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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पर हमला करने के लिए और अंबाला में सेना की कमी को पूरी करने के लिए पंजाब से लश्कर भेजना प्रारंभ किया। इस सहायता की पहली खेप डॉली के अधीन भेजी गइ गाइड कोर रेजिमेंट थी। जॉन लॉरेंस का डॉली की बहादुरी पर बहुत विश्वास था और इसीलिए दिल्ली पर चढ़ाई करने के लिए उसने उसी को चुनां डॉली अपनी रेजिमेंट लेकर मंजिल-दर-मंजिल दिल्ली की ओर बढ़ा और बुंदेल की सराय की लड़ाई के दूसरे दिन वहां की अंग्रेजी सेना से आकर मिल गया। दिल्ली के घेरे में अब दो नेटिव रेजिमेंट हो गई थी-एक गुरखों की रीड के अधीन और दूसरी डॉली के अधीन पंजाब से आई हुई। इन दोनों रेजिमेंटों पर अंग्रेजों की बड़ी कृपा थी और वह अनुचित थी, यह कौन कहे? इन नेटिव रेजिमेंटों ने उस कृपा के बदले वैसा ही देशद्रोह किया था। डॉली की रेजिमेंट के दिल्ली की ओर रवाना होने के बाद सर जॉन लॉरेंस ने पंजाब की कुल परिस्थिति का सूक्ष्म निरिक्षण किया। उस प्रदेश में हिंदू, सिख और मुसलमानों का आपस में अखंड द्वेष शुरू था। उत्तर हिंदुस्थान में हिंदू और मुसलमान दोनों को ही स्वदेशाभिमान का जैसा चैतन्य मिला हुआ था वैसा पंजाब के लोगों को उस समय मिला नहीं था। वास्तव में उनकी स्वतंत्रता गए दस वर्ष भी नहीं हुए थे। अंग्रेजों के कंठनाल पर सन् 1949 में जो सिख सिपाही कुल्हाड़ी चला रहे थे वे ही 1857 में उनके गले क्यों लगे क्यों लगने लगे, इस विलक्षण कूट प्रश्न का खुलासा इसी बात में होनेवाला है कि उनकी स्वतंत्रता जाते-न-जाते ही सन् 1857 की क्रांति आ गई थी। मुसलमानों की परतंत्रता पर जिस शूर और स्वाभिमानी जाति को इतना गुस्सा आया था कि सौ वर्ष तक अखंड लड़ाई कर अंत में पंजाब को स्वतंत्र किए बिना उन्होंने तलवार नीचे नहीं रखी, उसी 'खालसा' पंथ के अनुयायियों ने अंग्रेजों की गुलामी को इतना चाहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं है। पर अंग्रेजों का राज गुलामी है या नहीं, यह उन सिपाहियों की बुद्धि में पूर्णता से आ भी नहीं पाया कि सन् 18567 आ गया। अंग्रेजों का राज हिंदुस्थान पर ऐसे ही समय आया जिस समय हिंदुस्थान में एक ऐतिहासिक जल प्रलय शुरू हो गया था। अनेक सदियों के बाद स्थान-स्थान पर अलग-अलग जमा जलसर अपने-अपने अपेक्षित बांधों को फोड़कर एक प्रचंड महानदी में विलीन हो रहे थे। यह महानदी थी हिंदुस्थान की एकराष्ट्रीय प्रवत्ति। आज विश्व में जो-जो राष्ट्र एकीकृत और संगठित हुए हैं उन सबको वह एकीकृत अस्तित्व आने के पहले, और आने के लिए ही ऐसी अराजकता और गृह कलह की अग्नि में पिघलना पड़ा था। इटली का गृहयुद्ध, जर्मनी का गृहयुद्ध-उनमें उनके विभिन्न प्रांतों और विविध जातियों की कड़ी शत्रुता और प्रतिशोध लेने के लिए एक-दूसरे पर किए गए अत्याचार-आदि की ओर देखें तो ऐसा लगता है जैसे हिंदुस्थान का यह गृहयुद्ध कुछ भी नहीं था। परंतु उपर्युक्त देशों को गृह कलह की भयानक आग में तथा 1857 का स्वातंत्र्य समर - 127

गुलामीगिरी की अत्यंत तीव्र उष्णता में पिघलना पड़ा, इसीलिए आज उनका एक संगठित सुंदर और सबल व्यक्तित्व बना है, यह भी कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। वैसी ही ऐतिहासिक उत्क्रांति से भारतभूमि की घटना गुजर रही थी। गुलामी की आंच हिंदुस्थानी लोगों को अच्छी तरह लग जाने से वे संगठित होने लगे थे। परंतु पंजाब को यह गुलामगिरी की आंच पूरी तरह लगने में दस वर्ष की अवधिंक कम थी और इसीलिए विशेषतः सिख सन् 1857 के उबलते राष्ट्र-तेज में विलीन न हो सके थे। 59 पंजाब के अंग्रेज अधिकारियों के ध्यान में यह सत्य आ गया था और इसीलिए उन्होंने सिखों और जाटों में मुसलमानों के प्रति द्वेष अधिक-से-अधिक भड़का देने का कार्य शुरू किया। सिख लोगों में मान्य एक पुराने भविष्य कथन का उन्हें स्मरण कराया गया। पहले मुगल बादशाह ने जहां अपने गुरु को मार डाला था उसी दिल्ली पर 'खालसा साहब' एक बार हमला कर उसे धूल में मिला देनेवाले हैं, ऐसा भविष्य संदेश हर सिख को दिया गया था। उस भविष्य कथन की पूर्णता का 'कंपनी साहब' को क्या लाभ? बहादुरशाह के स्थान पर कोई रणजीत सिंह दिल्ली पर राज्य करने लगेगा? हिंदुस्थान में रणजीत सिंह और बहादुरशाह दोनों ही न हों, इस हेतु जो प्रयास कर रहे थे उनको एकांगी भविष्य में कुछ संशोधन करना आवश्यक और सहज था। संशोधन करके जारी किए गए भविष्य के नए संस्करण में ऐसा लिखा हुआ था कि दिलली मिट्टी में तब ही मिलेगी जब खालसा साहब और कंपनी साहब एक होंगे। भविष्य तो भविष्य ही है। एक बात बुरी है, वह यह कि आज के भविष्य कल भूत हो जाते हैं। पर कम-से-कम आज जितना हो सके उतना लाभ ले लेना बुद्धिमानी है। इस भविष्य के अतिरिक्त सिख लोगों में दिल्ली के प्रति अधिक गुस्सा दिलाने के लिए एक झूठी घोषणा की गइ कि दिल्ली में बादशाह ने यह आदेश जारी किया है कि 'सारे सिखों को एक साथ कत्ल किया जाए!' अरे रे! बेचारा गरीब बादशाह!! इसी समय वह दिल्ली की सड़कों पर स्वयं घूम-घूमकर यह कह रहा था कि यह युद्ध केवल फिरंगियों के विरूद्ध है, अतः स्वदेशी लोगों को खरोंच तक न लगने दी जाए। परंतु क्रांतिकारियों के बहुत जोर लगाने पर भी सिख अंग्रेजों की ओर ही रहे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 128 59 1. सर जॉन लॉरेंस ने अपने 21 अक्तूबर, 1857 को लिखे गए एक पत्र में लिखा था-“यदि सिख हमारे विरूद्ध क्रांतिकारियों के साथ मिल जाते तो हमारी रक्षा करना मानवी शक्ति से परे था। किसी को यह आशा नहीं थी, न ही कोई यह कल्पना ही कर पाया था कि अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता को हड़पनेवालों से प्रतिशोध लेने का अवसर ये लोग गंवा देंगे और इस लोभ का संवरण कर लेंगे।।” 2. मेटकॉफ कृत-‘टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी’।

