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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

१६ प्रशस्तपादभाष्यम्
उपादानों में से किसी एक में मादक शक्ति न रहने पर भी उस समूह से निर्मित
मदिरा में मादक शक्ति रहती है, उसी प्रकार पृथिवी प्रभृति पाँच भूतों में से
प्रत्येक में चैतन्य के न रहने पर भी उन पाँचों से निर्मित शरीर में चैतन्य रह
सकती है ।
शरीर को आत्मा न माननेवालों या शरीर में चैतन्य न माननेवालों का कहना
है कि शरीर को अगर चैतन्यत्वभाव का माना जाय तो फिर मृत शरीर में भी
चैतन्य मानना पड़ेगा; क्योंकि मृत शरीर भी तो शरीर ही है । अतः शरीर में
चैतन्य नहीं माना जा सकता । शरीर को चेतन मानने के पक्ष में दूसरी बाधा यह
उपस्थित होती है कि इस पक्ष में शरीर के प्रत्येक अवयव में चैतन्य मानना पड़ेगा ?
या फिर सम्पूर्ण शरीर में ? इन दोनों में से पहला पक्ष इसलिए नहीं मान सकते
कि शरीर के हाथ रूप अवयव के द्वारा अनुभूत विषय का उसके कट जाने पर
स्मरण नहीं हो सकेगा; क्योंकि स्मरण के प्रति जो पूर्वानुभव कारण है उसमें
समानकर्त्तृत्व भी आवश्यक है । अर्थात् जिस पुरुष को जिस विषय का पूर्व में
अनुभव रहेगा उसी पुरुष को उस अनुभवजनित उपयुक्त संस्कार के द्वारा समय
आने पर उस विषय का स्मरण होगा, किसी अन्य पुरुष को नहीं, जैसा कि
देवदत्त के पूर्वानुभव से यज्ञदत्त को स्मरण नहीं हो सकता । इस कार्यकारणभाव
के अनुसार शरीर के हाथ रूप अवयव केर द्वारा अनुभव के बाद उस हाथ रूप
अनुभविता के नष्ट हो जाने पर उस विषय का अगर स्मरण मानेंगे तो एक के
द्वारा अनुभूत विषय का स्मरण दूसरे से मानना पड़ेगा, अतः शरीर के प्रत्येक
अवयव में चैतन्य या ज्ञान नहीं माना जा सकता ।
एवं शरीर रूप अवयवी में भी चैतन्य नहीं माना जा सकता; क्योंकि प्रत्येक
अवयवी एक क्षण में उत्पन्न होकर दूसरे क्षण में रहकर तीसरे क्षण में नष्ट हो
जाता है । आगे फिर इसी प्रकार उत्पत्ति और विनाश का क्रम चलता है । (बौद्धों
के क्षणिकत्व सिद्धान्त में और वैशेषिकों के क्षणिकत्व सिद्धान्त में यही अन्तर है
कि वैशेषिक लोग कुछ पदार्थों को नित्य भी मानते हैं । और एक क्षण में उत्पत्ति,
दूसरे क्षण में स्थिति और तीसरे क्षण में नष्ट हो जाने को क्षणिकत्व कहते हैं ।
बौद्ध लोग सभी पदार्थों को क्षणिक ही मानते हैं किसी पदार्थ को नित्य नहीं मानते
और क्षणिक उस उत्पत्ति-विनाश की परम्परा को कहते हैं, जिसमें पदार्थ एक क्षण
में उत्पन्न होकर दूसरे ही क्षण में विनाश को प्राप्त होता है) वैशेषिक लोग
अवयवियों को क्षणिक इसलिए मानते हैं कि उत्पन्न होने के बाद उसमें हास और
वृद्धि देखी जाती है । एक ही मनुष्यशरीर कभी दुबला और कभी मोटा, कभी
छोटा और कभी बड़ा देखा जाता है; किन्तु एक ही आदमी छोटे और बड़े

भूमिका १७
परिमाण का आश्रय नहीं हो सकता; क्योंकि अवयव के परिणाम और अवयवों
की संख्या ही अवयवी में रहने वाले परिमाण के कारण हैं । कुछ नियमित संख्या
के अवयवों से निर्मित होनेवाले अवयवियों में अवयवों की एक प्रकार की संख्या
और एक परिमाण से अवयवी में विभिन्न प्रकार के परिमाणों की उत्पत्ति नहीं हो
सकती । अतः यही मानना पड़ेगा कि विभिन्न प्रकार के परिमाणवाले अवयवियों
की उत्पत्ति एक प्रकार की संख्यावाले और एक समान परिमाणवाले अवयवों से
नहीं हो सकती, अतः देवदत्तादि एक ही नाम से प्रत्यभिज्ञात होने पर भी विभिन्न
परिमाण के देवदत्तादि के शरीर विभिन्न संख्यक और विभिन्न परिमाणवाले
अवयवों से ही उत्पन्न होते हैं । विभिन्न संख्यक अवयवों से निर्मित अवयवी कभी
एक नहीं हो सकते । अतः देवदत्तादि के मोटे और पतले शरीर रूप अवयवी भी
विभिन्न ही हैं; क्योंकि विभिन्न परिमाणों के होने के कारण विभिन्न संख्यकों और
विभिन्न परिमाण के अवयवों से उत्पन्न हैं । उत्पत्ति और विनाश का या शरीर के
छोटे-बड़े होने का या मोटा और दुबला होने का यह क्रम इतना सूक्ष्म है कि उसे
परख नहीं सकते । यह तो प्रत्यक्ष है कि एक पाँच साल का लड़का जिस ऊँचाई
की वस्तु को छू नहीं सकता था, वही दश वर्ष का होने पर उसे आसानी से छू
सकता है; किन्तु उसकी ऊँचाई में यह वृद्धि कब हुई ? यह कोई देख नहीं सकता ।
ऐसा तो होता नहीं कि एक रात पहले जिस ऊँचाई की वस्तु को छूने में पाँच
अङ्गुल की कमी थी, वह प्रातः होते ही छूट जाती है और वह उस वस्तु को छू
लेता है । तस्मात् यह वृद्धि और नाश प्रतिक्षण होता है, अतः प्रत्येक वृद्धि को या
प्रत्येक विनाश को देखा नहीं जा सकता; क्योंकि क्षण अत्यन्त सूक्ष्म है ।
अतः 'अहं गौरः' इत्यादि प्रतीतियों के वाचक 'अहम्' शब्द से शरीर का
बोध लाक्षणिक ही है । शरीर आत्मशब्द का मुख्यार्थ नहीं है । उसका मुख्यार्थ
कोई अतिरिक्त द्रव्य ही है, जिसके सम्बन्ध के कारण आत्मा शब्द से शरीर का
भी गौणव्यवहार होता है । तस्मात् शरीर आत्मा नहीं है ।
किसी सम्प्रदाय का कहना है कि जिस प्रकार 'अहं गौरः' इस प्रकार की
प्रतीति होती है, उसी प्रकार 'अहं काणः' 'अहं बधिरः' इत्यादि प्रतीतियाँ भी
होती हैं, काणत्व, बधिरत्वादि चक्षुरादि इन्द्रियों के ही धर्म हैं, अतः उन प्रतीतियों
में अहं शब्द से चक्षुरादि इन्द्रियों का ही भान उचित है । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा
हैं । सभी ज्ञानों में इन्द्रियाँ किसी न किसी प्रकार अपेक्षित हैं ही । उन्हें आत्मा
मान लेने में केवल इतना अधिक होता है कि उन्हें ज्ञानों का निमित्तकारण न
मानकर समवायिकारण मानते हैं । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं । वे ही अपने-
अपने से उत्पन्न ज्ञानों के आश्रय हैं । अतः इन्द्रियों से अतिरिक्त आत्मा नाम का
कोई अतिरिक्त द्रव्य नहीं है ।

