भारतकोश
संग्रह पर लौटें

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ कारणेन नित्येनाविकृतेन सर्व- | आकाशादिके कारण, नित्य, गतेन सत्यज्ञानानन्तलक्षणेन | निर्विकार, सर्वगत, सत्य, ज्ञान एवं | अनन्तरूप, पञ्चकोशातीत सर्वात्मासे पञ्चकोशातिगेन सर्वात्मनात्म- | भी आत्मवान् हैं। वही परमार्थतः वन्तः। स हि परमार्थत आत्मा | सबका आत्मा है—यह बात भी सर्वेषामित्येतदप्यर्थादुक्तं भवति। | इस वाक्यके तात्पर्यसे कह ही दी | गयी है। प्राणं देवा अनु प्राणन्तीत्युक्तं | देवगण प्राणके पीछे प्राणन- तत्कस्मादित्याह । प्राणो हि | क्रिया करते हैं—ऐसा पहले कहा यस्माद्भूतानां प्राणिनामायुर्जीव- | गया। ऐसा क्यों है? सो बतलाते नम् । “यावद्ध्यस्मिञ्शरीरे प्राणो | हैं—क्योंकि प्राण ही प्राणियोंका वसति तावदायुर” (कौ० उ० | आयु—जीवन है। “जबतक इस ३। २) इति श्रुत्यन्तरात्। | शरीरमें प्राण रहता है तभीतक तस्मात्सर्वायुषम् । सर्वेषामायुः | आयु है” इस एक अन्य श्रुतिसे भी सर्वायुः सर्वायुरेव सर्वायुषमित्यु- | यही सिद्ध होता है। इसीलिये वह च्यते । प्राणापगमे मरणप्रसिद्धेः। | ‘सर्वायुष’ है। सबकी आयुका नाम प्रसिद्धं हि लोके सर्वायुष्ट्वं | ‘सर्वायु’ है, ‘सर्वायु’ ही ‘सर्वायुष’ प्राणस्य । | कहा जाता है; क्योंकि प्राण-प्रयाण- | के अनन्तर मृत्यु हो जाना प्रसिद्ध | ही है। प्राणका सर्वायु होना तो | लोकमें प्रसिद्ध ही है। अतोऽस्माद्वाह्यादसाधारणाद- | अतः जो लोग इस बाह्य प्राणोपासन- न्नमयादात्मनोऽप- | असाधारण (व्यावृत्तरूप) अन्नमय फलम् क्रम्यान्तः साधा- | कोशसे आत्मबुद्धिको हटाकर इसके | अन्तर्वर्ती और साधारण [सम्पूर्ण रणं प्राणमयमात्मानं ब्रह्मोपासते | इन्द्रियोंमें अनुगत] प्राणमय कोश- येऽहमस्मि प्राणः सर्वभूताना- | को ‘मैं प्राण सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ मात्मायुर्जीवनहेतुत्वादिति ते । और उनके जीवनका कारण होनेसे सर्वमेवायुरस्मिँल्लोके यन्ति; नाप- । उनकी आयु हूँ' इस प्रकार ब्रह्मरूपसे मृत्युना म्रियन्ते प्राक्प्राप्तादायुष । उपासना करते हैं वे इस लोकमें इत्यर्थः । शतं वर्षाणीति तु युक्तं । पूर्ण आयुको प्राप्त होते हैं । अर्थात् “सर्वमायुरेति” ( छा० उ० २ । । प्रारब्धवश प्राप्त हुई आयुसे पूर्व ११–२०, ४ । ११–१३ ) इति । अपमृत्युसे नहीं मरते । “पूर्ण आयु- श्रुतिप्रसिद्धेः । । को प्राप्त होता है” ऐसी श्रुति-प्रसिद्धि किं कारणं प्राणो हि भूता- । होनेके कारण यहाँ [ 'सर्वायु' नामायुस्तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । । शब्दसे ] सौ वर्ष समझने चाहिये । । [ प्राणको सर्वायु समझनेका ] यो यद्गुणं ब्रह्मोपास्ते स तद्- । क्या कारण है ? क्योंकि प्राण ही । प्राणियोंकी आयु है इसलिये वह गुणभागभवतीति विद्याफलप्राप्ते- । 'सर्वायुष' कहा जाता है । जो । व्यक्ति जैसे गुणवाले ब्रह्मकी उपासना हेत्वर्थं पुनर्वचनं प्राणो हीत्यादि । । करता है वह उसी प्रकारके गुणका । भागी होता है—इस प्रकार विद्याके तस्य पूर्वस्यान्नमयस्यैष एव । फलकी प्राप्तिके इस हेतुको प्रदर्शित । करनेके लिये 'प्राणो हि भूताना- शारीरेऽन्नमये भवः शारीर । मायुः' इत्यादि वाक्यकी पुनरुक्ति की । गयी है । यही उस पूर्वकथित आत्मा । कः ? य एष प्राणमयः । । अन्नमय कोशका शारीर—अन्नमय । शरीरमें रहनेवाला आत्मा है । कौन ? । जो कि यह प्राणमय है । तस्माद्वा एतस्मादित्युक्तार्थ- । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि शेष [मनोमयकोश-] मन्यत् । अन्यो- । पदोंका अर्थ पहले कह चुके हैं । [निर्वचनम्] ऽन्तर आत्मा मनो- । दूसरा अन्तर-आत्मा मनोमय है । । संकल्प-विकल्पात्मक अन्तःकरणका मयः । मन इति संकल्पाद्यात्म- । नाम मन है; जो तद्रूप हो उसे कमन्तःकरणं तन्मयो मनोमयो । मनोमय कहते हैं; जैसे

