अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
232
चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
मातलिः- (सस्मितम्) किमीश्वराणां परोक्षम्। एहि। भगवान्मारीचस्ते दर्शनमिच्छति।
राजा- प्रिये, अवलम्ब्यतां पुत्रः। त्वामेव पुरस्कृत्य भगवन्तं द्रष्टुमिच्छामि।
शकुन्तला- लज्जामि क्खु अज्जउत्तेण सद्धं गुरुअणसमीवं गन्तुं। (लज्जे खलु आर्यपुत्रेण सार्धं गुरुजनसमीपं गन्तुम्।
राजा- आचरितमेतदभ्युदयकालेषु। तदेहि तावत्। (इति परिक्रामन्ति)
(ततः प्रविशत्यदित्या सहहासनोपविष्टो मारीचः)
मारीचः- (राजानमवलोक्य) दाक्षायणि।
पुत्रस्य ते रणशिरस्ययमग्रयायी
दुःषन्त इत्यभिहितो भुवनस्य भर्ता।
चापेन यस्य विनिवर्तितकर्म जातं
तत्कोटिमत्कुलिशमाभरणं मघोनः॥ ७–२६॥
अदितिः- सम्भावणीअप्पहावा खु से आकिदी। (सम्भावनीयप्रभावा खल्वस्य आकृतिः।)
मातलिः- भूपते, एतौ पुत्रप्रीतिपिशुनेन चक्षुषा दिवौकसां पितरावायुष्मन्तमेवावलोकयतः। तदुपसर्प।
राजा- मातले,
प्राहुर्द्वादशधा स्थितस्य मुनयो यत्तेजसः कारणं
भर्तारं भुवनत्रयस्य सुषुवे यद्यज्ञभागेश्वरम्।
यस्मिन्नात्मभुवः परोऽपि पुरुषश्चक्रे भवायास्पदं
द्वन्द्वं दक्षमरीचिसंभवमिदं तत्स्रष्टुरेकान्तरम्॥ ७–२७॥
मातलिः- अथ किम्।
राजा- (प्रणिपत्य) उभाभ्यामपि वां वासावनियोज्यो दुःषन्तः प्रणमति।
मारीचः- वत्स, चिरं पृथिवीं पालय।
अदितिः- जाद, अप्पदरधो होहि। (जात, अप्रतिरथः भव।)
(शकुन्तला पुत्रसहिता पादयोः पतति)
पुत्रस्य०।। (7-26) कोटिमत् ति(ती)क्ष्णाग्रेशालि आभरणं भूषणमेव, न तु तेन युक्तमाचरतीत्यर्थः। सम्भावनीयप्रभावा आपन्नाकृतिः।
प्राहुः०।। (7-27) द्वादशधेति सूर्यस्येत्यर्थः। यज्ञेति इन्द्रं आत्मभुवो ब्रह्मणः परः पुरुषो नारायणः।
जात भर्तुर्बहुम[ता] भव, यावताराय(?)। अप्रतिहतरथो भव।
अभिज्ञानशकुन्तलम् सप्तमोऽङ्कः 233
मारीचः-वत्से,
आखण्डलसमो भर्ता जयन्तप्रतिमः सुतः।
आशीरन्या न ते योज्या पौलोमीमङ्गला भव॥7-28॥
अदितिः-जाद, भत्तुणो बहुमदा होहि। अअं च दीहाऊ उहअपक्खं अलंकरेदु। ता एध उपविसध। (जात, भर्तुः बहुमता भव। अयं च दीर्घायुः उभयपक्षं अलङ्करोतु। तत् एत उपविशत।)
(सर्वे उपविशन्ति)
मारीचः-एकैकं निर्दिशन्।
दिष्ट्या शकुन्तला साध्वी सदपत्यमिदं भवान्।
श्रद्धा वित्तं विधिश्चेति त्रितयं तत्समागतम्॥7-29॥
राजा-भगवन्, प्रागभिप्रेतसिद्धिः पश्चाद्दर्शनमित्यपूर्वः खलु वोऽनुग्रहः। पश्यतु भगवान्।
उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं
घनोदयः प्राक्तदनन्तरं पयः।
निमित्तनैमित्तिकयोरयं विधि-
स्तव प्रसादस्य पुरस्तु सम्पदः॥7-30॥
मातलिः-आयुष्मन्, एवं विश्वगुरवः प्रसीदन्ति।
राजा-भगवन्, इमामाज्ञाकरीं वो गान्धर्वेण विधिनोपयम्य कस्य चित्कालस्य बन्धुभि-
रानीतां स्मृतिशैथिल्यात्प्रत्यादिशन्नपराद्धोऽस्मि तत्रभवतो युष्मद्गोत्रस्य कण्वस्य।
पश्चादेनामङ्गुलीयकदर्शनादूढपूर्वामवगतोऽस्मि। तच्चित्रमिव मे प्रतिभाति।
यथा गजे साधुसमक्षरूपे
कस्मिन्नपि क्रामति संशयः स्यात्।
पदानि दृष्ट्वाथ भवेत्प्रतीति-
स्तथाविधो मे मनसो विकारः॥7-31॥
अङ्ग०॥ (7-28) पौलोमीति अविधवा भवेत्यर्थः। शङ्करस्तु भर्ता इन्द्रतुल्यो भवतु, जयन्ततुल्यश्च पुत्रो भवत्वित्याह। आशीर्नाम नाट्यालङ्कारोऽयम्। जात, भर्तुर्बहुमता भव। अयञ्च ते दीर्घायुरुभयपक्षेऽलङ्करोतु। तदत्रोपविशतु।। दिष्ट्या०।। (7-29) दिष्ट्या आनन्दे श्रद्धा प्रसिद्धा वेदबोधिताचरणं विधिः।
