१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
५५० ] [ चतुर्वेदोपनिषत् हृदये चाप्यधोमुखं सतस्यत्यैशीतकराभिश्च ॥४ तस्य मध्ये महानग्निर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखः । तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥५ तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः । स ब्रह्मा स ईशानः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । ६ हजारों शिर वाले हजारों आँखों वाले, विश्व की उत्पत्ति करने वाले परमदेव जो कि सर्वत्र व्यापक हैं हमेशा सर्वत्र विद्यमान एवम् नारायण, हरि आदि शब्दों से प्रसिद्ध हैं । उस ऋषि स्वरूप संसार के स्वामी समुद्र- शायी विश्वरूप परम-पुरुष का आश्रय लेकर ही यह संसार जीता है। कमलकोश के समान आकाश की तरह हृदय में अधोमुख होकर लटका है जो अपनी शक्तियों से सर्व कुछ करता है। उसके बीच में महान् अग्नि- जिनकी ज्वाला चारों ओर लपट मारती है एवम् चारों मुख वाली (लप- कने वाली) है। उसके बीच में ही वह्निशिखा है जो कि अणीय के ऊपर स्थित है। उस शिखा के मध्य में ही परमात्मा स्थित है कि स्वयं ही ब्रह्म शिव अक्षर (ब्रह्म) एवम् परम प्रभुः स्वयं प्रकाश है ॥२-६॥ य इमां महोपनिषदं ब्राह्मणोऽधीते अश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति । अनुपनीतः उपनीतो भवति । सोऽग्निपूतो भवति । स वायुपूतो भवति । स सूर्यपूतो भवति । स सोमपूतो भवति । स सत्यपूतो भवति । सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति । सर्वैषु तीर्थेषु स्नातो भवति । तेन सर्वैः ऋतुभिरिष्टं भवति । गायत्र्याः षष्टि सहस्राणि जप्तानि भवन्ति । इतिहासपुराणानां सहस्राणि जप्ताति भवन्ति । प्रणवानामयुतं जप्तं भवति । आचक्षुषः पङ्क्तिं पुनाति आसप्तमात् पुरुषं पुनाति । जाप्येन अमृतत्त्वं च गच्छति अमृतत्त्वं च गच्छति इत्याह भगवान् हिरण्यगर्भः ॥ ७ ॥ जो ब्राह्मण इस महोपनिषद् को पढ़ता है वह यदि अश्रोत्रीय हो तो श्रोत्रीय (कर्मकाण्डी हो जाता है। अनुपनीत हो तो उपनीत (यज्ञोप- वीती) होता जाता है। वह अग्नि-पवित्र, वायु-पवित्र, सूर्य-पवित्र, सोम-
पवित्र, सत्य से पवित्र माना जाता है, हो जाता है। उसे सभी देव जानते हैं। उसने सभी तीर्थों का स्नान कर लिया, तथा सभी यज्ञ भी कर चुका । उसने तो गायत्री के साठ हजार जप कर लिए । इतिहास तथा पुराणों के हजारों जप वह कर चुका । दस हजार ॐकार का जप वह कर चुका । वह पुरुष अपनी दृष्टमात्र से मनुष्यों की पंक्तियों को (हजारों मनुष्यों को) पवित्र कर देता है। सातवीं पीढ़ी तक के मनुष्यों को पवित्र कर देता है एवम् जो इसे पढ़ता है वह अमृतत्व को निश्चित ही प्राप्त कर लेता है, ऐसा भगवान् हिरण्यगर्भ ने कहा है ॥७॥ देवा ह वै स्वर्गं लोकमायंस्ते देवा रुद्रमपृच्छंस्ते देवा ऊर्ध्वबाहवो रुद्रं स्तुवन्ति । भूस्तवादिर्मध्यं भुवस्ते स्वस्ते शीर्षं विश्वरूपोऽसि ब्रह्मैकस्त्वं द्विधा त्रिधा शान्तिस्त्वं हुतमहुतं दत्त- मदत्तं सर्वमसर्वं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम् । अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवा नमस्याम धूर्तेरमृतं मृत मर्त्यं च सोमसूर्यपूर्वजगदधीतं वा यदक्षरं प्राजापत्यं सौम्यं सूक्ष्मं ग्राहं ग्राहेण भावं भावेन- सौम्यं सौम्येन सूक्ष्मं सूक्ष्मेण ग्रसति तस्मै महाग्रासाय नमः ॥ ८ ॥ देवता स्वर्ग लोक में आये तथा हाथ उठाकर रुद्र की स्तुति करते हुए उनसे पूछा (कहा) तेरा आदि भूः, मध्य भुवः, शिर स्वः है, तू विश्व- रूप है, तू ही एक ब्रह्म है। द्विविध, त्रिविध शक्तिहुत (होम किया गया) अहुत, दिया, न दिया, सर्वं (सब कुछ) असर्व, विश्व (संसार) अविश्व, किया न किया, पर, अपर परायण सब तू ही है। हम सोम पान अमृत होवें, हमें ज्ञान प्राप्त हो, हम देव आपको नमस्कार करते हैं, अमृत, मृत, मर्त्य, सोम, सूर्य, पूर्व संसार, अधीत या जो अक्षर (अविनाशी) प्राजा- पत्य, सौम्य सूक्ष्म है उसे ग्राह को ग्राह से, भाव को भाव से, सौम्य को सौम्य से, सूक्ष्म को सूक्ष्म से ग्रसित करते हैं। उस महाग्रास को (ग्रसित करने वाले को) नमस्कार है ॥ ४ ॥ ॥ चतुर्वेदोपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri चाक्षुषोपनिषत् ॐ अथातश्चाक्षुषीं पठितसिद्धविद्यां चक्षुरोगहरां व्याख्या- स्यामः। यच्चक्षू रोगाः सर्वतो नश्यति । चाक्षुषो दीप्तिर्भविष्य- तीति । तस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिः । गायत्री छन्दः । सूर्यो देवता । चक्षूरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः । ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव । मां पाहि पाहि । त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय । मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय । यथाऽहं अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्व- जन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय । ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय । ॐ नमः करुणाकरायामृताय । ॐ नमः सूर्याय । ॐ नमो भगवते सूर्याया- क्षितेजसे नमः । खेचराय नमः । महते नमः रजसेः नमः । तमसे नमः । असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । उष्णो भगवान्छुचिरूपः । हंसो भगवान् शुचि- प्रतिरूपः । य इमां चक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्या- क्षिरोगो भवति । न तस्य कुले अन्धो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति ॥ अब पाठ मात्र से सिद्ध हो जाने वाली चाक्षुषी विद्या का वर्णन करते हैं । यह विद्या नेत्र-रोगों का नाश करने वाली है तथा नेत्रों को तेजयुक्त करने में समर्थ है । इस विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य, छन्द गायत्री, देवता सूर्य हैं । इसका विनियोग नेत्र-रोगों के शमनार्थ होता है । हे सूर्यदेव ! तुम चक्षु के अभिमानी देवता हो । तुम चक्षु में चक्षु Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
चाक्षुषोपनिषत् ] [ ५५३ के तेज रूप से स्थिर होओ । मेरी रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो । मेरे नेत्र-रोग को शीघ्र शान्त करो, शान्त करो । मुझे अपने स्वर्ण के समान तेज के दर्शन कराओ । जिससे मैं अन्धा न होऊँ ऐसा उपाय करो, उपाय करो । कल्याण करो । मेरे जितने ऐसे पाप हैं जिनके द्वारा देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है उन सबको समूल नष्ट कर दो । नेत्रों को तेज देने वाले दिव्य स्वरूप भगवान् भास्कर को मेरा नमस्कार है । करुणा करने वाले अमृतस्वरूप को मेरा नमस्कार है । सूर्य भगवान् को नमस्कार है । नेत्रों के प्रकाश रूप सूर्य नारायण को नमस्कार है । आकाश में विहार करने वाले सूर्य को नमस्कार है । अत्यन्त श्रेष्ठ रूप को नमस्कार, रजोगुणमय सूर्य को नमस्कार है । तमोगुण के आश्रय- भूत सूर्य को नमस्कार है । हे प्रभो ! मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलो । उष्णता युक्त भगवान् सूर्य शुचि रूप हैं । हंस रूप भगवान् सूर्य शुचि रूप तथा अप्रतिरूप हैं । जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्या का पाठ नित्य करता है उसे नेत्रों से सम्बन्धित कोई रोग नहीं होता । उसके कुल में कोई अन्धा नहीं होता । यह विद्या आठ ब्राह्मणों को उपदेशित करने पर इसकी सिद्धि प्राप्त होती है । ॐ विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं पुरुषं ज्योतिरूपं तपन्तम् । विश्वस्य योनिं प्रतपन्तमुग्रं पुरः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः । ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिन्यहोवाहिनी स्वाहा । ॐ वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियेमेधा ऋषयो नाध- मानाः । अपध्वान्तमूर्णुहि पूर्द्धि चक्षुर्मु मुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान् । पुण्डरीकाक्षाय नमः । पुष्करेक्षणाय नमः । अमलेक्षणाय नमः । कमलेक्षणाय नमः । विश्वरूपाय नमः । महाविष्णवे नमः ।
५५४ ] [ चाक्षुषोपनिषत् जो भगवान् सूर्य सच्चिदानन्द रूप हैं तथा यह विश्व जिनका रूप है, जो सबके जानने वाले अपनी किरणों से सुशोभित हैं, जो ज्योति स्वरूप, हिरण्यमय, जगत के उत्पत्ति स्थान, पुरुष रूप में तपने वाले हैं, उन प्रचण्ड तेज वाले सूर्य नारायण को हम नमस्कार करते हैं । यह भगवान् सूर्य सम्पूर्ण प्राणियों के सामने प्रत्यक्ष उदय को प्राप्त हो रहे हैं । छः प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न भगवान् सूर्य को नमस्कार है । उनकी प्रभा दिवस की भारवाहिनी है । हम उन सूर्य भगवान् के लिए श्रेष्ठ आहुतियाँ देते हैं । जिन्हें मेधा से अत्यन्त प्रेम है वे ऋषिगण श्रेष्ठ पंखों वाले पक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के समीप जाकर निवेदन करने लगे—‘भगवन् ! इस अन्धकार को दूर करो । हमारे नेत्रों को प्रकाशमय करो । हम सब प्राणी तमोमय बन्धन में पड़े हुए-से हैं, हमें अपना दिव्य प्रकाश प्रदान कर मुक्त करो । पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार ! पुष्करेक्षण को नमस्कार । अमलेक्षण को नमस्कार । कमलेक्षण को नमस्कार । विश्व स्वरूप को नमस्कार । भगवान् महाविष्णु को नमस्कार । :! चाक्षुषोपनिषद् समाप्त ॥
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कलिसंतरणोपनिषत्
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, हम दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति । हरिः ओ३म् द्वापरान्ते नारदो ब्रह्माणं जगाम कथं भगवन् गां पर्यटन्कलि संतरेमिति । स होवाच ब्रह्मा साधु पृष्टोऽस्मि सर्वश्रुतिरहस्यं गोप्यं तच्छृणु येन कलिसंसारं तरिष्यसि । भग- वत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलि- र्भवति । नारदः पुनः पप्रच्छ तन्नाम किमिति । स होवाच हिर- ण्यगर्भः । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । द्वापर युग के अन्त की बात है। नारद मुनि ब्रह्माजी के पास जाकर बोले—'प्रभु ! भूलोक में घूमता हुआ किस तरह से कलि काल से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकता हूं। ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और बोले— "वत्स ! आज तुमने अत्यन्त प्रिय बात पूछी है। समस्त वेद, मन्त्रों का गुप्त रहस्य मैं तुझे बताता हूं। कलि के दोषों को नाश करने का उपाय भगवान आदिपुरुष नारायण के पवित्र नाम का उच्चारण करना है। नारदजी ने वह नाम पूछा, जिस पर ब्रह्माजी ने कहा— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
