योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । २६५
जैसा फुरना दृढ़ हुआ है तैसा ही रूप होकर स्थित है। यह स्थावररूप है, यह जङ्गम है, यह दैत्य है, यह देवता है, यह नाग है, यह नागिनी है, ब्रह्मा से तृणपर्यन्त जैसा उसमें अभ्यास है उसी प्रकार स्थित है। स्वरूप से ब्रह्मसत्ता का व्यभिचार कदाचित् नहीं हुआ वह तो सदा अपने आपमें स्थित है। जो ज्ञानवान् पुरुष है उसको सब ब्रह्मस्वरूप भासता है और जो अज्ञानी है उसको जगत् और नीति भी भिन्न भासती है। ज्ञानवान् को सब अचल ब्रह्मसत्ता ही भासता है और अज्ञानियों को चलनरूप जगत् भासता है। वह जगत् ऐसा है जैसे कि आकाश में वृक्ष भासते हैं और शिला के उदर में मूर्ति होती है। जो ज्ञानवान् हैं उनको सर्ग और निमित्त सब ज्ञानरूप ही भासते हैं। जैसे अवयवी के अवयव अपना ही रूप होते हैं तैसे ही ब्रह्मसत्ता के अवयव ब्रह्म नित्य सर्गादिक अपना ही रूप हैं। हे रामजी ! उसी नीति को दैव भी कहते हैं। जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह उसी दैव की आज्ञा से प्राप्त होता है, क्योंकि आदि से यही निश्चय धरा है कि इस साधन से यह फल प्राप्त होगा। जैसा साधन होता है तैसा ही फल अवश्य सबको उस दैव से प्राप्त होता है। इस कारण नीति को दैव कहते हैं और दैव को नीति कहते हैं। हे रामजी ! पुरुष जो कुछ पुरुषार्थ करता है उसके अनुसार फल प्राप्त होता है। इसी कारण इसका नाम नीति है और इसी का नाम पुरुषार्थ है। तुमने जो मुझसे दैव और पुरुषों का निर्णय पूछा और मैंने कहा उसी की तुम पालना करो। इसी का नाम पुरुषार्थ है और इसका जो फल तुमको प्राप्त हो उसका नाम दैव है। हे रामजी ! जो पुरुष ऐसा दैवपरायण हुआ है कि मुझको जो कुछ दैव भोजन करावेगा सो ही करूँगा और मौनधारी होके अक्रिय हो बैठे उसको जो आय प्राप्त हो सो भी नीति है और जो पुरुष भोगों के निमित्त पुरुषार्थ करता है वह भोगों को भोगकर मोक्षपर्यन्त अनेक शरीरों को धारेगा; यह भी नीति है। हे रामजी ! जो आदि संवित् में संवेदन फुरकर भवितव्यता धरी है उस ही प्रकार स्थित है उसका नाम भी नीति है। उस नीति को ब्रह्मा विष्णु और रुद्र भी उल्लंघन नहीं कर सकते तो और कैसे
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उल्लङ्घि सके। हे रामजी! जो पुरुष पुरुषार्थ को त्याग बैठे हैं उनको फल नहीं प्राप्त होता—यह भी नीति है और जो पुरुष फल के निमित्त पुरुषार्थ करता है उसको फल प्राप्त होता है—यह भी नीति है। जो पुरुष प्रयत्न को त्यागकर निष्क्रिय हो बैठे हैं और मन से विषयों की चित्त में वासना करते हैं वे निष्फल ही रहते हैं और जो पुरुष कर्तृत्व को त्याग-कर चित्त की वृत्ति से शून्य देवपरायण हो रहे हैं और विषयों की चित्त में वासना नहीं करते उनको सफलता ही होती है, क्योंकि फुरने से रहित होना भी पुरुषार्थ है। यह भी नीति है कि अर्थ चिन्तवन करनेवाले को प्राप्ति नहीं होती और अचानक को प्राप्ति होती है। हे रामजी! पुरुषार्थ सफल भी नहीं है जो आत्मबोध के निमित्त न हो। जब ब्रह्मसत्ता की ओर तीव्र अभ्यास होता है तब परमपद की अवश्य प्राप्ति होती है और जब परमपद पाया तब सब जगत् चिदाकाशरूप हो भासता है। नीति आदिक जो विस्तार कहे हैं सो सर्व भ्रमरूप हैं केवल ब्रह्मसत्ता ही ऐसे हो भासती है। जैसे पृथ्वी में रस सत्ता है और वह तृणवत् गुच्छे और फूलरूप होकर स्थित है तैसे ही नीति आदिक सब जगत् होकर ब्रह्म ही स्थित है; और कुछ वस्तु नहीं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे देवशब्दार्थविचारो नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो कुछ तुमको भासता है सो सर्व प्रकार सर्वदा और सर्व ओर से ब्रह्मतत्त्वही सर्वात्मा होकर स्थित हुआ है। वह अनन्त आत्मा है; जब उसमें चित्तशक्ति प्रकट होती है अर्थात् शुद्ध चैतन्यमात्र में अहंस्फूर्ति होती है तब जगत् भासता है; कहीं उपजता है; कहीं नष्ट होता है; कहीं हुलास करता है; कहीं चित्त भासता है, कहीं खिन्न है; कहीं प्रकट है और कहीं अप्रकट भासता है। निदान नाना प्रकार का जगत् है जहाँ जैसा तीव्र अभ्यास होता है वहाँ वैसा होकर भासता है। क्योंकि, आत्मा सर्व शक्ति और सर्वरूप है; जैसा जैसा फुरना उसमें दृढ़ होता है, वही रूप होकर भासता है। हे रामजी! ये जो नाना प्रकार की शक्तियाँ कही हैं सो वास्तव में आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। बुद्धिमानों
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ने समझाने के निमित्त नाना प्रकार के विकल्पजाल कहे हैं आत्मा में विकल्प जाल कोई नहीं । जैसे जल और उसकी तरङ्ग में; सुवर्ण और भूषण में और अवयवी और अवयव में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और शक्ति में कुछ भेद नहीं । हे रामजी ! एक संवित् है और एक संवेदन है; संवित् वास्तव है और संवेदन कल्पना है । जब संवित् में चिन्मात्र संवेदन फुरता है तो वह जैसे चेतता जाता है तैसे ही होकर स्थित होता है । शुद्ध चिन्मात्र संवित् में भीतर और बाहर कल्पना कोई नहीं । जब स्वभाव से किञ्चनरूप संवेदन होता है तब आगे कुछ देखता है और उसे देखने से नाना प्रकार के आकार भासते हैं पर वह और कुछ नहीं सर्व ब्रह्म ही है । हे रामजी ! शक्ति और शक्तिमान में भेद अज्ञानी देखते हैं और अवयवी और अवयव भेद भी कल्पते हैं । परमार्थ में कुछ भेद नहीं केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है उसके आश्रय संकल्प आभास होता है । जब संकल्प की तीव्रता होती है तब वह सत् हो अथवा असत्, परन्तु उसही का भान होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बीजावतारो नाम षट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो सर्वगत देव, परमात्मा महेश्वर है यह स्वच्छ अनुभव, परमानन्दरूप और आदि अन्त से रहित है। उस शुद्ध चिन्मात्र परमानन्द से प्रथम जीव उपजा, उससे चित्त उपजा और चित्त से जगत् उपजा है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अनुभव परिणाम से जो शुद्ध ब्रह्मतत्त्व; सर्वव्यापी, द्वैत से रहित स्थित है उसमें तुच्छ रूप जीव कैसे सत्यता पाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ब्रह्म सदा भास है अर्थात् असद्रूप जगत् उससे सत् भासता है और स्वच्छ है अर्थात् आभासरूपी जगत् से रहित है । बृहत् है अर्थात् बड़ा है बड़ा भी दो प्रकार का है; अविद्याकृत जगत् से जो बड़ा है सो अविद्या की बड़ाई मिथ्या है । ब्रह्म बड़ाई सर्वात्मकरूप है सो सर्वदेश, सर्वकाल और सर्ववस्तु से पूर्ण है और अविद्याकृत बड़ाई देश काल वस्तु से रहित निराकार है सो ज्ञानी का विषय है इससे बृहत् है और परम चेतन
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है। भैरव है अर्थात् जिसके भय से चन्द्रमा, सूर्य्य, अग्नि, वायु और जल अपनी मर्यादा में चलते हैं। परमानन्द है, अविनाशी है, सर्व ओर से पूर्ण है, सम है, शुद्ध है और अचित्य है अर्थात् वाणी में नहीं कहा जाता और क्षोभ से रहित चिन्मात्र है ऐसी आत्मसत्ता ब्रह्म का जो स्वभाव सम्पत है उसी का नाम जीव है अर्थात् जो शुद्ध चिन्मात्र में अहंकुरना है उसी का नाम जीव है। इस अनुभवरूपी दर्पण में अहं रूपी प्रतिबिम्ब फुरने को जीव कहते हैं। जीव अपने शान्त पद को त्यागे की नाईं स्थित होता है सो चिदात्मा ही फुरने के द्वारा आपको जीवरूप जानता है। जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होता है पर समुद्र और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं; तैसे ही ब्रह्म ही जीवरूप है। जैसे वायु और स्पन्द और वरफ और शीललता में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और जीव में कुछ भेद नहीं। हे रामजी ! चित्तरूपी आत्मतत्व को ही अपने स्वभाव-वश से माया करके संवेदन सहित जीवरूप कहते हैं वह जीव आगे फुरने के बड़े विस्तार धारण करता है। जैसे इन्धन में अग्नि के बहुत अणु होते हैं और बड़े प्रकाश को प्राप्त होता है तैसे ही जीव फुरने से जगतरूप को प्राप्त होता है। जैसे आकाश में नीलता भासती है सो नीलता कुछ भिन्न नहीं है तैसे ही अहंभाव से ब्रह्म में जीवरूप भासता है और अहंकृत को अङ्गीकार करके कल्पितरूप की नाईं स्थित होता है। जैसे घन की शून्यता से आकाश में नीलता भासती है तैसे ही स्वरूप के प्रमाद से देश, काल वस्तु के परिच्छेद सहित अहंकाररूपी जीव भासते हैं पर वास्तव चिदाकाश ही चिदाकाश में स्थित है। जैसे वायु से समुद्र तरङ्गरूप होता है तैसे ही संवेदन फुरने से आत्मसत्ता जीवरूप होती है। जीव की चेत्योन्मुखत्वता के कारण इतनी संज्ञा है-चित्त, जीव, मन, बुद्धि, अहङ्कार, माया, प्रकृति सहित ये सब उसी के नाम हैं। उस जीव ने संकल्प संवेष्टित तन्मात्रा को चेता तो उन पश्चतन्मात्रा के आकार में अणुरूप होकर स्थित हुआ; उससे अणु अनउपजे ही उपजे के नाईं स्थित हुए और भासने लगे। फिर उसी चित्त संवेदन ने अणु अङ्गीकार करके जगत् को रचा और जैसे बीज से सत् अंकुर वृक्ष होता
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है तैसे ही संवेदन ने विस्तार पाया । प्रथम वह एक अण्डरूपी होकर स्थित हुआ और फिर उसने अण्ड को फोड़ा । जैसे गन्धर्वनगर और स्वप्न सृष्टि भासती है तैसे ही उसमें जगत् भासने लगा । फिर उसमें भिन्न-भिन्न देह और भिन्न-भिन्न नाम कल्पे । जैसे बालक मृत्तिका की सेना कल्पता है और उनका भिन्न-भिन्न नाम रखता है तैसे ही स्थावर जङ्गम आदिक नाम कल्पना की पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन पाँचों भूतों की सृष्टि संकल्प से उपजी है । हे रामजी ! आदि ब्रह्म से जो जीव फुरा है उसका नाम ब्रह्मा है । वह ब्रह्मा आत्मा में आत्मरूप होकर स्थित है और उससे क्रम करके जगत् हुआ है । जैसे वह चेतता है तैसे ही होकर स्थित होता है । जैसे समुद्र में द्रवता से तरङ्ग होते हैं तैसे ही ब्रह्म में चित्त स्वभाव से जीव होता है । वह जीव जब प्रमाद से अनात्मभाव को धारण करता है तब कर्मों से बन्धवान् होता है जैसे जल जब दृढ़ जड़ता को अंगीकार करता है तब बरफ़रूप होकर पत्थर के समान हो जाता है; तैसे जीव जब अनात्म में अभिमान करता है तब कर्मों के बन्धन में आता है । हे रामजी ! कर्मों का बीज संकल्प है और संकल्प जीव से फुरता है । जीवत्वभाव तब होता है जब शुभचेतना मात्र स्वरूप से उत्थान होता है । उत्थान के अर्थ ये हैं कि जब प्रमाद होता है तब जीवत्वभाव होता है और जब जीवत्वभाव होता है तब अनेक संकल्प कल्पना फुरता है । उन संकल्प कल्पनाओं से कर्म होते हैं; और कर्मों से जन्म, मरण आदिक नाना प्रकार के विकार होते हैं जैसे बीज से अंकुर और पत्र होते हैं; फिर आगे फूल फल और टास होते जाते हैं तैसे ही संकल्प कर्मों से नाना प्रकार के विकार होते हैं । जैसे-जैसे कर्म जीव करता है उनके अनुसार जन्म, मरण और अधः-ऊर्ध्व को प्राप्त होता है । हे रामजी ! मन के फुरने का नाम कर्म है; फुरने का ही नाम चित्त है; फुरने का ही नाम कर्म है और फुरने का ही नाम दैव है । उसही से जीव को शुभ अशुभ जगत् प्राप्त होता है । सबका आदि कारण ब्रह्म है; उसके प्रथम मन उत्पन्न हुआ फिर उस मन ही ने सम्पूर्ण जगत् की रचना की है । जैसे बीज से प्रथम अंकुर
