भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० १२] \hfill * प्रथम अंश * \hfill ५१


बारहवाँ अध्याय

ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान्‌का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान


श्रीपराशर उवाच

निशम्यैतदशेषेण मैत्रेय नृपतेः सुतः।
निर्जगाम वनात्तस्मात्प्रणिपत्य स तानृषीन्॥ १
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यमानस्ततो द्विज।
मधुसंज्ञं महापुण्यं जगाम यमुनाटटम्॥ २
पुनश्च मधुसंज्ञेन दैत्येनाधिष्ठितं यतः।
ततो मधुवनं नाम्ना ख्यातमत्र महीतले॥ ३
हत्वा च लवणं रक्षो मधुपुत्रं महाबलम्।
शत्रुघ्नो मधुरां नाम पुरीं यत्र चकार वै॥ ४
यत्र वै देवदेवस्य सान्निध्यं हरिमेधसः।
सर्वपापहरे तस्मिंस्तपस्तीर्थे चकार सः॥ ५
मरीचिमुख्यैर्मुनिभिर्यथोद्दिष्टमभूत्तथा ।
आत्मन्यशेषदेवेशं स्थितं विष्णुममन्यत॥ ६
अनन्यचेतसस्तस्य ध्यायतो भगवान्हरिः।
सर्वभूतगतो विप्र सर्वभावगतोऽभवत्॥ ७

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! यह सब सुनकर राजपुत्र ध्रुव उन ऋषियोंको प्रणामकर उस वनसे चल दिया॥ १॥ और हे द्विज! अपनेको कृतकृत्य-सा मानकर वह यमुनाटटवर्ती अति पवित्र मधु नामक वनमें आया। आगे चलकर उस वनमें मधु नामक दैत्य रहने लगा था, इसलिये वह इस पृथ्वीतलमें मधुवन नामसे विख्यात हुआ॥ २-३॥ वहीं मधुके पुत्र लवण नामक महाबली राक्षसको मारकर शत्रुघ्नने मधुरा (मथुर) नामकी पुरी बसायी॥ ४॥ जिस (मधुवन)-में निरन्तर देवदेव श्रीहरिकी सन्निधि रहती है उसी सर्वपापपहारी तीर्थमें ध्रुवने तपस्या की॥ ५॥ मरीचि आदि मुनीश्वरोंने उसे जिस प्रकार उपदेश किया था उसने उसी प्रकार अपने हृदयमें विराजमान निखिलदेवेश्वर श्रीविष्णुभगवान्‌का ध्यान करना आरम्भ किया॥ ६॥ इस प्रकार हे विप्र! अनन्य-चित्त होकर ध्यान करते रहनेसे उसके हृदयमें सर्वभूतान्तर्यामी भगवान् हरि सर्वतोभावसे प्रकट हुए॥ ७॥


मनस्यवस्थिते तस्मिन्विष्णौ मैत्रेय योगिनः।
न शशाक धरा भारमुद्वोढुं भूतधारिणी॥ ८
वामपादस्थिते तस्मिन्ननामाद्धं मेदिनी।
द्वितीयं च नामाद्धं क्षितेर्दक्षिणतः स्थिते॥ ९
पादाङ्गुष्ठेन सम्पीय यदा स वसुधां स्थितः।
तदा समस्ता वसुधा चचाल सह पर्वतः॥ १०
नद्यो नदाः समुद्राश्च सङ्क्षोभं परमं ययुः।
तत्क्षोभादमराः क्षोभं परं जग्मुर्महामुने॥ ११
यामा नाम तदा देवा मैत्रेय परमाकुलाः।
इन्द्रेण सह सम्मन्त्र्य ध्यानभङ्गं प्रचक्रमुः॥ १२
कूष्माण्डा विविधै रूपैर्महेन्द्रेण महामुने।
समाधिभङ्गमत्यन्तमारब्धाः कर्तुमातुराः॥ १३

हे मैत्रेय! योगी ध्रुवके चित्तमें भगवान् विष्णुके स्थित हो जानेपर सर्वभूतोंको धारण करनेवाली पृथिवी उसका भार न सँभाल सकी॥ ८॥ उसके बायें चरणपर खड़े होनेसे पृथिवीका बायाँ आधा भाग झुक गया और फिर दायें चरणपर खड़े होनेसे दायाँ भाग झुक गया॥ ९॥ और जिस समय वह पैरके अँगूठेसे पृथिवीको (बीचसे) दबाकर खड़ा हुआ तो पर्वतोंके सहित समस्त भूमण्डल विचलित हो गया॥ १०॥ हे महामुने! उस समय नदी, नद और समुद्र आदि सभी अत्यन्त क्षुब्ध हो गये और उनके क्षोभसे देवताओंमें भी बड़ी हलचल मची॥ ११॥ हे मैत्रेय! तब याम नामक देवताओंने अत्यन्त व्याकुल हो इन्द्रके साथ परामर्श कर उसके ध्यानको भंग करनेका आयोजन किया॥ १२॥ हे महामुने! इन्द्रके साथ अति आतुर कूष्माण्ड नामक उपदेवताओँने नानारूप धारणकर उसकी समाधि भंग करना आरम्भ किया॥ १३॥


सुनीतिर्नाम तन्माता सास्रा तत्पुरतः स्थिता।
पुत्रेति करुणां वाचमाह मायामयी तदा॥ १४

उस समय मायाहीसे रची हुई उसकी माता सुनीति नेत्रोंमें आँसू भरे उसके सामने प्रकट हुई और 'हे पुत्र! हे पुत्र!' ऐसा कहकर करुणायुक्त वचन बोलने लगी

५२* श्रीविष्णुपुराण *[अ० १२

[मूल संस्कृत श्लोक]

पुत्रकास्मान्निवर्त्तस्व शरीरात्ययदारुणात्।
निर्बन्धतो मया लब्धो बहुभिस्त्वं मनोरथैः॥ १५

दीनामेकां परित्यक्तुमनाथां न त्वमर्हसि।
सपत्नीवचनाद्वत्स अगतेस्त्वं गतिर्मम॥ १६

क्व च त्वं पञ्चवर्षीयः क्व चैतद्दारुणं तपः।
निवर्त्ततां मनः कष्टान्निर्बन्धात्फलवर्जितात्॥ १७

कालः क्रीडनकानान्ते तदन्तेऽध्ययनस्य ते।
ततः समस्तभोगानां तदन्ते चेष्यते तपः॥ १८

कालः क्रीडनकानां यस्तव बालस्य पुत्रक।
तस्मिंस्त्वमिच्छसि तपः किं नाशायात्मनो रतः॥ १९

मत्प्रीतिः परमो धर्मो वयोऽवस्थाक्रियाक्रमम्।
अनुवर्त्तस्व मा मोहान्निवर्त्तास्मादधर्मतः॥ २०

परित्यजति वत्साद्य यद्येतन्न भवांस्तपः।
त्यक्ष्याम्यहमिह प्राणांस्ततो वै पश्यतस्तव॥ २१

श्रीपराशर उवाच
तां प्रलापवतीमेवं बाष्पाकुलविलोचनाम्।
समाहितमना विष्णौ पश्यन्नपि न दृष्टवान्॥ २२

वत्स वत्स सुघोराणि रक्षांस्येतानि भीषणे।
वनेऽभ्युद्यतशस्त्राणि समायान्त्यपगम्यताम्॥ २३

इत्युक्त्वा प्रययौ साथ रक्षांस्याविर्बभूस्ततः।
अभ्युद्यतोग्रशस्त्राणि ज्वालामालाकुलैर्मुखैः॥ २४

ततो नादानतीवोग्रान्राजपुत्रस्य ते पुरः।
मुमुचुर्दीप्तशस्त्राणि भ्रामयन्तो निशाचराः॥ २५

शिवाश्च शतशो नेदुः सञ्ज्वालाकवलैर्मुखैः।
त्रासाय तस्य बालस्य योगयुक्तस्य सर्वदा॥ २६

हन्यतां हन्यतामेष छिद्यतां छिद्यतामयम्।
भक्ष्यतां भक्ष्यतां चायमित्यूचुस्ते निशाचराः॥ २७

ततो नानाविधान्नादान् सिंहोष्ट्रमकराननाः।
त्रासाय राजपुत्रस्य नेदुस्ते रजनीचराः॥ २८

रक्षांसि तानि ते नादाःशिवास्तान्यायुधानि च।
गोविन्दासक्तचित्तस्य ययुर्नेन्द्रियगोचरम्॥ २९

एकाग्रचेताः सततं विष्णुमेवात्मसंश्रयम्।
दृष्टवान्पृथिवीनाथपुत्रो नान्यं कथञ्चन॥ ३०


[हिन्दी अनुवाद]

[उसने कहा]—बेटा! तू शरीरको घुलानेवाले इस भयंकर तपका आग्रह छोड़ दे। मैंने बड़ी-बड़ी कामनाओंद्वारा तुझे प्राप्त किया है॥ १४-१५॥

अरे! मुझ अकेली, अनाथा, दुखियाको सौतके कटु वाक्योंसे छोड़ देना तुझे उचित नहीं है। बेटा! मुझ आश्रयहीनाका तो एकमात्र तू ही सहारा है॥ १६॥

कहाँ तो पाँच वर्षका तू और कहाँ तेरा यह अति उग्र तप? अरे! इस निष्फल क्लेशकारी आग्रहसे अपना मन मोड़ ले॥ १७॥

अभी तो तेरे खेलने-कूदनेका समय है, फिर अध्ययनका समय आयेगा, तदनन्तर समस्त भोगोंके भोगनेका और फिर अन्तमें तपस्या करना भी ठीक होगा॥ १८॥

बेटा! तुझ सुकुमार बालकका 'जो खेल-कूदका समय है उसीमें तू तपस्या करना चाहता है। तू इस प्रकार क्यों अपने सर्वनाशमें तत्पर हुआ है?॥ १९॥

तेरा परम धर्म तो मुझको प्रसन्न रखना ही है, अतः तू अपनी आयु और अवस्थाके अनुकूल कर्मोंमें ही लग, मोहका अनुवर्तन न कर और इस तपरूपी अधर्मसे निवृत्त हो॥ २०॥

बेटा! यदि आज तू इस तपस्याको न छोड़ेगा तो देख तेरे सामने ही मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी॥ २१॥

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! भगवान् विष्णुमें चित्त स्थिर रहनेके कारण ध्रुवने उसे आँखोंमें आँसू भरकर इस प्रकार विलाप करती देखकर भी नहीं देखा॥ २२॥

तब, 'अरे बेटा! यहाँसे भाग-भाग! देख, इस महाभयंकर वनमें ये कैसे घोर राक्षस अस्त्र-शस्त्र उठाये आ रहे हैं'—ऐसा कहती हुई वह चली गयी और वहाँ जिनके मुखसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं ऐसे अनेकों राक्षसगण अस्त्र-शस्त्र सँभाले प्रकट हो गये॥ २३-२४॥

उन राक्षसोंने अपने अति चमकीले शस्त्रोंको घुमाते हुए उस राजपुत्रके सामने बड़ा भयंकर कोलाहल किया॥ २५॥

उस नित्य-योगयुक्त बालकको भयभीत करनेके लिये अपने मुखसे अग्निकी लपटें निकालती हुई सैकड़ों स्यारियाँ घोर नाद करने लगीं॥ २६॥

वे राक्षसगण भी 'इसको मारो-मारो, काटो-काटो, खाओ-खाओ' इस प्रकार चिल्लाने लगे॥ २७॥

फिर सिंह, ऊँट और मकर आदिके-से मुखवाले वे राक्षस राजपुत्रको त्रास देनेके लिये नाना प्रकारसे गरजने लगे॥ २८॥

किन्तु उस भगवदासक्तचित्त बालकको वे राक्षस, उनके शब्द, स्यारियाँ और अस्त्र-शस्त्रादि कुछ भी दिखायी नहीं दिये॥ २९॥

वह राजपुत्र एकाग्रचित्तसे निरन्तर अपने आश्रयभूत विष्णुभगवान्‌को ही देखता रहा और उसने किसीकी ओर किसी भी प्रकार दृष्टिपात नहीं किया॥ ३०॥

अ० १२] * प्रथम अंश * ५३


ततः सर्वासु मायासु विलीनासु पुनः सुराः।
सङ्क्षोभं परमं जग्मुस्तत्पराभवशङ्किताः ॥ ३१
ते समेत्य जगद्योनिमनादिनिधनं हरिम्।
शरण्यं शरणं यातास्तपसा तस्य तापिताः ॥ ३२

देवा ऊचुः
देवदेव जगन्नाथ परेश पुरुषोत्तम।
ध्रुवस्य तपसा तप्तास्त्वां वयं शरणं गताः ॥ ३३
दिने दिने कलालेशैः शशाङ्कः पूर्यते यथा।
तथायं तपसा देव प्रयात्यृद्धिमहर्निशम् ॥ ३४
औत्तानपादितपसा वयमित्थं जनार्दन।
भीतास्त्वां शरणं यातास्तपसस्तं निवर्तय ॥ ३५
न विद्मः किं स शक्रत्वं सूर्यत्वं किमभीप्सति।
वित्तपाम्बुपसोमानां साभिलाषः पदेषु किम् ॥ ३६
तदस्माकं प्रसीदेश हृदयाच्छल्यमुद्धर।
उत्तानपादतनयं तपसः संनिवर्तय ॥ ३७

श्रीभगवानुवाच
नेन्द्रत्वं न च सूर्यत्वं नैवाम्बुपधनेशताम्।
प्रार्थयत्येष यं कामं तं करोम्यखिलं सुराः ॥ ३८
यात देवा यथाकामं स्वस्थानं विगतज्वराः।
निवर्त्तयाम्यहं बालं तपस्यासक्तमानसम् ॥ ३९

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ता देवदेवेन प्रणम्य त्रिदशास्ततः।
प्रययुः स्वानि धिष्ण्यानि शतक्रतुपुरोगमाः ॥ ४०
भगवानपि सर्वात्मा तन्मयत्वेन तोषितः।
गत्वा ध्रुवमुवाचेदं चतुर्भुजवपुर्हरिः ॥ ४१

