योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । ३४३
है। हे रामजी ! ज्ञानवान् अज्ञानी के उपदेश के निमित्त भेद कल्पते हैं; अपनी दृष्टि में उनको सर्व ब्रह्म ही भासता है। मन आदिक भी जो तुमको भासते हैं वे ब्रह्म से भिन्न नहीं अनन्य और शक्तिरूप हैं। उससे अन्य कोई पदार्थ नहीं; सर्वशक्ति परब्रह्म नित्य और सर्व ओर से पूर्ण अविनाशी है और सबही ब्रह्मसत्ता में है सर्व शक्तिमान आत्मा है। जैसी उसको रुचि है वही शक्ति प्रत्यक्ष होती है और सर्व शक्तिरूप होकर फला है। जीवों में चेतनशक्ति ज्ञान, वायु में स्पन्दता, पत्थर में जड़ता, जल में द्रवता, अग्नि में तेज, आकाश में शून्यता, स्वर्ग में भाव, काल में नाम, शोक में शोक, मुदिता में आनन्द, वीरों में वीर, सर्ग के उपजाने में उत्पत्ति और कल्प के अन्त में नाशशक्ति आदि जो कुछ भाव अभाव शक्ति है सो सब ब्रह्म ही की है। जैसे फूल, फल, बेल, पत्र, शाखा, वृक्ष विस्तार बीज के अन्दर होता है तैसे ही सब जगत् ब्रह्म में स्थित होता है और जीव, चित्त और मन आदिक भी ब्रह्म ही में स्थित हैं। हे रामजी ! जैसे वसन्त ऋतु में एक ही रस नाना प्रकार के फूल, फल, टहनियों सहित बहुत रूपों को धरता है तैसे ही एक ही आकाश ब्रह्म चैत्यता से जगत्रूप हो भासता है और उसमें देशाकालादिक कोई विचित्रता, नहीं सम्पूर्ण जगत् वही रूप है। वह ब्रह्मात्मा सर्वज्ञ, नित्य उदित और बृहद्रूप है। हे रामचन्द्र ! उसी की मनन कलना मन कहाती है। जैसे आकाश में आँख से तरुवरे और सूर्य की किरणों में जल भासता है तैसे ही आत्मा में मन है । हे रामजी ब्रह्म में चित्त मन का रूप है और वह मन ब्रह्म की शक्तिरूप है; इसी कारण ब्रह्म से भिन्न नहीं ब्रह्म ही है—ब्रह्म से भिन्न कल्पना करनी अज्ञानता है । ब्रह्म में मैं ऐसा उत्थान हुआ है इसका नाम मन है और जड़ अजड़रूप मनसे जगत् हुआ है। प्रतियोगी और व्यवच्छेदक संख्यारूप सब मन के कल्पे हैं। प्रतियोगी और व्यवच्छेदक संख्या का भेद यह है कि प्रतियोगी विरोधी को कहते हैं; जैसे चेतन का प्रतियोगी जड़ और व्यवच्छेद इसे कहते हैं कि जैसे घट अविच्छिन्न पट । ऐसे अनेकरूप दृश्य सब मन के कल्पे हैं जैसे-जैसे ब्रह्म में इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों की नाईं मन दृढ़ होता है तैसे ही तैसे भासता
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हे जैसे समुद्र में द्रवता से तरङ्गचक्रदो भासते हैं तैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में जीव फुरने से नाना प्रकार का जगत् हो भासता है परन्तु कुछ हुआ नहीं ब्रह्म ही अपने आप में स्थित है । जैसे तरङ्गों के होने और मिटने में जल एक ही रस रहता है तैसे ही जगत् के उपजने और मिटने से ब्रह्म ज्यों का त्यों है । जैसे सूर्य की किरणों में वृथा तेज से जल भासता है तैसे ही आत्मतत्त्व में विचित्रता भासती है परन्तु सदा अपने आप में स्थित है । हे रामजी ! कारण, कर्म और कर्त्ता, जन्म, मरणादिक जो कुछ भासते हैं सो सब ब्रह्मरूप है ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं और आत्मा शुद्धरूप है उसमें न लोभ है, न मोह है और न तृष्णा है क्योंकि अद्वैत-रूप और सर्वात्मा है । जैसे सुवर्ण से नाना प्रकार के भूषण हो भासते हैं तैसे ही ब्रह्म से जगत् हो भासता है । जो ज्ञानवान् पुरुष है उसको सदा ऐसे ही भासता है । और जो अज्ञानी है उसको भिन्न-भिन्न कल्पना भासती है । जैसे किसी का बान्धव दूर देश से चिरकाल पीछे आवे तो वह देशकाल के व्यवधान से बान्धव को भी अबान्धव जानता है तैसे ही अज्ञान के व्यवधान से जीव अभिन्नरूप आत्मा को भिन्नरूप जानता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासता है तैसे ही सत्य असत्यरूप मन आत्मा में भासता है । उस मन ने शब्द-अर्थरूप भिन्न-भिन्न कल्पना रची हैं पर आत्मतत्त्व सदा अपने आप में स्थित है और उसमें बन्ध मोक्ष कल्पना का अभाव है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मन में जो निश्चय होता है वही होता है अन्यथा नहीं होता पर मन में जो बन्ध का निश्चय होता है सो बन्ध कैसे सत्य है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! बन्ध की कल्पना मूर्ख करते हैं इससे वह मिथ्या है और जो बन्ध की कल्पना मिथ्या हुई तो बन्ध की अपेक्षा से मोक्ष मिथ्या है—वास्तव में न बन्ध है और न मोक्ष है । हे महामते रामजी ! अज्ञान से अवस्तु भी वस्तुरूप हो भासती है-जैसे रस्सी में सर्प भासता है पर ज्ञानवान् को अवस्तु सत्य नहीं भासती । जैसे रस्सी के ज्ञान से सर्प नहीं भासता तैसे ही बन्ध-मोक्ष कल्पना मूर्खों को भासती है, ज्ञानवान् को बन्ध-मोक्ष कल्पना कोई नहीं, हे रामजी ! आदि परमात्मा से मन उपजा है उसने ही बन्ध और मोक्ष
उत्पत्ति प्रकरण । ३४५
मोह से कल्या है और फिर दृश्य प्रपञ्च को रचा है । वह प्रपञ्च कल्पना- मात्र है और बालक की कथावत् मूर्खों को रुंचता है अर्थात् जो विचार से रहित हैं उनको यह जगत् सत्य भासता है ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तचिकित्सावर्णनन्नाम षट्सप्ततितमस्सर्गः ॥ ७६ ॥
