तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु; होनेके कारण ग्रहण ही नहीं किया तस्मादस्ति ब्रह्म । असतश्चेत्कार्यं जा सकता था । किन्तु वह ग्रहण किया ही जाता है; इसलिये ब्रह्म है गृह्यमाणमप्यसदनुन्वितमेव तत् ही । यदि यह कार्यवर्ग असत्से स्यात् । न चैवम्; तस्मादस्ति उत्पन्न हुआ होता तो ग्रहण किये जानेपर भी असदात्मक ही ग्रहण ब्रह्म तत्र । “कथमसतः सज्जायेत” किया जाता । किन्तु ऐसी बात है नहीं । इसलिये ब्रह्म है ही । इसी ( छा० उ० ६ । २ । २ ) इति सम्बन्धमें “असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है” ऐसी एक अन्य श्रुत्यन्तरमसतः सज्जन्मासंभव- श्रुतिने युक्तिपूर्वक असत्से सत्का जन्म होना असम्भव बतलाया है । मन्वाचष्टे न्यायतः । तस्मात्सदेव इसलिये ब्रह्म सत् ही है—यही मत ब्रह्मेति युक्तम् । ठीक है । तद्यदि मृद्बीजादिवत्कारणं शङ्का—यदि ब्रह्म मृत्तिका और बीज आदिके समान [ जगत्का स्यादचेतनं तर्हि ? उपादान ] कारण है तो वह अचेतन होना चाहिये । न, कामयितृत्वात् । न हि समाधान—नहीं, क्योंकि वह कामना करनेवाला है । लोकमें कोई ब्रह्मगणश्चित्स्वरूपत्व- कामयित्रचेतनमस्ति भी कामना करनेवाला अचेतन नहीं विवेचनम् लोके । सर्वज्ञं हि हुआ करता । ब्रह्म सर्वज्ञ है—यह ब्रह्मेत्यवोचाम । अतः कामयि- हम पहले कह चुके हैं । अतः उसका कामना करना भी युक्त तृत्वोपपत्तिः । ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९ कामयितृत्वत्वादस्मदादिवदना- | शङ्का—कामना करनेवाला होनेसे | तो वह हमारी-तुम्हारी तरह अनाप्त- प्तकाममिति चेत् ? | काम (अपूर्ण कामनावाला) सिद्ध होगा। | न, स्वातन्त्र्यात् । यथारन्यान् | समाधान—ऐसी बात नहीं है, | क्योंकि वह स्वतन्त्र है। जिस प्रकार परवशीकृत्य कामादिदोषाः | काम आदि दोष अन्य जीवोंको | विवश करके प्रवृत्त करते हैं प्रवर्तयन्ति न तथा ब्रह्मणः | उस प्रकार वे ब्रह्मके प्रवर्तक नहीं | हैं। तो वे कैसे हैं ? वे सत्य-ज्ञान- प्रवर्तकाः कामाः । कथं तर्हि | स्वरूप एवं स्वात्मभूत होनेके | कारण विशुद्ध हैं। उनके द्वारा सत्यज्ञानलक्षणाः स्वात्मभूतत्वा- | ब्रह्म प्रवृत्त नहीं किया जाता; बल्कि | जीवोंके प्रारब्ध-कर्मोंकी अपेक्षासे द्विशुद्धा न तैर्ब्रह्म प्रवर्त्यते । | वह ब्रह्म ही उनका प्रवर्तक है। | अतः कामनाओंके करनेमें ब्रह्मकी तेषां तु तत्प्रवर्तकं ब्रह्म प्राणि- | स्वतन्त्रता है। इसलिये ब्रह्म अनाप्त- | काम नहीं है। कर्मापेक्षया । तस्मात्स्वातन्त्र्यं | | किन्हीं अन्य साधनोंकी अपेक्षा- कामेषु ब्रह्मणः । अतो नानाप्त- | वाला न होनेसे भी कामनाओंके | विषयमें ब्रह्मकी स्वतन्त्रता है। जिस कामं ब्रह्म । | प्रकार धर्मादि कारणोंकी अपेक्षा | रखनेवाली अन्य जीवोंकी अनात्मभूत साधनान्तरानपेक्षत्वाच्च । किं | कामनाएँ अपने आत्मासे अतिरिक्त | देह और इन्द्रियरूप अन्य साधनों- च यथान्येषामनात्मभूता धर्मा- | की अपेक्षावाली होती हैं उस प्रकार | ब्रह्मको निमित्त आदिकी अपेक्षा दिनिमित्तापेक्षाः कामाः स्वात्म- व्यतिरिक्तकार्यकरणसाधनान्त- रापेक्षाश्च न तथा ब्रह्मणो निमि-
१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ त्ताद्यपेक्षत्वम् । किं तर्हि स्वात्म- | नहीं होती । तो ब्रह्मकी कामनाएँ | कैसी होती हैं ? वे स्वात्मासे नोऽनन्याः । | अभिन्न होती हैं । तदेतदाह सोऽकामयत स | उसीके विषयमें श्रुति कहती है— ब्रह्मणो आत्मायस्मादाकाशः | उसने कामना की—उस आत्माने, बहुभवनसङ्कल्पः संभूतोऽकामयत | जिससे कि आकाश उत्पन्न हुआ | है, कामना की । किस प्रकार कामितवान् । कथम् ? बहु स्यां | कामना की ? मैं बहुत-अधिक बहु प्रभूतं स्यां भवेयम् । कथमे- | रूपमें हो जाऊँ। अन्य पदार्थमें प्रवेश | किये बिना ही एक वस्तुकी बहुलता कस्यार्थान्तराननुप्रवेशे बहुत्वं | कैसे हो सकती है ? इसपर कहते स्यादित्युच्यते । प्रजायेयोत्पद्येय । | हैं—'प्रजायेय' अर्थात् उत्पन्न होऊँ । न हि पुत्रोत्पत्त्येवार्थान्तरविषयं | यह ब्रह्मका बहुत होना पुत्रकी | उत्पत्तिके समान अन्य वस्तुविषयक बहुभवनम्, कथं तर्हि ? आत्म- | नहीं है । तो फिर कैसा है ? अपने- स्थानाभिव्यक्तनामरूपाभिव्य- | में अव्यक्तरूपसे स्थित नाम-रूपोंकी | अभिव्यक्तिके द्वारा ही [ यह अनेक क्त्या । यदात्मस्थे अनभि- | रूप होना है ] । जिस समय व्यक्ते नामरूपे व्याक्रियेते तदा | आत्मामें स्थित अव्यक्त नाम और नामरूपे आत्मस्वरूपापरित्यागे- | रूपोंको व्यक्त किया जाता है उस | समय वे अपने स्वरूपका त्याग किये नैव ब्रह्मणाप्रविभक्तदेशकाले | बिना ही समस्त अवस्थाओंमें ब्रह्मसे सर्वावस्थासु व्याक्रियेते तदा | अभिन्न देश और कालमें ही व्यक्त | किये जाते हैं । यह नाम-रूपका तन्नामरूपव्याकरणं ब्रह्मणो बहु- | व्यक्त करना ही ब्रह्मका बहुत होना भवनम् । नान्यथा निरवयवस्य | है । इसके सिवा और किसी प्रकार | निरवयव ब्रह्मका बहुत अथवा अल्प ब्रह्मणो बहुत्वपत्तिरुपपद्यतेऽल्प- | होना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१
