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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

उत्पत्ति प्रकरण । २८५

रामजी ! ऐसे कहकर जब ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये तब सूची ने कहा ऐसे ही हमको दोनों तुल्य है। तब जैसे बीज से वृक्ष होता है तैसे ही क्रम से शरीर बढ़ गया। प्रथम प्रदेशमात्र हुआ, फिर हस्तमात्र हुआ फिर वृक्षमात्र हुआ और फिर योजनमात्र हो गया। जैसे संकल्प का वृक्ष एक क्षण में बढ़ जाता है तैसे उसका शरीर बढ़ गया।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सूचीशरीरलाभो नाम द्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे वर्षाकाल का बादल सूक्ष्म से स्थूल हो जाता है तैसे सूची सूक्ष्म शरीर से फिर कर्कटी राक्षसी हो गई। जैसे सर्प काञ्चली त्यागके फिर ग्रहण नहीं करता तैसे ही राक्षसी ने आत्मतत्त्व के कारण शरीर न ग्रहण किया। छः महीने तक पहाड़ के शिखर की नाईं खड़ी रही और फिर पद्मासन बाँध संवित् सत्ता और निर्विकल्प पद में स्थित हुई। जब प्रारब्ध के वेग से जागा तब वृत्ति बहिर्मुख हुई और क्षुधा लगी; क्योंकि शरीर का स्वभाव शरीर पर्यन्त रहता है। तब विचारने लगी कि जो विवेकी हैं उनका मैं भोजन न करूँगी; उनके भोजन से मेरा मरना श्रेष्ठ है पर जो न्याय से भोजन करने योग्य है उसको खाऊँगी और शरीर भी नष्ट हो तो भी न्याय बिना भोजन न करूँगी। देहादिक सब संकल्पमात्र हैं; मुझे न मरने की इच्छा है और न जीने की। हे रामजी ! जब ऐसे विचारकर सूची तूष्णीम् हो बैठी और राक्षसी स्वभाव का त्याग किया तब सूर्य भगवान् ने आकाशवाणी से कहा; हे कर्कटी ! तू जाके मूढ़ जीवों का भोजन कर। जब तू उनका भोजन करेगी तब उनका कल्याण होगा। मूढ़ों का उद्धार करना भी सन्तों का स्वभाव है। जो विवेकी पुरुष हैं उनको न खाना और जो तेरे उपदेश से ज्ञान पावें उनको भी न मारना, जो उपदेश से भी बोधात्मा न हों उनका भोजन करना—यह न्याय है ? तब राक्षसी ने कहा हे भगवन् ! तुमने अनुग्रह करके जो कहा है वही मुझसे ब्रह्माजी ने भी कहा था। ऐसे कहकर सूची हिमालय के शिखर से उतरी और जहाँ किरातदेश था और बहुत मृग और पशु रहते थे उनमें विचरने लगी।

२८६ योगवाशिष्ठ।

रात्रि में श्याम राक्षसी और श्याम ही तमाल वृक्ष भी महाअन्धकार भासते थे—मानों कज्जल का मेघ स्थित है। ऐसी श्यामता में किराती देश के राजा मन्त्री और वीरों सहित यात्रा को निकले तो उनको आते देख राक्षसी ने विचारा कि मुझे भोजन मिला। यह मूढ़ अज्ञानी है और इनको देहाभिमान है; इन मूर्खों के जीने से न यह लोक न परलोक कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता। ऐसे जीवों का जीना दुःख के निमित्त है इसलिये इनको यत्न करके भी मारना योग्य है और इनका पालन अनर्थ के निमित्त है, क्योंकि यह पाप को उदय करते हैं। ब्रह्मा की आनि नीति है कि पापी मारने योग्य हैं और गुणवान् मारने योग्य नहीं। कदाचित् ये गुणवान् हों तो मैं इन्हें न मारूँगी। गुणवान् भी दो प्रकार के होते हैं। जो अमानी, अदम्भी, अहिंसक, शान्तिमान और पुण्यकर्म करनेवाले हैं वे भी गुणवान् हैं पर महागुणवान् तो ब्रह्मवेत्ता हैं जिनके जीने से बहुतों के कार्य सिद्ध होते हैं, इसलिये जो मेरा शरीर भोजन बिना नष्ट भी हो जावे तो भी मैं गुणवान् को न मारूँगी। जो उदार पुरुष है वह पृथ्वी का चन्द्रमा है; उसकी संवित् से स्वर्ग और मोक्ष होता है। जैसे संजीवनी बूटी से मृतक भी जीता है तैसे ही सन्तों के संग से अमृत होता है। इससे मैं प्रश्न करके इनकी परीक्षा लूँ; कदाचित् यह भी गुणवान् हों। यह कमलनयन ज्ञानवान् भासते हैं; यदि यथार्थ ज्ञानवान् पुरुष हैं तो पूजने योग्य हैं और जो मूर्ख हैं तो दण्ड देने योग्य हैं और मैं उनको अवश्य भोजन करूँगी।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणेराक्षसीविचारो नाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तब वह राक्षसी उनको देखके मेघ की नाईं गरजने लगी और कहा; अरे आकाश के चन्द्रमा और सूर्य! तुम कौन हो? बुद्धिमान् हो अथवा दुर्बुद्धि हो? कहाँ से आये हो और तुम्हारा क्या आचार है? तुम तो मुझको ग्रास की नाईं आन प्राप्त हुए हो इससे अब मैं तुमको भोजन करूँगी। राजा बोले; अरी! इस भौतिक तुच्छ शरीर को पाकर तू कहाँ रहती है? हमको देखके जो तू गरजती

उत्पत्ति प्रकरण । २८७

है सो तेरा शब्द हमको अमरी के शब्दवत् भासता है; हमको कुछ भय नहीं । हे राक्षसी ! यह तेरा शरीर मायामात्र है इसलिये इस तुच्छ स्वभाव को त्यागके जो कुछ तेरा अर्थ है वह कह हम पूर्ण कर देंगे । तब राक्षसी ने उनके डराने को ग्रीवा और भुजा को ऊँचे करके प्रलयकाल के मेघों की नाईं फिर शब्द किया कि जिसके नाद से पहाड़ भी चूर्ण हो जावें । निदान सब दिशाएँ शब्द से भर गई और वह बिजली की नाईं नेत्रों को चमकाने लगी । उसकी मूर्ति देख राक्षस और पिशाच भी शङ्कायमान हों पर ऐसे भयानक स्वरूप को देख के भी उन दोनों ने धीरज रखा । मन्त्री ने कहा, अरी राक्षसी ! ऐसे शब्द तू व्यर्थ करती है । इससे तो तेरा कुछ प्रयोजन न सिद्ध होगा इसलिये इस आरम्भ को त्यागके अपना अर्थ कह । बुद्धिमान् पुरुष उस अर्थ को ग्रहण करते हैं जो अपना विषयभूत होता है और जो अपना विषयभूत नहीं होता उसके निमित्त वे यत्न नहीं करते । हम तेरे विषयभूत नहीं तुझ ऐसे तो हजारों हमने मार डाले हैं । हे राक्षसी ! हमारे धैर्यरूपी पवन से तुझ ऐसी अनन्त मक्खियाँ तृणवत् उड़ती फिरती हैं । इससे अपने नीच स्वभाव को त्याग स्वस्थचित्त होके जो कुछ तेरा प्रयोजन हो सो कह । बुद्धिमान् स्वस्थचित्त होके व्यवहार करते हैं; स्वस्थ हुए बिना व्यवहार भी सिद्ध नहीं होता; यह आदि नीति है । हमारे पास से स्वप्न में भी कोई अर्थी व्यर्थ नहीं गया । हम सबका अर्थ पूर्ण करते हैं इसलिये तू भी हमसे अपना प्रयोजन कह दे । तब राक्षसी समझी कि यह कोई बड़े उदार आत्मा और उज्जवल आचारवान् हैं और जीवों के समान नहीं । यह बड़े प्रकाशमान और धैर्यवान् जान पड़ते हैं; उदारात्मा के से इनके वचन ज्ञानवानों से मिलते हैं अब मैंने इनको जाना है और इन्होंने मुझको जाना है इससे मुझसे इसका नाश भी न होगा । अविनाशी पुरुष ब्रह्मसत्ता में स्थित हैं इससे ज्ञानवान् हैं । ऐसा निश्चय ज्ञान बिना किसी को नहीं होता परन्तु कदाचित् अज्ञानी हो तो फिर सन्देह को अङ्गीकार करके पूछती हूँ। जो सन्देहवान् होकर बोधवान् से नहीं पूछते वे भी नीच बुद्धि हैं। हे रामजी ! ऐसे मन में विचार फिर उसने पूछा,

