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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

२०१०]

शरीरस्थानम्

३१७

इत्थादि) धात्रीको बुलाये। धात्री मध्यम आकार की (न बहुत लम्बी, न छोटी), बहुत उमर की न हो (मध्यम वय की प्रौढ़ा), नीरोगी, उत्तम स्वभाव की, चंचलता रहित, निर्लोभी, न मोटी, निर्मल दूधवाली, जिसके ओठ लम्बे न हों, जिसके स्तन लम्बे या ऊपर को न हों, अर्धग्री, ग्यसनों से रहित, जीवित बालकवाली, मधुर दूधवाली, प्रेम करनेवाली, नीच कर्म न करनेवाली, उत्तम कुल में उत्पन्न होने के कारण बहुत से गुणों से युक्त, श्यामा इस प्रकार की धात्री बालक के आरोग्य, बल और बुद्धि के लिये होती है। इनमें ऊर्ध्वस्तनवाली बालक को कराल (आगे निकले हुए दांतोंवाला) बना देती है। लम्बे स्तनोंवाली नासिका के मुख को बन्द करके मृत्यु का कारण बनती है। फिर प्रशस्त तिथि में शिर समेत बच्चे को स्नान कराके नये वस्त्र पहनाकर उत्तर की ओर मुख करके बिठाये। धात्री को पूर्व की ओर मुख करके बिठाये। पहले दक्षिण स्तन को धोकर थोड़ा-सा दूध बाहर निकालकर निम्न मंत्र से आमन्त्रित करके पिलाये।

वि० मन्तव्य—यदि किसी कारण से जननी दूध पिलाने योग्य न हो अथवा न रहे तो धात्री का चुनाव करे। यदि प्रमादवंश जननी दूध न पिलाना चाहे तो उसे समझा-बुझाकर दूध पिलाने के लिये तैयार करे क्योंकि—मातुरेव पिबेत् स्तन्यं तत् परं देहवृद्धये—अर्थात् जननी का दूध ही बालक के शरीर की पुष्टिबुद्धि के लिये परमात्तम होता है। श्यामा-श्यामवर्णा स्त्री प्रायः स्वस्थ गौरी की अपेक्षा अधिक स्वस्थ होती है, (पुरुष भी) और अतएव उसको दूध भी अधिक होता है—श्यामा हि प्रायशः प्रचुरस्त्रीरा भवति (डरलन) दूध पिलाने की उक्त विधि जननी एवं धात्री दोनों के लिये समान है, और यह एक दिन के लिये ही नहीं प्रतिदिन या प्रतिबार इसी प्रकार स्तन्यपान कराना चाहिये। दूध पिलाने के पूर्व पिठानेवाली अपने स्तनों को हाथ से मसल लिया करे, जिससे दूध तरल हो जाय और स्तन चूचकों की कठोरता दूर हो जाय और अधिक दूध हो तो पर्याप्त, अन्यथा थोड़ा सा दूध चुआ दिया करे, इस प्रकार सू० २६ में कथित काम आदि विकार नहीं होते और शिशु को चूषण में सरलता हो जाती है। जीवद्-वत्सा-जिसका अपना शिशु जीवित एवं स्वस्थ हो—यह दूध की उत्तमता का सूचक है। दोग्ध्री-धात्री को दो शिशुओं को पालना होता है, अतः दो के योग्य दूध होना आवश्यक है। धात्री के जो गुण लिखे हैं उनसे भी अधिक गुणोंवाली हो। वत्सला—इस शिशु के साथ अपने शिशु के समान स्नेह करनेवाली हो। कोई २ शिशु स्तन्य चूषण नहीं करते, परन्तु कुछ दिनों में अभ्यास हो जाने पर करने लगते

हैं। तब तक सीपी या चम्मच में दहकर दूध पिलाते रहना चाहिये ॥२५॥

चरवारः सागरास्तुभ्यं स्तनयोः क्षीरवाहितनः।

भवन्तु सुभगे नित्यं बालस्य वलवृद्धये ॥२६॥

पयोऽमृतसं पीत्वा कुमारास्ते शुभानने।

दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राश्यामृतं यथा ॥२७॥

मंत्र—हे सुभगे ! तुम्हारे स्तनों में दूध को वहन करनेवाले चारों समुद्र बालक की बुद्धि के लिये हों। हे शुभानने ! जिस प्रकार देवता अमृत का पान करके दीर्घायु हुए, उसी प्रकार तुम्हारा अमृत रूपी दूध पीकर बालक दीर्घायु हो ॥

वक्तव्य—श्यामा “शीतकाले भवेदुष्णा, ग्रीष्मकाले च शीतला। तसकांचनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते”। विस्तार के लिये मेरी पुस्तक “हमारे भोजन की समस्या” पढ़ें ॥२६, २७॥

अतोऽन्यथा नानास्तन्योपयोगस्यासत्क्याद् व्याधि-जन्म भवति ॥२८॥

इससे विपरीत नाना (भिन्न-भिन्न) दूध के उपयोग करने से—असत्क्य-होने के कारण रोग उत्पन्न होते हैं।

वक्तव्य—बार-बार दूध बदलते रहने से दूध अनुकूल नहीं होता। दूध के अनुकूल न पड़ने से रोग होते हैं। इसलिये एकही धात्री को रखें। इसी प्रकार गाय या बकरी एक का ही दूध बच्चे को देना चाहिये। बार-बार दूध बदलना नहीं चाहिये। माता के दूध के अभाव में धात्री का दूध, धात्री के अभाव में बकरी या गाय का दूध देवे “स्तन्याभावे पयश्छागां गन्यं वा तद्गुणं हितम् ॥” वाग्भट में कहा है—मातुरेव पिबे-स्तन्यं तत्परं देहवृद्धये। स्तन्यधान्याद्युभे कार्यं तदसम्पदि वत्सले ॥२८॥

अपरिस्पृतेऽप्यतिस्वस्थस्तन्यपूर्णस्तनपानादुत्सुहित-स्नोतसः शिशोः कासश्वासवमीप्रादुर्भावः। तस्मादेवंविधानां स्तन्यं न पाययेत् ॥२९॥

स्तनों में से दूध न निकलने के कारण दूध के रुके रहने से, स्तनों के कठोर एवं भरे होने पर—स्तनपान करने से, स्नोतों के भराव होने पर बच्चे को कास, श्वास, वमन होता है। इसलिए इस प्रकार का दूध न पिलावे।

वक्तव्य—स्तनों में दूध रुकने से स्तन भारी और कठोर होते हैं। बच्चा दबा नहीं सकता। या जोर से दबाने पर स्नोतों में दूध का जोर होने से दूध जोर से आकर बच्चे के मुख में भर जाता है, इससे कास श्वास होता है। अतः पहले स्तनों में से दूध निकालकर फिर पीने को देना चाहिये ॥२९॥

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० १० ]

क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च छिप्याः स्तन्यनागो भवति । अथास्याः क्षौरजननार्थं सौमनस्यमुत्पाद्य यवगो- धूमशालिषष्टिकमांसरससुरासौवोकरपिण्याकळमुनमरस्य- कशेरुकशृङ्गाटकविसविद्वारिकन्दमधुकगतावरोनालिका- लायूकालशाकप्रभृतीनि विदध्यात् ॥३०॥

क्रोध, शोक, अममत्व आदि से दूध सूख जाता है । इस अवस्था में दूध को बढ़ाने के लिए मन को प्रसन्नता उत्पन्न करके जो, गेहूँ, शालि, साठी, मांसरस, सुरा, काञ्ची, तिल- खली, लहसुन, मछली, कसेरू, पिंपाड़ा, बिस, विदारीकन्द, मुलेहटी, शतावरी, नालिका, अलायू, काल शाक आदि देवे ।

वि० मन्तव्य—स्तनप्रवृत्ति के लिए देखिए—नि० स्था० अ० १० श्लो० १५ से २७ । निरन्तर-सच्चा स्नेह ही स्तन्य की प्रवृत्ति का हेतु है तथापि यदि क्रोध शोक आदि के कारण स्तन्य प्रवृत्ति न हो तो उचित उपाय करे लाभ अवश्य होता है । स्तन्य का क्षय होने पर—स्तन ढीले हो जाते हैं । अथवा घट जाते हैं । इस दशा में कफबर्द्धक द्रव्यों का प्रयोग करे । (मु० सू० अ० १५ सू० १२) ॥३०॥

अथास्याः स्तन्यमप्यु परीक्षेत तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासमप्यु न्यस्तमेकीभावं गच्छत्यफेनिलम- तन्तुमन्तोत्प्लवतेऽवसीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात्, तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्च भवति । न च वृषितशोकातशान्तप्रदुष्टधातुगभिणीवज्ररितानिखीणा- तिस्थूलविदग्धभक्तविरुद्धाहारतर्पितायाः, स्तन्यं पाययेत्, नाजांणौषधं च बालं, दोषोषधमलां नीत्रवेगोत्पत्ति- भयात् ॥३१॥

