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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत

बोधसागर

( ७९ )

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । गुरुडको ज्ञान सुनो विख्याता॥ हम तीनों अवरे नहिं कोई । हमरे परे सुनावै सोई ॥ ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । हमको कहत है परलय घाता॥ हम तो तीन लोकको कीन्हा । हमको सकल देवता चीन्हा ॥

गुरुड वचन

तबहि गुरुड यक वचन उचारा । जब कर्ता तुम सृष्टि सव्वारा ॥ वह साहब सबही ते न्यारा । कस नहिं ताकर करो विचारा॥ जिन साहब तुम्हें निर्मायी । तुम कस ताको नाम छिपाई॥ विष्णु रहत हैं तुम्हरे पास । तिनहुं को पुनि काल गरासा॥ क्रोधवंत ब्रह्मा तब भयेऊ । अचरज बात गुरुड जो कहेऊ॥ जाकी तैं पुनि सेवा करई । सो तो हमरे त्रास महँ डरई ॥ सुर नर सुनि सब काहू चीन्हा । सुनु पंछी तैं मतिका हीना ॥ लोक वेद सब हम कहैं जाने । न जानूं कस आप चित आने॥

गुरुड वचन

सुनु ब्रह्मा तैं गर्व भुलासी । तोहि अस ब्रह्म कोटि मरासी॥ हम तो ब्रह्मा बहुत जो देखा । जी पूछहु तो काढों लेखा ॥ काढों विष्णु कोटि सै चारी । महादेव जाके भंडारी ॥ मैं तो भक्त कवीरका चेला । युगन युगन जिन कीन्हो मेला॥ हमसों कह्यो कवीर बुझायी । ताते आय कह्यो गोहराई ॥

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा कोपि उठे तब भाई । विष्णु महादेव सुनहुँ आई ॥

विष्णु वचन

आये दूनों जन ब्रह्मा ठाई । विष्णु कहै कस मता दिढाई ॥ काह आज जिव बहुत उदासा । कीन्हो क्रोध गुरुड के पास ॥ कहो वचन मुख होय प्रकाश । हम अजान है तुम्हरे आसा ॥

( ८० )

गरुडबोध

ब्रह्मा कहै सुनो हो भाई । अविगत की गति गरुड सुनाई॥ हमहीं तीन अवर नहिं कोई । चौथे एक निरंजन सोई ॥ ताको गरुड न माने भाई । ताते मोहि कोध भौ आई ॥ तिहि कारण हम तुम्हें बुलावा । गरुड ज्ञान हमहीं समझावा ॥

विष्णु वचन

विष्णु कहैं सुनो गरुड विचारी । आदि अंत कोई अगम है भारी॥ एक ध्यान हमहूं नहिं कीना । अविगति बात हमहूँ नहिं चीना॥ अहमेव मटी सुरत लगाया । अविगति ध्यान तबहूँ नहिं पाया॥ ध्यान मध्य हम देखा जाही । ब्रह्मा विष्णु महादेव नाहीं ॥ साखी-विष्णु नहीं ब्रह्मा नहीं, माहादेव नहिं कोय । ओम्ओंकार तहवाँ नहीं, निरखि देखा हम सोय ॥

ब्रह्मावचन-चौपाई

तब ब्रह्मा अस वचन उचारा । यह है बड़ा काल वटपारा ॥

विष्णु वचन

सुनु ब्रह्म अविगती कहानी । विना तत्त्व मैं निरखा बानी ॥ ताकी का कहिये अब वाता । अगम अपार कहूँ विरुगता ॥ साखी-निःकामी निध्यानि सोई, निज्जेमी निर्वान । कहै विष्णु ब्रह्मा सुनो, अविगति यहि विधि जान ॥

चौपाई

ब्रह्मासों कहै विष्णु बखानी । है कोई आदि पुरुष निर्वानी ॥ दुर्वासा संग रहे जब भाई । अविगतिकी गति तब हम पाई ॥ तबका बोल हम कीन्ह परमाना । ताते हम जानहिं निरवाना ॥ दुरवासा गुरुभक्ति दृढाया । तब ते हमहु परम पद पाया ॥

साखी-ब्रह्मा हमकहैं जानहुँ, और न कोई सांच । दृढा ज्ञान नहिं आवई, ताते काया कांच ॥

गरुड़ और महादेवका वार्तालाप

बोधसागर

( ८१ )

ब्रह्मा कहै सुनो विष्णु विचारी । हमही रचा पुरुष औ नारी ॥ हमते और कौन है भाई । सो मोहि भेद कहौ समझाई ॥ हम तो सर्गुण सकल पसारा । हमतो अगम निगम विस्तारा ॥ हमतो रचा पवन औ पानी । हम कहैं वेदव्यास बखानी ॥ हम चौरासी नाव जो कीन्हा । हम निर्गुण सरगुण चीन्हा ॥ इतनी कथा कहि ब्रह्मा सुनाई । तबहूँ गुरुड न मानैं भाई ॥

गुरुड वचन

कहै गुरुड सुनो ब्रह्म कुमारा । तुम कहैं रची सृष्टि करतारा ॥ सबको रची सबै जिन कीन्हा । वह तो पुरुष सबन ते भीना ॥ वह तो पृथ्वी पाँव न दीन्हा । शब्दहि ते सकलो जग कीन्हा ॥ जो आप रचना करि जाना । तो हमसे हठि भाषहु ज्ञाना ॥ जो तुम रचा पवन औ पानी । पृथ्वी अकाश तुमहिं जो ठानी ॥ रचा तुम्हार तब जानहिं भाई । अब रचहु तुम फिरि विनशाई ॥ जो तुम्हार है सकल बनाई । फिरिके परलय करहु तुम भाई ॥ तब हम जानहिं कीन तोहारा । यह मेटहु सकलो विस्तारा ॥ अपने हाथ रचै जो कोई । फिरिकै मेटि सके पुनि सोई ॥ तब ब्रह्मा सुनि रहे लजाई । सम्मुख उत्तर कह्यो न जाई ॥