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होता है और फिर पत्र, फूल, और फल और टास होते हैं तैसे ही ब्रह्म से मन और जगत् उपजा है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बीजांकुरवर्णनन्नाम सप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आदि कारण ब्रह्म से मन उत्पन्न हुआ है । वह मन संकल्परूप है और मन से ही सम्पूर्ण जगत् हुआ है । वह मन आत्मा में मनत्वभाव से स्थित है और उस मन ने ही भाव अभाव-रूपी जगत् कल्प्या है । जैसे गन्धर्व की इच्छा से गन्धर्वनगर होता है तैसे ही मन से जगत् होता है । हे रामजी ! आत्मा में द्वैतभेद की कुछ कल्पना नहीं । इस मन से ही ऐसी संज्ञा हुई हैं । ब्रह्म, जीव, मन, माया, कर्म, जगत् और द्रष्टा आदि सब भेद मन से हुए हैं; आत्मा में कोई भेद नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग उछलते और बड़े विस्तार धारण करते हैं तैसे ही चित्तरूपी समुद्र में संवेदन से जो नाना प्रकार जगत् विस्तार पाता है सो असतरूपी है, क्योंकि स्थित नहीं रहता और सदा चलरूप है और जो अधिष्ठान स्वरूपभाव से देखिये तो सतरूप है । इससे द्वैत कुछ न हुआ । जैसे स्वम का जगत् सत् असतरूप चित्त से भासता है तैसे ही सत् असतरूप यह जगत् भासता है । वास्तव में कुछ उपजा नहीं, चित्त के भ्रम से भासता है जैसे इन्द्रजाली की बाजी में जो नाना प्रकार के वृक्ष और ओषध भासते हैं सो भ्रममात्र हैं तैसे यह जगत् भ्रम-मात्र है । हे रामजी ! यह जगत् दीर्घकाल का स्वप्ना है और मन के भ्रम से सत् होकर भासता है । जैसे बालक भ्रम से परछाहीं में भूत कल्पता है और भय पाता है तैसे ही यह पुरुष चित्त के संयोग से द्वैत कल्प के भय पाता है । जैसे विचार करने से वैताल का भय नष्ट होता है तैसे ही आत्मज्ञान से भय आदिक विकार नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! आत्मा, अनादि, दिव्य स्वरूप और अंशांशीभाव से रहित, शुद्ध चैतन्यरूप है । जब वह चेतना संवित् चेत्योन्मुखत्व होता है तब चित्त अर्थात् जो चेतनता का लक्षण है उससे जीवकल्पना होती है । उस जीव में जब अहंभाव होता है कि 'मैं हूँ' तब उससे चित्त फुरता है;
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चित्त से इन्द्रियाँ होती हैं; उन इन्द्रियों से देहभाव होता है और उस देह-भ्रम से मलिन हुआ नरक, स्वर्ग, बन्ध, मोक्ष आदि की कल्पना होती है जैसे बीज से अंकुर, पत्र, फूल, फल और टास होते हैं तैसे ही अहं-भाव से जगत् विस्तार होता है । हे रामजी ! जैसे देह और कर्मों में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और चित्त में कुछ भेद नहीं । जैसे चित्त और जीव में कुछ भेद नहीं तैसे ही चित्त और देह में कुछ भेद नहीं। जैसे देह और कर्मों में कुछ भेद नहीं तैसे ही जीव और ईश्वर में कुछ भेद नहीं और तैसे ही ईश्वर और आत्मा में कुछ भेद नहीं । हे रामजी ! सर्व ब्रह्मस्वरूप है; द्वैत कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जीवविचारो नामाष्टचत्वा-रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो नानात्व भासता है सो वास्तव में एक ब्रह्मस्वरूप है, चेत्यता से एक का अनेक रूप हो भासता है । जैसे एक दीप से अनेक दीप होते हैं तैसे ही एक परब्रह्म से अनेक रूप हो भासते हैं । हे रामजी ! यह असतरूपी जगत् जिसमें आभास है उस आत्मतत्त्व का जब पदार्थ ज्ञान होता है तब चित्त में जो अहंभाव है सो नष्ट हो जाता है और उस अहंभाव के नष्ट हुए सब शोक नष्ट हो जाते हैं। हे रामजी ! जीव चित्तरूपी है और चित्त में जगत् हुआ है। जब चित्त नष्ट हो तब जगद्भ्रम भी नष्ट हो जावेगा । जैसे अपने चरण में चर्म की जूती पहनते हैं तो सर्व पृथ्वी चर्म से लपेटी प्रतीत होती है और ताप कण्टक नहीं लगते हैं तैसे ही जब चित्त में शान्ति होती है तब सर्व जगत् शान्तिरूप होता है । जैसे केले के थम्भ में पत्रों के सिवाय अन्य कुछ सार नहीं निकलता तैसे ही सब जगत् भ्रममात्र है और इससे सार कुछ नहीं निकलता है। हे रामजी ! इतना भ्रम चित्त से होता है। बाल्या-वस्था में क्रीड़ा करना फिरता है; यौवन अवस्था धारण करके विषयों को सेवता है और वृद्धावस्था में चिन्ता से जर्जरीभूत होता है फिर मृतक होकर कर्मों के अनुसार नरक स्वर्ग में चला जाता है । हे रामजी ! यह सब मन का नृत्य है । मन ही भ्रमता है, जैसे नेत्रदूषण से आकाश में
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दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही अज्ञान से जगत्भ्रम भासता है। जैसे मद्यपान करके वृक्ष भ्रम भासते हैं तैसे ही चित्त के संयोग से भ्रम करके जगत्द्वैत भासते हैं। जैसे बालक लीला करके भ्रम से जगत् को चक्र की नाईं भ्रमता देखता है तैसे ही चित्त के भ्रम से जीव जगत् भ्रम देखता है। हे रामजी! जब चित्त द्वैत नहीं चेतता तब यह द्वैतभ्रम मिट जाता है। जब तक चित्तसत्ता फुरती है तब तक नाना प्रकार का जगत् भासता है और शान्ति नहीं पाता और जब घन चेतनता पाता है तब शान्ति पाकर जगत्भ्रम मिट जाता है जैसे पपीहा बकता है और शान्तिमान् नहीं होता पर घन वर्षा से तृप्त होकर शान्त होता है तैसे ही जब जीव महाचैतन्य घनता को प्राप्त होता है तब शान्तिमान होता है तब वह चाहे व्यवहार में हो अथवा तूष्णीम् रहे सदा शान्तिमान होता है। हे रामजी! जब चित्त की चैतन्यता फुरती है तब जगत्भ्रम से नाना प्रकार के विकार देखता है और भ्रम से ही ऐसे देखता है कि मैं उपजा हूँ, अब बड़ा हुआ हूँ और अब में मरूँगा। पर