मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७३ शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि
* अध्याय ७० * । २७५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यदा सूर्यदिने हस्तः पुष्यो वाथ पुनर्वसुः॥ ३३<br>भवेत् सर्वौषधीस्नानं सम्यङ्नारी समाचरेत्।<br>तदा पञ्चशरस्यापि संनिधातुत्वमेष्यति।<br>अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमङ्गस्यानुकीर्तनैः॥ ३४<br>कामाय पादौ सम्पूज्य जङ्घे वै मोहकारिणे।<br>मेढ्रं कंदर्पनिधये कटिं प्रीतिमते नमः॥ ३५<br>नाभिं सौख्यसमुद्राय रामाय च तथोदरम्।<br>हृदयं हृदयेशाय स्तनावाह्लादकारिणे॥ ३६<br>उत्कण्ठायेति वै कण्ठमास्यानन्दकारिणे।<br>वामाङ्गं पुष्पचापाय पुष्पबाणाय दक्षिणम्॥ ३७<br>मानसायेति वै मौलिं विलोलायेति मूर्धजम्।<br>सर्वात्मने च सर्वाङ्गं देवदेवस्य पूजयेत्॥ ३८<br>नमः शिवाय शान्ताय पाशाङ्कुशधराय च।<br>गदिने पीतवस्त्राय शङ्खचक्रधराय च॥ ३९<br>नमो नारायणायेति कामदेवात्मने नमः।<br>सर्वशान्त्यै नमः प्रीत्यै नमो रत्यै नमः श्रियै॥ ४०<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै नमः सर्वार्थसम्पदे।<br>एवं सम्पूज्य देवेशमनङ्गात्मकमीश्वरम्।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्नैवेद्येन च कामिनी॥ ४१<br>तत आहूय धर्मज्ञं ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>अव्यङ्गावयवं पूज्य गन्धपुष्पार्चनादिभिः॥ ४२<br>शालेयतण्डुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम्।<br>तस्मै विप्राय सा दद्यान्माधवः प्रीयतामिति॥ ४३<br>यथेष्टाहारयुक्तं वै तमेव द्विजसत्तमम्।<br>रत्यर्थं कामदेवोऽयमिति चित्तेऽवधार्य तम्॥ ४४<br>यद् यदिच्छति विप्रेन्द्रस्तत्तत्कुर्याद् विलासिनी।<br>सर्वभावेन चात्मानमर्पयेत् स्मितभाषिणी॥ ४५ | जब रविवारको हस्त, पुष्य अथवा पुनर्वसु नक्षत्र आवे तो स्त्रीको सर्वौषधिमिश्रित जलसे भलीभाँति स्नान करना उचित है। ऐसा करनेसे उसे देवताकी संनिकटता प्राप्त होगी। फिर नामोंका कीर्तन करते हुए भगवान् पुण्डरीकाक्षकी यों अर्चना करनी चाहिये—'कामाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'मोहकारिणे नमः' से जङ्घाओंका, 'कंदर्पनिधये नमः' से जननेन्द्रियका, 'प्रीतिमते नमः' से कटिका, 'सौख्यसमुद्राय नमः' से नाभिका, 'रामाय नमः' से उदरका, 'हृदयेशाय नमः' से हृदयका, 'आह्लादकारिणे नमः' से दोनों स्तनोंका, 'उत्कण्ठाय नमः' से कण्ठका, 'आनन्दकारिणे नमः'-से मुखका, 'पुष्पचापाय नमः' से वामाङ्गका, 'पुष्पबाणाय नमः' से दक्षिणाङ्गका, 'मानसाय नमः'-से ललाटका, 'विलोलाय नमः' से केशोंका और 'सर्वात्मने नमः' से देवाधिदेव पुण्डरीकाक्षके सर्वाङ्गका पूजन करना चाहिये। पुनः 'शिवाय नमः', 'शान्ताय नमः', 'पाशाङ्कुशधराय नमः', 'गदिने नमः', 'पीतवस्त्राय नमः', 'शङ्खचक्रधराय नमः', 'नारायणाय नमः', 'कामदेवात्मने नमः' से भगवान् विष्णुकी पूजा करके 'सर्वशान्त्यै नमः', 'प्रीत्यै नमः', 'रत्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'सर्वार्थसम्पदे नमः' से लक्ष्मीका भी पूजन करनेका विधान है। इस प्रकार व्रतिनी नारी चन्दन, पुष्पमाला, धूप और नैवेद्य आदिसे कामदेवस्वरूप देवेश्वर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तत्पश्चात् वह सुडौल अङ्गोंवाले, धर्मज्ञ एवं वेदज्ञ ब्राह्मणको बुलाकर चन्दन, पुष्प आदि पूजन-सामग्रीद्वारा उनकी पूजा करे और घीसे भरे हुए पात्रके साथ एक सेर अगहनी चावल उस ब्राह्मणको दान करे और कहे—'माधव मुझपर प्रसन्न हों।' फिर वह विलासिनी नारी उस द्विजवरको यथेष्ट भोजन करावे॥ ३३—४५॥ |
| एवमादित्यवारेण सर्वमेतत् समाचरेत्।<br>तण्डुलप्रस्थदानं च यावन्मासास्त्रयोदश॥ ४६<br>ततस्त्रयोदशे मासि सम्प्राप्ते तस्य भामिनी।<br>विप्रायोपस्करैर्युक्तां शय्यां दद्यात् विलक्षणाम्॥ ४७<br>सोपधानकविश्रामां सास्तरावरणां शुभाम्।<br>प्रदीपोपानहच्छत्रपादुकासनसंयुताम् ॥ ४८ | इस प्रकार रविवारसे प्रारम्भ करके यह सब कार्य करते रहना चाहिये। एक सेर चावलका दान तो तेरह मासतक करनेका विधान है। तेरहवाँ महीना आनेपर उस स्त्रीको चाहिये कि उपर्युक्त ब्राह्मणको समस्त उपकरणोंसे युक्त एक ऐसी विलक्षण शय्या प्रदान करे, जो गद्दा, चादर और विश्रामहेतु बने हुए तकियेसे युक्त एवं सुन्दर हो तथा उसके साथ दीपक, जूता, छाता, खड़ाऊँ और |
७४ कल्याणसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२७६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सपत्नीकमलङ्कृत्य हेमसूत्राङ्गुलीयकैः।<br>सूक्ष्मवस्त्रैः सकटकैर्भूरिमाल्यानुलेपनैः ॥ ४९<br>कामदेवं सपत्नीकं गुडकुम्भोपरि स्थितम्।<br>ताम्रपात्रासनगतं हेमनेत्रपटावृतम् ॥ ५०<br>सकांस्यभाजनोपेतमिक्षुदण्डसमन्वितम् ।<br>दद्यादेतेन मन्त्रेण तथैकां गां पयस्विनीम् ॥ ५१<br>यथान्तरं न पश्यामि कामकेशवयोः सदा।<br>तथैव सर्वकामाप्तिरस्तु विष्णो सदा मम ॥ ५२<br>यथा न कमला देहात् प्रयाति तव केशव।<br>तथा ममापि देवेश शरीरं स्वीकुरु प्रभो ॥ ५३<br>तथा च काञ्चनं देवं प्रतिगृह्णन् द्विजोत्तमः।<br>क इदं कस्मादादिति वैदिकं मन्त्रमीरयेत् ॥ ५४<br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य विसर्ज्य द्विजपुंगवम्।<br>शय्यासनादिकं सर्वं ब्राह्मणस्य गृहं नयेत् ॥ ५५<br>ततः प्रभृति यो विप्रो रत्यर्थं गृहमागतः।<br>स मान्यः सूर्यवारे च स मन्तव्यो भवेत् तदा ॥ ५६<br>एवं त्रयोदशं यावन्मासमेवं द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेत यथाकामं प्रोषितेऽन्यं समाचरेत् ॥ ५७<br>तदनुज्ञया रूपवान् यावदभ्यागतो भवेत्।<br>आत्मनोऽपि यथाविघ्नं गर्भभूतिकरं प्रियम् ॥ ५८<br>दैवं वा मानुषं वा स्यादनुरागेण वा ततः।<br>साचारानष्टपञ्चाशद् यथाशक्त्या समाचरेत् ॥ ५९<br>एतद्धि कथितं सम्यग् भवतीनां विशेषतः।<br>अधर्मोऽयं ततो न स्याद् वेश्यानामिह सर्वदा ॥ ६०<br>पुरुहूतेन यत् प्रोक्तं दानवीषु पुरा मया।<br>तदिदं साम्प्रतं सर्वं भवतीष्वपि युज्यते ॥ ६१<br>सर्वपापप्रशमनमनन्तफलदायकम् ।<br>कल्याणीनां च कथितं तत् कुरुध्वं वराननाः ॥ ६२<br>करोति याशेषमखण्डमेतत्<br>कल्याणिनी माधवलोकसंस्था ।<br>सा पूजिता देवगणैरशेषै-<br>रानन्दकृत् स्थानमुपैति विष्णोः ॥ ६३ | आसनी भी हो। उस समय उस सपत्नीक ब्राह्मणको महीन वस्त्र, सोनेकी जंजीर, अँगूठी, कड़ा, अधिकाधिक पुष्पमाला और चन्दनसे अलंकृत करके गुड़से भरे हुए कलशके ऊपर स्थापित ताम्रपात्रके आसनपर सपत्नीक कामदेवकी मूर्तिको रख दे, उसे स्वर्णनिर्मित नेत्राच्छादनसे ढक दे। उसके निकट कांसेका पात्र और गन्ना भी रख दे। फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रका उच्चारण करके समग्र उपकरणोंसहित उस मूर्तिका तथा एक दुधारू गौका उस ब्राह्मणको दान करे। (दानका मन्त्र इस प्रकार है—) 'केशव! जिस प्रकार लक्ष्मी आपके शरीरसे विलग होकर कहीं अन्यत्र नहीं जातीं, देवेश्वर प्रभो! उसी प्रकार आप मेरे शरीरको भी स्वीकार कर लें।' स्वर्णमय कामदेवकी मूर्तिको ग्रहण करते समय वे द्विजवर—'कोऽदात् कस्मा अदात् कामोऽदात् कामायादात्' इत्यादि—(वाजस० सं० ७। ४८) इस वैदिक मन्त्रका उच्चारण करें। तदनन्तर वह स्त्री उन द्विजवरकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा करे और शय्या, आसन आदि दानकी सभी वस्तुएँ उनके घर भिजवा दे। इस प्रकार इस दैवकर्मको अनुरागपूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक अट्ठावन बार करना चाहिये। विशेषतः तुम्हीं लोगोंके लिये ही मैंने इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन किया है। ऐसा करनेसे पण्यस्त्रियोंको इस लोकमें कभी अधर्मका भागी नहीं होना पड़ेगा॥ ४६—६०॥<br><br>पूर्वकालमें इन्द्रने दानव-पत्नियोंके प्रति जिस व्रतका वर्णन किया था, वही सब इस समय तुमलोगोंको भी करना उचित है। सुन्दरियो! कल्याणी स्त्रियोंके समस्त पापोंको शान्त करनेवाले एवं अनन्त फलदायक जिस व्रतका मैंने वर्णन किया है, उसका तुमलोग अवश्य पालन करो। जो कल्याणमयी नारी इस व्रतका पूरा-पूरा अखण्डरूपसे पालन करती है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें स्थित होती है और अखिल देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णुके आनन्ददायक स्थानको प्राप्त होती है॥ ६१—६३॥ |
* अध्याय ७१ * । २७७
| श्रीभगवानुवाच<br>तपोधनः सोऽप्यभिधाय चैवं<br>तदा च तासां व्रतमङ्गनानाम्।<br>स्वस्थानमेष्यत्यनु वै समस्ताः<br>व्रतं चरिष्यन्ति च वेदद्योने ॥ ६४ ॥ | **श्रीभगवान्ने कहा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार तपस्वी दाल्भ्य उन स्त्रियोंसे वाराङ्गनाओंके व्रतका वर्णन करके अपने स्थानको चले जायँगे। उसके पश्चात् वे सभी उस व्रतका अनुष्ठान करेंगी ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽनङ्गदानव्रतं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनङ्गदानव्रत नामक सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥
इकहत्तरवाँ अध्याय
अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ब्रह्मोवाच<br>भगवन् पुरुषस्येह स्त्रियाश्च विरहादिकम्।<br>शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद् येन तद् वद ॥ १<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>श्रावणस्य द्वितीयायां कृष्णायां मधुसूदनः।<br>क्षीरार्णवे सपत्नीकः सदा वसति केशवः ॥ २<br><br>तस्यां सम्पूज्य गोविन्दं सर्वान् कामान् समश्रुते।<br>गोभूहिरण्यतानादि सप्तकल्पशतानुगम् ॥ ३<br><br>अशून्यशयना नाम द्वितीया सम्प्रकीर्तिता।<br>तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुमेभिर्मन्त्रैर्विधानतः ॥ ४<br><br>श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीधामन् श्रीपतेऽव्यय।<br>गार्हस्थ्यं मा प्रणशं मे यातु धर्मार्थकामदम् ॥ ५<br><br>अग्नयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम।<br>पितरो मा प्रणश्यन्तु मास्तु दाम्पत्यभेदनम् ॥ ६ | **ब्रह्माजीने पूछा—**भगवन्! इस लोकमें जिसका अनुष्ठान करनेसे पुरुषको पत्नीवियोग अथवा स्त्रीको पतिवियोग न हो तथा शोक एवं रोगका भय और दुःख न हो, वह व्रत बतलाइये ॥ १ ॥<br><br>**श्रीभगवान्ने कहा—**ब्रह्मन्! श्रावणमासके कृष्ण-पक्षकी द्वितीया तिथिको मधुसूदनभगवान् केशव लक्ष्मीसहित सदा क्षीरसागरमें निवास करते हैं, अतः उस तिथिको जो मनुष्य भगवान् गोविन्दकी पूजा कर सात सौ कल्पोंतक फल देनेवाली गौ, पृथ्वी और सुवर्णका दान करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यह द्वितीया अशून्यशयना* नामसे प्रसिद्ध है; इस दिन विधिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन कर इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंद्वारा प्रार्थना करनी चाहिये—<br>‘लक्ष्मीकान्त! आप श्रीवत्सको धारण करनेवाले, धन-सम्पत्तिके निधि और सौन्दर्यके अधीश्वर हैं। अविनाशी भगवन्! मेरा धर्म, अर्थ और कामको सिद्ध करनेवाला गृहस्थ-आश्रम कभी विनाशको न प्राप्त हो। पुरुषोत्तम! मेरे गृहमें अग्नियों और इष्ट देवताओंका कभी अभाव न हो, मेरे पितरोंका विनाश न हो और दाम्पत्य—पति-पत्नी (रूप-व्यवहार)-में कभी भेद-भाव न उत्पन्न हो। |
* इस व्रतकी विस्तृत विधि वामनपुराणके १६ वें अध्यायमें है। पर यह वहाँ तथा पद्म, भविष्यादिमें कुछ अन्तरसे प्रायः इसी प्रकार निर्दिष्ट है।
७५ विशोकसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२७८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लक्ष्मा वियुज्यते देव न कदाचिद् यथा भवान्।<br>तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम्॥ ७<br>लक्ष्मा न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथैव मधुसूदन॥ ८<br>गीतवादित्रनिर्घोषं देवदेवस्य कीर्तयेत्।<br>घण्टा भवेदशक्तस्य सर्ववाद्यमयी यतः॥ ९ | देवाधिदेव! जैसे आप कभी लक्ष्मीसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार मेरा भी स्त्री-सम्बन्ध कभी खण्डित न हो। वरदाता मधुसूदन! जिस प्रकार आपकी शय्या कभी लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, उसी तरह मेरी भी शय्या स्त्रीसे शून्य न हो।' इस प्रकार प्रार्थना कर गाने-बजानेके माङ्गलिक शब्दोंके साथ-साथ देवाधिदेव भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। जो गीत-वाद्यके आयोजनमें असमर्थ हो, उसे घण्टाका शब्द कराना चाहिये; क्योंकि घण्टा समस्त बाजोंके समान माना गया है॥ २-९॥ |
| एवं सम्पूज्य गोविन्दमश्नीयात् तैलवर्जितम्।<br>नक्तमक्षारलवणं यावत् तत् स्याच्चतुष्टयम्॥ १०<br>ततः प्रभाते संजाते लक्ष्मीपतिसमन्विताम्।<br>दीपान्नभाजनैर्युक्तां शय्यां दद्याद् विलक्षणाम्॥ ११<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुताम् ।<br>अभीष्टोपस्करैर्युक्तां शुक्लपुष्पाम्बरावृताम्॥ १२<br>सोपधानकविश्रामां फलैर्नानाविधैर्युताम्।<br>तथाऽऽभरणधान्यैश्च यथाशक्त्या समन्विताम्॥ १३<br>अव्यङ्गाङ्गाय विप्राय वैष्णवाय कुटुम्बिने।<br>दातव्या वेदविदुषे भावेनापतिताय च॥ १४<br>तत्रोपवेश्य दाम्पत्यमलं कृत्य विधानतः।<br>पत्न्यास्तु भाजनं दद्याद् भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्॥ १५<br>ब्राह्मणस्यापि सौवर्णीमुपस्करसमन्विताम्।<br>प्रतिमां देवदेवस्य सोदकुम्भां निवेदयेत्॥ १६ | इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी पूजा करके रातमें एक बार तेल और क्षार नमकसे रहित अन्नका भोजन करे। ऐसा भोजन तबतक करे, जबतक इस व्रतकी चार आवृत्ति न हो जाय (चार मासतक ऐसा ही भोजन करना चाहिये)। तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर एक विलक्षण शय्याका भी दान करनेका विधान है। वह शय्या गद्दा, श्वेत चादर और विश्रामोपयोगी तकियेसे सुशोभित हो; उसपर भगवान् लक्ष्मीपतिकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित हो; उसके निकट दीपक, अन्नके पात्र, खड़ाऊँ, जूता, छाता, चँवर और आसन रखे गये हों; वह अभीष्ट सामग्रियोंसे युक्त हो, उसपर श्वेत पुष्प बिखेरे गये हों, वह नाना प्रकारके ऋतुफलोंसे सम्पन्न हो तथा अपनी शक्तिके अनुसार आभूषण और अन्न आदिसे समन्वित हो। इस प्रकार वह शय्या ऐसे ब्राह्मणको देनी चाहिये, जिसका कोई अङ्ग विकृत न हो तथा जो विष्णु-भक्त, परिवारवाला, वेदज्ञ और आचरणसे पतित न हो। फिर उस शय्यापर द्विजदम्पतिको बैठाकर विधानके अनुसार उन्हें अलंकृत करे। उस समय पत्नीको भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थोंसे युक्त बर्तन दान करे और ब्राह्मणको सभी उपकरणोंसे युक्त देवाधिदेव विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमा जलपूर्ण घटके साथ निवेदित करे। (तत्पश्चात् ब्राह्मणको विदा कर व्रत समाप्त करे) ॥ १०-१६॥ |
| एवं यस्तु पुमान् कुर्यादशून्यशयनं हरेः।<br>वित्तशाठ्येन रहितो नारायणपरायणः॥ १७<br>न तस्य पत्न्या विरहः कदाचिदपि जायते।<br>नारी वा विधवा ब्रह्मन् यावच्चन्द्रार्कतारकम्।<br>न विरूपौ न शोकार्तौ दम्पती भवतः क्वचित्॥ १८ | ब्रह्मन्! इस प्रकार जो पुरुष श्रीहरिके अशून्यशयनव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे कभी पत्नी-वियोग नहीं होता तथा सधवा अथवा विधवा नारी नारायणपरायण होकर कृपणता छोड़कर इसका अनुष्ठान करती है, वह दम्पति सूर्य-चन्द्रमाके स्थितिपर्यन्त न तो कभी शोकसे दुःखी होते हैं और न उनका रूप ही विकृत होता है। साथ ही |
७६ फलसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७२ * | २७९ |
|---|
| न पुत्रपशुरत्नानि क्षयं यान्ति पितामह।<br><br>समकल्पसहस्राणि समकल्पशतानि च।<br>कुर्वन्नशून्यशयनं विष्णुलोके महीयते॥ १९॥ | उनके पुत्र, पशु और धन आदिका विनाश नहीं होता। पितामह! अशून्यशयनव्रतका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सात हजार सात सौ कल्पोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १७-१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽशून्यशयनव्रतं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अशून्यशयनव्रत नामक इकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७१॥
बहत्तरवाँ अध्याय
अङ्गारक-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
|---|---|
| शृणु चान्यद् भविष्यं यद् रूपसम्पत्प्रदायकम्।<br>भविष्यति युगे तस्मिन् द्वापरान्ते पितामह।<br>पिप्पलादस्य संवादो युधिष्ठिरपुरःसरैः॥ १॥<br>वसन्तं नैमिषारण्ये पिप्पलादं महामुनिम्।<br>अभिगम्य तदा चैनं प्रश्नमेकं करिष्यति।<br>युधिष्ठिरो धर्मपुत्रो धर्मयुक्तस्तपोधनम्॥ २॥ | पितामह! अब भविष्यमें घटित होनेवाले एक अन्य व्रतके वृत्तान्तको सुनो, जो सुन्दरता और सम्पत्ति प्रदान करनेवाला है। उसी द्वापरयुगके अन्तमें युधिष्ठिर आदिके साथ महर्षि पिप्पलादका संवाद होगा। उस समय तपस्वी महामुनि पिप्पलादके नैमिषारण्यमें निवास करते समय धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर उनके निकट जाकर एक प्रश्न करेंगे॥ १-२॥ |
| युधिष्ठिर उवाच | युधिष्ठिर पूछेंगे— |
| कथमारोग्यमैश्वर्यं मतिर्धर्मे गतिस्तथा।<br>अव्यङ्गता शिवे भक्तिर्वैष्णवो वा भवेत् कथम्॥ ३॥ | नीरोगता, ऐश्वर्य, धर्ममें बुद्धि तथा गति, अव्यङ्गता (शरीरके सभी अङ्गोंकी पूर्णता) तथा शिव एवं विष्णुमें अनुपम भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?॥ ३॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
| तस्योत्तरमिदं ब्रह्मन् पिप्पलादस्य धीमतः।<br>शृणुष्व यद् वक्ष्यति वै धर्मपुत्राय धार्मिकः॥ ४॥ | ब्रह्मन्! (इस विषयमें) उन बुद्धिमान् पिप्पलादका वह उत्तर सुनो, जो वे धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिरसे कहेंगे॥ ४॥ |
| पिप्पलाद उवाच | पिप्पलाद कहेंगे— |
| साधु पृष्टं त्वया भद्र इदानीं कथयामि ते।<br>अङ्गारव्रतमित्येतत् स वक्ष्यति महीपतेः॥ ५॥<br>अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।<br>विरोचनस्य संवादं भार्गवस्य च धीमतः॥ ६॥<br>प्रह्लादस्य सुतं दृष्ट्वा द्विरष्टपरिवत्सरम्।<br>रूपेणाप्रतिमं कान्त्या सोऽहसद् भृगुनन्दनः॥ ७॥<br>साधु साधु महाबाहो विरोचन शिवं तव।<br>तत् तथा हसितं तस्य पप्रच्छ सुरसूदनः॥ ८॥ | भद्र! आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है, अब मैं आपको इस अङ्गारक-व्रतको बतला रहा हूँ। यों कहकर वे मुनि राजा युधिष्ठिरसे इस व्रतका (इस प्रकार) वर्णन करेंगे। महाराज युधिष्ठिर! इस विषयमें एक पुरातन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जो विरोचन और बुद्धिमान् शुक्राचार्यके संवाद (रूप)-में है। एक बार प्रह्लादके षोडशवर्षीय पुत्र विरोचनको देखकर, जो अनुपम सौन्दर्यशाली और कान्तिमान् था, भृगुनन्दन शुक्राचार्य हँस पड़े और उससे बोले—'महाबाहु विरोचन! तुम धन्य हो, तुम्हारा कल्याण हो।' उन्हें उस प्रकार हँसते देखकर देवशत्रु विरोचनने |
२८० * मत्स्यपुराण *