पंजाब में जहां-जहां सेना की रेजिमेंट थीं वे अधिकतर हिंदुस्थानी लोगों की थी। इस कारण उन सबने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए कमर कसी हुई थी और वे अपने नियत संकेत-समय की प्रतीक्षा में रूके थे। केवल हिंदुस्थानी सिपाही ही पंजाब में स्वातंत्र्य को ललचाए थे, ऐसा बिल्कुल नहीं था; लश्कर के बाहर हर तरह के व्यवसायी नागरिक भी राज्य क्रांति के ‘बीज’ यहां-वहां छितराए हुए थे। मियां मीर के सिपाहियों को निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किले यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी सुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किसी यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी असुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने का विचार त्यागकर तथा उनको केवल अलग-अलग रखने का निर्णय लेकर उनमें से एक पलटन को शहर के बाजार में से ले जाया गया। परंतु किस लेन-देन के लिए वह फिरोजपुर का बाजार से चले तो उन्हें दुकानदारों और दूसरे लोगों ने स्वराज्य की हवा बेचना प्रारंभ किया, जिससे बाजार से निकलते-निकलते सिपाहियों के मन की चंचलता नष्ट हो गई; दृढ़ निश्चय हो गया और 'हर-हर महादेव' की घोषणा हो गई। सिपाहियों के आक्रमण से गोला-बारूद का भंडार बचाना कठिन लगते ही उसे उड़ा देने के सिवाए अंग्रेजों का अन्य उपाय ही न रहा। बारूद का भंडार उड़ा देखकर स्वराज्य का निशान जिस दिल्ली की प्राचीर पर स्वदेश वीरों को बुला रहा था उस प्राचीर की ओर सिपाही दौड़ चले। इसी समय फिरोजपुर शहर भी विद्रोही हो गया और यूरोपियन लोगों के बंगले, तंबू, भोजनालय, प्रोस्टेंट चर्च कैथोलिक चर्च जलाते, गिराते, लूटते, नष्ट करते लोग यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन पहले ही बैरकों के पीछे जाकर सुरक्षित बैठे थे। सिपाहियों का पीछा करने जो अंग्रेजी सेना भेजी गई थी वह, जो सामने आया उसे मारते और अपनी क्रूरता पर घमंड करते हुए लौट आई। पंजाब में अंग्रेजों की सत्ता को जैसे अंदरूनी असंतोष का डर था वैसे ही उसे सरहद पार के अफगानी डकैतों का भी डर था। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की गुप्त चर्चा के समय लखनऊ की गुप्त समिति ने काबुल के अमीर की सहायता मांगने का प्रयास किया था। क्योंकि सन् 1856 के अगस्त माह में मि. फारसिथ के हाथ एक पत्र पड़ा था जिसमें यह स्पष्ट लिखा था- “लखनऊ के मुसलमानों ने अमीर दोस्त मोहम्मद से संबंध जोड़े हैं। अवध का राज्य अधिगृहीत हो गया है और अब हैदराबाद पर एक 1857 का स्वातंत्र्य समर - 129

कुल्हाड़ी चलते ही मुसलमानी सत्ता का नाम भी फिर से सुनाई न देगा। इसका समय पर ही कुछ उपचार करना होगा। यदि लखनऊ के इस प्रश्न का उस राजनितिपटु अमीर ने अस्पष्ट उत्तर दिया-‘‘जो होगा, देख लेंगे।‘’ परंतु काबुल के अमीर से अंग्रेजों का हाल ही में समझौता हो जाने के कारण उन्हें अमीर से अधिक पेशावर के नजदीक की स्वतंत्र मुसलमान जमातों से अधिक डर था और मुसलमानी जमातों में कोई अंग्रेजों से मिल न जाए, यह उपदेश करते सैकड़ों मुल्ला यात्रा पर निकले थे। पेशावर में इस समय जो अंग्रेज अधिकारी थे वे सारे ही साहसी, राजनीतिपटु और युद्ध-विशारद थे, इसमें कोई शंका नहीं। निकल्सन, एडवर्ड्स, चेंबरलेन आदि अधिकारियों के उत्साह के कारण और उन्हें जॉन लॉरेंस जैसे वरिष्ठ अधिकारी से प्राप्त अचूक सहायता के कारण पेशावर की ओर का यह संकट बड़े धैर्य से टाला गया। उन्होंने तत्काल ही जान लिया कि विद्रोह करना चाहनेवाली मुसलमान जमातों को किस तरह अपनी ओर करना चाहिए और धन का लालच मिलते ही वे सारे पहाड़ी लोग अंग्रेजी सेना में नौकरी पाने की जल्दी करने लगे। पहाड़ी लोगों को धनबल पर खरीदते ही जॉन लॉरेंस ने पंजाब में इधर-उधर सुलगते असंतोष को वहीं-का-वही दबा देने के लिए एक घुमंतू सेना का निर्माण किया। इस सेना में अनुभवी, कसे हुए, जिनकी ईमानदारी पर अंग्रेजों को पूरा विश्वास था, ऐसे नेटिव सिपाही एवं अंग्रेज सोल्जर लिये जाते। इस`सेना का गठन होते-होते ही उसके लिए एक काम तैयार हो गया, क्योंकि पेशावर की ओर के भारतीय सिपाहियों में मियां मीर की निःशस्त्रता की घटना का समाचार पहुंचते ही बडी खलबली मच गई थी, इसलिए इस भारतीय सेना पर स्वयं पहली चोट करने की योजना पेशावर के साहसी अंग्रेज अधिकारियों ने बनाई और वे इस सारी सेना को निःशस्त्र करने को तैयार हो गए। परंतु उस भारतीय सेना के अंग्रेज कमांडर आदि अधिकारियों को अपने सिपाहियों का यह अमपान बहुत बुरा लगा। सन् 1857 में जो एक विलक्षण गुप्तता चारों ओर रखी गई थी उसी के जाल में फंसे ये अंग्रेज अधिकारी यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं थे कि उनके अधीनस्थ सिपाही विद्रोह पर उतारू हैं। फिर भी कॉटन और निकल्सन ने इस नेटिव सिपाहियों को 21 मई को सुबह के समय यूरोपियन सेना से घेरकर निःशस्त्र करने का आदेश दिया। इस अकस्मात् हुए हमले से बच पाना असंभव है, यह देखकर सारे सिपाहियों ने अपने हथियार नीचे रखे और यह अपमान भरा कृत्य देखकर क्रोधित उनके अंग्रेज अधिकारी भी अपने सिपाहियों के साथ कंपनी को धिक्कारने लगे। पेशावर की नेटिव सेना को निःशस्त्र करने के बाद पंजाब सरकार को होती-मर्दानी में रखी 55वीं नेटिव रेजिमेंट की ओर देखने की फुरसत मिली। यह 55वीं नेटिव 1857 का स्वातंत्र्य समर - 130

रेजिमेंट विद्रोही हो गई है, इस संबंध में सरकार को विश्वास हो गया था। परंतु उन सिपाहियों के मुख्य सैनिक अधिकारी कर्नल स्पॉटिस वुड को सरकार के इस संदेह पर बहुत खेद हुआ। हमारे सिपाही सरकार से कभी भी बेईमानी नहीं करेंगे, यह वह जी तोड़कर कहता रहा, फिर भी जब सरकार पर सवार खून नहीं उतरा तो उसका हृदय टूट गया। 24 मई को सिपाहियों के नेताओं ने कर्नल के पास आकर पूछा, "अंग्रेजी सेना पेशावर से हमपर हमला करने आ रही है, क्या यह समाचार सच है?" इस प्रश्न का कर्नल ने गोलमोल उत्तर दिया। सिपाहियों को उससे संतोष न होते हुए भी वे लौट गए। उस 55वीं नेटिव रेजिमेंट का पेशावर की सेना की तरह खात्मा करने के लिए अंग्रेजों सेना वास्तव में चढ़ी चली आ रही थी। वह दुष्टतापूर्ण कार्य देखते बैठने की अपेक्षा कर्नल स्पॉटिस वुड ने अपने कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। यह समाचार 55वीं रेजिमेंट को ज्ञात होते ही उसने खजाने पर हमला किया और अपने-अपने शस्त्र, निशान और वह खजाना लेकर वे सारे सिपाही फिरंगियों की गुलामी को लात-मारकर आगे चले। परंतु होती-मर्दान से दिल्ली कोई पास नहीं थी। सारा पंजाब यूरोपियनों की सुसज्ज सेना से अटा पड़ा था और यूरोपियन सेना पिछाड़ी पर टूटी पड़ रही थी। ऐसी स्थिति में सफलता इतनी कठिन थी कि पेशावर के सिपाहियों की तरह ही चुपचाप शस्त्र नीचे रखकर फिरंगियों की शरण जाने की बात भी उनके मन में आने लगी। परंतु अब फिरंगी दासता की बेड़ियां पैरों में डाल लेने की अपेक्षा यमपाश गले में डलवा लेना उन वीरों को पसंद आया और अपने पीछे लगी अंग्रेजी सेना को उसने यह बात कह दी कि - अब लड़ते-लड़ते प्राण दिए। इस 55वीं रेजिमेंट की कहानी भी इतनी हृदयद्रावक है कि उसे सुनने पर-'अपि ग्रावा रोदत्यपि दलति वज्रस्य हृदयम!' उनका पीछा करने के लिए निकल्सन इतना कठोर हो गया था कि वह चौबीस घंटे तक घोड़े से नीचे नहीं उतरा। सैंकड़ों लोग उस लड़ाई में मारे गए और शेष लड़ते-लड़ते सरहद के बाहर निकल गए। परंतु वहां भी उन्हें आश्रय कौन दें? वहां की मुसलमान जमातों ने उनका स्वागत बहुत ही भयंकर तरीके से किया। उनमें से हिंदुओं को अकेले-अकेले पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाने लगा। उनमें से हिंदुओं को अकेले-अकेले पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाने लगा। तब वे अभागे सिपाही यह सोचकर कि अपने हिंदुत्व की रक्षा करने में कश्मीर का हिंदू राजा समर्थ होगा, आश्रय पाने, धर्म-रक्षण करने एवं देश-सेवा करने गुलाब सिंह के प्रदेश की ओर चल पड़े। रास्ता पथरीला, वहां अन्न नहीं, वस्त्र नहीं, विश्राम नहीं-ऐसे संकटों और कठिनाइयों से जूझते वे सैकड़ों हिंदू सिपाही-अपने धर्म का आज तीनों लोकों में कोई त्राता नहीं, इस दुःख के अश्रु बहाते कश्मीर की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्हें चींटियों, कीड़ों की तरह मसल डालने को अंग्रेजों ने हर कदम 1857 का स्वातंत्र्य समर -131