महादेव वचन

कहे महादेव सुनो रे भाई । अचरज बात कही नहिं जाई ॥ सुनु ब्रह्मा गुरुड जो कहई । ताकर भेद कोई विरला लहई ॥ दश औतार विष्णु जो लियऊ । काया काल ब्रास जो कियऊ ॥ तबही कृष्ण भेद यक कीन्हा । ताको ब्रह्मा तुम नहिं चीन्हा ॥ गोपी ग्वाल सबै हरि लाये । तब जो कृष्ण सब दीन मेराये ॥ इतनी बात ब्रह्मा तुम नहिं जानो । अविगतिकी गति कैसे पहिचानो ॥

( ८२ )

गरुडबोध

सारखी-कौन सरूपी कृष्ण है, कौन धरे अनुमानु । देह धरे नहीं चीन्हहूँ, निर्गुण कैसे जानु ॥

चोपाई

निरगुणको गुण है बड भारी । जिन उत्पन्न कियो सब सारी ॥ वह तो पुरुष मूल है माथा । गति प्रतीति ताहीके साथा ॥ नहीं महात्म पुरुष की पूजा । जप तप संयम नाम विनु दूजा ॥ वार पार नाम नर सेई । अजर नामको सुमिरन देई ॥ बारहिं बार नाम लौ लावे । अजर अमर होय लोक सिधावे ॥ नाम सिखापन बदन सो खोले । विना नाम विनु महात्म डोले ॥ सतगुरु विना मर्म नहीं जाने । हमैं तुम्हैं सब जगत बखाने ॥

ब्रह्मा वचन

सुनो महादेव साँच बखाना । निर्गुणके गुण हमहूँ नहीं जाना ॥ अविगतिकी गति हम ना जानी । योगी जंगम सेविं हम जानी ॥ सुर नर मुनि सब हमको ध्यावें । हम उपजावें हमही विनशावें ॥ साखी-मैं उपजावों मैं विनसावों, मैं खरचों मैं खाऊँ । तीन लोक पैदा करें, मोर ब्रह्म है नाऊँ ॥

गरुड वचन चोपाई

ममताते नर नरकें जायी । ताते बहुरि बहुरि जन्मायी ॥ तुहि अब ब्रह्मा बहुत विचारा । ताते काया विनसे सब सारा ॥ तू ब्रह्मा अस जो धरे हँकारा । तेहिते काल भया वटपारा ॥ सुनु ब्रह्मा अविगति की बाता । एकै पुरुष एक है माता ॥ सुनहू सब सभा विचारो । यक मैं निरखिकहौं निरुआरो ॥ वहि साहबकी खबरि न पावा । तुव अस ब्रह्मा बहुत उपावा ॥ वही हम निरखि परखिके जानी । साहब शब्द लेहु पहिचानी ॥

१ ब्रह्मा शिवकी बातकी व्यंगसे हँसी करते हैं ।

तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद पूछनेको जाना

बोधसागर

( ८३ )

साखी-कहो ब्रह्मका भूलहू, कहौं तोहि समुझाय । मोर मोर कै धावहू, ममता अमल चलाय ॥

चोपाई

ममिता ते दशों अवतारा । ममिता महादेव धरु छारा ॥ ममिता लोमश योग जो कीन्ह। आयु बढी भगती नहिं चीन्ह।। ममिता ते आपुहिं जो रहेऊ । ममिता ते तीन लोक बहि गयऊ।। ममिता तेज निरञ्जन कियऊ । ममिता ते पुरुष दरश नपयऊ।। तुम ब्रह्मा कीन्हे अभिमाना । तेहिंते साहब अछय छिपाना ॥ साखी-ब्रह्मा गर्व तुम कीनिया, सुनि राखू यक बात । जो साहब अभि अंतरे, सोई सदा सँघात ॥ तुम अज्ञानी नहिं जानहू, सुनु ब्रह्मा यक बात । अविगति अगम अपार है, समरथ सदा सँघात ॥

विष्णु वचन-चोपाई

विष्णु कहैं सुनो हो भाई । चलहू तुरत ज्योति पहुँ जाई।। ज्योति कहैं सो सुनिये भाई । सब मिल चलहु साँचके आई।। आंखिन देखी पूछि न जाई । पाय अभिमान चीन्हे नहिं पाई।। अभिमान मता सब दूर दीजे । साँच बस्तुको धारण कीजे ॥ अभिमान समेत चीन्हे नहिं कोई । देह धरी सब गये विगोई ॥ आपा थापि सुधि बुधि खोई । आपा छोडे पावे सोई ॥

महादेव वचन

तब महादेव कहैं विचारी । अहो विष्णु पूछहु महतारी ॥ जो वह कहैं सो हम तुम मानैं । औरी बात नाहिं हम जानैं ॥ ब्रह्मा विष्णु से हुई यह बात । तुम बडे हो कि बडी है माता ॥ सबै मिली तब कीन्ह पयाना । जाइ माता ढिग कीन्ह बयाना ॥ बोलहु माता सत के भाऊ । नहिं अरुझावहु भाषि सुनाऊ ॥

( ८४ )

गरुडबोध

तीनों देव कहैं सुनु माता । और कौन पुरुष आहि विधाता ॥ हम तीनों कि और है कोई । यह निज भेद बतावहु सोई ॥

