हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
-११] शूर और डरपोक योद्धाओंके लक्षण १८९ वैसा ही कहा है-घोड़ों पर चढ़कर लड़ने वाले देवताओंसे भी नहीं जीते जा सकते हैं, क्योंकि उनको दूरके वैरी भी अपने हाथके पास दीखते हैं ॥८५॥ प्रथमं युद्धकारित्वं समस्तबलपालनम् । दिङ्मार्गाणां विशोधित्वं पत्तिकर्म प्रचक्षते ॥ ८६ ॥ हस्ती आदि सब चतुरंग सेनाकी रक्षा करना, युद्धकी पहली चतुरता है और दिशाओंके आने जानेके मार्गोंको काट कर युद्ध कर देना यह पैदल सेनाका काम कहते हैं ॥ ८६ ॥ स्वभावशूरमस्त्रज्ञमविरक्तं जितश्रमम् । प्रसिद्धक्षत्रियप्रायं बलं श्रेष्ठतमं विदुः ॥ ८७ ॥ स्वभावहीसे शूर वीर, अस्त्रके चलानेमें चतुर, लड़ाईमें पीठ नही देने वाले, परिश्रमको सहने वाले और वीरतामें प्रसिद्ध क्षत्रियोंके समान, ऐसी सेनाको पण्डित लोग सबसे उत्तम कहते हैं ॥ ८७ ॥ यथा प्रभुकृतान्मानाद्युध्यन्ते भुवि मानवाः । न तथा बहुभिर्दत्तैर्द्रविणैरपि भूपते ! ॥ ८८ ॥ हे राजा ! पृथ्वी पर स्वामीके सन्मान करनेसे जैसे मनुष्य लड़ते हैं वैसे बहुत दिये हुए, धनसेभी नहीं लड़ते हैं ॥ ८८ ॥ वरमल्पबलं सारं न कुर्यान्मुण्डमण्डलीम् । कुर्यादसारभङ्गो हि सारभङ्गमपि स्फुटम् ॥ ८९ ॥ बलवान् थोड़ी-सी सेना अच्छी होती है किंतु बहुत-सी मुंडोंकी मंडली अर्थात् बलहीन सेना इकट्ठी न करनी चाहिये, क्योंकि दुर्बलोंका पीठ दे कर संग्रामसे भागना साक्षात् बलवान् सेनाका भी उत्साहभंग कर देता है; याने कायर सेना भाग जाने पर वीरभी उन्हें देख कर कभी कभी भाग उठते हैं ॥ ८९ ॥ अप्रसादोऽनधिष्ठानं देयांशहरणं च यत् । कालयापोऽप्रतीकारस्तद्वैराग्यस्य कारणम् ॥ ९० ॥ अप्रसन्न होना, अधिकारी न करना, लूटे हुए धनको आपही ले लेना, वेतन आदि देनेमें आज-कल कह कर समय बिताना, और सेनाके विरोध आदिमें उपाय न करना ये वैराग्यके अर्थात् स्नेह छूटनेके कारण हैं ॥ ९० ॥ आपीडयन्बलं शत्रोर्जिगीषुरतिशोषयेत् । सुखसाध्यं द्विषां सैन्यं दीर्घयानप्रपीडितम् ॥ ९१ ॥
१९० हितोपदेशः [ विग्रहः ९२- विजय पानेकी इच्छा करने वाला राजा अपनी सेनाको विश्राम देता हुआ शत्रुसे जा भिड़े, क्योंकि लंबे मार्ग चलनेसे थकी थकाई शत्रुओंकी सेना सहजमें जीती जा सकती है ॥ ९१ ॥ दायादादपरो मन्त्रो नास्ति भेदकरो द्विषाम् । तस्मादुत्थापयेद्यत्नाद्दायादं तस्य विद्विषः ॥ ९२ ॥ वैरियाँके भाईबेटोंको छोड़ कर फूट कराने वाला दूसरा मंत्र (उपाय) नहीं है, इसलिये उस शत्रुके नाते-गोतेके पुरुषको प्रयत्नसे उकसावे अर्थात् तोड़ फोड़ कर अपनी ओर मिलावे ॥ ९२ ॥ संधाय युवराजेन यदि वा मुख्यमन्त्रिणा । अन्तःप्रकोपनं कार्यमभियोक्तुः स्थिरात्मनः ॥ ९३ ॥ युवराजके साथ अथवा मुख्य मंत्रीके साथ संधि (मेल) करके निश्चित्ताईसे बैठे-ठाले शत्रुके घरमें फूट करा देनी चाहिये ॥ ९३ ॥ क्रूरं मित्रं रणे चापि भङ्गं दत्त्वा विघातयेत् । अथवा गोग्रहाकृष्ट्या तल्लक्ष्याश्रितबन्धनात् ॥ ९४ ॥ युद्धमें हरा कर भी क्रूर मित्र (राजा) को मार डाले अथवा जैसे गौको खींच कर बाँधते हैं वैसे ही उसके मुख्य सहायक राजाओंको बंधनमें डाल कर उसे मार देना चाहिये ॥ ९४ ॥ स्वराज्यं वासयेद्राजा परदेशावगाहनात् । अथवा दानमानाभ्यां वासितं धनदं हि तत् ॥ ९५ ॥ और राजा शत्रुके राज्यसे मनुष्योंको पकड़ ला कर अपने राज्यमें बसावे, अथवा धन और आदरसे बसाया हुआ वह राज्य ही धन देने वाला होता है' ॥९५॥ राजाह—‘आः ! किं बहुनोदितेन ? राजा बोला—‘अजी ! बहुत बातोंसे क्या है ? आत्मोदयः परग्लानिर्द्वयं नीतिरितीयती । तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतीयते’ ॥ ९६ ॥ अपना लाभ और शत्रुको हानि नीति तो यही है। बुद्धिमान् लोग इसीको स्वीकार करके अपनी चतुरता प्रकट करते हैं ॥ ९६ ॥ मन्त्रिणा विहस्योच्यते—‘सर्वमेतद्विशेषतश्चोच्यते ! मंत्रीने हँस कर कहा-‘यह तो सबमे बढ़ कर बात आप कहते हैं,
-९७ ] चित्रवर्णकी सेनाका डेरा लगा लेना १९१ किंतु,- अन्यदुच्छृङ्खलं सत्त्वमन्यच्छास्त्रनियन्त्रितम् । सामानाधिकरण्यं हि तेजस्तिमिरयोः कुतः ? ॥ ९७ ॥ परन्तु, एक मनुष्य तो निरंकुश याने स्वतंत्र, और दूसरा नियन्त्रित याने नीति पर चलने वाला इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है, जैसे निश्चय करके चाँदनी और अँधेरेका एक जगह पर होना कहाँ संभव है ? अर्थात् नहीं हो सकता है, इसलिये नीतिविरुद्ध नहीं चलना चाहिये ॥ ९७ ॥ तत उत्थाय राजा मौहूर्तिकावेदितलग्ने प्रस्थितः । तब राजा उठ कर ज्योतिषीके बतलाये लग्नमें लड़ाईके लिये बिदा हुआ । अथ प्रहितप्रणिधिर्हिरण्यगर्भमागत्योवाच-'देव ! समागतप्रायो राजा चित्रवर्णः । संप्रति मलयपर्वताधित्यकायां समावासितकट- कोऽनुवर्तते । दुर्गशोधनं प्रतिक्षणमनुसंधातव्यम्, यतोऽसौ गृध्रो महामन्त्री । किंच केनचित्सह तस्य विश्वासकथाप्रसङ्गेनैव तदिङ्गितमवगतं मया यदनेन कोऽप्यस्मद्दुर्गे प्रागेव नियुक्तः ।' चक्रो ब्रूते- 'देव ! काक एवासौ संभवति ।' राजाह - 'न कदा- चिदेतत् । यद्येवं तदा कथं तेन शुकस्याभिभवोद्योगः कृतः ? अपरं च । शुकस्यागमनात्तस्य विग्रहोत्साहः । स चिरादत्रास्ते ।' मन्त्री ब्रूते- 'तथाप्यागन्तुः शङ्कनीयः ।' राजाह- 'आगन्तुका हि कदाचिदुपकारका दृश्यन्ते । फिर भेजे हुए दूतने हिरण्यगर्भसे आ कर कहा- 'महाराज ! राजा चित्रवर्ण आ पहुँचा है । अब मलय पर्वतकी ऊँची भूमि पर डेरा डाल कर अपनी सेनाको बसा कर ठहरा हुआ है । गढकी देखभाल क्षणक्षणमें करनी चाहिये, क्योंकि यह गिद्ध महामंत्री है । और किसीके साथ उसकी विश्वासकी बातचीतसेही उसकी चेष्टा मैंने जान ली कि हमारे गढ़में इसने किसी न किसीको पहलेसेही लगा रक्खा होगा।' चकवा बोला-'महाराज ! वह कौवाही होना संभव दीख पड़ता है।' राजा बोला-'यह बात कभी शक्य नहीं है। जो ऐसा होता तो कैसे उसने तोतेके अनादर करनेका उद्योग किया है ? और दूसरे तोतेके आनेसे उसको लड़ाईका उत्साह हुआ है। वह यहाँ बहुत दिनोंसे रहता है।' मंत्री
१९२ हितोपदेशः [ विग्रहः ९८- बोला-'तो भी आने वाले पर संदेह करना ही चाहिये।' राजा बोला-'आने वाले सचमुच कभी कभी उपकारी दीख पड़ते हैं। शृणु,- परोऽपि हितवान् बन्धुर्बन्धुरप्यहितः परः । अहितो देहजो व्याधिर्हितमारण्यमौषधम् ॥ ९८ ॥ सुन,-हित करने वाला शत्रु भी बन्धु है और अहितकारी बन्धु भी शत्रु होता है; जैसे देहसे उत्पन्न हुआ रोग अहितकारी होता है और वनमें उत्पन्न हुई औषध हितकारी होती है ॥ ९८ ॥ अपरं च,- आसीद्वीरवरो नाम शूद्रकस्य महीभृतः । सेवकः स्वल्पकालेन स ददौ सुतमात्मनः' ॥ ९९ ॥ और दूसरे-शूद्रक नाम राजाका एक वीरवर नाम सेवक था; उसने थोड़े कालमें अपने पुत्रको दे दिया' ॥ ९९ ॥ चक्रः पृच्छति-'कथमेतत् ?' । राजा कथयति- चक्रवा पूछने लगा-'यह कथा कैसे है?' राजा कहने लगा ।- कथा ९ [ राजकुमार और उसके पुत्रको बलिदानकी कहानी ९ ] 'अहं पुरा शूद्रकस्य राज्ञः क्रीडासरसि कर्पूरकेलिनाम्नो राज- हंसस्य पुत्र्या कर्पूरमञ्जर्या सहानुरागवानभवम् । तत्र वीरवरो नाम महाराजपुत्रः कुतश्चिद्देशादागत्य राजद्वारमुपगम्य प्रती- हारमुवाच-'अहं तावद्वेतनार्थी राजपुत्रः । राजदर्शनं कारय ।' ततस्तेनासौ राजदर्शनं कारितो ब्रूते-'देव ! यदि मया सेवकेन प्रयोजनमस्ति तदास्मद्वर्तनं क्रियताम् ।' शूद्रक उवाच-किं ते वर्तनम् ?' । वीरवरो ब्रूते-'प्रत्यहं सुवर्णपञ्चशतानि देहि ।' राजाह-'का ते सामग्री ?' । वीरवरो ब्रूते-'द्वौ बाहू तृतीयश्च खड्गः ।' राजाह-'नैतच्छक्यम् ।' तच्छ्रुत्वा वीरवरश्चलितः । अथ मन्त्रिभिरुक्तम्-'देव ! दिनचतुष्टयस्य वर्तनं दत्त्वा ज्ञायतामस्य स्वरूपं किमुपयुक्तोऽयमेतावद्वर्तनं गृह्णात्यनुपयुक्तो वेति' । ततो
-९९ ] वीरवरको नौकरीमें रखना, रातमें शब्द सुनना १९३ मन्त्रिवचनादाहूय वीरवराय ताम्बूलं दत्त्वा पञ्चशतानि सुवर्णानि दत्तानि । तद्विनियोगश्च राज्ञा सुनिभृतं निरूपितः । तदर्धं वीर- वरेण देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दत्तम् । स्थितस्यार्धं दुःखितेभ्यः, तद- वशिष्टं भोज्यव्ययविलासव्ययेन । एतत्सर्वं नित्यकृत्यं कृत्वा राज- द्वारमहर्निशं खड्गपाणिः सेवते । यदा च राजा स्वयं समादिशति तदा स्वगृहमपि याति । 'पहले मैं शूद्रक नाम राजाके क्रीड़ा-सरोवरमें कर्पूरकेलि नामक राजहंसकी पुत्री कर्पूरमंजरीके साथ अनुरक्त (प्रेमवश) हो गया था । वहाँ वीरवर नाम महा- राजकुमार किसी देशसे आया और राजाकी ड्योढ़ी पर आ कर द्वारपालसे बोला- 'मैं राजपुत्र हूं, नोकरी चाहता हूँ । राजाका दर्शन कराओ ।' फिर इसने उसे राजाका दर्शन कराया और वह बोला-'महाराज ! जो मुझ सेवकका प्रयोजन हो तो मुझे नौकर रखिये ।' शूद्रक बोला-"तुम कितनी तनखाह चाहते हो ?" वीरवर बोला-'नित्य पाँच सौ मोहरें दीजिये ।' राजा बोला-'तेरे पास क्या क्या सामग्री है ?' वीरवर बोला-'दो बाँहें और तीसरा खड्ग ।' राजा बोला-'यह बात नहीं हो सकती है । यह सुन कर वीरवर चल दिया । फिर मंत्रियोंने कहा- 'हे महाराज ! चार दिनका वेतन दे कर इसका स्वरूप जान लीजिये कि यह क्या उपकारी है, जो इतना धन लेता है या उपयोगी नहीं है ।' फिर मंत्रीके वचनसे बुलवाया और वीरवरको बीड़ा दे कर पाँच सौ मोहरें दे दीं । और उसका काम भी राजाने छुप कर देखा । वीरवरने उस धनका आधा देवताओंको और ब्राह्मणोंको अर्पण कर दिया । बचे हुएका आधा दुखियोंको; उससे बचा हुआ भोजनके तथा विलासादिमें खर्च किया । यह सब नित्य काम करके वह राजाके द्वार पर रातदिन हाथमें खड्ग ले कर सेवा करता था और जब राजा आप आज्ञा देता तब अपने घर जाता था । अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यां रात्रौ राजा सकरुणं क्रन्दनध्वनिं शुश्राव । शूद्रक उवाच—'कः कोऽत्र द्वारि ?' । तेनोक्तम्— 'देव ! अहं वीरवरः ।' राजोवाच—'क्रन्दनानुसरणं क्रियताम् ।' वीरवरो 'यथाज्ञापयति देवः' इत्युक्त्वा चलितः । राज्ञा च चिन्तितम्—'नैतदुचितम् । अयमेकाकी राजपुत्रो मया सूचिभेद्ये तमसि प्रेरितः । तदनु गत्वा किमेतदिति निरूपयामि।' हि० १३