त्वं वा । यथाकाशस्याल्पत्वं बहु- | कि आकाशका अल्पत्व और बहुत्व | भी अन्य वस्तुके ही अधीन है त्वं च वस्त्वन्तरकृतमेव । अतस्त- | [उसी प्रकार ब्रह्मका भी है] । अतः | उन (नाम-रूपों) के द्वारा ही ब्रह्म द्द्वारेणैवात्मा बहु भवति । | बहुत हो जाता है । न ह्यात्मनोऽन्यदनात्मभूतं | आत्मासे भिन्न अनात्मभूत, तथा | उससे भिन्न देश-कालमें रहनेवाली तत्प्रविभक्तदेशकालं सूक्ष्मं व्यव- | कोई भी सूक्ष्म, व्यवहित (ओटवाली), | दूरस्थ, अथवा भूत, वर्तमान या भविष्यकालीन हितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वा | वस्तु नहीं है । अतः सम्पूर्ण वस्तु विद्यते । अतो नामरूपे | अवस्थाओंसे सम्बन्धित नाम और सर्वावस्थे ब्रह्मणैवात्मवती, न | रूप ब्रह्मसे ही आत्मवान् हैं, किन्तु ब्रह्म तदात्मकम् । ते तत्प्रत्या- | ब्रह्म तद्रूप नहीं है । ब्रह्मका निषेध ख्याने न स्त एवेति तदात्मके | करनेपर वे रह ही नहीं सकते, | इसीसे वे तद्रूप कहे जाते हैं । उन उच्येते । ताभ्यां चोपाधिभ्यां | उपाधियोंसे ही ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय और | ज्ञान-इन शब्दोंका तथा इनके अर्थ ज्ञातृज्ञेयज्ञानशब्दार्थादिसर्वसं- | आदि सब प्रकारके व्यवहारका पात्र व्यवहारभाग्ब्रह्म । | बनता है । स आत्मैवंकामः संस्तपो- | उस आत्माने ऐसी कामनावाला ऽतप्यत । तप इति ज्ञानमुच्यते । | होकर तप किया । 'तप' शब्दसे | यहाँ ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि “यस्य ज्ञानमयं तपः” ( मु० उ० | “जिसका ज्ञानरूप तप है” इस अन्य १ । १ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । | श्रुतिसे सिद्ध होता है । आप्तकाम | होनेके कारण आत्माके लिये अन्य आप्तकामताच्चेतरस्यासंभव एव | तप तो असम्भव ही हैं । 'उसने तपसः । तत्तपोऽतप्यत तप्तवान् । | तप किया' इसका तात्पर्य यह है तै० उ० २१-२२- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ सृज्यमानजगद्रचनादिविषयामा- कि आत्माने रचे जानेवाले जगत्की लोचनामकरोदात्मेत्यर्थः । रचना आदिके विषयमें आलोचना की । स एवमालोच्य तपस्तप्त्वा इस प्रकार आलोचना अर्थात् तप प्राणिकर्मादिनिमित्तानुरूपमिदं करके उसने प्राणियोंके कर्मादि निमित्तोंके अनुरूप इस सम्पूर्ण सर्वं जगद्देशतः कालतो नाम्ना जगत्को रचा, जो देश, काल, रूपेण च यथानुभवं सर्वैः नाम और रूपसे यथानुभव सारी प्राणिभिः सर्वावस्थैरनुभूयमानम- अवस्थाओंमें स्थित सभी प्राणियोंद्वारा अनुभव किया जाता है । यह जो सृजत सृष्टवान् । यदिदं किं च कुछ है अर्थात् सामान्यरूपसे यह यत्किं चेदमविशिष्टम् । तदिदं जो कुछ जगत् है इसे रचकर उसने जगत्सृष्ट्वा किमकरोदित्युच्यते- क्या किया, सो बतलाते हैं—वह उस रचे हुए जगत्में ही अनुप्रविष्ट तदेव सृष्टं जगदनुप्राविशदिति । हो गया । तत्रैतच्चिन्त्यं कथमनुप्राविश- अब यहाँ यह विचारना है कि उसने किस प्रकार अनुप्रवेश किया ? तस्य जगदनु- दिति । किं यः जो स्रष्टा था, क्या उसने स्वस्वरूपसे प्रवेशः स्रष्टा स तेनैवात्म- ही अनुप्रवेश किया अथवा किसी और रूपसे ? इनमें कौन-सा पक्ष नानुपाविशदुतान्येनेति, किं ता- समीचीन है ? श्रुतिमें [ 'सृष्ट्वा' इस क्रियामें ] 'क्त्वा' प्रत्यय होनेसे तो वद्युक्तम् ? क्त्वाप्रत्ययश्रवणाद्यः यही ठीक जान पड़ता है कि जो स्रष्टा स्रष्टा स एवानुप्राविशदिति । था उसीने पीछे प्रवेश भी किया । *
- 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकालिक क्रियामें हुआ करता है । हिन्दीमें इसी अर्थमें 'कर' या 'के' प्रत्यय होता है; जैसे—'रामने श्यामको बुलाकर [ या बुलाके ] धमकाया ।' इसमें यह नियम होता है कि पूर्वकालिक क्रिया और मुख्य क्रियाका कर्ता एक ही होता है; जैसे कि उपर्युक्त वाक्यमें पूर्वकालिक क्रिया 'बुलाकर' तथा मुख्य क्रिया 'धमकाया' इन दोनोंका कर्ता 'राम' ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३