पर तलवार चलाई। परंतु फिर भी अपने धर्म का त्राता कश्मीर में है, ऐसी उत्कट भावना से वे हजारों सिपाही कश्मीर की ओर बढ़ ही रहे थे। धर्म का त्राता! हाय!! यह ज्ञात होते ही ि कवे कश्मीर की ओर आ रहे हैं, वहां के राजा राजपूत कुलोत्पन्न गुलाब सिंह ने उन अनाथ हुए और धर्मरक्षा के लिए मृत्यु से भी बच निकलनेवाले हिंदू लोगों को अपने राज्य में प्रवेश करने से मना किया। इतना ही नहीं अपितू इन हिंदुओं में से जो कोई जहां कहीं भी मिल जाए उसे वहीं काट डालने का कड़ा आदेश अपने लश्कर को देकर उसने अपना यह 'सुकृत्य' अंग्रेजों के दरबार में बड़े गर्व से सूचित किया। अब या तो धर्मांतरण करना या फिर गुलामी स्वीकार करना या मृत्यु का आलिंगन करना, यही कुछ करना था उन्हें। इन तीनों में से उन हिंदू शूरों ने तीसरा रास्ता अपनाया। अंग्रेजों ने कदम-कदम पर निष्ठुरता से इतने कत्ल किए कि मैदानों में स्थित वध-स्तंभ निरपराध हिंदू रक्त से भीगकर सड़ने लगे। फिर भी अंग्रेजों को उस रक्तपात से घृणा नहीं हुई। वध-स्तंभ-स्थायी वध-स्तंभ-जब रात-दिन काम करते वधिक थक गए तब तोपों के मुंह खोले गए। और जिस 55वीं रेजिमेंट ने अंग्रेजों के रक्त की एक बूंद भी नहीं बहाई थी उसका हर सिपाही तोप से उड़ा दिया गया। एक हजार हिंदू चुटकी बजाते गारद कर दिए गए। परंतु उस अंतिम समय में भी उन हिंदू वीरों ने अपना वीरत्व नहीं त्यागा। क्योंकि फांसी या तोप के प्रश्न के उत्तर में वे अटल होकर उत्तर देते-“कुत्ते फांसी पर नहीं मरेंगे-हमें तो तोप से उड़ाया जाना ही इष्ट है।|”60 घोर जंगली आदमी से लज्जित हो जाए, ऐसी क्रूरता से उपर्युक्त शूरवीरों को काट डालने के लिए अंग्रेजी इतिहासकार कहते हैं-"यह दंड क्रूरतम था, इसमें कोई शंका नहीं; परंतु उस समय की क्रूरता ही सर्वकालीन भूतदया है। भूतदया के लिए ही वह क्रूरता करना इष्ट था।” अंग्रेजी इतिहासकारों, तुम अपने ये बोल ध्यान में रखना, अच्छा! “घड़ी भर की क्रूरता में सदैव के लिए मानवता का मंगल निहित था।” इस वाक्य का जो अर्थ तुम अभी कर रहे हो वैसा ही वह तुम्हें क्या और थोड़ी देर बाद भी स्मरण रहेगा? सार्वकालिक भूतदया के लिए यह तात्कालिक क्रूरता कर रहे हो वह तो ठीक है, पर उधर कानपुर में हिंदुओं का नाना साहब बैठा हुआ है, यह भी थोड़ा ध्यान में रखना। यहां एक बात और कहनी चाहिए कि क्रांतिकारियों द्वारा की गई मार-काट का वर्णन जो अंग्रेजी इतिहासकार कमाल की नाटकीयता से करते हैं वे ही (अंग्रेजी इतिहासकार) अंग्रेजों द्वारा किए गए अक्षम्य, अनन्वित एवं अमानुषिक अत्याचारों को जान-बूझकर छिपाने का प्रयास करने लगते हैं। उपर्युक्त दुर्दैवग्रस्त परंतु स्वाभिमानी रेजिमेंट का कत्लेआम जब चल रहा था तब उनके मृत्यु पूर्व तक अंग्रेजों के राक्षसी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 132 60 के द्वारा प्रस्तुत वृत्तांत।

विद्वेष ने उन्हें कैसी-कैसी यंत्रणाएं दी होंगी, वह केवल ईश्वर को ही ज्ञात होगा। क्योंकि उन भयानक कहानियों को इतिहास से पोंछ डालने के लिए अंग्रेजी इतिहासकारों ने उसका कोई संकेत भी अब रहने नहीं दिया है। स्वयं ‘के’, जो प्रमुख अंग्रेज लेखक है, कहता है-‘‘यद्यपि मेरे सामने अंग्रेजों द्वारा की गई भयंकर क्रूरतापूर्ण यंत्रणाओं के वर्णन के ढेर सारे पत्र पड़े हैं, फिर भी यह विषय फिर से विश्व के सामने न आ पाए, इसलिए मैं उस हेतु एक अक्षर भी नहीं लिखता।’’ ये हैं इतिहासकार! जिन लोगों ने दिल्ली के रास्ते पर गरीब और निरपराध ग्रामीणों के मुंह में मरने के पहले गाय का मांस ठूंसा, उन लोगों ने 55वीं रेजिमेंट के धर्मनिष्ठ सिपाहियों के मुंह में मरने के पहले गाय का मांस ठूंसा, उन लोगों ने 55वीं रेजिमेंट के धर्मनिष्ठ सिपाहियों के मुंह में गाय का मांस ठूसकर ही उन्हें तोप से उड़ाया होगा, इसमें शंका की गुंजाइश कहां। पेशावर की ओर ऐसी अमानवीय घटनाएं हो रही थी और इधर जालंधर की ओर विद्रोह की आग चेत रही थी। पंजाब में जॉन लॉरेंस नेटिव सिपाहियों को लगातार सपाटे से निःशस्त्र करता जा रहा था और उसी सपाटे में अब तक जालंधर और फिल्लौर भी पड़ जानेवाला था। परंतु फिल्लौर के नेटिव सिपाहियों ने जो आत्मसंयम और घटना चातुर्य दिखाया वह वास्तव में बड़ी चालाकी का था। पंजाब में सारे नेटिव सिपाहियों की जैसी एकदम उठने की तैयारी हुई थी वैसी ही जालंधर-दोआब में भी नेटिव सिपाहियों की जैसी एकदम उठने की तैयारी हुई थी वैसी ही जालंधर-दोआब में भी नेटिव सिपाहियों की थी। दिल्ली जीतते समय उस लड़ाई में घायल पड़े एक देशभक्त हवलदार ने स्पष्ट कहा है और सरकारी रिपोर्ट में यही मान्य है कि सारे जालंधर-दोआब भर में एकाएक विद्रोह करने का पक्का निर्णय हो चुका था। जालंधर की सेना ने एक टुकड़ी होशियारपुर भेजी और यह संदेश भी कि वहां 33वीं पैदल रेजिमेंट विद्रोह करे और वह न हो सके तो 33वीं पैदल रेजिमेंट वहीं रहे। (उसी तरह वे रहे भी) बाद में उन सब लोगों के फिल्लौर की ओर आते ही फिल्लौर की तीसरी रेजिमेंट विद्रोह करे और फिर सब मिलकर दिल्ली की ओर चलें। अन्य स्थानों पर भी ऐसी ही योजनाएं चल रही थीं। परंतु उसपर कार्यवाही का समय आने के पहले ही सब बात फूटने से अंग्रेज सावधान हो जाते। हां, फिल्लौर के रेजिमेंट ने अंत तक आश्चर्यजनक गोपनीयता बनाए रखी। दिल्ली के लिए जब सीजट्रेन ले जाई गई उस समय उसके टुकड़े कर देना। उनके हाथ में था। परंतु इससे सारी योजना ही न फूट जाए, इसलिए इस रेजिमेंट ने अंत तक ऊपरी शांति बनाए रखकर कमाल किया। आखिर में 9 जून को जालंधर की ओर पक्की सूचना दी गई-क्वींस रेजिमेंट के कर्नल के बंगले को आग लगाई गई। यह संकेत होते ही आधी रात को जालंधर के सिपाहियों का विद्रोह इतना अचूक और तेजी से हुआ कि उनकी कर्कश रणध्वनि होते ही अंग्रेजों का साहस टूट गया। अंग्रेज महिला, बच्चे, पुरूष अपनी-अपनी जान बचाने के लिए तेजी से भागने लगे। परंतु जालंधर के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 133

