८
दशों पिङ्कायों की उत्पत्ति२४९
बीस प्रकार के प्रमेहों की उत्पत्ति२४९
सप्तमोऽध्यायः
उदररोग की व्याख्या२५०
उदर रोग के आठ प्रकार२५०
कारण२५१
सम्प्राप्ति२५१
पूर्वरूप२५१
वातोदर२५१
पित्तोदर२५१
कफोदर२५१
सन्निपातोदर२५१
प्लीहोदर२५२
बद्धगुदोदर२५२
परिखाण्युदर२५२
दकोदर२५२
सामान्य लक्षण२५३
साध्यासाध्य लक्षण२५३
अष्टमोऽध्यायः
मूद्गर्भ रोग निदान२५३
मूद्गर्भ के कारण२५३
मूद्गर्भ के चार प्रकार२५३
मूद्गर्भ की आठ गतियाँ२५३
असाध्य के लक्षण२५३
यह गर्भ भी असमय में गिरता है२५४

विषयानुक्रमणिकां

११

विषयपृष्ठ
गर्भस्त्राव और गर्भपात२५४
असाध्य मूढ़गर्भ तथा गर्भिणी के लक्षण२५४
शिशु के गर्भाशय में मरने के लक्षण२५४
माता के मरने पर जीवित गर्भ को निकालने के उपाय२५४
नवमोऽध्यायः ✓
विद्रधि निदान व्याख्या२५५
सम्प्राप्ति२५५
वातजन्यविद्रधि२५५
पित्तजन्यविद्रधि२५५
कफजन्यविद्रधि२५५
सन्निपातजन्यविद्रधि२५५
आगंतुजविद्रधि२५६
रक्तजन्यविद्रधि२५६
अभ्यन्तरविद्रधि२५६
स्थान२५७
स्थानमेद से विशेष लक्षण२५७
रक्तविद्रधि२५७
गुल्म और विद्रधि रोगमें मेद२५७
विद्रधि के अस्थि में पहुँच कर पक जाने के लक्षण२५७
दशमोऽध्यायः
विसर्प नाड़ी स्तन रोग की व्याख्या२५८
विसर्प के लक्षण२५८
वातादि दोष मेदों से लक्षण२५८
पित्तजन्य विसर्प२५८
कफजन्य विसर्प२५८
सन्निपातजन्य विसर्प२५८
क्षतजन्य विसर्प२५८
साध्यासाध्य२५८
नाडी२५९
आठ प्रकार के नाडी ब्रण२५९
स्तन्यनिदान२५९
जिनमें स्तन रोग नहीं होते२५९
स्तन्य२५९
प्रवृत्ति के कारण२६०
विषयपृष्ठ
स्तन्य वायु से दूषित होने पर सम्प्राप्ति२६०
वातादिजन्य पांचों स्तन रोगों के लक्षण२६१
एकादशोऽध्यायः ✓
ग्रन्थि, अबुर्द, गलगण्ड अपची निदान की व्याख्या२६१
ग्रन्थि के लक्षण ✓२६१
वात, पित्तजन्य ग्रन्थि२६१