श्रीभगवानुवाच
औत्तानपादे भद्रं ते तपसा परितोषितः।
वरदोऽहमनुप्राप्तो वरं वरय सुव्रत ॥ ४२
बाह्यार्थनिरपेक्षं ते मयि चित्तं यदाहितम्।
तुष्टोऽहं भवतस्तेन तद्वृणीष्व वरं परम् ॥ ४३

श्रीपराशर उवाच
श्रुत्वेत्थं गदितं तस्य देवदेवस्य बालकः।
उन्मीलिताक्षो ददृशे ध्यानदृष्टं हरिं पुरः ॥ ४४


तब सम्पूर्ण मायाके लीन हो जानेपर उससे हार जानेकी आशंकासे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ३१ ॥ अतः उसके तपसे सन्तप्त हो वे सब आपसमें मिलकर जगत्के आदि-कारण, शरणागतवत्सल, अनादि और अनन्त श्रीहरिकी शरणमें गये ॥ ३२ ॥

देवता बोले— हे देवाधिदेव, जगन्नाथ, परमेश्वर, पुरुषोत्तम! हम सब ध्रुवकी तपस्यासे सन्तप्त होकर आपकी शरणमें आये हैं ॥ ३३ ॥ हे देव! जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी कलाओंसे प्रतिदिन बढ़ता है उसी प्रकार यह भी तपस्याके कारण रात-दिन उन्नत हो रहा है ॥ ३४ ॥ हे जनार्दन! इस उत्तानपादके पुत्रकी तपस्यासे भयभीत होकर हम आपकी शरणमें आये हैं, आप उसे तपसे निवृत्त कीजिये ॥ ३५ ॥ हम नहीं जानते, वह इन्द्रत्व चाहता है या सूर्यत्व अथवा उसे कुबेर, वरुण या चन्द्रमाके पदकी अभिलाषा है ॥ ३६ ॥ अतः हे ईश! आप हमपर प्रसन्न होइये और इस उत्तानपादके पुत्रको तपसे निवृत्त करके हमारे हृदयका काँटा निकालिये ॥ ३७ ॥

श्रीभगवान् बोले— हे सुरगण! उसे इन्द्र, सूर्य, वरुण अथवा कुबेर आदि किसीके पदकी अभिलाषा नहीं है, उसकी जो कुछ इच्छा है वह मैं सब पूर्ण करूँगा ॥ ३८ ॥ हे देवगण! तुम निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपने-अपने स्थानोंको जाओ। मैं तपस्यामें लगे हुए उस बालकको निवृत्त करता हूँ ॥ ३९ ॥

श्रीपराशरजी बोले— देवाधिदेव भगवान्‌के ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि समस्त देवगण उन्हें प्रणामकर अपने-अपने स्थानोंको गये ॥ ४० ॥ सर्वात्मा भगवान् हरिने भी ध्रुवकी तन्मयतासे प्रसन्न हो उसके निकट चतुर्भुजरूपसे जाकर इस प्रकार कहा ॥ ४१ ॥

श्रीभगवान् बोले— हे उत्तानपादके पुत्र ध्रुव! तेरा कल्याण हो। मैं तेरी तपस्यासे प्रसन्न होकर तुझे वर देनेके लिये प्रकट हुआ हूँ, हे सुव्रत! तू वर माँग ॥ ४२ ॥ तूने सम्पूर्ण बाह्य विषयोंसे उपरत होकर अपने चित्तको मुझमें ही लगा दिया है। अतः मैं तुझसे अति सन्तुष्ट हूँ। अब तू अपनी इच्छानुसार श्रेष्ठ वर माँग ॥ ४३ ॥

श्रीपराशरजी बोले— देवाधिदेव भगवान्‌के ऐसे वचन सुनकर बालक ध्रुवने आँखें खोलीं और अपनी ध्यानावस्थामें देखे हुए भगवान् हरिको साक्षात् अपने सम्मुख खड़े देखा ॥ ४४ ॥

५४

  • श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवरासिधरमच्युतम् ।<br>किरीटिनं समालोक्य जगाम शिरसा महीम् ॥ ४५श्रीअच्युतको किरीट तथा शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग धारण किये देख उसने पृथिवीपर सिर रखकर प्रणाम किया ॥ ४५ ॥ और सहसा रोमांचित तथा परम भयभीत होकर उसने देवदेवकी स्तुति करनेकी इच्छा की ॥ ४६ ॥ किन्तु ‘इनकी स्तुतिके लिये मैं क्या कहूँ? क्या कहनेसे इनका स्तवन हो सकता है?’ यह न जाननेके कारण वह चित्तमें व्याकुल हो गया और अन्तमें उसने उन देवदेवकी ही शरण ली ॥ ४७ ॥
रोमाञ्चिताङ्गः सहसा साध्वसं परमं गतः ।<br>स्तवाय देवदेवस्य स चक्रे मानसं ध्रुवः ॥ ४६
किं वदामि स्तुतावस्य केनोक्तेनास्य संस्तुतिः ।<br>इत्याकुलमतिर्देवं तमेव शरणं ययौ ॥ ४७

ध्रुव उवाच

भगवन्यदि मे तोषं तपसा परमं गतः ।<br>स्तोतुं तदहमिच्छामि वरमेनं प्रयच्छ मे ॥ ४८<br>[ ब्रह्माद्यैरस्य वेदज्ञैर्ज्ञायते यस्य नो गतिः ।<br>तं त्वां कथमहं देव स्तोतुं शक्नोमि बालकः ॥<br>त्वद्भक्तिप्रवणं ह्येतत्परमेश्वर मे मनः ।<br>स्तोतुं प्रवृत्तं त्वत्पादौ तत्र प्रज्ञां प्रयच्छ मे ॥ ]ध्रुवने कहा— भगवन्! आप यदि मेरी तपस्यासे सन्तुष्ट हैं तो मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, आप मुझे यही वर दीजिये [ जिससे मैं स्तुति कर सकूँ ] ॥ ४८ ॥ [ हे देव! जिनकी गति ब्रह्मा आदि वेदज्ञजन भी नहीं जानते; उन्हीं आपका मैं बालक कैसे स्तवन कर सकता हूँ। किन्तु हे परम प्रभो! आपकी भक्तिसे द्रवीभूत हुआ मेरा चित्त आपके चरणोंकी स्तुति करनेमें प्रवृत्त हो रहा है। अतः आप इसे उसके लिये बुद्धि प्रदान कीजिये]।

श्रीपराशर उवाच

शङ्खप्रान्तेन गोविन्दस्तं पस्पर्श कृताञ्जलिम् ।<br>उत्तानपादतनयं द्विजवर्य जगत्पतिः ॥ ४९श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजवर्य ! तब जगत्पति श्रीगोविन्दने अपने सामने हाथ जोड़े खड़े हुए उस उत्तानपादके पुत्रको अपने (वेदमय) शंखके अन्त (वेदान्तमय) भागसे छू दिया ॥ ४९ ॥ तब तो एक क्षणमें ही वह राजकुमार प्रसन्न-मुखसे अति विनीत हो सर्वभूताधिष्ठान श्रीअच्युतकी स्तुति करने लगा ॥ ५० ॥
अथ प्रसन्नवदनः स क्षणान्नृपनन्दनः ।<br>तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भूतधातारमच्युतम् ॥ ५०

ध्रुव उवाच

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।<br>भूतादिरादिप्रकृतिर्यस्य रूपं नतोऽस्मि तम् ॥ ५१ध्रुव बोले— पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार और मूल-प्रकृति—ये सब जिनके रूप हैं उन भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५१ ॥ जो अति शुद्ध, सूक्ष्म, सर्वव्यापक और प्रधानसे भी परे हैं, वह पुरुष जिनका रूप है उन गुण-भोक्ता परमपुरुषको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५२ ॥ हे परमेश्वर! पृथिवी आदि समस्त भूत, गन्धादि उनके गुण, बुद्धि आदि अन्तःकरण-चतुष्टय तथा प्रधान और पुरुष(जीव)-से भी परे जो सनातन पुरुष हैं, उन आप निखिलब्रह्माण्डनायकके ब्रह्मभूत शुद्धस्वरूप आत्माकी मैं शरण हूँ॥ ५३-५४॥ हे सर्वात्मन्! हे योगियोंके चिन्तनीय! व्यापक और वर्धनशील होनेके कारण आपका जो ब्रह्म नामक स्वरूप है, उस विकाररहित रूपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५५ ॥ हे प्रभो! आप हजारों मस्तकोंवाले, हजारों नेत्रोंवाले और हजारों चरणोंवाले परमपुरुष हैं, आप सर्वत्र व्याप्त हैं और [ पृथिवी आदि आवरणोंके सहित ] सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त कर दस गुण महाप्रमाणसे स्थित हैं ॥ ५६ ॥
शुद्धः सूक्ष्मोऽखिलव्यापी प्रधानात्परतः पुमान् ।<br>यस्य रूपं नमस्तस्मै पुरुषाय गुणाशिने ॥ ५२
भूरादीनां समस्तानां गन्धादीनां च शाश्वतः ।<br>बुद्ध्यादीनां प्रधानस्य पुरुषस्य च यः परः ॥ ५३
तं ब्रह्मभूतमात्मानमशेषजगतः पतिम् ।<br>प्रपद्ये शरणं शुद्धं त्वद्रूपं परमेश्वर ॥ ५४
बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च यद्रूपं ब्रह्मसंज्ञितम् ।<br>तस्मै नमस्ते सर्वात्मन्योगिचिन्त्याविकारिणे ॥ ५५
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।<br>सर्वव्यापी भुवः स्पर्शादत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ ५६

अ० १२] * प्रथम अंश * ५५

यद्भूतं यच्च वै भव्यं पुरुषोत्तम तद्भवान्। त्वत्तो विराद् स्वराद् सम्राट् त्वत्तश्चाप्यधिपूरुषः ॥ ५७ अत्यरिच्यत सोऽधश्च तिर्यगूर्ध्वं च वै भुवः । त्वत्तो विश्वमिदं जातं त्वत्तो भूतभविष्यती ॥ ५८ त्वद्रूपधारिणश्चान्तर्भूतं सर्वमिदं जगत्। त्वत्तो यज्ञः सर्वहुतः पृषदाज्यं पशुर्द्विधा ॥ ५९ त्वत्तः ऋचोऽथ सामानि त्वत्तश्छन्दांसि जज्ञिरे। त्वत्तो यजूंष्यजायन्त त्वत्तोऽश्वाश्चैकतो दतः ॥ ६० गावस्त्वत्तः समुद्भूतास्त्वत्तोऽजा अवयो मृगाः । त्वन्मुखाद्ब्राह्मणास्त्वत्तो बाहोः क्षत्रमजायत ॥ ६१ वैश्यास्तवोरुजाः शूद्रास्तव पद्भ्यां समुद्गताः। अक्ष्णोः सूर्योऽनिलः प्राणाच्चन्द्रमा मनसस्तव ॥ ६२ प्राणोऽन्तःसुषिराज्जातो मुखादग्निरजायत । नाभितो गगनं द्यौश्च शिरसः समवर्तत ॥ ६३ दिशः श्रोत्रात्क्षितिः पद्भ्यां त्वत्तः सर्वमभूदिदम् ॥ ६४ न्यग्रोधः सुमहानल्पे यथा बीजे व्यवस्थितः । संयमे विश्वमखिलं बीजभूते तथा त्वयि ॥ ६५ बीजादङ्कुरसम्भूतौ न्यग्रोधस्तु समुत्थितः । विस्तारं च यथा याति त्वत्तः सृष्टौ तथा जगत् ॥ ६६ यथा हि कदली नान्या त्वक्पत्रादपि दृश्यते। एवं विश्वस्य नान्यस्त्वं त्वत्स्थायीश्वर दृश्यते ॥ ६७ ह्लादिनी सन्धिनी संवित्त्वय्येका सर्वसंस्थितौ । ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ॥ ६८ पृथग्भूतैकभूताय भूतभूताय ते नमः । प्रभूतभूतभूताय तुभ्यं भूतात्मने नमः ॥ ६९ व्यक्तं प्रधानपुरुषौ विराद् सम्राट् स्वराद् तथा । विभाव्यतेऽन्तःकरणे पुरुषेष्वक्षयो भवान् ॥ ७० सर्वस्मिन्सर्वभूतस्त्वं सर्वः सर्वस्वरूपधृक् । सर्वं त्वत्तस्ततश्च त्वं नमः सर्वात्मनेऽस्तु ते ॥ ७१

