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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

१९६ वेदान्तसार विज्ञानमयादिकोशत्रयं जाग्रद्वासनामयत्वात्स्वप्नोऽत एव स्थूलशरीरलयस्थानमिति चोच्यते। एतौ सूत्रात्मतैजसौ तदानीं मनोवृत्तिभिः सूक्ष्मविषयाननुभवतः ‘प्रविविक्तभुक्तैजस’ इत्यादिश्रुतेः। अत्रापि समष्टिव्यष्ट्योस्तदुपहितसूत्रात्म- तैजसयोर्वनवृक्षवत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च जलाशयजलवत्तद् तप्रतिबिम्बा- काशवच्चाभेदः। एवं सूक्ष्मशरीरोत्पत्तिः॥१४॥ पदच्छेद-अत्र अपि अखिलसूक्ष्मशरीरम् एकबुद्धिविषयतया वनवत् जलाशयवत् वा समष्टिः अनेकबुद्धि-विषयतया वृक्षवत् जलवत् वा व्यष्टिः अपि भवति। एतत् समष्टि उपहितम् चैतन्यम् सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भः प्राणः च इति उच्यते। सर्वत्र अनुस्यूतत्वात् ज्ञानेच्छा-क्रिया शक्तिमद् उपहितत्वात् च अस्य एषा समष्टिः स्थूलप्रपञ्च-अपेक्षया सूक्ष्मत्वात् सूक्ष्मशरीरम्, विज्ञानमयादि कोशत्रयम् जाग्रद् वासनामयत्वात् स्वप्नः, अत एव स्थूल-प्रपञ्चलयस्थानम् इति च उच्यते। एतद् व्यष्टि-उपहितम् चैतन्यम् तेजसः भवति, तेजोमय-अन्तःकरण-उपहितत्वात्। अस्य अपि इयम् व्यष्टिः स्थूलशरीर-अपेक्षया सूक्ष्मत्वाद् इति हेतोः एव सूक्ष्मशरीरम्, विज्ञानमयादि कोशत्रयम्, जाग्रद्वासनामयत्वात् स्वप्नः अतः एव स्थूलशरीर-लयस्थानम् इति च उच्यते। एतौ सूत्रात्मतेजसौ तदानीम् मनोवृत्तिभिः सूक्ष्मविषयान् अनुभवतः ‘प्रविविक्तभुक् तेजसः’ इत्यादि श्रुतेः। अत्र अपि समष्टि-व्यष्ट्योः तद् उपहित-सूत्रात्मतैजसयोः वनवृक्षवत् तद् अवच्छिन्न-आकाशवत् च जलाशय-जलवत् तद्गत-प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च अभेदः। एवम् सूक्ष्मशरीरोत्पत्तिः।।14।। अनुवाद-यहाँ भी सम्पूर्ण चराचर के सूक्ष्मशरीर, एकत्व के ज्ञान का विषय होने से वन अथवा जलाशय के समान समष्टि एवं अनेकत्व के ज्ञान का विषय होने से वृक्ष अथवा जल के समान व्यष्टि वाला भी होता है। इस समष्टि से उपहित चैतन्य सर्वत्र व्याप्त होने तथा ज्ञान, इच्छा एवं क्रियाशक्ति से सम्पन्न होने के कारण (क्रमशः) सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ और प्राण इसप्रकार कहा जाता है। इसकी यह समष्टि स्थूलप्रपञ्च की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण ‘सूक्ष्म-शरीर’, विज्ञानमय आदि कोशत्रय से युक्त, जाग्रत् अवस्था में

सूक्ष्मशरीर निरूपण १९७ वासनायुक्त होने से 'स्वप्न', इसीलिए स्थूलप्रपञ्च का 'लयस्थान' भी कही जाती है। व्यष्टिरूप उपाधि से युक्त यह चैतन्य, तेजोयुक्त अन्तःकरण उपाधि से युक्त होने से 'तैजस्' होता है। इसकी भी यह व्यष्टि स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने रूपकारण से ही सूक्ष्मशरीर, विज्ञानमय आदि कोशत्रय से युक्त, एवं जाग्रत अवस्था में वासनायुक्त होने से स्वप्न, अतएव स्थूलशरीर का लयस्थान इस रूप में भी कहलाता है। सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों उससमय (भी) मनोवृत्तियों द्वारा सूक्ष्मविषयों का अनुभव करते हैं। "सूक्ष्मभोग करने वाला तैजस् है" इत्यादि श्रुति का वचन (इसमें प्रमाण है।) यहाँ भी समष्टिव्यष्टि एवं उनकी उपाधि से युक्त - सूत्रात्मा तथा तैजस् दोनों में वन और वृक्ष, उससे अवच्छिन्न आकाश के समान, जलाशय एवं जल तथा उसमें प्रतिबिम्बित आकाश के समान अभेद ही है। इसप्रकार सूक्ष्मशरीर की उत्पत्ति होती है। 'चन्द्रिका'-पूर्ववर्णित समष्टि एवं व्यष्टि के समान यहाँ भी सम्पूर्ण चराचरजगत् के अनन्तसंख्या वाले सूक्ष्मशरीरों को जब एक मानकर व्यवहार करते हैं, तो एकत्व की विवक्षा में वे सब एक बुद्धि का विषय होने के कारण वन अथवा जलाशय के समान 'समष्टि' इस रूप में व्यवहृत होते हैं तथा उनको ही जब हम अलग-अलग अनेक मानकर व्यवहार करते हैं तो अनेक जीवों के स्व-स्व बुद्धि का विषय होने के कारण ये वृक्ष अथवा जल के समान 'व्यष्टि' इस पद द्वारा व्यवहृत होते हैं। सूक्ष्मशरीरों की इस समष्टि से युक्त चैतन्यात्मा सर्वत्र व्याप्त होने तथा ज्ञान, इच्छा एवं क्रियाशक्ति से युक्त होने के कारण क्रमशः सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ तथा प्राण कहा जाता है, क्योंकि विज्ञानमयकोश ज्ञान का, मनोमयकोश इच्छाशक्ति का तथा प्राणमयकोश क्रियाशक्ति का प्रतीक है। इन सबमें चैतन्यात्मा माला में सूत्र के समान विद्यमान रहता है, इसीलिए इसे सूत्रात्मा कहा जाता है। सूत्रात्मा एवं हिरण्यगर्भ की यह समष्टि स्थूलप्रपञ्च की अपेक्षा सूक्ष्म होती है। इसीलिए सूक्ष्मशरीर भी कहलाती है। इसके अतिरिक्त इस समष्टि में विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय तीन कोश होने से 'कोशत्रय' तथा विराट्रूप में अनुभव की गई स्थूलप्रपञ्च से सम्बन्धित वासना से युक्त होने के कारण 'स्वप्न' कहलाती है, क्योंकि चैतन्य स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत दैनिक व्यवहार में जिस-जिसप्रकार की अनुभूति करता है वे सभी भाव वासनारूप

१९८ वेदान्तसार में उसके अन्दर विद्यमान रहते हैं। उन्हीं भावों को वह स्वप्नावस्था में अनुभव करता है। इसके अलावा प्रलयकाल की अवस्था में सम्पूर्ण स्थूल प्रपञ्च का विलय भी इसी सूक्ष्मशरीर में होता है। इसलिए इसे 'लयस्थान' भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट, अलग-अलग सूक्ष्मशरीर से उपलक्षित चैतन्य की 'तैजस्' संज्ञा होती है। समष्टि के समान ही यह भी स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण 'सूक्ष्मशरीर', विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीन कोशों से युक्त होने से 'कोशत्रय' तथा चैतन्य द्वारा अनुभव की गई स्थूलशरीर सम्बन्धित वासनाओं से युक्त होने से 'स्वप्न' तथा स्थूलशरीर का लय होने से 'लयस्थान' कहलाती है। सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों सूक्ष्ममनोवृत्तियों द्वारा स्थूलशरीर में अनुभव किए गए वासनामय शब्दादि विषयों का स्वप्नावस्था में भी ठीक उसीप्रकार अनुभव करते हैं, जिसप्रकार ईश्वर और प्राज्ञ अज्ञान की सूक्ष्मवृत्तियों द्वारा सुषुप्ति अवस्था में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसका पूर्णवाक्य इसप्रकार है- 'स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्गः एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसः' अर्थात् बाह्यविषयों से असम्बद्ध 'तैजस्' संज्ञा वाला चैतन्य स्वप्नावस्था में भी अपने सात अंगों एवं उन्नीस मुखों से वासनामय सूक्ष्मशब्द आदि विषयों का उपभोग करता है। यहाँ उन्नीस मुखों से अभिप्राय पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कुल उन्नीस तत्त्वों से है तथा सात अंग-अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु, वेद, दिशा, आकाश तथा पृथिवी को माना गया है। इसप्रकार यहाँ भी विज्ञानमय आदि कोशत्रय की समष्टि तथा उससे उपहित सूत्रात्मारूप चैतन्य की तथा इसी की व्यष्टिरूप विज्ञानमय आदि कोशत्रय तथा उससे अवच्छिन्न तैजस् संज्ञा वाले चैतन्य की, ठीक उसीप्रकार अभिन्नता मानी गयी है, जैसे-वन एवं वृक्ष तथा उनसे अवच्छिन्न आकाश में अभिन्नता होती है। इसीप्रकार जैसे-जल एवं जलाशय तथा उनमें प्रतिबिम्बित आकाश में ऐक्य है। अतः सूत्रात्मा एवं तैजस् इन दोनों का भेद समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से नाममात्र का भेद है। वास्तविकदृष्टि से समष्टि एवं व्यष्टि तथा उनमें स्थित सूत्रात्मा एवं तैजसरूप चैतन्य वस्तुतः एक ही हैं। इसप्रकार

सूक्ष्मशरीर निरूपण १९९ अपञ्चीकृत पञ्चभूतों की सृष्टि 'सूक्ष्मशरीर' का समष्टिव्यष्टि की दृष्टि से भी विवेचन किया गया एवं उनकी परस्पर एकता भी प्रदर्शित की गई। विशेष-(1) स्वप्न-जाग्रत अवस्था में सांसारिकविषयों का अनुभव करने के परिणामस्वरूप बनी वासनाएँ ही चित्त में विद्यमान रहती हैं, जो स्वप्न में अनुभव की जाती हैं। इसप्रकार स्वप्न केवल वासनामय ही होता है। सूक्ष्मशरीर को भी जाग्रत अवस्था में विषयों के अनुभवरूप वासनाओं से उत्पन्न होने से 'स्वप्न' माना गया है। (2) समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' तथा व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' कहा गया है, जिसमें वन एवं वृक्ष के समान ऐक्य बताया गया है। (3) सम्पूर्ण चराचर के अनन्त सूक्ष्मशरीरों में माला के सूत्र के समान विद्यमान होने से समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' कहा गया है। (4) इसीप्रकार तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट होने के कारण पृथक्-पृथक् सूक्ष्मशरीरों में स्थित व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' संज्ञा प्रदान की गई है। (5) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रस्तुत कर सकते हैं- सूक्ष्मशरीर ┌───────────────────────────┴───────────────────────────┐ समष्टि व्यष्टि │ │ एक ही ज्ञान का विषय तवच्छिन्न अनेक उपलब्धियों का विषय ↗ ↖ जलाशय आकाश जल ↓ चैतन्य वन ───► वत् ◄─── वृक्ष चैतन्य │ ↓ │ सूत्रात्मा अभेद तैजस् हिरण्यगर्भ प्राण │ │ │ │ (माला में सूत्र के ──► प्राण ज्ञान इच्छा क्रिया समान स्थित होने से) हिरण्यगर्भ │ │ │ │ │ (तेजोमय विशिष्ट │ │ ज्ञान इच्छा क्रिया◄── अन्तःकरण सम्पन्न) │ │ │ │ │ └───────┬───────┘ └─────┬───────┘ शक्ति सम्पन्न होने से शक्ति सम्पन्न होने से ───► सूक्ष्मशरीर कोशत्रय स्वप्न लयस्थान अवतरणिका-सूक्ष्मशरीर एवं उसकी समष्टिव्यष्टि के ऐक्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् ग्रन्थकार स्थूलसृष्टि के लिए आवश्यक पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख करते हैं-

२०० वेदान्तसार स्थूलभूतानि तु पञ्चीकृतानि। पञ्चीकरणं त्वाकाशादिपञ्चस्वेकैकं द्विधा समं विभज्य तेषु दशसु भागेषु प्राथमिकान्पञ्चभागान्प्रत्येकं चतुर्धा समं विभज्य तेषां चतुर्णां भागानां स्वस्वद्वितीयार्धभागपरित्यागेन भागान्तरेषु संयोजनम्। तदुक्तम्- “द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्वस्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात्पञ्चपञ्च ते” इति॥ पदच्छेद- स्थूलभूतानि तु पञ्चीकृतानि। पञ्चीकरणम् तु-आकाशादि पञ्चसु एकैकम् द्विधा समम् विभज्य तेषु दशसु भागेषु प्राथमिकान् पञ्चभागान् प्रत्येकम् चतुर्धा समम् विभज्य, तेषाम् चतुर्णाम् भागानाम् स्व-स्वद्वितीय-अर्धभाग-परित्यागेन भागान्तरेषु संयोजनम्। तद् उक्तम्- अन्वय- “प्रथमम् (प्रत्येकम्) द्विधा विधाय, पुनः एक-एकम् चतुर्धा (विधाय) स्व-स्व-इतर द्वितीयांशैः योजनात् ते पञ्च-पञ्च एव भवन्ति।” अनुवाद-पञ्चीकृत (महाभूतों) को ही स्थूलभूत (कहा जाता है)। पञ्चीकरण तो (वह है जिसमें) आकाश आदि सूक्ष्मपञ्चभूतों में से प्रत्येक को दो भागों में बराबर विभाजित करके, उन दस भागों के, प्रथम पञ्च भागों में से प्रत्येक को पुनः चार बराबर भागों में विभाजित करके, उन चार भागों को अपने-अपने द्वितीय अर्धभाग को छोड़कर दूसरे भागों में मिलाया जाता है। इसीलिए कहा भी गया है- सर्वप्रथम (प्रत्येक सूक्ष्मभूत को) समान दो भागों में विभाजित करके, तत्पश्चात् (प्रथम पाँच में से) प्रत्येक को चार भागों में विभक्त करके, अपने-अपने अंश को छोड़कर, अन्य भूतों के अर्धांश के साथ जोड़ने से वे पाँच (सूक्ष्मभूत) पाँच (स्थूलभूत) हो जाते हैं। 'चन्द्रिका'-यहाँ तक ग्रन्थकार ने अपञ्चीकृतसूक्ष्मभूतों से सूक्ष्मप्रपञ्च की उत्पत्ति का विस्तारपूर्वक कथन किया। तदनन्तर स्थूलप्रपञ्च की उत्पत्ति के प्रतिपादन का उपक्रम करते हैं, किन्तु इससे पूर्व वेदान्त के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त पञ्चीकरण की प्रक्रिया को कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण स्थूल प्रपञ्च की उत्पत्ति पञ्चीकृतमहाभूतों द्वारा ही होती है। तदनुसार- पञ्चीकरण प्रक्रिया-आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के सर्वप्रथम दो-दो भाग किए जाते हैं। इसप्रकार प्राप्त हुए दस भागों में से प्रथम पाँच भागों को पुनः चार-चार भागों में विभाजित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप एक

पञ्चीकरण प्रक्रिया

पञ्चीकरण प्रक्रिया २०१ सूक्ष्मभूत अपने पाँच भागों में विभक्त हो जाता है-प्रथम 1/2+1/8+1/8+ 1/8+1/8=एक (एक आधा भाग तथा शेष चार 1/8 भाग)। पुनः इन सब भागों में से अपने-अपने आधे भाग को छोड़कर अन्य सूक्ष्मभूत का एक-एक अष्टमांश 1/8 भाग दूसरे चारों भागों में मिला दिया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक महाभूत में आधा अपना तथा शेष चार सूक्ष्मभूतों का 1/8 अष्टमांश मिलने पर प्रत्येक आकाश आदि भूत पूर्णता को प्राप्त करके, पञ्चीकृतमहाभूत की संज्ञा को प्राप्त कर लेता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्नप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-४१ पञ्चीकरण प्रक्रिया | | आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी | | | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 | | 1/8 | वायु | आकाश | आकाश | आकाश | आकाश | | 1/8 | अग्नि | अग्नि | वायु | वायु | वायु | | 1/8 | जल | जल | जल | अग्नि | अग्नि | | 1/8 | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | जल | पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से स्थूलसृष्टि का निर्माण होता है। जिसका वर्णन आगे किया जाएगा। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका को प्रमाणरूप में प्रयुक्त करते हैं। इस कारिका का अभिप्राय भी वही है जो ऊपर गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है। विशेष-(1) उपर्युक्त प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक विस्तारपूर्वक चित्रात्मक ढंग से समझने के लिए द्रष्टव्य चित्र संख्या 9 एवं 10 (भूमिका)। (2) आचार्य सुरेश्वर ने इसी पञ्चीकरणप्रक्रिया को अपने वार्तिक में इसप्रकार प्रतिपादित किया है, जो अपेक्षाकृत अधिक सरल प्रतीत होता है- पृथिव्यादीनि भूतानि प्रत्येकं विभजेद् द्विधा। एकैकं भागमादाय चतुर्धा विभजेत् पुनः॥ एकैकं भागमेकस्मिन् भूते संवेशयेत्क्रमात्। ततश्चाकाशभूतस्य भागाः पञ्च भवन्ति हि॥

२०२ वेदान्तसार वाय्वादि भागांश्चत्वारो वाय्वादिष्वेवमादिशेत्। पञ्चीकरणमेतत्सstructure/word: पञ्चीकरणमेतत्स्यादित्याहुस्तत्त्ववेदिनः॥ अवतरणिका-पञ्चीकरणप्रक्रिया का निरूपण करने के प्रसङ्ग में ही उपनिषद् प्रतिपादित त्रिवृत्करण की प्रक्रिया को पञ्चीकरणप्रक्रिया का ही उपलक्षण बताते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्याप्युप- लक्षणत्वात्। पञ्चानां पञ्चात्मकत्वे समानेऽपि तेषु च “वैशेष्यात्तद्वादस्तद्वाद” इतिन्यायेनाकाशादिव्यपदेशः सम्भवति। तदानीमाकाशे शब्दोऽभिव्यज्यते वायौ शब्दस्पर्शावग्नौ शब्दस्पर्शरूपाण्यप्सु शब्दस्पर्शरूपरसाः पृथिव्यां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाश्च॥१५॥ पदच्छेद-अस्य अप्रामाण्यम् न आशङ्कनीयम् त्रिवत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्य अपि उपलक्षणत्वात्। पञ्चानाम् पञ्चात्मकत्वे समाने अपि तेषु च “वैशेष्यात् तद्वादः तद्वादः” इति न्यायेन आकाशादि व्यपदेशः सम्भवति। तदानीम् आकाशे-शब्दः अभिव्यज्यते, वायौ-शब्दस्पर्शौ अग्नौ-शब्द-स्पर्श- रूपाणि, अप्सु-शब्द-स्पर्श-रूप-रसाः, पृथिव्याम्-शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः च॥।15॥ अनुवाद- श्रुति का त्रिवृत्करण (यहाँ बताए गए) पञ्चीकरण का भी उपलक्षण होने के कारण, इसके अप्रामाण्य की आशङ्का नहीं करनी चाहिए। पाँचों (महाभूतों) में पाँचों के समानभाग मिले हुए होने पर भी उन सबमें प्रधान अंश के आधार पर उस-उसको कहे जाने रूप न्याय से ही (उनमें) आकाश आदि का व्यवहार सम्भव होता है। उस समय ही आकाश में शब्द, वायु में शब्द एवं स्पर्श, अग्नि में शब्द, स्पर्श एवं रूप, जलों में शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध की अभिव्यक्ति होती है। ‘चन्द्रिका'-छान्दोग्योपनिषद् (6.3.3) में सर्वप्रथम अग्नि की उत्पत्ति कही गई है तथा उसके बाद अग्नि से जल एवं जल से पृथिवी की उत्पत्ति का कथन करके, उनके त्रिवृत्करण द्वारा स्थूलसृष्टि की उत्पत्ति बतायी गयी है- “सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः, अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि। तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि, इति सेयं देवते- मास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् (6.3.2-3)

पञ्चीकरण प्रक्रिया २०३ त्रिवृत्करण के अनुसार अग्नि, जल और पृथिवी इन तीनों को सर्वप्रथम दो बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। पुनः प्रथम तीन अर्धांशों को फिर से दो भागों में विभाजित करके, उनका एक-एक भाग पूर्व के अर्धांश में जोड़ दिया जाता है। जिससे त्रिवृत्भूत का निर्माण होता है। ठीक इस प्रकार- चित्र-४२ 1/4 जल 1/4 पृथिवी 1/4 अग्नि 1/4 अग्नि 1/2 जल 1/2 पृथिवी 1/2 पृथिवी 1/4 अग्नि 1/4 जल 1/4 अग्नि जल पृथिवी किन्तु आचार्य सदानन्द ने यहाँ पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति का कथन किया है। अतः इस विषय में शङ्का होना स्वाभाविक है कि त्रिवृत्करण को स्थूलसृष्टि का कारण माना जाए अथवा पञ्चीकरण की प्रक्रिया को? इसी शङ्का के समाधान में ग्रन्थकार कहते हैं कि उपनिषद् में प्रतिपादित त्रिवृत्करण प्रस्तुत पञ्चीकरण का उपलक्षण है अर्थात् वह अपना भी बोध कराता है तथा प्रस्तुत पञ्चीकरण का भी द्योतक है। वस्तुतः स्थूलसृष्टि का निर्माण पञ्चसूक्ष्मभूतों की पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा ही होता है। अतः छान्दोग्योपनिषद् में प्रतिपादित त्रिवृत्करण को पञ्चमहाभूतों की सृष्टि में प्रयुक्त पञ्चीकरण का उपलक्षण मानना चाहिए। इस प्रसङ्ग में पुनः एक शङ्का की जा सकती है कि यदि पञ्चीकरण प्रक्रिया के परिणामस्वरूप स्थूलमहाभूतों की सृष्टि के सिद्धान्त को मान भी लिया जाए तो, वायु में पृथिवी का अंश होने के कारण हमें उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष होना चाहिए। इसीप्रकार आकाश में जल एवं पृथिवी का अंश होने के कारण उसका स्पर्श द्वारा प्रत्यक्ष होने के साथ-साथ चाक्षुषप्रत्यक्ष एवं गन्ध की उपलब्धि भी होनी चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता है। अतः पञ्चीकरण की प्रामाणिकता पर संदेह किया जा सकता है। इस शङ्का के समाधान के लिए ग्रन्थकार कहते हैं कि पञ्चीकरण प्रक्रिया द्वारा यद्यपि पाँचों महाभूतों में पाँचों सूक्ष्मभूतों के अंश विद्यमान रहते

स्थूलसृष्टि-निरूपण

२०१४ वेदान्तसार हैं, किन्तु इनमें अपने-अपने अंश की अधिकता के कारण ही तत्-तत् नाम से उनका व्यवहार किया जाता है एवं तत्-तत् अंश की अधिकता से अपने-अपने गुणों की अनुकूलता के आधार पर ही सम्बन्धित इन्द्रियों द्वारा उसका प्रत्यक्ष किया जाता है। इसीलिए पञ्चीकृत आकाश में शब्द। वायु में शब्द एवं स्पर्श। अग्नि में शब्द, स्पर्श एवं रूप। जल में शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि अपने-अपने कारणों के अनुसार स्पष्टरूप से अनुभव किए जा सकते हैं। विशेष-(1) पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख न तो बादरायण ने शारीरकसूत्रों में किया है और न ही आचार्य शङ्कर ने अपने भाष्य में इसकी चर्चा की है। (2) अपितु सर्वप्रथम इसका वर्णन उत्तरकालीन टीकाकार आनन्दज्ञान ने किया है। (3) इसीकारण पाश्चात्यविद्वान् डयूसन ने उपनिषदों में प्रतिपादित त्रिवृत्करण के सिद्धान्त को भारतीयदर्शनों की विकासपरम्परा में अपेक्षाकृत पूर्व अवस्था का द्योतक स्वीकार किया है। (4) यहाँ प्रयुक्त 'उपलक्षण' से अभिप्राय निर्देशन अथवा संकेतमात्र से ग्रहण करना चाहिए। (5) वैशेष्यात्तद्वादस्तद्वाद न्याय-यदि किसी एक वस्तु में एकाधिक तत्त्व विद्यमान हो तो अधिकता के आधार पर उसका सम्बोधन किया जाता है-इसीको 'वैशेष्यात् तद्वादः' कहा जाएगा। आकाश आदि पञ्चीकृत महाभूतों के नामकरण का भी यही सिद्धान्त आधाररूप में बताया गया है, क्योंकि जिस नाम से महाभूत को जाना जाता है, उसमें उसका आधा भाग विद्यमान रहता है। (6) त्रिवृत्करण को अपेक्षाकृत विस्तारपूर्वक समझने के लिए भूमिका में चित्रसंख्या-12 भी द्रष्टव्य है। अवतरणिका-पञ्चीकरण एवं इसी प्रसङ्ग में त्रिवृत्करण का उल्लेख करने के बाद ग्रन्थकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया के पश्चात् उत्पन्न पञ्चमहाभूतों से होने वाली स्थूलसृष्टि का कथन करते हैं- एतेभ्यः पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यो भूर्भुवःस्वर्महर्जनस्तपः सत्यमित्येतन्नामकानामुपर्य्युपरिविद्यमानानामतलवितलसुतलरसातलतलातल-

स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०५ महातलपातालनामकानामधोऽधोविद्यमानानां लोकानां ब्रह्माण्डस्य तदन्तर्वर्तिचतुर्विधस्थूलशरीराणां तदुचितानामन्नपानादीनां चोत्पत्तिर्भवति। चतुर्विधशरीराणि तु जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजाख्यानि। जरायुजानि जरायुभ्यो जातानि मनुष्यपश्वादीनि। अण्डजान्यण्डेभ्यो जातानि पक्षिषन्नगादीनि। उद्भिज्जानि भूमिमुद्भिद्य जातानि लतावृक्षादीनि। स्वेदजानि स्वेदेभ्यो जातानि यूकामशकादीनि॥१६॥ पदच्छेद- एतेभ्यः पञ्चीकृतेभ्यः भूतेभ्यः भूभुवः-स्वः-महः-जनः-तपः- सत्यम्-इति एतत् नामकानाम् उपर्युपरि विद्यमानानाम् अतल-वितल-सुतल-रसातल- तलातल-महातल-पाताल-नामकानाम् अधोऽधः विद्यमानानाम् लोकानाम्, ब्रह्माण्डस्य तद् अन्तर्वर्ति-चतुर्विध-स्थूलशरीराणाम् तद् उचितानाम् अन्नपान-आदीनाम् च उत्पत्तिः भवति। चतुर्विध-शरीराणि तु जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज-आख्यानि। जरायुजानि-जरायुभ्यः जातानि, मनुष्य-पशु-आदीनि। अण्डजानि-अण्डेभ्यः जातानि, पक्षि-पन्नग-आदीनि। उद्भिज्जानि-भूमिम् उद्भिद्य जातानि लता वृक्ष-आदीनि। स्वेदजानि-स्वेदेभ्यः जातानि, यूका मशक-आदीनि।।16।। अनुवाद-इन पञ्चीकृत महाभूतों में भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् इत्यादि नाम वाले ऊपर-ऊपर विद्यमान लोकों की और अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल नामक अधोवर्ती भुवनों की, ब्रह्माण्ड की तथा उनमें विद्यमान चार प्रकार के स्थूलशरीरों की एवं उनके योग्य अन्नपान आदिकों की उत्पत्ति होती है। जबकि जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज एवं स्वेदज नामक चार प्रकार के (स्थूल) शरीर हैं। जरायु से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि जरायुज (नामक स्थूलशरीर) हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सर्प आदि अण्डज हैं। पृथिवी को भेदकर उत्पन्न होने वाले लता, वृक्ष आदि उद्भिज्ज हैं तथा पसीने से पैदा होने वाले जूँ, मच्छर आदि स्वेदज (नामक स्थूल शरीर) हैं। 'चन्द्रिका'-उपर्युक्त गद्यखण्ड का अर्थ स्पष्ट होने से व्याख्या की आवश्यकता नहीं है। विशेष-(1) प्रस्तुत अंश में भूः आदि सात ऊर्ध्वलोक, पाताल आदि सात अधोलोक, इसप्रकार कुल चौदहभुवन, उनसे निर्मित सम्पूर्णब्रह्माण्ड तथा उन लोकों में विद्यमान चार प्रकार के स्थूलशरीर-जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज

२०६ वेदान्तसार तथा स्वेदज के साथ-साथ इनके पोषण के योग्य भोगपदार्थों अन्नपान आदि की उत्पत्ति का कथन किया गया है। (२) प्रस्तुत गद्यखण्ड को चित्रात्मकदृष्टि से समझने के लिए द्रष्टव्य भूमिका में चित्र संख्या-11 एवं 17 । अवतरणिका-तत्पश्चात् स्थूलप्रपञ्च का समष्टिव्यष्टि की दृष्टि से निरूपण करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- अत्रापि चतुर्विधसकलस्थूलशरीरमेकानेकबुद्धिविषयतया वनवज्जलाशयवद्वा समष्टिर्वृक्षवज्जलवद्वा व्यष्टिरपि भवति। एतत्समष्ट्युपहितं चैतन्यं वैश्वानरो विराडित्युच्यते सर्वनराभिमानित्वाद्विविधं राजमानत्वाच्च। अस्यैषा समष्टिः स्थूलशरीरमन्नविकारत्वादन्नमयकोशः स्थूल भोगायतनत्वाच्च स्थूलशरीरं जाग्रदिति च व्यपदिश्यते। एतद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं विश्व इत्युच्यते सूक्ष्मशरीराभिमानपरित्यज्य स्थूलशरीरादि- प्रविष्टत्वात्। अस्याप्येषा व्यष्टिः स्थूलशरीरमन्नविकारत्वादेव हेतोरन्नमयकोशो जाग्रदिति चोच्यते। तदानीमेतौ विश्ववैश्वानरौ दिग्वातार्कवरुणाश्विभिः क्रमान्नियन्त्रितेन श्रोत्रादीन्द्रियपञ्चकेन क्रमाच्छब्दस्पर्शरूपरसगन्धानग्नीन्द्रोपेन्द्रयम- प्रजापतिभिः क्रमान्नियन्त्रितेन वागादीन्द्रियपञ्चकेन क्रमाद्वचनादानगमन- विसर्गानन्दां श्चन्द्रचतुर्मुखशङ्कराच्युतैः क्रमान्नियन्त्रितेन मनोबुद्ध्यहङ्कार- चित्ताख्येनान्तरिन्द्रियचतुष्केण क्रमात्सङ्कल्पनिश्चयाहङ्कार्याचैतांश्च सर्वानैतान् स्थूलविषयाननुभवतो "जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञ" इत्यादिश्रुतेः। अत्राप्यनयोः स्थूलव्यष्टिसमष्ट्योस्तदुपहितविश्ववैश्वानरयोश्च वनवृक्ष- वत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च जलाशयजलवत्तद् तप्रतिबिम्बाकाशवच्च पूर्ववद्भेदः। एवं पञ्चीकृतपञ्चभूतेभ्यः स्थूलप्रपञ्चोत्पत्तिः॥१७॥ पदच्छेद-अत्र अपि चतुर्विध-सकल-स्थूल-शरीरम् एक-अनेक-बुद्धि विषयतया वनवद् जलाशयवद् वा समष्टिः, वृक्षवद् जलवद् वा व्यष्टिः अपि भवति। एतत् समष्टि-उपहितम् चैतन्यम् वैश्वानरः विराट् इति उच्यते, सर्वनराभिमानित्वाद्, विविधं राजमानत्वात् च। अस्य एषा समष्टिः स्थूलशरीरम्, अन्नविकारत्वाद् अन्नमयकोषः, स्थूल भोगायतनत्वात् च स्थूलशरीरम्, जाग्रद् इति च व्यपदिश्यते। एतत् व्यष्टि-उपहितम् चैतन्यम् विश्वः, इति उच्यते, सूक्ष्मशरीर-अभिमानम्

स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०७ अपरित्यज्य स्थूलशरीरादि-प्रविष्टत्वात्। अस्य अपि एषा व्यष्टिः स्थूलशरीरम्, अन्नविकारत्वाद् एव हेतोः अन्नमयकोशः, जाग्रद् इति च उच्यते। तदानीम् एतौ विश्व-वैश्वानरौ दिग्-वात-अर्क-वरुण-अश्विभिः क्रमात् नियन्त्रितेन श्रोत्रादि इन्द्रियपञ्चकेन क्रमात्, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धान्, अग्नि-इन्द्र-उपेन्द्र-यम-प्रजापतिभिः क्रमात् नियन्त्रितेन वाग् आदि इन्द्रियपञ्चकेन क्रमाद् वचन-आदान-गमन-विसर्ग-आनन्दान्, चन्द्र-चतुर्मुख- शङ्कर-अच्युतैः क्रमात् नियन्त्रितेन, मनः-बुद्धि-अहङ्कार-चित्त-आख्येन अन्तरिन्द्रिय-चतुष्केण क्रमात् सङ्कल्प-निश्चय-अहङ्कार्य-चैत्तान् च सर्वान् एतान् स्थूलविषयान् अनुभवतः, “जागरितस्थानः बहिःप्रज्ञ” इत्यादि श्रुतेः। अत्र अपि अनयोः स्थूलव्यष्टि-समष्ट्योः, तद् उपहित विश्व-वैश्वानरयोः, च, वन-वृक्षवत् तद् अवच्छिन्न-आकाशवत् च जलाशय-जलवत् तद्गत प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च पूर्ववद् अभेदः। एवम् पञ्चीकृत पञ्चभूतेभ्यः स्थूल प्रपञ्च-उत्पत्तिः।।17।। अनुवाद- यहाँ भी चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, एक और अनेक बुद्धियों का विषय होने से वन अथवा जलाशय के समान समष्टि, वृक्ष अथवा जल के समान व्यष्टि भी होते हैं। इस समष्टिरूप उपाधि से उपहित हुआ चैतन्य, सभी प्राणियों का अधिष्ठाता होने एवं विविध रूपों में विराजमान होने के कारण वैश्वानर एवं विराट् कहा जाता है। समष्टिरूप इसका यह स्थूलशरीर (माता-पिता द्वारा खाए हुए) अन्न का विकार होने से अन्नमयकोश, स्थूलभागों का आश्रय होने से स्थूलशरीर तथा (विषयों का भोग करने वाला होने के कारण) जाग्रद् इसप्रकार कहा जाता है। इस व्यष्टिरूप उपाधि से उपहित चैतन्य, सूक्ष्मशरीर के अभिमान का परित्याग किए बिना स्थूलशरीर में प्रविष्ट होने के कारण 'विश्व' इसप्रकार कहा जाता है। इसका भी यह व्यष्टिरूप स्थूलशरीर, अन्न का विकार होने से ही अन्नमयकोश तथा जाग्रद् इसप्रकार कहलाता है। ये दोनों विश्व और वैश्वानर उससमय, दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा अश्विनीकुमारों द्वारा क्रमशः नियन्त्रित श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियों से क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का; अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम, प्रजापति द्वारा क्रमशः नियन्त्रित वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः बोलना, लेना, चलना, विसर्जन और आनन्द का; चन्द्र, ब्रह्मा, शिव और विष्णु द्वारा क्रमशः नियन्त्रित मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त नामक चार अन्तरिन्द्रियों (के

२०८ वेदान्तसार समूह) से क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, अहङ्कार तथा स्मरण आदि इन सम्पूर्ण स्थूलविषयों का अनुभव करते हैं। “जाग्रत अवस्था से युक्त चैतन्य ही बाह्यविषयों से परिचित है” इत्यादि श्रुतिवचन भी (यहाँ प्रमाण है)। यहाँ भी इन दोनों स्थूल व्यष्टि एवं समष्टि में तथा उनसे उपहित विश्व और वैश्वानर में, वन और वृक्ष एवं उससे अवच्छिन्न आकाश के समान, जलाशय और जल तथा उसके प्रतिबिम्बित आकाश के समान पूर्ववत् अभेद होता है। इसप्रकार पञ्चीकृत पाँच महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की उत्पत्ति होती है। ‘चन्द्रिका’-स्थूलसृष्टि का कथन करने के उपरान्त समष्टि-व्यष्टि की दृष्टि से ग्रन्थकार चैतन्य का नामकरण करते हुए उनमें अभेद की स्थापना करते हैं-सम्पूर्ण स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत बताए गए जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज एवं स्वेदज चार प्रकार के स्थूलशरीर एकत्व अथवा अनेकत्व की विवक्षा में प्रत्येक प्राणी की एक बुद्धि तथा अलग-अलग प्राणियों की अलग-अलग अनेक बुद्धियों का विषय होने से, वन एवं जलाशय के समान समष्टि तथा वृक्ष एवं जल के समान व्यष्टिरूप में व्यवहृत होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार सभी वृक्षों को एक साथ कहने की इच्छा से वन एवं सभी जलों को एक साथ कहने की भावना से जलाशय इसरूप में कहा जाता है, ठीक उसीप्रकार विभिन्नप्रकार के स्थूलशरीरों को एक साथ कहने की दृष्टि से एक बुद्धि का विषय तथा अनेकरूप में कहने की विवक्षा से भिन्न-भिन्न शरीर मानकर विभिन्न बुद्धियों का विषय स्वीकार किया जाता है। यही क्रमशः समष्टि एवं व्यष्टि कहलाती है। इस समष्टि से उपहितचैतन्य को वैश्वानर अथवा विराट् कहा जाता है। इसका मुख्यकारण यही है कि समष्टि से उपहित यह चैतन्य सभी प्राणियों में ‘मैं’ इस अभिमान को धारण किए हुए विविधप्रकार से सुशोभित हो रहा है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत विद्यमान अज्ञान की उपाधियुक्त, चार प्रकार के स्थूलशरीरों की यह समष्टि विद्वानों द्वारा ‘स्थूलशरीर’ इस नाम से कही जाती है। इसके अतिरिक्त यह स्थूलशरीर माता-पिता द्वारा खाए गए अन्न द्वारा उत्पन्न होता है, इसलिए ‘अन्नमय’ भी कहलाता है। साथ ही आत्मा का आच्छादक होने के कारण ‘कोश’ एवं सुखदुःख आदि के भोग का आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा तत्तत् विषयों को भोगने के कारण ‘जाग्रत्’ भी कहा जाता है।

स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०९ इसके अलावा उन्हीं चार प्रकार के स्थूलशरीरों की व्यष्टि से उपहित चैतन्य यहाँ ‘विश्व’ कहलाता है। इसका भी मुख्यकारण यही है कि इन अलग-अलग स्थूलशरीरों में रहता हुआ भी वह अपने-अपने सूक्ष्मशरीर के प्रति ‘मैं’ रूप अभिमान को धारण किए हुए, प्रत्येक स्थूलशरीर में विद्यमान रहता है। अज्ञान की यह व्यष्टि भी समष्टि के समान ही ‘स्थूलशरीर’, माता-पिता द्वारा खाए हुए अन्न का विकार होने के कारण ‘अन्नमय’, आत्मा अथवा चैतन्य का आच्छादक होने से ‘कोश तथा सुखदुःख आदि के भोग का आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा उस-उसके विषयों का भोग करने के कारण ‘जाग्रत्’ इन नामों से व्यवहृत होता है। प्रस्तुत गद्यखण्ड के इतने अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझाया जा सकता है- चित्र-४३ चतुर्विध स्थूलशरीर की समष्टि व्यष्टि एकत्व विवक्षा अनेकत्व विवक्षा समष्टि वन अभेद वृक्ष व्यष्टि चैतन्य जलाशय जल चैतन्य वैश्वानर (विराट्) तदवच्छिन्नाकाश विश्व समस्त प्राणियों के विविधरूप में सम्पूर्ण शरीरों में प्रविष्ट होकर मैं इस अभिमान से युक्त स्थूल शरीर अन्नमय कोश जाग्रत (सुख-दुःख के भोग (माता-पिता द्वारा (आत्मा का आच्छादक (इन्द्रियों द्वारा विषयों का आधार) खाए गए अन्न होने से) का भोग करने से) से उत्पन्न होने से) इसप्रकार स्थूलशरीरों की समष्टिव्यष्टि का कथन करने के पश्चात् पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तरिन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवताओं का उल्लेख करते हुए ग्रन्थकार उनके कार्यों का विस्तारपूर्वक कथन करते हैं-

२१० वेदान्तसार इस जाग्रत अवस्था में समष्टिरूप उपाधि से उपहित हुआ वैश्वानर अथवा विराट् नामक यह चैतन्य एवं व्यष्टि-उपाधिरूप 'विश्व' ये दोनों-दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा अश्विनीकुमार देवों से अधिष्ठित क्रमशः श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन गुणों को ग्रहण करते हैं। इसीप्रकार अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम और प्रजापति इन देवताओं से नियन्त्रित क्रमशः वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः बोलना, ग्रहण करना (आदानप्रदान), चलना, मलत्याग एवं आनन्दरूप कार्यों को सम्पादित करते हैं। इसके अतिरिक्त चन्द्र, ब्रह्मा, शङ्कर तथा विष्णु इन देवों द्वारा अधिष्ठित क्रमशः मन, बुद्धि, अहङ्कार तथा चित्तरूपी चार अन्तः इन्द्रियों के माध्यम से क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, गर्व एवं स्मरणरूपी सभी स्थूलविषयों का अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि में माण्डूक्योपनिषद् की उक्ति को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि-“जाग्रत अवस्था से युक्त यह चैतन्य ही सम्पूर्ण बाह्यविषयों से अवगत रहता है।” इस स्थिति में भी अर्थात् स्थूल समष्टि एवं व्यष्टि में, उनसे उपहित 'विश्व' और वैश्वानररूप चैतन्य में वन से अवच्छिन्न आकाश तथा वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश, जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान परस्पर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, अपितु शुद्धचैतन्य की दृष्टि से दोनों समान हैं। तत्पश्चात् अन्त में प्रकरण का उपसंहार करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि इसप्रकार पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की सृष्टि होती है। विशेष-(1) 'अभिमानी' शब्द का प्रयोग यहाँ 'अधिष्ठाता' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड के प्रारम्भिक अंश में प्रयुक्त 'नर' शब्द समस्त प्राणियों का उपलक्षण है। (3) छान्दोग्य एवं श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी वैश्वानर एवं विराट् शब्दों का ही प्रयोग हुआ है।

स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २११ (4) यहाँ प्रयुक्त ‘विविधराजमानत्वात्’ का अभिप्राय देव, पशु, मनुष्य, पर्वत, नदी, समुद्र आदि विविधरूपों में विराजमान होने से, उन सबकी ‘विराट्’ संज्ञा प्रदान करने से है। (5) इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण करने के कारण इसे ‘जाग्रत’ कहा गया है। शङ्कराचार्य एवं सुबोधिनी टीकाकार इस व्याख्या से सहमत हैं- (क) इन्द्रियैरर्थोपलब्धिर्जागरितम् (शङ्कराचार्य) (ख) इन्द्रियैरर्थोपलब्धेश्च जाग्रदवस्थात्वं घटते (सुबोधिनी टीका) (6) स्थूलशरीरादि में प्रयुक्त ‘आदि’ पद को अधिकांश व्याख्याकार निरर्थक मानते हैं, किन्तु विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इसे ‘परम स्थूलशरीर’ के अर्थ में प्रयुक्त माना है। (7) यहां प्रतिपादित इन्द्रियविषयक देवताओं का अधिष्ठातृत्व श्रीमद्भागवत में कही गयी परिकल्पना पर आधारित है। (8) अन्तरिन्द्रियों की संख्या चार मानी गई है-मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार। यद्यपि आचार्य सदानन्द ने मन 'और बुद्धि में चित्त और अहङ्कार का अन्तर्भाव माना है- “अनयोरेव चित्ताहङ्कारयोरन्तर्भावः” (वेदान्तसार) (9) विश्व एवं वैश्वानररूप चैतन्य स्थूलशरीरों में स्थित ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय एवं अन्तःकरणों से सांसारिक स्थूलविषयों का भोग करता है। इन दोनों में दिखायी देने वाला भेद उपाधिमात्र का है, तात्त्विकदृष्टि से दोनों समान हैं। (10) विश्व एवं वैश्वानर की अन्तरिन्द्रिय तथा बाह्य इन्द्रियों के कार्यों को यहाँ प्रतिपादित देवताओं के अधिष्ठातृत्व के अनुसार इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-

स्थूलमहाप्रपञ्च

२१२ वेदान्तसार चित्र-४४ स्थूलशरीरों की ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ समष्टि व्यष्टि वैश्वानर (विराट्) ──> अभेद ── [अधिष्ठातृ देवता] ── अभेद ── विश्व (१) पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ ──┬─ श्रोत्र ── दिक् ── शब्द ──┐ ├─ त्वक् ── वायु ── स्पर्श ──┤ ├─ चक्षु ── सूर्य ── रूप ───┼─ ग्रहण करना ├─ रसना ── वरुण ── रस ───┤ └─ घ्राण ── अश्विन् ─ गन्ध ──┘ (२) पञ्चकर्मेन्द्रियाँ ──┬─ वाक् ─── अग्नि ─── बोलना ──────┐ ├─ पाणि ── इन्द्र ─── आदान-प्रदान ─┤ ├─ पाद ─── उपेन्द्र ─ चलना ──────┼─ क्रियाएँ सम्पादित करना ├─ पायु ─── यम ──── विसर्जन ────┤ └─ उपस्थ ── प्रजापति ─ आनन्द ─────┘ (३) अन्तरिन्द्रियाँ ───┬─ मन ──── चन्द्र ── संकल्प-विकल्प ─┐ ├─ बुद्धि ── ब्रह्मा ─ निश्चय ───────┤ ├─ अहङ्कार ─ शिव ─── गर्व ─────────┼─ करना └─ चित्त ── विष्णु ─ स्मरण ────────┘ अवतरणिका—इसप्रकार स्थूलप्रपञ्च का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के पश्चात् स्थूलमहाप्रपञ्च की समष्टिव्यष्टि एवं उनमें स्थित चैतन्य में ऐक्य प्रतिपादित करते हैं— एतेषां स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चानामपि समष्टिरेको महान्प्रपञ्चो भवति यथावान्तरवनानां समष्टिरेकं महद्वनं भवति यथा वावान्तरजलाशयानां समष्टिरेको महान् जलाशयः। एतदुपहितं वैश्वानरादीश्वरपर्यन्तं चैतन्यमप्यवान्तरवनावच्छिन्नाकाशवदवान्तरजलाशयगतप्रतिबिम्बाकाशव- च्चैकमेव। आभ्यां महाप्रपञ्चतदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायः पिण्डवदविविक्तं सदनुपहितं चैतन्यं “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इति वाक्यस्य वाच्यं भवति

स्थूलमहाप्रपञ्च २१३ विविक्तं सलक्ष्यमपि भवति। एवं वस्तुन्य वस्त्वारोपोऽध्यारोपः सामान्येन प्रदर्शितः ॥१८॥ पदच्छेद-एतेषाम् स्थूल-सूक्ष्मकारणप्रपञ्चानाम् अपि समष्टिः एकः महान् प्रपञ्चः भवति, यथा- अवान्तर वनानाम् समष्टिः एकम् महद्वनम् भवति। यथा वा अवान्तर-जलाशयानाम् समष्टिः एकः महान् जलाशयः। एतद् उपहितम् वैश्वानराद् ईश्वरपर्यन्तम् चैतन्यम् अपि अवान्तर वन-अवच्छिन्न-आकाशवद् अवान्तर जलाशयगत-प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च एकम् एव। आभ्याम् महाप्रपञ्च तद् उपहित-चैतन्याभ्याम् तप्त-अयः पिण्डवद् अविविक्तम् सद् अनुपहितम् चैतन्यम् “सर्वं खलु इदं ब्रह्म” इति वाक्यस्य वाच्यम् भवति, विविक्तम् सत् लक्ष्यम् अपि भवति। एवम् वस्तुनि अवस्तु-आरोपः अध्यारोपः सामान्येन प्रदर्शितः।।18।। अनुवाद-जिसप्रकार अलग-अलग वनों का समूह एक महान् वन हो जाता है अथवा जिसप्रकार पृथक्-पृथक् जलाशयों का समुदाय एक महान् जलाशय बन जाता है, (ठीक उसीप्रकार) इन स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण प्रपञ्चों की समष्टि भी एक महान्प्रपञ्च हो जाता है। इस उपाधि से उपहित वैश्वानर से लेकर ईश्वरपर्यन्त चैतन्य भी अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश के समान तथा भिन्न-भिन्न जलाशयों में प्रतिबिम्बित आकाश के समान एक ही होता है। ‘चन्द्रिका’-ग्रन्थकार ने यहाँ तक, कारणशरीर, समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से जिसमें स्थित चैतन्य ईश्वर एवं प्राज्ञ कहलाता है। सूक्ष्मशरीर, समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से जिसमें स्थित चैतन्य क्रमशः हिरण्यगर्भ अथवा सूत्रात्मा एवं तैजस् कहा जाता है। ठीक इसीप्रकार स्थूलशरीर, जिसमें स्थित चैतन्य समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से क्रमशः वैश्वानर (विराट्) एवं विश्व कहलाता है, का प्रतिपादन किया। जिसप्रकार आम, शीशम, पलाश आदि भिन्न-भिन्न वनों की समष्टि से एक विशालकाय महावन का निर्माण होता है तथा वापी, कूप, तालाब आदि अलग-अलग जलाशयों की समष्टि से एक विशाल महान् जलाशय बन जाता है। ठीक इसीप्रकार अभी तक बताए गए कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूल- शरीरों की समष्टि को मिलाकर एक महाप्रपञ्च का निर्माण होता है तथा जिसप्रकार वन से अवच्छिन्न आकाश एवं वृक्षों से अवच्छिन्न-आकाश में कोई भेद नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार इन तीनों प्रकार के प्रपञ्चों में स्थित चैतन्यों में अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश के समान, अलग-अलग जलाशयों

२१४ वेदान्तसार में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश के समान, तात्त्विकदृष्टि से किसी भी प्रकार की कोई भिन्नता नहीं होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश हमें स्थूलदृष्टि से देखने पर भिन्न-भिन्न दिखायी देते हैं तथा जिसप्रकार अलग-अलग जलाशयों में प्रतिबिम्बित आकाश भी हमें स्थूल- दृष्ट्या अलग-अलग ही प्रतीत होते हैं, किन्तु उनमें तात्त्विकदृष्टि से कोई भेद नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर की समष्टिव्यष्टि से उपहित चैतन्य भी स्थूलदृष्टि से ही क्रमशः ईश्वर प्राज्ञ, सूत्रात्मा, तैजस् एवं वैश्वानर, विश्वरूप में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, जबकि तात्त्विकदृष्टि से इनमें कोई भेद नहीं होता है। पुनः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' रूप महावाक्य के वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को कहते हैं- इस महाप्रपञ्च तथा उससे उपहित चैतन्य से अभिन्न होकर परमशुद्ध चैतन्य 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' इस महावाक्य का वाच्यार्थ होता है तथा वही अलग-अलग होने की स्थिति में लक्ष्यार्थ भी होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार एक लोहे के गोले को अग्नि में डालने पर वह तपकर लाल हो जाता है तथा उससे जलने पर 'मैं लोहे से जल गया' इसप्रकार कहा जाता है, जबकि जलाने की शक्ति लोहे में न होकर अग्नि में होती है। यहाँ अग्नि के सम्पर्क में आने पर लोहे और अग्नि का परस्पर तादात्म्य सम्बन्ध होने अर्थात् अत्यधिक नैकट्य होने से वे दोनों हमें एक प्रतीत होते हैं, जबकि होते वे दोनों अलग-अलग हैं। उसीप्रकार महाप्रपञ्च एवं उससे अवच्छिन्नचैतन्य के साथ परस्पर तादात्म्य की प्रतीति होने से प्रतीत होने वाला उपाधिशून्य शुद्धचैतन्य ही 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' महावाक्य का अभिधा शब्दशक्ति से प्रतीत होने वाला सीधा अर्थ अर्थात् वाच्यार्थ है। इसके अतिरिक्त उक्त महाप्रपञ्च एवं उससे उपहितचैतन्य के परस्पर आभासित होने वाली तादात्म्य की प्रतीति से शुद्ध चैतन्य को अलग मानने पर वही 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' रूप महावाक्य का लक्ष्यार्थ हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार 'अयो दहति' लोहा जलाता है, इत्यादि वाक्य में लोहे में जलाये जाने की क्षमता न होने से मुख्य अर्थ (वाच्यार्थ) का बाध हो जाता है तथा लक्षणा शब्दशक्ति से तत्सम्बद्ध अन्य अर्थ की प्रतीति-'लोहे में स्थित अग्नि जलाती है' इस रूप में होती है, जो

स्थूलमहाप्रपञ्च २१५ वस्तुतः उपर्युक्त 'अयो दहति' वाक्य का लक्ष्यार्थ माना जाएगा, क्योंकि यहाँ 'अय स्' शब्द की अयोगत अग्नि में लक्षणा की गयी है। ठीक इसीप्रकार 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' यह सब कुछ दृश्यमानजगत् ही ब्रह्म है। महावाक्य के इस वाच्यार्थ में महाप्रपञ्च, उससे उपहित चैतन्य एवं शुद्धचैतन्य ये तीनों एक कैसे हो सकते हैं? इस आशङ्का से मुख्य अर्थ का बाध होने से लक्षणा करनी होगी तथा उस स्थिति में विशेषणरूप अंश का परित्याग करके चैतन्यमात्र को ग्रहण करेंगे। ऐसा करने पर महाप्रपञ्च से उपहितचैतन्य एवं परमशुद्धचैतन्य दोनों एक हो जाएंगे। परिणामस्वरूप सर्वप्रपञ्च एवं चैतन्य की एकता स्वतःसिद्ध हो जाएगी। इसप्रकार यहाँ तक वस्तु में अवस्तु के आरोपरूप अध्यारोप का सामान्यरूप से वर्णन किया गया। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में सृष्टिविकास के कारण, सूक्ष्म एवं स्थूलशरीररूप विकास की अवस्थाओं में प्रतीत होने वाले भेदों में चैतन्य की दृष्टि से अभेद की स्थापना की गई है। (3) महाप्रपञ्च का सोदाहरण निरुपण किया गया है। (4) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-४५ महाप्रपञ्च महावन महासरोवर आम्रवन समष्टि वापी पलाशवन तडाग खदिरवन सरोवर कारणशरीर सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर समष्टि व्यष्टि समष्टि व्यष्टि समष्टि व्यष्टि ईश्वर प्राज्ञ हिरण्यगर्भ तेजस् वैश्वानर विश्व अभिन्नता चैतन्य का ऐक्य भिन्नता चैतन्य से प्रपञ्च की सर्वं खल्विदं ब्रह्म प्रपञ्च+चैतन्य-भिन्नता अभिन्नता लोह एवं अग्नि की अयोहति लोह+अग्नि-भिन्नता अभिन्नता लोहे से जल गया अग्नि लोहे में स्थित अग्नि से जल गया वाच्यार्थ लक्ष्यार्थ