मेदोग्रन्थि२६१
शिराजन्य ग्रन्थि२६१
अपचीरोग की सम्प्राप्ति२६२
अबुर्द ✓२६२
अबुर्द के लक्षण२६२
मांसजन्य अबुर्द२६२
द्विरबुर्द अधबुर्द असाध्य२६२
न पकने के कारण२६३
गलगण्ड सम्प्राप्ति२६३
वात, कफ, मेदजन्य गलगण्ड२६३
असाध्यता२६४
गलगण्ड का स्वरूप२६४
द्रादशोऽध्यायः
वृद्धि, उपदंश तथा श्लीपद निदान२६४
वृद्धिरोग के सात प्रकार ✓२६४
पूर्वरूप ✓२६५
लक्षण ✓२६५
उपदंश के लक्षण२६६
उपदंश के पाँच प्रकार२६६
श्लीपद के लक्षण२६६
त्रयोदशोऽध्यायः
क्षुद्ररोगों के निदान की व्याख्या संक्षेप में ४४ क्षुद्र रोगों के नाम तथा पृथक् पृथक् लक्षण२६७
चतुर्दशोऽध्यायः
शूकदोष निदानव्याख्या२७१
१८ प्रकार के शूक दोषजन्य रोग तथा उनके पृथक् पृथक् लक्षण२७२ २७३
विषयपृष्ठ
पञ्चदशोऽध्यायः ✓
भग्गनिदान व्याख्या२७४
भग्ग रोग के कारण२७४
सन्धिपुक्त भग्ग के ६ प्रकार२७४
लक्षण२७४
विशेष लक्षण२७४
सामान्य लक्षण२७४
पांच प्रकार की अस्थियां२७५
षोडशोऽध्यायः
मुख रोग निदानव्याख्या२७५
६५ प्रकार के मुखरोग सात स्थानों में उत्पन्न होते हैं२७५
ओष्ठ रोग२७५
वायु, पित्त, कफ, सन्निपात, रक्त, मांस, मेद, अभिघात के कारण ओष्ठरोग२७५
दन्तमूल में स्थित १५ रोग तथा उनके लक्षण२७५
जिह्वागत रोग२७६
वायु, पित्त, कफ, अलास, उपजिह्वाका के कारण जिह्वागत रोग२७६
तालुजन्य नौ रोग और उनके लक्षण२७६
कण्ठगत सत्रह रोग और उनके लक्षण२७६
सर्वसररोग के ४ प्रकार तथा उनके लक्षण२८०
शारीरस्थान
प्रथमोऽध्यायः
सर्वभूतचित्तानामक शरीर की व्याख्या२८१
अव्यक्त निरूपण२८२
२४ तत्त्वों की व्याख्या२८३
ज्ञान तथा कर्मेन्द्रियों के विषय२८५
आठ प्रकृतियाँ तथा १६ विकार२८५
चौबीस तत्त्वों का वर्ग अचेतन२८६
प्रकृति तथा पुरुष के साधर्म्य तथा वैधर्म्य की व्याख्या२८६