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में बाधा न बनने देकर यद्यपि अपनी रेजिमेंट पर सरकार खुश थी, तब भी मातृभूमि की स्वतंत्रता के युद्ध का शंखनाद होते ही उस उदात्त कर्तव्य पर उन्होंने कैसा आत्मार्पण किया, यह पूर्वोक्त वर्णन से स्पष्ट दृष्टिगत होता है। उस आधी रात को विद्रोह शुरू करने के पहले ह ीवह समाचार फिल्लौर के देशवीरों को बताने के लिए एक घुड़सवार दौड़ता गया था। जालंधर से स्वतंत्रता के इस दूत के आते ही फिल्लौर के सैनिकों ने विद्रोह किया। अब केवल जालंधर के लोगों के फिल्लौर पहुंचाने भर की देरी थी। पर अंग्रेजों के तोपखाने और घुड़सवारों को अनदेखा कर जालंधर से फिल्लौर आना कोई सरल काम नहीं था। परंतु अंग्रेजों में इतना गड़बड़ घोटाला फैल गया था और विद्रोहियों का नक्शा इतना सही था कि जालंधर के सारे सिपाही अपना अनुशासन बनाए हुए फिल्लौर पहुंच गए। अपने इन हजारों स्वदेश बंधुओं को अपनी ओर आते देखकर फिल्लौर पहुंच गए। अपने इन हजारों स्वदेश बंधुओं को अपनी ओर आते देखकर फिल्लौर के सिपाही प्रेम से उमड़ पड़े तथा अपनी लाइनें छोड़ भागकर आलिंगनबद्ध हुए और वह विशाल सेना स्वदेशी जमादारों, सूबेदारों की आज्ञा में दिल्ली की ओर चल पड़ी। रास्ते में एक नदी थी और उसके पर लुधियाना शहर था, जो उन देशवीरों की चरणधूलि की बाट जोह रहा था। लुधियाना शहर में उस दिन प्रातः ही अंग्रेज अधिकारियों के पास जालंधर विद्रोह का तार आ गया था। पर वह जब तक मिले तब तक उस शहर के सिपाहियों को कब्जे में रखने की सारी आशा नष्ट हो चुकी थी; क्योंकि यह तार आने के पहले ही अपने भाइयों के जालंधर छोड़कर निकल पड़ने का समाचार उन्हें मिल गया था। लुधियाना के अंग्रेज अधिकारियों ने फिल्लौर से आ रही सेना को दोनों शहरों के मध्य स्थित सतलुज नदी पर रोकने का निश्चय किया। उस नदी का नावोंवाला पुल तोड़कर यूरोपियन, सिख और नाभा द्वारा सहायता के लिए भेजा लश्कर-ये सब नदी किनारे की सुरक्षा करने लगे। क्रांतिकारियों को जब पुल तोड़े जाने का समाचार मिला तो वे वहां से चार मील दूर जाकर नदी के पर उतरने लगे। उनकी कुछ सेना नावों द्वारा उस पार हो गई थी, कुछ हो रही थी और कुछ किनारे पर ही खड़ी थी। यह अवसर उचित व अनुकूल समझकर अंग्रेजों और सिखों ने उन पर तोपखाने से हमला शुरू कर दिया। यह समय रात के दस बजे का था, इसलिए अंग्रेजों की सेना निकट ही है, इस बात का क्रांतिकारियों को अनुमान नहीं लग रहा था। उनकी तोपें भी अभी नदी पर नहीं हुई थीं। ऐसी कठिन परिस्थिति में फंसे उन क्रांतिकारियों पर तोपखाने के साथ अंग्रेज और सिख अचानक आ टूटे थे। परंतु उनके हमले का पहला जोर समाप्त होते ही सिपाहियों ने तनिक भी पीछे न हटते हुए उन पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। अंग्रेजी तोपों और सिखों की मार के सामने नदी उतरते वे बिखरे हुए सैनिक अडिग होकर लड़ रहे थे। इतने में अंग्रेज सेनापति विलियम के सीने में एक सिपाही की सनसनाती हुई गोली आ धंसी और वह 1857 का स्वातंत्र्य समर – 135

मरणासन्न हो गिर पड़ा। तभी उस भयंकर रणभूम में आधी रात का अंधियारा दूर करने और स्वतंत्रता-भक्तों के संतप्त सिरों पर शीतल चंद्रिका की वर्षा करने हेतु रजनीनाथ का आकाश में उदय हो गया था। इस चंद्र प्रकाश से क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की सारी व्यूह रचना समझ में आ गई और वे अपना स्थान छोड़कर अंग्रेजों पूरी शक्ति से टूट पड़े। इस अद्भूत आक्रमण के सामने अंग्रेजी सेना, सिख और अन्य राजनिष्ठ अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। अपनी इस आधी रात की विजय और जल्दी ही उदित उषःकाल की सुंदर प्रभा से और अधिक खिली वीरश्री से वे सारे क्रांतिकारी सैनिक दूसरे दिन दोपहर के लगभग लुधियाना शहर में घुसने लगे। लुधियाना में एक मौलवी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होकर स्वराज्य-संस्थापना करने के लिए लगातार उपदेश करता घूमता रहता था। उस मौलवी के प्रचार से लुधियाना शहर पंजाब में क्रांतिकारियों का एक सशक्त केंद्र बन गया था। गुलामी की बेडियां तोडने के लिए अंतिम चोट करने का समय आ गया है, ऐसी सूचना मिलते ही वह सारा शहर 'दीन' की गर्जना करता उठ खड़ा हुआ। सरकारी भंडार लूटे गए; येरोपियन चर्च, यूरोपियन के घर, अंग्रेजी अखबारों के छापाखाने-ऐसे सारे स्थान जलाकर खाक कर दिए गए और जब सिपाही अंदर घुसने लगे तो उन्हें साथ लेकर यूरोपियनों के प्रमुख स्थानों और विशेष रूप से सरकार के आगे दुम हिलानेवाले सारे नेटिव कुत्ते खोज निकालने के लिए नागरिकों में स्पर्धा शुरू हो गई। कारावास तोड़े गए। जो कुछ भी सरकारी था या जो कुछ अंग्रेजों का था वह वह अग्नि की भेंट न चढ़ पाया तो चूर-चूर कर दिया गया और इस तरह लुधियाना शहर विद्रोह की आग में जलने लगा। विद्रोहियों का दिल्ली जाना आवश्यक था; जबकि लुधियाना के किले पर रहकर पंजाब का वह नाका पकड़े रहना भी आत्यावश्यक था। यदि दिल्ली की भांत लुधियाना भी विद्रोह का केंद्र हो जाता तो उससे अंग्रेजी सत्ता को जोरदार धक्का लगा होता । हालांकि विद्रोही यह समझते नहीं थे, सिपाही; न उनका कोई सेनापति था, न ही कोई नेता। उनके पास यात्रा हेतु आवश्यक सामग्री भी नहीं थी। ऐसे समय में वहां कोई नाना साहब, खान बहादुर या मौलवी अहमद शाह होता तो उसने लुधियाना को कभी न छोड़ा होता। परंतु उन सबके न होने के कारण उन्हें दिल्ली की ओर जाने के सिवाय दूसरा मार्ग ही नहीं था और इसीलिए-स्वराज्य या गुलामी, इसका अंतिम निर्णय अब दिल्ली की प्राचीर पर ही होगा-ऐसी गर्जना करते हुए वे दिल्ली की ओर दिन-दहाड़े गाते-बजाते जा रहे थे, फिर भी उनका पीछा करने की किसी में हिम्मत नहीं थी। मेरठ के विद्रोह के कोई तीन हफ्ते बाद तक क्रांतिकारियों को जो शांति बनाए 1857 का स्वातंत्र्य समर – 136

