महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 452)
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
राजा पृथुका चरित्र
नारद उवाच
पृथुं वैन्यं च राजानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
यमभ्यषिञ्चन् साम्राज्ये राजसूये महर्षयः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**संजय! वेनके पुत्र राजा पृथु भी जीवित नहीं रह सके; यह हमने सुना है। महर्षियोंने राजसूययज्ञमें उन्हें सम्राट्के पदपर अभिषिक्त किया था ॥ १ ॥
यत्नतः प्रथतेत्यूचुः सर्वानभिभवन् पृथुः ।
क्षतान्नस्त्रास्यते सर्वानित्येवं क्षत्रियोऽभवत् ॥ २ ॥
‘ये समस्त शत्रुओंको पराजित करके अपने प्रयत्नसे प्रथित (विख्यात) होंगे’—ऐसा महर्षियोंने कहा था। इसलिये वे ‘पृथु’ कहलाये। ऋषियोंने यह भी कहा कि ‘ये क्षतसे हमारा त्राण करेंगे’, इसलिये वे ‘क्षत्रिय’ इस सार्थक नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २ ॥
पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्ताः स्मेति यदब्रुवन् ।
ततो राजेति नामास्य अनुरागादजायत ॥ ३ ॥
वेनकुमार पृथुको देखकर प्रजाने कहा, हम इनमें अनुरक्त हैं। इसलिये उस प्रजारंजनजनित अनुरागके कारण उनका नाम ‘राजा’ हुआ ॥ ३ ॥
अकृष्टपच्या पृथिवी आसीद् वैन्यस्य कामधुक् ।
सर्वाः कामदुघा गावः पुटके पुटके मधु ॥ ४ ॥
वेननन्दन पृथुके लिये यह पृथ्वी कामधेनु हो गयी थी। उनके राज्यमें बिना जोते ही पृथ्वीसे अनाज पैदा होता था। उस समय सभी गौएँ कामधेनुके समान थीं। पत्ते-पत्तेमें मधु भरा रहता था ॥ ४ ॥
आसन् हिरण्मया दर्भाः सुखस्पर्शाः सुखावहाः ।
तेषां चीराणि संवीताः प्रजास्तेष्वेव शेरते ॥ ५ ॥
कुश सुवर्णमय होते थे। उनका स्पर्श कोमल था और वे सुखद जान पड़ते थे। उन्हींके चीर बनाकर प्रजा उनसे अपना शरीर ढकती थी तथा उन कुशोंकी ही चटाइयोंपर सोती थी ॥ ५ ॥
फलान्यमृतकल्पानि स्वादूनि च मधूनि च ।
तेषामासीत् तदाहारो निराहाराश्च नाभवन् ॥ ६ ॥
वृक्षोंके फल अमृतके समान मधुर और स्वादिष्ट होते थे। उन दिनों उन फलोंका ही आहार किया जाता था। कोई भी भूखा नहीं रहता था ॥ ६ ॥
अरोगाः सर्वसिद्धार्था मनुष्या ह्यकुतोभयाः ।
न्यवसन्त यथाकामं वृक्षेषु च गुहासु च ॥ ७ ॥ सभी मनुष्य नीरोग थे। सबकी सारी इच्छाएँ पूर्ण होती थीं और उन्हें कहींसे भी कोई भय नहीं था। वे अपनी इच्छाके अनुसार वृक्षोंके नीचे और पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करते थे ॥ ७ ॥
प्रविभागो न राष्ट्राणां पुराणां चाभवत् तदा । यथासुखं यथाकामं तथैता मुदिताः प्रजाः ॥ ८ ॥ उस समय राष्ट्रों और नगरोंका विभाग नहीं था। सबको इच्छानुसार सुख और भोग प्राप्त थे। इससे यह सारी प्रजा प्रसन्न थी ॥ ८ ॥
तस्य संस्तम्मिता ह्यापः समुद्रमभियास्यतः । पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ९ ॥ राजा पृथु जब समुद्रमें यात्रा करते थे, तब पानी थम जाता था और पर्वत उन्हें जानेके लिये मार्ग दे देते थे। उनके रथकी ध्वजा कभी खण्डित नहीं हुई थी ॥ ९ ॥
तं वनस्पतयः शैला देवासुरनरोरगाः । सप्तर्षयः पुण्यजना गन्धर्वाप्सरसोऽपि च ॥ १० ॥ पितरश्च सुखासीनमभिगम्येदमब्रुवन् । सम्राडसि क्षत्रियोऽसि राजा गोप्ता पितासि नः ॥ ११ ॥ देह्यस्मभ्यं महाराज प्रभुः सन्नीप्सितान् वरान् । यैर्वयं शाश्वतीस्तृप्तीर्वर्तयिष्यामहे सुखम् ॥ १२ ॥ एक दिन सुखपूर्वक बैठे हुए राजा पृथुके पास वनस्पति, पर्वत, देवता, असुर, मनुष्य, सर्प, सप्तर्षि, पुण्यजन (यक्ष), गन्धर्व, अप्सरा तथा पितरोंने आकर इस प्रकार कहा—'महाराज! तुम हमारे सम्राट् हो, क्षत्रिय हो तथा राजा, रक्षक और पिता हो। तुम हमें अभीष्ट वर दो, जिससे हमलोग अनन्त कालतक तृप्ति और सुखका अनुभव करें। तुम ऐसा करनेमें समर्थ हो' ॥ १०—१२ ॥
तथेत्युक्त्वा पृथुर्वैन्यो गृहीत्वाऽऽजगवं धनुः । शरांश्चाप्रतिमान् घोरांश्चिन्तयित्वाऽब्रवीन्महीम् ॥ १३ ॥ 'बहुत अच्छा' ऐसा ही होगा, यह कहकर वेनकुमार पृथुने अपना आजगव नामक धनुष और जिनकी कहीं तुलना नहीं थी, ऐसे भयंकर बाण हाथमें ले लिये और कुछ सोचकर पृथिवीसे कहा— ॥ १३ ॥
एह्येहि वसुधे क्षिप्रं क्षरैभ्यः काङ्क्षितं पयः । ततो दास्यामि भद्रं ते अन्नं यस्य यथेप्सितम् ॥ १४ ॥ 'वसुधे! तुम्हारा कल्याण हो। आओ-आओ, इन प्रजाजनोंके लिये शीघ्र ही मनोवांछित दूधकी धारा बहाओ। तब मैं जिसका जैसा अभीष्ट अन्न है, उसे वैसा दे सकूँगा' ॥ १४ ॥