१२

सुश्रुतसंहिता

विषय पृष्ठ

पुरुष भी सत्व, रज, तमोमय कई आचार्य का मत है २८६

मनुष्य इंद्रियों द्वारा निश्चित इंद्रिय के अर्थ का ही ग्रहण करता है २८६

शरीर, आत्मा तथा मन के संयोग से जो गुण उत्पन्न होते हैं उनका वर्णन २८७

मन के सात्विक आदि गुण द्वितीयोऽध्यायः

शुक्र और शोणित का स्वरूप २८७

दूषितशुक्र २८७

क्षीणवीर्य के लक्षण २८७

साध्य तथा असाध्य २८८

दूषित आर्तव २८८

चिकित्सा २८८

शुद्ध शुक्र की परीक्षा २८९

आर्तवशुद्धि की चिकित्सा २८९

शुद्ध आर्तव की परीक्षा २९०

रक्तप्रदर २९०

संतान के उपयुक्त स्त्री पुरुष २९१

ऋतुकाल के समय स्त्री का कर्तव्य २९१

सहवास के पहले पुरुष तथा स्त्री का कर्तव्य २९२

उत्तम तथा निन्दित तिथियां २९२

ऋतुमती स्त्री के साथ सहवास के दोष २९३

गर्भस्थित होने पर वैद्य का कर्तव्य २९४

वर्णों की उत्पत्ति का कारण २९५

नपुंसक के लक्षण २९६

पापजन्मगर्भ आदि का वर्णन २९६

तृतीयोऽध्यायः

गर्भावकान्ति नामक अध्याय की व्याख्या २९७

शुक्र-आर्तव स्वरूप २९७

गर्भावतरणप्रक्रिया २९७

तृतीयोऽध्यायः

गर्भावकान्ति अध्याय की व्याख्या २९७

विषय पृष्ठ

शुक्र और आर्तव का सौम्याग्नेय स्वरूप २९७

मैथुन तथा शुक्रार्तव संयोग २९७

आत्मा के पर्याय तथा शुक्रार्तव के संयोग के समयप्रवेश २९७

गर्भ में पुरुष, स्त्री, नपुंसक होने के कारण २९८

ऋतुमती के लक्षण २९८

ऋतुकाल के पश्चात् योनीकी स्थिति २९८

आर्तव स्वरूप और उसके खवण की युक्ति २९८

आर्तव का प्रारम्भ और अन्त, समविषम दिन और सभागम का फल २९८

गर्भधारण करते ही स्त्री लक्षण २९८

गर्भिणी के लक्षण २९८

गर्भिणी को त्यागने योग्य प्रथम मास से लेकर चतुर्थ मास तक गर्भ का स्वरूप २९९

गर्भवती स्त्री की इच्छा पूर्ण करने का फल ३००

गर्भवती की इच्छा पूर्ति न करने से दोष ३००

गर्भवती की जो इच्छा होती रहती है उखी स्वभाववाली संतान उत्पन्न होती है ३००

पांचवें छठे, सातवें, आठवें महीनों के गर्भ का स्वरूप ३०१

आठवें महीने में बालक उत्पन्न होने से जीता नहीं ३०२

प्रसवकाल की मर्यादा ३०२

गर्भ पोषणक्रम ३०२

गर्भवृद्धि में अंगोत्पत्ति के मतमतान्तर और धन्वन्तरि का मत ३०२

मातापितादि से उत्पन्न होने वाले शरीर का लक्षण ३०२

गर्भ के स्त्री पुनपुंसक शरीर लक्षण ३०३

अंग प्रत्यंग के निर्माणमें गुण-अवगुण धर्म, अधर्म के कारण ३०३

विषय पृष्ठ

चतुर्थोऽध्यायः

गर्भव्याकरण नामक अध्याय शरीर के ११ प्राण सात त्वचाओं का निरूपण सात कलायें तथा लक्षण पुरुष में शुक्र प्रबुत्त होने का मार्ग ३०६

गर्भिणी में अनार्तव का हेतु ३०७

गर्भ के यकृतादि अंगों की उत्पत्ति की कल्पना ३०७

हृदय का स्वरूप ३०७

निद्रा का स्वरूप और प्रकार स्वप्नदर्शन का कारण ३०९

इन्द्रियों की विकलता के कारण आत्मा का सोया हुआ मालूम होना ३०९

दिन में सोने का योग्य काल और किन के लिये दिन में सोना ठीक है, उसके दोष रात्रि जागरणदोष ३१०