२८८योगवाशिष्ठ ।

तुम कौन हो और तुम्हारा आचार क्या है ? निष्पाप महापुरुषों को देखके मित्रभाव उपज आता है । मन्त्री बोला, किरातदेश का यह राजा है और मैं इनका मन्त्री हूँ। रात्रि में तुमसे दुष्टों के मारने के निमित्त उठे हैं। रात्रि दिन में हमारा यही आचार है कि जो जीव धर्म की मर्यादा त्यागनेवाले हैं उनका हम नाश करते हैं। जैसे अग्नि ईंधन का नाश करता है। राक्षसी बोली, हे राजन् ! यह तेरा दुष्ट मन्त्री है। जिस राजा का मन्त्री भला नहीं होता वह राजा भी भला नहीं होता और जिस राजा का मन्त्री भला होता है उसकी प्रजा भी शान्तिमान् होती है । भला मन्त्री वह कहाता है जो मन्त्री को न्याय और विवेक में लगावे। जो राजा विवेकी होता है वह शान्तात्मा होता है और जो राजा शान्तिमान् हुआ तब प्रजा भी शान्तिमान् होती है। सब गुणों से जो उत्तम गुण है वह आत्मज्ञान है। जो आत्मा को जानता है वही राजा और जिसमें प्रभुता और समदृष्टि हो वही मन्त्री है, जो प्रभुता और समदृष्टि से रहित है वह न राजा है न मन्त्री है। हे राजन् ! जो तुम आत्मज्ञानवान् पुरुष हो तो तुम कल्याणरूप हो। जो ज्ञान से रहित होता है उसको मैं भोजन करती हूँ। तुम्हारे छूटने का उपाय यही है कि जो मैं प्रश्नों का समूह पूछती हूँ उसका उत्तर दो। जो तुमने प्रश्नों का उत्तर दिया तो मेरे पूजने योग्य हो। और जो मेरा अर्थ होगा सो कहूँगी तुम पूर्ण करना और जो तुमने प्रश्नों का उत्तर न दिया तो तुम्हारा भोजन करूँगी ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीविचारो नाम चतुःपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ ५४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार राक्षसी ने कहा तब राजा बोला, तू प्रश्न कर, हम तुमको उत्तर देंगे । राक्षसी बोली, हे राजन् ! वह एक कौन अणु है जिससे अनेक प्रकार हुए हैं और एक के अनेक नाम हैं और वह कौन अणु है जिसमें अनेक ब्रह्माण्ड होते हैं और लीन हो जाते हैं ? जैसे समुद्र में अनेक बुद्बुदे उपजकर लीन होते हैं। वह कौन आकाश है जो पोल से रहित है और कौन अणु है जो न किञ्चित

उत्पत्ति प्रकरण । २८६

है न अकिञ्चित् है ? वह कौन अणु है जिसमें तेरा और मेरा अहं फुरता है और वह कौन है जो अहं त्वं एक में जानता है ? वह कौन है जो चला जाता है और कदाचित् नहीं चलता और वह कौन है जो तिष्ठित भी है और अतिष्ठित भी है ? वह कौन है जो पाषाणवत् है और वह कौन है जिसने आकाश में चित्र किये हैं ? वह कौन अग्नि है जो दाहक शक्ति से रहित है और अग्निरूप है और वह अग्नि कौन है जिससे अग्नि उपजी है ? वह कौन अणु है जो सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के प्रकाश से रहित और अविनाशी है और वह कौन है जो नेत्रों से देखा नहीं जाता और सब प्रकाशों को उत्पन्न करता है ? वह कौन ज्योति है जो फूल, फल और बेल को प्रकाशती है और जन्मान्ध को भी प्रकाशती है ? वह कौन अणु है जो आकाशादिक भूतों को उपजाता है और वह कौन अणु है जो स्वाभाविक प्रकाशमान है ? वह भण्डार कौन है जिससे ब्रह्माण्डरूपी रत्न उपजते हैं ? वह कौन अणु है जिसमें प्रकाश और तम इकट्ठे रहते हैं ? और वह कौन अणु है जिससे सत् और असत् इकट्ठे रहते हैं ? वह कौन अणु है जो दूर है परन्तु दूर नहीं और वह कौन अणु है जिसमें सुमेरु आदिक पर्वत भी समाय रहे हैं ! वह कौन अणु है जिसमें निमेष में कल्प और कल्प में निमेष है और वह कौन है जो प्रत्यक्ष और असद्रूप है ? वह कौन है जो सत् और अप्रत्यक्षरूप है ? वह कौन चेतन है जो अचेतन है और वह कौन वायु है जो अवायु रूप है ? वह कौन है जो अशब्दरूप है और वह कौन है जो सर्व और निष्किञ्चित् है ? वह कौन अणु है जिसमें अहं नहीं है ? वह कौन है जिसको अनेक जन्मों के यत्न से पाता है और पाके कहता है कि कुछ नहीं पाया और सब कुछ पाया ? वह कौन अणु है जिसमें सुमेरु आदिक तीनों भुवन तृणसमान हैं और वह कौन अणु है जो अनेक योजनों को पूर्ण करता है ? वह कौन अणु है जिसके देखने से जगत् फुर आता है और वह कौन अणु है जो अणुता को त्यागे बिना सुमेरु आदिक स्थूल आकार को प्राप्त होता है ? वह कौन अणु है जो बाल का सौवाँ भाग और सुमेरु से भी ऊँचा हुआ है ? वह कौन अणु है जिसमें सब अनु-

