विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : २७ मन्त्र का उच्चारण, जो कि 'अजपा जप'1 के नाम से प्रसिद्ध है, परा शक्ति स्वयं ही करती है। इसीलिये 'मैं वह शिव हूँ' इस तरह के अपने स्वरूप का परिचय यहाँ प्राप्त होता है। इस स्थिति में हकार और सकार इन दोनों की उत्पत्ति के स्थल में, अर्थात् हकार की उत्पत्ति के स्थान हृदय और सकार की उत्पत्ति के स्थान द्वादशान्त में भरण से, अर्थात् उन वर्णों के स्वरूप का चिन्तन करने से, शाक्त बल की प्राप्ति होती है और अन्त में साधक भैरव-स्वरूप हो जाता है। ऊपर बताई गई छः व्याख्याओं में से पहली और दूसरी व्याख्या के अनुसार अविकल्प स्वरूप के चिन्तन से साधक शाम्भव समावेश में, चौथी और पांचवीं व्याख्या के अनुसार सब कुछ अपना ही स्वरूप है, इस तरह की भावना के आधार पर शुद्ध विकल्प का चिन्तन करने से शाक्त समावेश में एवं तीसरी और छठी व्याख्या के अनुसार धारणा में वर्णविशेष के परामर्श की प्रधानता के आधार पर आणव समावेश में समाहित होता है। इन त्रिविध समावेशों का वर्णन मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में 'उच्चारकरण' (२।२१-२३) इत्यादि तीन श्लोकों में किया गया है। उपोद्घात में इस विषय पर विशेष प्रकाश डाला जायगा। इस प्रथम धारणा में और आगे दी जा रही सभी धारणाओं में शाम्भव, शाक्त और आणव उपायों में से किसी एक का सहारा लेकर ही योगी अनुपाय प्रक्रिया में प्रविष्ट होता है या कभी-कभी बिना इनका सहारा लिये भी अपने स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है, इस बात का विशेष विवेचन भी हम वहीं करेंगे। आवश्यकता के अनुसार श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में भी इनका संक्षिप्त उल्लेख हो सकता है ॥२४॥ [ धारणा-२ ] मरुतोऽन्तर्बहिर्वाऽपि वियद्युग्मानि१वर्तनात् । भैरव्या२ भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः ॥२५॥ भैरवि, मरुतः प्राणस्यापानस्य च, अन्तर्बहिश्च यद् वियद्युग्मं हृदाकाशो द्वादशान्तश्च यद् वियद्द्वयम्, ततोऽनिवर्तनात् प्रत्यावर्तनाभावेन क्षणमात्रमन्तर्मुखत्वेना- वस्थानात् प्राणापानयोर्द्वयोरस्तंगतत्वात्, भैरवीस्वरूपस्य भैरवस्य परमात्मनः, वपुः शरीरं स्वरूपमिति यावत्। धर्मिधर्मात्मकत्वेन शिवशक्तिद्वैधं प्रकाशविमर्शस्वरूपं परमार्थत एकमेव तत्त्वं व्यज्यते प्रकाशते, प्रकटीभवति। 'अनुवर्तनात्' इति पाठे अनुन्मेषनिमेषणादित्यर्थः ॥२५॥ हे भैरवि, प्राण और अपान नामक पवन के आधारभूत स्थान आन्तर आकाश हृदय और बाह्य आकाश द्वादशान्त से प्रत्यावृत्ति के अभाव में एक क्षण के लिये उसकी वृत्ति १. ॰नु॰-ख० । २. ॰वं-ख० ।
- आगे १५१ संख्या के श्लोक की व्याख्या में इस विषय पर विस्तार से विचार किया जायगा।
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२८ : विज्ञानभैरव अन्तर्मुख हो जाती है। तब ऐसी प्रतीति होती है मानों प्राण और अपान कहीं विलीन हो गये हैं। इस स्थिति को इस शास्त्र में 'मध्यदशा' के नाम से जाना गया है, जिसका कि विश्लेषण आगे किया जा रहा है। इस मध्यदशा का जब विकास किया जाता है, तब परा शक्ति भैरवी से अभिन्न रूप में विद्यमान भगवान् भैरव का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। धर्म और धर्मी के रूप में प्रकाश और विमर्श स्वभाव शिव और शक्ति भिन्न होते हुए भी परमार्थतः एक ही हैं, इसका विवेचन अभी यहीं (१४-२१ श्लोक) किया जा चुका है। 'अनिवर्तनात्' के स्थान पर 'अनुवर्तनात्' ऐसा पाठ भी उपलब्ध होता है। यहाँ अनुवर्तन शब्द का अर्थ प्राण और अपान की उन्मेष और निमेष दशा की स्थिर अनुवृत्ति है। अर्थात् प्राण और अपान की जो स्थिति है, उसी के अनुवृत्त रहने पर, उनमें नये उन्मेष और निमेष व्यापार के न चलने पर, पहली व्याख्या में प्रतिपादित मध्यदशा का अन्वेषण किया जा सकता है। योगशास्त्र¹ की प्रक्रिया के अनुसार इस श्लोक का अभिप्राय यह होगा—सकल², प्रलयाकल प्रभृति सभी प्रमाता जीवों के प्राण की पूरक, कुम्भक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभा- विक रूप से बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील रहती हैं। हृदय स्थित कमलकोश से प्राण का उदय होता है। नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चल कर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है। इसलिए बाह्य आकाश भी योगशास्त्र में द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। प्राण की इस स्वाभाविक बाह्य गति को 'रेचक' नाम से जाना जाता है। बाह्य द्वादशान्त से अपान का उदय होता है और नासिका मार्ग से ही चलकर यह हृदय स्थित कमल- कोश में विलीन हो जाता है। अपान की यह स्वाभाविक आन्तर गति 'पूरक' कही जाती है। प्राण द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षणमात्र के लिये विलीन हो जाता है। यही प्राण की १. शिवोपाध्याय ने इस श्लोक की व्याख्या, विशेष कर आठ प्रकार के प्राणायामों का विवेचन योगवासिष्ठ के आधार पर किया है। योगवासिष्ठ 'मोक्षोपाय' के नाम से भी प्रसिद्ध है। द्रष्टव्य—प्रकरण ६ पूर्वार्ध, २५ वां सर्ग। २. शैव शास्त्रों में प्रमाता के सात भेद माने गये हैं। ये हैं—शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल। शिव और शक्ति तत्त्व मिलकर शिव प्रमाता का रूप धारण करते हैं। इसकी स्थिति राजा के समान है। सदाशिव मन्त्रमहेश्वर, ईश्वर मन्त्रेश्वर और शुद्धविद्या मन्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी स्थिति अधिकारी राजपुरुष की सी है। विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल जीवों पर ये शिवप्रमाता रूपी राजा के प्रतिनिधि होकर शासन करते हैं। आणव, मायीय और कार्म—ये तीन प्रकार के मल माने गये हैं। इनमें से एक मल से आवृत विज्ञानाकल, दो मलों से आवृत प्रलयाकल और तीनों मलों से आवृत सकल प्रमाता कहलाते हैं। ये सभी भेद परिमित प्रमाता के हैं। प्रथम चार भेद शुद्ध सृष्टि के और अन्तिम तीन अशुद्ध सृष्टि के अन्तर्गत हैं। अशुद्ध सृष्टि के प्रमाताओं को ही अपने मलीय आवरणों को हटाने के लिए उपायों का सहारा लेना पड़ता है।
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विज्ञानभैरव : २९ 'कुम्भक' अवस्था कही जाती है। बाहर और भीतर दोनों स्थानों में निष्पन्न होने से यह बाह्य और आन्तर के भेद से दो तरह की होती है। मनुष्य के श्वास-प्रश्वास की निरन्तर चलने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया से निष्पन्न होने वाली इन रेचक, पूरक तथा बाह्य एवं आन्तर कुम्भक अवस्थाओं का निरन्तर सावधानी से निरीक्षण¹ करने वाला योगी फिर आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ता। पातंजल योग में प्राणायाम के अभ्यास से प्राण वायु की गति को नियन्त्रित इसलिये किया जाता है कि उसी अभ्यास की पद्धति से मन को भी नियन्त्रित किया जा सके। सहज योग के प्रतिपादक इस ग्रन्थ में न तो प्राण वायु के और न मन के ही निग्रह के लिये कोई आयास-साध्य उपाय बताया गया है। वायु स्वभाव से ही चल है। चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते प्राणों की गति निरन्तर चलती रहती है। सकल, प्रलयाकल प्रभृति प्रमाता जीवों में ही नहीं, पशु पक्षी, मृग आदि में भी सदा, सर्वत्र दिन-रात बिना प्रयत्न के स्वाभाविक रूप से आठ प्रकार के प्राणायाम निरन्तर निष्पन्न होते रहते हैं। इन आठ प्रकार के प्राणायामों के स्वरूप को ठीक तरह से जान लेने पर योगी मुक्त हो जाता है। साधक जो कुछ करता है, उन सभी अवस्थाओं में अपने स्वाभाविक बोध से इन कुम्भक प्रभृति प्राण की अवस्थाओं को जानता रहता है, वह अन्तर्मुख हो जाता है, अर्थात् सब कुछ करते हुए भी वह उनमें लिप्त नहीं होता। इन आठ प्राणायामों की स्थिति इस प्रकार है—१. हृदय कमल से प्राण स्वेच्छा से ही बहिर्मुख हो जाता है। यह प्राण की रेचक अवस्था है। २. हृदय से बाहर निकलते समय बारह अंगुल तक प्राण का अंगों से जो स्पर्श होता है, वह पूरक दशा है। ३. पुरुष के प्रयत्न के बिना ही बाहर से अपान के लौटते समय, अंगों में उसके भरते समय जो स्पर्श होता है, उसको भी पूरक ही कहते हैं। ४. अपान के हृदय में आकर विलीन हो जानेपर जब तक प्राण का उदय नहीं होता, तब तक की अवस्था कुम्भक कहलाती है। इस अवस्था का अनुभव केवल योगी को ही हो सकता है। इस तरह प्राण वायु शरीर के बाहर और भीतर निरन्तर स्वाभा- विक रूप से प्राण² के आयाम के अभ्यास में निरत रहता है। प्राण की भांति अपान भी दिन-रात शरीर के भीतर और बाहर चलता हुआ अपान के आयाम के स्वाभाविक अभ्यास