१९४ हितोपदेशः [ विग्रहः १९-
ततो राजापि खङ्गमादाय तदनुसरणक्रमेण नगराद्वहिर्निर्जगाम । गत्वा च वीरवरेण सा रुदती रूपयौवनसंपन्ना सर्वांलंकारभूषिता काचित्स्त्री दृष्टा। पृष्टा च—'का त्वम् ? किमर्थं रोदिषि ?' स्त्रियोक्तम्—'अहमेतस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीः । चिरादेतस्य भुजच्छायायां महता सुखेन विश्रान्ता। इदानीमन्यत्र गमि- ष्यामि।' वीरवरो ब्रूते—'यत्रापायः संभवति तत्रोपायोऽप्यस्ति। तत्कथं स्यात्पुनरिहावलम्बनं भवत्याः ?' । लक्ष्मीरुवाच— 'यदि त्वमात्मनः पुत्रं शक्तिधरं द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतं भगवत्याः सर्वमङ्गलाया उपहारीकरोषि तदाहं पुनरत्र सुचिरं निवसामि' इत्युक्त्वाऽदृश्याऽभवत् ।
फिर एक समय कृष्णपक्षकी चौदसके दिन, रातको राजाने करुणासहित रोनेका शब्द सुना । शूद्रक बोला-'यहाँ द्वार पर कौन कौन है ?' उसने कहा—'महाराज ! मैं वीरवर हूँ।' राजाने कहा-'रोनेकी तो टोह लगाओ ।' 'जो महाराजकी आज्ञा' यह कह कर वीरवर चल दिया । और राजाने सोचा-'यह बात उचित नहीं है कि इस राजकुमारको मैंने घने अँधेरेमें जाने की आज्ञा दी । इसलिये मैं उसके पीछे जा कर यह क्या है इसका निश्चय करूँ ।' फिर राजा भी खङ्ग ले कर उसके पीछे नगरसे बाहर गया । और वीरवरने जा कर उस रोती हुई, रूप तथा यौवनसे सुन्दर और सब आभूषण पहिने हुए किसी स्त्रीको देखा और पूछा-'तू कौन है ? किसलिये रोती है ?' स्त्रीने कहा—'मैं इस शूद्रककी राजलक्ष्मी हूँ । बहुत कालसे इसकी भुजाओंकी छायामें बड़े सुखसे विश्राम करती थी । अब दूसरे स्थानमें जाऊँगी ।' वीरवर बोला— 'जिसमें अपाय(नाश)का संभव है उसमें उपाय भी है । इसलिये कैसे फिर यहाँ आपका रहना होगा ?' लक्ष्मी बोली-'जो तू बत्तीस लक्षणोंसे संपन्न अपने पुत्र शक्तिधरको सर्वमंगला देवीकी भेट करे तो मैं फिर यहाँ बहुत काल तक रहूँ।' यह कह कर वह अंतर्धान हो गई ।
ततो वीरवरण स्वगृहं गत्वा निद्रायमाणा स्ववधूः प्रबोधिता पुत्रश्च । तौ निद्रां परित्यज्योत्थायोपविष्टौ । वीरवरस्तत्सर्वं लक्ष्मीवचनमुक्तवान्। तच्छ्रुत्वा सानन्दः शक्तिधरो ब्रूते—'धन्यो-
ऽहमेवंभूतः स्वामिराज्यरक्षार्थं यन्ममोपयोगः श्लाघ्यः । तत्को- ऽधुना विलम्बस्य हेतुः ? एवंविधे कर्मणि देहस्य विनियोगः श्लाघ्यः । फिर वीरवरने अपने घर जा कर सोती हुई अपनी स्त्रीको और बेटेको जगाया । वे दोनों नींदको छोड़, उठ कर खड़े हो गये । वीरवरने वह सब लक्ष्मीका वचन उनको सुनाया । उसे सुन कर शक्तिधर आनन्दसे बोला-‘मैं धन्य हूँ जो ऐसे, स्वामीके राज्यकी रक्षाके लिये मेरा उपयोग प्रशंसनीय है । इसलिये अब विलम्बका क्या कारण है ? ऐसे काममें देहका त्याग प्रशंसनीय है । यतः,— धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् । सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति’ ॥ १०० ॥ क्योंकि—पण्डितको परोपकारके लिये धन और प्राण छोड़ देने चाहिये, विनाश तो निश्चय होगाही, इसलिये अच्छे कार्यके लिए प्राणोंका त्याग श्रेष्ठ है’ ॥ १०० ॥ शक्तिधरमातोवाच—‘यद्येतन्न कर्तव्यं तत्केनान्येन कर्मणा मुख्यस्य महावर्तनस्य निष्क्रयो भविष्यति ?’ इत्यालोच्य सर्वे सर्वमङ्गलायाः स्थानं गताः। तत्र सर्वमङ्गलां संपूज्य वीरवरो ब्रूते—‘देवि ! प्रसीद । विजयतां विजयतां शूद्रको महाराजः, गृह्य- तामुंपहारः ।’ इत्युक्त्वा पुत्रस्य शिरश्छिच्छेद । ततो वीरवरश्चि- न्तयामास—‘गृहीतराजवर्तनस्य निस्तारः कृतः। अधुना निष्पुत्र- स्य जीवनेनालम् ।’ इत्यालोच्यात्मनः शिरच्छेदः कृतः । ततः स्त्रियापि स्वामिपुत्रशोकार्तया तदनुष्ठितम् । शक्तिधरकी माता बोली-‘जो यह नहीं करोगे तो और किस कामसे इस बड़े वेतनके ऋणसे उनंतर होगे ? ।’ यह विचार कर सब सर्वमंगला देवीके स्थान पर गये । वहाँ सर्वमंगला देवीको पूज कर वीरवरने कहा-‘हे देवी ! प्रसन्न हो; शूद्रक महाराजकी जय हो जय हो ! यह भेंट लो ।’ यह कह कर पुत्रका शिर काट डाला । फिर वीरवर सोचने लगा कि-‘लिये हुए राजाके ऋणको तो चुका दिया। अब बिना पुत्रके जीवित किस कामका ? ।’ यह विचार कर उसने अपना शिर
