विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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( ४२ ) राष्ट्रीयता ही भारतीय गणतन्त्र को संघबद्ध तथा सबल कर सकती है, विभिन्न जातियों, उपजातियों और सम्प्रदायों से सम्बद्ध सज्जनों में सौजन्य की वृद्धि कर सकती है तथा विश्वबन्धुत्व का मार्ग प्रशस्त कर सकती है । समता पर आधृत संस्कृति ही श्रेष्ठ मानी जा सकती है। तभी विश्वबन्धुत्व, मान- वता और विश्वकल्याण की भावना को बढ़ावा मिल सकता है । निराग्रही समीक्षा तथा सर्जनात्मक समन्वय द्वारा ही यह सम्भव है । विचार-वैचित्र्य से घबराने की कोई बात नहीं है। विचार-स्वातन्त्र्य चिर काल से भारतीय संस्कृति का सद्गुण रहा है। भारतीय संस्कृति के विकास में विचार-स्वातन्त्र्य और विचार-विमर्श का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है और इनके द्वारा ही इस समय भी जड़ता और संकीर्णता का परित्याग तथा सर्जनात्मक चिन्तन हमारे लिये सम्भव हो सकते हैं । राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, लोकतन्त्र और समाजवाद इस युग की मुख्य मान्यताएँ हैं। इन्हें अपनाना, भारतीय संस्कृति में इनका समावेश करना नितान्त आवश्यक है । इस तरह समाजवाद भारतीय संस्कृति के दीर्घकालीन, सर्वजनीन, सजीव मूल्यों तथा तथ्यों का पाश्चात्य संस्कृति के सजीव, प्रगतिशील तत्त्वों तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों से समन्वय करता है। आचार्य नरेन्द्रदेव के शब्दों में समाजवाद पर आस्था रखने वाले विचारक एक ऐसी नई संस्कृति का निर्माण करना चाहते हैं, जिसका मूल प्राचीन सभ्यता में होगा, जिसका रूप-रंग देशी होगा, जिसमें पुरातन सभ्यता के उत्कृष्ट अङ्ग सुरक्षित रहेंगे और साथ-साथ उसमें ऐसे नवीन अंशों का भी समावेश होगा, जो आज जगत् में प्रगतिशील हैं और संसार के सामने एक नवीन आदर्श उपस्थित करना चाहते हैं । तभी उस विश्व-संस्कृति का निर्माण हो सकेगा, जिसमें कि सभो मनुष्य आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दासता से मुक्त हों, सभी को मौलिक मानवाधिकार प्राप्त हों तथा सबको स्वतन्त्रता और सम्मान के साथ अपने आर्थिक अभ्युदय और सांस्कृतिक उन्नति की सुविधा प्राप्त हो, जिसमें प्रत्येक राष्ट्र को बराबर की जनतान्त्रिक आजादी हासिल हो, सब अन्तरराष्ट्रीय झगड़े शान्तिमय ढंग से निपटाये जा सकें और सब राष्ट्र पारस्परिक सहयोग के जरिये मानव-कल्याण में वृद्धि करें। यह खेद की बात है कि भारतीय समाजवादी आन्दोलन आचार्य नरेन्द्रदेव सरीखे मानवतावादी मनीषी के उक्त विचारों का अनुवर्तन न कर सका। उनके कुछ अन्तरंग साथियों ने ही उनका अन्तिम जीवन दूभर बना दिया था। उनके कुछ दूसरे साथियों ने राजनीति से संन्यास ले लिया। किन्तु आचार्यजी अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक इन सब विपरीत परिस्थितियों से जूझते रहे और अपने सिद्धान्तों के मूल्य पर कभी भी किसी के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। आज उनके कुछ अनुयायी तान्त्रिकों और बाबाओं की देहली ढोकने लगे हैं और कुछ धम्म की शरण में चले गये हैं। महात्मा गाँधी और आचार्य नरेन्द्रदेव के द्वारा स्थापित मूल्यों का अनुवर्तन न कर पाने के कारण ही भारतीय गणतन्त्र ने दलतन्त्र का रूप ले लिया है। आज भारतीय राजनीतिज्ञों की देश की अपेक्षा अपने दल के
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( ४३ ) प्रति अधिक गहरी भक्ति है। दूसरी तरफ तान्त्रिक धर्म को रहस्यवादी मान्यताओं के कारण धर्म और मोक्ष के क्षेत्र में भी जब छद्म वेश में अर्थ और काम ने प्रवेश पा लिया, तो सामान्य नागरिक के सामने नैतिकता का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है। आभिजात्यवाद से वह दबा हुआ है। 'समरथ को नहि दोष गुसाईं' की घुट्टी उसे पिलाई गई है। वह उत्पीड़क को दोष न देकर अपने ही पूर्व जन्म के कृत्यों को कोसता है। भगवद्गीता में वर्णित आसुरी सम्पति का सर्वत्र साम्राज्य फैला हुआ है। विश्वविद्यालय जैसी पवित्र संस्थाएँ भी इनसे अछूती नहीं हैं। देश में असंख्य छोटे-मोटे तानाशाह हैं। उनके आतंक से आसपास का वातावरण भय और आशंका से भरा रहता है। हमने 'शोचनीया भारतीया नैतिकता' शीर्षक संस्कृत निबन्ध में भारतीय जनमानस की इस कमजोरी पर प्रकाश डाला था कि उसकी अन्याय के प्रतीकार की शक्ति अत्यन्त प्रसुप्त है। इसी का यह परिणाम है कि दुर्योधन के औद्धत्य जैसी सभापर्व की घटनाओं को हम अनुशासन पर्व मान बैठते हैं। योगशास्त्र का स्वरूप बतलाते हुए हमने उसको धर्म-निरपेक्ष शास्त्र बताया है। आज से १५ वर्ष पहले महावीर जयन्ती के अवसर पर आचार्य नरेन्द्रदेव ने अपने भाषण में इस बात का उल्लेख किया था और सम्पूर्ण भारतीय योगशास्त्र का एक तुलनात्मक अनुशीलन प्रस्तुत करने के लिए विद्वानों का आह्वान किया था। यह कार्य अब भी जहाँ का तहाँ पड़ा हुआ है। प्रत्येक भारतीय दर्शन की अपनी योगविधि है और अपने चरम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उसका आचरण आवश्यक माना गया है। इन योगविधियों की पृथक् सत्ता रहते हुए भी इनमें अद्भुत साम्य है। बौद्ध तन्त्र की योगविधि को ही लें। वज्रयान, कालचक्रयान और सहजयान के नाम से इसके तीन भेद किये गये हैं। सहजयान को बौद्ध सिद्धों की अनोखी देन माना जाता है। वस्तुतः योगवासिष्ठ, विज्ञानभैरव सरीखे ग्रन्थों को देखने से यह सारा कल्पनाओं का महल ढह जाता है। वैष्णव, शैव, शाक्त प्रायः सभी तान्त्रिक धाराओं में वज्र- यान, कालचक्रयान, और सहजयान के सिद्धान्तों का विस्तार से प्रतिपादन मिलता है। यह बताया जा चुका है कि १जैन योगशास्त्र में प्रतिपादित पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत ध्यानविधि कौलदर्शन में भी स्वीकृत है और मालिनीविजय, तन्त्रालोक जैसे ग्रन्थों में इनका विस्तार से वर्णन मिलता है। इन पंक्तियों के लेखक का यह स्पष्ट विचार है कि भारतीय तत्त्वज्ञान के क्रमिक विकास को ब्राह्मण, बौद्ध, जैन, हिन्दू आदि के कल्पित काल विभागों में बाँटकर किया गया अध्ययन वस्तुतः अधूरा है। सम्पूर्ण भारतीय चिन्तन के दैशिक और कालिक क्रमिक विकास का तुलनात्मक एवं घात-प्रतिघातात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाना चाहिये और ऐसा करते समय ब्राह्मण, बौद्ध, जैन जैसे कल्पित विभाग सत्य की खोज में बाधक नहीं होने चाहिये। इस प्रकार का अध्ययन प्रस्तुत न हो पाने से ही भारतीय चिन्तन में अनेक प्रकार की विसंगतियाँ प्रविष्ट हो गई हैं। १. द्रष्टव्य—आचार्य शुभचन्द्र कृत ज्ञानार्णव, ३४-३७ प्रकरण ।
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( ४४ ) अन्त में सत्य की विजय होती है, यह एक सही भारतीय अवधारणा है। कुछ लोगों का कहना है कि सत्य की नहीं, शक्ति की विजय होती है। वस्तुतः आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाय तो सत्य और शक्ति में कोई विरोधाभास नहीं है। लोक-व्यवहार में देखा जाता है कि पाशविक शक्तियाँ सदा सत्य का गला घोटे रहती हैं। किन्तु पीड़ित व्यक्ति घबरा कर उस पाशविक शक्ति के सामने घुटने नहीं टेकता, तो उसके भीतर धीरे-धीरे दिव्य शक्ति का आलोक फैलने लगता है। यह शक्ति कहीं से आती नहीं, यह उसका अपना ही स्वरूप है। तन्त्रशास्त्र का उद्घोष है कि अपनी आत्मा ही अपना इष्टदेव है। इस पवित्र आध्यात्मिक शक्ति की ही आराधना का तन्त्रशास्त्र उपदेश करते हैं और विज्ञानभैरव सरीखे योगशास्त्र के ग्रन्थों में सहज योगविधि से अपने इस स्वरूप का साक्षात्कार करने का विधान है। इसी दिव्य शक्ति को जगाने का योगी अरविन्द और श्रद्धेय पं० गोपीनाथ कविराज उपदेश करते हैं। इस दिव्य शक्ति का आविर्भाव होने पर ही जगत् की पाशविक शक्तियाँ दब सकती हैं। गाँधीवादी दर्शन अथवा समाजवादी दर्शन में किसी योगविधि को नहीं अपनाया गया है। इसीलिये आज यह दिग्भ्रान्त है। यम (अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) और नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योगविधि के अत्यावश्यक अंग हैं। नये-नये भूदान जैसे कर्मकाण्डों की सृष्टि करने से यह कार्य पूरा नहीं होगा। आज मानव जाति, विशेष कर भारतीय जनता तन और मन से बीमार है। योगशास्त्र से ये बीमारियाँ दूर हो सकती हैं। यह तब होगा, जब कि योगशास्त्र के सही स्वरूप का चुनाव किया जाय। तभी व्यक्तिगत उन्नति के साथ सामूहिक उन्नति की भावना की, पारलौकिक उपलब्धि के साथ ऐहलौकिक नैतिकता की, सीमित रूप में ही सही ह्रासवाद के स्थान पर विकासवाद और भाग्यवाद के स्थान पर पुरुषकारवाद की भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठा हो सकती है। हमारे मत से योगवासिष्ठ और विज्ञानभैरव सरीखे ग्रन्थ इस कमी को पूरी ईमानदारी से पूरा कर सकते हैं। कृतज्ञता-ज्ञापन इस ग्रन्थ को पाठकों के सामने उपस्थित करते हुए सभी पूर्वाचार्यों और श्रद्धेयचरण गुरुदेव स्वर्गीय पं० गोपीनाथ कविराज एवं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वेदान्त विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष पं० श्रीरघुनाथ शर्मा के प्रति नतमस्तक हूँ। इस ग्रन्थ के अनुवाद कार्य का आरम्भ तब हुआ था, जब कि यह लेखक जातीय और क्षेत्रीय संकीर्णता की तीखी डाढ़ों में फंसा हुआ था। इस दुष्काल के प्रमुख सहायक परमा- दरणीय अनन्तश्रीविभूषित पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य एवं स्वामी करपात्रीजी महाराज के प्रति आभार प्रदर्शित करता हूँ। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पालि विभाग के अध्यक्ष सुहृद्वर पं० श्री जगन्नाथ उपाध्याय कष्ट और अभाव के दिनों के सदा साथी रहे हैं। इन सब महानुभावों की सहायता के बिना इस दुःस्थिति से निकल पाना कठिन था। उत्तर