रखना अनिवार्य हो गया था, उस शांति का लाभ अंग्रेजों ने पंजाब में पूरी तरह उठाया। पंजाब में यूरोपियन सेना अधिक होने के कारण वहां की नेटिव रेजिमेंटों को या तो निःशस्त्र करना या असमय और अपरिपक्व अवस्था में विद्रोह करने को बाध्य करके उनका सहज नाश करना बहुता ही सुलभ हो गया। राज्य क्रांति के पक्ष से सिख रियासतदार और अन्य सिख लोग मिलकर अपने से ही मिल रहे हैं, यह देखकर ही वे सरहद से सतलज तक पंजाब में जितने भी हिंदुस्थानी थे उन्हें वहां से भगाकर पंजाब में विद्रोह का बीज समाप्त कर सके। इस समय लश्कर में ही नहीं अपितु गांवों और शहरों में आराम से रह रहे हजारों हिंदुस्थानी लोग पंजाब से अंग्रेजों की इच्छा के कारण सीमा पार कराए गए और इस तरह पंजाब हाथ में आते ही वहां की यूरोपियन सेनाओं को दिल्ली की ओर तीव्रता से भेजा जाने लगा। पंजाब के अंग्रेजों के पूर्ण नियंत्रण में रहने के दो मुख्य कारण थे। एक तो यह कि सिखों ने अंग्रेजों का साथ दिया। इन लोगों ने उस समय केवल चुप्पी ही साध ली होती तो अंग्रेजों के हाथों में पंजाब एक दिन भी नहीं रह पाता। इन सिख लोगों को क्रांतिकारियों ने अपनी ओर करने के लिए प्रयास नहीं किए, ऐसा भी नहीं था। दिल्ली के स्वतंत्र होते ही बादशाह के एक 'ईमानदार सेवक' ने उन्हें पंजाब के सारे समाचार सूचित करने के लिए एक लंबा, विस्तृत एवं बहुत ही मार्मिक पत्र लिखा था। उसमें वह ईमानदार पत्र-लेखक ताजुद्दीन लिखता है-“पंजाब के सारे सिख सरदार कायर, डरपोक और हिंदुस्थानी लोगों का साथ न देकर फिरंगियों के कुत्ते बने हुए हैं। मैं स्वयं उनसे मिला, उनसे संवाद किया और उनको जी-जान से कहा कि फिरंगियों से मिलकर जो तुम देशद्रोह कर रहे हो वह किसलिए? स्वराज्य में तुम्हारा लाभ नहीं है? फिर अपने इस लाभ के लिए ही तुम्हें बादशाह से मिलना चाहिए। इसपर वे मेरे सामने कहते हैं-देखिए, हमस ब अवसर की प्रतीक्षा में हैं। दिल्ली के बादशाह का आदेश लेकर घुड़सवार सिख राजाओं के पास आए तब उन्होंने उन्हें मरवा दिया। पंजाब पर नियंत्रण रखना अंग्रजों को सुलभ हुआ, उसका यह पहला और विशेष कारण है। सिखों के इस विरोध की परवाह न कर पंजाब से अंग्रेजों को भगाना किसी तरह भी संभव नहीं, ऐसा नहीं था। अंग्रेज जिस विलक्षण ढीलेपन से मई माह तक रहते थे उस ढीलेपन का लाभ उठाकर पूर्व संकल्प के अनुसार सब ओर एक साथ विद्रोह हुआ होता तो सिखों पर भी क्रांतिकारियों का आतंक छाने से कम-से-कम उनमें फूट तो निश्चित ही पड़ जाती। विशेषकर पंजाब के नेटिव सिपाहियों को एक-एक कर पकड़कर अंग्रेज जिस तरह उन्हें नरम कर सके वैसा बिल्कुल नहीं हो पाता। पंजाब में स्वराज्य की इच्छा नहीं थी। ठाणेश्वर के ब्राह्मण, लुधियाना के मौलवी, फिरोजपुर के दुकानदार और पेशावर के मुसलमान-सभी 'स्वराज्य 1857 का स्वातंत्र्य समर – 137

और स्वधर्म के लिए जंगी जेहाद करो', ऐसा उपदेश देते हुए घूम रहे थे। उपर्युक्त पत्र लेखक भी लिखता है- "बादशाह के दरबार से यदि कोई सरदार सेना के साथ इधर भेजा जाए तो पंजाब चुटकी बजाते ही स्वतंत्र हो जाएगा। सारी हिंदुस्थानी सेना विद्रोह कर उनके झंडे के नीचे आ जाती और सिखों का भागना मुश्किल हो जाता। मेरा ऐसा विश्वास है कि सारे हिंदू और मुसलमान आपके भाग्यशाली सिंहासन का प्रेम मुजरा करेंगे। और यह भी कि जून माह में ही विद्रोह करना इष्ट है, क्योंकि अंग्रेज सोल्जरों को धूप की गरमी में लड़ना बहुत कठिन होता है। वे लड़ने के पहले ही चटाचट मरने लगते हैं। इसलिए पत्र देखते ही आप कोई सरदार पंजाब में भेजे। पंजाब के लोकमत का झुकाव दिल्ली की ओर होते हुए भी वह दिल्ली का लाभ नहीं ले सका, इसका कारण यह था कि दिल्ली में विद्रोह हो जाने के बाद तीन सप्ताह तक क्रांति की लहर का ठहरी रहना अपरिहार्य हो गया था। यही विद्रोह यदि पहले से निश्चित संकेतों के अनुसार एक सप्ताह में होता तो अंग्रेज कहीं भी हलचल नहीं कर सकते थे। पंजाब में अकेली एक-एक और अनाथ सेनाएं निःशस्त्र नहीं की जा सकती थीं। क्रांति की लहर निरंतर उबलने से सिखों जैसे अनिश्चित विचार के लोग भी उसमें बह सकते थे और प्रारंभ में ही विजय प्राप्त हो जाने पर जिनके मन क्रांति की ओर झुके हुए थे, पर क्रांति में सम्मिलित होने से डरते थे, उन्हें भी जोश आ जाता। सारांश यह है कि सिख लोगों के देशद्रोह के कारण और अधपकी स्थिति में अंग्रेजों ने इन तीन सप्ताहों में चारों ओर यथासंभव बंदोबस्त करके कलकत्ता से इलाहाबाद तक यूरोपियन सेनाओं का निरंतर प्रवाह चालू रखा था। बंबइ, मद्रास, राजपूताना और सिंध प्रांत में विद्रोह से सहानुभूति रखनेवाले कोई हैं या नहीं, इसकी बारीकी से जांच कर उनको पंजाब की भांति ही समय रहते पूरी तरह नष्ट कर डालने के प्रयास आरंभ हो गए थे। और इस अग्रिम सूचना के लिए ईश्वर का आभार मानते हुए अब विद्रोह की ज्वालाएं स्थान-स्थान पर समाप्त कर दी गई हैं, यह विश्वास भी उन्हें होने लगा। इन तीन हफ्तों में अंग्रेजों की कार्यवाहियों के चलते क्रांति पक्ष की ओर से इक्का-दुक्का विद्रोह को छोड़कर सब ओर यथासंभव गोपनीयता रखी गई थी। 30 मई तक दोनों पक्षों की ऐसी स्थिति थी। यह स्थिति मई की 30 तारीख के बाद किस तरह पलट गई, अंग्रेजों के मन में उत्पन्न होता विश्वास कैसे चकनाचूर हुआ और तीन हफ्तों में हुई हानि की परवाह न करते हुए क्रांति की ज्वालाएं कैसे एकाएक भड़क उठी, यह देखना आवश्यक है। राज्य क्रांतियां किसी सूत्रबद्ध नियम से नहीं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 138