१९६ हितोपदेशः [ विग्रहः १०१- काट डाला। फिर पति और पुत्रके शोकसे पीड़ित स्त्रीने भी अपना शिर काट डाला। तत्सर्वं दृष्ट्वा राजा साश्चर्यं चिन्तयामास— ‘जीवन्ति च म्रियन्ते च मद्विधाः क्षुद्रजन्तवः। अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ १०१ ॥ यह सब देख कर राजा आश्चर्यसे सोचने लगा,—मेरे समान नीच प्राणी संसारमें जीते हैं और मरतेभी हैं, परन्तु संसारमें इसके समान न हुआ और न होगा ॥ १०१ ॥ तदेतेन परित्यक्तेन मम राज्येनाप्यप्रयोजनम् । ततः शूद्रके- णापि स्वशिरश्छेत्तुं खङ्गः समुत्थापितः । अथ भगवत्या सर्व- मङ्गलया राजा हस्ते धृत उक्तश्च—‘पुत्र ! प्रसन्नास्मि ते एता- वता साहसेनालम् । जीवनान्तेऽपि तव राज्यभङ्गो नास्ति ।' राजा च साष्टाङ्गपातं प्रणम्योवाच—‘देवि ! किं मे राज्येन, जीवितेन वा किं प्रयोजनम् ? यद्यहमनुकम्पनीयस्तदा ममायुः- शेषेणायं सदारपुत्रो वीरवरो जीवतु । अन्यथाऽहं यथाप्राप्तां गतिं गच्छामि ।' भगवत्युवाच—‘पुत्र ! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च तव तुष्टास्मि । गच्छ । विजयी भव । अयमपि सपरिवारो राजपुत्रो जीवतु ।' इत्युक्त्वा देव्यदृश्याभवत् । ततो वीरवरः सपुत्रदारो गृहं गतः । राजापि तैरलक्षितः सत्वरमन्तः- पुरं प्रविष्टः । इसलिये ऐसे महापुरुषसे शून्य इस राज्यसे मुझे भी क्या प्रयोजन है ? पीछे शूद्रकने भी अपना शिर काटनेको खङ्ग उठाया । तब सर्वमंगला देवीने राजाका हाथ रोका और कहा—'हे पुत्र ! मैं तेरे ऊपर प्रसन्न हूँ, इतना साहस मत करो । मरनेके बाद भी तेरा राज्य भंग नहीं होगा।' तब राजा साष्टांग दंडवत और प्रणाम करके बोला-'हे देवी ! मुझे राज्यसे क्या है अथवा जीनसे भी क्या प्रयोजन है ? और जो मैं कृपाके योग्य हूँ तो मेरी शेष आयुसे स्त्रीपुत्रसहित वीर- वर जी उठे । नहीं तो मैं अपना शिर काट डालूंगा।' देवी बोली-‘हे पुत्र ! तेरे इस अधिक उत्साहसे और सेवकतासे स्नेहसे मैं तुझ पर प्रसन्न हूं । जाओ, तुम्हारी जय हो । यह राजपुत्र भी परिवारसमेत जी उठे।' यह कह कर देवी
-१०३ ] सर्वस्वदानी वीरवरको कर्नाटकराज्यका अर्पण १९७ अंतर्धान हो गई। पीछे वीरवर अपने स्त्रीपुत्रसमेत घरको गया । राजा भी उनसे छुप कर शीघ्र रनवासमें चला गया । अथ प्रभाते वीरवरो द्वारस्थः पुनर्भूपालेन पृष्टः सन्नाह—‘देव ! सा रुदती मामवलोक्यादृश्याभवत् । न काप्यन्या वार्ता विद्यते ।' तद्वचनमाकर्ण्य राजाऽचिन्तयत्—‘कथमयं श्लाघ्यो महासत्त्वः ? इसके अनन्तर प्रातःकाल राजाने ड्योढ़ी पर बैठे हुए वीरवरसे फिर पूछा और वह बोला—'हे महाराज ! वह रोती हुई स्त्री मुझे देख कर अन्तर्धान हो गई, और कुछ दूसरी बात नहीं थी।' उसका वचन सुन कर राजा सोचने लगा— 'इस महात्माको किस प्रकार बड़ाई करूँ ? यतः,— प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्याद्विकत्थनः । दाता नापात्रवर्षी च प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ॥ १०२ ॥ क्योंकि—उदार पुरुषको मीठा बोलना चाहिये, शूरको अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, दाताको कुपात्रमें दान न करना चाहिये, और उचित कहने वालेको दयारहित नहीं होना चाहिये ॥ १०२ ॥ एतन्महापुरुषलक्षणमेतस्मिन्सर्वमस्ति ।' ततः स..राजा प्रातः शिष्टसभां कृत्वा सर्ववृत्तान्तं प्रस्तुत्य प्रसादात्तस्मै कर्नाटकराज्यं ददौ। तत्किमागन्तुको जातिमात्राद्दुष्टः ? तत्राप्युत्तमाधममध्यमाः सन्ति ।' यह महापुरुषका लक्षण इसमें सब है । पीछे उस राजाने प्रातःकाल शिष्ट लोगोंकी सभा करके और सब वृत्तान्तकी प्रशंसा करके प्रसन्नतासे उसे कर्नाटकका राज्य दे दिया । इसलिये (मैं जानना चाहता हूं) क्या विदेशी केवल जाति मात्रसेही दुष्ट होता है ? उनमें भी उत्तम, निकृष्ट और मध्यम होते हैं । चक्रवाको ब्रूते— ‘योऽकार्यं कार्यवच्छास्ति स किंमन्त्री नृपेच्छया । वरं स्वामिमनोदुःखं तन्नाशो न त्वकार्यतः ॥ १०३ ॥ चकवा बोला—'जो राजाकी इच्छा(के अनुरोध)से, अयोग्य कार्यको योग्य कार्यके समान उपदेश करता है वह नीच मंत्री है। क्योंकि स्वामीके मनको
१९८ हितोपदेशः [ विग्रहः १०४- दुःख होना अच्छा है परन्तु उस अनुचित काम करनेसे उसका नाश होना अच्छा नहीं है ॥ १०३ ॥ वैद्यो गुरुश्च मन्त्री च यस्य राज्ञः प्रियः सदा । शरीरधर्मकोशेभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते ॥ १०४ ॥ जिस राजाके पास वैद्य, गुरु और मंत्री सदा हाँमें हाँ मिलाने वाले हों वह राजा शरीर, धर्म और कोशसे शीघ्र रहित ( नष्ट ) हो जाता है ॥ १०४ ॥ शृणु देव !- पुण्याल्लब्धं यदेकेन तन्ममापि भविष्यति । हत्वा भिक्षुं महालोभान्निध्यर्थी नापितो हतः' ॥ १०५ ॥ सुनिये महाराज ! जो वस्तु किसीने पुण्यसे पा ली वह वस्तु मुझे भी मिल जायगी, यह नहीं सोचना चाहिये; अधिक लोभसे भिखारीको मार कर एक धनका अभिलाषी नाई मारा गया ॥ १०५ ॥ राजा पृच्छति - 'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति- राजा पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।- कथा १० [ एक क्षत्रिय, नाई और भिखारीकी कहानी १० ] 'अस्त्ययोध्यायां चूडामणिर्नाम क्षत्रियः । तेन धनार्थिना महता क्लेशेन भगवांश्चन्द्रार्धचूडामणिश्चिरमाराधितः । ततः क्षीणपापो- ऽसौ स्वप्ने दर्शनं दत्वा भगवदादेशाद्यक्षेश्वरेणादिष्टः - 'यत्त्वमद्य प्रातः क्षौरं कृत्वा लगुडं हस्ते कृत्वा गृहे निभृतं स्थास्यसि ततोऽस्मिन्नेवाङ्गणे समागतं भिक्षुं पश्यसि । तं निर्दयं लगुड- प्रहारेण हनिष्यसि । ततः सुवर्णकलशो भविष्यति, तेन त्वया यावज्जीवं सुखिना भवितव्यम् ।' ततस्तथानुष्ठिते तद्वृत्तम् । तत्र क्षौरकरणायानीतेन नापितेनालोक्य चिन्तितम्- 'अये ! निधि- प्राप्तेरयमुपायः । अहमप्येवं किं न करोमि ?' ततःप्रभृति नापितः प्रत्यहं तथाविधो लगुडहस्तः सुनिभृतं भिक्षोरागमनं प्रतीक्षते । एकदा तेन प्राप्तो भिक्षुर्लगुडेन व्यापादितः । तस्मादपराधा- त्सोऽपि नापितो राजपुरुषैर्व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि- 'पुण्याल्लब्धं यदेकेन' इत्यादि ।
-१०७ ] शत्रु की जांच करनेकी युक्ति १९९ अयोध्यामें चूड़ामणि नाम एक क्षत्रिय रहता था। उस धनके अभिलाषीने बड़े क्लेशसे भगवान् महादेवजीकी बहुत काल तक आराधना की। फिर जब वह क्षीणपाप हो गया तब महादेवजीकी आज्ञासे कुबेरने स्वप्नमें दर्शन दे कर आज्ञा दी कि-जो तुम आज प्रातःकाल और क्षौर कराके लाठी हाथमें ले कर घरमें एकांतमें छुप कर बैठोगे तो इसी आँगनमें एक भिखारीको आया हुआ देखोगे। जब तुम उसे निर्दय हो कर लाठीकी प्रहारोंसे मारोगे तब वह सुवर्णका कलश हो जायगा । उससे तुम जीवनपर्यन्त सुखसे रहोगे ।' फिर वैसा करने पर वही बात हुई । वहाँ क्षौर करनेके लिये बुलाया हुआ नाई सोचने लगा-‘अरे ! धन पानेका यही उपाय है, मैं भी ऐसा क्यों न करूँ ?' फिर उस दिनसे नाई वैसे ही लाठी हाथमें लिये हमेशा छिप कर भिखारीके आनेकी राह देखता रहता था। एक दिन उसने भिखारीको पा लिया और लाठीसे मार डाला । अपराधसे उस नाईको भी राजाके पुरुषोंने मार डाला । इसलिये मैं कहता हूं, "किसीको पुण्यसे मिल गई" इत्यादि ।' राजाह— ‘पुरावृत्तकथोद्गारैः कथं निर्णीयते परः । स्यान्निष्कारणबन्धुर्वा किं वा विश्वासघातकः ॥ १०६ ॥ राजा बोला-‘पहले हो गई कथाओंके कहनेसे नवीन आया हुआ कैसे निश्चय किया जाय कि यह अकृत्रिम बांधव है अथवा विश्वासघाती है ॥१०६॥ यातु । प्रस्तुतमनुसंधीयताम् । मलयाधित्यकायां चेच्चित्रवर्णस्त- दधुना किं विधेयम् ?' मन्त्री वदति—'देव ! आगतप्रणिधिमुखा- न्मया श्रुतं तन्महामन्त्रिणो गृध्रस्योपदेशे, यच्चित्रवर्णेनानादरः कृतः । ततोऽसौ मूढो जेतुं शक्यः । इसे जाने दो। अब जो उपस्थित है उसका विचार करो। मलय पर्वतके ऊपर जो चित्रवर्ण ठहरा है इसलिये अब क्या करना चाहिये ?' मंत्री बोला-‘हे महाराज ! लौट कर आये हुए दूतके मुँहसे मैंने यह सुना है कि उस महामंत्री गृध्रके उपदेश पर चित्रवर्णने अनादर किया है। फिर उस मूर्खको जीत सकते हैं। तथा चोक्तम्,— लुब्धः क्रूरोऽलसोऽसत्यः प्रमादी भीरुरस्थिरः । मूढो योधावमन्ता च सुखच्छेद्यो रिपुः स्मृतः ॥ १०७ ॥
२०० हितोपदेशः [ विग्रहः १०८- वैसा कहा है—लोभी, कपटी, आलसी, झूठा, कायर, अधीर, मूर्ख और योद्धाओंका अनादर करने वाला शत्रु सहजमें नाश किया जा सकता हैं ॥१०७॥ ततोऽसौ यावदस्मद्दुर्गद्वाररोधं न करोति तावन्नद्यद्रिवनवर्त्मसु तद्बलानि हन्तुं सारसादयः सेनापतयो नियुज्यन्ताम् । फिर वह जब तक हमारे गढ़का द्वार न रोके तब तक पर्वत और वनके मार्गोंमें उसकी सेनाको मारनेके लिये सारस आदिको सेनापति नियुक्त कर दीजिये । तथा चोक्तम्,— दीर्घवर्त्मपरिश्रान्तं नद्यद्रिवनसंकुलम् । घोराग्निभयसंत्रस्तं क्षुत्पिपासादितं तथा ॥ १०८ ॥ वैसा कहा है—राजाको लंबे मार्गसे थकी हुई, नदी, पर्वत और वनके कारण रुकी हुई भयंकर अग्निसे डरी हुई तथा भूख-प्याससे व्याकुल हुई ॥१०८॥ प्रमत्तं भोजनव्यग्रं व्याधिदुर्भिक्षपीडितम् । असंस्थितमभूयिष्ठं वृष्टिवातसमाकुलम् ॥ १०९ ॥ ( मद्यपानादिसे ) मतवाली, भोजनमें आसक्त, रोग तथा अकालसे पीडित तथा आश्रयरहित, थोड़ीसी, तथा वर्षा और ( शीतल ) वायुसे घबराई हुई ॥ १०९ ॥ पङ्कपांशुजलाच्छन्नं सुव्यस्तं दस्युविद्रुतम् । एवंभूतं महीपालः परसैन्यं विघातयेत् ॥ ११० ॥ कीचड़, धूलि और जलसे व्याप्त, आपत्तिसे निकलनेके यत्नमें व्याकुल, चौर आदिके उपद्रवोंसे युक्त ऐसी शत्रु की सेनाको नाश करना चाहिये ॥ ११० ॥ अन्यच्च,— अवस्कन्दभयाद्राजा प्रजागरकृतश्रमम् । दिवासुप्तं समाहन्यान्निद्राव्याकुलसैनिकम् ॥ १११ ॥ और दूसरे—घिर जानेकी शंकाके कारण रातके अधिक जागनेसे थकी हुई, दिनमें सोती हुई, निद्रासे व्याकुल शत्रु की सेनाको राजा मार डाले ॥ १११ ॥ अतस्तस्य प्रमादिनो बलं गत्वा यथावकाशं दिवानिशं घ्नन्त्वस्म- त्सेनापतयः ।' तथानुष्ठिते चित्रवर्णस्य सैनिकाः सेनापतयश्च बहवो निहताः । ततश्चित्रवर्णो विषण्णः स्वमन्त्रिणं दूरदर्शिनमाह— 'तात ! किमित्यस्मदुपेक्षा क्रियते किं काप्यवानयो ममास्ति ?
-११५ ] राज्य पाने पर राजाका कर्तव्यकर्तव्य २०१ इसलिये उस प्रमादीकी सेनाको जा कर जैसा अवसर मिले रातदिन हमारे सेनापति लूट खसोट कर मारे । ऐसा करनेसे चित्रवर्णकी सेना और बहुतसे सेनापति मारे गये; फिर चित्रवर्ण विकल हो कर अपने मंत्री दूरदर्शीसे कहने लगा—'प्यारे ! किसलिये हमारा अनादर करता है ? क्या कभी मैंने तेरा अनादर किया है ? तथा चोक्तम्,— न राज्यं प्राप्तमित्येवं वर्तितव्यमसांप्रतम् । श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम् ॥ ११२ ॥ जैसा कहा है—राज्य मिल गया, यह जान कर अनुचित व्यवहार नहीं करना चाहिये । क्योंकि कठोरता निश्चय करके लक्ष्मीको ऐसे नाशमें मिला देती है जैसे सुन्दर रूप-रंगको बुढ़ापा ॥ ११२ ॥ अपि च,— दक्षः श्रियमधिगच्छति पथ्याशी कल्यतां सुखमरोगी । अभ्यासी विद्यान्तं धर्मार्थयशांसि च विनीतः ॥ ११३ ॥ और भी-चतुर पुरुष लक्ष्मीको, सुन्दर और हलका भोजन करने वाला नीरोगताको, रोगहीन सुखको, अभ्यासी विद्याके अंतको, और सुशील अर्थात् नम्रतादिगुणोंसे युक्त मनुष्य धर्म, धन और यशको पाता है ॥ ११३ ॥ गृध्रोऽवदत्—'देव ! शृणु,— गिद्ध बोला—'महाराज ! सुनिये,— अविद्वानपि भूपालो विद्यावृद्धोपसेवया । परां श्रियमवाप्नोति जलासन्नतस्तरुर्यथा ॥ ११४ ॥ मूर्ख राजा भी पण्डितोंकी सेवासे जलके समीपके वृक्षके समान उत्तमोत्तम संपत्तिको पाता है ॥ ११४ ॥ अन्यच्च,— पानं स्त्री मृगया द्यूतमर्थदूषणमेव च । वाग्दण्डयोश्च पारुष्यं व्यसनानि महीभुजाम् ॥ ११५ ॥ और दूसरे-मद्य आदिका पीना, परस्त्रीका संग, आखेट, जुआ, अन्यायसे पराया धन लेना, और वचन तथा दंडमें रुखाई और कठोरता ये राजाओंके अवगुण कहे हैं; अर्थात् उनका त्याग करना अवश्य है ॥ ११५ ॥
२०२ हितोपदेशः [ विग्रहः ११६- किं च,— न साहसैकान्तरसानुवर्तिना न चाप्युपायोपहतान्तरात्मना । विभूतयः शक्यमवाप्तुमूर्जिता नये च शौर्ये च वसन्ति संपदः ॥ ११६ ॥ और ( बुराई भलाईको विना विचार कर ) केवल साहस करने वाला, और उपायसे उपहत चित्तवाला, अधिक ऐश्वर्यको नहीं पा सकता है, क्योंकि जहां पर नीति और शूरता रहती है वहां ही संपत्तियाँ रहती हैं ॥ ११६ ॥ त्वया स्वबलोत्साहमवलोक्य साहसैकवासिना मयोपन्यस्ते- ष्वपि मन्त्रेष्वनवधानं वाक्पारुष्यं च कृतम् । अतो दुर्नीतेः फलमिदमनुभूयते । और केवल साहस पर भरोसा करने वाले, आपने अपनी सेनाके उत्साहको देख कर मेरे किये उपदेशों पर ध्यान नहीं दिया था और कठोर वचन कहे थे उसी कटु नीतिका फल भोग रहे हो । तथा चोक्तम्,— दुर्मन्त्रिणं किमुपयन्ति न नीतिदोषाः संतापयन्ति कमपथ्यभुजं न रोगाः ? । कं श्रीर्न दर्पयति कं न निहन्ति मृत्युः कं स्त्रीकृता न विषयाः परितापयन्ति ? ॥ ११७ ॥ नीतिके दोष किस बुरे मंत्रीमें नहीं होते हैं ? किसको अपथ्य ( अहितकर वस्तुएँ ) खाने पर रोग नहीं पीड़ा देते हैं ? लक्ष्मी किस मनुष्यको अभिमानी नहीं करती है ? मृत्यु किसको नहीं मारती है और स्त्रीके किये हुए दुराचार किस पुरुषको दुःख नहीं देते हैं ? ॥ ११७ ॥ अपरं च,— मुदं विषादः शरदं हिमागम- स्तमो विवस्वान् सुकृतं कृतघ्नता । प्रियोपपत्तिः शुचमापदं नयः श्रियः समृद्धा अपि हन्ति दुर्नयः ॥ ११८ ॥
नीतिशास्त्रकथाकौमुदीं वागुल्काभिस्तिमिरयति ?
-१२१] बची सेनाके साथ विंध्याचल जानेकी तैयारी २०३ और दूसरे-दुःख-हर्षको, हिमऋतु शरदको, सूर्य अँधेरेको, कृतघ्नता उपकार अथवा पुण्यको, अभीष्टका लाभ शोकको, नीति आपत्तिको और अनीति अतिसमृद्ध ( बड़ी हुई ) संपत्तिको भी नाश कर देती है ॥ ११८ ॥ ततो मयाप्यालोचितम्—'प्रज्ञाहीनोऽयं राजा । नो चेत्कथं नीतिशास्त्रकथाकौमुदीं वागुल्काभिस्तिमिरयति ? तब मैंने भी सोच लिया था कि यह राजा बुद्धिहीन है; नहीं तो कैसे नीतिशास्त्रकी कथारूपी चाँदनीको वाणीरूपी उल्कापातोंसे धुँधली करता ? यतः,— यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ? । लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ?' ॥ ११९ ॥ क्योंकि—जिस मनुष्यको अपनी बुद्धि नहीं है उसको शास्त्र क्या करता है ? जैसे दोनों आँखोंसे रहित अन्धे मनुष्यको दर्पण क्या करेगा ?' ॥ ११९ ॥ इत्यालोच्य तूष्णीं स्थितः । अथ राजा बद्धाञ्जलिरह—'तात ! अस्त्ययं ममापराधः । इदानीं यथावशिष्टबलसहितः प्रत्यावृत्य विन्ध्याचलं गच्छामि तथोपदिश ।' गृध्रः स्वगतं चिन्तयति— 'क्रियतामत्र प्रतीकारः । यह जीमें विचार कर चुपका-सा हो बैठा था । पीछे राजा हाथ जोड़ कर बोला—'प्यारे ! यह मेरा अपराध हुआ । अब जैसे बची हुई सेनाके साथ लौट कर विंध्याचल पहुँच जाऊँ वैसा उपाय बता ।' गिद्ध अपने जीमें सोचने लगा,—'इसका कुछ ना कुछ उपाय करना चाहिये । यतः,— देवतासु गुरौ गोषु राजसु ब्राह्मणेषु च । नियन्तव्यः सदा कोपो बालवृद्धातुरेषु च' ॥ १२० ॥ क्योंकि—देवता, गुरु, गाय, राजा, ब्राह्मण, बालक, बूढ़ा और रोगी इन पर क्रोध रोकना चाहिये' ॥ १२० ॥ मन्त्री प्रहस्य ब्रूते—'देव ! मा भैषीः । समाश्वसिहि शृणु देव ! मंत्री ( यह अपने जीमें विचार कर ) हँस कर बोला—'महाराज ! मत डरिये और धीरज धरिये, हे महाराज ! सुनिये,—
२०४ हितोपदेशः [ विग्रहः १२१- मन्त्रिणां भिन्नसंधाने भिषजां सांनिपातिके । कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा सुस्थे को वा न पण्डितः ? ॥१२१॥ लड़ाईके समय शत्रुसे मेल करनेमें मंत्रियोंकी, सन्निपात(ज्वर) रोगमें वैद्योंकी और कार्योंके साधनमें दूसरोंकी बुद्धि जानी जाती है, और यों बैठें ठाले कौन पण्डित नहीं है ? ॥ १२१ ॥ अपरं च,— आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च । महारम्भाः कृतधियस्तिष्ठन्ति च निराकुलाः ॥ १२२ ॥ और दूसरे-बुद्धिहीन, छोटे ही कामका आरम्भ करते हैं और अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं । बुद्धिमान् बड़े बड़े काम करते हैं और कभी विकल नहीं होते हैं ॥ १२२ ॥ तदत्र भवत्प्रतापादेव दुर्ग भङ्क्त्वा कीर्तिप्रतापसहितं त्वामचि- रेण कालेन विन्ध्याचलं नेष्यामि।' राजाह—'कथमधुना स्वल्प- बलेन तत्संपद्यते?' । गृध्रो वदति—'देव ! सर्वं भविष्यति । यतो विजिगीषोरदीर्घसूत्रता विजयसिद्धेरवश्यंभावि लक्षणम् । तत्सहसैव दुर्गावरोधः क्रियताम्।' इसलिये यहाँ आपके पुण्यप्रतापसेही गढ़को तोड़ फोड़ यश और पराक्रम- सहित आपको शीघ्र विंध्याचलको ले चलूँगा।' राजा बोला-'अब थोड़ीसी सेनासे यह कैसे होगा ?' गिद्धने कहा-'महाराज ! सब कुछ हो जायगा । क्योंकि जय चाहने वालेको दीर्घसूत्रता (कालक्षेप) न होना ही जयकी सिद्धिका अवश्य होनहार लक्षण है । इसलिये एकाएक ही गढ़ चारों ओरसे घेर लीजिये।' प्रहितप्रणिधिना बकेनागत्य हिरण्यगर्भस्य तत्कथितम्—'देव ! स्वल्पबल एवायं राजा चित्रवर्णो गृध्रस्य मन्त्रोपस्तम्भेन दुर्गावरोधं करिष्यति । राजाह—'सर्वज्ञ, किमधुना विधेयम् ?' चक्रो ब्रूते— 'स्वबले सारासारविचारः क्रियताम्।' तज्ज्ञात्वा सुवर्णवस्त्रादिकं यथार्हं प्रसादप्रदानं क्रियताम् । १ बात, पित्त और कफ इन तीन दोषोंके संनिपातसे होने वाला ज्वर या अन्य रोग भयंकर प्राणघातक माने गये हैं।
-१२५ ] बगुलेका हिरण्यगर्भको निवेदन २०५ भेजे हुए दूत बगुलेने लौट कर राजा हिरण्यगर्भसे यह कहा-'महाराज ! राजा चित्रवर्णके पास थोड़ी ही सेना रह गई है, गिद्धके उपदेशसे गढ़ घेरेगा ।' राजा बोला-'हे सर्वज्ञ ! अब क्या करना चाहिये ?' चकवा बोला-'अपनी सेनामें निर्बल और प्रबलका विचार कर लीजिये । वह जान कर सुवर्ण कपड़े आदि जो जिस योग्य हो उसे प्रसन्नताका दान ( अर्थात ) पारितोषिक दीजिये ॥ यतः,— यः काकिनीमप्यपथप्रपन्नां समुद्धरेन्निष्कसहस्रतुल्याम् । कालेषु कोटिष्वपि मुक्तहस्त- स्तं राजसिंहं न जहाति लक्ष्मीः ॥ १२३ ॥ क्योंकि—जो राजा बुरे मार्गमें पडी हुई एक कौडीको भी हजार मोहरोंके समान जान कर उठा लेता है और फिर किसी उचित समय पर करोड़ों रुपये खर्च कर डालता है उस श्रेष्ठ राजा को लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती है ॥ १२३ ॥ अन्यच्च,— ऋतौ विवाहे व्यसने रिपुक्षये यशस्करे कर्मणि मित्रसंग्रहे । प्रियासु नारीष्वधनेषु बान्धवे- ष्वतिव्ययो नास्ति नराधिपाष्टसु ॥ १२४ ॥ और दूसरे-महाराज ! यज्ञमें, विवाहमें, विपत्तिमें, शत्रुके नाश करनेमें, यश बढ़ाने वाले कार्यमें, मित्रके आदरमें, प्रिय स्त्रियोंमें, निर्धन बान्धवोंमें इन आठ बातोंमें व्यय वृथा नहीं कहाता है ॥ १२४ ॥ यतः,— मूर्खः स्वल्पव्ययत्रासात्सर्वनाशं करोति हि । कः सुधीः संत्यजेद्भाण्डं शुल्कस्यैवातिसाध्वसात्' ॥ १२५ ॥ क्योंकि मूर्ख थोड़े व्ययके भयसे निश्चय करके सर्वनाश कर देता है, और कौनसा बुद्धिमान् राज्यके भयसे अपनी दुकानके द्रव्य आदिको छोड़ देता है ? ॥ १२५ ॥ राजाह-'कथमिह समयेऽतिव्ययो युज्यते ? उक्तं च-“आपदर्थे धनं रक्षेत्” इति ।' मन्त्री ब्रूते-'श्रीमतः कथमापदः ?' । राजाह—