उदेति०।। (7-30) प्रियोक्ति नाम नाट्यलक्षणमिदम्। तदुक्तं स्यात् संप्रीणयितुम् पूज्यं(?) प्रियोक्तिर्हर्षभाषणमिति। कस्यचित् कस्मिंश्चिदित्यर्थः। षष्ठी सप्तम्यो(म्य)भावात्।
यथा०।। (7-31) साधु आबाधितं समक्षं विद्यमानं रूपं यस्य। पदानि पदचिह्नानि।
234 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
मारीचः-वत्स, अलमात्मापराधशङ्कया। संमोहोऽपि त्वय्युपपन्न एव। श्रूयताम्।
राजा-अवहितोऽस्मि।
मारीचः-यदैवाप्सरस्तीर्थावतरणात्प्रत्याख्यानविक्लवां शकुन्तलामादाय दाक्षायणीमुपगता मेनका तदैव ध्यानादवगतवृत्तान्तोऽस्मि दुर्वाससः शापादियं तपस्विनी सहधर्मचारिणा प्रत्यादिष्टेति। स चाङ्गुलीयकदर्शनावसानः शापः।
राजा-(सोच्छ्वासमात्मगतम्) एष वचनीयान्मुक्तोऽस्मि।
शकुन्तला-(स्वगतम्) दिट्ठिआ। अकामपच्चादेसी अज्जउत्तो। ण उण सच्चं मं सुमरेदि। अथवा ण सुदो भवे अअं सुण्णहिअआए मए सावो, जदो सहीहिं अच्चादरेण संदिट्ठं भत्तुणो अङ्गुलीअअं दंसेसि त्ति। (दिष्ट्या। अकामप्रत्यादेशी आर्यपुत्रः। न पुनः सत्यं मां स्मरति। अथवा न श्रुतः भवेत् अयं शून्यहृदयया मया शापः, यतः सखीभिः अत्यादरेण संदिष्टं भर्तुः अङ्गुलीयकं दर्शयसि इति।)
मारीचः-वत्से, विदिताथार्सि। तदिदानीं सहधर्मचारिणं प्रति न त्वया मन्युः करणीयः। पश्य-
शापादसि प्रतिहता स्मृतिलोपरूक्षे
भर्त्तर्यपेततमसि प्रभुता तवैव।
छाया न मूर्च्छति मलोपहतप्रसादे
शुद्धे तु दर्पणतले सुलभावकाशा॥ 7-32॥
राजा-यथाह भगवान्।
मारीचः-वत्स, कच्चिदभिनन्दितस्त्वया विधिवदस्माभिरनुष्ठितजातकमादिक्रियः पुत्र एष शाकुन्तलेयः।
राजा-भगवन्, अत्र खलु मे वंशप्रतिष्ठा।
मारीचः-तथा शौर्यस्वभावेन चक्रवर्तिनमेनमवगच्छतु भवान्। पश्य-
रथेनानुद्धातस्तिमितगतिनोत्तीर्णजलधि :
पुरा सप्तद्वीपां अवति वसुधामप्रतिरथः।
दिष्ट्या अकामप्रत्यादेशी आर्यपुत्रः। न पुनः सत्यं मां स्मरति। अथवा न श्रुतो भवेदयं शून्यहृदयया शापः। लकारश्त्रकारौ। यतः सखीभिरत्यादरेण सन्दिष्टं भर्तुरङ्गुलीयकं दर्शयिष्यसीति। शापा० ।। (7-32) रूक्षे कलुषे अत्र हेतुः शापादिति। तमोऽज्ञानं मूर्च्छति स्फुरति।
रथेन० ।। (7-33) सप्तद्वीपां सप्तद्वीपवतीं पुरा अवति पालयिष्यति भविष्यति ल(लृ)ट्। अनया पितृदुहितुर्मनोरथसम्पत्त्या कण्वोऽपि तावद्विज्ञातार्थः क्रियताम्। मेनका पुनरत्र मां परिचरन्ती सुसपिहितेन। मम मनोरथो व्याहतो भवत्या विहायसा आकाशेन।
अभिज्ञानशकुन्तलम् सप्तमोऽङ्कः 235
इहायं सत्त्वानां प्रसभादमनात्सर्वदमनः
पुनर्यास्यत्याख्यां भरत इति लोकस्य भरणात् ।। 7-33 ।।
राजा-भगवत्कृतसंस्कारेऽस्मिन्सर्वमाशंसे।
अदितिः-इमाए दुहिदिआए मणोरधसम्पत्तीए कण्णो वि दाव विण्णादत्थो करीअदु। मेणआ उण इध मं परिअरन्ती संणिहिदा जेव चिट्ठदि। (अनया दुहितुः मनोरथसम्पत्त्या कण्वः अपि तावत् विज्ञातार्थः क्रियताम्। मेनका पुनः इह मां परिचरन्ती सन्निहिता एव तिष्ठति।)
शकुन्तला-(स्वगतम्) मम मणोरधो वाहरिदो भअवदीए। (मम मनोरथः व्याहृतः भगवत्या।)
मारीचः-तपः प्रभावात्सर्वमिदं प्रत्यक्षं तत्रभवतः कण्वस्य। (विचिन्त्य) तथाप्यसौ दुहितुः सपुत्रायाः पत्या परिग्रहप्रियमस्माभिः श्रावयितव्यः। कः कोऽत्र भोः।
प्रविश्य शिष्यः-भगवन्, अयमस्मि।
मारीचः-गालव, मद्धचनादिदानीमेव विहायसा गत्वा तत्रभवते कण्ववाय प्रियमावेदय यथा पुत्रवती शकुन्तला दुर्वाससः शापनिवृत्तौ स्मृतिमतो दुष्यन्तेन गृहीतेति।
शिष्यः-यथाज्ञापयति भगवान्। (इति निष्क्रान्तः)
मारीचः-(राजानं प्रति) वत्स, त्वमपि सापत्यदारः सख्युराखण्डलस्य रथमास्थाय स्वां राजधानीं प्रतिष्ठस्व।
राजा-यथाज्ञापयति भगवान्।