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( ४५ ) प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल महामहिम मरि डॉ० चेन्ना रेड्डी महोदय की असीम अनुकम्पा से इस दुःस्थिति का अन्त हो सका। अतः यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित किया जा रहा है। इस प्रसंग में मैं अपने परिवार को और सहधर्मिणी सौ० सुशीला द्विवेदी को भी नहीं भुला सकता, जिन्होंने कि रुग्ण रहते हुए भी बड़े धैर्य और शालीनता के साथ इस दुःस्थिति का सामना किया। इनके कारण ही मैं परिवार के दैनन्दिन उत्तरदायित्व से मुक्ति पाकर भगवती सर- स्वती की आराधना के लिये पर्याप्त समय निकाल पाता हूं। अनेक भारतीय लिपियों के विशेषज्ञ और सरस्वतीभवन पुस्तकालय के वरिष्ठ सदस्य पं० श्रीजनार्दन शास्त्री पाण्डेय एवं मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन संस्था की वाराणसी शाखा के व्यवस्थापक श्रीनरेन्द्रकुमार जैन के परामर्श से इस ग्रन्थ के अनुवाद कार्य का श्रीगणेश किया गया था और भारतीय दर्शन एवं संगीत के प्रसिद्ध विद्वान् ठाकुर श्रीजयदेवसिंहजी ने इस अनुवाद को सराहा और साथ में अनुवाद को टिप्पणियों से सुसज्जित करने का बहुमूल्य परा- मर्श दिया था। हिन्दी के माने हुए विद्वान् श्रीकृष्णशंकर शुक्ल ने ग्रन्थ के पूरे हिन्दी अनुवाद को धैर्यपूर्वक सुनकर उसमें यथोचित संशोधन प्रस्तुत किये थे और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्व- विद्यालय के आगमशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् श्रीरघुनाथ मिश्र ने सम्पूर्ण उपोद्घात को मनो- योगपूर्वक पढ़कर आवश्यक परिवर्तन एवं संशोधन सुझाये हैं। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्या- लय के बौद्ध दर्शन विभाग के प्राध्यापक नवाचार्य श्रीलक्ष्मण त्रिवेदी, सरस्वतीभवन पुस्तका- लय के मुद्रित विभाग के वरिष्ठ सदस्य श्रीजानकीप्रसाद शर्मा और पं० श्रीहरिवंश त्रिपाठी ने भी इस कार्य में यथोचित सहयोग किया है। गोयनका विश्वनाथ पुस्तकालय के अध्यक्ष श्रीदेवमणि याज्ञिक ने संबद्ध पुस्तकों के अभाव की प्रतीति कभी नहीं होने दी। इन सब महा- नुभावों के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन संस्था के अध्यक्ष श्रीसुन्दरलाल जैन के सहयोग से ही यह पुस्तक पाठकों तक पहुंच रही है। इसके त्वरित मुद्रण में काशी के महावीर प्रेस के व्यवस्थापक श्रीबाबूलाल जैन 'फागुल्ल' ने सराहनीय सहयोग किया है। इनके प्रति भी यह लेखक कृतज्ञता-ज्ञापन करता है। श्लोकार्ध-सूची और शब्द-सूची तैयार करने में सहायता करनेवाली अपनी पुत्री कु० करुणा द्विवेदी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ। हमने यहाँ कुछ विषयों पर अपने विचार प्रकट करने की धृष्टता की है। उनकी साधुता-असाधुता का निर्णय तो मनीषीगण ही कर सकते हैं। स्खलन और त्रुटियाँ मनुष्य के स्वभाव के साथ लगी हुई हैं। भट्ट कुमारिल के शब्दों में 'समादधति सज्जनाः' कह कर हम इस उपोद्घात को पूरा करते हैं। गीता जयन्ती, सं० २०३४ विद्वद्वशंवद— दि० २१-१२-७७ व्रजवल्लभ द्विवेदी
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द्वितीय संस्करण इस ग्रन्थ का पहला संस्करण सन् १९७७ के बीतते-बीतते प्रकाशित हुआ था । यह प्रसन्नता की बात है कि अब १९८३ के बीतते-बीतते इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हो रहा है । किसी परीक्षा का पाठ्यग्रन्थ न रहते हुए भी अथवा उपन्यास एवं कथा साहित्य जैसी मनोरंजक सामग्री के न रहने पर भी ६ वर्ष की स्वल्प अवधि में इसका यह दूसरा संस्करण प्रकाशक की ओर से प्रस्तुत किया जा रहा है, अपने आप में यह एक घटना है । इससे पाठकों की योग और अध्यात्म सम्बन्धी रुझान का पता चलता है । आशा है कि इस द्वितीय संस्करण का भी पाठक उसी उत्साह से स्वागत करेंगे । इस ग्रन्थ को एक तरफ मध्यप्रदेश के एक बाबा का श्राप मिला है और दूसरी तरफ गणेशपुरी के सन्त स्वामी मुक्तानन्द जी महाराज का प्रसाद । दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि अब वे स्थूल रूप में हमारे सामने नहीं रहे । निग्रह और अनुग्रह दोनों भगवान् भैरव के ही व्यापार हैं । गणेशपुरी आश्रम के एक वाक्य की ओर मैं पाठकों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ । वह वाक्य है—परस्परदेवो भव । प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रतिपादित विश्वाहन्ता दृष्टि के विकास की कुञ्जी इस वाक्य में छिपी-सी प्रतीत होती है । इस विषय पर गहन मनन करने की आवश्यकता है । इस ग्रन्थ के एक समालोचक का कहना है कि गांधीवादी दर्शन दिग्भ्रान्त नहीं है, देशवासी दिग्भ्रान्त हैं और उसके अनेक कारण हैं । कौन दिग्भ्रान्त है, इसका निर्णय पाठकों पर ही छोड़ा जा रहा है । इस संस्करण में टिप्पणी आदि में यत्र-तत्र किये गये सामान्य संशोधनों के अतिरिक्त कोई विशेष परिवर्तन-परिवर्धन नहीं किये गये हैं और न उस प्रकार के सुझाव ही हमारे पास आये हैं । प्रबुद्ध पाठकों के द्वारा भेजे गये सुझावों का हम सदा स्वागत करेंगे और आवश्य- कता के अनुसार तदनुरूप सामग्री का अगले संस्करणों में साभार समावेश करने का प्रयत्न करेंगे । पौष कृष्ण ६, वि० २०४० विद्वद्वशंवद— बड़ा दिन (२५-१२-८३) व्रजवल्लभ द्विवेदी
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विज्ञानभैरवः
श्रीभैरवी¹ उवाच श्रुतं देव मया सर्वं ²रुद्रयामलसंभवम् । त्रिकभेदमशेषेण सारात्सारविभागशः ॥१॥ अद्यापि न निवृत्तो मे संशयः परमेश्वर । अन्वयार्था हे देव, मया रुद्रतच्छक्तिसामरस्यात्मनो यामलात् संभूतं सर्वं त्रिकभेदम् अशेषेण सामस्त्येन सारात्सारविभागशः श्रुतम्। वेदादिशास्त्रेषु त्रिकशास्त्रं सारम्, तत्रापि सिद्धा-मालिनी-¹उत्तरशास्त्राणि क्रमश उत्कृष्टानि सारात्सारपदाभिधेयानि विभागशो मया श्रुतानि। तथापि हे परमेश्वर ! नाद्यापि मे संशयः शान्तः। 'यामलादिषु भाषितम्' इति पाठे यामलादिषु शिवशक्तिसंघट्टनात्महेतुषु ब्रह्मविष्णुरुद्रभैरवादियामलेषु तदाख्येषु आगमेषु यत्किञ्चिदुक्तमित्यर्थः ॥१॥ रहस्यार्थ अनुबन्ध-चतुष्टय शास्त्रीय ग्रन्थों के टीकाकारों की यह परम्परा रही है कि प्रारंभ में व्याख्येय ग्रन्थ के अनुबन्ध-चतुष्टय का स्पष्ट लेखा-जोखा रखा जाय । विषय, प्रयोजन, संबन्ध और अधिकारी ये अनुबन्ध-चतुष्टय कहलाते हैं। ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय क्या है ? इसके अध्ययन से किस १. देवी-क० । २. यामलादिषु भाषितम्-ख० ।
- तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने (१।१८; पृ० ४९) त्रिकशास्त्र को सिद्धा, नामक और मालिनी नाम के तीन खण्डों में विभक्त किया है। इनमें क्रिया-प्रधान तन्त्र को सिद्धा और ज्ञान-प्रधान तन्त्र को नामक बताया गया है। मालिनीमत में क्रिया और ज्ञान दोनों प्रतिपादित हैं। अभिनवगुप्त ने स्वयं "तत्सारं त्रिकशास्त्रं हि तत्सारं मालिनीमतम्" (१।१८) ऐसा कह कर इनमें मालिनीमत को प्रधानता दी है। क्षेमराज अपने विज्ञानो- द्योत (पृ० ४) में सिद्धा, मालिनी और उत्तर यह नाम देकर इनका उत्तरोत्तर उत्कर्ष बताते हैं। नामक नाम का कोई तन्त्र हमारी दृष्टि में नहीं आया। क्षेमराज के 'उत्तर' नाम को देख कर ऐसी कल्पना करने की इच्छा होती है कि जयरथ के ग्रन्थ में 'नामक' न होकर 'वामक' पाठ होना चाहिये। वाम तन्त्र शिव के उत्तर मुख से उद्भूत माने जाते हैं। क्या 'वामक' नाम से वामकेश्वर तन्त्र का ग्रहण किया जाय ?