माता वचन

तब माता बोले हितकारी । कस न ब्रह्मा करहु विचारी ॥ जब तुम हते हमारे पास । तब तुम कौन पिता की आसा ॥ तबकी बात विसरी तुम गयऊ । पुरुष ते विमुख तुम भयऊ ॥ पुनि माता यक वचन अनुसारी । महादेव ही कृतम भिकारी ॥ अमर वचन जो हमहीं भाखा । युग चारों देह अमर राखा ॥ सोई वचन भूलि जो गयऊ । मातु पिता सो अंतर लयऊ ॥ पुनि माता गरुडसे बोली । अमृत वचन रसाल अति खोली ॥ कहे माता सुनु गरुड सुजाना । तुमतो वचन कही परमाना ॥

गरुड वचन

गरुड तब पूछे ज्योतिसों बानी । कैसे तुम यह सिरजा खानी ॥

माया वचन

तब उन कहा पुरुष सों बानी । पावक नीर पवन वैसानी ॥ जल रंग अंश सो साथहि रहई । ताकी खबरि कोई नहि लहई ॥ प्रथम अंशजल रंग जो कीन्हा । तब जलसिन्धुनाम कहि दीन्हा ॥ सारखी-ब्रह्मा विष्णु कोई नहीं, महादेव भी नाहिं । पुरुष एक तब अविगति, अगम अगोचर माहिं ॥

ब्रह्मा वचन चौपाई

कहे ब्रह्मा हम आपु प्रकाशा । हम पुहमी नौ खण्ड निवासा ॥ हम हैं नीर हमहिं हैं पवना । हमहीं रचा सकल सब भवना ॥ हमहीं पांच तत्त्व सब कीन्हा । हमहीं आप सृष्टि रचि लीन्हा ॥ हमहीं सकल सृष्टि विस्तारा । हम कर्ता है सकल पसारा ॥ हमहीं चन्द्र सूर दिन राती । हमहीं कीन्ह किरतम उत्पाती ॥ हमहीं आदि अंत मधि तारा । हमहीं अंध कूप उजियारा ॥

बोधसागर

( ८५ )

हमहीं ब्रह्मा विष्णु महेशा । हमहीं नारद शुक्रदेव शेशा ॥ हमहीं कंस कृष्ण बलि वावन । हमहीं रघुपति हमहीं रावन ॥ हमहीं हैं मच्छ कच्छ बाराहा । हमहीं भादों फागुन माहा ॥ हमहीं दशौ भये अवतारा । तीरथ बरत देहरा धारा ॥ हमहीं हंसा समुद्र तरंगा । हमहीं सरस्वती यमुना गंगा ॥ हमहीं योग युक्ति व्रत पूजा । हमहीं छौंठि देव नहीं दूजा ॥ हमहीं पटना गुनना लीखा । हमहीं पाप पुण्य गुरु शीखा ॥ हमहीं विद्या वेद पुराना । हमहीं कीन कितेक कुराना ॥ हमहीं आवें हमहीं जावें । हमहीं आदि अन्त की छावें ॥ तीन लोक हमहीं विस्तारा । सकल निबल देही हम धारा ॥ साखी-तीन लोक में रमि रहे, सबही मोही मान ।

कहु माता ससुझायके, किरतम कैसे जान ॥

माता वचन-चौपाई

तब माता अस बोली बानी । तू तो ब्रह्मा चतुर सुजानी ॥ हमसे भयी उत्पत्ति तुम्हारी । तुमही पुत्र हमही महतारी । पिता केर खोज जो कीन्हा । तब हम तुमको हुकुम नदीन्हा ॥ बरबस कै तुम खोजेउ जायी । तब हम पिताकी खोज बतायी ॥ तब हम तुमसों बोली बानी । दर्शन ते बेसुख तुम्हें जानी ॥ तब तुम पैज बाँधि कै चलेऊ । पिता के दर्शन नहीं भयऊ ॥ जो तुम कीन्हे सकल बखाना । ताकर मोसों कहो विधाना ॥ जो तुम आपुहिँ आप तुम रहऊ । कवनके खोज करन तुम गयऊ ॥ काहे को बोलहु अनरीती । तुम लबार सो कीन्ही प्रीती ॥ बरबस खोज पिताके गयऊ । खोजन पाय अमरख तब भयऊ ॥ तब हमतो बोले झूठे लबारा । तैसहिँ सब चलही संसारा ॥ एक बार लबारी करेऊ । तब हम तो कहैँ शाप सो दयऊ ॥ अब बोलहु तुम वचन सम्हारी । काहे ब्रह्मा बोलु लबारी ॥

निर्गुण भेद वर्णन

( ८६ )

गरुडबोध

सारखी-भाषडु वचन सँभारिकै, जनि बोलडु अज्ञान । परमपुरुष एक अगम है, ताकर करहु ध्यान ॥

चौपाई

हम तो सत्य वचन चित धरऊ । हम तुम सत्य पुरुष ते भयऊ॥ ममता तेज बहुत तुम कीन्हा । आदि अन्तको नाहिन चीन्हा॥ माता वचन कह्यो सब झारी । तब ब्रह्मा मन आयी हारी ॥

गरुड वचन

सुनु ब्रह्मा तुम कौन मति ठानी । माता कहै सो कहा न मानी ॥ जो नहिं यह वचन परमानो । ज्योति कहै सो सब मिलिमानो॥ सुनि ब्रह्मा को गर्व परहारा । एक पुरुष जिय किया है चारा॥ परम पुरुष तेहि कीन प्रकाशा । जिनकी जगत लगावे आशा॥ चौसठ युग वही प्रकासा । सत्तर युग है वाके पासा ॥ सहस्र युग गये शून्य वे शून्ये । नहिं तहँ पाप नहीं तहँ पुत्रे ॥ तुम सब ब्रह्मा केतिक गयऊ । हम तब सब कर भेदे लयऊ ॥

