१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
( ६० ) “यह परमात्मा ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म, और वरुण है।” तमादि देवमजरं केचिदाहुः शिवामिधम् केचिद्विष्णुं सदा सत्यं ब्रह्माणं केचिदुच्यते —बृहन्नारदीय पुराण १।२।५ “उस अनादि, अजर परमात्मा कोई शिव, कोई विष्णु, कोई ब्रह्मा कहते हैं।” त्रिधाभिन्नोह्यहं विष्णो, ब्रह्मा विष्णु हराख्यया । सर्गरक्षालय गुणैर्निष्क्लोऽहं सदा हरे । —शिव पुराण २।१।६।२८ “सृष्टि के उत्पादन, पालन तथा संहार के गुणों के कारण मेरे ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीन भेद हुये हैं। वस्तुतः मेरा स्वरूप सदा भेद रहित है।” ब्रह्मा दक्षः कुवेरो यमवरुणमरुद्वह्नि चन्द्रैन्द्र रुद्राः । शैलानद्यः समुद्रा ग्रह गण मनुजा दैत्य गन्धर्वनागाः ॥ द्वीपां नक्षत्र तारा रवि वसु मुनयोव्योमभूरिश्वनौ च । संलीना यस्य सर्वे वपुषि स भगवान् पातु वोर्विश्वस्वरूपः ॥ “ब्रह्मा, दक्ष, कुवेर, यम, वरुण, मरुत, अग्नि, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, पर्वत, नदी, समुद्र, ग्रह, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व नाग, द्वीप, नक्षत्र, तारागण, रवि, वसु, मुनि, आकाश-पृथ्वी, अश्वनीकुमार आदि सभी जिसमें लीन हैं, उस विश्वरूप परमात्मा को नमस्कार है।” यो ब्रह्मा स हरिः प्रोक्तो यो हरिः स महेश्वरः । या काली सैव कृष्णः स्याद् यः कृष्ण सैव कालिका ॥ देव देवीं समुद्दिश्य न कुर्यादन्तरं क्वचित् । तत्तद्भेदों न मन्तव्यः शिव शक्तिमयं जगत् ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ६३ ) “जो ब्रह्मा है वही हरि हैं, जो हरि हैं वे ही महेश्वर हैं। जो काली है वही कृष्ण है, जो कृष्ण हैं वही काली है। देव और देवी को लक्ष्य करके कभी मन में भेद भाव उत्पन्न होने देना उचित नहीं है। देवता के चाहे जितने नाम और रूप हों, सभी एक हैं। यह जगत् शिव शक्तिमय है।” विभिन्न देवताओं की अलग-अलग उपासना का तात्पर्य परमात्मा की उस शक्ति से सम्बन्ध स्थापित करना है जो साधक के अभीष्ट प्रयोजन से सम्बन्धित है। जैसे समस्त प्रजा एक ही राजा के राज्य में रहती है तो भी उसे अलग-अलग प्रयोजनों के लिये अलग-अलग विभागों के दफ्तरी एवं कर्मचारियों के पास जाना पड़ता है। देव उपासना का भी यही प्रयोजन है। साधक अपनी आवश्यकता और आकांक्षा के अनुरूप उनमें से समय समय पर इन देवताओं का अंचल पकड़ता है और छोड़ता रहता है। किस देवता की आराधना किस प्रयोजन के लिये किस प्रकार करनी चाहिये इसका वर्णन और साधना शास्त्रों में विस्तारपूर्वक मिलता है। श्रीमद्भागवत में भी इस प्रकार का प्रसंग आता है:– ब्रह्मवर्चसमामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् । इन्द्रमिन्द्रिय कामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् ॥ देवीं यायाँ तु श्रीकामस्तेजत्कामो विभावसुम् । वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्य कामोऽथ वीर्यवान् ॥ अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्ग कामोऽदितेः सुतान् । विश्वान् देवान् राज्यकामः साध्यान्संसाधको विशाम् ॥ आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टि काम इलां यजेत् । प्रतिष्ठा कामः पुरुषो रोदसी लोक मातरो ॥ रूपाभिकामो गन्धर्वान्स्त्रीकामोऽप्सर उर्वसीम् ।
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आधिपत्य कामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् ॥ यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् । विद्या कामस्तुगिरिशं दाम्पत्यार्थ उमां सतीम् ॥ धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तुं तन्वन्पितॄन्यजेत् । रक्षाकामः पुण्य जनानोजस्कामो मरुद्गणान् ॥ राज्य कामो मनून्देवान् निर्ऋतित्वभिचरन्यजेत् । कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् ॥ —श्रीमद्भागवत २।३।