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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को खा जाता है निरंजन

रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को

खा जाता हैं निरंजन

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दर्शन पायउ तोरा ॥ हे साहिब मैं तुम बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥ चार खानि रचि पुनि कस कीन्हा । सो सब मोहि बतावो चीन्हा ॥

धर्मदास जी ने कहा—हे साहिब । आज बहुत ही शुभ दिन है जो आपका दर्शन हुआ, कृपा करके अब मुझे आगे की कथा कहो, मुझे बताओ कि चार खानि की रचना के बाद क्या किया गया !

साहिब ने कहा

सुन धर्मन यह है यमबाजी । जेहि न चीन्हे पंडित काजी ॥ चारहु मिलि यह रचना कीन्हा । कच्चा रंग सु जीवहि दीन्हा ॥ पाँच तत्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥ यहि विधि कीन्हीं नर की काया । मारे खाय बहुरि उपजाया ॥ ओंकार है वेद को मूला । ओंकार में सब जग भूला ॥ है ओंकार निरंजन जानो । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥ सहस अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तार काल की छाया ॥ ब्रह्मा ते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥ स्मृति शास्त्र पुराण भटकावा । अलख निरंजन ध्यान दृढ़ावा ॥ वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुष को मर्म न जाने ॥ निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥

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साहिब कह रहे हैं—हे धर्मदास! यह काल का खेल पंडित-काजी आदि नहीं समझ पाए। अद्वा और त्रिदेव ने मिल जगत की रचना की और जीव को कच्छा रंग दिया यानी नश्वर शरीर में डाला। पाँच तत्व, तीन गुण और 14 यम एक जीव के साथ कर दिये। यानी 14 यम इस काया में जीव को भटकाने के लिए रखे। इस तरह मनुष्य की देही का निर्माण किया और बार-2 मार-खाकर बार-2 उत्पन्न किया। वेद में भी ओंकार की बात की गयी और इसी ओंकार में सारा जगत भटक गया। यही ओंकार निरंजन अथवा निरंकार है। परम पुरुष का भेद गुप्त रखा गया। काल ने अपना इतना विस्तार किया कि 88 हजार ब्रह्मा उत्पन्न किये, फिर ब्रह्मा ने आगे जीवों की सृष्टि की और वेद, शास्त्र आदि में सबको उलझा दिया, निरंजन का ध्यान करने को कहा। वेद-मत के अनुसार सभी जीव भ्रमित हुए, परम पुरुष का भेद नहीं मिला। साहिब कह रहे हैं— हे धर्मदास! यह सब निरंजन ने ही किया।

असुर है जीव सतावै, देव ऋषि मुनि कारकं । पुनि धरि अवतार रक्षक, असुर करत संहारकं ॥ जीव को दिखलाय लीला, आपनी महिमा घनी । यहि जान जीव बाँध आसा, यही है रक्षक धनी ॥ रक्षक कला दिखलाय कर, अंत काल भक्षण करै । पीछे जीव पछिताय बहुत, जब काल के मुख में परै ॥

यही निरंजन असुर रूप में आकर जीवों को सताता है, ऋषि-मुनियों को तंग करता है और फिर यही अवतार धारण कर रखवाला बनने की कला दिखाते हुए असुरों का संहार करता है। यह जीवों को अपनी लीला दिखाकर अपनी महिमा बताता है और जीव सोचते हैं कि शायद यही रक्षक है, पर वो रक्षक की कला दिखाकर अंतकाल में जीवों को खा जाता है। और फिर जीव जब काल के मुख में जाते हैं तो पछताते हैं।

जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने

जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने

यम बाजी कोई चीन्ह न पाया। आशा दे यम जीव नचाया ॥ लख जीव नित प्रति खाई। महा अपरबल काल कसाई ॥ तप्त शिला निशि दिन तहँ जरइ। तापर लै जीवन कहँ धरई ॥ जीवहि जारे कष्ट दिलावे। तब फिर लै चौरासी नावे ॥

साहिब कह रहे हैं कि काल का खेल कोई नहीं समझ पाया, यह ऐसा भयानक कसाई है कि लाख जीवों को प्रतिदिन तप्त शिला पर भून-भून कर खाता है। जीवों को जलाकर कष्ट देकर फिर चौरासी की खानि में फेंक देता है।

जीव कीन्ह तब बहुत पुकारा। काल कष्ट देत अपारा ॥

यमकर कष्ट सह्यो न जाई। है कोई रक्षक करो सहाई ॥

ऐसे मैं जब काल जीवों को बहुत कष्ट दे रहा था तो जीवों ने पुकार की कि काल हमें बड़ा कष्ट दे रहा है, जो हमसे सहा नहीं जा रहा। यदि कोई रक्षक है तो हमें बचाओ!