उचित प्रमाण की नींद से १०० वर्ष जीता है ३११

नींद न आने के कारण तथा चिकित्सा ३११

निद्रा के अतियोग में तन्त्रा, जम्भाई, कलम, आलस्य ग्लानि, गारव ३१२

गर्भ का शरीर कैसे बढ़ता है दृष्टि और रोमकूप कभी नहीं बढ़ते ३१२

नख और केश सदा बढ़ते हैं ३१३

सात प्रकार की प्रकृतियाँ प्रकृति की उत्पत्ति का हेतु ३१३

वात प्रकृति लक्षण ३१३

पित्तप्रकृति लक्षण ३१३

कफ प्रकृति लक्षण ३१४

पार्थिव तथा आकाश प्रकृति ३१४

सत्त्वादि गुणभेद से प्रकृति ३१४

राजस प्रकृति ३१५

तामस प्रकृति ३१५

विषणानुक्रमणिका

१३

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
पञ्चमोऽध्यायःममों की लम्बाई चौड़ाई३३०दोषयुक्त शेषरक्त की चिकित्सा ✓
शरीर संख्या व्याकरणमर्म स्थान को बचाकरसंशमन से३४०
व्याख्या३१६शस्त्रकर्म३३०बलवान् व्यक्ति के रक्त निकालने
शरीर नाम कितने कहते हैं३१६अमर्म आदि स्थानों के छेदन-भेदनका परिमाण३४०
शरीर के अंग प्रत्यंग३१६से मृत्यु नहीं होती३३२भिन्न २ रोगों में सिरावेष का ✓
आशय, आंत, खोल३१६सद्यः प्राणहर ममों पर आघातपरिमाण३४१
कण्डरार्य, जालकों, कूर्च३१८लगने से इन्द्रिय विषयदूषितरू में वेधन हुई सिराएँ३४१
बड़ीमांस रज्जु, सेवनी, अस्थिकायोंज्ञान नहीं३३२दूषित सिराओं का विवरण३४१
के संघात सीमान्त३१८ममों पर आघात पहुँचने से प्रायःसिराओं का वेधन यत्न पूर्वक३४१
अस्थियों की संख्या३१६विकलता (मृत्यु) अवश्यसिरावेष रोग जल्दी शान्त
सन्धियों के दो प्रकार३२०होती है३३३होते हैं३४१
सन्धियों की संख्या३२०सप्तमोऽध्यायःशल्यतंत्र में आधी चिकित्सा
स्नायु३२१सिरा वर्ण विभक्ति शरीर३३३सिरावेष है३४१
पेशियाँ तथा उनका आकार३२२सात सौ शिराएँ स्वरूप३३३सिरावेष आदि के लिये त्याज्य
प्रत्यक्ष तथा शस्त्र दोनों ही ज्ञाननाभि, प्राण और सिराओंबातें३४२
बुद्धि के कारण हैं३२३का सम्बन्ध३३३दूषित रक्त को निकालने का ✓
आत्मा को कैसे देखा जाता है३२४मूल सिरा और दोषवह सिराओंतरीका३४२
षष्ठोऽध्यायः ✓की संख्या३३४नवमोऽध्यायः
मर्म निर्देश शरीर कावातवह सिराओं का प्राकृतधमनी व्याकरण शरीर की
व्याख्यान३२४कार्य३३४व्याख्या३४३
मर्म के १०७ प्रकार ✓३२४वातपित्तकफ सिराओं का रंग३३५धमनी की २४ संख्या३४३
टांग पेट और छाती, पीठ, बाहु,अवेध्य सिराएँ३३५ऊपर को जानेवाली धमनियाँ३४३
जनु से ऊपर के ममे३२४अष्टमोऽध्यायःनीचे की ओर जानेवाली
मांसमर्म, सिरामर्म, स्नायुमर्म, ✓सिराव्येष विधि शरीर की ✓धमनियाँ३४५
अस्थिमर्म, सन्धिमर्म३२४व्याख्या३३७तिर्यगगत धमनियाँ३४७
मर्म के पाँच भेद ✓३२५किन अवस्थाओं में सिरावेष ✓खोलों के मूल में बुद्ध होने से
प्राणहर मर्म ✓३२५न करे३३८उत्पन्न लक्षण३४८
मर्म का लक्षण ✓३२५निषिद्ध रोगियों में सिरावेषदशमोऽध्यायः
शरीर का पालन करनेवालीके प्रयोजन३३८गर्भिणी व्याकरण शरीर का
चार प्रकार की सिराएँ३२६सिरावेष विधि ✓३३८व्याख्यान३४६
ममों की परीक्षा कर शल्य ✓सिरावेष का अयोग्य काल ✓३३८गर्भिणी के प्रथम दिन से
निकालना चाहिये३२७सिरावेष के लिये यन्त्रविधि३३८कर्तव्य३४६
प्राणहर ममों के मारने की ✓प्रदेश विशेष से शस्त्र कागर्भिणी को मासक्रम से सेवने
कालविधि३२७प्रमाण३३६योग्य३४६
टांग के ममों का व्याख्यान३२८सिरावेष ऋतुभेद से कालभेद ✓३४०नवम मास में सूतिका ग्रह
उदर और छाती के ममों कामुनिद्ध सिरा लक्षण३४०प्रवेश३५०
व्याख्यान३२६सिरावेष से पहले दूषितप्रसव के स्पष्ट लक्षण३५०
पृष्ठ के ममों का व्याख्यान३२६रक्त का निकालना३४०प्रसव को जानकर करने
जनु के ऊपर के ममों काक्षीण व्यक्ति के सिरावेष कायोग्य उपचार३५०
व्याख्यान३३०समय३४०प्रतिलोम को अनुलोम करना३५१