२—६ "ब्रह्मतेज की इच्छा वाले को ब्रह्मा की, इन्द्रिय भोगों के लिये इन्द्र की, सन्तान के लिये प्रजापति की, सौभाग्य के लिये दुर्गा, की तेज, के लिए अग्नि की धन के लिये वसुओं की, वीर्य के लिए रुद्र की, अन्न के लिए अदिति की, स्वर्ग के लिए आदित्यों की, राज्य के लिये विश्वेदेवों की, लोक प्रियता के लिए साध्यगण की, दीर्घायु के लिए अश्विनी कुमारों की पुष्टि के लिये बसुन्धरा की, प्रतिष्ठा के लिए अन्तरिक्ष की, रूप के लिए गन्धर्वों की रमणी के लिये उर्वशी की, आधिपत्य के लिए प्रजापति की, यश के लिए यज्ञ की, कोश के लिए वरुण की, विद्या के लिए शंकर की, दाम्पत्य के लिये गौरी की, धन संचय के लिये नारायण की, कुटुम्ब वृद्धि के लिए पितृगण की, रक्षा के लिए यज्ञों की, बल के लिये मरुद्गण की, अभिचार के लिए राक्षसों की, भोगों के लिए चन्द्रमा की, और जिसे कोई इच्छा न हो वह परमात्मा की उपासना करे।" यह देव शक्तियां विभिन्न आकार प्रकार में चित्रित की गई हैं। इनकी आकृतियां, आयुध, वाहन, आदि का भी स्वरूप दिखाया गया है पर वस्तुतः इस सब का आधार ध्यान-विद्या का विज्ञान है। किस प्रकार से ध्यान करने पर कौन-सी
देव उपासना में जहाँ विधि-विधान और कर्मकाण्ड का
( ६३ ) देव शक्ति को साधक अपनी धारणा में अवतीर्ण कर सकता है, इस सूक्ष्म विज्ञान के ज्ञाता बहुत खोज करने पर ही प्राप्त हो सकते हैं। देव उपासना में जहाँ विधि-विधान और कर्मकाण्ड का महत्व है वहाँ श्रद्धा और विश्वास की सुदृढ़ भावना का होना भी आवश्यक है। उथली श्रद्धा के साथ, केवल कौतुक, कौतूहल समझकर, मन्त्र या देवता की परीक्षा के लिए कुछ आधा-अधूरा साधन कर लेने से समुचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। उसके लिए गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास का होना अपरिहार्य है। इस श्रद्धा-विश्वास को ही (अमृत) कहते हैं। इसी को पीकर देवता तृप्त एवं प्रसन्न होते हैं। उपनिषद् में इसी प्रकार का वर्णन आता है:— न वै देवा अश्नन्ति, न पिवन्त्येत देवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति । —छान्दोग्य ३।६।१ “देवता न तो खाते हैं, न पीते हैं। केवल अमृत को देख कर तृप्त रहते हैं।” उपासक केवल विधि-विधान की लकीर पीट रहा है या वह ‘अमृत’ भी अर्पण कर रहा है, इसकी परीक्षा के लिए कई बार देवताओं की ओर से साधना काल में लोभ और भय के अवसर उपस्थित किए जाते हैं। दुर्बल मनोभूमि का साधक उस परीक्षा में विचलित हो जाता है, फलस्वरूप अभीष्ट सिद्धि से उसे वंचित रहना पड़ता है। यों देवता सर्वव्यापी हैं पर उनका सबसे निकटवर्ती निवास स्थान अपनी 'देह' ही है। इस मानव शरीर में सभी देवता निवास करते हैं। विभिन्न अंग प्रत्यङ्गों में विभिन्न
( ६४ ) देव-शक्तियों का निवास है। इसलिए साधक को अपना शरीर एवं मन इस योग्य बनाना होता है कि वहां निवास करने वाली देव शक्तियां जागृत होकर अपनी सजातीय महाशक्ति को सूक्ष्म जगत में से आकर्षित न कर सकें। आहार-विहार, व्रत, संयम, उपवास, ब्रह्मचर्य एवं विविध तपश्चर्याओं द्वारा शरीर में रहने वाली देव शक्तियों को शुद्ध करना भी अभीष्ट सिद्धि के लिए आवश्यक है। 'एतरेयोपनिषद्' में कहा गया है:— ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशना पिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एन मब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्न मदामेति । —एतरेयोपनिषद् १।२।१ “परमात्मा ने अग्नि आदि सब देवता उत्पन्न किए और इन्हें इस संसार में भेजा । उन्हें भूख और प्यास से युक्त कर दिया । तब वे देवता परमात्मा से बोले—हमारे लिए स्थान की व्यवस्था कीजिए जहां रहकर हम अपना आहार प्राप्त कर सकें ।” ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति । —एतरेयोपनिषद् १।२।३ “परमात्मा ने उनके लिए मनुष्य का शरीर उपस्थित किया । तब देवताओं ने कहा—बस, हमारे लिए यह बहुत सुन्दर स्थान बन गया। यह सचमुच ही बड़ी सुन्दर रचना है। तब परमात्मा ने कहा—अब तुम लोग अपने लिए इसमें उचित स्थान ढूंढलो और उसी में प्रवेश कर जाओ ।”