| ब्रह्मन् किमर्थमेतत् ते हास्यमाकस्मिकं कृतम्।<br>साधु साध्विति मामेवमुक्तवांस्त्वं वदस्व मे॥ ९<br><br>तमेवंवादिनं शुक्र उवाच वदतां वरः।<br>विस्मयाद् व्रतमाहात्म्याद्धास्यमेतत् कृतं मया॥ १०<br><br>पुरा दक्षविनाशाय कुपितस्य तु शूलिनः।<br>अथ तद्भीमवक्त्रस्य स्वेदबिन्दुर्ललाटजः॥ ११<br><br>भित्त्वा स सप्त पातालाानदहत् सप्त सागरान्।<br>अनेकवक्त्रनयनो ज्वलज्ज्वलनभीषणः॥ १२<br><br>वीरभद्र इति ख्यातः करपादायुतैर्युतः।<br>कृत्वासौ यज्ञमथनं पुनर्भूतलसम्भवः।<br>त्रिजगन्निर्दहन् भूयः शिवेन विनिवारितः॥ १३<br><br>कृतं त्वया वीरभद्र दक्षयज्ञविनाशनम्।<br>इदानीमलमेतेन लोकदाहेन कर्मणा॥ १४<br><br>शान्तिप्रदाता सर्वेषां ग्रहाणां प्रथमो भव।<br>प्रेक्षिष्यन्ते जनाः पूजां करिष्यन्ति वरान्मम॥ १५<br><br>अङ्गारक इति ख्यातिं गमिष्यसि धरात्मज।<br>देवलोकेऽद्वितीयं च तव रूपं भविष्यति॥ १६<br><br>ये च त्वां पूजयिष्यन्ति चतुर्थ्यां त्वद्दिने नराः।<br>रूपमारोग्यमैश्वर्यं तेष्वनन्तं भविष्यति॥ १७<br><br>एवमुक्तस्तदा शान्तिमगमत् कामरूपधृक्।<br>संजातस्तत्क्षणाद् राजन् ग्रहत्वमगमत् पुनः॥ १८<br><br>स कदाचिद् भवांस्तस्य पूजार्घ्यादिकमुत्तमम्।<br>दृष्टवान् क्रियमाणं च शूद्रेण च व्यवस्थितः॥ १९<br><br>तेन त्वं रूपवाञ्जातः सुरशत्रुकुलोद्वह।<br>विविधा च रुचिर्जाता यस्मात् तव विदूरगा॥ २०<br><br>विरोचन इति प्राहुस्तस्मात् त्वां देवदानवाः।<br>शूद्रेण क्रियमाणस्य व्रतस्य तव दर्शनात्।<br>ईदृशीं रूपसम्पत्तिं दृष्ट्वा विस्मितवानहम्॥ २१ | उनसे पूछा—'ब्रह्मन्! आपने किस प्रयोजनसे यह आकस्मिक हास्य किया है और मुझे 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है? इसका कारण मुझे बतलाइये।' इस प्रकार पूछनेपर विरोचनसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने कहा—'व्रतके माहात्म्यसे आश्चर्यचकित होकर मैंने यह हास्य किया है। (उस प्रसङ्गको सुनो—) पूर्वकालमें दक्ष-यज्ञका विनाश करनेके लिये जब भयंकर मुखवाले त्रिशूलधारी भगवान् शंकर कुपित हो उठे, तब उनके ललाटसे पसीनेकी एक बूँद टपक पड़ी। वह स्वेदबिन्दु अनेकों मुखों, नेत्रों और दस सहस्र हाथ-पैरोंसे युक्त एक पुरुषाकारमें परिणत हो गया। वह प्रज्वलित अग्निके समान भयंकर पुरुष वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ। उसने सातों पातालोंका भेदन कर सातों सागरोंको भस्म कर दिया। पुनः दक्ष-यज्ञका विध्वंस कर वह भूतलपर आ धमका और त्रिलोकीको जला डालनेके लिये उद्यत हुआ। यह देखकर शिवजीने उसे रोक दिया॥ ५—१३॥<br><br>फिर उन्होंने उसे मना करते हुए कहा—'वीरभद्र! तुमने दक्ष-यज्ञका विनाश तो कर ही दिया, अब तुम अपने इस लोक-दहनरूप क्रूर कर्मको बंद कर दो। मेरे वरदानसे तुम सभी ग्रहोंके लिये शान्ति-प्रदायक बनो और सर्वप्रथम स्थान ग्रहण करो। लोग तुम्हारा दर्शन और पूजन करेंगे। पृथ्वीनन्दन! तुम अङ्गारक नामसे ख्याति प्राप्त करोगे और देवलोकमें तुम्हारा अनुपम रूप होगा। जो मनुष्य तुम्हारा जन्मदिन चतुर्थी तिथि आनेपर तुम्हारी पूजा करेंगे उन्हें अनन्त सौंदर्य, नीरोगता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी।' शिवजीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला वीरभद्र तुरंत शान्त हो गया। राजन्! पुनः उसी क्षण (पृथ्वीसे) उत्पन्न होकर उसने ग्रहका स्थान प्राप्त कर लिया। असुरकुलोद्वह! किसी समय शूद्रद्वारा व्यवस्थितरूपसे की जाती हुई उसकी अर्घ्य आदिसे सम्पन्न श्रेष्ठ पूजाको तुमने देख लिया था, इसी कारण तुम सुन्दररूपसे युक्त होकर पैदा हुए हो और तुम्हारी रुचि—प्रतिभा विभिन्न प्रकारके ज्ञानोंवाली और दूरगामिनी है। इसी कारण देवता और दानव तुम्हें विरोचन नामसे पुकारते हैं। शूद्रद्वारा किये जाते हुए व्रतके दर्शनसे प्राप्त हुई तुम्हारी इस प्रकारकी रूप- |
७७ शर्करासप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७२ * | २८१ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| साधु साध्विति तेनोक्तमहो माहात्म्यमुत्तमम्।<br>पश्यतोऽपि भवेद् रूपमैश्वर्यं किमु कुर्वतः॥ २२<br>यस्माच्च भक्त्या धरणीसुतस्य<br>विनिन्द्यमानेन गवादिदानम्।<br>आलोकितं तेन सुरारिगर्भै<br>सम्भूतिरेषा तव दैत्य जाता॥ २३ | सम्पत्तिको देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। इसी कारण मैंने 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है। अहो! यह कैसा उत्तम माहात्म्य है कि जब देखनेवालेको भी ऐसी सुन्दरता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति हो जाती है, तब करनेवालेकी तो बात ही क्या है। दितिवंशज! चूँकि तुमने पृथ्वीपुत्र वीरभद्रके व्रतमें भक्तिपूर्वक दिये जाते हुए गो-दान आदि दानोंको अवहेलनापूर्वक देखा था, इसीलिये तुम्हारी उत्पत्ति राक्षस-योनिमें हुई है॥ १४—२३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>अथ तद् वचनं श्रुत्वा भार्गवस्य महात्मनः।<br>प्रह्लादनन्दनो वीरः पुनः पप्रच्छ विस्मितः॥ २४ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! महात्मा शुक्राचार्यके उस वचनको सुनकर प्रह्लाद-नन्दन विरोचनने विस्मय-विमुग्ध हो पुनः प्रश्न किया॥ २४॥ |
| विरोचन उवाच<br>भगवंस्तद् व्रतं सम्यक् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>दीयमानं तु यद् दानं मया दृष्टं भवान्तरे॥ २५<br>माहात्म्यं च विधिं तस्य यथावद् वक्तुमर्हसि।<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा कविः प्रोवाच विस्तरात्॥ २६ | विरोचनने पूछा— भगवन्! जन्मान्तरमें मैंने जिसके दिये जाते हुए दानको देखा था, उस व्रतको भलीभाँति आनुपूर्वी सुनना चाहता हूँ। आप मुझे उसके विधान और माहात्म्यको यथार्थ रूपसे बतलाइये। इस प्रकार विरोचनकी बात सुनकर शुक्राचार्यने विस्तारपूर्वक कहना प्रारम्भ किया॥ २५-२६॥ |
| शुक्र उवाच<br>चतुर्थ्यङ्गारकदिने यदा भवति दानव।<br>मृदा स्नानं तदा कुर्यात् पद्मरागविभूषितः॥ २७<br>अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्रं जपंस्तिष्ठेदूदङ्मुखः।<br>शूद्रस्तूष्णीं स्मरन् भौममास्ते भोगविवर्जितः॥ २८<br>अथास्तमित आदित्ये गोमयेनानुलेपयेत्।<br>प्राङ्गणं पुष्पमालाभिरक्षताभिः समंततः॥ २९<br>अभ्यर्च्यीभिलिखेत् पद्मं कुङ्कुमेनाष्टपत्रकम्।<br>कुङ्कुमस्याप्यभावे तु रक्तचन्दनमिष्यते॥ ३०<br>चत्वारः करकाः कार्या भक्ष्यभोज्यसमन्विताः।<br>तण्डुलै रक्तशालीयैः पद्मरागैश्च संयुताः॥ ३१<br>चतुष्कोणेषु तान् कृत्वा फलानि विविधानि च।<br>गन्धमाल्यादिकं सर्वं तथैव विनिवेशयेत्॥ ३२<br>सुवर्णशृङ्गीं कपिलामथार्च्य<br>रौप्यैः खुरैः कांस्यदुहां सवत्साम्।<br>धुरंधरं रक्तखुरं च सौम्यं<br>धान्यानि समाम्बरसंयुतानि॥ ३३ | शुक्र बोले— दानव! जब मंगलवारको चतुर्थी तिथि पड़ जाय तो उस दिन शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करे और पद्मरागमणिकी अँगूठी आदि धारण करके उत्तराभिमुख बैठकर 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०—' इस मन्त्रका जप करता रहे। यदि व्रती शूद्र हो तो उसे भोगसे दूर रहकर चुपचाप मंगलका स्मरण करते हुए दिन बिताना चाहिये। फिर सूर्यास्त हो जानेपर आँगनको गोबरसे लीपकर सर्वाङ्गसुन्दर पुष्पमाला आदिसे चारों ओर पूजा कर दे। आँगनके मध्यमें कुङ्कुमसे अष्टदल कमलकी रचना करे। कुङ्कुमका अभाव हो तो लाल चन्दनसे काम चलाना चाहिये। फिर आँगनके चारों कोनोंमें चार करवा स्थापित करे, जिन्हें लाल अगहनीके चावलसे भरकर उनके ऊपर पद्मरागमणि रख दे। वे भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भी संयुक्त रहें। उनके निकट नाना प्रकारके ऋतुफल, चन्दन, पुष्पमाला आदि सभी पूजन-सामग्री भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् बछड़ेसहित एक कपिला गौका पूजन करे, जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा उसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो। इसी प्रकार लाल खुरोंसे युक्त सौम्य स्वभाववाले हृष्ट-पुष्ट एक वृषभकी भी पूजा करे और उसके निकट |
७८ कमलसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२८२ * मत्स्यपुराण *
| अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव सौवर्णमत्यायतबाहुदण्डम् ।<br>चतुर्भुजं हेममये निविष्टं पात्रे गुडस्योपरि सर्पिषा युतम् ॥ ३४ | सात वस्त्रोंसे युक्त धान्यराशि भी प्रस्तुत कर दे। फिर अँगुठेके बराबर लम्बाई-चौड़ाईवाली एक पुरुषाकार मूर्ति बनवाये, जो चार बड़ी भुजाओंसे संयुक्त हो। उसे गुड़के ऊपर रखे हुए स्वर्णमय पात्रमें स्थापित कर दे और उसके निकट घी भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् | | सामस्वरज्ञाय जितेन्द्रियाय पात्राय शीलान्वयसंयुताय ।<br>दातव्यमेतत् सकलं द्विजाय कुटुम्बिने नैव तु दाम्भिकाय ।<br>समर्पयेद् विप्रवराय भक्त्या कृताञ्जलिः पूर्वमुदीर्य मन्त्रम् ॥ ३५ | मूर्तिसहित ये सारी वस्तुएँ ऐसे सुपात्र ब्राह्मणको दान करनी चाहिये, जो सामवेदके स्वर एवं अर्थका ज्ञाता, जितेन्द्रिय, सुशील, कुलीन और विशाल कुटुम्बवाला हो। दाम्भिकको कभी दान नहीं देना चाहिये। उस समय भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण करते हुए ऐसे द्विजवरको सारा सामान समर्पित कर दे। | | भूमिपुत्र महातेजः स्वेदोद्भव पिनाकिनः ।<br>रूपार्थी त्वां प्रपन्नोऽहं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ ३६ | (उस मन्त्रका भाव इस प्रकार है—) 'महातेजस्वी भूमिपुत्र! आप पिनाकधारी भगवान् शिवके स्वेदबिन्दुसे उद्भूत हुए हैं। मैं सौन्दर्यका अभिलाषी होकर आपकी शरणमें आया हूँ। आपको मेरा नमस्कार है। आप मेरे द्वारा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण कीजिये।' | | मन्त्रेणानेन दत्त्वार्घ्यं रक्तचन्दनवारिणा ।<br>ततोऽर्चयेद् विप्रवरं रक्तमाल्याम्बरादिभिः ॥ ३७ | इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक लाल चन्दनमिश्रित जलसे अर्घ्य देनेके पश्चात् लाल पुष्पोंकी माला और लाल रंगके वस्त्र आदि उपकरणोंसे उन द्विजवरकी अर्चना करे और | | दद्यात् तेनैव मन्त्रेण भौमं गोमिथुनान्वितम् ।<br>शय्यां च शक्तितो दद्यात् सर्वोपस्करसंयुताम् ॥ ३८ | इसी मन्त्रको पढ़कर गौ एवं वृषभसहित मङ्गलकी स्वर्णमयी मूर्तिको उन्हें दान कर दे। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्याका भी दान करना चाहिये। | | यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे ।<br>तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षय्यमिच्छता ॥ ३९ | साथ ही दाताको लोकमें जो-जो वस्तुएँ अधिक इष्ट हों तथा अपने घरमें भी जो अधिक प्रिय हों, उन सबको अक्षय्यरूपमें प्राप्त करनेकी अभिलाषासे गुणवान् (ब्राह्मण)-को देना चाहिये। | | प्रदक्षिणं ततः कृत्वा विसर्ज्य द्विजपुङ्गवम् ।<br>नक्तमक्षारलवणमश्नीयाद् घृतसंयुतम् ॥ ४० | तदनन्तर उन द्विजश्रेष्ठकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा कर दे तथा स्वयं रातमें एक बार क्षारनमकरहित एवं घृतयुक्त अन्नका भोजन करे। | | भक्त्या यस्तु पुनः कुर्याद्देवमङ्गारकाष्टकम् ।<br>चतुरो वाथवा तस्य यत् पुण्यं तद् वदामि ते ॥ ४१ | इस प्रकार जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पुनः इस अङ्गारक-व्रतका आठ अथवा चार बार अनुष्ठान करता है, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। | | रूपसौभाग्यसम्पन्नः पुनर्जन्मनि जन्मनि ।<br>विष्णौ वाथ शिवे भक्तः सप्तद्वीपाधिपो भवेत् ॥ ४२ | वह मनुष्य प्रत्येक जन्ममें सुन्दरता और सौभाग्यसे सम्पन्न होकर विष्णु अथवा शिवकी भक्तिमें लीन होता है और सातों द्वीपोंका अधीश्वर हो जाता है | | सप्तकल्पसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते ।<br>तस्मात् त्वमपि दैत्येन्द्र व्रतमेतत् समाचर ॥ ४३ | तथा सात हजार कल्पोंतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसलिये दैत्येन्द्र! तुम भी इस व्रतका अनुष्ठान करो॥ २७—४३॥ | | पिप्पलाद उवाच | पिप्पलादने कहा— | | इत्येवमुक्त्वा भृगुनन्दनोऽपि<br>जगाम दैत्यश्च चकार सर्वम् । | राजन्! इस प्रकार व्रतका विधान बतलाकर शुक्राचार्य चले गये। तत्पश्चात् दैत्य विरोचनने पूरी विधिके साथ उस व्रतका अनुष्ठान किया। |
७९ मन्दारसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७३ * | २८३ |
|---|
| त्वं चापि राजन् कुरु सर्वमेतद्<br>यतोऽक्षयं वेदविदो वदन्ति ॥ ४४ | इसलिये आप भी इन सारे विधानोंके साथ इस व्रतका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि वेदवेत्तालोग इसका फल अक्षय बतलाते हैं ॥ ४४ ॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! तब अद्भुत पराक्रमपूर्ण कर्मोंको करनेवाले युधिष्ठिरने 'तथेति—ऐसा ही करूँगा'—कहकर महर्षि पिप्पलादकी विधिवत् पूजा की और उनके वचनोंका पालन किया। जो मनुष्य अनन्यचित्तसे इस व्रत-विधानका श्रवण करता है, भगवान् उसकी सिद्धिका भी विधान करते हैं ॥ ४५ ॥ |
| तथेति सम्पूज्य स पिप्पलादं<br>वाक्यं चकाराद्भुतवीर्यकर्मा।<br>शृणोति यश्चैनमनन्यचेता-<br>स्तस्यापि सिद्धिं भगवान् विधत्ते ॥ ४५ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽङ्गारकव्रतं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गारकव्रत नामक बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥
तिहत्तरवाँ अध्याय
शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि
| पिप्पलाद उवाच | पिप्पलादने कहा— |
|---|---|
| अथातः शृणु भूपाल प्रतिशुक्रं प्रशान्तये।<br>यात्रारम्भेऽवसाने च तथा शुक्रोदये त्विह ॥ १ | भूपाल! अब मैं विपरीत शुक्रकी* शान्तिके लिये विधान बतला रहा हूँ, सुनिये। इस लोकमें शुक्रके उदयकालमें यात्राके आरम्भ अथवा समाप्तिके अवसरपर शुक्रकी एक चाँदीकी मूर्ति बनवाये, उसे श्वेत मुक्ताफल (मोती)-के साथ श्वेत चावलसे परिपूर्ण सुवर्ण, चाँदी अथवा काँसेके पात्रके ऊपर स्थापित करके श्वेत पुष्प और श्वेत वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर इस वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण कर वह सारा सामान सामवेदके ज्ञाता (सस्वर गान करनेवाले) ब्राह्मणको निवेदित कर दे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर! आपको नमस्कार है। भृगुनन्दन! आपको प्रणाम है। कवे! मैं आपको अभिवादन करता हूँ। आप मेरी समस्त कामनाओंकी पूर्तिके लिये यह अर्घ्य ग्रहण करें।' भारत! जो मनुष्य शुक्रके विपरीत रहनेपर यात्रा आदि कार्योंमें इस प्रकार विधान करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें |
| राजते वाथ सौवर्णे कांस्यपात्रेऽथवा पुनः।<br>शुक्लपुष्पाम्बरयुते सिततण्डुलपूरिते ॥ २ | |
| विधाय रजतं शुक्रं शुचिमुक्ताफलान्वितम्।<br>मन्त्रेणानेन तत् सर्वं सामगाय निवेदयेत् ॥ ३ | |
| नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते भृगुनन्दन।<br>कवे सर्वार्थसिद्धयर्थं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ ४ | |
| एवमस्योदये कुर्वन् यात्रादिषु च भारत।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते ॥ ५ |
* ज्योतिषप्रकाश, रत्नमाला, गर्गसंहिता आदिमें शुक्रके सामने यात्रा अत्यन्त हानिकर कही गयी है। ज्योतिर्निबन्ध आदिमें प्रतिकूल शुक्र-शान्तिके लिये कई श्रेष्ठ स्तोत्र तथा 'रेवतीसे कृतिका'-तकमें उन्हें अन्धा बतलाकर यात्रा-विधान निर्दिष्ट है। वहाँ 'मत्स्यपुराण' के ही नामसे—'चतुःशालं चतुर्द्वारम्' आदि श्लोकको उद्धृत कर चार दरवाजेके मकानोंमें शुक्रदोष नहीं माना गया है। सम्भवतः वे श्लोक पहले मत्स्यपुराणमें यहाँ प्राप्त थे। ज्योतिर्निबन्धकी विषयवस्तु इससे बहुधा मिलती है। वहाँ १०वें श्लोकमें इसी प्रकार अर्घ्यदानकी बात आयी है।
२८४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यावच्छुक्रस्य न कृता पूजा संमाल्यकैः शुभैः।<br>वटकैः पूरिकाभिश्च गोधूमैश्चणकैरपि।<br>तावदन्नं न चाश्नीयात् त्रिभिः कामार्थसिद्धये ॥ ६<br><br>तद्वद् वाचस्पतेः पूजां प्रवक्ष्यामि युधिष्ठिर।<br>सुवर्णपात्रे सौवर्णममरेशपुरोहितम् ॥ ७<br><br>पीतपुष्पाम्बरयुतं कृत्वा स्नात्वाथ सर्षपैः।<br>पलाशाश्वत्थयोगेन पञ्चगव्यजलेन च॥ ८<br><br>पीताङ्गरागवसनो घृतहोमं तु कारयेत्।<br>प्रणम्य च गवा सार्धं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ ९<br><br>नमस्तेऽङ्गिरसां नाथ वाक्पते च बृहस्पते।<br>क्रूरग्रहैः पीडितानाममृताय नमो नमः॥ १०<br><br>संक्रान्तावस्य कौन्तेय यात्रास्वभ्युदयेषु च।<br>कुर्वन् बृहस्पतेः पूजां सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ११ | विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। शुक्रकी वह पूजा जबतक माङ्गलिक पुष्पमाला, बड़ा, पूरी, गेहूँ और चनाद्वारा सम्पन्न न कर ली जाय, तबतक धर्म, अर्थ और कामकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको अपनी मनोरथ-सिद्धिके लिये भोजन नहीं करना चाहिये॥ १—६॥<br><br>युधिष्ठिर ! इसी प्रकार मैं बृहस्पतिकी भी पूजा-विधि बतला रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि वह सरसों, पलाश, पीपल और पञ्चगव्यसे युक्त जलसे स्नान करे, पीला वस्त्र पहनकर शरीरमें पीला अङ्गराग, चन्दन आदिका अनुलेप करे और ब्राह्मणद्वारा घीका हवन करावे। तत्पश्चात् मूर्तिको प्रणाम करके गौसहित उसे ब्राह्मणको दान कर दे। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'वाणीके अधीश्वर ! आप अङ्गिरा-वंशियोंके स्वामी हैं। बृहस्पते ! क्रूर ग्रहोंसे पीड़ित प्राणियोंके लिये आप अमृततुल्य फलदाता हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।' कुन्तीनन्दन ! सूर्यकी संक्रान्तिके दिन, यात्राओंमें तथा अन्यान्य आभ्युदयिक कार्योंके अवसरपर बृहस्पतिकी पूजा करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ७—११॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे गुरुशुक्रपूजाविधिर्नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुक्र-गुरु-पूजाविधि नामक तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७३॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
कल्याणसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ब्रह्मोवाच<br>भगवन् भवसंसारसागरोत्तारकारक।<br>किञ्चिद् व्रतं समाचक्ष्व स्वर्गारोग्यसुखप्रदम् ॥ १<br><br>ईश्वर उवाच<br>सौरं धर्मं प्रवक्ष्यामि नाम्ना कल्याणसप्तमीम्।<br>विशोकसप्तमीं तद्वत् फलाढ्यां पापनाशिनीम् ॥ २<br><br>शर्करासप्तमीं पुण्यां तथा कमलसप्तमीम्।<br>मन्दारसप्तमीं तद्वच्छुभदां शुभसप्तमीम् ॥ ३ | **ब्रह्माने पूछा—**भगवन् ! आप तो भवसागररूपी संसारसे उद्धार करनेवाले हैं, अतः कोई ऐसा व्रत बताइये जो स्वर्ग, नीरोगता और सुखका प्रदाता हो ॥ १ ॥<br><br>**ईश्वरने कहा—**ब्रह्मन् ! अब मैं सूर्यसे सम्बन्धित धर्म (व्रत)-का वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें कल्याणसप्तमी, विशोकसप्तमी, पापनाशिनी फलसप्तमी, पुण्यदायिनी शर्करासप्तमी, कमलसप्तमी, मन्दारसप्तमी तथा मङ्गलप्रदायिनी शुभसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है। |
८० शुभसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७४ * | २८५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वानन्तफलाः प्रोक्ताः सर्वा देवर्षिपूजिताः।<br>विधानमासां वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः॥ ४ | ये सभी सप्तमियाँ* देवर्षियोंद्वारा पूजित हैं तथा अनन्त फल देनेवाली कही गयी हैं। मैं इनके विधानको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ॥२-४॥ |