रामजी बोले, हे मुनियों में श्रेष्ठ ! बालक की कथा क्या है वह क्रम से कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र ! एक मूर्ख बालक ने दाई से कहा कि कोई अपूर्व कथा जो आगे न हुई हो मुझसे कह । तब उसके विनोद निमित्त महाबुद्धिमान धात्री एक कथा कहने लगी । वह बोली हे पुत्र ! सुन, एक बड़ा शून्य नगर था और उसका एक राजा था । उस राजा के शुभ आचारवान् और बड़े सुन्दर तेजवान् तीन पुत्र थे । उनमें से दो तो उपजे न थे और एक गर्भ में ही आया न था । वे तीनों शुभ आचारवान् और शुभ क्रिया कर्त्ता द्रव्य के अर्थ जीतने को चले और शून्य नगर से बाहर जा निमार्गरूप नगर में वे निर्बन्ध और शोकसहित इकट्ठे ऐसे चले जैसे बुध, शुक्र और शनैश्चर । इकट्ठे चलने का दृष्टान्त शुक्र, शनैश्चर और बुध का नहीं है, निर्बन्ध और शोक का ग्रहणरूप दृष्टान्त है । सरसों के फूलों की नाईं उनके अङ्ग कोमल थे इसलिये वे मार्ग में थक गये और ऊपर से सूर्य की धूप तपने लगी । जैसे ज्येष्ठ- आषाढ़ की धूप से कमल कुम्हिला जाते हैं तैसे ही वे कुम्हिला गये और तप्त चरणों से तपने लगे और महाशोक को प्राप्त हुए । चरणों में डाभ के कण्टक लगे, मुख धूर से धूसर हो गये और तीनों कष्टवान् हुए । आगे चलकर उन्होंने तीन वृक्ष देखे जिनमें से दो तो उपजे नहीं और तीसरे का बीज भी नहीं बोया गया । उन तीनों ने एक-एक वृक्ष के नीचे आकर विश्राम किया—जैसे स्वर्ग में कल्पवृक्ष के नीचे इन्द्र और यम आ बैठे—और उनके फल भक्षण किये, फलों को काट के रस पान किया, उनके फूलों की माला गले में पहिरी और चिरकाल पर्यन्त वहाँ विश्रामकर फिर दूर से दूर चले गये । इतने में मध्याह्न का समय हुआ उसमे वे तपायमान हुए । आगे उन्होंने तीन नदियाँ देखीं और
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उनके निकट गये जो तरङ्गों से लीलायमान थीं । उनमें से दो में तो कुछ भी जल न था और तीसरी सूखी पड़ी थी । उनमें वे चिरकाल पर्यन्त क्रीड़ा करते रहे-जैसे स्वर्ग की गंगा में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कल्लोल करते हैं और जलपान किया । फिर जब दिन अस्त होने लगा तब वहाँ से चले तो एक भविष्यत् नगर देखा जो बड़ी ध्वजाओं से सम्पन्न और रत्न मणि और सुवर्ण से जड़ा मानों सुमेरु का शिखर था । उसमें उन्होंने हीरे और माणिकों से जड़ा हुआ एक मन्दिर देखा जो निराकाररूप था उसमें वे घुस गये तो वहाँ बहुत अंगना देखीं और फिर विचार किया कि रसोई कीजिये और ब्राह्मण को भोजन खवाइये । तब उन्होंने कञ्चन की तीन बटलोइयाँ मँगवाईं जिनमें से दो का करने-वाला तो उपजा नहीं अर्थात् आधार से रहित थीं और तीसरी चूर्णरूप थी । उस चूर्णरूप बटलोई में उन्होंने सोलह सेर रसोई चढ़ाई और ब्रह्मा आदि विदेहरूप और निर्मुख ऋषियों ने भोजन किया । उससे उन्होंने सैंकड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराय आप भी भोजन किया । इस प्रकार वह राजपुत्र आजतक सुख से स्थित हैं । हे पुत्र ! यह रमणीय कथा मैंने तुझसे सुनाई है । यदि तू इसको हृदय में धारेगा तो पंडित होगा । हे रामजी ! इस प्रकार धात्री ने जब बालक को कथा सुनाई तब बालक के मन में सच प्रतीत हुई । जैसे उस कथा का रूप संकल्प से भिन्न कुछ न था तैसे यह जगत् सब संकल्पमात्र है, अज्ञान से हृदय में स्थिर हो रहा है, भ्रम में इससे आस्था हुई है और बन्ध, मोक्ष भी कल्पना-मात्र है संकल्प से भिन्न इसका स्वरूप नहीं । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा निष्किञ्चनरूप है पर संकल्प के वश से किञ्चनरूप हो भासता है । पृथ्वी, वायु, आकाश, नदियाँ, देश आदिक जो पाञ्चभौतिक सृष्टि है सो सब संकल्पमात्र है जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि भासती है और कुछ नहीं उपजी तैसे ही इस जगत् को जानो । जैसे कल्पित राजपुत्र भविष्यत् नगर में स्थित हुए थे और वह रचना संकल्प बालक को स्थिरीभूत हुई थी तैसे ही यह जगत् संकल्पमात्र मन के फुरने से दृढ़ हुआ है । जैसे द्रवता से जो जल में तरङ्ग होते हैं वह जल ही जल है तैसे ही आत्मा
उत्पत्ति प्रकरण । ३५७
ही आत्मा में स्थित है। यह सब जगत् संकल्प से उपजता है और बड़े विस्तार को प्राप्त होता है जैसे दिन होने से सब व्यवहार विस्तार को प्राप्त होते हैं तैसे ही संकल्प से उपजा जगत् विस्तार को प्राप्त होता है और चित् का विलास है, चित् के फुरने से भासता है। इससे हे रामजी संकल्परूपी मैल को त्याग करके निर्विकल्प आत्मतत्त्व का आश्रय करो। जब उस पद में स्थित होंगे तब परम शान्ति की प्राप्ति होगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बालकारूढ्यायिकावर्णनन्नाम सप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मूढ अज्ञानी पुरुष अपने संकल्प से आप ही मोह को प्राप्त होता है और जो पण्डित है वह मोह को नहीं प्राप्त होता। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में पिशाच कल्पकर भय पाता है तैसे ही मूर्ख अपनी कल्पना से दुःखी होता है। रामजी बोले, हे भगवन् ! ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! वह संकल्प क्या है और छाया क्या है जो असत्य ही सत्यरूप पिशाच की नाईं दीखती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पाञ्चभौतिक शरीर परछाहीं की नाईं है, क्योंकि अपनी कल्पना से रचा है और अहंकाररूपी पिशाच है। जैसे मिथ्या परछाहीं में पिशाच को देख के मनुष्य भयवान् होता है तैसे ही देह में अहंकार को देखके खेद प्राप्त होता है। हे रामजी ! एक परम आत्मा सर्व में स्थित है तब अहंकार कैसे हो वास्तव में अहंकार कोई नहीं परमात्मा ही अभेद-रूप है और उसमें अहंबुद्धि भ्रम से भासती है । जैसे मिथ्यादर्शी को मरुस्थल में जल भासता है तैसे ही मिथ्याज्ञान से अहंकार कल्पना होती है। जैसे मणि का प्रकाश मणि पर पड़ता है सो मणि से भिन्न नहीं, मणिरूप ही है, तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है सो आत्मा ही में स्थित है। जैसे जल में द्रवता से चक्र और तरङ्ग हो भासते हैं सो जलरूप ही हैं, तैसे ही आत्मा में चित्त से जो नानात्व हो भासता है सो आत्मा से भिन्न नहीं, असम्यक् दर्शन से नानात्व भासता है इससे असम्यक् दृष्टि को त्याग के आनन्दरूप का आश्रय करो और मोह के आरम्भ को त्याग कर शुद्ध बुद्धि सहित विचारो और विचार से सत्य ग्रहण