५५६ कलिसंतरणोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम् । नातः परत रोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते । इति षोडशकलाऽवृतस्य जीव- स्यावरणविनाशनम् । ततः प्रकाशते । परं ब्रह्म मेघापाये रवि- रश्मिमण्डलीवेति । पुनर्नारदः पप्रच्छ भगवन्कोऽस्य विधिरिति । तं होवाच नास्व विधिरिति । सर्वदा शुचिरशुचिर्वा पठन्ब्राह्मणः सलोकतां समीपतां सरूपतां सायुज्यतामेति । यदास्य षोडशीकस्य सार्धत्रिकोटीर्जपति तदा ब्रह्महत्यां तरति । तरति वीरहत्याम् । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । पितृदेवमनुष्याणामपकारात्पूतो भवति सर्वधर्मपरित्यागपापात्सद्यः शुचितामाप्नुयात् । सद्यो मुच्यते सद्यो मुच्यते इत्युपनिषत् ॥ हरिः ओ३म् तत्सत् ॥ कलि के पापों को यह सोलह नाम नाश करते हैं । वेद शास्त्रों में भी इससे अच्छा उपाय दिखाई नहीं देता । इसकी सहायता से सोलह कलाओं से सम्पन्न जीव के पर्दे कट जाते हैं, तभी उस परब्रह्म का वास्तविक स्वरूप साफ-साफ भासने लगता है, जैसे बादल के चले जाने पर सूर्य की किरणों का प्रकाश आ जाता है । इस पर नारदजीं ने जप की विधि पूछी । ब्रह्माजी ने उत्तर देते हुए कहा कि इसकी कोई विशेष विधि नहीं है । पवित्र या अपवित्र जिस हालत में हो इसका जप किया जा सकता है । इसके जप करने से चारों प्रकार की ( सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य ) मुक्ति प्राप्त होती है । साधक इस मन्त्र के साढ़े तीन करोड़ जप के पश्चात् ब्रह्महत्या के कोष से निवृत्त हो जाता है । वह वीरहत्या के दोष से छूट जाता है । सोने की चोरी के दोष से मुक्त हो जाता है । मनुष्य, देवता और पिता के प्रति किए गए अपकार के पाप से भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है । सब धर्मों को छोड़ने के दोष से तुरन्त ही छूट जाता है, शीघ्र ही निवृत्त हो जाता है, शीघ्र ही निवृत्त हो जाता है—यह उपनिषद् है । ॥ कलिसंतरणोपनिषद् समाप्त ॥ ॥ १०८ उपनिषद् का साधना खण्ड समाप्त ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
चारों वेदों का सरल हिन्दी भाष्य ऋग्वेद—में सृष्टि रचना, प्रकृति, आत्मा और जीव का स्वरूप, धर्म- नीति, चरित्र, सदाचार, परोपकार और मनुष्य के वास्तविक कर्तव्य का सुन्दर दिग्दर्शन है। साथ ही समाज-नीति, राजनीति, अर्थनीति, अंक- गणित, रेखागणित, बीज-गणित, ज्योतिष, भूगोल, खगोल, रसायन-शास्त्र, भूगर्भ-विद्या, धातु-विज्ञान व मनोविज्ञान के मूल, सिद्धान्तों का स्पष्टी- करण किया गया है। ४ खण्डों का मूल्य २४) मात्र अथर्ववेद—में अन्न-सिद्धि, बुद्धि बढ़ाने के उपाय, वीर्य रक्षा, ब्रह्मचर्य, धन-धान्य, समय पर वृष्टि, व्यापार की वृद्धि, दीर्घ आयु और सुदृढ़ स्वास्थ्य के साधन, राज्याधिकारियों का नियन्त्रण, युद्ध में विजय, शत्रु सेना में मोह व भ्रम उत्पन्न करना आदि विषयों का विज्ञान है। २ खण्ड—मूल्य १२) मात्र यजुर्वेद—कर्मकाण्ड प्रधान वेद है। इसमें यज्ञों के विधि-विधान व विज्ञान पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, शिल्प, व्यवसाय, राज्य, स्वराज्य, साम्राज्य आदि के सम्बन्ध में कल्याणकारी ज्ञान प्रदान किया गया है। मूल्य ६) मात्र सामवेद—यद्यपि चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है, फिर भी उसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है। सामवेद के मन्त्र अमूल्य रत्नों की खान हैं। इसकी भक्तिरसपूर्ण काव्य धारा में अवगाहन करने से तुरन्त ही मनुष्य का अन्तरतम निर्मल, विशुद्ध, पवित्र और रससिक्त हो जाता है। मूल्य ६) गायत्री तपोभूमि, मथुरा के संचालक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा प्राचीन सायणभाष्य के आधार पर यह हिन्दी संस्करण सम्पादित हुआ है। इसमें मूल वेदमन्त्रों के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। प्रकाशकः संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतब बरेली (उ० प्र०)