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२ : विज्ञानभैरव प्रयोजन की सिद्धि होगी ? इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी कौन है ? ये बातें परस्पर एक दूसरे से कैसे जुड़ी हुई हैं ? इनका संक्षिप्त विवरण दे दिया जाय तो पाठक को अपनी रुचि के शास्त्र का अध्ययन करने में सुविधा अवश्य होती है । इस तरह से अनुबन्ध-चतुष्टय का विश्लेषण करते हुए प्राचीन टीकाकार संक्षेप में प्रायः उन सभी बातों की चर्चा कर देते हैं, जिनकी कि विस्तार से चर्चा आधुनिक ग्रन्थ-संपादन पद्धति में प्रारंभ में भूमिका लिख कर की जाती है । प्रस्तुत संस्करण में भी प्रारंभ में उपोद्घात लिख कर इन बातों की विस्तार से चर्चा की जायेगी, किन्तु प्राचीन टीकाकारों की पद्धति के अनुसार यहाँ उन बातों को संक्षेप में बता देना भी आवश्यक प्रतीत होता है । अन्य शास्त्रों की अपेक्षा आगमशास्त्र¹ या तन्त्रशास्त्र की यह विशेषता रही है कि यहाँ सृष्टि, स्थिति और संहार के अतिरिक्त तिरोधान और अनुग्रह भी भगवान् के कृत्य (कार्य) मान जाते हैं । इस तरह से प्रत्येक आगमिक या तान्त्रिक संप्रदाय अपने उपास्य परम तत्त्व को पंचकृत्यकारी मानता है । ईश्वर की तिरोधान शक्ति के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल बैठता है और वह सृष्टि, स्थिति, संहार के अर्थात् आवागमन के एक अटूट से चक्कर में पड़ जाता है । इस चक्कर से जीव ईश्वर का अनुग्रह होने पर ही निकल सकता है । ईश्वर के इस अनुग्रह को तन्त्रशास्त्र में 'शक्तिपात' के नाम से कहा गया है । ईश्वर का अनुग्रह, ²शक्तिपात, अर्थात् कृपादृष्टि जिस जीव पर होती है, शास्त्रों के अध्ययन में उसकी रुचि जाग उठती है और अनायास ही उस पर गुरु की कृपा हो जाती है । ³गुरु की कृपा से, शास्त्रों के अध्ययन से और अन्ततः निजी प्रयत्नों से जीव जब अपने
- आगमशास्त्र और तन्त्रशास्त्र एक ही मूल उद्गम की दो धाराएँ हैं । इसके लिए लेखक का 'आगम आणि तन्त्रशास्त्र' शीर्षक निबन्ध देखना चाहिये ।
- साधक या शिष्य पर ईश्वर या गुरु की कृपा को शक्तिपात कहा जाता है । शैव, शाक्त और वैष्णव आगमों का यह एक पारिभाषिक शब्द है । पंचकृत्यकारी (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह) प्रभु की अनुग्रह शक्ति का यह व्यापार है । ईश्वर या गुरु अपनी शक्ति का संचार साधक या शिष्य के हृदय में कर देता है, जिससे कि उसकी बुद्धि निर्मल होकर विवेकोन्मुख हो उठती है, स्वात्मस्वरूप की खोज में लग जाती है । अभिनवगुप्त ने शक्तिपात के लक्षण, भेद आदि के संबन्ध में मत-मतान्तरों की आलो- चना करते हुए अपने विशाल ग्रन्थ तन्त्रालोक के तेरहवें आह्निक (भा० ८, पृ० १-२१४) में विस्तार से विचार किया है । लु० सं० उपोद्घात (पृ० १५५-१५७) भी देखिये ।
- "गुरुतः शास्त्रतः स्वतः" किरणागम के इस वचन को अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक (४।७८) में उद्धृत किया है । वहीं (४।७९) निशाटन नाम का एक अन्य ग्रन्थ भी उद्धृत है, जिसमें कि क्रमभेद से यही बात कही गई है—"त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानमात्मा शास्त्रं गुरोर्मुखम्" । महार्थमंजरीपरिमल (पृ०६) में भी यह प्रसंग आया है ।
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विज्ञानभैरव : ३ वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तो वह आवागमन से छुटकारा पा जाता है और उसके लिये ईश्वर की पंचकृत्यकारिता समाप्त हो जाती है। आगम¹ या तन्त्रशास्त्र की अनेक शाखा-उपशाखाएँ हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ 'विज्ञानभैरव' कश्मीर के प्रत्यभिज्ञा या त्रिक संप्रदाय से संबद्ध माना जाता है। तन्त्रालोक में अभिनवगुप्त ने तन्त्रशास्त्र को चार कोटियों में विभक्त किया है—²अनुपाय, शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और आणवोपाय । प्रत्यभिज्ञा या त्रिक दर्शन को उन्होंने अनुपाय कोटि में रखा है। सिद्ध-साहित्य में प्रचलित 'सहज' शब्द को हम अनुपाय शब्द का पर्याय मान सकते हैं। अनुपाय पद्धति से जिस परम तत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है, किसी यौगिक पद्धति का सहारा लिये बिना वहाँ तक पहुँचा नहीं जा सकता। अनुपाय शब्द का जयरथ³ ने 'अल्प उपाय' अर्थ किया है, क्योंकि पर्युदास स्थल में नञ् ⁴अल्पार्थक माना जाता है जैसा कि 'अनुदरा कन्या' इस प्रयोग में 'अनुदरा' शब्द का अर्थ 'पतली कमर वाली' होता है। जिस यौगिक प्रक्रिया के सहारे इस अनुपाय पद्धति से परम तत्त्व तक पहुँचा जा सकता है, विज्ञानभैरव में उसी का विस्तार से बड़ी गंभीरता से विवेचन किया गया है। इस तरह प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय अनुपाय (सहज) योग है। अनुपाय दर्शन के द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व (विज्ञानभैरव) तक साधक को पहुँचा देना इसका प्रयोजन है। गुरु की कृपा, शास्त्र के अध्ययन और स्वयं अपनी प्रतिभा के सहारे परम तत्त्व के अन्वेषण में लगा हुआ व्यक्ति इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी होगा और ये परस्पर प्रतिपाद्य-प्रतिपादक एवं प्रतिपत्ता के रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए रहेंगे। प्रश्नोत्तरतत्त्वनिर्णय तन्त्रशास्त्र के प्रायः सभी ग्रन्थ प्रश्न-प्रतिवचन (उवाच) शैली में लिखे गये हैं। शैव और शाक्त तन्त्र शिव-पार्वती अथवा भैरव-भैरवी के संवाद अर्थात् प्रश्नोत्तर पद्धति में मिलते हैं। अद्वैतवादी शैव और शाक्त तन्त्रों में शिव और शक्ति का पृथक् अस्तित्व नहीं
- आगम और तन्त्रशास्त्र के स्वरूप, शाखा-उपशाखा आदि के विषय में लेखक ने पूना की वेदशास्त्रोत्तेजक सभा के शताब्दी ग्रन्थ 'प्राचीन भारतीय विद्येचे पुनर्दर्शन' में प्रकाशित 'आगम आणि तन्त्रशास्त्र' शीर्षक निबन्ध में विस्तार से प्रकाश डाला है। लुप्तागमसंग्रह के उपोद्घात का पूर्वार्ध भी देखिये।
- इन चारों उपायों के संबन्ध में उपोद्घात में विस्तार से विचार किया गया है।
- "पर्युदासस्य 'अनुदरा कन्या' इतिवदल्पार्थत्वेऽपि भावात् । (तथा च) अनुपायत्वम् (इत्यस्य) अल्पोपायत्वमित्यर्थः" (तन्त्र० वि० २।२; पृ० ३)।
- "नञ्भावे विषेधे च स्वरूपार्थेऽप्यतिक्रमे । ईषदर्थे च सादृश्ये तद्विकारतदन्ययोः ॥" मेदिनीकोश के इस श्लोक में आठ अर्थों में नञ् का प्रयोग बताया गया है। प्रस्तुत स्थल में ईषत् (अल्प) अर्थ में नञ् का प्रयोग हुआ है।
