१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
२५४ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् शुभ और सुखदायक है। ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) के मुख पर जो कफ आदि रहता है उसको नष्ट करने वाला है। यह सत् आदि तीनों गुणों से उत्पन्न तीनों ग्रन्थियों का भेदन करने वाला है। इसीलिये इस भस्त्रिका नामक प्राणायाम का विशेष रूप से अभ्यास करना चाहिये ॥३२-३६॥ चतुर्णामपि भेदानां कुम्भके समुपस्थिते । बन्धत्रयमिदं कार्यं योगिभिर्वीतकल्मषैः ॥४० प्रथमो मूलबन्धस्तु द्वितीयोड्डीयणाभिधः । जालन्धरस्तृतीयस्तु तेषां लक्षणमुच्यते ॥४१ अधोगत्तिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् । आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते ॥४२ अपाने चोर्ध्वगे याते संप्राप्ते वह्निमण्डले । ततोऽनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुना हृता ॥४३ ततो यातौ वह्न्यपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम् । तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा ॥४४ तेन कुण्डलिनी सुप्ता संतप्ता संप्रबुध्यते । दण्डाहतभुजङ्गीव निश्वस्य ऋजुतां व्रजेत् ॥४५ इस प्रकार इन चारों प्रकार के प्राणायामों को रोकने के साथ- साथ योगी को तीन 'बन्ध' भी करने चाहिए । इनमें से पहला मूलबन्ध, दूसरा उड्डियाण और तीसरा जालन्धरबन्ध कहा जाता है ॥४०-४१॥ अधोगति वाले अपान को शक्तिपूर्वकं गुदा के आकुंचन द्वारा ऊपर ले जाने से मूलबन्ध होता है। अपान ऊपर जाकर वह्निमंडल से मिलता है तो उसके प्रभाव से अग्नि की तीव्रता बहुत अधिक हो जाती है। उस ज्वाला से संतप्त होकर सोई हुई कुण्डलिनी जागृत होती है और
प्रथम अध्याय ] [ २५५
प्रथम अध्याय ] [ २५५ दण्डे से मारी जाने वाली सर्पिणी के समान फुत्कार कर सीधी हो जाती है ॥४२-४५॥ बिलप्रवेशतो यत्र ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् । तस्मान्नित्यं मूलबन्धः कर्तव्यो योगिभिः सदा ॥४६॥ कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियाणकः । बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥४७॥ तस्मादुड्डियणाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः । सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेद्दृढम् ॥४८॥ गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् । पश्चिमं ताणमुदरे धारयेद्ध दये गले ॥४९॥ शनैः शनैर्यदा प्राणस्तुन्दसंधिं निगच्छति । तुन्ददोषं विनिर्धूय कर्तव्यं सततं शनैः ॥५०॥ तब वह बिल में प्रवेश करने के समान सुषुम्ना के भीतर जाती- है। इस कारण योगियों को मूलबन्ध का अभ्यास सदैव करना चाहिये- ॥ ४६ ॥ कुम्भक के पश्चात् रेचक करने के पूर्व उड्डियानबन्ध करना चाहिए, जिससे प्राण वायु सुषुम्ना के भीतर उड़ती है । इसलिए योगीजन इसको उड्डियाण कहते हैं। इसके लिये वज्रासन लगाकर पैरों- को हाथों से दृढ़तापूर्वक पकड़े। जहाँ गुल्फ (टखना) रखा जाता है वहाँ कन्द स्थानों को दबाये, पेट को ऊपर की तरफ खींचे और हृदय- तथा गले को भी तनाव देकर खींचे। इस विधि से प्राण क्रमशः पेट की संधियों में प्रवेश करता है और पेट के सब दोषों को दूर करता है। इस- कारण यह अभ्यास सदैव करते रहना चाहिये ॥४७-५०॥ पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिधः । कण्ठसंकोचरूपोऽसौ वायुमार्गनिरोधकः ॥५१॥ अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसंकोचने कृते । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५६ [CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri] योगकुण्डल्युपनिषत् मध्ये पश्चिमताणेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥५२॥ पूर्वोक्तेन क्रमेणैव सम्यगासनमास्थितः । चालनं तु सरस्वत्याः कृत्वा प्राणं निरोधयेत् ॥५३॥ प्रथमे दिवसे कार्यं कुम्भकानां चतुष्टयम् । प्रत्येकं दशसंख्याकं द्वितीये पञ्चभिस्तथा ॥५४॥ विंशत्यलं तृतीयेऽह्नि पञ्चवृद्ध्या दिने दिने । कर्तव्यः कुम्भको नित्यं बन्धत्रयसमन्वितः ॥५५॥ जालन्धरबंध में कंठ का संकोचन वायु को रोकने के निमित्त किया जाता है, वह बंध पूरक के अन्त में करना होता है ॥ ५१ ॥ अधोभाग में मूलबंध द्वारा गुदा का आकुंचन करे और ऊपर से जालंधर बन्ध द्वारा कण्ठ का संकोचन करे और मध्य में पश्चिमतान(उड्डीयान) से प्राण को खींचे। इस प्रकार सब तरफ से रोका जाकर प्राण ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) में चढ़ता है ॥ ५२ ॥ जैसे पहले बतलाया गया है सम्यक प्रकार से आसन पर बैठकर सरस्वती का चालन करके प्राण का निरोध करना चाहिये ॥ ५३ ॥ प्रथम दिन चारों कुम्भकों को दस-दस बार करना चाहिए और दूसरे दिन पन्द्रह-पन्द्रह बार करना चाहिये। तीसरे दिन बीस-बीस करना चाहिये, इसी प्रकार प्रतिदिन पाँच-पाँच बढ़ाता जाय। इन कुम्भकों का अभ्यास प्रतिदिन तीन बन्ध सहित करना चाहिये ॥५४-५५॥ दिवा सुप्तिर्निशायां तु जागरादतिमैथुनात् । बहुसंक्रमणं नित्यं रोधान्मूत्रपुरीषयोः ॥५६॥ विषमासनदौषाश्च प्रयासप्राणचिन्तनात् । शीघ्रमूत्पद्यते रोगः स्तम्भयेद्यदि संयमी ॥५७॥ योगाभ्यासेन मे रोग उत्पन्न इति कथ्यते । ततोऽभ्यासं त्यजेदेवं प्रथमं विघ्नमुच्यते ॥५८॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
प्रथम अध्याय ] [ २५७
प्रथम अध्याय ] [ २५७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri द्वितीयं संशयाख्यं च तृतीयं च प्रमत्तता । आलस्याख्यं चतुर्थं च निद्रारूपं तु पञ्चमम् ॥५९ षष्ठं तु विरतिर्भ्रान्तिः सप्तमं परिकीर्तितम् । विषयं चाष्टमं चैव अनाख्यं नवमं स्मृतम् ॥६० अलब्धिर्योंगतत्त्वस्य दशमं प्रोच्यते बुधैः । इत्येतद्विघ्नदशकं विचारेण त्यजेद्बुधः ॥६१ दिन का सोना, रात का जगना, अति मैथुन, ज्यादा चलना, मलमूत्र का सदैव रोकना, आसन की विषमता, हठपूर्वक प्राण का अभ्यास आदि दोषों से शीघ्र ही रोगों का आक्रमण होता है ॥ ५६ ॥ यदि कोई कहे कि मुझे योगाभ्यास ही से रोग हुआ, तो उसे समझ लेना चाहिए कि योगाभ्यास का त्याग ही सबसे पहला विघ्न है, दूसरा विघ्न संशय करते रहना, तीसरा प्रमत्तता, चौथा आलस्य, पाँचवां अधिक निद्रा, छठा प्रेम न रहना, सातवां भ्रान्ति, आठवां विषमता, नवां अनाख्य और दसवां योगतत्व की अप्राप्ति है। बुद्धिमान साधक इन सबको विचार कर इनका त्याग कर दे ॥ ५७-६१ ॥ प्राणाभ्यासस्ततः कार्यों नित्यं सत्त्वास्थया धिया । सुषुम्ना लीयते चित्तं न च वायुः प्रधावति ॥६२ शुष्के मले तु योगी च स्याद्नतिश्चालिता ततः । अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥६३ आकुञ्चनेन तं प्राहूर्मू'लबन्धोऽयमुच्यते । अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥६४ प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् । मिलित्वा कुण्डलीं यति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥६५ तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता । प्रसार्य स्वशरीर तु सुषुम्नाबदनान्तरे ॥६६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५८ [ योगकुण्डल्युपनिषत् इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से सत्वमयी बुद्धि से करना चाहिए। इसके फलस्वरूप चित्त सुषुम्ना में संलग्न रहता है और उसमें प्राणवायु दौड़ता है ॥ ६२ ॥ जब मलशोधन हो जाय और प्राण चलने लगे तब प्रयत्नपूर्वक अपान की ऊर्ध्वगति करनी चाहिए ॥ ६३ ॥ इसके लिए जो गुदा का आकुंचन किया जाता है, उसे मूलबन्ध कहते हैं। यह अपान ऊपर आकर अग्नि के साथ संयुक्त होता है और ऊपर चढ़ता है ॥ ६४ ॥ जब यह अग्नि प्राण स्थान में पहुँच प्राणवायु से मिलता है और वे सोती हुई कुण्डलिनी को प्राप्त होते हैं तो उसकी उष्णता से तप्त होकर तथा वायु से चलित होकर कुण्डलिनी सीधी हो जाती है और सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है ॥ ६५-६६ ॥ ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्त्वा रजोगुणसमुद्भवम् । सुषुम्ना वदने शीघ्रं विद्युल्लेखेव संस्फुरेत् ॥६७ विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरं हृदि संस्थिता । ऊर्ध्वं गच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥६८ भ्रुवोर्मध्यं तु संभिद्य याति शीतांशुमण्डलम् । अनाहताख्यं यच्चक्रं दलैः षोडशभिर्युतम् ॥६९ तत्र शीतांशुसंजातं द्रवं शोषयति स्वयम् । चलिते प्राणवेगेन रक्तं पित्तं रविर्गृहात् ॥७० रजोगुण से उत्पन्न ब्रह्मग्रन्थि को भेदकर यह कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के भीतर बिजली की रेखा की तरह चढ़ती है ॥ ६७ ॥ शीघ्र ही यह हृदय स्थिति विष्णु-ग्रन्थि को प्राप्त होती हुई और भी ऊपर ( आज्ञा चक्र ) जाती है और वहाँ रुद्र-ग्रन्थि को प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥ वहाँ से यह भौंहों के मध्य स्थान को भेदती हुई चन्द्रमा के स्थान में पहुँचती है, जहाँ सोलह पंखुरियों वाला अनाहत चक्र स्थित है ॥ ६९ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