१०८ उपनिषदें-हिंदी टीका सहित वेद के दुरूह रहस्यों का सरल रीति से विस्तार पूर्वक विवेचन उप- निषदों में हुआ है। प्राचीन-काल में ऋषि, मुनि मानव-जीवन की व्यक्ति- गत व सामाजिक सभी प्रकार की उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने के लिए लाखों वर्षों से जो चिन्तन और मनन करते रहे हैं, उनका सार उप- निषदों में संचित है। आत्म-विद्या, ब्रह्मविद्या के रहस्य का उपनिषदों में विवेचन हुआ है। यह जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन ही हैं। प्रमुख उपनिषदें १०८ हैं। उनमें से अब तक बहुत थोड़ी उपनिषदों का भाष्य उपलब्ध था। शेष कठिन संस्कृत में होने के कारण सर्वसाधारण के लिए दुरूह ही बनी हुई थी। प्रसन्नता की बात है कि गायत्री तपोभूमि, मथुरा के सञ्चालक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा १०८ उपनिषदों का मूल मन्त्रों से साथ सरल व सुबोध हिन्दी भाष्य किया गया है। यह अपने ढंग का सर्व प्रथम प्रकाशन है। इसके तीन भाग हैं (१) ज्ञान खण्ड (२) ब्रह्मविद्या खण्ड (३) साधना खण्ड । ज्ञान खण्ड में विचारात्मक व आचारात्मक उपनिषदें हैं। ब्रह्मविद्या खण्ड में आध्यात्मिक रहस्यों का विवेचन है। साधना खण्ड में योग साधनों का मार्ग दर्शन है। प्रत्येक खण्ड का मूल्य ७) रु० । ३ खण्डों के सम्पूर्ण सेट का २१), रु० डाक खर्च इसके अतिरिक्त । भारत के महामान्य राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन् की सम्मति है— “यह एक महत्वपूर्ण प्रकाशन है और मुझे विश्वास है कि उसे बहुत लोग पढ़ना पसन्द करेंगे।” दैनिक हिन्दुस्तान नई दिल्ली की सम्मति—“वस्तुतः उपनिषदों ने इस संकलन में सरलता, सरसता और सुरुचिता की ज्ञान गंगा प्रवाहित की गई है। भारत के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पुस्तक विक्रेताओं और संस्थाओं द्वारा जो प्रकाशन हमारे देखने में आए हैं, उन सबसे बढ़कर उपनिषदों का रहस्य समझने में आचार्य जी ही अधिक सफल हुए हैं।” प्रकाशक :— संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब, बरेली (उ०प्र०)
षट् दर्शनों की हिन्दी टीका भारतीय दर्शन को प्राचीन काल से संसार में सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहा है। वेद और उपनिषदों में जिन आध्यात्मिक तत्त्वों का उपदेश दिया गया है, दर्शनों में उसे तर्क तथा युक्ति के अनुकूल एवं व्यवस्थित रूप दे दिया गया है, जिससे मनुष्य की बुद्धि उसे भली प्रकार ग्रहण करके उस पर आचरण करने की सामर्थ्य प्रदान कर सके । मनुष्य क्या है .? उसके जीवन का लक्ष्य क्या है ? इसका कोई सृष्टा है या नहीं ? मनुष्य को अपना जीवन किस तरह व्यतीत करना चाहिए ? भारतीय दर्शनों ने इन्हीं प्रश्नों पर बड़ी व्यापक दृष्टि से विचार किया है और इस बात को स्पष्ट रूप से समझा दिया है कि संसार के दुःखों का कारण क्या है और उनका नाश किस प्रकार किया जा सकता है। इससे मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य को समझ सकता है और तदनुसार आचरण करके उन दुःखों से छुटकारा पा सकता है । वैशेषिक दर्शन की रचना कणादि मुनि ने की है। इस दर्शन के सूत्र भारतीय दर्शन सूत्रों में सबसे प्राचीनतम हैं। कणाद ने इस दर्शन में सृष्टि रचना में परमाणुवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है । कणादन का मत है कि धर्म के बिना अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो सकता । अशुद्ध अन्तः- करण में प्रकाश नहीं होता । न्याय