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करो, असत्य का त्याग करो । हे रामजी ! तुम मोह का माहात्म्य देखो कि स्थूलरूप देह जो नाशवन्त है उसके रखने का उपाय करना है पर वह रहता नहीं और जिस मनरूपी शरीर के नाश हुए कल्याण होता है उसको पुष्ट करता है । हे रामजी ! सब मोह के आरम्भ मिथ्या भ्रम से दृढ़ हुए हैं, अनन्त आत्मतत्त्व में कोई कल्पना नहीं, कौन किसको कहे । जो कुछ नानात्व भासता है वह है नहीं, और जीव ब्रह्म से अभिन्न है । उस ब्रह्मतत्त्व में किसे बन्ध कहिये और किसे मोक्ष कहिये, वास्तव में न कोई बन्ध है न मोक्ष है, क्योंकि आत्मसत्ता अनन्तरूप है । हे रामजी ! वास्तव में द्वैतकल्पना कोई नहीं, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में है । जो आत्मतत्त्व अनन्त है वही अज्ञान से अन्य की नाईं भासता है । जब जीव अनात्म में आत्माभिमान करता है तब परिच्छिन्न कल्पना होती है और शरीर को अच्छेदरूप जान के कष्टवान् होता है पर आत्मपद में भेद अभेद विकार कोई नहीं, क्योंकि वह तो नित्य, शुद्ध, बोध और अविनाशी पुरुष है । हे रामजी ! आत्मा में न कोई विकार है, न बन्धन है और न मोक्ष है, क्योंकि आत्मतत्त्व अनन्तरूप, निर्विकार, अच्छेद, निराकार और अद्वैतरूप है । उसको बन्ध विकार कल्पना कैसे हो ? हे रामजी ! देह के नष्ट हुए आत्मा नष्ट नहीं होता । जैसे चमड़ी में आकाश होता है तो वह चमड़ी के नाश हुए नष्ट नहीं होता तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा नष्ट नहीं होता । जैसे फूल के नाश हुए गन्ध आकाश में लीन होती है, जैसे कमल पर बरफ पड़ता है तो कमल नष्ट हो जाता है भ्रमर नष्ट नहीं होता और जैसे मेघ के नाश हुए पवन का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता । हे रामजी ! सबका शरीर मन है और वह आत्मा की शक्ति है उसमें यह शरीर आदिक जगत् रचा है । उस मन का ज्ञान बिना नाश नहीं होता तो फिर शरीर आदि के नष्ट हुए आत्मा का नाश कैसे हो ? हे रामजी ! शरीर के नष्ट हुए तुम्हारा नाश नहीं होगा, तुम क्यों मिथ्या शोकवान् होते हो ? तुम तो नित्य, शुद्ध और शान्तरूप आत्मा हो । हे रामजी ! जैसे मेघ के क्षीण हुए पवन क्षीण नहीं होता और कमलों
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के सूखे से भ्रमर नष्ट नहीं होता तैसे ही देह के नष्ट हुए आत्मा नहीं नष्ट होता । संसार में क्रीड़ाकर्त्ता जो मन है उसका संसार में नाश नहीं होता तो आत्मा का नाश कैसे हो ? जैसे घट के नाश हुए घटाकाश का नाश नहीं होता । हे रामजी ! जैसे जल के कुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है और उस कुण्ड के नाश हुए प्रतिबिम्ब का नाश नहीं होता, यदि उस जल को और ठौर ले जायँ तो प्रतिबिम्ब भी चलता भासता है तैसे ही देह में जो आत्मा स्थित है सो देह के चलने से चलता भासता है । जैसे घट के फूटे से घटाकाश महाकाश में स्थित होता है तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा निरामयपद में स्थित होता है । हे रामजी ! सब जीवों का देह मनरूपी है । जब वह मृतक होता है तब कुछ काल पर्यन्त देशकाल और पदार्थ का अभाव हो जाता है और इसके अनन्तर फिर पदार्थ भासते हैं, उस मूर्च्छा का नाम मृतक है । आत्मा का नाश तो नहीं होता चित्त की मूर्च्छा से देश, काल और पदार्थों के अभाव होने का नाम मृतक है । हे रामजी ! संसारभ्रम का रचनेवाला जो मन है उसका ज्ञानरूपी अग्नि से नाश होता है, आत्मसत्ता का नाश कैसे हो ? हे रामजी ! देश काल और वस्तु से मन का निश्चय विपर्यय भाव को प्राप्त होता है; चाहे अनेक यत्न करे परन्तु ज्ञान विना नष्ट नहीं होता । हे रामजी ! कल्पितरूप जन्म का नाश नहीं होता तो जगत् के पदार्थों से आत्मसत्ता का नाश कैसे हो ? इसलिए शोक किसी का न करना । हे महाबाहो ! तुम तो नित्यशुद्ध अविनाशी पुरुष हो । यह जो सङ्कल्प वासना से तुममें जन्म-मरण आदिक भासते हैं सो भ्रममात्र है । इससे इस वासना को त्याग के तुम शुद्ध चिदाकाश में स्थित हो जाओ । जैसे गरुड़ पक्षी अण्डा त्याग के आकाश को उड़ता है तैसे ही वासना को त्याग करके तुम चिदाकाश में स्थित हो जाओ । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा में मनन फुरता है वही मन है, वह मनन शक्ति इष्ट और अनिष्ट से बन्धन का कारण है और वह मन मिथ्या भ्रान्ति से उदय हुआ है । जैसे स्वप्न द्रष्टा भ्रान्तिमात्र होता है तैसे ही जाग्रत् सृष्टि भ्रान्तिमात्र है । हे रामजी ! यह जगत् अविद्या से बन्धनमय और दुःख का कारण