१८ प्रशस्तपादभाष्यम्
आत्मा को इन्द्रियों से भिन्न अतिरिक्त पदार्थ माननेवाले सिद्धान्तियों का कहना
है कि शरीर को आत्मा मानने में जो स्मरणानुपपत्ति प्रभृति दोष दिखला आये हैं,
वे सभी अनित्य इन्द्रियों को आत्मा मान लेने के पक्ष में भी हैं। उसकी रीति यह
है कि आँखों के रहते जिसने जिन वस्तुओं को देखा है, अन्धा हो जाने पर भी
उस व्यक्ति को उन वस्तुओं का स्मरण होता है; किन्तु इन्द्रियों को आत्मा मान
लेने के पक्ष में यह स्मरण सम्भव नहीं है; क्योंकि इस स्मरण का आश्रय
(समवायिकारण) चक्षु रूप इन्द्रिय सर्वदा के लिए नष्ट हो चुका है। अतः यह
मानना पड़ता है कि इन्द्रियों से होनेवाले ज्ञानों का आश्रय कोई और ही द्रव्य है,
जो इन्द्रियों के नष्ट होने पर भी विद्यमान रहता है। वही आत्मा है।
इन्द्रियात्मवाद के पक्ष में कोई कहते हैं कि ये सभी आपत्तियाँ इन्द्रियों के
अनित्य होने के कारण उठती हैं। श्रोत्रेन्द्रिय आकाश रूप होने पर भी पूर्ण नित्य
नहीं है; क्योंकि निरुपाधिक आकाश इन्द्रिय नहीं है। कर्णशष्कुली प्रभृति उपाधि
से युक्त आकाश ही इन्द्रिय है, अतः उपाधि में दोष आ जाने से स्वरूपतः आकाश
रूप श्रोत्र का नाश न होने पर भी उसका इन्द्रियत्व नष्ट हो जाता है। अतः
श्रोत्रेन्द्रिय भी फलतः अनित्य ही है। ऐसी स्थिति में मन रूप इन्द्रिय को आत्मा
मान लेने से उक्त सभी आपत्तियाँ हट जाती हैं; क्योंकि मन नित्य है एवं सभी
ज्ञानों में मन की अपेक्षा भी है ही। तस्मात् सभी ज्ञानों के प्रति मन को ही
समवायिकारण मान लें। तद्भिन्न आत्मा नाम के किसी द्रव्य को मानने की
आवश्यकता नहीं है। इस प्रसङ्ग में सिद्धान्तियों का कहना है कि मन की सिद्धि
जिस हेतु से की जाती है, वही उसको अतीन्द्रिय भी सिद्ध करता है। मन को
अगर विभु मान लिया जाय तो फिर उसका कुछ भी प्रयोजन नहीं रह जाता;
क्योंकि एक समय एक आश्रय में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती है; किन्तु
चक्षु-घ्राणादि इन्द्रियों के अपने विषयों के साथ एक ही समय सम्बन्ध हो सकते
हैं। ज्ञान के समवायिकारण को जो लोग विभु मानते हैं उनके मत में एक ही
साथ अनेक विषयों के साथ उसका सम्बन्ध होना कोई बड़ी बात नहीं है। अतः
मध्यवर्ती एक ऐसे इन्द्रिय की कल्पना करनी पड़ती है जो अपनी सूक्ष्मता के
कारण एक समय एक ही बहिरिन्द्रिय के साथ सम्बद्ध हो सके, वही इन्द्रिय 'मन'
है। फलतः जिस बहिरिन्द्रिय के साथ जिस समय मन रूप इन्द्रिय का सम्बन्ध
रहेगा, उस समय उसी बहिरिन्द्रिय के विषय का ग्रहण होगा और इन्द्रियों के
विषयों का नहीं। अगर मन को विभु मान लें तो फिर एक ही समय अनेक
बहिरिन्द्रियों के साथ वह सम्बद्ध हो सकता है। अतः एक ही क्षण में अनेक
ज्ञानों की (ज्ञानयौगपद्य की) आपत्ति जैसी की तैसी रहेगी। अतः मन की सत्ता के
साधक प्रमाण (धर्मिग्राहक प्रमाण) के द्वारा ही मन का अणुत्व भी सिद्ध है। मन
के इस अणुत्व के कारण ही ज्ञान का आश्रय मन नहीं हो सकता; क्योंकि ऐसा

भूमिका १९
मान लेने पर ज्ञान-सुखादि का प्रत्यक्ष न हो सकेगा; क्योंकि गुणप्रत्यक्ष के प्रति
आश्रय का महत्त्व भी कारण है, चूँकि मन अणु है, अतः उसमें रहनेवाले
ज्ञानसुखादि का प्रत्यक्ष संभव नहीं होगा। तस्मात् मन भी आत्मा नहीं है। अतः
पृथिव्यादि आठों द्रव्यों से अतिरिक्त आत्मा नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य मानना
आवश्यक है।
यह आत्मा ईश्वर और जीव भेद से दो प्रकार का है। ईश्वर एक ही
है और सर्वज्ञत्वादि गुणों से विभूषित है। जीव अदृष्टादि गुणों के द्वारा बद्ध
है और प्रत्येक शरीर में अलग-अलग होने के कारण अनन्त है। मन रूप नवम
द्रव्य के प्रसङ्ग में जानने योग्य सभी बातें आत्मनिरूपण के प्रसङ्ग में अधिकतर कह
दी गयी हैं।
गुण
रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व,
अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, यल, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म,
अधर्म और शब्द ये चौबीस गुण हैं।
रूप
केवल आँखों से ही दीखने वाला गुण 'रूप' है। द्रव्य भी वही आँखों से देखा
जाता है जिसमें कि रूप हो। आकाशादि में रूप नहीं है, अतः वे नहीं देखे
जाते। सुतरां द्रव्य के चाक्षुष प्रत्यक्ष में भी रूप सहायककारण है। केवल
द्रव्य ही नहीं जिस किसी का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष हो-रूप किसी न किसी प्रकार
अपेक्षित होगा ही। फलतः चक्षु से सभी ज्ञानकार्यों के सम्पादन में रूप
सहायककारण है। यह शुक्ल, नील, पीत, हरित, रक्त, कपिश और चित्र भेद
से सात प्रकार का है।
चित्र रूप के प्रसङ्ग में कुछ विवाद है। कुछ लोग कथित नीलादि रूपों से भिन्न
चित्र नाम का कोई अतिरिक्त रूप नहीं मानते। सिद्धान्तियों का कहना है कि
संयोग की तरह रूप अपने किसी आश्रय के एक अंश में रहे और दूसरे अंश में
नहीं-ऐसा नहीं होता (रूप अव्याप्यवृत्ति नहीं है); किन्तु रूप अपने आश्रय के
सभी अंशों में रहता है (अतः वह व्याप्यवृत्ति है)। इस नियम के अनुसार जो
छींट प्रभृति अनेक रङ्गों के कपड़े हैं, उनमें कोई रूप सभी अंशों में नहीं है; किन्तु
वे सभी रूपवाले द्रव्य हैं; क्योंकि उनका चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है। तस्मात् उनमें
नीलादि से भिन्न कोई रूप मानना पड़ेगा। वही चित्र रूप है।
पृथिवी में ये सभी रूप रहते हैं। जल और तेज इन दोनों में केवल शुक्ल
रूप ही है। शुक्ल रूप को छोड़कर और किसी रूप का अवान्तर वास्तविक भेद

३० प्रशस्तपादभाष्यम्
नहीं है। शुक्ल रूप भास्वर और अभास्वर भेद से दो प्रकार का है। जल में
अभास्वर शुक्ल रूप है और तेज में भास्वर शुक्ल रूप है।
रस
केवल रसनेन्द्रिय से ज्ञात होनेवाले गुण को रस कहते हैं। यह मधुर, अम्ल,
लवण, कटु, कषाय और तिक्त भेद से छः प्रकार का है। यह पृथिवी और जल
इन दो द्रव्यों में ही रहता है। पृथिवी में सभी प्रकार के रस रहते हैं और जल में
केवल मधुर रस ही रहता है।
गन्ध
घ्राण से ज्ञात होनेवाले गुण को 'गन्ध' कहते हैं। यह सुगन्ध और दुर्गन्ध भेद
से दो प्रकार का है एवं यह केवल पृथिवी में ही रहता है।
स्पर्श
केवल त्वचा रूप इन्द्रिय से ज्ञात हो सकनेवाले गुण को स्पर्श कहते हैं। यह
पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों में रहता है। शीत, उष्ण और
अनुष्णाशीत भेद से यह चार प्रकार का है। शीत स्पर्श जल में, उष्ण स्पर्श तेज
में, अनुष्णाशीत स्पर्श पृथिवी और वायु में रहता है। अनुष्णाशीत स्पर्श भी
पाकज और अपाकज भेद से दो प्रकार का है। इनमें पाकज अनुष्णाशीत स्पर्श
पृथिवी में (पाक से पृथिवी का अनुष्णाशीत स्पर्श परिवर्तित हो सकता है) और
अपाकज अनुष्णाशीत स्पर्श वायु में रहता है।
इनमें से जल के परमाणुओं में रहनेवाले रूप, रस, और स्पर्श एवं तेज के
परमाणुओं में रहनेवाले रूप और स्पर्श और वायु के परमाणुओं में रहनेवाले स्पर्श
नित्य हैं। एवं कार्य रूप जलादि में रहनेवाले रूपादि अनित्य हैं; किन्तु पृथिवी के
परमाणुओं में रहनेवाले रूप, रस, गन्ध और स्पर्श भी अनित्य ही हैं। कार्य रूप
पृथिवी में रहनेवाले रूपादि तो अनित्य हैं ही।
इसका यह हेतु है कि पाक के द्वारा पृथिवी में रहनेवाले रूप, रस, गन्ध और
स्पर्श का परिवर्तित होना प्रत्यक्ष से सिद्ध है। अवयवियों के रूपादि का यह
परिवर्तन परमावयव परमाणुओं में रूपादि परिवर्तन के बिना संभव नहीं है। अतः
पार्थिव परमाणुओं के रूपादि को अनित्य मानना पड़ता है। यह वैशेषिक दर्शन का
खास विषय है, अतः इस विषय का विवरण कुछ विस्तृत रूप से देता हूँ।
पाकरूपादि
समवायिकारणों में रहनेवाला गुण ही जन्य द्रव्यों में रहनेवाले गुणों का असम-
वायिकारण है। शतशः देखी हुई यह व्याप्ति ही 'कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते'

भूमिका २१
इस न्याय में पर्यवसित हुई है । जब तक सूत लाल न हों तब तक कपड़े लाल
नहीं होते । श्याम कपालों से श्याम घट ही उत्पन्न होते हैं; किन्तु श्याम कपाल से
उत्पन्न श्याम घट ही आग में पकने पर लाल हो जाता है । अतः प्रत्यक्ष दृष्ट रक्त
घट की उत्पत्ति उक्त न्याय से रक्त कपालों से ही माननी पड़ेगी । फलतः कपालों
का रक्त रूप ही घट में दीखनेवाले रक्त रूप का असमवायिकारण है । रक्त रूप
की उत्पत्ति की यह प्रणाली घट के उत्पादक त्र्यसरेणु तक अबाधित गति से
चलेगी । उक्त रीति के अनुसार घट के उत्पादक द्व्यणुक में रहनेवाले रक्त रूप
की उत्पत्ति द्व्यणुक के उत्पादक दोनों परमाणुओं में रहनेवाले रक्त रूप से होगी;
किन्तु प्रश्न यह है कि उन परमाणुओं में रक्त रूप आया कहाँ से ? क्योंकि श्याम
घट के उत्पादक परमाणु ही इस रक्त घट के भी उत्पादक हैं । उन परमाणुओं में
श्याम रूप का अनुमान घट की श्यामता से निराबाध है । अतः यही एक कल्पना .
अवशिष्ट रह जाती है कि अग्नि के विशेष प्रकार के संयोग (पाक) से उन
परमाणुओं की श्यामता नष्ट हो जाती है और उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती
है; किन्तु घट के बन जाने पर घट के उत्पादक परमाणुओं की स्वतन्त्र सत्ता है
कहाँ ? वे तो अपने कार्य द्व्यणुकों को अपने में समेट कर अपनी स्वतन्त्रता खो
चुके हैं । अतः द्व्यणुकों में समवेतत्व सम्बन्ध से विद्यमान परमाणुओं में रहनेवाले
श्याम रूप का नाश पाक से नहीं हो सकता । अतः उन परमाणुओं में रक्त रूप
की उत्पत्ति की सम्भावना ही नहीं है । अतः यह कल्पना करनी पड़ती है कि जिन
अवयवियों की परम्परा से श्याम घट का निर्माण हुआ था, द्व्यणुकपर्यन्त के वे
सभी अवयवी अग्नि के संयोग से विनष्ट हो जाते हैं । नित्य होने के कारण
परमाणु विनष्ट नहीं होते । इस प्रकार उक्त श्याम घट के आरम्भक सभी
परमाणुओं के अलग हो जाने पर उनमें से प्रत्येक परमाणु में पाक से श्याम रूप
का नाश हो जाता है और पाक से ही उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती है । इसी
प्रकार पहले के रस, गन्ध और स्पर्श भी नष्ट हो जाते हैं और उनमें दूसरे रसादि
की उत्पत्ति होती है । इन दूसरे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श से युक्त परमाणुओं के
द्वारा पुनः द्व्यणुकादि के क्रम से दूसरे पक्व घट की उत्पत्ति होती है । उसमें
कथित कारणगुण क्रम से ही रक्तरूपादि की उत्पत्ति होती है । इस पके हुए घट में
'यही वह घट है जिसे पकने के लिए दिया गया था' इस प्रकार की जो प्रत्यभिज्ञा
होती है, उसका कारण पके हुए और बिना पके हुए दोनों घटों का ऐक्य नहीं है ।
ऐक्य न रहने पर भी सादृश्य के कारण प्रत्यभिज्ञा होती है । जैसे कि 'सेयं
दीपज्वाला' इत्यादि स्थलों में होती है । वैशेषिकों का यह सिद्धान्त 'पिलुपाकवाद'
के नाम से प्रख्यात हैं । 'पिलु' परमाणुओं का ही दूसरा नाम है ।
किन्तु नैयायिक लोग इस बात को नहीं मानते । उन लोगों का कहना है कि
पका हुआ घट और बिना पका हुआ घट-दोनों एक ही हैं । इस ऐक्य से ही

२२ प्रशस्तपादभाष्यम्
'सोऽयं घटः' इत्यादि प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । सम्भव होने पर किसी प्रतीति का
गौणार्थक मानना उचित नहीं है । अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा वस्तुतः ऐक्यमूलक ही है,
सादृश्यमूलक नहीं । तदनुसार सम्पूर्ण घट रूप अवयवी में ही पाक होता है, भट्टी
में डाले गये घट का छिद्र से देखने पर प्रत्यक्ष भी होता है । अतः उक्त स्थल में
घट का विनाश मानना प्रत्यक्षविरुद्ध भी है । उक्त प्रत्यभिज्ञा से विरुद्ध होने के
कारण 'कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते' इस नियम को पाकज रूपादि से अतिरिक्त
विषय के लिए सङ्कुचित करना पड़ेगा ।
प्रत्येक अवयवी अनन्त छिद्रों से युक्त है, अतः उन छिद्रों के द्वारा अतितीक्ष्ण
तेज भीतर प्रविष्ट होकर अवयवी को बाहर और भीतर पका देता है । अतः
अनुभव से विरुद्ध कच्चे घट का विनाश और पके घट की उत्पत्ति मानने की कोई
आवश्यकता नहीं है ।
संख्या
'यह एक है, ये दो हैं, ये तीन हैं' इत्यादि व्यवहार जिस गुण से उत्पन्न हों,
वही 'संख्या' है । यह एकत्व और द्वित्वादि से लेकर परार्द्धपर्यन्त अनन्त प्रकार
की है । इनमें एकत्व संख्या की नित्यता और अनित्यता उसके आश्रय की नित्यता
और अनित्यता के अनुसार होती है, घट अनित्य है, अतः उसमें रहनेवाली एकत्व
संख्या भी अनित्य है, आकाश नित्य है, अतः उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या भी
नित्य है; किन्तु द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य ही हैं, चाहे उनके आश्रय नित्य हों
या अनित्य; क्योंकि इन संख्याओं के व्यवहार करनेवाले पुरुषों की बुद्धि से इसकी
उत्पत्ति होती है । जिस घट में पट को साथ लेकर कोई पुरुष द्वित्व का व्यवहार
करता है, उसी घट में पट और दण्ड को साथ लेकर कोई तीसरा पुरुष त्रित्व का
व्यवहार भी करता है । द्वित्व को दृष्टान्त रूप में लेकर समझने में सरलता होगी ।
जब किसी पुरुष को दो घटों में से प्रत्येक में 'यह एक है, यह एक है' इस प्रकार
की बुद्धि उत्पन्न होती है, तभी दो एकत्वों की उक्त बुद्धि से उक्त दोनों घटों में
द्वित्व संख्या की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार अनेक एकत्व-विषयक बुद्धि की
'अपेक्षा' द्वित्व की उत्पत्ति में है, अतः उक्त बुद्धि को 'अपेक्षाबुद्धि' कहते हैं ।
सभी बुद्धियाँ क्षणिक हैं, अतः अपेक्षाबुद्धि क्षणिक ही है । अतः उनसे उत्पन्न
होनेवाली द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य हैं ।
पहले कह चुके हैं कि एक क्षण में उत्पत्ति, द्वितीय क्षण में स्थिति और तृतीय
क्षण में जिस वस्तु का नाश हो, उसे ही वैशेषिक लोग 'क्षणिक' कहते हैं; किन्तु
अपेक्षाबुद्धि का क्षणिकत्व उक्त क्षणिकत्व से थोड़ा-सा भिन्न है । अपेक्षाबुद्धि की
एक क्षण में उत्पत्ति, उसके बाद दो क्षणों तक उसकी स्थिति और चौथे क्षण में
विनाश मानना होगा, अतः अपेक्षाबुद्धि का क्षणिकत्व चतुर्थ क्षण में नष्ट होना