चकिया सब रागन की रानी ॥ एक पट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लागे सवालाख की धानी ॥

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अमर लोक से साहिब चले

अमर लोक से साहिब चले

देख जीवन विकल अति, दया पुरुष जनाइया। दयानिधि सत पुरुष साहिब, तबहिं मोहिं बुलाइया ॥ कहे मुहिं समुझाय बहु विधि, जीव जाय चितावहू। तुम दरश ते हो जीव शीतल, जाय तपन बुझावहू ॥

जीवों की पुकार जब परम पुरुष के पास पहुँची तो वे दयाल हुए, कबीर साहिब कह रहे हैं कि तब उन्होंने मुझे बुलाया और समझाकर कहा कि जीवों को चिताकर ले आओ।

कर परनाम ज्ञानी चले, करन हँस को काज। जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुरुष को लाज ॥

परम पुरुष को प्रणाम कर जीवों के काम के लिए साहिब चल पड़े।

नो भी पिस गये दस भी पिस गये, पिस गये सहज अठासी। कथनी कथ कथ पिस गये भक्ता, भये गर्भ के वासी ॥

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निरंजन ने की साहिब से बहस

निरंजन ने साहिब से बहस की

जबहिं पुरुष आज्ञा कीन्हा। जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥ आवत मिल्यो धर्म अन्याई। तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥ मो कहँ देखि धर्म ढिग आवा। महा क्रोध बोले अतुरावा ॥ योगजीत इहँवा कस आवो। सो तुम हमसों वचन सुनावो ॥

जब साहिब आए तो रास्ते में निरंजन मिला, उसने क्रोधित होकर पूछा कि यहाँ क्यों आए हो!

निरंजन ने कहा

जाहु ज्ञानी घर आपने, मानो वचन हमार। तीन लोक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥

निरंजन ने कहा—हे ज्ञानी! वापिस अपने घर जाओ, यह संसार मेरा है, परम-पुरुष ने दिया है।

साहिब ने कहा

मुहि जो पठयो पुरुष को, करन हंस के काज। कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥

साहिब ने कहा कि मुझे परम पुरुष ने जीवों के कल्याण के लिए भेजा है, तुझे मारने का सामान भी उन्होंने मुझे दिया है।

तासों कह्यो सुनो धर्मराई। जीव काज संसार सिधाई ॥ तप्त शिला पर जीव जरावहु। जारि बारि निज स्वाद करावहु ॥ तुम अस कष्ट जीव कहँ दीन्हा। तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ॥ जीव चिताय लोक लै जाऊँ। काल कष्ट से जीव बचाऊँ ॥ ताते हम संसारहि जायब। दे परवाना लोक पठायब ॥

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साहिब ने कहा कि तुम तप्त शिला पर जीवों को भून-2 कर खा रहे हो, उन्हें अपार कष्ट दे रहे हो, इसलिए परम पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, जीवों को चिताकर अमर लोक ले जाऊँगा।

निरंजन ने कहा

तबै निरंजन बोले बानी। कैसे हंस छुड़ावो ज्ञानी ॥ जग के माहिं कीन्ह हम बासा। पशु पंछी जल थल में आसा ॥ तिनसौ साठ हम पैठ लगाहीं। तामें सकल जीव उरझाहीं ॥ तापर काम क्रोध हम डारी। तृष्णा सकल जीव कहँ मारी ॥ तापर कीन्हों एक हम काजा। पाप पुण्य थापे हम राजा ॥ इनमें जीव बंधे सब झारी। कैसे हंसहि लेव उबारी ॥

निरंजन ने कहा कि जीवों को कैसे छुड़ा ले जाओगे! कहा- मैं ही सब में समाया हुआ हूँ। (मन रूप में निरंजन सबके अन्दर बैठा है) फिर तीन सौ ऐसे स्थान हैं, जहाँ मैंने पैठ लगायी हुई है, (360 ऐसे स्थान हैं जहाँ निरंजन ने थोड़ी-2 शक्तियाँ रखी हुई हैं, खुद बैठा हुआ है) सभी उनमें उलझे हैं, इस पर भी मैंने सबको काम, क्रोध, तृष्णा आदि से मारा हुआ है, बेहाल किया हुआ है। फिर मैंने पाप-पुण्य में जीव को बाँध दिया है, तुम उन्हें कैसे छुड़ाओगे!