- 'विज्ञानभैरव' पद की व्याख्या एवं विश्लेषण उपोद्घात में देखना चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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४ : विज्ञानभैरव माना जाता। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रारंभिक श्लोकों में बहुत ही संक्षेप में इस विषय पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस स्थिति मे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब इनकी अलग से कोई सत्ता नहीं है, तब इनमें संवाद कैसे संभव है ? क्योंकि संवाद तो परस्पर दो या अधिक व्यक्तियों का ही हो सकता हैं। इस प्रश्न का समाधान अद्वैतवादी तन्त्र-ग्रन्थों के टीकाकारों ने अपनी-अपनी शैली में किया है। कविकुलगुरु कालिदास ने पार्वती और परमेश्वर को शब्द और अर्थ के समान परस्पर अनुस्यूत माना है (रघु० १।१)। महावैयाकरण भर्तृहरि ने कहा है कि शब्दब्रह्म ही अर्थ अर्थात् जगत् के रूप में परिणत होता है (वाक्य० १।१)। तन्त्रशास्त्र बताते हैं कि जब परब्रह्म शब्दब्रह्म और अर्थ के रूप में परिणत होता है तो उसका यह परिणाम ही शिव और शक्ति नाम से जाना जाता है। शिवपुराण की ¹वायवीय संहिता में बताया गया है— शब्दजातमशेषं तु धत्ते शर्वस्य वल्लभा। अर्थस्वरूपमखिलं धत्ते मुग्धेन्दुशेखरः ॥ अर्थात् भगवान् शिव की शक्ति समस्त शब्दों का ओर भगवान् शिव समस्त अर्थों का स्वरूप धारण करते हैं। शब्दब्रह्म ही क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी ²वाणी के रूप में परिणत होता है और तदनुसार पर, सूक्ष्म, स्थूल अर्थों की अभिव्यक्ति होती है। परावस्था में शिव और शक्ति अर्थात् शब्द ओर अर्थ अभिन्न रूप से ³स्त्यानावस्था में अवस्थित रहते हैं। पंचकृत्यों के संपादन में प्रवृत्त परमेश्वर इस अवस्था में निरन्तर अनुग्रहशील पराशक्ति से संचालित होकर स्वयं भी अनुग्रहस्वभाव का बन जाता है, तब ⁴रुद्रयामल की समावेश
- सोन्दर्यलहरी की व्याख्या अरुणामोदिनी (पृ० ३०) द्रष्टव्य (गणेश एण्ड कम्पनी, मद्रास, सन् १९५७ का संस्करण)।
- प्रपंचसार, शारदातिलक प्रभृति ग्रन्थों के आधार पर लेखक ने 'आगम ओर तन्त्रशास्त्र की सृष्टिप्रक्रिया' नामक निबन्ध में 'भास्करराय-संमत सृष्टिप्रक्रिया' शीर्षक के अन्तर्गत इस विषय को विस्तार से समझाने का प्रयत्न किया है।
- 'स्त्यै ष्ट्यै शब्दसंघातयों' (भ्वा० ९१०-९११) धातु से कर्ता अर्थ में क्त प्रत्यय होने पर 'स्त्यान' शब्द बनता है। हिम (बर्फ) दशा में जल जब संघातावस्था में रहता है, तो उसकी स्वाभाविक स्पन्दन क्रिया भी रुक जाती है। इसी तरह से शब्द और अर्थ की इस संघातावस्था में क्रिया-शक्ति स्तिमित रहती है, निष्पन्द रहती है। शब्द और अर्थ शिव और शक्ति से अभिन्न है, यह बताया जा चुका है। शिव और शक्ति की इसी निष्क्रिय (निष्पन्द) स्थिति को स्त्यानावस्था कहते हैं।
- शैव और शाक्त अद्वैतवादी दार्शनिक प्रकाश शब्द को शिव का तथा विमर्श पद को शक्ति का वाचक मानते हैं। इन दोनों शब्दों का विवेचन नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात (पृ० ८३) की एक टिप्पणी में किया गया है। शब्द और अर्थ की तरह, पार्वती
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विज्ञानभैरव : ५ दशा का उन्मेष होता है, जो कि प्रकाश और विमर्श के नाम से शास्त्रों में व्यवहृत है । इस प्रकार पश्यन्ती अवस्था में शास्त्रों का सूक्ष्म रूप से आविर्भाव होता है और मध्यमा एवं वैखरी अवस्था में आकर ये स्थूल रूप धारण कर लेते हैं । परा शक्ति पर भैरव से अभिन्न है, किन्तु अनुग्रह व्यापार में प्रवृत्त होकर जब यह पश्यन्ती भूमिका में प्रवेश करती है, तो लोक के कल्याण के लिए यह स्वयं प्रश्नकर्ता के रूप में उपस्थित होती है । उसको अपनी परा भूमि का सदा अपने आप भान होता रहता है, किन्तु वह आन्तर या बाह्य इन्द्रियों का विषय नहीं है, इसलिये यह उस परा वाणी को सदा परोक्ष मानती है । वह परा भूमि पश्यन्ती आदि से पहले विद्यमान है, अतः उसका भूतकाल में निर्देश माना जाता है । उस परा भूमि में दिन, मास आदि का संबन्ध न होने से अत्यन्त परोक्ष भूत काल का, जैसे वह आज भी विद्यमान है, इस तरह से भान होता है । लोक में 'सुप्तोऽहं किल विललाप' (मैं जब सोया हुआ था, तब प्रलाप कर रहा था) इस तरह से वर्तमान काल में भूत काल का प्रयोग होता है, उसी तरह से यहाँ वर्तमान काल की अनुस्यूति रहते हुए भी अवस्था की भिन्नता के आधार पर 'उवाच' इस भूत काल की क्रिया का प्रयोग उचित ही माना जायगा । इसका अभिप्राय यह है कि लोक में गाढ़ी नींद से जाग उठने पर व्यक्ति को उस बीती अवस्था का स्मरण नहीं रहता, क्योंकि वह उसके जाग्रत् अनुभव का विषय नहीं रही है । बाद में दूसरे व्यक्ति के कहने से तथा पूर्व अवस्था में की गई विलाप, गान आदि क्रियाओं के कारण उत्पन्न अपने शरीर के कम्प, हर्ष आदि विकारों को देख कर यह जान पाता है कि सोये हुए मैंने ऐसा किया था । इन अनुभूति का सर्वथा अपलाप नहीं किया जा सकता । मद, स्वप्न, मूर्छा प्रभृति अवस्थाओं में किसी विशेष वस्तु का ज्ञान न होने से उसको परोक्ष अनुभूति मान लिया जाता है । परावस्था में तो वेद्य (जानने योग्य) विषय का सर्वथा अभाव ही रहता है । इन दोनों ही स्थितियों में विषय की परोक्षता तो समान ही है, किन्तु अन्तर यह है कि मद आदि अवस्थाओं में अज्ञान से आवृत्त (छिपा) और परमेश्वर की तरह, प्रकाश और विमर्श की भी स्थिति यामल भाव में ही रहती है । ये सदा साथ रहते हैं । वस्तुतः शब्द-अर्थ, पार्वती-परमेश्वर और प्रकाश-विमर्श शब्द पर्यायवाची हैं । अर्धनारीश्वर रूप में भगवान् शिव जैसे सतत यामल भाव में रहते हैं, वैसे ही प्रारंभ में प्रकाश और विमर्श की स्थिति सामरस्य अवस्था में रहती है । इसी को समावेश दशा भी कहते हैं । समावेश दशा में जीव में परिमित प्रमाता का भाव गौण हो जाता है और वह अपने को स्वतन्त्र, बोधस्वरूप समझने लगता है, किन्तु शिव और शक्ति का यह समावेश (सामरस्य) प्रपंच के उन्मेष के लिये होता है । जीव जिस तरह शिवभाव में समाविष्ट होता है, उसी तरह से शिव और शक्ति का यामल भाव भी प्रपंच के रूप में समाविष्ट हो जाता है, प्रपंच के रूप में दिखाई देने लगता है ।
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६ : विज्ञानभैरव होने से विषय का साक्षात्कार नहीं होता, परावस्था में तो ¹वेद्यवेदकभाव की सत्ता बनती ही नहीं। इस विश्लेषण के आधार पर 'भैरवी उवाच' और 'भैरव उवाच' जैसे शास्त्र में व्यवहृत वाक्यों का यह अर्थ होता है कि परमशिव विश्व का कल्याण करने की दृष्टि से स्वयं ही विमर्श रूप में बदल कर अनुग्राह्य की योग्यता के अनुसार पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के माध्यम से प्रश्न करते हैं और प्रकाश स्वरूप में अवस्थित होकर इसी पद्धति से वे प्रश्नों का उत्तर भी देते हैं। 'उवाच' पद यहाँ लिट् लकार के उत्तम पुरुष के एक वचन में प्रयुक्त हुआ है। यद्यपि यहाँ 'वच्मि' इस वर्तमान काल की क्रिया का प्रयोग होना चाहिए, किन्तु शास्त्र तो सनातन हैं, अर्थात् इनको संप्रदाय परम्परा तीनों कालों में अविच्छिन्न रूप से चलती रहती है, अतः साधारणतः यहाँ भूत काल की क्रिया का ही प्रयोग होता है। शास्त्रों में ऐसा अनेक स्थलों में देखा गया है कि जो प्रकरण बाद में आने वाला है, उसके लिए भी भविष्य काल की क्रिया का प्रयोग न होकर भूत काल की क्रिया का प्रयोग होता है²। महास्वच्छन्दतन्त्र के निम्न वचन से इस बात की पुष्टि होती है— ³गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः। प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत् ।। अर्थात् स्वयं सदाशिव देव शिव और शक्ति के रूप में गुरु और शिष्य बनकर प्रश्न और प्रतिवचन के रूप में तन्त्रों की अवतारणा करते हैं। ग्रन्थोपक्रम (तन्त्रावतार) प्रस्तुत ग्रन्थ में 'श्रुतं देव' से लेकर 'छिन्धि संशयम्' पर्यन्त प्रथम सात श्लोकों में देवी अपने संशय को उपस्थित करती है और 'साधु साधु'से 'शिवः प्रिये' पर्यन्त चौदह श्लोकों में
