वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
२४४ वेदान्तसार पदच्छेद-अत्र 'शोणः धावति' इति वाक्यवद् 'अजहल्लक्षणा' अपि न सम्भवति। तत्र शोण-गुण-गमन-लक्षणस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात्, तद् अपरित्यगेन तद् आश्रय-अश्वादिलक्षणया तद् विरोध-परिहारसम्भवाद्, अजहल्लक्षणा सम्भवति। अत्र तु परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य-एकत्वस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात् तद् अपरित्यगेन तत् सम्बन्धिनः यस्य कस्यचिद् अर्थस्य लक्षितत्वे अपि तद् विरोध-परिहार-असम्भवाद् अजहल्लक्षणा न सम्भवति एव। न च तत् पदम् त्वम् पदम् वा स्वार्थविरुद्ध-अंशपरित्यागेन अंशान्तर-सहितम् त्वम् पदार्थम् तत् पदार्थम् वा लक्षयतु, अतः कथम् प्रकारान्तरेण भागलक्षणा-अङ्गीकरणम् इति वाच्यम्। एकेन पदेन स्वार्थांश-पदार्थान्तर-उभय लक्षणायाः असम्भवात्, पदान्तरेण तद् अर्थप्रतीतौ लक्षणया पुनः तत् प्रतीतिः अपेक्षा अभावात् च॥26॥ अनुवाद-यहाँ (तत्त्वमसि इत्यादि वाक्य में) 'लाल' दौड़ रहा है' इत्यादि वाक्य के समान 'अजहल्लक्षणा' (करना) भी सम्भव नहीं है। (क्योंकि) वहाँ लालगुण का गमनरूप जो वाक्यार्थ है, असंगत है। अतः (उसकी संगति हेतु) उस अर्थ का परित्याग किए बिना, उसके आश्रयभूत अश्वादि में लक्षणा द्वारा अर्थ करके उस विरोध का परिहार हो जाता है (अतः इस वाक्य में) अजहल्लक्षणा सम्भव है। जबकि (तत्त्वमसि इत्यादि वाक्य में) तो परोक्षत्व एवं अपरोक्षत्व आदि विशिष्ट (दो) चैतन्यों की एकता, अभिन्नवाक्यार्थ के विरुद्ध होने के कारण उसका परित्याग किए बिना उससे सम्बन्धित जिस किसी भी अर्थ की लक्षणा से प्रतीति होने पर भी, उस विरोध का परिहार असम्भव होने से, अजहल्लक्षणा भी सम्भव नहीं है। (और यदि यह कहा जाए कि) 'तत्' अथवा 'त्वम्' पद अपने अर्थ में विरुद्ध अंश का परित्याग करके, दोनों में सामान्य (चैतन्य) रूप अंश सहित त्वम् एवं तत् पदों के अर्थ को लक्षणा से प्रदर्शित करें, (तो भी ठीक नहीं), क्योंकि तब तो (हमारे द्वारा कथित) भागलक्षणा को ही प्रकारान्तर से क्यों न स्वीकार कर लिया जाए? (क्योंकि) एक पद द्वारा अपने (विरुद्ध) अंश का परित्याग करके तथा दूसरे पद के अविरुद्ध अर्थ की प्रतीति दोनों कार्यों में लक्षणा (एक साथ)
महावाक्यार्थ-निरूपण २४५ प्रवृत्त नहीं हो सकती। (फिर) दूसरे पद द्वारा (अभिधा से ही) उस अर्थ की प्रतीति हो जाने के कारण, पुनः लक्षणा से उसकी प्रतीति कराने की आवश्यकता ही नहीं है। 'चन्द्रिका'-'तत्त्वमसि' इस वाक्य में 'शोणो धावति' इस वाक्य के समान 'अजहल्लक्षणा' मानकर भी अखण्ड अर्थ की प्रतीति नहीं करायी जा सकती है, क्योंकि 'शोणो धावति' का सीधा अर्थ है-'लाल दौड़ता' है। यहाँ लाल रंग तो वस्तुतः गुण है, इसलिए उसका दौड़ना सम्भव नहीं है। अतः मुख्य अर्थ का बाध होने के कारण उक्त वाक्य की संगति बैठाने के लिए लाल रंग है जिसका, ऐसा घोड़ा दौड़ रहा है। इस अर्थ में लक्षणा कर ली जाती है। अतः यहाँ लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा 'शोण' शब्द अपने लालरूप अर्थ का परित्याग किए बिना ही (अजहत्) अर्थात् बिना छोड़े अश्व का बोधक होता है। ऐसा करने पर 'शोणो धावति' वाक्य के अर्थ में किसीप्रकार का विरोध नहीं रह जाता है। इस वाक्य में पूर्व अर्थ-'लाल' रंग के साथ-साथ 'अश्व' रूप अन्य अर्थ की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा करायी जा रही है। इसीलिए इस लक्षणा को 'अजहत्-लक्षणा' कहा गया है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में इसप्रकार की विशेषता से युक्त अजहल्लक्षणा नहीं की जा सकती है, क्योंकि यहाँ तत् पद का अर्थ है-'परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य एवं त्वम् पद का अर्थ है-अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य। ये दोनों, चैतन्यांश की दृष्टि से एकत्व के प्रतिपादक होते हुए भी परोक्षत्व तथा अपरोक्षत्व रूप अर्थ में परस्पर विरुद्ध हैं। इसलिए यदि 'शोणो धावति' के समान अजहल्लक्षणा मानकर परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि विशिष्ट तत् एवं त्वम् पदों द्वारा केवल चैतन्यरूप अंश के एकत्व की कल्पना कर भी ली जाए तो भी परोक्षत्व अपरोक्षत्वादि विशिष्टरूप भेद के बने रहने के कारण अभेद की प्रतीति तो हो ही नहीं सकती तथा इसप्रकार की अभेदप्रतीति यदि नहीं होती है तो फिर लक्षणा मानने का कोई लाभ नहीं होगा। इसलिए यहाँ अजहल्लक्षणा को नहीं माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि यहाँ प्रयुक्त तत् पद त्वम् पद के विरुद्ध अपने परोक्षत्वादिवैशिष्ट्य का परित्याग करता हुआ, दोनों में समानरूप से स्थित चैतन्यरूप अंश को ग्रहण करते हुए, त्वम् पद