२६०योगवाशिष्ठ ।

भव स्थित है और वह कौन अणु है जो अत्यन्त निस्स्वाद है और आप ही सब स्वाद होता है ? वह कौन अणु है जिसको अपने ढाँपने की सामर्थ्य नहीं और सबको ढाँप रहा है और वह कौन अणु है जिससे सब जीते हैं ? वह कौन अणु है जिसका अवयव कोई नहीं और सब अवयव को धारण कर रहा है ? वह कौन निमेष है जिसमें बहुतेरे कल्प स्थित हैं ? वह कौन अणु है जिसमें अनन्त जगत् स्थित है जैसे बीज में वृक्ष होता है ? वह कौन अणु है जिसमें बीज से आदि फल पर्यन्त अनउदय हुए भी भासते हैं ? वह कौन है जो प्रयोजन और कर्तृत्व से रहित है और प्रयोजनवान् और कर्तृत्ववान् की नाई स्थित है ? वह कौन द्रष्टा है जो दृश्य से मिलाकर दृश्य होता है और वह कौन है जो दृश्य के नष्ट हुए भी आपको अखण्ड देखता है ? वह कौन है जिसके जाने से द्रष्टा दर्शन-दृश्य तीनों लय हो जाते हैं, जैसे सोने के जाने से भूषणभाव लीन हो जाते हैं और वह कौन है जिससे भिन्न कुछ नहीं जैसे जल भिन्न तरंगों का अभाव है ? वह एक ही कौन है जो देश काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित सत् असत् की नाईं स्थित है और वह कौन अद्वैत है जिससे द्वैत भी भिन्न नहीं—जैसे समुद्र से तरंग भिन्न नहीं ? वह कौन है जिसके देखे सत्ता असत्ता सब लीन होती है और वह कौन है जिसमें अभ्ररूपी अनन्त जगत् स्थित है—जैसे बीज में वृक्ष होता है ? वह कौन है जो सबके भीतर है—जैसे वृक्ष में बीज होते हैं और वह कौन है जो सच्चा असत्तारूपी आप ही हुआ है—जैसे बीज वृक्षरूप है और वृक्ष बीजरूप है ? वह अणु कौन है जिसमें ताँत भी सुमेरु की नाईं स्थूल है और जिसके भीतर कोटि ब्रह्माण्ड हैं ? हे राजन् ! उस अणु को देखा हो तो कहो । यही मुझको संशय है इसको तुम अपने मुख से दूर करो । जिससे संशय निवृत्त न हो उसको पण्डित न कहना चाहिए । जो ज्ञानवान् हैं उनको इन प्रश्नों का उत्तर कहना सुगम है । इन संशयों को वह शीघ्र ही निवृत्त कर देते हैं । जो अज्ञानी हैं उनको उत्तर देना कठिन है । हे राजन् ! जो तुमने मेरे प्रश्नों का उत्तर दिया तो तुम मेरे पूजने योग्य हो और जो मूर्खता से प्रश्नों का

उत्पत्ति प्रकरण । २६१

उत्तर न दोगे और प्रश्नों के विपर्यय जानोगे जो तुम दोनों को भोजन कर जाऊँगी और फिर तुम्हारी सब प्रजा को ग्रास कर लूँगी, क्योंकि मूर्ख पापियों का मारना श्रेष्ठ है कि आगे को पाप करने से छूटेंगे। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार राक्षसी कहकर और शुद्ध आशय को लेकर तूष्णीम हुई और जैसे शरत्काल में मेघ-मण्डल निर्मल होता है तैसे निर्मल हुई ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीप्रश्नवर्णनन्नाम-पञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अर्धरात्रि के समय महाशून्य वन में जब उस राक्षसी ने महाप्रश्न किये तब महामन्त्री ने उससे कहा, हे राक्षसी ! ये जो तुमने संशयप्रश्न किये हैं उनका मैं क्रम से उत्तर देता हूँ। जैसे उन्मत्त हाथी को केसरी सिंह नष्ट करता है तैसे मैं तेरे संशयों को निवृत्त करता हूँ। तूने सब प्रश्न परमात्मा ही के विषय किये हैं इससे तेरे सब प्रश्नों का एक ही प्रश्न है, परन्तु तूने अनेक प्रकार से किये हैं सो ब्रह्मवेत्ता के योग्य हैं। हे राक्षसी ! जो अनामारूप है अर्थात् सर्व इन्द्रियों का विषय नहीं और अगम है और मन की चिन्तना से रहित है ऐसी सत्ता चिन्मात्र है और उसका आकार भी सूक्ष्म है इस कारण सूक्ष्म कहाता है। सूक्ष्मता से ही उसकी अणु संज्ञा है। उस अणु में सब असत् की नाईं जगत् स्थित है और उसही चिद्अणु में जब कुछ संवेदन फुरता है वही संवेदन सत्य असत्य जगत् की नाईं भासता है इससे उसे चित्त कहते हैं। सृष्टि से पूर्व उसमें कुछ न था इससे निष्किञ्चन कहाता है। और इन्द्रियों का विषय नहीं इससे न किञ्चित् है। उसी चिद्अणु में सब का आत्मा है इससे वह अनन्त भोक्ता पुरुष किञ्चन है और उससे कुछ भिन्न नहीं, इससे किञ्चन नहीं। वही चिद्अणु सबका आत्मा है और एक ही आभास से अनेकरूप भासता है—जैसे सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण भासते हैं। वही चिद्अणु परमाकाशरूप है जो आकाश से भी सूक्ष्म और मन वाणी से अतीत है। सर्वात्मा है; शून्य कैसे हो ? सत् को जो शून्य कहते हैं वह उन्मत्त हैं, क्योंकि असत् भी सत् बिना सिद्ध नहीं

२६२ योगवाशिष्ठ ।

होता । जिसके आश्रय असत् भी सिद्ध होता है सो सत् है । वह चिद्- अणु पञ्चकोशों में नहीं छिपता । जैसे कपूर की गन्ध नहीं छिपती तैसे ही पञ्चकोश में आत्मा नहीं छिपती । अनुभवरूप है । वही चिन्मात्र सर्व- रूप से किञ्चित् है और अचेतन चिन्मात्र है, इससे अकिञ्चित् इन्द्रियों से रहित और निर्मल है । उस ही चिद्अणु में फुरने से अनेक जगत् स्थित हैं। जैसे समुद्र में फुरने से तरङ्ग उपजते हैं और फिर लीन होते हैं तैसे ही चिद्अणु में फुरने से अनेक जगत् उपज के लीन होते हैं वह मन और इन्द्रियों से अतीत है इससे शून्य कहाता है और अपने आपही प्रकाशता है इससे अशून्य है । हे राक्षसी ! मेरा और तेरा अहं एक ही आत्मा है । अहं की अपेक्षा से त्वं है और त्वं की अपेक्षा से मैं परिच्छिन्न हूँ, परन्तु दोनों का उत्थान एक आत्मतत्त्व में ही है । उसही चिद्अणु के बोध से ब्रह्मरूप होता है और उसही बोध में अहं त्वं सब लीन होते हैं, अथवा सर्व आपही होता है । त्रिपुटीरूप भी वही है । वहाँ चिद्अणु अनेक योजनों पर्यन्त जाता है कदाचित् चलायमान नहीं होता, क्योंकि संवित् अनन्तरूप है । योजनों के समूह उसके भीतर हैं वास्तव में न कोई आता है और न जाता है, अपने आकाश- कोश में सब देश काल स्थित है । जिसमें सब कुछ हो उसकी प्राप्ति वास्तव में क्या हो ? यह जितना जगत् है वह तो आत्मा में है फिर आत्मा कहाँ जावे ? जैसे माता की गोद में पुत्र हो तो फिर वह उस निमित्त कहाँ जावे तैसे ही आत्मा में यह जगत् स्थित है फिर आत्मा कहाँ जाय; देह की अपेक्षा से चलता है भासता है वह कदाचित् चला नहीं । जैसे आकाश में घटादिक स्थित हैं तैसे ही चिद्अणु में देशकाल स्थित है । जैसे घट एकदेश से देशान्तर को जावे तो घट जाता है आकाश नहीं जाता, पर घट की अपेक्षा से आकाश जाता भासता है । वास्तव में घटाकाश कहीं नहीं गया, क्योंकि आकाश में सब देश स्थित हैं यह कहाँ जावे; तैसे ही आत्मा भी जाता है और नहीं जाता । उसही चिन्मात्र परमात्मा में संवेदन आकार रचे हैं और आदि अन्त से रहित विचित्र- रूपी जगत् रचा है । वही चिद्अणु अग्नि की नाई प्रकाशरूप है और

