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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

( ८ ) विषय : पृष्ठाङ्क औरंगज़ेब का बसाड़ और गयासपुर के परगने महाराणा को देना ... ... ... १५३ सहायता के लिए दाराशिकोह का महारावत के नाम निशान भेजना ... ... ... १५४ महाराणा राजसिंह का देवलिया पर सेना भेजना ... १५५ महाराणा राजसिंह के पास महारावत का उपस्थित होना १५६ महारावत को पुनः गयासपुर और बसाड़ आदि परगने मिलना १५८ महारावत का परलोकवास ... ... १६३ महारावत की संतति ... ... १६४ महारावत के बनवाये हुए महल और उसके समय के लोकोपयोगी कार्य ... ... १६७ महारावत के समय के ताम्रपत्र और शिलालेख ... १६७ महारावत का साहित्यानुराग ... ... १७० महारावत का व्यक्तित्व ... ... १७५ प्रतापसिंह ... ... ... १७७ राज्यप्राप्ति ... ... ... १७७ महारावत को खिलअत तथा मंसब मिलना ... १७७ शाहीदरबार से महाराणा राजसिंह और महारावत की तकरार की जांच के लिए शेख इनायतुल्ला की नियुक्ति ... १७७ मेवाड़ पर बादशाह औरंगज़ेब की चढ़ाई और महारावत के नाम फ़रमान पहुंचना ... १७८ शाहज़ादे मुअज्जम का महारावत के नाम निशान भेजना १८२ महारावत का प्रतापगढ़ का क़स्वा आबाद करना ... १८३ महाराणा अमरसिंह ( दूसरा ) का महारावत से छेड़-छाड़ करना १८३ महारावत की पिपलोदे पर चढ़ाई ... ... १८४ महारावत का शेरबुलंदखां को अपने यहां आश्रय देना १८५

( ६ ) विषय पृष्ठाङ्क बादशाह का महारावत को शाही दरबार में बुलाना १८५ महाराजा अजीतसिंह और सवाई जयसिंह का देवलिया जाना १८६ किशनगढ़ के राजा राजसिंह का देवलिया जाकर रहना १८७ महारावत का परलोकवास ... ... १८८ महारावत की राणियां और संतति ... ... १८६ महारावत के समय के लोकोपयोगी कार्य ... १९० महारावत का विद्यानुराग ... ... १९१ महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र ... १९१ महारावत का व्यक्तित्व ... ... १९३ ——— पांचवां अध्याय महारावत पृथ्वीसिंह से सामन्तसिंह तक पृथ्वीसिंह ... ... ... १९७ राज्यप्राप्ति ... ... ... १९७ महारावत की पुत्री का जोधपुर के महाराजा के साथ विवाह होना ... ... १९७ महारावत के नाम वसाड़ का पुनः फ़रमान और उसके मंसब में वृद्धि होना ... १९८ जहांदारशाह के पास से वसाड़ परगने का फ़रमान होना १९६ महारावत के नाम बादशाह फ़र्रुख़सियर का फ़रमान २०० महारावत का शाही इलाके में लूट-मार करना ... २०१ महारावत का अपने कुंवर पहाड़सिंह को उदयपुर भेजना २०२ आंबेर और बूंदी के नरेशों का बादशाह से महारावत की शिकायत करना ... ... २०३ शिकायतों की जांच के लिए कुतुबुलमुल्क का भेजा जाना २०४

( १० ) विषय पृष्ठाङ्क मंत्री बिहारीदास का रामपुरे से लौटते समय देवलियां में ठहरना २०५ महारावत का देहान्त ... ... २०६ महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र ... २०७ महारावत का व्यक्तित्व ... ... २११ संग्रामसिंह ... ... ... २१३ महारावत की गद्दीनशीनी और मृत्यु ... २१३ महारावत के समय के ताम्रपत्र ... ... २१४ उम्मेदसिंह ... ... ... २१५ राज्यप्राप्ति और देहान्त ... ... २१५ महारावत के शिलालेख और दानपत्र ... २१६ महारावत की राणियां और सन्तति ... ... २१७ गोपालसिंह ... ... ... २१८ राज्यप्राप्ति ... ... ... २१८ मुग़ल वादशाहत की तत्कालीन स्थिति ... २१६ मरहटों का उत्थान ... ... ... २२० आंबेर और जोधपुर के राजाओं की शक्ति बढ़ना ... २२२ महारावत को धरियावद का परगना मिलना ... २२४ महारावत का डूंगरपुर से महाराणा की सेना का घेरा उठवाना २२५ मालवे के लिए मरहटों की लड़ाइयां ... २२६ मरहटों से समझौते के लिए देवलिया के समीप राजाओं के एकत्र होने की विफल योजना ... २३२ पेशवा के राजपूताना में पहुंचने पर महारावत का उसके पास जाना २३४ महारावत का महाराणा के साथ सवाई जयसिंह की सहायतार्थ जाना ... ... ... २४० महारावत का देहान्त और राणियां आदि ... २४१ महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र ... २४२