मारीचः-सम्प्रति हि-
तव भवतु बिडौजाः प्राज्यवृष्टिः प्रजासु
त्वमपि विततयज्ञो वज्रिणं प्रीणयालम्।
युगशतपरिवृत्तैरेवमन्योन्यकृत्यै -
र्नयतमुभयलोकानुग्रहश्लाघनीयौ ।। 7-34 ।।
राजा-भगवन्, यथाशक्ति श्रेयसि प्रयतिष्ये।
मारीचः-वत्स, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि।
तव० ।। (7-34) बिडौजा इन्द्रः प्राज्यं प्रचुरम्। किं ते भूय इति निर्वहणाङ्ग काव्यसंहारोऽयम्। तदुक्तं वरप्रदानसंप्राप्तिः काव्यसंहार इष्यत इति।।
236 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
राजा-भगवन्, अतः परमपि प्रियमस्ति। तथाप्येतदस्तु।
प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः
सरस्वती श्रुतिमहतां महीयताम्।
ममापि च क्षपयतु नीललोहितः
पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः ।। 7-35 ।।
(इति निष्क्रान्ताः सर्वे)
।। इति सप्तमोऽङ्कः ।।
पुन० ।। (7-35) श्रुतिमतां वेदविदां महीयतां पूजिता भवतु। प्रसन्नेति यावत् नीललोहितः शिखः(वः) आत्मनाम्भावेन परिगता आश्रिता शक्तिः सकलभुवनशासनानुग्रहक्षमं सामर्थ्यं यस्तु नित्यशक्तिरित्यर्थः। यद्वा परिगतशक्तिः सगौरीकः आगमे शक्तिपदेन गौर्याविधानात्। आत्मभूरिति क्वचित् पाठः। प्रशस्ति (?) सामर्थ्यकम् इदं तदुक्तं.......भूपतेः शान्तिरस्तु प्रशस्तिरित्यभिधीयते इति।।
इति महामहोपाध्याय-श्रीविष्णुपण्डित-तनुजन्म
श्रीचन्द्रशेखर-चक्रवर्तिकृतावभिज्ञानशकुन्तलटीकायां
[ज्ञान]सन्दर्भदीपिकायां⁹⁴ सप्तमाङ्कविवरणं समाप्तम्।।
श्रीहरये नमः।। श्रीरामाय नमः।।
शकाब्दाः 1728 ।। ॐ गङ्गायै नमः ।।⁹⁵
।। शुभं भूयात् ।।
- मातृका 4117 इत्यत्रैव ज्ञानसन्दर्भदीपिकेति नाम पठ्यते।
- मातृका 4118 इत्यत्र लेखनकालो नैव लिखितः।।
परिशिष्ट-1
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 1 | अक्लिष्टबालतरुपल्लव० | 6 | 23 | 210 |
| 2 | अतः समीक्ष्य कर्तव्यं विशेषात्० | 5 | 27 | 188 |
| 3 | अद्यापि नूनं हरकोपवह्नि० | 3 | 3 | 135 |
| 4 | अधरः किसलयरागः कोमल० | 1 | 21 | 108 |
| 5 | अध्याक्रान्ता वसतिरमुना० | 2 | 15 | 130 |
| 6 | अनवरतधनुर्ज्यास्फालन० | 2 | 4 | 124 |
| 7 | अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं० | 2 | 11 | 128 |
| 8 | अनिर्द्योपभोग्यस्य रूपस्य० | 3 | 30 | 148 |
| 9 | अनिशमपि मकरकेतुर्मनसो० | 3 | 5 | 135 |
| 10 | अनुकारिणि पूर्वेषां युक्ति० | 2 | 17 | 131 |
| 11 | अनुमतगमना शकुन्तला सा तरुभि० | 4 | 12 | 167 |
| 12 | अनुयास्यन् मुनितनयां सहसा० | 1 | 29 | 116 |
| 13 | अनेन कस्यापि कुलांकुरेण० | 7 | 19 | 226 |
| 14 | अनेन लीलाभरणेन ते प्रिये० | 3 | 32 | 149 |
| 15 | अन्तर्गतप्रार्थनमन्तिकस्थं० | 7 | 2 | 220 |
| 16 | अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती० | 4 | 3 | 159 |
| 17 | अपयास्यति मे शोकः कथं० | 4 | 23 | 173 |
| 18 | अपराधमिमं ततः सहिष्ये यदि० | 3 | 24 | 145 |
| 19 | अप्यौत्सुक्ये महति दयित० | 3 | 27 | 147 |
| 20 | अभिजनवतो भर्तुः श्लाघ्ये० | 4 | 21 | 172 |
| 21 | अभिमुखे मयि संवृतमीक्षितं० | 2 | 12 | 128 |
| 22 | अभ्यक्तमिव स्नातः शुचिर० | 5 | 12 | 180 |
| 23 | अभ्युन्नता पुरस्तादवगाढा० | 3 | 9 | 136 |
238 \hfill चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 24 | अमी वेदीं परितः क्लृप्तधिष्ण्याः० | 4 | 10 | 166 |
| 25 | अयं स ते तिष्ठति संगमोत्सुको० | 3 | 16 | 141 |
| 26 | अयं स ते श्यामलतामनोहरं० | 3 | 35 | 150 |
