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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

अध्याय - १ तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४॥ [ इन्द्रियानिन्द्रिय ] इन्द्रियाँ और मन [ तत् ] उस मतिज्ञान के [ निमित्तम् ] निमित्त हैं। That is caused by the senses and the mind. अवग्रहेहावायधारणाः ॥१५॥ [ अवग्रह ईहा अवाय धारणाः ] अवग्रह, ईहा, अवाय, और धारणा यह चार भेद हैं। (The four divisions of sensory knowledge are) apprehension (sensation), speculation, perceptual judgment, and retention. बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥१६॥ [ बहु ] बहुत [ बहुविध ] बहुत प्रकार [ क्षिप्र ] जल्दी [ अनिःसृत ] अनिःसृत [ अनुक्त ] अनुक्त [ ध्रुवाणां ] ध्रुव [ सेतराणां ] उनसे उल्टे भेदों से युक्त अर्थात् एक, एकविध, अक्षिप्र, निःसृत, उक्त, और अध्रुव, इस प्रकार बारह प्रकार के पदार्थों का अवग्रह ईहादिरूप ज्ञान होता है। 7

अध्याय - १ (The subdivisions of each of these are) more, many kinds, quick, hidden, unexpressed, lasting, and their opposites. अर्थस्य ॥१७॥ उपरोक्त बारह अथवा 288 भेद [ अर्थस्य ] पदार्थ के (द्रव्य के - वस्तु के) हैं। (These are the attributes) of substances (objects). व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥१८॥ [ व्यञ्जनस्य ] अप्रगटरूप शब्दादि पदार्थों का [ अवग्रहः ] मात्र अवग्रह ज्ञान होता है, ईहादि तीन ज्ञान नहीं होते। (There is only) apprehension of indistinct things. न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥१९॥ व्यञ्जनावग्रह [ चक्षुः अनिन्द्रियाभ्याम् ] नेत्र और मन से [ न ] नहीं होता। 8

अध्याय - १ Indistinct apprehension does not arise by means of the eyes and the mind. श्रुतं मतिपूर्वं द्व्यनेकद्वादशभेदम् ॥२०॥ [ श्रुतम् ] श्रुतज्ञान [ मतिपूर्वं ] मतिज्ञान पूर्वक होता है अर्थात् मतिज्ञान के बाद होता है, वह श्रुतज्ञान [ द्व्यनेकद्वादशभेदम् ] दो, अनेक और बारह भेदवाला है। Scriptural knowledge preceded by sensory knowledge is of two kinds, which are of many and twelve subdivisions. भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम् ॥२१॥ [ भवप्रत्ययः ] भवप्रत्यय नामक [ अवधिः ] अवधिज्ञान [ देवनारकाणाम् ] देव और नारकियों के होता है। Clairvoyance (avadhi) based on birth is possessed by celestial and infernal beings. 9

अध्याय - १ क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥ [ क्षयोपशमनिमित्तः ] क्षयोपशमनैमित्तक अवधिज्ञान [ षड्विकल्पः ] अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित - ऐसे छह भेदवाला है, और वह [ शेषाणाम् ] मनुष्य तथा तिर्यंचों के होता है। Clairvoyance from destruction-cum-subsidence (i.e. arising on the lifting of the veil) is of six kinds. It is acquired by the rest (namely human beings and animals). ऋजुविपुलमती मनःपर्ययः ॥२३॥ [ मनःपर्ययः ] मनःपर्ययज्ञान [ ऋजुमतिविपुलमतिः ] ऋजुमति और विपुलमति दो प्रकार का है। Ṛjumati and vipulmati are the two kinds of telepathy (manahparyaya). विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥२४॥ [ विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां ] परिणामों की विशुद्धि और अप्रतिपात अर्थात् केवलज्ञान होने से पूर्व न छूटना [ तद्विशेषः ] इन दो बातों से ऋजुमति और विपुलमति ज्ञान में विशेषता (अन्तर) है। 10

अध्याय - १ The differences between the two are due to purity and infallibility. विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५॥ [ अवधिमनःपर्यययोः ] अवधि और मनःपर्ययज्ञान में [ विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः ] विशुद्धता, क्षेत्र, स्वामी और विषय की अपेक्षा से विशेषता होती है। Telepathy (manahparyaya) and clairvoyance (avadhi) differ with regard to purity, space, knower and objects. मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥२६॥ [ मतिश्रुतयोः ] मतिज्ञान और श्रुतज्ञान का [ निबंधः ] विषय-सम्बन्ध [ असर्वपर्यायेषु ] कुछ (न कि सर्व) पर्यायों से युक्त [ द्रव्येषु ] जीव पुद्गलादि सर्व द्रव्यों में है। The range of sensory knowledge and scriptural knowledge extends to all the six substances but not to all their modes. 11