- अभी बताया गया है कि परावस्था में शब्द और अर्थ अभिन्न रूप से स्त्यानावस्था में रहते हैं। वाच्य और वाचक के भेद के अभाव में लोक-व्यवहार नहीं चल सकता। इसी बात को वाक्यपदीयकार ने कहा है—"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते। अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ।।" (१।१२३)। अर्थात् बिना शब्द के किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं हो सकता। वस्तुमात्र का ज्ञान किसी न किसी शब्द से जुड़ा हुआ ही रहता है। इस तरह से परावस्था में जब वाच्यवाचकभाव की स्थिति नहीं बनती, तो उसके सहारे चलने वाले वेद्यवेदकभाव, यह वेद्य (जानने योग्य) है और यह वेदक (जानने वाला है) है, की भी स्थिति सुतरां नहीं बन सकती।
- "अत एव तन्त्रराज उत्तरपटलेषु वक्ष्यमाणोऽप्यर्थः पूर्वपटलेषु प्रोक्त इति भूतार्थकपदेनैव तत्र तत्र निर्दिश्यते" (नि० से० १।१३)।
- योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २) में यह श्लोक उद्धृत है। मुद्रित स्वच्छन्दतन्त्र (८.३१-३२) में पाठभेद के साथ यह श्लोक मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ७ शिव संक्षेप में उसका समाधान करते हैं। इसके बाद 'देवदेव' से 'ब्रूहि भैरव' पर्यन्त श्लोकों में देवी शिव द्वारा प्रतिपादित परमतत्त्व की प्राप्ति का उपाय पूछती है और शिव इसके उत्तर में आगे के ग्रन्थ में ११२ धारणाओं का वर्णन करते हैं। इन धारणाओं के अभ्यास की फल- श्रुति सुन कर 'इदं यदि वपुर्देव' इत्यादि दो श्लोकों से देवी पुनः कुछ प्रश्न उठाती है और आगे के ग्रन्थ में शिव उनका भी समाधान प्रस्तुत करते हैं। अन्त के दो श्लोकों में देवी पूरी तरह से अपने संशय की निवृत्ति की बात स्वीकार करते हुए इस समाधान के प्राप्त परितृप्ति (प्रसन्नता) का वर्णन करती हैं और शिव के साथ तन्मय हो जाती हैं। इस प्रकार प्रश्न- प्रतिवचनात्मक इस पूरे ग्रन्थ का तात्पर्य वैखरी प्रभृति परा पर्यन्त वाणी के माध्यम से विज्ञानभैरव के साथ साधक की समावेश दशा की उपलब्धि में है। अर्थात् परा देवी के प्रश्नों का समाधान हो जाने पर जिस तरह से वह शिव के साथ तन्मय हो गई, उसी तरह से प्रत्येक साधक विज्ञानभैरव स्वरूप परम तत्त्व के साथ तादात्म्य लाभ कर सकता है, जब कि वह परा- वस्था तक पहुँच कर इस शास्त्र के रहस्य को ठीक समझ लेता है। इसलिए इस शास्त्र का नाम भी यही रख दिया गया है । इस शास्त्र के रचयिता स्वयं भैरव ही हैं। जब वे तिरोधान व्यापार में प्रवृत्त होते हैं तो सुख-दुःख, नील-पीत आदि नाना प्रकार के आन्तर और बाह्य विचित्र स्वरूपों और तदनुकूल चेष्टाओं से अपने स्वरूप को ढक लेते हैं और अनुग्रह व्यापार में प्रवृत्त होनेपर वे ही सूर्य से निकली किरणों की तरह अपने स्वरूप से बाहर निकले भक्त जनों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से प्रश्नोत्तर शैली में शास्त्र की अवतारणा करते हैं। 'श्रुतं देव....परमेश्वर' इस श्लोक में विमर्शमयी भैरवी प्रकाशस्वरूप भैरव से पूछती है कि हे देव, १ अर्थात् विश्व को प्रकाशित करने जैसी क्रीड़ा करने वाले स्वात्मस्वरूप भगवन् ! समस्त रोगों को नष्ट करने वाले रुद्र और उसकी शक्ति के सामरस्य स्वरूप यामल से जिनकी उत्पत्ति हुई है, २ ऐसे समस्त शास्त्रों को मैंने सुन लिया है। ये शास्त्र त्रिक अर्थात् परा, परा- परा और अपरा शक्ति के सारभूत शिव, शक्ति और नर (जीव) नामक तीनों तत्त्वों के भेद से
- दिवादि गण में पठित 'दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु' इस धातु से 'पचाद्यच्' प्रत्यय होने पर देव शब्द बनता है। क्रीडा, विजिगीषा, व्यवहार, द्युति, स्तुति ओर गति शब्दों के साम्प्रदायिक अर्थ महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १७३) में मिलते हैं।
- "अदृष्टविग्रहाच्छान्ताच्छिवात् परमकारणात् । ध्वनिरूपं विनिष्क्रान्तं शास्त्रं परम- दुर्लभम् ॥" यह श्लोक विज्ञानभैरवोद्योत (पृ० ३) और स्वच्छन्दोद्योत (१।३; पृ० ६) में उद्धृत है। कुछ पाठ भेदों के साथ यह स्वच्छन्दतन्त्र (८।२७-२८), श्रीकण्ठीयसंहिता (स्वच्छन्दोद्योत, वहीं, पृ० १९) और पौष्करागम (श० २० सं०, पृ० ७) में उपलब्ध होता है। इन स्थलों में शास्त्रों की नादरूपता का प्रतिपादन मिलता है। इस विषय की विशद जानकारी के लिये लु० सं० उपोद्घात (पृ० ११२-११३) देखिये।
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८ : विज्ञानभैरव ज्ञान, क्रिया आदि के प्राधान्य और अप्राधान्य का प्रतिपादन करने से अनेक भेदों में विभक्त हो जाते हैं। उन सबके सारभूत त्रिक शास्त्र को भी मैंने पूरी सावधानी से सुन लिया है, किन्तु मेरा संदेह अभी भी दूर नहीं हुआ है । 'यामलादिषु भाषितम्' इस पाठान्तर का अर्थ यह होगा कि शिव और शक्ति के सामरस्य से उत्पन्न हुए ब्रह्मयामल, विष्णुयामल, रुद्रयामल, भैरवयामल आदि में जो कुछ आपने कहा है, आपके साथ अभिन्नरूप से रहने के कारण वह सब मैंने पहले सुना ही है । इस पूरे कथन का अभिप्राय यह है कि दर्पण में प्रतिबिम्बित वस्तु की जैसे अपने बिम्ब से भिन्न और अभिन्न दोनों तरह की प्रतीति होती है, उसी तरह से आन्तर रूप से एकता और बाह्य रूप से नर, शक्ति और शिव के रूप में भिन्नता का भी बोध होता है । इस भेदावस्था में असाधारण और साधारण रूप से यद्यपि मैंने इस विषय को आप से सुन लिया है, किन्तु अभी भी मेरा संदेह दूर नहीं हो रहा है, क्योंकि माया¹ प्रभृति के ढांचे में पड़- कर मेरा स्वरूप और ज्ञान संकुचित हो गया है । ²वेदादिभ्यः परं शैवं शैवाद् वामं तु दक्षिणम् । दक्षिणात् परतः कौलं कौलात् परतरं त्रिकम् ॥ इस वचन के अनुसार वेद से श्रेष्ठ शैव शास्त्र, शैव से श्रेष्ठ वाम, वाम से श्रेष्ठ दक्षिण, दक्षिण से कौल और उससे भी श्रेष्ठतर त्रिक शास्त्र है । त्रिक शास्त्र में भी सिद्धा, मालिनी और उत्तर³ शासन क्रमशः ज्ञान और उपदेश के प्रकर्ष के आधार पर उत्कृष्ट माने जाते हैं । 'सारात्सारविभागशः' इस पद का अभिप्राय यही है कि इन सब शास्त्रों को, जो कि एक से एक बढ़कर हैं, मैंने सुना है । त्रिक शास्त्र ही नहीं, उसमें भी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट सिद्धा, मालिनी और उत्तर शास्त्र को भी मैंने सुन लिया, किन्तु मेरा संशय अभी दूर नहीं हुआ है ।।१।।
- “सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च विभो- र्विधिज्ञा : षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य ।।” (वा० पु० १२।३३) इस श्लोक में शिव के सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबेध, वतन्त्रता, अलुप्तशक्तित्ता और अनन्तशक्तित्ता—ये छः गुण गिनाये गये हैं । अद्वैत सिद्धान्त के अनुसार जीव शिव से अभिन्न है, किन्तु माया के कारण उसका स्वरूप संकुचित हो जाता है और इसके बाद कला, विद्या, राग, काल और नियति तत्त्वों के कारण क्रमशः उसकी सर्वकर्तृता, सर्वज्ञता, नित्यपरिपर्णतृप्तिता, नित्यता और स्वतन्त्रता—ये पाँच शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं (द्रष्टव्य—सौ० सू० १. ३२-३९), अतः इन पाँच तत्त्वों को पंचकंचुक कहा जाता है । माया का भी इनमें समावेश कर कुछ आचार्य कंचुकों की संख्या छः मानते हैं ।