( ६५ ) अग्निनर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुःप्राणो भूत्वा नासिके प्राविश- दादित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्रावि शन्नोषधि वनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशं श्चचन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविन्मृत्युर्पानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् । —ऐतरेयोपनिषद् १।२।४ “अग्नि ने वाणी बनकर मुख में प्रवेश किया। वायु प्राण बनकर नासिकां में रहने लगा। सूर्य ने नेत्र बनकर आँखों में स्थान ग्रहण किया। दिशा-देवता ने कर्णेन्द्रिय बनकर कानों में, वनस्पति देवता ने रोम बनकर त्वचा में, चन्द्रमा ने मन बनकर हृदय में, यम ने अपान वायु बनकर नाभि में और वरुण देवता ने वीर्य बन कर शिश्नेन्द्रिय में प्रवेश किया।” तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभि प्रजानीहीति । ते अब्रवी देतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येता सुभागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृ ह्यते भागिन्यावेवास्यामशनाया पिपासे भवतः । —ऐतरेयोपनिषद् २।२।५ “तब भूख और प्यास परमात्मा से बोलीं—हमारे लिये भी स्थान दीजिए। उसने उत्तर दिया तुम्हें इन देवताओं में ही प्रविष्ट किये देता हूँ। तुम्हें इन्हीं का भागीदार बनाता हूँ। यह देवता तुम्हारे ही द्वारा अपनी-अपनी हवि ग्रहण करेंगे। तुम दोनों उन्हीं की भागीदार रहोगी।” शरीर में निवास करने वाले देवताओं को भूख, प्यास के माध्यम से ही पोषण मिलता है। अर्थात् जैसा कुछ हम खाते पीते हैं, उसी के अनुरूप देव-शक्तियाँ सशक्त एवं दुर्बल होती हैं।
[ ६६ ] सात्विक खान-पान देव-तत्वों को पुष्ट करता है, और आसुरी तमोगुणी आहार करने से, मद्य-मांस सेवन करने से देवता दुर्बल हो जाते हैं। यह देवता केवल मुख के द्वारा ही आहार नहीं लेते वरन् प्रत्येक इन्द्रिय के द्वारा उसकी उचित-अनुचित प्रकृयाओं के आधार पर वे देवता पुष्ट एवं असक्त बनते हैं। जो अपनी इन्द्रियों का दुरुपयोग करता है, उनके द्वारा अनैतिक आचरण करता है, अग्राह्य को ग्रहण करता है तो शरीरवासी देवता असक्त हो जाते हैं, फिर विधि-विधान एवं मन्त्र प्रकृया भी वैसा फल नहीं देती जैसी शरीर में पुष्ट देव-स्थिति होने पर दिया करती है। इसलिये देव उपासकों को इन्द्रिय-संयमी, सदाचारी, होना और आहार-विहार की शुद्धता का भी भरपूर ध्यान रखना आवश्यक है। साधक यदि अपने शरीर-देवताओं को परिपुष्ट रखे और श्रद्धा, विश्वास पूर्वक नियत विधि-विधान के साथ साधना करे तो देव वरदान का वही लाभ हो सकता है जो शास्त्रों में वर्णन किया गया है। गायत्री तपोभूमि, मथुरा } श्रीराम शर्मा आचार्य अषाढ़ सुदी ३०, सम्वत् २०१६
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १०८ उपनिषद् (साधना-खण्ड) —ॐ— योगचूड़ामण्युपनिषत् ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषद माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे अस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों, वाणी, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र बल और सब इन्द्रियां वृद्धि को प्राप्त हों । सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं। मुझसे ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे । उसमें रत हुये मुझको उपनिषद् धर्म की प्राप्ति हो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । योगचूड़ामणिं वक्ष्ये योगिनां हितकाम्यया । कैवल्यसिद्धिदं गूढं सेवितं योगवित्तमैः ॥१॥ आसनं प्राणसंरोध-प्रत्याहारश्च धारणा । ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥२॥