२०६ हितोपदेशः [ विग्रहः १२६- 'कदाचिच्चलते लक्ष्मीः ।' मन्त्री ब्रूते—'संचितापि विनश्यति । तद्देव ! कार्पण्यं विमुच्य दानमानाभ्यां स्वभटाः पुरस्क्रियन्ताम् । राजा बोला-'इस समय अधिक व्यय क्यों करना चाहिये ? कहा भी है- "आपत्तिके नाशके लिये धनकी रक्षा करे" इत्यादि ।' मंत्री बोला-'लक्ष्मीवान्को आपत्ति कहाँ ?' राजा बोला-'जो लक्ष्मी चली जाय तो ?' मंत्री बोला-'संचित धन भी नष्ट हो जाय तो ? इसलिये महाराज ! कृपणताको छोड़ दान और मानसे अपने शूर वीरोंका आदर कीजिये । तथा चोक्तम्,— परस्परज्ञाः संहृष्टास्त्यक्तुं प्राणान्सुनिश्चिताः । कुलीनाः पूजिताः सम्यग्विजयन्ते द्विषद्बलम् ॥ १२६ ॥ जैसा कहा है-आपसमें एक दूसरेकी सहायता करनेवाले, प्रसन्नचित्त, प्राणोंको ( स्वामीके लिये संग्राममें ) झोंकने वाले, ( शत्रुके मारनेका निश्चय संकल्प करने वाले, श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुए ) और अच्छे प्रकारसे सन्मान किये गये ऐसे शूरवीर शत्रु की सेनाको विजय करते हैं ॥ १२६ ॥ अपरं च,— सुभटाः शीलसंपन्नाः संहताः कृतनिश्चयाः । अपि पञ्चशतं शूरा निघ्नन्ति रिपुवाहिनीम् ॥ १२७ ॥ और दूसरे-अच्छे स्वभाव वाले, आपसमें मिले हुए, और बिना-मरें मारे नहीं लड़ेंगे ऐसा निश्चय करने वाले, पाँच सौ भी बड़े बड़े शूर वीर योधा वैरीकी सेनाका नाश कर देते हैं ॥ १२७ ॥ किं च,— शिष्टैरप्यविशेषज्ञ उग्रश्च कृतनाशकः । त्यज्यते किं पुनर्नान्यैश्चाप्यात्मम्भरिर्नरः ॥ १२८ ॥ और महामूर्ख, दुष्ट प्रकृति वाला, कृतघ्न और स्वार्थी मनुष्यको सज्जन भी छोड़ देते हैं; फिर दूसरोंका क्या कहना है ? अर्थात् ऐसेको सब त्याग देते हैं ॥ १२८ ॥ यतः,— सत्यं शौर्यं दया त्यागो नृपस्यैते महागुणाः । एभिर्मुक्तो महीपालः प्राप्नोति खलु वाच्यताम् ॥ १२९ ॥
-१३४ ] उचित राजनीतिका निरूपण २०७ क्योंकि—सत्य, शूरता, दया और दान याने उदारता ये राजाके बड़े गुण हैं, और इन गुणोंसे रहित राजा निश्चय करके वाच्यता(निन्दा)को पाता है ॥ ईदृशि प्रस्तावेऽमात्यास्तावदेव पुरस्कृतव्याः । ऐसे समय पर पहले मंत्रियोंका सत्कार होना चाहिये; तथा चोक्तम्,— यो येन प्रनिबद्धः स्यात्सह तेनोदयी व्ययी । स विश्वस्तो नियोक्तव्यः प्राणेषु च धनेषु च ॥ १३० ॥ जैसा कहा है,—जो जिससे बँधा हुआ है और उसीके साथ जिसका उदय और ह्रास (क्षति) है ऐसे भरोसेके मनुष्यको प्राणोंकी रक्षाके कार्यमें लगाना चाहिये ॥ १३० ॥ यतः,— धूर्तः स्त्री वा शिशुर्यस्य मन्त्रिणः स्युर्महीपतेः । अनीतिपवनक्षिप्तः कार्याब्धौ स निमज्जति ॥ १३१ ॥ क्योंकि—जिस राजाके धूर्त, स्त्री अथवा बालक मंत्री हों वह अनीतिरूपी पवनसे उड़ाया हुआ कार्यरूपी समुद्रमें डूबता है ॥ १३१ ॥ शृणु देव !— हर्षक्रोधौ समौ यस्य शास्त्रार्थे प्रत्ययस्तथा । नित्यं भृत्यानुपेक्षा च तस्य स्याद्धनदा धरा ॥ १३२ ॥ महाराज ! सुनिये—जिसको हर्ष और क्रोध समान हैं, शास्त्रमें भरोसा है और सेवकों पर अतिस्नेह है उसको पृथिवी सतत धन देनेवाली होती है ॥१३२॥ येषां राज्ञा सह स्यातामुच्चयापचयौ ध्रुवम् । अमात्या इति तान्राजा नावमन्येतकदाचन ॥ १३३ ॥ जिन्होंकी राजाके साथ निश्चय करके घटती और बढ़ती हो वे मंत्री कहाते हैं और राजाको उनका कभी अपमान नहीं करना चाहिये ॥ १३३ ॥ यतः,— महीभुजो मदान्धस्य संकीर्णस्येव दन्तिनः । स्खलतो हि करालम्बः सुहृत्सचिवचेष्टितम्' ॥ १३४ ॥ और मतवाले हाथीके समान गिरते हुए मदांध राजाको स्निग्ध अंतःकरणवाले मंत्रीका अच्छा उपदेशही करावलंब अर्थात् हाथसे सहारा देनेके समान है' ॥
२०८ हितोपदेशः [ विग्रहः १३५-
अथागत्य प्रणम्य मेघवर्णो ब्रूते—'देव ! दृष्टिप्रसादं कुरु । इदानीं विपक्षो दुर्गद्वारि वर्तते । तद्देवपादादेशाद्बहिर्निःसृत्य स्वविक्रमं दर्शयामि । तेन देवपादानामानृण्यमुपगच्छामि ।' चक्रो ब्रूते—'मैवम् । यदि बहिर्निःसृत्य योद्धव्यं तदा दुर्गाश्रयण- मेव निष्प्रयोजनम् ।
फिर मेघवर्णने आ कर प्रणाम करके कहा—'हे महाराज ! कृपा कर देख लीजिये । अब शत्रु गढ़के द्वारमें आ पहुँचा है। इसलिये आपकी आज्ञासे बाहर निकल कर अपना पराक्रम दिखलाऊँ जिससे महाराजके ऋणसे मैं उनंतर हो जाऊँ।' चकवा बोला—'ऐसा मत कर, जो बाहर निकल कर हम लड़ेंगे तो गढ़का आसरा ही वृथा है।
अपरं च,— विषमो हि यथा नक्रः सलिलान्निर्गतोऽवशः । वनाद्विनिर्गतः शूरः सिंहोऽपि स्याच्छृगालवत् ॥ १३५ ॥
और दूसरे—जैसे भयंकर मगर पानीसे बाहर निकल कर विवश हो जाता है, वैसे ही वनसे निकल कर पराक्रमी सिंह भी गीदड़के समान हो जाता है ॥१३५॥
देव ! स्वयं गत्वा दृश्यतां युद्धम् । महाराज ! आप चल कर युद्ध देखिये;
यतः,— पुरस्कृत्य बलं राजा योधयेदवलोकयन् । स्वामिनाधिष्ठितः श्वापि किं न सिंहायते ध्रुवम् ?' ॥१३६॥
क्योंकि—राजा आप देखता हुआ सेनाको आगे करके लड़ावे, क्योंकि स्वामीसे लहकाया हुआ कुत्ता भी क्या सचमुच सिंहकी भाँति बल नहीं दिखाता है ? अर्थात् अवश्य ही दिखाता है ॥ १३६ ॥
अथ ते सर्वे दुर्गद्वारं गत्वा महाहवं कृतवन्तः । अपरेद्युश्चित्र- वर्णो राजा गृध्रमुवाच—'तात ! स्वप्रतिज्ञातमधुना निर्वाहय ।' गृध्रो ब्रूते—'देव ! शृणु तावत्;
१ 'नक्रः स्वस्थानमासाद्य गजेन्द्रमपि कर्षति'—मगर पानीमें रह कर बडे हाथी- कोभी खींच सकता है, पर बाहर निकलनेसे तो विवश हो जाता है.