प्रथम अभ्यास ] [ २५६ यहाँ यह चन्द्रमा से उत्पन्न द्रव को सोख लेती है तथा प्राणवायु के वेग से रक्त और पित्त को सूर्य ग्रहण कर लेता है ॥ ७० ॥ यातेन्दुचक्रं यत्रास्ते शुद्धश्लेष्मद्रवात्मकम् । तन्न सिक्तं ग्रसत्युष्णं कथं शीतस्वभावकम् ॥७१ तथैव रभसा शुक्लं चन्द्ररूपं हि तप्यते । ऊर्ध्वं प्रहवति क्षुब्धा तदैव स्रवतेतराम् ॥७२ तस्यास्वादवशाच्चित्तं बहिष्टं विषमेषु यत् । तदेव परमं भुक्त्वा स्वस्थस्यात्मरतो युवा ॥७३ प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली । क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलीयते ॥७४ इत्यधोध्वंरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः । प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च ॥७५ यह चन्द्र मंडल में जाकर वहाँ के द्रव पदार्थ को शोषण कर लेती है और उसे उष्ण कर देती है । तब वहाँ शीतलता कैसे रह सकती है ? ॥ ७१ ॥ यह चन्द्रमा के शुक्ल रूप को तप्त कर देती है और क्षुब्ध होती हुई ऊपर चढ़ती है ॥ ७२ ॥ इसके प्रभाव से जो चित्त पहले बाहरी पदार्थों में संलग्न रहता था, वह परमार्थ में लग कर आत्मानन्द का उपभोग करने लगता है ॥ ७३ ॥ इस प्रकार कुण्डलिनी अष्टधा प्रकृति को प्राप्त होकर शिव के साथ मिलती है और उसी के साथ लय को प्राप्त हो जाती है ॥ ७४ ॥ इससे अधोभाग का रज और ऊपर का शुक्ल मिलकर शिव में लीन हो जाते हैं, तथा प्राण और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, क्योंकि वे समान रूप से उत्पन्न होते हैं ॥ ७५ ॥ भूतेऽल्पे च मनोल्पे वा वाचके त्वतिवर्धते । धावयत्यखिला वाता अग्निमूषाहिरण्यवत् ॥७६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२६० ] योगकुण्डल्युपनिषत् आधिभौतिकदेहं तु अधिदैविकविग्रहे । देहोऽतिविमलं याति चातिवाहिकतामियात् ॥७७ जाड्यभावविनिर्मुक्तममलं चिन्मयात्मकम् । तस्यातिवाहिकं मुख्यं सर्वेषां तु मदात्मकम् ॥७८ जायाभवविनिर्मुक्तिः कालरूपस्य विभ्रमः । इति तं स्वस्वरूपा हि मती रज्जुभुजङ्गवत् ॥७९ मृषैवोदेति सकलं मृषैव प्रविलीयते । रौप्यबुद्धिः शुक्तिकायां स्त्रीपुंसोर्भ्रंमतो यथा ॥८० भौतिक देह चाहे छोटा हो या बड़ा हो जब उष्णता बहुत बढ़ती है तो वह समस्त देह में उसी प्रकार फैल जाती है जैसे गर्मी पाकर सुवर्ण फैल जाता है ॥ ७६ ॥ इसके प्रभाव से आधिभौतिक देह आधिदैविक हो जाता है और शरीर अत्यन्त विमल होकर सूक्ष्म शरीर की तरह हो जाता है ॥ ७७ ॥ वह जड़ता को त्याग कर निर्मल चित्स्वरूप हो जाता है, जब कि अन्य देह जड़तायुक्त ही बने रहते हैं ॥ ७८ ॥ ऐसे साधक का गर्भवास छूट जाता है और काल का भी उस पर वश नहीं चलता । उसको अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो जाता है । जिस प्रकार रस्सी में सांप का भ्रम होता है, सीपी में चाँदी का भ्रम होता है, स्त्री में पुरुष का भ्रम होता है, इसी प्रकार वह अपने देह सम्बन्धी भ्रम को समझ जाता है कि यह मिथ्या है ॥ ७९-८० ॥ पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं लिङ्गसूत्रात्मनोरपि । स्वापाव्याकृतयोरैक्यं स्वप्रकाशचिदात्मनोः ॥८१ शक्तिः कुण्डलिनी नाम बिसतन्तुनिभा शुभा । मूलकन्दं फणाग्रेण दृष्ट्वा कमलकन्दवत् ॥८२ मुखेन पुच्छं संगृह्य ब्रह्मरन्ध्रसमन्विता । पद्मासनगतः स्वस्थो गुदमाकुञ्च्य साधकः ॥८३
द्वितीय अध्याय ] [ २६१