ननु न युक्तं मृद्वच्चेतत्कारणं पूर्व०-यदि ब्रह्म मृत्तिकाके ब्रह्म तदात्मकत्वात्कार्यस्य । का- समान जगत्का कारण है तो उसका कार्य तद्रूप होनेके कारण रणमेव हि कार्यात्मना परिणत- उसमें उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है। क्योंकि कारण ही कार्यरूप- मित्यतोऽप्रविष्ट इव कार्योत्पत्ते- से परिणत हुआ करता है, अतः किसी अन्य पदार्थके समान पहले रूर्ध्वं पृथक्कारणस्य पुनः प्रवेशो- बिना प्रवेश किये कार्यकी उत्पत्तिके ऽनुपपन्नः । न हि घटपरिणाम- अनन्तर उसमें कारणका पुनः प्रवेश करना सर्वथा असम्भव है। घटरूप- व्यतिरेकेण मृदो घटे प्रवेशो- में परिणत होनेके सिवा मृत्तिकाका घटमें और कोई प्रवेश नहीं हुआ ऽस्ति । यथा घटे चूर्णात्मना करता। हाँ, जिस प्रकार घटमें चूर्ण मृदोऽनुप्रवेश एवमन्येनात्मना (बालू) रूपसे मृत्तिकाका अनु- प्रवेश होता है उसी प्रकार किसी नामरूपकार्येऽनुप्रवेश आत्मन इति अन्य रूपसे आत्माका नाम-रूप कार्यमें चेच्छ्रुत्यन्तराच्च "अनेन जीवेना- भी अनुप्रवेश हो सकता है; जैसा कि "इस जीवरूपसे अनुप्रवेश करके" त्मनानुप्रविश्य" ( छा० उ० ६ । इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है ३ । २ ) इति । —यदि ऐसा मानें तो ?
नैवं युक्तमेकत्वाद्व्रह्मणः । मृ- सिद्धान्ती-ऐसा मानना उचित नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो एक ही दात्मनस्त्वनेकत्वात्सावयवत्वाच्च है। मृत्तिकारूप कारण तो अनेक और सावयव होनेके कारण उसका युक्तो घटे मृदश्चूर्णात्मनानु- घटमें चूर्णरूपसे अनुप्रवेश करना भी सम्भव है; क्योंकि मृत्तिकाके चूर्णका प्रवेशः । मृदश्चूर्णस्याप्रविष्टदेश- उस देशमें प्रवेश नहीं है; किन्तु वत्त्वाच्च । न त्वात्मन एकत्वे आत्मा तो एक है, अतः उसके
इसी प्रकार 'अनुप्राविशत्' और 'सृष्ट्वा' इन दोनों क्रियाओंका कर्ता भी ब्रह्म ही होना चाहिये ।
१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ सति निरवयवत्वादप्रविष्टदेशा- | निरवयव और उससे अप्रविष्ट देशका भावाच्च प्रवेश उपपद्यते । कथं | अभाव होनेके कारण उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है । तो फिर उसका तर्हि प्रवेशः स्यात् ? युक्तश्च प्रवेशः | प्रवेश कैसे होना चाहिये ? तथा उसका प्रवेश होना उचित ही है; श्रुतत्वात्तदेवानुप्राविशदिति । | क्योंकि 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' ऐसी श्रुति है । सावयवमेवास्तु तर्हि । साव- | पूर्व०-तब तो ब्रह्म सावयव ही यवत्वान्मुखे हस्तप्रवेशवन्नाम- | होना चाहिये । उस अवस्थामें, सावयव होनेके कारण मुखमें हाथका रूपकार्ये जीवात्मनानुप्रवेशो युक्त | प्रवेश होनेके समान उसका नाम-रूप कार्यमें जीवरूपसे प्रवेश होना ठीक एवेति चेत् ? | ही होगा-यदि ऐसा कहें तो ? नाशून्यदेशत्वात् । न हि | सिद्धान्ती-नहीं; क्योंकि उससे कार्यात्मना परिणतस्य नाम- | शून्य कोई देश नहीं है । कार्य-रूपमें परिणत हुए ब्रह्मका नाम-रूप रूपकार्यदेशव्यतिरेकेणात्मशून्यः | कार्यके देशसे अतिरिक्त और कोई अपनेसे शून्य देश नहीं है, जिसमें प्रदेशोऽस्ति यं प्रविशेज्जीवात्मना । | उसका जीवरूपसे प्रवेश करना सम्भव हो । और यदि यह मानो कारणमेव चेत्प्रविशेज्जीवात्मत्वं | कि जीवात्माने कारणमें ही प्रवेश किया तब तो वह अपने जीवत्वको जह्याद्यथा घटो मृत्प्रवेशे घटत्वं | ही त्याग देगा, जिस प्रकार कि घड़ा मृत्तिकामें प्रवेश करनेपर जहाति । तदेवानुप्राविशदिति | अपना घटत्व त्याग देता है । तथा 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' इस च श्रुतेर्न कारणानुप्रवेशो युक्तः । | श्रुतिसे भी कारणमें अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है ।
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५
| [संस्कृत-मूल] |
| कार्यान्तरमेव स्यादिति चेत् ? |
| तदेवानुप्राविशदिति जीवात्मरूपं |
| कार्यं नामरूपपरिणतं कार्यान्तर- |
| मेवापद्यत इति चेत् ? |
| न; विरोधात् । न हि घटो |
| घटान्तरमापद्यते । व्यतिरेक- |
| श्रुतिविरोधाच्च । जीवस्य नाम- |
| रूपकार्यव्यतिरेकानुवादिन्यः |
| श्रुतयो विरुध्येरन् । तदापत्तौ |
| मोक्षासंभवाच्च । न हि यतो |
| मुच्यमानस्तदेवापद्यते । न हि |
| शृङ्खलापत्तिर्बद्धस्य तस्करादेः । |
| बाह्यान्तर्भेदेन परिणतमिति |
| चेत्तदेव कारणं ब्रह्म शरीराद्या- |
| धारत्वेन तदन्तर्जीवात्मनाधेय- |
| त्वेन च परिणतमिति चेत् ? |
- अर्थात् जीवको तो नाम-रूपात्मक कार्यसे मुक्त होना इष्ट है, फिर वह उसीको क्यों प्राप्त होगा ?