हे पुरुषोत्तम ! भूत और भविष्यत् जो कुछ पदार्थ हैं वे सब आप ही हैं तथा विराट्, स्वराट्, सम्राट् और अधिपूरुष (ब्रह्मा) आदि भी सब आपहीसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ५७ ॥ वे ही आप इस पृथिवीके नीचे-ऊपर और इधर-उधर सब ओर बढ़े हुए हैं। यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे उत्पन्न हुआ है तथा आपहीसे भूत और भविष्यत् हुए हैं ॥ ५८ ॥ यह सम्पूर्ण जगत् आपके स्वरूपभूत ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है [फिर आपके अन्तर्गत होनेकी तो बात ही क्या है] जिसमें सभी पुरोडाशोंका हवन होता है वह यज्ञ, पृषदाज्य (दधि और घृत) तथा [ग्राम्य और वन्य] दो प्रकारके पशु आपहीसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ५९ ॥ आपहीसे ऋक्, साम और गायत्री आदि छन्द प्रकट हुए हैं, आपहीसे यजुर्वेदका प्रादुर्भाव हुआ है और आपहीसे अश्व तथा एक ओर दाँतवाले महिष आदि जीव उत्पन्न हुए हैं ॥ ६० ॥ आपहीसे गौओं, बकरियों, भेड़ों और मृगोंकी उत्पत्ति हुई है; आपहीके मुखसे ब्राह्मण, बाहुओंसे क्षत्रिय, जंघाओंसे वैश्य और चरणोंसे शूद्र प्रकट हुए हैं तथा आपहीके नेत्रोंसे सूर्य, प्राणसे वायु, मनसे चन्द्रमा, भीतरी छिद्र (नासारन्ध्र)-से प्राण, मुखसे अग्नि, नाभिसे आकाश, सिरसे स्वर्ग, श्रोत्रसे दिशाएँ और चरणोंसे पृथिवी आदि उत्पन्न हुए हैं; इस प्रकार हे प्रभो ! यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे प्रकट हुआ है ॥ ६१–६४ ॥ जिस प्रकार नन्हेंसे बीजमें बड़ा भारी वट-वृक्ष रहता है उसी प्रकार प्रलय-कालमें यह सम्पूर्ण जगत् बीज-स्वरूप आपहीमें लीन रहता है ॥ ६५ ॥ जिस प्रकार बीजसे अंकुररूपमें प्रकट हुआ वट-वृक्ष बढ़कर अत्यन्त विस्तारवाला हो जाता है उसी प्रकार सृष्टिकालमें यह जगत् आपहीसे प्रकट होकर फैल जाता है ॥ ६६ ॥ हे ईश्वर ! जिस प्रकार केलेका पौधा छिलके और पत्तोंसे अलग दिखायी नहीं देता उसी प्रकार जगत्से आप पृथक् नहीं हैं, वह आपहीमें स्थित देखा जाता है ॥ ६७ ॥ सबके आधारभूत आपमें ह्लादिनी (निरन्तर आह्लादित करनेवाली) और सन्धिनी (विच्छेदरहित) संवित् (विद्याशक्ति) अभिन्नरूपसे रहती हैं। आपमें (विषयजन्य) आह्लाद या ताप देनेवाली (सात्त्विकी या तामसी) अथवा उभयमिश्रा (राजसी) कोई भी संवित् नहीं है, क्योंकि आप निर्गुण हैं ॥ ६८ ॥ आप [कार्यदृष्टिसे] पृथक्-रूप और [कारणदृष्टिसे] एकरूप हैं। आप ही भूतसूक्ष्म हैं और आप ही नाना जीवरूप हैं। हे भूतान्तरात्मन् ! ऐसे आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६९ ॥ [योगियोंके द्वारा] अन्तःकरणमें आप ही महत्तत्त्व, प्रधान, पुरुष, विराट्, सम्राट् और स्वराट् आदि रूपोंसे भावना किये जाते हैं और [क्षयशील] पुरुषोंमें आप नित्य अक्षय हैं ॥ ७० ॥ आकाशादि सर्वभूतोंमें सार अर्थात् उनके गुणरूप आप ही हैं; समस्त रूपोंको धारण

५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२


सर्वात्मकोऽसि सर्वेश सर्वभूतस्थितो यतः।
कथयामि ततः किं ते सर्वं वेत्सि हृदि स्थितम् ॥ ७२
सर्वात्मन्सर्वभूतेश सर्वसत्त्वसमुद्भव।
सर्वभूतो भवान्वेत्ति सर्वसत्त्वमनोरथम् ॥ ७३
यो मे मनोरथो नाथ सफलः स त्वया कृतः।
तपश्च तप्तं सफलं यद्दृष्टोऽसि जगत्पते ॥ ७४
श्रीभगवानुवाच
तपसस्तत्फलं प्राप्तं यद्दृष्टोऽहं त्वया ध्रुव।
मद्दर्शनं हि विफलं राजपुत्र न जायते ॥ ७५
वरं वरय तस्मात्त्वं यथाभिमतमात्मनः।
सर्वं सम्पद्यते पुंसां मयि दृष्टिपथं गते ॥ ७६
ध्रुव उवाच
भगवन्भूतभव्येश सर्वस्यास्ते भवान् हृदि।
किमज्ञातं तव ब्रह्मन्मनसा यन्मयेक्षितम् ॥ ७७
तथापि तुभ्यं देवेश कथयिष्यामि यन्मया।
प्रार्थ्यते दुर्विनीतेन हृदयेनातिदुर्लभम् ॥ ७८
किं वा सर्वजगत्स्रष्टः प्रसन्ने त्वयि दुर्लभम्।
त्वत्प्रसादफलं भुङ्क्ते त्रैलोक्यं मघवानपि ॥ ७९
नैतद्राजासनं योग्यमजातस्य ममोदरात्।
इतिगर्वादवोचन्मां सपत्नी मातुरुच्चकैः ॥ ८०
आधारभूतं जगतः सर्वेषामुत्तमोत्तमम्।
प्रार्थयामि प्रभो स्थानं त्वत्प्रसादादतोऽव्ययम् ॥ ८१
श्रीभगवानुवाच
यत्त्वया प्रार्थ्यते स्थानमेतत्प्राप्स्यसि वै भवान्।
त्वयाऽहं तोषितः पूर्वमन्यजन्मनि बालक ॥ ८२
त्वमासीर्ब्राह्मणः पूर्वं मय्येकाग्रमतिः सदा।
मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्निजधर्मानुपालकः ॥ ८३
कालेन गच्छता मित्रं राजपुत्रस्तवाभवत्।
यौवनेऽखिलभोगाढ्यो दर्शनीयोज्ज्वलाकृतिः ॥ ८४
तत्सङ्गात्तस्य तामृद्धिमवलोक्यातिदुर्लभाम्।
भवेयं राजपुत्रोऽहमिति वाञ्छा त्वया कृता ॥ ८५


करनेवाले होनेसे सब कुछ आप ही हैं; सब कुछ आपहीसे हुआ है; अतएव सबके द्वारा आप ही हो रहे हैं इसलिये आप सर्वात्माको नमस्कार है ॥ ७१ ॥ हे सर्वेश्वर ! आप सर्वात्मक हैं; क्योंकि सम्पूर्ण भूतोंमें व्याप्त हैं; अतः मैं आपसे क्या कहूँ? आप स्वयं ही सब हृदयस्थित बातोंको जानते हैं॥ ७२॥ हे सर्वात्मन्! हे सर्वभूतेश्वर ! हे सब भूतोंके आदि-स्थान ! आप सर्वभूतरूपसे सभी प्राणियोंके मनोरथोंको जानते हैं ॥ ७३ ॥ हे नाथ ! मेरा जो कुछ मनोरथ था वह तो आपने सफल कर दिया और हे जगत्पते ! मेरी तपस्या भी सफल हो गयी, क्योंकि मुझे आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ ॥ ७४॥
श्रीभगवान् बोले— हे ध्रुव ! तुमको मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ, इससे अवश्य ही तेरी तपस्या तो सफल हो गयी; परन्तु हे राजकुमार ! मेरा दर्शन भी तो कभी निष्फल नहीं होता ॥ ७५ ॥ इसलिये तुझको जिस वरकी इच्छा हो वह माँग ले। मेरा दर्शन हो जानेपर पुरुषको सभी कुछ प्राप्त हो सकता है ॥ ७६ ॥
ध्रुव बोले— हे भूतभव्येश्वर भगवन् ! आप सभीके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं। हे ब्रह्मन्! मेरे मनकी जो कुछ अभिलाषा है वह क्या आपसे छिपी हुई है ? ॥ ७७ ॥ तो भी, हे देवेश्वर ! मैं दुर्विनीत जिस अति दुर्लभ वस्तुकी हृदयसे इच्छा करता हूँ उसे आपकी आज्ञानुसार आपके प्रति निवेदन करूँगा ॥ ७८ ॥ हे समस्त संसारको रचनेवाले परमेश्वर ! आपके प्रसन्न होनेपर (संसारमें) क्या दुर्लभ है? इन्द्र भी आपके कृपाकटाक्षके फलरूपसे ही त्रिलोकीको भोगता है ॥ ७९ ॥
प्रभो ! मेरी सौतेली माताने गर्वसे अति बढ़-बढ़कर मुझसे यह कहा था कि 'जो मेरे उदरसे उत्पन्न नहीं है उसके योग्य यह राजासन नहीं है' ॥ ८० ॥ अतः हे प्रभो ! आपके प्रसादसे मैं उस सर्वोत्तम एवं अव्यय स्थानको प्राप्त करना चाहता हूँ जो सम्पूर्ण विश्वका आधारभूत हो ॥ ८१ ॥
श्रीभगवान् बोले— अरे बालक ! तूने अपने पूर्वजन्ममें भी मुझे सन्तुष्ट किया था, इसलिये तू जिस स्थानकी इच्छा करता है उसे अवश्य प्राप्त करेगा ॥ ८२ ॥ पूर्व जन्ममें तू एक ब्राह्मण था और मुझमें निरन्तर एकाग्रचित्त रहनेवाला, माता-पिताका सेवक तथा स्वधर्मका पालन करनेवाला था ॥ ८३ ॥ कालान्तरमें एक राजपुत्र तेरा मित्र हो गया। वह अपनी युवावस्थामें सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न और अति दर्शनीय रूपलावण्ययुक्त था ॥ ८४ ॥ उसके संगसे उसके दुर्लभ वैभवको देखकर तेरी ऐसी इच्छा हुई कि 'मैं भी राजपुत्र होऊँ' ॥ ८५ ॥

अ० १२ ] * प्रथम अंश * ५७


ततो यथाभिलषिता प्राप्ता ते राजपुत्रता।<br>उत्तानपादस्य गृहे जातोऽसि ध्रुव दुर्लभे॥ ८६<br>अन्येषां दुर्लभं स्थानं कुले स्वायम्भुवस्य यत्॥ ८७अतः हे ध्रुव! तुझको अपनी मनोवांछित राजपुत्रता प्राप्त हुई और जिन स्वायम्भुवमनुके कुलमें और किसीको स्थान मिलना अति दुर्लभ है, उन्हींके घरमें तूने उत्तानपादके यहाँ जन्म लिया॥ ८६-८७॥
तस्यैतदपरं बाल येनाहं परितोषितः।<br>मामाराध्य नरो मुक्तिमवाप्नोत्यविलम्बिताम्॥ ८८<br>मय्यर्पितमना बाल किमु स्वर्गादिकं पदम्॥ ८९अरे बालक! [औरोंके लिये यह स्थान कितना ही दुर्लभ हो परन्तु] जिसने मुझे सन्तुष्ट किया है उसके लिये तो यह अत्यन्त तुच्छ है। मेरी आराधना करनेसे तो मोक्षपद भी तत्काल प्राप्त हो सकता है, फिर जिसका चित्त निरन्तर मुझमें ही लगा हुआ है उसके लिये स्वर्गादि लोकोंका तो कहना ही क्या है?॥ ८८-८९॥
त्रैलोक्यादधिके स्थाने सर्वताराग्रहाश्रयः।<br>भविष्यति न सन्देहो मत्प्रसादाद्भवाञ्ध्रुव॥ ९०हे ध्रुव! मेरी कृपासे तू निस्सन्देह उस स्थानमें, जो त्रिलोकीमें सबसे उत्कृष्ट है, सम्पूर्ण ग्रह और तारामण्डलका आश्रय बनेगा॥ ९०॥
सूर्यात्सोमात्तथा भौमात्सोमपुत्राद्बृहस्पतेः।<br>सितार्कतनयादीनां सर्वर्क्षाणां तथा ध्रुव॥ ९१<br>सप्तर्षीणामशेषाणां ये च वैमानिकाः सुराः।<br>सर्वेषामुपरि स्थानं तव दत्तं मया ध्रुव॥ ९२हे ध्रुव! मैं तुझे वह ध्रुव (निश्चल) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों, सप्तर्षियों और सम्पूर्ण विमानचारी देवगणोंसे ऊपर है॥ ९१-९२॥
केचिच्चतुर्युगं यावत्केचिन्मन्वन्तरं सुराः।<br>तिष्ठन्ति भवतो दत्ता मया वै कल्पसंस्थितिः॥ ९३देवताओंमेंसे कोई तो केवल चार युगतक और कोई एक मन्वन्तरतक ही रहते हैं; किन्तु तुझे मैं एक कल्पतककी स्थिति देता हूँ॥ ९३॥
सुनीतिरपि ते माता त्वदासन्नातिनिर्मला।<br>विमाने तारका भूत्वा तावत्कालं निवत्स्यति॥ ९४तेरी माता सुनीति भी अति स्वच्छ तारारूपसे उतने ही समयतक तेरे पास एक विमानपर निवास करेगी॥ ९४॥
ये च त्वां मानवाः प्रातः सायं च सुसमाहिताः।<br>कीर्त्तयिष्यन्ति तेषां च महत्पुण्यं भविष्यति॥ ९५और जो लोग समाहित-चित्तसे सायंकाल और प्रातःकालके समय तेरा गुण-कीर्तन करेंगे उनको महान् पुण्य होगा॥ ९५॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
एवं पूर्वं जगन्नाथाद्देवदेवाज्जनार्दनात्।<br>वरं प्राप्य ध्रुवः स्थानमध्यास्ते स महामते॥ ९६हे महामते! इस प्रकार पूर्वकालमें जगत्पति देवाधिदेव भगवान् जनार्दनसे वर पाकर ध्रुव उस अत्युत्तम स्थानमें स्थित हुए॥ ९६॥
स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यान्मातापित्रोश्च वै तथा।<br>द्वादशाक्षरमाहात्म्यात्तपसश्च प्रभावतः॥ ९७<br>तस्याभिमानमृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य हि।<br>देवासुराणामाचार्यः श्लोकमत्रोशना जगौ॥ ९८हे मुने! अपने माता-पिताकी धर्मपूर्वक सेवा करनेसे तथा द्वादशाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य और तपके प्रभावसे उनके मान, वैभव एवं प्रभावकी वृद्धि देखकर देव और असुरोंके आचार्य शुक्रदेवने ये श्लोक कहे हैं—॥ ९७-९८॥
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य तपसः फलम्।<br>यदेनं पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ९९'अहो! इस ध्रुवके तपका कैसा प्रभाव है? अहो ! इसकी तपस्याका कैसा अद्भुत फल है जो इस ध्रुवको ही आगे रखकर सप्तर्षिगण स्थित हो रहे हैं॥ ९९॥
ध्रुवस्य जननी चेयं सुनीतिर्नाम सूनृता।<br>अस्याश्च महिमानं कः शक्तो वर्णयितुं भुवि॥ १००इसकी यह सुनीति नामवाली माता भी अवश्य ही सत्य और हितकर वचन बोलनेवाली है*। संसारमें ऐसा कौन है

* सुनीतिने ध्रुवको पुण्योपार्जन करनेका उपदेश दिया था, जिसके आचरणसे उन्हें उत्तम लोक प्राप्त हुआ। अतएव 'सुनीति' सूनृता कही गयी है।

