मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८६- नर्मदा-माहात्म्यका उपक्रम
७६८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वात्मना तपः सेव्यं ब्राह्मणैर्नात्र संशयः।<br>अविमुक्ते वसेद् यस्तु मम तुल्यो भवेन्नरः॥ ३८<br><br>यतो मया न मुक्तं हि त्वविमुक्तं ततः स्मृतम्।<br>अविमुक्तं न सेवन्ते मूढा ये तमसावृताः॥ ३९<br><br>विण्मूत्ररेतसां मध्ये ते वसन्ति पुनः पुनः।<br>कामः क्रोधश्च लोभश्च दम्भः स्तम्भोऽतिमत्सरः॥ ४०<br><br>निद्रा तन्द्रा तथाऽऽलस्यं पैशुन्यमिति ते दश।<br>अविमुक्ते स्थिता विघ्नाः शक्रेण विहिताः स्वयम्॥ ४१<br><br>विनायकोपसर्गाश्च सततं मूर्ध्नि तिष्ठति।<br>पुण्यमेतद् भवेत् सर्वं भक्तानामनुकम्पया॥ ४२<br><br>परं गुह्यमिति ज्ञात्वा ततः शास्त्रानुदर्शनात्।<br>व्याहृतं देवदेवैस्तु मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४३<br><br>मेदसा विप्लुता भूमिरविमुक्ते तु वर्जिता।<br>पूता सम्भवत् सर्वा महादेवेन रक्षिता॥ ४४<br><br>संस्कारस्तेन क्रियते भूमेरन्यत्र सूरिभिः।<br>ये भक्त्या वरदं देवमक्षरं परमं पदम्॥ ४५<br><br>देवदानवगन्धर्वयक्षरक्षोमहोरगाः ।<br>अविमुक्तमुपासन्ते तन्निष्ठास्तत्परायणाः॥ ४६<br><br>ते विशन्ति महादेवमाज्याहुतिरिवानलम्।<br>तं वै प्राप्य महादेवमीश्वराध्युषितं शुभम्॥ ४७<br><br>अविमुक्तं कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमुपलब्धते। | ब्राह्मणोंको यहाँ निःसन्देह सर्वभावसे तपस्यामें तत्पर रहना चाहिये। जो मनुष्य अविमुक्तमें निवास करता है, वह मेरे समान हो जाता है; क्योंकि मैं इस स्थानको कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये यह अविमुक्त नामसे कहा जाता है। जो मोहग्रस्त पुरुष तमोगुणसे आवृत हो अविमुक्तमें निवास नहीं करते, वे मल-मूत्र-वीर्यके मध्यमें पुनः-पुनः निवास करते हैं। (अर्थात् उन्हें बारंबार जन्म लेना पड़ता है)। काम, क्रोध, लोभ, दम्भ, स्तम्भ, अतिशय मात्सर्य, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य तथा पिशुनता—ये दस विघ्न जो स्वयं इन्द्रद्वारा विहित हैं, अविमुक्तमें स्थित रहते हैं। इनके अतिरिक्त विनायकोंके उपद्रव निरन्तर सिरपर सवार रहते हैं, किंतु ये सभी भक्तोंके प्रति भगवान्की अनुकम्पाके कारण पुण्यफल प्रदान करते हैं, क्योंकि श्रेष्ठ देवताओं और तत्त्वद्रष्टा मुनियोंके द्वारा शास्त्रकी आलोचनाके आधारपर इस स्थानको परम गुह्य कहा गया है। (प्राचीनकालमें मधु-कैटभकी) मज्जासे सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त हो गयी थी, किंतु अविमुक्तकी भूमि उससे रहित थी। महादेवजीके द्वारा रक्षित यह सम्पूर्ण भूमि पवित्र ही बनी रही। इसीलिये (कल्पसूत्रोक्त-रीतिसे) मनीषिगण अन्यत्र भूमिका संस्कार करते हैं। जो देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और प्रधान नाग भगवान् भवमें निष्ठा रखते हुए उनकी भक्तिमें तत्पर हो अविमुक्तक्षेत्रमें आकर भक्तिपूर्वक वरप्रदान करनेवाले अविनाशी परमपदस्वरूप शंकरकी उपासना करते हैं, वे महादेवमें उसी प्रकार प्रवेश कर जाते हैं, जैसे घीकी आहुति अग्निमें प्रविष्ट होती है। वे उन महादेवको तथा ईश्वरद्वारा अधिकृत शुभमय अविमुक्तको पाकर अपनेको 'मैं कृतार्थ हूँ'—ऐसा अनुभव करते हैं॥ ३७–४७ १/२ ॥ |
| ऋषिदेवासुरगणैर्जपहोमपरायणैः ॥ ४८<br><br>यतिभिर्मोक्षकामैश्च ह्यविमुक्तं निषेव्यते।<br>नाविमुक्ते मृतः कश्चिन्नरकं याति किल्बिषी॥ ४९<br><br>ईश्वरानुगृहीता हि सर्वे यान्ति परां गतिम्।<br>द्वियोजनमथार्धं च तत् क्षेत्रं पूर्वपश्चिमम्॥ ५० | ऋषि, देव, असुर तथा जप-होमपरायण मुमुक्षु और यतिसमूह इस अविमुक्तमें निवास करते हैं। कोई भी पापी अविमुक्तक्षेत्रमें मरकर नरकमें नहीं जाता; क्योंकि ईश्वरके अनुग्रहसे वे सभी परमगतिको प्राप्त होते हैं। यह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक ढाई योजन और |
* अध्याय १८४ * ७६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अर्धयोजनविस्तीर्णं दक्षिणोत्तरतः स्मृतम्।<br>वाराणसी तदीया च यावच्छुक्लनदी तु वै॥ ५१<br><br>एष क्षेत्रस्य विस्तारः प्रोक्तो देवेन धीमता।<br>लब्ध्वा योगं च मोक्षं च काङ्क्षन्तो ज्ञानमुत्तमम्॥ ५२<br><br>अविमुक्तं न मुञ्चन्ति तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>तस्मिन् वसन्ति ये मर्त्या न ते शोच्याः कदाचन॥ ५३<br><br>योगक्षेत्रं तपःक्षेत्रं सिद्धगन्धर्वसेवितम्।<br>सरितः सागराः शैला नाविमुक्तसमा भुवि॥ ५४<br><br>भूर्लोके चान्तरिक्षे च दिवि तीर्थानि यानि च।<br>अतीत्य वर्तते चान्यदविमुक्तं प्रभावतः॥ ५५<br><br>ये तु ध्यानं समासाद्य मुक्तात्मानः समाहिताः।<br>संनियम्येन्द्रियग्रामं जपन्ति शतरुद्रियम्॥ ५६<br><br>अविमुक्ते स्थिता नित्यं कृतार्थास्ते द्विजातयः।<br>भवभक्तिं समासाद्य रमन्ते तु सुनिश्चितम्॥ ५७<br><br>संहृत्य शक्तितः कामान् विषयेभ्यो बहिः स्थिताः।<br>शक्तितः सर्वतो मुक्ताः शक्तितस्तपसि स्थिताः॥ ५८<br><br>करणानीह चात्मानमपुनर्भवभाविताः।<br>तं वै प्राप्य महात्मानमीश्वरं निर्भयाः स्थिताः॥ ५९<br><br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।<br>अविमुक्ते तु गृह्यन्ते भवेन विभुना स्वयम्॥ ६० | दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। यह शिवपुरी वाराणसी शुक्लनदीतक बसी हुई है। बुद्धिमान् महादेवने इस क्षेत्रका यह विस्तार स्वयं बतलाया है। शिवमें निष्ठावान् और शिवपरायण भक्तगण योग और मोक्षको प्राप्तकर उत्तम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अविमुक्तक्षेत्रका परित्याग नहीं करते। जो मृत्युलोकवासी व्यक्ति इस क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे कभी भी शोचनीय नहीं होते। यह अविमुक्तक्षेत्र योगक्षेत्र है, तपःक्षेत्र है तथा सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित है। भूतलपर नदी, सागर और पर्वत—कोई भी अविमुक्तके समान नहीं है। भूलोक, अन्तरिक्ष और स्वर्गमें जितने तीर्थ हैं, उनका अविमुक्त अपने प्रभावसे अतिक्रमण कर विराजमान है। अविमुक्तमें नित्य निवास करनेवाले जो द्विजगण ध्यानयोगकी प्राप्तिसे मुक्तात्मा हो समाहित चित्तसे इन्द्रियोंको निरुद्धकर शतरुद्रीका जप करते हैं, वे कृतार्थ हो जाते हैं और भवकी भक्तिको प्राप्त कर निश्चितरूपसे रमण करते हैं। जो यथाशक्ति कामनाओंका परित्याग कर विषयवासनासे रहित, यथाशक्ति सब तरहसे मुक्त, यथाशक्ति तपस्यामें स्थित तथा अपनी इन्द्रियों और आत्माको वशमें कर चुके हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। वे उन महात्मा शिवको प्राप्तकर निर्भय विचरण करते हैं। सर्वव्यापी शिव अविमुक्तमें उन व्यक्तियोंको स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, अतः सैकड़ों कोटि कल्पोंमें भी उनका पुनरागमन नहीं होता है॥४८-६०॥ |
| उत्पादितं महाक्षेत्रं सिद्ध्यन्ते यत्र मानवाः।<br>उद्देशमात्रं कथिता अविमुक्तगुणास्तथा॥ ६१<br><br>समुद्रस्येव रत्नानामविमुक्तस्य विस्तरम्।<br>मोहनं तदभक्तानां भक्तानां भक्तिवर्धनम्॥ ६२<br><br>मूढास्ते तु न पश्यन्ति श्मशानमिति मोहिताः।<br>हन्यमानोऽपि यो विद्वान् वसेद् विघ्नशतैरपि॥ ६३<br><br>स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति।<br>जन्ममृत्युजरामुक्तः परं याति शिवालयम्॥ ६४<br><br>अपुनर्मरणानां हि सा गतिर्मोक्षकाङ्क्षिणाम्।<br>यां प्राप्य कृतकृत्यः स्यादिति मन्येत पण्डितः॥ ६५<br><br>न दानैर्न तपोभिर्वा न यज्ञैर्नापि विद्यया।<br>प्राप्यते गतिरिष्टा या ह्यविमुक्ते तु लभ्यते॥ ६६ | इस महाक्षेत्रको (स्वयं भगवान् शिवने) उत्पन्न किया है, जहाँ मानवोंको सभी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मैंने अविमुक्तके गुणोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। अविमुक्तक्षेत्रका विस्तार समुद्रके रत्नोंकी भाँति दुष्कर है। यह अभक्तोंको मोहित करनेवाला और भक्तोंकी भक्तिकी वृद्धि करनेवाला है। मोहग्रस्त मूढ व्यक्ति इसे श्मशान समझकर इसकी ओर नहीं देखते। जो विद्वान् सैकड़ों विघ्नोंसे बाधित होकर भी अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करता है, वह उस परमपदको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता। वह जन्म-जरा-मरणसे रहित होकर शिवलोकको प्राप्त हो जाता है। मोक्षकी कामना करनेवाले पुनर्जन्मसे रहित व्यक्तियोंको जो गति प्राप्त होती है, उसी गतिको प्राप्तकर विद्वान् अपनेको कृतकृत्य मानता है। जो अभीष्ट गति दान, तप, यज्ञ और ज्ञानसे नहीं प्राप्त होती, वह अविमुक्तक्षेत्रमें सुलभ हो जाती है। |
७७० * मत्स्यपुराण *
| नानावर्णा विवर्णाश्च चण्डाला ये जुगुप्सिताः।<br>किल्बिषैः पूर्णदेहाश्च प्रकृष्टैः पातकैस्तथा॥ ६७<br>भेषजं परमं तेषामविमुक्तं विदुर्बुधाः।<br>जात्यन्तरसहस्रेषु ह्यविमुक्ते म्रियेत् तु यः॥ ६८<br>भक्तो विश्वेश्वरे देवे न स भूयोऽभिजायते।<br>यत्र चेष्टं हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्॥ ६९<br>सर्वमक्षयमेतस्मिन्नविमुक्ते न संशयः।<br>कालेनोपरता यान्ति भवे सायुज्यमक्षयम्॥ ७०<br>कृत्वा पापसहस्राणि पश्चात् संतापमेत्य वै।<br>योऽविमुक्ते वियुज्येत स याति परमां गतिम्॥ ७१<br>उत्तरं दक्षिणं चापि अयनं न विकल्पयेत्।<br>सर्वस्तेषां शुभः कालो ह्यविमुक्ते म्रियन्ति ये॥ ७२<br>न तत्र कालो मीमांस्यः शुभो वा यदि वाशुभः।<br>तस्य देवस्य माहात्म्यात् स्थानमद्भुतकर्मणः।<br>सर्वेषामेव नाथस्य सर्वेषां विभुना स्वयम्॥ ७३<br>श्रुत्वेदमृषयः सर्वे स्कन्देन कथितं पुरा।<br>अविमुक्ताश्रमं पुण्यं भावयेत्करणैः शुभैः॥ ७४ | जो चाण्डालयोनिमें उत्पन्न, अनेकों रंगोंवाले, कुरूप और निन्दित हैं, जिनका शरीर उत्कृष्ट पातकों एवं पापोंसे परिपूर्ण है, उनके लिये अविमुक्तक्षेत्र परम औषधके समान है—ऐसा पण्डितवर्ग मानते हैं। जो भगवान् विश्वेश्वरका भक्त हजारों जन्मोंके बाद अविमुक्तमें मृत्युको प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इस अविमुक्तक्षेत्रमें किया हुआ यज्ञ, दान, तप, होम आदि सभी कर्म अक्षय हो जाते हैं—इसमें संदेह नहीं है। ऐसे लोग समयानुसार मृत्युको प्राप्तकर अविनाशी शिवसायुज्यको प्राप्त करते हैं। जो हजारों पापोंका सम्पादन कर बादमें पश्चात्तापका अनुभव करता है, वह अविमुक्तक्षेत्रमें प्राणोंका त्याग करके परमगतिको प्राप्त होता है। इस विषयमें उत्तरायण एवं दक्षिणायनकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। जो अविमुक्तमें प्राण-त्याग करते हैं, उनके लिये सभी समय शुभ है। उस समय शुभ या अशुभ कालका विचार नहीं करना चाहिये। सभीके नाथ, सर्वव्यापी, अद्भुतकर्मा स्वयं महादेवके माहात्म्यसे यह स्थान परम अद्भुत है। पूर्व समयमें सभी ऋषियोंने स्कन्दद्वारा कथित इस पवित्र वृत्तान्तको सुनकर यह निर्णय किया कि इस अविमुक्तक्षेत्रका विशुद्ध इन्द्रियोंद्वारा सेवन करना चाहिये॥ ६७—७४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्यं नाम चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्तमाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१८४॥
एक सौ पचासीवाँ अध्याय
वाराणसी-माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| अविमुक्ते महापुण्ये चास्तिकाः शुभदर्शनाः।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्हर्षगद्गदनिःस्वनाः॥ १ | ऋषियो! अतिशय पुण्यमय अविमुक्तक्षेत्रमें आस्तिक, शुभ दर्शनवाले एवं हर्षगद्गद वाणीसे युक्त उन ऋषियोंको (इस आश्चर्यजनक आख्यानको सुनकर) महान् आश्चर्य हुआ। तब उन्होंने प्रसन्नचित्त |
| ऊचुस्ते हृष्टमनसः स्कन्दं ब्रह्मविदां वरम्।<br>ब्रह्मण्यो देवपुत्रस्त्वं ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः॥ २ | होकर ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ स्कन्दजीसे कहा—भगवन्! आप ब्राह्मण-भक्त, महादेवजीके पुत्र, ब्राह्मण, ब्राह्मणोंके प्रिय, |
| * अध्याय १८५ * | ७७१ |
|---|
| ब्रह्मिष्ठो ब्रह्मविद् ब्रह्मा ब्रह्मेन्द्रो ब्रह्मलोककृत्।<br>ब्रह्मकृद् ब्रह्मचारी त्वं ब्रह्मादिर्ब्रह्मवत्सलः॥ ३<br>ब्रह्मतुल्योद्भवकरो ब्रह्मतुल्यो नमोऽस्तु ते।<br>ऋषयो भावितात्मानः श्रुत्वेदं पावनं महत्॥ ४<br><br>तत्त्वं तु परमं ज्ञातं यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामो भूर्लोकं शङ्करालयम्॥ ५<br><br>यत्रासौ सर्वभूतात्मा स्थाणुभूतः स्थितः प्रभुः।<br>सर्वलोकहितार्थाय तपस्युग्रे व्यवस्थितः॥ ६<br><br>संयोज्य योगेनात्मानं रौद्रीं तनुमुपाश्रितः।<br>गुह्यकैरात्मभूतस्तु आत्मतुल्यगुणैर्वृतः॥ ७ | ब्रह्ममें स्थित, ब्रह्मज्ञ, स्वयं ब्रह्मस्वरूप, ब्रह्मेन्द्र, ब्रह्मलोककर्ता, ब्रह्मकृत्, ब्रह्मचारी, ब्रह्मासे भी पुरातन, ब्रह्मवत्सल, ब्रह्माके समान सृष्टिकर्ता और ब्रह्मतुल्य हैं, आपको नमस्कार है। इस अतिशय पवित्र कथाको सुनकर हम ऋषिगण कृतार्थ हुए। हमने उस परम तत्त्वको जान लिया, जिसे जानकर अमरत्व (मोक्ष)-की प्राप्ति होती है। आपका कल्याण हो, अब हमलोग पृथ्वीलोकमें शिवजीके उस निवासस्थानपर जा रहे हैं, जहाँ सभी जीवोंके आत्मस्वरूप सामर्थ्यशाली शिव स्थाणुरूपमें स्थित हैं। वे वहाँ सभी प्राणियोंके कल्याणकी कामनासे उग्र तपस्यामें संलग्न हैं। वे अपनेको योगयुक्त कर रुद्रभावापन्न शरीरका आश्रयण किये हुए हैं और अपने समान गुणोंसे युक्त आत्मभूत गुह्यकोंसे घिरे हुए विराजमान हैं॥ १—७॥ |
| ततो ब्रह्मादिभिर्देवैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः।<br>विज्ञप्तः परया भक्त्या त्वत्प्रसादाद् गणेश्वर॥ ८<br><br>वस्तुमिच्छाम नियतमविमुक्ते सुनिश्चिताः।<br>एवंगुणे तथा मर्त्या ह्यविमुक्ते वसन्ति ये॥ ९<br><br>धर्मशीला जितक्रोधा निर्ममा नियतेन्द्रियाः।<br>ध्यानयोगपराः सिद्धिं गच्छन्ति परमाव्ययाम्॥ १०<br><br>योगिनो योगसिद्धाश्च योगमोक्षप्रदं विभुम्।<br>उपासते भक्तियुक्ता गुह्यं देवं सनातनम्॥ ११<br><br>अविमुक्तं समासाद्य प्राप्तयोगान्महेश्वरात्।<br>सप्त ब्रह्मर्षयो नीता भवसायुज्यमागताः॥ १२<br><br>एतत्तु परमं क्षेत्रमविमुक्तं विदुर्बुधाः।<br>अप्रबुद्धा न पश्यन्ति भवमायाविमोहिताः॥ १३<br><br>तेनैव चाभ्यनुज्ञातास्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>अविमुक्ते तनुं त्यक्त्वा शान्ता योगगतिं गताः॥ १४ | गणेश्वर! अब हमलोग ब्रह्मादि देवों, महर्षियों और सिद्धोंसे आज्ञा लेकर परम भक्तिपूर्वक आपकी कृपासे अविमुक्तक्षेत्रमें नियमपूर्वक सुनिश्चितरूपसे निवास करना चाहते हैं। पूर्वकथित गुणोंसे सम्पन्न इस अविमुक्तमें जो धर्मशील, क्रोधजयी, आसक्तिरहित, जितेन्द्रिय और ध्यानयोगपरायण मनुष्य निवास करते हैं, वे अविनाशिनी परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं। योगसिद्ध योगिगण भक्तिपूर्वक योग और मोक्षको देनेवाले, सर्वव्यापी, सनातन एवं गुह्य महादेवकी उपासना करते हैं। सात ब्रह्मर्षियोंने अविमुक्त-क्षेत्रमें आकर महेश्वरकी कृपासे योगको प्राप्तकर भवसायुज्यको प्राप्त किया है। ज्ञानिगण इस अविमुक्तको परम क्षेत्र मानते हैं, किंतु भवकी मायासे विमोहित अज्ञानीलोग इसे नहीं जानते। शिवनिष्ठ एवं शिवभक्तिपरायण ऋषिगण शिवजीकी आज्ञासे अविमुक्तमें शरीरका त्यागकर शान्तिपूर्वक योगकी गतिको प्राप्त हो गये॥ ८—१४॥ |
| स्थानं गुह्यं श्मशानानां सर्वेषामेतदुच्यते।<br>न हि योगादृते मोक्षः प्राप्यते भुवि मानवैः॥ १५<br><br>अविमुक्ते निवसतां योगो मोक्षश्च सिद्ध्यति।<br><br>एक एव प्रभावोऽस्ति क्षेत्रस्य परमेश्वरि।<br>अनेन जन्मनैवेह प्राप्यते गतिरुत्तमा॥ १६ | सभी श्मशानोंमें यह अविमुक्त गुह्य स्थान कहा गया है। मनुष्य संसारमें योगके बिना मोक्षको नहीं प्राप्त कर सकते, किंतु अविमुक्तमें निवास करनेवालोंके लिये योग और मोक्ष—दोनों ही सिद्ध हो जाते हैं। परमेश्वरि! इस अविमुक्तक्षेत्रका एक ही प्रभाव है कि इसी जन्ममें और यहीं उत्तम गतिको प्राप्त किया जा सकता है। |
१८७- नर्मदा-माहात्म्यके प्रसङ्गमें पुनः त्रिपुराख्यान
| ७७२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अविमुक्ते निवसता व्यासेनामिततेजसा।<br>नैव लब्धा क्वचिद् भिक्षा भ्रममाणेन यत्नतः॥ १७<br>क्षुधाविष्टस्ततः क्रुद्धोऽचिन्तयच्छापमुत्तमम्।<br>दिनं दिनं प्रति व्यासः षण्मासं योऽवतिष्ठति॥ १८<br>कथं ममेदं नगरं भिक्षादोषाब्द्वतं त्विदम्।<br>विप्रो वा क्षत्रियो वापि ब्राह्मणी विधवापि वा॥ १९<br>संस्कृतासंस्कृता वापि परिपक्वाः कथं नु मे।<br>न प्रयच्छन्ति वै लोका ब्राह्मणाश्चर्यकारकम्॥ २०<br>एषां शापं प्रदास्यामि तीर्थस्य नगरस्य तु।<br>तीर्थं चातीर्थतां यातु नगरं शापयाम्यहम्॥ २१<br>मा भूत्त्रिपौरुषी विद्या मा भूत्त्रिपौरुषं धनम्।<br>मा भूत्त्रिपुरुषं सख्यं व्यासो वाराणसीं शपन्॥ २२<br>अविमुक्ते निवस्तां जनानां पुण्यकर्मणाम्।<br>विघ्नं सृजामि सर्वेषां येन सिद्धिर्न विद्यते॥ २३<br>व्यासचित्तं तदा ज्ञात्वा देवदेव उमापतिः।<br>भीतभीतस्तदा गौरीं तां प्रियां पर्यभाषत॥ २४<br>शृणु देवि वचो मह्यं यादृशं प्रत्युपस्थितम्।<br>कृष्णद्वैपायनः कोपाच्छापं दातुं समुद्यतः॥ २५ | किसी समय असीम प्रतापी व्यास अविमुक्तमें निवास करते हुए प्रयत्नपूर्वक घूमते रहनेपर भी कहीं भी भिक्षा नहीं पा सके। तब वे भूखसे पीड़ित होकर क्रोधपूर्वक भयंकर शाप देनेका विचार करने लगे। इस प्रकार एक-एक दिन करते व्यासके छः मास बीत गये, (तब वे सोचने लगे कि) क्या कारण है कि इस नगरमें मुझे भिक्षा नहीं मिल रही है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, ब्राह्मणी, विधवा, संस्कृता या असंस्कृता, वृद्धा कोई भी नारी या कोई भी प्राणी और ब्राह्मण मुझे भिक्षा नहीं दे रहा है—आश्चर्य है! अतः मैं यहाँके निवासी, तीर्थ और नगर—सभीको ऐसा शाप दे रहा हूँ कि यह तीर्थ अतीर्थ हो जाय। अब मैं नगरको शाप दे रहा हूँ—यहाँ तीन पीढ़ी तक लोगोंकी विद्या नहीं रहेगी, तीन पीढ़ी तक धन नहीं रहेगा और तीन पीढ़ी तक मित्रता स्थिर नहीं रहेगी। अविमुक्तमें निवास करनेवाले सभी मनुष्योंके पुण्यकर्मोंमें विघ्न उत्पन्न हो जायगा, जिससे उन्हें सिद्धि नहीं मिल सकेगी। उस समय देवदेव उमापति व्यासके हृदयको जानकर भयभीत हो गये। तब वे अपनी प्रिया गौरीसे बोले—‘देवि! इस नगरमें जैसी घटना घटित होनेवाली है, वह कह रहा हूँ, मेरी बात सुनो। श्रीकृष्णद्वैपायन क्रोधवश शाप देनेके लिये उद्यत हो गये हैं’॥ १७-२५॥ |
| देव्युवाच<br>किमर्थं शपते क्रुद्धो व्यासः केन प्रकोपितः।<br>किं कृतं भगवंस्तस्य येन शापं प्रयच्छति॥ २६ | देवीने पूछा— भगवन्! व्यासजी क्रुद्ध होकर शाप देनेके लिये क्यों उद्यत हैं? वे किसके द्वारा क्रुद्ध किये गये हैं? उनका क्या अप्रिय कर दिया गया, जिससे वे शाप दे रहे हैं?॥ २६॥ |
| देवदेव उवाच<br>अनेन सुतप्तस्तपं बहून वर्षगणान् प्रिये।<br>मौनिना ध्यानयुक्तेन द्वादशाब्दान् वरानने॥ २७<br>ततः क्षुधा सुसंजाता भिक्षामटितुमागतः।<br>नैवास्य केनचिद् भिक्षा ग्रासार्धमपि भामिनि॥ २८<br>एवं भगवतः काल आसीत् षाण्मासिको मुनेः।<br>ततः क्रोधापरीतात्मा शापं दास्यति सोऽधुना॥ २९<br>यावन्नैष शपेत्तावदुपायस्तत्र चिन्त्यताम्।<br>कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रिये॥ ३०<br>कोऽस्य शापान्न बिभेति ह्यपि साक्षात् पितामहः।<br>अदैवं दैवतं कुर्याद् दैवं चाप्यपदैवतम्॥ ३१ | देवाधिदेव महादेवने कहा— प्रिये! व्यासजीने अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या की है। वरानने! ये मौन धारणकर ध्यानपरायण हो बारह वर्षोंतक तपस्यामें लीन रहे। तदनन्तर भूख लगनेपर ये भिक्षा माँगनेके लिये यहाँ आये हैं। किंतु भामिनि! किसीने इन्हें आधा ग्रास भी भिक्षा नहीं दी। इस प्रकार भगवान् व्यासमुनिके छः महीने बीत गये। इसी कारण इस समय ये क्रोधसे अभिभूत होकर शाप देनेको उद्यत हो गये हैं। प्रिये! कृष्णद्वैपायन व्यासको साक्षात् नारायण समझो, अतः जबतक ये शाप नहीं दे देते, तभीतक इस विषयमें कोई उपाय सोच लो। कौन है, जो इनके शापसे नहीं डरता, चाहे वह साक्षात् ब्रह्मा ही क्यों न हो! ये मनुष्यको देवता और देवताको मनुष्य |
* अध्याय १८५ * ७७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आवां तु मानुषौ भूत्वा गृहस्थाविहवासिनौ।<br>तस्य तृप्तिकरीं भिक्षां प्रयच्छावो वरानने॥ ३२ | कर सकते हैं। वरानने! हम दोनों मनुष्य होकर यहाँ गृहस्थाश्रममें निवास कर रहे हैं, अतः उन्हें संतुष्ट करनेवाली भिक्षा समर्पित करें॥ २७—३२॥ |
| एवमुक्ता ततो देवी देवेन शम्भुना तदा।<br>व्यासस्य दर्शनं दत्त्वा कृत्वा वेषं तु मानुषम्॥ ३३<br><br>एह्येहि भगवन् साधो भिक्षां गृहाण सत्तम।<br>अस्मद् गृहे कदाचित् त्वं नागतोऽसि महामुने॥ ३४<br><br>एतच्छ्रुत्वा प्रीतमना भिक्षां ग्रहीतुमागतः।<br>भिक्षां दत्त्वा तु व्यासाय षड्रसाममृतोपमाम्॥ ३५<br><br>अनास्वादितपूर्वा सा भक्षिता मुनिना तदा।<br>भिक्षां व्यासस्ततो भुक्त्वा चिन्तयन् हृष्टमानसः॥ ३६<br><br>ववन्दे वरदं देवं देवीं च गिरिजां तदा।<br>व्यासः कमलपत्राक्ष इदं वचनमब्रवीत्॥ ३७<br><br>देवो देवी नदी गङ्गा मिष्टमन्नं शुभा गतिः।<br>वाराणस्यां विशालाक्षि वासः कस्य न रोचते॥ ३८<br><br>एवमुक्त्वा ततो व्यासो नगरीमवलोकयन्।<br>चिन्तयानस्ततो भिक्षां हृदयानन्दकारिणीम्॥ ३९<br><br>अपश्यत् पुरतो देवं देवीं च गिरिजां तदा।<br>गृहाङ्गणस्थितं व्यासं देवदेवोऽब्रवीदिदम्॥ ४०<br><br>इह क्षेत्रे न वस्तव्यं क्रोधनस्त्वं महामुने।<br>एवं विस्मयमापन्नो देवं व्यासोऽब्रवीद् वचः॥ ४१ | तब महादेव शिवद्वारा इस प्रकार कही जानेपर देवीने मनुष्यका वेश धारण कर व्यासको दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—'ऐश्वर्यशाली श्रेष्ठ साधो! आइये, आइये, भिक्षा ग्रहण कीजिये। महामुने! सम्भवतः आपने मेरे घरपर कभी आनेकी कृपा नहीं की है।' यह सुनकर व्यासजी प्रसन्नचित्त हो भिक्षा ग्रहण करनेके लिये आये। तब देवीने व्यासजीको छः रसोंसे समन्वित अमृतके समान भिक्षा प्रदान की। मुनिने पहले वैसी न खायी हुई भिक्षाको खाया। तत्पश्चात् भिक्षाको खाकर प्रसन्नचित्त हुए व्यासजी कुछ विचार करने लगे। तदुपरान्त कमलदलनेत्र व्यासजीने वरदाता शिव और देवी पार्वतीकी वन्दना की और इस प्रकार कहा—'विशाल नेत्रोंवाली देवि! वाराणसीमें महादेव, पार्वतीदेवी, गङ्गा नदी, स्वादिष्ट भोजन और शुभगति—सभी सुलभ हैं, फिर यहाँका निवास किसे अच्छा नहीं लगेगा!' ऐसा कहकर व्यासजी हृदयको आनन्द देनेवाली भिक्षाको सोचते हुए, नगरीका अवलोकन करते हुए घूमने लगे। तदनन्तर उन्होंने महादेव और देवी पार्वतीको अपने समक्ष उपस्थित देखा। तब देवाधिदेव महादेवने घरके आँगनमें अवस्थित व्याससे यह कहा—'महामुने! आप अतिशय क्रोधी स्वभावके हैं, अतः आपको इस क्षेत्रमें निवास नहीं करना चाहिये।' यह सुनकर व्यासजी आश्चर्यचकित हो गये और महादेवजीसे इस प्रकार बोले॥ ३३—४१॥ |
| व्यास उवाच<br><br>चतुर्दश्यामथाष्टम्यां प्रवेशं दातुमर्हसि।<br>एवमस्त्वित्यनुज्ञाय तत्रैवान्तरधीयत॥ ४२<br><br>न तद् गृहं न सा देवी न देवो ज्ञायते क्वचित्।<br>एवं त्रैलोक्यविख्यातः पुरा व्यासो महातपाः॥ ४३<br><br>ज्ञात्वा क्षेत्रगुणान् सर्वान् स्थितस्तस्यैव पार्श्वतः।<br>एवं व्यासं स्थितं ज्ञात्वा क्षेत्रं शंसन्ति पण्डिताः॥ ४४ | व्यासजीने कहा—भगवन्! चतुर्दशी और अष्टमीको मुझे यहाँ निवास करनेकी अनुमति दीजिये। अच्छा, 'ऐसा ही हो' यों अनुमति देकर शिवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। फिर तो वहाँ न कहीं कोई घर था, न वह देवी थीं और न महादेव ही थे। वे कहाँ चले गये, कुछ भी समझमें न आया। प्राचीनकालमें इस प्रकार तीनों लोकोंमें विख्यात महातपस्वी व्यास इस क्षेत्रके सभी गुणोंको जानकर उसीके पास (गङ्गाजीके पूर्वतटपर दक्षिणकी ओर) निवास करने लगे। इस प्रकार व्यासको वहाँ स्थित जानकर पण्डितगण इस क्षेत्रकी प्रशंसा करते हैं॥ ४२—४४॥ |
| ७७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अविमुक्तगुणानां तु कः समर्थो वदिष्यति।<br>देवब्राह्मणविद्विष्टा देवभक्तिविडम्बकाः ॥ ४५<br>ब्रह्मघ्नाश्च कृतघ्नाश्च तथा निष्कृतिकाश्च ये।<br>लोकद्विषो गुरुद्विषस्तीर्थायतनदूषकाः ॥ ४६<br>सदा पापरताश्चैव ये चान्ये कुत्सिता भुवि।<br>तेषां नास्तीति वासो वै स्थितोऽसौ दण्डनायकः॥ ४७<br>रक्षणार्थं नियुक्तं वै दण्डनायकमूत्तमम्।<br>पूजयित्वा यथाशक्त्या गन्धपुष्पादिधूपकैः ॥ ४८<br>नमस्कारं ततः कृत्वा नायकस्य तु मन्त्रवित्।<br>सर्ववर्णावृते क्षेत्रे नानाविधसरीसृपे ॥ ४९<br>ईश्वरानुगृहीता हि गतिं गाणेश्वरीं गताः।<br>नानारूपधरा दिव्या नानावेशधरास्तथा ॥ ५०<br>सुरा वै ये तु सर्वे च तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>यदिच्छन्ति परं स्थानमक्षयं तदवाप्नुयुः ॥ ५१<br>परं पुरं दैवपुराद् विशिष्यते<br>तदुत्तरं ब्रह्मपुरात् पुरः स्थितम्।<br>तपोबलादीश्वरयोगनिर्मितं<br>न तत्समं ब्रह्मदिवौकसालयम्।<br>मनोरमं कामगमं ह्यनामय-<br>मतीत्य तेजांसि तपांसि योगवत् ॥ ५२<br>अधिष्ठितस्तु तत्स्थाने देवदेवो विराजते।<br>तपांसि यानि तप्यन्ते व्रतानि नियमाश्च ये॥ ५३<br>सर्वतीर्थाभिषेकं तु सर्वदानफलानि च।<br>सर्वयज्ञेषु यत् पुण्यमविमुक्ते तदाप्नुयात् ॥ ५४<br>अतीतं वर्तमानं च यज्ज्ञानाज्ञानतोऽपि वा।<br>सर्वं तस्य च यत्पापं क्षेत्रं दृष्ट्वा विनश्यति ॥ ५५ | अविमुक्तक्षेत्रके सभी गुणोंका वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ? देवता और ब्राह्मणसे विद्वेष करनेवाले, देवभक्तिकी विडम्बना करनेवाले, ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले, किये हुए उपकारको न माननेवाले, निष्कृष्ट-अकर्मण्य, लोकद्वेषी, गुरुद्वेषी, तीर्थस्थानोंको दूषित करनेवाले, सदा पापमें रत तथा इनके अतिरिक्त जो निषिद्ध कर्मोंके आचरण करनेवाले हैं—उन सबके लिये यहाँ स्थान नहीं है; क्योंकि यहाँ दण्डनायक अवस्थित हैं। यहाँ श्रेष्ठ दण्डनायकको इसकी रक्षाके लिये नियुक्त किया गया है। सभी वर्णाश्रमियों तथा अनेक प्रकारके जन्तुओंसे भरे हुए इस क्षेत्रमें नायकके परामर्शसे यथाशक्ति गन्ध, पुष्प, धूप आदिसे पूजन करनेके पश्चात् उन्हें नमस्कार करके ईश्वरके अनुग्रहसे बहुत-से लोग गणेश्वरकी गतिको प्राप्त हो गये हैं। अनेकों वेष और विभिन्न रूप धारण करनेवाले सभी दिव्य देव, शिवमें श्रद्धासम्पन्न एवं शिवभक्ति-परायण हो जिस अक्षय श्रेष्ठ स्थानकी कामना करते हैं, वह उन्हें प्राप्त हो जाता है। यह श्रेष्ठ नगर अमरावतीसे भी विशिष्ट है। इस अविमुक्तनगरका उत्तरी भाग ब्रह्मलोकसे भी अधिक प्रतिष्ठित है। यह शिवजीके तपोबल और उनकी योगमहिमासे निर्मित है, अतः इसके समान ब्रह्मलोक तथा स्वर्ग भी नहीं है। यह मनोरम, अभिलाषाको पूर्ण करनेवाला, रोगरहित, तेज और तपस्यासे परे तथा योगयुक्त है। इस अविमुक्तक्षेत्रमें देवाधिदेव शंकर सदा विराजमान रहते हैं। जो लोग सभी प्रकारके तप, व्रत, नियम, सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, सभी प्रकारके दान और सभी प्रकारके यज्ञानुष्ठानसे जो पुण्य प्राप्त करते हैं, वह अविमुक्तनगरमें प्राप्त हो जाता है। अतीत या वर्तमानमें ज्ञानसे या अज्ञानसे किये गये उनके सभी पाप क्षेत्रके दर्शनमात्रसे विनष्ट हो जाते हैं॥ ४५—५५॥ |
| शान्तैर्दान्तैस्तपस्तप्तं यत्किञ्चिद् धर्मसंज्ञितम्।<br>सर्वं च तदवाप्नोति अविमुक्ते जितेन्द्रियः ॥ ५६<br><br>अविमुक्तं समासाद्य लिङ्गमर्चयते नरः।<br>कल्पकोटिशतैश्चापि नास्ति तस्य पुनर्भवः ॥ ५७<br><br>अमरा ह्यक्षयाश्चैव क्रीडन्ति भवसंनिधौ।<br>क्षेत्रतीर्थोपनिषदमविमुक्तं न संशयः ॥ ५८<br><br>अविमुक्ते महादेवमर्चयन्ति स्तुवन्ति वै।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते तिष्ठन्त्यजरामराः ॥ ५९ | अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर शान्तचित्तसे की गयी तपस्यासे एवं विहित कर्मोंके आचरणसे जो फल मिलते हैं, वह सब अविमुक्तनगरमें जितेन्द्रियको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य अविमुक्तनगरमें आकर शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उसका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसे लोग अमर और अविनश्वर रूपमें शिवके समीप क्रीड़ा करते हैं। यह अविमुक्तनगर अन्य स्थानों और तीर्थोंका प्रकाश-संवित्स्वरूप है—इसमें संदेह नहीं है। जो अविमुक्तनगरमें महादेवकी पूजा और स्तुति करते हैं, वे सभी पापोंसे विनिर्मुक्त होकर अजर-अमर हो जाते |
- अध्याय १८५ * ७७५
| सर्वकामाश्च ये यज्ञाः पुनरावृत्तिकाः स्मृताः।<br>अविमुक्ते मृता ये च सर्वे ते ह्यनिवर्तकाः॥ ६०<br>ग्रहनक्षत्रताराणां कालेन पतनाद् भयम्।<br>अविमुक्ते मृतानां तु पतनं नैव विद्यते॥ ६१<br>कल्पकोटिसहस्रैस्तु कल्पकोटिशतैरपि।<br>न तेषां पुनरावृत्तिर्मृता ये क्षेत्र उत्तमे॥ ६२<br>संसारसागरे घोरे भ्रमन्तः कालपर्ययात्।<br>अविमुक्तं समासाद्य गच्छन्ति परमां गतिम्॥ ६३ | हैं। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले जो यज्ञ हैं, वे सभी पुनर्जन्म प्रदान करनेवाले हैं; किंतु जो अविमुक्तनगरमें शरीरका त्याग करते हैं, उनका संसारमें पुनः आगमन नहीं होता। ग्रह, नक्षत्र और तारागणोंको समयानुसार पतनका भय बना रहता है, किंतु अविमुक्तमें मरनेवालोंका पतन कभी नहीं होता। जो इस उत्तम क्षेत्रमें मरते हैं, उनका सैकड़ों-करोड़ों कल्पोंमें क्या हजारों-करोड़ कल्पोंमें भी पुनरागमन नहीं होता। जो कालक्रमानुसार संसार-सागरमें भ्रमण करते हुए अविमुक्तनगरमें आ जाते हैं, वे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं॥ ५६—६३॥ | | ज्ञात्वा कलियुगं घोरं हाहाभूतमचेतनम्।<br>अविमुक्तं न मुञ्चन्ति कृतार्थास्ते नरा भुवि॥ ६४<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्तु यदि गच्छेत् ततः पुनः।<br>तदा हसन्ति भूतानि अन्योन्यं करताडनैः॥ ६५<br>कामक्रोधेन लोभेन ग्रस्ता ये भुवि मानवाः।<br>निष्क्रमन्ते नरा देवि दण्डनायकमोहिताः॥ ६६<br>जपध्यानविहीनानां ज्ञानवर्जितचेतसाम्।<br>ततो दुःखहतानां च गतिर्वाराणसी नृणाम्॥ ६७<br>तीर्थानां पञ्चकं सारं विश्वेशानन्दकानने।<br>दशाश्वमेधं लोलार्कः केशवो बिन्दुमाधवः॥ ६८<br>पञ्चमी तु महाश्रेष्ठा प्रोच्यते मणिकर्णिका।<br>एभिस्तु तीर्थवर्यैश्च वर्ण्यते ह्यविमुक्तकम्॥ ६९<br>एक एव प्रभावोऽस्ति क्षेत्रस्य परमेश्वरि।<br>एकेन जन्मना देवि मोक्षं पश्यन्त्यनुत्तमम्॥ ७०<br>एतद् वै कथितं सर्वं देव्यै देवेन भाषितम्।<br>अविमुक्तस्य क्षेत्रस्य तत् सर्वं कथितं द्विजाः॥ ७१ | जो मनुष्य हाहाकारमय एवं ज्ञानरहित भयंकर कलियुगको जानकर अविमुक्तका परित्याग नहीं करते, वे ही इस भूतलपर कृतार्थ हैं। जो अविमुक्तनगरमें जाकर यदि यहाँसे चला जाता है तो सभी प्राणी ताली बजाकर उसकी हँसी उड़ाते हैं। देवि! जो मानव भूतलपर क्रोध और लोभसे ग्रस्त हैं, वे ही दण्डनायककी मायासे मोहित होकर इस नगरसे चले जाते हैं। जो मनुष्य जप-ध्यानसे रहित, ज्ञानशून्य और दुःखसे संतप्त हैं, उनकी गति वाराणसी है। विश्वेश्वरके इस आनन्द-काननमें दशाश्वमेध, लोलार्क, केशव, बिन्दुमाधव और पाँचवीं जो परमश्रेष्ठ मणिकर्णिका कही गयी है—ये पाँचों तीर्थोंके सार कहे गये हैं। इन्हीं श्रेष्ठ तीर्थोंसे अविमुक्तकी प्रशंसा होती है। परमेश्वरी देवि! इस क्षेत्रकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही जन्ममें मनुष्य परमश्रेष्ठ मोक्षको प्राप्त कर लेता है। द्विजगण! अविमुक्तक्षेत्रके विषयमें महादेवजीने पार्वतीसे जो बात कही थी, वह सभी मैंने आप लोगोंसे वर्णन कर दिया॥ ६४—७१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्यं नाम पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८५॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्तमाहात्म्यवर्णन नामक एक सौ पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८५॥
१८८- त्रिपुर-दाहका वृत्तान्त
| ७७६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ छियासीवाँ अध्याय
नर्मदा-माहात्म्यका उपक्रम
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>माहात्म्यमविमुक्तस्य यथावत् कथितं त्वया।<br>इदानीं नर्मदायास्तु माहात्म्यं वद सत्तम॥ १<br>यत्रोङ्कारस्य माहात्म्यं कपिलासंगमस्य च।<br>अमरेशस्य चैवाहुर्माहात्म्यं पापनाशनम्॥ २<br>कथं प्रलयकाले तु न नष्टा नर्मदा पुरा।<br>मार्कण्डेयश्च भगवान् न विनष्टस्तदा किल।<br>त्वयोक्तं तदिदं सर्वं पुनर्विस्तरतो वद॥ ३ | **ऋषियोंने पूछा—**सज्जनोंमें श्रेष्ठ सूतजी! आपने अविमुक्तका माहात्म्य तो भलीभाँति कह दिया, अब नर्मदाके माहात्म्यका वर्णन कीजिये, जहाँ ओंकार, कपिलासंगम और अमरेश पर्वतका पापनाशक माहात्म्य कहा जाता है। प्रलयकालमें भी नर्मदाका नाश क्यों नहीं होता? एवं भगवान् मार्कण्डेयका भी पूर्व प्रलयके समयमें विनाश क्यों नहीं हुआ? यद्यपि आपने ये बातें पूर्वमें कही हैं, तथापि इस समय पुनः विस्तारके साथ वर्णन कीजिये॥ १–३॥ |
| सूत उवाच<br>एतदेव पुरा पृष्टः पाण्डवेन महात्मना।<br>नर्मदायास्तु माहात्म्यं मार्कण्डेयो महामुनिः॥ ४<br>उग्रेण तपसा युक्तो वनस्थो वनवासिना।<br>पृष्टः पूर्वं महागाथां धर्मपुत्रेण धीमता॥ ५ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्राचीनकालमें धर्मपुत्र बुद्धिमान् महात्मा युधिष्ठिरने वनमें निवास करते समय वनवासी उग्र तपस्वी महामुनि मार्कण्डेयजीसे नर्मदाके माहात्म्यकी विस्तृत कथाके विषयमें प्रश्न किया था॥ ४-५॥ |
| युधिष्ठिर उवाच<br>श्रुता मे विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादाद् द्विजोत्तम।<br>भूयश्च श्रोतुमिच्छामि तन्मे कथय सुव्रत॥ ६<br>कथमेषा महापुण्या नदी सर्वत्र विश्रुता।<br>नर्मदा नाम विख्याता तन्मे ब्रूहि महामुने॥ ७ | **युधिष्ठिरने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! आपकी कृपासे मैंने विभिन्न धर्मोंको सुना। सुव्रत! अब मैं पुनः जो सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलाइये? महामुने! यह महापुण्यप्रदायिनी नर्मदा-नामसे विख्यात नदी सर्वत्र क्यों प्रसिद्ध हुई—इसका रहस्य मुझे बतलाइये॥ ६-७॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ८<br>नर्मदायास्तु माहात्म्यं पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>तदेतद्धि महाराज तत्सर्वं कथयामि ते॥ ९<br>पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती।<br>ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥ १०<br>त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्।<br>सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥ ११<br>कलिङ्गदेशे पश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ १२ | **मार्कण्डेयजीने कहा—**सभी पापोंका नाश करनेवाली नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदा सभी स्थावर-जङ्गम जीवोंका उद्धार करनेवाली है। महाराज! मैंने इस नर्मदा नदीका जो माहात्म्य पुराणमें आपसे सुना है, वह सब कह रहा हूँ। कनखलमें गङ्गा और कुरुक्षेत्रमें सरस्वती नदी पुण्यप्रदा कही गयी हैं, किंतु चाहे गाँव हो या वन, नर्मदा तो सभी जगह पुण्यप्रदायिनी है। सरस्वतीका जल तीन दिनोंतक सेवन करनेसे, यमुनाका जल सात दिनोंमें और गङ्गाका जल (स्नान-पानादिसे) उसी समय पवित्र कर देता है, परंतु नर्मदाका जल तो दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देता है। कलिङ्ग देशकी पश्चिमी सीमापर स्थित अमरकण्टक पर्वतसे त्रिलोकीमें विख्यात, रमणीय, मनोरम एवं पुण्यदायिनी नर्मदा प्रवाहित होती है। |
| * अध्याय १८६ * | ७७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सदेवासुरगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तपस्तप्त्वा महाराज सिद्धिं च परमां गताः॥ १३<br>यत्र स्नात्वा नरो राजन् नियमस्थो जितेन्द्रियः।<br>उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्॥ १४<br>जलेश्वरे नरः स्नात्वा पिण्डं दत्त्वा यथाविधि।<br>पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १५ | महाराज! इसके तटपर देवता, असुर, गन्धर्व और तपस्यामें रत ऋषिगणोंने तपस्या कर परम सिद्धिको प्राप्त किया है। राजन्! यदि नियमनिष्ठ एवं जितेन्द्रिय मनुष्य नर्मदामें स्नानकर एक रात उपवास करके वहाँ निवास करे तो वह अपने सौ पीढ़ियोंको तार देता है। यदि मनुष्य जलेश्वर (जलेश्वर-तीर्थ)-में स्नानकर पिण्ड-दान करता है तो उसके पितर विधिपूर्वक प्रलयकालपर्यन्त तृप्त रहते हैं॥ ८—१५॥ |
| पर्वतस्य समंतात् तु रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता।<br>स्नात्वा यः कुरुते तत्र गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ १६<br>प्रीतस्तस्य भवेच्छर्वो रुद्रकोटिर्न संशयः।<br>पश्चिमे पर्वतस्यान्ते स्वयं देवो महेश्वरः॥ १७<br>तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>पितृकार्यं च कुर्वीत विधिवन्नियतेन्द्रियः॥ १८<br>तिलोदकेन तत्रैव तर्पयेत् पितृदेवताः।<br>आसप्तमं कुलं तस्य स्वर्गे मोदेत पाण्डव॥ १९<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते।<br>अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते॥ २०<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यालङ्कारभूषितः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जायते विपुले कुले॥ २१<br>धनवान् दानशीलश्च धार्मिकश्चैव जायते।<br>पुनः स्मरति तत् तीर्थं गमनं तत्र रोचते॥ २२<br>कुलानि तारयेत् सप्त रुद्रलोकं स गच्छति।<br>योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा॥ २३<br>विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता।<br>षष्टितीर्थसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च॥ २४<br>सर्वं तस्य समंतात् तु तिष्ठत्यमरकण्टके। | अमरकण्टक पर्वतके चारों ओर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नानकर गन्ध, माल्य और चन्दनॉंसे शिवजीकी पूजा करता है, उसपर भगवान् रुद्रकोटि प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें संदेह नहीं है। पाण्डुनन्दन! उस पर्वतके पश्चिम भागके अन्तमें साक्षात् महेश्वरदेव विराजमान हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नान करके पवित्र हो जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी एवं इन्द्रियोंको वशमें करके विधिपूर्वक पितृकार्य करता है तथा तिल-जलसे पितरों और देवताओंका तर्पण करता है, उसके सात पीढ़ीहतकके पितर स्वर्गमें आनन्दका भोग करते हैं। साथ ही वह व्यक्ति दिव्य गन्धोंके अनुलेपनसे युक्त तथा दिव्य अलंकारोंसे विभूषित हो साठ हजार वर्षोंतक अप्सरासमूहोंसे परिव्यास एवं सिद्धों और चारणोंसे सेवित स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर प्रतिष्ठित कुलमें जन्म ग्रहण करता है। यहाँ वह धनवान्, दानशील और धार्मिक होता है। वह उस तीर्थका पुनः-पुनः स्मरण करता है तथा उसको वहाँ जाना प्रिय लगता है। वहाँ जाकर वह सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और रुद्रलोकको चला जाता है। राजेन्द्र! ऐसी ख्याति है कि यह श्रेष्ठ नदी सौ योजनसे अधिक लम्बी और दो योजन चौड़ी है। साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ इस अमरकण्टकके चारों ओर वर्तमान हैं॥ १६—२४ १/२॥ |
| ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः॥ २५<br>सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः।<br>एवं सर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ २६<br>तस्य पुण्यफलं राजञ्शृणुष्वावहितो मम।<br>शतं वर्षसहस्त्राणां स्वर्गे मोदेत पाण्डव॥ २७ | राजन्! जो मनुष्य ब्रह्मचारी, पवित्र, क्रोधजयी, जितेन्द्रिय, सभी प्रकारकी हिंसाओंसे रहित, सभी प्राणियोंके हितमें तत्पर—इस प्रकार सभी सदाचारोंसे युक्त होकर यहाँ अपने प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे आप मुझसे सावधान होकर सुनिये। |
| ७७८ | * मत्स्यपुराण * |
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| अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते।<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः ॥ २८<br>क्रीडते देवलोकस्थो दैवतैः सह मोदते।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान् ॥ २९<br>गृहं तु लभते वै स नानारत्नविभूषितम्।<br>स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैर्वज्रवैडूर्यभूषितैः ॥ ३०<br>आलेख्यसहितं दिव्यं दासीदाससमन्वितम्।<br>मत्तमातङ्गशब्दैश्च हयानां हेषितेन च ॥ ३१<br>क्षुभ्यते तस्य तद्द्वारमिन्द्रस्य भवनं यथा।<br>राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः ॥ ३२<br>तस्मिन् गृहे उषित्वा तु क्रीडाभोगसमन्विते।<br>जीवेद् वर्षशतं साग्रं सर्वरोगविवर्जितः ॥ ३३<br>एवं भोगो भवेत् तस्य यो मृतोऽमरकण्टके।<br>अग्नौ विषजले वापि तथा चैव ह्यनाशके ॥ ३४<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा।<br>पतनं कुरुते यस्तु अमरेशे नराधिप ॥ ३५<br>कन्यानां त्रिसहस्त्राणि एकैकस्यापि चापरे।<br>तिष्ठन्ति भुवने तस्य प्रेषणं प्रार्थयन्ति च।<br>दिव्यभोगैः सुसम्पन्नः क्रीडते कालमक्षयम् ॥ ३६ | पाण्डुपुत्र! वह एक लाख वर्षोंतक अप्सराओंसे व्याप्त तथा सिद्धों एवं चारणोंसे सेवित स्वर्गमें आनन्दका उपभोग करता है। वह दिव्य चन्दनके लेपसे युक्त एवं दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित हो देवलोकमें रहता हुआ देवोंके साथ क्रीड़ा करते हुए आनन्दका अनुभव करता है। तत्पश्चात् स्वर्गसे भ्रष्ट होकर इस लोकमें पराक्रमी राजा होता है। उसे अनेक प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत ऐसे भवनकी प्राप्ति होती है, जो दिव्य हीरे, वैदूर्य और मणिमय स्तम्भोंसे विभूषित होता है। वह दिव्य चित्रोंसे सुशोभित तथा दासी-दाससे समन्वित रहता है। उसका द्वार मदमत्त हाथियोंके चिग्घाड़ और घोड़ोंकी हिनहिनाहटसे इन्द्रभवनके समान संकुलित रहता है। वह सम्पूर्ण स्त्रीजनोंका प्रिय, श्रीसम्पन्न और सभी प्रकारके रोगोंसे रहित होकर राजराजेश्वरके रूपमें क्रीड़ा और भोगसे समन्वित उस गृहमें निवासकर सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक जीवित रहता है। जो अमरकण्टकमें शरीरका त्याग करता है, उसे इस प्रकारके आनन्दका उपभोग मिलता है। जो अग्नि, विष, जल तथा अनशन करके यहाँ मरता है, उसे आकाशमें वायुके समान स्वच्छन्द गति प्राप्त होती है। नरेश्वर! जो इस अमरकण्टक पर्वतसे गिरकर देहत्याग करता है, उसके भवनमें एक-से-एक बढ़कर सुन्दरी तीन हजार कन्याएँ स्थित रहती हैं, जो उसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करती रहती हैं। वह दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण होकर अक्षय कालतक क्रीडा करता है॥ २५–३६॥ | | पृथिव्यामासमुद्रायामीदृशो नैव जायते।<br>यादृशोऽयं नृपश्रेष्ठ पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ३७ | नृपश्रेष्ठ! अमरकण्टक पर्वतपर शरीरका त्याग करनेसे जैसा पुण्य होता है, वैसा समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर कहीं भी नहीं होता। इस तीर्थको पर्वतके पश्चिम प्रान्तमें समझना चाहिये। | | तावत् तीर्थं तु विज्ञेयं पर्वतस्य तु पश्चिमे।<br>ह्रदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ ३८<br>तत्र पिण्डप्रदानेन संध्योपासनकर्मणा।<br>पितरो दश वर्षाणि तर्पितास्तु भवन्ति वै ॥ ३९ | यहाँ तीनों लोकोंमें विख्यात जलेश्वर नामक कुण्ड वर्तमान है, वहाँ पिण्डदान एवं संध्योपासन कर्म करनेसे पितरगण दस वर्षोंतक तृप्त बने रहते हैं। | | दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलेति महानदी।<br>सकलार्जुनसंछन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता ॥ ४०<br>सापि पुण्या महाभागा त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानां तु युधिष्ठिर ॥ ४१ | नर्मदाके दक्षिण तटपर समीप ही कपिला नामकी महानदी स्थित है। वह सब ओरसे अर्जुन वृक्षोंसे परिव्याप्त है। युधिष्ठिर! वह महाभागा पुण्यतोया नदी भी तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ सौ करोड़से भी अधिक तीर्थ हैं। | | पुराणे श्रूयते राजन् सर्वं कोटिगुणं भवेत्।<br>तस्यास्तीरे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात् ॥ ४२ | राजन्! पुराणमें जैसा वर्णन है, उसके अनुसार वे सभी तीर्थ करोड़गुना फल देनेवाले हैं। उसके तटके जो वृक्ष कालवश गिर जाते हैं, |
| * अध्याय १८६ * | ७७९ |
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| नर्मदातोयसंस्पृष्टास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।<br>द्वितीया तु महाभागा विशल्यकरणी शुभा ॥ ४३<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा विशल्यो भवति क्षणात्।<br>तत्र देवगणाः सर्वे सकिन्नरमहोरगाः ॥ ४४<br>यक्षराक्षसगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सर्वे समागतास्तत्र पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ४५<br>तैश्च सर्वैः समागम्य मुनिभिश्च तपोधनैः।<br>नर्मदामाश्रिता पुण्या विशल्या नाम नामतः ॥ ४६<br>उत्पादिता महाभागा सर्वपापप्रणाशिनी।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ४७<br>उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्।<br>कपिला च विशल्या च श्रूयते राजसत्तम ॥ ४८<br>ईश्वरेण पुरा प्रोक्ते लोकानां हितकाम्यया।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत् ॥ ४९ | वे भी नर्मदाके जलके स्पर्शसे श्रेष्ठ गतिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरी महाभागा मङ्गलदायिनी विशल्यकरणी नदी है। मनुष्य उस तीर्थमें स्नानकर उसी क्षण दुःखरहित हो जाता है। वहाँ सभी देवगण, किन्नर, महान् सर्पगण, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, तपस्वी ऋषिगण आये और उस अमरकण्टकपर्वतपर मुनियों और तपस्वियोंके साथ स्थित हुए। वहाँ उन लोगोंने सभी पापोंका विनाश करनेवाली महाभागा पुण्यसलिला विशल्या नामसे विख्यात नदीको उत्पन्न किया, जो नर्मदामें मिलती है। राजन्! वहाँ जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपूर्वक जितेन्द्रिय होकर स्नानकर उपवासपूर्वक एक रात भी निवास करता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको तार देता है। नृपश्रेष्ठ! ऐसा सुना जाता है कि पूर्वकालमें लोगोंके हितकी कामनासे महेश्वरने कपिला और विशल्या नामके तीर्थोंका वर्णन किया था। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेधके फलको प्राप्त करता है॥ ३७–४९॥ | | अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ॥ ५०<br>नर्मदायास्तु राजेन्द्र पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>यत्र यत्र नरः स्नात्वा चाश्वमेधफलं लभेत् ॥ ५१<br>ये वसन्त्युत्तरे कूले रुद्रलोके वसन्ति ते।<br>सरस्वत्यां च गङ्गायां नर्मदायां युधिष्ठिर ॥ ५२<br>समं स्नानं च दानं च यथा मे शंकरोऽब्रवीत्।<br>परित्यजति यः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ५३<br>वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते।<br>नर्मदाया जलं पुण्यं फेनोर्मिभिरलङ्कृतम् ॥ ५४<br>पवित्रं शिरसा वन्द्यं सर्वपापैः प्रमोचनम्।<br>नर्मदा च सदा पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी ॥ ५५<br>अहोरात्रोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया।<br>एवं रम्या च पुण्या च नर्मदा पाण्डुनन्दन ॥ ५६<br>त्रयाणामपि लोकानां पुण्या ह्येषा महानदी।<br>वटेश्वरे महापुण्ये गङ्गाद्वारे तपोवने ॥ ५७<br>एतेषु सर्वस्थानेषु द्विजाः स्युः संशितव्रताः।<br>श्रुतं दशगुणं पुण्यं नर्मदोदधिसंगमे ॥ ५८ | नरेश्वर! इस तीर्थमें जो अनशन करता है, वह सभी पापोंसे रहित होकर रुद्रलोकको प्राप्त करता है। राजेन्द्र! मैंने स्कन्दपुराणमें नर्मदाका जो फल सुना है, उसके अनुसार वहाँ-वहाँ स्नानकर मनुष्य अश्वमेधके फलको प्राप्त करता है। जो नर्मदाके उत्तर तटपर निवास करते हैं, वे रुद्रलोकमें निवास करते हैं। युधिष्ठिर! जैसा मुझसे शंकरजीने कहा था, उसके अनुसार सरस्वती, गङ्गा और नर्मदामें स्नान और दानका फल समान होता है। जो अमरकण्टक पर्वतपर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सौ करोड़ वर्षोंसे भी अधिक कालतक रुद्रलोकमें पूजित होता है। नर्मदाका लहरियोंके फेनसे अलंकृत, पुण्यमय पवित्र जल सभी पापोंसे मुक्त करनेवाला है, अतः वह सिरसे वन्दना करनेयोग्य है। पुण्यतोया नर्मदा ब्रह्महत्याका नाश करनेवाली है। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। पाण्डुपुत्र! नर्मदा इस प्रकार पुण्यमयी और रमणीया है। यह महानदी तीनों लोकोंमें भी पुण्यमयी है। महापुण्यप्रद वटेश्वर, तपोवन और गङ्गाद्वार—इन स्थानोंमें द्विजगण व्रतानुष्ठान करते हैं, परंतु नर्मदा और समुद्रके सङ्गमपर उससे दसगुना अधिक फल सुना जाता है॥ ५०–५८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यमें एक सौ छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८६ ॥
७८२ * मत्स्यपुराण *
| अनौपम्योवाच<br>भगवन् मानुषे लोके केन तुष्यति केशवः।<br>व्रतेन नियमेनाथ दानेन तपसापि वा॥ २६ | अनौपम्याने पूछा—भगवन्! मनुष्यलोकमें केशव व्रत, नियम, दान अथवा तपस्या—इनमें किससे प्रसन्न होते हैं?॥ २६॥ |
|---|---|
| नारद उवाच<br>तिलधेनुं च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>ससागरवनद्वीपा दत्ता भवति मेदिनी॥ २७<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः।<br>मोदते चाक्षयं कालं यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २८<br>आम्रामलकपित्थानि बदराणि तथैव च।<br>कदम्बचम्पकाशोकपुन्नागविविधद्रुमान् ॥ २९<br>अश्वत्थपिप्पलांश्चैव कदलीवटदाडिमान्।<br>पिचुमन्दं मधूकं च उपोष्य स्त्री ददाति या॥ ३०<br>स्तनौ कपित्थसदृशावूरू च कदलीसमौ।<br>अश्वत्थे वन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी॥ ३१<br>चम्पके चम्पकाभा स्यादशोके शोकवर्जिता।<br>मधूके मधुरं वक्ति वटे च मृदुगात्रिका॥ ३२<br>बदरी सर्वदा स्त्रीणां महासौभाग्यदायिनी।<br>कुक्कुटी कर्कटी चैव द्रव्यषष्ठी न शस्यते॥ ३३<br>कदम्बमिश्रकनकमञ्जरीपूजनं तथा।<br>अनग्निपक्कमन्नं च पक्वान्नानामभक्षणम्॥ ३४<br>फलानां च परित्यागः संध्यामौनं तथैव च।<br>प्रथमं क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः॥ ३५<br>तस्या भवति वै भर्ता मुखप्रेक्षी सदानघे।<br>अष्टमी च चतुर्थी च पञ्चमी द्वादशी तथा॥ ३६<br>संक्रान्तिर्विषुवच्चैव दिनच्छिद्रमुखं तथा।<br>एतांस्तु दिवसान् दिव्यानुपवसन्ति याः स्त्रियः।<br>तासां तु धर्मयुक्तानां स्वर्गवासो न संशयः॥ ३७<br>कलिकालुष्यनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>उपवासरतां नारीं नोपसर्पति तां यमः॥ ३८ | नारदजीने कहा— जो मनुष्य वेदमें पारङ्गत ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करता है, उसके द्वारा समुद्र, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वीका दान सम्पन्न हुआ समझना चाहिये। वह दाता करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा सूर्य, चन्द्र और तारोंकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्द मनाता है। जो स्त्री उपवास करके आम, आँवला, कैथ, बेर, कदम्ब, चम्पक, अशोक, पुंनाग, जायफल, पीपल, केला, वट, अनार, नीम, महुआ आदि अनेक प्रकारके वृक्षोंका दान करती है, उसके दोनों स्तन कैथके समान और दोनों जंघाएँ केलेके सदृश सुन्दर होती हैं। वह अश्वत्थके दानसे वन्दनीय और नीमके दानसे सुगन्धयुक्त होती है। वह चम्पाके दानसे चम्पाकी-सी कान्तिवाली और अशोकके दानसे शोकरहित होती है। महुआके दानसे वह मधुरभाषिणी होती है और वटके दानसे उसका शरीर कोमल होता है। बेर स्त्रियोंके लिये सदा महान् सौभाग्यदायी होता है। ककड़ी, जटाधारी और द्रव्यषष्ठीका दान, कदम्बसे मिश्रित धतूरेकी मंजरीसे पूजन, बिना अग्निसे पकाया हुआ अन्न एवं पके हुए अन्नोंका अभक्षण, फलोंका परित्याग तथा संध्याकालमें मौनधारण—ये स्त्रियोंके लिये प्रशस्त नहीं हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक क्षेत्रपालकी पूजा करनी चाहिये। पापशून्ये! उस स्त्रीका पति सदा उसका मुख ही देखा करता है। जो स्त्रियाँ अष्टमी, चतुर्थी, पञ्चमी और द्वादशी तिथि, संक्रान्ति, विषुवयोग और दिनच्छिद्रमुख (दोपहरमें चन्द्रमाका नये मासकी तिथिमें प्रवेश करना)—इन दिव्य दिनोंमें उपवास करती हैं, उस धर्मयुक्त स्त्रियोंका स्वर्गमें निवास होता है—इसमें संदेह नहीं है। वे कलियुगके पापोंसे रहित और सभी पापोंसे शून्य हो जाती हैं। इस प्रकार जो स्त्री उपवासमें तत्पर रहती है, उसके समीप यम भी नहीं आते॥ २७—३८॥ |
| अनौपम्योवाच<br>अस्मिन् कृतेन पुण्येन पुराजन्मकृतेन वा।<br>भवदागमनं भूतं किंचित् पृच्छाम्यहं व्रतम्॥ ३९ | अनौपम्या बोली— नारदजी! पता नहीं, इस जन्ममें या पूर्व जन्ममें किये हुए पुण्यसे ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। अब मैं आपसे कतिपय व्रतोंके विषयमें पूछती |
| * अध्याय १८७ * | ७८३ |
|---|---|
| अस्ति विन्ध्यावलिर्नाम बलिपत्नी यशस्विनी।<br>श्वश्रूर्ममापि विप्रेन्द्र न तुष्यति कदाचन॥ ४०<br>श्वशुरोऽपि सर्वकालं दृष्ट्वा चापि न पश्यति।<br>अस्ति कुम्भीनसी नाम ननान्दा पापकारिणी॥ ४१<br>दृष्ट्वा चैवाङ्गुलीभङ्गं सदा कालं करोति माम्।<br>दिव्येन तु पथा याति मम सौख्यं कथं वद॥ ४२<br>ऊषरे न प्ररोहन्ति बीजाङ्कुराः कथञ्चन।<br>येन व्रतेन चीर्णेन भवन्ति वशगा मम।<br>तद्व्रतं ब्रूहि विप्रेन्द्र दासभावं व्रजामि ते॥ ४३<br><br>नारद उवाच<br>यदेतत् ते मया पूर्वं व्रतमुक्तं शुभानने।<br>अनेन पार्वती देवी चीर्णेन वरवर्णिनि॥ ४४<br>शंकरस्य शरीरस्था विष्णोर्लक्ष्मीस्तथैव च।<br>सावित्री ब्रह्मणश्चैव वसिष्ठस्याप्यरुन्धती॥ ४५<br>एतेनोपोषितेनेह भर्ता स्थास्यति ते वशे।<br>श्वश्रूश्वशुरयोश्चैव मुखबन्धो भविष्यति॥ ४६<br>एवं श्रुत्वा तु सुश्रोणि यथेष्टं कर्तुमर्हसि।<br>नारदस्य वचः श्रुत्वा राज्ञी वचनमब्रवीत्॥ ४७<br>प्रसादं कुरु विप्रेन्द्र दानं ग्राह्यं यथेप्सितम्।<br>सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च॥ ४८<br>तव दास्याम्यहं विप्र यच्चान्यदपि दुर्लभम्।<br>प्रगृहाण द्विजश्रेष्ठ प्रीयेतां हरिशंकरौ॥ ४९<br><br>नारद उवाच<br>अन्यस्मै दीयतां भद्रे क्षीणवृत्तिस्तु यो द्विजः।<br>अहं तु सर्वसम्पन्नो मद्भक्तिः क्रियतामिति॥ ५०<br>एवं तासां मनो हृत्वा सर्वासां तु पतिव्रतात्।<br>जगाम भरतश्रेष्ठ स्वकीयं स्थानकं पुनः॥ ५१<br>ततो हृष्टहृदया अन्यतोगतमानसाः।<br>पतिव्रतात्वमुत्सृज्य तासां तेजो गतं ततः।<br>पुरे छिद्रं समुत्पन्नं बाणस्य तु महात्मनः॥ ५२ | हूँ। विप्रवर! जो बलिकी पत्नी यशस्विनी विन्ध्यावलि हैं, वे मेरी भी सास हैं। वे मुझसे कभी भी प्रसन्न नहीं रहतीं। मेरे श्वशुर भी मुझे सभी समय देखते हुए भी अनदेखी करते हैं। पापाचरणमें रत रहनेवाली कुम्भीनसी नामकी मेरी ननद है। वह सभी समय मुझे देखकर अङ्गुली तोड़ती रहती है। वह दिव्य मार्गसे कैसे चले और मुझे सुखकी प्राप्ति कैसे हो—यह बतानेकी कृपा करें। (यह सत्य है कि) ऊषर भूमिमें डाले हुए बीजसे किसी प्रकार भी अङ्कुर नहीं उत्पन्न होते, फिर भी जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे ये मेरे वशमें आ जायँ, वह व्रत मुझे बतलाइये। विप्रेन्द्र! मैं आपकी दासी हूँ॥ ३९–४३॥<br><br>नारदजीने कहा—सुन्दर मुखवाली! जो व्रत मैंने पूर्वमें तुमसे कहा है, उस व्रतका अनुष्ठान करनेसे पार्वतीदेवी शंकरके, लक्ष्मी विष्णुके, सावित्री ब्रह्माके, अरुन्धती वसिष्ठके शरीरमें विराजमान रहती हैं। इस उपवास-व्रतसे तुम्हारा पति भी तुम्हारे अधीन रहेगा तथा सास और श्वशुरका भी मुख बंद हो जायगा अर्थात् वे तुमसे प्रेम करने लगेंगे। सुश्रोणि! ऐसा सुनकर तुम जैसा चाहो वैसा कर सकती हो। नारदजीके वचनको सुनकर रानीने इस प्रकार कहा—'विप्रवर! मुझपर कृपा कीजिये और यथाभिलषित दान स्वीकार कीजिये। विप्र! सुवर्ण, मणि, रत्न, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य जो भी दुर्लभ पदार्थ हैं, वह सब मैं आपको दूँगी। द्विजश्रेष्ठ! आप उसे ग्रहण करें, जिससे विष्णु और शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ॥ ४४–४९॥<br><br>नारदजी बोले—कल्याणि! जो ब्राह्मण जीविकारहित हो, उसे ही यह दान दो। मैं तो सर्वसम्पन्न हूँ। तुम मेरे प्रति भक्ति-भाव रखो। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उन सभी स्त्रियोंके मनको पातिव्रतसे विचलित कर नारदजी पुनः अपने स्थानपर चले गये। तभीसे उन स्त्रियोंका हृदय उदास रहने लगा और उनका मन दूसरी ओर लग गया। इस प्रकार पातिव्रत्यके त्यागसे उनका तेज नष्ट हो गया तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न बाणके नगरमें छिद्र (दोष) उत्पन्न हो गया॥ ५०–५२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १८७ ॥
७८२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनौपम्योवाच<br>भगवन् मानुषे लोके केन तुष्यति केशवः।<br>व्रतेन नियमेनाथ दानेन तपसापि वा॥ २६ | अनौपम्या ने पूछा— भगवन्! मनुष्यलोकमें केशव व्रत, नियम, दान अथवा तपस्या—इनमें किससे प्रसन्न होते हैं?॥ २६॥ |
| नारद उवाच<br>तिलधेनुं च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>ससागरवनद्वीपा दत्ता भवति मेदिनी॥ २७<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः।<br>मोदते चाक्षयं कालं यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २८<br>आम्रामलकपित्थानि बदराणि तथैव च।<br>कदम्बचम्पकाशोकपुन्नागविविधद्रुमान् ॥ २९<br>अश्वत्थपिप्पलांश्चैव कदलीवटदाडिमान्।<br>पिचुमन्दं मधूकं च उपोष्य स्त्री ददाति या॥ ३०<br>स्तनौ कपित्थसदृशावूरू च कदलीसभौ।<br>अश्वत्थे वन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी॥ ३१<br>चम्पके चम्पकाभा स्यादशोके शोकवर्जिता।<br>मधूके मधुरं वक्ति वटे च मृदुगात्रिका॥ ३२<br>बदरी सर्वदा स्त्रीणां महासौभाग्यदायिनी।<br>कुक्कुटी कर्कटी चैव द्रव्यषष्ठी न शस्यते॥ ३३<br>कदम्बमिश्रकनकमञ्जरीपूजनं तथा।<br>अनग्निपक्वमन्नं च पक्वान्नानामभक्षणम्॥ ३४<br>फलानां च परित्यागः संध्यामौनं तथैव च।<br>प्रथमं क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः॥ ३५<br>तस्या भवति वै भर्ता मुखप्रेक्षी सदानघे।<br>अष्टमी च चतुर्थी च पञ्चमी द्वादशी तथा॥ ३६<br>संक्रान्तिर्विषुवच्चैव दिनच्छिद्रमुखं तथा।<br>एतांस्तु दिवसान् दिव्यानुपवसन्ति याः स्त्रियः।<br>तासां तु धर्मयुक्तानां स्वर्गवासो न संशयः॥ ३७<br>कलिकालुष्यनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>उपवासरतां नारीं नोपसर्पति तां यमः॥ ३८ | नारदजीने कहा— जो मनुष्य वेदमें पारङ्गत ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करता है, उसके द्वारा समुद्र, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वीका दान सम्पन्न हुआ समझना चाहिये। वह दाता करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा सूर्य, चन्द्र और तारोंकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्द मनाता है। जो स्त्री उपवास करके आम, आँवला, कैथ, बेर, कदम्ब, चम्पक, अशोक, पुंनाग, जायफल, पीपल, केला, वट, अनार, नीम, महुआ आदि अनेक प्रकारके वृक्षोंका दान करती है, उसके दोनों स्तन कैथके समान और दोनों जंघाएँ केलेके सदृश सुन्दर होती हैं। वह अश्वत्थके दानसे वन्दनीय और नीमके दानसे सुगन्धयुक्त होती है। वह चम्पाके दानसे चम्पाकी-सी कान्तिवाली और अशोकके दानसे शोकरहित होती है। महुआके दानसे वह मधुरभाषिणी होती है और वटके दानसे उसका शरीर कोमल होता है। बेर स्त्रियोंके लिये सदा महान् सौभाग्यदायी होता है। ककड़ी, जटाधारी और द्रव्यषष्ठीका दान, कदम्बसे मिश्रित धतूरेकी मंजरीसे पूजन, बिना अग्निसे पकाया हुआ अन्न एवं पके हुए अन्नोंका अभक्षण, फलोंका परित्याग तथा संध्याकालमें मौनधारण—ये स्त्रियोंके लिये प्रशस्त नहीं हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक क्षेत्रपालकी पूजा करनी चाहिये। पापशून्ये! उस स्त्रीका पति सदा उसका मुख ही देखा करता है। जो स्त्रियाँ अष्टमी, चतुर्थी, पञ्चमी और द्वादशी तिथि, संक्रान्ति, विषुवयोग और दिनच्छिद्रमुख (दोपहरमें चन्द्रमाका नये मासकी तिथिमें प्रवेश करना)—इन दिव्य दिनोंमें उपवास करती हैं, उस धर्मयुक्त स्त्रियोंका स्वर्गमें निवास होता है—इसमें संदेह नहीं है। वे कलियुगके पापोंसे रहित और सभी पापोंसे शून्य हो जाती हैं। इस प्रकार जो स्त्री उपवासमें तत्पर रहती है, उसके समीप यम भी नहीं आते॥२७—३८॥ |
| अनौपम्योवाच<br>अस्मिन् कृतेन पुण्येन पुराजन्मकृतेन वा।<br>भवदागमनं भूतं किंचित् पृच्छाम्यहं व्रतम्॥ ३९ | अनौपम्या बोली— नारदजी! पता नहीं, इस जन्ममें या पूर्व जन्ममें किये हुए पुण्यसे ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। अब मैं आपसे कतिपय व्रतोंके विषयमें पूछती |
१८९- नर्मदा-कावेरी-संगमका माहात्म्य
| * अध्याय १८७ * | ७८३ |
|---|
| अस्ति विन्ध्यावलिर्नाम बलिपत्नी यशस्विनी।<br>श्वश्रूर्ममापि विप्रेन्द्र न तुष्यति कदाचन ॥ ४०<br>श्वशुरोऽपि सर्वकालं दृष्ट्वा चापि न पश्यति।<br>अस्ति कुम्भीनसी नाम ननान्दा पापकारिणी ॥ ४१<br>दृष्ट्वा चैवाङ्गुलीभङ्गं सदा कालं करोति माम्।<br>दिव्येन तु पथा याति मम सौख्यं कथं वद ॥ ४२<br>ऊषरे न प्ररोहन्ति बीजाङ्कुराः कथञ्चन।<br>येन व्रतेन चीर्णेन भवन्ति वशगा मम।<br>तद्व्रतं ब्रूहि विप्रेन्द्र दासभावं व्रजामि ते ॥ ४३<br><br>नारद उवाच<br>यदेतत् ते मया पूर्वं व्रतमुक्तं शुभानने।<br>अनेन पार्वती देवी चीर्णेन वरवर्णिनि ॥ ४४<br>शंकरस्य शरीरस्था विष्णोर्लक्ष्मीस्तथैव च।<br>सावित्री ब्रह्मणश्चैव वसिष्ठस्याप्यरुन्धती ॥ ४५<br>एतेनोपोषितेनेह भर्ता स्थास्यति ते वशे।<br>श्वश्रूश्वशुरयोश्चैव मुखबन्धो भविष्यति ॥ ४६<br>एवं श्रुत्वा तु सुश्रोणि यथेष्टं कर्तुमर्हसि।<br>नारदस्य वचः श्रुत्वा राज्ञी वचनमब्रवीत् ॥ ४७<br>प्रसादं कुरु विप्रेन्द्र दानं ग्राह्यं यथेप्सितम्।<br>सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च ॥ ४८<br>तव दास्याम्यहं विप्र यच्चान्यदपि दुर्लभम्।<br>प्रगृहाण द्विजश्रेष्ठ प्रीयेतां हरिशंकरौ ॥ ४९<br><br>नारद उवाच<br>अन्यस्मै दीयतां भद्रे क्षीणवृत्तिस्तु यो द्विजः।<br>अहं तु सर्वसम्पन्नो मद्भक्तिः क्रियतामिति ॥ ५०<br>एवं तासां मनो हृत्वा सर्वासां तु पतिव्रतात्।<br>जगाम भरतश्रेष्ठ स्वकीयं स्थानकं पुनः ॥ ५१<br>ततो ह्यहृष्टहृदया अन्यतोगतमानसाः।<br>पतिव्रतात्वमुत्सृज्य तासां तेजो गतं ततः।<br>पुरे छिद्रं समुत्पन्नं बाणस्य तु महात्मनः ॥ ५२ | हूँ। विप्रवर! जो बलिकी पत्नी यशस्विनी विन्ध्यावलि हैं, वे मेरी भी सास हैं। वे मुझसे कभी भी प्रसन्न नहीं रहतीं। मेरे श्वशुर भी मुझे सभी समय देखते हुए भी अनदेखी करते हैं। पापाचरणमें रत रहनेवाली कुम्भीनसी नामकी मेरी ननद है। वह सभी समय मुझे देखकर अङ्गुली तोड़ती रहती है। वह दिव्य मार्गसे कैसे चले और मुझे सुखकी प्राप्ति कैसे हो—यह बतानेकी कृपा करें। (यह सत्य है कि) ऊषर भूमिमें डाले हुए बीजसे किसी प्रकार भी अङ्कुर नहीं उत्पन्न होते, फिर भी जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे ये मेरे वशमें आ जायँ, वह व्रत मुझे बतलाइये। विप्रेन्द्र! मैं आपकी दासी हूँ॥ ३९–४३॥<br><br>नारदजीने कहा—सुन्दर मुखवाली! जो व्रत मैंने पूर्वमें तुमसे कहा है, उस व्रतका अनुष्ठान करनेसे पार्वतीदेवी शंकरके, लक्ष्मी विष्णुके, सावित्री ब्रह्माके, अरुन्धती वसिष्ठके शरीरमें विराजमान रहती हैं। इस उपवास-व्रतसे तुम्हारा पति भी तुम्हारे अधीन रहेगा तथा सास और श्वशुरका भी मुख बंद हो जायगा अर्थात् वे तुमसे प्रेम करने लगेंगे। सुश्रोणि! ऐसा सुनकर तुम जैसा चाहो वैसा कर सकती हो। नारदजीके वचनको सुनकर रानीने इस प्रकार कहा—'विप्रवर! मुझपर कृपा कीजिये और यथाभिलषित दान स्वीकार कीजिये। विप्र! सुवर्ण, मणि, रत्न, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य जो भी दुर्लभ पदार्थ हैं, वह सब मैं आपको दूँगी। द्विजश्रेष्ठ! आप उसे ग्रहण करें, जिससे विष्णु और शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ॥ ४४–४९॥<br><br>नारदजी बोले—कल्याणि! जो ब्राह्मण जीविकारहित हो, उसे ही यह दान दो। मैं तो सर्वसम्पन्न हूँ। तुम मेरे प्रति भक्ति-भाव रखो। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उन सभी स्त्रियोंके मनको पातिव्रतसे विचलित कर नारदजी पुनः अपने स्थानपर चले गये। तभीसे उन स्त्रियोंका हृदय उदास रहने लगा और उनका मन दूसरी ओर लग गया। इस प्रकार पातिव्रत्यके त्यागसे उनका तेज नष्ट हो गया तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न बाणके नगरमें छिद्र (दोष) उत्पन्न हो गया॥ ५०–५२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये समाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १८७ ॥
१९०- नर्मदाके तटवर्ती तीर्थ
७८४ * मत्स्यपुराण *
एक सौ अठासीवाँ अध्याय
त्रिपुर-दाहका वृत्तान्त
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>यन्मां पृच्छसि कौन्तेय तन्मे कथयतः शृणु।<br>एतस्मिन्नन्तरे रुद्रो नर्मदातटमास्थितः॥ १<br>नाम्ना माहेश्वरं स्थानं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तस्मिन् स्थाने महादेवोऽचिन्तयत् त्रिपुरक्षयम्॥ २<br>गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा च वासुकिम्।<br>स्थानं कृत्वा तु वैशाखं विष्णुं कृत्वा शरोत्तमम्॥ ३<br>शल्ये चाग्निं प्रतिष्ठाप्य पुङ्खे वायुं समर्पयत्।<br>हयांश्च चतुरो वेदान् सर्वदेवमयं रथम्॥ ४<br>अभीषवोऽश्विनौ देवावक्षो वज्रधरः स्वयम्।<br>स तस्याज्ञां समादाय तोरणे धनदः स्थितः॥ ५<br>यमस्तु दक्षिणे हस्ते वामे कालस्तु दारुणः।<br>चक्रे त्वमरकोट्यस्तु गन्धर्वा लोकविश्रुताः॥ ६<br>प्रजापतिरथ श्रेष्ठो ब्रह्मा चैव तु सारथिः।<br>एवं कृत्वा तु देवेशः सर्वदेवमयं रथम्॥ ७<br>सोऽतिष्ठत् स्थाणुभूतस्तु सहस्रपरिवत्सरान्।<br>यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे स्थितानि वै॥ ८<br>त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि व्यभेदयत्।<br>शरः प्रचोदितस्तेन रुद्रेण त्रिपुरं प्रति॥ ९<br>भ्रष्टतेजाः स्त्रियो जाता बलं तासां व्यशीर्यत।<br>उत्पाताश्च पुरे तस्मिन् प्रादुर्भूताः सहस्रशः॥ १० | मार्कण्डेयजीने कहा—कुन्तीनन्दन! आपने जो मुझसे पूछा है, उसे मैं कह रहा हूँ, सुनिये! इसी बीच रुद्रदेव नर्मदा-तटपर आये। वहाँ जो तीनों लोकोंमें विख्यात माहेश्वर नामक स्थान है, उस स्थानपर बैठकर महादेव त्रिपुर-संहारके विषयमें सोचने लगे। उन्होंने मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकि सर्पको धनुषकी प्रत्यञ्चा, कार्तिकेयको तरकस, विष्णुको श्रेष्ठ बाण, बाणके अग्रभागमें अग्निको और पुच्छ भागमें वायुको प्रतिष्ठित करके चारों वेदोंको घोड़ा बनाया। इस प्रकार उन्होंने सर्वदेवमय रथका निर्माण किया। दोनों अश्विनीकुमारोंको वागडोर और रथकी धुरीके रूपमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्रको नियुक्त किया। उनकी आज्ञाको स्वीकार कर कुबेर तोरणके स्थानपर स्थित हुए। दाहिने हाथपर यम और बायें हाथपर भयंकर काल स्थित हुए। करोड़ों देवगण और लोकविश्रुत गन्धर्वगण रथके चक्के हुए तथा श्रेष्ठ प्रजापति ब्रह्मा सारथि बने। इस प्रकार शिवजी सर्वदेवमय रथका निर्माण कर उसपर स्थाणुरूपमें एक हजार वर्षोंतक स्थित रहे। जब तीनों पुर अन्तरिक्षमें एक साथ सम्मिलित हुए, तब उन्होंने तीन पर्वोंवाले तीन बाणोंसे उनका भेदन किया। जिस समय भगवान् रुद्रने उस बाणको त्रिपुरके ऊपर चलाया, उस समय वहाँकी स्त्रियाँ तेजोहीन हो गयीं और उनका पातिव्रत्य-बल नष्ट हो गया तथा उस नगरमें हजारों प्रकारके उपद्रव उत्पन्न होने लगे॥ १—१०॥ |
| त्रिपुरस्य विनाशाय कालरूपाभवंस्तदा।<br>अट्टहासं प्रमुञ्चन्ति हयाः काष्ठमयास्तदा॥ ११<br>निमेषोन्मेषणं चैव कुर्वन्ति चित्ररूपिणः।<br>स्वप्ने पश्यन्ति चात्मानं रक्ताम्बरविभूषितम्॥ १२<br>स्वप्ने तु सर्वे पश्यन्ति विपरीतानि यानि तु।<br>एतान् पश्यन्ति उत्पातांस्तत्र स्थाने तु ये जनाः॥ १३ | उस समय वे स्त्रियाँ भी त्रिपुर-नाशके लिये कालस्वरूप हो गयीं। काष्ठमय घोड़े अट्टहास करने लगे। चित्ररूपमें निर्मित जीव आँखको खोलने और बंद करने लगे। वहाँके निवासी स्वप्नमें अपनेको लाल वस्त्रसे अलंकृत देखने लगे। उन्हें स्वप्नमें सभी वस्तुएँ विपरीत दिखायी पड़ने लगीं। वे इस प्रकार इन उत्पातोंको देखने |
| * अध्याय १८८ * | ७८५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेषां बलं च बुद्धिश्च हरकोपेन नाशिते।<br>ततः सांवर्तको वायुर्युगान्तप्रतिमो महान्॥ १४<br>समीरितोऽनलस्तेन उत्तमाङ्गेन धावति।<br>ज्वलन्ति पादपास्तत्र पतन्ति शिखराणि च॥ १५<br>सर्वतो व्याकुलीभूतं हाहाकारमचेतनम्।<br>भग्नोद्यानानि सर्वाणि क्षिप्रं तत् प्रत्यभज्यत॥ १६<br>तेनैव पीडितं सर्वं ज्वलितं त्रिशिखैः शरैः।<br>द्रुमाश्रारामखण्डानि गृहाणि विविधानि च॥ १७<br>दशदिक्षु प्रवृत्तोऽयं समृद्धो हव्यवाहनः।<br>मनःशिलापुञ्जनिभो दिशो दश विभागशः॥ १८<br>शिखाशतैरनेकस्तु प्रजज्वाल हुताशनः।<br>सर्वं किंशुकवर्णाभं ज्वलितं दृश्यते पुरम्॥ १९ | लगे। शंकरजीके कोपसे उनके बल और बुद्धि नष्ट हो गये। तदनन्तर प्रलयकालके समान प्रचण्ड सांवर्तक वायु बहने लगा। वायुसे प्रेरित आगकी भयंकर लपटें भी इधर-उधर व्याप्त होने लगीं। जिससे वहाँ वृक्ष-समूह जलने लगे और पर्वतके शिखर गिरने लगे। सभी ओर लोग व्याकुल होकर चेतानारहित हो गये। चतुर्दिक भयंकर हाहाकार मच गया। सभी उद्यान नष्ट हो गये। वहाँ सब कुछ शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गया। शंकरजीद्वारा सभी दुःखमग्न कर दिये गये। तीन शिखाओंवाले बाणोंसे वृक्ष, वाटिकाएँ और विविध प्रासाद जलने लगे। यह प्रदीप्त अग्नि दसों दिशाओंमें फैल गया। उस समय दसों दिशाएँ मैनशिलसमूहके समान दीखने लगीं। अग्निदेव अनेकों प्रकारकी सैकड़ों शिखाओंसे युक्त प्रज्वलित हो उठे, जिससे जला हुआ वह सम्पूर्ण त्रिपुर पलाशपुष्पके समान लाल रंगका दिखायी पड़ रहा था॥ ११—१९॥ |
| गृहाद् गृहान्तरं नैव गन्तुं धूमेन शक्यते।<br>हरकोपानलैर्दग्धं क्रन्दमानं सुदुःखितम्॥ २०<br>प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं पुरम्।<br>प्रासादशिखराग्राणि व्यशीर्यन्त सहस्रशः॥ २१<br>नानामणिविचित्राणि विमानान्यप्यनेकधा।<br>गृहाणि चैव रम्याणि दह्यन्ते दीप्तवह्निना॥ २२<br>धावन्ति द्रुमखण्डेषु वलभीषु तथा जनाः।<br>देवागारेषु सर्वेषु प्रज्वलन्तः प्रधाविताः॥ २३<br>क्रन्दन्ति चानलप्लुष्टा रुदन्ति विविधैः स्वरैः।<br>गिरिकूटनिभास्तत्र दृश्यन्तेऽङ्गारराशयः॥ २४<br>गजाश्च गिरिकूटाभा दह्यमाना यतस्ततः।<br>स्तुवन्ति देवदेवेशं परित्रायस्व नः प्रभो।<br>अन्योन्यं च परिष्वज्य हुताशनप्रधर्षिताः॥ २५<br>स्नेहात् प्रदह्यमानाश्च तथैव विलयंगताः।<br>दह्यन्ते दानवास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ २६ | उस समय धुएँके कारण एक घरसे दूसरे घरमें जाना सम्भव नहीं था। सभी लोग शंकरजीकी क्रोधाग्निसे जलते हुए अत्यन्त दुःखके कारण चीत्कार कर रहे थे। इस प्रकार सभी दिशाओंमें धधकता हुआ त्रिपुरनगर जल रहा था। राजभवनोंके शिखरोंके अग्रभाग हजारों टुकड़ोंमें टूटकर गिर रहे थे। विविध मणियोंसे जटित अनेकों विमान और रमणीय घर उद्दीप्त आगसे जल रहे थे। वहाँके निवासी वृक्षोंके समूहोंमें, घरोंके छज्जोंके नीचे तथा सभी देवगृहोंमें जलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे। आगकी चपेटमें आकर वे सभी विविध स्वरोंमें क्रन्दन कर रहे थे। वहाँ पर्वतशिखरके समान अङ्गारसमूह दिखायी दे रहे थे। पर्वतशिखरके समान विशाल गजराज इधर-उधर जल रहे थे। सभी देवाधिदेव शंकरकी यों स्तुति कर रहे थे—'प्रभो! हमलोगोंकी रक्षा कीजिये।' वे अग्निसे जलते हुए स्नेहके कारण एक-दूसरेका आलिङ्गन कर उसी प्रकार जलते हुए नष्ट हो रहे थे। इस प्रकार वहाँ सैकड़ों-हजारों दानव जल रहे थे॥ २०—२६॥ |
| हंसकारण्डवाकीर्णा नलिन्यः सहपङ्कजाः।<br>दृश्यन्तेऽनलदग्धानि पुरोद्यानानि दीर्घिकाः॥ २७<br>अम्लानपङ्कजच्छन्ना विस्तीर्णा योजनायताः।<br>गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादा रत्नभूषिताः॥ २८<br>पतन्त्यनलनिर्दग्धा निस्तोया जलदा इव।<br>वरस्त्रीबालवृद्धेषु गोषु पक्षिषु वाजिषु॥ २९ | हंसों और बतखोंसे परिपूर्ण एवं कमलोंसे युक्त पुष्करिणी, बगीचे तथा बावलियाँ, जो एक योजन लम्बी-चौड़ी और खिले हुए कमलोंसे व्याप्त थीं, अग्निसे जलती हुई दिखायी दे रही थीं। वहाँ रत्नोंसे विभूषित पर्वतशिखरके समान राजभवन अग्निके द्वारा भस्म होकर गिर रहे थे। वे जलशून्य मेघके समान दिखायी दे रहे थे। शंकरजीके क्रोधसे प्रेरित अग्नि श्रेष्ठ स्त्री, बालक, वृद्ध, गौ, पक्षी |
१९१- नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
७८६ * मत्स्यपुराण *
| निर्दयो व्यदहद् वह्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>सहस्रशः प्रबुद्धाश्च सुप्ताश्च बहवो जनाः॥ ३०<br>पुत्रमालिङ्ग्य ते गाढं दह्यन्ते त्रिपुराग्निना।<br>निदाघोऽभून्महावह्नेरन्तकालो यथा तथा॥ ३१<br>केचिद् गुप्ताः प्रदग्धास्तु भार्योत्सङ्गगतास्तथा।<br>पित्रा मात्रा च सुश्लिष्टा दग्धास्वे त्रिपुराग्निना ॥ ३२<br>अथ तस्मिन् पुरे दीप्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ॥ ३३<br>अग्निज्वालाहतास्तत्र ह्यपतन् धरणीतले।<br>काचिच्छ्यामा विशालाक्षी मुक्तावलिविभूषिता ॥ ३४<br>धूमेनाकुलिता सा तु पतिता धरणीतले।<br>काचित् कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता ॥ ३५<br>भर्तारं पतितं दृष्ट्वा पतिता तस्य चोपरि।<br>काचिदादित्यसङ्काशा प्रसुप्ता च गृहे स्थिता ॥ ३६<br>अग्निज्वालाहता सा तु पतिता गतचेतना।<br>उत्थितो दानवस्तत्र खड्गहस्तो महाबलः ॥ ३७<br>वैश्वानरहतः सोऽपि पतितो धरणीतले।<br>मेघवर्णापरा नारी हारकेयूरभूषिता ॥ ३८<br>श्वेतवस्त्रपरीधाना बालं स्तन्यं न्यधापयत्।<br>दह्यन्तं बालकं दृष्ट्वा रुदती मेघशब्दवत्॥ ३९<br>एवं स तु दहन्नग्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>काचिच्चन्द्रप्रभा सौम्या वज्रवैदूर्यभूषिता ॥ ४० | और घोड़ोंमें फैलकर निर्दयतापूर्वक जला रहे थे। हजारों जागे हुए एवं अनेकों सोये हुए व्यक्ति, जो पुत्रका गाढ़ आलिङ्गन किये हुए थे, त्रिपुराग्निसे जल रहे थे। वहाँ प्रचण्ड अग्निके कारण प्रलयकालीन संताप परिव्याप्त था। उस त्रिपुराग्निसे कुछ लोग पत्नीकी गोदमें छिपे हुए ही भस्म हो गये तो कुछ लोग माँ-बापसे चिपके हुए ही जलकर भस्मसात् हो गये। उस प्रज्वलित त्रिपुरमें अप्सराओंके समान सुन्दरी स्त्रियाँ अग्निकी ज्वालाओंसे झुलसकर पृथ्वीपर गिर रही थीं। कोई मोतीकी मालाओंसे अलंकृत विशाल नेत्रोंवाली षोडशवर्षीया नायिका धूएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई इन्द्रनील मणिसे अलंकृत स्वर्णके समान कान्तिवाली स्त्री पतिको गिरा हुआ देखकर उसीके ऊपर गिर पड़ी। कोई सूर्यके समान तेजस्विनी नारी घरमें ही स्थित रहकर सो रही थी, वह अग्निकी ज्वालासे चेतनारहित होकर धराशायी हो गयी। उसी समय अतिशय बलशाली एक दानव हाथमें तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ, किंतु अग्निसे जलकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ा। मेघके समान श्यामवर्णकी दूसरी स्त्री, जो हार और केयूरसे अलंकृत तथा श्वेतवस्त्र पहने हुए अपने दुधमुँहे बच्चेको सुलाये हुए थी, वह उस बच्चेको जलते हुए देखकर मेघके शब्दके समान रोने लगी। इस प्रकार शंकरजीके कोपसे प्रेरित वह अग्नि त्रिपुरको जला रही थी॥ २७-३९ १/२ ॥ | | सुतमालिङ्ग्य वेपन्ती दग्धा पतति भूतले।<br>काचित् कुन्देन्दुवर्णाभा क्रीडन्ती स्वगृहे स्थिता ॥ ४१<br>गृहे प्रज्वलिते सा तु प्रतिबुद्धा शिखार्दिता।<br>पश्यन्ती ज्वलितं सर्वं हा सुतो मे कथं गतः ॥ ४२<br>सुतं संदग्धमालिङ्ग्य पतिता धरणीतले।<br>आदित्योदयवर्णाभा लक्ष्मीवदनशोभना ॥ ४३<br>त्वरिता दह्यमाना सा पतिता धरणीतले।<br>काचित् सुवर्णवर्णाभा नीलरत्नैर्विभूषिता ॥ ४४ | कोई चन्द्रके समान कान्तिवाली एवं हीरक और वैदूर्यसे अलंकृत सज्जन नायिका अपने पुत्रको गोदमें लेकर काँपती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान कान्तिवाली स्त्री क्रीडा करती हुई अपने घरमें ही सो रही थी, वह घरके जलनेपर अग्निशिखासे पीड़ित हो जाग उठी और सबको जलता हुआ देखकर 'हा! मेरा पुत्र कहाँ चला गया?' ऐसा कहती हुई जलते हुए पुत्रका आलिङ्गन कर पृथ्वीपर गिर पड़ी। उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिसे युक्त एवं लक्ष्मीके मुखके समान शोभायमान मुखवाली कोई स्त्री भागती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर गयी। कोई स्वर्णके समान कान्तिवाली नीलरत्नोंसे अलंकृत स्त्री |
| * अध्याय १८८ * | ७८७ |
|---|
| धूमेनाकुलिता सा तु प्रसुप्ता धरणीतले।<br>अन्या गृहीतहस्ता तु सखि दह्यति बालिका ॥ ४५<br>अनेकदिव्यरत्नाढ्या दृष्ट्वा दहनमोहिता।<br>शिरसि ह्यञ्जलिं कृत्वा विज्ञापयति पावकम् ॥ ४६<br>भगवन् यदि वैरं ते पुरुषेष्वपकारिषु।<br>स्त्रियः किमपराध्यन्ते गृहपञ्जरकोकिलाः ॥ ४७<br>पाप निर्दय निर्लज्ज कस्ते कोपः स्त्रियः प्रति।<br>न दाक्षिण्यं न ते लज्जा न सत्यं शौर्यवर्जितः ॥ ४८<br>अनेन ह्यापसर्गेण तूपालम्भं शिखिन्यदात्।<br>किं त्वया न श्रुतं लोके ह्यवध्याः शत्रुयोषितः ॥ ४९<br>किंतु तुभ्यं गुणा होते दहनोत्सादनं प्रति।<br>न कारुण्यं भयं वापि दाक्षिण्यं न स्त्रियः प्रति ॥ ५०<br>दयां कुर्वन्ति म्लेच्छापि दहन्तीं वीक्ष्य योषितम्।<br>म्लेच्छानामपि कष्टोऽसि दुर्निवारो ह्यचेतनः ॥ ५१<br>एते चैव गुणास्तुभ्यं दहनोत्सादनं प्रति।<br>आसामपि दुराचार स्त्रीणां किं ते निपातने ॥ ५२<br>दुष्ट निर्घृण निर्लज्ज हुताशिन् मन्दभाग्यक।<br>निराशत्वं दुरावास बलाद् दहसि निर्दय ॥ ५३<br>एवं विलपमानास्ता जल्पन्त्यश्च बहून्यपि।<br>अन्याः क्रोशन्ति संक्रुद्धा बालशोकेन मोहिताः ॥ ५४<br>दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः पूर्वशत्रुवत्।<br>पुष्करिण्यां जलं दग्धं कूपेष्वपि तथैव च ॥ ५५<br>अस्मान् संदह्य म्लेच्छ त्वं कां गतिं प्रापयिष्यसि।<br>एवं प्रलपितं तासां श्रुत्वा देवो विभावसुः।<br>मूर्तिमान् सहसोत्थाय वह्निर्वचनमब्रवीत् ॥ ५६ | धुएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर सो गयी। अन्य स्त्री अपनी सखीका हाथ पकड़कर कह रही हैं—'सखि! बालिका जल रही है।' कोई अनेक दिव्य रत्नोंसे अलंकृत नारी अग्निको देखकर मोहित हो गयी, तब वह सिरपर हाथ जोड़कर अग्निसे प्रार्थना करने लगी—'भगवन्! यदि तुम्हारा अपकारी पुरुषोंसे वैर है तो घरके पिंजरेमें कोयलके समान आबद्ध स्त्रियोंने तुम्हारा क्या अपराध किया है? अरे पापी! तुम तो बड़े निर्दयी और निर्लज्ज हो। स्त्रियोंके प्रति यह तुम्हारा कैसा क्रोध है! अरे कायर! न तो तुममें कुशलता है, न लज्जा है और न सत्यता है।' वह ऐसे आक्षेपयुक्त वाक्योंसे अग्निको उलाहना देने लगी। (फिर दूसरी कहने लगी—) 'क्या तुमने यह नहीं सुना है कि शत्रुको स्त्रियाँ भी अवध्य होती हैं? क्या जलाना और नाश करना ये ही तुम्हारे गुण हैं? तुम्हारेमें स्त्रियोंके प्रति दया, भय अथवा उदारता नहीं है। म्लेच्छगण भी स्त्रियोंको जलती हुई देखकर उनपर दया करते हैं। तुम तो म्लेच्छोंसे भी बढ़कर हृदयशून्य दुर्निवार कष्ट हो। दुराचारिन्! इन स्त्रियोंको मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? क्या जलाना और मारना ये ही तुम्हारे गुण हैं? दुष्ट हुताशिन्! तुम बड़े दयाहीन, निर्लज्ज, अभागा, कठोर और कपटी हो। अरे निर्दय! तुम क्यों बलपूर्वक स्त्रियोंको जला रहे हो?' इस प्रकार वे स्त्रियाँ अनेकों प्रकारसे विलाप करती हुई चीत्कार कर रही थीं? अन्य कुछ स्त्रियाँ बालशोकसे मोहित होकर विलाप कर रही थीं। यह निष्ठुर अग्नि क्रुद्ध होकर पुराने शत्रुके समान हमलोगोंको जला रहा है। पुष्करिणियों और कुओंके भी जल सूख गये। अरे म्लेच्छ! हमलोगोंको जलाकर तुम किस गतिको प्राप्त होगे? इस प्रकार उनका प्रलाप सुनकर अग्निदेव सहसा मूर्तिमान् होकर उठ खड़े हुए और इस प्रकार बोले॥ ४०–५६॥ | | अग्निरुवाच | अग्निदेवने कहा— | | स्ववशो नैव युष्माकं विनाशं तु करोम्यहम्।<br>अहमादेशकर्ता वै नाहं कर्तास्म्यनुग्रहम् ॥ ५७<br>रुद्रक्रोधसमाविष्टो विचरामि यथेच्छया।<br>ततो बाणो महातेजास्त्रिपुरं वीक्ष्य दीपितम् ॥ ५८<br>सिंहासनस्थः प्रोवाच ह्यहं देवैर्विनाशितः।<br>अल्पसत्त्वैर्दुराचारैरीश्वरस्य निवेदितम् ॥ ५९ | मैं अपनी इच्छाके अनुसार तुमलोगोंका विनाश नहीं कर रहा हूँ, अपितु मैं आदेशका पालक हूँ। मैं अनुग्रहका कर्ता नहीं हूँ। मैं रुद्रके क्रोधसे आविष्ट होकर इच्छानुसार विचरण कर रहा हूँ। तदनन्तर सिंहासनपर बैठा हुआ महातेजस्वी बाण त्रिपुरको जलता हुआ देखकर बोला—'मैं देवताओंन्द्वारा विनष्ट कर दिया गया। उस स्वल्पबलशाली दुराचारियोंने शंकरसे निवेदन |