उत्पत्ति प्रकरण । २६३

जलाने से रहित है । ज्ञान अग्नि से प्रकाशमान है; अग्नि भी उससे उपजी है और सर्वगता वही है । द्रव्यों को पचाता भी वही है; प्रलय में सब भूत उसमें ही लीन होते हैं और पुष्कल मेघ इकट्ठा हों तो भी उसको आवरण नहीं कर सकते । वह सदा प्रकाश और ज्ञानरूप है; आकाश से भी निर्मल है और अग्नि भी उससे उत्पन्न होती है । सबको सत्ता देनेवाला वही है और सूर्यादिक भी उसके प्रकाश से प्रकाशते हैं वह अनुभवरूप है और नेत्रों बिना भासता है । ऐसा हृदयरूपी मन्दिर का दीपक आत्मा अनन्त और परम प्रकाशरूप है और मन और इन्द्रियों का विषय नहीं । वह लता फूल, फल आदिक सबको आत्मतत्त्व से प्रकाशता है सबका अनुभवकर्त्ता वही है और काल, आकाश, क्रिया आदिक पदार्थों को सत्ता देनेवाला भी वही चिदणु है । सबका स्वामी कर्त्ता वही है; सबका पिता भोक्ता भी वही है; और सदा अकर्त्ता अभोक्तारूप है । जैसे स्वप्न में कर्त्ता भोक्ता भासता है पर अकर्त्ता अभोक्ता है; उससे भिन्न नहीं, इस कारण किञ्चनरूप है और जगत् को धारण करनेवाला है । स्वरूप से मातृ, मान, मेय जिससे प्रकाशते हैं और कुछ उपजा नहीं । चिदात्मा का किञ्चन है; किञ्चन से जगत् की नाईं भासता है । तूने जो पूछा था कि 'दूर और निकट कौन है' सो अलब्धभाव से दूर भी वही है और चिद्रूपभाव से निकट भी वही है अथवा ज्ञान से निकट है और अज्ञान से दूर से दूर है । अज्ञान से तपरूप है और ज्ञान से प्रकाशरूप भी वही है और उसही चिदणु में संवेदन से सुमेरु आदिक स्थित हैं । हे राक्षसी ! जो कुछ जगत् भासता है वह सब संवेदनरूप है । सुमेरु आदिक पदार्थ कुछ उपजे नहीं, चिद्सत्ता ज्यों की त्यों स्थित है; उसमें जैसा संवेदन फुरता है तैसा आकार हो भासता है । जहाँ निमेष का संवेदन फुरता है वहाँ निमेष कहाता है और जहाँ कल्प का संवेदन फुरता है वहाँ उसे कल्प कहते हैं । कल्प, क्रिया आदिक जगत्विलास सब निमेष में फुर आये हैं । जैसे मन के फुरने से बहुत योजनों पर्यन्त पुरुष देख आता है और जैसे छोटे शीशे में बड़े विस्तार नगर का प्रति-बिम्ब समा जाता है तैसे ही एक निमेष के फुरने में सब जगत् फुर आता

२६४योगवाशिष्ठ ।

है। एक निमेष में कल्प, समुद्र, पुर इत्यादिक अनन्त योजनों-का विस्तार चिदणु में स्थित है और एक दो के क्रम से रहित है। हे राक्षसी ! इस जगत् का स्वरूप कुछ नहीं, संवेदन से भासता है; जैसा-जैसा संवेदन में दृढ़ प्रतीत होता है तैसा ही तैसा अनुभव होता है। देख, क्षण के स्वप्न में सत् असत् जगत् स्फुर आता है और बहुत काल का अनुभव होता है। जो दुःखी होते हैं उनको थोड़े काल में बहुत काल भासता और सुखी जनों को बहुत काल में थोड़ा काल भासता है। जैसे हरि-श्चन्द्र को एक रात्रि में द्वादश वर्ष का अनुभव हुआ था। इससे जितना जितना संवेदन दृढ़ होता है उतने देश काल हो भासते हैं और सत् भी असत् की नाईं भासता है जैसे सुवर्ण में भूषणबुद्धि होती है तो भूषण भासते हैं और समुद्र में तरङ्गों की दृढ़ता से तरङ्ग भिन्न भासते हैं; तैसे ही निमेष में कल्प भासते हैं पर वास्तव में न निमेष है; न कल्प है; न दूर है न निकट है, चिदणु आत्मा का सब आभास है। हे राक्षसी ! प्रकाश और तम; दूर और निकट सब चेतन सम्पुट में रत्नों की नाईं है और वास्तव में अनन्यरूप है, भेदाभेद कुछ नहीं। हे राक्षसी ! जब तक दृश्य का सद्भाव दृढ़ होता है तब तक द्रष्टा नहीं भासता—जैसे जब तक भूषणबुद्धि होती है तब तक सुवर्ण नहीं भासता और जब सुवर्ण जाना गया तब भूषणबुद्धि नहीं रहती सुवर्ण ही भासता है; तैसे ही जब तक दृश्य का स्पन्दभाव होता है तब तक द्रष्टा नहीं भासता और जब आत्मज्ञान होता है तब केवल ब्रह्मसत्ता ही निर्मल हो सरूप से सर्वत्र भासती है। दुर्लक्ष्यता अर्थात् मन और इन्द्रियों के अविषय से असतरूप कहते हैं; चैत्यता से उसको चेतन कहते हैं और चेत्य के अभाव से अचेतनरूप कहते हैं अर्थात् चेत्य के अभाव से अचेत्य चिन्मात्र कहते हैं। चेतन चमत्कार से जगत् की नांई हो भासता है। हे राक्षसी ! और जगत् उससे कोई नहीं—जैसे वायु का गोला वृत्ताकार हो भासता है और सघनरूप से मृगतृष्णा की नदी भासती है तैसे ही एक अद्वैत चेतन घन चैतन्यता से जगत् की नांई हो भासता है। जैसे सघन शून्यता से आकाश में नीलता भासती है तैसे ही दृढ़ सघन चेतनता से जगत्