चलतीं। राज्य क्रांति कोई घड़ी की तरह ठीक-ठीक चलनेवाला यंत्र नहीं है। राज्य क्रांतियां स्वैर संचारप्रिय होती हैं। उनपर सिद्धांतों का बंध नही रह सकता है, बाकी फुटकर नियम उनके अपूर्व धक्के से गिर जाते हैं। राज्य क्रांति का एक नियम है और वह यह कि उसकी पकड़ बनी रहनी चाहिए। मध्यांतर में चाहे नई और अकल्पित परिस्थितियां उत्पन्न हों, परंतु उनके कारण रूके बिना उन्हें एक तरफ करते हुए आगे बढ़ना होगा। राज्य क्रांति एक विचित्र पक्षी है, जो बहुत दिनों बाद पिंजरे से बाहर निकलने पर गंतव्य को जाने के पहले आकाश में देर तक उड़ान भरता है। जिसे उस गरूड़ जैसे पक्षी पर बैठकर इच्छित स्थान को पहुंचना हो वह उसकी पीठ पर अटल आसन लगाए। उड़ान भरकर उसकी मस्ती ठंडी हो जाने के बाद तक जो उसकी पीठ पर जमकर बैठा है उसी के पूरे नियंत्रण में वह आ जाता है। मेरठ के लोगों ने इस राज्य क्रांति के पंछी को पिंजरे से कुछ पहले ही उड़ा दिया था; फिर भी उससे न घबराए श्रीमंत नाना साहब, लखनऊ के मौलवी, झांसी की बिजली छबीली आदि धुरंधर उस्तादों ने उस पक्षी की कैसे पकड़ की, वह सब हे इतिहास! अब तू हमें बता। उस गरूड़ पक्षी को पकड़े रखने की दृढ़ता हिंद भूमि के सब हाथों में न होने के कारण वह गरूड़ आकाश में कैसे उड़ गया, हे इतिहास! यह तू हमें बता। तू हमारे साथ पहले वर्ग के स्तुति गीत गा और दूसरे वर्ग के लिए हमारे साथ-साथ आक्रोश करने लग! 1857 का स्वातंत्र्य समर – 139

प्रकरण-5 अलीगढ़ और नसीराबाद मेरठ में उत्पन्न भूकंप का धक्का जैसे ऊपर अंबाला और पंजाब की ओर सारा प्रदेश ध्वस्त कर रहा था वैसे ही उस भूकंप के धक्के की दूसरी लहर मेरठ के निचले प्रदेश की उस सारी भूमि को कंपित कर रही थी। दिल्ली के नीचे अलीगढ़ शहर में नौवीं नेटिव पैदल रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट को अलीगढ़ के मुख्य थाने के साथ-साथ मैनपुरी, इटावा और बुलंदशहर में भी रखा हुआ था। इस रेजिमेंट पर सरकार का इतना विश्वास था कि चाहे हिंदुस्थान के सारे सिपाही विद्रोह कर जाएं, फिर भी 9वीं रेजिमेंट राजनिष्ठ बनी रहेगी। बुलंदशहर के बाजार में राज्य क्रांति के गुप्त षड्यंत्र प्रारंभ होने का समाचार कानों में आ जाने के बाद भी इस क्रांति से 9वीं रेजिमेंट के सिपाही निश्चित ही अलग रहेंगे, ऐसा समझकर बुलंदशहर के अधिकारी सबकुछ सुरक्षित अनुभव करते रहे। मई माह के करीब बुलंदशहर के आसपास के गांवों ने अपने में से एक मानवीय, विश्वस्त एवं स्वातंत्र्य-प्रिय ब्राह्मण चुना और उसे तत्काल बुलंदशहर भेज दिया। एक ओर जिसकी राजनिष्ठा पर अंग्रेजों का अपना पूरा विश्वास है और दूसरी ओर जिसे मातृभूमि अपने अश्रुपूरित नेत्रों से अपलक देख रही है-ऐसी उस बुलंदशहर की सैनिक छावनी की ओर वह ब्राह्मण भयानक कल्पनाओं और अपने भावी यश-अपयश के बादलों से घिरा अपना हृदय लिए तेजी से जाने लगा। मातृभूमि की स्वतंत्रता और स्वधर्म की रक्षा के लिए क्या मेरे स्वदेश बंधु मेरा निवेदन मानेंगे? क्या स्वराज्य के उच्चतर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 140

वातावरण में उड़ान भरने में सक्षम पंख इन सैनिक बंधुओं के पास हैं? मेरे इस भविष्यवाद को धिक्कारकर गुलामी के अंधियारे के गह्वर में सोये सुंदर उषःकाल के दर्शन हेतु मैं उनकी उस नींद को भंग कर रहा हूं। इसलिए मेरे सिर पर ये देशबंधु आघात ही करेंगे! मनोविकारों की ऐसी उथल-पुथल हृदय में चलते हुए भी जिसके चेहरे पर मूर्त शांति विराजमान थी, ऐसा वह ब्राह्मण अपना विलक्षण संदेश लिये लश्कर में प्रवेश कर गया। उन सिपाहियों को दीक्षा देते हुए उसने कहा कि एक बड़ी सी बरात निकालकर उस हल्ले-गुल्ले में आप सब विद्रोह देते हुए उसने कहा कि एक बड़ी सी बरात निकालकर उस हल्ले-गुल्ले में आप सब विद्रोह करें और सारे अंग्रेजों को मौत के घाट उतारकर दिल्ली की ओर चलें। अंग्रेजों का राज्य उलटने के सिद्धांत का विरोधी कोई था ही नहीं; पर उसमें भी उस सिद्धांत को यथार्थ में कैसे बदला जाए, इस प्रश्न का हल भी सुनकर उसकी ग्राह्यता-अग्राह्यता पर विचार चल रहा था। तभी उस रेजिमेंट के तीन सिपाहियों ने अंग्रेजों को यह समाचार देकर उस ब्राह्मण को कैद कर लिया। तत्काल बुलंदशहर से उस ब्राह्मण को रेजिमेंट के मुख्य थाने की ओर रवाना किया गया और उन सब सिपाहियों के सामने फांसी पर लटकाने का दंड दिया गया। यह घटना जब अलीगढ़ में घटित हो रही थी, तभी इधर बुलंदशहर के उन तीन राजनिष्ठों पर सब ओर से थू-थू होने लगी। उनपर गालियों की बौछार करते हुए बुलंदशहर का सारा लश्कर अधिकारियों की अनुमति न लेते हुए जिस स्थान पर वह क्रांतिदूत ले जाया गया था, उस अलीगढ़ शहर की ओर चल दिया। दिनांक 20 मई की शाम को उस ब्राह्मण को फांसी दी गई। बगल में सारी रेजिमेंट खड़ी की गई थी। अब क्या करें? दिनांक 31 मई तक रुकें तो ब्राह्मण निकलता नहीं, निकल ही गया है और फांसी पर उसकी मृत देह प्रतिशोध का बीभत्स व्याख्यान देती लटकी हुई है। भयानक व्याख्यान! शब्द के स्थान पर जहां रक्त की धाराएं स्खलित बह रही हैं। उस भयानक वक्ता ने जीवित रहते जो व्याख्यान कभी न किया हो, वह आज फांसी पर लटके एक शब्द भी न बोलते हुए कर दिया था। क्योंकि आधे क्षण में ही उन असंख्य सिपाहियों की भीड़ में से उछलकर एक सिपाही आगे आया और अपनी तलवार उस फांसी पर लटकते ब्राह्मण की ओर करके चिल्लाया, “अरे यार, यह शहीद रक्त में नहा रहा है।“ बारूद के ढेर पर चढ़ी चिंगारी भी किंचित् देर से सुलगती, पर उस शूर सिपाही के मुंह से छूटी तेजस्वी चिंगारी को उन हजारों सिपाहियों के हृदय में घुसने में उतना भी समय नहीं लगा। उन्होंने अपनी तलवारें बाहर निकालीं और ‘फिरंगियों का नाश हो' की गर्जना करते क्रोध से पगलाए वे हजारों नाचने लगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह देखते ही अंग्रेज कर्मचारी भयभीत हो गये। राजनिष्ठ 9वीं रेजिमेंट विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं, उसने अंग्रेजों को सूचित किया कि अपने प्राण बचाने हों तो तत्काल अलीगढ़ छोड़ दें। इस उदारता का लाभ लेकर अलीगढ़ के सारे अंग्रेज अधिकारी, उनकी पत्नियां, बच्चे, लेडी आउटेरम आदि सारे-के-सारे अंग्रेज चुपचाप उस शहर से निकल गए। रात बारह बजे तक अलीगढ़ में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 141