इसके पीछे दूध की परीक्षा जल में करे । यदि वह दूध- शीतल, निर्मल, पतला, शङ्ख के समान कान्ति का, जल में ढाला हुआ मिश्रित हो जाता है, क्षाग रहित, तन्तु की भांति नहीं, पानी में न बैठता है और न ऊपर तैरता है, तो इस दूध को शुद्ध समझे । इससे बच्चे में आरोग्य शरीर की पुष्टि, बल की वृद्धि होती है । मूली होने पर, शोक से दुःखी, थकी, वृषित थात, गमवती, ज्वर आए हुए, अतिक्षीण, अतिस्थूल, विदग्ध भोजन या विरुद्ध भोजन किए, उपवास किए—इन अवस्थाओं में दूध न पिलावे । बालक को यदि औषध न पची हो तो उसे दूध न देवे । क्योंकि दोष औषध और मल से तीव्र वेगोत्पात्ति का मथ रहता है ।

वि० मन्तव्य—दूध पिलानेवाली के दूध की परीक्षा अवश्य कर ले । कदाचित् दूध अशुद्ध हो तो शिशु अस्वस्थ हो जाता है । एतदर्थं देखिए नि० स्थान अ० १० और

शुद्ध दूध भी पिलानेवाली की क्षुधित आदि दशाओं में नहीं नहीं पिलाना चाहिये । यदि शिशु को कोई औषध दी गई हो जब तक वह पच न जाय तब तक दूध न पिलाया जाय । यदि बालक—मुखपाक आदि किसी कारण से स्तन चूचुक का आचूषण न कर सकता हो तो सीपी या चम्मच अथवा कोमल कपड़ा की बत्ती द्वारा दूध पिलाना चाहिये । शिशु दूध पीता रहे तब तक इस सूत्र को ध्यान में रखना चाहिए ॥३१॥

भवन्ति चान्न—

धाड्यास्तु गुरुभिर्भोज्यैर्विषमैर्दोषलैस्तथा । दोषा देहे प्रकृष्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ॥३२॥ मिथ्याहारांबहारिण्या दुष्टा वातादयः छिप्याः । दूषयन्ति पयस्तेन शारीरा व्याधयः शिशोः । भवन्ति कुशलतांश्च भिषक् सम्यग्निर्भावयेत् ॥३३॥

इसमें श्लोक भी हैं—धात्री के गुरु, विषम और दोषकारक भोजनों के करने से दोष शरीर में वृषित होते हैं, इससे दूध वृषित हो जाता है मिथ्या आहार विहार करनेवाली धात्री के वृषित हुए वातादि दोष दूध को भी वृषित कर देते हैं, इससे बच्चे में रोग उत्पन्न होते हैं । इन रोगों को कुशल वैद्य भली प्रकार पहचाने ।

वि० मन्तव्य—यह सच है कि क्षौरपायी शिशु कोई अन्य पदार्थ तो खाता नहीं है, उसे यदि कोई विकार हो तो उसका कारण दूध ही हो सकता है । अतः दूध पिलानेवाली के आहार- विहार पर पूर्णरूप से ध्यान और नियन्त्रण रखना आवश्यक है । आहार रस से दुग्ध का निर्माण होता है, यथा—रसप्रदाय- मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः । कृत्स्नदेहात् स्तनो प्राप्तः स्तन्यमिल- भिषीयते ॥ तथा—आहाररसयोनित्वात् एवं स्तन्यमपि छिप्याः । अतः धात्री के आहार-विहार से दूध में विकृति आती है और विकृत दूध पीने से शिशु में विकृति आती है । दुग्धशोधनार्थं धात्री को दुग्ध शोधक क्वाथ आदि पिलाना चाहिए ॥३२,३३॥

अङ्गप्रत्यङ्गदेशे तु रुजा यत्रास्य जायते । सुहृदुः स्पर्शति तं स्पर्शयमाने च रोदिति ॥३४॥ निमलितानक्षो मूर्धस्थे शिरोरोगे न धारयेत् । वस्तिस्थे मूत्रसङ्घातां रुजा वृष्यति मूच्छति ॥३५॥ विषमूत्रसङ्घवेण्यच्छर्वाधमानात्रकूजनेः । कोष्ठे दोषान् विज्ञानायात् सर्वत्रस्थान्श्व रोदनैः ॥३६॥ बच्चे के जिस अंग-प्रत्यङ्ग में वेदना होती है, वह उस स्थान को बार-बार स्वयं छूता है, परन्तु दूसरा कोई छूए तो वह रोता है । शिर में रोग होने पर आँखें बन्द कर लेता है, शिर को सीधा नहीं रखता । मूत्राशय में रोग होने पर मूत्र का रक्ता, पीड़ा, प्यास और मूर्च्छा होती है । कोष्ठ में स्थित दोषों

अ० १० ]

शारीरस्थानम्

३५६

को मल-मूत्र के रूकने से, विवर्णता से, वमन से, आध्मन से, आंतों की गड़गड़ाहट से पहचाने । सारे शरीर में उत्पन्न विकार को रोगे से समझे ।

वि० मन्तव्य—शिशु स्वतः बोलकर अपना कष्ट बतला नहीं सकता, अतः इन लक्षणों से और अपनी प्रतिभा से उसे जानने का प्रयत्न करना चाहिये ॥३४-३६॥

तेषु यथाभिहितं भृदुच्छेदनीयमौषधं मात्रया क्षीर-पत्य क्षीरसर्पिषा संयुक्तं विदध्यान्, धाड्याश्च केवलं, क्षीरात्राऽस्यात्मनि धाड्याश्च पूर्ववत्, अत्रादस्य कषाया-दीनात्मन्येव न धाड्याः ॥३७॥

इन रोगों में इन रोगों के अनुसार कोमल कफ-मेद का लेवन करनेवाली, औषध को मात्रा से दूध पीनेवाले बच्चे को दूध और घी के साथ मिलाकर देवे । और धात्री को अकेली औषध पिलाये । दूध और अन्न खानेवाले बालक को पूर्व की भांति बच्चे और धात्री दोनों को औषध देवे । अन्न खानेवाले बच्चे में केवल बच्चे को ही कषाय आदि औषध देवे, धात्री को औषध न दे ।

वि० मन्तव्य—शिशु तीन प्रकार के होते हैं १—क्षीरप अर्थात् केवल दूध पीनेवाले । २—क्षीराद् अर्थात् दूध के साथ २ अन्न खानेवाले । ३—अत्राद् अर्थात् धात्री का दूध छोड़कर केवल अन्न पर निर्वाह करनेवाले । बालक को चाटने का भी अभ्यास नहीं होता, अतः दुग्ध एवं घृत में बालक औषध पिलानी चाहिये । औषध तीक्ष्ण या उग्र नहीं हो, क्योंकि शिशु स्वभावतः कोमल एवं सुकुमार होते हैं । चरक के शब्दों में—और यदि कुमार को कोई व्याधि आ जाय तो प्रकृति, निमित्त, पूर्वरूप, रूप एवं उपशय के द्वारा भली भाँति समझ-कर तथा रोगी, देश, काल, रागाश्रय आदि का विचारकर मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीत एवं कल्पाण कारक औषध एवं उपचारों का प्रयोग करते हुए चिकित्सा करे, क्योंकि कुमारों को इसी प्रकार के औषध एवं उपचार अनुकूल होते हैं, और इस प्रकार वे सुख का सदा के लिये लाभ करते हैं । जब वे स्वस्थ रहें तब स्वस्थवृत्त का अनुष्ठान व्यवस्था करे । इस प्रकार वह—बल, वर्ण, शरीर एवं आयुः की सम्पत्ति को प्राप्त कर लेते हैं । (च० शा० अ० ८६) ॥३७॥

तत्र मासादूर्ध्वं क्षीरपायाङ्कुलिषर्वद्वयग्रहणसंमिता-मौषधमात्रां विदध्यान्, कोलास्थिसंमितां कल्पमात्रां क्षीरात्रादाय, कोलसंमितामत्रादायेति ॥३८॥

एक मास से ऊपर की आयुवाले दूध पीनेवाले बच्चे को दूध-घी में मिलाई औषध को अंगुली के प्रथम दो पंखों तक मात्रा में देवे । दूध और अन्न खानेवाले को औषध कल्क की,

बेर की गुठली के बराबर मात्रा देवे । अन्न खानेवाले को बेर बराबर मात्रा देवे ।

वक्तव्य—प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भोजरुक्तिः । अव-लेक्षा तु कर्तव्या मधुक्षीरसितायुतैः ॥ एकैको वर्षयेतावत् याव-त्सर्वस्वरो भवेत् । तदूर्ध्वं माषद्विद्विः स्याद् यावत् स्युः षोडशा-ब्दकाः ॥३८॥

येषां गदानां ये योगाः प्रवदयन्तेऽगदङ्कराः । तेषु तत्कल्कसंलिप्तौ पाययेत शिशुं स्तनौ ॥३९॥

