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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कबीर साहबका वेष स्वरूप देखकर वीरसिंहका कबीर साहबके पास आना

बोधसागर

(११)

छड़ीदार वचन

बेगहिं छड़ीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन

नामदेव पूछे चित लायी । राव संग को और रहायी ॥ छड़ीदार तब वचन सुनावा । कोउ नहिं साथ रायके भावा ॥ नामदेव छड़ी हाथमें लयऊ । चले चले राजापहैं गयऊ ॥ राजा देखि ठाढ उठि भयऊ । कर गहिके आसन बैठयऊ ॥

राजा वचन

राजा कहै सुनौ हो देवा । कहौ कौनकी करत हो सेवा ॥

नामदेव वचन

सांखी-भक्ति करौं गोविंदकी, एक चित ध्यान लगाय ॥

राजावीरसिंह वचन

श्वेत रूप जो भक्त है, सो कस न्यार रहाय ॥

नामदेव वचन

राजा सुनो वचन यक मोरा । हम तुम हरि हर ब्रह्मा दोरा ॥ ताकर भक्ति करे वह हांसी । कहै पुरुष यक और अविनासी ॥ माला मेखली श्याम शरीरा । मिली जुलाहा सत्य कबीरा ॥ किरतन कहे सकल सब देवा । कहे साँछु देख नहिं सेवा ॥ मूर्ति कूटि पाथर का लाई । कारीगर छाती दे पाई ॥ काँसा ताँबा मूर्ति बनावा । तामें कैसे ब्रह्म समावा ॥ ऐसे कहे कबीर जुलाहा । झूठे देवन हमैं मनाहा ॥ वह तो कहे हम पुरुष अभेवा । नहिं कोइ जाने हमरो भेवा ॥ आप अपनपौ बहु विधि थापै । आपै देव सेवक पुनि आपै ॥ भक्ति ज्ञान योग को भेवा । तीरथ व्रत तप अरु सब देवा ॥ सबको काल जाल बतलावे । एकोको नहिं मनमें लावे ॥ हम सन बहु विधि वाद विवादा । नहि माने वह अनहद नादा ॥

राजा वीरसिंह और कबीर साहबकी वार्तालाप

(१००)

बोरसिंह बोध

साखी-जोलहा निंदत सबनको, बन्दत काहू नाहिं ॥ झूठ कहत हरि ब्रह्महीं, कहे निर्गुण एकै आहिं ॥

राजाबीरसिंह वचन

राजा नामदेव कह बानी । अगम ज्ञान वह करत बखानी ॥

नामदेव वचन

कह नामदेव सुनो हो राजा । बहु विधि कहै शब्द को साजा ॥ जो को निर्गुण नामहिं धावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥ राजा छरीदार पठवाई । जाय कबीरहिं आनु बुलाई ॥

राजाबीरसिंह वचन

परम खुशी हमरे मन आवै । जो कोइ निर्गुण नाम सुनावै ॥ अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावत हरि हर ताको ॥ अहिंपति अस्तुति करै जो ताही । कोउ विधि पार न पावत जाही ॥ तेहिकर भजन करै जो कोई । तब विधिसे पूरा है सोई ॥ नाम देव सुनु संत सुजाना । वह निन्दक नहि संत प्रमाना ॥ छडीदार भेजि तुरत बुलवाऊँ । निर्गुण भेद अबहि खुलवाऊँ ॥ रूप संत हृदय मम भावै । शांत रूप वह भजन प्रभावै ॥ देखो अबहीं आवत सोई । सब कहिहै तेहि भावत जोई ॥ छडीदार तुरते चलि आयऊँ । जहंवा हम वहाँ बैठे रहेऊँ ॥

छडीदार वचन

छडीदार तब विन्ती लावा । अहो कबीर तोहि राय बुलावा ॥ विन्ती राय कीन कर जोरी । लावा कबीर वेगि तैं दोरी ॥