साहिब ने कहा

सत्त शब्द हम बोले बानी। बचन हमारे छूटे प्राणी ॥ गहै शब्द जब मन चित्तलाई। भजिहै काल जिव लेब छुड़ाई ॥

साहिब ने कहा कि मैं सत्य कह रहा हूँ, जब जीव मेरे शब्द को पकड़ लेगा, वो छूट जायेगा।

निरंजन ने कहा

तबै निरंजन बोले बानी। सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥ तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ॥

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साहिब बन्दगी

गंगा जमुना सरसवती जानी । पुष्कर गोदावरी मानी ॥ बद्री केदार हमका ठाऊँ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लगाऊँ ॥ सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय हम थाना ॥ गढ़ गिरनार दत्त को थाना । ताहि घेर हम बैठे निहाना ॥ कमरू माह कमच्छा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥ नगर अयोध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बाँध सब साजा ॥ याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस लेव मुकताई ॥

निरंजन ने कहा कि बड़े स्थान हैं, जहाँ जीव भ्रमित है। गंगा, यमुना, गोदावरी, मथुरा, बद्रीनाथ, केदार, अयोध्या, पुष्कर आदि जगहों पर बैठ मैंने जीवों को भुलाया हुआ है, फिर किस विधि से तुम उन्हें छुड़ाओगे!

साहिब ने कहा

तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ॥ पुरुष नाम को कहुँ समुझाई । जम राजा तब छोड़ पराई ॥ घाट-घाट बैठे उरझेरा । हमरे शब्द ते होय निबेरा ॥ सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सग हंस घर जाई ॥

साहिब ने कहा—हे निरंजन! मैं परम पुरुष का नाम दूँगा, यम का जोर फिर उनपर नहीं चलेगा, तुम स्थान-2 पर बैठे उन्हें भ्रमित कर रहे हो, मेरे शब्द से वे छूट जायेंगे, शब्द उन्हें अपने साथ अमर लोक ले जायेगा।

निरंजन ने कहा

का ज्ञानी देहो अधिकारा । हमरो नहिं छूटे यम जारा ॥ पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ॥ तामें पाप पुण्य को वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ॥

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जहाँ तहाँ जग भरमावै । ज्ञान संधि कछु रहन न पावै ॥

एक शब्द की कैतक आशा । मेरे हैं चौरासी फाँसा ॥

निरंजन ने साहिब से कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर ले ही नहीं जा सकते, मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप-पुण्य में जीवों को बाँधा हुआ है। मन रूप में मैं सबके अन्दर समाया हुआ हूँ, किसी को सोचने भी नहीं देता हूँ कि क्या माज़रा है, तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा, मैंने चौरासी लाख योनियों में जीव को उलझाया हुआ है।

साहिब कहते हैं

बोले ज्ञानी शब्द बिचारी । छूटे चौरासी की धारी ॥

छूटे पाँच पचीस गुण तीनों । ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हों ॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा ज़बरदस्त नाम है, जिन्हें परम पुरुष का नाम(शब्द) दे दूँगा, उनका तुम कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। वो जीव तुम्हारे फंदे से आजाद हो जायेगा।

निरंजन ने कहा

हे ज्ञानी का करो बड़ाई । हमते नाहिं छूट जिव जाई ॥

इसने युग भये का तुम देखा । ज्ञानी हँस न ऐको पेखा ॥

का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक परलय कर डारा ॥

साधु संत हम देखी रीती । परलय परे सकल जग जीती ॥

करम रेख बाँधै सब साधा । सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा ॥

निरंजन ने कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी जीव को सतलोक आते देखा। बड़ी ताकत से मैंने जीव को बाँधा हुआ है, छूटने नहीं दूँगा, तुम और तुम्हारा शब्द क्या कर लेगा, मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ। निरंजन ने कई बार स्मृष्टि का प्रलय भी किया है। यह सब काम साहिब के नहीं हैं, परम पुरुष के नहीं हैं। इस पर साहिब ने कहा

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साहिब बन्दगी

भी है—जो रक्षक तहँ चीहनत नाहिँ, जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं। निरंजन ने कहा कि इस पर भी मैंने पाप पुण्य में जीव को बाँधा हुआ है, आम आदमी की बात ही क्या है, सुर, नर, मुनि सारे संसार को बाँधा हुआ हूँ। एक भी जीव को जाने नहीं दूँगा। निरंजन ने साहिब से यह कहा। अब साहिब कह रहे हैं।