वसुधोवाच
दुहितृत्वेन मां वीर संकल्पयितुमर्हसि ।
तथेत्युक्त्वा पृथुः सर्वं विधानमकरोद् वशी ॥ १५ ॥
वसुधा बोली—वीर! तुम मुझे अपनी पुत्री मान लो, तब जितेन्द्रिय राजा पृथुने 'तथास्तु' कहकर वहाँ सारी आवश्यक व्यवस्था की ॥ १५ ॥
ततो भूतनिकायास्तां वसुधां दुदुहुस्तदा ।
तां वनस्पतयः पूर्वं समुत्तस्थुर्दुधुक्षवः ॥ १६ ॥
तदनन्तर प्राणियोंके समुदायने उस समय वसुधाको दुहना आरम्भ किया। सबसे पहले दूधकी इच्छावाले वनस्पति उठे ॥ १६ ॥
सातिष्ठद् वत्सला वत्सं दोग्धृपात्राणि चेच्छती ।
वत्सोऽभूत् पुष्पितः शालः प्लक्षो दोग्धाभवत् तदा ॥ १७ ॥
छिन्नप्ररोहणं दुग्धं पात्रमौदुम्बरं शुभम् ।
उस समय गोरूपधारिणी पृथ्वी वात्सल्य-स्नेहसे परिपूर्ण हो बछड़े, दुहनेवाले और दुग्धपात्रकी इच्छा करती हुई खड़ी हो गयी। वनस्पतियोंमेंसे खिला हुआ शालवृक्ष बछड़ा हो गया। पाकरका पेड़ दुहनेवाला बन गया। गूलर सुन्दर दुग्धपात्रका काम देने लगा। कटनेपर पुनः पनप जाना यही दूध था ॥ १७ १/२ ॥
उदयः पर्वतो वत्सो मेरुर्दोग्धा महागिरिः ॥ १८ ॥
रत्नान्योषधयो दुग्धं पात्रमश्ममयं तथा ।
पर्वतोंमें उदयाचल बछड़ा, महागिरि मेरु दुहनेवाला, रत्न और ओषधि दूध तथा प्रस्तर ही दुग्धपात्र था ॥
दोग्धा चासीत् तदा देवो दुग्धमूर्जस्करं प्रियम् ॥ १९ ॥
देवताओंमें भी उस समय कोई दुहनेवाला और कोई बछड़ा बन गया। उन्होंने पुष्टिकारक अमृतमय प्रिय दूध दुह लिया ॥ १९ ॥
असुरा दुदुहुर्मायामामपात्रे तु ते तदा ।
दोग्धा द्विमूर्धा तत्रासीद् वत्सश्चासीद् विरोचनः ॥ २० ॥
असुरोंने कच्चे बर्तनमें मायामय दूधका ही दोहन किया। उस समय द्विमूर्धा दुहनेवाला और विरोचन बछड़ा बना था ॥ २० ॥
कृषिं च सस्यं च नरा दुदुहुः पृथिवीतले ।
स्वायम्भुवो मनुर्वत्सस्तेषां दोग्धाभवत् पृथुः ॥ २१ ॥
भूतलके मनुष्योंने कृषिकर्म और खेतीकी उपजको ही दूधके रूपमें दुहा। उनके बछड़ेके स्थानपर स्वायम्भू मनु थे और दुहनेका कार्य पृथुने किया ॥ २१ ॥
अलाबुपात्रे च तथा विषं दुग्धा वसुंधरा ।
धृतराष्ट्रोऽभवद् दोग्धा तेषां वत्सस्तु तक्षकः ॥ २२ ॥
सर्पोंने तुम्बीके बर्तनमें पृथ्वीसे विषका दोहन किया। उनकी ओरसे दुहनेवाला धृतराष्ट्र और बछड़ा तक्षक था।।
सप्तर्षिभिर्ब्रह्म दुग्धा तथा चाक्लिष्टकर्मभिः । दोग्धा बृहस्पतिः पात्रं छन्दो वत्सश्च सोमराट् ॥ २३ ॥ अक्लिष्टकर्मा सप्तर्षियोंने ब्रह्म (वेद एवं तप)-का दोहन किया। उनके दोग्धा बृहस्पति, पात्र छन्द और बछड़ा राजा सोम थे ।। २३ ।।
अन्तर्धानं चामपात्रे दुग्धा पुण्यजनैर्विराट् । दोग्धा वैश्रवणस्तेषां वत्सश्चासीद् वृषध्वजः ॥ २४ ॥ यक्षोंने कच्चे बर्तनमें पृथ्वीसे अन्तर्धान विद्याका दोहन किया। उनके दोग्धा कुबेर और बछड़ा महादेवजी थे ।। २४ ।।
पुण्यगन्धान् पद्मपात्रे गन्धर्वाप्सरसोऽदुहन् । वत्सश्चित्ररथस्तेषां दोग्धा विश्वरुचिः प्रभुः ॥ २५ ॥ गन्धर्वों और अप्सराओंने कमलके पात्रमें पवित्र गन्धको ही दूधके रूपमें दुहा। उनका बछड़ा चित्ररथ और दुहनेवाले गन्धर्वराज विश्वरुचि थे ।। २५ ।।
स्वधां रजतपात्रेषु दुदुहुः पितरश्च ताम् । वत्सो वैवस्वतस्तेषां यमो दोग्धान्तकस्तदा ॥ २६ ॥ पितरोंने पृथ्वीसे चाँदीके पात्रमें स्वधारूपी दूधका दोहन किया। उस समय उनकी ओरसे वैवस्वत यम बछड़ा और अन्तक दुहनेवाले थे ।। २६ ।।
एवं निकायैस्तैर्दुग्धा पयोऽभीष्टं हि सा विराट् । यैर्वर्तयन्ति ते ह्यद्य पात्रैर्वत्सैश्च नित्यशः ॥ २७ ॥ संजय! इस प्रकार सभी प्राणियोंने बछड़ों और पात्रोंकी कल्पना करके पृथ्वीसे अपने अभीष्ट दूधका दोहन किया था, जिससे वे आजतक निरन्तर जीवन-निर्वाह करते हैं ।। २७ ।।
यज्ञैश्च विविधैरिष्ट्वा पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् । संतर्पयित्वा भूतानि सर्वैः कामैर्मनःप्रियैः ॥ २८ ॥ तदनन्तर प्रतापी वेनकुमार पृथुने नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा यजन करके मनको प्रिय लगनेवाले सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति कराकर सब प्राणियोंको तृप्त किया ।।
हैरण्यानकरोद् राजा ये केचित् पार्थिवा भुवि । तान् ब्राह्मणेभ्यः प्रायच्छदश्वमेधे महामखे ॥ २९ ॥ भूतलपर जो कोई भी पार्थिव पदार्थ हैं, उनकी सोनेकी आकृति बनवाकर राजा पृथुने महायज्ञ अश्वमेधमें उन्हें ब्राह्मणोंको दान किया ।। २९ ।।