२४६ वेदान्तसार में स्थित अल्पत्वादि विशिष्ट जीवरूप चैतन्य को लक्षणा द्वारा बोधित करा सकता है। इसीप्रकार त्वम् पद भी 'तत्' पद के विरुद्ध अपने अपरोक्षत्वादिधर्म का परित्याग करके तथा दोनों में समानरूप से स्थित चैतन्यांश को न छोड़ता हुआ, तत् पद के सर्वज्ञत्व आदि विशिष्ट ईश्वररूपचैतन्य को लक्षणा द्वारा बोधित करा सकता है। इसलिए यहाँ 'भागलक्षणा' को मानने की आवश्यकता नहीं है, तो यह भी संगत नहीं है। क्योंकि एक ही तत् अथवा त्वम् पद परित्याग किए हुए अपने परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि रूप अर्थ को तथा दूसरे पद के अर्थ को भी एक साथ लक्षणा द्वारा बोध कराएँ, ऐसी उभयलक्षणा ठीक उसीप्रकार नहीं होती है, जैसे-शोणो धावति में प्रयुक्त 'शोण' पद अपने लाल अर्थ को बताने के साथ-साथ लक्षणा से काले, नीले, पीले आदि रंगों का कथन नहीं करता है। इसके अलावा यहाँ तत् एवं त्वम् दोनों पदों का प्रयोग हुआ ही है। अतः उन्हीं के द्वारा अपने-अपने अर्थों की अभिधा शब्दशक्ति से स्वतःप्रतीति हो ही जाएगी। इसलिए लक्षणा द्वारा दूसरे पद से, अन्य पद के अर्थ की प्रतीति कराने की कोई आवश्यकता नहीं है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार ने 'शोणो धावति' के समान 'तत्त्वमसि' वाक्य में अजहल्लक्षणा के अनौचित्य का प्रतिपादन किया है। (2) लक्षणा दो प्रकार की होती हैं (क) जहल्लक्षणा इसीको लक्षण लक्षणा भी कहते हैं (ख) अजहल्लक्षणा इसे उपादानलक्षणा भी कहा जाता है। (3) 'तत्त्वमसि' वाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के उभय सामान्यधर्म की प्रतीति कराने के लिए ग्रन्थकार ने उक्त दोनों लक्षणाओं से भिन्न जहदजहल्लक्षणा की परिकल्पना की है, जिसे भागलक्षणा भी कहा जाता है। (4) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
महावाक्यार्थ-निरूपण २४७ चित्र-५३ शोणो धावति शोणः (लाल) धावति-वाच्यार्थ (रंग विशेष) (दौड़ता है) लाल रंग होने से गति का अभाव पुनः मुख्यार्थ बाध लक्षणा द्वारा घोड़ा रूप अर्थ की प्रतीति अजहत् लाल रंग का घोड़ा धावति-वाच्यार्थ रंग सहित घोड़ा रूप अर्थ की प्रतीति के कारण अजहल्लक्षणा चित्र संख्या-52 के समान तत्त्वमसि वाक्य को समझें। अवतरणिका-इसप्रकार यहाँ तक 'तत्त्वमसि' वाक्य में जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा के अनौचित्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् 'सोऽयं देवदत्तः' के समान भागलक्षणा अर्थात् जहदजहल्लक्षणा का कथन करते हैं- तस्माद्यथा सोऽयं देवदत्त इति वाक्यं तदर्थो वा तत्कालैतत्काल- विशिष्टदेवदत्तलक्षणस्य वाक्यार्थस्यांशे विरोधाद्विरुद्धतत्कालैतत्काल- विशिष्टत्वांशं परित्यज्याविरुद्धं देवदत्तांशमात्रं लक्षयति तथा तत्त्वमसीतिवाक्यं तदर्थो वा परोक्षत्वापरोक्षत्वादिविशिष्ट- चैतन्यैकत्वलक्षणस्य वाक्यार्थस्यांशे विरोधाद्विरुद्धपरोक्षत्वापरोक्षत्वादि- विशिष्टत्वांशं परित्यज्याविरुद्धमखण्डचैतन्यमात्रं लक्षयतीति॥२७॥ पदच्छेद-तस्मात् यथा 'सः अयम् देवदत्तः' इति वाक्यम् तद् अर्थः वा, तत्काल-एतत्काल-विशिष्ट-देवदत्त-लक्षणस्य वाक्यार्थस्य अंश विरोधाद् विरुद्ध-तत्काल-एतत्काल-विशिष्टत्व-अंशम् परित्यज्य, अविरुद्धम् देवदत्तांश-मात्रम् लक्षयति। तथा 'तत्त्वमसि' इति वाक्यम् तद् अर्थः वा परोक्षत्व- अपरोक्षत्वादि-विशिष्ट-चैतन्य-एकत्वलक्षणस्य, वाक्यार्थस्य अंश विरोधाद्-विरुद्ध, परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि-विशिष्टत्वांशम् परित्यज्य अविरुद्धम् अखण्ड चैतन्यमात्रम् लक्षयति, इति॥27॥
२४८ वेदान्तसार अनुवाद-इसलिए जिसप्रकार 'यह वही देवदत्त है' इत्यादि वाक्य अथवा उसका अर्थ, अर्थात् तत्काल एवं एतत्काल विशिष्ट देवदत्तरूप वाक्यार्थ के अंशमात्र में विरोध होने के कारण, विरुद्ध तत्काल एवं एतत् काल वैशिष्ट्य वाले अंश का परित्याग करके, अविरुद्ध देवदत्त अंशमात्र को लक्षित करता है। ठीक उसीप्रकार 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि वाक्य अथवा उसका अर्थ-अर्थात् परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादिविशिष्ट अभिन्नरूप लक्षण वाला एक चैतन्य है। उसका वाक्यार्थ के अंशमात्र में विरोध होने के कारण, विरुद्ध परोक्षत्व-अपरोक्षत्व आदि विशिष्ट अंश का परित्याग करके, अविरुद्ध अखण्डचैतन्यमात्र को परिलक्षित करता है। 'चन्द्रिका'-इसलिए 'यह वही देवदत्त है' इत्यादि वाक्य के समान तत्त्वमसि-'वह तू है' इत्यादि वाक्य में जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा दोनों लक्षणाओं से भिन्न, तीसरे प्रकार की लक्षणा अर्थात् 'जहदजहल्लक्षणा' होती है। इसीको अन्य नाम 'भागलक्षणा' भी दिया गया है, क्योंकि इस लक्षणा में प्रयुक्त शब्द अपने अर्थ के कुछ अंश का परित्याग करके कुछ ही अंश का बोध कराता है। जैसा कि 'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादि वाक्य में भी होता है, क्योंकि वहाँ 'सः' का अभिप्राय तत्कालविशिष्ट देवदत्त है तथा 'अयम्' शब्द एतत्कालविशिष्ट देवदत्त का कथन करता है। यह वही देवदत्त है, ऐसा कहने पर देवदत्तरूप अंश में किसीप्रकार का कोई विरोध विद्यमान नहीं है, और यदि विरोध है भी तो वह है कालिकविरोध अर्थात् तत्कालीन एवं एतत्कालीन देवदत्त। इसलिए यहाँ स्थित विरुद्ध अंश को छोड़कर, अविरुद्ध अंश देवदत्तरूप पिण्डमात्र का बोध कराने के लिए-जहदजहल्लक्षणा ही माननी होगी। ठीक इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य में भी 'तत्' पद का अभिप्राय है-परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य अर्थात् ब्रह्म एवं त्वम् पद का अर्थ है-अपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य अर्थात् जीव। इन दोनों पदों में चैतन्यरूप अंश समानरूप से विद्यमान होने के कारण उनमें कोई विरोध विद्यमान नहीं है, किन्तु परोक्षत्व एवं अपरोक्षत्व रूप अंशों में विरोध स्थित है। इसलिए यहाँ स्थित विरुद्ध अंश को छोड़कर अविरुद्धचैतन्य अंश को ग्रहण करते हुए, जहत् (छोड़कर) अजहत् (बिना छोड़े) रूप लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा तत्
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण (अहं ब्रह्मास्मि)