वास्तव में जीव चेतन ब्रह्म से अनन्यस्वरूप है। जैसे वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और चैतन्यता में कुछ भेद नहीं, जैसे वायु सदा रहता पर जब स्पन्दरूप होता है तब स्पर्श करता भासता है तैसे ही चैतन्यता मिटती नहीं। ब्रह्म की चेतना हो तब जगत्भ्रम मिट जाता है और केवल ब्रह्मसत्ता ही भासती है। जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्पभ्रम होता है और रस्सी के यथार्थ जाने से सर्पभ्रम मिट जाता है तो रस्सी ही भासती है; तैसे ही ब्रह्म के अज्ञान से जगत्भ्रम भासता है और जब चित्त से दृढ़ चेत्यता भासती है तब भ्रम पदार्थ का ज्ञान होता है और तभी जगत्भ्रम भी मिट जाता है, केवल ब्रह्मसत्ता ही भासती है। हे रामजी! दृश्यरूपी व्याधिरोग लगा है और उस रोग का नाशकर्त्ता संवित्मात्र है। जब तक चित्त बहिर्मुख होकर दृश्य को चेतता है तब तक शान्त नहीं होता और जब सर्ववासना को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित अन्तर्मुख होगा तब उसही काल में मुक्तिरूप शान्त होगा—इसमें कुछ संशय नहीं। जैसे रस्सी दूर के देखने से सर्प भासती है और
उत्पत्ति प्रकरण । ۲७३
जब निकट होकर देखे तब सर्पभ्रम मिट जाता है रस्सी ही भासती है; तैसे ही आत्मा का निवृत्तरूप जगत् है; जब बहिर्मुख होकर देखता है तब जगत् ही भासता है जब अन्तर्मुख होकर देखता है तब जगत् श्रम मिटकर आत्मा ही भासता है। हे रामजी ! जिसमें अभिलाषा हो उसको त्याग दे। ऐसे निश्चय से मुक्ति प्राप्त होती है। त्याग का यत्न कुछ नहीं। महात्मा पुरुष प्राणों को तृण की नाईं त्याग देते हैं और बड़े दुःख को सह लेते हैं। तुमको अभिलाषा त्यागने में क्या कठिनता है? हे रामजी ! आत्मा के आगे अभिलाषा ही आवरण है। अभिलाषा के होते आत्मा नहीं भासता है। जैसे बादलों के आवरण से सूर्य नहीं भासता और जब बादलों का आवरण नष्ट होता है तब सूर्य भासता है; तैसे ही अभिलाषा के निवृत्त हुए आत्मा भासता है। इससे जो कुछ अभिलाषा उठे उसको त्यागो और निरभिलाषा होकर आत्मपद में स्थित हो। प्रकृत आचार देह और इन्द्रियों में ग्रहण करो और जो कुछ त्याग करना हो उसको त्याग करो; पर देह में ग्रहण और त्याग की बुद्धि न हो। हे रामजी ! जो तुम सम्पूर्ण दृश्य की इच्छा त्यागोगे तो जैसे हाथ में बेलफल प्रत्यक्ष होता है और जैसे नेत्रों के आगे प्रतिबिम्ब प्रत्यक्ष भासता है; तैसे ही अभिलाषा के त्याग से आत्मपद तुमको प्रत्यक्ष भासेगा और सब जगत् भी आत्मरूप ही भासेगा। जैसे महाप्रलय में सब जगत् जल में भासता है और कुछ दृष्टि ही नहीं आता तैसे ही आत्मपद से भिन्न तुमको कुछ न भासेगा। आत्मतत्त्व को न जानने का ही नाम बन्धन है और आत्मपद का जानना ही मोक्ष है और मोक्ष कोई नहीं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे संश्रितउपशमयोगोनामकौन-पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ४९ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मन क्योंकर उत्पन्न हुआ है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ब्रह्म अनन्तशक्ति है और उसमें अनेक प्रकार का किचन होता है। जहाँ जहाँ जैसी जैसी शक्ति फुरती है वहाँ वहाँ वैसा ही रूप होकर भासता है। जब शुद्ध चिन्मात्रसत्ता चेतन में फुरती है कि 'अहं अस्मि' तब उस फुरने से जीव कहलाता है। वही चित्शक्तिसंकल्प का कारण भासती
२७४ योगवाशिष्ठ ।
है । जब वह दृश्य की ओर फुरती है तब जगत् दृश्य होकर भासता है और नाना प्रकार के कार्य कारण हो भासते हैं । रामजी ने फिर पूछा कि हे मुनियों में श्रेष्ठ ! जो इस प्रकार है तो देव किसका नाम है, कर्म क्या है और कारण किसको कहते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! फुरना अफुरना दोनों चिन्मात्रसत्ता के स्वभाव हैं । जैसे फुरना अफुरना दोनों वायु के स्वभाव हैं परन्तु जब फुरता है तब आकाश में स्पर्श होकर भासता है और जब चलने से रहित होता है तब शान्त हो जाता है; तैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में जब चैतन्यता का लक्षण, 'अहं अस्मि' अर्थात् 'मैं हूँ' होता है तब उसका नाम 'स्पन्द बुद्धीश्वर' कहते हैं । उसमें जगत् दृश्य रूप हो भासता है । उस जगत् दृश्य से रहित होने को निस्पन्दन कहते हैं । चित्त के फुरने से नाना प्रकार जगत् हो भासता है और चित्त के अफुर हुए जगद्भ्रम मिट जाता है और नित्य शान्त ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है । हे रामजी ! जीव कर्म और कारण ये सब चित्तस्पन्दन के नाम हैं और चित्तस्पन्दन में भिन्न अनुभव नहीं, अनुभव ही चित्तस्पन्दन हुए की नाईं भासता है । जीव कर्म और कारण का बीजरूप चित्तस्पन्द ही है । चित्तस्पन्द से दृश्य होकर भासता है, फिर चिदाभास द्वारा देह में अहं प्रतीति होती है और उस देह में स्थित होकर चित्तसंवेदन दृश्य की ओर संसरता है । संसरना दो प्रकार का होता है-एक बड़ा और दूसरा अल्प । कितनों को संसरने में अनेक जन्म व्यतीत होते हैं और कितनों को एक जन्म होता है । आदि ही जो फुरकर स्वरूप में स्थित हैं उनको प्रथम जन्म होता है और जो आदि उपजकर प्रमादी हुए हैं सो फुरकर दृश्य की ओर चले जाते हैं और उनके बहुतेरे जन्म होते हैं । चित्त के फिरने से ऐसा अनुभव करते हैं । पुण्यक्रिया करके स्वर्ग में जाते हैं और पापक्रिया करके नरक में जाते हैं । इस प्रकार दृश्यभ्रम देखते हैं और अज्ञान से बन्धन में रहते हैं । जब ज्ञान की प्राप्ति होती तब मोक्ष का अनुभव करते हैं सो बड़ा संसरना है और जो एक ही जन्म पाकर आत्मा की ओर आते हैं वह अल्प संसरना है । हे रामजी ! जैसे स्वर्ण ही भूषणरूप धारण करता है तैसे ही संवेदन ही काष्ठलोष्ट आदिक रूप होकर भासता है । इस चित्त का संयोग