सारखी-सुनु ब्रह्मा का जानई, तुम तो करम के खोट । तेहिंते हाल विनसिहो, जनी कहावहु छोट ॥ सुनु ब्रह्मा कहँ भूलिया, जनि करहु तुम रोख । जन्म जन्म चौरासिया, यहि विधि पावो धोख ॥ कहै गरुड समुझायके, जनि भरमहु अभिमान । साहिब एक अगम्य है, ताकर करहु पिछान ॥

चौपाई

टीका मूल एक हम देखा । तहाँ है निज शब्द विवेखा ॥ विलुण्ड वचन

ब्रह्म महादेव सुनहु भाई । सब पर देव निरञ्जन राई ॥ एक निरञ्जन और न कोऊ । तेहिंते अपर और नहिं होऊ ॥ तेहिंते और नहीं कोइ पारा । सो तो सकल भुवन सरदारा ॥

लौकिक ज्ञान वर्णन

बोधसागर

( ८७ )

वही सकल भुवनका स्वामी । वही परम ब्रह्म अन्तर्यामी ॥ उन्ही नारी पुरुष बनावा । सकल सृष्टि उन्ही सिरजावा ॥ लाख चौरासी उनहि सँवारा । उन्ही गोरख नाम धरावा ॥ उन्ही छलिबलि पतालपठावा । काल रूप धरि जगमें आवा ॥ उन्ही यह सब खेले खिलायी । उन्ही सकल सृष्टि उपजायी ॥

साखी-कहे विष्णु गुरुड सुनु, कहे सुने का होय ।

एक निरञ्जन आपु है, दूजा और न कोय ॥

सात द्रौप नौखंडमें, एक निरञ्जन होय ।

और कौन सो देखिये, ताको कहिये सोय ॥

गुरुड वचन-चौपाई

मैल मलीन सकल संसारा । सो निर्मल जाके अन्त न पारा ॥

मैले ब्रह्मा मैले इंद्र । रवि मैला मैले शशि चन्द्र ॥

मैले सनक सनन्दन देवा । मैले यह जग लहै न भेवा ॥

मैले शिव ब्रह्मादिक देखा । मैले लोक ब्रह्माण्ड विशेषा ॥

निशि वासर मैले दिन तीसा । मैले काल मैले अवनीसा ॥

मैले जोत मैले तन हेता । मैली काया मैल समेता ॥

मैले निरंजन नर नहि जाना । उन यह सृष्टि कीन्ह पिसमाना ॥

निर्मल नाम एक है श्वेता । निर्मल सो जो नामहि लेता ॥

कहै गुरुड ते जन परमाना । जो निर्मल निज नामहि जाना ॥

साखी-निरंकार ओंकार है, पार ब्रह्म है सोय ।

एकनाम चीन्हे विना भटकि सुवा सब कोय ॥

साहब इनहि बनाइके, आपुइ रहै निनार ।

सो निज नाम जाने विना, कैसे उतरे पार ॥

चौपाई

कहत सुनत सबही सुधि पायी । कहत सुनत सब तीर्थहि जाई ॥

कहत सुनत ज्ञान बहु करई । दम्भ अभिमान बहुत सो धरई ॥

महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान

( ८८ )

गरुडबोध

कहत सुनत नर तीर्थहिं जायी । भरमतभरमतगलफांसलगायी॥ कहत सुनत सब सुनै पुराना । कहत सुनत सब देत है दाना ॥ कहत सुनत सब खेती करई । कहत सुनत नर माया धरई ॥ कहत सुनत जो जुगली करई । होय चंडाल नरक महाँ परई ॥ कहत सुनत नर रूप खुदावे । कहत सुनत उद्यम मन लावे ॥ कहत सुनत स्वाद मन धरई । कहत सुनत नर गढहे परई ॥ कहत सुनत नर माया जोरी । सौ सहस्र औ लक्ष करोरी ॥ कहत सुनत गुरु शिष्यजोकरई । आप अजान भरम में परई ॥ कहत सुनत भक्ति जो ठानी । कहत सुनत पायन पर आनी॥ कहत सुनत सागर तलाब बनावै । कहत सुनत पाप पुण्य कमावै॥

साखी-कहन सुनत सब गये हैं, कहत सुनत सब जाय ।

कहत सुनत करनी करे, तब प्रभु परसे आय ॥

महादेव वचन-चौपाई

क्रोधवंत महादेव तब भयऊ । हमहू को उठाय तुम धरऊ ॥ महादेव बोले बात विचारी । हमको जान्यो किरतम भिकारी॥ हमको मनुष्य देह करि जाना । भूली बात करे बखाना ॥ महादेव अस युक्ति बतायी । कहो तो सकलो देऊँ दिखायी ॥ कहो अकाशको बन्द बताऊँ । सात द्वीप नौ खंड दिखाऊँ ॥ अचरज एक बात उन भाखी । कहो तो आनि दिखाओं साखी॥ कहो तो गरुडही मारि कै डारों । कहो तो योग जीतहिं मारों ॥ कहो तो काल रूप हम धोरें । कहो तो पलमहँ मारि सँघोरें॥ कहो तो याही देउं भुलायी । बढ़ुरि न हमसों हो बौरायी ॥ यह सो बकवाद विचारा । हमसों बाजी करै अपारा ॥ यह तो आदि अंतसे आये । तेहिते ब्रह्म विष्णु कहाये ॥ हमहीं सिरजें पाले मारें । दानव देवी मारि उखारें ॥

गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये बालक लाना

बोधसागर

(८२)

ब्रह्मा तो है जेठा भाई । वेद वाक्य सब कहै बनाई ॥ कैसे ब्रह्मा शीव उठावे । कैसे विष्णुहि हीन दिखावे ॥ सारखी-अगम निगम सब जानई, कहै मुक्तिका नीव । विष्णु काया दिढावई, योग दिढावे शीव ॥

गुरु बचन

सुनो महादेव मतिके हीना । तुम नहिं जानो पुरुष प्रवीना ॥ तुम तो आपहिं गर्वें झुलाये । तुम सेवक साहब होय आये ॥ तुम किंचित हो जीव विचारे । तुम्हरे कहे होय का पारे ॥ तुम्हरा किया कछू ना होई । आप पुरुष उपजावे सोई ॥ आप सुरत प्रभु कीन उचारा । तब तहैं चौदह भुवन सँवारा ॥ सेवा बदले पाय तिहुँल्लोका । जीवन कारन लाये धोका ॥ धोका लाय ठरयो संसारा । तीन लोकमें फन्द वसारा ॥ सारखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुनहु सत्य विचार । वह तौ पुरुष अखण्ड है, अपरमपार अधार ॥ तुम तीनों मिलि आपा थापी । आप थापी भये महा पापी ॥

सत्गुरु बचन

सुनु धर्मनि औरो यक बाता । उहैं तो सबै ज्ञानमहैं राता ॥ जब देख्यो सब आपा थापै । करत बडाई नहिं तनिको धापै ॥ तब अस युक्ति किया बनाई । जाते होय परीक्षा भाई ॥ बंग देश बालक यक रहेछ । जाति ब्राह्मण सबै तेहि पयछ ॥ ताकर आयू सबै खुटानी । मृत्यु निकट भयी तुलानी ॥ ताको ज्ञान अस हम दीना । मृत्यु निकट भयी आयु छीना ॥ काल वचन उपाय विचारो । ब्रह्मादिकके निकट पग धारो ॥ लाय गुरुड तुरत पहुँचाये । ब्रह्मा विष्णु शिवहि बताये ॥

बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे विनती करना

(९०)

गरुडबोध

कहै गरुड सुनो यक बानी । यहि बालककीमृत्यु नियरानी ॥ याको कोई नाहिं सहाई । याते आयो तुव शरणायी ॥ यहि बालक को कौन जो राखे । सत्य बचन हम सुखते भाखे ॥ तुम तीनों त्रिभुवनके देवा । बालक ठान्यो तुम्हरी सेवा ॥

ब्रह्मा बचन

तब ब्रह्मा बालक सों बोले । जानि प्रभुता आपन सुख खोले ॥ कहे ब्रह्मा बचन हित कारी । को तेरा बाप को है महतारी ॥ कहु बालक कहाँते आया । किन तुमको यहाँ पठाया ॥ कौन साहब दीन्हा औतारा । कौन तुझेको मारनहारा ॥

बालक बचन

तब बालक बोले अनुसारि । को है पिताको है महतारी ॥ ना जानूँ किन दिया औतारा । ना जानूँ को मारन हारा ॥ हम पूछे कोई राखहु भाई । तेहि कारन आये तुम्हरे ठाई ॥

साखी-तीनलोक के ठाकुर तुम, ब्रह्मा विष्णु महेश । मैं तो कछु जानो नहीं, काहि कहौं संदेश ॥

महादेव बचन

सुनो बालक मैं कहूँ बुझायी । मृत्यु तुम्हारी नियरे आयी ॥ इहाँ कौन है राखन हारा । धर्मराज तुव कीन पुकारा ॥ केहि विधि यहाँ कैसे रहिहो । कौन शब्द पुरुष पद पैहो ॥ कैसे के भवसागर तरिहो । कौन भक्ति हृदय चित धरिहो ॥ सोई भेद कहौं समुझायी । जाते तुम्हरा दुःख नशायी ॥

हंसा ( बालक ) बचन

हम तो तुम्हरी शरणे आये । जस जानो तस करो उपाये ॥ हमरी तो अब मृत्यु तुलानी । हम का जानें शब्द औ बानी ॥

बोधसागर

( ११ )

अब करू वेगि सम्भारी मेरी । अब जनि करहु देव तुम देरी ॥ मृत्यु हमारी तुली अब आयी । तुम अब हमको लेहु बचायी ॥ जो तुमसे नहि बाचै भाई । मिथ्या तुम का करहु बड़ाई ॥ तुम सेवक साहब का होऊ । दूसर साहब है निज कोऊ ॥

विष्णु वचन

विष्णु कहे सुनु बालक भाई । अब तोको यहाँ कौन छुड़ाई ॥ कैसे को अब राखै भाई । कैसे को तुव काल छुड़ाई ॥ कैसेको तोर काल छुड़ाओं । कैसे आवा गमन मिटाओं ॥ साखी-काल बड़ा प्रबल अहै, मो पै कछू ना होय । वासे नहिं कोइ बाचई, ब्रह्मा विष्णु विगोय ॥

चौपाई

सब मिलि रहे काल के साथ । काल फिरत है सबके माथा ॥ काल की गति हम नहिं जाने । धोखे यम के हाथ विकाने ॥ साखी-काल कि गति जाने नहीं, ब्रह्मा विष्णु महेश । ऋषी सुनी सब कम्पहीं, कम्पे शेष सुरेश ॥