| 27 | अयं स यस्मात् प्रणयावधीरणा० | 3 | 17 | 141 |
| 28 | अयमगविवरेभ्यश्चातकैर्नि० | 7 | 7 | 221 |
| 29 | अरिहसि मे चुअङ्कुर दिण्णो० | 6 | 3 | 198 |
| 30 | अर्थो हि कन्या परकीय एव० | 4 | 24 | 174 |
| 31 | अर्धपीतस्तनं मातुरमर्दमक्लिष्ट० | 7 | 14 | 224 |
| 32 | अशिशिरतरैरन्तस्तापैर्विवर्ण० | 3 | 15 | 140 |
| 33 | असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा० | 1 | 22 | 110 |
| 34 | अस्मात् परं बत यथास्मृति० | 6 | 28 | 214 |
| 35 | अस्मान् साधु विचिन्त्य संयमध० | 4 | 19 | 170 |
| 36 | अस्यास्तुंगमिव स्तनद्वयमिदं० | 6 | 16 | 207 |
| 37 | अहन्यहन्यात्मन एव ताव० | 6 | 32 | 217 |
| 38 | अहिणवमहुलोहभाविओ० | 5 | 8 | 177 |
| 39 | आ जन्मनः शाठ्यमशिक्षितो० | 5 | 28 | 188 |
| 40 | आ परितोषाद् विदुषां न साधु० | 1 | 2 | 97 |
| 41 | आअम्बहरिअवेण्टं ऊससिअं विअ० | 6 | 2 | 197 |
| 42 | आखण्डलसमो भर्ता जयन्त० | 7 | 28 | 233 |
| 43 | आचार इत्यधिकृतेन मया० | 5 | 1 | 175 |
| 44 | आमूलशुद्धसंततिकुलमेतत्० | 6 | 29 | 215 |
| 45 | आलक्ष्यदन्तमुकुलान० | 7 | 17 | 226 |
| 46 | इतः प्रत्यादिष्टा स्वजनमनुगन्तुं० | 6 | 10 | 203 |
| 47 | इदं किलाव्याजमनोहरं वपु० | 1 | 17 | 106 |
| 48 | इदमनन्यपरायणमन्यथा० | 3 | 22 | 144 |
| 49 | इदमप्युपकृतिपक्षे सुरभि मुखं० | 3 | 37 | 152 |
| 50 | इदमुपनतमेवं रूपमक्लिष्ट० | 5 | 20 | 184 |
| 51 | इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना० | 1 | 18 | 106 |
| 52 | उत्पक्ष्मणोर्नयनयोरुपरुद्धवृत्तिं० | 4 | 17 | 170 |
| 53 | उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनी० | 3 | 26 | 147 |
अभिज्ञानशकुन्तलम् परिशिष्ट-१ 239
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 54 | उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं० | 7 | 30 | 233 |
| 55 | उन्नमितैकभ्रूलतमाननमस्याः० | 3 | 18 | 142 |
| 56 | उपकृत्य हरेस्तस्या भवाल्लंघु० | 7 | 1 | 220 |
| 57 | उपहितस्मृतिरङ्गुलिमुद्रया० | 6 | 9 | 201 |
| 58 | उपोढशब्दा न रथाङ्गनेमयः० | 7 | 10 | 222 |
| 59 | उल्ललइ दब्भकवलं मई० | 4 | 14 | 168 |
| 60 | एकैकमत्र दिवसे दिवसे मदीयं० | 6 | 13 | 205 |
| 61 | एवमाश्रमविरुद्धवृत्तिना० | 7 | 18 | 226 |
| 62 | एष त्वामभिनवकण्ठशोणितार्थी० | 6 | 33 | 217 |
| 63 | एषा कुसुमनिषण्णा तृषिता० | 6 | 22 | 210 |
| 64 | औत्सुक्यमात्रमवसादयति० | 5 | 5 | 176 |
| 65 | कः पौरवे वसुमतीं शासति० | 1 | 25 | 111 |
| 66 | कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं० | 1 | 20 | 107 |
| 67 | कथं नु तं कोमलबन्धुरा० | 6 | 14 | 206 |
| 68 | कर्कन्धूनामुपरि तुहिनं रञ्जय० | 4 | 4 | 159 |
| 69 | का कथा बाणसंधाने ज्या० | 3 | 1 | 134 |
| 70 | कामं प्रत्यादिष्टां स्मरामि न० | 5 | 34 | 191 |
| 71 | कामं प्रिया न सुलभा मनस्तु० | 2 | 1 | 121 |
| 72 | कार्या सैकतलीनहंसमिथुना० | 6 | 20 | 209 |
| 73 | किं कृतकार्यद्वेषाद् धर्मं प्रति० | 5 | 19 | 183 |
| 74 | किं तावद् व्रतिनामुपोढतपसां० | 5 | 10 | 179 |
| 75 | किं शीकरैः क्लमविमर्दिभि० | 3 | 25 | 146 |
| 76 | कुतो धर्मक्रियाविघ्नः सतां० | 5 | 15 | 181 |
| 77 | कुमुदान्येव शशाङ्कः सविता० | 5 | 31 | 189 |
| 78 | कुल्याम्भोभिः पवनचपलैः० | 1 | 14 | 103 |
| 79 | कृतं न कर्णार्पितबन्धनं० | 6 | 21 | 209 |