( ११ ) विषय पृष्ठाङ्क महारावत का व्यक्तित्व ... ... २४४ महारावत सालिमसिंह ... ... ... २४५ राज्यप्राप्ति ... ... ... २४५ महारावत का दिल्ली जाकर बादशाह से सम्मान प्राप्त करना २४५ तुकोजी का देवलिया पर घेरा डालना ... २४६ महाराणा अरिसिंह की सहायतार्थ महारावत का सेना भेजना २४७ महारावत का देहांत और उसकी रानियां आदि ... २५३ महारावत के समय के शिलालेख, दानपत्र आदि ... २५४ महारावत का व्यक्तित्व ... ... २५५ सामन्तसिंह ... ... ... २५६ राज्यप्राप्ति ... ... ... २५६ धरियावद का परगना महाराणा-द्वारा खालसा होना २५७ होल्कर का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज स्थिर करना २५८ होल्कर सरकार को खिराज की रक़म न देने से कुंवर दीपसिंह का ओल में जाना ... २५६ सिंधिया की सेना का प्रतापगढ़ को घेरना ... २५६ अंग्रेज़ सरकार के साथ महारावत की प्रथम संधि ... २६० भंवर केसरीसिंह और दलपतसिंह का जन्म ... २६३ अंग्रेज़ सरकार के साथ दूसरी संधि ... २६३ प्रतापगढ़ राज्य की आर्थिक स्थिति में उन्नति होना २६८ दलपतसिंह का डूंगरपुर गोद जाना ... . २६८ सेना-व्यय के एवज़ अंग्रेज़ सरकार को नक़द रुपये देने का क़रार होना ... ... २६६ कुंवर दीपसिंह का उपद्रव करना ... ... २७० महारावत का नवलचंद पाडलिया को कामदार बनाना २७३ महारावत की पौत्री का बीकानेर के कुंवर सरदारसिंह से विवाह २७३

( १२ ) विषय पृष्ठाङ्क भंवर केसरीसिंह का देहावसान ... ... २७३ शासन में अव्यवस्था होना ... ... २७४ महारावत का डूंगरपुर से दलपतसिंह को बुलाकर शासन-कार्य सौंपना ... ... २७४ महारावत का देहान्त ... ... २७५ रानियां और संतति आदि ... ... २७५ महारावत के समय बने हुए देवालय आदि ... २७६ महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र आदि २७७ महारावत का व्यक्तित्व ... ... २७६ ━━━━━━━━ छठा अध्याय महारावत दलपतसिंह से वर्तमान. महारावत सर रामसिंहजी तक दलपतसिंह ... ... २८१ राज्य-प्राप्ति ... ... २८१ अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की ख़िलअत आना २८१ महारावल जसवन्तसिंह का डूंगरपुर से वृन्दावन भेजा जाना २८२ महारावल जसवन्तसिंह का वृन्दावन में देहान्त होना और साबली के ठाकुर के पुत्र उदयसिंह का डूंगरपुर का स्वामी होना २८४ महाराजकुमार उदयसिंह का जन्म ... २८५ डूंगरपुर का शासनाधिकार छूटना ... २८५ सिपाही विद्रोह के समय अंग्रेज़ सरकार को प्रतापगढ़ राज्य से सहायता मिलना ... २८७ गोदनशीनी की सनद मिलना ... २६४ महारावत का परलोकवास और रानियां आदि ... २६५ महारावत का व्यक्तित्व ... ... २६६