साहिब कहते हैं

ज्ञानी कहँ काल अन्यायी। शब्द बिना तू खाय चबाई॥

अब तुम कस खैहो बटसारा। पुरुष भाषों विश्वासा॥

सुभ अरू असुभ का करे निबेरा। मेटो काल सकल उरझेरा॥

साहिब ने कहा—हे निरंजन! इसलिए तो मैं आया हूँ, तुमने एक भी जीव को सतलोक नहीं आने दिया। तब इनके पास में सच्चा नाम नहीं था, ये अपने जोर से पार होना चाहते थे..... तुमने खा लिया। पर अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा, और तुम्हारा बस अब जीव पर नहीं चलने दूँगा, अन्दर से विश्वास भी नाम उन्हें देता जायेगा। शुभ और अशुभ का ज्ञान भी अन्दर से होता जायेगा, नाम जीव को पूरी सुरक्षा देता चलेगा और तुम्हारे सब बंधनों से छुड़ाकर अमर लोक ले जायेगा। साहिब ने एक अन्य स्थान पर भी कहा है—सुमिरन पाय सत्य जो वीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा।

निरंजन ने कहा

निरगुन काल तब बोले बानी। उरझे जीव सकल जम खानी॥

कैसे के तुम शब्द पसारो। कौने विधि तुम जीव उबारौ॥

ऐसे जीव सकल हैं करनी। कैसे पहुँचै पुरुष की सरनी॥

जग में जीव क्रोध विकरारा। कैसे पहुँचै पुरुष के द्वारा॥

क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी। धरिहँ जन्म नरक की खानी॥

लोभ होय सरप विकरारा। माटी भखे जीव अधिकारा॥

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लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ विषई विषै सब विष की खानी । ऐ सब कहिये जम सहिदानी ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोध आदि में जीव को फँसाया हुआ है। ऐसे में तो कोई भी जीव परम पुरुष के लोक में नहीं पहुँच सकता। इस पर भी यम के 14 दूत मैंने हरेक में फिट किये हुए हैं, तुम उन्हें कैसे निकालोगे उन्हें ! प्रत्येक आदमी के भीतर यम के 14 दूत बैठे हुए हैं। एक का काम हैं-नींद लाना, एक का काम है- विषयों को दिल में उत्पन्न करना, एक का काम है-मौज करना। जिससे जीव मौज करता है। एक का काम है-चित्त भंग कर देना। इसका नाम है-चित्तभंगा, आदि ये यम के 14 दूत हैं, जो जीव को भ्रमित कर रहे हैं। इनके साथ काम, क्रोध आदि भी जीव पर छाए हुए हैं। विषयों में जीव को उलझा दिया है। जीव बड़ा गंदा हो गया है, तुम्हारे शब्द को कोई नहीं मानेगा।

साहिब ने कहा

ज्ञानी कहै करहु वरियारा । हमतो कीन्ह सकल निरबारा ॥ जोई ज्ञानी होय हमारा । काम क्रोध ते होय नियारा ॥ तूस्ना लोभहि देई बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥ उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥ नाम ध्यान हंस घर जाई । क्या रे काल तुम करो बड़ाई ॥ उनमें यम का परै न छाहीं । ताते हंस लोकहि जाई ॥

साहिब ने कहा कि जिस शरीर में यह नाम दे दूँगा, तेरा जोर उसमें नहीं चलेगा। वहाँ काम, क्रोध निकट नहीं आयेंगे और वो जीव निर्मल हो जायेगा, तुम उस जीव को छू भी नहीं पाओगे और वो जीव हंस रूप होकर अपने देश में चला जायेगा।

निरंजन ने कहा

कहे निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हा जान तुम्हारी बानी ॥ युगत महात्म सबै बताऊँ । तुम्हारा नाम ले पंथ चलाऊँ ॥

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साहिब बन्दगी

अब निरंजन अपनी जगह आया। उसने कहा, मैं भी तुम्हारा नाम लेकर पंथ चलाऊँगा और जीवों को उलझा दूँगा। किसी को पता नहीं चलेगा कि सच क्या है और झूठ क्या है। यानी उसने कहा कि मैं नाम अपने वाला दूँगा और उस पर मोहर तुम्हारी होगी। इसलिए आज दुनिया में जीव उलझन में हैं, पता नहीं चल पाता है कि इतने नामों में से कौन-सा नाम सच्चा है और वो किसके पास है।

साहिब ने कहा

कहे ज्ञानी सुन काल विचारा। हंस हमार नहीं न्यारा ॥ निसवासर रहै लौ लीना। शब्द विचार होय नहीं भीना ॥ हंस हमारा शब्द अधिकारा। पुरुष परताप को करे सम्हारा ॥ नाम जपै अरु सुरत लगाई। मिले कर्म लागे नहीं काई ॥ शब्द मानि होय शब्द सरूपा। निश्चय हंस होय अनूपा ॥ साहिब ने कहा-हे निरंजन! जिसे सच्चा नाम मिल जाएगा, वो निर्मल हो जाएगा, फिर वो तुम्हारी तरफ जाएगा ही नहीं।