१४

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
गर्भ के योनि में रुकने पर
धूपन३५२
प्रसव होर पर शिशु के उपचार३५२
प्रसव के ३-४ दिन बाद दूध का आना३५२
पहले ३-४ दिन में बच्चे को क्या पिलाना३५३
स्तिका के उपचार३५३
प्रसूता के मिथ्या आचार आदि से उत्पन्न रोग३५४
अपरा के बाहर न आने से दोष और चिकित्सा३५५
प्रसूता में मल्ल लक्षण तथा उनकी चिकित्सा३५६
बालक के उपचार३५६
दसवें दिन बालक का नाम-कारण३५६
धात्री के लक्षण३५६
बच्चे को कैसा दूध नहीं देना चाहिये३५६
दूध को बढ़ाने के उपाय३५६
दूध की परीक्षा३५६
धात्री के दूषित स्तन का हेतु३५७
अनजान बच्चे के रोग को जानने का उपाय३५७
उन रोगों की चिकित्सा३५८
बालक को नीरोग तथा उसमें बल आदि के उपाय३५८
बालक को कैसे उठाना-बिठाना चाहिये३६०
माता का दूध पर्याप्त मात्रा के अभाव में देने योग्य दूध३६०
बालक की ग्रहों से रक्षा३६०
ग्रहों से आक्रान्त शिशु के सामान्य लक्षण३६१
बालक का विद्याध्ययन३६१
छोटी आयु की कन्या में गर्भाधान नहीं करना चाहिये३६२
गर्भाधान के अयोग्य ली पुरुष३६२
विषयपृष्ठ
गर्भिणी के उपद्रवों की चिकित्सा३६२
प्रत्येक मान में देनेवाली औषधियाँ३६३
शारीर अध्याय के कोष्ठक३६५-३७८
चिकित्सास्थान
प्रथमोऽध्यायः
द्विभ्रणीय चिकित्सा का व्याख्यान३७६
ग्रहों के दो प्रकार३७६
आगन्तुज ब्रण में कर्म ही
विशेष प्रयोजन३८०
दोष के उपप्लवभेद से ब्रणभेद३८०
ब्रण के २ प्रकार के लक्षण३८०
वातजन्य ब्रण३८०
ब्रण के साठ उपक्रम३८१
ब्रण के अवस्थाभेद से करने योग्य उपचार३८१
अपतर्पण का निरूपण३८२
किनको उपवास लंघन न कराना चाहिये३८२
आलेपन विषय३८२
आलेपन का फल३८२
परिषेक का फल तथा प्रयोग३८२
अभ्यंग का फल३८२
स्वेदन३८३
विस्लापन तथा प्रयोग३८३
उपनाह३८३
पाचन तथा प्रयोग३८३
स्लावण३८३
स्नेहपान, वमन, विरेचन३८३
छेदन, भेदन, दारण, लेखन, ऐषण३८४
शल्यकर्म, व्यधन-स्लावण३८४
सीना और सन्धान३८४
पीडन, रक्त-स्थापन, निर्वापण३८४
उत्कारिका शोधन कषाय, शोधन वर्ति३८५
विषयपृष्ठ
घृत सिद्ध करने के शोधन३८५
तैल से शोधन३८५
जो ब्रण तैल से शुद्ध न हों उनमें रसक्रिया बरतें३८५
शोधनीय चूर्ण प्रयोग३८६
रोपण-कषाय, रोपण-वर्ति३८६
रोपण-कल्ल रोपण-सर्पि, रोपण तैल, रोपण रसक्रिया, रोपण-चूर्ण३८६
शोधन रोपण विधि मंत्र की भाँति गुणों को दोषों के अनुसार मिलाकर बरते३८६
धूपन प्रयोग३८७
उत्सादन, अवसादन३८७
कोमल उपचार दारण कर्म३८७
क्षार क्रिया३८८
अनिकर्म, कृष्णकर्म, पाण्डुकर्म३८८
ग्रहों पर प्रतिसारण३८८
पुनः बाल उगने के उपाय३८९
बालनाशक उपाय३८९
वस्ति योग्य ब्रण३८९
उत्तर वस्ति योग्य ब्रण३८९
ब्रण-पर पट्टी बाँधने का कारण३८९
पत्र का उपयोग३८९
ब्रण से क्रमियों को निकालना३९०
शिरोविरेचन विषय नस्य विषय३९०
शोधन तथा रोपण के लिये शीतल कवल३९०
धूमपान विषय३९०
घृत विषय३९०
यंत्र विषय३९१
ब्रणरोगियों को उष्ण और अग्निदीपक आहार३९१
ब्रणरोगी की राक्षसों से रक्षा३९१
ब्रण की संक्षेप से मूलाधिष्ठान लक्षण चिकित्सा३९१
अप्राप्त औषध में उपपत्ति के अनुसार चिकित्सा३९१
ब्रणरोगी के उपद्रव बहुत प्रकार के हैं३९१