( १३ ) विषय पृष्ठाङ्क उदयसिंह ... ... २६७ जन्म, गद्दीनशीनी और पुत्र-जन्म ... २६७ शासन-कार्य चलाने के सम्बन्ध में महारावत के नाम पोलिटिकल एजेंट का खरीता जाना ... ... २६७ एजेन्ट गवर्नर-जेनरल का गद्दीनशीनी की खिलअत लेकर जाना २६८ भील और मीणों को दंड देना ... २६८ रेलवे निकालने के सम्बन्ध में अंग्रेज़ सरकार की महारावत से बातचीत ... २६८ महारावत का वाइसरॉय लॉर्ड लॉरेन्स से मुलाक़ात करने आगरे जाना ... ... २६६ प्रतापगढ़ में राजधानी स्थिर होना ... २६६ अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से प्रतापगढ़ राज्य के स्वामी की सलामी की तोपें नियत होना ... ३०० वि० सं० १९२५ के अकाल में महारावत की उदारता ३०० शासन-व्यवस्था में गड़बड़ी होना ... ३०२ अंग्रेज़ सरकार से अपराधियों के देन-लेन का इक़रारनामा होना ३०२ बांसवाड़ा राज्य के साथ सीमा सम्बन्धी झगड़ा होना ३०६ महारावत का नीमच जाकर वाइसरॉय लॉर्ड नॉर्थ ब्रुक से मुलाक़ात करना ... ... ३०८ मोदियों को महारावत का अपने राज्य में न ठहरने देना ३०८ कामदार ओंकारलाल व्यास की मृत्यु ... ३०६ महारावत का अपने राज्य की आबादी बढ़ानां ... ३०६ दिल्ली दरबार के उपलक्ष्य में महारावत को झंडा मिलना ३१० प्रतापगढ़ राज्य में प्रथम बार मनुष्य-गणना होना ३१० इन्दौर नरेश से मुलाक़ात के लिए महारावत का नीमच जाना ३१० महारावत का पारसी फ़्रामजी भीकाजी को कामदार बनाना ३११

( १४ ) विषय पृष्ठाङ्क महारावत की सैलानेवाली महाराणी से कुंवर उत्पन्न होना ३११ महाराणी विक्टोरिया की स्वर्ण जयन्ती का उत्सव मनाया जाना ३११ महारावत का नीमच जाकर ड्यूक ऑव् कनाट से मुलाक़ात करना ... ... ... ३१२ महारावत के अन्य प्रमुख कार्य ... ... ३१२ महारावत का परलोकवास ... ... ३१३ महारावत की रानियां ... ... ३१३ महारावत के लोकोपयोगी कार्य ... ... ३१३ महारावत का व्यक्तित्व ... ... ३१३ रघुनाथसिंह ... ... ... ३१५ जन्म और गद्दीनशीनी ... ... ३१५ अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की ख़िलअत पहुंचना ३१७ सीमा सम्बन्धी झगड़े तय होना ... ... ३१८ पंडित मोहनलाल पंड्या का कामदार नियत होना ... ३१८ रघुनाथ हास्पिटल का निर्माण होना ... ३१६ म्युनिसिपल कमेटी की स्थापना ... ३१६ सायर के महक्मे की स्थापना ... ३१६ प्रतापगढ़ में तारघर और देवलिया में डाकख़ाना खुलना ३२० मन्दसोर तक पक्की सड़क बनना ... ३२० देवलिया के राजमहलों का जीर्णोद्धार होना ... ३२० ज़िलाबंदी होना ... ... ... ३२१ सरदारों को न्याय सम्बन्धी अधिकार मिलना ... ३२१ पारसी फ़्रामजी भीकाजी को पुनः कामदार नियत करना ३२५ राजकुमारी वल्लभकुंवरी का महाराजा बीकानेर के साथ विवाह होना ३२५ महारावत का बीकानेर जाना तथा कामदार पद पर ठाकुर रघुवीरसिंह का नियत होना ... ३२६

( १५ ) विषय पृष्ठाङ्क सेठ सोभागमल ढड्ढा को खज़ांची बनाना ... ३२६ न्याय-विभाग को पृथक् कर राजसभा की स्थापना करना ३२६ संवत् १९५६ का भयंकर अकाल ... ३२७ कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म और उसको अरणोद की जागीर मिलना ३२८ अकाल का पुन: आक्रमण ... ... ३२६ ठाकुर रघुबीरसिंह का कामदार पद से पृथक् होना ३२६ महाराजकुमार मानसिंह का खेतड़ी में विवाह होना ३२६ महारावत का अंग्रेज़ सरकार से ऋण लेकर क़र्ज़ चुकाना ३२६ सालिमशाही के स्थान में कलदार का चलन होना ३३० खिराज की रक़म में कमी होकर कलदार रक़म नियत होना ३३१ खालसे के गांवों की पैमाइश होकर ठेकाबन्दी होना ३३१ प्लेग की भयंकर बीमारी होना ... ३३२ महाराजकुमार मानसिंह को राज्याधिकार मिलना ... ३३२ महाराजकुमार मानसिंह का परलोकवास ... ३३८ महारावत के समय के पिछले उल्लेखनीय कार्य ... ३४२ महारावत का कामदार पद पर पारसी धनजीशाह को नियुक्त करना ... ... ३४३ महारावत के भंवर रामसिंह का विवाह ... ३४३ अफ़ीम की खरीद के बारे में अंग्रेज़ सरकार से बातचीत होना ३४३ महारावत की बीमारी और परलोकवास ... ३४४ महारावत की राणियां और संतति ... ३४४ महारावत के समय के लोकोपयोगी कार्य ... ३४५ महारावत का व्यक्तित्व ... ... ३४६ महारावत सर रामसिंहजी ... ... ३५० जन्म और गद्दीनशीनी ... ... ३५० शिक्षा ... ... ... ३५०