५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३


त्रैलोक्याश्रयतां प्राप्तं परं स्थानं स्थिरायति।<br>स्थानं प्राप्ता परं धृत्वा या कुक्षिविवरे ध्रुवम्॥ १०१<br>यश्चैतत्कीर्त्तयेन्नित्यं ध्रुवस्यारोहणं दिवि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते॥ १०२<br>स्थानभ्रंशं न चाप्नोति दिवि वा यदि वा भुवि।<br>सर्वकल्याणसंयुक्तो दीर्घकालं स जीवति॥ १०३जो इसकी महिमाका वर्णन कर सके? जिसने अपनी कोखमें उस ध्रुवको धारण करके त्रिलोकीका आश्रयभूत अति उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया, जो भविष्यमें भी स्थिर रहनेवाला है'॥ १००-१०१ ॥<br>जो व्यक्ति ध्रुवके इस दिव्यलोक-प्राप्तिके प्रसंगका कीर्तन करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें पूजित होता है॥ १०२॥ वह स्वर्गमें रहे अथवा पृथिवीमें, कभी अपने स्थानसे च्युत नहीं होता तथा समस्त मंगलोंसे भरपूर रहकर बहुत कालतक जीवित रहता है॥ १०३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

राजा वेन और पृथुका चरित्र

श्रीपराशर उवाच

ध्रुवाच्छिष्टं च भव्यं च भव्याच्छम्भुर्व्यजायत।<br>शिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्चपुत्रानकल्मषान्॥ १<br>रिपुं रिपुञ्जयं विप्रं वृकलं वृकतेजसम्।<br>रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम्॥ २<br>अजीजनत्पुष्करिण्यां वारुण्यां चाक्षुषो मनुम्।<br>प्रजापतेरात्मजायां वीरणस्य महात्मनः॥ ३<br>मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः।<br>कन्यायां तपतां श्रेष्ठ वैराजस्य प्रजापतेः॥ ४<br>कुरुः पुरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाञ्छुचिः।<br>अग्निष्टोमोऽतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चेति ते नव।<br>अभिमन्युश्च दशमो नड्वलायां महौजसः॥ ५<br>कुरोरजनयत्पुत्रान् षडाग्नेयी महाप्रभान्।<br>अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं शिबिम्॥ ६<br>अङ्गात्सुनीथापत्यं वै वेनमेकमजायत।<br>प्रजार्थमृषयस्तस्य ममन्थुर्दक्षिणं करम्॥ ७<br>वेनस्य पाणौ मथिते सम्बभूव महामुने।<br>वैन्यो नाम महीपालो यः पृथुः परिकीर्त्तितः॥ ८<br>येन दुग्धा मही पूर्वं प्रजानां हितकारणात्॥ ९श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! ध्रुवसे [उसकी पत्नीने] शिष्टि और भव्यको उत्पन्न किया और भव्यसे शम्भुका जन्म हुआ तथा शिष्टिके द्वारा उसकी पत्नी सुच्छायाने रिपु, रिपुंजय, विप्र, वृकल और वृकतेजा नामक पाँच निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये। उनमेंसे रिपुके द्वारा बृहतीके गर्भसे महातेजस्वी चाक्षुषका जन्म हुआ॥ १-२॥ चाक्षुषने अपनी भार्या पुष्करणीसे, जो वरुण-कुलमें उत्पन्न और महात्मा वीरण प्रजापतिकी पुत्री थी, मनुको उत्पन्न किया [जो छठे मन्वन्तरके अधिपति हुए]॥ ३॥ तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मनुसे वैराज प्रजापतिकी पुत्री नड्वलाके गर्भमें दस महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए॥ ४॥ नड्वलासे कुरु, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवान्, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र तथा नवाँ सुद्युम्न और दसवाँ अभिमन्यु इन महातेजस्वी पुत्रोंका जन्म हुआ॥ ५॥ कुरुके द्वारा उसकी पत्नी आग्नेयीने अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और शिबि इन छः परम तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ६॥ अंगसे सुनीथाके वेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ऋषियोंने उस (वेन)-के दाहिने हाथका सन्तानके लिये मन्थन किया था॥ ७॥ हे महामुने! वेनके हाथका मन्थन करनेपर उससे वैन्य नामक महीपाल उत्पन्न हुए जो पृथु नामसे विख्यात हैं और जिन्होंने प्रजाके हितके लिये पूर्वकालमें पृथिवीको दुहा था॥ ८-९॥

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अ० १३ ] * प्रथम अंश * ५९

श्रीमैत्रेय उवाच किमर्थं मथितः पाणिर्वेनस्य परमर्षिभिः। यत्र जज्ञे महावीर्यः स पृथुर्मुविसत्तम ॥ १० श्रीपराशर उवाच सुनीथा नाम या कन्या मृत्योः प्रथमतॊऽभवत्। अङ्गस्य भार्या सा दत्ता तस्यां वेनो व्यजायत ॥ ११ स मातामहदोषेण तेन मृत्योः सुतात्मजः। निसर्गादेव मैत्रेय दुष्ट एव व्यजायत ॥ १२ अभिषिक्तो यदा राज्ये स वेनः परमर्षिभिः। घोषयामास स तदा पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १३ न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं कथञ्चन। भोक्ता यज्ञस्य कस्त्वन्यो ह्यहं यज्ञपतिः प्रभुः ॥ १४ ततस्तमृषयः पूर्वं सम्पूज्य पृथिवीपतिम्। ऊचुः सामकलं वाक्यं मैत्रेय समुपस्थिताः ॥ १५ ऋषय ऊचुः भो भो राजन् शृणुष्व त्वं यद्वदाम महीपते। राज्यदेहोपकाराय प्रजानां च हितं परम् ॥ १६ दीर्घसत्रेण देवेशं सर्वयज्ञेश्वरं हरिम्। पूजयिष्याम भद्रं ते तस्यांशस्ते भविष्यति ॥ १७ यज्ञेन यज्ञपुरुषो विष्णुः सम्प्रीणितो नृप। अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेव प्रदास्यति ॥ १८ यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषां राष्ट्रे सम्पूज्यते हरिः। तेषां सर्वेप्सितावाप्तिं ददाति नृप भूभृताम् ॥ १९ वेन उवाच मत्तः कोऽभ्यधिकोऽन्योऽस्ति कश्चाराध्यो ममापरः। कोऽयं हरिरिति ख्यातो यो वो यज्ञेश्वरो मतः ॥ २० ब्रह्मा जनार्दनः शम्भुरिन्द्रो वायुर्यमो रविः। हुतभुग्वरुणो धाता पूषा भूमिर्निशाकरः ॥ २१ एते चान्ये च ये देवाः शापानुग्रहकारिणः। नृपस्यैते शरीरस्थाः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २२ एवं ज्ञात्वा मयाज्ञप्तं यद्यथा क्रियतां तथा। न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं च भो द्विजाः ॥ २३ भर्तृशुश्रूषणं धर्मो यथा स्त्रीणां परो मतः। ममाज्ञापालनं धर्मो भवतां च तथा द्विजाः ॥ २४

श्रीमैत्रेयजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! परमर्षियोंने वेनके हाथको क्यों मथा जिससे महापराक्रमी पृथुका जन्म हुआ ? ॥ १०॥ श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मृत्युकी सुनीथा नामवाली जो प्रथम पुत्री थी वह अंगको पत्नीरूपसे दी (व्याही) गयी थी। उसीसे वेनका जन्म हुआ ॥ ११ ॥ हे मैत्रेय! वह मृत्युकी कन्याका पुत्र अपने मातामह (नाना)-के दोषसे स्वभावसे ही दुष्ट प्रकृति हुआ ॥ १२ ॥ उस वेनका जिस समय महर्षियोंद्वारा राजपद्पर अभिषेक हुआ उसी समय उस पृथिवीपतिने संसारभरमें यह घोषणा कर दी कि 'भगवान्, यज्ञपुरुष मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त यज्ञका भोक्ता और स्वामी हो ही कौन सकता है? इसलिये कभी कोई यज्ञ, दान और हवन आदि न करे' ॥ १३-१४ ॥ हे मैत्रेय! तब ऋषियोंने उस पृथिवीपतिके पास उपस्थित हो पहले उसकी खूब प्रशंसा कर सान्त्वनायुक्त मधुर वाणीसे कहा ॥ १५ ॥ ऋषिगण बोले—हे राजन्! हे पृथिवीपते! तुम्हारे राज्य और देहके उपकार तथा प्रजाके हितके लिये हम जो बात कहते हैं, सुनो ॥ १६॥ तुम्हारा कल्याण हो; देखो, हम बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा जो सर्व-यज्ञेश्वर देवाधिपति भगवान् हरिका पूजन करेंगे उसके फलमेंसे तुमको भी [छठा] भाग मिलेगा ॥ १७ ॥ हे नृप! इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हमलोगोंके साथ तुम्हारी भी सकल कामनाएँ पूर्ण करेंगे ॥ १८ ॥ हे राजन् जिन राजाओंके राज्यमें यज्ञेश्वर भगवान् हरिका यज्ञोंद्वारा पूजन किया जाता है, वे उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ १९॥ वेन बोला—मुझसे भी बढ़कर ऐसा और कौन है जो मेरा भी पूजनीय है? जिसे तुम यज्ञेश्वर मानते हो वह 'हरि' कहलानेवाला कौन है? ॥ २०॥ ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, धाता, पूषा, पृथिवी और चन्द्रमा तथा इनके अतिरिक्त और भी जितने देवता शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं वे सभी राजाके शरीरमें निवास करते हैं, इस प्रकार राजा सर्वदेवमय है ॥ २१-२२ ॥ हे ब्राह्मणो ! ऐसा जानकर मैंने जैसी जो कुछ आज्ञा की है वैसा ही करो। देखो, कोई भी दान, यज्ञ और हवन आदि न करे ॥ २३ ॥ हे द्विजगण! स्त्रीका परमधर्म जैसे अपने पतिकी सेवा करना ही माना गया है वैसे ही आपलोगोंका धर्म भी मेरी आज्ञाका पालन करना ही है ॥ २४ ॥

६०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३

| ऋषय ऊचुः | **ऋषिगण बोले—**महाराज! आप ऐसी आज्ञा दीजिये, जिससे धर्मका क्षय न हो। देखिये, यह सारा जगत् हवि (यज्ञमें हवन की हुई सामग्री)-का ही परिणाम है॥ २५॥ | | देह्यनुज्ञां महाराज मा धर्मो यातु सङ्क्षयम्।<br>हविषां परिणामोऽयं यदेतदखिलं जगत्॥ २५ | | | श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**महर्षियोंके इस प्रकार बारम्बार समझाने और कहने-सुननेपर भी जब वेनने ऐसी आज्ञा नहीं दी तो वे अत्यन्त क्रुद्ध और अमर्षयुक्त होकर आपसमें कहने लगे—'इस पापीको मारो, मारो!॥ २६-२७॥ जो अनादि और अनन्त यज्ञपुरुष प्रभु विष्णुकी निन्दा करता है वह अनाचारी किसी प्रकार पृथ्वीपति होनेके योग्य नहीं है'॥ २८॥ ऐसा कह मुनिगणोंने, भगवान्की निन्दा आदि करनेके कारण पहले ही मरे हुए उस राजाको मन्त्रसे पवित्र किये हुए कुशाओंसे मार डाला॥ २९॥ | | इति विज्ञाप्यमानोऽपि स वेनः परमर्षिभिः।<br>यदा ददाति नानुज्ञां प्रोक्तः प्रोक्तः पुनः पुनः॥ २६ | | | ततस्ते मुनयः सर्वे कोपामर्षसमन्विताः।<br>हन्यतां हन्यतां पाप इत्यूचुस्ते परस्परम्॥ २७ | | | यो यज्ञपुरुषं विष्णुमनादिनिधनं प्रभुम्।<br>विनिन्दत्यधमाचारो न स योग्यो भुवः पतिः॥ २८ | | | इत्युक्त्वा मन्त्रपूतैस्तैः कुशैर्मुनिगणा नृपम्।<br>निजघ्नुर्निहतं पूर्वं भगवन्निन्दनादिना॥ २९ | | | ततश्च मुनयो रेणुं ददृशुः सर्वतो द्विज।<br>किमेतदिति चासन्नान्प्रपच्छुस्ते जनांस्तदा॥ ३० | हे द्विज! तदनन्तर उन मुनीश्वरोंने सब ओर बड़ी धूलि उठती देखी, उसे देखकर उन्होंने अपने निकटवर्ती लोगोंसे पूछा—“यह क्या है?”॥ ३०॥ उन पुरुषोंने कहा—“राष्ट्रके राजाहीन हो जानेसे दीन-दुखिया लोगोंने चोर बनकर दूसरोंका धन लूटना आरम्भ कर दिया है॥ ३१॥ हे मुनिवरो! उन तीव्र वेगवाले परधनहारी चोरोंके उत्पातसे ही यह बड़ी भारी धूलि उड़ती दीख रही है”॥ ३२॥ | | आख्यातं च जनैस्तेषां चोरीभूतैरराजके।<br>राष्ट्रे तु लोकैरारब्धं परस्वादानमातुरैः॥ ३१ | | | तेषामुदीर्णवेगानां चोराणां मुनिसत्तमाः।<br>सुमहान् दृश्यते रेणुः परवित्तापहारिणाम्॥ ३२ | | | ततः सम्मन्त्र्य ते सर्वे मुनयस्तस्य भूभृतः।<br>ममन्थूरुं पुत्रार्थमनपत्यस्य यत्नतः॥ ३३ | तब उन सब मुनीश्वरोंने आपसमें सलाह कर उस पुत्रहीन राजाकी जंघाका पुत्रके लिये यत्नपूर्वक मन्थन किया॥ ३३॥ उसकी जंघाके मथनेपर उससे एक पुरुष उत्पन्न हुआ जो जले ठूँठके समान काला, अत्यन्त नाटा और छोटे मुखवाला था॥ ३४॥ उसने अति आतुर होकर उन सब ब्राह्मणोंसे कहा—'मैं क्या करूँ?' उन्होंने कहा—“निषीद (बैठ)” अतः वह 'निषाद' कहलाया॥ ३५॥ इसलिये हे मुनिशार्दूल! उससे उत्पन्न हुए लोग विन्ध्याचलनिवासी पाप-परायण निषादगण हुए॥ ३६॥ उस निषादरूप द्वारसे राजा वेनका सम्पूर्ण पाप निकल गया। अतः निषादगण वेनके पापोंका नाश करनेवाले हुए॥ ३७॥ | | मथ्यमानात्समुत्तस्थौ तस्योरोः पुरुषः किल।<br>दग्धस्थूणाप्रतीकाशः खर्वाटास्योऽतिह्रस्वकः॥ ३४ | | | किं करोमीति तान्सर्वान्स विप्रानाह चातुरः।<br>निषीदेति तमूचुस्ते निषादस्तेन सोऽभवत्॥ ३५ | | | ततस्तत्सम्भवा जाता विन्ध्यशैलनिवासिनः।<br>निषादा मुनिशार्दूल पापकर्मोपलक्षणाः॥ ३६ | | | तेन द्वारेण तत्पापं निष्क्रान्तं तस्य भूपतेः।<br>निषादास्ते ततो जाता वेनकल्मषनाशनाः॥ ३७ | | | तस्यैव दक्षिणं हस्तं ममन्थुस्ते ततो द्विजाः॥ ३८ | फिर उन ब्राह्मणोंने उसके दायें हाथका मन्थन किया। उसका मन्थन करनेसे परम प्रतापी वेनसुवन पृथु प्रकट हुए, जो अपने शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान थे॥ ३८-३९॥ इसी समय आजगव नामक आद्य (सर्वप्रथम) धनुष और दिव्य बाण तथा कवच आकाशसे गिरे॥ ४०॥ | | मथ्यमाने च तत्राभूत्पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्।<br>दीप्यमानः स्ववपुषा साक्षादग्निरिव ज्वलन्॥ ३९ | | | आद्यमाजगवं नाम खात्यपात ततो धनुः।<br>शराश्च दिव्या नभसः कवचं च पपात ह॥ ४० | |