अंग्रेजी सत्ता का नामोनिशान न रहा। अलीगढ़ स्वतंत्र हो जाने का समाचार 22 मई की शाम को मैनपुरी पहुंचा। मैनपुरी में 9वीं रेजिमेंट का कुछ हिस्सा रहता था, यह पहले ही बताया जा चुका है। उन सिपाहियों के मन में क्या था, यह अलीगढ़ की ओर से बंधुओं के समाचारों से स्पष्ट है। मई की 10 तारीख को मेरठ में क्रांति होने के बाद अंग्रेजों से लड़े सिपाही राजनाथ सिंह के अपने गांव जीवंती लौटने का समाचार मैनपुरी के अधिकारियों को मिलने पर उन्होंने अपनी 9वीं रेजिमेंट के कुछ सिपाहियों को उसे पकड़ने के लिए भेजा। परंतु उन सिपाहियों ने राजनाथ सिंह को पकड़ने की जगह सुरक्षा के साथ उसे जीवंती के बाहर पहुंचा दिया और अंग्रेजों को सूचना दी कि जीवंती में राजनाथ सिंह नाम का कोई व्यक्ति रहता ही नहीं। सिपाही रामदीन सिंह ने आदेश की अवहेलना की, इसलिए उसे कैद कर अंग्रेज अधिकारियों ने सिपाहियों के पहरे में अलीगढ़ भेज दिया। परंतु आधे रास्ते में आने के बाद पहरे के सिपाहियों ने रामदीन सिंह को मुक्त कर दिया। उन्होंने उसकी बेड़ियां काट डाली और वे चुपचाप मैनपुरी लौट आए। 62 इस स्थिति तक पहुंचा वह नेटिव लश्कर केवल संकेत समय के लिए रुका हुआ था और उस एक निश्चित समय के पूर्व शत्रु को अपने पैर काट डालने का अवसर न मिले, इसलिए ऊपर से इतना शांत व्यवहार कर रहा था कि यह 9वीं रेजिमेंट 'राजनिष्ठतम गिनी हुई। परंतु ऊपर बताये गए ब्राह्मण के दौरे के बाद से सिपाहियों का ही नहीं अपितु अलीगढ़ की सारी जनता का गुस्सा अतिरेक की सीमा चला गया था। यह 9वीं रेजिमेंट अलीगढ़ में फैलते जा रहे असंतोष को दबाने जब शहर में भेजी गई तब शहर से निकलते समय बाजार के खटीक और कसाई लोगों ने उन सिपाहियों से पूछा कि यूरोपियनों को कब मारेंगे और स्वतंत्रता के लिए कब उठेंगे? खटीक और कसाई भी जिसके लिए जल्दी कर रहे हों वह कृत्य अब भी टालना सिपाहियों को अच्छा कैसे लगे! और तभी अलीगढ़ का समाचार आया। रेजिमेंट के अन्य लोगों द्वारा विद्रोह कर देने के बाद अब केवल अपना ही रुका रहना निंदनीय है, यह देखकर मैनपुरी का लश्कर विद्रोह कर उठा। उन्होंने भी अलीगढ़ के अपने भाइयों की भांति अंग्रेजों को जीवनदान दिया, शस्त्रागार से शस्त्र और भरपूर गोला-बारूद ऊंटों पर लादकर उन सारे सिपाहियों ने 23 मई को दिल्ली की ओर तत्काल कूच किया। इसी समय इटावा की टुकड़ी में भी धुआंधार हो रही थी। इस इटावा शहर के मुख्य मजिस्ट्रेट डेनियल की सहायता से पड़ोस के रास्ते पर गश्त करने को एक चुनी हुई सेना तैयार की। 19 मई को मेरठ से आए कुछ सिपाही इस सेना से मिले। वे मुट्ठी भर सिपाही शरण में आ गए और उन्हें कुछ थोड़े लोगों के सशस्त्र पहरे में रखने का आदेश मिला। यह आदेश हमारे सिरमाथे है, ऐसा दिखाते हुए मेरठ के उन सिपाहियों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 142 62 चार्ल्स बाल, खंड 1, पृष्ठ 134।

अपने शत्रु को पूरी तरह असावधान कर दिया और फिर वे ही शस्त्र लेकर उन्होंने उन सबको कत्ल कर दिया। यह समाचार फैलते-न-फैलते वे सिपाही पड़ोस के एक हिंदू देवालय में जा घुसे और अंदर शस्त्र-सज्जित हो घात लगाकर बैठ गए। इटावा शहर का कलेक्टर मि. एलन ह्यूम यह समाचार पाते ही मि. डेनियल के साथ कुछ नेटिव सेना लेकर उस मंदिर पर हमला करने निकला। ह्यूम को यह विश्वास था कि उसके सिपाहियों के हमला करने के पूर्व उन विद्रोहियों को गांववालों ने उनका सफाया करना छोड़ उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें ढेर सारी रसद पहुंचा दी थी। गांववालों ने हमें धोखा दिया; पर कम-से-कम अपने साथ आए सिपाही और पुलिस तो धोखा नहीं देंगे, इस विश्वास से मंदिर पर आमने से आक्रमण करने आए ह्यूम साहब उन सिपाहियों को उनके मंदिर में छोड़कर इटावा की ओर भाग गए। उस दिन अर्थात् तारीख 19 मई को ही इटावा की नेटिव सेना विद्रोह करेगी, ऐसी खबर सब ओर थी। परंतु उस सेना का मुख्यालय अलीगढ़ में होने से और उधर से विद्रोह का आदेश अभी न मिलने से इटावा की नेटिव सेना अवश्य ही चुप होकर बैठ गई होती, परंतु मध्यांतर में ही उस शहीद ब्राह्मण के आत्मयज्ञ की ज्वालाएं एकाएक भड़क उठने का समाचार इटावा में 22 तारीख को पहुंच जाने से वहां के सिपाहियों को विद्रोह करना आवश्यक हो गया। दिनांक 23 मई को वहां की सारी सेना ने ‘हर-हर-महादेव' की घोषणा कर दी और एक हाथ में तलवार तथा दूसरे हाथ में जलती कब्जे में ले लिया। कारावास तोड़ दिए गए और सारे अंग्रेजों को कह दिया गया कि वे तुरंत भाग जाएं, अन्यथा एक सिरे से उनका कत्ल होगा। यह अभूतपूर्व एवं भयप्रद समाचार सुनते ही भयभीत हुए अंग्रेज लोग अपनी पत्नी-बच्चों को सहित जिधर रास्ता सूझा उधर दौड़ पड़े। स्वयं एलन ओ. ह्यूम ने नेटिव सिपाहियों की उदारता का लाभ लेकर, एक नेटिव महिला का वेश धारण कर ‘यः पलायति स जीवति' का आश्रय लिया।⁶³ इस ह्यूमबाई के भागते ही इटावा पूर्ण स्वतंत्र हो जाने की मुनादी पीटी गई और बाद में वे सारे सिपाही दिल्ली की ओर जानेवाली अपनी रेजिमेंट के मुख्य भाग से मिल गए। इस तरह यह पूरी रेजिमेंट एक व्यक्ति के कारण एकाएक विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं अपितु खजाना लूटना, देश स्वतंत्र करना, विदेशियों को अपनी तलवार की 1857 का स्वातंत्र्य समर – 143 ⁶³ रेड पैंफलेट, खंड 2, पृष्ठ 70 ।