चौपाई

केतिक देह हमहीं जो धरिया । फिरि फिरि कालके फन्देपरिया ॥ देह धरी धरि जगमें आये । यहि पृथ्वी में नाम धराये ॥ साखी-कालसों कोई ना बचै, सुनु बालक चित लाय । कैसे कै मैं राखिहौं, मोसों राखि न जाय ॥

चौपाई

देह धरे नहिं बचिहो भाई । सबको काल धरी धरि खाई ॥ काल बड़ो है अति बलवंता । देवी देवा खाय अनन्ता ॥ सप्त दीप जो हैं नौ खण्डा । काल बली सबहिन को डण्डा ॥ तीन लोक पै करे रजधानी । हमहूँ ताकी सेवा मानी ॥

( ९२ )

गरुडबोध

विष्णु कहे ब्रह्मा सों बाता । यह बालक कीन्ह्ना उत्पाता ॥ यह वृत्तांत तुम जानो भाई । तुम बालक को लेहु बचाई ॥ ब्रह्मा तव सुनि रहे लजाई । हमसे बालक राखि न जायी ॥

गरुड वचन

तबही गरुड जो बोलै बानी । बालक जिये तब तोहि जानी ॥ आपा रोपि रहे ठहराई । किया तुम्हार न होवे भाई ॥ जो तुम आज बालकको राखो । तौ तुव वचन सत्य कै भाखो ॥ कहै गरुड सो तरक लगायी । बालक काहे न राखु बचाई ॥ ऐसी विधि फिरि फिरि अवतरहु । पुनि अपनी बुधि भरमत रहहु ॥ सबको ब्रह्मा देउ उपदेशा । अपने गर्वका न जानहु लेशा ॥ हम जानी तुमरी मति भाई । अब तुम थापि रहहु ठहराई ॥ गरुड कहै अस ज्ञान विचारी । ऐसी भूल परी संसारी ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो विचारी । गरुड या विधि दीन्ह प्रचारी ॥ तब तीनों मन में कीन विचारा । करि विचार ज्योति कहैं उरधारा ॥ तीनों मिलिके पूछैं माता । जो वह कहै सुनौ विधाता ॥ आप आपमें तीनों ठानी । अन्त काल गमि पूछन आनी ॥

त्रिदेव वचन माता प्रति

माता ते पूछै चितलाई । सत्य वचन कहो तुम माई ॥ तुमरा चरित हमहीं नहि जाना । आप आप मिलि कीन बखाना ॥

माता वचन

तबहीं ज्योति उचारी बानी । अहै काल सब पर परधानी ॥ कौन है बालक राखन हारा । आप पुरुष जो कीन हँकारा ॥ जाइके तुरत देहु पहुँचायी । जहवाँका जीव तहँवा चलियायी ॥

तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ होना और गरुड़का बालकको जिलानेकी प्रतिज्ञा करना

बाधसागर

( १३ )

सत्गुरु वचन

तब तो ब्रह्मा ध्यान लगावा । तुरतहि गये ब्रह्मके ठावा ॥ ब्रह्मा वचन तब उठा परमाना । आदि पुरुषका मर्म न जाना ॥ तुम ब्रह्मा गर्व बहु भाखा । ताते जोति छिपाय के राखा ॥ माता ते नहिं अन्तर करते । फिरि फिरि देह सु काहे धरते ॥ ब्रह्मा तवै रहे अरथाई । सन्मुख बात कही नहीं जाई ॥

गरुड वचन

तीनों देव विवस जब भयऊ । देखि गरुड तब बोलन लयऊ ॥ अब जनि भूलो तीनों देवा । आदि पुरुषकी करो तुम सेवा ॥

सत्गुरु वचन

तीनों देव मिलि मंत्र यक कीना । बालक को विदा कै दीना ॥

तीनों देव वचन

सुनु बालक तेरी मृत्यु तुलायी । कौनी शांति कै तोहि जियायी ॥ तुमते कहैं हम वचन प्रकासा । हम जो गये ज्योतिके पास ॥ ज्योतिस्वरूप हम कहा बुझायी । अब तुम बरजहु काल बनायी ॥ तबही ज्योति वचन अस भाखी । यहि बालकको अबको राखी ॥ अवधि तोहार नियरिहोय आयी । अब कोइ राखे राखि न जायी ॥ साखी-हम तीनों को धिग है, जीवन धृग हमार । हमसे बालक ना जिये, मिथ्या कीन्ह हँकार ॥ बालक तो जीवै नहीं, मिथ्या जन्म हमार । यह चरित्र ना जानिया, केहि करें उपचार ॥

गरुड वचन-चौपाई

जो धिरकार तुम कीन पुकारा । अपने मनमें करहु विचारा ॥ गर्व अभिमान छोड़ु सब भारा । मन अपने तुम मन्मदु हारा ॥ वो तो पुरुष गर्व नहिं भाखे । तुम यम काल अपने शिरराखे ॥

( १४ )

गरुडबोध

जो तुम ब्रह्मा मुक्ति गति पायी । तो तुम राखहु काल बचायी ॥ जो ब्रह्मा इतना नहीं जानो । तौ काहे को आपा ठानो ॥ बोलहु जानि तुम गर्ब निदाना । तुम धिरकार आपको आना ॥ ब्रह्मा कस तुम आपा ठाना । ऊ गति काहू बिरले जाना ॥ जो ब्रह्मा तुम मृत्युगति जानौ । हठिकै ज्ञान तु काहि बखानौ ॥ वह तो पुरुष सबै ते न्यारा । अगम अपार पावे नहीं पारा ॥ साखी-ब्रह्मा विष्णु जाने नहीं, जाने नहीं महेश । ज्योति आप न जानई, रचे जो कालको भेश ॥

चौपाई

सुन ब्रह्मा मैं कहौं बुझाई । तुमरे किये होय का भाई ॥ गर्ब गुमान सब देहु बहायी । तबहीं तुम सतगुरु पदपायी ॥ साखी-ऐसो काल वर जोर है, आस्थो सत्तर योग । अमृत नाम सो मन दर्ई, लेहु अमर रस भोग ॥

चौपाई

जो नहीं ब्रह्मा सांच कै मानो । तौ यह बालक हमपै आनो ॥ जो प्रभु हम कहैं नाम सुनायी । ताकहैं चरित्र तुम देखहु-आयी ॥ सांच झूठका करहु निवेरा । आखिन देखि करहु बहुतेरा ॥ सत्यलोक अमरपुर डेरा । काल नहीं तब ताकहैं घेरा ॥ जो कोइ शब्द का करे निवेरा । सत्य लोक पावे सो डेरा ॥ साखी-जो संशय अब छूटे, घट सो चलै बरजोर । सुमिरन दीन दयालका, पहुँचे सो वहि ठौर ॥

चौपाई

अस कहि गरुड यकज्ञान विचारा । बालक लाईसो उत्तरो पारा ॥

ब्रह्मा वचन

अचरज बात ब्रह्मा को लागी । देखतु विष्णु गरुड तुम्ह त्यागी ॥ तुमरे सन्मुख करे यह रंगा । तुमरी भाव भक्ति करे भंगा ॥

बोधसागर

( १५ )

जो बालक जीवित लै आने । होय अचल तब जगत बखाने॥ ब्रह्मा विष्णु अस बात विचारे । गुरुड वचन परिहास निकारे ॥ उधर गुरुड कीन अस अरम्भू । जो नहीं जाने हरिहर शम्भू ॥ मानसरोवर गुरुड जब गयऊ । ताकी सुधि हंसन तब पयऊ ॥ आवहु गुरुड महा सुख ज्ञानी । मित्र सुनावहु लोक कि बानी ॥ हंस अजरमुनि द्रौप महाँ रहई । द्रौप देखिके बातें कहई ॥ मानसरोवर माँहि है भाई । उपजन विनशन तहाँ न पाई ॥ मानसरोवर ज्योति बहु कीना । कामिनि कला पुरुष रचिदीना॥ सरोवर माँहि रहे सब भाई । बिनशे देह मृत्यु जो पाई ॥

अजरमुनि वचन

कहो विहँसि मुनि कहवौंते आये । सो भेद मोहि कहु समझाये ॥

१ इस पुस्तक गुरुबोध की १० । १२ प्रति मेरे सम्मुख रखी हुई हैं । जिनमें से १ प्रति सम्बत् १७०३ विक्रमों की लिखी हुई है जो मेरे पिता शिवरहर राज्यके पूर्व अमात्य कबीरपंथके विहार प्रांतीय स्तम्भ परमज्जानी श्रीमान् यशस्वी गोपाल तालजीकी पुस्तकालयकी है । और दूसरी प्रतियोंमें से ४ प्रतियाएँ सम्बत् १८०० से १९०० सम्बत् विक्रमों के बीचकी लिखी हैं । और १ प्रति सम्बत् १९१३ विक्रमोंकी तथा ४ प्रतियाँ उसके पीछेकी लिखी हुई हैं । सम्बत् १९०० तक की जितनी प्रतियाँ लिखी हुई हैं सबमें बही ऊपर की चौपाई लिखी है और उनमें हंस अजरमुनि का ही मानसरोवरमें गुरुजीसे मिलनेका हाल लिखा है किन्तु उसके पीछेकी प्रतियोंमें कहीं तो अजरमुनि और कहीं चन्द्रमुनि लिखा है, इतनाही नहीं ग्रन्थमें ऊपर लिखा है “चन्द्रमुनि-वचन” तो नीचे लिखा है “अजरमुनि द्रौप रहाय” कहीं लिखा है हंस मुनि इस प्रकारसे भेद पड़नेके कारण पुरानी प्रतियोंके अनुसारही “अजरमुनि” रखा है । योंतो उत्तरोत्तर की लिखी हुई प्रतियोंमें लेखक महाशयोंकी कृपासे ग्रन्थोंमें कुछ कुछ भेद होता हो गया है, तथापि १९०० सम्बत् के प्रथमकी लिखी हुई पुस्तकोंमें है । इतना अन्तर नहीं है जितना १९१३ बालों प्रतिसे लेकर उसके पश्चात् की प्रतियोंमें है । इधरकी लिखी हुई प्रतियोंमें कई तो ऐसे हैं जिनमें “अ” के स्थानमें समस्त पुस्तकमें “य” काही प्रयोग किया है “अ” का गन्ध भी नहीं है ।

गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा करना

( ९६ )

गरुडबोध

गरुड वचन

सुनहु अजरमुनि कहौं बुझायी । अकथ कथा कह्यु कह्योन जायी ॥ सुनत हंस यह अकथ कहानी । तीनों देव बडे अभिमानी ॥ ब्रह्मा विष्णु लगायी बाजी । अपनी अपनी सब करहिं अवाजी ॥ तब समरथ एक कला उपायी । बालक भेद न जाने भाई ॥ तब हम एक बोल्यो बानी । बालक एककी मृत्यु तुलानी ॥ प्रथम तो बाद बहु ठाना । बालक देखत बहुत लजाना ॥ उन अपने जीव सोच बहु कीना । यहि बालकको किनहुन चीना ॥ तब उन पुरुष सांच कर माना । है कोइ पुरुष आदि निर्वाना ॥ हारि मानि के बिदा जो कीना । तुम्हरे द्वीप तानि पग दीना ॥ अब ऐसी युक्ति तुम ठानो । जाते होय सब काज प्रमानो ॥ बालक जिए सोइ अब कीजे । साचा अमृत मोकहँ दीजे ॥ तीनों जने तब जाहिं लजायी । सत्य पुरुष की सत्य कै पायी ॥ ये तीनों तो गर्व भुलाना । निर्गुण तो वे आप कर जाना ॥ महापुरुष कोइ मान न भाई । आप गर्व दुनिया भरमाई ॥ सुनहु अजरमुनि हंस सो ज्ञानी । कैसे रहो सरोवर आनी ॥ कौन यतन सरोवर में आनी । सरोवर के गुण कहो बखानी ॥ साखी-कैसा सरोवरमान है, कैसे रहे समाय ।

किहि विधि इसको नांघि के, सत्यलोकको जाय ॥

अजर मुनि वचन-चोपाई

सुनहु गरुड तुम सत्य हो साधू । तुमरी भक्तिसों अहै अबाधू ॥ तुम तो आदि अंत सब देखा । कहो तुमहि जो सकल विशेषा ॥ जो कोइ आदि अंतकै जाने । तासों कौन वृथा हठ ठाने ॥ सुनहु गरुड मैं कहौं प्रमाना । ताको कहिये कहा जो माना ॥ जो प्रभुकी अंतगति जाने कोई । तासों पुनि सत कहिये सोई ॥

बोधसागर

( ९७ )

सुनहु गुरुड साधुन के स्वामी । सबकी महिमा तुम भल नामी॥ हम तो ज्ञान सब तुमसे पावा । तुव प्रताप हम लोक सिधावा॥ साखी-समरथ नाम अमरपुर, अजर द्रौप अस्थान । उहवाँ रहत हैं हंस सब, पावहि पद निरवान ॥

चौपाई

अक्षय द्रौप पुरुष अस्थाना । तहवाँ रहैं सब हंस सुजाना ॥ सदा आनन्द होत तेहि ठाँके । नहिं तहं चले कालकर दाँके ॥ साखी-हंसा विलासहिं द्रौपमहैं, भोजन करहिं अघाय । जरा मरण व्यापै नहीं, नहिं आवैं नहिं जायैं ॥

गुरुड वचन

अमृत देहु बताइके पुरुष नाम कहि देहु । बालक लेहु जिवाइके, इतना यश तुम लेहु ॥

चौपाई

कहहु पुरुष कैसे के बोला । कहसे प्रभु सो सम्पुट खोला ॥

अजरमुनि वचन

आपुहि में वह अमृत कीन्हा । आपुहि साहब कहि जो दीन्हा॥ अमी बुन्द प्रथमहि उपजाया । अमी बुन्द ते अमृत आया ॥ साखी-ज्ञानी कहै विचारके । सुनो गुरुड चित लाय । गति को भक्ति दिढावहु, बालक लेहु जिवाय ॥ बालक लेउ अमर कै, अमी द्रौप चलि जाउ । हठ कै भक्ति हठावहु, अजर अमर होय आय ॥

गुरुड वचन-चौपाई

कहै गुरुड बालक अकुलाई । अमृत दैके लेहु जिवायी ॥

अजरमुनि वचन

सुनहु गुरुड तुम ज्ञान गँभीरा । तुम तो पुरुष पा अस्थिरा ॥

नं. ५ कबीरसागर - ५

( ९८ )

गरुडबोध

जाहु तुरत वरुण के ठाई । वरुण अहैं हमार गुरु भाई ॥ पवनै द्रौप रहे वह वैसा । तोसों कब्बो भेद है जैसा ॥ साखी-शीस श्रवण नहिं नासिका, इन्द्री साधे घाट । यहि रहनी वह रहत है, सुरति शब्द के बाट ॥

चौपाई

गरुड चले वरुण की ठाई । अमी द्रौप मोहि देहु बताई ॥ तुरतहि वरुण दीन उपदेशा । हमते पूछौ कौन सँदेशा ॥ तुम सब भेद जानत हो भाई । तुरतहि जाऊ श्रवण की ठाई ॥ वही श्रवण कहै सम भेवा । वह तो करइ समर्थ की सेवा ॥ वह लौलीन प्रभू को जाने । साधु संतको सेवा ठाने ॥ सत्य पुरुष को जाने भेवा । सकल खबर कह जाने देवा ॥ द्रौप द्रौपकी कहै जो बानी । जाहु जहाँ घर होय निर्बानी ॥ जाहु तुम उनही के पास । सत्य शब्द कहो परकासा ॥ जहाँ कहैं तहवाँ चलि जाऊ । अमृत लेके बाल पिआऊं ॥

सतगुरु वचन

तुरत गरुड गये तब तहवाँ । सत्य पुरुष को द्रौप है जहवाँ ॥

गरुड वचन

श्रवण हंस मोहि कह समुझाई । कौन ठाम अमृत देहु बताई ॥

अवन वचन

तब श्रवण यक बोलेउ बानी । पुरुषकी गति अजहूँ नहिं जानी ॥ विनु आज्ञा कैसे तुम कहऊँ । कौनी भाँति भेद मैं लहऊँ ॥ हैं अमृत नहिं राखूँ गोई । इतना पातक लागे मोई ॥ पुरुषउ थापि अमृत जो दीना । हमको कैसे नास्ती कीना ॥ सांखी-कहे श्रवण मैं भाषेउ, अमृत का सब भेव । मारग कोई जानई, ऐसो अखंड अभेव ॥