अ० १३ ] * प्रथम अंश * ६१

तस्मिन् जाते तु भूतानि सम्प्रहृष्टानि सर्वशः ॥ ४१
सत्पुत्रेणैव जातेन वेनोऽपि त्रिदिवं ययौ ।
पुन्नाम्नो नरकात् त्रातः सुतेन सुमहात्मना ॥ ४२
तं समुद्राश्च नद्यश्च रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तोयानि चाभिषेकार्थं सर्वाण्येवोपत्तस्थिरे ॥ ४३
पितामहश्च भगवान्देवैराङ्गिरसैः सह ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि च सर्वशः ।
समागम्‍य तदा वैन्यमभ्यषिञ्चन्नराधिपम् ॥ ४४
हस्ते तु दक्षिणे चक्रं दृष्ट्वा तस्य पितामहः ।
विष्णोरंशं पृथुं मत्वा परितोषं परं ययौ ॥ ४५
विष्णुचक्रं करे चिह्नं सर्वेषां चक्रवर्तिनाम् ।
भवत्यव्याहतो यस्य प्रभावस्त्रिदशैरपि ॥ ४६
महता राजराज्येन पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
सोऽभिषिक्तो महातेजा विधिवद्धर्म्मकोविदैः ॥ ४७
पित्राऽपरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः ।
अनुरागात्ततस्तस्य नाम राजेत्यजायत ॥ ४८
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ४९
अकृष्टपच्या पृथिवी सिद्ध्यन्त्यन्नानि चिन्तया ।
सर्वकामदुघा गावः पुटके पुटके मधु ॥ ५०
तस्य वै जातमात्रस्य यज्ञे पैतामहे शुभे ।
सूतः सूत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः ॥ ५१
तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽथ मागधः ।
प्रोक्तौ तदा मुनिवरैस्तावभौ सूतमागधौ ॥ ५२
स्तूयतामेष नृपतिः पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
कर्म्‍मैतदनुरूपं वां पात्रं स्तोत्रस्य चापरम् ॥ ५३
ततस्तावूचतुर्विप्रान्सर्वानेव कृताञ्जली ।
अद्य जातस्य नो कर्म ज्ञायतेऽस्य महीपतेः ॥ ५४
गुणा न चास्य ज्ञायन्ते न चास्य प्रथितं यशः ।
स्तोत्रं किमाश्रयं त्वस्य कार्यमस्माभिरुच्यताम् ॥ ५५
ऋषय ऊचुः
करिष्यत्येष यत्कर्म चक्रवर्ती महाबलः ।
गुणा भविष्या ये चास्य तैरयं स्तूयतां नृपः ॥ ५६


उनके उत्पन्न होनेसे सभी जीवोंको अति आनन्द हुआ और केवल सत्पुत्रके ही जन्म लेनेसे वेन भी स्वर्गलोकको चला गया। इस प्रकार महात्मा पुत्रके कारण ही उसकी पुम् अर्थात् नरकसे रक्षा हुई ॥ ४१-४२ ॥

महाराज पृथुके अभिषेकके लिये सभी समुद्र और नदियाँ सब प्रकारके रत्न और जल लेकर उपस्थित हुए ॥ ४३ ॥ उस समय आंगिरस देवगणोंके सहित पितामह ब्रह्माजीने और समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंने वहाँ आकर महाराज वैन्य (वेनपुत्र)-का राज्याभिषेक किया ॥ ४४ ॥ उनके दाहिने हाथमें चक्रका चिह्न देखकर उन्हें विष्णुका अंश जान पितामह ब्रह्माजीको परम आनन्द हुआ ॥ ४५ ॥ यह श्रीविष्णुभगवान्‌के चक्रका चिह्न सभी चक्रवर्ती राजाओंके हाथमें हुआ करता है। उनका प्रभाव कभी देवताओंसे भी कुण्ठित नहीं होता ॥ ४६ ॥

इस प्रकार महातेजस्वी और परम प्रतापी वेनपुत्र धर्मकुशल महानुभावोंद्वारा विधिपूर्वक अति महान् राजराजेश्वरपदपर अभिषिक्त हुए ॥ ४७ ॥ जिस प्रजाको पिताने अपरुक्त (अप्रसन्न) किया था उसीको उन्होंने अनुरंजित (प्रसन्न) किया, इसलिये अनुरंजन करनेसे उनका नाम ‘राजा’ हुआ ॥ ४८ ॥ जब वे समुद्रमें चलते थे तो जल बहनेसे रुक जाता था, पर्वत उन्हें मार्ग देते थे और उनकी ध्वजा कभी भंग नहीं हुई ॥ ४९ ॥ पृथिवी बिना जोते-बोये धान्य पकानेवाली थी; केवल चिन्तनमात्रसे ही अन्न सिद्ध हो जाता था, गौएँ कामधेनुरूपा थीं और पत्ते-पत्तेमें मधु भरा रहता था ॥ ५० ॥

राजा पृथुने उत्पन्न होते ही पैतामह यज्ञ किया; उससे सोमाभिषवके दिन सूति (सोमाभिषवभूमि)-से महामति सूतकी उत्पत्ति हुई ॥ ५१ ॥ उसी महायज्ञमें बुद्धिमान् मागधका भी जन्म हुआ। तब मुनिवरोंने उन दोनों सूत और मागधोंसे कहा— ॥ ५२ ॥ ‘तुम इन प्रतापवान् वेनपुत्र महाराज पृथुकी स्तुति करो। तुम्हारे योग्य यही कार्य है और राजा भी स्तुतिके ही योग्य हैं’ ॥ ५३ ॥ तब उन्होंने हाथ जोड़कर सब ब्राह्मणोंसे कहा—‘‘ये महाराज तो आज ही उत्पन्न हुए हैं, हम इनके कोई कर्म तो जानते ही नहीं हैं ॥ ५४ ॥ अभी इनके न तो कोई गुण प्रकट हुए हैं और न यश ही विख्यात हुआ है; फिर कहिये, हम किस आधारपर इनकी स्तुति करें’’ ॥ ५५ ॥

**ऋषिगण बोले—**ये महाबली चक्रवर्ती महाराज भविष्यमें जो-जो कर्म करेंगे और इनके जो-जो भावी गुण होंगे उन्हींसे तुम इनका स्तवन करो ॥ ५६ ॥

६२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर राजाको भी परम सन्तोष हुआ; उन्होंने सोचा 'मनुष्य सद्गुणोंके कारण ही प्रशंसाका पात्र होता है; अतः मुझको भी गुण उपार्जन करने चाहिये॥ ५७॥ इसलिये अब स्तुतिके द्वारा ये जिन गुणोंका वर्णन करेंगे मैं भी सावधानतापूर्वक वैसा ही करूँगा॥ ५८॥ यदि यहाँपर ये कुछ त्याज्य अवगुणोंको भी कहेंगे तो मैं उन्हें त्यागूँगा।' इस प्रकार राजाने अपने चित्तमें निश्चय किया॥ ५९॥ तदनन्तर उन (सूत और मागध) दोनोंने परम बुद्धिमान् वेननन्दन महाराज पृथुका, उनके भावी कर्मोंके आश्रयसे स्वरसहित भली प्रकार स्तवन किया॥ ६०॥ [उन्होंने कहा—] 'ये महाराज सत्यवादी, दानशील, सत्य मर्यादावाले, लज्जाशील, सुहृद्, क्षमाशील, पराक्रमी और दुष्टोंका दमन करनेवाले हैं॥ ६१॥ ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान्, प्रियभाषी, माननीयोंको मान देनेवाले, यज्ञपरायण, ब्रह्मण्य, साधुसमाजमें सम्मानित और शत्रु तथा मित्रके साथ समान व्यवहार करनेवाले हैं'॥ ६२-६३॥ इस प्रकार सूत और मागधके कहे हुए गुणोंको उन्होंने अपने चित्तमें धारण किया और उसी प्रकारके कार्य किये॥ ६४॥ तब उन पृथिवीपतिने पृथिवीका पालन करते हुए बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अनेकों महान् यज्ञ किये॥ ६५॥ अराजकताके समय ओषधियोंके नष्ट हो जानेसे भूखसे व्याकुल हुई प्रजा पृथिवीनाथ पृथुके पास आयी और उनके पूछनेपर प्रणाम करके उनसे अपने आनेका कारण निवेदन किया॥ ६६॥
ततः स नृपतिस्तोषं तच्छ्रुत्वा परमं ययौ।<br>सद्गुणैः श्लाघ्यतामेति तस्माल्लभ्या गुणा मम॥ ५७
तस्माद्यदद्य स्तोत्रेण गुणनिवर्णनं त्विमौ।<br>करिष्येते करिष्यामि तदेवाहं समाहितः॥ ५८
यदिमौ वर्जनीयं च किञ्चिदत्र वदिष्यतः।<br>तदहं वर्जयिष्यामीत्येवं चक्रे मतिं नृपः॥ ५९
अथ तौ चक्रतुः स्तोत्रं पृथोर्वैन्यस्य धीमतः।<br>भविष्यैः कर्मभिः सम्यक् सुस्वरौ सूतमागधौ॥ ६०
सत्यवाग्दानशीलोऽयं सत्यसन्धो नरेश्वरः।<br>ह्रीमान्मैत्रः क्षमाशीलो विक्रान्तो दुष्टशासनः॥ ६१
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावान् प्रियभाषकः।<br>मान्यान्मानयिता यज्वा ब्रह्मण्यः साधुसम्मतः॥ ६२
समः शत्रौ च मित्रे च व्यवहारस्थितौ नृपः॥ ६३
सूतेनोक्तान् गुणानित्थं स तदा मागधेन च।<br>चकार हृदि तादृक् च कर्मणा कृतवानसौ॥ ६४
ततस्तु पृथिवीपालः पालयन्पृथिवीमिमाम्।<br>इयाज विविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः॥ ६५
तं प्रजाः पृथिवीनाथमुपतस्थुः क्षुधार्दिताः।<br>ओषधीषु प्रणष्टासु तस्मिन्काले ह्यराजके।<br>तमूचुस्ते नताः पृष्टास्तत्रागमनकारणम्॥ ६६
प्रजा ऊचुःप्रजाने कहा— हे प्रजापति नृपश्रेष्ठ! अराजकताके समय पृथिवीने समस्त ओषधियाँ अपनेमें लीन कर ली हैं, अतः आपकी सम्पूर्ण प्रजा क्षीण हो रही है॥ ६७॥ विधाताने आपको हमारा जीवनदायक प्रजापति बनाया है; अतः क्षुधारूप महारोगसे पीड़ित हम प्रजाजनोंको आप जीवनरूप ओषधि दीजिये॥ ६८॥
अराजके नृपश्रेष्ठ धरित्र्या सकलौषधीः।<br>ग्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्वाः प्रजेश्वर॥ ६७
त्वन्नो वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः।<br>देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः॥ ६८
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर महाराज पृथु अपना आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक पृथिवीके पीछे दौड़े॥ ६९॥ तब भयसे अत्यन्त व्याकुल हुई पृथिवी गौका रूप धारणकर भागी और ब्रह्मलोक आदि सभी लोकोंमें गयी॥ ७०॥ समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथिवी जहाँ-जहाँ भी गयी वहीं-वहीं उसने वेनपुत्र पृथुको शस्त्र-सन्धान किये अपने पीछे आते देखा॥ ७१॥
ततस्तु नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः।<br>शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम्॥ ६९
ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा।<br>सा लोकान्ब्रह्मलोकादीन्सन्त्रासादगमन्मही॥ ७०
यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी।<br>तत्र तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम्॥ ७१

अ० १३ ] * प्रथम अंश * ६३


ततस्तं प्राह वसुधा पृथुं पृथुपराक्रमम्।
प्रवेपमाना तद्बाणपरित्राणपरायणा ॥ ७२

पृथिव्युवाच
स्त्रीवधे त्वं महापापं किं नरेन्द्र न पश्यसि।
येन मां हन्तुमत्यर्थं प्रकरोषि नृपोद्यमम् ॥ ७३

पृथुरुवाच
एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि।
बहूनां भवति क्षेमं तस्य पुण्यप्रदो वधः ॥ ७४

पृथिव्युवाच
प्रजानामुपकाराय यदि मां त्वं हनिष्यसि।
आधारः कः प्रजानां ते नृपश्रेष्ठ भविष्यति ॥ ७५