उत्पत्ति प्रकरण । २६५

भासता है । जैसे सूर्य की सूक्ष्म किरणों का किञ्चन मृगतृष्णा का जल होता है; उस नदी का प्रमाण कुछ नहीं तैसे ही इस जगत् की आस्था भासती है पर सब आकाशरूप है । जैसे अभ्र से धूलि के कण में स्वयं की नाईं चमत्कार होता है तैसे ही जगत्कल्पना चित्त के फुरने से भासती है । जैसे स्वप्नपुर और गन्धर्वनगर आकार सहित भासते हैं सो न सत् हैं न असत् हैं तैसे ही यह जगत् दीर्घ स्वप्न है; तो न सत् है और न असत् है । हे राक्षसी ! जब आत्मा में अभ्यास हो तब यह कुण्डादिक ऐसे ही रहें और आकाशरूप हो भासैं । कुण्डादिक भी आकाशरूप हैं; आकाश और कुण्डादिकों में भेद कुछ नहीं मूढ़ता से भेद भासता है । ज्ञानी को सब चिदाकाशरूप भासता है । हे राक्षसी ! ब्रह्मा से तृणपर्यन्त के संवेदन में जैसी कल्पना दृढ़ हो रही है तैसे ही भासती है और वास्तव में वही चिदाकाश प्रकाशता है । घन चेतनता से वही चिदाकाश आकारों की नाईं प्रकाशता है और उसी का यह प्रकाश है । जैसे बीज और वृक्ष अनन्यरूप हैं तैसे ही असंख्यरूप जगत् जो ब्रह्मसत्ता में स्थित है वह अनन्यरूप है । जैसे बीज में वृक्ष का भाव स्थित है सो आकाशरूप है तैसे ही ब्रह्म में जगत् स्थित है सो अछोभरूप है—अन्यभाव को नहीं प्राप्त हुए । ब्रह्मसत्ता सब ओर से शान्तरूप, अज, एक, और आदि-मध्य-अन्त से रहित है । उसमें एक और द्वैत की कल्पना नहीं । वह अनउदय ही उदय हुआ है और निर्मल स्वप्रकाश आत्मा है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीप्रश्नभेदो नाम षट्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, बड़ा आश्चर्य है कि मन्त्री ने तो यह परमपावन परमार्थ वचन कहे और कमलनयन राजा ने भी कहा, हे राक्षसी ! यह जो जाग्रत् जगत् की प्रतीति होती है इसका जब अभाव हो तब आत्मा प्रतीति होती है । जब सब संकल्प की चैत्यता का नाश हो तब आत्मा का साक्षात्कार हो । उस आत्मसत्ता में संवेदन फुरने से जगत् भासता है और संवेदन के संकोच से सृष्टि का प्रलय होता है । सबका अधिष्ठान-रूप वही आत्मसत्ता है तिसको वेदान्तवाक्य जतावने के अर्थ कुछ कहते

२६६ योगवाशिष्ठ ।

हैं क्योंकि वाणी से अतीतपद है । हे राक्षसी ! यह जो द्रष्टा, दर्शन और दृश्य है इसके अन्तर जो अनुभवसत्ता है सो परमात्मा है । वह परमात्मा ही द्रष्टा, दर्शन, दृश्यरूप होकर भासता है ! उसी में यह सब जगल्लीला है; नानात्वभाव से भी वह कुछ खण्डितभाव को नहीं प्राप्त हुआ; अखण्ड ही है। उसी तन्मात्रसत्ता को ब्रह्म कहते हैं। हे भद्रे वही ! चिदणु संवेदन से वायुरूप हुआ है और वायु उसमें अत्यन्त भ्रान्ति मात्र है, क्योंकि केवल शुद्ध चिन्मात्र है । जब उसमें शब्द का संवेदन फुरता है तब शब्दरूप हो भासता है और शब्दरूप उसमें भ्रान्तिमात्र है । उसमें शब्द और शब्द का अर्थ देखना दूर से दूर है, क्योंकि केवल चिन्मात्र है । उसमें अहं त्वं कुछ नहीं । वह निष्किञ्चन है ऐसे रूप होकर भासता है; क्योंकि शक्तिरूप है । उसमें जैसी प्रतिभा फुरती है तैसा ही होकर भासता है इससे फुरना ही इस जगत् का कारण है। जो अनेक यत्नों से मिलता है सो भी आत्मसत्ता है। जब उसको कोई पाता है तब उसने कुछ नहीं पाया और सब कुछ पाया है। पाया तो इस कारण नहीं कि आगे भी अपना आप था और सब कुछ इस कारण पाया कि आत्मा को पाने से कुछऔर पाना नहीं रहता । हे राक्षसी! अज्ञानरूपी वसन्तऋतु में जन्मों की परम्परा बेलि तब तक बढ़ती जाती है जब तक इसका काटनेवाला बोधरूपी खड्ग नहीं प्राप्त हुआ। जब बोधरूपी खड्ग प्राप्त होता है तब जन्मरूपी बेलि को काटता है। हे राक्षसी ! चिदणु संवेदन द्वारा आपको दृश्य में प्रीति करता है-जैसे किरणों का चमत्कार जलरूप होकर स्थित होता है-सो शुद्ध ही आपको संवेदन द्वारा फुरता देखता है । चिदणु द्वारा जो जगत् हुआ है सो मेरु से आदि लेकर तीनों भुवनों में किरणों की नाईं स्थित-होता है और वास्तव में सब मायामात्र हैं, भ्रम से भासते हैं । जैसे स्वप्न में रागी को स्वप्नस्त्री का आलिङ्गन होता है तैसे ही यह जगत् मन के फुरने से भासता है सो भ्रममात्र है । हे राक्षसी ! सर्वशक्तिरूप आत्मा में जैसे सृष्टि का आदि फुरना हुआ है तैसा ही रूप होकर भासने लगा है । और जैसे संकल्प किया है तैसे ही स्थित हुआ है । इससे सब जगत्

उत्पत्ति प्रकरण । २६७

संकल्पमात्र है। जैसे जिसमें बालक का मन लगता है तैसा ही रूप उस- का हो भासता है; तैसे ही संवित् के आश्रय जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही रूप हो भासता है। हे राक्षसी ! चिद्अणु परमाणु से भी सूक्ष्म है और उसने ही सब जगत् को पूर्ण किया है और सब जगत् अनन्तरूप आत्मा है उसमें संवेदन से जगत् की रचना हुई है। जैसे नटनायक जैसे जैसे बालक को नेत्रों से जताता है तैसे ही तैसे वह नृत्य करता है और जब वह ठहर जाता तब यह भी ठहर जाता है; तैसे ही चित्त के अवलोकन से सुमेरु से तृण पर्यन्त जगत् नृत्य करता है। जैसे चित्त संवेदन अनन्त शक्ति आत्मा में फुरता है तैसे ही तैसे हो भासता है। हे राक्षसी ! देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से आत्मसत्ता रहित है, इस कारण सुमेरु आदिक से भी स्थूल है; उसके सामने सुमेरु आदिक तृण के समान हैं और बाल के अग्र के सहस्रों भाग से भी सूक्ष्म है। अल्पता से ऐसा सूक्ष्म नहीं जिसमें सरसों का दाना भी सुमेरुवत् स्थूल है। माया की कला बहुत सूक्ष्म है उससे भी चिद्अणु सूक्ष्म है, क्योंकि निर्मायिकपद परमात्मा है। जैसे सुवर्ण और भूषण की शोभा समान नहीं अर्थात् स्वर्ण में भूषण कल्पित है समान कैसे हो, तैसे ही माया परमात्मा के समान नहीं क्योंकि कल्पित है। हे राक्षसी ! जैसे सूर्य आदिक सब अनुभव से प्रकाशते हैं इनका सद्भाव कुछ न था उस सत्ता से ही इनका प्रकट होना हुआ है और फिर जर्जरीभूत होते हैं। शुद्ध चिन्मात्र सत्ता प्रकाशरूप है और वह सदा अपने आपमें स्थित है उस चिद्अणु के भीतर बाहर प्रकाश है और यह जो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदिक प्रकाश हैं सो तम से मिले हुए हैं अर्थात् भेदरूप हैं। ये भी तमरूप हैं, क्योंकि प्रकाश की अपेक्षा रखते हैं। इसमें इतना भेद है कि प्रकाश शुक्लरूप है और तम कृष्णरूप है इससे रङ्ग का भेद है प्रकाशरूप कोई नहीं। जैसे मेघ का कुहिरा श्याम होता है और वरफ का शुक्ल होता है पर दोनों कुहिरे हैं; तैसे ही तम और प्रकाश दोनों तुल्य हैं और आत्मसत्ता दोनों को प्रकाशती है इससे दोनों का आश्रयभूत आत्मसत्ता ही है। हे राक्षसी ! रात्रि, दिन, भीतर, बाहर, नदियाँ, पहाड़ आदिक सब लोक आत्मसत्ता