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है और उस अविद्या को तरना कठिन है। अविचार से अविद्या सिद्ध है, विचार किये से नष्ट होती है। उसी अविद्या ने जगत् विस्तारा है। यह जगत् बरफ की दीवार है। जब ज्ञानरूपी अग्नि का तेज होगा तब निवृत्त हो जावेगी। हे रामजी ! यह जगत् आकाशरूप है, अविद्या भ्रान्ति दृष्टि से आकार हो भासता है और असत्य अविद्या से बड़े विस्तार को प्राप्त होता है। यह दीर्घ स्वप्ना है, विचार किये से निवृत्त हो जाता है। हे रामजी ! यह जगत् भावनामात्र है, वास्तव में कुछ उपजा नहीं। जैसे आकाश में भ्रान्ति से मोर के पुच्छ की नांई तरुवरे भासते हैं तैसे ही भ्रान्ति से जगत् भासता है। जैसे बरफ की शिला तप्त करने से लीन हो जाती है तैसे ही आत्मविचार से जगत् लीन हो जाता है। हे रामजी! यह जगत् अविद्या से बँधा है सो अनर्थ का कारण है। जैसे-जैसे चित्त फुरता है तैसे ही तैसे हो भासता है। जैसे इन्द्रजाली सुवर्ण की वर्षा आदिक माया रचता है तैसे ही चित्त जैसा फुरता है तैसा ही हो भासता है। आत्मा के प्रमाद से जो कुछ चेष्टा मन करता है वह अपने ही नाश के कारण होती है। जैसे घुरान अर्थात् कुसयारी की चेष्टा अपने ही बन्धन का कारण होती है तैसे ही मन की चेष्टा अपने नाश के निमित्त होती है और जैसे नटवा अपनी क्रिया से नाना प्रकार के रूप धारता है तैसे ही मन अपने सङ्कल्प को विकल्प करके नाना प्रकार के भावरूपों को धारता है। जब चित्त अपने सङ्कल्प विकल्प को त्यागकर आत्मा की ओर देखता है तब चित्त नष्ट हो जाता है और जब तक आत्मा की ओर नहीं देखता तब तक जगत् को फैलाता है सो दुःख का कारण होता है। हे रामजी! सङ्कल्प आवरण को दूर करो तब आत्मतत्त्व प्रकाशेगा सङ्कल्प विकल्प ही आत्मा में आवरण है। जब दृश्य को त्यागोगे तब आत्मबोध प्रकाशेगा। हे रामजी ! मन के नाश में बड़ा आनन्द उदय होता है और मन के उदय हुए बड़ा अनर्थ होता है, इससे मन के नाश करने का यत्न करो । मन के बढ़ाने का यत्न मत करो। हे रामजी ! मनरूपी किसान ने जगतरूपी वन रचा है, उसमें सुख-दुःखरूपी वृक्ष हैं और मनरूपी सर्प रहता है। जो विवेक से रहित पुरुष हैं उनको वह भोजन करता है। हे
उत्पत्ति प्रकरण । ३५१
रामजी ! यह मन परम दुःख का कारण है; इसमें तुम इस मनरूपी शत्रु को वैराग्य और अभ्यासरूपी खड्ग से मारो तब आत्मपद को प्राप्त होगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा तब सायंकाल का समय हुआ और सब श्रोता परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये और फिर सूर्य की किरणों के उदय होने पर अपने-अपने स्थान पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मननिर्वाणोपदेशवर्णन- नामाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ ७८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह चित्र भी परमात्मा से उठे है । जैसे समुद्र में लीला से जलकणिका होती है तैसे ही परमात्मा से मन हुआ है । उस मन ने बड़े विस्तार का जगत् रचा है जो छोटे को बड़ा कर लेता है और बड़े को छोटा करता है, जो अपना आप रूप है उसको अन्य की नाईं दिखाता है और जो अन्य रूप है उसको अपना रूप दिखाता है अर्थात् आत्मा को अनात्मभाव प्राप्त करता है और अनात्मा को आत्मभाव प्राप्त करता है । ऐसा भ्रान्तिरूप मन निकट वस्तु को दूर दिखाता और दूर वस्तु को निकट दिखाता है—जैसे स्वप्ने में निकट वस्तु दूर भासती है और दूर वस्तु निकट भासती है । हे रामजी ! मन एक निमेष में संसार को उत्पन्न करता और एक निमेष में ही लीन कर लेता है । जो कुछ स्थावर-जङ्गमरूप जगत् भासता है वह सब मन ही से उपजा है और देश, काल, क्रिया और द्रव्य अनेक शक्ति विपर्ययरूप मन ही दिखाता है और अपने फुरने से नाना प्रकार के भाव अभाव को प्राप्त होता है । जैसे नट लीला करके नाना प्रकार के स्वांग रचता और सच को झूठ और झूठ को सच दिखाता है वैसे ही मन में जैसा फुरना दृढ़ होता है वैसे ही भासता है । जैसा-जैसा निश्चय चञ्चल मन में होता है उनके अनुसार इन्द्रियाँ भी विचरती हैं । हे रामजी ! जो मन से चेष्टा होती है वही सफल होती है, शरीर की चेष्टा मन बिना सफल नहीं होती । जैसे जैसा बेल का बीज होता है वैसा ही उसका फल होता है और प्रकार नहीं होता वैसे ही जो कुछ
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मन में निश्चय होता है वही सफल होता है। जैसे बालक मृत्तिका की सेना बनाता है और नाना प्रकार के उसके नाम रखता है वैसे ही मन भी संकल्प से जगत् रच लेता है। जैसे मिट्टी की सेना मिट्टी से भिन्न नहीं वैसे ही आत्मा में जो नाना प्रकार का जगत् कल्पता है वह आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे संकल्प में मन नाना प्रकार अर्थों को कल्पता है वैसे ही जाग्रत् जगत् भी भ्रम से कल्पता है। हे रामजी! एक गोपद में मन अनेक योजन रच लेता है और कल्प का क्षण और क्षण का कल्प रच लेता है। जैसा कुछ मन में तीव्र संवेग होता है वैसा ही होकर भासता है, उसको रचने में विलम्ब नहीं लगता; जो कुछ देश काल पदार्थ हैं वह मन से उपजे हैं और सबका कारणरूप मन ही है। जैसे पत्र, फूल, फल, और टहनी वृक्ष से उपजे हैं वे वृक्षरूप हैं, जैसे समुद्र में लहरें होती हैं वे जलरूप हैं और जैसे अग्नि उष्णतारूप है, वैसे ही नाना प्रकार के स्वभाव मन से उपजे दृष्टि आते हैं और सब मनरूप हैं। हे रामजी! कर्त्ता-कर्म-क्रिया, द्रष्टा-दर्शन-दृश्य सब मन ही का फैलाव है। जैसे सुवर्ण से नाना प्रकार के भूषण भासते हैं और जब सुवर्ण का ज्ञान हुआ तब सब भूषण एक सुवर्ण ही भासता है, भूषण भाव नहीं भासता वैसे ही जब तक आत्मा का प्रमाद है तब तक द्वैत रूप जगत् भासता है और जब आत्मज्ञान होता है तब सब भ्रम मिट जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तमाहात्म्यवर्णनन्नामै- कोनाशीतितमस्सर्गः ॥ ७६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अब एक वृत्तान्त जो पूर्वकाल में हुआ है तुमको सुनाता हूँ। यह जगत् इन्द्रजालवत् है। जैसे मनरूपी इन्द्रजाल में यह जगत् स्थित है तैसे तुम सुनो। इस पृथ्वी में एक उत्तरपाद नाम देश था, उसमें एक बड़ा वन था और वहाँ नाना प्रकार के वृक्ष, फूल, फल और ताल थे जिन पर मोर आदिक अनेक प्रकार के पक्षी शब्द करते थे। फूलों से सुगन्धें निकलती थीं और विद्याधर, सिद्धगण और देवता आनकर विश्राम करते थे, किन्नर गान करते थे और मन्द-मन्द पवन चलता था। निदान उस स्थान में महासुन्दर रचना बनी थी और
उत्पत्ति प्रकरण ।
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स्वर्णवत महाकल्पवृक्ष लगे थे । उस देश का लवण नाम राजा अति तेजवान् और धर्मात्मा राजा हरिश्चन्द्र के कुल में उपजा । उसका ऐसा तेज हुआ कि शत्रु उसका नाम स्मरण करे तो उसको ताप चढ़ जावे और वह श्रेष्ठ पुरुषों की पालना करे । उस राजा के यश से सम्पूर्ण पृथ्वी पूर्ण हो गई और स्वर्ग में देवता और विद्याधर यश गाते थे । उस राजा में लोभ और कुटिलता न थी और वह बड़ा बुद्धिमान् और उदार था । एक दिन सभा में बड़े ऊँचे सिंहासन पर वह बैठा था और सुन्दर स्त्रियों का नृत्य होता था, अतिसुन्दर बाजे बजते थे और मधुरध्वनि होती थी । राजा के शीश पर चमर झुलता था और मन्त्री और मण्डलेश्वरों की सेना आगे खड़ी राजा को देशमण्डल की वार्त्ता सुनाती थी । इतिहास आदि की पुस्तकें ढाँप के उठा रक्खी थीं और भाट स्तुति करते थे । केवल दो मुहूर्त्त दिन रह गया था उस काल में एक इन्द्रजाली बाजीगर आडम्बर संयुक्त सभा में आया और राजा से कहने लगा, हे राजन् ! आप मेरा एक कौतुक देखिये । इतना कहकर उसने अपना पिटारा खोला और उसमें से एक मोर की पूँछ निकालकर घुमाने लगा । उससे राजा को नाना प्रकार की रचना भासने लगी-मानो परमात्मा की माया है और नाना प्रकार के रङ्ग राजा ने देखे । उसी क्षण में किसी मण्डलेश्वर का दूत एक घोड़ा लेकर राजा के निकट आया और बोला, हे राजन् ! यह महाबलवान् घोड़ा राजा ने आपको दिया है । जैसे उच्चैःश्रवा इन्द्र का घोड़ा समुद्र मथने से निकला है तैसा ही यह है और इसका पवन के सदृश वेग है । मेरे स्वामी ने कहा है कि जो उत्तम पदार्थ है वह बड़ों को देना चाहिये और यह आपके योग्य है इससे आप इसे ग्रहण कीजिये । तब इन्द्रजाली बोला, हे राजन् ! आप इस घोड़े पर आरूढ़ हों, इस पर चढ़कर आप शोभा पावेंगे । इतना सुन राजा घोड़े की ओर देख मूर्च्छित हो गया और भय से मन्त्री भी उसे न जगावें और उसके हाथ पाँव भी कुछ न हिलें । जैसे कीचड़ में कमल अचल होता है तैसे ही राजा अचल हो गया और दो मुहूर्त्त पर्यन्त मूर्च्छित रहा । भाट और कवि जो स्तुति करते थे वे सब चुप हो रहे और मन्त्री और नौकर भय
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और संशय के समुद्र में डूब गये और उन्होंने जाना कि राजा के मन में कोई बड़ी चिन्ता उपजी है और सबके सब अति आश्चर्यवान् थे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे इन्द्रजालोपाख्याने नृपमोहो नामाशीतितमस्सर्गः ॥८०॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! दो मुहूर्त के उपरान्त राजा चैतन्य हुआ और उसका अङ्ग हिलकर सिंहासन से गिरने लगा, तब राजा के मन्त्री और अन्य नौकरों ने उसकी भुजा पकड़ के थॉंभा परन्तु राजा की बुद्धि व्याकुल हो गई और बोले कि यह नगर किसका है यह सभा किसकी है और इसका कौन राजा है? जब इस प्रकार का वचन मन्त्रियों ने सुना तो शान्त हुए और प्रसन्न होकर कहने लगे, हे राजन्! आप क्यों व्याकुल हुए हैं? आपका मन तो निर्मल है और आप उदारात्मा हैं। जिन पुरुषों की प्रीति पदार्थों में होती है और आपात रमणीय भोगों में चित्त है उनका मन मोह से भर जाता और जो सन्त जन उदार हैं उनका चित्त निर्मल होता है। उनका मन मोह में कैसे पड़े? हे देव! जिनका चित्त भोगों की तृष्णा में बँधा है उनका मन मोह जाता और जो महापुरुष सन्त जन हैं उनका मन मोह में नहीं डूबता। जिसका चित्त पूर्ण आत्म-तत्त्व में स्थित हुआ है और बड़े गुणों से सम्पन्न हैं उनको शरीर के रहने और नष्ट होने में कुछ मोह नहीं उपजता, और जिनको आत्मतत्त्व का अभ्यास नहीं प्राप्त हुआ है और जो अविवेकी हैं उनका चित्त देश, काल, मन्त्र और औषध के वश से मोह को प्राप्त होता है। आपका चित्त तो विवेक भाव को ग्रहण करता है, क्योंकि आप नित्य ही नूतन कथा और शब्द सुनते हो। अब आप कैसे मोह से चलायमान हुए हो? जैसे वायु से पर्वत चलायमान हो वैसे ही आप चलायमान हुए हैं-यह आश्चर्य है! आप अपनी उदारता स्मरण कीजिये। इतना सुनकर राजा सावधान हुआ और उसके मुख की कान्ति उज्ज्वल हुई-जैसे शरत्काल की सूखी हुई मञ्जरी वसन्त ऋतु में प्रफुल्लित होती है तैसे ही राजा नेत्रों को खोल-कर देखने लगा और जैसे सूर्य राहु की ओर और सर्प नेवले की ओर देखता है तैसे ही इन्द्रजाली की ओर देखकर बोला, हे दुष्ट, इन्द्रजाली!