कबीर वचन

कहे कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राय बुलाई ॥ ना हम पण्डित ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥ ना हम विराना देश बसावैं । ना हम नाटक चेटक लावैं ॥

बोधसागर

(१०१)

पैसा दमरी नाहिं हमारे । केहि कारणे मोहि राय हंकारे ॥ गरज होय तो यहाँ चलि आवै । हम तो बैठे भजन करावै ॥

साखी—छडीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥ महा प्रचण्ड बघेल है, हम नहिं मानत त्रास ॥

चौपाई

छडीदार अति कोधित भयऊ । तुरतहिं चलि रायपहँ गयऊ ॥

छडीदार वचन

छडीदार कहै कर जोरी । महाराज एक विनती मोरी ॥ भक्त न आवै मोर हँकारे । कुछ भयभीरन राखु तुम्हारे ॥ कहैं हमारे कौन है काजा । तृणहि समान गिनत हौं राजा ॥ एता वचन राय सुनि लीन्हा । अगम बात कछु घटमो चीन्हा ॥ वह तो परमपुरुष है सोई । और होय तो आवै कोई ॥ सत्य भाव जाके उर आवे । मान बढाई लोभ सब जावे ॥ निर्गुण भक्ति जोई लवलीना । ताहि न उपजे भाव मलीना ॥ आशा तृष्णा जेहि घट व्यापै । धनवन्ता सो चाह मिलापै ॥ यहतो संत अविकल अविकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ॥ शोचत राजा मनमें गूने । नामदेव मन रहे अलूने ॥ मान बढाई जो नर पागे । करत खुशामद नृपती आगे ॥ साखी—नामदेव राजा कहे, जुलहा यहाँ न आव ॥ है अभिमानी बहुत सो, बहु अहँकार जनाव ॥

चौपाई

कीन विवेक राय दिल माहीं । नहिं आये कवीर हम जाहीं ॥ वह तो सत्य भक्ति चित दीन्हा । कारण कौन त्रास मम कीन्हा ॥ यहि विधि कीन विवेक विचारा । तबहीं राजा आप सिधारा ॥

१ नामदेवजीने राजाके विचारका भाव नहीं समझा ॥

(१०२)

बीरसिंह बोध

हुकम पाय आय असवारा । गज औ तुरंग सु साज सँवारा ॥ आवत देखा जब हम भाई । तब हम लीला एक बनाई ॥ आसन अधर कीन तेहि वारा । सवा हाथ धरतीसे न्यारा ॥ माला तिलक औ टोप विराजै । हाथ स्वेत कुवरी सो छाजै ॥ नृपति देखि अचरज मन कीन्हा । यह तो पुरुष अगम कछु चीन्हा ॥ कीन अवलोकन जग हम सबहीं । ऐसे पुरुष न देखे कबहीं ॥ धन्य धन्य अस्तुति सब गावैं । धन्य कवीर चरण सब ध्यावैं ॥ राजा चरण पकड़ि दोउ भाई । धन्य धन्य नृप करई बडाई ॥ कहे राय धन भाग हमारा । दर्शन दीन्ह आय करतारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-अस्तुति करत नृपति भाषेउ तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ॥ अनाथ नाथ सनाथ करि दिये माथ हाथ अनाथ हो ॥ अपनो दास करि जानि साहब दरश दीनेउ आयकै ॥ कीजै कृपा यहि दासपै चलि भवन दरस दिखायकै ॥ सोरठा-कृपा कीन जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ॥ विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ॥

कवीर वचन-चोपाई

कहैं कवीर तहाँ नहिं काजा । तुम परचण्ड बघेला राजा ॥ काम क्रोध मद लोभ बडाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥ तुरी सवा लक्ष सँग तोरे । लक्ष सवा दो प्यादा दोरे ॥ हस्ती चलत सहस तव संगा । निश्चिदिन भूले कामिनि रंगा ॥ कंचन कलसा महल अटारी । कैसे शब्द गहै नर नारी ॥ हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है तहाँ हमारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

तुम सतगुरु हो दीन दयाला । करमवश्य हम अहैं विहाला ॥ माया तिमिर नैन पट लागी । दर्शन पाय भये अनुरागी ॥

राजाका रानीसे कबीर साहबको गुरु बनानेकी बात चलाना और रानीका राजाको नीति समझाना

बोधसागर

(१०३)

करो दया अपनो करि लीजै । दास जानि आयसु प्रभु दीजै ॥ दीन जानि मन्दिर पगु धारो । भक्तराज तुम वेगि पधारो ॥ हम हैं पापी अधम अजाना । तव विनु कृपा काल धरि ताना ॥ देह उपदेश प्रभु मोहि बचावो । पाप जालते वेगि छुडाओ ॥ तुमरी कृपा सुनहु हो साहब । अंस विश्वास भवहितरि जायब ॥ अब जनि लावहु बार गुसाई । चलहु कृपा करि हंसन राई ॥

साखी-भक्तराज दाता अहो, कीजै मोह सनाथ ॥

मैं आधीन शरण तुव, चलो हमारे साथ ॥

चोपाई

बहुत अधीन तेहि जब देखा । चलन विचार कीन तब लेखा ॥ ततक्षण राजा हस्ति मँगावा । लै हमहीं तब हस्ती बैठावा ॥ गजते आसन अधरहिं धारा । चले राय तब बजे नगारा ॥ जबै राय मन्दिर लै गयऊ । तबै रानि कहैं तुरत बोलेऊ ॥ मानिक देहरानी चलि आयी । तासे राजा बात सुनाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम रानी गुरु कीन कबीरा । आदि ब्रह्म हैं मतिके धीरा ॥ चरण धोय चरणाभूत लीजै । सतगुरु दया करम सब छीजै ॥ तब सो रानी कहैं सुनु बाता । ओढे चीर सुभग निज गाता ॥

रानी मानिकदेवी वचन

राजा विन्ती सुनो हमारा । समुझि बूझि गुरु करो भुवारा ॥ तुम राजा हौ बहुतै ज्ञानी । विनय हमार लेहु सुनि मानी ॥

राजा बीरसिंह वचन

इतना सुनत राय मुसुकाये । रानी ज्ञान कौन बहुराये ॥ तुम हौ नारि भक्ति कहैं मानौ । साहबकी गति नहिं तुम जानौ ॥ कर्ता आप देह धरि लीना । भक्तरूप होय दर्शन दीना ॥

नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबसे ईर्षा करना और उनका समाधान

(१०४)

बीरसिंह बोध

हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनि सो वार घरे दोय थारा ॥ कंचन थारी झारी पानी । कंचनवटुकी व्यंजन आनी ॥ अधरसु थार भुईं ते न्यारा । महाप्रसाद राय चित धारा ॥ पाय प्रसाद राय जब लीन्हा । हम अरु राय बाहर पगु दीन्हा ॥ एकहि आसन बैठे दोई । नामदेव तब ठाढे होई ॥ नामदेव कह आसन दीन्हा । बहु सन्मान ताहिकर कीना ॥ नामदेव बैठे जब जायी । प्रश्न करन तिन चित तब लाई ॥

नामदेव वचन

कहहु कवीर मोहि समुझाई । कहैं तव गुरु शब्द कित पायी ॥ साहिब कौन सबनके पारा । मोसे कहहु वचन विचारा ॥ साहिब कौन जाहि तुम ध्याओ । कहैवा सुक्ति सुरति कित लाओ ॥ कौन भाँति यमसे जिव बाँचे । भिन्न भिन्न कहहु मोहि साँचे ॥ आप न समझो बोधो राजा । राम विना होय जीव अकाजा ॥ केतो पढे गुने अरु गावै । विनु हरि भक्ति पार नहीं पावै ॥