दर्शन के रचयिता गौतम हैं । यह मानव को मुक्ति का मार्ग प्रस्तुत करता है। इसमें अपने विषय को सम- झाने के लिए तर्क और बुद्धि का सहारा लिया गया है। न्याय की यह नीति सभी दर्शनों की पथप्रदर्शक है। कपिल का सांख्य दर्शन प्रधानतः ज्ञान मार्ग से मानव व्यक्तित्व के चरम विकास की योजना प्रस्तुत करता है। योग दर्शन जीवन की पवित्रता और चिन्तन, मन्त्र और निदिध्यासन के द्वारा उपर्युक्त उद्देश्य की पूर्ति करता है । महर्षि जैमिनी के मीमांसा दर्शन का प्रतिपादक विषय कर्मकाण्ड है । वैदिक काल में यज्ञ सम्बन्धी प्रक्रियाओं के रूप नियत करने में जो तर्क वितर्क उपस्थित किए गए, उन्हीं से इस दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ । यज्ञीय कर्मों से ही स्वर्ग अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति हो सकती है, यह दर्शन की मूल धारणा है। महर्षि बाद- रायण व्यास द्वारा रचित वेदान्त दर्शन वैदिक साहित्य की सारी दार्शनिक शिक्षाओं का निचोड़ ही है । प्रत्येक दर्शन का मूल्य ४) प्रकाशक : संस्कृति संस्थान, ख्वाजाकुतुब, बरेली (उ० प्र०)
सांस्कृतिक विचारधारा के प्रसार का प्रतिनिधि मासिकपत्र "युग-संस्कृति" 'युग-संस्कृति' युग की वाणी व पुकार है। इसका उद्देश्य नवीन, आधुनिक, वैज्ञानिक ढंग से भारतीय संस्कृति की विशेषताओं, विचार- धाराओं व परम्पराओं का बौद्धिक आधार पर प्रतिपादन करना है। भारतीय तत्वज्ञान के मूलाधार तत्वों का स्पष्टीकरण करके संस्कृति के विशुद्ध व परिष्कृत रूप को जनता के सम्मुख रखना है। व्रत, त्यौहार, रीतिरिवाजों, आचार विचार, पूजा उपासना पद्धति की मनोवैज्ञानिक उपयोगिता को प्रस्तुत करना है। वेद-विज्ञान, संस्कार-विज्ञान, योग- विज्ञान, परलोक-विज्ञान, तुलसी-विज्ञान, पुराण-विज्ञान पर प्रकाश डालना है। ऋषि चरित्रों, व्रत कथाओं व पुराणों में असम्भव दिखाई देने वाली कथाओं में निहित वास्तविक तथ्यों का अनुसन्धान करना है। उपनिषदों की ज्ञान गंगा का प्रवाह, स्मृतियों की नीति, रामायण की पारिवारिक शिक्षा व गीता का तात्विक विवेचन इसकी विशेषता है। धर्म व संस्कृति की भावना का व्यापक विस्तार, समाज का नव-निर्माण, व नैतिक पुनरु- त्थान इसका लक्ष्य है। यदि आप अपने धर्म के प्रत्येक अंग को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता देखना चाहते हैं तो युग-संस्कृति को पढ़ें। पत्रिका साइज के ३६ पृष्ठों व बढ़िया ग्लेज कागज के दोरंगे टाइटल से सुसज्जित होने पर भी मूल्य केवल ३) वार्षिक है। नमूने की प्रति मुफ्त मँगाइये प्रकाशक : संस्कृति संस्थान, ख्वाजाकुतुब, बरेली (उ० प्र०)
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
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भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठतम धर्मग्रंथ १. चारों वेद ८ जिल्दों में— ऋग्वेद ४ खण्ड ... २४) अथर्व वेद २ खण्ड ... १२) यजुर्वेद १ खण्ड ... ६). सामवेद १ खण्ड ... ६) २. १०८ उपनिषदें (३ खण्डों में) ज्ञान खण्ड ... ७) ब्रह्मविद्या खण्ड ... ७) साधना खण्ड ... ७) ३. षट् दर्शन (६ जिल्दों में) वेदान्त दर्शन ... ४) सांख्य दर्शन ... ४) योग दर्शन ... ४) वैशेषिक दर्शन ... ४) न्याय दर्शन ... ४) मीमांसा दर्शन ... ५) ४. २० स्मृतियां २ खंड ... १४) ५. शिव पुराण ... १२)७५ वायु पुराण २ खण्ड ... १४) विष्णु पुराण २ खण्ड ... १४) अग्नि पुराण २ खण्ड ... १४) मार्कण्डेय पुराण २ खण्ड ... १४) संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब, बरेली जागरण बुक-कम्पनी प्रिन्टिंग प्रेस, मथुरा।