| यदा तु शुक्लसप्तम्यादादित्यस्य दिनं भवेत्।<br>सा तु कल्याणिनी नाम विजया च निगद्यते ॥ ५<br><br>प्रातर्गव्येन पयसा स्नानमस्यां समाचरेत्।<br>ततः शुक्लाम्बरः पद्ममक्षताभिः प्रकल्पयेत्॥ ६<br><br>प्राङ्मुखोऽष्टदलं मध्ये तद्वद् वृत्तां च कर्णिकाम्।<br>पुष्पाक्षतैश्च देवेशं विन्यसेत् सर्वतः क्रमात्॥ ७<br><br>पूर्वेण तपनायेति मार्तण्डायेति चानले।<br>याम्ये दिवाकरायेति विधात्र इति नैर्ऋते ॥ ८<br><br>पश्चिमे वरुणायेति भास्करायेति चानिले।<br>सौम्ये विकर्तनायेति रवये चाष्टमे दले॥ ९<br><br>आदावन्ते च मध्ये च नमोऽस्तु परमात्मने।<br>मन्त्रैरेभिः समभ्यर्च्य नमस्कारान्तदीपितैः ॥ १०<br><br>शुक्लवस्त्रैः फलैर्भक्ष्यैर्धूपमाल्यानुलेपनैः।<br>स्थण्डिले पूजयेद् भक्त्या गुडेन लवणेन च॥ ११<br><br>ततो व्याहृतिमन्त्रेण विसृजे द्विजपुङ्गवान्।<br>शक्तितः पूजयेद् भक्त्या गुडक्षीरघृतादिभिः।<br>तिलपात्रं हिरण्यं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १२<br><br>एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>कृतस्नानजपो विप्रैः सहैव घृतपायसम्॥ १३<br><br>भुक्त्वा च वेदविदुषे विडालव्रतवर्जिते।<br>घृतपात्रं सकनकं सोदकुम्भं निवेदयेत्॥ १४<br><br>प्रीयतामत्र भगवान् परमात्मा दिवाकरः।<br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत् ॥ १५<br><br>ततस्त्रयोदशे मासि गा वै दद्यात् त्रयोदश।<br>वस्त्रालङ्कारसंयुक्ताः सुवर्णास्याः पयस्विनीः ॥ १६<br><br>एकामपि प्रदद्याद् वा वित्तहीनो विमत्सरः।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत यतो मोहात् पतत्यधः ॥ १७ | जब शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको रविवार पड़ जाय तो उस सप्तमीको कल्याणिनी (नामसे) कहा जाता है। उसीका दूसरा नाम विजया भी है। व्रतीको चाहिये कि वह उस दिन प्रातःकाल उठकर गोदुग्धयुक्त जलसे स्नान करनेके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण करे। फिर पूर्वाभिमुख हो चावलोंद्वारा अष्टदल कमल बनावे। उसके मध्यभागमें उसी आकारवाली कर्णिकाकी भी रचना करे। तत्पश्चात् पुष्प और अक्षतद्वारा क्रमशः सब ओर देवेश्वर सूर्यकी स्थापना करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'तपनाय नमः' से पूर्वदलपर, 'मार्तण्डाय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'दिवाकराय नमः' से दक्षिणदलपर, 'विधात्रे नमः' से नैर्ऋत्यकोणके दलपर, 'वरुणाय नमः' से पश्चिमदलपर, 'भास्कराय नमः' से वायव्यकोणवाले दलपर, 'विकर्तनाय नमः' से उत्तरदलपर, 'रवये नमः' से ईशानकोणस्थित आठवें दलपर और 'परमात्मने नमः' से आदि, मध्य और अन्तमें सूर्यका आवाहन करके स्थापित कर दे। फिर नमस्कारान्तसे सुशोभित इन मन्त्रोंका उच्चारण कर श्वेत वस्त्र, फल, नैवेद्य, धूप, पुष्पमाला और चन्दनसे भलीभाँति पूजन करे। वेदीपर भी व्याहृति-मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक गुड़ और नमकसे भक्तिपूर्वक पूजा करनेका विधान है। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। फिर अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक गुड़, दूध और घी आदिके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और तिलसे भरा हुआ पात्र और सुवर्ण ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार विधानको पूरा करके व्रती मानव रात्रिमें शयन करे और प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्म पूरा करे। तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंके साथ ही घी और दूधसे बने हुए पदार्थोंका भोजन करे। अन्तमें विडालव्रत (छल-कपट)-से रहित वेदज्ञ ब्राह्मणको सुवर्णसहित घृतपूर्ण पात्र और जलसे भरा हुआ घट दान कर दे और उस समय इस प्रकार कहे—'मेरे इस व्रतसे परमात्मा भगवान् सूर्य प्रसन्न हों।' इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सभी व्रतोंका अनुष्ठान करना चाहिये। तदनन्तर तेरहवाँ महीना आनेपर तेरह गौ दान करनेका विधान है, जो सभी दुधारू हों, वस्त्र और अलंकार आदिसे सुसज्जित हों और जिनके मुखपर सोनेका पत्र लगा हुआ हो। यदि व्रती निर्धन हो तो वह अलंकाररहित होकर एक ही गौका दान करे, किंतु कृपणता न करे; क्योंकि मोहवश कंजूसी करनेसे अधःपतन हो जाता है॥५-१७॥ |
* प्रायः ये सभी सप्तमियाँ भविष्यपुराणमें अन्य कई अधिक सप्तमीव्रतोंके साथ उपदिष्ट हैं।
८१ विशोकद्वादशी-व्रतकी विधि
| २८६ | * मत्स्यपुराण * |
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| अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कल्याणसप्तमीम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यमनन्तमिह जायते॥ १८<br>सर्वपापहरा नित्यं सर्वदैवतपूजिता।<br>सर्वदुष्टोपशमनी सदा कल्याणसप्तमी ॥ १९<br>इमामनन्तफलदां यस्तु कल्याणसप्तमीम्।<br>शृणोति पठते चेह सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २० | जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार इस कल्याणसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस लोकमें भी उसे अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है; क्योंकि यह कल्याणसप्तमी सदा समस्त पापोंको हरनेवाली और सम्पूर्ण दुष्ट ग्रहोंका शमन करनेवाली है। सभी देवता नित्य इसकी पूजा करते हैं। जो मानव इस लोकमें इस अनन्त फलप्रदायिनी कल्याणसप्तमीकी चर्चा—कथाको सुनता अथवा पढ़ता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १८—२०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कल्याणसप्तमीव्रतं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्याणसप्तमीव्रत नामक चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
विशोकसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>विशोकसप्तमीं तद्वद् वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव।<br>यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्नुते॥ १<br>माघे कृष्णातिलैः स्नात्वा षष्ठ्यां वै शुक्लपक्षतः।<br>कृताहारः कृसरया दन्तधावनपूर्वकम्।<br>उपवासव्रतं कृत्वा ब्रह्मचारी भवेन्निशि॥ २<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममर्कायेति च पूजयेत्।<br>करवीरेण रक्तेन रक्तवस्त्रयुगेन च॥ ३<br>यथा विशोकं भुवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।<br>तथा विशोकता मेऽस्तु त्वद्भक्तिः प्रतिजन्म च॥ ४<br>एवं सम्पूज्य षष्ठ्यां तु भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्।<br>सुप्त्वा सम्प्राश्य गोमूत्रमुत्थाय कृतनैत्यकः॥ ५<br>सम्पूज्य विप्रानन्नेन गुडपात्रसमन्वितम्।<br>तद्वस्त्रयुग्मं पद्मं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ६ | ईश्वरने कहा—मुनिपुङ्गव! अब मैं उसी प्रकार विशोकसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ। जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य इस लोकमें कभी शोकको नहीं प्राप्त होता। व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिको दातूनसे दाँतोंको साफ करनेके बाद काले तिलमिश्रित जलसे स्नान करे और (तिल-चावलकी) खिचड़ीका भोजन करे। फिर उपवासका व्रत लेकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रातमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो ले, फिर स्वनिर्मित कमलको स्थापित कर 'अर्काय नमः'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लाल कनेरके पुष्प और दो लाल रंगके वस्त्रोंद्वारा सूर्यकी पूजा करे और ऐसा कहे—'आदित्य! जैसे आपके द्वारा यह सारा जगत् सदा शोकरहित बना रहता है, उसी प्रकार मुझे भी प्रत्येक जन्ममें विशोकता और आपकी भक्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार षष्ठी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा कर ब्राह्मणोंका भी भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। फिर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे और प्रातःकाल उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो जाय। तत्पश्चात् अन्नद्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करके दो वस्त्र और गुड़पूर्ण पात्रसहित वह स्वर्णमय कमल ब्राह्मणको निवेदित कर दे। |
| * अध्याय ७६ * | २८७ |
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| अतैललवणं भुक्त्वा सप्तम्यां मौनसंयुतः।<br>ततः पुराणश्रवणं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ७<br>अनेन विधिना सर्वमुभयोरपि पक्षयोः।<br>कृत्वा यावत् पुनर्माघशुक्लपक्षस्य सप्तमी ॥ ८<br>व्रतान्ते कलशं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>शय्यां सोपस्करां दद्यात् कपिलां च पयस्विनीम् ॥ ९<br>अनेन विधिना यस्तु वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>विशोकसप्तमीं कुर्यात् स याति परमां गतिम् ॥ १०<br>यावज्जन्मसहस्राणां साग्रं कोटिशतं भवेत्।<br>तावन्न शोकमभ्येति रोगदौर्गत्यवर्जितः ॥ ११<br>यं यं प्रार्थयते कामं तं तमाप्नोति पुष्कलम्।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ १२<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि विशोकाख्यां च सप्तमीम्।<br>सोऽपीन्द्रलोकमाप्नोति न दुःखी जायते क्वचित् ॥ १३ | स्वयं सप्तमीको तेल और नमकसहित अन्नका भोजन करके मौन धारण कर ले। वैभवकी इच्छा रखनेवाले व्रतीको उस दिन पुराणोंकी कथाएँ सुननी चाहिये। इस विधिसे दोनों पक्षोंमें सारा कार्य तबतक करते रहना चाहिये जबतक पुनः माघमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी न आ जाय॥१—८॥<br>व्रतके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसमेत कलश, समस्त उपकरणोंसहित शय्या और दुधारू कपिला गौका दान करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य कृपणता छोड़कर उपर्युक्त विधिके अनुसार विशोकसप्तमी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है तथा करोड़ों जन्मतक उसे शोककी प्राप्ति नहीं होती। वह रोग और दुर्गतिसे रहित हो जाता है तथा जिस-जिस मनोरथकी प्रार्थना करता है, उसे-उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त करता है। जो व्रती निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस विशोकसप्तमीव्रतकी कथा या विधानको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी इस लोकमें कभी दुःखी नहीं होता और अन्तमें इन्द्रलोकको प्राप्त होता है॥९—१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकसप्तमीव्रतं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकसप्तमीव्रत नामक पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥
छियत्तरवाँ अध्याय
फलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>अन्यामपि प्रवक्ष्यामि नाम्ना तु फलसप्तमीम्।<br>यामुपोष्य नरः पापाद् विमुक्तः स्वर्गभाग् भवेत् ॥ १<br>मार्गशीर्षे शुभे मासि सप्तम्यां नियतव्रतः।<br>तामुपोष्याथ कमलं कारयित्वा तु काञ्चनम् ॥ २<br>शर्करासंयुक्तं दद्याद् ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>रविं काञ्चनकं कृत्वा पलस्यैकस्य धर्मवित्।<br>दद्याद् द्विकालवेलायां भानुर्मे प्रीयतामिति ॥ ३<br>भक्त्या तु विप्रान् सम्पूज्य चाष्टम्यां क्षीरभोजनम्।<br>दत्त्वा कुर्यात् फलयुतं यावत् स्यात् कृष्णसप्तमी ॥ ४ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! अब मैं फलसप्तमी नामक एक अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो स्वर्गभागी हो जाता है। व्रतनिष्ठ मनुष्यको चाहिये कि वह मार्गशीर्ष नामक शुभ मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको सोनेका एक कमल बनवाये और उस दिन उपवास कर उसे शक्करसमेत कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर दे। इसी प्रकार धर्मवेत्ता व्रती एक पल सोनेकी सूर्यकी मूर्ति बनवाकर उसे सायंकालके समय 'भगवान् सूर्य मुझपर प्रसन्न हों'—यों कहकर ब्राह्मणको दान करे। फिर अष्टमीके दिन ब्राह्मणोंको फलसहित दूधसे बने हुए अन्नका भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करे। ऐसा तबतक करते रहना चाहिये जबतक पुनः |
| २८८ | * मत्स्यपुराण * |
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| तामप्युपोष्य विधिवदनेनैव क्रमेण तु।<br>तद्वद्धेमफलं दत्त्वा सुवर्णकमलान्वितम्॥ ५<br><br>शर्करापात्रसंयुक्तं वस्त्रमाल्यसमन्वितम्।<br>संवत्सरं च तेनैव विधिनाभयसप्तमीम्॥ ६<br><br>उपोष्य दत्त्वा क्रमशः सूर्यमन्त्रमुदीरयेत्।<br>भानुरर्को रविर्ब्रह्मा सूर्यः शक्रो हरिः शिवः।<br>श्रीमान् विभावसुस्त्वष्टा वरुणः प्रीयतामिति॥ ७<br><br>प्रतिमासं च सप्तम्यामेकैकं नाम कीर्तयेत्।<br>प्रतिपक्षं फलत्यागमेतत् कुर्वन् समाचरेत्॥ ८<br><br>व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूजयेद् वस्त्रभूषणैः।<br>शर्कराकलशं दद्याद्धेमपद्मदलान्वितम्॥ ९<br><br>यथा न विफलाः कामास्त्वद्भक्तानां सदा रवे।<br>तथानन्तफलावाप्तिरस्तु मे सप्तजन्मसु॥ १०<br><br>इमामसन्तफलदां यः कुर्यात् फलसप्तमीम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सूर्यलोके महीयते॥ ११<br><br>सुरापानादिकं किञ्चिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>तत् सर्वं नाशमायाति यः कुर्यात् फलसप्तमीम्॥ १२<br><br>कुर्वाणः सप्तमीं चेमां सततं रोगवर्जितः।<br>भूतान् भव्यांश्च पुरुषांस्तारयेदेकविंशतिम्।<br>यः शृणोति पठेद् वापि सोऽपि कल्याणभाग् भवेत्॥ १३ | कृष्णपक्षकी सप्तमी न आ जाय। उस दिन भी उसी क्रमसे विधिपूर्वक उपवास करके स्वर्णमय कमलके साथ स्वर्णनिर्मित फलका दान करना चाहिये। उसके साथ शक्करसे भरा हुआ पात्र, वस्त्र और पुष्पमाला भी होना आवश्यक है। इस प्रकार एक वर्षतक दोनों पक्षोंकी सप्तमीके दिन उपवास और दान कर क्रमशः सूर्य-मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। भानु, अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु, त्वष्टा और वरुण—ये मुझपर प्रसन्न हों। मार्गशीर्षसे प्रारम्भ कर प्रत्येक मासकी सप्तमी तिथिको उपर्युक्त नामोंमें क्रमशः एक-एकका कीर्तन करना चाहिये। प्रत्येक पक्षमें फलदान करनेका भी विधान है। इस प्रकार सारा कार्य करते हुए व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये॥ १-८॥<br><br>व्रतकी समाप्तिपर वस्त्र और आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे और स्वर्णमय कमलसहित शक्करसे भरा हुआ कलश दान करे। उस समय ऐसा कहे—'सूर्यदेव! जिस प्रकार आपके भक्तोंकी कामनाएँ कभी विफल नहीं होतीं, उसी प्रकार मुझे भी सात जन्मोंतक अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहे।' जो मनुष्य इस अनन्त फलदायिनी फलसप्तमीका व्रत करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। फलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यद्वारा इस लोकमें अथवा परलोकमें मद्यपान आदि जो कुछ भी दुष्कर्म किया गया है, वह सारा-का-सारा विनष्ट हो जाता है। इस फलसप्तमीव्रतका* निरन्तर अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यके पास रोग नहीं फटकते और वह अपनी भूत एवं भविष्यकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देता है। जो इस व्रत-विधानको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भी कल्याणभागी हो जाता है॥ ९-१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे फलसप्तमीव्रतं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें फलसप्तमीव्रत नामक छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥
* 'व्रतकल्पद्रुम' में इसके अतिरिक्त दो और भिन्न फलसप्तमियाँ निर्दिष्ट हुई हैं।
८२ गुड़-धेनुके दानकी विधि और उसकी महिमा
| * अध्याय ७७ * | २८९ |
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सतहत्तरवाँ अध्याय
शर्करासप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
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| शर्करासप्तमीं वक्ष्ये तद्वत् कल्मषनाशिनीम्।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यं ययानन्तं प्रजायते॥ १ | ब्रह्मन्! अब मैं उसी प्रकार पापनाशिनी शर्करासप्तमीका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। |
| माधवस्य सिते पक्षे सप्तम्यां नियतव्रतः।<br>प्रातः स्नात्वा तिलैः शुक्लैः शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ २ | व्रतनिष्ठ पुरुष वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको प्रातःकाल श्वेत तिलोंसे युक्त जलसे स्नान करके श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दन धारण कर ले। |
| स्थण्डिले पद्ममालिख्य कुङ्कुमेन सकर्णिकम्।<br>तस्मिन् नमः सवित्रे तु गन्धधूपौ निवेदयेत्॥ ३ | फिर वेदीपर कुङ्कुमसे कर्णिकासहित कमलका चित्र बनावे। उसपर 'सवित्रे नमः' कहकर गन्ध और धूप निवेदित करे। |
| स्थापयेदुदकुम्भं च शर्करापात्रसंयुतम्।<br>शुक्लवस्त्रैरलङ्कृत्य शुक्लमाल्यानुलेपनैः।<br>सुवर्णेन समायुक्तं मन्त्रेणानेन पूजयेत्॥ ४ | फिर उसपर शक्करसे परिपूर्ण पात्रसहित जलपूर्ण कलश स्थापित करे, उसपर स्वर्णमयी मूर्ति रख दे और उसे श्वेत वस्त्रसे सुशोभित करके श्वेत पुष्पमाला और चन्दनद्वारा वक्ष्यमाण-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक पूजन करे। |
| विश्ववेदमयो यस्माद् वेदवादीति पठ्यसे।<br>त्वमेवामृतसर्वस्वमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ५ | (वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सूर्यदेव! विश्व और वेद आपके स्वरूप हैं, आप वेदवादी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंके लिये अमृततुल्य फलदायक हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान कीजिये।' |
| पञ्चगव्यं ततः पीत्वा स्वपेत् तत्पार्श्वतः क्षितौ।<br>सौरसूक्तं जपंस्तिष्ठेत् पुराणश्रवणेन वा॥ ६ | तत्पश्चात् पञ्चगव्य पान कर उसी कलशके पार्श्वभागमें भूमिपर शयन करे। उस समय सूर्यसूक्तका जप* अथवा पुराणका श्रवण करते रहना चाहिये। |
| अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां कृतनैत्यकः।<br>तत् सर्वं वेद विदुषे ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ७ | इस प्रकार दिन-रात बीत जानेपर अष्टमीके दिन प्रातःकाल नित्यकर्मसे निवृत्त होकर पहलेकी तरह वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे। |
| भोजयेच्छक्तितो विप्राञ्छर्कराघृतपायसैः।<br>भुञ्जीतातैललवणं स्वयमप्यथ वाग्यतः॥ ८ | पुनः अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको शक्कर, घी और दूधसे बने हुए पदार्थ भोजन करावे और स्वयं भी मौन रहकर तेल और नमकसे रहित पदार्थोंका भोजन करे। |
| अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>संवत्सरान्ते शयनं शर्कराकलशान्वितम्॥ ९ | इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सारा कार्य करना चाहिये। एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर शक्करसे पूर्ण कलशसमेत समग्र उपकरणोंसे युक्त शय्या तथा |
| सर्वोपस्करसंयुक्तं तथैकां गां पयस्विनीम्।<br>गृहं च शक्तिमान् दद्यात् समस्तोपस्करान्वितम्॥ १० | एक दुधारू गौ दान करनेका विधान है। व्रती यदि धन-सम्पत्तिसे युक्त हो तो उसे समस्त उपकरणोंसे युक्त गृहका भी दान करना चाहिये। |
| सहस्रेणाथ निष्काणां कृत्वा दद्याच्छतेन वा।<br>दशभिर्वाथ निष्केण तदर्धेनापि शक्तितः॥ ११ | तदनन्तर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल एक हजार अथवा एक सौ अथवा पाँच निष्क (सोलह माशेका एक निष्क होता है जिसे दीनार भी कहते हैं) |
* ऋग्वेदके प्रथम मण्डलका ५० वाँ सूक्त सूर्यसूक्त है।
२९० * मत्स्यपुराण *
| सुवर्णाश्वः प्रदातव्यः पूर्ववन्मन्त्रवादनम्।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषं समश्नुते॥ १२<br><br>अमृतं पिबतो वक्त्रात् सूर्यस्यामृतबिन्दवः।<br>निष्येतुर्ये धरण्यां ते शालिमुद्गेक्षवः स्मृताः॥ १३<br><br>शर्करा तु परा तस्मादिक्षुसारोऽमृतात्मवान्।<br>इष्टा रवेरतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः॥ १४<br><br>शर्करासप्तमी चेयं वाजिमेधफलप्रदा।<br>सर्वदुष्टप्रशमनी पुत्रपौत्रप्रवर्धिनी॥ १५<br><br>यः कुर्यात् परया भक्त्या स वै सद्गतिमाप्नुयात्।<br>कल्पमेकं वसेत् स्वर्गे ततो याति परं पदम्॥ १६<br><br>इदमनघं शृणोति यः स्मरेद् वा<br>परिपठतीह दिवाकरस्य लोके।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-<br>रमरवधूजनमालयाभिपूज्यः॥ १७ | सोनेका एक घोड़ा बनवाकर पहलेकी ही भाँति मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान करना चाहिये। इसमें कृपणता न करे, यदि करता है तो दोषभागी होना पड़ता है॥ १—१२॥<br><br>अमृत-पान करते समय सूर्यके मुखसे जो अमृतबिन्दु भूतलपर गिर पड़े थे, वे ही शालि (अगहनी धान), मूँग और ईंख नामसे कहे जाते हैं। इनमें ईंखका सारभूत शक्कर अमृततुल्य सुस्वादु है, इसलिये यह तीनोंमें श्रेष्ठ है। इसी कारण यह पुण्यवती शर्करा सूर्यके हव्य एवं कव्य—दोनों हवनीय पदार्थोंमें उन्हें अत्यन्त प्रिय है। यह शर्करासप्तमी अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायिनी, समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाली और पुत्र-पौत्रोंकी प्रवर्धिनी है। जो मानव उत्कृष्ट श्रद्धाके साथ इसका अनुष्ठान करता है, उसे सद्गतिकी प्राप्ति होती है। वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास कर अन्तमें परमपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस निष्पाप व्रतका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। साथ ही जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवगणों एवं देवाङ्गनाओंके समूहसे पूजित होता है॥१३—१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शर्कराव्रतं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शर्करासप्तमीव्रत नामक सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७७॥
अठहत्तरवाँ अध्याय
कमलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br><br>अतः परं प्रवक्ष्यामि तद्वत् कमलसप्तमीम्।<br>यस्याः संकीर्तनादेव तुष्यतीह दिवाकरः॥ १<br><br>वसन्तामलसप्तम्यां स्नातः सन् गौरसर्षपैः।<br>तिलपात्रे च सौवर्णं निधाय कमलं शुभम्॥ २<br><br>वस्त्रयुग्मावृतं कृत्वा गन्धपुष्पैः समर्चयेत्।<br>नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे॥ ३<br><br>दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>ततो विकालवेलायामुदकुम्भसमन्वितम्॥ ४<br><br>विप्राय दद्यात् सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः।<br>शक्त्या च कपिलां दद्यादलङ्कृत्य विधानतः॥ ५ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! इसके बाद अब मैं कमलसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका नाम लेनेमात्रसे भी भगवान् सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं। व्रती मनुष्य वसन्त-ऋतुमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको पीली सरसोंयुक्त जलसे स्नान करके शुद्ध हो जाय और किसी तिलसे पूर्ण पात्रमें एक सुन्दर स्वर्णमय कमल स्थापित कर दे। फिर उसे दो वस्त्रोंसे आच्छादित कर गन्ध, पुष्प आदिद्वारा उसकी अर्चना करे। पूजनके समय 'पद्महस्ताय ते नमः', 'विश्वधारिणे ते नमः', 'दिवाकर तुभ्यं नमः', 'प्रभाकर ते नमोऽस्तु'—इन मन्त्रोंका उच्चारण (कर सूर्यको प्रणाम) करे। तदनन्तर सायंकाल वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे ब्राह्मणका पूजन कर उन्हें जलपूर्ण कलशसहित कमल दान कर दे। साथ ही एक कपिला गौको |
८३ पर्वतदानके दस भेद, धान्यशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७९ * | २९१ |
|---|
| अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां भोजयेद् द्विजान्।<br>यथाशक्त्यथ भुञ्जीत मांसतैलविवर्जितम्॥ ६<br>अनेन विधिना शुक्लसप्तम्यां मासि मासि च।<br>सर्वं समाचरेद् भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ ७<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>गां च दद्यात् स्वशक्त्या तु सुवर्णाढ्यां पयस्विनीम्॥ ८<br>भोजनासनदीपादीन् दद्यादिष्टानुपस्करान्।<br>अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कमलसप्तमीम्।<br>लक्ष्मीमनन्तामभ्येति सूर्यलोके महीयते॥ ९<br>कल्पे कल्पे ततो लोकान् सप्त गत्वा पृथक् पृथक्।<br>अप्सरोभिः परिवृतस्ततो याति परां गतिम्॥ १०<br>यः पश्यतीदं शृणुयाच्च मर्त्यः<br>पठेच्च भक्त्याथ मतिं ददाति।<br>सोऽप्यत्र लक्ष्मीमचलामवाप्य<br>गन्धर्वविद्याधरलोकभाक् स्यात्॥ ११ | भी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक सुसज्जित करके दान करे। पुनः दिन-रात बीत जानेके बाद अष्टमी तिथिको अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उसके बाद स्वयं भी मांस और तेलसे रहित अन्नका भोजन करे। प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको इसी विधिके अनुसार कंजूसी छोड़कर भक्तिपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये। (एक वर्ष पूर्ण होनेपर) व्रतकी समाप्तिके समय स्वर्णमय कमलके साथ एक शय्याका भी दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुसज्जित एक दुधारू गौ तथा भोजन, आसन, दीप आदि अभीष्ट सामग्रियोंके भी दान करनेका विधान है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार कमलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वह प्रत्येक कल्पमें अप्सराओंसे घिरा हुआ पृथक्-पृथक् सातों लोकोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको देखता, सुनता, पढ़ता और इसे करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी इस लोकमें अचल लक्ष्मीका उपभोग कर अन्तमें गन्धर्व-विद्याधरलोकका भागी होता है॥ १—११॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कमलसप्तमीव्रतं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कमलसप्तमीव्रत नामक अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७८ ॥
उन्यासीवाँ अध्याय
मन्दारसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वकामप्रदां पुण्यां नाम्ना मन्दारसप्तमीम्॥ १<br>माघस्यामलपक्षे तु पञ्चम्यां लघुभुङ्नरः।<br>दन्तकाष्ठं ततः कृत्वा षष्ठीमुपवसेद् बुधः॥ २<br>विप्रान् सम्पूजयित्वा तु मन्दारं प्राशयेन्निशि।<br>ततः प्रभात उत्थाय कृत्वा स्नानं पुनर्द्विजान्॥ ३ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! अब मैं परम पुण्यप्रदायिनी मन्दारसप्तमीका वर्णन करता हूँ, जो समस्त पापोंकी विनाशिनी एवं सम्पूर्ण कामनाओंकी प्रदात्री है। बुद्धिमान् व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको थोड़ा आहार करके (रात्रिमें शयन करे)। पुनः षष्ठी तिथिको प्रातःकाल दातून कर दिनभर उपवास करे। रातमें ब्राह्मणोंकी पूजा कर मन्दार-पुष्पका भक्षण करे और सो जाय। तत्पश्चात् सप्तमी* तिथिको प्रातःकाल उठकर स्नान आदि नित्यकर्म सम्पादन कर |
* पाद्म, वायव्यादि विविध माघमाहात्म्यों एवं 'व्रतरत्न' आदि व्रतनिबन्धोंमें इसी तिथिको अचलासप्तमी, रथसप्तमी, रथाङ्गसप्तमी, महासप्तमी आदि कहकर अन्य व्रत भी निर्दिष्ट हैं।
| २९२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भोजयेच्छक्तितः कुर्यात् मन्दारकुसुमाष्टकम्।<br>सौवर्णं पुरुषं तद्वत् पद्महस्तं सुशोभनम्॥ ४<br><br>पद्मं कृष्णातिलैः कृत्वा ताम्रपात्रेऽष्टपत्रकम्।<br>हेममन्दारकुसुमैर्भास्करायेति पूर्वतः॥ ५<br><br>नमस्कारेण तद्वच्च सूर्यायेत्यानले दले।<br>दक्षिणे तद्वदर्काय तथार्यम्णेति नैर्ऋते॥ ६<br><br>पश्चिमे वेदधाम्ने च वायव्ये चण्डभानवे।<br>पूष्णोत्युत्तरतः पूज्यमानन्दायैत्यतः परम्॥ ७<br><br>कर्णिकायां च पुरुषं स्थाप्य सर्वात्मनेति च।<br>शुक्लवस्त्रैः समावेष्ट्य भक्ष्यैर्माल्पफलादिभिः॥ ८ | अपनी शक्तिके अनुसार पुनः ब्राह्मणोंको भोजन करावे। तदनन्तर सोनेके आठ मन्दार-पुष्प और एक पुरुषाकार सुन्दर मूर्ति बनवाये, जिसके हाथमें कमल सुशोभित हो। पुनः ताँबेके पात्रमें काले तिलोंसे अष्टदल कमलकी रचना करे। तदनन्तर स्वर्णमय मन्दार-पुष्पोंद्वारा (कमलके आठों दलोंपर वक्ष्यमाण-मन्त्रोंका उच्चारण करके सूर्यका आवाहन करे। यथा—) 'भास्कराय नमः' से पूर्वदलपर, 'सूर्याय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'अर्काय नमः' से दक्षिणदलपर, 'अर्यम्णे नमः' से नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर, 'वेदधाम्ने नमः' से पश्चिमदलपर, 'चण्डभानवे नमः' से वायव्यकोणस्थित दलपर, 'पूष्णे नमः' से उत्तरदलपर, उसके बाद 'आनन्दाय नमः' से ईशानकोणवाले दलपर स्थापना करके कर्णिकाके मध्यमें 'सर्वात्मने नमः' कहकर पुरुषाकार मूर्तिको स्थापित कर दे तथा उसे श्वेत वस्त्रोंसे ढँककर खाद्य पदार्थ (नैवेद्य), पुष्पमाला, फल आदिसे उसकी अर्चना करे॥ १-८॥ |
| एवमभ्यर्च्य तत् सर्वं दद्याद् वेदविदे पुनः।<br>भुञ्जीतातैललवणं वाग्यतः प्राङ्मुखो गृही॥ ९<br><br>अनेन विधिना सर्वं सप्तम्यां मासि मासि च।<br>कुर्यात् संवत्सरं यावद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ १० | इस प्रकार गृहस्थ व्रती उस मूर्तिका पूजन कर पुनः वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे और स्वयं पूर्वाभिमुख बैठकर मौन हो तेल और नमकरहित अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको इसी विधिके अनुसार सारा कार्य सम्पन्न करनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। |
| एतदेव व्रतान्ते तु निधाय कलशोपरि।<br>गोभिर्विभवतः सार्धं दातव्यं भूतिमिच्छता॥ ११ | व्रतकी समाप्तिके समय वैभवकी अभिलाषा रखनेवाला व्रती उस मूर्तिको कलशके ऊपर रखकर अपनी धन-सम्पत्तिके अनुसार प्रस्तुत की गयी गौओंके साथ दान कर दे। |
| नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च।<br>त्वं रवे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात्॥ १२ | (उस समय सूर्यभगवान्से यों प्रार्थना करे—) 'सूर्यदेव! आप मन्दारके स्वामी हैं और मन्दार आपका भवन है, आपको नमस्कार है। आप हमलोगोंका इस संसाररूपी सागरसे उद्धार कीजिये।' |
| अनेन विधिना यस्तु कुर्यान्मन्दारसप्तमीम्।<br>विपाप्मा स सुखी मर्त्यः कल्पं च दिवि मोदते॥ १३ | जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस मन्दारसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित हो सुखपूर्वक एक कल्पतक स्वर्गमें आनन्दका उपभोग करता है। |
| इमामघौघपटलभीषणध्वान्तदीपिकाम् ।<br>गच्छन् संगृह्य संसारशर्वर्यां न स्खलेन्नरः॥ १४ | यह सप्तमीव्रत पापसमूहरूप परदेसे आच्छादित होनेके कारण प्रकट हुए भयंकर अन्धकारके लिये दीपकके समान है, जो मनुष्य इसे हाथमें लेकर संसाररूपी रात्रिमें यात्रा करता है, वह कहीं पथभ्रष्ट नहीं होता। |
| मन्दारसप्तमीमेतामीप्सितार्थफलप्रदाम् ।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ १५ | जो मनुष्य अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली इस मन्दारसप्तमीके व्रतको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९-१५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्दारसप्तमीव्रतं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्दारसप्तमीव्रत नामक उन्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७९॥
* अध्याय ८० * <span style="float: right;">२९३</span>
अस्सीवाँ अध्याय
शुभसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| अथान्यामपि वक्ष्यामि शोभनां शुभसप्तमीम्।<br>यामुपोष्य नरो रोगशोकदुःखैः प्रमुच्यते॥ १<br><br>पुण्ये चाश्वयुजे मासि कृतस्नानजपः शुचिः।<br>वाचयित्वा ततो विप्रानारभेच्छुभसप्तमीम्॥ २<br><br>कपिलां पूजयेद् भक्त्या गन्धमाल्यानुलेपनैः।<br>नमामि सूर्यसम्भूतामशेषभुवनालयाम्।<br>त्वामहं शुभकल्याणशरीरां सर्वसिद्धये॥ ३<br><br>अथ कृत्वा तिलप्रस्थं ताम्रपात्रेण संयुतम्।<br>काञ्चनं वृषभं तद्वद् गन्धमाल्यगुडान्वितम्॥ ४<br><br>फलैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्घृतपायससंयुतैः ।<br>दद्याद् विकालवेलायामर्यमा प्रीयतामिति॥ ५<br><br>पञ्चगव्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावसंस्तरे।<br>ततः प्रभाते संजाते भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्॥ ६<br><br>अनेन विधिना दद्यान्मासि मासि सदा नरः।<br>वाससी वृषभं हैमं तद्वद् गां काञ्चनोद्भवाम्॥ ७<br><br>संवत्सरान्ते शयनमिक्षुदण्डगुडान्वितम्।<br>सोपधानकविश्रामं भाजनासनसंयुतम्॥ ८<br><br>ताम्रपात्रे तिलप्रस्थं सौवर्णं वृषभं तथा।<br>दद्याद् वेदविदे सर्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति॥ ९ | ब्रह्मन्! अब मैं एक अन्य सुन्दर शुभसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य रोग, शोक और दुःखसे मुक्त हो जाता है। पुण्यप्रद आश्विनमासमें (शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको) व्रती स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो जाय, तब ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर शुभसप्तमी-व्रत आरम्भ करे। उस समय सुगन्धित पदार्थ, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे भक्तिपूर्वक कपिला गौकी पूजा करके यों प्रार्थना करे—'देवि! आप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रयभूता हैं तथा आपका शरीर सुशोभन मङ्गलोंसे युक्त है, आपको मैं समस्त सिद्धियोंकी प्राप्तिके निमित्त नमस्कार करता हूँ।' तदनन्तर एक ताँबेके पात्रमें एक सेर तिल भर दे और एक बड़े आसनपर स्वर्णमय वृषभको स्थापित कर उसकी चन्दन, माला, गुड़, फल, घी एवं दूधसे बने हुए नाना प्रकारके नैवेद्य आदिसे पूजा करे। फिर सायंकाल 'अर्यमा प्रसन्न हों' यों कहकर उसे दान कर दे। रातमें पञ्चगव्य खाकर बिना बिछावनके ही भूमिपर शयन करे। प्रातःकाल होनेपर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करे। व्रती मनुष्यको प्रत्येक मासमें सदा इसी विधिसे दो वस्त्र, स्वर्णमय बैल और स्वर्णनिर्मित गौका दान करना चाहिये। इस प्रकार वर्षकी समाप्तिमें विश्रामहेतु गद्दा, तकिया आदिसे युक्त एवं ईख, गुड़, बर्तन, आसन आदिसे सम्पन्न शय्या तथा एक सेर तिलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रके ऊपर स्थापित स्वर्णमय वृषभ आदि सारा उपकरण वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे और यों कहे—'विश्वात्मा मुझपर प्रसन्न हों'॥ १-९॥ |
| अनेन विधिना विद्वान् कुर्याद् यः शुभसप्तमीम्।<br>तस्य श्रीर्विपुला कीर्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥ १०<br><br>अप्सरोगणगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरालये।<br>वसेद् गणाधिपो भूत्वा यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>कल्पादाववतीर्णस्तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्॥ ११ | जो विद्वान् पुरुष उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शुभसप्तमी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे प्रत्येक जन्ममें विपुल लक्ष्मी और कीर्ति प्राप्त होती है। वह देवलोकमें गणाधीश्वर होकर अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा पूजित होता हुआ प्रलयपर्यन्त निवास करता है। पुनः कल्पके |
| २९४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्महत्यासहस्रस्य भ्रूणहत्याशतस्य च।<br>नाशयालमियं पुण्या पठ्यते शुभसप्तमी ॥ १२<br>इमां पठेद् यः शृणुयान्मुहूर्तं<br>पश्येत् प्रसङ्गादपि दीयमानम्।<br>सोऽप्यत्र सर्वाघविमुक्तदेहः<br>प्राप्नोति विद्याधरनायकत्वम् ॥ १३<br>यावत् समाः सप्त नरः करोति<br>यः सप्तमीं सप्तविधानयुक्ताम्।<br>स सप्तलोकाधिपतिः क्रमेण<br>भूत्वा पदं याति परं मुरारेः ॥ १४ । | आदिमें उत्पन्न होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। यह पुण्यप्रद शुभसप्तमी एक हजार ब्रह्महत्या और एक सौ भ्रूणहत्याके पापोंका नाश करनेके लिये समर्थ कही जाती है। जो मनुष्य इस व्रत-विधिको पढ़ता अथवा दो घड़ीतक सुनता है तथा प्रसङ्गवश दिये जाते हुए दानको देखता है, वह भी इस लोकमें समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परलोकमें विद्याधरोंके अधिनायक-पदको प्राप्त करता है। जो मनुष्य उपर्युक्त सात विधानोंसे युक्त इस सप्तमीव्रतका सात वर्षोंतक अनुष्ठान करता है, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति होकर अन्तमें भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त हो जाता है॥ १०—१४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शुभसप्तमीव्रतं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुभसप्तमीव्रत नामक अस्सीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
विशोकद्वादशीव्रतकी विधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>किमभीष्टवियोगशोकसंघा-<br>दलमुद्धर्तुमुपोषणं व्रतं वा।<br>विभवोद्भवकारि भूतलेऽस्मिन्<br>भवभीतेरपि सूदनं च पुंसः ॥ १ | मनुने पूछा— भगवन्! इस भूतलपर कौन ऐसा उपवास या व्रत है, जो मनुष्यके अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे उत्पन्न शोकसमूहसे उद्धार करनेमें समर्थ, धन-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला और संसार-भयका नाशक है ॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>परिपृष्टमिदं जगत्प्रियं ते<br>विबुधानामपि दुर्लभं महत्त्वात्।<br>तव भक्तिमतस्तथापि वक्ष्ये<br>व्रतमिन्द्रासुरमानवेषु गुह्यम् ॥ २<br><br>पुण्यमाश्वयुजे मासि विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>दशम्यां लघुभुग्विद्वानारभेन्नियमेन तु ॥ ३<br><br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा दन्तधावनपूर्वकम्।<br>एकादश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य केशवम्।<br>श्रियं वाभ्यर्च्य विधिवद् भोक्ष्येऽहं चापरेऽहनि ॥ ४ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजर्षे! तुमने जिस व्रतके विषयमें प्रश्न किया है, यह समस्त जगत्को प्रिय तथा इतना महत्त्वशाली है कि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यद्यपि इन्द्र, असुर और मानव भी उसे नहीं जानते, तथापि तुम-जैसे भक्तिमान्के प्रति मैं अवश्य इसका वर्णन करूँगा। उस पुण्यप्रद व्रतका नाम विशोकद्वादशीव्रत है। विद्वान् व्रतीको आश्विनमासमें दशमी तिथिको अल्प आहार करके नियमपूर्वक इस व्रतका आरम्भ करना चाहिये। पुनः एकादशीके दिन व्रती मानव उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर दातून करे, फिर (स्नान आदिसे निवृत्त होकर) निराहार रहकर भगवान् केशव और लक्ष्मीकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करे और 'दूसरे दिन |