- परारित्रशिका की व्याख्या (पृ० ९२) में अभिनवगुप्त ने भी इसी आशय का श्लोक उद्धृत किया है, जिसमें कि त्रिकशास्त्र को सर्वोत्तम माना गया है ।
- उत्तर शब्द के स्पष्टीकरण के लिए पृ० १ की टिप्पणी द्रष्टव्य ।
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विज्ञानभैरव : ९ किं रूपं तत्त्वतो देव शब्दराशिकलाम१यम् ॥२॥ किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ । त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ॥३॥ नादबिन्दुमयं वाऽपि किं चन्द्रार्धनिरोधिकाः२ । चक्रारूढमनच्चकं वा किं वा शक्तिस्वरूपकम् ॥४॥ हे देव, भैरवाकृतौ भैरवभट्टारके तत्त्वदृष्ट्या किं रूपम् ? किमस्य बोधभैरवस्य शब्दराशिकलामयं स्वरूपम् ? किं वा नवतत्त्वात्मतया नववामादिशक्तिस्वरूपतया वा प्रथितं तत् ? त्रिशिरोभैरवरूपेण भिन्नं वा ? किं वा शक्तित्रयात्मकम् ? अथवा नाद- बिन्दुमयं ? अर्ध चन्द्रनिरोधिकादिरूपं वा तत् ? चक्रारूढमनच्चकं वा तस्य स्वरूपम् ? अथवा शक्तिस्वरूपमेव तद् भैरवस्वरूपमिति तत्सर्वं वद ॥२-४॥ यहाँ भगवती भैरवी पूर्व अभ्यस्त अनेक शास्त्रों के आधार पर निम्न विकल्पों की उद्भावना इस अभिप्राय से करती है कि अन्ततः परम तत्त्व के वास्तविक स्वरूप का सही ज्ञान प्राप्त हो सके । वह पूछती है कि उस अनुत्तर तत्त्व का वास्तव में स्वरूप क्या है ? उसका पहला प्रश्न है कि भयानक आकृति वाले, संसार की घटना करने में समर्थ भैरव भट्टारक का, क्या अकार से ले कर क्षकार पर्यन्त शब्दराशि की कलाएँ—अनुत्तर१, आनन्द, इच्छा प्रभृति विमर्श शक्तियां ही, जिन्होंने कि वाच्य और वाचक स्वरूप से जगत् के सारे विस्तार को अपने में समेट रखा है, वास्तविक स्वरूप है ? क्योंकि बोध-भैरव सदा विमर्श शक्ति से युक्त रहता है । अनुत्तर अकार प्रकाशात्मक शिव का और हकार विमर्शात्मक शक्ति का प्रतीक माना जाता है । इन्हीं के संयोग से 'अहम्' इस सामरस्य स्वरूप की निष्पत्ति होती है, जिसमें कि पाणिनि के२ प्रत्याहारों की तरह समस्त वर्णों की स्थिति मानी गई है । इस १. ॰त्मक॰-ख० । २. ॰धकम्-ख० ।
- शब्दब्रह्म की अनुत्तर प्रभृति विमर्श-शक्तियों का विकास-क्रम तन्त्रालोक तृतीय आह्निक, सौभाग्यसुधोदय प्रथम प्रपंच और परापंचाशिका प्रभृति ग्रन्थों में विस्तार से वर्णित है । इस विषय को शिवसूत्रविमर्शिनी के द्वितीय उन्मेष की ५२-५५ संख्या की टिप्पणियों में संक्षेप में समझाया गया है । वहाँ यह भी बताया गया है कि वाच्यवाचकभावमय षडध्व- स्वरूप सारा विश्व अनुत्तर तत्त्व अकार में ही निवास करता है ।
- पाणिनि की अष्टाध्यायी के प्रारंभ में पठित 'अइउण्' प्रभृति चौदह शिवसूत्रों को प्रत्याहार सूत्र भी कहा जाता है । इनसे अण्, अक्, अच् प्रभृति ४४ प्रत्याहारों की रचना की जाती है । इसकी विधि 'आदिरन्त्येन सहेता' इस पाणिनि सूत्र में बताई गई है । तदनुसार उक्त चौदह सूत्रों के अन्तिम हल् वर्ण के साथ उसके पहले के किसी वर्ण को पकड़ कर इन प्रत्याहारों की रचना की जाती है । यह उसके मध्य में पठित वर्णों का और स्वयं अपना भी बोधक होता है । जैसे कि अण् प्रत्याहार से मध्य में पठित इ
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१० : विज्ञानभैरव प्रश्न का सीधा अर्थ यह है कि क्या यह बोध-भैरव शब्दब्रह्म स्वरूप है ? पुराण प्रभृति शास्त्रों में बताया गया है— द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च तत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ अर्थात् शब्दब्रह्म और परब्रह्म के भेद से ब्रह्म दो प्रकार का होता है। शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है¹। महावैयाकरण भर्तृहरि ने अनादिनिधन अक्षर शब्दतत्त्व को ही ब्रह्म माना है। देवी के इस प्रश्न का अभिप्राय यह है कि क्या यही परम तत्त्व का वास्तविक स्वरूप है ? देवी का दूसरा प्रश्न है—अथवा प्रकृति से लेकर शिव² पर्यन्त तत्त्वों के परामर्श से प्रत्यभिज्ञात तथा षडध्व में परिगणित नवात्म मन्त्रराज उसका स्वरूप है ? 'भैरवे भैरवाकृतो किं वा नवात्मभेदेन' ऐसा अन्वय कर इस श्लोकार्ध का यह अर्थ भी किया जा सकता है कि क्या भयानक स्वरूप वाले भैरव की वामा प्रभृति नौ शक्तियों के रूप में यह परम तत्त्व अवस्थित है ? तन्त्रालोक में— एकवीरो यामलोऽथ त्रिशक्तिश्चतुरात्मकः । पञ्चमूर्तिः षडात्माऽयं सप्तकोष्ठकभूषितः ॥ नवात्मा दशदिक्छक्तिरेकादशकलात्मकः । द्वादशारमहाचक्रनायको भैरवस्त्विति ॥ (१।११०-१११) उ वर्णों का और स्वयं अकार का भी बोध होता है। पाणिनि व्याकरण की इसी प्रत्याहार पद्धति के आधार पर अन्तिम वर्ण हकार और प्रथम वर्ण अकार को लेकर बनाये गये 'अह्' प्रत्याहार से स्वर-व्यंजनात्मक समस्त मातृका-चक्र (वर्णमाला) का बोध होता है। पाणिनि के प्रत्याहार से इस प्रत्याहार की विशेषता यह है कि पाणिनि के प्रत्याहार का अन्तिम वर्ण केवल प्रत्याहार बनाने के लिये होता है, वह किसी अक्षर का बोधक नहीं होता। इसके विपरीत यहाँ 'अह्,' प्रत्याहार का अन्तिम वर्ण भी सार्थक है, इस प्रत्याहार से अनिवार्य रूप से विमर्श शक्ति के रूप में उसका भी बोध होता है।
- शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति पर ब्रह्म को कैसे प्राप्त कर लेता है, इसकी प्रक्रिया श्लो० ३८-४२ की व्याख्या में तथा सात्वतसंहिता के हमारे उपोद्घात (पृ० ३८-३९) में भी देखिये।
- नेत्रतन्त्र में, जो कि प्राचीन तन्त्र-ग्रन्थों में मृत्युंजयभट्टारक के नाम से उद्धृत है, अमृतेश अथवा मृत्युंजय नामक मन्त्रराज की विस्तार से महिमा वर्णित है। शिव, सदाशिव, ईश्वर, विद्या, माया, काल, नियति प्रकृति और पुरुष नामक नौ तत्त्वों का इसमें समावेश (द्रष्टव्य—नेत्रतन्त्रोद्योत, भा० १, पृ० १३९) होने से इसको नवात्म मन्त्रराज कहते हैं। प्रस्तुत स्थल में इसी के संबन्ध में प्रश्न किया गया है कि क्या नेत्रतन्त्र में प्रतिपादित यह नवात्मक मन्त्रराज हो परम तत्त्व का प्रतीक है ? नवात्म-मन्त्रराज की षडध्वात्मकता का भी प्रतिपादन नेत्रतन्त्र में मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ११ यहाँ भैरव के नवात्म स्वरूप की भी चर्चा की गई है । तीसरा प्रश्न है—अथवा त्रिशिरोभैरव तन्त्र में निर्दिष्ट नर-शक्ति-शिवात्मक, मातृ- मान-मेयात्मक अथवा इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक समस्त तत्त्वत्रय परामर्श को अपने में समेटे हुए विशिष्ट मन्त्र के स्वरूप में वह विद्यमान है ? चौथा प्रश्न है—अथवा नर-शक्ति-शिवात्मक तत्त्वत्रय की अधिष्ठात्री अपरा, परापरा और परा नामक तीन शक्तियों वाला यह है ? पाँचवां प्रश्न है—अथवा समस्त मन्त्रसमूह में सामान्यतः मन्त्रवीर्य के रूप में जो अवस्थित है, वह विश्व के सभी वाच्यों में अभिन्न रूप से विद्यमान प्रकाशस्वरूप बिन्दु और समस्त वाचकों में अभिन्न रूप से विद्यमान विमर्शस्वरूप नाद उसका स्वरूप है ? छठा प्रश्न है—अथवा इस बिन्दु और नाद के ही प्रपञ्चरूप अर्धचन्द्र, निरोधिका आदि उसके स्वरूप हैं ? सभी वाच्य पदार्थों में अभिन्न रूप से विद्यमान प्रकाशात्मक बिन्दु¹ जब नाद रूप में परिणत होता है, उस समय वाच्य की प्रधानता शान्त हो जाने पर अर्धचन्द्र की स्थिति होती है । इसके आगे वेद्य पदार्थ का कौटिल्य जब निकल जाता है, तब स्पष्ट रेखामय निरोधिका की स्थिति आती है । इसको निरोधिका इस लिए कहते हैं कि यह मित योगी को नाद में प्रवेश करने से रोक देती है और अमित योगी को भेद दशा में आने से रोकती है । 