षष्टिनागसहस्राणि षष्टिनागशतानि च ।
सौवर्णानकरोद् राजा ब्राह्मणेभ्यश्च तान् ददौ ।। ३० ।।
राजाने छाछठ हजार सोनेके हाथी बनवाये और उन्हें ब्राह्मणोंको दे दिया ।। ३० ।।
इमां च पृथिवीं सर्वां
मणिरत्नविभूषिताम् ।
सौवर्णीमकरोद् राजा
ब्राह्मणेभ्यश्च तां ददौ ।। ३१ ।।
राजा पृथुने इस सारी पृथ्वीकी भी मणि तथा रत्नोंसे विभूषित सुवर्णमयी प्रतिमा बनवायी और उसे ब्राह्मणोंको दे दिया ।। ३१ ।।
स चेन्ममार सृञ्जय
चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं
मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्य-
मभि श्वैत्येत्युदाहरत् ।। ३२ ।।
श्वैत्य सृंजय! चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तब दूसरोंकी क्या गिनती है? अतः तुम यज्ञानुष्ठान और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा ।। ३२ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयो- पाख्यानविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 458)
सप्ततितमोऽध्यायः
परशुरामजीका चरित्र
नारद उवाच
रामो महातपाः शूरो वीरलोकनमस्कृतः । जामदग्न्योऽप्यतियशा अवितृप्तो मरिष्यति ॥ १ ॥ नारदजी कहते हैं—संजय! महातपस्वी शूरवीर, वीरजनवन्दित महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजी भी अतृप्त अवस्थामें ही मौतके मुखमें चले जायँगे ॥ १ ॥ यः स्माद्यमनुपर्येति भूमिं कुर्वन्निमां सुखाम् । न चासीद् विक्रिया यस्य प्राप्य श्रियमनुत्तमाम् ॥ २ ॥ जिन्होंने इस पृथ्वीको सुखमय बनाते हुए आदि युगके धर्मका जहाँ निरन्तर प्रचार किया था तथा परम उत्तम सम्पत्तिको पाकर भी जिनके मनमें किसी प्रकारका विकार नहीं आया ॥ २ ॥ यः क्षत्रियैः परामृष्टे वत्से पितरि चाब्रुवन् । ततोऽवधीत् कार्तवीर्यमजितं समरे परैः ॥ ३ ॥ जब क्षत्रियोंने गायके बछड़ेको पकड़ लिया और पिता जमदग्निको मार डाला, तब जिन्होंने मौन रहकर ही समरभूमिमें दूसरोंसे कभी पराजित न होनेवाले कृतवीर्यकुमार अर्जुनका वध किया था ॥ ३ ॥ क्षत्रियाणां चतुःषष्टिमयुतानि सहस्रशः । तदा मृत्योः समेतानि एकेन धनुषाजयत् ॥ ४ ॥ उस समय मरने-मारनेका निश्चय करके एकत्र हुए चौसठ करोड़ क्षत्रियोंको उन्होंने एकमात्र धनुषके द्वारा जीत लिया ॥ ४ ॥ ब्रह्मद्विषां चाथ तस्मिन् सहस्राणि चतुर्दश । पुनरन्यानि जग्राह दन्तक्रूरं जघान ह ॥ ५ ॥ उसी युद्धके सिलसिलेमें परशुरामजीने चौदह हजार दूसरे ब्रह्मद्रोहियोंका दमन किया और दन्तक्रूर नामक राजाको भी मार डाला ॥ ५ ॥ सहस्रं मुसलेनाहन् सहस्रमसिनावधीत् । उद्बन्धनात् सहस्रं च सहस्रमुदके धृतम् ॥ ६ ॥ उन्होंने एक सहस्र क्षत्रियोंको मूसलसे मार गिराया, एक सहस्र राजपूतोंको तलवारसे काट डाला, फिर एक सहस्र क्षत्रियोंको वृक्षोंकी शाखाओंमें फाँसीपर लटकाकर मार डाला और पुनः एक सहस्रको पानीमें डुबो दिया ॥ ६ ॥ दन्तान् भङ्क्त्वा सहस्रस्य कर्णान् नासान्यकृन्तत ।
ततः सप्तसहस्राणां कटुधूपमपाययत् ।। ७ ।।
एक सहस्र राजपूतोंके दाँत तोड़कर नाक और कान काट डाले तथा सात हजार
राजाओंको कड़ुवा धूप पिला दिया ।। ७ ।।
शिष्टान् बद्ध्वा च हत्वा वै तेषां मूर्ध्नि विभिद्य च ।
गुणावतीमुत्तरेण खाण्डवाद् दक्षिणेन च ।
गिर्यन्ते शतसाहस्रा हैहयाः समरे हताः ।। ८ ।।
सरथाश्वगजा वीरा निहतास्तत्र शेरते ।
पितुर्वधामर्षितेन जामदग्न्येन धीमता ।। ९ ।।
शेष क्षत्रियोंको बाँधकर उनका वध कर डाला। उनमेंसे कितनोंके ही मस्तक विदीर्ण
कर डाले। गुणावतीसे उत्तर और खाण्डव वनसे दक्षिण पर्वतके निकटवर्ती प्रदेशमें लाखों
हैहयवंशी क्षत्रिय वीर पिताके वधसे कुपित हुए बुद्धिमान् परशुरामजीके द्वारा समरभूमिमें
मारे गये। वे अपने रथ, घोड़े और हाथियोंसहित मारे जाकर वहाँ धराशायी हो
गये ।। ८-९ ।।
निजघ्ने दशसाहस्रान् रामः परशुना तदा ।
न ह्यमृष्यत ता वाचो यास्तैर्भृशमुदीरिताः ।। १० ।।
भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजोत्तमाः ।
परशुरामजीने उस समय अपने फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंको काट डाला।
आश्रमवासियोंने आर्तभावसे जो बातें कही थीं, वहाँके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने 'भृगुवंशी परशुराम!