उत्पत्ति प्रकरण । २७५
से ही अज और अविनाशी पुरुष को नाना प्रकार के देह प्राप्त होते हैं और जानता है कि मैं अब उपजा, अब जीता हूँ फिर मर जाऊँगा । जैसे नौका में बैठे भ्रम से तट के वृक्ष भ्रमते दीखते हैं तैसे ही भ्रम से अपने में जन्मादि अवस्था भासती हैं । आत्मा के अज्ञान से जीव को 'अहं' आदि कल्पना फुरती हैं । जैसे मथुरा के राजा लवण को स्वप्न में चाण्डाल का भ्रम हुआ था तैसे ही चित्त के फुरने से जीव जगद्भ्रम देखते हैं । हे रामजी ! यह सब जगत् मन के भ्रम से भासता है । शिव जो परम तत्त्व है सो चिन्मात्र है; उसमें जब चैत्योन्मुखत्व होता है कि 'मैं हूँ' उसका ही नाम जीव है । जैसे सोमजल में द्रवता होती है, इससे उसमें चक्र फुरते हैं और तरङ्ग होते हैं; तैसे ही ब्रह्मरूपी सोमजल में जीवरूपी चक्र फुरते हैं और चित्तरूपी तरङ्ग उदय होते हैं और सृष्टिरूपी बुद्बुदे उपजकर लीन हो जाते हैं । हे रामजी ! चेतन स्फूर्ति द्वारा जीव की नाईं भासता है । जैसे समुद्र ही द्रवता से तरङ्गरूप हो भासता है; तैसे ही चित्त चैत्य के संयोग से जीव कहाता है । उस जीव में जब संकल्प का फुरना होता है तब मन कहाता है; जब संकल्प निश्चय रूप होता है तब बुद्धि होकर स्थित होता है और जब अहंभाव होता है तब अहं-प्रतिकार कहाता है । उस अहंभाव को पाकर तन्मात्रा की कल्पना होती है और पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ये सूक्ष्म भूत होते हैं—उनके पीछे जगत् होता है । हे रामजी ! असतरूपी चित्त के संसरने से ही जगत्रूप हो भासता है । जैसे नेत्रदूषण से आकाश में मुक्तमाला; भ्रममात्र गन्धर्वनगर और स्वप्नभ्रम से स्वप्नजगत् भासते हैं तैसे ही चित्त के संसरने से जगद्भ्रम भासता है । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा नित्य, तृप्त, शान्तरूप, सम और अपने आप ही में स्थित है । उसमें चित्तसंवेदन ने जगत् रचा है और उसको भ्रम से सत्य की नाईं देखता है । जैसे स्वप्न सृष्टि को मनुष्य भ्रम से देखता है; तैसे ही यह जगत् फुरने से सत्य भासता है । हे रामजी ! मन के संसरने का नाम जाग्रत् है; अहंकार का नाम स्वप्न है; चित्त जो सजातीयरूप चेतनेवाला है उसका नाम सुषुप्ति है और चिन्मात्र का नाम तुरीयपद है । जब शुद्ध चिन्मात्र में अत्यन्त
२७६ | योगवाशिष्ट ।
परिणाम हो तब उसका नाम तुर्यातीत पद है । उसमें स्थित हुआ फिर शोकवान् कदाचित् नहीं होता । उसी ब्रह्मसत्ता से सब उदय होते हैं और उस ही में सब लीन होते हैं और वास्तव में न कोई उपजा है और न कोई लीन होता है; चित्त के फुरने से ही सब भ्रम भासता है । जैसे नेत्र-दूषण से आकाश में मुक्तमाला भासती है तैसे ही चित्त के फुरने से यह जगत् भासता है । हे रामजी ! जैसे वृक्ष के बढ़ने को आकाश ठौर देता है कि जितनी बीज की सत्ता हो उतना ही आकाश में बढ़ता जावे तैसे ही सबको आत्मा ठौर देता है । अकर्त्तारूप भी संवेदन से भासता है । हे रामजी ! जैसे निर्मल किया हुआ लोहा आरसी की नाईं प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है तैसे ही आत्मा में संवेदन से जगत् का प्रतिबिम्ब होता है; पर वास्तव में जगत् भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं है । जैसे एक ही बीज, पत्र, फूल, फल और टास हो भासता है तैसे ही आत्मा संवेदन से नानारूप जगत् हो भासता है । जैसे पत्र और फूल वृक्ष से भिन्न नहीं होते तैसे ही अबोधरूप जगत् भी बोधरूप आत्मा से भिन्न नहीं । जो ज्ञानवान् है उसको अखण्डसत्ता ही भासती है । जैसे समुद्र ही तरङ्ग और बुद्बुदे होकर और बीज ही पत्र, फूल, फल और टास होकर भासते हैं; तैसे ही अज्ञानी को भिन्न-भिन्न नामरूपसत्ता भासती है । 'मूर्ख' जो देखता है तो उनके नामरूप सत् मानता है ज्ञानवान् देखके एक रूप ही जानता है । ज्ञानवान् को एक ब्रह्मसत्ता ही अनन्त भासती है और जगद्भ्रम उनको कोई नहीं भासता है । इतना सुन रामजी ने कहा; बड़ा आश्चर्य है कि असतरूपी जगत् सत् होकर बड़े विस्तार से स्पष्ट भासता है । यह जगत् ब्रह्म का आभास है; अनेक तन्मात्रा उसके जल और बँदों की नाईं हे और अविद्या करके फुरती है । ऐसा भी मैंने सुना है । हे मुनीश्वर ! यह स्फूर्त्ति बहिर्मुख कैसे होती है और अन्तर्मुख कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार का दृश्य का अत्यन्त अभाव है । अनहोते दृश्य के फुरने से अनुभव होता है । शुद्ध चिन्मात्र ब्रह्मसत्ता में फुरने से जो जीवत्व हुआ है वह जीवत्व असत् है और सत् की नाईं होता है । जीव ब्रह्म से अभिन्न है पर फुरने से भिन्न की नाईं स्थित होता है । उस जीव में
उत्पत्ति प्रकरण । २७७