जिन जिन रोगों को नष्ट करनेवाले योग आगे कहे जायेंगे उन उन रोगों में उन उन योगों के कल्क से स्तनों पर लेप करके बच्चे को स्तन पिलाये ।

वि० मन्तव्य—जो ज्वर आदि नाशक औषध बड़ी आयु-वालों को दिये जाते हैं, वे ही बालक को देवे, परन्तु उनकी मात्रा न्यून हो, अथच यथासम्भव उनके लिये मृदु, मधुर, लघु एवं शीत औषधों का चुनाव करे ॥३९॥

एकं द्वे त्रणि चाहानि वातपित्तकफज्वरे । स्तन्यपायाहितं सर्पिरितराभ्यां यथार्थतः ॥४०॥

न च तृष्णाभयाद्भ्रत पाययेत शिशुं स्तनौ । विरेकवस्तिवमनान्युते कुर्याच्च नात्ययात् ॥४१॥

स्तनपायी शिशु को ज्वर में क्रमशः वातज्वर में एक दिन, पित्तज्वर में दो दिन और कफज्वर में तीन दिन घृत न देवे । क्षीरान्नभोजी को और अन्नभोजी को जैसा उचित समझे, वैसा करे । बच्चे को प्यास लगी है, इस थोड़े में बार-बार स्तन न देवे । बिना जलरत के बच्चे को वमन, विरेचन या वस्ति न देवे ।

वक्तव्य—घी बच्चे को सदा देना चाहिये, योग्य मात्रा में ऐसा पता लगाता है । इससे यह नियम ज्वर के लिये अपवाद रूप दिया है । बच्चे को रोता देवकर चुग कराने के लिये बार बार स्तन सुख में देना हानिकारक है । एरण्ड तेल का विरे-चन के लिये उपयोग प्रायः करते रहना ठीक नहीं है । इन साधारण बातों का यहाँ निर्देश है ।

वि० मन्तव्य—आवश्यकतानुसार लंघन आदि को व्यवस्था भी करे । यथा आमाशय विकारों में लंघन और हृस्वडस्वा (श्वास) में वमन एवं विरेचन आवश्यक होता है ॥४०,४१॥

मस्तुलुङ्गभ्याद्यस्य वायुस्तात्वस्थि नामयेत् । तस्य तुद्वैऋयुक्तस्य सर्पिमधुरकैः श्रुतम् ॥४२॥

पानाभ्यञ्जनयोग्येभ्यं शोताम्बूद्देजनं तथा । मस्तुलुंग के क्षय के कारण वायु तात्वस्थि को मुका देती है । तब बच्चे को प्यास लगती है, और चेहरा गरीब दीखता है । इसमें काकोल्यादि गण से विद्व घृत का पान

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० १० ]

और अभयंग में उपयोग करे । शीतल पानी के सेवन से बच्चे को उद्देजित करे ।

वि० मन्तव्य—शिशु के शिर की कपालस्थियाँ अधूरी होने के कारण ब्रह्मरन्ध्र पर केवल त्वचा का ही आवरण होता है और वहाँ स्पर्श करने पर धमन प्रतीत होता है तथा वह स्थल पिलपिला रहता है । यदि किसी कारण से मेजा या मस्तु-लुङ्ग का क्षय हो जाता है तो वहाँ वह स्थल निम्न-दबा हुआ हो जाता है । इसी को ताजुपात कहते हैं, इस पर सर्वदा नवनीत का पिचु धरा जाता है, और धरना चाहिये । शीतल जल के छोटे मारने से शिशु ज्योंही “हूलभसी” लेता है, त्योंही निम्नता दूर हो जाती है, परन्तु तब जब कि मस्तुलुङ्ग पिण्ड खिसकने से ताजु पात होता है । यदि क्षय से होता है तब नवनीत का पिचु धरने से लाभ होता है ॥४२॥

वातेनाध्मापितां नाभि सरुजां तुण्डिसंज्ञिताम् ॥४३॥

माहृतघ्नैः प्रशमयेत् स्नेहस्वेदोपनाह्नैः ।

गुदापाके तु बालानां पिस्तघ्नीं कारयेत् क्रियाम् ।

रसाञ्जनं विशेषेण पानलेपनयोर्हितम् ॥४४॥

वायु से नाभि फूल जाये और उसमें वेदना हो तो इसको तुण्डिनाभि कहते हैं । इसमें वात नाशक स्नेहन स्वेदन, उपनाह बांधकर चिकित्सा करे । बच्चों के गुदा पाक में पिस्तनाशक चिकित्सा करे । विशेष करके रसौत का पान, और लेप में व्यवहार करे ।

वि० मन्तव्य—नालच्छेदन के समय खिच जाने से अथवा उसके पश्चात् नालखण्ड खिचकर समय के पूर्व दूर जाने से “तुण्ड” नामक व्याधि हो जाती है, इसमें नाभि की गम्भीरता नहीं रहती है । पितातिसार आदि में अथवा पिप्तप्रकोप से—मुखपाक के समान भी हो जाता है और कभी कभी गुदभ्रंश भी । इससे गुदवलियाँ हो जाती हैं, गुद में गिनामा हो जाता है ॥

क्षीरहाराय सर्पिः पाययेत् सिद्धार्थकवचामांसीपय- स्यापामार्गश्रुतावरीसारिवाब्राह्मोपिप्पळीहरिद्राकुष्ठसैन्ध- वसिद्धं, क्षीरान्नादाय मधुकवचपिप्पळीचित्रकत्रिफला- सिद्धम्, अन्नादाय द्विपञ्चमूलोक्षीरतगरभद्रारुमरिचमधु- कबिडङ्गद्राक्षद्रिद्राक्षोसिद्धं, तेनारोग्यवल्लमेधायुषि शिशो- भंवनति ॥४५॥

स्तनपायी शिशु को—सरसों, बच, जटामांसी, बिदारी, चिरचिटा, शतावरी, सारिवा, ब्राह्मी, पिप्पळी, हल्दी कूठ और सैन्धव से सिद्ध घृत पिलाये । दूध और अन्नभोजी शिशु को—मुलेहटी, बच, चिवक, पिप्पळी, त्रिफला से सिद्ध किया घृत देवे । अन्नभोजी शिशुको—दशमूल, दूध, तगर, देवदारु, मरिच, मुलेहटी, वायविङ्ग, द्राक्षा, दोनों ब्राह्मी से सिद्ध घी देवे । इनसे बच्चे में नीरोगता, बळ, मेधा और आयु बढ़वे है ॥४५॥

बालं पुनर्गार्त्रमुखं गृह्णीयात्, न चैनं तर्जयेत्, सहसा न प्रतिबोधयेद्वित्रासभयात् सहसा नापहरेदुत्क्षिपेद्वा वातादिविघातभयात्, नोपवेगयेत्, कौड्यभयात्, नित्यं चैनमनुवर्तत प्रियअतैरजिघासुः, एवमविहतमना ह्यभि- वर्धते नित्यमुदप्रसन्त्वसंपन्ना नीरोगः सुप्रसन्नमनाश्च भवति । वातातपविघ्नप्रभापादपल्लताशून्यागारनिम्नस्था- नग्रहच्छायादिभ्यो दुर्ग्रहोपसर्गतश्च बालं रत्नेन ॥४६॥

नाशुचौ विस्मृजेद्बालं नाकाशे विषमे न च ।

नोष्ममाहृतवर्षेषु रजोधूमोदकेषु च ॥४७॥

बालक को इस प्रकार उठाये, जिससे उसके अंगों में तक- लोक न हो (अस्थि आदि न उतरे) । इसको कभी धमकायेँ नहीं । कभी भी एक दम से न जगायेँ क्योंकि बच्चा डर जाता है । बालक को एक दम दूसरों से खींच कर न लें, न इसको ऊपर उछालें, इससे वात आदि दोषों के कोप का भय रहता है । जल्दी विठाना आरम्भ न करे, कुबड़ा होने के डर से । हानि न करनेवाली प्रिय बातों से सदा इसका मन प्रसन्न रखे इस प्रकार करने से बालक सदा प्रसन्न रहकर बढ़ता है, बलिष्ठ नीरोग और सुप्रसन्न रहता है । इसे उत्तम सत्त्व प्राप्त होता है । वायु, धूप, त्रिजली, प्रभा (चमक), वृक्ष, लता, खाली घर, गड़दे आदि नीचे स्थान, ग्रहों की छाया तथा डूरे ग्रहों के उप- द्रवों से बालक की रक्षा करे । गन्दे स्थान में आकाश में, ऊँची नीची जगह पर, गरमी, वायु, वर्षा में, धूल, धूम पानी में बच्चे को न छोड़े ।

न ह्यस्य वित्रासनं साधु । तस्मात्तस्मिन् रुदत्यमुञ्जाने वाडन्यत्र वा विषेयतामार्गच्छति, राक्षसपिशाचपूतनाथानां नामानि चाहयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥ चरक शा० अ० ८-६८ ॥४६,४८॥