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २४९ एवं त्वम् पद अविरुद्ध परमशुद्धचैतन्यमात्र को लक्षित करते हैं। यही भाग लक्षणा भी है। यही वेदान्त का सिद्धान्त भी है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार ने सोदाहरण अपना पक्ष प्रस्तुत किया है। (2) 'सोऽयं देवदत्तः' एवं 'तत्त्वमसि' वाक्यों में लक्षणा की दृष्टि से परस्पर संगति प्रतिपादित की है। (3) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को संक्षेप में इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-५४ भागलक्षणा (जहदजहल्लक्षणा) सः ────────► विशिष्ट ◄──────── अयम् (तत्काल) ↓ (एतत्काल) देवदत्तः (पिण्ड विशेष) ┌──────┐ ▲ ┌──────┐ तत् │ अभिन्नता │ │ │ अभिन्नता │ त्वम् (परोक्षत्व) ◄─│ की प्रतीति│ │ ─►│ की प्रतीति│ (अपरोक्षत्व) ↓ └──────┘ │ └──────┘ ↓ विशिष्ट ────────► चैतन्य ◄──────── विशिष्ट (तुरीय) ▲ (विरुद्धांश के परित्यागपूर्वक) अवतरणिका-इसप्रकार 'तत्त्वमसि उपदेशवाक्य में प्रयुक्त होने वाले सम्बन्ध एवं उसकी अर्थप्रतीति को स्पष्ट करने के पश्चात् ग्रन्थकार 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि अनुभवमहावाक्य को स्पष्ट करते हैं- अथाधुनाहं ब्रह्मास्मीत्यनुभववाक्यार्थो वर्ण्यते। एवमाचार्येणाध्यारो- पापवादपुरःसरं तत्त्वम्पदार्थों शोधयित्वा वाक्येनाखण्डार्थेऽवबोधितेऽधि- कारिणोऽहं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्यस्वभावपरमानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्मास्मीत्य- खण्डाकाराकारिताचित्तवृत्तिरुदेति। सा तु चित्प्रतिबिम्बसहिता सती प्रत्यगभिन्नमज्ञातं परं ब्रह्म विषयीकृत्य तद्गताज्ञानमेव बाधते तदा पटकारणतन्तुदाहे पटदाहवदखिलकारणेऽज्ञाने बाधिते सति तत्कार्यस्याखिलस्य बाधितत्वात्तदन्तर्भूताखण्डाकाराकारिता चित्तवृत्तिरपि बाधिता भवति। तत्र प्रतिबिम्बितं चैतन्यमपि यथा दीपप्रभादित्यप्रभाव- भासनाससमर्था सती तयाभिभूता भवति तथा स्वयम्प्रकाशमानप्रत्यग-
२५० वेदान्तसार भिन्नपरब्रह्मावभासनानर्हतया तेनाभिभूतं सत्स्वोपाधिभूताखण्डचित्तवृत्ते- र्बाधितत्वाददर्पणाभावे मुखप्रतिबिम्बस्य मुखमात्रत्ववत्प्रत्यगभिन्नपरब्रह्ममात्रं भवति॥२८॥ पदच्छेद-अथ अधुना 'अहम् ब्रह्म अस्मि' इति अनुभववाक्यार्थः वर्ण्यते। एवम् आचार्येण अध्यारोप-अपवाद-पुरःसरम् तत्-त्वम्-पदार्थों शोधयित्वा वाक्येन अखण्डार्थे अवबोधिते 'अधिकारिणः अहम्' नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त- सत्य-स्वभाव-परमानन्द-अनन्त-अद्वयम् 'ब्रह्म अस्मि' इति अखण्डाकार- आकारिता-चित्तवृत्तिः उदेति। सा तु चित् प्रतिबिम्बसहिता सती प्रत्यक् अभिन्नम् अज्ञातम् परमब्रह्म विषयीकृत्य तद्गत-अज्ञानम् एव बाधते। तदा पटकारण-तन्तुदाहे पट-दाहवद्, अखिल-कारणे अज्ञाने बाधिते सति, तत् कार्यस्य अखिलस्य बाधितत्वात् तद् अन्तर्भूत-अखण्डकार-आकारिता चित्तवृत्तिः अपि बाधिता भवति । तत्र प्रतिबिम्बितम् चैतन्यम् अपि यथा दीपप्रभा-आदित्यप्रभा- अवभासन-असमर्था सती, तया अभिभूता भवति तथा स्वयंप्रकाशमान- प्रत्यग् अभिन्न-परमब्रह्म-अवभासन-अनर्हतया तेन अभिभूतम् सत् स्व-उपाधिभूत-अखण्डचित्तवृत्तेः बाधितत्वाद्, दर्पण-अभावे मुख- प्रतिबिम्बस्य मुख-मात्रत्ववत्, प्रत्यग् अभिन्नपरब्रह्ममात्रम् भवति॥२८॥ अनुवाद-इसके पश्चात् अब 'मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि अनुभववाक्यार्थ का वर्णन किया जा रहा है। इसप्रकार अध्यारोप एवं अपवाद सहित आचार्य द्वारा तत् एवं त्वम् इन दोनों पदार्थों में शोध करके (तत्त्वमसि) वाक्य द्वारा अखण्ड अर्थ का ज्ञान कराये जाने पर, 'मैं अधिकारी हूँ' मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव, परमानन्दस्वरूप, अनन्त एवं अद्वैत ब्रह्म हूँ, इत्यादि अखण्डाकार से आकारित चित्तवृत्ति उत्पन्न होती है। 'चित्' के प्रतिबिम्ब से युक्त होती हुई (चित्तवृत्ति) तो आन्तरिक, सबसे भिन्न एवं अज्ञात परमब्रह्म का साक्षात्कार करके उसमें स्थित अज्ञान का ही बाध करती है। तब वस्त्र के कारणरूप तन्तुओं के जल जाने पर वस्त्रदाह के समान, सम्पूर्ण (संसार) के कारणभूत अज्ञान के विनष्ट हो जाने पर, उसके कार्यरूप सम्पूर्ण सृष्टिप्रपञ्च के बाध होने से, उसके अन्दर स्थित अखण्ड आकार से आकारित चित्तवृत्ति भी समाप्त हो जाती है।
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५१ उस (चित्तवृत्ति) में प्रतिबिम्बित चैतन्य भी, जिसप्रकार दीपक की प्रभा सूर्य की प्रभा को प्रकाशित करने में असमर्थ होती हुई, उससे अभिभूत हो जाती है। ठीक उसीप्रकार स्वयं प्रकाशमान, प्रत्यक्, अभिन्न, परमब्रह्म को अवभासित करने में असमर्थ होने से, उससे अभिभूत हुई, अपनी उपाधिरूप अखण्डचित्तवृत्ति को नष्ट कर देने से, दर्पण के अभाव में मुख के प्रतिबिम्ब की (अपेक्षा) मुखमात्र रहने के समान, आन्तरिक आत्मा से अभिन्न परमब्रह्ममात्र ही रह जाता है॥ 'चन्द्रिका' - प्रस्तुत अंश को समझने के लिए वेदान्तियों की लौकिक- ज्ञान विषयक प्रक्रिया को समझना आवश्यक है। तदनुसार घट-पट आदि के ज्ञान में सर्वप्रथम वृत्ति उस पदार्थ के सम्बन्ध में स्थित अज्ञान को दूर करती है। तत्पश्चात् उसका 'चित्' प्रतिबिम्ब पदार्थ का आकार धारण करके उसे भासित करता है। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि समस्त भौतिक पदार्थों के जड़ होने के कारण, उनमें स्वयं प्रकाशित होने की सामर्थ्य के अभाव के कारण 'चित्' प्रतिबिम्ब आवश्यक होता है। इसलिए लौकिकज्ञान में सामान्यरूप से अज्ञान को दूर करना रूप बुद्धि की वृत्ति एवं चित् का प्रतिबिम्बरूप फल अथवा आभास दोनों आवश्यक हैं। जबकि ब्रह्मसाक्षात्कार में केवल तद्विषयक अज्ञान को दूर करना रूप वृत्ति की ही अपेक्षा रहती है। चित् प्रतिबिम्बरूप फल या उसके आभास की इसलिए आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ब्रह्म स्वयं प्रकाशमान है। उसे किसी से प्रकाशित होने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मज्ञान एवं लौकिकज्ञान में यही अन्तर है। जिसकी ओर ग्रन्थकार ने प्रस्तुत अंश में सङ्केत किया है। वेदान्त की दृष्टि में अधिकारी को गुरु अध्यारोप एवं अपवादन्याय से 'तत्त्वमसि' महावाक्य के तत् एवं त्वम् पदों के अर्थों को भलीप्रकार समझाने के पश्चात् अखण्ड अर्थ का बोध कराता है। जिसके परिणामस्वरूप उसके हृदय में अखण्ड आकार से आकारित इसप्रकार की चित्तवृत्ति का उदय होता है कि मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव, परमानन्द- स्वरूप, अनन्त एवं अद्वैतब्रह्म हूँ। किन्तु इस विषय में यदि कोई यह शङ्का करे कि चित्तवृत्ति तो जड़ है, जो स्वयंप्रकाश, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, ब्रह्म को अपना विषय ठीक उसीप्रकार बनाकर उदित नहीं हो सकती, जिसप्रकार दीपक का प्रकाश सूर्यमण्डल को
२५२ वेदान्तसार प्रकाशित नहीं कर सकता। इसी के उत्तर में ग्रन्थकार ‘सा तु’ इत्यादि गद्यखण्ड को प्रस्तुत करते हैं- अर्थात् वह चित्तवृत्ति परमशुद्धचैतन्य को अपना विषय नहीं बनाती, अपितु वह तो अज्ञान-विशिष्ट प्रत्यक्-अभिन्न विषय वाली होती है। उसमें चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उस स्थिति में वह प्रत्यक् चैतन्यगत अज्ञान रूप आवरण को दूर कर देती है। अतः इस अज्ञान को दूर करना ही उस वृत्ति के उदय का प्रयोजन है। चैतन्यगत परब्रह्मविषयक अज्ञान के आवरण के विनष्ट होते ही अधिकारी को इसप्रकार की अनुभूति होने लगती है कि मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, आदिस्वरूप परब्रह्म हूँ। इस प्रसङ्ग में ‘प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का पुनः प्रस्तुत की जा सकती है कि गुरु द्वारा ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि उपदेशवाक्यों से उत्पन्न तात्त्विकज्ञान से आभासित होने वाली, अखण्डचैतन्यवृत्ति के कारण अधिकारी का प्रत्यक् चैतन्यविषयक अज्ञान भले ही विनष्ट हो जाए, किन्तु उस स्थिति में भी अज्ञान का कार्य सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च का आभास तो उसे प्रत्यक्षरूप में होता ही रहेगा। ऐसी स्थिति में उसे अद्वैत की अनुभूति कैसे हो सकती है? इस शङ्का का निवारण करते हुए कहते हैं कि सामान्यसिद्धान्त है कि कारण के नष्ट होने पर कार्य स्वतः विनष्ट हो जाता है। ठीक उसीप्रकार जैसे पट के कारण तन्तु के नष्ट होने पर पट स्वतः ही नष्ट हो जाता है। सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च यहाँ कार्य है तथा अज्ञान कारण है, इसलिए अज्ञानरूपी कारण के नष्ट होने पर चराचरप्रपञ्चरूप कार्य भी स्वतः ही नष्ट हो जाएगा। पुनः यदि कोई कहे कि उस स्थिति में भी अखण्ड आकार से आकारित चित्तवृत्ति के विद्यमान रहने से अद्वैत की सिद्धि तो तब भी नहीं होगी? इसके उत्तर में ग्रन्थकार कहते हैं कि-अखण्ड आकार से आकारित वह वृत्ति भी वस्तुतः अज्ञान एवं उसके कार्यप्रपञ्च के अन्तर्गत ही आती है। इसलिए कारणभूत अज्ञान के नष्ट होने पर प्रपञ्च एवं वृत्ति दोनों ही विनष्ट होंगे। अतः इसप्रकार के विरोध की सम्भावना नहीं रहेगी। पुनः यदि कहा जाए कि अज्ञान, सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च एवं अखण्ड आकार से आकारित चित्तवृत्ति, इन तीनों के नष्ट हो जाने पर भी वृत्ति में
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५३ प्रतिबिम्बित होने वाला चैतन्य का आभास तो उस स्थिति में भी विद्यमान रहेगा ही, तो भला अद्वैत की सिद्धि कैसे हो सकती है? इसका निवारण करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि जिसप्रकार दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है, किन्तु दर्पण के न रहने पर केवल मुखमात्र ही शेष रहता है, उसका प्रतिबिम्ब अलग से भासित नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य, वृत्ति के नष्ट हो जाने पर अलग से भासित न होकर बिम्बमात्र अर्थात् चैतन्यमात्र शेष रह जाता है। जिसप्रकार दीपक का प्रकाश सूर्य को प्रकाशित नहीं कर सकता, उसके सामने क्षीण हो जाता है। ठीक उसीप्रकार स्वयंप्रकाशस्वरूप, प्रत्यक् अभिन्न उस परमब्रह्म को वह चैतन्य प्रतिबिम्ब प्रकाशित नहीं कर पाता है, अपितु जिस अखण्डचित्तवृत्ति के कारण उसकी अलग से प्रतीति हो रही थी, उस वृत्ति के नष्ट होने पर बिम्बमात्र अर्थात् ब्रह्ममात्र शेष रह जाता है। इसे दर्पण एवं मुख के उदाहरण द्वारा पहले ही समझाया जा चुका है। अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि दर्पण के विद्यमान न होने पर प्रतिबिम्ब के अभाव एवं मुख अर्थात् बिम्बमात्र की उपस्थिति के समान ही वृत्ति के विद्यमान न रहने पर उस चैतन्य के प्रतिबिम्ब का भी अभाव हो जाता है और वह बिम्ब अर्थात् प्रत्यग्-अभिन्न परमब्रह्ममात्र ही शेष रहता है, यही 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य का अभिप्राय है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड के आरम्भ में प्रयुक्त 'अथ' का प्रयोग अनन्तर अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। यद्यपि 'अथ' पद अनेकार्थवाची है 'मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्न्र्येष्वथो अथ' के अनुसार 'अथ' पद का प्रयोग मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न एवं कात्स्न्र्य इन पाँच अर्थों की अभिव्यक्ति के लिए होता है। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड में परमब्रह्म अर्थात् तुरीय के अनेक विशेषणों का साभिप्राय प्रयोग किया गया है। जैसे- (क) शुद्ध-अविद्या आदि दोषों से रहित ब्रह्म। (ख) बुद्ध-स्वयंप्रकाशभूत अतः जड़ता आदि दोषों से रहित। (ग) मुक्त-सभीप्रकार की उपाधियों से पूर्णतयारहित। (घ) सत्यस्वभाव-अनश्वर स्वभावसम्पन्न। (ङ) अनन्त-देशकाल आदि की दृष्टि से अपरिच्छिन्न।