पृथुरुवाच
त्वां हत्वा वसुधे बाणैर्मच्छासनपराङ्मुखीम्।
आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः ॥ ७६

श्रीपराशर उवाच
ततः प्रणम्य वसुधा तं भूयः प्राह पार्थिवम्।
प्रवेपिताङ्गी परमं साध्वसं समुपागता ॥ ७७

पृथिव्युवाच
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः।
तस्माद्ददाम्युपायं ते तं कुरुष्व यदीच्छसि ॥ ७८
समस्ता या मया जीर्णा नरनाथ महौषधीः।
यदीच्छसि प्रदास्यामि ताः क्षीरपरिणामिनीः ॥ ७९
तस्मात्प्रजाहितार्थाय मम धर्मभृतां वर।
तं तु वत्सं कुरुष्व त्वं क्षरेयं येन वत्सला ॥ ८०
समां च कुरु सर्वत्र येन क्षीरं समन्ततः।
वरौषधीबीजभूतं बीजं सर्वत्र भावये ॥ ८१

श्रीपराशर उवाच
तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः।
धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः ॥ ८२
न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले।
प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ ८३
न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः।
वैण्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ ८४


हिन्दी अनुवाद

तब उन प्रबल पराक्रमी महाराज पृथुसे, उनके बाणप्रहारसे बचनेकी कामनासे काँपती हुई पृथिवी इस प्रकार बोली ॥ ७२ ॥

पृथिवीने कहा— हे राजेन्द्र! क्या आपको स्त्री-वधका महापाप नहीं दीख पड़ता, जो मुझे मारनेपर आप ऐसे उतारू हो रहे हैं? ॥ ७३ ॥

पृथु बोले— जहाँ एक अनर्थकारीको मार देनेसे बहुतोंको सुख प्राप्त हो उसे मार देना ही पुण्यप्रद है ॥ ७४ ॥

पृथिवी बोली— हे नृपश्रेष्ठ! यदि आप प्रजाके हितके लिये ही मुझे मारना चाहते हैं तो [ मेरे मर जानेपर ] आपकी प्रजाका आधार क्या होगा? ॥ ७५ ॥

पृथुने कहा— अरी वसुधे! अपनी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाली तुझे मारकर मैं अपने योगबलसे ही इस प्रजाको धारण करूँगा ॥ ७६ ॥

श्रीपराशरजी बोले— तब अत्यन्त भयभीत एवं काँपती हुई पृथिवीने उन पृथिवीपतिको पुनः प्रणाम करके कहा ॥ ७७ ॥

पृथिवी बोली— हे राजन्! यत्नपूर्वक आरम्भ किये हुए सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अतः मैं भी आपको एक उपाय बताती हूँ; यदि आपकी इच्छा हो तो वैसा ही करें ॥ ७८ ॥ हे नरनाथ! मैंने जिन समस्त ओषधियोंको पचा लिया है उन्हें यदि आपकी इच्छा हो तो दुग्धरूपसे मैं दे सकती हूँ ॥ ७९ ॥ अतः हे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! आप प्रजाके हितके लिये कोई ऐसा वत्स (बछड़ा) बनाइये जिससे वात्सल्यवश मैं उन्हें दुग्धरूपसे निकाल सकूँ ॥ ८० ॥ और मुझको आप सर्वत्र समतल कर दीजिये जिससे मैं उत्तमोत्तम ओषधियोंके बीजरूप दुग्धको सर्वत्र उत्पन्न कर सकूँ ॥ ८१ ॥

श्रीपराशरजी बोले— तब महाराज पृथुने अपने धनुषकी कोटिसे सैकड़ों-हजारों पर्वतोंको उखाड़ा और उन्हें एक स्थानपर इकट्ठा कर दिया ॥ ८२ ॥ इससे पूर्व पृथिवीके समतल न होनेसे पुर और ग्राम आदिका कोई नियमित विभाग नहीं था ॥ ८३ ॥ हे मैत्रेय! उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापारका भी कोई क्रम न था। यह सब तो वैन्यपुत्र पृथुके समयसे ही आरम्भ हुआ है ॥ ८४ ॥

६४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३

यत्र यत्र समं त्वस्या भूमेरासीद्द्विजोत्तम।
तत्र तत्र प्रजाः सर्वा निवासं समरोचयन्॥ ८५
आहारः फलमूलानि प्रजानामभवत्तदा।
कृच्छ्रेण महता सोऽपि प्रणष्टास्वोषधीषु वै॥ ८६
स कल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुम्।
स्वपाणौ पृथिवीनाथो दुदोह पृथिवीं पृथुः।
सस्यजातानि सर्वाणि प्रजानां हितकाम्यया॥ ८७
तेनान्नेन प्रजास्तात वर्तन्तेद्यापि नित्यशः॥ ८८
प्राणप्रदाता स पृथुर्यस्माद्भूमेरभूत्पिता।
ततस्तु पृथिवीसंज्ञामवापाखिलधारिणी॥ ८९
ततश्च देवैर्मुनिभिर्दैत्यै रक्षोभिरद्रिभिः।
गन्धर्वैरुरगैर्यक्षैः पितृभिस्तरुभिस्तथा॥ ९०
तत्तत्पात्रमुपादाय तत्तद्दुग्धं मुने पयः।
वत्सोग्धृविशेषाश्च तेषां तद्योनयोऽभवन्॥ ९१
सैषा धात्री विधात्री च धारिणी पोषणी तथा।
सर्वस्य तु ततः पृथ्वी विष्णुपादतलोद्भवा॥ ९२
एवं प्रभावस्स पृथुः पुत्रो वेनस्य वीर्यवान्।
जज्ञे महीपतिः पूर्वो राजाभूज्जनरञ्जनात्॥ ९३
य इदं जन्म वैन्यस्य पृथोः संकीर्त्तयेन्नरः।
न तस्य दुष्कृतं किञ्चित्फलदायि प्रजायते॥ ९४
दुस्स्वप्नोपशमं नृणां शृण्वतामेतदुत्तमम्।
पृथोर्जन्म प्रभावश्च करोति सततं नृणाम्॥ ९५

हे द्विजोत्तम! जहाँ-जहाँ भूमि समतल थी वहीं-वहींपर प्रजाने निवास करना पसन्द किया॥ ८५॥ उस समयतक प्रजाका आहार केवल फल मूलादि ही था; वह भी ओषधियोंके नष्ट हो जानेसे बड़ा दुर्लभ हो गया था॥ ८६॥
तब पृथिवीपति पृथुने स्वायम्भुवमनुको बछड़ा बनाकर अपने हाथमें ही पृथिवीसे प्रजाके हितके लिये समस्त धान्योंको दुहा। हे तात! उसी अन्नके आधारसे अब भी सदा प्रजा जीवित रहती है॥ ८७-८८॥ महाराज पृथु प्राणदान करनेके कारण भूमिके पिता हुए,* इसलिये उस सर्वभूतधारिणीको ‘पृथिवी’ नाम मिला॥ ८९॥
हे मुने! फिर देवता, मुनि, दैत्य, राक्षस, पर्वत, गन्धर्व, सर्प, यक्ष और पितृगण आदिने अपने-अपने पात्रोंमें अपना अभिमत दूध दुहा तथा दुहनेवालोंके अनुसार उनके सजातीय ही दोग्धा और वत्स आदि हुए॥ ९०-९१॥ इसीलिये विष्णुभगवान्‌के चरणोंसे प्रकट हुई यह पृथिवी ही सबको जन्म देनेवाली, बनानेवाली तथा धारण और पोषण करनेवाली है॥ ९२॥ इस प्रकार पूर्वकालमें वेनके पुत्र महाराज पृथु ऐसे प्रभावशाली और वीर्यवान् हुए। प्रजाका रंजन करनेके कारण वे ‘राजा’ कहलाये॥ ९३॥
जो मनुष्य महाराज पृथुके इस चरित्रका कीर्तन करता है उसका कोई भी दुष्कर्म फलदायी नहीं होता॥ ९४॥ पृथुका यह अत्युत्तम जन्म-वृत्तान्त और उनका प्रभाव अपने सुननेवाले पुरुषोंके दुःस्वप्नोंको सर्वदा शान्त कर देता है॥ ९५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥


* जन्म देनेवाला, यज्ञोपवीत करानेवाला, अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला तथा जो विद्यादान करे—ये पाँचों पिता माने गये हैं; जैसे कहा है—
जनकश्चोपनेता च यश्च विद्याः प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥


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अ० १४ ] * प्रथम अंश * ६५


चौदहवाँ अध्याय

प्राचीनबर्हिका जन्म और प्रचेताओँका भगवदाराधन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
पृथॊः पुत्रौ तु धर्मज्ञौ जज्ञातेऽन्तर्द्धिवादिनौ ।<br>शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्द्धानाद्व्यजायत ॥ १हे मैत्रेय ! पृथुका अन्तर्द्धान और वादी नामक दो धर्मज्ञ पुत्र हुए; उनमेंसे अन्तर्द्धानसे उसकी पत्नी शिखण्डिनीने हविर्धानको उत्पन्न किया॥ १॥
हविर्द्धानात् षडाग्नेयी धिषणाऽजनयत्सुतान् ।<br>प्राचीनबर्हिषं शुक्लं गयं कृष्णं वृजाजिनौ ॥ २हविर्धानसे अग्निकुलीना धिषणाने प्राचीनबर्हि, शुक्र, गय, कृष्ण, वृज और अजिन—ये छः पुत्र उत्पन्न किये॥ २॥
प्राचीनबर्हिर्भगवान्महानासीत्प्रजापतिः ।<br>हविर्द्धानान्महाभाग येन संवर्द्धिताः प्रजाः ॥ ३हे महाभाग! हविर्धानसे उत्पन्न हुए भगवान् प्राचीनबर्हि एक महान् प्रजापति थे, जिन्होंने यज्ञके द्वारा अपनी प्रजाकी बहुत वृद्धि की॥ ३॥
प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य पृथिव्यां विश्रुता मुने ।<br>प्राचीनबर्हिर्भवत्ख्यातो भुवि महाबलः ॥ ४हे मुने! उनके समयमें [यज्ञानुष्ठानकी अधिकताके कारण] प्राचीनाग्र कुश समस्त पृथिवीमें फैले हुए थे, इसलिये वे महाबली 'प्राचीनबर्हि' नामसे विख्यात हुए॥ ४॥
समुद्रतनयायां तु कृतदारो महीपतिः ।<br>महत्तस्तपसः पारे सवर्णायां महामते ॥ ५हे महामते! उन महीपतिने महान् तपस्याके अनन्तर समुद्रकी पुत्री सवर्णासे विवाह किया॥ ५॥
सवर्णार्धत्त सामुद्री दश प्राचीनबर्हिषः ।<br>सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः ॥ ६उस समुद्र-कन्या सवर्णाके प्राचीनबर्हिसे दस पुत्र हुए। वे प्रचेता-नामक सभी पुत्र धनुर्विद्याके पारगामी थे॥ ६॥
अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः ।<br>दशवर्षसहस्राणि समुद्रसलिलेशयाः ॥ ७उन्होंने समुद्रके जलमें रहकर दस हजार वर्षतक समान धर्मका आचरण करते हुए घोर तपस्या की॥ ७॥
श्रीमैत्रेय उवाचश्रीमैत्रेयजी बोले—
यदर्थं ते महात्मानस्तपस्तेपुर्महामुने ।<br>प्रचेतसः समुद्राम्भस्येतदाख्यातुमर्हसि ॥ ८हे महामुने! उन महात्मा प्रचेताओँने जिस लिये समुद्रके जलमें तपस्या की थी सो आप कहिये॥ ८॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी कहने लगे—
पित्रा प्रचेतसः प्रोक्ताः प्रजार्थममितात्मना ।<br>प्रजापतिनियुक्तेन बहुमानपुरस्सरम् ॥ ९हे मैत्रेय! एक बार प्रजापतिकी प्रेरणासे प्रचेताओँके महात्मा पिता प्राचीनबर्हिने उनसे अति सम्मानपूर्वक सन्तानोत्पत्तिके लिये इस प्रकार कहा॥ ९॥
प्राचीनबर्हिरुवाचप्राचीनबर्हि बोले—
ब्रह्मणा देवदेवेन समादिष्टोऽस्म्यहं सुताः ।<br>प्रजाः संवर्द्धनीयास्ते मया चोक्तं तथेति तत् ॥ १०हे पुत्रो! देवाधिदेव ब्रह्माजीने मुझे आज्ञा दी है कि 'तुम प्रजाकी वृद्धि करो' और मैंने भी उनसे 'बहुत अच्छा' कह दिया है॥ १०॥
तन्मम प्रीतये पुत्राः प्रजावृद्धिमत्तन्द्रिताः ।<br>कुरुध्वं माननीया वः सम्यगाज्ञा प्रजापतेः ॥ ११अतः हे पुत्रगण! तुम भी मेरी प्रसन्नताके लिये सावधानतापूर्वक प्रजाकी वृद्धि करो, क्योंकि प्रजापतिकी आज्ञा तुमको भी सर्वथा माननीय है॥ ११॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
ततस्ते तत्पितुः श्रुत्वा वचनं नृपनन्दनाः ।<br>तथेत्युक्त्वा च तं भूयः पप्रच्छुः पितरं मुने ॥ १२हे मुने! उन राजकुमारों ने पिताके ये वचन सुनकर उनसे 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर फिर पूछा॥ १२॥
प्रचेतस ऊचुःप्रचेता बोले—
येन तात प्रजावृद्धौ समर्थाः कर्मणा वयम् ।<br>भवेम तत् समस्तं नः कर्म व्याख्यातुमर्हसि ॥ १३हे तात! जिस कर्मसे हम प्रजा-वृद्धिमें समर्थ हो सकें उसकी आप हमसे भली प्रकार व्याख्या कीजिये॥ १३॥