- बौद्ध (पालि और संस्कृत) अभिधर्म ग्रन्थों में दस अनुस्मृतियां वर्णित हैं। इनमें अन्तिम अनुस्मृति का नाम आनापान स्मृति है (द्रष्टव्य—अभिधम्मत्थसंगहो ९।८)। इसका संबन्ध प्राण और अपान की इस सूक्ष्म प्रक्रिया से ही है।
- "तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः" (२।४९) इस योग-सूत्र और इसके व्यास-भाष्य प्रभृति ग्रन्थों में प्राणायाम शब्द की विस्तृत व्याख्या देखनी चाहिये। संक्षेप में श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना ही प्राणायाम कहलाता है। श्लो० ६६ की व्याख्या में इसका अवयवार्थ स्पष्ट किया गया है। प्राणायाम शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य नरेन्द्रदेव अपने ग्रन्थ 'बौद्ध-धर्म-दर्शन' में आश्वास-प्रश्वास शब्द पर टिप्पणी करते हैं—"विनय की अर्थकथा के अनुसार 'आश्वास' सांस छोड़ने को
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३० : विज्ञानभैरव में निरन्तर लगा रहता है। जैसे कि १. उदय के बिना अपान की अन्तर्मुखता बाह्य रेचक के नाम से जानी जाती है। २. अपान के द्वादशान्त से उठ कर स्थूल स्वरूप धारण करने की दशा को बाह्य पूरक कहा जाता है। ३. इसी तरह से द्वादशान्त (बाह्य आकाश) से उठ कर नासिका के अग्रभाग तक की अपान की गति को भी बाह्य पूरक कहा जाता है। ४. बाह्य आकाश (द्वादशान्त) में प्राण के अस्त हो जाने पर जब तक अपान का उदय नहीं हो जाता, तब तक की अवस्था को बाह्य कुम्भक कहा जाता है। अपान की उस समय वैसी ही स्थिति रहती है, जैसी कि मिट्टी में अभी पैदा नहीं हुए घड़े की होती है। इस तरह से प्राण और अपान के पूरण के दो प्रकारों के अनुसार प्राणायाम के आठ भेद होते हैं। इन सभी आठों प्राणायामों को अपना ही स्वरूप समझ कर इनकी भावना करनी चाहिये। हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में प्राण की गति रहती है और हृदय-कमल, मुख का संकोच-विकास तथा द्वादशान्त अपान की गति के स्थान हैं। इनमें एक क्षण के लिये प्राण के अस्त हो जाने पर और अपान का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के बाह्य कुम्भक की प्राप्ति होती है। इसी तरह से एक क्षण के लिये अपान के अस्त हो जाने पर और प्राण का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के अन्तः कुम्भक की प्राप्ति होती है। यह 1मध्यदशा ही परम पद कहलाती है। प्राण और अपान की इस मध्यदशा को योगी ही जान सकते हैं। एक 2त्रुटि, लव अथवा क्षण के लिये भी अन्तर्मुख हो जाने पर योगी में इस मध्य- और 'प्रश्वास' सांस लेने को कहते हैं। लेकिन सूत्र की अर्थकथा में दिया हुआ अर्थ इसका ठीक उल्टा है। आचार्य बुद्धघोष विनय की अर्थकथा का अनुसरण करते हैं। उनका कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले भीतर की हवा बाहर जाती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है। इस प्रवृत्ति क्रम से 'आश्वास' वह वायु है, जिसका निःसारण होता है। सूत्र की अर्थकथा में किया गया अर्थ पातंजल योगसूत्र के व्यास-भाष्य के अनुसार है (२।४९ पर व्यासभाष्य- “बाह्यस्थवायोरानयनं (चमनं) श्वासः, कोष्ठ्यस्य वायोर्निःसारणं प्रश्वासः)'' (पृ० ८१)। ६६ वें श्लोक की व्याख्या में भी इस तरह का मतभेद देखने में आता है। इस पर उपोद्घात में विचार किया जायगा।
- “मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः” और “विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकास-वाहच्छेदद्यन्त- कोटिनिभालनादय इहोपायाः” (सू० १७-१८) प्रत्यभिज्ञाहृदय के इन दो सूत्रों और उनकी व्याख्या में क्षेमराज ने इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाया है।
- प्राण के सवा दो अंगुल चलने में जितना समय लगता हैं, उसे 'त्रुटि' कहते हैं। कमल के कोमल पत्तों में तीखी सुई चुभोने पर एक पत्ते को छेदने में जो समय लगता है, उसे 'लव' कहा जाता है। अठारह निमेष (पलक झपने का समय) की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला और तीस कला का एक क्षण होता है। त्रुटि, लव और क्षण की यह परिभाषा क्रमशः तन्त्रसार (अभिनवगुप्त कृत, पृ० ४८), प्रपंचसार (१।३९) और अमर- कोश (१।४।११) में दी गई है।
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विज्ञानभैरव : ३१ दशा का आविर्भाव हो जाता है और तब प्राण और अपान की पुनः प्रत्यावृत्ति नहीं होती, अर्थात् वह साधक मुक्त हो जाता है ॥२५॥ [ धारणा-३ ] ¹न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरुद्रूपा विकासि¹ते । निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता² ॥२६॥ मध्ये मध्यनाडीधाम्नि निर्विकल्पतया विकल्पहान्युपायतो विकासिते सति मरु- द्रूपा शक्तिः प्राणात्मिका न व्रजेद् हृदयतो द्वादशान्तं न यायात्, न चापानात्मिका शक्तिः, विशेद् द्वादशान्ताद् हृदयं गच्छेत् । एवंविधया तया प्राणात्मिकया अपाना- त्मिकया वा शक्त्या भैरवरूपता भवेत् भैरवरूपधारी योगी भवति ॥२६॥ वायुरूप यह प्राणात्मक और अपानात्मक शक्ति हृदय से द्वादशान्त तक न तो जायगी और न द्वादशान्त से हृदय की ओर वापस ही लौटेगी, जब कि मध्यनाडी का धाम (स्थान) विकल्पहानि रूप उपाय से विकसित कर दिया जाय, अर्थात् पूर्व श्लोक में प्रतिपादित मध्य- दशा का योगाभ्यास की पद्धति से विकास कर लिया जाय । इसका अभिप्राय यह है— सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विश्वक् । क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तम्भभूतस्तिष्ठन् विश्वाकार एकोऽवभासि ॥ कक्ष्यास्तोत्र के इस वचन के अनुसार दर्शन आदि सब शक्तियों के समूह को अपने अपने विषय में एक साथ डाल कर, उसके आधार के रूप में— तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ॥ (श्लो० ११) इस स्पन्दकारिका के श्लोक में प्रतिपादित स्पन्दतत्त्वात्मक अपने स्वभाव को जान कर, निर्विकल्पभाव से निमीलन और उन्मीलन समाधि में एक साथ रहने वाली व्यापक मध्यदशा का सहारा लेकर योगी भैरव मुद्रा में प्रविष्ट हो जाता है । इस मुद्रा का लक्षण यह है— अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेषवर्जिता । इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ इस अवस्था में प्रविष्ट हो जाने पर योगी दर्पण में बनते-बिगड़ते हुए नाना प्रकार के प्रतिबिम्बों की भांति चिदाकाश में उदित और विलीन हो रहे बाह्य पदार्थों और आन्तर भावों को, अर्थात् समस्त विकल्पों को, निमीलन और उन्मीलन ²समापत्ति (समाधि) के बीच १. °स°-ख० । २. °धृत्-ख० तवि०, °धृक्-रप० ।
- यह श्लोक स्पन्दनिर्णय (पृ० २४) और तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३३३) में उद्धृत है ।