दौड़ो, बचाओ' इस प्रकार कहकर जो करुण क्रन्दन किया था, उनकी वह कातर पुकार
परशुरामजीसे नहीं सही गयी ।। १० १/२ ।।
ततः काश्मीरदरदान् कुन्तिक्षुद्रकमालवान् ।। ११ ।।
अङ्गवङ्गकलिङ्गांश्च विदेहांस्ताम्रलिप्तकान् ।
रक्षोवाहान् वीतिहोत्रांस्त्रिगर्तान् मार्तिकावतान् ।। १२ ।।
शिबीनन्यांश्च राजन्यान् देशान् देशान् सहस्रशः ।
निजघान शितैर्बाणैर्जामदग्न्यः प्रतापवान् ।। १३ ।।
तदनन्तर प्रतापी परशुरामने काश्मीर, दरद, कुन्ति, क्षुद्रक, मालव, अंग, वंग, कलिंग,
विदेह, ताम्रलिप्त, रक्षोवाह, वीतिहोत्र, त्रिगर्त, मार्तिकावत, शिबि तथा अन्य सहस्रों देशोंके
क्षत्रियोंका अपने तीखे बाणोंद्वारा संहार किया ।। ११-१३ ।।
कोटीशतसहस्राणि क्षत्रियाणां सहस्रशः ।
इन्द्रगोपकवर्णस्य बन्धुजीवनिभस्य च ।। १४ ।।
रुधिरस्य परीवाहैः पूरयित्वा सरांसि च ।
सर्वानष्टादश द्वीपान् वशमानीय भार्गवः ।। १५ ।।
ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ।
सहस्रों और लाखों कोटि क्षत्रियोंके इन्द्रगोप (वीर-बहूटी) नामक कीट तथा बन्धुजीव (दुपहरिया)-पुष्पके समान रंगवाले रक्तकी धाराओंसे भृगुनन्दन परशुरामने कितने ही तालाब भर दिये और समस्त अठारह द्वीपोंको अपने वशमें करके उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त सौ पवित्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया ।। १४-१५ १/२ ।।
वेदीमष्टनलोत्सेधां सौवर्णां विधिनिर्मिताम् ।। १६ ।।
सर्वरत्नशतैः पूर्णां पताकाशतमालिनीम् ।
ग्राम्यारण्यैः पशुगणैः सम्पूर्णां च महीमिमाम् ।। १७ ।।
रामस्य जामदग्न्यस्य प्रतिजग्राह कश्यपः ।
उस यज्ञमें विधिपूर्वक बत्तीस हाथ ऊँची सोनेकी वेदी बनायी गयी थी, जो सब प्रकारके सैकड़ों रत्नोंसे परिपूर्ण और सौ पताकाओंसे सुशोभित थी। जमदग्निनन्दन परशुरामकी उस वेदीको तथा ग्रामीण और जंगली पशुओंसे भरी-पूरी इस पृथ्वीको भी महर्षि कश्यपने दक्षिणारूपसे ग्रहण किया ।। १६-१७ १/२ ।।
ततः शतसहस्राणि द्विपेन्द्रान् हेमभूषणान् ।। १८ ।।
निर्दस्यूं पृथिवीं कृत्वा शिष्टेष्टजनसंकुलाम् ।
कश्यपाय ददौ रामो हयमेधे महामखे ।। १९ ।।
उस समय परशुरामजीने लाखों गजराजोंको सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करके तथा पृथ्वीको चोर-डाकुओंसे सूनी और साधु पुरुषोंसे भरी-पूरी करके महायज्ञ अश्वमेधमें कश्यपजीको दे दिया ।। १८-१९ ।।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।
इष्ट्वा क्रतुशतैर्वीरो ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ।। २० ।।
वीर एवं शक्तिशाली परशुरामजीने इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य करके सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया और इस वसुधाको ब्राह्मणोंके अधिकारमें दे दिया ।। २० ।।
सप्तद्वीपां वसुमतीं मारीचोऽगृह्णत द्विजः ।
रामं प्रोवाच निर्गच्छ वसुधातो ममाज्ञया ।। २१ ।।
ब्रह्मर्षि कश्यपने जब सातों द्वीपोंसे युक्त यह पृथ्वी दानमें ले ली, तब उन्होंने परशुरामजीसे कहा—‘अब तू मेरी आज्ञासे इस पृथ्वीसे निकल जाओ’ (और कहीं अन्यत्र जाकर रहो) ।। २१ ।।
स कश्यपस्य वचनात् प्रोत्सार्य सरितां पतिम् ।
इषुपाते युधां श्रेष्ठः कुर्वन् ब्राह्मणशासनम् ।। २२ ।।
अध्यावसद् गिरिश्रेष्ठं महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ।
कश्यपके इस आदेशसे योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामने जितनी दूर बाण फेंका जा सकता है, समुद्रको उतनी ही दूर पीछे हटाकर ब्राह्मणकी आज्ञाका पालन करते हुए उत्तम पर्वत गिरिश्रेष्ठ महेन्द्रपर निवास किया ॥ २२ १/२ ॥
एवं गुणशतैर्युक्तो भृगूणां कीर्तिवर्धनः ॥ २३ ॥
जामदग्न्यो ह्यतियशा मरिष्यति महाद्युतिः ।
इस प्रकार भृगुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले महायशस्वी, महातेजस्वी और सैकड़ों गुणोंसे सम्पन्न जमदग्निनन्दन परशुराम भी एक-न-एक दिन मरेंगे ही ॥ २३ १/२ ॥
त्वया चतुर्भद्रतरः पुत्रात् पुण्यतरस्तव ॥ २४ ॥
अयज्वानमदाक्षिण्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
सृंजय! चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे तुमसे श्रेष्ठ और तुम्हारे पुत्रसे अधिक पुण्यात्मा हैं। अतः तुम यज्ञानुष्ठान और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो ॥ २४ १/२ ॥
एते चतुर्भद्रतरास्त्वया भद्रशताधिकाः ।
मृता नरवरश्रेष्ठ मरिष्यन्ति च सृञ्जय ॥ २५ ॥
नरश्रेष्ठ सृंजय! अबतक जिन लोगोंका वर्णन किया गया है, ये चतुर्विध कल्याणकारी गुणोंमें तो तुमसे बढ़कर थे ही, तुम्हारी अपेक्षा उनमें सैकड़ों मंगलकारी गुण अधिक भी थे; तथापि वे मर गये और जो विद्यमान हैं, वे भी मरेंगे ही ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयो-
पाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
व्यासजी कहते हैं—राजन्! इन सोलह राजाओंका पवित्र एवं आयुकी वृद्धि करनेवाला उपाख्यान सुनकर राजा सृंजय कुछ भी नहीं बोलते हुए मौन रह गये॥ १॥
एकसप्ततितमोऽध्यायः
नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना
व्यास उवाच
पुण्यमाख्यानमायुष्यं श्रुत्वा षोडशराजकम्।
अव्याहरन्नरपतिस्तूष्णीमासीत् स सृञ्जयः॥ १॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! इन सोलह राजाओंका पवित्र एवं आयुकी वृद्धि करनेवाला उपाख्यान सुनकर राजा सृंजय कुछ भी नहीं बोलते हुए मौन रह गये॥ १॥
तमब्रवीत् तथाऽऽसीनं नारदो भगवानृषिः।
श्रुतं कीर्तयतो मह्यं गृहीतं ते महाद्युते॥ २॥
उन्हें इस प्रकार चुपचाप बैठे देख भगवान् नारदमुनिने उनसे पूछा—'महातेजस्वी नरेश! मैंने जो कुछ कहा है, उसे तुमने सुना और समझा है न?'॥ २॥
आहोस्विदन्ततो नष्टं श्राद्धं शूद्रीपताविव।
स एवमुक्तः प्रत्याह प्राञ्जलिः सृञ्जयस्तदा॥ ३॥
'अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि जैसे शूद्रजातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट (निष्फल) हो जाता है, उसी प्रकार मेरा यह सारा कहना अन्ततोगत्वा व्यर्थ हो गया हो।' उनके इस प्रकार पूछनेपर उस समय सृंजयने हाथ जोड़कर उत्तर दिया—॥ ३॥
एतच्छ्रुत्वा महाबाहो धन्यमाख्यानमुत्तमम्।
राजर्षीणां पुराणानां यज्वनां दक्षिणावताम्॥ ४॥
विस्मयेन हृते शोके तमसीवार्कतेजसा।
विपाप्मास्म्यव्यथोपेतो ब्रूहि किं करवाण्यहम्॥ ५॥
'महाबाहु महर्षे! यज्ञ करने और दक्षिणा देनेवाले प्राचीन राजर्षियोंका यह परम उत्तम सराहनीय उपाख्यान सुनकर मुझे ऐसा विस्मय हुआ है कि उसने मेरा सारा शोक हर लिया है। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यका तेज सारा अन्धकार हर लेता है। अब मैं पाप (दुःख) और व्यथासे शून्य हो गया हूँ। बताइये, आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ'॥ ४-५॥
नारद उवाच
दिष्ट्यापहृतशोकस्त्वं वृणीष्वेह यदिच्छसि।
तत् तत् प्रपत्स्यसे सर्वं न मृषावादिनो वयम्॥ ६॥
नारदजीने कहा— राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा शोक दूर हो गया। अब तुम्हारी जो इच्छा हो, यहाँ मुझसे माँग लो। तुम्हारी वह सारी अभिलषित वस्तु तुम्हें प्राप्त हो जायगी। हमलोग झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ६ ॥
सृञ्जय उवाच
एतेनैव प्रतीतोऽहं प्रसन्नो यद्भगवान् मम ।
प्रसन्नो यस्य भगवान् न तस्यास्तीह दुर्लभम् ॥ ७ ॥
संजयने कहा— मुने! आप मुझपर प्रसन्न हैं, इतनेसे ही मैं पूर्ण संतुष्ट हूँ। जिसपर आप प्रसन्न हों, उसे इस जगत्में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ७ ॥
नारद उवाच
मृतं ददानि ते पुत्रं दस्युभिर्निहतं वृथा ।
उद्धृत्य नरकात् कष्टात् पशुवत् प्रोक्षितं यथा ॥ ८ ॥
नारदजीने कहा— राजन्! लुटेरोंने तुम्हारे पुत्रको प्रोक्षित पशुकी भाँति व्यर्थ ही मार डाला है। तुम्हारे उस मरे हुए पुत्रको मैं कष्टप्रद नरकसे निकालकर तुम्हें पुनः वापस दे रहा हूँ ॥ ८ ॥
व्यास उवाच
प्रादुरासीत् ततः पुत्रः सृञ्जयस्याद्भुतप्रभः ।
प्रसन्नेनर्षिणा दत्तः कुबेरतनयोपमः ॥ ९ ॥
व्यासजी कहते हैं— युधिष्ठिर! नारदजीके इतना कहते ही सृंजयका अद्भुत कान्तिमान् पुत्र वहाँ प्रकट हो गया। उसे ऋषिने प्रसन्न होकर राजाको दिया था। वह देखनेमें कुबेरके पुत्रके समान जान पड़ता था ॥ ९ ॥
ततः संगम्य पुत्रेण प्रीतिमानभवन्नृपः ।
ईजे च ऋतुभिः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ १० ॥
अपने उस पुत्रसे मिलकर राजा सृंजयको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त पुण्यमय यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया ॥ १० ॥
अकृतार्थश्च भीतश्च न च सान्नाहिको हतः ।
अयज्वा त्वनपत्यश्च ततोऽसौ जीवितः पुनः ॥ ११ ॥
सृंजयका पुत्र कवच बाँधकर युद्धमें लड़ता हुआ नहीं मारा गया था। उसे अकृतार्थ और भयभीत अवस्थामें अपने प्राणोंका त्याग करना पड़ा था। वह यज्ञकर्मसे रहित और संतानहीन भी था। इसलिये नारदजीने पुनः उसे जीवित कर दिया था ॥ ११ ॥
शूरो वीरः कृतार्थश्च प्रताप्यारीन् सहस्रशः ।
अभिमन्युर्गतो वीरः पृतनाभिमुखो हतः ॥ १२ ॥
परंतु शूरवीर अभिमन्यु तो कृतार्थ हो चुका है। वह वीर शत्रुसेनाके सम्मुख युद्धतत्पर हो सहस्रों वैरीयोंको संतप्त करके मारा गया और स्वर्गलोकमें जा पहुँचा है ॥
ब्रह्मचर्येण यान् कांश्चित् प्रज्ञया च श्रुतेन च । इष्टैश्च क्रतुभिर्यान्ति तांस्ते पुत्रोऽक्षयान् गतः ॥ १३ ॥ पुण्यात्मा पुरुष ब्रह्मचर्यपालन, उत्तम ज्ञान, वेदशास्त्रोंके स्वाध्याय तथा यज्ञोंके अनुष्ठानसे जिन किन्हीं लोकोंमें जाते हैं, उन्हीं अक्षय लोकोंमें तुम्हारा पुत्र अभिमन्यु भी गया है ॥ १३ ॥