६६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४


पितोवाच**पिताने कहा—**वरदायक भगवान् विष्णुकी आराधना
आराध्य वरदं विष्णुमिष्टप्राप्तिमसंशयम्।करनेसे ही मनुष्यको निःसन्देह इष्ट वस्तुकी प्राप्ति
समेति नान्यथा मर्त्यः किमन्यत्कथयामि वः॥ १४होती है और किसी उपायसे नहीं। इसके सिवा और मैं
तस्मात्प्रजाविवृद्ध्यर्थं सर्वभूतप्रभुं हरिम्।तुमसे क्या कहूँ॥ १४॥ इसलिये यदि तुम सफलता
आराधयत गोविन्दं यदि सिद्धिमभीप्सथ॥ १५चाहते हो तो प्रजा-वृद्धिके लिये सर्वभूतोंके स्वामी श्रीहरि
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चान्विच्छतां सदा।गोविन्दकी उपासना करो॥ १५॥ धर्म, अर्थ, काम या
आराधनीयो भगवाननादिपुरुषोत्तम ॥ १६मोक्षकी इच्छावालोंको सदा अनादि पुरुषोत्तम भगवान्
यस्मिन्नाराधिते सर्गं चकारादौ प्रजापतिः।विष्णुकी ही आराधना करनी चाहिये॥ १६॥ कल्पके
तमाराध्याच्युतं वृद्धिः प्रजानां वो भविष्यति॥ १७आरम्भमें जिनकी उपासना करके प्रजापतिने संसारकी
रचना की है, तुम उन अच्युतकी ही आराधना करो।
इससे तुम्हारी सन्तानकी वृद्धि होगी॥ १७॥
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**पिताकी ऐसी आज्ञा होनेपर
इत्येवमुक्तास्ते पित्रा पुत्राः प्रचेतसो दश।प्रचेता नामक दसों पुत्रोंने समुद्रके जलमें डूबे रहकर
मग्नाः पयोधिसलिले तपस्तेपुः समाहिताः॥ १८सावधानतापूर्वक तप करना आरम्भ कर दिया॥ १८॥
दशवर्षसहस्त्राणि न्यस्तचित्ता जगत्पतौ।हे मुनिश्रेष्ठ! सर्वलोकाश्रय जगत्पति श्रीनारायणमें चित्त
नारायणे मुनिश्रेष्ठ सर्वलोकपरायणे॥ १९लगाये हुए उन्होंने दस हजार वर्षतक वहीं (जलमें
तत्रैवावस्थिता देवमेकाग्रमनसो हरिम्।ही) स्थित रहकर देवाधिदेव श्रीहरिकी एकाग्र-चित्तसे स्तुति
तुष्टुवुर्यस्स्तुतः कामान् स्तोतुरिष्टान्प्रयच्छति॥ २०की, जो अपनी स्तुति की जानेपर स्तुति करनेवालोंकी
सभी कामनाएँ सफल कर देते हैं॥ १९-२०॥
श्रीमैत्रेय उवाच**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! समुद्रके जलमें
स्तवं प्रचेतसो विष्णोः समुद्राम्भसि संस्थिताः।स्थित रहकर प्रचेताओंने भगवान् विष्णुकी जो अति
चक्रुस्तन्मे मुनिश्रेष्ठ सुपुण्यं वक्तुमर्हसि॥ २१पवित्र स्तुति की थी वह कृपया मुझसे कहिये॥ २१॥
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! पूर्वकालमें समुद्रमें
शृणु मैत्रेय गोविन्दं यथापूर्वं प्रचेतसः।स्थित रहकर प्रचेताओंने तन्मयभावसे श्रीगोविन्दकी
तुष्टुवुस्तन्मयीभूताः समुद्रसलिलेशयाः॥ २२जो स्तुति की, वह सुनो॥ २२॥
प्रचेतस ऊचुः**प्रचेताओंने कहा—**जिनमें सम्पूर्ण वाक्योंकी नित्य-
नताः स्म सर्ववचसां प्रतिष्ठा यत्र शाश्वती।प्रतिष्ठा है [अर्थात् जो सम्पूर्ण वाक्योंके एकमात्र प्रतिपाद्य
तमाद्यन्तमशेषस्य जगतः परमं प्रभुम्॥ २३हैं] तथा जो जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके कारण हैं उन
ज्योतिराद्यमनौपम्यमण्वनन्तमपारवत्।निखिल-जगन्नायक परमप्रभुको हम नमस्कार करते
योनिभूतमशेषस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ २४हैं॥ २३॥ जो आद्य ज्योतिःस्वरूप, अनुपम, अणु, अनन्त,
यस्याहः प्रथमं रूपमरूपस्य तथा निशा।अपार और समस्त चराचरके कारण हैं, तथा जिन रूपहीन
सन्ध्या च परमेशस्य तस्मै कालात्मने नमः॥ २५परमेश्वरके दिन, रात्रि और सन्ध्या ही प्रथम रूप हैं, उन
भुज्यतेऽनुदिनं देवैः पितृभिश्च सुधात्मकः।कालस्वरूप भगवान्को नमस्कार है॥ २४-२५॥ समस्त
जीवभूतः समस्तस्य तस्मै सोमात्मने नमः॥ २६प्राणियोंके जीवनरूप जिनके अमृतमय स्वरूपको देव
यस्तमांस्यत्ति तीव्रात्मा प्रभाभिर्भासयन्नभः।और पितृगण नित्यप्रति भोगते हैं—उन सोमस्वरूप प्रभुको
धर्मशीताम्भसां योनिस्तस्मै सूर्यात्मने नमः॥ २७नमस्कार है॥ २६॥ जो तीक्ष्णस्वरूप अपने तेजसे
आकाशमण्डलको प्रकाशित करते हुए अन्धकारको भक्षण
कर जाते हैं तथा जो घाम, शीत और जलके उद्गमस्थान
हैं उन सूर्यस्वरूप [नारायण]-को नमस्कार है॥ २७॥

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अ० १४ ] * प्रथम अंश * ६७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
काठिन्यवान् यो बिभर्त्ति जगदेतदशेषतः।<br>शब्दादिसंश्रयो व्यापी तस्मै भूम्यात्मने नमः ॥ २८जो कठिनतायुक्त होकर इस सम्पूर्ण संसारको धारण करते हैं और शब्द आदि पाँचों विषयोंके आधार तथा व्यापक हैं, उन भूमिरूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ २८ ॥
यद्योनिभूतं जगतो बीजं यत्सर्वदेहिनाम्।<br>तत्तोयरूपमीशस्य नमामो हरिमेधसः ॥ २९जो संसारका योनिरूप है और समस्त देहधारियोंका बीज है, भगवान् हरिके उस जलस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं ॥ २९ ॥
यो मुखं सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा।<br>पितॄणां च नमस्तस्मै विष्णवे पावकात्मने ॥ ३०जो समस्त देवताओंका हव्यभुक् और पितृगणका कव्यभुक् मुख है, उस अग्निस্বরূপ विष्णुभगवान्‌को नमस्कार है ॥ ३० ॥
पञ्चधावस्थितो देहे यश्चेष्टां कुरुतेऽनिशम्।<br>आकाशयोनिर्भगवान्स्तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ३१जो प्राण, अपान आदि पाँच प्रकारसे देहमें स्थित होकर दिन-रात चेष्टा करता रहता है तथा जिसकी योनि आकाश है, उस वायुरूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ ३१ ॥
अवकाशमशेषाणां भूतानां यः प्रयच्छति।<br>अनन्तमूर्तिमाञ्छुद्धस्तस्मै व्योमात्मने नमः ॥ ३२जो समस्त भूतोंको अवकाश देता है उस अनन्तमूर्ति और परम शुद्ध आकाशस्वरूप प्रभुको नमस्कार है ॥ ३२ ॥
समस्तेन्द्रियसर्गस्य यः सदा स्थानमुत्तमम्।<br>तस्मै शब्दादिरूपाय नमः कृष्णाय वेधसे ॥ ३३समस्त इन्द्रिय-सृष्टिके जो उत्तम स्थान हैं उन शब्द-स्पर्शादिरूप विधाता श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार है ॥ ३३ ॥
गृह्णाति विषयान्नित्यमिन्द्रियात्मा क्षराक्षरः।<br>यस्तस्मै ज्ञानमूलाय नताः स्म हरिमेधसे ॥ ३४जो क्षर और अक्षर इन्द्रियरूपसे नित्य विषयोंको ग्रहण करते हैं उन ज्ञानमूल हरिको नमस्कार है ॥ ३४ ॥
गृहीतानिनिन्द्रियैरर्थानात्मने यः प्रयच्छति।<br>अन्तःकरणरूपाय तस्मै विश्वात्मने नमः ॥ ३५इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किये विषयोंको जो आत्माके सम्मुख उपस्थित करता है उस अन्तःकरणरूप विश्वात्माको नमस्कार है ॥ ३५ ॥
यस्मिन्ननन्ते सकलं विश्वं यस्मात्तथोद्गतम्।<br>लयस्थानं च यस्तस्मै नमः प्रकृतिधर्मिणे ॥ ३६जिस अनन्तमें सकल विश्व स्थित है, जिससे वह उत्पन्न हुआ है और जो उसके लयका भी स्थान है उस प्रकृतिस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ३६ ॥
शुद्धः सँल्लक्ष्यते भ्रान्त्या गुणवानिव योऽगुणः।<br>तमात्मरूपिणं देवं नताः स्म पुरुषोत्तमम् ॥ ३७जो शुद्ध और निर्गुण होकर भी भ्रमवश गुणयुक्त-से दिखायी देते हैं उन आत्मस्वरूप पुरुषोत्तमदेवको हम नमस्कार करते हैं ॥ ३७ ॥
अविकारमजं शुद्धं निर्गुणं यन्निरञ्जनम्।<br>नताः स्म तत्परं ब्रह्म विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥ ३८जो अविकारी, अजन्मा, शुद्ध, निर्गुण, निर्मल और श्रीविष्णुका परमपद है उस ब्रह्मस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं ॥ ३८ ॥
अदीर्घह्रस्वमस्थूलमनण्वश्यामलोहितम्।<br>अस्नेहच्छायमतनुमसक्तमशरीरिणम् ॥ ३९जो न लम्बा है, न पतला है, न मोटा है, न छोटा है और न काला है, न लाल है; जो स्नेह (द्रव), कान्ति तथा शरीरसे रहित एवं अनासक्त और अशरीरी (जीवसे भिन्न) है ॥ ३९ ॥
अनाकाशमसंस्पर्शमगन्धमरसं च यत्।<br>अचक्षुश्रोत्रमचलमवाक्पाणिममानसम् ॥ ४०जो अवकाश स्पर्श, गन्ध और रससे रहित तथा आँख-कान-विहीन, अचल एवं जिह्वा, हाथ और मनसे रहित है ॥ ४० ॥
अनामगोत्रमसुखमतेजस्कमहेतुकम् ।<br>अभयं भ्रान्तिरहितमनिद्रमजरामरम् ॥ ४१जो नाम, गोत्र, सुख और तेजसे शून्य तथा कारणहीन है; जिसमें भय, भ्रान्ति, निद्रा, जरा और मरण-इन (अवस्थाओं)-का अभाव है ॥ ४१ ॥
अरजोऽशब्दममृतमप्लुतं यदसंवृतम्।<br>पूर्वापरे न वै यस्मिंस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ४२जो अरज (रजोगुणरहित), अशब्द, अमृत, अप्लुत (गतिशून्य) और असंवृत (अनाच्छादित) है एवं जिसमें पूर्वापर व्यवहारकी गति नहीं है वही भगवान् विष्णुका परमपद है ॥ ४२ ॥
परमेशत्वगुणवत्सर्वभूतमसंश्रयम् ।<br>नताः स्म तत्पदं विष्णोर्जिह्वादृग्गोचरं न यत् ॥ ४३जिसका ईशन (शासन) ही परमगुण है, जो सर्वरूप और अनाधार है तथा जिह्वा और दृष्टिका अविषय है, भगवान् विष्णुके उस परमपदको हम नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥
६८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १५
श्रीपराशर उवाच
एवं प्रचेतसो विष्णुं स्तुवन्तस्तत्समाधयः।<br>दशवर्षसहस्राणि तपश्चेरुर्महार्णवे ॥ ४४**श्रीपराशरजी बोले—**इस प्रकार श्रीविष्णुभगवान्‌में समाधिस्थ होकर प्रचेताओेंने महासागरमें रहकर उनकी स्तुति करते हुए दस हजार वर्षतक तपस्या की ॥ ४४ ॥
ततः प्रसन्नो भगवांस्तेषामन्तर्जले हरिः।<br>ददौ दर्शनमुन्निद्रनीलोत्पलदलच्छविः ॥ ४५तब भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें खिले हुए नील कमलकी-सी आभायुक्त दिव्य छविसे जलके भीतर ही दर्शन दिया ॥ ४५ ॥
पतत्त्रिराजमारूढमवलोक्य प्रचेतसः।<br>प्रणिपेतुः शिरोभिस्तं भक्तिभारावनामितैः ॥ ४६प्रचेताओेंने पक्षिराज गरुड़पर चढ़े हुए श्रीहरिको देखकर उन्हें भक्तिभावके भारसे झुके हुए मस्तकोंद्वारा प्रणाम किया ॥ ४६ ॥
ततस्तानाह भगवान्व्रियतामीप्सितो वरः।<br>प्रसादसुमुखोऽहं वो वरदः समुपस्थितः ॥ ४७तब भगवान्‌ने उनसे कहा—"मैं तुमसे प्रसन्न होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ, तुम अपना अभीष्ट वर माँगो" ॥ ४७ ॥
ततस्तमूचुर्वरदं प्रणिपत्य प्रचेतसः।<br>यथा पित्रा समादिष्टं प्रजानां वृद्धिकारणम् ॥ ४८तब प्रचेताओेंने वरदायक श्रीहरिको प्रणाम कर, जिस प्रकार उनके पिताने उन्हें प्रजा-वृद्धिके लिये आज्ञा दी थी वह सब उनसे निवेदन की ॥ ४८ ॥
स चापि देवस्तं दत्त्वा यथाभिलषितं वरम्।<br>अन्तर्धानं जगामाशु ते च निश्चक्रमुर्जलात् ॥ ४९तदनन्तर, भगवान् उन्हें अभीष्ट वर देकर अन्तर्धान हो गये और वे जलसे बाहर निकल आये ॥ ४९ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

प्रचेताओेंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी साठ कन्याओंके वंशका वर्णन