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ यथान्नमयः । सोऽयं प्राणमय- होनेके कारण ] अन्नमय कहा गया स्याभ्यन्तर आत्मा । तस्य यजु- है । वह इस प्राणमयका अन्तर्वर्ती आत्मा है । उसका यजुः ही शिर रेव शिरः । यजुरित्यनियताक्षर- है । जिनमें अक्षरोंका कोई नियम पादावसानो मन्त्रविशेषस्तज्जा- नहीं है ऐसे पादोंमें समाप्त होनेवाले मन्त्रविशेषका नाम यजुः है । उस तीयवचनो यजुःशब्दस्तस्य जातिके मन्त्रोंका वाचक 'यजुः' शिरस्त्वं प्राधान्यात् । प्राधान्यं च शब्द है । उसे प्रधानताके कारण शिर कहा गया है । यागादिमें यागादौ संनिपत्योपकारकत्वात् । संनिपत्य उपकारक * होनेके कारण यजुषा हि हविर्दीयते स्वाहाका- यजुः-मन्त्रोंकी प्रधानता है; क्योंकि स्वाहा आदिके द्वारा यजुर्मन्त्रोंसे ही रादिना । हवि दी जाती है । वाचनिकी वा शिरआदि- अथवा इन सब प्रसंगोंमें शिर आदिकी कल्पना श्रुतिवाक्यसे ही कल्पना सर्वत्र । मनसो हि समझनी चाहिये । अक्षरोंके [उच्चारणके] स्थान, [आन्तरिक] प्रयत्न, स्थानप्रयत्ननादस्वरवर्णपदवाक्य- [उससे उत्पन्न हुआ] नाद, [उदात्तादि] स्वर, [अकारादि] वर्ण, [उनसे रचे हुए] विषया तत्संकल्पात्मिका पद और [पदोंके समूहरूप] वाक्यसे सम्बन्ध रखनेवाली तथा उन्हींके तद्भाविता वृत्तिः श्रोत्रादिकरण- संकल्प और भावसे युक्त जो श्रवणादि इन्द्रियोंके द्वारा उत्पन्न होनेवाली द्वारा यजुःसंकेतविशिष्टा यजुः 'यजुः' संकेतविशिष्ट मनकी वृत्ति है

  • यज्ञाङ्ग दो प्रकारके होते हैं—एक संनिपत्य उपकारक और दूसरे आरात् उपकारक । उनमें जो अङ्ग साक्षात् अथवा परम्परासे प्रधान यागके कलेवरकी पूर्ति कर उसके द्वारा अपूर्वकी उत्पत्तिमें उपयोगी होते हैं वे संनिपत्य उपकारक कहलाते हैं । यजुर्मन्त्र भी यागशरीरको निष्पन्न करनेवाले होनेसे संनिपत्य उपकारक हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

एवं च मनोवृत्तित्वे मन्त्राणां | इस प्रकार मन्त्रोंके मनोवृत्तिरूप

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

इत्युच्यते । एवमृगेवं साम | वही 'यजुः' कही जाती है । इस च । | प्रकार 'ऋक्' और ऐसे ही 'साम' | को भी समझना चाहिये ।* एवं च मनोवृत्तित्वे मन्त्राणां | इस प्रकार मन्त्रोंके मनोवृत्तिरूप | होनेपर ही उस वृत्तिका आवर्तन वृत्तिरेवावर्त्यत इति मानसो जप | करनेसे उनका मानसिक जप किया | जाना ठीक हो सकता है । अन्यथा उपपद्यते । अन्यथाविषयत्वान्म- | घटादिके समान मनके विषय न | होनेके कारण तो मन्त्रोंकी आवृत्ति न्त्रो नावर्तयितुं शक्यो घटादि- | भी नहीं की जा सकती थी और | उस अवस्थामें मानसिक जप होना वदिति मानसो जपो नोपपद्यते । | सम्भव ही नहीं था । किन्तु मन्त्रोंकी | आवृत्तिका तो बहुत-से कर्मोंमें विधान मन्त्रावृत्तिश्च चोद्यते बहुशः | किया ही गया है [ इससे उसकी | असम्भावना तो सिद्ध हो नहीं कर्मसु । | सकती ] ।

  • 'यजुः' आदि शब्दोंसे यजुर्वेद आदि ही समझे जाते हैं । परन्तु यहाँ जो उन्हें मनोमय कोशके शिर आदि रूपसे बतलाया गया है उसमें यह शंका होती है कि उनका उससे ऐसा क्या सम्बन्ध है जो वे उसके अङ्गरूपसे बतलाये गये हैं ? इस वाक्यमें भगवान् भाष्यकारने उसी बातको स्पष्ट किया है । इसका तात्पर्य यह है कि यजुः, साम अथवा ऋक् आदि मन्त्रोंके उच्चारणमें सबसे पहले अन्यान्य शब्दोंके उच्चारणके समान मनका ही व्यापार होता है । पहले कण्ठ अथवा तालु आदि स्थानोंसे जठराग्निद्वारा प्रेरित वायुका आघात होता है, उससे अस्फुट नादकी उत्पत्ति होती है; फिर क्रमशः स्वर और अकारादि वर्ण अभि- व्यक्त होते हैं । वर्णोंके संयोगसे पद और पदसमूहसे वाक्यकी रचना होती है । इस प्रकार मानसिक सङ्कल्प और भावसे ही यजुः आदि मन्त्र अभिव्यक्त होकर श्रोत्रेन्द्रियसे ग्रहण किये जाते हैं । अतः मनोवृत्तिसे उत्पन्न होनेवाले होनेके कारण ही यहाँ यजुर्विषयक मनोवृत्तिको 'यजुः', ऋग्विषयक वृत्तिको 'ऋक्' और सामविषयक वृत्तिको 'साम' कहा गया है; तथा इस प्रकारकी यजुर्वृत्ति ही मनोमय कोशकी शीर्षस्थानीय है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


[बायाँ स्तम्भ (मूल संस्कृत)]