६८ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम् । षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपंचकम् ॥३॥ स्वदेहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत् । चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षडदलम् ॥४॥ नाभौ दशदलं पद्मं हृदयं द्वादशारकम् । षोडशारं विशुद्धाख्यं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ॥५॥ ॐ । योगियों की हित कामना से ‘योगचूडामणि’ उपनिषद् को कहता हूँ । यह कैवल्यपद और सिद्धियों का प्रदाता है और योगवेत्ताओं द्वारा सेवित ( अभ्यासित ) है ॥ १ ॥ योग के छः अङ्ग कहे गये हैं—आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । आसनों में प्रथम सिद्धासन है, दूसरा पद्मासन है । षट्चक्र, षोडश आधार और पाँच आकाशों को जो अपनी देह के भीतर नहीं देखता, उसको सिद्धि कहाँ हो सकती है ? इनमें आधार चक्र (मूलाधार) चार दल वाला है, स्वाधिष्ठान में छः दल हैं, नाभि में दश दल वाला और हृदय में बारह दल वाला पद्म है, फिर सोलह पंखुड़ियों वाला विशुद्ध चक्र है और भ्रुकुटियों के मध्य दो दल का चक्र है ॥२—५॥ सहस्रदलसंख्यातं ब्रह्मारन्ध्रे महापथि । आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥६॥ योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । कामाख्यं तु गुदस्थाने पङ्कजं तु चतुर्दलम् ॥७॥ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । तस्य मध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥८॥ नाभौ तु मणिवद्विम्बं यो जानाति स योगवित् । तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥९॥
योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ६६ त्रिकोणं तत्पुरं वन्हेरोधोमेढ्रात्प्रतिष्ठितम् । समाधौ परमं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् ॥१०॥ ब्रह्मरंध्र के महापथ में सहस्र दल-कमल है। प्रथम चक्र 'आधार' है और दूसरा स्वाधिष्ठान है। यह योनि स्थान में दोनों के मध्य में स्थित है और 'कामरूप' कहा जाता है। 'काम' नाम का चार दल का कमल गुदा स्थान में है। उसके मध्य में सिद्धों द्वारा बन्दना की गई 'काम' नाम की योनि है और उसके मध्य में पश्चिम की तरफ मुख वाला महालिङ्ग स्थित है ॥६-८॥ नाभि में मणि के समान आकार वाले (मणिपुर) को जो जानता है, वही योगी है। तप्त सुवर्ण के समान चमक वाला, विद्युत धारा के सदृश्य सुप्रकाशित, तीन कोण युक्त वह्नि का स्थान मेढ़ के नीचे स्थित है। वहां पर समाधि में विश्वतोमुख अनन्त परमज्योति दिखाई देती है ॥६-१०॥ तस्मिन्दृष्टे महायोगे यातायातो म विद्यते । सबशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम् ॥११॥ स्वाधिष्ठानाश्रयादस्मान्मेढ्रमेवाभिधीयते । तन्तुना मणिवत्प्रोतो योऽत्र कन्दः सुषुम्नया ॥१२॥ तन्नाभिमण्डले चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते ॥१३॥ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्वं न विन्दति । ऊर्ध्वं मेढ्रादधोनाभेः कन्दयोनिः खगाण्डवत्॥१४॥ तत्र नाड्यः समुत्पन्ना सप्तन्नाणिः द्विसप्ततिः । तेषु नाडीसहस्रे षुद्विसप्ततिरुदाहृता ॥१५॥ योगाभ्यास द्वारा उसे देख लेने पर आवागमन से छुटकारा हो जाता है। प्राण को 'स्व' कहा जाता है और वह स्वधिष्ठान के
७० ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आश्रय में रहता है । स्वाधिष्ठान के आश्रय में होने से उसे मेढ्र भी कहा जाता है । यही तागे में पिरोए हुये मणि के समान सुषुम्ना-नाड़ी का केन्द्र है ॥१२॥ नाभि-मण्डल में रहने वाला यह चक्र मणिपूरक कहा जाता है । इस बारह दल वाले और पाप-पुण्य से रहित चक्र में जब तक जीव तत्त्वज्ञान नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक उसे संसार में भ्रमण ही करना पड़ता है । मेढ्र से ऊपर और नाभि के नीचे वाले केन्द्र में पक्षी के अण्डे की आकार वाली योनि है । उसी स्थान से बहत्तर हजार नाड़ियां उत्पन्न हुई हैं, जिनमें से बहत्तर प्रधान कही गई हैं ॥१३—१५॥ प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दश स्मृताः । इडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयगा ॥१५॥ गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी । अलम्बुसा कुहूश्चैव शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥१६॥ एतन्नाडीमहाचक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा । इडा वामे स्थिता भागे दक्षिणे पिङ्गला स्थिता ॥१८॥ सुषुम्ना मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि । दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे तु दक्षिणे ॥१६॥ यशस्विनी वामकर्णे चानने चाप्यलम्बुसा । कुहूश्च लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने तु शङ्खिनी ॥२०॥ इनमें से भी दश प्राण वाहिनी नाड़ियाँ मुख्य मानी गई हैं— इडा, पिंगला और तीसरी सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्व।, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शंखिनी दसवीं है ॥१५—१७॥ नाडियों का यह महाचक्र योगियों के लिये सदैव ज्ञातव्य है । इनमें इडा बायीं तरफ और पिंगला दाहिनी तरफ रहती है । इन दोनों के मध्य में सुषुम्ना का स्थान है । गान्धारी बांएॅ नेत्र में, हस्तिजिह्व। बायें नेत्र में रहती है । पूषा दायें कान में और यशस्विनी बाँयें कान में Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
रहती है । अलम्बुसा मुख में कुहू लिगेन्द्रो में तथा शङ्खिनी मूल स्थान में है ॥ १८—२० ॥ एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ते नाडयः क्रमात् । इडापिङ्गलसौषुम्नाः प्राणमार्गे च संस्थिताः ॥२१॥ सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः । प्राणापानसमानाख्या व्यानोदानौ च वायवः ॥२२॥ नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनंजयः । हृदि प्राणः स्थिती नित्यमपानो गुदमण्डले ॥२३॥ समानो नाभि देशे तु उदानः कण्ठमध्यगः । व्यानः सर्वशरीरे तु प्रधानाः पञ्च वायवः ॥२४॥ उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तथा । कृकरः क्षुत्करो ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ॥२५॥ इस प्रकार क्रम से शरीर के विभिन्न द्वारों में एक-एक करके समस्त नाड़ियाँ स्थित हैं और इडा, पिंगला, सुषुम्ना प्राण-मार्ग में स्थित रहती है ॥२१॥ सोम ( चन्द्र ) सूर्य और अग्नि देवता प्राण को सदैव गतिमान रखते हैं । प्राण, अपान, समान व्यान, उदान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय से वायु तथा उपवायु हैं । इनमें प्राण, वायु हृदय में स्थित रहता है और अपान गुदा स्थान में । समान नाभि देश में, उदान कण्ठ में, व्यान सर्व शरीर में—ये पाँचों प्रधान वायु हैं ॥२२—२४॥ उद्गार (डकार) में नाग, उन्मीलन (पलक बन्द करना) में कूर्म, छींकने में कृकर, जँभाई लेने में देवदत्त को जानना चाहिये ॥२५॥ न जहाति मृतं वापि सर्वव्यापी धनंजय । एते नाडीषु सर्वासु भ्रमन्ते जीवजन्तवः ॥२६॥ आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलित कन्दुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तया जीवो न तिष्ठति ॥२७॥
७२ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च धावति । वामदक्षिणमार्गाभ्यां चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥२८॥ रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः । गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कर्षति ॥२९॥ प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च गच्छति । अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपानेन कर्षति ॥ ऊर्ध्वाधःसंस्थितावेतौ यो जानाति स योगवित् ॥३०॥ धनंजय वायु ऐसा सर्वव्यापी है कि मृत्यु के पश्चात् भी नहीं छोड़ता । इन समस्त नाड़ियों में जीव भ्रमण करता रहता है ॥२६॥ जिस प्रकार हाथ से फेंकी हुई गेंद इधर-उधर जाती रहती है, उसी प्रकार प्राण भी प्राण और अपान वायुओं के वेग से स्थिर नहीं रह पाता ॥२७॥ प्राण और वायुओं के वशीभूत होकर जीव ऊपर और नीचे दौड़ता रहता है और वाम तथा दक्षिण मार्गों से भी आता जाता है, पर गति में अधिक शीघ्रता होने से वह दिखाई नहीं देता ॥२८॥ जिस प्रकार रस्सी से बँधा हुआ श्येन (पक्षी) जाता है और पुनः खींच लिया जाता है, उसी प्रकार गुणों के बन्धन में पड़ा जीव प्राण और अपान वायुओं से खींचा जाता है ॥२९॥ प्राण और अपान की शक्ति से जीव निरन्तर ऊपर नीचे आता जाता है । अपान प्राण को खींचता है और प्राण अपान को खींचता है । जो योगवित् है वह इनके ऊपर नीचे जाने को समझता है ॥३०॥ हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥३१॥ हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्रण्येकविंशतिः ॥