अध्याय - १ रूपिष्ववधेः ॥२७॥ [ अवधेः ] अवधिज्ञान का विषय-सम्बन्ध [ रूपिषु ] रूपी द्रव्यों में है अर्थात् अवधिज्ञान रूपी पदार्थों को जानता है। The scope of clairvoyance is that which has form. तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ॥२८॥ [ तत् अनन्तभागे ] सर्वावधिज्ञान के विषयभूत रूपी द्रव्य के अनन्तवें भाग में [ मनःपर्ययस्य ] मनःपर्ययज्ञान का विषय-सम्बन्ध है। The scope of telepathy is the infinitesimal part of the matter ascertained by clairvoyance. सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥२९॥ [ केवलस्य ] केवलज्ञान का विषय-सम्बन्ध [ सर्वद्रव्य-पर्यायेषु ] सर्व द्रव्य और उनकी सर्व पर्याय हैं, अर्थात् केवलज्ञान एक ही साथ सभी पदार्थों को और उनकी सभी पर्यायों को जानता है। Omniscience (kevala jñāna) extends to all entities (substances) and all their modes simultaneously. 12

अध्याय - १ एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः ॥३०॥ [ एकस्मिन् ] एक जीव में [ युगपत् ] एक साथ [ एकदीनि ] एक से लेकर [ आचतुर्भ्यः ] चार ज्ञान तक [ भाज्यानि ] विभक्त करने योग्य हैं, अर्थात् हो सकते हैं। From one up to four kinds of knowledge can be possessed simultaneously by a single soul. मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥३१॥ [ मतिश्रुतावधयः ] मति, श्रुत और अवधि यह तीन ज्ञान [ विपर्ययश्च ] विपर्यय भी होते हैं। Sensory knowledge, scriptural knowledge and clairvoyance may also be erroneous knowledge. सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥३२॥ [ यदृच्छोपलब्धेः ] अपनी इच्छा से चाहे जैसा ग्रहण करने के कारण [ सत् असतोः ] विद्यमान और अविद्यमान पदार्थों का [ अविशेषात् ] भेदरूप ज्ञान (यथार्थ विवेक) न होने से [ उन्मत्तवत् ] पागल के ज्ञान की भाँति मिथ्यादृष्टि का ज्ञान विपरीत अर्थात् मिथ्याज्ञान ही होता है। 13

अध्याय - १ नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूता नयाः ॥३३॥ [ नैगम ] नैगम, [ संग्रह ] संग्रह, [ व्यवहार ] व्यवहार, [ ऋजुसूत्र ] ऋजुसूत्र, [ शब्द ] शब्द, [ समभिरूढ ] समभिरूढ, [ एवंभूता ] एवंभूत - यह सात [ नयाः ] नय हैं। ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥

अध्याय - २ अथ द्वितीयोऽध्यायः The Category of the Living औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥१॥ [ जीवस्य ] जीव के [ औपशमिकक्षायिकौ ] औपशमिक और क्षायिक [ भावौ ] भाव [ च मिश्रः ] और मिश्र तथा [ औदयिक-पारिणामिकौ च ] औदयिक और पारिणामिक यह पाँच भाव [ स्वतत्त्वम् ] निजभाव हैं अर्थात् यह जीव के अतिरिक्त दूसरे में नहीं होते। The distinctive characteristics of the soul are the dispositions (thought-activities) arising from subsidence, destruction, destruction-cum- subsidence of karmas, the rise of karmas, and the inherent nature or capacity of the soul. द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदाः यथाक्रमम् ॥२॥ उपरोक्त पाँच भाव [ यथाक्रमम् ] क्रमशः [ द्वि नव अष्टादश एकविंशति त्रिभेदाः ] दो, नव, अट्ठारह, इक्कीस और तीन भेद वाले हैं। 15

अध्याय - २ (These are of) two, nine, eighteen, twenty-one, and three kinds respectively. सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥ [ सम्यक्त्व ] औपशामिक सम्यक्त्व और [ चारित्रे ] औपशामिक चारित्र - इस प्रकार औपशामिकभाव के दो भेद हैं। (The two kinds are) right belief and conduct. ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥४॥ [ ज्ञान दर्शन दान लाभ भोग उपभोग वीर्याणि ] केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिकदान, क्षायिकलाभ, क्षायिकभोग, क्षायिकउपभोग, क्षायिकवीर्य तथा [ च ] च कहने पर, क्षायिकसम्यक्त्व और क्षायिकचारित्र - इस प्रकार क्षायिकभाव के नौ भेद हैं। (The nine kinds are) knowledge, perception, gift, gain, enjoyment, re-enjoyment, energy, etc. 16