( १६ ) विषय पृष्ठङ्क अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की ख़िलअत प्राप्त होना ३५० मंत्री-पद पर एफ़्० सी० केवेन्टरी की नियुक्ति ... ३५१ राजकुमारी मोहनकुंवरी का विवाह ... ३५१ लोक-हितकारी कार्य ... ... ३५२ खिराज में कमी होना ... ... ३५३ दिगंबर जैन सम्मेलन की ओर से महारावत को अभिनंदनपत्र मिलना ... ... ३५४ सम्राट् जॉर्ज की ओर से महारावत को खिताब मिलना ३५४ मंत्री पद पर महारावत का राजा त्रिभुवनदास को नियत करना ३५४ विवाह और सन्तति ... ... ... ३५५ महारावत की जीवन सम्बन्धी मुख्य-मुख्य बातें ... ३५६ सातवां अध्याय प्रतापगढ़ राज्य के सरदार और प्रतिष्ठित कर्मचारी सरदार ... ... ... ३५८ महारावत के निकट सम्बन्धी ... ... ३५६ अरगोद ... ... ... ३५६ प्रथम वर्ग के सरदार ... ... ... ३६१ धमोतर ... ... ... ३६१ कल्याणपुरा ... ... ... ३६५ आंबीरामा ... ... ... ३६६ रायपुर ... ... ... ३६७ भांतला ... ... ... ३६८ सालिमगढ़ ... ... ... ३६६ अचलावदा ... ... ... ३७०

( १७ ) विषय पृष्ठांक यरडिया ... ... ... ३७० बोड़ी साखथली ... ... ... ३७२ जाजली ... ... ... ३७२ द्वितीय वर्ग के सरदार ... ... ... ३७३ अनघोरा ... ... ... ३७३ घरखेड़ी ... ... ... ३७४ नागदी ... ... ... ३७६ देवद ... ... ... ३७७ बड़ा सेलारपुरा ... ... ... ३७८ छायण (लीधेरथा) ... ... ... ३७८ पणणावा ... ... ... ३७६ धनेसरी ... ... ... ३८० डोराणा ... ... ... ३८० प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ... ... ... ३८१ घषांवत ... ... ... ३८३ शाह वर्षा और उसके वंशज ... ... ... ३८३ पाडलियों का घराना ... ... ... ३८३ पाडलिया चंद्रभाण और सुन्दर ... ... ... ३८३ लसण के पुत्र कपूर के वंशज ... ... ... ३८४ लसण के दूसरे पुत्र हरचंद के वंशधर ... ... ... ३६० खासगीवालों का घराना ... ... ... ३६१ भांचावत ... ... ... ३६३ आपा सखाराम का वंश ... ... ... ३६४

( १८ ) परिशिष्ट विषय पृष्ठाङ्क १—गुहिल से लगाकर प्रतापगढ़ के पूर्व पुरुष रावत क्षेमकर्ण तक मेवाड़ के गुहिलवंशी राजाओं की वंशावली ... ३६५ २—महारावत क्षेमकर्ण से वर्तमान समय तक प्रतापगढ़ के राजाओं की वंशावली ... ... ३६७ ३—प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास का कालक्रम ... ३६८ ४—प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रणयन में जिन-जिन पुस्तकों से सहायता ली गई उनकी सूची ... ... ४१३ अनुक्रमणिका (क) वैयक्तिक ... ... ... ४१६ (ख) भौगोलिक ... ... ... ४४८