| 80 | कृतः शरव्यं हरिणा तवासुरा० | 6 | 35 | 218 |
| 81 | कृतावमर्गामनुमन्यमानः० | 5 | 21 | 184 |
| 82 | कृत्ययोर्भिन्नदेशत्वाद्० | 2 | 18 | 132 |
| 83 | कृष्णसारे ददच्चक्षुस्त्वयि० | 1 | 6 | 100 |
240 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः ।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 84 | केयमवगुण्ठनवती नातिपरि० | 5 | 14 | 181 |
| 85 | क्व वयं क्व परोक्षमन्मथो मृग० | 2 | 19 | 133 |
| 86 | क्षणात्प्रबोधमायाति लंघ्यते० | 5 | 2 | 175 |
| 87 | क्षामक्षामकपोलमानन० | 3 | 12 | 138 |
| 88 | क्षौमं केनचिदिन्दुपाण्डु तरुणा० | 4 | 7 | 164 |
| 89 | खणचुम्बिआइँ भमरेहिँ उअह० | 1 | 4 | 98 |
| 90 | गच्छति पुरः शरीरं धावति० | 1 | 34 | 119 |
| 91 | गान्धर्वेण विवाहेन बह्व्यो थ० | 3 | 28 | 148 |
| 92 | गाहन्तां महिषा निपानसलिलं० | 2 | 6 | 125 |
| 93 | ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहु० | 1 | 7 | 100 |
| 94 | चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि० | 1 | 24 | 110 |
| 95 | चारुणा स्फुरितेनायमपरिक्षत० | 3 | 36 | 151 |
| 96 | चित्ते निवेश्य परिकल्पित० | 2 | 10 | 127 |
| 97 | चूतानां चिरनिर्गतापि कलिका० | 6 | 4 | 198 |
| 98 | जाने तपसो वीर्यं सा बाला० | 3 | 2 | 134 |
| 99 | ज्वलति चलितेन्धनो ग्निर्विप्रकृत० | 6 | 37 | 219 |
| 100 | णावेक्खिओ गुरुअणो इमीअ० | 5 | 17 | 182 |
| 101 | तदाशु कृतसंधानं प्रतिसंहर० | 1 | 11 | 102 |
| 102 | तदेषा भवतः पत्नी त्यज वैनं० | 5 | 29 | 188 |
| 103 | तपति तनुगात्रि मदनस्त्वाम्० | 3 | 20 | 143 |
| 104 | तव कुसुमशरत्वं शीतरश्मि० | 3 | 4 | 135 |
| 105 | तव भवतु बिडौजाः प्राज्यवृष्टि० | 7 | 34 | 235 |
| 106 | तव सुचरितमङ्गुरीय नूनं० | 6 | 12 | 204 |
| 107 | तवास्मि गीतरागेण हारिणा० | 1 | 5 | 99 |
| 108 | तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता० | 3 | 39 | 154 |
| 109 | तस्याग्रभागाद् गृहनीलकण्ठै० | 6 | 31 | 216 |
| 110 | तीव्राघातादभिमुखतरुस्कन्ध० | 1 | 33 | 118 |
| 111 | तुज्झ ण आणे हिअअं मम० | 3 | 19 | 142 |
| 112 | तुज्झे ज्जेव प्रमाणं जाणध० | 5 | 26 | 187 |
| 113 | तुरगखुरहतस्तथा हि रेणुर्विटप० | 1 | 32 | 118 |
अभिज्ञानशकुन्तलम् परिशिष्ट-1 241
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः ।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 114 | त्रिस्रोतसं वहति यो गगनप्रतिष्ठां० | 7 | 6 | 221 |
| 115 | त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं० | 3 | 29 | 148 |
| 116 | तन्मतिः केवला तावत् प्रतिपाल० | 6 | 38 | 219 |
| 117 | त्वमर्हतां प्राग्रहरः स्मृतो० | 5 | 16 | 182 |
| 118 | दर्भाङ्कुरेण चरणः क्षत० | 2 | 13 | 129 |
| 119 | दर्शनसुखमनुभवतः साक्षादिव० | 6 | 24 | 211 |
| 120 | दिष्ट्या शकुन्तला साध्वी० | 7 | 29 | 233 |
| 121 | दीर्घापाङ्गविसारिनेत्र० | 6 | 15 | 206 |
| 122 | दुःषन्तेनाहितं तेजो दधानां० | 4 | 6 | 162 |
| 123 | धर्म्यास्तपोधनानां प्रतिहतविघ्नाः० | 1 | 12 | 102 |
| 124 | न खलु न खलु बाणः संनिपात्यो० | 1 | 10 | 101 |
| 125 | न तिर्यगवलोकितं भवति चक्षु० | 5 | 24 | 187 |
| 126 | न नमयितुमधिज्यमुत्सहिष्ये० | 2 | 3 | 123 |
| 127 | नियमयसि विमार्गप्रस्थिता० | 5 | 7 | 177 |
| 128 | निराकृतनिमेषाभिर्नेत्रपंक्ति० | 2 | 8 | 126 |