अध्याय - २ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥ [ ज्ञान अज्ञान ] मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय यह चार ज्ञान तथा कुमति, कुश्रुत और कुअवधि ये तीन अज्ञान, [ दर्शन ] चक्षु, अचक्षु और अवधि ये तीन दर्शन, [ लब्धयः ] क्षायोपशमिक दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य ये पाँच लब्धियाँ [ चतुः त्रि त्रि पञ्च भेदाः ] इस प्रकार 4+3+3+5=15 भेद तथा [ सम्यक्त्व ] क्षायोपशमिक सम्यक्त्व [ चारित्र ] क्षायोपशमिक चारित्र [ च ] और [ संयमासंयमाः ] संयमासंयम - इस प्रकार क्षायोपशमिकभाव के 18 भेद हैं। (The eighteen kinds are) knowledge, wrong knowledge, perception, and attainment, of four, three, three, and five kinds, and right faith, conduct, and mixed disposition of restraint and non-restraint. गतिकषायलिंगमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्ध लेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकैकषड्भेदाः ॥६॥ 17

अध्याय - २ [ गति ] तिर्यंच, नरक, मनुष्य और देव – यह चार गतियाँ, [ कषाय ] क्रोध, मान, माया, लोभ - यह चार कषायें, [ लिंग ] स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुसंकवेद – यह तीन लिंग, [ मिथ्यादर्शन ] मिथ्यादर्शन [ अज्ञान ] अज्ञान [ असंयत ] असंयम [ असिद्ध ] असिद्धत्व तथा [ लेश्याः ] कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल – यह छह लेश्यायें, इस प्रकार [ चतुः चतुः त्रि एक एक एक एक षड् भेदाः ] 4+4+3+1+1+1+1+6=21, इस प्रकार सब मिलाकर औदयिकभाव के 21 भेद हैं। (These are) the conditions of existence, the passions, sex, wrong belief, wrong knowledge, non- restraint, non-attainment of perfection (imperfect disposition), and colouration, which are of four, four, three, one, one, one, one, and six kinds. जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥७॥ [ जीवभव्याभव्यत्वानि च ] जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व – इस प्रकार पारिणामिक भाव के तीन भेद हैं। (The three are) the principle of life (consciousness), capacity for salvation, and incapacity for salvation. 18

अध्याय - २ उपयोगो लक्षणम् ॥८॥ [ लक्षणम् ] जीव का लक्षण [ उपयोगः ] उपयोग है। Consciousness is the differentia (distinctive characteristic) of the soul. स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥९॥ [ सः ] वह उपयोग [ द्विविधः ] ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग के भेद से दो प्रकार का है, और वे क्रमशः [ अष्ट चतुः भेदः ] आठ और चार भेद सहित हैं अर्थात् ज्ञानोपयोग के मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय, केवल (यह पाँच सम्यग्ज्ञान) और कुमति, कुश्रुत तथा कुअवधि (यह तीन मिथ्याज्ञान) इस प्रकार आठ भेद हैं। तथा दर्शनोपयोग के चक्षु, अचक्षु, अवधि तथा केवल इस प्रकार चार भेद हैं। इस प्रकार ज्ञान के आठ और दर्शन के चार भेद मिलकर उपयोग के कुल बारह भेद हैं। Consciousness is of two kinds. And these in turn are of eight, and four kinds respectively. 19

अध्याय - २ संसारिणो मुक्ताश्च ॥१०॥ जीव [ संसारिणः ] संसारी [ च ] और [ मुक्ताः ] मुक्त - ऐसे दो प्रकार के हैं। कर्म सहित जीवों को संसारी और कर्म रहित जीवों को मुक्त कहते हैं। The transmigrating and the emancipated souls. समनस्काऽमनस्काः ॥११॥ संसारी जीव [ समनस्काः ] मनसहित-सैनी [ अमनस्काः ] मनरहित-असैनी, यों दो प्रकार के हैं। (The two kinds of transmigrating souls are those) with and without minds. संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥१२॥ [ संसारिणः ] संसारी जीव [ त्रस ] त्रस और [ स्थावराः ] स्थावर के भेद से दो प्रकार के हैं। The transmigrating souls are (of two kinds), the mobile and the immobile beings. 20

अध्याय - २ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥१३॥ [ पृथिवी अप् तेजः वायुः वनस्पतयः ] पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक

  • यह पाँच प्रकार के [ स्थावराः ] स्थावर जीव हैं। (इन जीवों के मात्र एक स्पर्शन इन्द्रिय होती है।) Earth, water, fire, air and plants are immobile beings. द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥१४॥ [ द्वीन्द्रिय आदयः ] दो इन्द्रिय से लेकर अर्थात् दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पाँच इन्द्रिय जीव [ त्रसाः ] त्रस कहलाते हैं। The mobile beings are from the two-sensed beings onwards. पश्चेन्द्रियाणि ॥१५॥ [ इन्द्रियाणि ] इन्द्रियाँ [ पञ्च ] पाँच हैं। The senses are five. 21