( १६ ) चित्र-सूची चित्र पृष्ठाङ्क ( १ ) स्वर्गवासी महाराजकुमार मानसिंह समर्पण पत्र के सामने ( २ ) देवलिया के राजमहल ... ... १७ ( ३ ) उदयनिवास महल, प्रतापगढ़ ... ... १६ ( ४ ) प्रतापगढ़ के प्राचीन महल ... ... २० ( ५ ) शेवना के प्राचीन शिवमन्दिर का भीतरी भाग ... २७ ( ६ ) शेवना के प्राचीन देवी-मन्दिर का भीतरी भाग ... २८ ( ७ ) महारावत जसवन्तसिंह ... ... १२६ ( ८ ) महारावत हरिसिंह ... ... १४१ ( ९ ) महारावत प्रतापसिंह ... ... १७७ ( १० ) महारावत पृथ्वीसिंह ... ... १९७ ( ११ ) महारावत उम्मेदसिंह ... ... २१५ ( १२ ) महारावत सालिमसिंह ... ... २४५ ( १३ ) महारावत सामन्तसिंह ... ... २५६ ( १४ ) रघुनाथद्वारा, देवलिया ... ... २७६ ( १५ ) महारावत दलपतसिंह ... ... २८१ ( १६ ) महारावत उदयसिंह ... ... २९७ ( १७ ) प्रतापगढ़ का नवीन राजभवन ... ... २९९ ( १८ ) महारावत सर रघुनाथसिंह, के० सी० आई० ई० ... ३१५ ( १९ ) महारावत सर रामसिंहजी बहादुर, के० सी० एस० आई० ३५० ( २० ) श्रीभुवनेश्वरीदेवी ज़नाना हॉस्पिटल, प्रतापगढ़ ... ३५२

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महामहोपाध्याय रायबहादुर साहित्यवाचस्पति डॉ० गौरीशंकर हीराचंद ओझा, डी० लिट्०, अजमेर रचित तथा संपादित ग्रन्थ स्वतन्त्र रचनाएं- मूल्य (१) प्राचीन लिपिमाला ( प्रथम संस्करण ) ... अप्राप्य (२) भारतीय प्राचीन लिपिमाला ( द्वितीय परिवर्द्धित संस्करण ) ... अप्राप्य (३) सोलंकियों का प्राचीन इतिहास-प्रथम भाग ... अप्राप्य (४) सिरोही राज्य का इतिहास ... अप्राप्य (५) बापा रावल का सोने का सिक्का ... ॥) (६) वीरशिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह ... ॥=) (७) * मध्यकालीन भारतीय संस्कृति ... रु० ३) (८) राजपूताने का इतिहास-पहली जिल्द ( द्वितीय संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण ) ... रु० ७) (६) राजपूताने का इतिहास-दूसरी जिल्द, उदयपुर राज्य का इतिहास-पहला खंड ... अप्राप्य उदयपुर राज्य का इतिहास-दूसरा खंड ... रु० ११) (१०) राजपूताने का इतिहास-तीसरी जिल्द, पहला भाग-डूंगरपुर राज्य का इतिहास ... रु० ४) दूसरा भाग-बांसवाड़ा राज्य का इतिहास ... रु० ४॥) तीसरा भाग-प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ... रु० ७) (११) राजपूताने का इतिहास-चौथी जिल्द, जोधपुर राज्य का इतिहास-प्रथम खंड ... रु० ८) जोधपुर राज्य का इतिहास-द्वितीय खंड ... यंत्रस्थ (१२) राजपूताने का इतिहास-पांचवीं जिल्द, बीकानेर राज्य का इतिहास-प्रथम खंड ... रु० ६) बीकानेर राज्य का इतिहास-द्वितीय खंड ... रु० ६)

  • प्रयाग की "हिन्दुस्तानी एकेडमी"-द्वारा प्रकाशित । इसका उर्दू अनुवाद भी उक्त संस्था ने प्रकाशित किया है। "गुजरात वर्नाक्युलर सोसाइटी" (अहमदाबाद) ने भी इस पुस्तक का गुजराती अनुवाद प्रकाशित किया है, जो वहां से १) रु० में मिलता है ।

२ मूल्य (१३) राजपूताने का इतिहास—दूसरा खंड ... अप्राप्य (१४) राजपूताने का इतिहास—तीसरा खंड ... रु० ६) (१५) राजपूताने का इतिहास—चौथा खंड ... रु० ६) (१६) भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की सामग्री ... ॥) (१७) ‡ कर्नल जेम्स टॉड का जीवनचरित्र ... ।) (१८) ‡ राजस्थान-ऐतिहासिक-दन्तकथा—प्रथम भाग ('एक राजस्थान निवासी' नाम से प्रकाशित) ... अप्राप्य (१९) × नागरी अंक और अक्षर ... अप्राप्य सम्पादित (२०) ✼ अशोक की धर्मलिपियां—पहला खंड ( प्रधान शिलाभिलेश्व ) ... रु० ३) (२१) ✼ सुलेमान सौदागर ... रु० १॥) (२२) ✼ प्राचीन मुद्रा ... रु० ३) (२३) ✼ नागरीप्रचारिणी पत्रिका ( त्रैमासिक ), नवीन संस्करण, भाग १ से १२ तक—प्रत्येक भाग ... रु० १०) (२४) ✼ कोशोत्सव स्मारक संग्रह ... रु० ३) (२५-२६) ‡ हिन्दी टॉड राजस्थान—पहला और दूसरा खंड ( इनमें विस्तृत सम्पादकीय टिप्पणियों-द्वारा टॉड-कृत 'राजस्थान' की अनेक ऐतिहासिक त्रुटियां शुद्ध की गई हैं ) ... रु० ४) (२७) जयानक-प्रणीत 'पृथ्वीराज-विजय-महाकाव्य' सटीक ... रु० ५) (२८) जयसोम-रचित 'कर्मचंद्रवंशोत्कीर्तनकं काव्यम्' ... यंत्रस्थ (२९) मुंहणोत नैणसी की ख्यात—दूसरा भाग ... रु० ४) (३०) गद्य-रत्न-माला—संकलन ... रु० १॥) (३१) पद्य-रत्न-माला—संकलन ... रु० ।।।) ‡ खङ्गविलास प्रेस, बांकीपुर-द्वारा प्रकाशित । × हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग-द्वारा प्रकाशित । ✼ काशी नागरीप्रचारिणी सभा-द्वारा प्रकाशित । ❖❖ ग्रन्थकर्त्ता-द्वारा रचित पुस्तकें 'व्यास एण्ड सन्स', बुकसेलर्स, अजमेर के यहां भी मिलती हैं ।