द्वितीय अध्याय ] [ २६१ वायुमूर्ध्वगतं कुर्वन् कुम्भकाविष्टमानसः । वाय्वाघातपवशादग्निः स्वाधिष्ठानगतो ज्वलन् ॥८४ ज्वलनाघातपवना घातोन्निद्रितोऽहिराट् । ब्रह्मग्रन्थि ततो भित्त्वा विष्णुग्रन्थिं भिनत्त्यतः ॥८५ रुद्रग्रन्थिं च भित्त्वैव कमलानि भिनत्ति षट् । सहस्रकमले शक्तिः शिवेन सह मोदते ॥ सैवावस्था परा ज्ञेया सैव निर्वृत्तिकारणा ॥८६ इति ॥ इससे पिण्ड और ब्रह्माण्ड की, लिंग-देह और सूत्रात्मा की एकता होकर अपनी आत्मा और स्वयं प्रकाश रूप चैतन्य में ऐक्य भाव हो जाता है। कुण्डलिनी शक्ति पद्मतन्तु के समान होती है और कमल के कन्द के समान ही मूलकन्द को फणाग्र से देखकर, अपनी पूँछ को मुख में डालकर ब्रह्मरन्ध्र के मुख को ढक कर सोती रहती है। उसके लिए साधक को पद्मासन लगाकर, गुदा का आकुंचन करके कुम्भक द्वारा वायु को ऊपर चढ़ाना चाहिए। वायु के जोर से स्वाधिष्ठान चक्र की अग्नि को प्रज्ज्वलित करे ॥ ८३-८४ ॥ तब अग्नि और पवन दोनों के आघात से सोई हुई कुण्डलिनी जागृत होती है और ब्रह्म-ग्रन्थि, विष्णु-ग्रन्थि तथा रुद्र-ग्रन्थि को तथा षट्चक्र को भेदन करती हुई सहस्र दल कमल में पहुँच जाती है। वहाँ यह शिव से शक्ति रूप में मिलकर आनन्द को प्राप्त होती है। यही श्रेष्ठ और मोक्षदायक अवस्था होती है ॥ ८६ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ द्वितीयोऽध्यायः अथाहं संप्रवक्ष्यामि विद्यां खेचरिसंज्ञिकाम् । यया विज्ञातवानस्य लोकेऽस्मिन्नजरामरः ॥१॥
२६२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् मृत्युव्याधिजराग्रस्तो दृष्ट्वा विद्यामिमां मुने । बुद्धिं दृढतरां कृत्वा खेचरीं तु समभ्यसेत् ॥२ जरामृत्यु गदघ्नो यः खेचरीं वेत्ति भूतले । ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव तदभ्यासप्रयोगतः ॥३ तं मुने सर्वभावेने गुरुं मत्वा समाश्रयेत् । दुर्लभा खेचरी विद्या तदभ्यासोऽपि दुर्लभः ॥४ अभ्यासं मेलनं चैव युगपन्नैव सिध्यति । अभ्यासमात्रनिरता न विन्दन्ते ह मेलनम् ॥५ अब खेचरी विद्या के सम्बन्ध में बतलाते हैं, जिसके जानने से वृद्धावस्था तथा मृत्यु से छूट जाते हैं ॥ १ ॥ बुढ़ापा, मौत और रोगों में जो मनुष्य ग्रस्त हैं, उनको निश्चयपूर्वक इस विद्या का अभ्यास करना चाहिए और जो महापुरुष ग्रन्थों से, भाव से, अभ्यास से इनका ज्ञान रखता है, उसी को सर्व भाव से गुरु मानकर तथा उसका आश्रय ग्रहण करके इसकी शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए क्योंकि यह खेचरी विद्या बड़ी कठिन है और उसका अभ्यास और भी अधिक कठिन है ॥ २-४ ॥ इसका अभ्यास और मेलन ( योग ) दोनों एक साथ करने से अथवा दोनों को अलग-अलग करने से भी सिद्धि प्राप्त कर सकना संभव नहीं होता ॥ ५ ॥ अभ्यासं लभते ब्रह्मन् जन्मजन्मान्तरे क्वचित् । मेलनं जन्मनां तत्तु शतान्तेऽपि न लभ्यते ॥६ अभ्यासं बहुजन्मान्ते कृत्वा तद्भावसाधितम् । मेलनं लभते कश्चिद्योगी जन्मान्तरे क्वचित् ॥७ यदा तु मेलनं योगी लभते गुरुवक्त्रतः । तदा तत्सिद्धिमाप्नोति यदुक्ता शास्त्रसंततौ ॥८ ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव मेलनं लभते यदा ।
द्वितीय अध्याय ] [ २६३
द्वितीय अध्याय ] [ २६३ तदा शिवत्वमाप्नोति निर्मुक्तः सर्वसंसृतेः ॥६ शास्त्रं विनाऽपि संबोद्धुं गुरवोऽपि न शक्नुयुः । तस्मात्सुदुर्लभतरं लभ्यं शास्त्रमिदं मुने ॥१० अभ्यास तो किसी जन्म में मिल भी जाता है । पर मेलन (योग) सैकड़ों जन्म में भी नहीं मिलता ॥ ३ ॥ बहुत से जन्मों तक अभ्यास करने पर किसी जन्म में योगी 'मेलन' को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ जब साधक गुरु के मुख से 'मेलन' का मन्त्र प्राप्त करता है, तो उसे शास्त्रानुकूल सिद्धि की भी प्राप्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ जब साधक ग्रन्थ के अर्थ को समझ कर 'मेलन' को प्राप्त करता है, तो भी वह संसार से छूटकर शिवत्वं को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ शास्त्र का होना भी अत्यावश्यक है क्योंकि इसके बिना गुरु भी यथार्थ बोध नहीं करा सकते । इसी लिए शास्त्र का प्राप्त होना भी बड़े महत्व का है ॥१०॥ यावन्न लभ्यते शास्त्रं तावद्दुर्गा पर्यटेद्यतिः । यदा संलभ्यते शास्त्रं तदा सिद्धिः कर स्थिता ॥११ न शास्त्रेण विना सिद्धिर्दृष्टा चैव जगत्त्रये । तस्मान्मेलनदातारं शास्त्रदातारमच्युतम् ॥१२ तदभ्यासप्रदातारं शिवं मत्वा समाश्रयेत् । लब्ध्वा शास्त्रमिदं मह्यमन्येषां न प्रकाशयेत् ॥१३ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गोपनीयं विजानता । यत्रास्ते च गुरुर्ब्रह्मन्दिव्ययोगप्रदायकः ॥१४ तत्र गत्वा च तेनाक्तविद्यां संगृह्य खेचरीम् । तेनोक्तः सम्यगभ्यासं कुर्यादादावतन्द्रितः ॥१५ जब तक शास्त्र की प्राप्ति न हो तब तक पर्यटन करते हुए प्रयत्नशील रहे । जब सच्चा शास्त्र मिल जायगा तब सिद्धि हाथ में ही