२५४ वेदान्तसार (च) अद्वय-एकत्व का सूचक। (३) अखण्डाकार आकारितवृत्ति से अभिप्राय-अखण्डब्रह्म के स्वरूप को धारण करने वाली, अन्तःकरण की वृत्ति से ग्रहण करना चाहिए। ब्रह्म के अपरोक्ष एवं नित्य होने से इसीको 'साक्षात्काररूपा' भी कहा गया है। (४) कारण के नष्ट होने पर कार्य का स्वतः ही नष्ट होना, इसे समझाने के लिए तन्तु के नष्ट होने पर, पट का स्वतः ही नष्ट होना, अत्यन्त सुन्दर एवं प्रासङ्गिक उदाहरण है। जो प्रायः दार्शनिकग्रन्थों में दिया जाता रहा है। न्यायदर्शन में इसका सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। (५) इसीप्रकार दर्पण का उदाहरण देकर 'अहं ब्रह्मास्मि' अनुभूति में ब्रह्म की अद्वैतरूप में स्थिति को अत्यन्त स्पष्टरूप में समझाया गया है। (६) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-५५ अहं ब्रह्मास्मि आचार्य के उपदेश के परिणामस्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव, परमानन्द स्वरूप, चित्तवृत्ति का उदय अनन्त, अद्वैत ब्रह्म के आकार से आकारित चित्त में स्थित अज्ञान का बाध पटकारणतन्तुदाहे पट दाहवत् अज्ञान के विनष्ट होने पर सृष्टि प्रपञ्च का बाध अधिकारी के चित्त में स्थित अखण्डाकाराकारित चित्त वृत्ति की समाप्ति परिणामस्वरूप प्रत्यक्-अभिन्न परमब्रह्म मात्रम् तिष्ठति दर्पणाभावे मुख प्रतिबिम्बस्य मुखमात्रत्ववत्। अवतरणिका-इसी प्रसङ्ग को आगे बढ़ाते हुए श्रुतिवाक्यों से प्रमाणित करते हैं-
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५५ एवं च सति “मनसैवानुद्रष्टव्यं” “यन्मनसा न मनुत” इत्यनयोः श्रुत्योरविरोधो वृत्तिव्याप्यत्वाङ्गीकारेण फलव्याप्यत्वप्रतिषेधप्रतिपादनात्। तदुक्तम्- “फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम्। ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता” इति॥ “स्वयम्प्रकाशमानत्वान्नाभास उपयुज्यते” इति च जडपदार्थाकाराकारितचित्तवृत्तेर्विशेषोऽस्ति। तथाहि। अयं घट इति घटाकाराकारितचित्तवृत्तिरज्ञातं घटं विषयीकृत्य तद्गताज्ञाननिरसनपुरःसरं स्वगतचिदाभासेन जडं घटमपि भासयति। तदुक्तम्- “बुद्धितत्स्थचिदाभासौ द्वावेतौ व्याप्नुतो घटम्। तत्राज्ञानं धिया नश्येदाभासेन घटः स्फुरेत्” इति॥ यथा दीपप्रभामण्डलमन्धकारगतं घटपटादिकं विषयीकृत्य तद्ग तान्धकारनिरसनपुरःसरं स्वप्रभया तदपि भासयतीति॥२९॥ पदच्छेद-एवम् च सति “मनसा एव अनुद्रष्टव्यम्”, “यत् मनसा न मनुते” इति अनयोः श्रुत्योः अविरोधः वृत्तिव्याप्यत्व-अङ्गीकारेण फलव्याप्यत्व प्रतिषेधप्रतिपादनात्। तद् उक्तम्- “फलव्याप्यत्वम् एव अस्य शास्त्रकृद्भिः निवारितम्। ब्रह्मणि अज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिः अपेक्षिता”॥ “स्वयं प्रकाशमानत्वात् न आभासः उपयुज्यते इति च॥” जडपदार्थ-आकार-आकारित- चित्तवृत्तेः विशेषः अस्ति। तथाहि, अयम् घटः इति घटाकार-आकारितचित्तवृत्तिः अज्ञातम् घटम् विषयीकृत्य, तद्गत-अज्ञान-निरसनपुरःसरम् स्वगतचिद् आभासेन जडम् घटम् अपि भासयति। तद् उक्तम्- “बुद्धितत्स्थ-चिद् आभासौ द्वौ एतौ व्याप्नुतः घटम्। तत्र अज्ञानम् धिया नश्येत् आभासेन घटः स्फुरेत्” इति॥ यथा दीपप्रभा-मण्डलम् अन्धकारगतम् घटपट-आदिकम् विषयीकृत्य तद्गत-अन्धकार-निरसन-पुरःसरम् स्वप्रभया तद् अपि भासयति, इति॥२९॥ अनुवाद-और ऐसा होने पर ‘(वह) मन से ही द्रष्टव्य हैं’, ‘जो मन द्वारा जाना नहीं जा सकता है, इसप्रकार की दोनों श्रुतियों में वृत्ति के
२५६ वेदान्तसार व्याप्यत्व को स्वीकार करने से, फल व्याप्यत्व के प्रतिषेध प्रतिपादन के कारण विरोध नहीं है। इसीलिए कहा गया है- "इस (ब्रह्म) के (साक्षात्कार के लिए) शास्त्रकारों द्वारा फलव्याप्यत्व का भी निषेध किया गया है, किन्तु ब्रह्म-विषयक अज्ञान के नाश के लिए चित्तवृत्ति की व्याप्ति तो अपेक्षित ही होती है। जबकि स्वयंप्रकाशमान होने के कारण (चैतन्य के) आभास का कोई उपयोग नहीं है।" (अन्वय-अस्य (साक्षात्काराया) शास्त्रकृद्भिः फलव्याप्यत्वम् एव निवारितम्; (किन्तु) ब्रह्मणि अज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिः अपेक्षिता। (पुनरपि) स्वयं प्रकाशमानत्वात् (चैतन्यस्य) आभासः न उपयुज्यते) जड़पदार्थ के आकार से आकारित चित्त की वृत्ति इससे भिन्न अर्थात् विशेष होती है, क्योंकि 'यह घड़ा है' इसप्रकार अज्ञात घटविषयक घट के आकार से आकारित चित्तवृत्ति, उसमें स्थित अज्ञान के विनाश के साथ, अपने में स्थित चित्-आभास द्वारा जड़रूप घट को भी प्रकाशित करती है। इसीलिए कहा गया है- "बुद्धि एवं उसमें स्थित चिदाभास ये दोनों (ही) घट में व्याप्त रहते हैं। उनमें बुद्धि द्वारा अज्ञान विनष्ट होता है तथा चिदाभास द्वारा घट की अभिव्यक्ति होती है।" जिसप्रकार दीपक का प्रभामण्डल अंधकार में रखे हुए घट-पट आदि को विषय बनाकर (सर्वप्रथम) उनसे सम्बन्धित अन्धकार को विनष्ट करने के साथ ही अपनी प्रभा से उसे भी प्रकाशित करता है। 'चन्द्रिका'- प्रस्तुत अंश को समझने के लिए सर्वप्रथम हमें यहाँ प्रयुक्त दो शब्दों 'वृत्तिव्याप्ति' एवं 'फलव्याप्ति' को स्पष्ट करना होगा। वस्तुतः किसी विषय के ज्ञान के क्रम में दो अवस्थाएँ होती हैं (क) वृत्तिव्याप्ति एवं (ख) फलव्याप्ति। (क) चक्षु आदि इन्द्रियों के माध्यम से अन्तःकरण द्वारा घट-पटादि विषयप्रदेश में पहुँचकर, तत्तत् वस्तु के आकार को धारण करना 'वृत्तिव्याप्ति' कहलाता है। (ख) घट-पट आदि विषयरूप में परिवर्तित अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित चिदाभास या उससे आच्छादितचैतन्य द्वारा, उस विषय का साक्षात् करना ही 'फलव्याप्ति' कहलाता है।