राजपूताने का इतिहास-तीसरी जिल्द, तीसरा भाग प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पहला अध्याय भूगोल सम्बन्धी वर्णन प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी राजधानी देवलिया होने से पहले यह राज्य देवलिया (देवगढ़) राज्य कहलाता था। उक्त राज्य के अधीन का प्रदेश कांठल नाम से प्रसिद्ध है। देवलिया का नाम क़सबा पहाड़ी प्रदेश में होने तथा वहां का जलवायु आरोग्यप्रद न होने के कारण महारावत प्रतापसिंह ने समान भूमि में घोघे- रिया खेड़ा (डोडेरिया का खेड़ा) के स्थान पर प्रतापगढ़ नगर बसाया, जहां राजधानी स्थिर होने से इसका नाम प्रतापगढ़ राज्य हुआ। प्रतापगढ़ राज्य राजपूताने के दक्षिणी भाग में २३°२२' और २४°१८' उत्तर अक्षांश तथा ७४°२६' और ७५° पूर्व देशान्तर के बीच स्थित है। स्थान और क्षेत्रफल इस राज्य का क्षेत्रफल अनुमान ८८६ वर्ग मील है। (१) संस्कृत के 'कंठ' या 'कंठिका' शब्द से कांठा शब्द की उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ समुद्र, नदी अथवा किसी निश्चित सीमा के किनारे का प्रदेश होता है। यथा 'मही कांठा' = 'मही के तट का प्रदेश'; 'रेवा कांठा' = 'रेवा(नर्मदा)के तट का प्रदेश' आदि। प्रतापगढ़ राज्य से मालवा राज्य की सीमा मिलती है। इस कारण से उक्त राज्य 'कांठा' अर्थात् सीमा के तट का प्रदेश कहलाने लगा, जिसका परिवर्तित रूप 'कांठल' है।

२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस राज्य के उत्तर में उदयपुर और ग्वालियर राज्य; पश्चिम में उदयपुर और बांसवाड़ा राज्य; दक्षिण में रतलाम और जावरा राज्य एवं पूर्व में ग्वालियर, जावरा तथा इंदौर राज्य के कुछ- सीमा कुछ अंश हैं। उत्तर से दक्षिण तक इस राज्य की अधिक से अधिक लंबाई ५० मील है। पूर्व से पश्चिम तक का उत्तर का आधा भाग चौड़ा है, जिसकी चौड़ाई ३० मील है, परंतु दक्षिणी आधे विभाग की चौड़ाई कम है और कहीं-कहीं तो केवल ८ मील ही है। प्रतापगढ़ राज्य का उत्तरी तथा उत्तर-पश्चिम का अनुमान एक तिहाई हिस्सा, जो 'मगरे' के नाम से प्रसिद्ध है, पर्वत श्रेणियों से भरा पर्वत श्रेणियां हुआ है। उत्तरी विभाग में सबसे ऊंची पहाड़ी समुद्र की सतह से १८४२ फुट ऊंची है। दक्षिणी विभाग में सबसे ऊंची पहाड़ी समुद्र की सतह से १६१० फुट है, जो कानगढ़ के समीप है। शेष भूमि अर्थात् राज्य का पश्चिमी विभाग मालवा के पठार के समान है, जो समुद्र की सतह से १६५० से १७०० फुट तक ऊंचा है और माल की ज़मीन होने से बड़ा उपजाऊ है। इस राज्य में जाकम (जाखम), शिव, ऐरा, रेतम और करमोई नदियां नामक नदियां हैं। उनमें जाकम (जाखम) और शिव साल भर बहती हैं, बाक़ी कुछ मास तक ही। (१) जाकम (जाखम)—यह नदी इंदौर राज्य के जाखमियां गांव से निकलकर कुछ दूर मेवाड़ में बहती हुई मेवाड़ से दक्षिण-पश्चिम में इस राज्य में प्रवेशकर मगरा ज़िले के उत्तरी भाग में बहती हुई पुनः मेवाड़ में प्रवेश करती है। तत्पश्चात् धरियावद के पास होती हुई यह मही की सहायक नदी सोम में जा मिलती है। (२) शिव—इस नदी का उद्गम इसी राज्य के दक्षिणी भाग में शिवना गांव से हुआ है। कुछ मील प्रतापगढ़ राज्य में बहकर पूर्व में २३ मील तक इस राज्य की सीमा बनाती हुई यह उत्तर-पूर्व में मंदसोर के पास बहकर चंबल में जा गिरती है।

भूगोल सम्बन्धी वर्णन ३ (३) ऐरा—राजधानी प्रतापगढ़ के पास से निकलकर १५ मील दक्षिण-पश्चिम में बहती हुई यह बांसवाड़ा राज्य में प्रवेश करती है और वहां से तीस मील बहकर मही में मिल जाती है। (४) रेतम—क़सबा प्रतापगढ़ से निकलकर राज्य के उत्तर-पूर्व में बहती हुई ग्वालियर राज्य में जाकर यह चंबल में मिल जाती है। (५) करमोई—इस नदी का निकास सीतामाता की पहाड़ियों से हुआ है। मेवाड़ में धरियावद के पास बहती हुई यह मही में जा मिलती है। इस राज्य में कोई बड़ी उल्लेखनीय झील नहीं है। राज्य में छोटे-बड़े सब मिलाकर ३१ तालाब हैं, जिनमें रायपुर, गंधेर, खेरोट, घोटार्सो, अचल्ल- झीलें पुर, जाजली, अचलावदा, साखथली और देवलिया का 'तेजसागर' तालाब मुख्य हैं। तेजसागर तालाब महारावत तेजसिंह का बनवाया हुआ है। इस राज्य का जल-वायु मालवा के समान है और सामान्यतः आरोग्यप्रद है। मई-जून और अक्टूबर मास में सर्वत्र विशेष गर्मी पड़ती जल-वायु और वर्षा है, किंतु मगरा ज़िले में पहाड़ियां होने से अन्य स्थानों की अपेक्षा गर्मी कम रहती है। शीतकाल में सर्दी अधिक पड़ती है। यहां वर्षा का औसत २५ इंच के क़रीब है। ई० स० १८६३ (वि० सं० १६५०) में यहां ६४ इंच वर्षा हुई थी और ई० स० १८६६ (वि० सं० १६५६) में ११ इंच से भी कम। पहाड़ी प्रदेश को छोड़कर यहां की अधिकांश भूमि उपजाऊ है। मिट्टी काली, भूरी और धामनी है। मगरा ज़िले की भूमि कंकरीली है। ज़मीन और पैदावार काली मिट्टीवाली अर्थात् 'माळ' की भूमि अधिक उपजाऊ है। यहां खरीफ़ (सियालू) और रबी (उन्हालू) दोनों फ़सलें होती हैं, परंतु रबी की फ़सल की अपेक्षा खरीफ़ की फ़सल अधिक होती है। जहां कुओं आदि से सिंचाई की सुविधा है, वहां तथा 'माळ' में रबी की फ़सल पैदा की जाती है।