१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ न; बहिःष्ठस्य प्रवेशोपपत्तेः। न | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि प्रवेश हि यो यस्यानतःस्थः स एव | बाहर रहनेवाले पदार्थका ही हो सकता है । जो जिसके भीतर तत्प्रविष्ट उच्यते । बहिःष्ठस्यानु- | स्थित है वह उसमें प्रविष्ट हुआ नहीं कहा जाता । अनुप्रवेश प्रवेशः स्यात्प्रवेशशब्दार्थस्यैवं | तो बाहर रहनेवाले पदार्थका ही हो सकता है; क्योंकि 'प्रवेश' दृष्टत्वात् । यथा गृहं कृत्वा | शब्दका अर्थ ऐसा ही देखा गया प्राविशदिति । | है; जैसे कि 'घर बनाकर उसमें प्रवेश किया' इस वाक्यमें । जलसूर्यकादिप्रतिविम्बवत्प्र- | यदि कहो कि जलमें सूर्यके वेशः स्यादिति चेन्न; अपरिच्छि- | प्रतिबिम्ब आदिके समान उसका प्रवेश हो सकता है, तो ऐसा न्नत्वादमूर्तत्वाच्च । परिच्छिन्नस्य | कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि ब्रह्म अपरिच्छिन्न और अमूर्त है । परि- मूर्तस्यान्यस्यान्यत्र प्रसादस्व- | च्छिन्न और मूर्तरूप अन्य पदार्थोंका भावके जलादौ सूर्यकादिप्रतिवि- | ही स्वच्छस्वभाव जल आदि अन्य पदार्थोंमें सूर्यकादिरूप प्रतिबिम्ब म्बोदयः स्यात् । न त्वात्मनः, | पड़ा करता है; किन्तु आत्माका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता; क्योंकि अमूर्तत्वादाकाशादिकारणस्या- | वह अमूर्त है तथा आकाशादिका त्मनो व्यापकत्वात् । तद्विप्रकृष्ट- | कारणरूप आत्मा व्यापक भी है । उससे दूर देशमें स्थित प्रतिबिम्बकी देशप्रतिविम्बाधारवस्त्वन्तराभा- | आधारभूत अन्य वस्तुका अभाव वाच्च प्रतिविम्बवत्प्रवेशो न | होनेसे भी उसका प्रतिबिम्बके समान प्रवेश होना सम्भव नहीं है । युक्तः । एवं तर्हि नैवास्ति प्रवेशो न | पूर्व०-तब तो आत्माका प्रवेश होता ही नहीं-इसके सिवा च गत्यन्तरमुपलभामहे 'तदे- | 'तदेवानुप्राविशत्' इस श्रुतिकी और
[अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७
[मूल/संस्कृत-स्तम्भः]
वानुप्राविशत्' इति श्रुतेः। श्रुतिश्च नोऽतीन्द्रियविषये विज्ञा- नोत्पत्तौ निमित्तम्। न चास्मा- द्वाक्याद्यत्नवतामपि विज्ञानमु- त्पद्यते। हन्त तर्ह्यनर्थकत्वादपो- ह्यमेतद्वाक्यम् 'तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत्' इति। न, अन्यार्थत्वात्। किमर्थ- मस्थाने चर्चा। प्रकृतो ह्यन्यो विवक्षितोऽस्य वाक्यस्यार्थोऽस्ति स स्मर्तव्यः। "ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै० उ० २।१।१) "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २।१।१) "यो वेद निहितं गुहायाम्" (तै० उ० २।१।१) इति तद्विज्ञानं च विवक्षितं प्रकृतं च तत्। ब्रह्मस्वरूपानुगमाय चाकाशाद्य- न्नमयान्तं कार्यं प्रदर्शितं ब्रह्मा- नुगमश्चारब्धः। तत्रान्नमयादा- त्मनोऽन्योऽन्तर आत्मा प्राण-
[हिन्दी-भाष्यार्थ-स्तम्भः]
कोई गति दिखायी नहीं देती। हमारे (मीमांसकोंके) सिद्धान्ता- नुसार इन्द्रियातीत विषयोंका ज्ञान होनेमें श्रुति ही कारण है। किन्तु इस वाक्यसे बहुत यत्न करनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान उत्पन्न नहीं होता। अतः खेद है कि 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' यह वाक्य अर्थशून्य होनेके कारण त्यागने ही योग्य है। सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि इस वाक्यका अर्थ अन्य ही है। इस प्रकार अप्रासङ्गिक चर्चा क्यों करते हो? इस प्रसंगमें इस वाक्य- को और ही अर्थ कहना अभीष्ट है। उसीको स्मरण करना चाहिये। "ब्रह्म- वेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है" "ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है" "जो उसे बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ जानता है" इत्यादि वाक्योंद्वारा जिसका निरूपण किया गया है उस ब्रह्मका ही विज्ञान यहाँ बतलाना अभीष्ट है और उसीका यहाँ प्रसङ्ग भी है। ब्रह्मके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ही आकाशसे लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त सम्पूर्ण कार्य- वर्ग दिखलाया गया है तथा ब्रह्मा- नुभवका प्रसङ्ग भी चल ही रहा है। उसमें अन्नमय आत्मासे भिन्न दूसरा अन्तरात्मा प्राणमय है,
१६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ मयस्तदन्तर्मनोमयो विज्ञानमय | उसका अन्तर्वर्ती मनोमय और फिर इति विज्ञानगुहायां प्रवेशितस्तत्र | विज्ञानमय है । इस प्रकार आत्माका चानन्दमयो विशिष्ट आत्मा | विज्ञानगुहामें प्रवेश करा दिया गया प्रदर्शितः । | है और वहाँ आनन्दमय ऐसे विशिष्ट | आत्माको प्रदर्शित किया गया है । अतः परमानन्दमयलिङ्गाधि- | इसके आगे आनन्दमय-इस गमद्वारेणानन्दविवृद्ध्यवसान | लिङ्गके ज्ञानद्वारा आनन्दके उत्कर्ष- आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा सर्व- | का अवसानभूत आत्मा जो सम्पूर्ण विकल्पास्पदो निर्विकल्पोऽस्या- | विकल्पका आश्रयभूत एवं निर्विकल्प मेव गुहायामधिगन्तव्य इति | ब्रह्म है तथा [ आनन्दमय कोशकी ] तत्प्रवेशः प्रकल्प्यते । न ह्यन्य- | पुच्छ प्रतिष्ठा है, वह इस गुहामें ही त्रोपलभ्यते ब्रह्म निर्विशेषत्वात् । | अनुभव किये जाने योग्य है- विशेषसंबन्धो ह्युपलब्धिहेतु- | इसलिये उसके प्रवेशकी कल्पना र्दृष्टः, यथा राहेश्चन्द्रार्कविशिष्ट- | की गयी है । निर्विशेष होनेके कारण संबन्धः । एवमन्तःकरणगुहात्म- | ब्रह्म [ बुद्धिरूप गुहाके सिवा ] और संबन्धो ब्रह्मण उपलब्धिहेतुः । | कहीं उपलब्ध नहीं होता; क्योंकि संनिकर्षादवभासात्मकत्वाच्चान्तः- | विशेषका सम्बन्ध ही उपलब्धिमें हेतु करणस्य । | देखा गया है, जिस प्रकार कि राहु- | की उपलब्धिमें चन्द्रमा अथवा सूर्य- | रूप विशेषका सम्बन्ध । इस प्रकार | अन्तःकरणरूप गुहा और आत्मा- | का सम्बन्ध ही ब्रह्मकी उपलब्धिका | हेतु है; क्योंकि अन्तःकरण उसका | समीपवर्ती और प्रकाशस्वरूप* है । ※ जिस प्रकार अन्धकार और प्रकाश दोनों ही जड हैं, तथापि प्रकाश अन्धकाररूप आवरणको दूर करनेमें समर्थ है, इसी प्रकार यद्यपि अज्ञान और अन्तःकरण दोनों ही समानरूपसे जड हैं तो भी प्रत्यय ( विभिन्न प्रतीतियोंके ) रूपमें परिणत हुआ अन्तःकरण अज्ञानका नाश करनेमें समर्थ है और इस प्रकार वह आत्माका प्रकाशक ( ज्ञान करानेवाला ) है । इसी बातको आगेके भाष्यसे स्पष्ट करते हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६९ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ यथा चालोकविशिष्टा घटा- | जिस प्रकार कि प्रकाशयुक्त द्युपलब्धिरेवं बुद्धिप्रत्ययालोक- | घटादिकी उपलब्धि होती है उसी विशिष्टात्मोपलब्धिः स्यात्तस्मा- | प्रकार बुद्धिके प्रत्ययरूप प्रकाशसे दुपलब्धिहेतौ गुहायां निहित- | युक्त आत्माका अनुभव होता है । मिति प्रकृतमेव । तद्वृत्तिस्थ्या- | अतः उपलब्धिकी हेतुभूत गुहामें नीये त्विह पुनस्तत्सृष्ट्वा तदेवा- | वह निहित है—इसी बातका यह नुप्राविशदित्युच्यते । | प्रसङ्ग है । उसकी वृत्ति (व्याख्या) | के रूपमें ही श्रुतिद्वारा 'उसे रचकर | वह पीछेसे उसीमें प्रवेश कर गया' | ऐसा कहा गया है । तदेवेदमाकाशादिकारणं कार्यं | इस प्रकार इस कार्यवर्गको सृष्ट्वा तदनुप्रविष्टमिवान्तर्गुहायां | रचकर इसमें अनुप्रविष्ट-सा हुआ बुद्धौ द्रष्टृ श्रोतॄ मन्तृ विज्ञातृत्वेनेवं | आकाशादिका कारणरूप वह ब्रह्म विशेषवदुपलभ्यते । स एव तस्य | ही बुद्धिरूप गुहामें द्रष्टा, श्रोता, प्रवेशस्तस्मादस्ति तत्कारणं ब्रह्म । | मन्ता और विज्ञाता—ऐसा सविशेष- | रूप-सा जान पड़ता है । यही | उसका प्रवेश करना है । अतः | वह ब्रह्म कारण है; इसलिये उसका | अस्तित्व होनेके कारण उसे 'है' अतोऽस्तित्वादस्तीत्येवोपलब्धव्यं | इस प्रकार ही ग्रहण करना चाहिये । तत् । | तत्कार्यमनुप्रविश्य, किम् ? | उसने कार्यमें अनुप्रवेश करके | फिर क्या किया ? वह सत्—मूर्त तस्य सच्च मूर्तं त्यच्चामूर्त- | और असत्—अमूर्त हो गया । जिन- सर्वात्म्यम् मभवत् । मूर्तामूर्ते | के नाम और रूपकी अभिव्यक्ति ह्यव्याकृतनामरूपे आत्मस्थे | नहीं हुई है, वे मूर्त और अमूर्त तो | आत्मामें ही रहते हैं । उन 'मूर्त' अन्तर्गतैनात्मना व्याक्रियेते | एवं 'अमूर्त' शब्दवाच्य पदार्थोंको | उनका अन्तर्वर्ती आत्मा केवल व्याकृते मूर्तामूर्तशब्दवाच्ये । ते | अभिव्यक्त कर देता है । उनके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ आत्मना त्वप्रविभक्तदेशकाले | देश और काल आत्मासे अभिन्न हैं इति कृत्वात्मा ते अभवदित्यु- | —इसीलिये ‘आत्मा ही मूर्त और च्यते । | अमूर्त हुआ’ ऐसा कहा जाता है । किं च निरुक्तं चानिरुक्तं च । | तथा वही निरुक्त और अनिरुक्त | भी हुआ । निरुक्त उसे कहते हैं निरुक्तं नाम निष्कृष्य समाना- | जिसे सजातीय और विजातीय समानजातीयेभ्यो देशकाल- | पदार्थोंसे अलग करके देश-काल- | विशिष्टरूपसे ‘वह यह है’ ऐसा विशिष्टतयेदं तदित्युक्तमनिरुक्तं | कहा जाय । इससे विपरीत लक्षणों- तद्विपरीतं निरुक्तानिरुक्ते अपि | वालेको ‘अनिरुक्त’ कहते हैं । | निरुक्त और अनिरुक्त भी मूर्त और मूर्तामूर्तयोरेव विशेषणे । यथा | अमूर्तके ही विशेषण हैं । जिस | प्रकार ‘सत्’ और ‘त्यत्’ क्रमशः सच्च त्यच्च प्रत्यक्षपरोक्षे, तथा | ‘प्रत्यक्ष’ और ‘परोक्ष’ को कहते हैं निलयनं चानिलयनं च । निल- | उसी प्रकार ‘निलयन’ और ‘अनि- | लयन’ भी समझने चाहिये । यनं नीडमाश्रयो मूर्तस्यैव धर्मः । | निलयन-—नीड अर्थात् आश्रय अनिलयनं तद्विपरीतममूर्तस्यैव | मूर्तका ही धर्म है और उससे | विपरीत अनिलयन अमूर्तका ही धर्मः । | धर्म है । त्यदनिरुक्तानिलयनान्यमूर्त- | त्यत्, अनिरुक्त और अनिलयन— धर्मत्वेऽपि व्याकृतविषयाण्येव । | ये अमूर्तके धर्म होनेपर भी व्याकृत | ( व्यक्त ) से ही सम्बन्ध रखनेवाले सर्गोत्तरकालभावश्रवणात् । त्य- | हैं; क्योंकि इनकी सत्ता सृष्टिके दिति प्राणाद्यनिरुक्तं तदेवानि- | अनन्तर ही सुनी गयी है । त्यत्— | यह प्राणादि अनिरुक्तका नाम है; लयनं च । अतो विशेषणान्य- | वही अनिलयन भी है । अतः ये CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७१ मूर्तस्य व्याकृतविषयाण्येवैतानि । | अमूर्तके विशेषण व्याकृतविषयक | ही हैं । विज्ञानं चेतनमविज्ञानं | विज्ञान यानी चेतन, अविज्ञान- तद्रहितमचेतनं पाषाणादि सत्यं | उससे रहित अचेतन पाषाणादि | और सत्य-व्यवहारसम्बन्धी सत्य; च व्यवहारविषयमधिकारात्न | क्योंकि यहाँ व्यवहारका ही प्रसंग परमार्थसत्यम् । एकमेव हि | है, परमार्थ सत्य नहीं; परमार्थ सत्य | तो एकमात्र ब्रह्म ही है; यहाँ तो परमार्थसत्यं ब्रह्म । इह पुन- | केवल व्यवहारविषयक आपेक्षिक | सत्यसे ही तात्पर्य है, जैसे कि र्व्यवहारविषयमापेक्षिकं सत्यम्, | मृगतृष्णा आदि असत्यकी अपेक्षासे मृगतृष्णिकाद्यनृतापेक्षयोदकादि | जल आदिको सत्य कहा जाता है सत्यमुच्यते । अनृतं च तद्विप- | तथा अनृत-उस (व्यावहारिक | सत्य ) से विपरीत । सो फिर रीतम्। किं पुनः ? एतत्सर्वमभवत्, | क्या ? ये सब वह सत्य--परमार्थ सत्यं परमार्थसत्यम् । किं | सत्य ही हो गया । वह परमार्थ पुनस्तत् ? ब्रह्म, सत्यं ज्ञानमनन्तं | सत्य है क्या ? वह ब्रह्म है; क्योंकि | 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान एवं अनन्त है' ब्रह्मेति प्रकृतत्वात् । | इस प्रकार उसीका प्रकरण है । यस्मात्सच्चदादिकं मूर्तामूर्त- | क्योंकि सत्-त्यत् आदि जो कुछ धर्मजातं यत्किंचेदं सर्वमविशिष्टं | मूर्त-अमूर्त धर्मजात है वह सामान्य- | रूपसे सारा ही विकार एकमात्र विकारजातमेकमेव सच्छब्दवाच्यं | 'सत्' शब्दवाच्य ब्रह्म ही हुआ है- ब्रह्माभवत्तद्व्यतिरेकेणाभावान्ना- | क्योंकि उससे भिन्न नाम-रूप विकार- | का सर्वथा अभाव है-इसलिये ब्रह्म- मरूपविकारस्य, तस्मात्तद्ब्रह्म | वादीलोग उस ब्रह्मको 'सत्य' ऐसा सत्यमित्याचक्षते ब्रह्मविदः । | कहकर पुकारते हैं । अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नः प्रकृत- | 'ब्रह्म है या नहीं' इस अनुप्रश्नका स्तस्य प्रतिवचनविषय एतदुक्त- | यहाँ प्रसंग था । उसके उत्तरमें यह CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
मात्माकामयत बहु स्यामिति । स | कहा गया था—'आत्माने कामना की यथाकामं चाकाशादिकार्यं सच्च- | कि मैं बहुत हो जाऊँ' । वह अपनी दादिलक्षणं सृष्ट्वा तदनु प्रविश्य | कामनाके अनुसार सत् त्यत् आदि पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन् | लक्षणोंवाले आकाशादि कार्यवर्गको बहुभवत्तस्मात्तदेवेदमाकाशादि- | रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हो द्रष्टा, कारणं कार्यस्थं परमे व्योमन् | श्रोता, मन्ता और विज्ञातारूपसे हृदयगुहायां निहितं तत्प्रत्ययाव- | बहुत हो गया । अतः आकाशादि- भासविशेषेणोपलभ्यमानमस्ति | के कारण, कार्यवर्गमें स्थित, इत्येवं विजानीयादित्युक्तं भवति । | परमाकाशके भीतर बुद्धिरूप गुहामें छिपे हुए और उसके कर्त्ता-भोक्तादि- तदेतस्मिन्नर्थे ब्राह्मणोक्त एष | रूप जो प्रत्ययावभास हैं उनके द्वारा श्लोको मन्त्रो भवति । यथा | विशेषरूपसे उपलब्ध होनेवाले उस पूर्वेषु अन्नमयाद्यात्मप्रकाशकाः | ब्रह्मको ही 'वह है' इस प्रकार जाने- पञ्चस्वप्येवं सर्वान्तरतमात्मास्ति- | ऐसा कहा गया । त्वप्रकाशकोऽपि मन्त्रः कार्य- | उस इस ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही द्वारेण भवति ॥ १ ॥ | यह श्लोक यानी मन्त्र है । जिस प्रकार पूर्वोक्त पाँच पर्यायोंमें अन्नमय आदि कोशोंके प्रकाशक श्लोक थे उसी प्रकार सबकी अपेक्षा आन्तरतम आत्माके अस्तित्वको उसके कार्यद्वारा प्रकाशित करनेवाला भी यह मन्त्र है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥
सप्तम अनुवाक
ब्रह्मकी सुकृतता एवं आनन्दरूपताका तथा ब्रह्मवेत्ताकी अभयप्राप्तिका वर्णन असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानँस्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसँह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति । को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति । यदा ह्येवैष एत- स्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदर- मन्तरं कुरुते । अथ तस्य भयं भवति । तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ पहले यह [ जगत् ] असत् (अव्याकृत ब्रह्मरूप) ही था । उसीसे सत् (नाम-रूपात्मक व्यक्त) की उत्पत्ति हुई । उस असत्ने स्वयं अपनेको ही [ नाम-रूपात्मक जगद्रूपसे ] रचा । इसलिये वह सुकृत (स्वयं रचा हुआ) कहा जाता है । वह जो प्रसिद्ध सुकृत है सो निश्चय रस ही है । इस रसको पाकर पुरुष आनन्दी हो जाता है । यदि हृदयाकाशमें स्थित यह आनन्द (आनन्दस्वरूप आत्मा) न होता तो कौन व्यक्ति अपान-क्रिया करता और कौन प्राणन-क्रिया करता ? यही तो उन्हें आनन्दित करता है । जिस समय यह साधक इस अदृश्य अशरीर, अनिर्वाच्य और निराधार ब्रह्ममें अभय-स्थिति प्राप्त करता है उस
१७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ समय यह अभयको प्राप्त हो जाता है; और जब यह इसमें थोड़ा-सा भी भेद करता है तो इसे भय प्राप्त होता है। वह ब्रह्म ही भेददर्शी विद्वान्के लिये भयरूप है। इसी अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥
[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]
असद्वा इदमग्र आसीत् । (टिप्पणी: असच्छब्दवाच्याव्याकृताज्जगदुत्पत्तिः) असदिति व्याकृत- नामरूपविशेषविप- रीतरूपमव्याकृतं ब्रह्मोच्यते । न पुनरत्यन्तमेवा- सत् । न ह्यसतः सज्जन्मास्ति इदमिति नामरूपविशेषवद्व्याकृतं जगदग्रे पूर्वं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मैवास- च्छब्दवाच्यमासीत् । ततोऽसतो वै सत्प्रविभक्तनामरूपविशेष- मजायतोत्पन्नम् । किं ततः प्रविभक्तं कार्यमिति पितुरिव पुत्रः, नेत्याह । तदस- च्छब्दवाच्यं स्वयमेवात्मानमेवा- कुरुत कृतवत् । यस्मादेवं तस्मा- द्ब्रह्मैव सुकृतं स्वयंकर्तृच्यते । स्वयंकर्तृ ब्रह्मेति प्रसिद्धं लोके सर्वकारणत्वात् ।
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या]
पहले यह [ जगत् ] असत् ही था। 'असत्' इस शब्दसे, जिनके नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन विशेष पदार्थोंसे विपरीत स्वभाववाला अव्याकृत ब्रह्म कहा जाता है। इससे [ वन्ध्यापुत्रादि ] अत्यन्त असत् पदार्थ बतलाये जाने अभीष्ट नहीं हैं; क्योंकि असत्से सत्का जन्म नहीं हो सकता । 'इदम्' अर्थात् नाम-रूप विशेषसे युक्त व्याकृत जगत् अग्रे—पहले अर्थात् उत्पत्तिसे पूर्व 'असत्' शब्दवाच्य ब्रह्म ही था । उस असत्से ही सत् यानी जिसके नाम-रूपका विभाग हो गया है उस विशेषकी उत्पत्ति हुई । तो क्या पितासे पुत्रके समान यह कार्यवर्ग उस [ ब्रह्म ] से विभिन्न है ? इसपर श्रुति कहती है—नहीं; उस 'असत्' शब्दवाच्य ब्रह्मने स्वयं अपनेको ही रचा । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये वह ब्रह्म ही सुकृत अर्थात् स्वयंकर्ता कहा जाता है; सबका कारण होनेसे ब्रह्म स्वयं कर्ता है—यह बात लोकमें प्रसिद्ध है ।
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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ यस्माद्वा स्वयमकरोत्सर्वं अथवा, क्योंकि सर्वरूप होने- से ब्रह्मने स्वयं ही इस सम्पूर्ण सर्वात्मना तस्मात्पुण्यरूपेणापि जगत्की रचना की है, इसलिये पुण्यरूपसे भी उसका कारणरूप तदेव ब्रह्म कारणं सुकृतमुच्यते । वह ब्रह्म 'सुकृत' कहा जाता है। लोकमें जो कार्य [ पुण्य अथवा सर्वथापि तु फलसंबन्धादि- पाप ] किसी भी प्रकारसे फलके कारणं सुकृतशब्दवाच्यं प्रसिद्धं सम्बन्ध आदिका कारण होता है वही 'सुकृत' शब्दके वाच्यरूपसे प्रसिद्ध लोके । यदि पुण्यं यदि वान्यत्तसा होता है। वह प्रसिद्धि चाहे पुण्य- रूपा हो और चाहे पापरूपा किसी प्रसिद्धिर्नित्ये चेतनवत्कारणे नित्य और सचेतन कारणके होनेपर ही हो सकती है । अतः उस सत्युपपद्यते । तस्मादस्ति तद्ब्रह्म सुकृतरूप प्रसिद्धिकी सत्ता होनेसे यह सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म है। सुकृतप्रसिद्धेः । इतश्चास्ति । ब्रह्म इसलिये भी है; किस लिये ? रस- स्वरूप होनेके कारण । ब्रह्मकी कुतः ? रसत्वात् । कुतो रसत्व- रसरूपताकी प्रसिद्धि किस कारण- से है-इसपर श्रुति कहती है— सिद्धिर्ब्रह्मण इत्यत आह— यद्वै तत्सुकृतम् । रसो वै जो भी वह प्रसिद्ध सुकृत है वह ब्रह्मगो सः । रसो नाम निश्चय रस ही है । खट्टा-मीठा रसरूपत्वम् तृप्तिहेतुरानन्दकरो आदि तृप्तिदायक और आनन्दप्रद पदार्थ लोकमें 'रस' नामसे प्रसिद्ध मधुराम्लादिः प्रसिद्धो लोके है ही । इस रसको ही पाकर पुरुष रसमेवायं लब्ध्वा प्राप्यानन्दी आनन्दी अर्थात् सुखी हो जाता है। लोकमें किसी असत् पदार्थकी सुखी भवति । नासत आनन्द- आनन्दहेतुता कभी नहीं देखी गयी । हेतुत्वं दृष्टं लोके । बाह्यानन्द- ब्रह्मनिष्ठ निरीह और निरपेक्ष विद्वान् साधनरहिता अप्यनीहा निरषणा बाह्यसुखके साधनसे रहित होनेपर
१७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ब्राह्मणा बाह्यरसलाभादिव सा- | भी बाह्य रसके लाभसे आनन्दित नन्दा दृश्यन्ते विद्वांसः; नूनं | होनेके समान आनन्दयुक्त देखे जाते | हैं । निश्चय उनका रस ब्रह्म ही है । ब्रह्मैव रसस्तेषाम् । तस्मादस्ति | अतः रसके समान उनके आनन्दका तत्तेषामानन्दकारणं रसवद्ब्रह्म । | कारणरूप वह ब्रह्म है ही । इतश्चास्ति; कुतः ? प्राणनादि- | इसलिये भी ब्रह्म है; किसलिये ? | प्राणनादि क्रियाके देखे जानेसे । क्रियादर्शनात् । अयमपि हि | जीवित पुरुषका यह पिण्ड भी प्राणकी | सहायतासे प्राणन करता है और पिण्डो जीवतः प्राणेन प्राणित्य- | अपान वायुके द्वारा अपानक्रिया | करता है । इसी प्रकार संघातको पानेनापानिति । एवं वायवीया | प्राप्त हुए इन शरीर और इन्द्रियोंके | द्वारा निष्पन्न होती हुई और भी ऐन्द्रियकाश्च चेष्टाः संहतैः कार्य- | वायु और इन्द्रियसम्बन्धिनी चेष्टाएँ | देखी जाती हैं । वह वायु आदि करणैर्निर्वर्त्यमाना दृश्यन्ते । | अचेतन पदार्थोंका एक ही उद्देश्यकी तच्चैकार्थवृत्तित्वेन संहननं नान्त- | सिद्धिके लिये परस्पर संहत ( अनु- | कूल ) होना किसी असंहत ( किसी- रेण चेतनमसंहतं संभवति । | से भी न मिले हुए ) चेतनके बिना | नहीं हो सकता; क्योंकि और कहीं अन्यत्रादर्शनात् । | ऐसा देखा नहीं जाता । तदाह-तद्यदि एष आकाशे | इसी बातको श्रुति कहती है- परमे व्योम्नि गुहायां निहित | यदि आकाश-परमाकाश अर्थात् आनन्दो न स्यान्न भवेत्को ह्येव | बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ यह | आनन्द न होता तो लोकमें कौन लोकेऽन्यादपानचेष्टां कुर्यादि- | अपान-क्रिया करता और कौन त्यर्थः । कः प्राण्यात्प्राणनं वा | प्राणन कर सकता; इसलिये वह कुर्यात्तस्मादस्ति तद्ब्रह्म । यदर्थाः | ब्रह्म है ही, जिसके लिये कि शरीर
अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७
कार्यकरणप्राणनादिचेष्टास्तत्कृत | और इन्द्रियकी प्राणन आदि चेष्टाएँ एव चानन्दो लोकस्य । | हो रही हैं; और उसीका किया हुआ | लोकका आनन्द भी है । कुतः ? एष ह्येव पर आत्मा | ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह आनन्दयात्यानन्दयति सुखयति | परमात्मा ही लोकको उसके धर्मा- लोकं धर्मानुरूपम् । स एवात्मा- | नुसार आनन्दित-सुखी करता है । नन्दरूपोऽविद्यया परिच्छिन्नो | तात्पर्य यह है कि वह आनन्दरूप विभाव्यते प्राणिभिरित्यर्थः । | आत्मा ही प्राणियोंद्वारा अविद्यासे भयाभयहेतुत्वाद्विद्वदविदुषोरस्ति | परिच्छिन्न भावना किया जाता है । तद्ब्रह्म । सद्द्वस्त्वाश्रयेण ह्यभयं | अविद्वान्के भय और विद्वान्के भवति । नासद्वस्त्वाश्रयेण | अभयका कारण होनेसे भी ब्रह्म है; भयनिवृत्तिरुपपद्यते । | क्योंकि किसी सत्य पदार्थके आश्रयसे | ही अभय हुआ करता है, असद्वस्तुके | आश्रयसे भयकी निवृत्ति होनी सम्भव | नहीं है । कथमभयहेतुत्वमित्युच्यते— | ब्रह्मका अभयहेतुत्व किस प्रकार [ब्रह्मणोऽभय-हेतुत्वम्] यदा ह्येव यस्मादेष साधक एतस्मिन्न- | है, सो बतलाया जाता है—क्योंकि | जिस समय भी यह साधक इस ह्मणि किंविशिष्टेऽदृश्ये दृश्यं नाम | ब्रह्ममें [ प्रतिष्ठा-स्थिति अर्थात् | आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ।] द्रष्टव्यं विकारो दर्शनार्थत्वाद्धि- | किन विशेषणोंसे युक्त ब्रह्ममें ? | अदृश्यमें—दृश्य देखे जानेवाले अर्थात् कारस्य । न दृश्यमदृश्यमविकार | विकारका नाम है; क्योंकि विकार | देखे जानेके ही लिये है; जो दृश्य न इत्यर्थः । एतस्मिन्नदृश्येऽविकारे- | हो उसे अदृश्य अर्थात् अविकार | कहते हैं । इस अदृश्य-अविकारी ऽविषयभूते अनात्म्येऽशरीरे । | अर्थात् अविषयभूत, अनात्म्य-अ- | शरीरमें । क्योंकि वह अदृश्य है यस्माददृश्यं तस्मादनात्म्यं | इसलिये अशरीर भी है और क्योंकि तै० उ० २३—२४—