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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

अध्याय - ८ which cause (and which are caused by) the passions and quasi-passions, the subtypes of the passions² and the quasi-passions³ being sixteen and nine respectively. नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥१०॥ [ नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ] नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु – ये चार भेद आयुकर्म के हैं। (The life-karmas determine the quantum of life in the states of existence as) infernal beings, plants and animals, human beings, and celestial beings. गतिजातशरीरांगोपांगनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थान- संहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपघात- परघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥११॥ ² The passions are four – anger, pride, deceitfulness, and greed. Each of these four is further divided into four classes, namely that which leads to infinite births, that which hinders partial abstinence, that which disturbs complete self-restraint, and that which interferes with perfect conduct. Thus the passions make up sixteen. ³ The quasi-passions are nine, namely laughter, liking, disliking, sorrow, fear, disgust, the male sex-passion, the female sex-passion, and the neuter sex-passion. 118

अध्याय - ८ [ गतिजातिशरीरांगोपांगनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थान- संहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपघात- परघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः ] गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास और विहायोगति - ये इक्कीस, तथा [ प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि ] प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, सुस्वर, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय और यशःकीर्ति - ये दस तथा इनसे उलटे दस अर्थात् साधारण शरीर, स्थावर, दुर्भग, दुस्वर, अशुभ, बादर (-स्थूल), अपर्याप्ति, अस्थिर, अनादेय और अपयशःकीर्ति - ये दस, [ तीर्थकरत्वं च ] और तीर्थकरत्व, इस तरह नामकर्म के कुल ब्यालीस भेद हैं। The name (physique-making) karmas comprise the state of existence, the class, the body, the chief and secondary parts, formation, binding (union), molecular interfusion, structure, joint, touch, taste, odour, colour, movement after death, neither heavy nor light, self-annihilation, annihilation by others, emitting warm splendour, emitting cool lustre, respiration, gait, individual body, mobile being, amiability, a melodious voice, beauty of form, minute body, complete development (of the organs), firmness, lustrous body, glory and renown, and the •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• 119

अध्याय - ८ opposites of these (commencing from individual body), and Tīrthakaratva. उच्चैर्नीचैश्च ॥१२॥ [ उच्चैर्नीचैश्च ] उच्चगोत्र और नीचगोत्र - ये दो भेद गोत्र कर्म के हैं। The high and the low. दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥१३॥ [ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ] दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय - ये पाँच भेद अन्तराय कर्म के हैं। प्रकृतिबन्ध के उपभेदों का वर्णन यहाँ पूर्ण हुआ। The obstructive karmas are of five kinds, obstructing the making of gifts, gain, enjoyment of consumable things, enjoyment of non-consumable things, and effort (energy). आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥ 120

अध्याय - ८ [ आदितस्तिसृणाम् ] आदि से तीन अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, तथा वेदनीय [ अन्तरायस्य च ] और अन्तराय - इन चार कर्मों की [ परा स्थितिः ] उत्कृष्ट स्थिति [ त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः ] तीस कोड़ाकोड़ी सागर की है। The maximum duration of the three main types (primary species) from the first and obstructive karmas is thirty sāgaropama kotīkotī. सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥ [ मोहनीयस्य ] मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति [ सप्ततिः ] सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर की है। Seventy sāgaropama kotīkotī is the maximum duration of the deluding karmas. विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥ [ नामगोत्रयोः ] नाम और गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति [ विंशतिः ] बीस कोड़ाकोड़ी सागर की है। Twenty sāgaropama kotīkotī is the maximum duration of the name-karma and the status- determining karma. 121

अध्याय - ८ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥१७॥ [ आयुषः ] आयु कर्म का उत्कृष्ट स्थिति [ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि ] तेंतीस सागर की है। Thirty-three sāgaropamas is the maximum duration of life. अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्य ॥१८॥ [ वेदनीयस्य अपरा ] वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति [ द्वादशमुहूर्ता ] बारह मुहूर्त की है। The minimum duration of the feeling-producing karma is twelve muhūrtas. नामगोत्रयोरष्टौ ॥१९॥ [ नामगोत्रयोः ] नाम और गोत्र कर्म की जघन्य स्थिति [ अष्टौ ] आठ मुहूर्त की है। The minimum duration of the name-karma and the status-determining karma is eight muhūrtas. शेषाणामन्तर्मुहूर्ता ॥२०॥ 122

अध्याय - ८ [ शेषाणां ] बाकी के अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय और आयु - इन पाँच कर्मों की जघन्य स्थिति [ अन्तर्मुहूर्ता ] अन्तर्मुहूर्त की है। The minimum duration of the rest is up to one muhūrta. विपाकोऽनुभवः ॥२१॥ [ विपाकः ] विविध प्रकार का जो पाक है [ अनुभवः ] सो अनुभव है। Fruition is the ripening or maturing of karmas. स यथानाम ॥२२॥ [ सः ] यह अनुभाग बन्ध [ यथानाम ] कर्मों के नाम के अनुसार ही होता है। (The nature of) fruition is according to the names of the karmas. ततश्च निर्जरा ॥२३॥ 123

अध्याय - ८ [ ततः च ] तीव्र, मध्यम या मन्द फल देने के बाद [ निर्जरा ] उन कर्मों की निर्जरा हो जाती है अर्थात् उदय में आने के बाद कर्म आत्मा से पृथक् हो जाते हैं। नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाह- स्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥२४॥ [ नामप्रत्ययाः ] ज्ञानावरणादि कर्म प्रकृतियों का कारण, [ सर्वतः ] सर्व तरफ से अर्थात् समस्त भावों में [ योगविशेषात् ] योग विशेष से [ सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः ] सूक्ष्म, एकक्षेत्रावगाहरूप स्थित [ सर्वात्मप्रदेशेषु ] और सर्व आत्मप्रदेशों में [ अनन्तानन्तप्रदेशाः ] जो कर्म पुद्गल के अनन्तानन्त प्रदेश हैं सो प्रदेशबन्ध है। 124

अध्याय - ८ सद्धेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥२५॥ [ सद्धेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि ] साता वेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम और शुभ गोत्र [ पुण्यम् ] ये पुण्य-प्रकृतियाँ हैं। अतोऽन्यत्पापम् ॥२६॥ [ अतःअन्यत् ] इन पुण्य-प्रकृतियों से अन्य अर्थात् असाता वेदनीय, अशुभ आयु, अशुभ नाम और अशुभ गोत्र [ पापम् ] ये पाप-प्रकृतियाँ हैं। ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः ॥ 125

अध्याय - ९ अथ नवमोऽध्यायः Stoppage and Shedding of Karma आस्रवनिरोधः संवरः ॥१॥ [ आस्रवनिरोधः ] आस्रव का रोकना सो [ संवरः ] संवर है अर्थात् आत्मा में जिन कारणों से कर्मों का आस्रव होता है उन कारणों को दूर करने से कर्मों का आना रुक जाता है उसे संवर कहते हैं। The obstruction of influx is stoppage (samvara). स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः ॥२॥ [ गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः ] तीन गुप्ति, पाँच समिति, दश धर्म, बारह अनुप्रेक्षा, बावीस परीषहजय और पाँच चारित्र - इन छः कारणों से [ सः ] संवर होता है। Stoppage (is effected) by control, carefulness, virtue, contemplation, conquest by endurance, and conduct. तपसा निर्जरा च ॥३॥ [ तपसा ] तप से [ निर्जरा च ] निर्जरा होती है और संवर भी होता है। 126

अध्याय - ९ By penance (austerity) dissociation also. सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४॥ [ सम्यग्योगनिग्रहो ] भले प्रकार योग का निग्रह करना सो [ गुप्तिः ] गुप्ति है। Curbing activity well is control (gupti). ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ॥५॥ [ ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः ] सम्यक् ईर्या, सम्यक् भाषा, सम्यक् एषणा, सम्यक् आदाननिक्षेप और सम्यक् उत्सर्ग – ये पाँच [ समितयः ] समिति हैं। (चौथे सूत्र का ‘सम्यक्’ शब्द इस सूत्र में भी लागू होता है।) Walking, speech, eating, lifting and laying down, and depositing waste products constitute the five- fold regulation of activities. उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्य- ब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥६॥ 127

अध्याय - ९ [ उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्य- ब्रह्मचर्याणि ] उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य - ये दस [ धर्मः ] धर्म हैं। Supreme forbearance, modesty, straightforward- ness, purity, truthfulness, self-restraint, austerity, renunciation, non-attachment, and celibacy constitute virtue or duty. अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरा- लोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्याततत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥ [ अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरा- लोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्याततत्त्वानुचिन्तनम् ] अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म - इन बारह के स्वरूप का बारम्बार चिन्तवन करना सो [ अनुप्रेक्षाः ] अनुप्रेक्षा है। Reflection is meditating on transitoriness, helpless- ness, transmigration, loneliness, distinctness, impurity, influx, stoppage, dissociation, the universe, rarity of enlightenment, and the truth proclaimed by religion. 128

अध्याय - ९ मार्गाच्चवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः ॥८॥ [ मार्गाच्चवननिर्जरार्थं ] संवर के मार्ग से च्युत न होने और कर्मों की निर्जरा के लिये [ परीषहाः परिषोढव्याः ] बाईस परीषह सहन करने योग्य हैं। (यह संवर का प्रकरण चल रहा है, अतः इस सूत्र में कहे गये 'मार्ग' शब्द का अर्थ 'संवर का मार्ग' समझना।) The afflictions are to be endured so as not to swerve from the path of stoppage of karmas and for the sake of dissociation of karmas. क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्या- शय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोगतृणस्पर्शमल- सत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ॥९॥ [ क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्या- शय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोगतृणस्पर्शमल- सत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ] क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्न्य, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कारपुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन, ये बाईस परीषह हैं। 129

अध्याय ८: बन्ध तत्व व अष्ट कर्म प्रकृतियाँ

अध्याय - ९ Hunger, thirst, cold, heat, insect-bites, nakedness, absence of pleasures, women, pain arising from roaming, discomfort of postures, uncomfortable couch, scolding, injury, begging, lack of gain, illness, pain inflicted by blades of grass, dirt, reverence and honour (good as well as bad reception), (conceit of) learning, despair or uneasiness arising from ignorance, and lack of faith (are the twenty-two hardships). सूक्ष्मसाम्परायच्छद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ॥१०॥ [ सूक्ष्मसाम्परायच्छद्मस्थवीतरागयो: ] सूक्ष्मसाम्पराय वाले जीवों के और छद्मस्थ वीतरागों के [ चतुदर्श ] 14 परीषह होती हैं। Fourteen afflictions occur in the case of the saints in the tenth and twelfth stages. एकादश जिने ॥११॥ [ जिने ] तेरहवें गुणस्थान में जिनेन्द्रदेव के [ एकादश ] ऊपर बतलाई गई चौदह में से अलाभ, प्रज्ञा और अज्ञान इन तीन को छोड़कर बाकी की ग्यारह परीषह होती हैं। Eleven afflictions occur to the Omniscient Jina. 130

अध्याय - ९ बादरसाम्पराये सर्वे ॥१२॥ [ बादरसाम्पराये ] बादरसाम्पराय अर्थात् स्थूलकषाय वाले जीवों के [ सर्वे ] सर्व परीषह होती हैं। All the afflictions arise in the case of the ascetic with gross passions. ज्ञानावरणे प्रज्ञाऽज्ञाने ॥१३॥ [ ज्ञानावरणे ] ज्ञानावरणीय के उदय से [ प्रज्ञाऽज्ञाने ] प्रज्ञा और अज्ञान ये दो परीषह होती हैं। Extraordinary learning and ignorance are caused by knowledge-covering karmas. दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ ॥१४॥ [ दर्शनमोहान्तराययोः ] दर्शनमोह और अन्तराय कर्म के उदय से [ अदर्शनालाभौ ] क्रम से अदर्शन और अलाभ परीषह होती हैं। Misbelief and lack of gain are caused by faith- deluding and obstructive karmas. 131

अध्याय - ९ चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशयाचना- सत्कारपुरस्काराः ॥१५॥ [ चारित्रमोहे ] चारित्रमोहनीय के उदय से [ नाग्न्यारतिस्त्री- निषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्काराः ] नग्नता, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कारपुरस्कार – ये सात परीषह होती हैं। (The afflictions of) nakedness, absence of pleasures, woman, sitting posture, reproach, begging, and reverence and honour, are caused by conduct- deluding karmas. वेदनीये शेषाः ॥१६॥ [ वेदनीये ] वेदनीय कर्म के उदय से [ शेषाः ] बाकी की ग्यारह परीषह अर्थात् क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श, और मल – ये परीषह होती हैं। The other afflictions are caused by feeling karmas. एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकोनविंशतिः ॥१७॥ [ एकस्मिन् युगपत् ] एक जीव के एक साथ [ एकादयो ] एक से लेकर [ आ एकोनविंशतिः ] उन्नीस परीषह तक [ भाज्याः ] जानना चाहिये। 132

अध्याय - ९ The afflictions can occur simultaneously from one to nineteen. सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराय- यथाख्यातमिति चारित्रम् ॥१८॥ [ सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराय- यथाख्यातम् ] सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात [ इति चारित्रम् ] इस प्रकार चारित्र के 5 भेद हैं। Equanimity, reinitiation, purity of non-injury, slight passion, and perfect conduct are the five kinds of conduct. अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्याग- विविक्तशय्यासनकायक्लेशा बाह्यं तपः ॥१९॥ [ अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्त- शय्यासनकायक्लेशा ] सम्यक् प्रकार से अनशन, सम्यक् अवमौदर्य, सम्यक् वृत्तिपरिसंख्यान, सम्यक् रसपरित्याग, सम्यक् विविक्तशय्यासन और सम्यक् कायक्लेश - ये [ बाह्यं तपः ] छः प्रकार के बाह्य तप हैं। 133

अध्याय - ९ (The external austerities are) fasting, reduced diet, special restrictions for begging food, giving up stimulating and delicious dishes, lonely habitation, and mortification of the body. प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥२०॥ [ प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानानि ] सम्यक् रूप से प्रायश्चित्त, सम्यक् विनय, सम्यक् वैयावृत्त्य, सम्यक् स्वाध्याय, सम्यक् व्युत्सर्ग और सम्यक् ध्यान [ उत्तरम् ] ये छः प्रकार के अभ्यन्तर तप हैं। Expiation, reverence, service, study, renunciation, and meditation are the internal austerities. नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदा यथाक्रमं प्राग्ध्यानात् ॥२१॥ [ प्राक् ध्यानात् ] ध्यान से पहले के पाँच तप के [ यथाक्रमं ] अनुक्रम से [ नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदाः ] नव, चार, दस, पाँच और दो भेद हैं अर्थात् सम्यक् प्रायश्चित के नव, सम्यक् विनय के चार, सम्यक् वैयावृत्त्य के दस, सम्यक् स्वाध्याय के पाँच और सम्यक् व्युत्सर्ग के दो भेद हैं। 134

अध्याय - ९ Prior to meditation, these are of nine, four, ten, five, and two kinds respectively. आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेद- परिहारोपस्थापनाः ॥२२॥ [ आलोचनाप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेद- परिहारोपस्थापनाः ] आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार, उपस्थापना, ये प्रायश्चित्त तप के नव भेद हैं। Confession, repentance, both, discrimination, giving up attachment to the body, penance, suspension, expulsion, and reinitiation. ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः ॥२३॥ [ ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः ] ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय और उपचारविनय – ये विनय तप के चार भेद हैं। Reverence to knowledge, faith, conduct, and the custom of homage. 135

अध्याय - ९ आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्ष्यग्लानगणकुलसंघसाधु- मनोज्ञानाम् ॥२४॥ [ आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्ष्यग्लानगणकुलसंघसाधु- मनोज्ञानाम् ] आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष्य, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ - इन दस प्रकार के मुनियों की सेवा करना सो वैयावृत्य तप के दस भेद हैं। Respectful service to the Head (ācārya), the preceptor, the ascetic, the disciple, the ailing ascetic, the congregation of aged saints, the congregation of disciples of a common teacher, the congregation of the four orders (of monks, nuns, laymen, and laywomen), the long-standing ascetic, and the saint of high reputation. वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः ॥२५॥ [ वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः ] वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश - ये स्वाध्याय के पाँच भेद हैं। Teaching, questioning, reflection, recitation, and preaching. 136

अध्याय - ९ बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥२६॥ [ बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ] बाह्य उपधिव्युत्सर्ग और अभ्यंतर उपधिव्युत्सर्ग - ये दो व्युत्सर्ग तप के भेद हैं। Giving up external and internal attachments. उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ॥२७॥ [ उत्तमसंहननस्य ] उत्तम संहनन वाले के [ आ अन्तर्मुहूर्तात् ] अन्तर्मुहूर्त तक [ एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम् ] एकाग्रतापूर्वक चिन्ता का निरोध सो ध्यान है। Concentration of thought on one particular object is meditation. In the case of a person with the best physical structure or constitution it extends up to one muhūrta. आर्तरौद्रधर्म्यशुक्लानि ॥२८॥ [ आतरौद्रधर्म्यशुक्लानि ] आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल - ये ध्यान के चार भेद हैं। 137