उत्पत्ति प्रकरण । ३५५
तूने यह क्या कर्म किया ? राजा से भी कोई ऐसा कर्म करता है ? जैसे जल बिना मछली कष्ट पाके फिर जल में प्रसन्न हो तैसे ही मैं हुआ हूँ । बड़ा आश्चर्य हे परमात्मा की अनन्त शक्ति है और अनेक प्रकार के पदार्थ फुरते हैं । मैंने दो मुहूर्त में क्या ही भ्रम देखा । मेरा मन सदा ज्ञान के अभ्यास में था सो तो मोह गया तो प्राकृत जीवों का क्या कहना है ? मैंने बड़ा आश्चर्य भ्रम देखा है । यह इन्द्रजाली मानों शम्बर दैत्य है कि उसने दो मुहूर्त में मुझको अनेक देश, काल और पदार्थ दिखाये । जैसे ब्रह्मा एक मुहूर्त में नाना प्रकार के पदार्थ रच लेवें वैसे ही एक मुहूर्त में इसने मुझको अनेक भ्रम दिखाये हैं । मैं सब तुम्हारे आगे कहता हूँ—मानो सारी सृष्टि इसके पिटारे में है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राजाप्रबोधोनाम एकाशीतितमस्सर्गः ॥ ८१ ॥
राजा बोला, हे साधो ! मैं इस पृथ्वी का राजा हूँ और सब पृथ्वी में मेरी आज्ञा चलती है और मैं इन्द्र की नाईं सिंहासन पर बैठता हूँ जैसे स्वर्ग में इन्द्र के आगे देवता होते हैं तैसे ही मेरे आगे भृत्य और मन्त्री हैं । उदारता से मैं सम्पन्न हूँ पर मैंने बड़ा भ्रम देखा । हे साधो ! जब इस इन्द्रजाली ने पिटारे से मोर की पूँछ निकाल कर घुमाई तो वह मुझको सूर्य की किरणों की नाईं भासी और जैसे बड़ा मेघ गरज के शान्त हो जाता है और पीछे इन्द्रधनुष दीखता है तैसे ही वह विचित्र रूप पूँछ मुझको दीखी । फिर एक दूत घोड़ा लेकर आया उस पर मैं आरूढ़ हुआ और वह चित्त ही से मुझको दूर से दूर ले गया । जैसे भोगों की वासना से मूर्ख घर ही बैठे दूर से दूर भटकते फिरते हैं तैसे ही मुझको वह घोड़ा दूर से दूर ले गया । फिर वह मुझे एक महाभयानक निर्जन देश में ले गया जो प्रलयकाल के जले हुए स्थानों के समान था । वहाँ मानों दूसरा आकाश था और सात समुद्र थे और उनके समान एक आठवाँ समुद्र था । चारों दिशा के जो चार समुद्र वर्णन किये हैं उनके समान वह मानों पाँचवाँ समुद्र था निदान वह मुझे महाभयानक स्थानों और देशों को लाँघकर एक महावन में ले आया । जैसे ज्ञानी
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का चित्त आकाशवत् होता है और जैसे अज्ञानी का चित्त कठोर और शून्य होता है वैसे ही स्थान में मुझको ले गया, जहाँ घास, वृक्ष, जीव मनुष्य कोई भी दृष्टि न आता था वहाँ में महाकष्ट और दीनता को प्राप्त हुआ । जैसे धन और बान्धवों से और देश और बल से रहित पुरुष कष्ट पाता है वैसे ही में कष्टवान् हुआ । तब दिन का अन्त हो गया और वहाँ उजाड़ में कष्ट से मैंने रात बिताई और पृथ्वी पर सोया परन्तु निद्रा न आई और दुःख से कल्प समान रात्रि हो गई । जब सूर्य उदय हुआ तब में वहाँ से चला और आगे गया तो पक्षियों का शब्द सुना और वृक्ष देखे परन्तु खाने पीने को कुछ न पाया । इन वृक्षों को देखके में प्रसन्न हुआ—जैसे मृत्यु से छुटा पुरुष रोग से भी प्रसन्न हो—और एक जामुन के वृक्ष के नीचे बैठ गया—जैसे मार्कण्डेय ऋषि ने प्रलय के समुद्र में श्रमकर वट का आश्रय लिया था । तब वह घोड़ा मुझको छोड़ के चला गया और सूर्य अस्त हुआ तो मैंने वहाँ रात्रि बिताई परन्तु न कुछ भोजन किया और न जलपान किया और न स्नान ही किया । इससे मैं महादीन हुआ । जैसे कोई बिका मनुष्य दीन हो जाता है और जैसे अन्धकूप में गिरा मनुष्य कष्टवान् होता है तैसे ही में कष्टवान् हुआ और कल्प के समान रात्रि बीती । जब वहाँ अन्न पानी कुछ दृष्टि न आया तब मैं आगे गया जहाँ पक्षी शब्द करते थे । उस समय आधा पहर दिन रह गया था तब एक कन्या मुझे दिखाई दी जो अपने हाथ में मृत्तिका की एक मटका में पके हुए चावल और जांबू के रस का भरा हुआ पात्र लिए जाती थी । मैं उसके सम्मुख आया—जैसे रात्रि के सम्मुख चन्द्रमा आता है और कहा कि हे बाले ! मुझको भोजन दे, मैं क्षुधा से आतुर हूँ । जो कोई दीन आर्त्त को अन्न देता है वह बड़ी सम्पदा पाता है । हे साधो ! जब मैंने बारम्बार कहा तब उसने कहा तुम तो कोई राजा भासते हो कि नाना प्रकार के भूषण वस्त्र पहिने हुए हो, में तुम को भोजन न दूँगी । ऐसे कह के वह आगे चली और में भी उसके पीछे जैसे छाया जावे तैसे चला । मैं कहता जाता था कि हे बाले ! मुझे भोजन दे कि मेरी क्षुधा शान्त हो और वह कहती, हे राजन् ! हम नीच
उत्पत्ति प्रकरण । ३५७
लोग हैं अपने प्रयोजन बिना किसी को भोजन नहीं देते, जो तुम मेरे भर्त्ता होवो तो मैं तुमको यह अन्न अपने पिता के निमित्त ले चली हूँ दूँ । मेरा पिता मशान में वेताल की नाईं अवधूत हो बैठा है और घूर से अङ्ग भरे हैं, जो तुम मेरे भर्त्ता बनो तो मैं देती हूँ, क्योंकि भर्त्ता प्राणों से भी प्यारा होता है पिता से क्षमा करा लूँगी । मैंने कहा अच्छा मैं तुझसे विवाह करूँगा पर मुझे भोजन दे। हे साधो ! ऐसा कौन है जो ऐसी आपदा में अपने वर्णाश्रम के धर्म को दृढ रक्खे । उसने मुझको आधा भोजन और आधा जांबू का रस दिया, उसे भोजन कर मैं कुछ शान्तिमान् हुआ परन्तु मेरा मोह निवृत्त न हुआ । तब उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ के मुझको आगे कर लिया और अपने पिता के निकट ले गई-जैसे पापी को यमदूत ले जाते हैं-और कहा, हे पिता ! यह मैंने भर्त्ता किया है । उसके पिता ने कहा अच्छा किया और ऐसा कहकर चावल और जांबू के रस का भोजन किया । फिर उसके पिता ने कहा, हे पुत्री ! इसको अपने घर ले जा । तब वह मुझको अपने घर ले गई और जब अपने घर के निकट गई तब मैंने देखा कि वहाँ अस्थि मांस और रुधिर है और कुत्ते, गर्दभ, हस्ति आदिक जीवों की खालें पड़ी हैं । उनको लाँघकर वह मुझे अपने घर में ले गई-जैसे पापी को नरक में यमदूत ले जाते हैं । वहाँ से एक बगीचा था उसमें जाकर वह अपनी माता के पास मुझे ले गई और कहा, हे माता ! यह तेरा जामातृ हुआ है । माता ने कहा अच्छी बात है । निदान उनके घर हमने विश्राम किया और उस चाण्डाली ने मुझको जो भोजन दिया उसको मैंने भोजन किया-मानों अनेक जन्मों के पाप भोगे । फिर विवाह का दिन नियत किया गया और उस दिन मैंने विवाह किया । चाण्डाल हँसते थे और नृत्य करते थे मानों मेरे पाप नृत्य करते थे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चाण्डालीविवाहवर्णनन्नाम द्व्यशीतितमसर्गः ॥ ८२ ॥