२६४ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् रखी है ॥ ११ ॥ शास्त्र के बिना सिद्धि तीनों लोक में कहीं दिखाई नहीं देती । इसलिए मेलन ( योग ) का देने वाला, शास्त्र का देने वाला और अभ्यास का कराने वाला गुरु भगवत स्वरूप ही है, ऐसा समझ कर उसका आश्रय लेना चाहिये और इस शास्त्र को प्राप्त कर लेने पर किसी अन्य के सम्मुख प्रकट न करना चाहिए ॥१२—१३ ॥ इसलिए इसको हर तरह से प्रयत्न करके गुप्त रखना चाहिये और जहाँ कहीं इस दिव्य योग का ज्ञाता गुरु रहता हो, वहाँ उसके पास जाकर खेचरी विद्या को ग्रहण करके सम्यक रूप से इसका अभ्यास करना चाहिए ॥ १४—१५ ॥ अनया विद्यया योगी खेचरीसिद्धिभाग्भवेत् । खेचर्या खेचरीं युञ्जन् खेचरीबीजपूरया ॥१६ खेचराधिपतिर्भूत्वा खेचरेषु सदा वसेत् । खेचरावसथं वह्निसम्बुमण्डलभूषितम् ॥१७ आख्यातं खेचरीबीजं तेन योगः प्रसिध्यति । सोमांशनवकं वर्णं प्रतिलोमेन चोद्धरेत् ॥१८ तस्मात् त्र्यंशकमाख्यातमक्षरं चन्द्ररूपकम् । तस्मादप्यष्टमं वर्णं विलोमेनापरं मुने ॥१९ तथा तत्परमं विद्धि तदादिरपि पञ्चमा । इन्दोश्च बहुभिन्नं च कूटोऽयं परिकीर्तितः ॥२० योगी को इस विद्या द्वारा खेचरी शक्ति की प्राप्ति होती है । खेचरी में खेचरी के बीज सहित खेचरी का योग करने से साधक खेचरों ( देवताओं ) का अधीश्वर बनकर सदा उन्हीं में रहता है । खेचर का प्रतीक 'ह' कार आवसथ ( धारणा ) का 'ई'कार, अग्नि का 'रकार और जल का 'म'कार है । इन सबका योग करने से 'ह्रीं' होता है जो कि खेचरी का बीज मन्त्र है और इसी से खेचरी
द्वितीय अध्याय ] [ २६५
द्वितीय अध्याय ] [ २६५ योग सिद्ध होता है। सोमांश 'स' कार है, उसका प्रतिलोम से नौवां अक्षर 'भ' होता है। फिर चन्द्रमा का बीजाक्षर 'स' है, उसका आठवां अक्षर विलोम से 'म' होता है। फिर से पांच अक्षर उलटा गिनने से 'प' अक्षर निकलता है। चन्द्रमा का बीज 'स' और अनेक वर्ण वाला 'क्ष' अन्तिम अक्षर है। (इस प्रकार "ह्रीं भं सं मं पं सं क्ष" यह खेचरी का बीज मन्त्र प्रकट होता है) ॥ १६—२० ॥ गुरूपदेशलभ्यं च सर्वयोगप्रसिद्धिदम् । यत्तस्य देहजा माया निरुद्धकरणाश्रया ॥२१ स्वप्नेऽपि न लभेत्तस्य नित्यं द्वादशजप्यतः । य इमां पञ्च लक्षाणि जपेदपि सुयन्त्रितः ॥२२ तस्य श्रीखेचरीसिद्धिः स्वयमेव प्रवर्तते । नश्यन्ति सर्वविघ्नानि प्रसीदन्ति च देवताः ॥२३ वलीपलितनाशश्च भविष्यति न संशयः । एवं लब्ध्वा महाविद्यामभ्यासं कारयेत्ततः ॥२४ अन्यथा क्लिश्यते ब्रह्मन्न सिद्धिः खेचरी पथे । यदभ्यासविधौ विद्यां न लभेद्यः सुधामयीम् ॥२२ ततः संमेलकादौ च लब्ध्वा विद्यां सदां जपेत् । नान्यथा रहितो ब्रह्मन्न किंचित्सिद्धिभागभवेत् ॥२६ यह खेचरी मन्त्र सब प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। यह गुरु के उपदेश से ही सिद्ध होता है। जो नियम से इसका प्रतिदिन बारह बार जप करता है, उसे अन्तःकरण में स्थित देह सम्बन्धी माया नहीं व्यापती। जो इसे भावपूर्वक पाँच लाख जपेगा उसको खेचरी की सिद्धि स्वयमेव हो जायेगी, सब विघ्न दूर होकर देवताओं की प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २१—२३ ॥ इससे शरीर पर पड़ी हुई झुरियां मिट जाती हैं इसमें कुछ भी संशय नहीं। इस महाविद्या को जब