जब संकल्प कलना होती है तब मन रूप होके स्थित होता है; स्मरण करके चित्त होता है, निश्चय करके बुद्धि होती है और अहंभाव करके अहंकार होता है । फिर काकताला की नाईं चिद्अणु में तन्मात्रा फुर आती है । जब शब्द सुनने की इच्छा हुई तब श्रवण इन्द्रिय प्रकट हुई; जब देखने की इच्छा हुई तब नेत्र इन्द्रिय प्रकट हुई; गन्ध लेने की इच्छा से नासिका इन्द्रिय प्रकट हुई; स्पर्श की इच्छा से त्वचा इन्द्रिय प्रकट हुई और रस लेने की इच्छा से रसना इन्द्रिय प्रकट हुई । इस प्रकार पाँचों इन्द्रियाँ प्रकट हुई हैं और भावना से सत् ही असत् की नाईं भासने लगा । हे रामजी ! इस प्रकार आदि जीव हुए हैं और उनकी भावना से अन्तर्वाहक शरीर हो आये हैं । चलते भासते हैं पर अचलरूप हैं, इससे जो कुछ जगत् भासता है वह सब ब्रह्मस्वरूप है भिन्न कुछ नहीं । प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ब्रह्म है और संवेदन ब्रह्म से ही अनेकरूप नाना प्रकार के भासते हैं । जैसा जैसा संवेदन फुरता है तैसा तैसा रूप होकर भासता है । जब दृश्य को चेतता है तब नाना प्रकार का दृश्य भासता है और जब अन्तर्मुख ब्रह्म चेतता है तब ब्रह्मरूप होकर भासता है । हे रामजी ! दृश्य कुछ उपजा नहीं, आत्मा सदा अपने आप में स्थित है । जब दृश्य असंभव हुआ तब बन्धन और मोक्ष किसको कहिये और विचार किसका कीजिये ? सर्वकल्पना का अभाव है । यह जो तुम्हारा प्रश्न है उसका उत्तर सिद्धान्तकाल में होगा यहाँ न बनेगा । जैसे कमल के फूलों की माला अपने काल में बनती है और बिना समय शोभा नहीं देती तैसे ही तुम्हारा प्रश्न सिद्धान्तकाल में शोभा पावेगा; समय बिना सार्थक शब्द भी निरर्थक होता है । हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ हैं उनका फल भी समय पाके होता है; समय बिना नहीं होता इससे अब पूर्व प्रसंग सुनो । हे रामजी ! ब्रह्म में चैत्योन्मुखत्व से आदि जीव ने आपको पिता, माता जाना । जैसे स्वप्न में आपको कोई देखे तैसे ही ब्रह्माजी ने आपको जाना । उन ब्रह्मा ने प्रथम "ॐ" शब्द उच्चारण किया; उस शब्द तन्मात्रा से चारों वेद देखे और उसके अनन्तर मनोराज से सृष्टि रची । तब असतरूप सृष्टि भावना से सत्य होकर भासने लगी । जैसे स्वप्न में सर्प और गन्धर्वनगर भासते हैं
२७८ | योगवाशिष्ठ ।
तेसे ही असत्यरूप सृष्टि सत्य भासने लगी । हे रामजी ! ब्रह्मसत्ता में जैसे ब्रह्मा आदिक उपजे हैं वैसे ही और जीव, कीट आदि भी उत्पन्न हुए । जगत् का कारण संवेदन है । संवेदन भ्रम से जीवों को जगत् भासता है । उनको भौतिक शरीर में जो अहं प्रतीति हुई है उससे अपने निश्चय के अनुसार शक्ति हुई । ब्रह्मा में ब्रह्मा की शक्ति का निश्चय हुआ और चींटी में चींटी की शक्ति का निश्चय हुआ । हे रामजी ! जैसी जैसी वासना संवित् में होती है उसके अनुसार ही अनुभव होता है । शुद्ध चिन्मात्र में जो चैत्योन्मुखत्व हुआ उसी का नाम जीव हुआ । उसमें जो ज्ञानरूप सत्ता है सोई पुरुष है और जो फुरना है सोई कर्म है । जैसे जैसे फुरता है तैसे ही तैसे भासता है । हे रामजी ! आत्मसत्ता में जो अहं हुआ है उसी का नाम चित्त है उससे जो जगत् रचा है वह भी अविचारसिद्ध है; विचार करने से नष्ट हो जाता है । जैसे अविचार से अपनी परछाहीं में भूत पिशाच कल्पता है और उससे भय उत्पन्न होता है पर विचार करने से पिशाच और भय दोनों नष्ट हो जाते हैं; तैसे ही हे रामजी ! आत्मविचार से चित्त और जगत् दोनों नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! ब्रह्म सत्ता सदा अपने आपमें स्थित है; उसमें चित्त कल्पना कोई नहीं और प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय भी ब्रह्म से भिन्न नहीं तो द्वैत की कल्पना कैसे हो ? जैसे शशे के शृङ्ग असत् हैं; तैसे आत्मा में द्वैतकल्पना असत्य है । हे रामजी ! यह ब्रह्माण्ड भावनामात्र है । जिसको सत्य भासता है उसको बन्धन का कारण है । जैसे घुरान अर्थात् कुशावारी अपना गृह अपने बन्धन का कारण बनाती है और उसमें फँस मरती है; तैसे ही जो जगत् को सत्य मानते हैं उनको अपना मानना ही बन्धन करता है और उससे जन्म मरण देखते हैं । जिसको जगत् का असत्य निश्चय हुआ है उसको बन्धन नहीं होता—उसको उल्लास है । हे रामजी ! अनुभवसत्ता सबका अपना आप है । उसमें जो जैसा निश्चय किया उसको अपने अनुभव के अनुसार पदार्थ भासते हैं । वास्तव में तो जगत् उपजा ही नहीं । जगत् का उपजना भी मिथ्या है; बढ़ना भी मिथ्या है; रस भी मिथ्या है और रस लेनेवाला भी मिथ्या है । शुद्धब्रह्म सर्वगत, नित्य और अद्वैत सदा
उत्पत्ति प्रकरण । २७६
अपने आपमें स्थित है, परन्तु अज्ञान से शुद्ध भी अशुद्ध भासता है; सर्व जगत् भी परिच्छिन्न भासता है, ब्रह्म भी अब्रह्म भासता है; नित्य भी अनित्य भासता है और अद्वैत भी द्वैतसहित भासता है। हे रामजी ! अज्ञान से ऐसा भासता है। जैसे जल और तरङ्ग में मूर्ख भेद मानते हैं परन्तु भेद नहीं; तैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद अज्ञानी देखते हैं। जैसे सुवर्ण में भूषण और रस्सी में सर्प मूर्ख देखते हैं; तैसे ही ब्रह्म में नानात्व मूर्ख देखते हैं; ज्ञानी को सब चिदाकाश है। हे रामजी ! जब आत्मसत्ता में अनात्मरूप दृश्य की चैतन्यता होती है तब कल्पना उत्पन्न होती है और मनरूप होके स्थित होती है उसके अनन्तर अहंभाव होता है और फिर तन्मात्र की कल्पना होकर शब्द अर्थ की कल्पना होती है। इसी प्रकार चित्तसत्ता में जैसी जैसी चैतन्यता फुरती है तैसा ही तैसा रूप भासने लगता है। सत् असत् पदार्थ वासना के वश फुर आते हैं। जैसे स्वप्नसृष्टि फुर आती है सो अनुभवरूप ही होती है वैसे यह जगत् फुर आया है सो अनुभवस्वरूप है। इससे सृष्टि में भी चिन्मात्र है और चिन्मात्र ही में सृष्टि है। सबको सत्तारूपी भीतर बाहर ऊर्ध्व अधः चिन्मात्र ही है। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय सब पद चिन्मात्र ही में धारे हैं, नित्य उपशान्तरूप है, समसत् जगत् की सत्ता उससे ही होती है सो एक ही सम है और तुरीया अतीतपद नितही स्थित है।
" इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सत्योपदेशो नाम
पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रसङ्ग पर एक पुरातन इतिहास है और उसमें महा प्रश्नों का समूह है सो सुनो। काजल के पर्वत की नाईं कर्कटी नाम एक महाश्याम राक्षसी हिमालय पर्वत के शिखर पर हुई। विसूचिका भी उसका नाम था। अस्थिर बिजली की नाईं उसके नेत्र और अग्नि की नाईं बड़ी जिह्वा चमत्कार करती थी और उसके बड़े नख और ऊँचा शरीर था जैसे बड़वाग्नि तृप्त नहीं होता तैसे ही वह भी भोजन से तृप्त न होती थी। उसके मन में विचार उपजा कि जम्बूद्वीप के सम्पूर्ण जीवों को भोजन करूँ तो तृप्त होऊँ अन्यथा मेरी तृप्ति नहीं
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होती । आपदा उद्यम किये से दूर होती है, इससे मैं अखण्डचित्त होकर तप करूँ । हे रामजी ! ऐसा विचारकर वह एकान्त हिमालय पर्वत की कन्दरा में एक टाँग से स्थिर हुई और दोनों भुजाओं को उठाके नेत्र आकाश की ओर किये मानों मेघ को पकड़ती है । शरीर और प्राणों को स्थिर करके मूर्ति की नाईं हो गई शीत और उष्ण के क्षोभ से रहित हुई और पवन से शरीर जर्जरी भूत हुआ । जब इस प्रकार सहस्रवर्ष दारुण तप किया तब ब्रह्माजी आये और राक्षसी ने उन्हें देखके मद से नमस्कार किया और मन में विचारा कि मेरे वर देने के निमित्त यह आये हैं तब ब्रह्माजी ने कहा, हे पुत्री ! तूने बड़ा तप किया अब उठ खड़ी हो और जो कुछ चाहती है वर माँग । कर्कटी बोली, हे भगवन् ! मैं लोहे की नाईं वज्रसूचिका होऊँ जिससे जीवों के हृदय में प्रवेश कर जाऊँ । हे रामजी ! जब ऐसे उस मूर्ख राक्षसी ने वर माँगा तब ब्रह्माजी ने कहा ऐसे ही हो तेरा नाम भी प्रसिद्ध विसूचिका होगा । हे राक्षसी ! जो दुराचारी जीव होंगे उनके हृदय में तू प्राणवायु के मार्ग से प्रवेश करेगी और जो गुणवान् तेरे निवृत्त करने के निमित्त 'ॐ' मन्त्र पढ़ेंगे और यह पढ़ेंगे कि हिमालय के उत्तर शिखर में कर्कटी नाम राक्षसी विसूचिका है सो दूर हो और विसूचिका का दुःखी चन्द्रमा के मण्डल में चित्तवे कि अमृत के कुण्ड में बैठा है और राक्षसी हिमालय के शिखर को गई तब तू उनको त्याग जाना । उनमें तू प्रवेश न कर सकेगी । हे रामजी ! इस प्रकार कहके ब्रह्माजी आकाश को उड़े और इन्द्र और सिद्धों के मार्ग से गये और वही मन्त्र उनको भी सुनाया । जब उन्होंने उस मन्त्र को प्रसिद्ध किया तब कर्कटी का शरीर सूक्ष्म होने लगा । जैसे संकल्प का पहाड़ संकल्प के क्षीण होने से क्षीण हो जाता है तैसे ही क्रम से प्रथम जो उसका मेघवत् आकार था सो घटकर वृक्षवत् हो गया । फिर वह पुरुषरूप हो गई; फिर हस्तमात्र; फिर प्रदेशमात्र और फिर लोहे की सुई की नाईं सूक्ष्म हो गई । हे रामजी ! ऐसे रूप को कर्कटी ने धारा जिसको देख मूर्ख अविचारी पुरुष तृण की नाईं शरीर को त्यागते हैं । जो पुरुष परस्पर की विचारते हैं सो पीछे से कष्ट नहीं पाते और जो पूर्वापर विचार
उत्पत्ति प्रकरण । २८१
से रहित हैं सो पीछे कष्ट पाते हैं और अनर्थ करके औरों को कष्ट देते हैं। वे एक पदार्थ को केवल भला जानके उसके निमित्त यत्न करते हैं न धर्म की ओर देखते हैं और न सुख की ओर देखते हैं। इस प्रकार मूर्ख राक्षसी ने भोजन के निमित्त बड़े गम्भीर शरीर को त्याग कर तुच्छ शरीर को अंगीकार किया। उसका एक शरीर तो सूक्ष्म हुआ और दूसरा पुर्यष्टक हुआ। कहीं तो सूक्ष्म शरीर से, जिसको इन्द्रियाँ भी न ग्रहण कर सकें, प्रवेश करे और कहीं पुर्यष्टक से जा प्रवेश करे। कहीं प्राणवायु के साथ प्रवेश करके दुःख दे और कहीं प्राणी को विपर्यय करे तब प्राणी कष्ट पावें और कहीं रक्त आदिक रसों का पानकर एक बूंद से उदर पूर्ण हो जावे परन्तु तृष्णा निवृत्त न हो। जब शरीर से बाहर निकले तब भी कष्ट पावे और वायु चले उससे गढ़े और कीचड़ में गिरे और चरणों के तले आवे। निदान कभी देशों में रहे और कभी घास और तृणों में रहे जो नीच पापी जीव हैं उनको कष्ट दे और जो गुण-वान् हों उनको कष्ट न दे सके। मन्त्र पढ़ने से निवृत्त हो जावे। जो आप किसी छिद्र में भी गिरे तो जाने कि मैं बड़े कूप में गिरी। हे रामजी! मूर्खता से उसने इतने कष्ट पाये। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा तब सूर्य अस्त होकर सायं-काल का समय हुआ तब सब सभा परस्पर नमस्कार करके स्नान को गई और विचारसंयुक्त रात्रि व्यतीत करके सूर्य की किरणों के निकलते ही फिर आ उपस्थित हुई।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे विसूचिकाव्यवहार-वर्णनन्नामेकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥ ५१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार प्राणियों को मारते उसे कुछ वर्ष बीते तब उसके मन में विचार उत्पन्न हुआ कि बड़ा कष्ट है! बड़ा कष्ट!! यह विसूचिका शरीर मुझको कैसे प्राप्त हुआ है !!! मैंने मूर्खता से यह वर ब्रह्माजी से माँगा था। मूर्खता बड़े दुःख को प्राप्त करती है। कैसा मेघ की नाईं मेरा शरीर था कि सूर्यादिक को ढाँक लेती थी। हाय, मन्दराचल पर्वत की नाईं मेरी उदर और बड़वाग्नि
२८२ योगवाशिष्ठ ।