- समाधि के अर्थ में समापत्ति शब्द का प्रयोग बौद्ध साहित्य में भी मिलता है । भैरवी मुद्रा में अन्तर्लीन व्यक्ति की इन्द्रियाँ खुली रहती हैं, तो भी वे अपने विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होतीं। इसी स्थिति को उन्मीलन समाधि कहते हैं। बाह्य और आन्तर इन्द्रियों (करणों) के प्रवाह को रोक कर प्राप्त की गई समाधि को निमीलन समाधि कहते हैं ।
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३२ : विज्ञानभैरव में ध्यान रूपी अरणि से जलाई गई ज्ञानाग्नि के द्वारा भस्म कर अपने समस्त करणचक्र (इन्द्रिय समूह) को आलम्बन के अभाव में अक्रम रूप से अपने स्वरूप में ही विस्फारित (विस्तीर्ण) कर लेता है। उस समय ऐसी प्रतीति होती है, मानों ये इन्द्रियां अपने अद्भुत स्वरूप को आँखें फाड़ कर देख रही हों। इस निर्विकल्प अवस्था में प्रवेश कर लेने पर साधक भैरवस्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसको अपने स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा हो जाती है, प्राण और अपान की गति के शान्त हो जाने से, हृदय और द्वादशान्त में प्राण और अपान की अस्पन्द अवस्था में स्थिति हो जाने से, मध्यदशा का विकास होने पर साधक अपने भैरवीय स्वरूप को पहचान लेता है, वह साक्षात् भैरव स्वरूप हो जाता है। इसी विषय को अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में— तद्ध्यानारणिसंक्षोभान्महाभैरववह्न्यभुक् । हृदयाख्ये महाकुण्डे जाज्वलन् स्फीततां व्रजेत् ॥ इत्यादि ग्रन्थ से स्पष्ट किया है। पचीसवें और छब्बीसवें श्लोक में मध्यम धाम (स्थान) का सहारा लेने वाले आणव उपाय का वर्णन है ॥२६॥ [ धारणा-४ ] कुम्भिता रेचिता वापि पूरिता वा यदा भवेत् । तदन्ते शान्तनामासौ शक्त्या शान्तः प्रकाशते ॥२७॥ शास्त्रमार्गानुसारेण रेचिता सती कुम्भिता बहिः, पूरिता वा सती कुम्भिता अन्तः, यदा मरुद्रूपा शक्तिर्भवति, तदा तदन्ते तत्तदभ्यासपरिशीलनेन शान्तवेगानुभवेन प्रशान्तकुम्भकावस्थोदये प्रकाशमात्रावस्थोदये भेदोपशमात् तया शक्त्या शान्तनामा नामरूपातीतः, असौ शान्तः परमस्वभावः प्रकाशतेऽभिव्यक्तो भवति ॥२७॥ योगशास्त्र में उपदिष्ट पूर्वोक्त विधि से बाह्य कुम्भक अवस्था में, अथवा आन्तर कुम्भक अवस्था में प्राण और अपान रूप शक्ति आदरपूर्वक निरन्तर अभ्यास का परिशीलन करने से शान्त हो जाती है, अर्थात् मध्यदशा का विकास हो जाता है। कुम्भक की प्रशान्त अवस्था का उदय होने से सभी भेद विगलित हो जाते हैं और शक्ति भी अपने शान्त स्वरूप में विलीन हो जाती है। तब नाम और रूप से अतीत प्रकाशमात्र अवस्था का उदय होने पर परम शान्तस्वभाव स्वात्मस्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है ॥२७॥ [ धारणा-५ ] १आमूलात् किरणाभासां १सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरात्मिकाम् । चिन्तयेत् तां द्विषट्कान्ते शाम्यन्तीं भैरवोदयः ॥२८॥ १. सूक्ष्मसूक्ष्मत°-त० ।
- नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) तथा तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ४०१) में यह श्लोक उद्धृत है।
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विज्ञानभैरव : ३३ आमूलात् आहृदयाद् जन्माधाराद्वा द्वादशान्तं यावत् किरणाभासां मरीचिरूपां क्रमात्क्रमं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरात्मिकां तनिमानमाश्रयन्तीं तां मरुच्छक्तिं चिन्तयेत् ध्यायेत् । कीदृशीम् ? द्विषट्कान्ते द्वादशान्ते शाम्यन्तीम् । एवं सुसूक्ष्मतमस्यापि ध्येयाकारस्य गलनाद् भैरवोदयो भैरवस्वरूपाविर्भावः, भवेदिति शेषः ॥२८॥ हृदय से अथवा मूलाधार से लेकर द्वादशान्त तक चन्द्र और सूर्य के समान अपनी किरणों से भासित हो रही तथा क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था की ओर अग्रसर हो रही उस पवन की शक्ति का चिन्तन करे, जो कि द्वादशान्त में जाकर शान्त हो जाती है, नाम और रूप से अतीत अवस्था को प्राप्त कर लेती है । इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त सूक्ष्म ध्येय के आकार के भी विगलित हो जाने पर योगी भैरव स्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसकी स्वाभाविक भैरव दशा का आविर्भाव हो जाता है । नेत्रतन्त्र (८।४१) की टीका में क्षेमराज ने तथा तन्त्रालोक (५।८९-९१) की टीका में जयरथ ने इस श्लोक को उद्धृत कर जो विवरण प्रस्तुत किया है, तदनुसार यहाँ द्वादशान्त पद से ब्रह्मरन्ध्र का ग्रहण किया जाना चाहिये । मूलाधार में अथवा हृदय में विद्यमान प्राण शक्ति यौगिक पद्धति के अनुसार सुषुम्णा मार्ग से अथवा मध्यदशा के विकास के कारण ब्रह्मरन्ध्र तक जाते जाते अत्यन्त सूक्ष्म होकर अन्त मे प्रकाश में विलीन हो जाती है ॥२८॥ [ धारणा-६ ] ¹उद्गच्छन्तीं तडिद्रूपां प्रतिचक्रं क्रमात्क्रमम् । ऊर्ध्वं मुष्टित्रयं यावत् तावदन्ते महोदयः ॥२९॥ तामेत शक्तिं तडिद्रूपां विद्युद्वत् चलद्दीप्त्योज्ज्वलां प्रतिचक्रं कन्दादिब्रह्मरन्धा- न्तचक्रेभ्यः क्रमात्क्रमम् उद्गच्छन्तीमुल्लसन्तीं चिन्तयेत्, यावत् परं विश्वपूरकमूर्ध्वं मुष्टित्रयं द्वादशान्तधाम तावत् । अन्ते महोदयः महाभैरवैकात्मतोदयः, अहमेव महाभैरव इत्यवमर्शः स्यादेव ॥२९॥ इसी विद्युतस्वरूप, बिजली के समान एकाएक चमकने वाली शक्ति का प्रत्येक चक्र में, कन्द से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त क्रमशः ऊपर उठती हुई अवस्था में चिन्तन करे । इससे ²मुष्टित्रय परिमित द्वादशान्त धाम में परम उत्कृष्ट विश्वपूरक, सारे विश्व को अपने प्रकाश से भर देने वाला, महाभैरव का स्वरूप प्रकाशित हो उठता है । इसी बात को तन्त्रालोक में इस प्रकार से कहा गया है— अधःप्रवाहसंरोधादूर्ध्वक्षेपविवर्जनात् । महाप्रकाशमुदयज्ञानव्यक्तिप्रदायकम् ॥ अनुभूय परे धाम्नि मात्रावृत्त्या पुरं विशेत् । (५।८८-८९) १. यह श्लोक तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३९७) में उद्धृत है । २. एक मुट्ठी का परिमाण चार अंगुल माना गया है । तीन मुट्ठी, अर्थात् बाहर अंगुल । इस तरह से मुष्टित्रय शब्द यहाँ द्वादशान्त के अर्थ में प्रयुक्त है ।
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३४ : विज्ञानभैरव इसका अभिप्राय यह है कि प्राण और अपान की गति को रोक कर मध्यदशा का विकास कर उससे उत्पन्न शक्ति की सहायता से ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश पाकर योगी परम प्रकाश- मय स्थिति में अवस्थित हो जाता है ॥२९॥ [ धारणा-७ ] क्रमद्वादशकं सम्यग् द्वादशाक्षरभेदितम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्वा मुक्त्वा¹ऽन्ततः शिवः ॥३०॥ जन्माग्र-मूल-कन्द-नाभि-हृत् - कण्ठ-तालु-भ्रूमध्य - ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापि- न्याख्यं यत्क्रमाणां चक्राणां द्वादशकं द्वादशस्थाननामभिः प्रसिद्धम्, तत् सम्यगिति यथा- यथं क्रमेण अकारादिविसर्गान्तैः षण्ढस्वरवर्जैर्द्वादशाक्षरैः, भेदितं रञ्जितम्, ध्यायेदिति शेषः । तच्च प्रत्येकं स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या आदौ ध्यानेन स्फुटं ततश्च स्पन्दमानं ततोऽपि ज्योतीरूपतां प्राप्तं स्थूलं सूक्ष्मं परमित्यभिधीयते । इति सोपानपदक्रमं मुक्त्वा मुक्त्वा परित्यज्य, अन्ततोऽन्ते, शिवः परमार्थतः सर्वत्रावभासकः स्वात्मस्वरूपः शिव एव भवति ॥३०॥ जन्माग्र, मूल, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति, व्यापिनी ये बारह चक्र, जो कि द्वादश स्थान के नाम से प्रसिद्ध हैं, क्रमशः एक दूसरे के ऊर्ध्व स्थान में स्थित हैं । इन चक्रों के स्थान और स्वरूप को ठीक तरह से समझ कर उनमें अकार से लेकर विसर्ग पर्यन्त स्वरों का ध्यान करना चाहिये । तन्त्रशास्त्र में ऋ ॠ लृ लॄ ये चार स्वर षण्ढ (नपुंसक) कहे गये हैं, अतः ध्यान आदि में इनका उपयोग नहीं किया जाता । सोलह स्वरों में से इन चार षण्ढ स्वरों को निकाल देने पर इनकी संख्या भी बारह रह जाती है । अतः इन बारह स्वरों का क्रमशः उक्त बारह चक्र स्थानों में ध्यान करना चाहिये । यह ध्यान स्थूल, सूक्ष्म और पर पद्धति से त्रिविध¹ उपाय के रूप में मृत्युंजयभट्टारक (नेत्रतन्त्र) के ६-८ अधि- कारों में विस्तार से वर्णित है । योगी जब अपने दृढ़ संकल्प से इन ध्यानों का अभ्यास करते हुए स्पष्ट स्थूल वस्तु के ध्यान को छोड़ कर स्पन्दावस्था में विद्यमान सूक्ष्म वस्तु के ध्यान में और सूक्ष्म ध्यान को छोड़कर ज्योतिर्मय पर वस्तु के ध्यान में प्रविष्ट होता है, तो अन्ततः इस अभ्यास-पद्धति से वह परमार्थ रूप से सर्वत्र प्रकाशित हो रहे कल्याणमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, अर्थात् स्वयं शिव बन जाता है ॥३०॥ [ धारणा-८ ] तया²ऽऽपूर्याशु मूर्धान्तं भङ्क्त्वा भ्रूक्षेपसेतुना । निर्विकल्पं मनः कृत्वा सर्वोर्ध्वे सर्वगोद्गमः ॥३१॥ १. ˚क्त्वा त˚-ख० । २. ˚था˚-ख० ।
- याग, होम, जप, ध्यान, मुद्रा, यन्त्र, मन्त्र—ये सब स्थूल उपाय हैं । षट्चक्र, षोडश आधार आदि में प्राण-चार की भावना को सूक्ष्म उपाय बताया गया है । अष्टांग योग के अभ्यास से प्राप्त होने वाली सर्वात्मभाव की स्थिति को पर उपाय माना गया है ।
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विज्ञानभैरव : ३५ तया जन्मादिचक्राक्रमणशक्त्या प्राणाख्यया मूर्धान्तं द्वादशान्तमापूर्य, तथा तमेव द्वादशान्तं भ्रूक्षेपसेतुना भ्रूभेदनक्रमेण सेतुनेव वारिप्रवाहं गुरूपदेशयुक्त्या भङ्क्त्वा, तदन- न्तरं मनो निर्विकल्पं त्यक्तचापलं कृत्वा विधाय, सर्वोर्ध्वे द्वादशान्तादप्युपरि परमाकाशे सर्वगोद्गमः सर्वव्यापकताप्रादुर्भावः स्यात् ॥३१॥ पूर्व श्लोक में प्रतिपादित जन्माग्र प्रभृति बारह चक्रों का भेदन करने वाली प्राण-शक्ति से मूर्धान्त, अर्थात् द्वादशान्त को भर कर तथा उस द्वादशान्त को भ्रूक्षेप के सेतु से, अर्थात् भ्रूभेद के क्रम से, जैसे पुल (सेतु) की सहायता से नदी आदि के पानी को पार किया जाता है, उसी तरह गुरु के द्वारा उपदिष्ट युक्ति से पार कर और इसके बाद मन को निर्विकल्प, निश्चल, स्थिर बना कर द्वादशान्त के भी ऊपर स्थित सबसे ऊपर वाले स्थान परमाकाश में जब योगी पहुँचता है, उस समय उसमें सर्वव्यापकता का उद्गम हो जाता है, अर्थात् वह सर्वव्यापक पर- भैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥३१॥ [ धारणा-९ ] १शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम्२ । ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये प्रवेशो३ हृदये भवेत् ॥३२॥ यथा हि शिखिपक्षैर्मयूरपुच्छैः, चित्ररूपैरनेकवर्णैः, मण्डलैश्चन्द्रकैः, शून्यपञ्चक- मूर्ध्वाधोमध्यपार्श्वद्वयस्थितमिव पञ्चेन्द्रियमण्डलैश्चित्रवद्भासमानस्य जगतो शून्यपञ्चकरूपत्वं हृदये ध्यायतः, अनुत्तरे शून्ये परमाकाशे परमधामनि प्रवेशः समावेशो भवेत् । गन्धर्वनगरतुल्यं चित्रमिवेदमिति निश्चयेन परमार्थसिद्धिः स्यादेवेति भावः । शिखिपक्षचित्ररूपैरिति पाठे त्वयमर्थः—शिखिपक्षवच्चित्ररूपैः रूपरसादिग्रहणानानारूपै- मण्डलैः । मण्डं रससारं लान्तीदृंशि मण्डलानीन्द्रियाणि तैः । शून्यपञ्चकं तन्मात्रत्वे- नाव्यक्तत्वात् शून्यरूपं विषयपञ्चकं शब्दादिरूपं ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये भैरवरूपे प्रवेशः समावेशो भवेदिति ॥३२॥ जैसे चित्र-विचित्र चन्द्रकों से देदीप्यमान मोर के पंखों में पाँच शून्य दिखाई पड़ते हैं, इनकी स्थिति ऊपर, नीचे, मध्य तथा दोनों पार्श्वों में होती है, इसी तरह पाँच इन्द्रिय- मण्डलों से चित्र-विचित्र रूप में प्रतीत हो रहे इस जगत् के प्रति अपने हृदय में पाँच इन्द्रियों के विषयों के स्थान पर पाँच शून्यों की भावना करने पर योगी का अनुत्तर शून्य, अर्थात् परम आकाश में समावेश हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि योगी को अपने इन्द्रिय- मण्डल की सहायता से यह जगत् मयूर के पंख के समान नाना वर्णों से चित्रित चित्र के समान विविध रूपों में भासित होता है । यह आभास शून्य-स्वरूप है, यह सब गन्धर्व- नगर के समान अथवा चित्र के समान कल्पना का व्यापार मात्र है, ऐसी भावना करने पर १. °पिच्छचि°-योक०, °पक्षचि°-योख० । २. °ष्ट्ककम्-योख० । ३. परं व्योमतनुर्भ°-योख० ।
- योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ३१९) में यह श्लोक मिलता है ।
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३६ : विज्ञानभैरव निश्चय ही परमार्थ की प्राप्ति हो जाती है। कहीं कहीं 'शिखिपक्षचित्ररूपैः' ऐसा पाठ मिलता है। इसका अभिप्राय यह है कि रूप, रस आदि विविध विषयों के ग्राहक इन्द्रियों का मण्डल इस लिये है कि ये उन-उन विषयों के सार को लाकर चित्त को समर्पित करती हैं। तन्मात्रा- वस्था में अव्यक्त, अर्थात् शून्य रूप से अवस्थित इन शब्द आदि पाँच विषयों का हृदय में ध्यान करने वाले योगी का अनुत्तर शून्य भैरव रूप में प्रवेश अर्थात् ¹समावेश हो जाता है। योगिनीहृदयदीपिका के रचयिता अमृतानन्द योगी ने शून्यषट्क की व्याख्या करते हुए इस श्लोक को उद्धृत किया है। योगिनीहृदय में 'ह्रीं' इस बीजाक्षर में छः शून्यों की भावना का उपदेश है। प्रणव आदि में भी यह भावना की जा सकती है। 'ह्रीं' बीज में हकार और मायाक्षर (ईकार) के बीच में रेफ की, मायाक्षर और अर्धचन्द्र के बीच में बिन्दु की, अर्धचन्द्र और नाद के बीच में रोधिनी की, नाद और शक्ति के बीच में नादान्त की, शक्ति और समना के बीच में व्यापिका की और समना के ऊपर उन्मनी की शून्य के रूप में भावना करनी चाहिये। इनमें से प्रथम पाँच शून्यों की भावना मयूर के पंख में विद्यमान चन्द्रक के सदृश करनी चाहिये। अन्ततः जब योगी उन्मना नामक षष्ठ शून्य में प्रविष्ट होता है, तब वह परमाकाश में लीन हो जाता है ॥३२॥ [ धारणा-१० ] ईदृशेन क्रमेणैव यत्र ¹कुत्रापि चिन्तना² । शून्ये कुड्ये परे पात्रे स्वयंलीना वरप्रदा ॥३३॥ ईदृशेन क्रमेण हानादानरूपेण गुदाधार-जन्म-कन्द-नाभि-हृदय-कण्ठ-तालु- भ्रूमध्य-ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापिन्यन्तं यत्र कुत्रापि स्वात्मनोऽन्यत्र स्वात्मवत् परत्रापि व्योम्नि प्राकारभाजनादौ, यद्वा परे पात्रे निर्मलचित्ते शिष्यादौ, चिन्तना स्मरणा, स्वयंलीना अहर्निशं स्वदेहान्तः क्रमद्वादशकारोहणगाढतरध्यानावमर्शबलात् स्वयमेव लीना सती, वरप्रदा भवेत् परप्रकाशोदयात्मकोत्कृष्टवस्तुप्रदायिनी भवति। चिन्तनादिति पाठे तु पूर्वोक्तां मरुच्छक्तिं प्रथमान्तत्वेन विपरिणमय्य सा मण्डूकप्लुत्या- ऽनुवर्तनीया, तेन चिन्तनाद् हेतोर्मरुच्छक्तिः शून्ये बाह्ये कुड्यादौ वा स्वयंलीना सती वरप्रदेत्यन्वयः। बाह्यशून्यकुड्यादिकेऽपि स्वात्मवपुषीव प्राणशक्तिक्रमद्वादशकं चिन्तनीयम्, यत्र तत्र परपदपरामर्शैक्यभावेनाहंरूपतादात्म्याभिमानः स्यादिति तात्पर्यम् ॥३३॥ १. य°-ख०। २. °नात्-कटी०, °येत्-ख०।
- समावेश, समापत्ति, समाधि—ये सब शब्द पर्यायवाची हैं। समावेश दशा में व्यक्ति अपने बाह्य स्वरूप को भूल जाता है और अपने इष्टदेव के स्वरूप में समाविष्ट ( लीन ) हो जाता है। समावेश का लक्षण और उसके भेदों का, विशेष कर शाम्भव, शाक्त और आणव समावेशों का, निरूपण तन्त्रालोक के प्रथम आह्निक (पृ० २०५-२५५) में विस्तार से मिलता है।