३२॥ एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ७३ अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥३३॥ अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते । अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जयः ॥३४ अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति । कुण्डलिन्यां समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी ॥ प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स वेदवित् ॥३५ यह जीव ( प्राणवायु ) 'ह'कार ध्वनि से बाहर आता है और 'स'कार ध्वनि से भीतर जाता है और इस प्रकार वह सदैव 'हंस-हंस' मन्त्र का जप करता रहता है ॥ ३१ ॥ इस तरह एक दिन रात्रि में जीव इक्कीस हजार छः सौ मन्त्र सदैव जपता है ॥ ३२ ॥ इसका नाम 'अजपा गायत्री' है, जो योगियों के लिए मोक्ष- प्रदायक है, इसके संकल्पमात्र से सब पापों से छुटकारा मिल जाता है ॥ ३३ ॥ न इसके समान कोई विद्या है, न इसके समान कोई जप है और न इसके समान कोई ज्ञान भूत या भविष्यत काल में हो सकता है ॥ ३४ ॥ कुण्डलिनी में उत्पन्न हुई यह गायत्री प्राण- धारिणी प्राणविद्या और महाविद्या है, जो इसको जानता है वही वेदज्ञ है ॥३५॥ कन्दोर्ध्वे कुण्डलीशक्तिरष्टधा कुण्डलाकृतिः ॥३६ ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति । येन द्वारेण गन्तव्यं ब्रह्मद्वारमनामयम् ॥३७ मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी । प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ॥३८ सूचीवद्गात्रमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया । उद्घाटयेत्कवाटं तु यथा कुञ्चिकया गृहम् । कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं प्रभेदयेत् ॥३९
७४ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बद्ध्वाऽथ पद्मासनं गाढं वक्षसि संनिधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेष्टितम् । वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चरयेत्पूरितं मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभावान्नरः ॥४० कन्द के ऊर्ध्वभाग में कुण्डलिनी शक्ति आठ कुण्डलों में व्यास है और वह वहीं पर ब्रह्मद्वार को ढककर सदैव स्थित रहती है ॥ ३६ ॥ जिस ब्रह्मद्वार से निष्पाप होकर जाना पड़ता है, उसी द्वार को मुख से ढककर यह परमेश्वरी शक्ति सोई हुई है ॥ ३७ ॥ वह्नियोग से जागृत होकर मन और प्राण सहित वह सुषुम्ना में होकर सुई के समान ऊपर की ओर चलती है ॥ ३८ ॥ जैसे घर के द्वार को कुञ्जी द्वारा खोलते हैं, उसी प्रकार योगी कुण्डलिनी शक्ति द्वारा मोक्ष के द्वार का भेदन करे ॥ ३६ ॥ हाथों को संपुटित करके, पद्मासन को दृढ़तापूर्वक लगाकर, ठोड़ी को छाती पर लगाकर, ब्रह्म का ध्यान करते हुए बारम्बार वायु को ऊपर खींचे और फिर बाहर निकाल दे । इस प्रकार करने से मनुष्य को विशेष शक्ति का अनुभव होता है ॥४०॥ अंगानां मर्दनं कृत्वा श्रमसंजातवारिणा । कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥४१ ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः । अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥४२ सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशावशेषितः । भुज्यते शिव संप्रीत्या मिताहारी स उच्यते ॥४३ कन्दोर्ध्वं कुण्डलीशक्तिरष्टधा कुण्डलाकृतिः । बन्धनाय च मूढानां योगिनां मोक्षदा सदा ॥४४ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ७५ महामुद्रा नभोमुद्रा ओड्ड्याणं च जलन्धरम् । मूलबन्धं च यो वेत्ति स योगी मुक्तिभाजनम् ॥४५ इस अभ्यास में श्रम होने से जो पसीना निकले उसको शरीर में ही मर्दन कर लेना चाहिये, भोजन में कटु, खट्टे, नमकीन पदार्थों का त्याग करके दूध का आहार विशेष रूप से करना उचित है ॥४१॥ जो योगी ब्रह्मचारी, मिताहार करने वाला और योग-परायण होगा, वह एक वर्ष में सिद्धि प्राप्त कर सकेगा इसमें सन्देह नहीं ॥४२॥ उसे स्निग्ध और मधुर आहार करना चाहिये और उदर का चौथाई भाग खाली रखना चाहिये । जो भगवान का ध्यान रखते हुये भोजन करता है वह मिताहारी कहा जाता है ॥