अक्षरविषयस्मृत्यावृत्त्या मन्त्रावृत्तिः स्यादिति चेत् ? न; मुख्यार्थासंभवात् । "त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्" इति ऋगावृत्तिः श्रूयते । तत्रर्चो- ऽविषयत्वे तद्विषयस्मृत्यावृत्त्या मन्त्रावृत्तौ च क्रियमाणायाम् "त्रिः प्रथमामन्वाह" इति ऋगा- वृत्तिर्मुख्योऽर्थश्चोदितः परित्यक्तः स्यात् । तस्मान्मनोवृत्त्युपाधि- परिच्छिन्नं मनोवृत्तिनिष्ठमात्म- चैतन्यमनादिनिधनं यजुःशब्द- वाच्यमात्मविज्ञानं मन्त्रा इति । एवं च नित्यत्वोपपत्तिर्वेदानाम् । अन्यथा विषयत्वे रूपादि- वदनित्यत्वं च स्यान्नैतद्यु- क्तम् । "सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति


[दायाँ स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)]

शङ्का-मन्त्रके अक्षरोंको विषय करनेवाली स्मृतिकी आवृत्ति होनेसे मन्त्रकी भी आवृत्ति हो सकती है— यदि ऐसा मानें तो ? समाधान—नहीं; क्योंकि [ ऐसा माननेसे जपका विधान करनेवाली श्रुतिका ] मुख्य अर्थ असम्भव हो जायगा । "तीन बार प्रथम ऋक् की आवृत्ति करनी चाहिये और तीन बार अन्तिम ऋक् का अन्वाख्यान ( आवर्तन ) करे" इस प्रकार ऋक् की आवृत्तिके विषयमें श्रुतिकी आज्ञा है । ऐसी अवस्थामें मन्त्रमय ऋक् तो मनका विषय नहीं है, अतः मन्त्रकी आवृत्तिके स्थानमें यदि केवल उसकी स्मृतिका ही आवर्तन किया जाय तो "तीन बार प्रथम ऋक् की आवृत्ति करनी चाहिये" इस श्रुतिका मुख्य अर्थ छूट जाता है । अतः यह समझना चाहिये कि मनोवृत्तिरूप उपाधिसे परिच्छिन्न मनोवृत्तिस्थित जो अनादि-अनन्त आत्मचैतन्य 'यजुः' शब्दवाच्य आत्मविज्ञान है वह यजुर्मन्त्र है । इसी प्रकार वेदोंकी नित्यता भी सिद्ध हो सकती है; नहीं तो इन्द्रियोंके विषय होने- पर तो रूपादिके समान उनकी भी अनित्यता ही सिद्ध होगी; और ऐसा होना ठीक नहीं है । "जिसमें समस्त

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

स मानसीन आत्मा" इति च | वेद एकरूप हो जाते हैं वह मनरूप श्रुतिर्नित्यात्मनैकत्वं ब्रुवत्यृगा- | उपाधिमें स्थित आत्मा है" यह नित्य दीनां नित्यत्वे समञ्जसा स्यात् । | आत्माके साथ ऋगादिका एकत्व बतलानेवाली श्रुति भी उनका "ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्य- | नित्यत्व सिद्ध होनेपर ही सार्थक हो सकती है । इस सम्बन्धमें स्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः" | "जिसमें सम्पूर्ण देव स्थित हैं उस अक्षर और परब्रह्मरूप आकाशमें ( श्वे० उ० ४ । ८ ) इति च | ही ऋचाएँ तादात्म्यभावसे व्यवस्थित मन्त्रवर्णः । | हैं" ऐसा मन्त्रवर्ण भी है । आदेशोऽत्र ब्राह्मणम्; अति- | 'आदेश आत्मा' इस वाक्यमें 'आदेश' शब्द ब्राह्मणका वाचक देष्टव्यविशेषानतिदिशतीति। अथ- | है; क्योंकि वेदोंका ब्राह्मणभाग ही कर्त्तव्यविशेषोंका आदेश ( उपदेश ) र्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा ब्राह्मणं | देता है । अथर्वाङ्गिरस ऋषिके साक्षात्कार किये हुए मन्त्र और च शान्तिकपौष्टिकादिप्रतिष्ठा- | ब्राह्मण ही पुच्छ—प्रतिष्ठा हैं; क्योंकि उनमें शान्ति और पुष्टिकी स्थितिके हेतुर्मप्रधानत्वात्पुच्छं प्रतिष्ठा । | हेतुभूत कर्मोंकी प्रधानता है । तदप्येष श्लोको भवति मनो- | पूर्ववत् इस विषयमें ही—मनोमय आत्माका प्रकाश करनेवाला ही मयात्मप्रकाशकः पूर्ववत् ॥१॥ | यह श्लोक है ॥ १ ॥


इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥३॥

चतुर्थ अनुवाक मनोमय कोशकी महिमा तथा विज्ञानमय कोशका वर्णन यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मा- न्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ जहाँसे मनके सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है उस ब्रह्मानन्दको जाननेवाला पुरुष कभी भयको प्राप्त नहीं होता । यह जो [ मनोमय शरीर ] है वही उस अपने पूर्ववर्ती [ प्राणमय कोश ] का शारीरिक आत्मा है । उस इस मनोमयसे दूसरा इसका अन्तर-आत्मा विज्ञानमय है । उसके द्वारा यह पूर्ण है । वह यह विज्ञानमय भी पुरुषाकार ही है । उस [ मनोमय ] की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । उसका श्रद्धा ही शिर है । ऋत दक्षिण पक्ष है । सत्य उत्तर पक्ष है । योग आत्मा ( मध्यभाग ) है और महत्तत्त्व पुच्छ-प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥ यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य | जहाँसे मनके सहित वाणी उसे | न पाकर लौट आती है-इत्यादि मनसा सहेत्यादि । तस्य पूर्वस्य | [ अर्थ स्पष्ट ही है ] उस पूर्व- प्राणमयस्यैष एवात्मा शारीरः | कथित प्राणमयका यही शारीर CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९