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विज्ञानभैरव : ३७ इसी क्रम से गुदाधार, जन्म, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति और व्यापिनी में से किसी को छोड़ते और किसी को पकड़ते हुए, अथवा जहाँ कहीं भी अपने शरीर के सिवाय दूसरे के शरीर में भी इसी प्रकार चिन्तन करते हुए, अथवा अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र आकाश, प्राकार (परकोटा), पात्र आदि में, अथवा परपात्र, अर्थात् निर्मल मन वाले शिष्य के चित्त में चिन्तन-स्मरण की प्रक्रिया से रात-दिन इस द्वादश क्रम के आरोहण की पद्धति का दृढ़तापूर्वक अभ्यास करने से साधक की स्मृति स्वयं विलीन होकर वरदात्री बन जाती है, अर्थात् परम प्रकाश के उदय के रूप में उत्कृष्ट वस्तु को देने वाली होती है। इसी बात को अभिनवगुप्त ने अपने परमार्थसार में इस तरह से बताया है— सर्वोत्तीर्णं रूपं सोपानपदक्रमेण संश्रयतः । परतत्त्वरूढिलाभे पर्यन्ते शिवमयीभावः ॥ (९७ श्लो०) अर्थात् कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, बिन्दु, नाद, शक्ति ये सब परतत्त्व तक पहुँचने के लिए सीढ़ी का काम करते हैं। धीरे-धीरे एक सीढ़ी को छोड़कर दूसरी पर चढ़ते हुए अन्त में जैसे व्यक्ति गन्तव्य स्थान तक पहुँच जाता है, उसी तरह से इनमें से भी एक को छोड़ कर दूसरे को पकड़ते हुए योगी अन्त में सर्वोत्तीर्ण रूप में, सबसे उत्कृष्ट अवस्था में पहुँच जाता है, अर्थात् वह स्वयं शिवमय हो जाता है। 'चिन्तनात्' ऐसा पाठ मानने पर पूर्व श्लोकों में वर्णित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति पद को प्रथमा विभक्ति में बदल कर ¹मण्डूक-प्लुति न्याय से उसकी यहाँ अनुवृत्ति की जाती है। इससे यह अर्थ होगा कि चिन्तन के कारण मरुच्छक्ति शून्य में अथवा बाहर स्थित भित्ति आदि में स्वयं लीन होकर वरप्रदात्री बन जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि बाह्य शून्य, कुड्य (भित्ति) आदि में भी अपने शरीर के समान ही प्राणशक्ति के उक्त बारह सोपानों का क्रमशः चिन्तन करना चाहिये । इस प्रक्रिया से अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र भित्ति आदि में अथवा पर पात्र में ध्यान को स्थिर करने से योगी की एकाग्रता की भावना जब दृढ़ हो जाती है, तो यह मरुच्छक्ति वहीं अपने आप लीन हो जाती है। तब परम पद के परामर्श से उसके साथ स्वात्मस्वरूप की तादात्म्य भावना, अर्थात् मैं वही हूँ इस प्रकार की
- मण्डूक-प्लुति न्याय पाणिनि व्याकरण में प्रसिद्ध है । वहाँ आगे के सूत्रों में पूर्व सूत्रों के कुछ पदों की अनुवृत्ति की जाती है। यह अनुवृत्ति प्रायः निरन्तर चलती है। कभी-कभी आवश्यकता के अनुसार बीच के किसी सूत्र में किसी पद की अनुवृत्ति न होने पर भी आगे के सूत्र में उसकी अनुवृत्ति कर ली जाती है। ऐसे ही स्थलों में मण्डूक-प्लुति न्याय प्रवृत्त होता है। मेढक जैसे कूद कर चलता है, उसी तरह आवश्यक पद की अनुवृत्ति भी बीच के सूत्र या सूत्रों को कुदा कर की जातो है। प्रस्तुत स्थल में २८वें श्लोक में पठित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति शब्द की आवृत्ति इसी न्याय से की जाती है और उसको प्रथमान्त पद में बदल लिया जाता है।
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३८ : विज्ञानभैरव प्रत्यभिज्ञा के आधार पर ऐक्य भावना का अभिमान जाग उठता है । इस विषय को स्पन्द- कारिका में इस तरह से समझाया गया है— यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥ तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न या शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ।: इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । संपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (२८-३० श्लो०) अर्थात् यह जीवात्मा सर्वमय सर्वात्मक विश्वरूप है, क्योंकि यह सभी पदार्थों को जानने वाला है और सभी पदार्थ इसी से उत्पन्न होते हैं। यह जीवात्मा सर्वमय इसलिये भी है कि यह सभी संवेद्य (जानने योग्य) पदार्थों के साथ संवेदन (ज्ञान) के रूप में जुड़ा रहने से सदा उनसे अभिन्न ही प्रतीत होता है । इस तादात्म्य अवस्था में शब्द और अर्थ की अलग-अलग प्रतीति न होकर उनकी एकाकार प्रतीति होती है । इस स्थिति में ऐसी कोई अवस्था नहीं बच रहती, जहाँ कि शिव का स्वभाव, चित् का प्रकाश, न प्रकाशित हो रहा हो । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रकाश-स्वभाव चिदात्मक शिव ही ज्ञेय के रूप में भासित होता है । अतः यह कहना ठीक ही है कि यह जीवात्मा सर्वमय है । जिस जीवात्मा को इस स्थिति का ज्ञान हो जाता है, जिसमें इस प्रत्यभिज्ञा का उदय हो जाता है कि सब कुछ मैं ही हूँ, वह इस सारे जगत् को अपनी लीला-भूमि समझने लगता है, वह सदा युक्त अवस्था में, समाधि दशा में रहते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । स्पन्दकारिका के व्याख्याकार उत्पल वैष्णव, रामकण्ठ और क्षेमराज ने इन कारिकाओं के अर्थ को विस्तार से समझाया है । जिज्ञासु जनों को उसे वहीं देखना चाहिये । अन्तिम निष्कर्ष यही निकलता है कि जब जीवात्मा को यह ज्ञान हो जाता है कि मैं सर्वमय हूं, तब अपने शरीर में, दूसरे के शरीर में, अथवा भित्ति-प्राकार आदि में भी प्राणशक्ति का क्रमिक विकास कर वह परम पद में प्रतिष्ठित हो सकता है ॥३३॥ [ धारणा-११ ] कपालान्तर्मनो न्यस्य ति¹ष्ठन्मीलितलोचनः । क्रमेण मनसो दाढर्याल्लक्ष्येल्लक्ष्यमुत्तमम् ॥३४॥ कपालान्तः शिरःकपालमध्ये यदन्तश्छिद्रमस्ति तदन्तरे, मनो न्यस्य कपाल- रन्ध्रस्थिते स्वप्रकाशे प्रभास्वरे ज्योतिषि आलम्बने धारणाध्यानसमाधीन् संपाद्य, कूणित- नेत्रः स्थितः सन् क्रमेण मनसो दाढर्याद् उत्तमं लक्ष्यं लक्षयेत्, “मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्” (यो० ३। ३१) इति न्यायात् । अथवा कपालान्तः प्रकाशविमर्शस्वरूपमध्ये शिवशक्ति- १. ॰ल्ले॰-ख० ।
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विज्ञानभैरव : ३९ मयं सर्वं जगदिति विमर्शविषयं मनो न्यस्य मीलितलोचनः संकुचितभेददृष्टिः, अन्तः- संकुचितहृदयादिबाह्यान्तरेन्द्रियवर्गः, क्रमेण मनसो दाढर्यात् सुषुम्णायामस्तङ्गतप्राणा- पानादिचारेण तद्दाढर्याद् यल्लक्ष्यमस्ति तदेव लक्षयेत् । तेन घटोऽयमितिवत् प्रत्यक्षत उत्तमं ज्योतिः पश्यतीत्यर्थः ॥३४॥ शिरःकपाल के भीतर विद्यमान छिद्र (सुषिर) में अपने मन को स्थापित कर, कपाल- रन्ध्र में विद्यमान स्वयंप्रकाश प्रभास्वर ज्योति को आलम्बन बनाकर, उसमें धारणा, ध्यान और समाधि का अभ्यास करना चाहिये । आँख मूँद कर इस प्रक्रिया को निरन्तर दोहराते रहने से योगी के मन में क्रमशः दृढ़ता का संचार होता है और वह उस उत्तम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, जिसका कि वर्णन “मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्” (३।३१) इस सूत्र में योगसूत्रकार भगवान् पतंजलि ने किया है। 1कशब्देन परा शक्तिः पालकः शिवसंज्ञया । शिवशक्तिसमायोगः कपालः परिपठ्यते ॥ तन्त्रकोश के इस वचन के आधार पर 'क' शब्द परा शक्ति का और 'पाल' शब्द शिव का वाचक है, अतः कपाल शब्द से यहाँ शिव और शक्ति के समायोग (सामरस्य) का ग्रहण होना चाहिये । अनेक स्थानों पर उद्धृत "शवतयोऽस्य जगत् कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महे- श्वरः" इस श्रीकण्ठिसंहिता के वचन के अनुसार यह सारा जगत् शिव और शक्ति के, तन्त्रशास्त्र में प्रकाश और विमर्श के नाम से प्रसिद्ध, स्वरूप में विद्यमान है । साधक को इसी स्वरूप में अपने मन को स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिये और बाह्य विषयों से अपने इन्द्रिय-चक्र को समेट लेना चाहिये । धीरे-धीरे उसकी भेद-दृष्टि, दूसरे से अपने को अलग समझने का स्वभाव, घटती जाती है और उसकी बाह्य और आन्तर इन्द्रियाँ अन्तर्मुख हो जाती हैं । क्रमशः उसका प्राण-चार, प्राण और अपान की गति, मध्यनाडी सुषुम्णा में लीन हो जाता है और तब उसका मन दृढ़, अर्थात् अत्यन्त स्थिर हो जाता है । इस अवस्था में वह उस स्वात्मस्वरूप उत्तम ज्योति का दर्शन उसी तरह से कर सकता है, जैसे कि कोई मनुष्य घट, पट आदि पदार्थों को अपनी आँखों के सामने देखता रहता है ॥३४॥ [ धारणा-१२ ] 2मध्यनाडी मध्यसंस्था1 बिससूत्राभरूपया । ध्याताऽन्तर्व्योमया देव्या तया देवः प्रकाशते ॥३५॥ मध्यनाडी सुषुम्णाख्या, मध्यसंस्था हृदयमध्यस्था भवतीत्यन्वयः । बिससूत्र- भरूपया सूक्ष्मत्वात् मृणालतन्तुतुल्याकारया ध्याताऽन्तर्व्योमया ध्यातं चिन्तितमन्तर्व्योम चिदाकाशात्मकं यस्यां सा तथाविधया तया देव्या देवः प्रकाशः प्रकाशते । मध्यनाड्या- १. °स्थ°-तवि० ।