४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास खरीफ़ की फ़सल की मुख्य पैदावार ज्वार, मक्का, तिल, कोदरा, कुरी, सामली, माल, चांवल, मूंग, उड़द, चौंला, तूअर, सन, कपास आदि हैं। रबी की पैदावार में गेहूं, जौ, चना, अफ़ीम, सरसों, अलसी, अजवाइन, राई, बटला ( मटर ), मसूर और सुवा हैं। जहां जल की सुविधा है, वहां गन्ने की खेती भी होती है। पहिले अफ़ीम की खेती बहुतायत से होती थी, परंतु कितने एक वर्षों से अंग्रेज़-सरकार की ओर से उसका बोना कम करा दिया गया है। शाकों में गोभी, आलू, कद्दू (कुम्हड़ा, कोला), प्याज़, लहसुन, मूली, रतालू, अरबी, अदरक, बैंगन, भिंडी, तुरई, आल (लौकी), गवार, मेथी आदि और फलों में आम, सीताफल (शरीफ़ा), केला, अनार, अमरूद, शहतूत, अंजीर, पपीता और नींवू मुख्य हैं। जंगल की पैदावार में सफ़ेद मूसली, गोंद, शहद, चिरौंजी तथा कत्था आदि हैं। इस राज्य के उत्तरी तथा पश्चिमी पहाड़ी प्रदेशों में जंगल बहुत हैं। पहले इन जंगलों की तरफ़ राज्य की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जाता जंगल था, किंतु अब वे राज्य के प्रबंध में हैं। जंगल में सागवान, शीशम, आबनूस, हल्दू, सालर, ढाक, धौ, कदंब, महुआ, पीपल, बबूल, नीम, इमली, बांस आदि के वृक्ष हैं। सीता- माता के पास केवड़ा अधिकता से होता है, जो सुगंधि के लिए प्रसिद्ध है। सरीपीपली, दोनों सालिमगढ़, बजरंगगढ़, कनोरा और अरणोद में भरनेवाले साप्ताहिक हटवाड़ों में भील लोग लकड़ियां, बांस आदि बेचने के लिए ले जाते हैं, जिससे राज्य को लगभग सात हज़ार रुपये वार्षिक महसूल की आय होती है। इन हटवाड़ों में सरीपीपली और सालिमगढ़ के हाट प्रसिद्ध हैं, जिनमें नीमच, मंदसोर और कभी-कभी नसीराबाद के व्यापारी भी लकड़ी खरीदने के लिए जाते हैं। चंदन के वृक्ष इस राज्य में सर्वत्र पाये जाते हैं, परंतु दक्षिणी भाग के बड़वास कलां और हतुण्या में अधिकता से होते हैं, जो राज्य की ही संपत्ति समझे जाते हैं। घास सर्वत्र होती है, पर मगरा ज़िले में अधिक। घास के कुछ स्थल राज्य के लिए सुरक्षित हैं।

भूगोल सम्बन्धी वर्णन ५ पालतू-पशुओं में गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़ा और ऊंट मुख्य हैं। जंगली जानवरों में बाघ, चीता, रीछ, जरख (लकड़बग्घा), हिरन, पशु-पक्षी नीलगाय, सांभर, चीतल, सूअर, भेड़िया, शियागोस आदि पाये जाते हैं । पक्षियों में गिद्ध, चील, तोता, कबूतर, फ़ाख़्ता, तीतर, बटेर, लवा आदि कई प्रकार के पक्षी हैं । जल के निकट रहनेवाले पक्षियों में सारस, बतख़, बगुले, टिटहरी आदि हैं । जल-जंतुओं में मगर, मछलियां, मेंढक, केकड़े, कछुए, जलमानुस आदि हैं खनिज पदार्थों की इस राज्य में खोज नहीं हुई है। प्रसिद्ध है कि राजधानी प्रतापगढ़ के समीप की पहाड़ियों में लोहा है । धमोतर के खानें पश्चिम में नकोर के पास इमारती पत्थर की खान है। देवलिया के महलों का निर्माण उसी पत्थर से हुआ है, परंतु कई वर्षों से यह खान बंद है । चूने का पत्थर राजधानी प्रतापगढ़ से पांच मील दूर रजोरा और तेरह मील दूर कामलियाखाल में मिलता है। प्रतापगढ़ राज्य में अब तक कोई रेल्वे लाइन नहीं खुली है । राज्य का निकटवर्ती रेल्वे स्टेशन पूर्व में बी० बी० एंड सी० आई० रेल्वे का रेल्वे मंदसोर है, जो वर्तमान राजधानी प्रतापगढ़ से २० मील दूर है । प्रतापगढ़ से मंदसोर स्टेशन तक पक्की सड़क है, जिसपर बैल- गाड़ियां, तांगे और मोटरें चलती हैं। इस राज्य में इस सड़क की लंबाई सड़कें १३ मील है और शेष ग्वालियर राज्य में है। आज- कल प्रतापगढ़ से मंदसोर तक मोटर सर्विस जारी हो जाने से लोगों को बड़ा सुभीता हो गया है। देवलिया, नीमच, धरियावद, बांसवाड़ा, पीपलोदा और जावरा की तरफ़ गमनागमन के लिए कच्ची सड़कें बनी हुई हैं और उधर मोटरें, तांगे आदि भी चलते हैं। राज्य के अन्य भागों में गाड़ियों तथा ऊंट, घोड़ा आदि भार-वाहक पशुओं के जाने लायक़ मार्ग हैं। बरसात में कच्ची सड़कें तथा पहाड़ी मार्ग खराब हो जाते