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५७ 'वह परमब्रह्म मन से ही देखने योग्य है' इत्यादि श्रुतिवाक्यों में जब उसे मन द्वारा प्राप्य कहा जाता है, तब उस स्थिति में प्रयुक्त 'मन' से अभिप्राय 'वृत्तिव्याप्ति' से ग्रहण करना चाहिए तथा जब 'उसे मन द्वारा जाना नहीं जा सकता' ऐसा श्रुतिवचन उपलब्ध होता है, तब ब्रह्मतत्त्व को मन एवं बुद्धि से परे बताया गया है। उस स्थिति में हमें 'फलव्याप्ति' रूप अर्थ लेना चाहिए। इसप्रकार अर्थग्रहण करने पर इन दोनों श्रुतिवचनों 'मनसैवानुद्रष्टव्यं' एवं 'यन्मनसा न मनुते' का स्थूलदृष्टि से प्रतीत होने वाला विरोध स्वतः ही नष्ट हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि अनुभूति में-चैतन्य प्रतिबिम्बसहित अखण्डाकार से आकारित वृत्ति द्वारा प्रत्यक् (आन्तरिक) चैतन्यगत अज्ञान नष्ट होकर प्रत्यग्-अभिन्न परब्रह्ममात्र शेष रह जाता है, क्योंकि स्वयंप्रकाशमान होने के कारण यदि वह वृत्तिगत चिदाभास द्वारा प्रकाशित ही किया जा सकता तो 'मनसैवानुद्रष्टव्यं' एवं 'यन्मनसा न मनुते' इत्यादि श्रुतिवचनों में विरोध नहीं होता, क्योंकि अन्तःकरणरूप वृत्ति में प्रतिबिम्बित चिदाभास द्वारा अज्ञान से उपहित चैतन्य के अज्ञानरूप आवरण की समाप्तिपूर्वक स्वरूपज्ञान के अभिप्राय से कही गई श्रुति-'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' चरितार्थ हो जाती है। साथ ही स्वयंप्रकाशमान परब्रह्म किसी अन्य द्वारा प्रकाशित नहीं हो सकता, यह मन, वाणी एवं बुद्धि इन सबसे परे है। इसलिए इस अभिप्राय को ध्यान में रखकर कहे गए 'यन्मनसा न मनुते' इत्यादि श्रुतिवचन भी चरितार्थ हो जाते हैं। इसीलिए वेदान्तशास्त्र के विद्वानों ने ब्रह्मस्थित अज्ञान के विनाश के लिए वृत्तिव्याप्यत्व की अपेक्षा तो प्रदर्शित की है, किन्तु फल की व्याप्ति का निषेध किया है, क्योंकि स्वयं प्रकाशित होने के कारण उसे चैतन्याभास जैसे प्रकाशकतत्त्व की आवश्यकता नहीं रहती है। चैतन्याभास वस्तुतः शुद्धचैतन्य का ही एक अंश है। इसलिए उसे प्रकाशित न कर पाने के कारण वह परमशुद्धचैतन्य में ही, उसीप्रकार विलीन हो जाता है, जिसप्रकार दूषित जल को साफ करने के लिए प्रयोग किया गया कतकरेणु नामक पदार्थ स्वयं भी उसी जल में विलीन हो जाता है। अथवा अरणिगत अग्नि अरणि से उत्पन्न होने के बाद, अरणि के जल जाने पर स्वयं भी स्वतः ही शान्त हो जाती है।
२५८ वेदान्तसार
इसप्रकार निष्कर्षरूप में कहा जा सकता है कि गुरु के उपदेश के परिणामस्वरूप अधिकारी प्रमाता में जब 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि अज्ञातब्रह्म विषयकचित्तवृत्ति का उदय होता है तो वह प्रथमतः जीव के चैतन्यगत अज्ञान के आवरण को दूर करती है। उस अज्ञान के दूर होने के साथ ही उस चित्तवृत्ति का अस्तित्व भी दूषितजल को स्वच्छ करने वाले कतकचूर्ण के समान तथा अरणि में उत्पन्न अग्नि के समान स्वतः ही समाप्त हो जाता है। उस स्थित में चैतन्य का प्रतिबिम्बरूप चैतन्याभासमात्र रह जाता है, जो स्वयं परमशुद्धचैतन्य का ही अंश है। इसलिए परमशुद्धचैतन्यरूप, सूर्य को प्रकाशित करने में अक्षम दीपक के समान, वह भी उसी में विलीन हो जाता है और तब परमशुद्धचैतन्यमात्र शेष बचता है। यही 'अहं ब्रह्मास्मि' की सात्त्विक एवं अन्तिम अनुभूति है। इसी प्रसंग में जड़पदार्थ घट-पटादि के प्रत्यक्ष में उत्पन्न वृत्ति की भिन्नता का प्रतिपादन करते हैं-सांसारिक घट-पट आदि जड़पदार्थों के आकार से आकारितवृत्ति, वस्तुतः ब्रह्मज्ञान विषयकवृत्ति से भिन्न होती है। उस समय प्रमाता में 'अयं घटः' तथा 'अहं घटविषयक ज्ञानवान्' इसप्रकार की अज्ञात घटविषयकवृत्ति का उदय होता है, जो घटावच्छिन्नचैतन्य को आवृत करने वाले घटविषयक अज्ञान का विनाश करके, अपने में वर्तमान चिदाभास द्वारा घट को प्रकाशित करती है। इस प्रक्रिया को समझाने के लिए ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका को उद्धृत करते हैं। जिसका अभिप्राय है कि- बुद्धि एवं बुद्धि में प्रतिबिम्बित चिदाभास ये दोनों सबसे पहले घट में जाकर व्याप्त होते हैं। परिणामस्वरूप बुद्धि अर्थात् वृत्ति द्वारा घटविषयक अज्ञान विनष्ट कर दिया जाता है तथा वृत्ति में प्रतिबिम्बित होने वाले चिदाभास द्वारा घट प्रकाशित होता है। पुनः ग्रन्थकार इसी बात को एक उदाहरण देकर समझाते हैं-जिसप्रकार दीपक पहले अंधकार में रखे हुए घट-पटादि के आवरणरूप अंधकार को दूर करता है तथा बाद में अपने उसी प्रकाश से उन्हें प्रकाशित करता है। ठीक उसीप्रकार घटादि के आकार से आकारित चित्तवृत्ति घटादिविषयक चैतन्य के अज्ञानरूपी आवरण को पहले विनष्ट करती है और बाद में स्वप्रतिबिम्बित चिदाभास द्वारा घटादिकों को भी प्रकाशित करती है। अतः