भूमिका २३
है । अगर ऐसा न मानें, अपेक्षाबुद्धि का भी और बुद्धियों की तरह तीसरे ही
क्षण में विनाश मानें ? तो उससे उत्पन्न होनेवाले द्वित्व का सविकल्पक प्रत्यक्ष नहीं
हो सकेगा; क्योंकि वर्त्तमान विषयों का ही प्रत्यक्ष होता है । प्रत्यक्ष के प्रति विषय
कारण हैं । तदनुसार द्वित्वविषयक प्रत्यक्ष के प्रति भी द्वित्व कारण है । अगर
द्वित्व के कारणीभूत उक्त अपेक्षाबुद्धि की सत्ता तीन क्षणों तक न मानें तो द्वित्व-
जनित उक्त प्रत्यक्ष अनुपपन्न हो जाएगा । द्वित्व प्रत्यक्ष की रीति यह है कि द्वित्व
के आश्रयीभूत दोनों व्यक्तियों में अलग-अलग 'अयमेकः, अयमेकः' इत्यादि
आकार की अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न होती है । इस अपेक्षाबुद्धि से द्वित्व की उत्पत्ति
होती है, फिर द्वित्व में विशेषणीभूत द्वित्वत्वविषयक निर्विकल्पक प्रत्यक्ष होता है ।
इसके बाद द्वित्व का विशिष्टप्रत्यक्ष होता है । उसके बाद के क्षण में द्वित्व का
विनाश होता है; क्योंकि विशिष्टज्ञान के लिए पहले विशेषण का ज्ञान आवश्यक
है, अतः द्वित्वत्वविशिष्ट द्वित्व के प्रत्यक्ष के लिए द्वित्वत्व का निर्विकल्पक ज्ञान
मानना आवश्यक है । अगर उक्त अपेक्षाबुद्धि की और साधारण ज्ञानों की तरह
दूसरे क्षण तक ही स्थिति मानें, तो द्वित्व की उत्पत्ति के आगे के क्षण में ही
अपेक्षाबुद्धि का विनाश हो जाएगा; अतः जिस क्षण में द्वित्वत्व का निर्विकल्पक
प्रत्यक्ष कहा गया है, उसी क्षण में अपेक्षाबुद्धि का विनाश होगा । फिर उसके
आगे के क्षण में द्वित्व के सविकल्पक प्रत्यक्ष की अपेक्षा द्वित्व का ही नाश हो
जाएगा; क्योंकि अपेक्षाबुद्धि का विनाश ही द्वित्व का विनाशक है । फिर
द्वित्व विनाश के बाद द्वित्व का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता; क्योंकि प्रत्यक्ष के
अव्यवहित पूर्वक्षण में विषय का रहना आवश्यक है । अतः अपेक्षाबुद्धि का
विनाश और बुद्धियों की तरह तीसरे क्षण में न मानकर उत्पत्ति के चौथे क्षण में
मानना पड़ता है ।
परिमाण
लम्बा और चौड़ा एवं भारी और हल्का ये व्यवहार जिस गुण के कारण हों,
उस गुण को 'परिमाण' कहते हैं । दोनों में पहले से लम्बाई-चौड़ाई का बोध होता
है और दूसरे से भारीपन और हल्कापन का बोध होता है । इनमें पहला भी दो
प्रकार का है, एक दीर्घ और दूसरा ह्रस्व । दूसरे प्रकार का वह परिमाण है,
जिससे द्रव्य का भारीपन और हल्कापन प्रतीत हो । यह भी अणु और महत् भेद
से दो प्रकार का है । इसकी भी नित्यता और अनित्यता अपने आश्रय की नित्यता
और अनित्यता के अधीन है । अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण नित्य है
और अनित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण अनित्य है । अनित्य परिमाण तीन
कारणों से उत्पन्न होता है- (१) अवयवों के परिमाण से, (२) अवयवों की संख्या
से और (३) (अवयवों के प्रशिथिलसंयोगरूप) प्रचय से । दोनों कलापों के

२४ प्रशस्तपादभाष्यम्
परिमाण से घट में परिमाण की उत्पत्ति होती है; किन्तु उसी परिमाण के तीन
कपालों से जिस घट की उत्पत्ति होगी, उस घट का परिमाण दो कपालों से उत्पन्न
घट के परिमाण से भिन्न होगा। इस विलक्षण परिमाण का कारण तीनों कपालों
का परिमाण नहीं हो सकता; क्योंकि इन तीनों कपालों का परिमाण भी पहले घट
के उत्पादक दोनों कपालों के समान ही है। अतः उक्त तीन कपालों से उत्पन्न घट
में जो उक्त दोनों कपालों से उत्पन्न घट के परिमाण से विलक्षण परिमाण उपलब्ध
होता है, उसका कारण कपालों की त्रित्व संख्या ही है। अतः संख्या भी परिमाण
का कारण है। इस प्रकार संख्या में स्वीकृत परिमाण की कारणता के अनुसार
ही अणु परिमाणों में किसी भी वस्तु की कारणता का अस्वीकार करना वैशेषिकों
के लिए संभव होता है। वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार अणुपरिमाण किसी के
भी कारण नहीं हैं। परमाणुओं के परिमाण और द्व्यणुकों के परिमाण ही
अणुपरिमाण हैं। ये अगर कारण होंगे तो परमाणु के परिमाण द्व्यणुकों के
परिमाण के कारण होंगे और द्व्यणुकों के परिमाण त्र्यसरेणु के परिमाण के
कारण होंगे; किन्तु सो संभव नहीं है; क्योंकि परिमाणों में यह नियम देखा जाता
है कि वे अपने समान जाति के अपने से उत्कृष्ट परिमाण को ही उत्पन्न करते हैं।
कपालों में महत् परिमाण हैं, उसके परिमाणों से घट का जो परिमाण उत्पन्न होता
है, वह कपाल परिमाण से महत्तर होता है। अर्थात् कपाल परिमाण में रहनेवाली
महत्त्व जाति भी उसमें है और कपाल परिमाण से वह बड़ा भी है। इस नियम के
अनुसार परमाणुओं के परिमाणों से द्व्यणुकों के परिमाणों की उत्पत्ति मानने से
द्व्यणुक के परिमाणों में अणुत्व-जाति के साथ-साथ परमाणुओं के परिमाण से
न्यूनता भी माननी पड़ेगी; क्योंकि जिस प्रकार महत्परिमाण से उत्पन्न होनेवाले
परिमाण महत्तर होते हैं, उसी प्रकार अणुपरिमाण से उत्पन्न होनेवाले परिमाण
अणुतर होंगे। इसी प्रकार द्व्यणुकों में रहनेवाले अणुपरिमाणों से अगर त्र्यसरेणु
परिमाण की उत्पत्ति मानें तो वह द्व्यणुक के परिमाण से छोटा होगा। फलतः
त्र्यसरेणु का प्रत्यक्ष न हो सकेगा। जिससे आगे की प्रत्यक्ष धारा ही रुक जाएगी।
जो जगत् के अप्रत्यक्ष में परिणत हो जाएगी। तस्मात् द्व्यणुक परिमाण के
उत्पादक दोनों परमाणुओं की द्वित्व संख्या ही है एवं तीन द्व्यणुकों से उत्पन्न
होनेवाले त्र्यसरेणु के परिमाण का उसके उपादानभूत तीनों द्व्यणुकों की त्रित्व
संख्या ही कारण है। घटादि के विशेष प्रकार के परिमाणों के लिए भी संख्या की
अपेक्षा का उपपादन कर चुके हैं। अतः जन्य अणुपरिमाणों के लिए वह कोई
नवीन कल्पना भी नहीं है।
'प्रचय' भी परिमाण का कारण है। इसी से सेर भर लोहे की लम्बाई-चौड़ाई
और सेर भर रूई की लम्बाई-चौड़ाई में अन्तर उपलब्ध होता है। यह अन्तर
अवयवों के परिमाण या अवयवों की संख्या से उपपन्न नहीं हो सकते। कथित

भूमिका २५
लौहखण्ड और तुलखण्डों के अवयवों की संख्या और परिमाण समान हैं । अतः
उक्त अन्तर की उपपत्ति के लिए यही कल्पना करनी चाहिए कि लोहे के अवयवों
के संयोग संघटित हैं और रूई के अवयवों के संयोग शिथिल (ढीले) हैं । अवयवों
के इस शिथिल संयोग को ही 'प्रचय' कहते हैं ।
पृथक्त्व
'घट पट से पृथक् है' (अयम्स्मात् पृथक्) इस आकार की प्रतीति जिस गुण
से हो, उसे 'पृथक्त्व' कहते हैं । यह भिन्न द्रव्यों में एक, दो या इनसे अधिक
द्रव्यों को अवधि मानकर शेष द्रव्यों में रहता है । इस प्रकार यह भेद या
अन्योन्याभाव-सा ही दीखता है; किन्तु अन्योन्याभाव की प्रतीति का 'घटभिन्नः
पटः' इत्यादि प्रकार के होते हैं, अतः भेद से पृथक्त्व भिन्न है । अर्थात् भेद की
प्रतीति के अभिलापक वाक्य में प्रयुक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के लिए
प्रथमान्त पद का ही प्रयोग होता है; किन्तु पृथक्त्व की प्रतीति के लिए उनमें से
अवधिभूत एक अर्थ का पञ्चम्यन्त पद से उपादान किया जाता है ।
संयोग
असम्बद्ध दो द्रव्यों के परस्पर सम्बन्ध को ही 'संयोग' कहते हैं । यह तीन
प्रकार का है-(१) दोनों सम्बन्धियों में से एकमात्र की क्रिया से उत्पन्न । जैसे
पहाड़ और पक्षी का संयोग केवल पक्षी की क्रिया से उत्पन्न होता है । (२) दोनों
सम्बन्धियों की क्रिया से उत्पन्न, जैसे लड़ते हुए दो पहलवानों का संयोग ।
(३) तीसरा संयोग संयोग से ही उत्पन्न होता है । जैसे हाथ और पुस्तक के संयोग
से शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । वैशेषिकों के सिद्धान्त में
अवयव और अवयवी परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं । अतः शरीर रूप अवयवी और
हाथ-पैर प्रभृति अवयव परस्पर भिन्न हैं । अतः जिस प्रकार घट की क्रिया से
भूतल और पट का संयोग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार हाथ की क्रिया से
शरीर और पुस्तक का संयोग भी उत्पन्न नहीं हो सकता; किन्तु शरीर में क्रिया के
न रहने पर भी हाथ की क्रिया से पुस्तक के साथ जो हाथ और पुस्तक का
संयोग उत्पन्न होता है, उसके बाद शरीर के साथ पुस्तक के संयोग की प्रतीति
होती है । प्रतीति का अपलाप नहीं किया जा सकता । अतः शरीर और पुस्तक
में भी संयोग मानना पड़ेगा; किन्तु यह संयोग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो
पुस्तक की क्रिया या शरीर की क्रिया या फिर उन्हीं दोनों की क्रिया से उत्पन्न
होगा; किन्तु न शरीर में और न पुस्तक में ही क्रिया है । अतः प्रकृत में शरीर
और पुस्तक के संयोग का कारण क्रिया को नहीं माना जा सकता; किन्तु
असमवायिकारण तो क्रिया या गुण इन दोनों में से ही कोई होगा । प्रकृत में क्रिया