२६८योगवाशिष्ठ ।

के प्रकाश से प्रकाशते हैं—जैसे—कमल और नीलोत्पल दोनों को सूर्य प्रकाशता है । कमल श्वेत है और नीलोत्पल श्याम है; जहाँ श्वेत कमल है वहाँ नीलोत्पल का अभाव है और जहाँ नील कमल है वहाँ श्वेत कमल का अभाव है पर दोनों का प्रकाशक सूर्य है; तैसे ही तम और प्रकाश दोनों का प्रकाशक चिदात्मा है । जैसे रात्रि और दिन दोनों सूर्य से सिद्ध होते हैं तैसे ही तम और प्रकाश दोनों आत्मा से सिद्ध होते हैं । जैसे दिन तब कहाता है, जब सूर्य उदय होता है और जब सूर्य अस्त होता है तब रात्रि होती है; आत्मा तैसे भी नहीं । आत्मप्रकाश सदा उदयरूप है और उदय अस्त से रहित भी है । उस बिना कुछ सिद्ध नहीं होता सबका प्रकाश चिद्अणु ही है । हे राक्षसी ! उस अणु के भीतर विचित्र अनुभव अणु है । जैसे वसन्तऋतु में पत्र, फूल, फल और टास होते हैं तैसे ही चिद्अणु में सब अनुभव अणु होते हैं । जैसे एक बीज से अनेक वृक्ष क्रम से हो जाते हैं तैसे ही एक चिद्अणु से अनेक अनुभव अणु होते हैं। कई व्यतीत हुए हैं; कई वर्त्तमान हैं और कई होंगे । जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं सो कोई अब वर्त्तते हैं और कई आगे होंगे; तैसे ही आत्मा में तीनों काल की सृष्टि वर्त्तती है । हे राक्षसी ! चिद्अणु आत्मा उदासीन है और आसीन की नाईं स्थित होता है । सबका कर्त्ता भी है और भोक्ता भी है और स्पर्श किसी से नहीं किया जाता । जगत् की सत्यता उसी से उदय होती है इस कारण वह सबका कर्त्ता है और सबका अपना आप है इससे सबको भोगता है । वास्तव में न कुछ उपजा है और न लीन होता है । चिन्मात्रसत्ता ज्यों की त्यों सदा अपने आपमें स्थित है और अखण्ड और सूक्ष्म है इस कारण किसी से स्पर्श नहीं किया जाता है । हे राक्षसी ! जो कुछ जगत् दीखता है वह सब आत्मरूप है; आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । आत्मा और जगत् कहनेमात्र को दोनों नाम हैं वास्तव में एक आत्मा ही है । आत्मा का चमत्कार ही जगत्रूप हो भासता है । वास्तव में जगत् कुछ बना नहीं चिन्मात्रसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है और जो कुछ कहना है वह उपदेश के निमित्त है वास्तव में दूसरी कुछ वस्तु नहीं

उत्पत्ति प्रकरण। २६६

बनी--तीनों जगत् चिदाकाशरूप हैं। हे राक्षसी द्रष्टा! जब दृश्य पद को प्राप्त होता है तब स्वाभाविक ही अपने भाव को नहीं देखता। जैसे नेत्र जब घट को देखता है तब घट ही भासता है अपना नेत्रत्वभाव नहीं दृष्टि आता; तैसे ही दृश्य के होते द्रष्टा नहीं भासता और जब दृश्य नष्ट होता है तब द्रष्टा भी अवास्तव है, क्योंकि द्रष्टा भी दृश्य के सम्बन्ध से कहते हैं। जब दृश्य नष्ट हो जावे तब द्रष्टा किसको कहिये। दृश्य विषय-भूत वह होता है जो अदृश्य है; वह विषयभूत किसी का नहीं इस कारण उसमें और कोई कल्पना नहीं बनती और यह जगत् भी उसका ही आभास है। हे राक्षसी! जैसे भोक्ता बिना भोग नहीं होते, तैसे ही द्रष्टा बिना दृश्य नहीं होता। जैसे पिता बिना पुत्र नहीं होता; तैसे ही एक बिना द्वैत नहीं होते। हे राक्षसी! द्रष्टा को दृश्य उपजाने की सामर्थ्य है। दृश्य को द्रष्टा उपजाने की सामर्थ्य नहीं, क्योंकि दृश्य जड़ है। जैसे सुवर्ण से भूषण बनता है पर भूषण से स्वर्ण नहीं बनता, तैसे ही द्रष्टा से दृश्य होता है; दृश्य से द्रष्टा नहीं होता। हे राक्षसी! सुवर्ण में जैसे भूषण है तैसे ही द्रष्टा में जो दृश्य है वह भ्रमरूप है-इसी से जड़रूप है। जब द्रष्टा दृश्य को देखता है तब दृश्य दृश्य भासता है द्रष्टृत्वभाव नहीं भासता और जब द्रष्टा अपने स्वभाव में स्थित होता है तब दृश्य नहीं भासता। जैसे जब तक भूषणबुद्धि होती है तब तक सुवर्ण नहीं भासता-भूषण ही भासता है और जब सुवर्ण का ज्ञान होता है तब सुवर्ण ही भासता है-भूषण नहीं भासता। एक सत्ता में दोनों नहीं सिद्ध होते जैसे अन्धकार में किसी पुरुष को देखकर उसमें पशुत्वभ्रम हो तो जब तक पशुबुद्धि होती है तब तक पुरुष का निश्चय नहीं होता और जब निश्चय करके पुरुष जाना तब फिर पशुबुद्धि नहीं रहती, तैसे ही जब द्रष्टा दृश्य को देखता है तब द्रष्टाभाव नहीं दीखता दृश्य ही भासता है। जैसे रस्सी के ज्ञान से सर्प का अभाव हो जाता है तैसे ही बोध करके दृश्य का अभाव होता है तब एक ही परमात्मसत्ता भासती है-द्रष्टासंज्ञा भी नहीं रहती। जैसे दूसरे की अपेक्षा से एक कहलाता है और दूसरे के अभाव से एक एक नहीं कह सकते तैसे ही दृश्य के अभाव में द्रष्टा कहना नहीं रहता।