शरीरे प्राणमये भवः शारीरः । | अर्थात् प्राणमय शरीरमें रहनेवाला कः ? य एष मनोमयः । तस्माद्वा | आत्मा है । कौन ? यह जो मनोमय एतस्मादित्यादि पूर्ववत् । अ- | है । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि न्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयो | वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । उस इस मनोमयसे दूसरा मनोमयस्याभ्यन्तरो विज्ञानमयः । | इसका अन्तर आत्मा विज्ञानमय है अर्थात् मनोमय कोशके भीतर विज्ञानमय कोश है । मनोमयो वेदात्मोक्तः । वे- | मनोमय कोश वेदरूप बतलाया दार्थविषया बुद्धिनिश्चयात्मिका | गया था । वेदोंके अर्थके विषयमें जो निश्चयात्मिका बुद्धि है उसीका विज्ञानं तच्चाध्यवसायलक्षणम- | नाम विज्ञान है । और वह अन्तः- न्तःकरणस्य धर्मः । तन्मयो | करणका अध्यवसायरूप धर्म है । तन्मय अर्थात् प्रमाणस्वरूप निश्चय निश्चयविज्ञानैः प्रमाणस्वरूपैर्नि- | विज्ञानसे (निश्चयात्मिका बुद्धिसे) र्वर्तित आत्मा विज्ञानमयः । | निष्पन्न होनेवाला आत्मा विज्ञानमय है, क्योंकि प्रमाणके विज्ञानपूर्वक प्रमाणविज्ञानपूर्वको हि यज्ञादि- | ही यज्ञादिका विस्तार किया जाता स्तायते । यज्ञादिहेतुत्वं च | है । विज्ञान यज्ञादिका हेतु है- यह बात श्रुति आगे चलकर मन्त्र- वक्ष्यति श्लोकेन । | द्वारा बतलायेगी । निश्चयविज्ञानवतो हि कर्तव्ये- | निश्चयात्मिका बुद्धिसम्पन्न पुरुष- ष्वर्थेषु पूर्वं श्रद्धोत्पद्यते । सा | को सबसे पहले कर्त्तव्य कर्ममें श्रद्धा ही उत्पन्न होती है । अतः सम्पूर्ण सर्वकर्त्तव्यानां प्राथम्याच्छिर इव | कर्मोंमें प्रथम होनेके कारण वह शिरके समान उस विज्ञानमयका शिरः । ऋतसत्ये यथाव्या- | शिर है । ऋत और सत्यका अर्थ पहले (शिक्षावल्ली, नवम अनुवाकमें) ख्याते एव । योगो युक्तिः | की हुई व्याख्याके ही समान है ।

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१४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत भाष्य] समाधानम्, आत्मेवात्मा । आत्मवतो हि युक्तस्य समाधान- वतोऽङ्गानीव श्रद्धादीनि यथार्थ- प्रतिपत्चिक्षमाणि भवन्ति । तस्मात्समाधानं योग आत्मा विज्ञानमयस्य । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । मह इति महत्तत्त्वं प्रथमजम् । "महद्यक्षं प्रथमजं वेद" (बृ० उ० ५।४।१) इति श्रुत्यन्तरात् । पुच्छं प्रतिष्ठा कारणत्वात् । कारणं हि कार्याणां प्रतिष्ठा । यथा वृक्षवीरुधां पृथिवी । सर्व- बुद्धिविज्ञानानां च महत्तत्त्वं कारणम् । तेन तद्विज्ञानमयस्या- त्मनः प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति पूर्ववत् । यथान्नमयादी- नां ब्राह्मणोक्तानां प्रकाशकाः श्लोका एवं विज्ञानमयस्यापि ॥१॥


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद] योग-युक्ति अर्थात् समाधान ही आत्माके समान उसका आत्मा है । युक्त अर्थात् समाधानसम्पन्न आत्मवान् पुरुषके ही अङ्गादिके समान श्रद्धा आदि साधन यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिमें समर्थ होते हैं । अतः समाधान यानी योग ही विज्ञानमय कोशका आत्मा है और महः उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । "प्रथम उत्पन्न हुए महान् यक्ष (पूजनीय) को जानता है" इस एक अन्य श्रुतिके अनुसार 'महः' यह महत्तत्त्वका नाम है । वही [ विज्ञानमयका ] कारण होनेसे उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है; क्योंकि कारण ही कार्यवर्गकी प्रतिष्ठा (आश्रय) हुआ करता है, जैसे कि वृक्ष और लता-गुल्मादिकी प्रतिष्ठा पृथिवी है। महत्तत्त्व ही बुद्धिके सम्पूर्ण विज्ञानोंका कारण है । इसलिये वह विज्ञानमय आत्माकी प्रतिष्ठा है । पूर्ववत् उसके विषयमें ही यह श्लोक है अर्थात् जैसे पहले श्लोक ब्राह्मणोक्त अन्नमय आदिके प्रकाशक हैं उसी प्रकार यह विज्ञानमयका भी प्रकाशक श्लोक है ॥ १ ॥


इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक विज्ञानकी महिमा तथा आनन्दमय कोशका वर्णन विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥१॥ विज्ञान (विज्ञानवान् पुरुष) यज्ञका विस्तार करता है और वही कर्मोंका भी विस्तार करता है। सम्पूर्ण देव ज्येष्ठ विज्ञान-ब्रह्मकी उपासना करते हैं। यदि साधक 'विज्ञान ब्रह्म है' ऐसा जान जाय और फिर उससे प्रमाद न करे तो अपने शरीरके सारे पापोंको त्यागकर वह समस्त कामनाओं (भोगों) को पूर्णतया प्राप्त कर लेता है। यह जो विज्ञानमय है वही उस अपने पूर्ववर्ती मनोमय शरीरका आत्मा है। उस इस विज्ञानमयसे दूसरा इसका अन्तर्वर्ती आत्मा आनन्दमय है। उस आनन्दमयके द्वारा यह पूर्ण है। वह यह आनन्दमय भी पुरुषाकार ही है। उस (विज्ञानमय) की पुरुषाकारताके समान ही यह पुरुषाकार है। उसका प्रिय ही शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म पुच्छ-प्रतिष्ठा है। उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विज्ञानं यज्ञं तनुते । विज्ञान- | विज्ञान यज्ञका विस्तार करता विज्ञानमयो- वान्हि यज्ञं तनोति | है अर्थात् विज्ञानवान् पुरुष ही पासनम् श्रद्धादिपूर्वकम् । | श्रद्धादिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करता अतो विज्ञानस्य कर्तृत्वं तनुत | है। अतः यज्ञानुष्ठानमें विज्ञानका कर्तृत्व है और तनुते—इसका भाव इति कर्माणि च तनुते । यस्मा- | यह है कि वही कर्मोंका भी द्विज्ञानकर्तृकं सर्वं तस्माद्युक्तं | विस्तार करता है। इस प्रकार क्योंकि सब कुछ विज्ञानका ही विज्ञानमय आत्मा ब्रह्मेति । | किया हुआ है इसलिये 'विज्ञानमय आत्मा ब्रह्म है' ऐसा कहना ठीक किं च विज्ञानं ब्रह्म सर्वे देवा | ही है। यही नहीं, इन्द्रादि सम्पूर्ण इन्द्रादयो ज्येष्ठं प्रथमजत्वात्सर्व- | देवगण विज्ञानब्रह्मकी, जो सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे प्रवृत्तीनां वा तत्पूर्वकत्वात्प्रथमजं | ज्येष्ठ है अथवा समस्त वृत्तियाँ विज्ञानपूर्वक होनेके कारण जो विज्ञानं ब्रह्मोपासते ध्यायन्ति | प्रथमोत्पन्न है, उस विज्ञानरूप ब्रह्मकी तस्मिन्विज्ञानमये ब्रह्मण्यभि- | उपासना अर्थात् ध्यान करते हैं। तात्पर्य यह है कि वे उस विज्ञानमय मानं कृत्वोपासत इत्यर्थः । | ब्रह्ममें अभिमान करके उसकी .उपासना करते हैं। अतः वे उस तस्मात्ते महतो ब्रह्मण उपा- | महद्ब्रह्मकी उपासना करनेसे ज्ञान सनाज्ज्ञानैश्वर्यवन्तो भवन्ति । | और ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं। तच्च विज्ञानं ब्रह्म चेद्यदि वेद | उस विज्ञानरूप ब्रह्मको यदि विजानाति न केवलं वेदैव तस्मा- | जान ले—केवल जान ही न ले बल्कि द्ब्रह्मणश्चेन्न प्रमाद्यति बाह्येष्वेवा- | यदि उससे प्रमाद भी न करे; बाह्य अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धि की नात्मस्वात्मभावितत्वात्प्राप्तं वि- | हुई है, उसके कारण विज्ञानमय ज्ञानमये ब्रह्मण्यात्मभावनायाः | ब्रह्ममें की हुई आत्मभावनासे प्रमाद

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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४३ प्रमदनं तन्निवृत्त्यर्थमुच्यते तस्मा- | होना सम्भव है; उसकी निवृत्तिके च्चेन्न प्रमाद्यतीति, अन्नमयादिष्वा- | लिये कहते हैं—'यदि उससे प्रमाद त्मभावं हित्वा केवले विज्ञान- | न करे' इत्यादि । तात्पर्य यह है मये ब्रह्मण्यात्मत्वं भावयन्नास्ते | कि यदि अन्नमय आदिमें आत्मभाव- चेदित्यर्थः । | को छोड़कर केवल विज्ञानमय ब्रह्ममें ततः किं स्यादित्युच्यते— | ही आत्मत्वकी भावना करके स्थित [विज्ञानब्रह्मो-पासनफलम्] शरीरे पाप्मनो हित्वा । शरीराभि- | रहे— माननिमित्ता हि सर्वे पाप्मानः | तो क्या होगा ? इसपर कहते तेषां च विज्ञानमये ब्रह्मण्यात्माभि- | हैं—शरीरके पापोंको त्यागकर, मानान्निमित्तापाये हानमुपपद्यते, | सम्पूर्ण पाप शरीराभिमानके कारण छत्रापाय इवच्छायापायः । | ही होनेवाले हैं; विज्ञानमय ब्रह्ममें तस्माच्छरीराभिमाननिमित्तान् | आत्मत्वका अभिमान करनेसे निमित्त- सर्वान्पाप्मनः शरीरप्रभवाञ्शरीर | का क्षय हो जानेपर उनका भी एव हित्वा विज्ञानमयब्रह्मस्वरू- | क्षय होना उचित ही है, जिस पापन्नस्तत्स्थान्सर्वान्कामान्विज्ञा- | प्रकार कि छातेके हटा लिये जानेपर नमयेनैवात्मना समश्नुते सम्य- | छायाकी भी निवृत्ति हो जाती है । ग्भुङ्क्त इत्यर्थः । | अतः शरीराभिमानके कारण होने- तस्य पूर्वस्य मनोमयस्यात्मैष | वाले शरीरजनित सम्पूर्ण पापोंको [आनन्दमयस्य कार्यात्मत्वस्थापनम्] एव शरीरे मनोमये भवः शारीरः। कः ? | शरीरहीमें त्यागकर विज्ञानमय ब्रह्म- य एष विज्ञानमयः । तस्माद्वा | स्वरूपको प्राप्त हुआ साधक उसमें स्थित सारे भोगोंको विज्ञानमय स्वरूपसे ही सम्यक्प्रकारसे प्राप्त कर लेता है अर्थात् उनका पूर्णतया उपभोग करता है । उस पूर्वकथित मनोमयका शारीर— मनोमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा भी यही है । कौन ? यह जो विज्ञानमय है । 'तस्माद्वा एतस्मात्'