- प्रस्तुत श्लोक को इसी श्लोक की व्याख्या में शिवोपाध्याय ने उद्धृत किया है ।
- तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १३१) पर यह श्लोक मिलता है ।
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४० : विज्ञानभैरव मन्तश्चिदाकाशात्मकं शून्यमेवास्ति । तस्मात् प्राणशक्तिर्निःसरतीति विमर्शेन प्रकाश- प्रादुर्भाव इति भावः । यद्वा मध्यनाडी मध्यसंस्था चासौ बिससूत्राभरूपा च, मध्यनाडी- मध्यसंस्थबिसरूपा चेति विशेषणोभयपदः समासः । तया एवंविधया मरुच्छक्त्या तन्मध्य- चिन्तिताकाशया देवः प्रकाशते ॥३५॥ सुषुम्णा नाम की मध्यनाडी हृदय के मध्य में रहती है । यह कमल-नाल में विद्यमान अत्यन्त सूक्ष्म तन्तुओं के समान कृश आकार वाली है । इस मध्यनाडी में चिदाकाश स्वरूप आन्तर व्योम (गगन) का ध्यान करने पर इसकी सहायता से साधक के हृदय में प्रकाशात्मक भगवान् शिव प्रकाशित हो उठते हैं । मध्यनाडी के भीतर चिदाकाश रूप शून्य का निवास है । उससे प्राणशक्ति निकलती है । इस तरह से विमर्श शक्ति की सहायता से प्रकाशात्मक शिवस्वभाव का प्रादुर्भाव होता है । अथवा मध्यनाडी मध्यसंस्था भी है और बिसतन्तु के समान सूक्ष्म आकार वाली भी है, इन दोनों विशेषण पदों का यहाँ समास माना जायगा, अर्थात् 'मध्यसंस्थबिससूत्राभरूपया' यह समस्त एक ही पद रहेगा । इस तरह की प्राण वायु की शक्ति से, जिससे कि बीच में चिदाकाश का चिन्तन किया जाता है, प्रकाशस्वरूप देव, परभैरव प्रकाशित हो उठते हैं । स्पन्दकारिका के इस श्लोक में भी यही बात कही गई है— तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ।। (२५ श्लो०) इसका अभिप्राय यह है कि साधक जब मध्यनाडी की सहायता से चिदाकाश में प्रविष्ट होता है, तब सोम और सूर्य अर्थात् अपान और प्राण अथवा मन और प्राण सुषुम्णा में अपने आप विलीन हो जाते हैं । इस अवस्था के उपस्थित होने पर जो योगी अपने वास्तविक स्वरूप को न पहचान कर सिद्धियों के चक्कर में पड़ जाता है, वह तो स्वप्न-सुषुप्ति जैसी मूढ़ दशा में ही पड़ा रह जाता है और जो उस अवस्था में भी आगे बढ़ने के लिये प्रयत्नशील रहता है, वह चिदाकाश में प्रविष्ट हो प्रकाशमय प्रबुद्ध स्वरूप हो जाता है ॥३५॥ [ धारणा-१३ ] कररुद्धदृगस्त्रेण भ्रूभेदाद् द्वाररोधनात् । दृष्टे बिन्दौ क्रमाल्लीने तन्मध्ये परमा स्थितिः ॥३६॥ अङ्गुष्ठतर्जन्यादिक्रमेण कराभ्यां रुद्धानि दृगुपलक्षितानि मुखरन्ध्राण्येवास्त्रं तेन करणेन यद् द्वाररोधनं द्वारस्थगनम्, तस्माद्धेतोर्यो भ्रूभेदो भ्रूमध्यस्थग्रन्थिविदारणम्, तस्माद्धेतोर्बिन्दौ दृष्टे क्रमादेकाग्रताप्रकर्षात् संविद्गगने तस्मिन् बिन्दौ लीने च सति संविद्गगनमध्य एव योगिनः परमा स्थितिः परभैरवाभिव्यक्तिः स्यात् ॥३६॥ भ्रूमध्य में अवस्थित ग्रन्थि को काटने के लिये योगी अपने इन्द्रिय रूपी हथियारों से ही काम लेता है, जब कि वह इन आंख आदि इन्द्रियों को अंगूठे से और अपनी तर्जनी आदि अंगुलियों से दबाकर उनके बाहर जाने के मार्गों को रोक लेता है । योगशास्त्र में इस तरह Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ४१ की क्रियाएँ १करण के नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार को क्रिया से योगी को भीतर (भ्रूमध्य में) प्रकाश-बिन्दु का दर्शन होने लगता है । इस बिन्दु में मन को एकाग्र करने का अभ्यास करते- करते यह बिन्दु बोध-गगन में विलीन हो जाता है और उसके साथ ही योगी की इस बोध- गगन में, प्रकाशात्मक अवस्था में, स्थिति हो जाती है, अर्थात् उसका परभैरव स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है । यहाँ वर्णित वस्तु का क्रम इस प्रकार होगा—योगी पहले अपनी अंगुलियों से आँख- कान आदि को दबाने जैसे करणों (मुद्राओं) की सहायता से इन इन्द्रियों के बाहर निकलने के मार्ग को रोक देता है । फिर इन्हीं इन्द्रियों को साधन बनाकर वह भ्रूमध्य तक पहुँचता है और इनकी सहायता से वह भ्रूमध्य स्थित ग्रन्थि को काट डालता है । इस क्रिया के बाद योगी को भ्रूमध्य में ज्योति-बिन्दु के दर्शन होते हैं । ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचने के रास्ते को यह ग्रन्थि ही रोके रहती है, अतः जब इस ग्रन्थि का भेदन हो जाता है और बिन्दु में चित्त एकाग्र हो जाता है, तो अनायास ही ब्रह्मरन्ध्र स्थित बोध-गगन में विहार करने वाली परासंविद् देवी के दर्शन हो जाते हैं ॥३६॥ [ धारणा-१४ ] धामान्तःक्षोभसंभूतसूक्ष्माग्नितिलकाकृतिम् । बिन्दुं शिखान्ते हृदये लयान्ते ध्यायतो लयः ॥३७॥ धाम्नो लोचनवर्तिनस्तेजसः, अन्तःक्षोभेण अत्यन्तनिपीडनादिना संभूतं सूक्ष्मा- ग्नितिलकाकृतिं नयनरश्मिरूपं बिन्दुं शिखान्ते२ द्वादशान्ते हृदि च ध्यायत: । अथवा धाम्नो दीपादितेजसो योऽन्ते निर्वाणसमये क्षोभश्चाञ्चल्यम्, ततः संभूतं सूक्ष्माग्नितिल- काकृतिं बिन्दुं शिखान्तादौ ध्यायत: । लयान्ते गलितविकल्पे पर्यवसाने लयस्तदैक्योप- पत्तिर्भवेत् । विकल्पे गलिते तदवसाने परमतेजस्तत्त्वसमावेशः स्यादित्यर्थः ॥३७॥ लोचन (नेत्र) में निवास करने वाला तेज यहां धाम पद से अभिप्रेत है । पूर्व श्लोक में प्रतिपादित प्रक्रिया से नेत्र को जोर से दबाने से सूक्ष्म अग्नि कणों की सी आकृतियाँ चमक उठती हैं । ये आकृतियाँ नयन (नेत्रों के) तेज से निकली किरणें ही हैं । इनमें से किसी एक
- ‘करणं देहसंनिवेशविशेषात्मा मुद्रादिव्यापार:’’ (पृ० ३५) शिवसूत्रविमर्शिनी के परिशिष्ट (टि० १९) में करण का यह लक्षण बताया गया है । योगशास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित खेचरी प्रभृति मुद्राओं और जालन्धर प्रभृति बन्धों का इसी में समावेश किया जाता है । इनमें शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखने का अभ्यास किया जाता है । करण की गणना आणव उपाय में की जाती है । अपने सात भेदों के साथ इसका विवेचन तन्त्रालोक के पंचम आह्निक (पृ० ४३८-४४३) में तथा अन्यत्र भी किया गया है ।
- शिखान्त पद यहां ऊर्ध्व द्वादशान्त के अर्थ में प्रयुक्त है । शिखा (चोटी) के नीचे के इस स्थान में ही उन्मना शक्ति निवास करती है । इस विषय को समझने के लिये श्लो० ४२ की टीका देखनी चाहिये ।
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४२ : विज्ञानभैरव बिन्दु को पकड़ कर ऊर्ध्व द्वादशान्त अथवा हृदय में उसका ध्यान करना चाहिये । अथवा धाम पद से दीपक प्रभृति के तेज को भी लिया जा सकता है । दीपक जब बुझने लगता है, तो वह अत्यन्त चंचल हो उठता है और चटकने के साथ उसमें से चिनगारियाँ निकलने लगती हैं । इनमें से किसी एक बिन्दु को पकड़ कर भी ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है । इसकी सहायता से योगी के सब जागतिक विकल्प शान्त हो जाते हैं, अर्थात् उनके साथ इसकी ऐक्य बुद्धि हो जाती है कि यह सारा प्रपंच मुझसे भिन्न नहीं है । इस अवस्था में योगी का परम तेज में समावेश हो जाता है ॥३७॥ [ धारणा-१५ ] अनाहते१ पात्रकर्णेऽभग्नशब्दे २सरिद्द्रुते । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥३८॥ पात्रे कर्णौ यस्य तस्मिन् पात्रकर्णे, सरिद्द्रुत् द्रुते वेगवाहिनि, 'परिश्रुते' इति पाठे परितः समन्तात् सर्वेषु प्रदेशेषु निर्गलिते, श्रवणगोचरं गते इत्यर्थः, अभग्नशब्दे अहर्निशं विच्छेदनरहितशब्दे, अनाहते न केनचिदाहते स्वरसत एवोत्थिते दशधोपलक्षिते नाद- भट्टारकात्मनि, शब्दब्रह्मणियो निष्णातः कृतधारणाध्यानसमाधिः, सपरंब्रह्म अधिगच्छति प्राप्नोति, ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः । अविच्छिन्नानाहतध्वनिविषयचित्तैकाग्रतासंपादनेन परमाकाशस्वरूपाविर्भावो भवतीत्यभिप्रायः ॥३८॥ नदी का जल जैसे निरन्तर बहता रहता है, उसी तरह से शरीर के भीतर दस प्रकार का अनाहत नाद (अनहद ध्वनि) निरन्तर दिन-रात स्वाभाविक रूप से बिना रुकावट के चलता रहता है । यह प्रायः देखा जाता है कि कोई भी ध्वनि (आवाज) बिना टकराव के नहीं पैदा होती, किन्हीं दो वस्तुओं (पात्रों) के आपस में टकराने से ही यह पैदा होती है । इसके विपरीत शरीर के भीतर सुनाई पड़ने वाली यह ध्वनि (नादभट्टारक) किसी टकराव से पैदा नहीं होतो । यह तो स्वभावतः सारे शरीर में चारों ओर से निकलती रहती है । इसीलिये इसको 'अनाहत' कहते हैं । इस ध्वनि को सुनने के लिये अपनी श्रवणेन्द्रिय (कानों) को ही पात्र (समर्थ) बनाया जाता है । अन्तर इतना ही है कि बाहरी पात्रों के टकराव से ध्वनि पैदा होती है, तब वह कानों से सुनाई पड़ती है; इसके विपरीत बिना किसी टकराव के प्रवाहित हो रही इस नादसन्तति को सुनने में श्रोत्रेन्द्रिय तब तक समर्थ नहीं हो सकती, जब तक कि योगाभ्यास के द्वारा उसमें इसको सुनने की पात्रता (योग्यता) न पैदा कर दी जाय । यह नादभट्टारक शब्दब्रह्म का ही व्यापार है । यह दस¹ प्रकार का होता है । दस प्रकार के नाद में धारणा, १. ॰तेष्पा॰-ख० । २. परिश्रुते-कटी० ।
- तन्त्रालोक (५।५९) में ब्रह्मयामल के प्रमाण पर दस प्रकार के राव का प्रतिपादन किया गया है । टीकाकार जयरथ ने (पृ० ४१०) राव शब्द को नाद का पर्यायवाची मानकर दस प्रकार के नाद का परिचय दिया है । स्वच्छन्दतन्त्र (११।६-७) में इसके आठ भेद माने गये हैं । क्षेमराज ने अपनी टीका में धर्मशिवाचार्य की पद्धति को उद्धृत कर इनका विव- Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ४३ ध्यान और समाधि का अभ्यास करने पर योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भलीभाँति समझ लेता है। वह यह जान लेता है कि शब्दब्रह्म से ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—इन चार तरह की वाणियों का विकास होता है। यह नाद तत्त्व परा और पश्यन्ती के क्रम से विकसित होता हुआ मध्यमा में आकर योगाभ्यास द्वारा श्रवणेन्द्रिय के अन्तर्मुख होने पर सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखता की ओर बढ़ते-बढ़ते, अर्थात् इस नाद के सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम स्वरूप का अन्वेषण करते-करते योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भलीभाँति समझने में समर्थ हो जाता है, निष्णात हो जाता है। शब्दब्रह्म के स्वरूप को ठीक से पहचान लेने पर साधक अनायास परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् इस निरन्तर प्रवहमान अनाहत ध्वनि में चित्त को एकाग्र कर लेने पर योगी का परमाकाश स्वभाव, चिदाकाशमय प्रकाशात्मक स्वरूप, प्रकट हो जाता है। कुछ टीकाकार 'अनाहते पात्रकर्णे' इन दो पदों के बीच अकार का प्रश्लेष मानकर 'अपात्रकर्णे' ऐसा पदच्छेद करते हैं और इसका अर्थ करते हैं कि यह अनाहत ध्वनि कानों से नहीं सुनाई पड़ती। वस्तुतः सभी साधक इस विषय में एकमत हैं कि यह ध्वनि भी कानों की सहायता से ही सुनी जा सकती है। इसलिये इन दोनों मतों का समन्वय इस तरह से किया जा सकता है कि श्रवणेन्द्रिय की बाहर की ओर वृत्ति रहने पर यह नहीं सुनाई पड़ती। अभी ऊपर यह बताया जा चुका है कि श्रवणेन्द्रिय की आन्तर वृत्ति होने पर ही यह नाद सुनाई पड़ता है ॥३८॥ [ धारणा-१६ ] प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावनात् । शून्यया परया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥३९॥ हे भैरवि, प्रणवादयः प्रणवप्रकाराः, आदिशब्दोऽत्र प्रकारार्थे प्रयुक्तः । यथा वेदप्रणव ॐकारः, शिवप्रणवो हूंकारः, मायाप्रणवो ह्रींकार इत्यादयो बहवः प्रकारा- स्तन्त्रेषु उद्दिष्टाः । तेषां समुच्चारः कुक्कुटरुतवद् ह्रस्वदीर्घप्लुतभेदेनोच्चारणम्, तस्मात्, प्लुतान्ते गुर्वक्षरेषु शून्यपात्रध्वनिवद् दीर्घकालमुच्चरितो यः प्लुतो मात्रात्रयपरिमितो वर्णस्तस्य अन्ते विश्रान्तौ बिन्द्वादिप्रमेयानारोहेण शून्यभावनात् शून्यावस्थाऽलम्बनेन ¹शून्यातिशून्योच्चारेण शून्यतामुल्लङ्घ्यान्तर्मुखताभावनात्, शून्यया वेद्यशून्यता- माप्तया परया शक्त्या शून्यतामेति भेदशून्यपरभैरवरूपां परमां गतिं प्राप्नोति ॥३९॥ रण दिया है। अर्थरत्नावली (पृ० ३६) में उद्धृत संकेतपद्धति में भी अनाहत नाद के आठ ही भेद माने गये हैं। स्वच्छन्दतन्त्र (१।१७) में महाशब्द के नाम से नवम नाद भी माना गया है। अर्थरत्नावली (पृ०३६) में उद्धृत हंसनिर्णय में नवम नाद को निर्विशेष विशेषण दिया गया है।
- स्वच्छन्दतन्त्र (७।५-७) की टीका में क्षेमराज ने शून्यातिशून्य को महामाया का और शून्य शब्द को माया का बोधक माना है। महामाया से सदाशिव, ईश्वर और शुद्धविद्या Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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४४ : विज्ञानभैरव प्रणवादि पद से यहाँ प्रणव के भेदों का ग्रहण किया जाता है। आदि शब्द यहाँ प्रकार के अर्थ में आया है। जैसे कि ॐकार वेद का प्रणव है, हूंकार शैवागम संमत प्रणव है और ह्रींकार शाक्तागम संमत । इस तरह से प्रणव के अनेक प्रकार तन्त्रशास्त्र में वर्णित हैं। इनके समुच्चार का अर्थ है ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत के भेद से इनका कुक्कुटरुतवत् उच्चारण, अर्थात् मुर्गा जैसे पहले धीमी आवाज में बाँग देता है, बाद में कुछ तेज आवाज में और अंत में बड़ी तेज आवाज कुछ क्षणों तक अपने गले से निकालता रहता है, यही ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरों के उच्चारण की विधि है। उक्त प्रणवों का उच्चारण इसी विधि से किया जाता है। अथर्वशिखोपनिषद् में इस विषय को समझाया गया है— "अन्त¹ में जो चौथी आधी मात्रा है, वह विद्युदती कहलाती है। इसमें सभी वर्ण रहते हैं और पुरुष इसका देवता है। इस प्रकार यह ॐकार चार अक्षर, चार पद और चार मात्रा वाला है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत इसके स्थूल रूप हैं", "ॐ ॐ ॐ इस प्रकार ॐकार का तीन बार उच्चारण कर अन्त में चतुर्थ अर्धमात्रा का उच्चारण करने से साधक की आत्मा परमशान्ति का अनुभव करती है। समस्त ॐकार की प्लुत उच्चारण द्वारा एक आवृत्ति करने से साधक का हृदय प्रकाश से ओत-प्रोत हो जाता है"। काँसे का खाली बरतन बजाने पर जैसे बहुत देर तक बजता रहता है, उसी तरह से गुरु अक्षरों को बहुत देर तक, तीन मात्रा या उससे अधिक समय तक बोलते रहने से वह उच्चारण प्लुत कहा जाता है। इस तरह के प्लुत उच्चारण के अन्त में प्लुत की विश्रान्ति हो जाने पर बिन्दु प्रभृति प्रमेयों