३०० योगवाशिष्ठ ।

केवल शुद्ध संवित्मात्र पद शेष रहता जिसमें वाणी की गम नहीं। जैसे दीपक पदार्थों को प्रकाशता है तैसे ही द्रष्टा दर्शन और दृश्य को प्रकाशता है और बोध से मातृ, मान और मेय त्रिपुटी लीन हो जाती है। जैसे सुवर्ण के जानने से भूषण की कल्पना का अभाव हो जाता है तैसे ही ज्ञान से त्रिपुटी का अभाव हो जाता है केवल शुद्ध अद्वैतरूप रहता है। हे राक्षसी ! परमाणु जो अत्यन्त निस्स्वादरूप है वह सर्व स्वादों को उपजाता है। जहाँ रस सहित होता है वह चिद्अणु करके होता है जैसे आदर्श बिना प्रतिबिम्ब नहीं होता तैसे ही सब स्वाद चिद्अणु बिना नहीं होते। सबको रस देनेवाला चिद्अणु ही है। आत्मभाव से सबका अधिष्ठान है और सूक्ष्म से सूक्ष्म है इससे निस्स्वाद है। वह चिद्अणु आपको छिपा नहीं सकता। सब जगत् को उसने ढाँप रखा है और आप किसी से ढाँपा नहीं जाता। वह चिदाकाशरूप है; सब पदार्थों को सत्ता देनेवाला है और सबका आश्रयभूत है। जैसे घास के बन में हाथी नहीं छिपता तैसे ही आत्मा किसी पदार्थ से नहीं छिपता। हे राक्षसी ! जिससे सब पदार्थ सिद्ध होते हैं और जो सदा प्रकाशरूप है वह मूर्खों को नहीं भासता-यह बड़ा आश्चर्य है। वह सदा अनुभवरूप है और यह सब जगत् उस ही से जीता है। जैसे वसन्त ऋतु से फूल, फल, टास और पत्र फूलते हैं तैसे ही सब जगत् आत्मा से फूलता है। वही चिदात्मा जगतरूप होके भासता है और सर्वात्मभाव से सब उसके ही अवयव हैं। परमार्थ निरवयव और निराकाररूप है उसमें कुछ उदय नहीं हुआ। हे राक्षसी ! एक निमेष के अबोध से चिद्अणु में अनेक कल्पों का अनुभव होता है। जैसे एक क्षण के स्वप्न में पहले आपको बालक और फिर वृद्धअवस्था देखने लगता है। उन कल्पों में जो निमेष है उसमें अनेक कल्प व्यतीत होते हैं क्योंकि अधिष्ठान सर्व शक्तिमान् है जैसा संवेदन जहाँ फुरता है वैसा रूप हो भासता है जैसे स्वप्न में अभोक्ता को भोक्तृत्व का अनुभव होता है। तैसे ही निमेष में कल्प का अनुभव होता है। वासना से आवेष्टित अभोक्ता ही आपको भोक्ता देखता है जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना मरण प्रत्यक्ष देखता है तैसे ही

उत्पत्ति प्रकरण । ३०१

यह जगत् भ्रम से भासता है । जैसी जहाँ स्फूर्ति दृढ़ होती है वैसे ही होकर वहाँ भासता है । हे राक्षसी ! जो कुछ आकर भासते हैं वे भ्रांति मात्र हैं । जैसे निर्मल आकाश में नीलता भासती है तैसे ही आत्मा में विश्व भासता है । आत्मा सर्वगत और सबका अनुभव है । हे राक्षसी ! उसमें व्याप्य-व्यापक भाव भी नहीं क्योंकि सर्व आत्मा है और सर्वरूप भी वही है । जब शुद्धचित्त संवित् संवेदन में फुरता है तब पृथक पृथक भाव चेतता है । इच्छा से जिस पदार्थ की उपलब्धि होती है उसमें व्याप्य-व्यापक भाव की कल्पना होती है—वास्तव में जो इच्छा है वही पदार्थ है । जैसे जल में द्रवता होती है और उससे तरंग, फेन और बुद्बुदे होते हैं सो सब जलरूप हैं जल से भिन्न नहीं, तैसे ही इच्छा से उपजे पदार्थ आत्मरूप हैं उससे भिन्न नहीं । आत्मा देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है; केवल शुद्ध चिन्मात्र और सर्वरूप होकर स्थित हुआ है और सबका अनुभव भी उसी में हुआ है । वह तो शुद्ध सत्तामात्र है उसमें द्वैतकल्पना कैसे कहिये ? हे राक्षसी ! जब कुछ द्वैत होता है तब एक भी होता है; जो कुछ द्वैत ही नहीं तो एक कैसे कहिये ? जैसे धूप की अपेक्षा से छाया है और छाया की अपेक्षा से धूप है; तैसे ही एक की अपेक्षा से द्वैत कहाता है इस कल्पना से जो रहित है वही चिन्मात्ररूप है और जगत् भी उससे व्यतिरिक्त नहीं । जैसे जल और द्रवता में कुछ भेद नहीं । तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । हे राक्षसी ! नाना प्रकार के आरम्भ उसमें दृष्टि आते हैं तो भी आत्मसत्ता सम है । हे राक्षसी ! जब सम्यक्बोध होता है तब द्वैत भी अद्वैतरूप भासता है, क्योंकि अज्ञान से द्वैत कल्पना होती है । वास्तव में द्वैत कुछ नहीं; अज्ञान के अभाव से द्वैत का भी अभाव हो जाता है । ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं जैसे जल और द्रवता, वायु और स्पन्दता और आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । हे राक्षसी ! द्वैत और अद्वैत जानना दुःख का कारण है । द्वैत और अद्वैत की कल्पना से रहित होने को ही परम-पद कहते हैं । द्रष्टारूप जो जगत् है वह चिद्परमाणु में स्थित है और