'निरोधिकाः' यहाँ बहुवचन 'आदि' के अर्थ में है। आदि शब्द से निरोधिका के बाद की नादान्त, शक्ति, व्यापिनी और समना नाम की नाद से ऊपर स्थित कलाओं का ग्रहण किया जाता है । जब नाद की शब्द से व्याप्ति शान्त होने लगती है, तब अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि वाले 'नादान्त' की स्थिति आती है। जब नाद पूर्णरूप से शान्त हो जाता है, उस अवस्था में आह्लादात्मक स्पर्श की निरन्तर अनुस्यूतता का उन्मेष 'शक्ति' कहलाता है । वही आह्लादात्मक स्पर्श जब देह से अवच्छिन्न (संयुक्त) न रहकर आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, तो 'व्यापिनी' कहलाता है । समस्त भाव और अभाव स्वरूप वेद्य विषयों की उपशान्ति हो जाने पर मनन अर्थात् चिन्तन के साधन बोध (विज्ञान) मात्र के बच रहने पर समना की स्थिति आती है। मन्त्रों की अर्धचन्द्र आदि कलाओं का यही रहस्य है। अर्थात् मन्त्रों की इन वीर्यात्मक कलाओं की सहायता से साधक उन उन स्थितियों में पहुँच जाता है । इस तरह से मातृका, मन्त्र, मन्त्रवीर्य के रूप में विचार करने के उपरान्त ध्येय महामन्त्र के रूप में भी भगवान् के स्वरूप का परामर्श करने के अभिप्राय से सातवाँ प्रश्न किया जाता है कि क्या वह मूलाधार आदि स्थानों में षड्दल आदि स्वरूप वाले चक्रों में आरूढ है, अर्थात् उन उन चक्रों में विन्यस्त लिपि-संकेतों के रूप में विद्यमान कोई तत्त्व है ? 'चक्रारूढं' पद का दूसरा अर्थ भी किया जा सकता है कि क्या वह मूलाधार चक्र में स्थित
- प्रणव की बारह कलाओं के रूप में बिन्दु, नाद, अर्धचन्द्र, निरोधिनी, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना, उन्मना प्रभृति की व्याख्या आगे की गई है । उपोद्घात में भी इस विषय पर विचार किया जायगा ।
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१२ : विज्ञानभैरव कुण्डलिनी की आकृति का साढे तीन फेरे लगाये कोई तत्त्व है ? अथवा इसका यह अर्थ भी किया जा सकता है कि अकारादि हकारान्त वर्णचक्र पर आरूढ अहमात्मक स्फुरण रूप यह तत्त्व है ? अथवा क्या यह तत्त्व 'अनच्क' है, अर्थात् अच् = स्वर से रहित हकारात्मक प्राणकुण्डलिनी स्वरूप यह तत्त्व है ? अन्तिम आठवां प्रश्न है कि क्या यह उस सुस्पष्ट शक्ति के रूप में विद्यमान है, जो कि समस्त कौटिल्य को छोड़कर अवस्थित है ? इन सब विकल्पों में से भैरव का वास्तविक स्वरूप क्या है ? हे देव, उसे मुझे आप बताइये ॥२-४॥ परापरायाः सकलमपरायाश्च वा पुनः । पराया यदि तद्वत् स्यात् परत्वं तद्विरुध्यते ॥५॥ १नहि वर्णविभेदेन देहभेदेन । परत्वं निष्कलत्वेन सकलत्वे१ न तद्भवेत् ॥६॥ परापराया देव्याः, अपराया देव्याः, पराया देव्या वा सकलं स्वरूपमस्ति ? स्वातन्त्र्यशक्तिरेव हि परा, सैव क्रमं स्रष्टुमिच्छती अपरा, सैव च क्रमरूपा सती परापरेति कथिता । अत्र परापराया अपरायाश्च स्वरूपं सकलं भवति । तदेव स्वरूपं यदि पराया अपि स्यात् तर्हि तस्याः परत्वं विरुध्येत । पराया हि स्वरूपं निष्कलं भवति । वर्णविभेदेन सितादिना अक्षररूपेण वा, देहभेदेन आकृतिविशेषेण वा, परायाः परत्वं प्रकृष्टत्वं न भवति, अपि तु कलानाशून्यत्वेनैव तन्निष्पद्यते, सकलत्वे तु तद्द्भवतीत्यसं- भाव्यमेव ॥५-६॥ इस तरह से ध्यातव्य महामन्त्र और उसकी शक्ति के स्वरूप के विषय में प्रश्न करने के बाद देवी सर्वोत्तर अनुत्तर परा शक्ति के विषय में भी प्रश्न करती है कि परात्रिंशिका (पृ० १२३) प्रभृति ग्रन्थों में मन्त्रविशेष का ध्यान करने योग्य जो विशेष सकल स्वरूप बताया गया है, वह परापरा देवी का है, अपरा देवी का है, अथवा परा देवी का ? स्वातन्त्र्य शक्ति को ही परा कहा जाता है । वही जब क्रम की सृष्टि करना चाहती है तो परापरा और क्रमरूप होकर अपरा कहलाती है । जैसा कि तन्त्रालोक में बताया गया है— स्वातन्त्र्यशक्तिः क्रमसंसिसृक्षा क्रमात्मता चेति विभोर्विभूतिः । तदेव देवीत्रयमन्तरास्तामनुत्तरं मे प्रथयत् स्वरूपम् ॥ (१।५) अर्थात् स्वातन्त्र्यशक्ति, क्रमसंसिसृक्षा और क्रमात्मता के रूप में विद्यमान नर-शक्ति- शिवात्मक भगवान् की विभूतियां परा-परापरा-अपरात्मक स्वरूप धारण करती हैं । ये देवियां अपने अनुत्तर स्वरूप को सदा प्रकाशित करती हुई मेरी अन्तरात्मा में निवास करें । १. °न वा भ° —ख० ।
- यह श्लोक स्वच्छन्दतन्त्र (भा० ३, प० ७, पृ० ३०८) की उद्योत टीका में क्षेमराज द्वारा उद्धृत है ।
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विज्ञानभैरव : १३ इस परा भट्टारिका का यदि यह सकल स्वरूप माना जायगा तो उस अवस्था में इसमें परत्व नाम मात्र का (लाक्षणिक) रहेगा, वास्तविक नहीं, क्योंकि परापरा देवी का और अपरा देवी का जो सकल स्वरूप है, उससे यदि परा का लाक्षणिक तादात्म्य न मान कर वास्तविक कहा जायगा, तो उसमें परत्व कैसे आवेगा ? परा, परापरा और अपरा में परस्पर भेद ही मानना पड़ेगा। परा के स्वरूप से वेद्यराशि के रूप में स्वीकृत सकल स्वरूप विरुद्ध पड़ेगा, क्योंकि परा देवी का यह स्वभाव नहीं है। इस तरह से परा का परापरा या अपरा के साथ अभेद नहीं सिद्ध किया जा सकता। वर्णों की श्वेत आदि विशेषता के आधार पर अथवा अक्षरों की विशेषता के आधार पर या शरीर की सुर, नर, तिर्यक् के रूप में आकृति की विशेषता के कारण अथवा द्वादशान्त प्रभृति शरीर के विशेष स्थानों का सहारा लेने के कारण परत्व (प्रकृष्टत्व) नहीं होता, किन्तु निष्कलता अर्थात् कलना की शून्यता की अवस्था में ही वह निष्पन्न होता है। सकल अवस्था में यह प्रकृष्टता किसी भी तरह से नहीं प्राप्त हो सकती, अतः परावस्था को परापरा और अपरा अवस्था से भिन्न ही मानना उचित होगा। देवी पूछती है कि क्या यह विचार-सरणि सही है ? ।।५-६।। प्रसादं कुरु मे नाथ निःशेषं छिन्धि संशयम् । हे नाथ, मे मम प्रसादं कुरु प्रसाददृष्टिं ददस्व, निःशेषं समस्तं मम हृदि स्थितं संशयं छिन्धि शमय । इस तरह से समस्त आगम शास्त्रों के हृदय को छूने वाले प्रश्नों के माध्यम से विचारणीय तत्त्वों को सामने लाने के बाद संविद्¹देवी संपूर्ण विज्ञानभैरव रूप में अपना प्रवेश पाने की दृष्टि से कहती है कि हे नाथ, मेरे ऊपर आप अनुग्रह कीजिये; वाणी, शरीर और मन से एक होकर आप मेरे ऊपर कृपादृष्टि डालिये; माया, महामाया आदि के संसर्ग से प्राप्त कालुष्य को दूर कर अपने निर्मल स्वरूप को मुझे बताइये और मेरे इस आठ खण्ड (कोटि) वाले संशय को आप मिटा दीजिये। अभिप्राय यह है कि तत्त्व यह है या वह ? तत्त्व वह है या यह ? अथवा इन सबसे भिन्न है ? इस तरह के अनेक कोटि वाले संशय की सब अवस्थाओं