की नाईं मेरी जीभ कहाँ गई ? जैसे कोई अभागी पुरुष चिन्तामणि को त्याग दे और काँच अङ्गीकार करे तैसे ही मैंने बड़े शरीर को त्याग के तुच्छ शरीर को अङ्गीकार किया जो एक बूँद से ही तृप्त हो जाता है परन्तु तृष्णा पूरी नहीं होती । उस शरीर से मैं निर्भय विचरती थी यह शरीर पृथ्वी के कण से भी दब जाता है । अब तो मैं बड़े कष्ट पाती हूँ यदि मैं मृतक हो जाऊँ तो छूटूँ, परन्तु माँगी हुई मृत्यु भी हाथ नहीं आती इससे मैं फिर शरीर के निमित्त तप करूँ । वह कौन पदार्थ है जो उद्यम करने से हाथ न आवे । हे रामजी ! ऐसे विचारकर वह फिर हिमालय पर्वत के निर्जनस्थान वन में जा एक टाँग से खड़ी हुई और ऊर्ध्वमुख करके तप करने लगी । हे रामजी ! जब पवन चले तो उसके मुख में फल, मांस और जल के कणके पड़ें परन्तु वह न खाय बल्कि मुख मूँद ले । पवन यह दशा देख के आश्चर्यवान् हुआ कि मैंने सुमेरु आदि को भी चलायमान किया है परन्तु इसका निश्चय चलायमान नहीं होता निदान मेघ की वर्षा से वह कीचड़ में दब गई परन्तु ज्यों की त्यों ही रही और मेघ के बड़े शब्द से भी चलायमान न हुई । हे रामजी ! इस प्रकार सहस्र वर्ष उसको तप करते बीते तब दृढ़ वैराग्य से उसका चित्त निर्मल हुआ और सब सङ्कल्पों के त्याग से उसको परमपद की प्राप्ति हुई; बड़े ज्ञान का प्रकाश उदय हुआ और परब्रह्म का उसको साक्षात्कार हुआ उससे परमपावनरूप होकर चित्तसूची हुई अर्थात् चेतन में एकत्वभाव हुआ । जब उसके तप से सातों लोक तपायमान हुए तब इन्द्र ने नारद से प्रश्न किया कि ऐसा तप किसने किया है जिससे लोक जलने लगे हैं? तब नारदजी ने कहा, हे इन्द्र ! कर्कटी नाम राक्षसी ने सात हजार वर्ष बड़ा कठिन तप किया । जिससे वह विसूचिका हुई । वह शरीर पा उसने बहुत कष्ट पाया और लोगों को भी कष्ट दिया । जैसे विराट् आत्मा और चित्ताशक्ति सबमें प्रवेश कर जाती है तैसे वह भी सबकी देह में प्रवेश कर जाती थी । जो मन्त्र जाप न करें उनके भीतर प्रवेश करके रक्त मांस भोजन करे परन्तु तृप्त न हो मन में तृष्णा रहे और सूक्ष्म शरीर थल में दब जावे । इस प्रकार उसने बहुत कष्ट पाके
उत्पत्ति प्रकरण ।
२८३
विचार किया कि उद्यम से सब कुछ प्राप्त होता है इससे पूर्व शरीर के निमित्त फिर एकान्त स्थान में जाकर तप करूँ । इतने में एक गीध पक्षी वहाँ आकर कुछ भोजन करने लगा कि उसके चोंच के मार्ग से विषूचिका भीतर चली गई । जब यह पक्षी कष्ट पाके उड़ा तो वह विषूचिका उसकी पुर्यष्टक से मिलके और उसको प्रेरके हिमालय पर्वत की ओर इस भाँति ले चली जैसे वायु मेघ को ले जाता है । उस गीध ने वहाँ पहुँचकर वमन करके विषूचिका को त्याग दिया है और आप सुखी होकर उड़ गया । तब उसी शरीर से विषूचिका वहाँ तप करने लगी । हे रामजी ! इस प्रकार इन्द्र ने सुनकर उसके देखने के निमित्त पवन चलाया । तब पवन आकाश छोड़के भूतल में उतरा और लोकालोक पर्वत स्वर्ण की पृथ्वी, समुद्रों और द्वीपों को लाँघके क्रम से हिमालय के वन में सूक्ष्म शरीर से आया और क्या देखा कि पवन चल रहा है और सूर्य तप रहे हैं परन्तु वह चलायमान नहीं होती और प्राणवायु का भी भोजन नहीं करती तब पवन ने भी आश्चर्यमान होके कहा, हे तपस्विनी ! तू किसलिए तप करती है ? पर विषूचिका तब भी न बोली । पवन ने फिर कहा, भगवती विषूचिका ने बड़ा तप किया है—अब इसको कोई कामना नहीं रही ऐसे पवन उड़ा और क्रम से इन्द्र के पास गया । इन्द्र विषूचिका के दर्शन के माहात्म्य से पवन को कण्ठ लगाय मिले और बड़ा आदर किया कि तू बड़े पुण्यवान् का दर्शन करके आया है । पवन ने भी सब वृत्तान्त कह सुनाया और कहा, हे राजन् ! उसके तप के तेज से हिमालय की शीतलता दब गई है । आप ब्रह्माजी के पास चलिये, नहीं तो उसके तप से सब जगत् जलेगा । तब इन्द्र पवन और देवतागणों सहित ब्रह्माजी के पास आये और प्रणाम करके बैठे । ब्रह्माजी ने कहा, तुम्हारी जो अभिलाषा है वह मैंने जानी । इस प्रकार इन्द्र से कहकर ब्रह्माजी विषूचिका के पास जिसका नाम सूची था आये और उसको देखके आश्चर्यमान हुए कि तृण की नाईं विषूचिका ने सुमेरु से भी अधिक धैर्य धारण किया है जैसे मध्याह्न का सूर्य तेजवान् होता है तैसे ही इसका तप से तेज हुआ है
२८४ योगवाशिष्ठ ।
और परब्रह्म में स्थित हुई है। अब इसका जगत्भ्रम शान्त हो गया है इस से वन्दना करने योग्य है। हे रामजी ! फिर आकाश में स्थित होकर ब्रह्माजी ने कहा, हे पुत्री ! तू अब वर ले, तब विसूचिका विचारकर कहने लगी कि जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना और शान्तरूप हुई हूँ, सम्पूर्ण संशय मेरे नष्ट हुए अब वर से मुझे क्या प्रयोजन है ? यह जगत् अपने संकल्प से उपजा है। जैसे बालक को अपनी परछाहीं में बैताल बुद्धि होती है और उससे भय पाता है तैसे ही मैं स्वरूप के प्रमाद से भटकती फिरी। अब इष्ट अनिष्ट जगत् की मुझको कुछ इच्छा नहीं। अब मैं निर्विकार शान्ति में स्थित हूँ। हे रामजी ! ऐसे कहकर जब सूची तूष्णीम् हो रही तब वीतराग और प्रसन्नबुद्धि ब्रह्माजी उसके भाव को देखके कहने लगे, हे कर्कटी ! तू कुछ वर ले, क्योंकि कुछ काल तुझे भूतल में विचरना है। भोगों को भोगके तू विदेहमुक्त होगी। अब तू जीवन्मुक्त होकर विचरेगी। नीति के निश्चय को कोई नहीं लाँघ सकता। जब तू तप करने लगी थी तब पूर्व देह के पाने का संकल्प किया था। तेरा वह संकल्प अब सफल हुआ है। जैसे बीज में वृक्ष का सद्भाव होता है सो काल पाकर होता है तैसे ही तेरे में पूर्व शरीर का जो संकल्प था सो अब प्राप्त होवेगा अर्थात् वैसा ही शरीर पाके तू हिमालय के वन में विचरेगी। हे पुत्री ! तुझे तो अनिच्छित योग हुआ है। जैसे कोई छाया के निमित्त आम के वृक्ष के निकट आन बैठे और उसे छाया और फल दोनों प्राप्त हों तैसे ही तूने शरीर की वृद्धि के लिये यत्न किया था वह तुझे तृप्ति करनेवाला हुआ है और ब्रह्मतत्त्व भी प्राप्त हुआ। हे पुत्री ! राक्षसी शरीर में जीवन्मुक्त होके तू विचरेगी और दूसरा जन्म तुझको न होगा। इस जन्म में तू परम शान्त रहेगी और शरत्काल के आकाश की नाईं निर्मल होगी। जब तेरी वृत्ति बहिर्मुख फुरेगी तब सब जगत् तुझको आत्मरूप भासेगा; व्यवहार में समाधि रहेगी और समाधि में भी समाधि रहेगी। पापी जीवों को तू भोजन करेगी; न्यायबान्धव तेरा नाम होगा और विवेकपालक तेरी देह होगी। इससे पूर्व के शरीर को अंगीकार कर। इतना कह फिर वशिष्ठजी बोले, हे