३०२ योगवासिष्ठ ।

उसमें सुमेरु आदिक स्थित है । बड़ा आश्चर्य है कि माया से चिद् परमाणु में त्रिलोकियों की परम्परा स्थित हैं इसी से असम्भवरूप और मायामय है । जैसे बीज में वृक्ष स्थित है तैसे ही चिदणु में जगत् स्थित है । जैसे शाखा, पत्र, फूल और फल से बीज अपना बीजत्व नहीं त्यागता और अखण्ड रहता है तैसे ही चिदणु के भीतर जगत् का विस्तार है और अणुत्वभाव नहीं त्यागता—अखण्ड ही रहता है । हे राक्षसी ! जैसे बीज परिणाम से वृक्षभाव में प्राप्त होता है तैसे ही चिदणु भी परि-णाम से जगतरूप होता है । सब चिदणु का किञ्चनरूप है इससे ऐसे दिखाई देता है, वास्तव में न द्वैत है, न अद्वैत है, न बीज—न अंकुर है न स्थूल है—न सूक्ष्म है, न कुछ उपजा है—न नष्ट होता है, न अस्ति है—न नास्ति है, न सम है—न असम है और न जगत् है—न अजगत् है; केवल चिदानन्द आत्मसत्ता अचिन्त्यचिन्मात्र अपने आपमें स्थित है, जैसी-जैसी भावना होती है तैसी ही तैसी ही भासती है । हे राक्षसी ! यह अनउदय ही संवेदन के वश से उदय होकर भासता है । जैसे बीज से वृक्ष अनन्यरूप अनेक हो भासता है तैसे ही एक आत्मा अनेकरूप हो भासता है । न कुछ उदय हुआ है और न मिटता है । हे राक्षसी ! उस चिदणु में कमल की डंडी की ताँत सुमेरु की नाईं स्थूल है । जैसे कमल की डंडी की ताँत से सुमेरु स्थूल है तैसे ही चिदणु से कमल की डंडी स्थूल है और दृश्यरूप है, पर चिदणु दृश्य और मन सहित षड्इन्द्रियों का विषय नहीं इस कारण ताँत से भी सूक्ष्म है उस चिद्-अणु में अनन्त सुमेरु आदिक स्थित हैं सो क्या रूप है; जैसे आकाश में शून्यता होती है तैसे ही आत्मा में जगत् है । हे राक्षसी ! जिसको आत्मा का बोध हुआ है उसको जगत् सुषुप्ति की नाईं भासता है । वह आत्मसत्ता अद्वैतरूप और परिणाम से रहित है उसमें मुक्त पुरुष सदा स्थित है । परमार्थ से जगत् भी ब्रह्मरूप है, भिन्नभाव कुछ नहीं ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सूच्युपाख्याने परमार्थनिरूपणन्नाम सप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५७ ॥

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३०४ | योगवाशिष्ट ।

तेरे शरीर का निर्वाह कैसे होगा ? राक्षसी बोली, हे राजन् ! हजार वर्ष में समाधि में स्थित रही और जब समाधि खुली तब मुझको क्षुधा लगी। अब मैं फिर हिमालय पर्वत की कन्दरा में जाकर निश्चल समाधि में, जैसे मूर्ति लिखी होती है, तैसे ही स्थित हूँगी और जब समाधि से उतरूँगी तब अमृत की धारणा में विश्राम करूूँगी । जब उससे उतरूँगी तब शरीर का त्याग करूूँगी परन्तु हिंसा न करूूँगी । हे राजन् ! जिस प्रकार मैंने हिंसाधर्म को अङ्गीकार किया था वह सुन ! मुझको जब बड़ी क्षुधा लगी तब उसके निवारण के अर्थ मैं हिमालय पर्वत के उत्तर शिखर पर वन में एक सोने की शिला के पास लोहे के थम्भ की नाईं जीवों के नाश के निमित्त तप करने लगी और जब बहुत वर्ष व्यतीत हुए तब ब्रह्माजी ने मनोवांछित वर मुझको दिया । तब मेरे दो शरीर हुए—एक आधार-भूत सूर्य की नाईं और दूसरा पुर्यष्टक और मैं विसूचिका नाम राक्षसी हुई । उस शरीर से मैं अनेक जीवों के भीतर जाकर उनको भोजन करती रही, परन्तु ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि जो गुणवान् होंगे और जो 'ॐ' मन्त्र पढ़ेंगे उन पर तेरा बल न चलेगा तू निवृत्त हो जावेगी । हे राजन् ! उसी मन्त्र का उपदेश अब तुम भी अङ्गीकार करो । उस मन्त्र के पाठ से सबके रोग नष्ट होंगे । ब्रह्माजी का जो उपदेश है उसको तुम नदी के तट पर जाकर और पवित्र होकर शीघ्र ही ग्रहण करो । उसके पाठ से तुम्हारी प्रजा का दुःख नष्ट हो जावेगा । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब अर्द्धरात्रि के समय राक्षसी ने कहा तब राजा मन्त्री और राक्षसी तीनों निकट नदी के तीर पर गये और अनन्य व्यति-रेक करके आपस में सुहृद् हुए । जब तीनों पवित्र होकर बैठे तब जो मन्त्र राक्षसी को ब्रह्माजी ने उपदेश किया था वही मन्त्र विसूचिका ने प्रीतिसंयुक्त राजा को उपदेश किया और वहाँ से चलने लगी । तब राजा ने कहा, हे महादेवी ! तू हमारी गुरु है इससे हम कुछ प्रार्थना करते हैं उसे अङ्गीकार कर । जो महापुरुष हैं उनका सुन्दर सुहृदपना बढ़ता जाता है और तुम्हारा शरीर भी इच्छाचारी है। इससे मन के हरने वाले भूषण-वस्त्र संयुक्त स्त्री का सा लघु शरीर धरके कुछ काल हमारे

उत्पत्ति प्रकरण । ३०५

नगर में निवास करो । राक्षसी बोली, हे राजन् ! मैं तो लघु आकार भी धरूँगी परन्तु तुम मुझे भोजन न दे सकोगे । जो लघु स्त्री का शरीर धरूँगी तो भी मेरा स्वभाव राक्षसी का है इसको तृप्त करना समान जनों की नाईं तो नहीं । जैसा कुब्ज शरीर का स्वभाव है सो सृष्टि पर्यन्त तैसा ही रहता है-अन्यथा नहीं होता । राजा बोले, हे कल्याणरूपिणि ! तू स्त्री समान शरीर धरके हमारे नगर में चलकर रह; जो चोर पापी मेरे मण्डल में आवेंगे वे हम तुझे देंगे और तू उन्हें स्त्रीरूप को त्याग करके राक्षसी शरीर से एकान्त ठौर ले जाकर अथवा हिमालय की कन्दरा में जाके भोजन करना, क्योंकि बड़े भोजन करनेवाले को एकान्त में खाना सुखरूप है । जब उनको भोजन करके तृप्त होना तब सो रहना; जब निद्रा से जागना तब समाधि में स्थित होना और जब समाधि से उतरना तब फिर हमारे पास आना हम तेरे निमित्त बन्दीजन इकट्ठे कर रक्खेंगे उनको ले जाकर भोजन करना । जो धर्म के निमित्त हिंसा है वह हिंसा पापरूप नहीं और जिसकी हिंसा करता है उसका मरण भी नहीं बल्कि उस पर दया है, क्योंकि वह पाप करने से छूटता है । राक्षसी बोली, हे राजन् ! तुमने युक्तिसहित वचन कहे हैं इससे मैं स्त्री का शरीर धरके तुम्हारे साथ चलती हूँ । युक्तिपूर्वक वचन को सब कोई मानते हैं इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर राक्षसी ने महासुन्दर स्त्री का शरीर धारण किया और बहुत कङ्कण आदिक नाना प्रकार के भूषण और वस्त्र पहिनकर राजा के साथ चली । निदान राजा और मन्त्री आगे चले और स्त्री पीछे चली । राजा उसको अपने ठाम में ले आया और एकान्त स्थान में तीनों बैठे रात्रि को परस्पर चर्चा करते रहे जब प्रातःकाल हुआ तब सौभाग्यवती स्त्रीरूप राक्षसी राजा के अन्तःपुर में जा बैठी और जो कुछ स्त्रियों का व्यवहार है वह करती रही और राजा और मन्त्री अपने व्यवहार में लगे । इसी प्रकार जब छः दिन व्यतीत हुए तब राजा के मण्डल में जो तीन सहस्र चोर बँधे हुए थे उन सबको उसने कर्कटी को दे दिया और उसने राक्षसी का शरीर धरके उनको भुजा मण्डल में ले