राजा बोले, हे साधो ! बहुत क्या कहूँ सात दिन तक विवाह का उत्साह रहा और फिर वहाँ मैं एक बड़ा चाण्डाल हुआ । आठ महीने
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यहाँ रहके फिर में और स्थानों में रहा। निदान वह चाण्डाली गर्भवती हुई और उससे एक कन्या उत्पन्न हुई जो शीघ्र ही बढ़ गई । तीन वर्ष पीछे एक बालक उत्पन्न हुआ और फिर एक पुत्र और एक कन्या और भी उत्पन्न हुई । इसी प्रकार उससे तीन पुत्र और तीन कन्या उत्पन्न हुई और में एक बड़ा परिवारवान् चाण्डाल हुआ । उस चाण्डाली सहित मैं चिरकाल पर्यन्त चाण्डालों में विचरता रहा और जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है तैसे में उनमें बन्धवान् हुआ । हे साधो ! उनमें मैंने बड़े कष्ट पाये, प्रथम जिस शिर में रेशम का वस्त्र भी चुभता था उस पर में भार उठाऊँ; नीचे नंगे चरण जलें और शिर पर सूर्य तपै । रात्रि को में काँटों पर सोऊँ, कोई वस्त्र न मिले और जीव जन्तुओं के लोहू से भरे हुए और गीले पुराने कपड़े शिरहाने रक्खूँ । कुक्कुट, हस्ती आदिक अशुचि पदार्थों को भोजन करूँ और उनके रुधिर का पान करूँ। ऐसी मेरी चेष्टा हो गई कि जाल से पक्षी मारूँ, बंशी से मच्छ कच्छ आदिक पकड़ूँ, अनेक प्रकार के क्रूर नीच कर्म करूँ और जैसी कैसी वस्तु मिले उसे भोजन करूँ, निदान ऐसी व्यवस्था हो गई कि अस्थि मांस के निमित्त हम आपस में और शीतकाल में शीत से उष्णकाल में उष्णता से कष्टवान् हों । इससे मेरा शरीर बहुत कृश हो गया और अवस्था भी वृद्ध हुई, मशान्यों में हमारा बहुत काल व्यतीत हुआ और मांस और रक्त पान करते रहे। जो हस्ती आदिक पशु आवें उनको हम मारें-जैसे चण्डिका ने दैत्यों को मारा था और उनकी आँतड़ें और चमड़े तले बिछाके सोवें और शिरहाने रक्खें। ऐसे ही चिरकाल पर्यन्त हम चेष्टा करते रहे और बन्धुओं में बहुत स्नेह बढ़ गया पर वर्षाकाल की नदी की नाईं हमारी तृष्णा बढ़ती जाती थी। जिन मृत्तिका के पात्रों में चाण्डाल भोजन कर जाते थे उन्हीं बासनों में हम भी भोजन करते थे। कालवशात् वर्षा बन्द हो गई और अकाल पड़ा, सूर्य ऐसे तपने लगे मानों द्वादश सूर्य इकट्ठे तपते हैं और दावाग्नि वन में लगी है। वन के जीव अन्न जल के निमित्त कष्ट पाने लगे और अपना देश छोड़ के देशान्तर जाने लगे। निदान महा उपद्रव हुआ, समय बिना ही मानों प्रलय आया है तब क्षुधा और तृषा से कितने जीव मृतक हो गये,
उत्पत्ति प्रकरण । ३५६
कितने गिर पड़े और हमको भी बहुत कष्ट हुआ । तब हम तीनों पुत्रों, तीनों कन्याओं और स्त्री सहित वहाँ से निकले और जहाँ अन्नजल सुनें वहाँ जावें । फिर यह भी हाथ न आवे तब हम बहुत शोकवान् हुए और शरीर नीरस सा हो गया । निदान सब ऐसे कष्टवान् हुए कि पुत्र पिता को न सँभाले और पिता पुत्र को न सँभाले, बान्धवों का स्नेह आपस में छूट गया सब अपने अपने वास्ते दौड़े ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे इन्द्रजालोपाख्याने उपद्रववर्णनन्नाम त्र्यशीतितमसर्गः ॥ ८३ ॥
राजा बोले, हे सभा ! इस प्रकार हम चिरकाल तक विचरते फिरे, शरीर बहुत वृद्ध हो गया और बाल वरफ की नाईं श्वेत हो गये । जैसे सूखा पात वायु में विचरता है तैसे ही हम भी कर्मों के वश में भ्रमते रहे । जो कुछ राजा का अभिमान था वह मुझे विस्मरण हो गया और चाण्डालभाव दृढ़ हो गया । सब जीव कष्टवान् होके कलत्र को छोड़ गये और कितने पहाड़ पर चढ़कर दुःख के मारे गिर पड़े । और जैसे चिड़िया को बाज भोजन करता है तैसे ही जनों को भेड़िये भोजन करते थे । एक वृक्ष के नीचे मैंने विश्राम किया तब एक बालक जो सबसे छोटा था मेरे पास आया और बोला, हे पिता ! मुझको मांस दे कि मैं भोजन करूँ, नहीं तो मेरे प्राण निकलते हैं । तब मैंने कहा मांस तो नहीं है, उसने कहा कहीं से ला दे । छोटा पुत्र सबसे प्यारा होता है इससे मैंने कहा, हे पुत्र ! मेरा मांस है यह खा ले । तब उस दुर्बुद्धि ने कहा दे, मैंने बन से लकड़ियाँ इकट्ठी करके अग्नि जलाई और कहा, हे पुत्र ! मैं अग्नि में प्रवेश करता हूँ जब परिपक्व हो जाऊँ तब तू भोजन करना । हे सभा ! इस प्रकार मैंने स्नेह के वश कहा कि किसी प्रकार यह जीते रहें । ऐसे कहकर मैं चिता में घुस गया और जब मुझको उष्णता लगी तब में काँपा और तुमको दृष्टि आया । फिर कुछ सावधान हुआ और तुरियाँ बजने लगीं । हे साधो ! इस प्रकार मैंने चरित्र देखा सो तुम्हारे आगे कहा । जैसे मार्कण्डेय ने प्रलय में क्षोभ देखे और देवताओं से कहे तैसे ही मैंने तुमसे अपना वृत्तान्त कहा
३६० योगवाशिष्ठ ।
है। जब इन्द्रजाली ने पूँछ घुमाई थी तब उसके सामने में घोड़े पर आरूढ़ हुआ था और इतने काल प्रत्यक्ष भ्रम देखता रहा। बड़ा आश्चर्य्य है कि मेरे से विवेकवान् राजा को इसने मोहित किया तो और प्राकृत जीवों की क्या वार्त्ता है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार तेजवान् राजा ने कहा तब वह साम्बरीक अन्तर्द्धान हो गया और सभा में जो मन्त्री आदि बैठे थे सब आश्चर्य्यवान् हुए और परस्पर देखके कहने लगे बड़ा आश्चर्य्य है! बड़ा आश्चर्य्य है!! भगवान् की माया विचित्ररूप है। यह साम्बरी माया नहीं है, क्योंकि साम्बरी अपने लोभ के निमित्त तमाशा दिखाता है पीछे यत्न से धन आदिक पदार्थ माँगता है, पर यह लिये बिना ही अन्तर्द्धान हो गया। यह ईश्वर की माया है जिससे ऐसा विवेकवान् राजा मोह गया। जो ऐसा बड़ा तेजवान् और शूरमा राजा मोहित हुआ तो सामान्य जीवों की क्या वार्त्ता है ? हे रामजी ! ऐसे संदेहवान् होकर सब स्थित हुए और मैं भी उस सभा में बैठा था। यह वृत्तान्त मैंने प्रत्यक्ष देखा है किसी के मुख से सुनके नहीं कहा। हे रामजी ! यह जो अनुरूप मन है सो महामोह और अविद्या है। इसके फुरने से अनेक प्रकार का मोह दीखता है। जब यह मन उपशम हो तभी कल्याण है। इससे इस मन में जो बहुत कल्पना उठती हैं उनको त्यागकर आत्मपद में स्थित करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे साम्बरोपाख्यानसमाप्ति- वर्णनन्नाम चतुरशीतितमसर्गः ॥ ८४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आदि जो शुद्ध परमात्मा से चित्तसंवेदन फुरा है वह कलनारूप होके स्थित हुआ है, उसी से दृश्य सत्य हो भासता है। आत्मा के प्रमाद से मोह में प्राप्त हुआ है और चित्त के फुरने से चिर पर्यन्त जगत् में मग्न हो रहा है। वह मन असत्यरूप है और उस मन में ही सम्पूर्ण जगत् विस्तारा है जिससे अनेक दुःखों को प्राप्त हुआ है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल कल्पकर आपही भयवान् होता है। वही मन जब संसार की वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित होता है तब जैसे सूर्य की किरणों से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही एक क्षण में सब
उत्पत्ति प्रकरण । ३६१
दुःख नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! ऐसा पदार्थ कोई नहीं जो अभ्यास किये से प्राप्त न हो । इसमें जब आत्मपद का अभ्यास कीजियेगा तब वह प्राप्त होगा । आत्मपद के अभ्यास किये से आत्मा निकट भासता है और संसार दूर भासता है । जब जगत् का अभ्यास दृढ होता है तब जगत् निकट भासता है और आत्मा दूर भासता है । हे रामजी ! जो मूर्ख मनुष्य है उसको अभयपद में भय होता है । जैसे पथिक को दूर से वृक्ष में वैताल कल्पना होती है और भय पाता है वैसे ही चित्त की वासना से जीव भय पाता है । हे रामजी ! वासना सहित मलीन मन में नाना प्रकार संसार भ्रम उठता है और जब आत्मपद में स्थित होता है तब भ्रम मिट जाता है । जैसा मन में निश्चय होता है तैसा ही हो भासता है, यदि मित्र में शत्रु बुद्धि होती है तो निश्चय करके वह शत्रु हो जाता है और मद से उन्मत्त हो सम्पूर्ण पृथ्वी भ्रमती दीखती है और व्याकुल होता है तो चन्द्रमा भी श्याम सा भासता है जो अमृत में विष की भावना होती है तो अमृत भी विष की नाईं भासता है । यह जाग्रत् पदार्थ देश, काल और क्रिया मन से भासते हैं । हे रामजी ! संसार का कारण मोह है, उससे जीव भटकता है । इसलिये ज्ञानरूपी कुल्हाड़े से वासनारूपी मलीनता को काटो, आत्मपद पाने में वासना ही आवरण है । हे रामजी ! वासनारूपी जाल में मनुष्यरूपी हरिण फंसकर संसाररूपी वन में भटकता है । जिस पुरुष ने विचार करके वासना नष्ट की है उसको परमात्मा का प्रकाश भासता है । जैसे बादल से रहित सूर्य प्रकाशित होता है तैसे ही वासना रहित चित्त में आत्मा प्रकाशता है । हे रामजी ! मन ही को तुम मनुष्य जानो, देह को मनुष्य न जानना क्योंकि देह जड़ है और मन जड़ और चेतन से विलक्षण है मन से किया हुआ कार्य सफल होता है । जो मन से दिया और जो मन से लिया है वही दिया और लिया है और जो देह से किया है वह भी मन ने ही किया है । हे रामजी ! यह सम्पूर्ण जगत् मनरूप है । मन ही पर्वत, आकाश, वायु, जल, अग्नि और पृथ्वी है सूर्यादिकों का प्रकाश मन ही से होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध सब मन ही से ग्रहण होते हैं और नाना
३६२ योगवाशिष्ट ।
प्रकार की वासनाओं से नाना प्रकार के रूप मन ही धरता है जैसे नटवा नाना प्रकार के स्वांग धारता है तैसे ही नाना प्रकार के रूप मन ही धरता है। लघु पदार्थ को मन ही दीर्घ करता है। सत्य को असत्य की नाईं और असत्य जगत् के पदार्थ को सत्य की नाईं मन ही करता है, और मन ही मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र करता है। हे रामजी ! जैसी वृत्ति मन की दृढ़ होती है वही सत्य हो भासती है। हरिश्चन्द्र को एक रात्रि में बारह वर्ष का अनुभव हुआ था और इन्द्र को एक मुहूर्त्त में युगों का अनुभव हुआ था और मन ही के दृढ़ निश्चय से इन्द्र ब्राह्मण के दशों पुत्र ब्रह्मापद को प्राप्त हुए थे। हे रामजी ! जो सुख से बैठे हुए को मन में कोई चिन्ता आन लगी तो सुख ही में उसको रौरव नरक हो जाता है और जो दुःख में बैठा है और मन में शान्त है तो दुःख भी सुख होता है। इससे जैसा निश्चय मन में होता है वैसा ही हो भासता है और जिस ओर मन का निश्चय होता है उसी ओर इन्द्रियों का समूह विचरता है। इन्द्रियों का आधारभूत मन है, जो मन टूट पड़ता है तो इन्द्रियाँ भिन्न भिन्न हो जाती हैं। जैसे तागे के टूटे से माला के दाने भिन्न भिन्न हो जाते हैं तैसे ही मन से रहित इन्द्रियाँ अर्थों से रहित भिन्न होती हैं, वास्तव में आत्मतत्त्व सबमें अधिष्ठान स्थित है और स्वच्छ, निर्विकार, सूक्ष्म, समभाव नित्य और सबका साक्षी-भूत और सब पदार्थों का ज्ञाता है। वह देह से भी अधिक सूक्ष्मरूप है अर्थात् अहंभाव के उत्थान से रहित चिन्मात्र है, उसमें मन के फुरने से संसार भासता है, वास्तव में द्वैतभ्रम से रहित है। सब जगत् आत्मा का किञ्चिन्मय रचा है और सबमें चेतनशक्ति व्यापी है। वायु में स्पन्द, पृथ्वी में कठोरता, सूर्य और अग्नि आदिक में प्रकाश, जल में द्रवता, और आकाश में शून्यता वही है और सब पदार्थों में वही चेतनशक्ति व्याप रही है। वास्तव में उसमें अनेकता नहीं है, मन से भासती है, शुक्ल पदार्थ को कृष्ण और देश, काल पदार्थ, क्रिया और द्रव्य को मन ही विपर्यय करता है। हे रामजी ! जैसे निश्चय मन में दृढ़ होता है वही सिद्ध होता है और मन बिना किसी पदार्थ का ज्ञान नहीं होता। हे रामजी ! जिह्वा से नाना प्रकार के भोजन करता है परन्तु मन और ठौर होता है तो उसका