अध्याय - २ द्विविधानि ॥१६॥ सब इन्द्रियाँ [ द्विविधानि ] द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय के भेद से दो प्रकार की हैं। (The senses are of) two kinds. निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥१७॥ [ निर्वृत्ति उपकरणे ] निवृत्ति और उपकरण को [ द्रव्येन्द्रियम् ] द्रव्येन्द्रिय कहते हैं। The physical sense consists of accomplishment (of the organ itself) and means or instruments – (its protecting environment). लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् ॥१८॥ [ लब्धि उपयोगौ ] लब्धि और उपयोग को [ भावेन्द्रियम् ] भावेन्द्रिय कहते हैं। The psychic sense consists of attainment and consciousness. 22

अध्याय २: जीव द्रव्य के भेद, इन्द्रिय व प्राण

अध्याय - २ स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥१९॥ [ स्पर्शन ] स्पर्शन, [ रसन ] रसना, [ घ्राण ] नाक, [ चक्षुः ] चक्षु और [ श्रोत्र ] कान - यह पाँच इन्द्रियाँ हैं। Touch, taste, smell, sight, and hearing (are the senses). स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥२०॥ [ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः ] स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण (रंग), शब्द - यह पाँच क्रमशः [ तत् अर्थाः ] उपरोक्त पाँच इन्द्रियों के विषय हैं अर्थात् उपरोक्त पाँच इन्द्रियाँ उन-उन विषयों को जानती हैं। Touch, taste, smell, colour and sound are the objects of the senses. श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥२१॥ [ अनिन्द्रियस्य ] मन का विषय [ श्रुतम् ] श्रुतज्ञानगोचर पदार्थ हैं अथवा मन का प्रयोजन श्रुतज्ञान है। Scriptural knowledge is the province of the mind. 23

अध्याय - २ वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥२२॥ [ वनस्पति अन्तानाम् ] वनस्पतिकाय जिसके अन्त में है ऐसे जीवों के अर्थात् पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीवों के [ एकम् ] एक स्पर्शन इन्द्रिय ही होती है। Up to the end of plants (there is only) one sense. कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥२३॥ [ कृमिपिपीलिकाभ्रमर मनुष्यादीनाम् ] कृमि इत्यादि, चींटी इत्यादि, भ्रमर इत्यादि तथा मनुष्य इत्यादि के [ एकैक वृद्धानि ] क्रम से एक एक इन्द्रिय बढ़ती (अधिक-अधिक) है अर्थात् कृमि इत्यादि के दो, चींटी इत्यादि के तीन, भौंरा इत्यादि के चार और मनुष्य इत्यादि के पाँच इन्द्रियाँ होती हैं। The worm, the ant, the bee, and the man, etc., have each one more sense than the preceding one. संज्ञिनः समनस्काः ॥२४॥ [ समनस्काः ] मनसहित जीवों को [ संज्ञिनः ] सैनी कहते हैं। 24

अध्याय - २ The five-sensed beings with minds are called samjñī jīvas. विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥२५॥ [ विग्रहगतौः ] विग्रहगति में अर्थात् नये शरीर के लिये गमन में [ कर्मयोगः ] कार्मण काययोग होता है। In transit from one body to another, (there is) vibration of the karmic body only. अनुश्रेणि गतिः ॥२६॥ [ गतिः ] जीव पुद्गलों का गमन [ अनुश्रेणि ] श्रेणी के अनुसार ही होता है। Transit (takes place) in rows (straight lines) in space. अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥ [ जीवस्य ] मुक्त जीव की गति [ अविग्रहा ] वक्रता रहित सीधी होती है। 25

अध्याय - २ The movement of a (liberated) soul is without a bend. विग्रहवती च संसारिणः प्राक्चतुर्भ्यः ॥२८॥ [ संसारिणः ] संसारी जीव की गति [ चतुर्भ्यः प्राक् ] चार समय से पहिले [ विग्रहवती च ] वक्रता-मोड़ सहित तथा रहित होती है। The movement of the transmigrating souls is with bend also prior to the fourth instant. एकसमयाऽविग्रहा ॥२९॥ [ अविग्रहा ] मोड़ रहित गति [ एकसमया ] एक समय मात्र ही होती है अर्थात् उसमें एक समय ही लगता है। Movement without a bend (takes) one instant. एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ॥३०॥ विग्रहगति में [ एकं द्वौ वा त्रीन् ] एक दो अथवा तीन समय तक [ अनाहारकः ] जीव अनाहारक रहता है। 26