निरंजन ने कहा

ज्ञानी मोर अपर बल ज्ञाना। वेद किताब भरम हम माना ॥ इनको माने सब संसारा। कलि में गंगा मुक्ति द्वारा ॥ देही दान से उतरे पारा। ऐसे सुमृत कहें विचारा ॥ यह विधि जग जीव भुलाहीं। जरा मरन सब बंध बंधाहीं ॥ सूतक पातक वेद विचारा। पूछ वेद से करहि सँहारा ॥ एकादशी मुक्ति को भाई। योग जग्य करवे अधिकाई ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने सूतक, पातक, कर्मकाण्ड आदि अनेक वहमों में जीवों को उलझाया हुआ है, सब इन्हीं को मानते हैं, तुम्हारी बात कोई मानेगा ही नहीं, इसलिए मत जाओ दुनिया में।

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साहिब ने कहा

सुनहु काल ज्ञान की संधी । छोरो जीव सकल की फंदी ॥ जब निज बीरा हंस पावै । जोग बरत तप सबै नसावै ॥ वेद किताब की छोड़े आसा । हंस करे शब्द विस्वासा ॥ ताके निकट काल नहीं आवे । निज बीरा जो सुरत लगावे ॥ जोग बरत पतहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥

साहिब ने कहा कि जिसे सच्चा नाम मिल जाएगा, उसका सारा वहम अन्दर से धुल जाएगा, काल भी उसके निकट नहीं आ पाएगा। नाम सदा उसकी रक्षा करेगा।

निरंजन ने कहा

अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझो सुरझो नहीं जाई ॥ पावै शब्द होय अभिमानी । कैसै लोक जाहिं प्रानी ॥ सब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्ति की थाहा ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने जो उलझने डाली हुई हैं वे सुलझेंगी ही नहीं, जीव नहीं समझेगा, यदि तुमने अपना शब्द दे भी दिया, तो भी जीव अहंकार में रहेगा, तुम्हारे नियमों पर नहीं चलने पायेगा, फिर मुक्ति कैसे मिलेगी !

साहिब ने कहा

तब ज्ञानी बोले मुख बानी । सुनियो काल निरंजन आनी ॥ हंस भक्ति जो करे हमारी । राखो सदा सब्द निज धारी ॥ काम क्रोध अहंकार बिकारा । इनको तजिहैं हंस हमारा ॥ पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥

साहिब ने कहा कि जो नाम पाकर मेरी भक्ति करेंगे, वे काम, क्रोध आदि छोड़ देंगे और तुम्हारी दुनिया को त्याग परम पुरुष के दरबार में पहुँच जायेंगे।

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साहिब बन्दगी

निरंजन ने कहा

निरंजन बोले गरब सो भाई । मोरे फंद तोर को जाई ॥ करम जंजीर बँधा संसारा । जोई हम जग जाल पसारा ॥ तीन लोक जोइन औतारा । आवागमन में फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसै रहै भुलाई । देव रिषी मुनि सकलो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बड़े जु ज्ञानी । बाँध बाँध कर तोपि समानी ॥ करम रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥

निरंजन ने बड़े घमण्ड से कहा कि मेरे फंद को तोड़कर कौन जा सका है, मैंने कर्म की जंजीर से सारे संसार को बाँधा हुआ है, क्या ऋषि, क्या मुनि, क्या सिद्ध, क्या साधु, क्या देवता, त्रिदेव आदि सबको कर्म जाल में उलझाकर बार-बार खा जाता हूँ, कोई भी कर्म से न्यारा नहीं है।

साहिब ने कहा

कहै ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहँ टूक जंजीर तुम्हारा ॥ हंसन लैहँ तुरत उबारी । पुरुष शब्द दीन्हँ मोहि भारी ॥

साहिब ने कहा-हे झूठे ! तेरी कर्म की जंजीर को भी तोड़ दूँगा, परम पुरुष ने मुझे ऐसा जबरदस्त नाम दिया है कि कर्म जाल से भी जीव को छुड़ा लेगा।

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क्रोधित निरंजन साहिब पर झपटा और असली रूप में आए साहिब

क्रोधित निरंजन साहिब पर झपटा

और असली रूप में आए साहिब

यह सुन काल भयंकर भयऊ। हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्ही। राज बड़ाई पुरुष मुहिं दीन्ही॥ फिर चौंसठ युग सेवा ठयऊ। अष्टं गी पुरुष हम दयऊ॥ तब तुम मारि निकारे मोहि। योगजीत नहिं छाड़ों तोहिं॥ अब हम जान भली विधि पावा। मारों तोहि लेउँ अब दावा॥ गरजे काल महा बिकराला। सत्रह लाख लो पाँव पसारा॥ लपकै जीभ जिमि टूटे तारा। जिमि बिजली चमकै औंधियारा॥ सूढ़ बढा य दंत अति बाढ़। मध्य घेर ज्ञानी कहैं ठाढ़॥ हमरे पौरुष हम बरियारा। तुम ज्ञानी का करो हमारा॥