श्रीपराशर उवाच
तपश्चरत्सु पृथिवीं प्रचेतःसु महीरुहाः।<br>अरक्ष्यमाणामावव्रुर्वभूवाथ प्रजाक्षयः ॥ १**श्रीपराशरजी बोले—**प्रचेताओेंके तपस्यामें लगे रहनेसे [कृषि आदिद्वारा] किसी प्रकारकी रक्षा न होनेके कारण पृथिवीको वृक्षोंने ढँक लिया और प्रजा बहुत कुछ नष्ट हो गयी ॥ १ ॥
नाशकन्मरुतो वातुं वृतं खमभवद्द्रुमैः।<br>दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितुं प्रजाः ॥ २आकाश वृक्षोंसे भर गया था। इसलिये दस हजार वर्षतक न तो वायु ही चला और न प्रजा ही किसी प्रकारकी चेष्टा कर सकी ॥ २ ॥
तान्दृष्ट्वा जलनिष्क्रान्ताः सर्वे क्रुद्धाः प्रचेतसः।<br>मुखेभ्यो वायुमग्निं च तेऽसृजन् जातमन्यवः ॥ ३जलसे निकलनेपर उन वृक्षोंको देखकर प्रचेतागण अति क्रोधित हुए और उन्होंने रोषपूर्वक अपने मुखसे वायु और अग्निको छोड़ा ॥ ३ ॥
उन्मूलानथ तान्वृक्षान्कृत्वा वायुरशोषयत्।<br>तानग्निरदहद्धोरस्तत्राभूद्द्रुमसंक्षयः ॥ ४वायुने वृक्षोंको उखाड़-उखाड़कर सुखा दिया और प्रचण्ड अग्निने उन्हें जला डाला। इस प्रकार उस समय वहाँ वृक्षोंका नाश होने लगा ॥ ४ ॥
द्रुमक्षयमथो दृष्ट्वा किञ्चिच्छिष्टेषु शाखिषु।<br>उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन् ॥ ५तब वह भयंकर वृक्ष-प्रलय देखकर थोड़े-से वृक्षोंके रह जानेपर उनके राजा सोमने प्रजापति प्रचेताओेंके पास जाकर कहा— ॥ ५ ॥

अ० १५ ] * प्रथम अंश * ६९

| कोपं यच्छत राजानः शृणुध्वं च वचो मम।<br>सन्धानं वः करिष्यामि सह क्षितिरुहैरहम्॥ ६<br>रत्नभूता च कन्येयं वार्क्षेयी वरवर्णिनी।<br>भविष्यज्जानता पूर्वं मया गोभिर्विवर्द्धिता॥ ७<br>मारिषा नाम नाम्नैषा वृक्षाणामिति निर्मिता।<br>भार्या वोऽस्तु महाभागा ध्रुवं वंशविवर्द्धिनी॥ ८<br>युष्माकं तेजसोऽर्द्धेन मम चार्द्धेन तेजसः।<br>अस्यामुत्पत्स्यते विद्वान्दक्षो नाम प्रजापतिः॥ ९<br>मम चांशेन संयुक्तो युष्मत्तेजोमयेन वै।<br>तेजसाग्निसमो भूयः प्रजाः संवर्द्धयिष्यति॥ १०<br>कण्डुर्नाम मुनिः पूर्वमासीद्वेदविदां वरः।<br>सुरम्ये गोमतीतीरे स तेपे परमं तपः॥ ११<br>तत्क्षोभाय सुरेन्द्रेण प्रम्लोचाख्या वराप्सराः।<br>प्रयुक्ता क्षोभयामास तमृषिं सा शुचिस्मिता॥ १२<br>क्षोभितः स तया सार्द्धं वर्षाणामधिकं शतम्।<br>अतिष्ठन्मन्दरद्रोण्यां विषयासक्तमानसः॥ १३<br>तं सा प्राह महाभाग गन्तुमिच्छाम्यहं दिवम्।<br>प्रसादसुमुखो ब्रह्मन्ननुज्ञां दातुमर्हसि॥ १४<br>तथैवमुक्तः स मुनिस्तस्यामासक्तमानसः।<br>दिनानि कतिचिद्भद्रे स्थीयतामित्यभाषत॥ १५<br>एवमुक्ता ततस्तेन साग्रं वर्षशतं पुनः।<br>बुभुजे विषयांस्तन्वी तेन साकं महात्मना॥ १६<br>अनुज्ञां देहि भगवन् व्रजामि त्रिदशालयम्।<br>उक्तस्तथेति स पुनः स्थीयतामित्यभाषत॥ १७<br>पुनर्गते वर्षशते साधिके सा शुभानना।<br>यामीत्याह दिवं ब्रह्मन्प्रणयस्मितशोभनम्॥ १८<br>उक्तस्तथैवं स मुनिरुपगुह्यायतेक्षणाम्।<br>इहास्यतां क्षणं सुभ्रु चिरकालं गमिष्यसि॥ १९<br>सा क्रीडमाना सुश्रोणी सह तेनर्षिणा पुनः।<br>शतद्वयं किञ्चिदूनं वर्षाणामन्वतिष्ठत॥ २०<br>गमनाय महाभाग देवराजनिवेशनम्।<br>प्रोक्तः प्रोक्तस्तया तन्व्या स्थीयतामित्यभाषत॥ २१ | "हे नृपतिगण! आप क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो कुछ कहता हूँ, सुनिये। मैं वृक्षोंके साथ आपलोगोंकी सन्धि करा दूँगा॥ ६॥ वृक्षोंसे उत्पन्न हुई इस सुन्दर वर्णवाली रत्नस्वरूपा कन्याको मैंने पहलेसे ही भविष्यको जानकर अपनी [अमृतमयी] किरणोंसे पालन-पोषण किया है॥ ७॥ वृक्षोंकी यह कन्या मारिषा नामसे प्रसिद्ध है, यह महाभागा इसलिये ही उत्पन्न की गयी है कि निश्चय ही तुम्हारे वंशको बढ़ानेवाली तुम्हारी भार्या हो॥ ८॥ मेरे और तुम लोगोंके आधे-आधे तेजसे इसके परम विद्वान् दक्ष नामक प्रजापति उत्पन्न होगा॥ ९॥ वह तुम लोगोंके तेजके सहित मेरे अंशसे युक्त होकर अपने तेजके कारण अग्निके समान होगा और प्रजाकी खूब वृद्धि करेगा॥ १०॥<br>पूर्वकालमें वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ एक कण्डु नामक मुनीश्वर थे। उन्होंने गोमती नदीके परम रमणीक तटपर घोर तप किया॥ ११॥ तब इन्द्रने उन्हें तपोभ्रष्ट करनेके लिये प्रम्लोचा नामकी उत्तम अप्सराको नियुक्त किया। उस मंजुहासिनीने उन ऋषिश्रेष्ठको विचलित कर दिया॥ १२॥ उसके द्वारा क्षुब्ध होकर वे सौसे भी अधिक वर्षतक विषयासक्त-चित्तसे मन्दराचलकी कन्दरामें रहे॥ १३॥<br>तब, हे महाभाग! एक दिन उस अप्सराने कण्डु ऋषिसे कहा—'हे ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्गलोकको जाना चाहती हूँ, आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे आज्ञा दीजिये'॥ १४॥ उसके ऐसा कहनेपर उसमें आसक्तचित्त हुए मुनिने कहा—'भद्रे! अभी कुछ दिन और रहो'॥ १५॥ उनके ऐसा कहनेपर उस सुन्दरीने महात्मा कण्डुके साथ अगले सौ वर्षतक और रहकर नाना प्रकारके भोग भोगे॥ १६॥ तब भी, उसके यह पूछनेपर कि 'भगवन्! मुझे स्वर्गलोकको जानेकी आज्ञा दीजिये' ऋषिने यही कहा कि 'अभी और ठहरो'॥ १७॥ तदनन्तर सौ वर्षसे कुछ अधिक बीत जानेपर उस सुमुखने प्रणययुक्त मुसकानसे सुशोभित वचनोंमें फिर कहा—'ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्गको जाती हूँ'॥ १८॥ यह सुनकर मुनिने उस विशालाक्षीको आलिंगनकर कहा—'अयि सुभ्रु! अब तो तू बहुत दिनोंके लिये चली जायगी इसलिये क्षणभर तो और ठहर'॥ १९॥ तब वह सुश्रोणी (सुन्दर कमरवाली) उस ऋषिके साथ क्रीड़ा करती हुई दो सौ वर्षसे कुछ कम और रही॥ २०॥<br>हे महाभाग! इस प्रकार जब-जब वह सुन्दरी देवलोकको जानेके लिये कहती तभी-तभी कण्डु ऋषि उससे यही कहते कि 'अभी ठहर जा'॥ २१॥ |

७० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


तस्य शापभयाद्भीता दाक्षिण्येन च दक्षिणा।<br>प्रोक्ता प्रणयभङ्गार्त्तिवेदिनी न जहौ मुनिम्॥ २२मुनिके इस प्रकार कहनेपर, प्रणयभंगकी पीड़ाको जाननेवाली उस दक्षिणाने* अपने दाक्षिण्यवश तथा मुनिके शापसे भयभीत होकर उन्हें न छोड़ा॥ २२॥ तथा उन महर्षि महोदयका भी कामासक्तचित्तसे उसके साथ अहर्निश रमण करते-करते, उसमें नित्य नूतन प्रेम बढ़ता गया॥ २३॥
तया च रमतस्तस्य परमर्षेरहर्निशम्।<br>नवं नवमभूत्प्रेम मन्मथाविष्टचेतसः॥ २३
एकदा तु त्वरायुक्तो निश्चक्रामोटजान्मुनिः।<br>निष्क्रामन्तं च कुत्रेति गम्यते प्राह सा शुभा॥ २४एक दिन वे मुनिवर बड़ी शीघ्रतासे अपनी कुटीसे निकले। उनके निकलते समय वह सुन्दरी बोली—"आप कहाँ जाते हैं"॥ २४॥ उसके इस प्रकार पूछनेपर मुनिने कहा—"हे शुभे! दिन अस्त हो चुका है, इसलिये मैं सन्ध्योपासना करूँगा; नहीं तो नित्य-क्रिया नष्ट हो जायगी"॥ २५॥ तब उस सुन्दर दाँतोंवालीने उन मुनीश्वरसे हँसकर कहा—"हे सर्वधर्मज्ञ! क्या आज ही आपका दिन अस्त हुआ है?॥ २६॥ हे विप्र! अनेकों वर्षोंके पश्चात् आज आपका दिन अस्त हुआ है; इससे कहिये, किसको आश्चर्य न होगा?"॥ २७॥
इत्युक्तः स तया प्राह परिवृत्तमहः शुभे।<br>सन्ध्योपास्तिं करिष्यामि क्रियालोपोऽन्यथा भवेत्॥ २५
ततः प्रहस्य सुदती तं सा प्राह महामुनिम्।<br>किमद्य सर्वधर्मज्ञ परिवृत्तमहस्तव॥ २६
बहूनां विप्र वर्षाणां परिवृत्तमहस्तव।<br>गतमेतन्न कुरुते विस्मयं कस्य कथ्यताम्॥ २७
मुनिरुवाच**मुनि बोले—**भद्रे! नदीके इस सुन्दर तटपर तुम आज सबेरे ही तो आयी हो। [ मुझे भली प्रकार स्मरण है ] मैंने आज ही तुमको अपने आश्रममें प्रवेश करते देखा था॥ २८॥ अब दिनके समाप्त होनेपर यह सन्ध्याकाल हुआ है। फिर, सच तो कहो, ऐसा उपहास क्यों करती हो?॥ २९॥
प्रातस्त्वमागता भद्रे नदीतीरमिदं शुभम्।<br>मया दृष्टासि तन्वङ्गि प्रविष्टासि ममाश्रमम्॥ २८
इयं च वर्तते सन्ध्या परिणाममहर्गतम्।<br>उपहासः किमर्थोऽयं सद्भावः कथ्यतां मम॥ २९
प्रम्लोचोवाच**प्रम्लोचा बोली—**ब्रह्मन्! आपका यह कथन कि 'तुम सबेरे ही आयी हो' ठीक ही है, इसमें झूठ नहीं; परन्तु उस समयको तो आज सैकड़ों वर्ष बीत चुके॥ ३०॥
प्रत्यूषस्यागता ब्रह्मन् सत्यमेतन्न तन्मृषा।<br>नन्वस्य तस्य कालस्य गतान्यब्दशतानि ते॥ ३०
सोम उवाच**सोमने कहा—**तब उन विप्रवरने उस विशालाक्षीसे कुछ घबड़ाकर पूछा—"अरी भीरु! ठीक-ठीक बता, तेरे साथ रमण करते मुझे कितना समय बीत गया?"॥ ३१॥
ततस्ससाध्वसो विप्रस्तां पप्रच्छायतेक्षणाम्।<br>कथ्यतां भीरु कः कालस्त्वया मे रमतः सह॥ ३१
प्रम्लोचोवाच**प्रम्लोचाने कहा—**अबतक नौ सौ सात वर्ष, छः महीने तथा तीन दिन और भी बीत चुके हैं॥ ३२॥
सप्तोत्तराण्यतीतानि नववर्षशतानि ते।<br>मासाश्च षट् तथैवान्यत्समतीतं दिनत्रयम्॥ ३२
ऋषिरुवाच**ऋषि बोले—**अयि भीरु! यह तू ठीक कहती है, या हे शुभे! मेरी हँसी करती है? मुझे तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि मैं इस स्थानपर तेरे साथ केवल एक ही दिन रहा हूँ॥ ३३॥
सत्यं भीरु वदस्येतत्परिहासोऽथ वा शुभे।<br>दिनमेकमहं मन्ये त्वया सार्द्धमिहासितम्॥ ३३

* दक्षिणा नायिकाका लक्षण इस प्रकार कहा है—

या गौरवं भयं प्रेम सद्भावं पूर्वनायके।
न मुञ्चत्यन्यसक्तापि सा ज्ञेया दक्षिणा बुधैः॥

अन्य नायकमें आसक्त रहते हुए भी जो अपने पूर्व-नायकको गौरव, भय, प्रेम और सद्भावके कारण न छोड़ती हो उसे 'दक्षिणा' जानना चाहिये। दक्षिणाके गुणको 'दाक्षिण्य' कहते हैं।