२६६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् भली प्रकार जान ले तब उसका अभ्यास भली भाँति करे ॥ २४ ॥ ऐसा न करने से खेचरी की सिद्धि न होकर उलटा कष्ट ही उठाना पड़ता है । विधिपूर्वक अभ्यास करने पर भी सफलता न हो तो भी 'सम्मेलक' (गुरु शिक्षक आदि) के बताये अनुसार सदैव इसका जप करता रहे । बिना उपयुक्त शिक्षक के इनमें कभी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती ॥ २५—२६ ॥ यदिदं लभ्यते शास्त्रं तदा विद्यां समाश्रयेत् । ततस्तदोदितां सिद्धिमाशु तां लभते मुनिः ॥२७ तालूमूलं समुत्कृष्य सप्तवासरमात्मवित् । स्वगुरूक्तप्रकारेण मलं सर्वं विशोधयेत् ॥२८ स्नुहिपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् । समादाय ततस्तेत लोममात्रं समुच्छिनेत् ॥२६ हित्वा सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रकर्षयेत् । पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोम मात्र समुच्छिनेत् ॥३० जब इस विद्या के शास्त्र का ठीक तरह से ज्ञान हो जायेगा तब साधक की सिद्धि प्राप्त करने में देर न लगेगी ॥ २७ ॥ सर्व प्रथम साधक को सात दिन तक तालु के मूल स्थान को गुरु के आदेश के अनुसार घिसकर वहां का सब मैल दूर करना चाहिए ॥ २८ ॥ फिर थूहर के पत्ते के समान उत्तम धार वाले शुद्ध चाकू आदि से तालूमूल को एक बाल के बराबर काटे अथवा गुरु या शिक्षक से कटावे) ॥ २६ ॥ कटे स्थान के ऊपर हर्र और सैन्धे नमक का चूर्ण भुरभुराता रहे। सात दिन के पश्चात् फिर पूर्ववत् बाल बराबर काटे ॥ ३० ॥ एवं क्रमेण षण्मासं नित्योद्युक्तः समाचरेत् । षण्मासाद्रसनामूलं शिराबन्धं प्रनश्यति ॥३१
द्वितीय अध्याय ] [ २६७
द्वितीय अध्याय ] [ २६७ अथ वागीश्वरीधाम शिरो वस्त्रेण वेष्टयेत् । शनैरुत्कर्षयेद्योगी कालवेलाविधानवित् ॥३२ पुनः षाण्मासमात्रेण नित्यं संघर्षणान्मुने । भ्रू मध्यावधि चाप्येति तियक्कर्णबिलावधि ॥३३ अधश्च चुबुकं मूलं प्रयाति क्रम चारिता । पुनः संवत्सराणां तु तृतीयादेव लीलया ॥३५ केशान्तमूर्ध्वं क्रमति तिर्यक्शाखाऽवधिर्मुने । अधस्तात्कण्ठकूपान्तं पुनर्वर्षत्रयेण तु ॥३५ ब्रह्मरन्ध्रं समावृत्य तिष्ठेदेव न संशयः । तिर्यक् चूलितलं याति अधः कण्ठबिलावधि ॥३६ इस क्रम से निरन्तर प्रयत्न करते रहने से जीभ का तालू के साथ वाला बन्धन कट जायगा ॥ ३१ ॥ तब जीभ के अग्रभाग को कपड़े से लपेट कर धीरे-धीरे दोहन करे ( बाहर की तरफ खींचे ) । इस प्रकार छः मास तक अभ्यास करने से जीभ बढ़कर भौंहों के मध्य तक पहुँचने लगेगी और बगल में कान के छेद तक पहुंचने लगती है । बाहर की तरफ जीभ थोड़ी तक पहुंच जाती है । जब इस अभ्यास को बराबर किया जाय तो तीसरे वर्ष में जीभ बालों तक पहुंच जाती है और बगल में कन्धे तक तथा नीचे कण्ठकूप तक पहुंचने लगती है । आगामी तीन वर्ष के अभ्यास से जीभ ब्रह्मरन्ध्र तक पहुंचकर उसे ढक लेगी इसमें संशय नहीं । तब वह गर्दन के पीछे तक और नीचे कण्ठ के अन्त तक पहुँच जायगी ॥ ३२-३६ ॥ शनैः शनैर्मस्तकाच्च महावज्रकवाटभित् । पूर्वं बीजयुता विद्या ह्याख्याता याति दुर्लभाम् ॥३७ तस्याः षडङ्गं कुर्वीत तया षट्स्वरभिन्नया । कुर्यादिकं करन्यासं सर्वसिद्धिप्रदिहेतवे ॥३८
२६८ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् शनैरेवं प्रकर्तव्यमभ्यासं युगपन्न हि । युगपद्वर्तते यस्य शरीरं विलयं व्रजेत् ॥३९ तस्माच्छनैः शनैः कार्यमभ्यासं मुनिपुंगव । यदा च बाह्यमार्गेण जिह्वा ब्रह्मबिलं व्रजेत् ॥४० तदा ब्रह्मार्गलं ब्रह्मन्दुर्भेदं त्रिदशैरपि । अंगुल्यग्रेण संधृष्य जिह्वामात्र निवेशयेत् ॥४१ धीरे-धीरे जिह्वा ब्रह्मरन्ध्र को भेद जाती है। यह समस्त बीजाक्षर की विधि सहित विद्या बड़ी ही कठिन है। इस पूर्वोक्त छःओं बीजाक्षरों से षडंगन्यास और करन्यास करना चाहिये तब सम्पूर्ण सिद्धि सम्भव होती है ॥ ३७--३८ ॥ इस प्रकार का अभ्यास बहुत सावधानी से क्रमशः धीरे-धीरे करना चाहिये । जल्दी करने से शरीर की हानि होना सम्भव है । इसीलिए इन अभ्यास में कभी जल्दी नहीं करनी चाहिये । जब बाहर के मार्ग से जीभ ब्रह्म विवर के भीतर जाने लगे तो उसे अँगुली से उठाकर उसके भीतर करदे ॥ ४०-४१ ॥ एवं वर्षत्रयं कृत्वा ब्रह्मद्वारं प्रविश्यति । ब्रह्मद्वारे प्रविष्टे तु सम्यङ्मथनमाचरेत् ॥४२ मथनेन विना केचित्साधयन्ति विपश्चितः । खेचरीमन्त्रसिद्धस्य सिध्यते मथनं विना ॥३३ जपं न मथनं चैव कृत्वा शीघ्रं फलं लभेत् । स्वर्णजां रौप्यजां वाऽपि लोहजां वा शलाकिकाम् ॥४४ नियोज्य नासिकारन्ध्रं दुग्धसिक्तेन तन्तुना । प्राणान्निरुध्य हृदये सुखमासनमात्सनः ॥४५ शनैः सुमथनं कुर्याद्भ्रू मध्ये न्यस्तचक्षुषि । षाण्मासान्मथवात्कस्य भवेनेव प्रजायते ॥४६