क्षीरसात्न्यतया क्षीरमाजं गन्धमथापि वा ।

दद्यादास्तन्यपर्याप्तैर्बालानां वीक्ष्य मात्रया ॥४८॥

बालक को दूध सात्न्य जानकर उसे बकरी या गाय का दूध, माता का दूध पर्याप्त न होने पर योग्य मात्रा में देना चाहिये ।

वि० मन्तव्य—यदि धात्री का दूध पर्याप्त न हो तो बकरी का, वह न मिले तो गो का दूध देना चाहिये । परन्तु ये दूध उष्ण करके पिलाए जायें, आवश्यकता हो तो कुछ जल मिलाकर, उष्ण करके दिये जायें । एक ही गो अथवा बकरी का दूध देना चाहिये ॥४८॥

षण्मासं चैनमननं प्रागयेच्छु द्वितं च ॥४९॥

छठे महीने में (जब दांत निकलते हैं) इस बालक को लघु और द्वितकर अन्न देवे ।

अ० १० ] ४६

शारीरस्थानम्

३६१

वि० मन्तव्य—अन्न प्राशन का विधान छठे मास में अवश्य है, परन्तु यदि १-२ या ३-४ मास टाल दिया जाय तो और उत्तम है, और उचित तो यह है, कि जब तक दन्तोद्भव न हो या पूर्णरूप से दन्त न आएँ तब तक अन्न का प्राशन न किया जाय अथवा अत्यन्त थोड़ा किया जाय, शीघ्र अन्न देने से—शिशु का उदर बढ़ जाता है और अनेक वाधाएँ भी होने लगती हैं। और जब अन्न खाने लग जाता है, तब उसे रोकना अथवा थोड़ा खाने के लिए बाध्य करना बहुत ही कठिन है, अथवा असम्भव है। बड़ी बुद्धियों का विचार है कि जब तक जननी पुनः गर्भवती न हो तब तक अन्न देना ही न चाहिये, जितना ही अधिक दिनों में माता का दूध अथवा अपर्याप्त होने के कारण बकरी अथवा गौ का दूध दिया जाता है बालक उतना ही पुष्ट एवं स्वस्थ होता है और जीवन भर स्वस्थ रहता है। माता के गर्भवती होने पर भी माता का दूध बुझाकर बकरी का दूध यथासम्भव ३-५ वर्ष तक दिया जाय तो अत्युत्तम है। देखा जाता है कि जिन अभागों को थोड़े दिन दूध मिलता है अथवा शीघ्र अन्न देना प्रारम्भ कर दिया जाता है वे जीवन भर दुबले-पतले तथा अस्वस्थ रहते हैं ॥ ४६ ॥

नित्यमवरोधरतश्च स्यात् कृतरक्ष उपसर्गभ्यात्; प्रयत्नतश्च प्रहोपसर्गभ्यो रक्ष्या बाला भवन्ति ॥५०॥

बालक को सदा अवरोध में (अन्तःपुर में) रखले, उपसर्ग (गिरता आदि) भय से उसको बचाये। ग्रहों के उपद्रवों से बालक की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये।

वि० मन्तव्य—बालक के संरक्षण में सर्वदा सावधान रहना परमावश्यक है, वे संसार रूपी वाटिका के कोमल, सुगन्धित एवं मनोहर पुष्प हैं ॥ ५० ॥

अथ कुमार उद्भिजते त्रस्यति रोदिति नष्टसंज्ञो भवति नखदशनैर्धात्रीमात्मानं च परिणदति दन्तान् खादति कूजति जूम्भते भुवौ विक्षिपत्यूर्ध्वं निरीक्षते फेनमुद्भवति सन्दृष्टोऽक्रूरं भिन्नवर्चा दीनार्तस्वरो निशि जागर्ति दुर्बलो स्नानाङ्गो मत्स्यच्छुच्छुन्दरिमत्कुणगन्धो यथा पुरा पाञ्चाः स्तन्यमभिलषति तथा नाभिलषतीति सामान्येन प्रहोपसृष्टलक्षणमुक्तं, विस्तरेणोत्तरे वक्ष्यामः ॥५१॥

बालक उद्भिन हो जाता है, डरता है, रोता है, बेहोश हो जाता है। नख दांतों से घात्री को और अपने को नोचता, काटता है। दांतों को कटकाटा है कराहता है, जम्भाई लेता है, भुवों को ऊपर चढ़ाता है, ऊपर को देखता है, मुख से क्षाग फेंकता है। ओठों को काटता है। देखने में भयानक पतला-आम सल आता है, स्वर-दीन और पीड़ित होता है, रात को

सोता नहीं, दुर्बल, मलिन अंगों का, शरीर से मलली, छुल्लुन्दर, खटमल की गन्ध आती है, पहले जिस प्रकार घात्री के दूध को चाहता था, वैसा अब नहीं चाहता, ग्रहों से आक्रान्त शिशु के ये सामान्य लक्षण हैं, विशेष लक्षणों को उत्तर तंत्र में कहेंगे ॥

अक्तिमन्तं चैनं ज्ञात्वा यथावर्णं विद्यां प्राहयेत् ॥५२॥ बालक के शक्तिमान् होने पर वर्ण के अनुसार उसको विद्या पढ़ाये ॥५२॥

अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय षोडशदशवर्षा पत्नीमा-वहेत् पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यतीति ॥५३॥

विद्याध्ययन करने पर जब आयु पन्चीस वर्ष की हो जाये तब सोलह साल की कन्या से इसका विवाह करवा दे। जिससे कि यह पितृभ्रूण, धर्म, अर्थ काम और प्रजा को प्राप्त करे।

वक्तव्य—क्योंकि कहा है कि बिना संतान के स्वर्ग नहीं मिलता।

वि० मन्तव्य—पन्चीस वर्ष का पुरुष और १६ वर्ष की स्त्री पूर्णरूप से बलवीर्य युक्त हो जाते हैं तभी उनका विवाह होना चाहिये। इस प्रकार वे दोनों—पित्र्य-माता पिता-सास स्वसुर आदि बड़ों की सेवा कर सकते हैं, और उनके और्ध्व-दैहिक-श्राद्धादि कृत्य कर सकते हैं, धर्म-यज्ञ दान आदि एवं अपने धारण पोषण में समर्थ हो सकते हैं, अर्थ—धन कमाने के उपाय कर सकते हैं, काम-शारीरिक एवं मानसिक सुखों का लाभ और उपभोग कर सकते हैं और उत्तम सन्तान का उत्पादन कर सकते हैं और इसके विपरीत छोटी आयु में विवाह करने से उक्त सुखों का पूर्ण लाभ भी नहीं होता और भी वे दुःखी अथवा रोगी बने रहते हैं। आयु के उक्त २५ तथा १६ वर्षों का निर्देश उपलक्षण मात्र है, अतः—कोई पुरुष २० वर्ष की आयु में पूर्ण यौवन प्राप्त कर लेता है, और कोई ३० वर्ष में प्राप्त करता है, अत एवं-अद्याङ्गसंग्रह में-२१ वर्ष, शाङ्गधर में २० वर्ष और मनुस्मृति में ३० वर्ष की आयु में विवाह का विधान किया गया है। परन्तु नारी का सोलह १६ वर्ष के पूर्व विवाह होना ही नहीं चाहिये, भलेही कोई कुछ कहें। वाग्भट के शब्दों में—पूर्णाषोडशवर्षा स्त्री पूर्णविशेष संयुता। शुद्ध गर्भाशये मार्गं रक्ते शुक्रेऽनिले हृदि। वीर्यवन्तं सुतं सृते, ततो न्यूनान्दयोः पुनः। रोगी अल्पायुः अधन्यो वा गर्भो भवति नेव वा। अ० ह० अ० १ ॥५३॥

ऊनषोडशवर्षीयामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्। यथाधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥५४॥ जातो वा न चिरं जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः। तस्माद्व्यन्तबालार्थां गर्भाधानं न कारयेत् ॥५५॥ पन्चीस वर्ष की आयु से कम आयु का पुरुष सोलह साल से कम आयु की कन्या में यदि गर्भाधान करता है, तो गर्भ

३६२

मुभुतसंहिता

[ ४०-१० ]

उदर में ही मर जाता है। यदि किसी प्रकार उत्पन्न हो जाये तो वह देर तक नहीं जीता। यदि किसी प्रकार जीवित रह जाये तो निर्बल इन्द्रियोवाला होता है। इसलिये अत्यन्त छोटी आयु की कन्या में गर्भाधान न करे।

इसीसे संग्रह में कहा है—पुमानेकविशतिवर्षः कन्यां द्वादशवर्षदेशीयाम्...उद्वहेत्। तस्यां षोडशवर्षीयायां पञ्चविशतिवर्षः पुरुषः पुत्रार्थं यतेत, तदा तो प्रातवीर्यो वीर्योन्निवर्त अवश्यं जनयतः॥