कवीर वचन

नामदेव भूले तुम जैसे । हमको मति जानहु तुम तैसे ॥ निर्गुण पुरुष आहि यक आना । अस्तुति ताकर वेद बखाना ॥ शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा । और जीव है कौन विचारा ॥ छन्द-नित्य निगम अस्तुति अराघै हारि थके विरंच महेश हो ॥ सबै ऋषिदेव अस्तुति अराधई तेहि गावत सुरपति शेष हो ॥ जेहि गावत नारद शारदादि पार कोई ना लहे ॥ सो भेद सतगुरु गावही कोइ संत ज्ञानी चित गहे ॥ सोरठा-पूजहि हरि हर देव, जड मूर्ति पूजत बहै ॥ निशिदिन लावत सेव, जो रक्षक भक्षक अहै ॥ नामदेव तब सुनत लजाने । नहीं पाये भेद मनहिं पछताने ॥ सुनि लजायके उठि सो गयऊ । राजा तबहिं कहत अस भयऊ ॥

राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना

बोधसागर

(१०५)

राजा वीरसिंह वचन

तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥ आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥ आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥ सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥ हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥ बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥ आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥

कवीर वचन

जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥ राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥ कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥

राजा वीरसिंह वचन

तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥ तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥ यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥ एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥ खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥ फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥ विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥

साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥

कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥

ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी बतलायी है ।

(१०६)

बीरसिंह बोध

पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥ राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥ बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥ ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥ राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥ पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥ जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥ सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥ अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥ व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥ तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥

साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥ छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥

चौपाई

तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥ बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥ विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥ विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥ विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥ मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥ करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥ गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥

बोधसागर

(१०७)

गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥ याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥ सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥ नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥ नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥ नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥

छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥

चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥

खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥

कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥

सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥

बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥

चौपाई

ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥ इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥ तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥ उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥ कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥ यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥ बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥ साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥

१ महल

(१०८)

बीरसिंह बोध

दीवान वचन

राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥ कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥ का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥ जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥

कबीर वचन

तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥ सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥ राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥ चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥ दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥ राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥ सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥ अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥ भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥ ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥ हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥ बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥ पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥ सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥ अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥

बोधसागर

(१०९)

साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥ गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥

चौपाई

करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥ कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥ मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥ राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥ जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥ खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥ लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥ फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥ परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥ ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥

साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥ मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥

कबीर वचन-चौपाई

तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥ होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥ अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥ वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥ सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥ हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥

राजा बीरसिंह

राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥ अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥

राजाका कबीर साहबका शिष्य होना

(११०)

बोरसिंह बोध

अब मन जनि दाय करि जानो । हम सेवक तुम निज कै मानो ॥ राय प्रतीति बहुत मन भाई । देखि प्रीति चलन फरमाई ॥ कुंजर राय भये असवारा । ले हमहीं पुनि तहाँ बैठारा ॥ सब सेनाकी भयी तैयारी । बजा निशान लगी नहिं बारी ॥ ततक्षण राय वचन कहि दीना । भरि भरि वर्तन सबही लीना ॥ छोड़ि सरोवर चले रिंगायी । क्षणहि सरोवर छार उडायी ॥ जब राजा पुनि पाछे निहारा । नहीं सरोवर उड़ैं तहाँ छारा ॥ देखत राजा चकित न थोरा । मँम पद गहि चित्त बहु मोरा ॥

साखी-धन्य कवीर सरोवर रची, दलहिं लीन ज़िवाय ॥

जहवाँको जल लायक, तहाँको दीन पठाय ॥

चौपाई

आगे मोहि करि जबही लीन्हा । तब पीछे राजा पग दीन्हा ॥ चले राय महल पग दियऊ । सतगुरुको आगे करि लयऊ ॥ मन्दिर कञ्चन पलंग बिछावा । लै सतगुरुहि तहाँ बैठवा ॥ मानिक देह रानी चली आयी । कहै राय रानी गहु पायी ॥

राजा बोरसिंह वचन रानी प्रति

चरण टेकि चरणामृत लीजै । गुरुकी दया अमृत रस पीजै ॥ लोक लाज तुम तजहु बडाई । गुरु कवीरकी शरणे आई ॥ गुरु कृपा होय दास पर जबहीं । काल त्रास ना ब्यापे तबहीं ॥ ज्ञान भक्ति विन गुरु न पावै । काल फन्द स्वपने नहिं जावै ॥ सर्गुण भक्ति जगत बतलावे । निर्गुण भक्ति गुरुसे पावे ॥ विन निर्गुण नहिं जीव छुटावे । बार बार यम फन्द परावे ॥ छन्द-गुरु कृपा होय जेहि दासपै तेहि काल त्रास न ब्यापई ॥ गुरु भक्ति मुक्ति दाता भक्त त्राता छुटै जीव तहाँ तापई ॥

१ मेरे पग पर पड़कर मनके अभिमानको छोड़ दिया ॥

बोधसागर

(१११)

संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥ गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥

चौपाई

सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥ बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥ नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥ कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥ नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥ रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥

राजा बीरसिंह वचन

चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥ आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥ मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥

कबीर वचन

सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥ श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥ तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥

दूत वचन

साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥

कबीर वचन

तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥ इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥ चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥ पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥

(११२)

बीरसिंह बोध

युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥ चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥ राजा परे चरणतर आयी ।

राजा बीरसिंह वचन

। दयावंत भल कोक दिखायी ॥

कबीर वचन

देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥ पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥ राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥ बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥ छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥ दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥ अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥ राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥ जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥

कबीर वचन

तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥ चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥ नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥

राजा वीरसिंहका गुरुस्तुति करना

बोधसागर

(११३)

कलश ले अरु पांचो बाती । साधु संत बैठे बहु भांती ॥ कंचन झारी जल धरवाई । तापर खरचा सात चढाई ॥ स्वेत चँदेवा स्वेत कनाता । सत्यपुर कह सूकृत वाता ॥ सत्यलोक स्वेत है फूला । स्वेत सब देह जीवका मूला ॥ स्वेत सिंहासन चौका चारी । सतगुरु बैठे आसन मारी ॥ कदली पत्र मेवा संयूता । चन्दन श्वेत सुगन्ध बहूता ॥ राजा सकल साज लइ आये । साधु संत बैठे सब आये ॥ विधिपूर्वक शुभ चौक पुराया । हाथ जोरि ठाढा भयो राया ॥ बोले साधु शब्द धुनि तबहींरानी राय चरण गहे जबहीं ॥

राजा बीरसिंहका सतगुरुकी स्तुति करना

राजा लीन्ह नारियर हाथा । बहुत जीव तहाँ भये सनाथा ॥ करी दंडवत विन्ती कीना । हंस राज मोहि दर्शन दीना ॥ धन्य भाग मम काह सराहू । हे प्रभु तुम हौ सत्य मम नाहू ॥ छन्द-आनन्द कन्द सर्वज्ञ रूप अखिल ज्ञाता अविगतं ॥ दास जानि दीजै अभय पद ज्ञानदाता अस्थितं ॥ अविनाश सागर-दयाके आगर धर्म कंटक मर्दनं ॥ संशय खण्डन रिपुविहंडन अजर वीरा सुमिरावैनं ॥ सोरठा-अमर पुरी तुव बास, अमर स्वरूपी हंस जहँ ॥ वास दीजिये दास, सुरतिवंत प्रभु कीजिये ॥

कबीर वचन-चौपाई

करि चौका तब नरियर मोरा । करि आरती भयो पुनि भोरा ॥ तिनका तोरि पान लिखि दयऊ । रानी राय अपन करि लयऊ ॥ बहुतक जीव पान मम पाये । ताघट पुरुष नाम सात आये ॥ जो कोइ हमारा बीरा पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥ बीरा पावे भवते छूटे । विनु बीरा यम धरि २ लूटे ॥

कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त राजासे कहना

(११४)

बीरसिंह बोध

सत्य कहूँ सुनु धर्मदासा । विनु बीरा पावै यम फांसा ॥ बीरा पाय राय भय भागा । सत्य ज्ञान हृदयमें जागा ॥ काल जाल तब सबै पराना । जब राजा पायो परवाना ॥ गद्गद् कंठ हरष मन बाढा । विनती करै राजा होय ठाढा ॥ प्रेमाश्रु दोइ नयन ढरावै । प्रेम अधिकता वचन न आवै ॥

राजा बीरसिंहका स्तुति करना

करुणारमन सद्वरु अभय मुक्तिधामी नाम हो ॥ पुलकि सादर प्रेम वश होय सुधरे सो जीवन काम हो ॥ भवसिन्धु अति विकराल दारुण तासु तत्त्व बुझायऊ ॥ अजर बीरा नाम दै मोहि पुरुष दरश करायऊ ॥ सोरठा-राय चरण गहे धाय, चलिये वहि लोकको ॥ जहवाँ हंस रहाय, जरा मरण जेहि घर नहीं ॥

कबीर वचन

आदि अन्त जब नहीं निवासा । तब नहिँ दूसर हते अवासा ॥ तौन नाम राजा कहँ दीना । सकल जीव आपन करि लीना ॥ रायं श्रवण जब नाम सुनायी । तब प्रतीति राया जिव आयी ॥ सत्यपुरुष सत्य है फूला । सत्य शब्द है जीवको मूला ॥ सत्य द्वीप सत्य है लोका । नहीं शोक जहाँ सदा अशोका ॥ सत्यनाम जीव जो पावै । सोई जीव तेहि लोक समावै ॥ ऐसो नाम सुहेला भाई । सुनतहिँ काल जाल नशि जाई ॥ सोई नाम राजा जो पाये । सत्य पुरुष दरशन चित लाये ॥ साखी-ऐसो नाम है खसमका, राय सुरति करि लीन ॥ दर्षित पहुँचे पुरुष घर, यमहिँ चुनौती दीन ॥

चौपाई

जब हंसा यम छेके आयी । चलत बेर निज मना सुनायी ॥ मंडल अखण्ड ब्रह्मण्डे बासा । नीर पवन हंस रहिवासा ॥

बोधसागर

(११५)

सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥ फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥ हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥ तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥

साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥ दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥

चौपाई

धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥ तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥ युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥ प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥ तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥ पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥ जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥ नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥

साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥ तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥

राजा बीरसिंह बचन-चौपाई

साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥ औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥ दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥ महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥ ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥ भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥

राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन

(११६)

अमरसिंह बोध

कबीर वचन

अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥ गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥ बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥ सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥ ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥

कबीर वचन

तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥ पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥ राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥ माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥ भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥

राजा बीरसिंह वचन

राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥ सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥ एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥

बोधसागर

(११७)

ब्राह्मणी वचन

छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥ गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥ हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥ करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥

कबीर वचन

सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥ कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन-बीपाई

साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥ कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥ कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥

कबीर वचन

एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥ छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥ यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥ राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥ नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥ लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥

ब्राह्मणी वचन

अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥

जगन्नाथ वचन

जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥ अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥

१ जगन्नाथपुरीको ।

(११८)

बीरसिंह बोध

ब्राह्मणी वचन

तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥ राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥ उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥ तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥

जगन्नाथ वचन

जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥ उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥

कबीर वचन

जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥ छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥ ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥

ब्राह्मणी वचन

हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥

छडीदार वचन

छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥ जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥ जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥ जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥ जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥

कबीर वचन

छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥ अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥ जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