विद्वांसः कर्मभिः पुण्यैः स्वर्गमीहन्ति नित्यशः । न तु स्वर्गादयं लोकः काम्यते स्वर्गवासिभिः ॥ १४ ॥ विद्वान् पुरुष पुण्यकर्मोंद्वारा सदा स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा करते हैं; परंतु स्वर्गवासी पुरुष स्वर्गसे इस लोकमें आनेकी कामना नहीं करते हैं ॥ १४ ॥
तस्मात् स्वर्गगतं पुत्रमर्जुनस्य हतं रणे । न चेहानयितुं शक्यं किंचिदप्राप्यमीहितम् ॥ १५ ॥ अर्जुनका पुत्र युद्धमें मारे जानेके कारण स्वर्गलोकमें गया हुआ है। अतः उसे यहाँ नहीं लाया जा सकता। कोई अप्राप्य वस्तु केवल इच्छा करनेमात्रसे नहीं सुलभ हो सकती ॥ १५ ॥
यां योगिनो ध्यानविविक्तदर्शनाः प्रयान्ति यां चोत्तमयज्विनो जनाः । तपोभिरिद्धैरनुयान्ति यां तथा तामक्षयां ते तनयो गतो गतिम् ॥ १६ ॥ जिन्होंने ध्यानके द्वारा पवित्र ज्ञानमयी दृष्टि प्राप्त कर ली है, वे योगी निष्कामभावसे उत्तम यज्ञ करनेवाले पुरुष तथा अपनी उज्ज्वल तपस्याओंद्वारा तपस्वी मुनि जिस अक्षय गतिको पाते हैं, तुम्हारे पुत्रने भी वही गति प्राप्त की है ॥ १६ ॥
अन्तात् पुनर्भावगतो विराजते राजेव वीरो ह्यमृतात्मरश्मिभिः । तामैन्दवीमात्मतनुं द्विजोचितां गतोऽभिमन्युर्न स शोकमर्हति ॥ १७ ॥ वीर अभिमन्यु मृत्युके पश्चात् पुनः पूर्वभावको प्राप्त होकर चन्द्रमासे उत्पन्न अपने द्विजोचित शरीरमें प्रतिष्ठित हो अपनी अमृतमयी किरणोंसे राजा सोमके समान प्रकाशित हो रहा है। अतः उसके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥
एवं ज्ञात्वा स्थिरो भूत्वा जह्यरीन् धैर्यमाप्नुहि । जीवन्त एव नः शोच्या न तु स्वर्गगतोऽनघ ॥ १८ ॥
राजन्! ऐसा जानकर सुस्थिर हो धैर्यका आश्रय लो और उत्साहपूर्वक शत्रुओंका वध करो। अनघ! हमें इस संसारमें जीवित पुरुषोंके लिये ही शोक करना चाहिये। जो स्वर्गमें चला गया है, उसके लिये शोक करना उचित नहीं है॥ १८॥
शोचतो हि महाराज अघमेवाभिवर्धते। तस्माच्छोकं परित्यज्य श्रेयसे प्रयतेद् बुधः॥ १९॥ प्रहर्षमभिमानं च सुखप्राप्तिं च चिन्तयन्। महाराज! शोक करनेसे केवल दुःख ही बढ़ता है। अतः विद्वान् पुरुष उत्कृष्ट हर्ष, अतिशय सम्मान और सुख-प्राप्तिका चिन्तन करते हुए शोकका परित्याग करके अपने कल्याणके लिये ही प्रयत्न करे॥ १९ १/२॥
एतद् बुद्ध्वा बुधाः शोकं न शोकः शोक उच्यते॥ २०॥ यही सब सोच-समझकर ज्ञानवान् पुरुष शोक नहीं करते हैं। शोकको शोक नहीं कहते हैं (उसका अनुभव करनेवाला मन ही शोकरूप होता है)॥ २०॥
एवं विद्वान् समुत्तिष्ठ प्रयतो भव मा शुचः। श्रुतस्ते सम्भवो मृत्योस्तपांस्यनुपमानि च॥ २१॥ राजन्! ऐसा जानकर तुम युद्धके लिये उठो। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखो तथा शोक न करो। तुमने मृत्युकी उत्पत्ति और उसकी अनुपम तपस्याका वृत्तान्त सुन लिया है॥ २१॥
सर्वभूतसमत्वं च चञ्चलाश्च विभूतयः। सृञ्जयस्य तु तं पुत्रं मृतं संजीवितं पुनः॥ २२॥ मृत्यु सम्पूर्ण प्राणियोंको समभावसे प्राप्त होती है और धन-ऐश्वर्य चंचल है—यह बात भी जान ली है। सृंजयका पुत्र मरा और पुनः जीवित हुआ, यह कथा भी तुमने सुन ही ली है॥ २२॥
एवं विद्वान् महाराज मा शुचः साधयाम्यहम्। एतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ २३॥ महाराज! यह सब तुम जानते हो। अतः शोक न करो। अब मैं अपनी साधनामें लग रहा हूँ। ऐसा कहकर भगवान् व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये॥ २३॥
वागीशाने भगवति व्यासे व्यभ्रनभःप्रभे। गते मतिमतां श्रेष्ठे समाश्वास्य युधिष्ठिरम्॥ २४॥ पूर्वेषां पार्थिवेन्द्राणां महेन्द्रप्रतिमौजसाम्। न्यायाधिगतवित्तानां तां श्रुत्वा यज्ञसम्पदम्॥ २५॥ सम्पूज्य मनसा विद्वान् विशोकोऽभूद् युधिष्ठिरः। पुनश्चाचिन्तयद् दीनः किंस्विद् वक्ष्ये धनंजयम्॥ २६॥
बिना बादलके आकाशकी-सी कान्तिवाले, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वागीश्वर भगवान् व्यास जब युधिष्ठिरको आश्वासन देकर चले गये, तब देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी और न्यायसे धन प्राप्त करनेवाले प्राचीन राजाओंके उस यज्ञ-वैभवकी कथा सुनकर विद्वान् युधिष्ठिर मन-ही-मन उनके प्रति आदरकी भावना करते हुए शोकसे रहित हो गये। तदनन्तर फिर दीनभावसे यह सोचने लगे कि अर्जुनसे मैं क्या कहूँगा ।। २४—२६ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।
(प्रतिज्ञापर्व)
(प्रतिज्ञापर्व)
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध
(धृतराष्ट्र उवाच
अथ संशप्तकैः सार्धं युध्यमाने धनंजये ।
अभिमन्यौ हते चापि बाले बलवतां वरे ।।
महर्षिसत्तमे याते युधिष्ठिरपुरोगमाः ।
पाण्डवाः किमथाकार्षुः शोकेन हतचेतसः ।।
कथं संशप्तकेभ्यो वा निवृत्तो वानरध्वजः ।
केन वा कथितः तस्य प्रशान्तः सुतपावकः ।।
एतन्मे शंस तत्त्वेन सर्वमेवेह संजय ।)
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध कर रहे थे, जब बलवानोंमें श्रेष्ठ बालक अभिमन्यु मारा गया और जब महर्षियोंमें श्रेष्ठ व्यास (युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर) चले गये, तब शोकसे व्याकुल चित्तवाले युधिष्ठिर और अन्य पाण्डवोंने क्या किया? कपिध्वज अर्जुन संशप्तकोंकी ओरसे कैसे लौटे तथा किसने उनसे कहा कि तुम्हारा अग्निके समान तेजस्वी पुत्र सदाके लिये शान्त हो गया। इन सब बातोंको तुम यथार्थरूपसे मुझे बताओ।
संजय उवाच
तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते घोरे प्राणभृतां क्षये ।
आदित्येऽस्तं गते श्रीमान् संध्याकाल उपस्थिते ।। १ ।।
व्यपयातेषु वासाय सर्वेषु भरतर्षभ ।
हत्वा संशप्तकव्रातान् दिव्यैरस्त्रैः कपिध्वजः ।। २ ।।
प्रायात् स शिविरं जिष्णुर्जैत्रमास्थाय तं रथम् ।
गच्छन्नेव च गोविन्दं साश्रुकण्ठोऽभ्यभाषत ।। ३ ।।
**संजय बोले—**भरतश्रेष्ठ! प्राणधारियोंका संहार करनेवाले उस भयंकर दिनके बीत जानेपर जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और संध्याकाल उपस्थित हुआ, उस समय समस्त सैनिक जब शिविरमें विश्रामके लिये चल दिये, तब विजयशील श्रीमान् कपिध्वज अर्जुन अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा संशप्तकसमूहोंका वध करके अपने उस विजयी रथपर बैठे हुए
शिविरकी ओर चले। चलते-चलते ही वे अश्रुगद्गदकण्ठ हो भगवान् गोविन्दसे इस प्रकार बोले— ॥ १—३ ॥
किं नु मे हृदयं त्रस्तं वाक् च सज्जति केशव । स्पन्दन्ति चाप्यनिष्टानि गात्रं सीदति चाप्युत ॥ ४ ॥ ‘केशव! न जाने क्यों आज मेरा हृदय धड़क रहा है, वाणी लड़खड़ा रही है, अनिष्ट-सूचक बायें अंग फड़क रहे हैं और शरीर शिथिल होता जा रहा है ॥ ४ ॥
अनिष्टं चैव मे श्लिष्टं हृदयान्नापसर्पति । भुवि ये दिक्षु चात्युग्रा उत्पातास्त्रासयन्ति माम् ॥ ५ ॥ ‘मेरे हृदयमें अनिष्टकी चिन्ता घुसी हुई है, जो किसी प्रकार वहाँसे निकलती ही नहीं है। पृथ्वीपर तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें होनेवाले भयंकर उत्पात मुझे डरा रहे हैं ॥ ५ ॥
बहुप्रकारा दृश्यन्ते सर्व एवाघशंसिनः । अपि स्वस्ति भवेद् राज्ञः सामात्यस्य गुरोर्मम ॥ ६ ॥ ‘ये उत्पात अनेक प्रकारके दिखायी देते हैं और सब-के-सब भारी अमंगलकी सूचना दे रहे हैं। क्या मेरे पूज्य भ्राता राजा युधिष्ठिर अपने मन्त्रियोंसहित सकुशल होंगे?’ ॥ ६ ॥
वासुदेव उवाच
व्यक्तं शिवं तव भ्रातुः सामात्यस्य भविष्यति । मा शुचः किञ्चिदेवान्यत् तत्रानिष्टं भविष्यति ॥ ७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण बोले—अर्जुन! शोक न करो। मुझे स्पष्ट जान पड़ता है कि मन्त्रियोंसहित तुम्हारे भाईका कल्याण ही होगा। इस अपशकुनके अनुसार कोई दूसरा ही
अनिष्ट हुआ होगा ॥ ७ ॥
संजय उवाच
ततः संध्यामुपास्यैव वीरौ वीरावसादने । कथयन्तौ रणे वृत्तं प्रयातौ रथमास्थितौ ॥ ८ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर वे दोनों वीर उस वीरसंहारक रणभूमिमें संध्या-वन्दन करके पुनः रथपर बैठकर युद्धसम्बन्धी बातें करते हुए आगे बढ़े ॥ ८ ॥
ततः स्वशिविरं प्राप्तौ हतानन्दं हतत्विषम् । वासुदेवोऽर्जुनश्चैव कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ९ ॥ फिर श्रीकृष्ण और अर्जुन जो अत्यन्त दुष्कर कर्म करके आ रहे थे, अपने शिविरके निकट आ पहुँचे। उस समय वह शिविर आनन्दशून्य और श्रीहीन दिखायी देता था ॥ ९ ॥
ध्वस्ताकारं समालक्ष्य शिविरं परवीरहा । बीभत्सुरब्रवीत् कृष्णमस्वस्थहृदयस्ततः ॥ १० ॥ अपनी छावनीको विध्वस्त हुई-सी देखकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनका हृदय चिन्तित हो उठा। अतः वे भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ १० ॥
नदन्ति नाद्य तूर्याणि मङ्गल्यानि जनार्दन । मिश्रा दुन्दुभिनिर्घोषैः शङ्खाश्चाडम्बरैः सह ॥ ११ ॥ ‘जनार्दन! आज इस शिविरमें मांगलिक बाजे नहीं बज रहे हैं। दुन्दुभिनाद तथा तुरहीके शब्दोंके साथ मिली हुई शंखध्वनि भी नहीं सुनायी देती है ॥ ११ ॥
वीणा नैवाद्य वाद्यन्ते शम्यातालस्वनैः सह । मङ्गल्यानि च गीतानि न गायन्ति पठन्ति च ॥ १२ ॥ स्तुतियुक्तानि रम्याणि ममानीकेषु बन्दिनः । ‘ढाक और करतारकी ध्वनिके साथ आज वीणा भी नहीं बज रही है। मेरी सेनाओंमें वन्दीजन न तो मंगलगीत गा रहे हैं और न स्तुतियुक्त मनोहर श्लोकोंका ही पाठ करते हैं ॥ १२१/२ ॥
योधाश्चापि हि मां दृष्ट्वा निवर्तन्ते ह्यधोमुखाः ॥ १३ ॥ कर्माणि च यथापूर्वं कृत्वा नाभिवदन्ति माम् । अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव ॥ १४ ॥ ‘मेरे सैनिक मुझे देखकर नीचे मुख किये लौट जाते हैं। पहलेकी भाँति अभिवादन करके मुझसे युद्धका समाचार नहीं बता रहे हैं। माधव! क्या आज मेरे भाई सकुशल होंगे?’ ॥ १३-१४ ॥
न हि शुद्ध्यति मे भावो दृष्ट्वा स्वजनमाकुलम् । अपि पाञ्चालराजस्य विराटस्य च मानद ॥ १५ ॥
सर्वेषां चैव योधानां सामग्र्यं स्यान्ममाच्युत । ‘आज इन स्वजनोंको व्याकुल देखकर मेरे हृदयकी आशंका नहीं दूर होती है। दूसरोंको मान देनेवाले अच्युत श्रीकृष्ण! राजा द्रुपद, विराट तथा मेरे अन्य सब योद्धाओंका समुदाय तो सकुशल होगा न? ।। १५ १/२ ।। न च मामद्य सौभद्रः प्रहृष्टो भ्रातृभिः सह । रणादायान्तुमुचितं प्रत्युद्याति हसन्निव ।। १६ ।। ‘आज प्रतिदिनकी भाँति सुभद्रकुमार अभिमन्यु अपने भाइयोंके साथ हर्षमें भरकर हँसता हुआ-सा युद्धसे लौटते हुए मेरी उचित अगवानी करने नहीं आ रहा है (इसका क्या कारण है?)’ ।। १६ ।।
संजय उवाच
एवं संकथयन्तौ तौ प्रविष्टौ शिविरं स्वकम् । ददृशाते भृशास्वस्थान् पाण्डवान् नष्टचेतसः ।। १७ ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार बातें करते हुए उन दोनोंने शिविरमें पहुँचकर देखा कि पाण्डव अत्यन्त व्याकुल और हतोत्साह हो रहे हैं ।। १७ ।। दृष्ट्वा भ्रातूंश्च पुत्रांश्च विमना वानरध्वजः । अपश्यंश्चैव सौभद्रमिदं वचनमब्रवीत् ।। १८ ।। भाइयों तथा पुत्रोंको इस अवस्थामें देख और सुभद्रकुमार अभिमन्युको वहाँ न पाकर कपिध्वज अर्जुनका मन अत्यन्त उदास हो गया तथा वे इस प्रकार बोले— ।। १८ ।। मुखवर्णोऽप्रसन्नो वः सर्वेषामेव लक्ष्यते । न चाभिमन्युं पश्यामि न च मां प्रतिनन्दथ ।। १९ ।। ‘आज आप सभी लोगोंके मुखकी कान्ति अप्रसन्न दिखायी दे रही है, इधर मैं अभिमन्युको नहीं देख पाता हूँ और आपलोग भी मुझसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप नहीं कर रहे हैं ।। १९ ।। मया श्रुतश्च द्रोणेन चक्रव्यूहो विनिर्मितः । न च वस्तस्य भेत्तास्ति विना सौभद्रमर्भकम् ।। २० ।। ‘मैंने सुना है कि आचार्य द्रोणने चक्रव्यूहकी रचना की थी। आपलोगोंमेंसे बालक अभिमन्युके सिवा दूसरा कोई उस व्यूहका भेदन नहीं कर सकता था ।। २० ।। न चोपदिष्टस्तस्यासीन्मयानीकाद् विनिर्गमः । कच्चिन्न बालो युष्माभिः परानीकं प्रवेशितः ।। २१ ।। ‘परंतु मैंने उसे उस व्यूहसे निकलनेका ढंग अभी नहीं बताया था। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि आपलोगोंने उस बालकको शत्रुके व्यूहमें भेज दिया हो? ।। २१ ।। भित्त्वानीकं महेष्वासः परेषां बहुशो युधि ।
कच्चिन्न निहतः संख्ये सौभद्रः परवीरहा ॥ २२ ॥ 'शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला महाधनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्यु युद्धमें शत्रुओंके उस व्यूहका अनेकों बार भेदन करके अन्तमें वहीं मारा तो नहीं गया? ॥ २२ ॥ लोहिताक्षं महाबाहुं जातं सिंहमिवाद्रिषु । उपेन्द्रसदृशं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥ २३ ॥ 'पर्वतोंमें उत्पन्न हुए सिंहके समान लाल नेत्रोंवाले, श्रीकृष्णतुल्य पराक्रमी महाबाहु अभिमन्युके विषयमें आपलोग बतावें। वह युद्धमें किस प्रकार मारा गया? ॥ २३ ॥ सुकुमारं महेष्वासं वासवस्यात्मजात्मजम् । सदा मम प्रियं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥ २४ ॥ 'इन्द्रके पौत्र तथा मुझे सदा प्रिय लगनेवाले सुकुमार शरीर महाधनुर्धर अभिमन्युके विषयमें बताइये। वह युद्धमें कैसे मारा गया? ॥ २४ ॥ सुभद्रायाः प्रियं पुत्रं द्रौपद्याः केशवस्य च । अम्बायाश्च प्रियं नित्यं कोऽवधीत् कालमोहितः ॥ २५ ॥ 'सुभद्रा और द्रौपदीके प्यारे पुत्र अभिमन्युको, जो श्रीकृष्ण और माता कुन्तीका सदा दुलारा रहा है, किसने कालसे मोहित होकर मारा है? ॥ २५ ॥ सदृशो वृष्णिवीरस्य केशवस्य महात्मनः । विक्रमश्रुतमाहात्म्यैः कथमायोधने हतः ॥ २६ ॥ 'वृष्णिकुलके वीर महात्मा केशवके समान पराक्रमी, शास्त्रज्ञ और महत्त्वशाली अभिमन्यु युद्धमें किस प्रकार मारा गया है? ॥ २६ ॥ वार्ष्णेयदियितं शूरं मया सततलालितम् । यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥ २७ ॥ 'सुभद्राके प्राणप्यारे शूरवीर पुत्रको, जिसको मैंने सदा लाड़-प्यार किया है, यदि नहीं देखूँगा तो मैं भी यमलोक चला जाऊँगा ॥ २७ ॥ मृदुकुञ्चितकेशान्तं बालं बालमृगेक्षणम् । मत्तद्विरदविक्रान्तं शालपोतमिवोद्गतम् ॥ २८ ॥ स्मिताभिभाषिणं शान्तं गुरुवाक्यकरं सदा । बाल्येऽप्यतुलकर्माणं प्रियवाक्यममत्सरम् ॥ २९ ॥ महोत्साहं महाबाहुं दीर्घराजीवलोचनम् । भक्तानुकम्पिनं दान्तं न च नीचानुसारिणम् ॥ ३० ॥ कृतज्ञं ज्ञानसम्पन्नं कृतास्त्रमनिवर्तिनम् । युद्धाभिनन्दिनं नित्यं द्विषतां भयवर्धनम् ॥ ३१ ॥ स्वेषां प्रियहिते युक्तं पितॄणां जयगृद्धिनम् । न च पूर्वं प्रहर्तारं संग्रामे नष्टसम्भ्रमम् ॥ ३२ ॥