वि० सन्तव्य—१६ वर्ष से नीचे नारी को गर्भाधान हो जाने से सन्तान की हानि तो होती ही है, नारी को भी अनेक कष्ट फेलने पड़ते हैं, और जीवन भर के लिये रोगिणी बनकर जीना पड़ता है। उसके साथ २ पति देवता भी पत्नी एवं सन्तान के कष्टों से व्याकुल बने रहते हैं ॥५४, ५५॥

अतिबुद्धायां दीर्घरोगिण्यासन्येन वा विकारोणोपसृष्टायां गर्भाधानं नैव कुर्वीत। पुरुषस्याप्येवंविधस्थं त एव दोषाः संभवन्ति ॥५६॥

अति बूढ़ी, चिरकालीन रुग्ण, अथवा किसी अन्य रोग से पीड़ित स्त्री में गर्भाधान न करे। इसी प्रकार के व रुग्ण पुमान् में भी यही दोष होते हैं। ( अर्थात् गर्भ उदर में मर जाता है )।

वि० सन्तव्य—अतिबुद्धा-५० वर्ष के पश्चात् भी कभी २ गर्भाधान हो जाता है, परन्तु वह गर्भ उत्तम गुण सम्पन्न नहीं होता। दीर्घरोगिणी—कुछ अर्थ आदि लम्बे रोगोंवाली स्त्री की सन्तान भी अर्थ आदि से उपद्रुत होती है, अथवा जीर्ण ज्वर-यक्ष्मा, श्वास आदि रोगों से पीड़िता को प्रसव काल में मृत्यु आदि का भय हो सकता है और सन्तान भी रोगयुक्त, अपृष्ठ तथा निर्गुण होती है। अन्येन वा विकारोण-उपदंश आदि योनि रोगों से उपद्रुत नारी में भी गर्भाधान करने से लाभ के स्थान में हानि ही होती है। इसी प्रकार के पुमान् भी इस योग्य नहीं होते कि वे गर्भाधान करें अन्यथा वेही हानियाँ होती हैं, जो नारी के लिये कही गई हैं ॥५६॥

तत्र पूर्वोक्तैः कारणैः पतिष्यति गर्भं गर्भोऽशयकटीवं-क्षणवस्तिशुलानि रक्तदुर्जनं च। तत्र औतैः परिषेका-वगाहप्रदेहादिभिरुपचरेउजीवनीयश्रुतस्त्रीरपानेन्द्र। गर्भ-स्फुरणे मुहुर्मुहुस्तस्मन्धारणार्थं स्त्रीरमुत्पलादिसिद्धं पाय-येत्। प्रसंसमाने सदाहपाश्चैर्पृष्ठशुलास्तुरदानाहमूत्रसङ्घाः, स्थानात् स्थानं च प्रकासति गर्भं कोष्ठे संरम्भः, तत्र स्निग्धशीताः क्रियाः। वेदनायां महासहाह्नुदसहासमुधु-कश्चद्वृत्पाकण्टकारिकासिद्धं पयः शर्कराश्रोदसिन्धुं पाययेत्, मूत्रसङ्घं दुर्भादिसिद्धम्, आनाहे हिङ्गुसौवर्चल्लजुनव-र्चासिद्धम्। अत्यर्थं स्रवति रक्तं कोष्ठागारिकागारमृत्पि-ण्डसमङ्गाघातकीकुपुमनवमालिकागैरिकसज्जरसरसाञ्जन-

चूर्णं मधुनाऽवल्लिहात्, यथालार्भं न्यग्रोधादिवस्वक्प्रवाह-कलकं वा पयसा पाययेत्, उत्पलादिकलकं वा कश्चैरुद्गाटकशालूककलकं वा श्रुतेन पयसा, उदुम्बर-फलौदककन्दकवाथेन वा शर्करामधुमधुरेण गालिपिष्टं, न्यग्रोधादिवस्वरसपरिपीतं वा वस्त्रावयवं योन्यां धारयेत्। अथाष्टशोणितवेदनायां मधुकरैवदारु-मञ्जिष्ठापयस्यासिद्धं पयः पाययेत्। तदेवाश्रमन्तकशता-वरीपयस्यासिद्धं विदारिगन्धादिसिद्धं वा वृहतीद्वयोरुप-ल्लक्षतावरीसारिवापयस्यामधुकसिद्धं वा, एवमुपक्रान्तया उपावर्तन्ते, सजो गर्भश्चाप्यायते। व्यवस्थिते च गर्भे गन्धेनोदुम्बरजलादुसिद्धेन पयसा भोजयेत्।

अतीते लक्षणस्तेहवध्यांभिर्यवाग्भिरुद्गलकादीनां पाचनीयोपसंस्कृताभिरुपक्रमेत् यावन्तो मासा गर्भस्य तावन्त्यहानि। वस्त्युदरशुल्लेषु पुराणगुद्दे दीपनीय-संयुक्तं पाययेदरिष्टं वा। वातोपद्रवगृहीतत्वात् क्षोतसां द्योयते गर्भः, सोऽतिकालमवतिष्ठमानो व्यापद्यते, तां मृदुना स्नेहादिकमेणेपचरेत्, उक्तो-शरससंसिद्धान्नलपस्नेहां यवाग् पाययेत्, माषतिल-बिल्वशलादुसिद्धान्नं वा कुल्माषान् भक्षयेन्मधुमाध्वीकं-चानुपिषेत् सप्तरात्रम्। कालातीतस्थायिनि गर्भे विशेषतः सधान्यमुदूखलं मुसलेनाभिहन्त्याद्विषमे वा यानासने सेवेत्। वाताभिपन्न एव जुष्यति गर्भः, स मातुः कृषि न पूरयति मन्दं स्पन्दते च, तं वृद्धीण्यैः पयोभिर्मांसरसैरुपचरेत्। शुक्रशोणितं वायुनाऽभिप-पन्नमवक्रान्तजीवमाध्मापयत्युदरं, तं कदाचिवाह्नछ्योप-शान्तं नैगमेवापहृतमिति भाषन्ते, तमेव कदाचित् प्रळीयमानं नागोदरमित्याहुः, तत्रापि लीनवत् प्रतीकारः ॥५७॥

गर्भावकति अध्यायं में कहे तथा मूद्रगर्भ निदान में कहे कारणों से गर्भ के गिरते समय गर्भाशय-कटिबंध-गर्भ में शूल होता है। रक्त दिखाई देता है। इसमें शीतस्पर्श, शीतवीर्य औषधियों से परिषेक, अवगाहन, प्रदेह आदि करते। जीवनीय गुण से सिद्ध किया दूध पीने को देवे। गर्भ के स्फुरण होने में उसको रोकने के लिए उत्पलादि गुण से सिद्ध किया दूध बार-बार पीने को देवे। गर्भ के बढ़ने के समय जलन, पाश्चैर्शूल, पृष्ठशूल, रक्त प्रदर, आनाह, मूत्र का अवरोध होता है। गर्भ के एक स्थान से दूसरे स्थान पर खिसका आने पर कोष्ठ में शोथ होती है, इसमें स्निग्ध शीतल उपचार करें। वेदना होने पर मुद्रागर्णी, मुलेहटी, गोखरू, कटरी से सिद्ध किये दूध में शर्करा और मधु मिलाकर पिलाये। मूत्र के अवरोध में पंचतृणमूल से सिद्ध दूध देवे। आनाह में हींग, संवल, कडुन

न० १० ]

गारीरस्थानम्

३६३

और बचा से सिद्ध दूध देवे । रक्त के बहुत अधिक बहने पर कोष्ठगारिका ( दिवारों में जो कीड़ा मिट्टी का घर बनाता है ) नामक जन्तु के घर की मिट्टी, मजीठ, धाय के फूल, वनमालिका, गेरु, राळ, रसोत इनका चूर्ण मधु से चढ़ाये । बरगद आदि क्षीर वृक्षों की छाल या कोमल पत्ते जो मिल सकें उनको पीसकर दूध से पिठाये । उत्प्लादि गण के कल्क को पीसकर दूध के साथ देवे । कसेरू, विषाड़ा, कमलकन्द, इनके कल्क को गरम किये दूध से देवे । गुलूर के फल, पानी के कन्द इनके क्वाथ में शर्करा और मधु मिलाकर इससे चावलों को पीसकर देवे । बरगद आदि के क्वाथ में मिंगोये वृक्ष के टुकड़े को योनि में रखे । यदि न दिखाई देने पर वेदना हो मुलहठी, देवदारू, मजीठ, विदारी से सिद्ध दूध पिलाये । अथवा अश्मन्तक, शतावरी, विदारी से या शालपर्णी आदिगण से सिद्ध दूध पिलाये । कटेरी, बड़ी कटेरी, कमल, शतावरी, सारिवा, विदारी और मुलहठी से सिद्ध दूध देवे । इस प्रकार करने से वेदनार्थ शान्त होती हैं, और गर्भ पुष्ट होता है । गर्भ के स्थिर हो जाने पर गुलूर के कच्चे फलों से सिद्धकिये गाय के दूध से भोजन देवे । गर्भपात हो जाने पर लवण और स्नेहों से रक्षित उद्हाल्क ( कोदो ) से बनाई यवागू को पाचनीय (पञ्चकोल आदि) द्रव्यों से मिलाकर, जितने मास का गर्भ पात हुआ हो, उतने दिनों तक पिलाये । वस्ति में शूल होने पर दीपनीय द्रव्यों से युक्त पुराना गुड या अरिष्ट देवे । वायु के उपद्रवों के कारण गर्भ छोतों में छिपा रहता है, फिर वहाँ बहुत दिन रहने पर मर जाता है, इसमें मृदु स्नेहन आदि विधि से चिकित्सा करे ।

उत्कोश—( कुरर ) के मांस रस में बनाई यवागू में प्रचुर पी डालकर पिलाये । उड्डद, तिल, कच्चे बिल्वफल से सिद्ध किये कुलमाषों ( अर्ध स्वित्तु गेहूँ या जौ ) को खाये । मधु मद्य माध्वीक मद्य पीछे से पीये । इस प्रकार सात दिन करे । समय ( प्रसव समय तथा ६ या १० मास ) के बीत जाने पर भी स्थिर रहे । गर्भ में—ऊखल में धान्य डालकर मुसल से कूटे । विषम सवारी या आसन ( स्थिता ) को बरते । वायु से पीड़ित गर्भ सूख जाता है; यह गर्भ माता की कोख को पूरा नहीं भरता और धीमे से गति करता है । इस गर्भ की बृंहणीय द्रव्यों से सिद्ध दूध से और मांस रस से चिकित्सा करे । शुक्र और आर्तव के वायु से आक्रान्त होने पर जीवात्मा का अवतरण हो जाने पर उदर फूलता है, यह गर्भ जब कभी बिना किसी कारण के हो शान्त हो जाता है ( बैठ जाता है या मर जाता है ), तब इसको नेगमेघ ने ले लिया है, ऐसा कहते हैं । यही गर्भ जब भी छिपा रहता है, तब इसको नागोदर कहते हैं, इसमें भी लीनगर्भ की भाँति चिकित्सा करे ।

वक्तव्य—“पुष्पदर्शनादेवेनां मृयात्—शयनं तावन्मृदु-सुखशिशिरास्तरणसंस्तीर्णमोषदवनतशिरस्कं प्रतिपश्यतेति । ततो यथीमधुकरसर्पिभ्यां परमशिशिरेवारिंसंस्थिताभ्यां पितृमाच्छान्यो-पश्यसमोपे स्थापयेत् । तथा शतवौतसहस्रवौताभ्यां सर्पिभ्यांमधो नामेः सर्वतः प्रदिद्यात् ॥ ( २ ) यस्याः पुनरुष्णतीर्णोपयोगाद् गर्भिण्या महति गर्भे जातसारे पुष्पदर्शनं स्यात् अन्यो वा योनि-खाद्यः तस्याः गर्भो बृद्धिं न प्राप्नोति, निःसृतत्वात् । सकालमव-तिष्ठतेऽतिमात्रम् । तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपवासव्रत-कर्मपरायाः, पुनः कदाहारायाः स्नेहद्वेषिण्या वातप्रकोपणोक्ता-न्यासेवमानाया गर्भो न बृद्धिं प्राप्नोति, परिशुष्कत्वात् । स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रम् । तन्नागोदरमित्याचक्षते” ॥ चरक० ॥

जैसे गान्धारी का गर्भ समय के बहुत पीछे तक प्रसव नहीं हुआ था—फिर उसने गुस्से में उसे निकाल दिया था । जिस को महर्षि व्यास ने फिर बाहर रखकर पाठा था । ( ३ ) गर्भ नष्ट होना—

असृङ्ग निरुद्धं पवनेन नायाः

गर्भं व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित् ।

तदनिनसूर्यश्रमशोकोर्गैः

उष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम् ॥

दृष्ट्वासूगेवं न च गर्भसंज्ञं

केचिन्नरा भूतद्वतं वदन्ति ॥ चरक ॥

दूध पाक का नियम—

द्रव्यादष्टगुणं क्षीरं क्षीराचोथं चतुर्गुणम् ।

क्षीरावशेषः कर्तव्यः क्षीरपाके स्वयं विधिः ॥ ५७ ॥

अत ऊर्ध्वं मासानुमासिकं वक्ष्यामः—॥ ५८ ॥

मधुर्कं शाकबीजं च पयस्या सुरदारु च ।

अश्मन्तकस्तिलाः कृष्णास्ताम्रवज्रौ शतावरी ॥ ५९ ॥

वृक्षादनी पयस्या च लता सौपलसारिवा ।

अनन्ता सारिवा रास्ता पद्मा मधुकमेव च ॥ ६० ॥

बृहत्स्यो कारमरी चापि क्षीरयुक्तास्त्वच्चो घृतम् ।

पृथिनपर्णी बला शिम्भः श्वदृष्टा मधुपर्णिका ॥ ६१ ॥

शृंगाटकं बिसं द्राक्षा कशेरु मधुर्कं सिता ।

वत्सैते सम योगाः स्युरधरंश्लोकसमापनाः ॥

यथासंख्यं प्रयोक्तव्या गर्भच्छावे पयोयुताः ॥ ६२ ॥

इसके पश्चात् प्रत्येक मास में देने योग्य औषधियाँ कहते हैं । मुलहठी, सागोन के बीज, विदारी और देवदारू, पहले महीने में; अश्मन्तक, तिल, पिप्ली, मजीठ और शतावर, दूसरे मास में; वोदा, विदारी, प्रियंगु, कमलगट्टा, और अनन्त-मूल, तीसरे महीने में; अनन्ता (डुवों या डुरालभा), सारिवा, रास्ता, भागी, और मुलहठी, चौथे मास में । कटेरी, बड़ीकटेरी,

३६४

शारीरस्थानम्

[ अ० १० ]

गम्भारी, बरगद आदि क्षीर वृक्षों के कोमले पत्ते और छाल, घृत, इनको पाँचवें मास में । पृश्निपर्णी, बला, सहजन, गोखरु और गिलोय छठे मास में । सिंधाड़ा, विस, द्राक्षा, कसेरु, मुल्हठी और मिश्री सातवें मास में, प्रत्येक मास में दूध के साथ इनको देवे । ये सात योग आधे श्लोक में कहे गये हैं । गर्भ खाव में क्रमशः दूध के साथ इनको बरतना चाहिये ॥

कपित्थवृहतीबिल्वपटोलेलुनिदिग्धिकाः ।

मूलानि क्षीरसिद्धानि पाययेद्विषगृहमे ॥ ६३ ॥

नवमे मधुकानन्तापयस्यासारिवाः पिवेत ।

क्षीरं शुण्टीपयस्याभ्यां सिद्धं स्यादशमे हितम् ॥ ६४ ॥

सखीरा वा हिता शुण्टी मधुकं सुरदारु च ।

एवमाप्यायते गर्भस्तीव्रा रुक् चोपशाम्यति ॥ ६५ ॥

आठवें मास में—कैय, बड़ी कटेरी, बेल, परवर, ईख, छोटी कटेरी, की जड़ से सिद्ध किया दूध देवे । नवम मास में—मुल्हठी, दूवा, क्षीर विदारी और अतन्त मूल से सिद्ध दूध पीये । दसवें मास में—सोठ और क्षीरकाकोली से सिद्ध किया दूध देना चाहिये । अथवा सोठ, मुल्हठी, देवदारु से सिद्ध किया दूध देवे । इस प्रकार से गर्भ पृष्ठ होता है, और तीव्र वेदना शान्त होती है ॥ ६३-६५ ॥

निवृत्तप्रसवायास्तु पुनः षड्भ्यो वर्षभ्य ऊर्ध्वं प्रसव-मानायां नार्याः कुमारोऽल्पयुर्भवति ॥ ६६ ॥

प्रसव निवृत्ति के पीछे यदि छः साल के ऊपर प्रसूति हो तो बालक अल्पायु होता है ।

वक्तव्य—गर्भाशय या योनि दोष के कारण ही प्रसव-या गर्भाधान होना रुकता है । इनकी चिकित्सा न करने पर यदि आहार-विहार के कारण अचानक गर्भ रहकर प्रसव होता है, तो वह अल्पायु होता है ।

वि० मन्तव्य—किसी २ को १५-२० वर्ष पश्चात् सन्तान होती है या होनी प्रारम्भ हो जाती है ॥ ६६ ॥

अथ गर्भिणी व्याध्युत्पत्तावत्यये छद्वेयेन्मधुरास्लेनात्रो-पहितेनानुलोमयेच्छ, संक्रमनीयं च मृदु विदध्यादनपानयोः, अन्नीयाच्च मृदुवोयं मधुरप्रायं गर्भाविरुद्धं च, गर्भाविरुद्धाच्च क्रिया यथायोगं विदधीत मृदुप्रायाः ॥ ६७ ॥

गर्भवती स्त्री को यदि कोई महान् भयानक रोग उत्पन्न हो जाय तो मधुर-अम्ल अन्न के साथ वमन करे और मधुर-अम्ल अन्न से उसे अनुलोमन कराये । संशमनीय चिकित्सा करे । खान पान में नरम वस्तु देवे । मृदुवीर्य, प्रायः करके मधुर, गर्भ के लिये अविरोधि भोजन करे । गर्भ के अपतिकूल एवं कोमल जो योग्य क्रियायें—उपचार हों, उनको बरते ।

वि० मन्तव्य—सामान्यतः गर्भिणी को वमन विरेचन का निषेध है, तथापि अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर करना चाहिये, यथा—अलसक विलम्बिका आदि विषविकारों में तथा कफजनित विकारों में—वमन तथा पित्तज विकारों में एवं पुरीषरोध आदि में विरेचन आवश्यक होता है ॥ ६७ ॥

सौवर्णं सुकृतं चूर्णं कुष्ठं मधु घृतं वचा ।

मत्स्याक्षकः शंखपुष्पी मधु सर्पिः सकाच्छनम् ॥ ६८ ॥

अर्कपुष्पी मधु घृतं चूर्णितं कनकं वचा ।

हेमचूर्णाणि कैडर्यः श्वेता दूर्वा घृतं मधु ॥ ६९ ॥

चत्वारोऽभिहिताः प्राशाः श्लोकाधृषु चतुष्वर्षि ।

कुमारार्णां वपुर्मधाबलवृद्धिविवर्धनाः ॥ ७० ॥

इति भगवता श्रीधन्वन्तरिगोपदिष्टायां तच्छिष्येण

महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां

तृतीयं शारीरस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥

( १ ) सुवर्णं भरम, कूठ, मधु घृत और वच इनका उत्तम चूर्ण, ( २ ) ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मधु, घी और सुवर्णभरम, ( ३ ) अर्कपुष्पी, मधु, घी, सुवर्ण भरम और वच, ( ४ ) स्वर्ण भरम, वकायन, श्वेता ( अपराजिता ), दूर्वा, घी और मधु, ये चार प्राश आधे श्लोकों से बताये गये हैं । ये योग बालकों के शरीर-मेधा, बल और बुद्धि को बढ़ाते हैं ।

वक्तव्य—कैडर्य का अर्थ गम्भारी उत्तम है । क्योंकि कहा भी है—

गर्भे शुष्के तु वातेन बालानां चापि शुष्यताम् ।

शिताकाश्मर्यमधुकैः, हितमुत्थापने पयः ॥ ६८ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भिणीव्याकरणं

शारीरं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

शारीरकोषुकानि

पंचविशतितत्वानि

२५ पुरुषः

१ अन्यकाम

२ महान्

३ अहंकार

वैकारिकः

( तेजससहायः )

१४ एकादशेन्द्रियाणि

तेजसः

भूतादिः

( तेजससहायः )

१६ पंचतन्मात्राणि

( पञ्चदुर्दोन्द्रियाणि उभयार्थकं मतः )

पञ्चकर्मैन्द्रियाणि

१. शब्दतन्मात्रम् २. स्पर्शतन्मात्रम् ३. रूपतन्मात्रम् ४. रसतन्मात्रम् ५. गन्धतन्मात्रम्

१. श्रोत्रम् २. त्वक् ३. चक्षुः

४. जिह्वा ५. प्राणम्

२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी

२५. उर्वी

विषयाः—शब्दः स्पर्शः

रसः, गन्धः

२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी

२५. उर्वी

रूपम्,

रसः, गन्धः

२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी

२५. उर्वी

विषयाः—वचनम् - आदानम्, आनन्दम्, विषयीः, विहरणम्

१. वाक् २. हस्तः ३. उपस्थम् ४. पायुः ५. पादः

२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी

२५. उर्वी

३६६

सुश्रुतसंहिता

त्वचां विभागाः

तस्य स्वरवेवंप्रवृत्तस्य ( भूतात्माधिष्ठितस्य ) त्वचः मु० शा० शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य वीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति

संख्यानामकार्यक्रमम्प्रमाणम्अधिष्ठानम्
प्रथमाअवभासिनीसर्ववर्णानवभासयति
पंचविधां छायां
च प्रकाशयतिब्रीहेरष्टादशभागप्रमाणासिध्मपञ्चकटकौ
द्वितीयालोहित्वाब्रीहिषोडशभागप्रमाणातिलकालकन्यच्छव्यंगानि
तृतीयाश्वेताब्रीहिद्रादशभागप्रमाणाचर्मदलम् अजगल्ली मशकः
चतुर्थीताम्बाब्रीहेरष्टभागप्रमाणाविविधकिलासकुष्ठानि
पञ्चमीवेदिनीब्रीहिर्पञ्चभागप्रमाणाकुष्ठविसर्पौ
षष्ठीरोहिणीब्रीहिप्रमाणाग्रन्थिः, अपची, अर्मुदम्, रुली
पदम्, गलगण्डम्
सप्तमीमांसधराब्रीहिद्रयप्रमाणाभगन्दरः, विद्रधिः अर्शः

कलाः ( सप्त ) ( मु० शा० अ० ४.५. २३ )

धातवाशयान्तरमर्यादाः

संख्यानामअधिष्ठानम्कार्यम्
प्रथमामांसधरामांसम्यस्यां सिरास्त्राद्युधमनीक्षोतसां प्रताना भवन्ति ।
द्वितीयारक्तधरामांसस्य अभ्यन्तरतःतस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृतस्त्रीहानश्च भवन्ति ।
तृतीयामेदोधराउदरस्थमण्वस्थिषु
चतुर्थीश्लेष्मधरासर्वसन्धिषुस्नेहाभ्यक्तं यथा हृक्षचक्रं साधु प्रवर्तते संघयः साधु वर्तन्ते संरिलघाः श्लेष्माणः तथा ।
पञ्चमीपुरीषधरापक्वाशयस्थाया अन्तःकोष्ठे मलमभिभिभजत् यकृतसमन्तात् कोष्ठं च, तथाऽन्नाणि समाश्रिता (सा) उपद्रुकस्थं विभजते मलम् ।
षष्ठीपित्तधरापक्वामाशयमध्यस्थाया चतुर्विधमन्नपानमुपसुक्तमाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोः पस्थितं धारयति (पाकार्यम्) ।
सप्तमीशुक्रधरासर्वधारीरन्यापिनीयथा पयसां सपिस्तु गृहं चेक्षी रसो यथा शरीरेषु तथा शुक्रं विद्यात् ।

शारीरस्थानम्

३६७

अस्थिसंख्याविवरणम्—१

अस्थिनामानिसंप्रहेचरकेसुश्रुतेप्रत्यक्षशारीरे
नखानि२०२०न गणितानिन गणितानि
अंगुल्यस्थीनि६०६०६०५६
अंगुलिशलाकाः२०२०{ तलास्थीनि २०
कूर्च-२०
गुल्फयोः २०२०
अंगुलिशलाकावन्धनेपादकूर्चेषु १४
अंगुलिशलाकाकूर्चास्थीनिहस्तकूर्चेषु १६ = ३०
गुल्फास्थीनि
मणिवन्धवास्थीनि
पाण्यस्थीनि
मणिवन्धौ
जानुकपालिके २
जंघास्थीनि
प्रकोष्ठास्थीनि
जान्वस्थीनि
कूर्चरी
ज्वरस्थीनि
प्रगण्डास्थीनि
पवम् शाखास्थीनि
पश्चाः१४०१२८१२०१२०
पशुकास्थालकानि२४२४२४२४
पशुकास्थालकावृदानि२४२४२४
पुष्टे२४२४२४
उरसि३०४५३०कशेदका २४
भंगारिध१४उरःफलम् १
त्रिकास्थिनी
नितंबास्थिनी
अक्षकास्थिनी
अंघास्थिनी
अंघफलकास्थिनी
गुदास्थि
कण्ठास्थि १
पवमन्तराघौ१२०१३८१७५८

३६८

सुश्रुतसंहिता

अस्थिसंख्याविवरणम् (२)

अस्थिनामानिसंप्रदेचरकेसुश्रुतेप्रत्यक्षशारीरे
ग्रीवायाम्१३१५पृष्ठवंशे
कंठनाड्याम्गणितानि
हनुबन्धने३२ऊर्ध्वहनु
दन्ताः३२३२
दन्तोद्गुलानि३२३२नगणिता
नासायाम्
शिरसिशिरःकपाठानि ४शिरःकपाठानि
गण्डास्थिनी
कर्णास्थिनी
जनु
ताणु
हृन्वस्थि
ललाटास्थि
जतुकास्थि
क्षभर्रास्थि
नासाशुक्रिके
नासामध्यसिरिका
अभुपीठे
एवं ग्रीवाशिरोस्थीनि,१००६४६३केवल शिरोस्थीनि
एवम् शरीरेऽस्थि—
संख्या—३६०२६०३००†२००

† केवल वृत्तसंख्याकानि कर्णितरास्थीन्यन्तर्गम्य २०६ संख्यामस्यां नृवते ।

अंगप्रत्यंगानि ।

Labels for the human figure (अंगप्रत्यंगानि):

  • Head: शिरः (Shira:), अग्नतनम् (Agnatana:), शिरोधरा (Shirodhara), अंसः (Ansa:), स्कन्धाः (Skandha:), उरः (Ura:).
  • Neck: रुलाटम् (Rulata:), नासा (Nasa), ओष्ठः (Ostha:), अग्न्यम् (Agnya:), चिबुकः (Chibuka:).
  • Torso: प्रवाहुः (Pravahu:), कक्षा (Kaksha), प्रपाणिः (Prapani:), स्तनपर्यन्तः (Stanaparyanta:), स्तनान्तरम् (Stanantar:), हृदयम् (Hridaya:), उदरम् (Udara:), कटिः (Kati:), बस्तिशिः (Bastishira:), मुष्कः (Mushka:), उरुः (Uru:), पाणिः (Pani:), मेदः (Meda:).
  • Limbs: अंगुष्ठः (Angusta:), भदेशिनी (तज्जनी) (Badesini (Tajjani)), सङ्कला (Sankala), अनामिका (Anamika), कनिष्ठिका (Kanisthika), जानु (Janu), जङ्घा (Janga), गुल्फः (Gulfa:), पादः (Pada:), पाषाणिः (Pashani:), पादतलम् (Padatala:), प्रपदम् (Prapada:), अङ्गुष्ठः (Angusta:), कनिष्ठिका (Kanisthika), अनामिका (Anamika), मध्यमा (Madhyama), प्रदेशिनी (Pradeshini).
  • Grouping: शरीरम् (Sharira:).

This image shows a blank, aged page with a light beige or cream-colored background. The surface has a subtle texture and a few small, faint brown spots or blemishes, particularly towards the bottom left. A thin, dark vertical line runs along the right edge, likely representing the binding or the edge of the paper. There is no text or other content on the page.

This image shows a blank, aged page with a light beige or off-white background. The surface has a subtle texture and shows signs of wear, including minor blemishes, faint smudges, and slight discoloration, particularly towards the edges. There is no text or other content on the page.

मर्मशारीरम् ।

The diagram illustrates the locations of vital points (Marmas) on the human body, labeled in Sanskrit. The labels are as follows:

  • Upper Body:
    • कुपिरम् (Kupiram) - Shoulder
    • ऊर्वी (Urvī) - Axilla
    • फुणा (Phuna) - Neck
    • लोहिताक्षः (Lohitaakṣaḥ) - Eye
    • अपालापः (Apalapah) - Breast
    • अपाङ्गः (Apangah) - Navel
    • स्थपनी (Sthapnī) - Pubis
    • शुङ्गटकानि (Shungatakanī) - Genitalia
    • फुणा (Phuna) - Genitalia
    • अंसः (Ansah) - Ear
  • Lower Body:
    • नाभिः (Nabhiḥ) - Navel
    • बस्तिः (Bastiḥ) - Groin
    • ऊर्वी (Urvī) - Thigh
    • जानु (Janu) - Knee
    • गुल्फः (Gulphah) - Ankle
    • क्षिप्रम् (Kṣipram) - Heel
  • Arms:
    • हृदयम् (Hṛdayam) - Heart
    • इन्द्रवस्तिः (Indravastiḥ) - Elbow
    • मणिबन्धः (Maṇibandhah) - Wrist
  • Foot:
    • कूर्चक्षिरः (Kūrčakṣirah) - Heel
    • तलहृदयम् (Talahṛdayam) - Sole
    • कूर्चः (Kūrčah) - Sole
    • दिप्रम् (Dipram) - Sole

मर्मशारीरम् ।

The diagram illustrates the locations of vital points (Marmas) on the human back and legs. The labels are as follows:

  • Right side labels (from top to bottom):
    • विधुरम् (Vidhura)
    • कृकारिका (Krukarika)
    • अंसः (Asa)
    • अंसफलकः (Asaphalaka)
    • बृहती (Bhuti)
    • कूपरम् (Kupa)
    • पार्श्वसन्धि (Parshvasandhi)
    • नितम्बः (Nitamba)
    • कुकुन्दरे (Kukundra)
    • क्रीकतस्त्रणम् (Krikatrasna)
    • गुदम् (Gudam)
    • कूर्व (Kurva)
    • आणिः (Agni)
    • जानु (Janu)
    • इन्द्रवस्ति (Indravasti)
    • गुल्फः (Gulfa)
  • Left side labels (from top to bottom):
    • कृकारिका (Krukarika)
    • अंसः (Asa)
    • अंसफलकः (Asaphalaka)
    • बृहती (Bhuti)
    • कूपरम् (Kupa)
    • पार्श्वसन्धि (Parshvasandhi)
    • नितम्बः (Nitamba)
    • मणिबन्धः (Manibandha)
    • क्रीकतस्त्रणम् (Krikatrasna)
    • उर्वी (Urva)
    • आणिः (Agni)
    • जानु (Janu)
    • इन्द्रवस्ति (Indravasti)
    • गुल्फः (Gulfa)

This image shows a blank page with a light beige or off-white background. There are several small, dark specks scattered across the surface, which appear to be scanning artifacts or dust. A faint vertical line is visible along the right edge of the page. The overall texture is slightly grainy, typical of a scanned document.

This image shows a blank, aged page from a book or document. The paper has a light beige or off-white color with a slightly textured appearance. There are subtle signs of aging, including faint yellowing and some minor discoloration, particularly along the left edge where it might have been bound. The overall surface is smooth but shows the natural grain of the paper. No text, illustrations, or other markings are present on the page.

मर्मशारीरम् ।

The diagram illustrates the 'Marmashariram' (Vital Points and Organs) of the human body. The labels are as follows:

  • Head and Neck:
    • अश्वघातः (Ashvaghata) - Forehead
    • स्वपनी (Svapani) - Temple
    • अपाङ्गः (Apanga) - Side of head
    • मन्या (Manya) - Side of head
    • सिरासातृका (Sirasatruka) - Side of head
    • नीला (Nila) - Side of head
    • आवर्तो (Aavarto) - Back of head
    • उदक्षेत्रो (Udaksheetro) - Back of head
    • शङ्खः (Shanka) - Side of head
    • मन्या (Manya) - Side of head
    • सिरासातृका (Sirasatruka) - Side of head
    • नीला (Nila) - Side of head
  • Upper Body:
    • अपस्तम्भः (Apastambha) - Neck
    • स्तनरोहितम् (Stanarohitam) - Right breast
    • उर्वी (Urvī) - Right breast
    • स्तनमूलम् (Stanamoolam) - Right breast
    • कक्षाधरः (Kshadhar) - Right shoulder
    • हृदयम् (Hridayam) - Right heart
    • उर्वी (Urvī) - Right heart
    • अगणिः (Agaṇi) - Right arm
    • नाभिः (Nabhi) - Navel
    • बस्तिः (Basti) - Right arm
    • इन्द्रबस्तिः (Indrabasti) - Right arm
    • माणबन्धः (Maṇabandha) - Right arm
    • कूर्चशिरः (Kurchasira) - Right arm
    • कूर्चः (Kurcha) - Right arm
    • तलहृदयम् (Talahridayam) - Right arm
    • रक्षिमम् (Rakshimam) - Right arm
    • उर्वी (Urvī) - Right arm
    • आगणिः (Agaṇi) - Right arm
    • जानु (Janu) - Right leg
  • Lower Body:
    • लोहिताक्षम् (Lohitaaksham) - Left breast
    • विटपम् (Vitapam) - Left breast
    • मणिबन्धः (Maṇibandha) - Left arm
    • कूर्परम् (Koorparam) - Left arm
    • स्तनमूलम् (Stanamoolam) - Left breast
    • उर्वी (Urvī) - Left breast
    • स्तनरोहितम् (Stanarohitam) - Left breast
    • अपस्तम्भः (Apastambha) - Left neck
    • नीला (Nila) - Left side of head
    • सिरासातृका (Sirasatruka) - Left side of head
    • मन्या (Manya) - Left side of head
    • अपाङ्गः (Apanga) - Left side of head
    • स्वपनी (Svapani) - Left temple
    • अश्वघातः (Ashvaghata) - Left forehead
    • गुल्फः (Gulfa) - Left foot
    • जानु (Janu) - Left leg
    • आगणिः (Agaṇi) - Left leg
    • तलहृदयम् (Talahridayam) - Left leg
    • कूर्चः (Kurcha) - Left leg
    • माणबन्धः (Maṇabandha) - Left leg
    • इन्द्रबस्तिः (Indrabasti) - Left leg
    • बस्तिः (Basti) - Left leg
    • नाभिः (Nabhi) - Navel
    • अगणिः (Agaṇi) - Left leg
    • गुल्फः (Gulfa) - Left foot