४३॥ कन्द के ऊर्ध्वभाग में जो आठ कुण्डलों युक्त कुण्डलिनी शक्ति है वह मूढ़ जनों के लिये बन्धन रूप और योगियों के लिए सदैव मोक्ष प्रदायिका है ॥४४॥ जो योगि महा मुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डियाण, जलंधर-बन्ध और मूलबन्ध को जानता है वह मुक्तिभाजन होता है ॥४५॥ पाष्णिघातेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्दृढम् । अपानमूर्ध्व माकृष्य मूलबन्धो यमच्यते ॥४६ अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः । युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् ॥४७ ओड्ड्याणं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः । ओड्ड्याणं तदेव स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥४८ उदरात्पश्चिमं ताणमधोनाभिर्निगद्यते । ओड्याणमुदरे बन्धस्तत्र बन्धो विधीयते ॥४९ बध्नाति हि शिरोजातमधोगामि नभोजलम् । ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः ॥५०
७६ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् ऐड़ी से दृढ़तापूर्वक दबाकर योनि स्थान को दृढ़ रूप से संकुचित करे तथा अपान वायु को ऊपर की तरफ आकर्षित करे तो यह मूलबन्ध कहलाता है ॥४६॥ इससे अपान और प्राण-वायु एक हो जाते हैं और मूत्र तथा मल घट जाता है। जो व्यक्ति सदैव इस बन्ध का अभ्यास करता है वह वृद्ध होने पर भी युवा हो जाता है ॥४७॥ जिस प्रकार एक महापक्षी विश्रान्ति के लिए उड्डियाण करता है, उसी प्रकार उड्डियाण अभ्यास मृत्यु रूपी हाथी के लिये सिंह के समान ही है ॥४८॥ उदर से नाभि के नीचे तानना पश्चिमतान कहा जाता है। उड्डियाण बन्ध भी उदर में होता है ओर इसको वहीं किया जाता है ॥४६॥ जो नीचे की तरफ जाने वाले आकाश और जलतत्व को शिर में ही स्थिर रखता है, ऐसा जालन्धर बंध दुःख और कष्ट समूह का नाश करने वाला है ॥५०॥ जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठ दुःखौघनाशने । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति ॥५१ कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा । भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥५२ न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा । न च मूर्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥५३ पीड्यते न च रोगेण लिप्यते न स कर्मभिः । बध्यते न च केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥५४ चितं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे यतः । तेनेयं खेचरी मुद्रा सर्वसिद्धनमस्कृता ॥५५ जालन्धर बन्ध के करने में जो कंठ का संकोचन किया जाता है, उससे अमृत अग्नि में नहीं पड़ता और वायु भी नहीं दौड़ता (अर्थात् स्थिर हो जाता है ) ॥५१॥ जिह्वा को लौटकर कपाल Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
कुहर में प्रविष्ट करने और दोनों भौंहों के बीच दृष्टि स्थिर करने से खेचरी मुद्रा होती है ॥५२॥ इसका साधन करने से न रोग, न मरण न भूख और न क्षुधा का भय रहता है । जो खेचरी मुद्रा को जानता है उसे मूर्च्छा भी नहीं होती ॥५३॥ वह रोग से कभी पीड़ित नहीं होता और न कर्मों में लिप्त होता है । जो खेचरी को जानता है उसे कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता ॥५४॥ जिस खेचरी मुद्रा के साधन से चित्त आकाश में विचरण करता है और जिह्वा भी आकाश में विचरण करती है, उसको सिद्ध नमस्कार करते हैं ॥५५॥ बिन्दूमूलशरीराणि सिरा यत्र प्रतिष्ठिताः । भावयन्ति शरीराणि आपादतलमस्तकम् ॥५६ खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लम्बिकोर्ध्वतः । न तस्य क्षीयते बिन्दुः कामिन्यालिङ्गितस्य च ॥५७ यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः । यावद्बद्धा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति ॥५८ ज्वलितोऽपि यथा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम् । व्रजत्यूर्ध्वं गतः शक्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया ॥५९ स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा । पाण्डरं शुक्लमृत्याहुर्लोहिताख्यं महारजः ॥६० पैर से लेकर शिर तक के समस्त अङ्गों का पोषण करने वाली शिराओं का आधार बिन्दु है ॥५६॥ जिससे खेचरी मुद्रा द्वारा जिह्वा के ऊपर विवर (कपाल कुहर) को बन्दकर लिया है, उसका बिन्दु (वीर्य) फिर किसी तरह नष्ट नहीं हो सकता, रमणी के आलिंगन का भी उस पर प्रभाव नहीं पड़ता ॥५७। जब तक देह में वीर्य स्थित है तब तक मृत्यु का क्या भय है ? और जब तक खेचरी मुद्रा बाँधी हुई है तब तक बिन्दु नहीं जाता ॥५८॥ यदि बिन्दु निकलकर अग्नितत्त्व को प्राप्त हो