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५९ ब्रह्म का अनुभव कराने वाली वृत्ति एवं घटादिकों का प्रत्यक्ष कराने वाली इस वृत्ति की भिन्नता स्पष्ट है। विशेष-(1) 'मनसा मनुते' इत्यादि श्रुतिवाक्यों में मन से अभिप्राय 'वृत्ति' से ग्रहण करना चाहिए। (2) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-५६ [बुद्धि एवं इसमें प्रतिबिम्बित चिदाभास] [सामान्यतः लौकिक प्रत्यक्ष-प्रक्रिया] प्रथमतः [घट में व्याप्त होते हैं] (अन्तःकरण) [परिणामस्वरूप] [विषयरूप में परिवर्तित होने पर] [घट विषयक अज्ञान की समाप्ति] [उसमें प्रतिबिम्बित चिदाभास] [उससे आच्छन्न चैतन्य] [तत्पश्चात् बुद्धि में स्थित चिदाभास द्वारा घट प्रकाशित होता है।] [द्वारा विषय का साक्षात्कार] (फलव्याप्ति) (वृत्ति व्याप्ति) [प्रकाशयुक्त शुद्ध चैतन्य में विलीन] [निषेध] [शास्त्रकारों द्वारा] [अपेक्षित] (अहं ब्रह्मास्मि) $\longleftarrow$ (ब्रह्मज्ञान में) अवतरणिका-परमशुद्धचैतन्य का साक्षात्कार होने तक अधिकारी प्रमाता श्रवण, मनन आदि का अभ्यास जारी रखता है। अतः ग्रन्थकार उनका विस्तृत वर्णन करते हैं- एवंभूतस्वस्वरूपचैतन्यसाक्षात्कारपर्यन्तं श्रवणमनननिदिध्यासन समाध्यनुष्ठानस्यापेक्षितत्वात्तेऽपि प्रदर्श्यन्ते। श्रवणं नाम षड्विधलिङ्गैरशेषवेदान्तानामद्वितीये वस्तुनि तात्पर्यावधारणम्। लिङ्गानि तूपक्रमोपसंहाराभ्यासापूर्वताफलार्थवादोपपत्त्याख्यानि। तत्र प्रकरणप्रति पाद्यस्यार्थस्य तदाद्यन्तयोरुपपादनमुपक्रमोपसंहारौ। यथा छान्दोग्ये
२६० वेदान्तसार षष्ठाध्याये प्रकरणप्रतिपाद्यस्याद्वितीयवस्तुन "एकमेवाद्वितीयं" इत्यादौ "ऐतदात्म्यमिदं सर्वं" इत्यन्ते च प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य वस्तुनस्तन्मध्ये पौनःपुन्येन प्रतिपादनमभ्यासः। यथा तत्रैवाद्वितीयवस्तुनि मध्ये तत्त्वमसीति नवंकृत्वः प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्याद्वितीयवस्तुनः प्रमाणान्तराविषयीकरणमपूर्वता। यथा तत्रैवाद्वितीयवस्तुनो मानान्तराविषयीकरणम्। पदच्छेद-एवम्भूत-स्वरूपचैतन्य-साक्षात्कार-पर्यन्तम् श्रवण-मनन- निदिध्यासन-समाधि-अनुष्ठानस्य अपेक्षितत्वात् ते अपि प्रदर्श्यन्ते। श्रवणम् नाम- षड्विधलिङ्गैः अशेष-वेदान्तानाम् अद्वितीये वस्तुनि तात्पर्यवधारणम्। लिङ्गानि तु उपक्रम-उपसंहार-अभ्यास-अपूर्वता-फलार्थवाद-उपपत्ति- आख्यानि। तत्र प्रकरणप्रतिपाद्यस्य अर्थस्य तद् आद्यन्तयोः उपपादनम् उपक्रम-उपसंहारौ। यथा- छान्दोग्ये षष्ठ-अध्याये प्रकरणप्रतिपाद्यस्य अद्वितीय वस्तुनः "एकम् एव अद्वितीयम्" इत्यादौ "ऐतद् आत्म्यम् इदम् सर्वम्" इति अन्ते च प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य वस्तुनः तत् मध्ये पौनःपुन्येन प्रतिपादनम् अभ्यासः। यथा तत्र एव अद्वितीयवस्तुनि मध्ये 'तत्त्वमसि' इति नवकृत्वः प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य अद्वितीयवस्तुनः प्रमाणान्तर अविषयीकरणम् अपूर्वता। यथा तत्रैव अद्वितीयवस्तुनः मानान्तर-अविषयीकरणम्।। अनुवाद-इसप्रकार अपने ही स्वरूप 'चैतन्य' के साक्षात्कार होने तक श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि आदि अनुष्ठानों के अपेक्षित होने के कारण वे भी प्रदर्शित किए जा रहे हैं। छः प्रकार के लक्षणों से युक्त, सम्पूर्ण वेदान्तसूत्रों का, अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में ही तात्पर्य है, यह निश्चय करना ही वस्तुतः श्रवण है। उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद तथा उपपत्ति नामक (ये) ही (छः) लिङ्ग हैं। उन छः लिङ्गों में प्रकरण में प्रतिपादन योग्य पदार्थ का, उसके प्रारम्भ एवं अन्त में प्रतिपादन करना (क्रमशः) उपक्रम एवं उपसंहार हैं। जिसप्रकार छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय में प्रकरण में प्रतिपादित करने योग्य अद्वितीयवस्तु 'एक ही अद्वैततत्त्व (ब्रह्म) के' प्रारम्भ में तथा 'यह सब कुछ वस्तुतः आत्मा का ही है' इसप्रकार अन्त में प्रतिपादन किया गया है।
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २६१ प्रकरण में प्रतिपादित वस्तु का बीच-बीच में बार-बार प्रतिपादन करना ही अभ्यास है। जैसे-वहीं (छान्दोग्योपनिषद् में) अद्वितीयवस्तु के (वर्णन के) बीच में 'वह तू है' इसका नौ बार प्रतिपादन किया गया है। प्रकरण में प्रतिपादित अद्वितीयवस्तु को अन्यप्रमाणों से अगम्य वर्णित करना 'अपूर्वता' है। जैसाकि वहीं (छान्दोग्योपनिषद् में) अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) के सम्बन्ध में प्रमाणान्तरों को अगम्य बताया गया है। 'चन्द्रिका'-गुरु के उपदेश के उपरान्त भी जब तक साधक को ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं होता, तब तक श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि इनका प्रतिदिन अनुष्ठान करना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए ग्रन्थकार इसी प्रसङ्ग में इनका उल्लेख करते हैं- (क) श्रवण-उपक्रम-उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद एवं उपपत्ति इन छः प्रकार के लक्षणों से सभी वेदान्तवाक्यों का एक ही अद्वितीय परमशुद्धचैतन्यब्रह्म में तात्पर्य है, इसप्रकार समझना ही श्रवण कहलाता है। यहाँ ग्रन्थकार ने 'श्रवण' की व्याख्या के प्रसङ्ग में 'छः' प्रकार के लिङ्गों का उल्लेख किया। अतः सर्वप्रथम उन छः लिङ्गों को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- (१) उपक्रम-उपसंहार-किसी भी प्रकरण में जब प्रतिपादन करने योग्य विषय के आरम्भ एवं अन्त का उचित एवं प्रभावशाली ढंग से प्रतिपादन करना ही, क्रमशः उपक्रम एवं उपसंहार कहा जाता है। इसी बात को उदाहरण द्वारा समझाते हैं। जैसे-छान्दोग्योपनिषद् नामक प्रसिद्ध प्रकरण ग्रन्थ के सम्पूर्ण छठे अध्याय में वस्तुतः वेदान्त की अद्वितीयवस्तु परब्रह्म का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है। उसी का वर्णन करते हुए वहाँ उपनिषद्कार ने एक ही अद्वैततत्त्व ब्रह्म का 'एकमेवाद्वितीयम्' इसप्रकार उल्लेख करते हुए विषय का प्रारम्भ किया है। जिसे 'उपक्रम' संज्ञा दी जा सकती है। इसीप्रकार वहीं अन्त में 'यह सब कुछ आत्मा का ही तत्त्व है' (ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्) ऐसा कहकर प्रतिपाद्यविषय का भलीप्रकार उपसंहार भी किया गया है। (२) अभ्यास-प्रतिपादन करने योग्य अद्वितीयवस्तु परब्रह्म के सम्बन्धित प्रकरणग्रन्थ के बीच-बीच में, बार-बार विभिन्न तरीकों से