| 129 | नीवाराः शुककोटरार्भकमुख० | 1 | 13 | 103 |
| 130 | नैतच्चित्रं यदयमुदधि० | 2 | 16 | 130 |
| 131 | परिग्रहबहुत्वे पि द्वे प्रतिष्ठे० | 3 | 23 | 144 |
| 132 | पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं० | 4 | 11 | 166 |
| 133 | पादन्यासं क्षितिधरगुरोर्मूर्ध्नि० | 4 | 5 | 159 |
| 134 | पिपासाक्षामकण्ठेन याचितं० | 3 | 33 | 149 |
| 135 | पुडइणिवत्तन्तरिअं वाहरिओ० | 4 | 18 | 170 |
| 136 | पुत्रस्य ते रणशिरस्ययम० | 7 | 26 | 232 |
| 137 | पृष्ट्य जनेन समदुःखसुखेन० | 3 | 13 | 139 |
| 138 | प्रजाः प्रजाः स्वा इव तन्त्रयित्वा० | 5 | 3 | 175 |
| 139 | प्रजागरात् खिलीभूत० | 6 | 25 | 211 |
| 140 | प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधि० | 6 | 6 | 200 |
| 141 | प्रथमं साराङ्गाक्ष्या प्रियया० | 6 | 7 | 200 |
| 142 | प्रलोभ्यवस्तुप्रणयप्रसारितो० | 7 | 16 | 225 |
| 143 | प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः० | 7 | 35 | 236 |
242 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 144 | प्रागेव जरसा कम्पः सविशेषेण० | 6 | 30 | 216 |
| 145 | प्राणानामनिलेन वृत्तिरुचिता० | 7 | 12 | 223 |
| 146 | प्राहूर्द्वादशधा स्थितस्य मुनयो० | 7 | 27 | 232 |
| 147 | बाष्पेन प्रतिषिद्धे पि जयशब्दे० | 7 | 23 | 230 |
| 148 | भव हृदय साभिलाषं संप्रति० | 1 | 28 | 116 |
| 149 | भवनेषु सुधासितेषु पूर्वं क्षिति० | 7 | 20 | 227 |
| 150 | भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै० | 5 | 13 | 180 |
| 151 | भानुः सकृद्युक्ततुरंग एव० | 5 | 4 | 176 |
| 152 | भूत्वा चिराय सदिगन्तमही० | 4 | 22 | 172 |
| 153 | मणिबन्धनगलितमिदं संक्रान्तो० | 3 | 31 | 149 |
| 154 | मनोरथाय नाशंसे किं बाहो० | 7 | 13 | 224 |
| 155 | मय्येव विस्मरणदारुणचित्तवृत्तौ० | 5 | 25 | 187 |
| 156 | महतस्तेजसो बीजं बालो यं० | 7 | 15 | 225 |
| 157 | महाभागः कामं नरपतिरभिन्न० | 5 | 11 | 180 |
| 158 | मानुषीभ्यः कथं नु स्यादस्य० | 1 | 26 | 115 |
| 159 | मुक्तेषु रश्मिषु निरायतपूर्व० | 1 | 8 | 100 |
| 160 | मुनिसुताप्रणयस्मृतिरोधिना० | 6 | 8 | 201 |
| 161 | मुहुरङ्गुलिसंवृत्ताधरोष्ठं० | 3 | 38 | 153 |
| 162 | मूढः स्यामहमेषा वा वदेन्मिथ्येति० | 5 | 32 | 189 |
| 163 | मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्यु० | 2 | 5 | 124 |
| 164 | मोहान्मया सुतनु पूर्वं० | 7 | 25 | 231 |
| 165 | यतो यतः षट्चरणो भिवर्तते० | 1 | 23 | 110 |
| 166 | यथा गजे साधुसमक्षरूपे० | 7 | 31 | 233 |
| 167 | यदालोके सूक्ष्मं व्रजति सहसा० | 1 | 9 | 101 |
| 168 | यदि यथा वदति क्षितिपस्तथा० | 5 | 30 | 189 |
| 169 | यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां० | 2 | 14 | 129 |
| 170 | यद्यत्साधु न चित्रे स्मिन्० | 6 | 17 | 207 |
| 171 | ययातेरिव शर्मिष्ठा पत्युर्बहुमता० | 4 | 9 | 166 |
| 172 | यस्य त्वया व्रणविरोहरणम्० | 4 | 16 | 169 |
| 173 | या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं० | 1 | 1 | 95 |
अभिज्ञानशकुन्तलम् परिशिष्ट-1 243
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 174 | यात्येकतो स्ताशिखरं पतिरोषधी० | 4 | 2 | 159 |
| 175 | यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं० | 4 | 8 | 165 |