१४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

एतस्मादित्युक्तार्थम् । आनन्द- | इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा मय इति कार्यात्मप्रतीतिरधि- | जा चुका है। 'आनन्दमय' इस शब्दसे कार्यात्माकी प्रतीति होती कारान्मयट्शब्दाच्च । अन्नादि- | है; क्योंकि यहाँ उसीका अधिकार (प्रसङ्ग) है और आनन्दके साथ मया हि कार्यात्मानो भौतिका | 'मयट्' शब्दका प्रयोग किया गया है। यहाँ अन्नमय आदि भौतिक इहाधिकृताः । तदधिकारपतित- | कार्यात्माओंका अधिकार है; उन्हींके अन्तर्गत यह आनन्दमय भी है। श्चायमानन्दमयः, मयट् चात्र वि- | 'मयट्' प्रत्यय भी यहाँ विकारके अर्थमें देखा गया है; जैसा कि कारार्थे दृष्टो यथान्नमय इत्यत्र । | 'अन्नमय' इस शब्दमें है। अतः आनन्दमय कार्यात्मा है—ऐसा तस्मात्कार्यात्मानन्दमयः प्रत्ये- | जानना चाहिये । तव्यः । | संक्रमणके कारण भी यही बात संक्रमणाच्च; आनन्दमयमा- | सिद्ध होती है। 'वह आनन्दमय आत्माके प्रति संक्रमण करता है त्मानमुपसंक्रामतीति वक्ष्यति । | [अर्थात् आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है]' ऐसा आगे (अष्टम कार्यात्मनां च संक्रमणमनात्मनां | अनुवाकमें) कहेंगे । अन्नमयादि अनात्मा कार्यात्माओंका ही संक्रमण दृष्टम् । संक्रमणकर्मत्वेन चा- | होता देखा गया है। और संक्रमणके कर्मरूपसे आनन्दमय आत्माका नन्दमय आत्मा श्रूयते । यथान्न- | श्रवण होता है, जैसे कि 'यह अन्नमय आत्माके प्रति संक्रमण मयमात्मानमुपसंक्रामतीति । न | (गमन) करता है' [इस वाक्यमें देखा जाता है]। स्वयं आत्माका चात्मन एवोपसंक्रमणम् । अधि- | ही संक्रमण होना सम्भव है नहीं; क्योंकि इससे उस प्रसङ्गमें विरोध कारविरोधादसंभवाच्च । न ह्या- | आता है और ऐसा होना सम्भव भी नहीं है। आत्माका आत्माक

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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५

त्मनैवात्मन उपसंक्रमणं संभ- | ही प्राप्त होना कभी सम्भव नहीं वति । स्वात्मनि भेदाभावात् । | है; क्योंकि अपने आत्मामें भेदका आत्मभूतं च ब्रह्म सङ्क्रमितुः । | सर्वथा अभाव है और ब्रह्म भी | संक्रमण करनेवालेका आत्मा ही है । शिरआदिकल्पनानुपपत्तेश्च । | [ आत्मामें ] शिर आदिकी न हि यथोक्तलक्षण आकाशादि- | कल्पना असम्भव होनेके कारण भी कारणेऽकार्यपतिते शिरआद्यवयव- | [ आनन्दमय कार्यात्मा ही है ] । रूपकल्पनोपपद्यते । "अदृश्ये- | आकाशादिके कारण और कार्यवर्गके ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने" (तै० | अन्तर्गत न आनेवाले उपर्युक्त उ० २ । ७ । १) "अस्थूल- | लक्षणविशिष्ट आत्मामें शिर आदि मनणु" (बृ० उ० ३ । ८ । ८) | अवयवरूप कल्पनाका होना संगत "नेति नेत्यात्मा" (बृ० उ० ३। ९ । | नहीं है । आत्मामें विशेष धर्मोंका २६) इत्यादिविशेषापोहश्रुति- | बाध करनेवाली "अदृश्य, अशरीर, भ्यश्च । | अनिर्वचनीय और अनाश्रयमें" "स्थूल | और सूक्ष्मसे रहित" "आत्मा यह | नहीं है यह नहीं है" इत्यादि श्रुतियोंसे | भी यही बात सिद्ध होती है । मन्त्रोदाहरणानुपपत्तेश्च । न | [ आनन्दमयको यदि आत्मा हि प्रियशिरआद्यवयवविशिष्टे | माना जाय तो ] आगे कहे हुए प्रत्यक्षतोऽनुभूयमान आनन्दमय | मन्त्रका उदाहरण देना भी नहीं आत्मनि ब्रह्मणि नास्ति ब्रह्मेत्या- | बनता । शिर आदि अवयवोंसे युक्त शङ्काभावात् "असन्नेव स | आनन्दमय आत्मारूप ब्रह्मके प्रत्यक्ष भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत्" | अनुभव होनेपर तो ऐसी शंका ही (तै० उ० २ । ६ । १) इति | नहीं हो सकती कि ब्रह्म नहीं है, | जिससे कि [ उस शंकाकी निवृत्ति- | के लिये ] "जो पुरुष, ब्रह्म नहीं | है—ऐसा जानता है वह असद्रूप तै० उ० १९-२०—

१४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

[ वाम भाग / संस्कृत ]

मन्त्रोदाहरणमुपपद्यते । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेत्यपि चानुपपन्नं पृथग्ब्र- ह्मणः प्रतिष्ठात्वेन ग्रहणम् । तस्मात्कार्यपतित एवानन्दमयो न पर एवात्मा । आनन्द इति विद्याकर्मणोः [आनन्दमयकोश-प्रतिपादनम्] फलं तद्विकार आ- नन्दमयः । स च विज्ञानमयादान्तरः । यज्ञा- दिहेतोर्विज्ञानमयादस्यान्तरत्व- श्रुतेः । ज्ञानकर्मणोर्हि फलं भोक्त्रर्थत्वादान्तरतमं स्यात् । आन्तरतमश्चानन्दमय आत्मा पूर्वेभ्यः । विद्याकर्मणोः प्रिया- द्यर्थत्वाच्च । प्रियादिप्रयुक्ते हि विद्याकर्मणी । तस्मात्प्रियादीनां फलरूपाणामात्मसंनिकर्षाद्वि- ज्ञानमयस्याभ्यन्तरत्वमुपपद्यते । प्रियादिवासनानिर्वृत्तो ह्यानन्द-


[ दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद ]

ही है" इस मन्त्रका उल्लेख संगत हो सके । तथा 'ब्रह्म पुच्छ-प्रतिष्ठा है' इस वाक्यके अनुसार प्रतिष्ठा- रूपसे ब्रह्मको पृथक् ग्रहण करना भी नहीं बन सकता । अतः यह आनन्दमय कार्यवर्गके अन्तर्गत ही है—परमात्मा नहीं है । 'आनन्द' यह उपासना और कर्मका फल है, उसका विकार आनन्दमय कहलाता है । वह विज्ञानमय कोशसे आन्तर है; क्योंकि श्रुतिके द्वारा वह यज्ञादिके कारणभूत विज्ञानमयकी अपेक्षा आन्तर बतलाया गया है । उपासना और कर्मका फल भोक्ताके ही लिये है, इसलिये वह सबसे आन्तरतम होना चाहिये; सो पूर्वोक्त सब कोशोंकी अपेक्षा आनन्दमय आत्मा आन्तरतम है ही; क्योंकि विद्या और कर्म भी [ प्रधानतया ] प्रिय आदिके ही लिये हैं । प्रिय आदिकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही उपासना और कर्मका अनुष्ठान किया जाता है; अतः उनके फलरूप प्रिय आदिका आत्मासे सान्निध्य होनेके कारण विज्ञानमयकी अपेक्षा इस ( आनन्दमय कोश ) का आन्तरतम होना उचित ही है । प्रिय आदिकी वासनासे निष्पन्न


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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७ मयो विज्ञानमयाश्रितः स्वप्न उप- | हुआ यह आनन्दमय स्वप्नावस्थामें लभ्यते । | विज्ञानमयके अधीन ही उपलब्ध होता है । तस्यानन्दमयस्यात्मन इष्ट- | उस आनन्दमय आत्माका पुत्रादि [आनन्दमयस्य पुरुषविधत्वम्] पुत्रादिदर्शनजं प्रियं | इष्ट पदार्थोंके दर्शनसे होनेवाला शिर इव शिरः | प्रिय ही प्रधानताके कारण शिरके प्राधान्यात् । मोद इति प्रिय- | समान शिर है । प्रिय पदार्थकी लाभनिमित्तो हर्षः । स एव च | प्राप्तिसे होनेवाला हर्ष 'मोद' प्रकृष्टो हर्षः प्रमोदः । आनन्द | कहलाता है; वही हर्ष प्रकृष्ट इति सुखसामान्यमात्मा प्रिया- | ( अतिशय) होनेपर 'प्रमोद' कहा दीनां सुखावयवानाम् । तेष्वनु- | जाता है । 'आनन्द' सामान्य स्यूतत्त्वात् । | सुखका नाम है; वह सुखके अवयवभूत प्रिय आदिका आत्मा है; क्योंकि उसीमें वे सब अनुस्यूत हैं । आनन्द इति परं ब्रह्म । तद्धि | 'आनन्द' यह परब्रह्मका ही शुभकर्मणा प्रत्युपस्थाप्यमाने | वाचक है । वही शुभकर्मद्वारा पुत्रमित्रादिविषयविशेषोपाधाव- | प्रस्तुत किये हुए पुत्र-मित्रादि विशेष न्तःकरणवृत्तिविशेषे तमसा प्र- | विषय ही जिसकी उपाधि हैं उस च्छाद्यमाने प्रसन्नेऽभिव्यज्यते । | सुप्रसन्न अन्तःकरणकी वृत्तिविशेष- तद्विषयसुखमिति प्रसिद्धं लोके । | में, जब कि वह तमोगुणसे आच्छादित तद्वृत्तिविशेषप्रत्युपस्थापकस्य क- | नहीं होता, अभिव्यक्त होता है । र्मणोऽनवस्थितत्वात्सुखस्य क्षणि- | वह लोकमें विषय-सुख नामसे प्रसिद्ध कत्वम् । तद्यदान्तःकरणं तपसा | है । उस वृत्तिविशेषको प्रस्तुत करनेवाले कर्मके अस्थिर होनेके तमोघ्नेन विद्यया ब्रह्मचर्येण श्रद्धया | कारण उस सुखकी भी क्षणिकता है। अतः जिस समय अन्तःकरण तमोगुणको नष्ट करनेवाले तप, उपासना, ब्रह्मचर्य और श्रद्धाके द्वारा

१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ च निर्मलत्वमापद्यते यावद्याव- | जितना-जितना निर्मलताको प्राप्त त्तावत्तावद्विविक्ते प्रसन्नेऽन्तः- | होता है उतने-उतने ही स्वच्छ और करण आनन्दविशेष उत्कृष्यते | प्रसन्न हुए उस अन्तःकरणमें विशेष आनन्दका उत्कर्ष होता है अर्थात् विपुलीभवति । वक्ष्यति च— | वह बहुत बढ़ जाता है। यही बात "रसो वै सः । रसँह्येवायं | “वह रस ही है, इस रसको पाकर लब्ध्वानन्दी भवति । एष ह्येवान- | ही पुरुष आनन्दी हो जाता है। न्दयति” ( तै० उ० २ । ७ । | यह रस ही सबको आनन्दित करता है।” इस प्रकार आगे कहेंगे, १) “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि | तथा “इस आनन्दके अंशमात्रके भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० | आश्रय ही सब प्राणी जीवित रहते उ० ४ । ३ । ३२) इति च | हैं” इस अन्य श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। इसी प्रकार काम- श्रुत्यन्तरात् । एवं च कामोप- | शान्तिके उत्कर्षकी अपेक्षा आगे- शमोत्कर्षापेक्षया शतगुणोत्तरो- | आगेके आनन्दका सौ-सौ गुना त्तरोत्कर्ष आनन्दस्य वक्ष्यते । | उत्कर्ष आगे बतलाया जायगा । एवं चोत्कृष्यमाणस्यानन्द- | इस प्रकार परमार्थ ब्रह्मके विज्ञान- मयस्यात्मनः परमार्थब्रह्मविज्ञाना- | की अपेक्षासे क्रमशः उत्कर्षको प्राप्त होनेवाले आनन्दमय आत्माकी पेक्षया ब्रह्म परमेव । यत्प्रकृतं | अपेक्षा ब्रह्म पर ही है। जो प्रकृत ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप है, सत्यज्ञानानन्तलक्षणम्, यस्य | जिसकी प्राप्तिके लिये अन्नमय आदि च प्रतिपत्त्यर्थं पञ्चान्नादिमयाः | पाँच कोशोंका उपन्यास किया गया कोशा उपन्यस्ताः, यच्च तेभ्य | है, जो उन सबकी अपेक्षा अन्तर्वर्ती है, और जिसके द्वारा वे सब आभ्यन्तरम्, येन च ते सर्व | आत्मवान् हैं—वह ब्रह्म ही उस आत्मवन्तः, तद्ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । | आनन्दमयकी पुच्छ-प्रतिष्ठा है।

अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९

तदेव च सर्वस्याविद्यापरि- अविद्याद्वारा कल्पना किये हुए कल्पितस्य द्वैतस्यावसानभूत- सम्पूर्ण द्वैतका निषेधावधिभूत वह मद्वैतं ब्रह्म प्रतिष्ठा आनन्द- अद्वैत ब्रह्म ही उसकी प्रतिष्ठा है; मयस्य । एकत्वावसानत्वात् । क्योंकि आनन्दमयका पर्यवसान भी अस्ति तदेकमविद्याकल्पितस्य एकत्वमें ही होता है । अविद्या- द्वैतस्यावसानभूतमद्वैतं ब्रह्म परिकल्पित द्वैतका अवसानभूत वह प्रतिष्ठा पुच्छम् । तदेतस्मिन्नप्यर्थ एक और अद्वितीय ब्रह्म उसकी प्रतिष्ठा यानी पुच्छ है । उस इसी एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥ —••|ॐ|••— इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

षष्ठ अनुवाक ब्रह्मको सत् और असत् जाननेवालोंका भेद, ब्रह्मज्ञ और अब्रह्मज्ञकी ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें शंका तथा सम्पूर्ण प्रपञ्चरूपसे ब्रह्मके स्थित होनेका निरूपण असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उता- विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वा- नमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ । सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा इदꣳसर्वमसृजत यदिदं किंच । तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च विज्ञानं चावि- ज्ञानं च । सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किंच । तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ यदि पुरुष 'ब्रह्म असत् है' ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत् ही हो जाता है । और यदि ऐसा जानता है कि 'ब्रह्म है' तो [ ब्रह्मवेत्ता- जन ] उसे सत् समझते हैं । उस पूर्वकथित ( विज्ञानमय ) का यह जो [ आनन्दमय ] है शरीर-स्थित आत्मा है । अब ( आचार्यका ऐसा उपदेश सुननेके अनन्तर शिष्यके ) ये अनुप्रश्न हैं—क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको प्राप्त हो सकता है ? अथवा कोई विद्वान् भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१ प्राप्त होता है या नहीं ? [ इन प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये आचार्य भूमिका बाँधते हैं— ] उस परमात्माने कामना की 'मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ।' अतः उसने तप किया । उसने तप करके ही यह जो कुछ है इस सबकी रचना की । इसे रचकर वह इसीमें अनुप्रविष्ट हो गया । इसमें अनुप्रवेश कर वह सत्यस्वरूप परमात्मा मूर्त्त- अमूर्त्त, [ देशकालादि परिच्छिन्नरूपसे ] कहे जानेयोग्य और न कहे जानेयोग्य, आश्रय-अनाश्रय, चेतन-अचेतन एवं व्यावहारिक सत्य-असत्य- रूप हो गया । यह जो कुछ है उसे ब्रह्मवेत्ता लोग 'सत्य' इस नामसे पुकारते हैं । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥१॥

असन्नेवासत्सम एव यथा- | जिस प्रकार असत् ( अविद्यमान ) सन्न पुरुषार्थसंब- | पदार्थ पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाला सदसद्वादिनोर्भेदः | नहीं होता उसी प्रकार वह भी न्ध्येवं स भवति | असत्—असत्के समान ही पुरुषार्थसे सम्बन्ध नहीं रखनेवाला अपुरुषार्थसंबन्धी । कोऽसौ ? | हो जाता है—वह कौन ? जो 'ब्रह्म असत्—अविद्यमान है' ऐसा योऽसदविद्यमानं ब्रह्मेति वेद | जानता है । 'चेत्' शब्दका अर्थ 'यदि' है । इसके विपरीत 'जो विजानाति चेद्यदि । तद्विपर्ययेण | तत्त्व सम्पूर्ण विकल्पोंका आश्रय, समस्त प्रवृत्तियोंका बीजरूप और यत्सर्वविकल्पास्पदं सर्वप्रवृत्ति- | सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित भी है वही ब्रह्म है' ऐसा यदि कोई जानता है बीजं सर्वविशेषप्रत्यस्तमितमप्य- | [ तो उसे ब्रह्मवेत्तालोग सद्रूप समझते हैं इस प्रकार इसका आगेके वाक्यसे स्ति तद्ब्रह्मेति वेद चेत् । | सम्बन्ध है ] । कुतः पुनराशङ्का तन्नास्तित्वे ? | किन्तु ब्रह्मके अस्तित्वाभावके विषयमें शंका क्यों की जाती है ? व्यवहारातीतत्वं ब्रह्मण इति | [ इसपर ] हमारा यह कथन है कि ब्रह्म व्यवहारसे परे है । [ इसी- ब्रूमः । व्यवहारविषये हि वाचा- | लिये ] व्यवहारके विषयभूत पदार्थों-