२६२ वेदान्तसार प्रतिपादन को ही अभ्यास कहते हैं। जैसे-वहीं छान्दोग्योपनिषद् में अद्वितीय वस्तु परमब्रह्म शुद्धचैतन्य के बारे में 'तत्त्वमसि' इत्यादि का वर्णन करते हुए बार-बार इसका वर्णन किया गया है। अतः यही अभ्यास है। (३) अपूर्वता-प्रकरण में प्रतिपादन करने योग्य अद्वितीयवस्तु परमब्रह्म के बारे में यह प्रतिपादन करना कि अनुभवादि के अतिरिक्त अन्य सभी प्रमाण इसे सिद्ध करने में असमर्थ हैं, अर्थात् अन्य किसी प्रमाण का ब्रह्म के प्रतिपादन अथवा सिद्धि में सक्षम होना ही अपूर्वता कहलाता है। जैसाकि वहीं छान्दोग्योपनिषद् में-'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' इत्यादि श्रुतिवचनों के माध्यम से उपनिषदकार ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि उस अद्वितीयतत्त्व ब्रह्म को केवल उपनिषद्वचनों से ही जाना जा सकता है। उसकी सिद्धि में प्रत्यक्षादि सभी प्रमाण व्यर्थ हैं। यही प्रतिपादन अपूर्वता कहा जाएगा। अवतरणिका-इसी प्रसङ्ग को आगे बढ़ाते हैं- फलं तु प्रकरणप्रतिपाद्यात्मज्ञानस्य तदनुष्ठानस्य वा तत्र तत्र श्रूयमाणं प्रयोजनम्। यथा तत्र “आचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेवं चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य” इत्यद्वितीयवस्तुज्ञानस्य तत्प्राप्तिः प्रयोजनं श्रूयते। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य तत्र तत्र प्रशंसनमर्थवादः। यथा तत्रैव “उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातं” इत्यद्वितीयवस्तुशंसनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यार्थसाधने तत्र तत्र श्रूयमाणा युक्तिरुपपत्तिः। यथा तत्र “यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यं” इत्यादावद्वितीयवस्तुसाधने विकारस्य वाचारम्भणमात्रत्वे युक्तिः श्रूयते। मननं तु श्रुतस्याद्वितीयवस्तुनो वेदान्तानुगुणयुक्तिभिरनवरतमनुचिन्तनम्। विजातीयदेहादिप्रत्ययरहिताद्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्ययप्रवाहो निदिध्यासनम्॥ पदच्छेद-फलम् तु प्रकरणप्रतिपाद्यस्य आत्मज्ञानस्य तद् अनुष्ठानस्य वा तत्र तत्र श्रूयमाणम् प्रयोजनम्। यथा-तत्र “आचार्यवान् पुरुषः वेद तस्य तावद् एव चिरम्, यावत् न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये” इति अद्वितीयवस्तुज्ञानस्य तत्प्राप्तिः प्रयोजनम् श्रूयते।
अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २६३ प्रकरणप्रतिपाद्यस्य तत्र तत्र प्रशंसनम् अर्थवादः। यथा-तत्र एव "उत तम आदेशम् अप्राक्ष्यः येन अश्रुतम् श्रुतम् भवति, अमतम् मतम्, अविज्ञातम् विज्ञातम्" इति अद्वितीयवस्तु प्रशंसनम्। प्रकरणप्रतिपाद्य-अर्थसाधने तत्र तत्र श्रूयमाणा युक्तिः उपपत्तिः। यथा-तत्र "यथा सौम्य, एकेन मृत्पिण्डेन सर्वम् मृण्मयम् विज्ञातम् स्याद्, वाचा-आरम्भणम् विकारः नामधेयम् मृत्तिका इति एव सत्यम्" इत्यादौ अद्वितीयवस्तुसाधने विकारस्य वाचा-आरम्भण-मात्रत्वे युक्तिः श्रूयते। मननम् तु श्रुतस्य अद्वितीयवस्तुनः वेदान्तः-अनुगुणयुक्तिभिः अनवरतम् अनुचिन्तनम्। विजातीय-देहादि-प्रत्ययरहित-अद्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्यय- प्रवाहः निदिध्यासनम्।। अनुवाद-प्रकरण में प्रतिपादित करने योग्य विषय आत्मज्ञान अथवा उसके अनुष्ठान का उस-उस विषय में सुनायी देता हुआ प्रयोजन ही फल है। जैसाकि-"वहाँ आचार्यवान् पुरुष ही जानता है, उसके लिए तभी तक विलम्ब समझना चाहिए जब तक वह इससे मुक्त नहीं हो जाता है, इसके बाद वह ब्रह्म ही हो जाता है।" इत्यादि (वाक्यों में) अद्वितीय वस्तु के ज्ञान एवं उसकी प्राप्ति का प्रयोजन बताया गया है। प्रकरण में प्रतिपाद्य वस्तु की यत्र तत्र प्रशंसा करना ही अर्थवाद है। जैसे-"वहीं तूने (ब्रह्म) के उस उपदेश को पूछा है जिसके द्वारा न सुना गया सुना हुआ, अचिन्तित चिन्तन किया हुआ और अविज्ञात भलीप्रकार जाना हुआ हो जाता है", इसप्रकार अद्वितीयवस्तु ब्रह्म की प्रशंसा की गई है। प्रकरण में प्रतिपादित करने योग्य वस्तु को सिद्ध करने के लिए यत्र तत्र वर्णन की गई युक्तियाँ ही उपपत्ति है। जैसे-वहीं 'हे सौम्य! जिसप्रकार एक ही मिट्टी के पिण्ड से बनी हुई सभी मिट्टी की वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है। उसके विभिन्न विकार केवल शब्दप्रपञ्चमात्र हैं, मिट्टी ही वहाँ वस्तुतः सत्य है।' इत्यादि में अद्वितीयवस्तु की सिद्धि में (जगत् प्रपञ्चरूप) कार्य को वाणी का प्रपञ्चमात्र कहना रूप युक्ति सुनाई देती है। केवल वेदान्त के अनुकूल युक्तियों द्वारा सुनी गई अद्वैतवस्तुरूप (ब्रह्म) का निरन्तर बार-बार चिन्तन ही मनन है। विजातीयदेह आदि के विचारों से रहित अद्वितीयवस्तु के बारे में अनुकूल विचारधारा के प्रवाह को निदिध्यासन कहा गया है।