| 176 | येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः० | 6 | 26 | 213 |
| 177 | यो हनिष्यति वध्यं त्वां रक्ष्यं० | 6 | 34 | 218 |
| 178 | रथेनानुद्धातस्तिमितगतिना० | 7 | 33 | 234 |
| 179 | रम्यं द्वेष्टि यथा पुरा प्रकृतिभिः० | 6 | 5 | 199 |
| 180 | रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च० | 5 | 9 | 178 |
| 181 | रम्यान्तरः कमलिनीहरितैः सरोभि० | 4 | 13 | 167 |
| 182 | रहः प्रत्यासत्तिं यदि सुवदना० | 3 | 40 | 154 |
| 183 | ललितोप्सरोभवं किल मुनेरपत्यं० | 2 | 9 | 127 |
| 184 | वल्मीकार्धनिमग्नमूर्तिरुरग्० | 7 | 11 | 223 |
| 185 | वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाम० | 7 | 21 | 229 |
| 186 | वाचं न मिश्रयति यद्यपि० | 1 | 31 | 118 |
| 187 | विचिन्तयन्ती यम् अनन्यमानसा० | 4 | 1 | 156 |
| 188 | विच्छित्तिशेषैः सुरसुन्दरीणां | 7 | 5 | 221 |
| 189 | वृथैव संकल्पशतैरजस्रमनङ्ग० | 3 | 6 | 135 |
| 190 | वैखानसं किमनया व्रतमाप्र० | 1 | 27 | 115 |
| 191 | व्यपदेशमाविलयितुं समीहसे० | 5 | 22 | 185 |
| 192 | शक्योरविन्दसुरभिः कणवाही० | 3 | 8 | 136 |
| 193 | शमप्रधानेषु तपोवनेषु गूढं० | 2 | 7 | 125 |
| 194 | शशिकरविशदान्यास्तथा० | 3 | 11 | 137 |
| 195 | शहये किल ये वि णिन्दिदे० | 6 | 1 | 193 |
| 196 | शान्तमिदमाश्रमपदं स्फुरति० | 1 | 15 | 104 |
| 197 | शापादसि प्रतिहता स्मृतिलोप० | 7 | 32 | 234 |
| 198 | शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रम० | 1 | 16 | 105 |
| 199 | शुश्रूषस्व गुरून् कुरु प्रियसखी० | 4 | 20 | 171 |
| 200 | शैलानामवरोहतीव शिखराद्० | 7 | 8 | 222 |
| 201 | संकल्पितं प्रथममेव मया० | 4 | 15 | 168 |
| 202 | संदष्टकुसुमशयनान्याशु० | 3 | 21 | 143 |
| 203 | संमीलन्ति न तावद् बन्धनकोशा० | 3 | 7 | 136 |
244 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 204 | संरोपिते प्यात्मनि धर्मपत्नी० | 6 | 27 | 214 |
| 205 | सख्यस्ते स किल शतक्रतोरवध्य० | 6 | 36 | 218 |
| 206 | सतीमपि ज्ञातिकुलैकसंश्रयां० | 5 | 18 | 183 |
| 207 | सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि० | 1 | 19 | 107 |
| 208 | सा निन्दन्ती स्वानि भाग्यानि० | 5 | 33 | 190 |
| 209 | साक्षात् प्रियामुपगतामपहाय० | 6 | 18 | 207 |
| 210 | सायंतने सवनकर्मणि संप्रवृत्ते० | 3 | 41 | 154 |
| 211 | सिध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि० | 7 | 4 | 220 |
| 212 | सुखपरस्य हरेरुभयैः कृतं० | 7 | 3 | 220 |
| 213 | सुतनु हृदयात् प्रत्यादेशव्यलीक० | 7 | 24 | 230 |
| 214 | सुभगसलिलावगाहाः पाटलिंसंसर्ग० | 1 | 3 | 97 |
| 215 | स्तनन्यस्तोशीरं प्रशिथिल० | 3 | 10 | 137 |
| 216 | स्त्रीणामशिक्षितपटुत्वम्० | 5 | 23 | 187 |
| 217 | स्निग्धं वीक्षितमन्यतो पि नयने० | 2 | 2 | 121 |
| 218 | स्मर एव तापहेतुर्निवापयिता० | 3 | 14 | 139 |
| 219 | स्मृतिभिन्नमोहतमसो दिष्ट्या० | 7 | 22 | 230 |
| 220 | स्रस्तांसावतिमात्रलोहिततलौ० | 1 | 30 | 117 |
| 221 | स्वप्नो नु माया नु मतिभ्रमो० | 6 | 11 | 204 |
| 222 | स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे० | 5 | 6 | 176 |
| 223 | स्वायंभुवान्मरीचेर्यः प्रबभूव० | 7 | 9 | 222 |
| 224 | स्विन्नांगुलिनिवेशाद् रेखा० | 6 | 19 | 208 |
| 225 | हरकोपाग्निदग्धस्य दैवेनामृत० | 3 | 34 | 150 |
परिशिष्ट-2