७८ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् जाए, तो भी योनि मुद्रा द्वारा शक्तिपूर्वक उसे रोक कर ऊर्ध्वगामी किया जा सकता है ॥५९॥ यह बिन्दु दो प्रकार का होता है, एक सफेद और दूसरा लाल, सफेद का नाम शुक्ल और लाल का नाम महाराज कहा जाता है ॥६०॥ सिन्दूरव्रातसंकाशं रविस्थानस्थितं रजः । शशिस्थानस्थितं शुक्लं तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ॥६१ बिन्दुब्रह्मा रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः । उभयोः सङ्गमादेव प्राप्यते परमं पदम् ॥६२ वायुना शक्तिचालेन प्रेरितं च यथा रजः । याति बिन्दुः सदैकत्वं भवेद्दिव्यवपुस्तदा ॥६३ शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्यसमन्वितम् । तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगवित् ॥६४ शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रसूर्ययोः । रसानां शोषणं चैव महामुद्राऽभिधीयते ॥६५ रज का स्थान सिन्दूर के समान चमकने वाला रवि-स्थान है और शुक्र का चन्द्र स्थान है, इन दोनों का संयोग होना बड़ा कठिन होता है ॥६१॥ बिन्दु ब्रह्मा है और रज शक्ति है, विन्दु चन्द्रमा रूप है तथा रज सूर्य रूप है इन दोनों के संगम से परम पद की प्राप्ति होती है ॥६२॥ जब वायु द्वारा चालित रज बिन्दु से मिलकर एक हो जाता है तब देह दिव्य हो जाती है ॥६३॥ शुक्ल चन्द्र से और रज सूर्य से संयुक्त है, जो इनकी एकता को, विषय को समझता है वह योग को जानने वाला है ॥ ६४ ॥ अब महामुद्रा को बतलाते हैं, जिससे नाड़ी जाल का शोधन, चन्द्र सूर्य का चलाना और रस का सुखाना होता है ।। ६५ ।।
योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ७६ वक्षोन्यस्तहनुः प्रपीड्य सुचिरं योनिं च वामाङ्घ्रिणा हस्ताभ्यामनुधारयन्प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम् । आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बद्ध्वा शनै रेचये— देतद्व्याधिविनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां प्रोच्यते ॥६६ चन्द्रांशेन समभ्यस्य सूर्यांशेनाभ्यसेत्पुनः । या तुल्या तु भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥६७ नहि पथ्यमपथ्यं वा रसा सर्वेऽपि नीरसाः । अतिभुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यते ॥३८ क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः । तस्य रोगाः क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत् ॥६९ कथितयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् । गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥७० ठोड़ी को छाती पर रखकर, बाँये पैर से योनि स्थान को देर तक दबाकर, दांये पैर को सीधा फैला दोनों हाथों से भली प्रकार पकड़े । तब दोनों कुक्षियों ( बगलों ) में श्वास भरे और फिर धीरे- धीरे उसका रेचन करे, यह सब प्रकार की व्याधियों को नष्ट करने वाली महामुद्रा कही जाती है ॥ ६६ ॥ पहले चन्द्र अंश ( बांयी नासिका ) से अभ्यास करे फिर सूर्य अंश ( दांयी नासिका ) से अभ्यास करे । जब दोनों की संख्या समान हो जाय तब अभ्यास का बन्द करदे ॥ ६७ ॥ इस मुद्रा के प्रभाव से पथ्य-अपथ्य ही नहीं, सब प्रकार का नीरस भोजन भी रसवान बन जाता है, अधिक खाया हुआ और तीव्र विष भी अमृत के समान पच जाता है ॥ ६८ ॥ क्षय, कोढ़, गुदावर्त ( भगन्दर ) गुल्म, अजीर्ण और आगे होने वाले समस्त रोग महामुद्रा के अभ्यास से शमन हो जाते हैं ॥ ६९ ॥ मनुष्यों को महासिद्धि देने वाली जो यह महामुद्रा यहाँ बताई गई है,