२६ प्रशस्तपादभाष्यम्
असमवायिकारण नहीं हो सकती, अतः उसके असमवायिकारण होने की बात ही
नहीं उठती । सुतरां प्रकृत में हाथ और शरीर इन दोनों के लिए गुण रूप किसी
असमवायिकारण की कल्पना आवश्यक है । यह गुण उक्त संयोग से अव्यवहित
पूर्वक्षण में नियत रूप से रहनेवो हाथ और पुस्तक के संयोग को छोड़कर दूसरा
नहीं हो सकता । अतः हाथ और पुस्तक की क्रिया से उत्पन्न संयोग से ही शरीर
और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । सुतरां संयोगजसंयोग का मानना
आवश्यक है ।
(१) नोदन और (२) अभिघात संयोग के ये दो और प्रकार भी हैं । जिस
संयोग से शब्द की उत्पत्ति न हो उसे 'नोदन' कहते हैं । एवं इसके विपरीत जिस
संयोग से शब्द की उत्पत्ति हो उसे 'अभिघात' कहते हैं ।
विभाग
संयोग को विनष्ट करनेवाले गुण का नाम 'विभाग' है । संयोग की तरह यह
भी (१) एक क्रिया से उत्पन्न, (२) दो क्रियाओं से उत्पन्न और (३) विभाग से
उत्पन्न भेद से तीन प्रकार का है । पर्वत से पक्षी का विभाग केवल पक्षी में
रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होता है । परस्पर गुथे हुए दो पहलवानों का विभाग
दोनों पहलवानों में से प्रत्येक में रहनेवाली अलग-अलग दो क्रियाओं से उत्पन्न
होता है ।
संयोगजसंयोग की तरह 'विभागजविभाग' का भी मानना आवश्यक है;
क्योंकि किसी व्यक्ति के हाथ का संयोग अगर किसी वृक्ष के साथ था और हाथ
की क्रिया से उस संयोग के छूट जाने पर वृक्ष से हाथ का विभाग हो जाता है ।
हाथ और वृक्ष के इस विभाग के उत्पन्न होने पर वृक्ष से शरीर के विभाग की भी
प्रतीति होती है । शरीर और वृक्ष का विभाग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो
फिर शरीर को क्रिया से या वृक्ष की क्रिया से अथवा दोनों की क्रिया से ही उत्पन्न
हो सकता है । प्रकृत में क्रिया केवल हाथ में ही है, पूरे शरीर में नहीं । वृक्ष में
तो है ही नहीं । हाथ अवयव है शरीर अवयवी, अतः दोनों भिन्न हैं । सुतरां घट
की क्रिया से जैसे कि पट और दण्ड का विभाग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी
प्रकार हाथ की क्रिया से शरीर और वृक्ष का भी विभाग नहीं उत्पन्न हो सकता ।
अतः हाथ और वृक्ष का विभाग हो शरीर और वृक्ष के विभाग का कारण है ।
अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है । इसी हेतु से विभाग को
संयोगध्वंस रूप न मानकर स्वतन्त्र गुणरूप भाव पदार्थ मानना पड़ता है । अगर
ऐसा न मानें अर्थात् विभाग को संयोगध्वंस रूप ही मानें तो हाथ और तरु के
विभाग के बाद जो शरीर और तरु के विभाग की प्रतीति होती है, वह नहीं
हो सकेगी; क्योंकि शरीर और तरु का विभाग शरीर और तरु के संयोग का ही

भूमिका २७
विनाश रूप होगा । शरीर में क्रिया है नहीं, क्रिया है हाथ में । हाथ की क्रिया से
शरीर के संयोग का विनाश कैसे होगा ? हाथ की क्रिया से जिस संयोग-विनाश
की उत्पत्ति होगी वह तो हाथ में ही रहेगी, शरीर में नहीं । अतः विभाग संयोग
का अभावरूप नहीं है; किन्तु गुणरूप भाव ही है । विभाग को भावरूप मान लेने
से प्रतीतियों की उपपत्ति दिखलायी जा चुकी है ।
विभागजविभाग भी दो प्रकार का है-(१) कारणमात्रजन्य और (२) समवायि-
कारणविभागजन्य । जिस विभाग की उक्त होगी, उस विभाग के समवायि-
कारणीभूत द्रव्यों के ही विभाग से जो विभाग उत्पन्न हो उसे 'कारण-
मात्रविभागजन्य विभाग' कहते हैं । घट-नाश से लेकर उसके उत्पादक कर्मनाश
पर्यन्त के पर्यालोचन से यहाँ की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी । उसका यह क्रम है कि .
पहले घट के अवयव रूप दोनों कपालों में क्रिया (हलचल) की उत्पत्ति होती है ।
फिर घट के उत्पादक दोनों कपालों में विभाग उत्पन्न होता है । कपालों के इस
विभाग से घट के उत्पादक कपालों के संयोग का नाश होता है । चूँकि कपालों का
संयोग घट का असमवायिकारण है, अतः इसके नाश से घट का नाश होता है ।
तब तक कपालों में क्रिया रहती ही है । घट-नाश के बाद कर्म से युक्त उन
कपालों का संयोग पहले के जिस देश के आकाश के साथ था, उस देश से
कपालों का विभाग उत्पन्न होता है । आकाश के साथ कपालों के इस विभाग का
असमवायिकारण पहले कहा गया दोनों कपालों का क्रियाजनित विभाग ही है ।
पूर्व देशों के आकाश से एक-दूसरे से विभक्त दोनों कपालों का यह विभाग ही
"कारणमात्रविभागजन्य विभागजविभाग" है; क्योंकि इस विभाग के समवायि-
कारण दोनों कपाल और पूर्वदेशों का आकाश है । अतः दोनों कपाल भी इस
विभाग के समवायिकारण हैं । अतः प्रकृत विभाग के समवायिकारणीभूत केवल
दोनों कपालों के विभाग से ही वह उत्पन्न होता है, किन्हीं और द्रव्यों के विभाग
से नहीं । इसके बाद विभागजविभाग से कपालों का जिस पूर्वदेश के साथ पहले
संयोग था, उस संयोग का नाश होता है । फिर दूसरे देशों के आकाश
(उत्तरदेश) के साथ इन विभक्त कपालों का संयोग होता है । कपालों की उस
क्रिया का नाश होता है, जिससे दोनों कपालों का विभाग उत्पन्न हुआ था ।
इस प्रसङ्ग में इन दो विषयों को भी समझना आवश्यक है-(१) जिस क्रिया से
कपालों का परस्पर विभाग उत्पन्न होता है, उस क्रिया से ही विभक्त कपालों के
पूर्वदेश के आकाश के साथ कथित विभाग की उत्पत्ति क्यों नहीं मानते ? क्योंकि
क्रिया में विभाग की हेतुता स्वीकृत है । एवं क्रिया की सत्ता इस विभाग के कई

२८ प्रशस्तपादभाष्यम्
क्षणों बाद तक रहती है । फिर विभाग में विभाग की हेतुता की नयी कल्पना
क्यों की जाती है ? दूसरी बात यह है कि अगर उक्त दूसरे विभाग की उत्पत्ति
विभाग से ही मान भी लें तो यह पहला विभाग दूसरे विभाग का
असमवायिकारण ही होगा । असमवायिकारण का संचलन हो जाने पर कार्य की
उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं रह जाती है । फिर अवयवों के विभाग के बाद ही
अवयवी के नाश से पूर्व ही उक्त दूसरे देश के साथ अवयवों का (विभागज)
विभाग क्यों नहीं उत्पन्न हो जाता ? इसके लिए घट के उत्पादक संयोग का
विनाश और घट का विनाश इन दो कार्यों के लिए अपेक्षित दो क्षणों का विलम्ब
सहने की क्या आवश्यकता है ?
इन दोनों में प्रथम प्रश्न का यह समाधान है कि अगर उक्त दूसरे विभाग को
भी क्रियाजन्य मानें तो कमल खिलने की अपेक्षा विनष्ट ही हो जाएँगे; क्योंकि
संयोग दो प्रकार के हैं । एक संयोग से अवयवी की उत्पत्ति होती है, जैसे दोनों
कपालों का कथित संयोग । इसे 'आरम्भक' संयोग कहते हैं, क्योंकि यह संयोग
घटरूप अवयवी द्रव्य का 'आरम्भक' अर्थात् 'उत्पादक' है । दूसरा संयोग है
अनारम्भक संयोग, जैसे विभक्त कपालों का दूसरे देश के आकाश के साथ
संयोग । इससे किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः इसे 'अनारम्भक'
संयोग कहते हैं । फलतः वे दोनों संयोग परस्पर विरोधी हैं, अतः एक क्रियारूप
कारण से उन दोनों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अगर इसे मानने का हठ करें
तो फूलते हुए कमल के विनाश की उक्त आपत्ति होगी; क्योंकि कमल के पत्रों का
ऊपर की ओर जो परस्पर संयोग है, यह कमल का उत्पादक संयोग नहीं है ।
उस संयोग को नष्ट करनेवाला विभाग ही कमल का फूलना है । जो सूर्य-किरणों
के संयोग से उत्पन्न होनेवाली पत्रों की क्रिया से होता है । कमल के पत्रों का ही
नीचे की ओर डण्डी के ऊपर अंश में भी परस्पर संयोग है । जो कमल का
उत्पादक संयोग है । इस संयोग का विनाश उन रविकिरणों के उक्त क्रियाजनित
विभाग से नहीं होता है । यदि आग्रहवश ऐसा मानें तो कमल का विनाश मानना
पड़ेगा; क्योंकि अवयवों का विशेष प्रकार संयोग ही अवयवी का उत्पादक है एवं
उक्त संयोग का विनाश ही अवयवी का विनाशक है । तस्मात् अवयवियों के
उत्पादक संयोग के विनाशक विभाग और उक्त संयोग के अविनाशक विभाग
दोनों की उत्पत्ति एक क्रिया से नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में कपालों के संयोग
को नष्ट करनेवाले विभाग की उत्पत्ति क्रिया से मानते हैं और उन्हीं विभक्त
कपालों के पूर्वदेशसंयोग के विनाशक विभाग की उत्पत्ति कपालों के उक्त विभाग
से मानते हैं । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है ।