द्वितीय अध्याय ] [ २६१ यथा सुषुप्तिर्बालानां यथा भावस्तथा भवेत् । न सदा मथनं शस्तं मासे समाचरेत् ॥४७ सदा रसनया योगी मार्गं न परिसंक्रमेत् । एवं द्वादशवर्षान्ते संसिद्धिर्भवति ध्रुवं ॥४८ शरीरे सकलं विश्वं पश्यत्यात्माविभेदतः । ब्रह्माण्डोऽयं महामार्गो राजदन्तोर्ध्वकुण्डली ॥४९ इति ॥ इस प्रकार तीन वर्ष तक करने से जीभ ब्रह्म द्वार में प्रवेश कर जायगी । जब वह प्रवेश कर जाय तब उसका विधिपूर्वक मंथन आरम्भ करना चाहिए ॥ ४२ ॥ कोई साधक बिना मन्थन के ही खेचरी करते हैं । जिनको खेचरी मन्त्र सिद्ध हो चुका है वे ऐसा कर सकते हैं ॥ ४३ ॥ तो भी जप और मन्थन दोनों करने से फल शीघ्र प्राप्त होता है । मन्थन के लिये सुवर्ण, चाँदी अथवा लोहे की शलाका के सिरे पर दुग्धयुक्त तन्तु लगाकर उसे नाक के भीतर डाले । फिर प्राण को हृदय में निरोध करके सुखासन पर बैठकर, आंखों को भ्रुकुटी स्थान में लगाकर धीरे-धीरे मन्थन करे । छः मास तक इस प्रकार मन्थन करने से उसका प्रभाव दिखलाई पड़ने लगता है ॥ ४४-४६ ॥ तब उसकी अवस्था इस प्रकार की होती है जैसी बालक की सुषुप्ति अवस्था में । मन्थन नित्य नहीं करना चाहिये वरन् महीने में एक बार करना होता है । इसी प्रकार जिह्वा को बार-बार ब्रह्मारन्ध्र में प्रविष्ट न करे । इस प्रकार बारह वर्ष अभ्यास करने पर सिद्धि निश्चित रूप से होती है ॥ ४७-४८ ॥ उस समय योगी करने समस्त विश्व अपने भीतर दिखाई देने लगता है, क्योंकि जीभ के ब्रह्मारन्ध्र तक जाने के मार्ग में ही ब्रह्माण्ड की स्थिति है ॥ ४६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥
२७० ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ योगकुण्डल्युपनिषत् तृतीयोऽध्यायः ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम् पद्मज उवाच— अमावस्या च प्रतिपत्पौर्णमासी च शंकर । अस्याः का वर्ण्यते संज्ञा एतदाख्याहि तत्त्वतः ॥१॥ प्रतिपद्दिनतोऽकाले अमावस्या तथैव च । पौर्णमास्यां स्थिरीकुर्यात्स च पन्था हि नान्यथा ॥२ कामेन विषयाकाङ्क्षी विषयात्काममोहितः । द्वावेव संत्यजेन्नित्यं निरञ्जनमुपाश्रयेत् ॥३ अपरं सत्यजेत्सर्वं यदिच्छेदात्मनो हितम् । शक्तिमध्ये मनः कृत्वा मनः शक्तेश्च मध्यगम् ॥४ मनसा मन आलोक्य तत्यजेत्परमं पदम् । मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थितिकारणम् ॥५ ब्रह्माजी बोले—मेलन मन्त्र इस प्रकार है—"ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम् । हे शंकर ! अमावस्या, प्रतिपदा और पौर्णमासी का मूल आशय क्या है ? ॥ १ ॥ प्रतिपदा से सूर्य का आशय है और पौर्णमासी से चन्द्रमा का । अमावस्या का अर्थ सूर्य और चन्द्र दोनों का अभाव है ॥ २ ॥ मनुष्य कामनाओं में ग्रसित होकर विषयाकांक्षी होता है और विषय में पड़कर कामना बढ़ती जाती है । इसलिए शुद्ध परमात्म भाव की प्राप्ति के लिए विषय और कामना दोनों का त्याग करना और आत्मा में ध्यान लगाना ही आवश्यक है ॥ ३ ॥ जो अपने हित की इच्छा रखता हो उसे अन्य सब मिथ्या विषयों को त्याग देना चाहिए और शक्ति में प्रवेश करके उसी में स्थित रहना चाहिए ॥ ४ ॥ मन द्वारा मन को देखकर और समझकर उसका त्याग करना ही परमपद है । उत्पत्ति और स्थिति का प्रधान बिन्दु मन ही है ॥ ५ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
तृतीय अध्याय ] [ २७१
तृतीय अध्याय ] [ २७१ मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् । न च बन्धनमध्यस्थं तद्वै कारणमानसम् ॥६ चन्द्रार्कमध्यमा शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम् । ज्ञात्वा सुषुम्ना तद्भेदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् ॥७ स्थित्वाऽसौ बैन्दवस्थाने घ्राणरन्ध्रे निरोधयेत् । वायुं बिन्दुं समाख्यातं सत्वं प्रकृ तिमेव च ॥८ षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डलम् । मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरं तृतीयकम् ॥६ अनाहतं विशुद्धिं च आज्ञाचक्रं च षष्ठकम् । आधारं गुदमित्युक्तं स्वाधिष्ठानं तु लैङ्गिकम् ॥१० मणिपूरं नाभिदेशं हृदयस्थमनाहतम् । विशुद्धिः कण्ठमूले च आज्ञाचक्रं च मस्तकम् ॥११ यह बिन्दु मन से ही उत्पन्न होता है, जैसे दूध से घी प्रकट होता है। उस बिन्दु में कोई बन्धन नहीं है, वरन् जो कुछ बन्धन है वह सब मन का ही है ॥ ६॥ सूर्य और चन्द्र के मध्य में जो शक्ति रहती है वही बन्धन रूप है। इसलिये इन दोनों के मध्य की सुषुम्ना का ज्ञान प्राप्त करके उसके भीतर प्राण को चलाना आवश्यक है ॥ ७॥ प्राण को इसी बिन्दु स्थान में स्थिर करके नासिका से वायु का निरोध करना चाहिये। यही प्राणवायु, बिन्दु, सत्व और प्रकृति का वर्णन है ॥ ८ ॥ इसके साथ ही षट्चक्रों की जानकारी भी प्राप्त करनी चाहिये जिससे सुख की स्थिति प्राप्त हो सके । ये षट्चक्र इस प्रकार है—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। मूलाधार का स्थान गुदा है, उसके ऊपर लिङ्ग के समीप स्वाधिष्ठान है, मणिपुर नाभि में है, अनाहत हृदय में, विशुद्ध कण्ठ में और आज्ञा-चक्र मस्तक में होता है ॥ ६-११ ॥
२७२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डले । प्रविशेद्व वायुमाकृष्य तयैवोर्ध्वं नियोजयेत् ॥१२ एवं समभ्यसेद्वायुं स ब्रह्माण्डमयो भवेत् । वायुं बिन्दुं तथा चक्रं चित्तं चैव समभ्यसेत् ॥१३ समाधिमेकेन समममृतं यान्ति योगिनः । यथाऽग्निर्दारुमध्यस्थो नोत्तिष्ठेन्मथनं विना ॥१४ विना चाभ्यासयोगेन ज्ञानदीपस्तथा न हि । घटमध्यगतो दीपो बाह्ये नैव प्रकाशते ॥१५ भिन्ने तस्मिन्घटे चैव दीपज्वाला च भासते । स्वकायं घटमित्युक्तं यथा दीपो हि तत्पदम् ॥१६ गुरुवाक्यसमा भिन्ने ब्रह्मज्ञानं स्फुटीभवेत् । कर्णधारं गुरुं प्राप्य कृत्वा सूक्ष्मं तरन्ति च ॥१७ इन समस्त चक्रों का ज्ञान प्राप्त करके सुख मण्डल रूप सहस्र दल कमल में प्रवेश करे और प्राण को ऊर्ध्व भाग में खींचकर स्थित करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार प्राण का अभ्यास करने से ब्रह्माण्ड में स्थित हो जाती है । प्राणवायु, बिन्दु, चक्र तथा चित्त का उचित रूप से अभ्यास करके योगीजन एक्य रूप की समाधि तक पहुँच जाते हैं, और अमृत पद को प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि रहती है, पर घिसने के बिना वह प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार सतत अभ्यास के बिना योग विद्या का दीपक भी प्रकाशित नहीं होता । अथवा जिस प्रकार घड़े के भीतर रखा हुआ दीपक बाहर प्रकाश नहीं कर सकता जब तक कि उस घड़े का भेदन न किया जाय, उसी प्रकार शरीर रूपी घट के भीतर रखे हुये ब्रह्मरूपी दीप का प्रकाश भी उस समय तक बाहर नहीं निकलता जब तक गुरु के उपदेश से इस घट का भेदन नहीं होता । इस प्रकार इस अपार सागर को पार करने का उपाय गुरु रूपी कर्णधार ही है ॥ १३-१७ ॥
तृतीय अध्याय ] [ २७३
तृतीय अध्याय ] [ २७३ अभ्यासवासनाशक्त्या तरन्ति भवसागरम् । परायामंकुरी भूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता ॥१८ मध्यमायां मुकुलिता वैखर्यां विकसीकृता । पूर्वं यथोदिता या वाग्विलोमेनास्तगा भवेत् ॥१९ तस्या वाचः परो देवः कटस्थो वाक्प्रबोधकः । सोऽहमस्मीति निश्चित्य यः सदा वर्तते पुमान् ॥२० शब्दंरुच्चावचैर्नीचैर्भाषितोऽपि न लिप्यते । विश्वश्च तैजसश्चैव प्राज्ञश्चेति च ते त्रयः ॥२१ विराड्ढिरण्यगर्भश्च ईश्वरश्चेति ते त्रयः । ब्रह्माण्डं चैव पिण्डाण्डं लोका भूरादयः क्रमात् ॥२२ स्वस्वोपाधिलयादेव लीयन्ते प्रत्यगात्मनि । अण्डं ज्ञानाग्निना तप्तं लीयये कारणैः सह ॥२३ अभ्यास और श्रेष्ठ वासना की शक्ति द्वारा ही वे इस भव सागर को तैर कर पार करने में समर्थ होते हैं। वाणी परा में अंकुरित होती है, पश्यन्ती में उसके दो भाग होते हैं, मध्यमा में पुष्पित होती है और बैखरी में विकास को प्राप्त हो जाती है। इस विधि से जिस प्रकार वाणी का आविर्भाव होता है, उसके विलोम-क्रम से ही वह लय हो जाती है ॥ १८-१९ ॥ इस वाणी का बोध कराने वाला अथवा परमदेव मैं ही हूँ, इस प्रकार निश्चय करके जो व्यक्ति तदनुसार व्यवहार करता है ॥ २० ॥ उससे कोई उच्च या नीच कैसा भी शब्द कहे, पर वह उसमें लिप्त नहीं होता । विश्व, तैजस और प्राज्ञ—ये तीन पिण्डक तथा विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—ये तीन ब्रह्माण्ड के और भूः, भुवः स्वः—ये तीन लोक के भेद हैं, जो अपनी उपाधि के लय होने पर प्रत्यगात्मा में लीन हो जाते हैं । ज्ञानाग्नि से तप्त होने पर ब्रह्माण्ड भी अपने मूल रूप में विलीन हो जाता है ॥ २१-२३ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi