तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
lxvi XXII The last chapter gives in short the nature of Kulācāra. It should be noted at the outset that this form of worship is not meant for everybody but for them who are well-advanced and in whom inclination for such rituals has grown strong. Only because of this they are entitled to perform the worship of the divine in accordance to this method. When a person becomes free from ( Vikalpas ) determi- nation and is able to attain steadiness in ( nirvikalpa ) the indeterminate state, only then he is considered worthy to worship according to kulakrama, for it is stated in Tantra- loka that during rituals if he thinks that the object of wor- ship is defferent and he himself is different from that, he fails to attain siddhi and mukti. One who has plunged into the secret of this krama and follows the course, is really endowed with the highest knowledge. Therefore, Jayaratha writes in his commentary on Tantraloka 29/102, that those great souls who are really free from Vikalpas take up the course as prescribed by the kula system. Particularly they follow the course only to see if their mind, in the presence of allurements is really steady in pure consciousness ( saṃvi- dadvaye ) or not For this reason they do not think it immo- ral to practise in the company of dūtīs. Kula ritual is performed in six different ways, namely, (i) externally, (ii) in the śakti, (iii) in one's own body, (iv) in the unity of both, male and female, (v) in the vital energy, (vi) in consciousness. As the worshippers are of two kinds, that is, he who is desirous of siddhi should perform Kula- yāga according to the method listed as the second, the fourth, and the fifth, but he who desires liberation should stick to the sixth.
lxvii The author gives a short description of each of the methods in a cryptic way. The tradition used to be handed down orally to real the adhikārin in the past, therefore many of the matters are not very clear to us. Hence we prefer to say less about the secret cult. In the end I thank the proprietor of Sanskrit Sahitya Sansthan for his co-operation in printing and publishing the text. My special thanks are also due to the proprietor of the Ananda Printing Press for his help. Janmastami H. N. Chakravarty 28-8-86
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विषय सूची क्रमांक पृष्ठांक १. विज्ञानभेद प्रकाशनम् १ २. अनुपाय प्रकाशनम् १० ३. शाम्भवोपाय प्रकाशनम् ११ ४. शाक्तोपाय प्रकाशनम् २२ ५. आणवोपाय प्रकाशनम् ३७ ६. कालाध्वप्रकाशनम् ५० ७. देशाध्वप्रकाशनम् ६७ ८. तत्त्वस्वरूप प्रकाशनम् ७४ ९. तत्त्वभेद प्रकाशनम् ९२ १०. कलाद्यध्व प्रकाशनम् १०४ ११. शक्तिपात प्रकाशनम् ११२ १२. स्नान प्रकाशनम् १२४ १३. समयिदीक्षा प्रकाशनम् १२८ १४. पुत्रकदीक्षा प्रकाशनम् १५१ १५. सप्रत्ययदीक्षा प्रकाशनम् १५८ १६. परोक्षदीक्षा प्रकाशनम् १६२ १७. लिङ्गोद्धरणम् १६७ १८. अभिषेक प्रकाशनम् १७१ १९. श्राद्धदीक्षा प्रकाशनम् १७४ २०. शेषवर्तन प्रकाशनम् १७९ २१. आगमप्रामाण्य प्रकाशनम् १९२ २२. कुलयाग प्रकाशनम् १९२
विषय सूची पृष्ठाङ्क विषय १ ... १० ... ३३ ... विधिः ... ... ... मन्त्र विधानम् ... ... ... विधिः ... ५० ... पटलः ... ... ... ... ... मन्त्रोद्धारः ... ... ... पूजाविधानम् ... ... ... यन्त्रोद्धारः ... १३१ ... विधिः ... १३३ ... पटलः ... ... ... विधानम् ... ... ... मन्त्र निर्णयः ... ... ... मन्त्रोद्धारः ... ४२१ ... पटलः ... ४२३ ... विधिः ... ४२७ ... न्यासविधिः ... ४६१ ... प्रयोगः ... ४८१ ... मन्त्र विधानम् ... ... ... विधिः ... ५१३ ... पटलः ... ... विधानम् ...
तन्त्रसारः ( श्रीमदभिनवगुप्तपादाचार्य कृत )
प्रकाशक ...
ओं तत्सत्स्वात्मसंविद्वपुषे शंभवे नमः। अथ तन्त्रसारः श्रीमन्महामाहेश्वराचार्यवर्य-श्रीमदभिनवगुप्तविरचितः। प्रथममाह्निकम् विमलकलाश्रयाभिनवसृष्टिमहा जननी भरिततनुश्च पञ्चमुखगुप्तरुचिर्जनकः। तदुभययामलस्फुरितभावविसर्गमयं हृदयमनुत्तरामृतकुलं मम संस्फुरतात् ॥१॥ विततस्तन्त्रालोको विगाहितुं नैव शक्यते सर्वैः। ऋजुवचनविरचितमिदं तु तन्त्रसारं ततः शृणुत ॥२॥ श्रीशंभुनाथभास्करचरणनिपातप्रभापगतसंकोचम्। अभिनवगुप्तहृदम्बुजमेतद्विचिनुत महेशपूजनहेतोः ॥३॥ इह ज्ञानं मोक्षकारणं बन्धनिमित्तस्य अज्ञानस्य विरोधकत्वात्; द्विविधं च अज्ञानं बुद्धिगतं पौरुषं च; तत्र बुद्धिगतम् अनिश्चयस्वभावं, विपरीतनिश्चयात्मकं च। पौरुषं तु विकल्पस्वभावं संकुचितप्रथात्मकं, तदेव च मूलकारणं संसारस्य इति वक्ष्यामो मलनिर्णये। तत्र पौरुषम् अज्ञानं दीक्षादिना निवर्तेतापि, किं तु दीक्षापि बुद्धिगते अनध्यवसा- यात्मके अज्ञाने सति न संभवति—हेयोपादेयनिश्चयपूर्वकत्वात् तत्त्वशुद्धि- शिवयोजनारूपाया दीक्षाया इति। तत्र अध्यवसायात्मकं बुद्धिनिष्ठमेव ज्ञानं प्रधानम्, तदेव च अभ्यस्यमानं पौरुषमपि अज्ञानं निहन्ति, विकल्प- संविदभ्यासस्य अविकल्पान्ततापर्यवसानात्। विकल्पासंकुचितसंवित्प्र- काशरूपो हि आत्मा शिवस्वभाव इति सर्वथा समस्तवस्तुनिष्ठं सम्यङ्- निश्चयात्मकं ज्ञानमुपादेयम्। तच्च शास्त्रपूर्वकम्। शास्त्रं च परमेश्वर- भाषितमेव प्रमाणम्। अपरशास्त्रोक्तानामर्थानां तत्र वैविक्त्येन अभ्यु- पगमात् तदतिरिक्तयुक्तिसिद्धनिरूपणाच्च, तेन अपरागमरोक्तं ज्ञानं
२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १ तावत एव बन्धात् विमोचकम्, न सर्वस्मात्, सर्वस्मात् तु विमोचकं परमेश्वरशास्त्रं, पञ्चस्रोतो [मयं] दशाष्टादशवस्वष्टभेदभिन्नम् । ततोऽपि सर्वस्मात् सारं षडर्धशास्त्राणि । तेभ्योऽपि मालिनीविजयम् । तदन्तर्गत- श्चार्थः संकलय्याशक्यौ निरूपयितुम् । न च अनिरूपितवस्तुतत्त्वस्य मुक्तत्वं मोचकत्वं वा, शुद्धस्य ज्ञानस्यैव तथारूपत्वात् इति । स्वभ्यस्तज्ञान मूलत्वात् परपुरुषार्थस्य तत्सिद्धये इदम् आरभ्यते— मेरा हृदय¹ उन दोनों के सामरस्य² से स्फुरित अनुत्तर अमृतमय कला रूप में जो उभय के यामल से प्रकाशमान होकर विसर्गमय है, विकसित हो उठे। ये उभय जननी³ और जनक हैं। वह जननी जो विमलकलाका आश्रय होकर आदि सृष्टि रूप तेज धारण करती हुई वर्तमान हैं और वह जनक⁴ जो सर्वतोभाव से परिपूर्ण हो पंचशक्ति से सम्बद्ध रहकर पंचकृत्यों से अभिलाषी हैं ॥१॥ १. यहाँ हृदय शब्द से जगदानन्द रूप आनन्द को ग्रहण करना चाहिए, जो ग्रन्थकार का आशय है। आनन्दका परम उत्कर्ष जगदानन्द है जो छः प्रकार आनन्दों के एक अनुसन्धाता हैं। यह नित्योदित अर्थात् इस आनन्द का न तो उदय है न अस्त । अन्तर्विश्रान्ति ही इसका वास्तविक स्वरूप है । २. यामल तत्त्व शिव और शक्ति का परम सामरस्य रूप है । इसे संघट्ट भी कहा जाता है । सृष्टि प्रक्रिया में यामलभाव से तत्त्व आदि की रचना होती है । सृष्टि के मूल में जो परम अद्वय तत्त्व है जिसे परमसाम्य कहा जाता है उस भाव में जब ईषत् वैषम्य का उदय होता है तो वही एक ही दो बनकर तीन या बहु बनता है । शिव और शक्ति के सामरस्य से दोनों की छटा धारण करनेवाला विसर्ग जो स्वभाव से ही बाहर की ओर प्रसृत होता है, उदित होता है। शास्त्रों में इसका वर्णन हार्धकला के रूप में हुआ है। कुल शरीर का पर्यायवाची शब्द है लेकिन यहाँ यह कुल शरीर होते हुए भी स्वरूपतः अनुत्तर तथा अमृतमय है। यह काल के कलंक से मलिन नहीं होता, अमाकला उसका स्वरूप है। ३. जननी स्वातन्त्र्य शक्ति रूपिणी हैं, वह सब प्रकार परिच्छिन्नता से परे है, पर विमर्श ही उसका एकमात्र स्वरूप है । ४. जनक शिवजी हैं जो पंचमुख हैं, चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया ही उनके पाँच मुख हैं—ये मुख ही उनकी पाँच शक्तियाँ हैं और वे निरन्तर सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान तथा अनुग्रह रूप कृत्य कर रहे हैं।
आ. १ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३ विस्तृत ( विशाल ) तन्त्रालोक में अवगाहन करने का सामर्थ्य सब का नहीं है। इसलिए सरल वाक्यों से विरचित इस तन्त्रसार (ग्रन्थ) का श्रवण करें ॥२॥ श्रीशम्भुनाथरूपी भास्कर के चरणों पर प्रणामरूपी प्रकाश से अभिनवगुप्त के हृदयकमल खिल उठा है। महेश्वर के पूजन के लिए उसे (सज्जन लोग) संग्रह करें ॥३॥ इस संसार में ज्ञान ही मोक्ष का कारण है क्यों कि वह बन्ध के कारण अज्ञान¹ का विरोधी है। अज्ञान बौद्ध और पौरुष भेद से दो प्रकार हैं, उनमें बौद्ध अज्ञान अनिश्चित स्वभाव तथा विपरीत निश्चयात्मक है। पौरुष अज्ञान स्वभावतः विकल्परूपी है और संकुचित १. अद्वैत तन्त्र मत के अनुसार अज्ञान पौरुष तथा बौद्ध दो प्रकार हैं, ज्ञान भी पौरुष तथा बौद्ध दो प्रकार हैं। पौरुष ज्ञान विकल्पहीन है और पूर्ण अहन्ता बोधमय है। परमेश्वर के साथ पूर्ण तादात्म्य लाभ होने पर ही इसकी अभिव्यक्ति होती है। लेकिन पौरुष अज्ञान विकल्प-स्वभाव है। यह पूर्ण प्रथा के विपरीत संकुचित प्रथा है, यह अपूर्ण ज्ञान है तथा संसार का मूल कारण है। दीक्षा के द्वारा पौरुष अज्ञान के नाश हो जाने पर भी देह के आरम्भक कार्ममल की सत्ता बनी ही रहती है, अतः पौरुष ज्ञान का उदय नहीं होता। कार्ममल प्रारब्ध रूप है। जब प्रारब्ध का पूर्णतया क्षय हो जाता है, तब शरीर छूट जाता है। उसके अनन्तर पौरुष ज्ञान का उदय होता है। इस विषय में क्रम इस प्रकार है। दीक्षा, पौरुष अज्ञान का नाश, अद्वय आगम शास्त्र के श्रवण का अधिकार, बौद्ध ज्ञान का उदय, बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति, जीवन्मुक्ति, भोग के द्वारा प्रारब्ध का नाश, देहपात के अनन्तर पौरुष ज्ञान का उदय, स्वरूप प्राप्ति। बौद्ध अज्ञान दो प्रकार है---- (१) तात्त्विक स्वरूप के अनिश्चयात्मक अज्ञान। (२) अनात्म वस्तुओं में आत्मबोध रूप विपरीत निश्चयात्मक अज्ञान। परमेश्वर द्वारा भाषित शास्त्रों का श्रवण तथा मनन से बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति होती है और वस्तुओं का तात्त्विक स्वरूप हृदय में प्रतिफलित होता है।
४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १ ज्ञान है, यही संसार का मूलकारण है—मल के निरूपण करते समय हम इस की आलोचना करेंगे । ( इन दोनों अज्ञानों में ) पौरुष अज्ञान दीक्षा आदि से निवृत्त होने पर भी, दीक्षा भी बुद्धिनिष्ठ अनध्यवसायात्मक अज्ञान के रहते हुए सम्भव नहीं होती—क्यों कि देह तथा उपादेय के निश्चय पहले होने पर ही तत्त्वों के शोधन के अनन्तर शिवयोजनरूप दीक्षा सम्भव होती । उसमें अध्यवसायत्मक बुद्धिनिष्ठ ज्ञान ही मुख्य माना जाता है जिसके पुनः पुनः अभ्यास से पौरुष अज्ञान का नाश होता है । विकल्पज्ञान के पुनः पुनः अभ्यास से अन्त में अविकल्पात्मक ज्ञान का उदय होता है । विकल्प के द्वारा असंकुचित संवित्-प्रकाशमय आत्मा ही शिवस्वभाव है इसलिए सब प्रकार से समस्त वस्तुनिष्ठ सम्यक् निश्चयात्मक ज्ञान ही उपादेय है । वह (ज्ञान) शास्त्रज्ञान पर आधारित है। परमेश्वर के द्वारा भाषित ज्ञान ही प्रमाण है ।¹ अपरशास्त्रों में आलोचित तत्त्वसमूह एक दूसरों से पृथक् रूप में स्वीकृत हुआ है और उन तत्त्वों से अतिरिक्त पूर्णप्रथा का निरूपण प्रमाणरूपी युक्ति द्वारा हुआ भी है, इसलिए अपर आगमों ( शास्त्रों ) से आलोचित ज्ञान² कुछ दूर तक ही बन्धन के निवृत्ति में सहायक है, सब से नहीं । सब से मुक्त करनेवाला परमेश्वर शास्त्र ही है जो पञ्चस्रोतमय³, दश, अष्टादश तथा चौषष्ठी प्रकार भेदों से भिन्न है । उन सब के सार त्रिक शास्त्र है और उनमें मुख्य मालिनीविजय तन्त्र है । उसमें निहित विषयों के संकलन १. अपर शास्त्रों से बौद्ध वैष्णवादि शास्त्रों को समझना चाहिए । २. अन्य आगमों के मनन से उन-उन तत्त्वों से मुक्ति मिलती है—जैसे सांख्य तथा पतञ्जलि सम्मत सिद्धान्त के अनुशीलन से प्रकृति कैवल्य हो सकता है लेकिन प्रकृति से ऊपर माया से छुटकारा नहीं मिलता । ३. पंचस्रोतोमय कहने का तात्पर्य यह है कि शास्त्रों का अवतरण परमेश्वर के चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया रूपी जो पाँच मुख हैं जो वस्तुतः उनकी पाँच शक्तियां है जो शिव के ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव तथा अघोर रूपी पाँच मुखों से सम्बन्धित हैं। पहले पाँच आगमों का अवतरण होता है । इन आगमों में कुछ भेदप्रधान, कुछ भेदाभेदप्रधान और कुछ अभेद प्रधान है । भेद प्रधान आगमों की संख्या दस हैं, भेदाभेद प्रधान आगमों की संख्या अठारह और अभेद प्रधान आगमों की संख्या ६४ हैं ।
२. आह्निक ५-१०: आणवोपाय, चक्र-विचार एवं काल-संकर्षण
आ. १] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [५ अज्ञानं किल बन्धहेतुरुदितः शास्त्रे मलं तत्स्मृतं पूर्णज्ञानकलोदये तदखिलं निर्मूलतां गच्छति । ध्वस्ताशेषमलात्मसंविदुदये मोक्षश्च तेनामुना शास्त्रेण प्रकटीकरोमि निखिलं यज्ज्ञेयतत्त्वं भवेत् ॥४॥ उपोद्घात तत्र इह स्वभाव एव परमोपादेयः, स च सर्वभावानां प्रकाशरूप एव अप्रकाशस्य स्वभावतानुपपत्तेः, स च नानेकः प्रकाशस्य तदितरस्वभा- वानुप्रवेशायोगे स्वभावभेदाभावात्; देशकालावपि च अस्य न भेदकौ, तयोरपि तत्प्रकाशस्वभावत्वात्, इति एक एव प्रकाशः, स एव च संवित्, अर्थप्रकाशरूपा हि संवित् इति सर्वेषामत्र अविवाद एव । स च प्रकाशो न परतन्त्रः, प्रकाश्यतैव हि पारतन्त्र्यम्, प्रकाश्यता च प्रकाशान्तरापे- क्षितैव, न च प्रकाशान्तरं किंचित् अस्ति इति स्वतन्त्र एकः प्रकाशः, स्वातन्त्र्यादेव च देशकालाकारावच्छेदविरहात् व्यापको नित्यः सर्वा- कारनिराकारस्वभावः, तस्य च स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः, तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः, प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः, आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः, सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः इत्येवं मुख्याभिः शक्तिभिः युक्तोऽपि वस्तुत इच्छाज्ञानक्रियाशक्तियुक्तः अनवच्छिन्नः प्रकाशो निजानन्दविश्रान्त शिव- रूपः, स एव स्वातन्त्र्यात् आत्मानं संकुचितम् अवभासयन् अणुरिति उच्यते । पुनरपि च स्वात्मानं स्वतन्त्रतया प्रकाशयति, येन अनवच्छिन्न- प्रकाशशिवरूपतयैव प्रकाशते । तत्रापि स्वातन्त्र्यवशात् अनुपायमेव स्वात्मानं प्रकाशयति सोपायं वा, सोपायत्वेऽपि इच्छा वा ज्ञानं वा क्रिया वा अभ्युपाय इति त्रैविध्यं शाम्भवशाक्ताणवभेदेन समावेशस्य, तत्र चतुर्विधमपि एतद्रूपं क्रमेण अत्र उपदिश्यते । आत्मा प्रकाशवपुरेष शिवः स्वतन्त्रः स्वातन्त्र्यनिर्भरभसेन निजं स्वरूपम् । संच्छाद्य यत्पुनरपि प्रथयेत पूर्णं तच्च क्रमाक्रमवशादथवा त्रिभेदात् ॥५॥
६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १ एहु पआसऊउ अत्ताणत सच्छन्दउ ढक्कइ णिअऊउ । पूणु पअढइ झठि अह कमवस्व एहत परमथीण शिवरसु ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्य विरचिते तन्त्रसारे विज्ञानभेद प्रकाशनं नाम प्रथममाह्निकम् ॥१॥
आ. १ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ७ कर एक स्थान में उपस्थित कर देना कठिन है । वस्तुतत्त्व का सही निरूपण हुए बिना उसे मुक्तता या मोचक कहा नहीं जा सकता । विशुद्ध ज्ञान का ही यही वास्तविक स्वरूप है । निज स्वरूप में ज्ञान के अभ्यास से ज्ञानमूलक परमपुरुषार्थ लाभ होता है । अतः उसकी सिद्धि के लिए शास्त्र का आरम्भ हो रहा है । शास्त्रों में अज्ञान जो बन्धन के कारण के रूप में वर्णित हुआ है मल रूप १ है । पूर्ण ज्ञानरूपी कला के उदय से वह निखिल मल निर्मूल हो जाता है । मलों का पूर्णतया नाश होने पर आत्मसंविद् के उदय से मोक्ष अधिगत होता है । मैं इस शास्त्र के द्वारा निखिल ज्ञेय तत्त्वों का प्रकट करूँगा ॥४॥ उपोद्घात इस शास्त्र में स्वभाव ही परम उपादेय वस्तु है । वह स्वभाव सब अस्तित्वशील विषयों का प्रकाशरूपी है, जो अप्रकाश है उसे स्वभाव कहना अनुपपन्न है । यह प्रकाश अनेक नहीं (अपितु एक है) । प्रकाश से भिन्न कोई स्वभाव में अनुप्रवेश के अभाव से अर्थात् स्वभाव में कोई भेद न होने के कारण (स्वभाव एक है ) । देश और काल भी उसका भेदक नहीं क्यों कि वे दोनों उस प्रकाशक के ही स्वभाव हैं । अतः वह एक ही है—वह है संवित् । विषयों का प्रकाशक वस्तुतः संवित् है—इस विषय में सभी की सम्मति है । वह प्रकाश अन्य के अधीन नहीं है, प्रकाश्यता ही परतन्त्रता है, क्यों कि प्रकाश्यता दूसरे प्रकाश के मुखापेक्षी है । अन्य कोई प्रकाश नहीं है, इसलिए स्वतन्त्र एक ही प्रकाश विराजमान है। स्वतन्त्र होने के कारण देश, काल तथा आकार आदि से उसमें परिच्छिन्नता नहीं आ सकती, अतः उसमें उसका अभाव है, इसलिए वह व्यापक, नित्य साकार तथा निराकार आदि स्वभाव है । उसकी स्व- तन्त्रता आनन्दशक्ति, आनन्द का चमत्कार इच्छाशक्ति, प्रकाशरूपता चिच्छक्ति, आमर्शकता ज्ञानशक्ति, सब आकारों से युक्त होना क्रियाशक्ति- इस प्रकार मुख्य शक्तियों से युक्त रहते हुए भी वस्तुतः इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया शक्ति से युक्त अपरिच्छिन्न प्रकाश अपने आनन्द स्वरूप में १. मल आणव, मायीय और कार्म आदि के भेद से तीन प्रकार है । ये तीनों अज्ञान रूपी हैं ।
८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १ स्थित शिवरूप हैं। वह अपने स्वातन्त्र्य के बल से अपने को संकुचित रूप में आभासित करते हैं इसलिए वह अणु कहलाते हैं। फिर वे अपनी आत्मा को स्वतन्त्रतावश प्रकाशित करते हैं ताकि अनवच्छिन्न प्रकाश रूप शिवत्व प्रकाशित हो उठे। वह अपनी स्वतन्त्रता को बिना किसी उपाय के (अनुपाय) निज आत्मा को प्रकाशित करते हैं या किसी उपाय के द्वारा ? उपाय होते हुए इच्छा या ज्ञान या क्रिया कोई भी उपाय बन सकता है, इसलिए समावेश शाम्भव, शाक्त, आणव आदि के भेद से तीन प्रकार हैं—इन चार प्रकार के उपायों का स्वरूप क्रमशः यहाँ उपदेश किया जा रहा है। प्रकाश-विग्रह आत्मस्वरूप शिव जो स्वतन्त्र स्वभाव हैं स्वातन्त्र्य लीलारस के आस्वादन के लिए अपने स्वरूप को ढक कर, फिर अपना पूर्ण स्वरूप को प्रकाशित करते हैं—यह प्रकाशन क्रम तथा अक्रम में या तीन उपायों के द्वारा होता है ॥५॥ यह प्रकाशरूपी आत्मा जो स्वच्छन्द हैं निज स्वरूप ढक देते हैं फिर अकस्मात् उस परमार्थ शिवरूप अमृत को अक्रम या क्रम के बिना प्रकाशित करते हैं। श्रीमदभिनवगुप्त विरचित विज्ञानभेद प्रदर्शन नामक प्रथम आह्निक समाप्त।
अथ द्वितीयमाह्निकम् अथ अनुपायमेव तावत् व्याख्यास्यामः । यदा खलु दृढशक्तिपाताविद्धः स्वयमेव इत्थं विवेचयति सकृदेव गुरुवचनम् अवधार्य, तदा पुनरुपायविरहितो नित्योदितः अस्य समावेशः । अत्र च तर्क एव योगाङ्गम् इति कथं विवेचयति इति चेत्, ? उच्यते— योऽयं परमेश्वरः स्वप्रकाशरूपः स्वात्मा तत्र किम् उपायेन क्रियते, न स्वरूपलाभो नित्यत्वात्, न ज्ञप्तिः स्वयंप्रकाशमानत्वात्, न आवरण- विगमः आवरणस्य कस्यचिदपि असंभवात्, न तदनुप्रवेशः अनुप्रवेष्टुः व्यतिरिक्तस्य अभावात् । कश्चात्र उपायः तस्यापि व्यतिरिक्तस्य अनुप- पत्तेः, तस्मात् समस्तमिदमेकं चिन्मात्रतत्त्वं कालेन अकलितं देशेन अपरिच्छिन्नम्, उपाधिभिरम्लानम्, आकृतिभिरनियन्त्रितं, शब्दैरसंदिष्टं, प्रमाणैरप्रपञ्चितं, कालादेः प्रमाणपर्यन्तस्य स्वेच्छयैव स्वरूपलाभनिमित्तं च, स्वतन्त्रं आनन्दघनं तत्त्वं, तदेव च अहम् तत्रैव अन्तर्मयि विश्वं प्रतिबिम्बितम् एवं दृढं विविञ्चानस्य शश्वदेव पारमेश्वरः समावेशो निरुपायक एव, तस्य च न मन्त्र-पूजा-ध्यान-चर्यादिनियन्त्रणा काचित् । उपायजालं न शिवं प्रकाशयेद् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः । विवेचयन्नित्थमुदारदर्शनः स्वयं प्रकाशं शिवमाविशेत्क्षणात् ॥६॥ जहि जहि फुरण फुरइ सो सअलउ परमेसरु भासइ मइ अमलउ । अत्ता नत सो श्चिव परमत्थिण इअ जानअ कञ्ज परमत्थिण ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे अनुपायप्रकाशनं नाम द्वितीयमाह्निकम् ॥२॥
१० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २ अब अनुपाय१ की व्याख्या करेंगे । जब कोई पुरुष जिसमें तीव्र शक्तिपात हुआ हो केवल एक ही बार गुरु के वचन से सत्य स्वरूप को हृदयंगम करते हुए इस प्रकार विचार करने लगता है, उस समय बिना किसी उपाय से ही उसे नित्योदित समावेश प्राप्त हो जाता है। इस विषय में शंका उठती है कि तर्क ही यहाँ योग का अङ्ग है—तब ग्रन्थकार कहते हैं—जो स्वप्रकाश परमेश्वर निज आत्मस्वरूप है उस विषय में उपाय क्या कर सकता है—उस से ( उपाय से ) स्वरूप का लाभ नहीं होता क्योंकि ( स्वरूप ) नित्य है, स्वरूप का ज्ञान भी उससे नहीं होता क्योंकि वह स्वयं प्रकाशमान हैं, न तो आवरण को दूर हटाना है क्योंकि किसी प्रकार आवरण की सत्ता की भी सम्भावना नहीं है, उसमें ( स्वरूप में ) अनुप्रवेश करने वाला उनसे भिन्न किसी की उपपत्ति नहीं हो सकती। इसलिए यह जो कुछ है वह एक मात्र चिद्रूप तत्त्व है जो काल के कलन के अतीत, देश के द्वारा अपरिच्छिन्न तथा उपाधि से अमलिन, कोई नियत आकार के द्वारा अनियन्त्रित, शब्द के द्वारा कहे जाने के अयोग्य हैं, वे प्रमाणों से १. परमार्थ स्वरूप की प्राप्ति का साधन ही उपाय शब्द का अर्थ है। उपाय ही उपेय प्राप्ति का सहायक है। इन उपायों में कुछ अनायास उपेय वस्तु को उपलब्ध कराता है और कुछ उतनी सरलता से नहीं, इसका कारण शक्ति- पात की तीव्रता का तर तम भाव है। भगवत् कृपाशक्ति का संचार जिन आधारों में तीव्र-तीव्र रूप में होता है उनमें विकल्प कलंक का लेश भी नहीं रहता, इसलिए उन्हें भावना आदि की आवश्यकता नहीं रहती। जो परम तत्त्व है वही अपना स्वरूप है-गुरु के उपदेश से एक बार यह सुनने से योगी में स्वरूप सम्बन्धी परम निष्ठा उत्पन्न हो जाती है और इसके फलस्वरूप पूर्णानन्द-चमत्कारघन आनन्दशक्ति में योगी विश्रान्त हो जाते हैं। उन्हें किसी प्रकार मन्त्र, ध्यान, जप, प्राणायाम आदि की आवश्यकता नहीं होती। वे अपने स्वरूप में ही समग्र विश्व को दर्शन करते हैं। बिना किसी क्रम के उन्हें तत्त्व-साक्षात्कार हो जाता है। इस प्रकार अनुपाय समावेश प्राप्त भाग्यशाली योगी के निकट समग्र भावमण्डल ऐसा लगता है कि यह सब मुझसे ही उदित और मुझमें विलीन हो रहा है और यह मेरा ही स्वरूप है।
आ. २ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११ प्रमाणित नहीं किये जा सकते । ( अथच ) काल से प्रमाण तक विषयों के अवभासक तथा उनकी इच्छा से वे भी ( काल आदि ) उनके स्वरूप लाभ का हेतु हैं। वह स्वतन्त्र आनन्दघन तत्त्व हैं—मैं भी वही हूँ। उन्हीं में जो मेरे हृदय के अन्त स्थल में यह विश्व प्रतिबिम्बित हो रहा है। इस प्रकार दृढ़ विचार करने वाले का परमेश्वर सम्बन्धी समावेश बिना उपाय से ही होता है, ऐसे पुरुष को मन्त्र, पूजा, ध्यान, चर्चा आदि किसी प्रकार नियन्त्रण नहीं रहता । उपाय समूहों से शिव प्रकाशित नहीं होता, क्या सहस्र किरण सूरज जड़ घट से प्रकाशित होता ? उदार दृष्टि वाले इस प्रकार विचार करते हुए स्वयंप्रकाश शिवसमावेश क्षण भर में ही प्राप्त करते हैं ॥६॥ जो कुछ स्फुरण स्फुरित हो रहे हैं वही मेरे भीतर सकल अथच अमल परमेश्वर ही भासित हो रहे हैं। वही मेरी आत्मा हैं। परमार्थरूप से इस प्रकार जानकर मुझे और कुछ कार्य करना नहीं है। इति तन्त्रसार द्वितीय आह्निक
अथ तृतीयमाह्निकम् अथ शाम्भवोपायः यदेतत् प्रकाशरूपं शिवतत्त्वम् उक्तम्, तत्र अखण्डमण्डले यदा प्रवेष्टुं न शक्नोति, तदा स्वातन्त्र्यशक्तिमेव अधिकां पश्यन् निर्विकल्पमेव भैरवसमावेशम् अनुभवति, अयं च अस्य उपदेशः,—सर्वमिदं भावजातं बोधगगने प्रतिबिम्बमात्रं प्रतिबिम्बलक्षणोपेतत्वात्, इदं हि प्रतिबिम्बस्य लक्षणं—यत् भेदेन भासितम् अशक्तम् अन्यव्यामिश्रत्वेनैव भाति तत् प्रतिबिम्बम्, मुखरूपमिव दर्पणे, रस इव दन्तोदके, गन्ध इव घ्राणे, मिथुनस्पर्श इव आनन्देन्द्रिये, शूलकुन्तादिस्पर्शो वा अन्तःस्पर्शनेन्द्रिये, प्रतिश्रुत्केव व्योम्नि । न हि स रसो मुख्यः तत्कार्यव्याधिशमनाद्यदृष्टेः । नापि गन्धस्पर्शौ मुख्यौ, गुणिनः तत्र अभावे तयोर्योगात् कार्यपरम्पराना- रम्भात् च । न च तौ न स्तः देहोद्धूलनविसर्गादिदर्शनात् । शब्दोऽपि न मुख्यः, कोऽपि वक्ति इति आगच्छन्त्या इव प्रतिश्रुत्कायाः श्रवणात् । एवं यथा एतत् प्रतिबिम्बितं भाति तथैव विश्वं परमेश्वरप्रकाशे । ननु अत्र बिम्बं किं स्यात् ?, माभूत् किंचित् । ननु किम् अकारणं तत् ? हन्त तर्हि हेतुप्रश्नः —तत् किं बिम्बवाचोयुक्त्या, हेतुश्च परमेश्वरशक्तिरेव स्वातन्त्र्यापरपर्याया भविष्यति, विश्वप्रतिबिम्बधारित्वाच्च विश्वात्मकत्वं भगवतः, संविन्मयं हि विश्वं चैतन्यस्य व्यक्तिस्थानम् इति, तदेव हि विश्वम् अत्र प्रतीपम् इति प्रतिबिम्बधारित्वम् अस्य, तच्च तावत् विश्वात्मकत्वं परमेश्वरस्य स्वरूपं न अनामृष्टं भवति, चित्स्वभावस्य स्वरूपानामर्शनानुपपत्तेः । स्वरूपानामर्शने हि वस्तुतो जडतैव स्यात्, आमर्शश्च अयं न सांकेतिकः, अपि तु चित्स्वभावतामात्रनान्तरीयकः परनादगर्भ उक्तः, स च यावान् विश्वव्यवस्थापकः परमेश्वरस्य शक्ति- कलापः तावन्तम् आमृशति । तत्र मुख्यास्तावत् तिस्रः परमेश्वरस्य शक्तयः—अनुत्तरःइच्छा-उन्मेष इति, तदेव परामर्शत्रयम् अ-इ-उ इति, एतस्मादेव त्रितयात् सर्वः शक्तिप्रपञ्चः चर्च्यते, अनुत्तर एव हि विश्रान्ति- रानन्दः, इच्छायामेव विश्रान्तिः ईशनम्, उन्मेष एव हि विश्रान्तिरूर्मिः यः क्रियाशक्तेः प्रारम्भ, तदेव परामर्शत्रयं आ-ई-ऊ इति । अत्र च प्राच्यं
[आ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३
परामर्शत्रयं प्रकाशभागसारत्वात् सूर्यात्मकं, चरमं परामर्शत्रयं विश्वा- न्तिस्वभावाह्लादप्राधान्यात् सोमात्मकम्, इयति यावत्कर्मांशस्य अनु- प्रवेशो नास्ति। यदा तु इच्छायाम् ईशने च कर्म अनुप्रविशति यत् तत् इष्यमाणम् ईश्यमाणम् इति च उच्यते, तदा अस्य द्वौ भेदौ प्रकाशमात्रेण रश्रुतिः, विश्रान्त्या लश्रुतिः, रलयोः प्रकाशस्तम्भस्वभावत्वात्, इष्यमाणं च न बाह्यवत् स्फुटम्, स्फुटरूपत्वे तदेव निर्माणं स्यात्, न इच्छा ईशनं वा, अतः अस्फुटत्वात् एव श्रुतिमात्रं रलयोः, न व्यञ्जनवत् स्थितिः। तदेतद्वर्णचतुष्टयं उभयच्छायाधारित्वात् नपुंसकम्—ऋ-ॠ-लृ-लॄ इति। अनुत्तरानन्दयोः इच्छादिषु यदा प्रसरः तदा वर्णद्वयम् ए-ओ इति। तत्रापि पुनरनुत्तरानन्दसंघट्टात् वर्णद्वयम् ऐ-औ इति। सा इयं क्रिया- शक्तिः, तदेव च वर्णचतुष्टयम् ए-ऐ ओ-औ इति। ततः पुनः क्रियाशक्त्यन्ते सर्वं कार्यभूतं यावत् अनुत्तरे प्रवेश्यति, तावदेव पूर्वं संवेदनसारतया प्रकाशमात्रत्वेन बिन्दुतया आस्ते—अमिति। ततस्तत्रैव अनुत्तरस्य विसर्गो जायते—अः इति। एवं षोडशकं परामर्शानां बीजस्वरूपम् उच्यते। तदुत्थं व्यञ्जनात्मकं योनिरूपम्। तत्र अनुत्तरात् कवर्गः, शुद्धायाः इच्छायाः चवर्गः सकर्मिकाया इच्छाया द्वौ टवर्गस्तवर्गश्च, उन्मेषात् पवर्गः—शक्तिपञ्चकयोगात् पञ्चकत्वम्। इच्छाया एव त्रिवि- धाया य-र-लाः, उन्मेषात् वकारः, इच्छाया एव त्रिविधायाः श-ष-साः, विसर्गात् हकारः, योनिसंयोगजः क्षकारः। इत्येवम् एष भगवान् अनुत्तर एव कुलेश्वररूपः। तस्य च एकैव कौलिकी विसर्गशक्तिः, यथा आनन्द- रूपात् प्रभृति इयता बहिःसृष्टिपर्यन्तेन प्रस्पन्दतः वर्गादिपरामर्शा एव बहिस्तत्त्वरूपतां प्राप्ताः। स च एष विसर्गस्त्रिधा, आणवः चित्तविश्रान्ति- रूपः, शाक्तः चित्तसम्बोधलक्षणः, शांभवः चित्तप्रलयरूपः इति। एवं विसर्ग एव विश्वजनने भगवतः शक्तिः। इत्येवम् इयतो यदा निर्विभाग- तया एव परामर्शः तदा एक एव भगवान्, बीजयोनितया भागशः परामर्शो शक्तिमान् शक्तिश्च। पृथक् अष्टकपरामर्शो चक्रेश्वरसाहित्येन नववर्गः, एकैकपरामर्शप्राधान्ये पञ्चाशदात्मकता। तत्रापि संभवद्भाग- भेदपरामर्शने एकाशीतिरूपत्वम्। वस्तुतस्तु षट् एव परामर्शाः, प्रस- रणप्रतिसंहरणयोगेन द्वादश भवन्तः परमेश्वरस्य विश्वशक्तिपूर्णत्वं पुष्णन्ति। ता एव एताः परामर्शरूपत्वात् शक्तयो भगवत्यः श्रीकालिका इति निरुक्ताः। एते च शक्तिरूपा एव शुद्धाः परामर्शाः शुद्धविद्यायां परापररूपत्वेन मायोन्मेषमात्रसंकोचात् विद्याविद्येश्वररूपतां भजन्ते।