( सन्दर्भदीपिका में निर्दिष्ट ग्रन्थ एवं ग्रन्थकारों की अ-कारादि क्रम से नामावली )
- अद्भुतसागरः-(1)-15
- अनन्तार्णवः-(2)-3
- अमरः-(1)-4, 7, 8, 12, (2)-2, 8, 12, (3)-6, 15, 25, (4)-9, (5)-9, 14, 19, 28, (7)-11,
- अमरटीका-(6)-30,
- आगमः-(7)-35,
- कविकण्ठहारः-(1)-25,
- कविकल्पलतिका-(3)-5,
- कालिदासः-(1)-1,
- काव्यमीमांसकः-(1)-6,
- कोषः-(1)-16, 20, (2)-10, (3)-24, (5)-21,
- गुरवः-(1)-10,
- चतुर्भुजमिश्रः-(1)-1,
- तीरभुक्तीयग्रन्थः-(1)-20,
- त्रिकाण्डशेषः-(4)-6,
- त्रिलोचनमिश्रः-(1)-1, 23, 24, (3)-5, (6)-33,
- दर्पणकारः (विश्वनाथः)-(3)-38, (5)-4,
- दाक्षिणात्यग्रन्थः-(1)-20, (6)-16,
- दुर्गटीका-(2)-15,
- देशी-(4)-18, (5)-19,
- नव्याः-(1)-1, 14,
- नाट्यलोचनः-(1)-23, 24, (3)-5, (6)-33,
- पाणिनिसूत्रम्-(1)-15, (2)-1 से पूर्व,
- पुराणपुस्तकम्-(5)-24,
246 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
- प्राकृतसूत्रम्-(1)-2, 15, 20, (3)-19, 37, (4)-13, (6)-2, 32, (7)-20,
- प्राचीनपुस्तकम्-(5)-20,
- प्राज्ञः (महिमभट्टः)-(2)-6,
- भरतः-(1)-1, 4, 5, 16, 21, 23, 24, (2)-1, 3, 13, (3)-1, 2, 10, 11, 14, 19, 20, 35, (4)-5, (5)-1, (6)-2,
- भर्तृहरिमिश्रः-(1)-1,
- मनुः-(1)-14, (3)-28, (5)-14,
- मेदिनी-(1)-10, 12, 16, (2)-11, (3)-25, 30, (6)-29,
- वामदेवमिश्रः-(1)-1,
- विदेशीयपुस्तकम्-(1)-14, 17, (4)-20, (6)-14, 20, (7)-5,
- व्याकरणम्-(5)-14, 30,
- व्याडिः-(1)-1,
- शङ्करः-(1)-1, 3, 4, 5, 9, 9, 10, 14, 15, 15, 16,17, 17, 20, 21, 21, 23, 24, 24, 24, 25, 25, 27, (2)-1, 3, 4, 4, 4, 5, 6, 7, 7, 7, 10, 11, 14, 17,17, (3)-5, 8, 20, 23, 28, 33, 36,37,37,37, 40, (4) 1, 1, 2, 3, 5, 5, 6, 6, 7,14,18,19, (5)-5,5,9,10, 11, 17,18, 20, 23, (6)-1, 2, 2, 6, 11, 15, 27, 34, (7)-6, 8, 11, 13, 14, 15, 20, 20,
- शाश्वतः-(1)-12, 12, 14, 26, (3)-9, 23, (4)-15, 20,
- सामुद्रिकः-(7) -15,
- साहसांकः-(1)-1,
- साहित्यदर्पणः-(2)-4,
- साहित्यरत्नाकरः-(1)-20, 23, (यज्ञनारायण दीक्षितः)
- हारावली-(4)-18, (6) 1.
सन्दर्भ ग्रन्थ-सूचि:
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Abhijnanaśakuntala, (The purer Devanagari Text), Ed. Prof. P.N. Patankar, Pub. Shiralkar&Co., Poona, 1902
Abhijnana Śakuntalam, Ed. Sharad Ranjan Rai, Calcutta, 1908
Abhijnana Śakuntalam, Ed. S.K. Belvalkar, Pub. Sahity Akademi, New Delhi, 1965
Die Kac'mirer Śakuntala–Handschrift, Ed. Karl Burkhard, Published in SITZUNGSBERICHTE Der Philosophisch & Historiischen Classe, Wein, Germany, 1884
Kalidāsa's Śakuntala, Ed. Richard Pischel, Harvard University Press, Cambridge, 1876, (Second Edition in 1922.
Patankar, P.N. (1902), TheAbhijnanaśakuntala, Poona: Shiralkar & Co, Boodhwar Peith, Poona.
Pischel, R. (1876] (Seond edition & 1922), Kalidāsa's Śakuntala, an Ancient Hindu Drama, Cambridge: Harvard University Press.
Sacuntala Annulo Recognita, (Textum Recensionis Devanagaricae Recognovit)] Ed. Carolus Burkhard, Vratislaviae, Impensis J.U. Kerni, Bonnensis, 1872
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248 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
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