भूमिका २९
दूसरे प्रश्न का यह समाधान है कि कथित आरम्भकर संयोग के विरोधी
विभाग से युक्त अवयवों का दूसरे आकाशादि देशों के साथ तब तक संयोग नहीं
हो सकता जब तक कि अवयवी विनष्ट नहीं हो जाता । अतः क्रिया से विभाग,
विभाग से पूर्व (आरम्भक) संयोग का नाश, संयोग के इस नाश से घट का नाश
जब हो जाएगा तभी घट के उत्पादक उक्त विभक्त कपालों का दूसरे देशों के साथ
संयोग उत्पन्न हो सकता है । अतः उक्त रीति माननी पड़ती है ।
परत्व और अपरत्व
परत्व और अपरत्व ये दोनों ही दैशिक और कालिक भेद से दो-दो प्रकार के
हैं । एक वस्तु से दूसरी वस्तु की दूरी दैशिक परत्व है और एक वस्तु का दूसरे
वस्तु से समीप होना दैशिक अपरत्व है । ये दोनों ही आपेक्षिक हैं, अतः
अपेक्षाबुद्धि ही इनकी कारण है और तीसरी अवधि की भी अपेक्षा होती है ।
जैसे कि पटना से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है एवं पटना से प्रयाग की अपेक्षा
काशी समीप है ।
कालिक परत्व का ही दूसरा नाम ज्येष्ठत्व है । एवं कालिक अपरत्व का ही
दूसरा नाम कनिष्ठत्व है । कालिक परत्व और अपरत्व भी आपेक्षिक हैं; क्योंकि
जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से ज्येष्ठ होता है, वही अपने से पूर्ववर्त्ती की अपेक्षा
कनिष्ठ भी होता है । एवं जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से कनिष्ठ होता है, वही
अपने से पश्चाद्वर्त्ती की अपेक्षा ज्येष्ठ भी होता है । अतः इनमें भी अपेक्षाबुद्धि
की आवश्यकता होती है । अतः अपेक्षाबुद्धि के नाश से इनका नाश होता है ।
परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धिसापेक्ष हैं । अतः इनके निरूपण के बाद ही
आकर-ग्रन्थों में बुद्धि का निरूपण किया गया है । तदनुसार मैं भी अब बुद्धि का
निरूपण प्रारम्भ करता हूँ । बुद्धि के निरूपण में नव्यन्याय की दृष्टि से भी कुछ
विषयों को समझाने का मैंने प्रयास किया है ।
बुद्धि
संसार के सभी व्यवहारों के मूल में बुद्धि ही काम करती है । संक्षेपतः (१)
प्रमा (विद्या) और (२) अप्रमा (अविद्या) इसके दो भेद हैं । इनमें अप्रमा के (१)
संशय, (२) विपर्यय, (३) अनध्यवसाय और (४) तर्क, ये चार भेद हैं ।
ज्ञान या बुद्धि को अच्छी तरह से समझने के लिए उसके विशिष्ट स्वरूप के
प्रत्येक अंश को अच्छी तरह समझ लेना आवश्यक है । नैयायिकों और वैशेषिकों
के मत में ज्ञान किसी विषय का ही होता है । बिना विषय के ज्ञान नहीं होते ।
ज्ञान में भासित होनेवाले विषय (१) विशेषण, (२) विशेष्य और (३) उन दोनों

३० प्रशस्तपादभाष्यम्
के संसर्ग, ये तीन प्रकार के हैं । 'विषय' का एक चौथा प्रकार भी है जो
निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होता है । 'घटवद्भूतलम्' इस ज्ञान में मुख्यतः घट
विशेषण है और भूतल विशेष्य है एवं संसर्ग वह संयोग है, जिसके कारण भूतल
में घट का रहना सम्भव होता है । वैसे तो इसी ज्ञान में घट में घटत्व भी भासित
होता है । अतः घटत्व भी विशेषण है और घट भी विशेष्य है एवं इन दोनों का
समवाय भी संसर्ग है । इसी प्रकार भूतल में भूतलत्व और संयोग में संयोगत्व के
भान होने के कारण भूतलत्व संयोगत्वादि और भी विशेषण हैं एवं घट, भूतलादि
और भी विशेष्य हैं । किन्तु ये गौण हैं । विशेषण को ही 'प्रकार' कहते हैं । ज्ञान
के इन विषयों में ज्ञानीय 'विषयता' नाम का एक धर्म है, जो विषयों के
प्रकारविशेष्यादि के विभेदों के कारण (१) प्रकारता, (२) विशेष्यता और (३)
संसर्गता भेद से तीन प्रकार का है । निर्विकल्पक ज्ञान के चौथे प्रकार के विषयों
में रहनेवाली इन तीनों विषयताओं से भिन्न एक चौथी विषयता भी है । उक्त
प्रकारता ही उस स्थिति में प्रायशः विधेयता कहलाती है, जिसमें कि उसका
आश्रय पहले ज्ञात न हो । विशेष्यता ही स्थिति विशेष में उद्देश्यता कहलाती है ।
ऊपर जिस संसर्ग की चर्चा की गयी है वह विभिन्न दो व्यक्तियों में क्रमशः
विशेष्यविशेषणभाव का सम्पादक वस्तु विशेष रूप है, 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि स्थलों
में चूँकि दण्ड का संयोग संसर्ग या सम्बन्ध पुरुष में है, इसीलिए दण्ड विशेषण है
और पुरुष विशेष्य है । सम्बन्ध (१) साक्षात् और (२) परम्परा भेद से दो प्रकार
का है । साक्षात् सम्बन्ध संयोग समवाय स्वरूपादि भेद से अनेक प्रकार के हैं ।
जिस सम्बन्ध के निर्माण में दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता हो, उसे परम्परा
सम्बन्ध कहते हैं । यह अनन्त प्रकार का हो सकता है । इसकी कोई संख्या
निर्णित नहीं हो सकती । यह सम्बन्ध ऐसे दो वस्तुओं का भी हो सकता है, जिन्हें
साधारण सम्बन्ध से कभी परस्पर सम्बद्ध होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती
। (१) वृत्तिनियामक और (२) वृत्तिता का अनियामक भेद से सम्बन्ध दो
प्रकार का है । जिस सम्बन्ध से आधार-आधेयभाव की प्रतीति हो, उसे 'वृत्तिता
का नियामक' सम्बन्ध कहते हैं । ये संयोग समवायादि नियमित प्रकार के ही हैं ।
जिससे दो सम्बन्धियों में केवल सम्बद्ध मात्र होने की प्रतीति हो, उसे वृत्तिता का
अनियामक सम्बन्ध कहते हैं ।
जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता वस्तुतः रहे, उसी ज्ञान को 'प्रमा'
कहते हैं । यथार्थ चाँदी में जो 'इदं रजतम्' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है,
वह 'प्रमा' ज्ञान है; क्योंकि ज्ञान का विशेष्य या उद्देश्य है चाँदी (रजत), उसमें
रजतत्व रूप विशेषण की या प्रकार की वस्तुतः सत्ता है, अतः उक्त ज्ञान 'प्रमा' है ।
किस वस्तु में किस वस्तु की यथार्थ सत्ता है ? इस प्रश्न का यह समाधान है कि

भूमिका ३१
जिस विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध की सत्ता रहे, उसी विशेष्य में विशेषण की
यथार्थ सत्ता है । प्रकृत उदाहरण के रजत रूप विशेष्य में रजतत्व जाति का
समवाय सम्बन्ध है, अतः रजतत्व की सत्ता रजत में है । शुक्तिका में जो
'इदं रजतम्' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है, वह 'प्रमा' इसलिए नहीं है कि
इस ज्ञान के विशेष्य शुक्तिका में रजतत्व का समवाय नहीं है । अतः शुक्तिका में
रजतत्व का ज्ञान प्रमा न होकर 'अप्रमा' है । फलतः प्रमा के विपरीत अर्थात्
जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता न रहे, उस ज्ञान को ही 'अप्रमा' या
अविद्या या भ्रम कहते हैं ।
अयथार्थ ज्ञान के भेदादि इस ग्रन्थ में विस्तृत रूप से वर्णित हैं । कथित
प्रमाज्ञान या यथार्थज्ञान के दो भेद हैं-(१) प्रत्यक्ष और (२) अनुमिति ।
शब्दादिजन्य जितने भी प्रमाज्ञान हैं वे सभी प्रायः अनुमिति में ही अन्तर्भूत हैं ।
फलतः प्रमाकरण भी, अर्थात् प्रमाण भी (१) प्रत्यक्ष और (३) अनुमान भेद से
दो ही प्रकार के हैं । शब्दादि जितने भी प्रकार के प्रमाज्ञान हैं, वे सभी इन्हीं
दोनों में से किसी करण से उत्पन्न होते हैं ।
प्रत्यक्ष शब्द 'प्रति' शब्द और 'अक्ष' शब्द से 'प्रतिगतम् अक्षि' या अक्ष्यक्षि
प्रति वर्त्ततं इन दोनों व्युत्पत्तियों के द्वारा निष्पन्न होता है । प्रकृत में अर्थ के साथ
सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष शब्द से अभीष्ट है । अर्थात् विषय के साथ सम्बद्ध
इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । इस प्रमाण के द्वारा उत्पन्न यथार्थ ज्ञान ही 'प्रत्यक्ष'
रूप प्रमिति है । फलतः इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न
हो, वह है प्रत्यक्ष-प्रमिति और इस प्रमिति का कारण ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रत्यक्ष
के प्रसङ्ग में और विशद विवेचन इस ग्रन्थ में देखना चाहिए ।
'अनु'पूर्वक 'मा' धातु से अनुमान शब्द बना है । 'अनु' शब्द का अर्थ है
पश्चात् । 'पश्चात्' शब्द अपने अर्थबोध के लिए किसी और अवधि की आकांक्षा
रखता है । प्रकृत में वह अवधि है 'लिङ्गपरामर्श', अर्थात् लिङ्गपरामर्श के पश्चात्
ही जो ज्ञान उत्पन्न हो उसे 'अनुमिति' कहते हैं । इसी दृष्टि से 'परामर्शजन्यं
ज्ञानमनुमितिः' इस प्रकार के अनुमिति के लक्षण मिलते हैं । व्याप्तिज्ञान और
पक्षधर्मताज्ञान इन दोनों से परामर्श उत्पन्न होता है । हेतु के आश्रय में साध्य
नियमित रूप से रहना ही व्याप्ति है । पक्ष में हेतु का रहना ही पक्षधर्मता है ।
'साध्यव्याप्यो हेतुः' यही व्याप्तिज्ञान का आकार है और 'हेतुमान् पक्षः' यह
पक्षधर्मताज्ञान का आकार है । अतः मिलकर इन दोनों से उत्पन्न परामर्श का
स्वभावतः 'साध्यव्याप्यहेतुमान् पक्षः' यह आकार होता है । इस परामर्श को ही
'तृतीयलिङ्गपरमर्श' भी कहते हैं । इस दृष्टि से पक्षधर्मता-ज्ञान हेतु का प्रथम ज्ञान
है और व्याप्तिविशिष्टहेतु का ज्ञान हेतु का दूसरा ज्ञान है, व्याप्ति और पक्षधर्मता

३२ प्रशस्तपादभाष्यम्
इन दोनों रूपों से हेतु का परामर्श रूप तीसरा ज्ञान होता है, अतः उसे "तृतीय
लिङ्गपरामर्श" कहते हैं । इसके बाद ही अनुमिति की उत्पत्ति होती है ।
पक्षता
इस प्रसङ्ग में एक विचार उठता है कि प्रायः सभी ज्ञान दो क्षणों तक रहते
हैं, तीसरे क्षण में उनका विनाश होता है । कथित परामर्श भी ज्ञान है, अतः
वह भी दो क्षणों तक रहेगा । जिस क्षण में वह उत्पन्न होगा, उसके अव्यवहित
उत्तरक्षण में जिस प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, इस अनुमिति के अगले
क्षण में भी उसी प्रकार की अनुमिति को वह क्यों नहीं उत्पन्न करता ? क्योंकि
कथित दूसरी अनुमिति के अव्यवहित पूर्वक्षण में अर्थात् पहली अनुमिति के
उत्पत्तिक्षण में परामर्श की सत्ता है । एवं परामर्श अनुमिति का अन्यनिरपेक्ष
कारण है । परामर्श संवलन के बाद अनुमिति के लिए और किसी की अपेक्षा
नहीं रह जाती । सुतरां परामर्श अगर अपने उत्पत्तिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण
में जिस विषय की जिस आकार-प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, उसी
आकार-प्रकार की उसी विषय की दूसरी अनुमिति को भी अपने स्थितिक्षण के
अव्यवहित उत्तरक्षण में फलतः पहली अनुमिति के अव्यवहित उत्तरक्षण में उत्पन्न
करने में कोई बाधा तो नहीं है ? किन्तु ऐसी बात होती नहीं है । अनुमान को
जितने माननेवाले दार्शनिक हैं, उनमें से कोई भी एक आकार-प्रकार की अनुमिति
के रहते हुए उसी आकार-प्रकार की दूसरी अनुमिति की सत्ता को स्वीकार नहीं
करते; किन्तु किसी की स्वीकृति और अस्वीकृति मात्र पर वस्तु के सामर्थ्य को
अन्यथा नहीं किया जा सकता । फलतः एक अनुमिति रूप सिद्धि के रहते हुए
परामर्श के रहने पर भी दूसरी अनुमिति न हो सके, इसके लिए परामर्श के समान
ही अनुमिति का एक और साक्षात् कारण माना गया है, जिसका नाम है 'पक्षता' ।
इसका ऐसा स्वरूप या लक्षण होना चाहिए, जिससे एक अनुमिति या अन्य किसी
प्रकार की सिद्धि के रहते हुए कथित दूसरी अनुमिति की आपत्ति न हो सके। इसी
प्रयोजन को सामने रखकर पक्षता के अनेकलक्षण किये गये हैं । जैसे कि (१) साध्य
का संशय ही पक्षता है । (२) अनुमित्सा ही पक्षता है । (३) अथवा अनुमित्सा
की योग्यता पक्षता है । (४) सिद्धि का अभाव ही पक्षता है । पक्षता के इन सभी
लक्षण करनेवालों की यही दृष्टि रही है कि अनुमिति या अन्य किसी भी प्रकार
की सिद्धि के रहते हुए उक्त प्रकार के लक्षणों से आक्रान्त किसी भी पक्षतारूप
कारण का रहना सम्भव न हो; क्योंकि सभी के साथ सिद्धि का विरोध है । अतः
सिद्धि के रहते हुए पक्षतारूप कारण का संवलन सम्भव ही नहीं है । अतः एक
अनुमिति के बाद दूसरी अनुमिति की आपत्ति नहीं दी जा सकती ।

भूमिका ३३
पक्षता के ये जितने भी लक्षण कहे गये हैं, उन सभी लक्षणों का तत्त्वचिन्ता-
मणिकार ने खण्डन किया है । खण्डन की युक्तियों को विस्तृत रूप से चिन्तामणि
के पक्षता प्रकरण में देखना चाहिए । संक्षेप में तत्त्वचिन्तामणिकार कहना है कि
एक अनुमिति के रहते हुए परामर्शादि सभी कारणों के रहने पर भी जब दूसरी
अनुमिति नहीं होती है, तो पहली अनुमिति या सिद्धि को दूसरी अनुमिति का
प्रतिबन्धक मानना पड़ेगा; क्योंकि और सभी कारणों के रहने पर भी जिसके
रहते कार्य उत्पन्न न हो सके, उसे ही कार्य का प्रतिबन्धक कहा जाता है ।
प्रतिबन्धक का अभाव भी कार्य का एक कारण ही है । अतः प्रकृत में सिद्धि का
भी अभाव भी अनुमिति का एक कारण है । जिसके चलते एक अनुमिति के बाद
तुरन्त दूसरी अनुमिति नहीं हो पाती । अतः सिद्धि का अभाव ही पक्षता है;
किन्तु कभी-कभी एक सिद्धि के रहते हुए भी विषय को विशेष प्रकार की जानने
की इच्छा से तुरन्त दूसरी अनुमिति होती है । जैसे कि आत्मा को विशेष प्रकार से
सजाने की इच्छा से आत्मा के श्रवण रूप सिद्धि के बाद भी मनन (अनुमिति) का
विधान 'आत्मा वारे श्रोतव्यो मन्तव्यः' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा किया गया है ।
अगर जिस किसी भी प्रकार की भी सिद्धि के रहने पर दूसरी अनुमिति के रूप
सिद्धि बिलकुल ही नहो, तो फिर उक्त विधान असङ्गत हो जाएगा । अतः इतना
इसमें जोड़ना आवश्यक है कि विशेष प्रकार की अनुमिति या सिद्धि की इच्छा
रहने पर एक सिद्धि के रहने पर भी दूसरी अनुमिति होती है । अतः सामान्य
रूप से सभी सिद्धियाँ अनुमिति की विरोधिनी नहीं हैं; किन्तु अनुमिति की इच्छा
से असंश्लिष्ट अथवा यों कहिये कि सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि ही
अनुमिति की विरोधिनी है । फलतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त जो सिद्धि,
उसका अभाव ही अनुमिति का पक्षतारूप कारण हैं । इसको समझने के लिए
अनुमिति की इन तीन स्थितियों को समझना आवश्यक है-(१) जहाँ परामर्श के
बाद केवल अनुमितिरूप सिद्धि रहेगी, वहाँ उस सिद्धि के अव्यावहित उत्तर क्षण
में अनुमिति नहीं होगी; क्योंकि यहां कथित पक्षतारूप कारण नहीं है । यहाँ सिद्धि
अनुमित्सा या सिषाधयिषा से युक्त नहीं है, सिषाधयिषा के विरह से युक्त है ।
अतः यह सिद्धि अनुमिति का प्रतिबन्धक है । सुतरां प्रतिबन्धकाभावरूप कारण
या कथित पक्षतारूप कारण के न रहने से अनुमिति का प्रतिरोध होता है । (२)
जहाँ परामर्शादि कारणों के साथ अगर सिषाधयिषा भी है तो फिर उक्त
परामर्शजनित अनुमितिरूप सिद्धि के बाद पुनः अनुमिति होगी; क्योंकि यह
अनुमितिरूप सिद्धि सिषाधयिषा से युक्त नहीं है, अतः सिषाधयिषा के विरह से

प्रकरणसम, (४) साध्यसम और (५) कालात्ययापदिष्ट भेद से पाँच प्रकारों का

३४ प्रशस्तपादभाष्यम्
युक्त नहीं है । अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त न होने के कारण यह सिद्धि
अनुमिति की प्रतिबन्धक कोई दूसरी सिद्धि है, जिसमें सिषाधयिषा का सम्बन्ध
नहीं है । उसका यहाँ अभाव है, अतः पक्षतारूप कारण के रहने से अनुमिति
होगी । (३) जहाँ सिद्धि नहीं वहाँ सिषाधयिषा रहे या न रहे-दोनों ही स्थितियों
में अनुमिति होगी ही; क्योंकि यहाँ कोई भी सिद्धि नहीं है, अतः सिषाधयिषा के
विरह से युक्त सिद्धि भी नहीं है । सुतरां सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि का
अभाव भी अवश्य है । अतः अनुमिति होगी । विस्तृत ज्ञान के लिए अध्यापकों
का साहाय्य अपेक्षित है ।
हेत्वाभास
किसी भी विषय के तत्व को अनुमान के द्वारा समझने के लिए जिस प्रकार
हेतुवों को समझना आवश्यक है, उसी प्रकार जो हेतु नहीं हैं, किन्तु हेतु की तरह
दीखते हैं, उन हेत्वाभासों को भी समझना आवश्यक है । अगर ऐसा न मानें तो
हेतुवों और हेत्वाभासों के सम्मिश्रण से कदाचित् अतत्व भी तत्व की तरह
प्रतिभात अन्त में अभीष्ट प्रवृत्ति को विफल कर देंगे और अनभीष्ट स्थिति में भी
डाल देंगे । अतः हेतुवों की तरह विशेष रूप से आचार्यों ने हेत्वाभासों का भी
निरूपण किया है ।
'हेत्वाभास' शब्द दो व्युत्पत्तियों से निष्पन्न होता है-(१) हेतोराभासा
हेत्वाभासाः और (२) हेतुवदाभासन्ते इति हेत्वाभासाः । इनमें पहली व्युत्पत्ति के
अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है 'हेतु का दोष' ।
महर्षि गौतम ने हेत्वाभासों को (१) सव्यभिचार, (२) विरुद्ध, (३)
प्रकरणसम, (४) साध्यसम और (५) कालात्ययापदिष्ट भेद से पाँच प्रकारों का
माना है और सव्यभिचार हेत्वाभास को समझाने के लिए 'अनैकान्तिकः
सव्यभिचारः' इस सूत्र की रचना की है । जो हेतु साध्य या साध्याभाव इन दोनों
में से किसी एक के साथ नियमित रूप से सम्बद्ध न हो, वही हेतु 'अनैकान्तिक'
है । अर्थात् जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे, केवल साध्य के ही
साथ न रहे, वही हेतु 'अनैकान्तिक' है । सव्यभिचारशब्द के अर्थ की आलोचना
से भी इसी अर्थ की पुष्टि होती है । 'व्यभिचारेण सहितः सव्यभिचारः' इस
व्युत्पत्ति से सव्यभिचार शब्द बना है । 'व्यभिचार' शब्द 'वि' 'अभि' और 'चार'
इन तीन शब्दों से बना है । इनमें 'वि' शब्द विरुद्धार्थक है और 'अभि' शब्द
उभयार्थक है । 'चार' शब्द सम्बन्ध का बोधक है । इसके अनुसार परस्पर
विरोधी दो वस्तुओं के साथ अर्थात् साध्य और साध्याभाव के साथ किसी आश्रय

भूमिका ३५
में हेतु का रहना ही व्यभिचार है। यह व्यभिचार अर्थात् साध्याधिकरण और
साध्याभावाधिकरण दोनों में समान रूप से रहना जिस हेतु का हो, वही
'सव्यभिचार' है।
साध्य के साथ नियत सम्बन्ध ही हेतु की व्याप्ति है। इस व्याप्ति के बल से
ही हेतु साध्य का ज्ञापक होता है। जो हेतु उक्त प्रकार से सव्यभिचार या
अनैकान्तिक होगा वह कभी कथित रीति से व्याप्तियुक्त नहीं हो सकता। अतः
व्यभिचारयुक्त हेतु 'सव्यभिचार' नाम का हेत्वाभास है, हेतु नहीं।
किन्तु बाद में सूक्ष्म निरूपण से यह निष्पन्न हुआ कि व्याप्ति का उक्त स्वरूप
ठीक नहीं है; किन्तु हेतु के नियत सम्बन्ध से युक्त साध्य के साथ सपक्षों में हेतु
का रहना ही हेतु की व्याप्ति है। इस प्रकार व्याप्तिशरीर के दो अंश माने गये,
एक तो साध्य में हेतु का नियत सम्बन्ध अर्थात् व्यापकत्व, दूसरा हेतु के
व्यापकीभूत साध्य का सपक्षों में हेतु के साथ रहना अर्थात् सामानाधिकरण्य। इस
स्थिति में साध्य में हेतु के व्यापकत्ववाला जो अंश है, उसका विरोध परोक्ष रूप
से ही सही, कथित व्यभिचार करेगा; क्योंकि जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों
के साथ रहेगा, उस हेतु की व्यापकता उस साध्य में नहीं जा सकती। व्यापक
होने के लिए यह आवश्यक है कि व्याप्य के अधिकरण में व्यापक का अभाव न
रहे। कथित व्यभिचारी हेतु के आश्रय में तो साध्य का अभाव रहता है। अतः
साध्य कभी भी व्यभिचारी हेतु का व्यापक नहीं हो सकता। इस प्रकार व्याप्ति के
उक्त स्वरूप मानने के पक्ष में भी कथित व्यभिचार दोष से युक्त हेतु अवश्य ही
सव्यभिचार हेत्वाभास होगा।
किन्तु उक्त व्याप्तिशरीर का एक अंश और है 'व्यापकीभूत साध्य का हेतु के
साथ सपक्षों में रहना'। इस अंश को विघटित करनेवाला दोष भी अगर हेतु में
रहेगा तो भी वह 'व्यभिचार' दोष से ही युक्त होने के कारण 'सव्यभिचार'
हेत्वाभास होगा; क्योंकि सामान्यतः व्याप्ति का विघटन ही व्यभिचार होता है।
व्याप्ति के उक्त द्वितीय अंश का विघटन दो प्रकारों से सम्भव है। जिस स्थल
में कोई सपक्ष या विपक्ष नहीं है, वहाँ साध्य का हेतु के साथ सपक्ष में रहना
सम्भव नहीं होगा; क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है। एवं जहाँ संसार के सभी
पदार्थ-पक्ष होंगे, वहाँ भी सपक्ष का मिलना सम्भव नहीं होगा। अतः ऐसे स्थलों
में भी हेतु के साथ साध्य का सामानाधिकरण्य सपक्ष में सम्भव नहीं होगा। पहले
का उदाहरण है 'शब्दो नित्यः शब्दत्वात्'। यहाँ शब्दत्व हेतु केवल शब्द में ही है।
शब्द ही पक्ष है। पक्ष में साध्य अनिर्णीत रहता है। सपक्ष में साध्य और हेतु
दोनों को पहले से निश्चित रहना चाहिए। नित्यत्व निर्णीत है आकाशादि में, वहाँ
शब्दत्व हेतु नहीं है। शब्दत्व निर्णीत है शब्द में, वहाँ नित्यत्व रूप साध्य ही