विषयानुक्रमणिका

१५

विषयपृष्ठ
द्वितीयोऽध्यायः ✓
सद्योन्न चिकित्सा व्याख्यान३६२
भिन्न भिन्न प्रकार के ब्रणों के लक्षण३६२
आगन्तु ब्रण के छ प्रकार ✓३६२
छिन्न, भिन्न, कोष्ठ, कोष्ठ भेद के सामान्य लक्षण३६२
विशेष लक्षण३६२
विद्ध, क्षत, पिच्छित, घृष्ट लक्षण३६२
छिन्न भिन्न आदि चारों की चिकित्सा३६३
पिच्छित तथा घृष्ट की चिकित्सा३६३
छिन्न ब्रणों की चिकित्सा३६३
कान की विशेष चिकित्सा३६३
तिरस्त्र प्रहारों के कारण चौड़ा ब्रण होने की चिकित्सा३६४
पीठ में ब्रण की चिकित्सा३६४
कटी हुई शाखा में रोपण क्रिया३६४
ब्रण रोपण के लिये चन्दनादि तैल३६५
दूसरा चन्दनादि तैल३६५
नेत्र में भिन्न ब्रण की चिकित्सा३६५
सब नेत्राभिधातों में बकरी के घी का प्रयोग३६५
पेट में से भेद की वर्त्ति निकलने की चिकित्सा३६५
कोष्ठगत शल्य लक्षण३६६
कोष्ठगत असाध्य ब्रण३६६
कोष्ठ के फट जाने पर रक्त को पीना३६६
कोष्ठ के फट जाने पर भी जो जीता है३६६
अन्तभेद चिकित्सा३६६
रोपण के लिये तैल३६६
जिस पुरुष के अण्ड बाहर आ गये हों उसकी चिकित्सा३६७
घिर के ब्रण की चिकित्सा३६७
विषयपृष्ठ
शरीर के अन्य भाग के ब्रण की चिकित्सा३६७
तैल का प्रयोग३६७
तालीशादि तैल३६७
क्षत तथा पिच्छित ब्रण चिकित्सा३६७
घृष्ट ब्रण की चिकित्सा३६७
मर्म स्थानों पर चोट लगने से चिकित्सा३६७
रोगी को खदा मृदु, शरीर को देखकर घी या तैल देना चाहिये३६७
सद्यःक्षत ब्रणवाले को तेल से परिषेक करे३६७
दूषित सद्यःक्षत ब्रणों में तैल३६७
दूषित ब्रणों में वमन विरेचन३६८
द्रवन्ती आदि तैल३६८
कल्क३६८
छः ही सबसे श्रेष्ठ हैं३६८
चतुर्थोऽध्यायः
भग्गचिकित्सा का व्याख्यान३६९
भग्ग रोग किनमें कठिनाई से अच्छा होता है३६९
भग्ग रोगी को न सेवन करने योग्य३६९
भग्ग रोगी को देने योग्य लेप३६९
मृदुओं को देखकर पट्टी बाँधनी३६९
भग्ग में साधारण बन्ध ठीक है३६९
परिषेचन में कषाय३६९
दोष और काल की विवेचनाकर३६९
भग्ग में पीने योग्य दूध४००
ब्रण वाले भग्गों में घी और मधु४००
मुखसाध्य भग्ग४००
सन्धि को हट जाने का समय४००
शरीर की सब प्रकार की सन्धियों को ठीक बिठाना चाहिये४००
नखसन्धि, भग्ग की चिकित्सा४००
अकुली, " "४००
पैर के तल्लुए, " "४००
जंघा और ऊरू, " "४००
विषयपृष्ठ
ऊर्वस्थि, भग्ग की चिकित्सा४००
कटि, के " "४००
पशु काओं, " "४००
अंससन्धि " "४०१
कूर्परसन्धि " "४०१
जानु-गुल्फ, " "४०१
हथेली, " "४०१
अक्षक अस्थि के भग्ग की चिकित्सा४०१
बाहुभग्ग ग्रीवा, हनुसन्धि ग्रीवा, दांत, नासा, कर्ण, शिर जंघा और ऊरू श्रोणी, घृष्ट अंस, वक्षस्थल, अक्षक के भग्ग होने पर४०२
स्नेहन तथा स्वेदन४०२
शिरोबस्ति तथा अनुवासन बस्ति भग्ग के लिये स्वस्थ करने-वाला तैल४०२
भग्ग पकना नहीं चाहिये४०२
चतुर्थोऽध्यायः
वातव्याधि चिकित्सा का व्याख्यान४०३
षड धरण४०३
वायु के पक्षाशय में होने पर४०३
वायु प्रकोप में स्नेहन, स्वेदन रक्तमोक्षण आदि४०३
वायु के स्नायु-सन्धि और अस्थि में आने पर४०३
अस्थि में वायु के भरजाने पर४०३
वायु के शुक में आने पर४०४
सर्वांगगत वायु में कफ, पित्त से मिली वायुको रक्त से आबूत वायु में४०४
वात रोगियों को देने योग्य४०४
सार्वण४०४
जो अङ्ग संकुचित या जड़ बन गये हों४०४
स्कन्ध, वक्ष, त्रिक और मन्धा-गत वायु४०४
वात रोगियों के सेवनीय४०४
तिल्व घृत४०४