नोंक पर रहते हुए भी जीवन-दान देना और बढ़ जाना, इस सारे कार्यक्रम का अभ्यास अलीगढ़, बुलंदशहर, मैनपुरी और इटावा जैसे दूर-दूर के भाग में भी एक साथ करने, दिल्ली का सारा नेटिव लश्कर विद्रोह कर दे, फिर भी वे विद्रोह नहीं करेंगे-जिसपर यह विश्वास सरकार का था वहीं रेजिमेंट कोई और नहीं उठा, उससे पहले तलवार निकालकर उठ खड़ी हुई। यह सब समाचार मिलने के बाद अंग्रेजों को अपने जीवन का तनिक भी भरोसा नहीं रह गया था। अजमेर से कोई छह कोस पर नसीराबाद नाम का गांव है। वहां अंग्रेज सिपाहियों की छावनी थी और वहां 30वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट, नेटिव तोपखाना, पहली बंबई लांसर और मेरठ से वहां लाई गई 15वीं रेजिमेंट-इतनी सेना इकट्ठा थी। मेरठ से कुछ दिनों पूर्व ही लाई गई इस रेजिमेंट में अंग्रेजी सरकार के प्रति अति द्वेष और उसे उतार फेंकने की उत्कट लालसा पूरी तरह भरी हुई थी। मेरठ की गुप्त सभाओं में जो-जो प्रस्ताव हुए वे सब आमने-सामने नसीराबाद के सिपाहियों को समझाकर कहने को प्राप्त हुआ। यह दुर्लभ अवसर मेरठ के उन एक जहर राजनीतिक प्रचारकों (उपदेशकों) ने व्यर्थ गंवाया होता तो ही आश्चर्य होता। बंबई लांसर्स के कुछ गैर नेटिवों को छोड़कर सारा नेटिव लश्कर एकमत हो गया, क्योंकि उस दिन तोपखाने का प्रभाव बहुत ढीला हो गया था। अतः निर्धारित संकेत मिलते ही मेरठ की 15वीं रेजिमेंट ने पहले तोपखाना हथिया लिया। उसे वापस लेने बंबई के लांसर्स के साथ अंग्रेज अधिकारी आगे बढ़े। परंतु कुछ ही देर में उस लांसर्स के सिपाही मैदान से भाग गए और उनके अंग्रेज अधिकारी प्रेत बनकर भूमि पर गिर गए। इतना ही नहीं, उनके शरीरों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। कर्नल पेनी, कैप्टन स्पॉटिस वुड भी इस लड़ाई में मारे गए। फिर उस शहर से आशा छोड़कर सारे अंग्रेज बोरिया-बिस्तर लिये भाग खड़े हुए। विद्रोहियों ने खजाना अपने नियंत्रण में कर लिया और उनमें से सर्वसम्मति से चुने गए नेटिव सेनापति ने दिल्ली के बादशाह के नाम से सिपाहियों में इनाम बांटे। यूरोपियनों के घर जलाए गए, नसीराबाद स्वतंत्र हो जाने की घोषणा की गई। विद्रोहियों का दो-तीन हजार लोगों का वह समुदाय अपने शस्त्र चमकाता लश्करी ठाट से अपने स्वदेशी नए सेनापति के अधीन लश्करी बैंड बजाता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ चला। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 144

प्रकरण-6 रूहेलखंड रूहेलखंड प्रदेश की मुख्य राजधानी का शहर बरेली है। इस राज्य में रोहिला जाति के पठानों का राज था और उसे जब से अंग्रेजों ने छीना, तभी से इस अपमान का बदला लेने के लिए घात लगाए बैठे शूर, बलिष्ठ और क्रूर मुसलमानों की एक बड़ी बस्ती वहां थी। सन् 1857 के आसपास अंग्रेजों के शिकंजे से छूटने के लिए विद्रोह की चर्चा जिन किन्हीं प्रदेशों में रंग ला रही थी उसमें रूहेलखंड की और उसकी राजधानी की भी गिनती करनी होगी। बरेली में इस समय 9वीं इरेंग्यूलर घुड़सवार, नेटिव पैदल की अठारह और 68वीं रेजिमेंट तथा नेटिव तोपखाने की एक बैटरी-इतनी नेटिव सेना थी। इस ब्रिगेड का ब्रिगेडियर सिवाल्ड था। अप्रैल में कुछ सिपाहियों ने कारतूसों के संबंध में आशंका व्यक्त की थी। परंतु उधर ध्यान न देते हुए सरकार ने सिपाहियों ने कारतूसों को एक-एक में अलग करके उनसे कारतूस चलवाए। आगे भी एक-दो बार गड़बड़ होने से सिपाहियों में क्षोभ बढ़ ही रहा था; फिर भी सरकार को उनके चेहरों पर संतोष ही दिखता रहा। इसी समय 14 मई को मेरठ विद्रोह का समाचार बरेली आ पहुंचा। यह समाचार आते ही अंग्रेजों ने अपने बाल-बच्चे नैनीताल भेजकर घुड़सवारों को तैयार रहने का आदेश दिया। यह घुड़सवार पलटन नेटिव ही थी, पर थी सरकार के पूर्ण विश्वास की। इस घुड़सवार रेजिमेंट के साथ बरेली की सभी नेटिव सिपाहियों को परेड पर बुलाकर अंग्रेज अधिकारियों ने दिनांक 14 मई को उन्हें उत्तम आचरण रखने का आदेश किया। नए कारतूस अब काम में नहीं लाए जा रहे हैं, सिपाहियों को जो पसंद हैं वही पुराने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 145

कारतूस वे काम में लाएं। नए कारतूस यदि दिखाई दिए तो मैं उनका चूरा कर दूंगा, ऐसा स्पष्ट कहते हुए एक अधिकारी ने सिपाहियों में व्याप्त कारतूसों का डर दूर करने का प्रयास किया। वास्तव में देखें तो अब सिपाहियों के भय पर व्याख्यान देते समय कारतूसों की बात करना विषयांतर ही था। ˙˙˙स्वयं कमांडर-इन-चीफ द्वारा सारे हिंदुस्थान में सिपाहियों को सैनिक आदेश से यह घोषित कर दिया गया था कि आगे से नए कारतूस काम में लाना सरकार ने बंद कर दिया है। मरेठ के विद्रोह के बाद जब सरकार ने स्वयं ही कदम पीछे हटा लिया और जिन कारतूसों के लिए मई माह के पहले इतनी जिद की थी-वे ही कारतूस काम में लाना स्वयं ही बंद किया तो-इस आदेश में सरकार की भयग्रस्तता और दुर्बलता के सिवाए सिपाहियों व लोगों को कुछ और नहीं दिखा। कारतूसों के कारण सिपाही भड़के हैं, यह समझने में सरकार से जो गलती हुई उसका पूरा विस्फोट बरेली में होने का अवसर आ गया था। ब्रिगेडियर ने यह कहकर कि नया कारतूस दिखते ही मैं उसे चूरा कर दूंगा, उनका डर दूर करने का प्रयास किया। परंतु अब इस तरह के आदेश से शांति स्थापित होने के दिन नहीं रहे थे; क्योंकि सिपाहियों को डर कारतूसों का नहीं था, वहां कारतूसों के संबंध में कैसा भी आदेश दिया जाए, तो भी उसका क्या उपयोग? अंग्रेजों को आदेश देने का अधिकार रहे या न रहे, यही जहां चर्चा थी वहां नया आदेश देने से वह चर्चा बंद न होकर उलटे अधिक तीव्र होनी थी; अब कारतूसों के प्रकरण में अच्छा या बुरा, कैसा भी व्याख्यान देना विषयांतर ही था; क्योंकि दिल्ली में स्थापित स्वकीय सिंहासन की ओर से हिंदुस्थान का स्वातंत्र्य ध्वज थामे रखने के लिए रूहेलखंड के लोगों के लिए आग्रहपूर्ण और एक आवश्यक निमंत्रण आया हुआ है। अब इस निमंत्रण-पत्रिका को ठुकराना है क्या? "दिल्ली के फौजी बहादुरों की ओर से बरेली के फौजी बहादुरों को प्रेमालिंगन! भाई, दिल्ली में अंग्रेजों से लड़ाई हो रही है। परमेश्वर की कृपा से अपनी एक पराजय भी उनकी दस पराजय के बराबर हानि कर रही है। अनगिनत स्वदेशी वीर इधर आ रहे हैं। ऐसे समय आप वहां भोजन कर रहे हों तो हाथ धोने यहां आना। शाहों का बादशाह और वैभव का आगर जो अपना दिल्ली का बादशाह है, वह आपका बढ़िया मान-सम्मान करेगा और आपकी सेवा का उत्तम पुरस्कार भी देगा। आपकी तोपों की गड़गड़ाहट के लिए हमारा कार्य और आपके दर्शनों के लिए हमारे नेत्र चातक की तरह बाट जोह रहे हैं। आइए, जल्दी आइए! क्योंकि बंधु! भवदागमन के वसंत के बिना यहां गुलाब कैसे खिलेगा? दूध के सिवाए बच्चा कैसे जिएगा?⁶⁴ अब ऐसी निमंत्रण-पत्रिका को कैसे ठुकराया जाए? ऐसे निमंत्रणों के बीच रूहेलखंड के अंतिम स्वतंत्र रोहिला सरदार हाफिज रहमत का वंशज भी बरेली में गुप्त षड़यंत्र के ताने-बाने बुन रहा था। इस खानबहादुर खान को अंग्रेजों की ओर से वह हाफिज रहमत खां का वंशज होने के नाते 'एक' और वह अंग्रेज सरकार में जज था, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 146 64 असली पत्र : कॉलिंस नैरेटिव, पृष्ठ 33 ।