का सहारा न लेकर शून्य की भावना करने से, सभी तरह के वेद्य विषयों से शून्य अवस्था को प्राप्त परा शक्ति की सहायता से साधक शून्यता को अर्थात् भेदरहित, द्वैतविवर्जित, परभैरव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसका अभिप्राय यह है कि अर्धमात्रा का प्लुत उच्चारण करने से बिन्दु, अर्धचन्द्र प्रभृति सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ध्वनियां निष्पन्न होती हैं। इस प्रकार यह प्लुत उच्चारण अपनी समुदाय शक्ति से अखण्ड ब्रह्म के ज्ञान में सहायक होता है, अर्थात् यह साधक को उस उन्मना- वस्था में पहुँचा देता है, जहां कि साधक को ब्रह्मदशा के सिवाय किसी जागतिक अवस्था की अनुभूति नहीं होती। यह सामान्य प्रक्रिया है। प्रस्तुत श्लोक में भगवान् विज्ञानभैरव भैरवी को की, अर्थात् मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर और मन्त्र नामक शुद्ध प्रमाताओं की, अधिकारी पुरुषों की सृष्टि होती है और माया से विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल नामक अशुद्ध प्रमाताओं की। अथवा बिन्दु से समना पर्यन्त अर्धमात्रा की स्थिति शून्य में और उन्मना की स्थिति शून्यातिशून्य पदवी में मानी गई है। मध्यधाम सुषुम्ना और शिवतत्त्व के अर्थ में भी शून्य और शून्यातिशून्य शब्दों का प्रयोग मिलता है। प्रस्तुत स्थल में शून्यातिशून्य के उच्चारण का तात्पर्य उन्मना पर्यन्त पिण्ड मन्त्र के उच्चारण के अभ्यास से है।
- शिवोपाध्याय की टीका में स्थित ये दोनों उद्धरण अथर्वशिखोपनिषद् की प्रथम कण्डिका से लिये गये हैं। दोनों ही स्थलों के पाठ त्रुटिपूर्ण हैं। इनका संशोधन परस्पर एक दूसरे की सहायता से किया जा सकता है।
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विज्ञानभैरव : ४५ इस प्रक्रिया से विलक्षण एक दूसरा उपाय बताते हैं कि प्लुत का उच्चारण निष्पन्न हो जाने पर जब बिन्दु, अर्धचन्द्र आदि सूक्ष्म ध्वनि-तरंगों की प्रतीति होने वाली हो, तब साधक अपने चित्त को उनके साथ न लगाकर शून्य में विलीन कर दे । इस शून्यावस्था का सहारा लेकर के भी साधक अन्त में उस ¹ अर्धमात्रा वाली अखण्ड-स्वभाव चिन्मात्र-स्वरूपिणी परा शक्ति में प्रविष्ट हो जाता है, जिसको कि दुर्गासप्तशती में अनुच्चार्य (उच्चारण के अयोग्य) कहा गया है। प्रणव में स्थित अकार, उकार और मकार उस परब्रह्म के व्यस्त स्वरूप को बताते हैं और चतुर्थ अर्धमात्रा स्वरूप अक्षर समस्त ब्रह्मतत्त्व का वाचक है । “तस्य वाचकः प्रणवः” (१।२७) इस योगसूत्र के अनुसार यह प्रणव सभी विकारों से अतीत तुरीय धामस्वरूप अखण्ड चैतन्यात्मक एक तत्त्व का, अर्थात् परमेश्वर का बोधक है। इस विषय को महिम्नस्तव के रचयिता पुष्पदन्त ने इस तरह से समझाया है— त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा- नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति । तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ (२७ श्लो०) जिज्ञासु जनों को इस श्लोक का विस्तृत अर्थ महिम्नस्तव की मधुसूदनी टीका में देखना चाहिये ॥३९॥ [ धारणा-१७ ] यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्तावनुभावयेत् । शून्यया शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान् भवेत् ॥४०॥ यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्ताविति उच्चिचारयिषाविरामौ, अनुभावयेत् शून्या- नुगततया भावयेत् । असौ पुमान् शून्यया वेद्यशून्यतामाप्तया परया शक्त्या शून्यभूतः शून्याकारो निवृत्तदेहादिप्रमातृत्वाभिमानो भवेत् । तदयं प्रघट्टकार्थः—पूर्वं शिक्षा, ततस्तदनुभवः, ततोऽपि गुरुप्रसादादिना तन्निश्चयः, ततोऽन्तर्नाडीचक्रादिपरीक्षा, ततश्च शून्यातिशून्ययोजनया शब्दब्रह्ममयं प्रणवस्वरूपं परिवर्ज्य परब्रह्मणि प्रविशति, ततश्च शून्यातिशून्यतामेति । वस्तुतः सर्वमिदं गन्धर्वनगरतुल्यवृत्तान्तम् । इतो यदन्यत् तदेव ब्रह्म ॥४०॥ केवल प्रणव का ही नहीं, अपितु वर्णमाला में विद्यमान जिस किसी के भी वर्ण की पूर्व और अपर अवस्था का, अर्थात् उच्चारण करने की इच्छा तथा उसकी विराम अवस्था का शून्य १. “अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः” (१।७४) दुर्गासप्तशती के इस श्लोक में अर्धमात्रा को अनुच्चार्य (जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता) माना है । पिण्ड मन्त्र में अर्धमात्रा की स्थिति बिन्दु से समना पर्यन्त मानी गई है । इसको अनुच्चार्य इसलिये कहते हैं कि यह केवल भावनागम्य है, इसका उच्चारण नहीं होता ।
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४६ : विज्ञानभैरव से अनुगत रूप में ध्यान करे । उच्चारण करने की इच्छा के उत्पन्न होने से पूर्व और उच्चा- रण का विराम हो जाने के उपरान्त भी सभी वर्ण शून्यस्वभाव ही हैं, इस तरह की भावना करने से साधक पूर्व कारिका में व्याख्यात शून्य शक्ति के माध्यम से शून्यस्वरूप, शून्याकार होकर, अर्थात् देहादि प्रमातृता के अभिमान को छोड़कर शून्य में लीन हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि साधक पहले योग की शिक्षा प्राप्त करता है । तदनुसार साधना करने से उसको कुछ नये अनुभव होते हैं । गुरु की कृपा से इन अनुभवों के आधार पर वह किसी एक निश्चय पर पहुँचता है । तब उसकी वृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है और वह नाडीचक्र की परीक्षा में प्रवृत्त हो जाता है, उनको शून्य में लीन करता चलता है । शून्य से अतिशून्य में प्रविष्ट होता हुआ वह शब्दब्रह्ममय प्रणव स्वरूप को भी छोड़कर अन्त में परब्रह्म में प्रविष्ट हो तदा- कार हो जाता है । वस्तुतः यह सारा जगत् गन्धर्वनगर की तरह कल्पना का विलासमात्र है । इसके ऊपर ही वह परब्रह्म अवस्थित है ॥४०॥ [ धारणा-१८ ] तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु दीर्घेषु क्रमसंस्थितेः । अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥४१॥ तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु तन्त्री आदिरवयवो येषां तानि तन्त्र्यादीनि तानि च तानि वाद्यानि वादनीयद्रव्याणि शततन्त्री-परिवादिनी-तुम्बवीणादीनि, तेषां ये शब्दा मूर्छना- त्मकाः स्वरास्तेषु क्रमसंस्थितेः क्रमस्थित्या दीर्घेषु बहुलेषु सत्सु योऽनन्यचेतास्तदाल- म्बनचित्तवृत्तिसन्तानयुक्तः स प्रत्यन्ते तच्छब्दनिवृत्तौ आलम्बनान्तरानुदये परव्योमतनुः परमाकाशशरीरो भवेत् । तस्य परभैरवात्मके परमाकाशे समावेशो जायते, ब्रह्मौव भवतीति भावः ॥४१॥ जो साधक तन्त्री, शततन्त्री, परिवादिनी, तुम्बवीणा आदि तन्तुवाद्यों की ध्वनि अर्थात् ¹मूर्छनात्मक स्वरों में, जो कि अपनी क्रमिकता के आधार पर दीर्घ काल तक अवस्थित रहते हैं, अपने चित्त को एकाग्र कर उन्हीं आलम्बनों में अपनी चित्त-वृत्ति की सन्तति को डाल देता है, वह उस ध्वनि के साथ चित्त की एकाग्रता के कारण परमाकाश शरीर हो जाता है, अर्थात् अन्त में उस शब्द के भी निवृत्त हो जाने पर तथा दूसरे आलम्बन का उदय न होने से उसका परमव्योम में समावेश हो जाता है । मूर्छनात्मक स्वरों की अवस्थिति दीर्घ काल तक रहती है । अतः इनमें चित्त की एकाग्रता अन्य उपायों की अपेक्षा अधिक सरलता से प्राप्त हो सकती है । इसी विशेषता की ओर इंगित करने के लिये श्लोक में 'दीर्घेषु' यह विशेषण दिया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि 'दे व द त्त' ये शब्द एक एक पहर के बाद यदि बोले जाँय, तो इनसे किसी अर्थ का बोध नहीं होगा । इन्हीं वर्णों का 'देवदत्त' इस तरह से एक
- संगीतशास्त्र में स्वरों की नियमित क्रम से आरोह और अवरोह की प्रक्रिया को मूर्छना कहते हैं ।