- "प्राक् संवित् प्राणे परिणता" (अनेक स्थलों पर उद्धृत भट्ट कल्लट का वचन), "संविदेव भगवती स्वान्तःस्थितं जगद् बहिः प्रकाशयति" (ऋजु० पृ० २७) इत्यादि स्थलों में संवित् शब्द पराहन्ता (पूर्णाहन्ता) मयी स्वातन्त्र्य शक्ति का वाचक है। शाक्त मत में यही परम तत्त्व के रूप में मान्य है। लक्ष्मीतन्त्र (१४।५) में संवित् को लक्ष्मी का स्वच्छ, स्वच्छन्द स्वरूप बताया गया है। प्रस्तुत स्थल में संवित् शब्द का प्रयोग विमर्श शक्ति के लिये किया गया है। दार्शनिकों ने इस शब्द का प्रयोग विज्ञान अथवा ज्ञान सामान्य के अर्थ में भी किया है। क्रम दर्शन में पंचवाह पद की व्याख्या करते समय व्योमवामेश्वरी, खेचरी प्रभृति समष्टि शक्तियों को और अन्तःकरण, बहिःकारण के माध्यम से प्रवहमान व्यष्टि शक्तियों को संविद्देवीचक्र के रूप में मान्यता दी गई है।
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१४ : विज्ञानभैरव को छोड़कर आप किसी एक निर्णीत वास्तविक स्वरूप को मुझे समझाइये कि स्वप्रकाश प्रमातृतत्त्व वस्तुतः क्या है ? इसकी प्राप्ति के लिए परावस्था की ओर उन्मुखता का त्याग करना पड़ता है या प्रमेय स्वरूप का ? अथवा समस्त प्रमाताओं के साथ अहमात्मक स्वात्मस्वरूप की भावना करनी पड़ती है ? इन सब प्रश्नों का समाधान मिलने पर ही समस्त जागतिक पदार्थों के स्वात्मस्वरूप से अतिरिक्त न होने के कारण अभेद-प्रतीति के आधार पर 'अहम्' इस स्वात्मस्वरूप में ही सारे जागतिक पदार्थों की विश्रान्ति हो जाने से यह सब मेरा ही स्वरूप है, इस तरह का निर्णय करने में मैं समर्थ हो सकूँगो ।। श्रीभैरव उवाच साधु साधु त्वया पृष्टं तन्त्रसारमिदं प्रिये ॥७॥ गूहनीयतमं भद्रे तथापि कथयामि ते । हे प्रिये, अत एव भद्रे कल्याणिनि, यत् त्वया तन्त्रसारं सर्वशास्त्रसारभूतम् इदं वस्तु पृष्टं तदतीव शोभनम्। प्रश्नचयस्यास्य परमेष्टत्वात् पुनरुक्त्या 'साधु साधु' इति निर्देशः । यत् त्वया तन्त्राणां सर्वशास्त्रनिचयानां सारं पृष्टं तद् अतिरहस्यत्वाद् गूहनीय- तममपि ते योग्यायास्तव समक्षं कथयामि, यतो हि मे विश्वासो वर्तते यत् त्वं गूहनीय- तममिदं वस्तु स्वात्मनि अभेदेन ध्यानार्थमेव पृच्छसि, न तु तस्य वाचा वैखर्या प्रकाश- नार्थमिति भावः ॥७॥ 'भैरवी उवाच' वाक्य की व्याख्या करते समय पहले बताया गया है कि स्वयं सदाशिव शिव और शक्ति के रूप में गुरु और शिष्य बनकर प्रश्न और प्रतिवचन की पद्धति से शास्त्रों की अवतारणा करते हैं । यद्यपि इन प्रश्नों के माध्यम से उठे संदेह को संविद्देवी स्वयं अपनी विचार शक्ति से ही दूर कर सकती है, प्रायः सभी लोगों के व्यवहार में इस प्रकार की स्थिति आती है कि वह स्वयं अपने मन में शंका उठाता है और स्वयं अपने ही उसका समाधान भी खोज लेता है, तथापि उक्त शास्त्रीय पद्धति के अनुसार स्वभाव-स्वरूपिणी देवी भैरवभाव को प्राप्त कर उक्त प्रश्नों का उत्तर देती है । अर्थात् इस तरह से अपने से अभिन्न संविद्देवी के शिष्य रूप में अवतरित हो तत्त्वविषयक प्रश्नों के पूछे जाने पर निर्णायक के पद पर बैठकर स्वयं परमेश्वर 'भैरव उवाच' इत्यादि से सिद्धान्त का उपदेश करते हैं । भैरवां ने जो कुछ पूछा, उसके लिये उसकी प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए भैरव कहते हैं कि हे प्रिये, परानन्द से प्राप्त होने वाली तृप्ति की प्रसिद्धि में तत्पर, अत एव सबका कल्याण करने वाली हे देवि, यह तुमने बहुत अच्छे प्रश्न पूछे है। इस तरह के प्रश्न भैरव को बहुत प्रिय हैं, अतः यहाँ 'साधु' शब्द की पुनरुक्ति (साधु साधु) की गई है । सब शास्त्रों की सारभूत यह बात अत्यन्त गोपनीय है । ऐसा होने पर भी इस गोपनीय रहस्य को तुम्हें मैं इसलिये बताता हूँ कि तुम में अनुत्तम पद में एकाकार (समाविष्ट) होने की उन्मुखता के कारण इस रहस्य को जानने की योग्यता विद्यमान है । इस रहस्य को बहुत छिपा कर रखना चाहिये । उसको अपने पेट में ही रखना चाहिये और उस पर विचार, ध्यान, मनन आदि चलाते रहना चाहिये । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १५ किसी दूसरे को वैखरी वाणी से नहीं सुनाना चाहिये । इसलिये मैं भी तुम्हारे इन प्रश्नों का उत्तर पश्यन्ती और मध्यमा वाणी के माध्यम से ही दे रहा हूँ, वैखरी वाणी में न ह् तुम भी ऐसा ही करोगी, इसी विश्वास पर तुमको यह सुना रहा हूँ, अन्यथा मैं न सुनाता ॥७॥ यत्किञ्चित् सकलं रूपं भैरवस्य प्रकीर्तितम् ॥८॥ तदसारतया देवि विज्ञेयं¹ शक्रजालवत् । मायास्वप्नोपमं चैव गन्धर्वनगरभ्रमम् ॥९॥ ध्यानार्थं भ्रान्तबुद्धीनां क्रियाडम्बरवर्तिनाम् । केवलं वर्णितं पुंसां विकल्पनिहतात्मनाम् ॥१०॥ हे देवि, भैरवस्य सकलं निष्कलं चेति द्विविधं रूपं शास्त्रेषु प्रकीर्तितं वर्णितम् । तत्र प्रसिद्धमेतत् सकलं जगद्रूपं नीलपीतघटपटादिनानावैचित्र्यात्मकं सर्वमसारतया अवस्तुतया गन्धर्वनगरभ्रमसदृशम् इन्द्रजालतुल्यं मायानिर्मितं स्वप्नावलोकितवस्तुसदृशं च असत्स्वरूपमेव मन्तव्यम् । भ्रान्तबुद्धीनाम् अप्रबुद्धमतीनाम् आडम्बरबहुलासु क्रियासु निरतानाम् 'अहं विष्णुं भजामि, अहं गणपतिं यजामीति स पुत्रवित्तादिकं मे दास्यति' इत्येवं विकल्पनिहतात्मनां पुंसां केवलं स्थूलध्यानयोगार्थमेवैतत् सकलं स्वरूप- मित्यर्थः । सम्प्रति तावदियती योग्यता एषामुत पद्यतामिति धिया तद्वर्णितम्, न तु तत्त्व- बुभुत्सून् प्रति तदुक्तमिति भावः ॥८-१०॥ भगवान् भैरव इस गोपनीय रहस्य को बताने से पहले हेय वस्तु को छोड़ने की तथा उपादेय वस्तु को ग्रहण करने की बात मन में बैठाते हैं। कि हे देवि, भैरव के सकल और निष्कल ये दो रूप शास्त्रों में बताये गये हैं। इनमें सकल नाम से प्रसिद्ध यह जगत् रूप अर्थ नील-पीत, घट-पट आदि नाना विचित्र रूपों में भासित होता है, वह सब इन्द्रजाल के समान माया से निर्मित और ¹गन्धर्व-नगर के भ्रम के समान, स्वप्न में देखी गई वस्तु के समान अस्थिर और असत्स्वरूप है। अर्थात् इन्द्रजाल, गन्धर्वनगर आदि की सत्ता जैसे भ्रम पर आधारित है, वैसे ही यह सकल स्वरूप भी भ्रम पर आधारित होने से ही असार है। इस तरह की भ्रान्त बुद्धि वाले, फल की आकांक्षा से नाना कर्मकाण्डों में रुचि रखने वाले, 'मैं विष्णु की पूजा करता हूँ, मैं गणपति की पूजा करता हूं, ये मुझे पुत्र, धन आदि देंगे' इस तरह के भाँति-भाँति के संकल्प-विकल्पों के कारण अपने वास्तविक स्वरूप से अपरिचित व्यक्तियों के लिये यह सकल स्वरूप उपदिष्ट है। इसका उपदेश इसलिये किया है कि निष्कल स्वरूप मे प्रवेश पाने के लिये साधक को पहले सकल स्वरूप में ध्यान की योग्यता प्राप्त हो। सक ल स्वरूप का यह उपदेश तत्त्व के जिज्ञासुओं के लिये नहीं है ॥८-१०॥ १. °यमिन्द्र°-ख० । 1 इन्द्रजाल, गन्धर्वनगर, मृगमरीचिका, रज्जुसर्प, वेशोण्ड्रक प्रभृति शब्दों का प्रयोग दार्शनिक गण विभ्रमात्मक सृष्टि, भ्रम से पैदा होने वाले मिथ्या ज्ञान के लिये करते हैं । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)