यह सुन निरंजन क्रोधित हो गया, साहिब को भय दिखाने लगा, कहा कि परम पुरुष की सेवा करके मैंने तीन लोक का राज्य और अष्टंगी को प्राप्त किया, पर तब तुमने मुझे मानसरोवर से निकाल दिया, इसलिए अब मैं तुमसे बदला लूँगा, तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। निरंजन ने तब विकराल हाथी का रूप धारण किया और सूँढ़ और दाँत बढ़ाकर साहिब को बीच में घेर लिया, कहा- हम बड़े बलवान हैं, तुम हमारा क्या करोगे!

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सूँढ़ दाँत गहि मोरा॥ मारे उ सब्द पाँव कर पेली। तोर सूँढ़ समुद्र गहि मेली॥ पुरुष रूप तबहीं पुन धारा। जौन सूरूप सकल औतारा॥

साहिब ने कहा कि तब वहाँ मैंने परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया, उसपर सुरति फेंकी, उसके दाँत तोड़ दिये और उसकी सूँढ़ पकड़ उसे समुद्र में फेंक दिया।

निरंजन अधीन हुआ

निरंजन अधीन हुआ

भया अधीन दोई कर जोरी। तुम सतपुरुष सरन हम तोरी।। प्रथम ज्ञानी हम नहीं जाना। बन्धु जान कीन्हा अभिमाना।। तुमसो बल बुद्धि हम धारा। अब तुम करहु मोर उद्धार।। मैं साहिब तुमको नहीं चीन्हा। सतपुरुष तुम दरसन दीन्हा।। दोइ कर जोरि चरण चित लावा। धन्य भाग हम दरसन पावा।।

तब निरंजन अधीन हुआ और दोनों हाथ जोड़कर कहा कि मैं आपकी शरण में हूँ, आप तो स्वयं सत्पुरुष हैं, मैंने भाई जानकर आपसे युद्ध किया, आपको पहचाना नहीं, आपसे ही बल और बुद्धि का प्रयोग किया, इसलिए क्षमा करें। मेरा बड़ा भाग्य है कि आपने आज मुझे दर्शन दिये।

साहिब ने कहा

सुन रे काल निरंजन राई। पुरुष नाम जो बीरा पाई।। ताको खूँट गहो मत लाई। सो हँसा मेरे लोकहि आई।।

साहिब ने कहा कि हे निरंजन! जिसे नाम मिल जाएगा, उसे तुम नहीं पकड़ोगे, वो मेरे देश में आएगा।

निरंजन ने कहा

सुनो गुसाई विनती मोरी। नाम पाय करै कछु औरी।। ज्ञान कथै अनत चित वासा। आवागमन की राखै आसा।।

निरंजन ने कहा कि जो नाम पाकर गलत चलें, नियमों का पालन न करें, आवागमन की इच्छा रखें, उनका क्या होगा, क्या वे भी पार होंगे!

साहिब ने कहा

सुनो निरंजन बचन हमारा। नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा।।

तब साहिब ने वहाँ निरंजन से करार किया कि नहीं, उसे तुम ले जाना, वो जीव तुम्हारा हो जाएगा।

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निरंजन ने कहा

दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता । पुरुष शाप सो कहैं अस दीन्हा । लच्छ जीव नित ग्रासन कीन्हा ॥ तुमहू कृपा मो पर करहू । माँगो सो वर मुहि उच्चरहू ॥ सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनहु युग शरण जीव थोरे जाहीं ॥ चौथा युग जब कलियुग आवे । तब तुव शरण जीव बहु जावे ॥ ऐसा वचन हार मुहिं दीजे । तब संसार गवन तुम कीजे ॥

निरंजन ने कहा कि एक कृपा करो, परम पुरुष ने मुझे एक लाख जीव रोज खाने का शाप दिया है, इसलिए मुझे कृप्या एक वर दो कि सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में आप थोड़े-2 जीव ही ले जायेंगे और जब कलियुग आयेगा तो बहुत सारे जीव ले जाना।

साहिब ने कहा

अरे काल परपंच पसारा । तीनों युग जीवन दुख डारा ॥ विनती तोरि लीन्ह मैं जानी । मो कहैं ठग काल अभिमानी ॥ जस विनती तू मोसन कीन्ही । सो अब बकसि तोहि कहैं दीही ॥ चौथा युग जब कलियुग आये । तब हम आपन अंश पठाये ॥

साहिब ने कहा कि तूने षड्यन्त्र रचकर तीन युग जीवों के लिए दुखदायी कर दिये, पर तुमने विनती की, इसलिए मैंने तुम्हें माफ़ कर तुम्हारी विनती मान ली, पर जब कलियुग आयेगा, तो मैं अपने अंश भेजूँगा।

अंश ब्यालिस पुरुष के, जीव कारण आवई ।

कलि पंथ प्रगट पसारि के, वे जीव लोक पठावई ॥

कहा- परम पुरुष के ब्यालिस अंश जीवों के कल्याण हेतु आयेंगे और अपना पंथ चलाकर जीवों को अमर लोक ले जायेंगे।

निरंजन ने कहा

वचन तुम्हार लीन्ह मैं मानी । विनती एक करों तुहि ज्ञानी ॥ पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीव लै सत लोक पठाऊ ॥ द्वादस पंथ करों मैं साजा । नाम तुम्हार ले करों अवाज़ा ॥

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साहिब बन्दगी

द्वादश यम संसार पठैहों। नाम तुम्हार पंथ चलैहों ॥ प्रथम दूत प्रगटे मम जायी। पीछे अंश तुम्हारा आयी ॥ द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं। सो हमरे मुख आन समैहैं ॥

निरंजन ने कहा कि आपका कहा मैंने मान लिया, पर एक विनती है कि आप अपना एक पंथ चलाकर जीवों को अमर लोक ले जाना और मैं अपने 12 पंथ चलाकर जीवों को भटकाऊंगा। 12 यम मैं संसार में भेजूंगा, वे आपका नाम लेकर मेरा पंथ चलायेंगे और जो जीव उन पंथों में आ जायेंगे, वे मेरे मुख में ही समायेंगे यानी उन्हें मैं खा जाऊंगा।

साहिब ने कहा

धर्म जस तुम माँगहु सो, चरित्र हम भल चीन्हिया ॥ पंथ द्वादश तुम कहै उसो, अमी घोर विष दीन्हिया ॥ जो मेटि डारों तोहि को अब, पलटि कला दिखावऊँ ॥ लै जीवबंद छुड़ाय यमसो, अमर लोक सिधावऊँ ॥ पुरुष वचन अस नाहिं, यहै सोच चित कीन्है ॥ लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्य शब्द जो दृढ़ गहे ॥

साहिब ने कहा कि मैंने तुम्हारी चालाकी जान ली है, जो तुम माँग रहे हो। अपने 12 पंथ चलाकर अमृत में विष घोल देना चाहते हो। यदि तुमने अब कोई खेल दिखाया तो तुम्हें मिटा दूँगा और सब जीवों को छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊंगा, पर अफसोस! परम पुरुष की ऐसी आज्ञा नहीं है, इसलिए जो जीव मेरे नाम को दृढ़ता से पकड़े रहेंगे, उन्हें ही मैं अमर लोक ले जाऊंगा।

निरंजन ने कहा

कहे धर्म जाओ संसारा। आनहु जीव नाम अधारा ॥ जो कोई जैहैं शरण तुम्हारा। हम सिर पग दै होवे पारा ॥

निरंजन ने कहा कि ठीक है, अब संसार में जाओ और जीवों को नाम के सहारे ले जाओ, जो कोई आपकी शरण में आयेगा, वो मेरे शीश पर पैर रखकर पार हो जायेगा।

साहिब आए संसार में

साहिब आये संसार में

धर्मराय उठ सीस नवायो । तबहिँ हम संसार सिधायो ॥

निरंजन ने तब उठकर साहिब को प्रणाम किया और साहिब संसार में आए।

आये जहाँ यम जीव सतावे । काल निरंजन जीव नचावे ॥

चटपट करे जीव तहाँ भाई । ठाढे भये तहाँ पुनि जाई ॥

मोहि देख जीव कीन्ह पुकारा । हे साहिब मुहि लेहि उबारा ॥

तब हम सत्य शब्द गुहरावा । पुरुष शब्द ते जीव जुड़ावा ॥

साहिब तप्त शिला पर आए, जहाँ निरंजन जीवों को कष्ट दे रहा था, भून-2 कर खा रहा था। साहिब को देख जीवों ने पुकार की कि हमें छुड़ाओ। तब साहिब ने सत्य शब्द पुकारा, जिससे तप्तशिला ठण्डी हो गयी, जीव शांत हो गये।

सकल जीव तब अस्तुति लाये । धन्य पुरुष भल तपन बुझाये ॥

यम ते छोर लेव तुम स्वामी । दया करो प्रभु अन्तरयामी ॥

सब जीवों ने साहिब से पुकार की, कहा-हे प्रभु! हमें छुड़ाओ।

तब मैं कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसायी ॥

जब तुम जाय धरौ जग देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥

देह धरी सत शब्द समाई । तब हँसा सत लोकै जाई ॥

जहाँ आशा तहाँ वासा होई । ताको टार सका न कोई ॥

जब तुम देह धरो जग जायी । बिसर्यो पुरुष काल धरि खाई ॥

साहिब ने कहा कि यदि ऐसे ही जबरन ले जाऊँगा तो मेरा शब्द कट जाएगा, जो निरंजन को दे चुका हूँ, इसलिए जब तुम मानव तन में जाओगे तो मेरे शब्द से प्रीत करना, जिस देही में मेरा नाम आ जायेगा,

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साहिब बन्दगी

वो सतलोक चला जायेगा। साहिब ने कहा—जहाँ आशा होगी, वहीं वास होगा, तुमने परम पुरुष को भुला दिया, इसलिए काल पुरुष ने तुम्हें खा लिया।

जीवों ने कहा

कहे जीव सुन पुरुष पुराना। देह धरी विसर्यो यह ज्ञाना ॥

पुरुष जान सुमरे उ यमराई। वेद पुराण कहे समुझाई ॥

वेद पुराण कहे मत एहा। निराकार ते कीजे नेहा ॥

सुर नर मुनि तैतीस करोरी। बाँधे सबै निरंजन डोरी ॥

जीवों ने कहा कि हे साहिब! मनुष्य तन में जाकर हमें ज्ञान नहीं रहा, हम भूल गये, काल को ही परम पुरुष जानकर पूजने लगे, क्योंकि वेद पुराण आदि भी इसी निराकार की भक्ति करने को कह रहे हैं, सुर, नर, मुनि, 33 करोड़ देवता आदि सभी निरंजन को मान रहे हैं।

साहिब ने कहा

सुनो जीव यह छल यम कैरा। यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥

साहिब ने कहा कि काल ने ही यह जाल फैलाया है।

काल कन्या अनेक कीन्हे, जीव कारण जाल हो।

तीरथ व्रत जग योग फन्दे, कोई ना पावत बाट हो ॥

देह धरि नर परगट हो, फिरि ताहि आशा कीन्हे ऊ ॥

भरमत इत उत काल बस, बहु पुण्य में चित दीन्हे ऊ ॥

काल और माया ने जीवों को फँसाने के लिए तीर्थ, योग, यज्ञ, तप आदि के अनेक जाल बनाए हैं, अनेक फंदे बनाए हैं, कोई भी सच्चा रास्ता नहीं पा रहा है। नर तन पाकर जीव काल की ही आशा में इधर उधर भटकते हुए पुण्य कर्मों में उलझ रहे हैं।

गुप्त वस्तु है नाम

गुप्त वस्तु है नाम

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिं कहो समझायी ॥ जो कछु पुरुष शब्द मुख भाखो । सो साहिब मोहिं गोय न राखो ॥ कौन शब्द ते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥

धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि परम पुरुष ने वो कौन-सा शब्द पुकारा, जिसे लेकर आप इस संसार में आए, और जिससे आप जीवों का कल्याण करते हैं !

साहिब ने कहा

पुरुष मोहिं जैसो फुरमायी । सो सब तुमसों संधि लखायी ॥ यहेउ मोहिं बहु विधि समझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥ गुप्त वस्तु प्रभु मो कहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्ति कर चीन्हा ॥ दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहिं सौँप्यो नाथा ॥ बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगम ते लिखि पावे कोई ॥ पंच अमीय मुक्ति का मूला । जातें मिटे गर्भ अस्थूला ॥ यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारी तासु इकोत्तर बंसा ॥ नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥ ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥ जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहुँ शिष्य सहिदाना ॥

साहिब ने कहा कि परम पुरुष ने मुझसे जैसा कहा, सो मैं तुमसे कहता हूँ। उन्होंने मुझे कहा कि शब्द से जीवों को चिताकर ले आओ। उन्होंने मुझे गुप्त वस्तु दी, विदेह नाम दिया; उसमें बिना मुख के आवाज़ (Sound Less Sound) होती है। गुरु-कृपा से कोई ही उसे देख पाता है। जो उस नाम को विश्वास के साथ पकड़े रखता है, मैं उसके 71 वंश तारता हूँ। नाम की डोरी से ही जीव उस लोक में जाता है और ऐसे जीव को देख काल भी डर जाता है।