अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
सर्ग २ ] अरण्यकाण्ड १०९
| द्रष्टुं सुमित्रासुतजानकीभ्यां<br>तदा दयाऽस्मासु दृढा भविष्यति ॥१७॥ | आश्रमोंको देखनेके लिये चलिये। ऐसा करनेसे आपको हमपर बड़ी दया आयेगी" ॥१७॥ |
| इति विज्ञापितो रामः कृताञ्जलिपुटैर्विभुः ।<br>जगाम मुनिभिः सार्धं द्रष्टुं मुनिवनानि सः ॥१८॥ | इस प्रकार हाथ जोड़कर निवेदन किये जानेपर भगवान् राम मुनियोंके साथ उनके तपोवनोंको देखने-के लिये चले ॥ १८ ॥ |
| ददर्श तत्र पतितान्यनेकानि शिरांसि सः ।<br>अस्थिभूतानि सर्वत्र रामो वचनमब्रवीत् ॥१९॥ | वहाँ उन्होंने सब ओर बहुत-सी खोपड़ियाँ पड़ी देखीं। उन्हें देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे पूछा-॥ १९ ॥ |
| अस्थीनि केषामेतानि किमर्थं पतितानि वै ।<br>तमूचुर्मुनयो राम ऋषीणां मस्तकानि हि ॥२०॥ | "ये हड्डियाँ किनकी हैं और इस तपोभूमिमें कैसे पड़ी हैं?" तब मुनीश्वरोंने कहा-"हे राम ! ये ऋषियोंके मस्तक हैं ॥ २०॥ |
| राक्षसैर्भक्षितानीश प्रमत्तानां समाधितः ।<br>अन्तरायं मुनीनां ते पश्यन्तोऽनुचरन्ति हि ॥२१॥ | हे समर्थ ! इन्हें राक्षसोंके खा लिया है, वे राक्षस समाधिसे विरत हुए मुनीश्वरोंको भक्षण करनेके लिये मौका देखते हुए जहाँ-तहाँ घूमते रहते हैं" ॥ २१ ॥ |
| श्रुत्वा वाक्यं मुनीनां स भयदैन्यसमन्वितम् ।<br>प्रतिज्ञामकरोद्रामो वधायाशेषरक्षसाम् ॥२२॥ | मुनियोंके ये भय और दीनतापूर्ण वचन सुनकर श्रीराम-चन्द्रजीने समस्त राक्षसोंका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की ॥ २२ ॥ |
| पूज्यमानः सदा तत्र मुनिभिर्वनवासिभिः ।<br>जानक्या सहितो रामो लक्ष्मणेन समन्वितः ॥२३॥<br>उवास कतिचित्तत्र वर्षाणि रघुनन्दनः ।<br>एवं क्रमेण संपश्यन्नृषीणामाश्रमान्विभुः ॥२४॥ | इस प्रकार क्रमशः मुनीश्वरोंके आश्रम देखते हुए श्रीरघुनाथजी वनवासी मुनियोंद्वारा नित्य पूजित हुए सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँ कुछ वर्ष रहे ॥ २३-२४॥ |
| सुतीक्ष्णस्याश्रमं प्रागात्प्रख्यातमृषिसङ्कुलम् ।<br>सर्वर्तुगुणसम्पन्नं सर्वकालसुखावहम् ॥२५॥ | तदनन्तर वे सुविख्यात सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें गये जो ऋषियोंसे घिरा हुआ समस्त ऋतुओंके गुणोंसे युक्त और सब समय सुखदायक था ॥ २५॥ |
| राममागतमाकर्ण्य सुतीक्ष्णः स्वयमागतः ।<br>अगस्त्यशिष्यो रामस्य मन्त्रोपासनतत्परः ।<br>विधिवत्पूजयामास भक्त्युत्कण्ठितलोचनः ॥२६॥ | रामका आगमन सुन राम-मन्त्रके उपासक और अगस्त्यके शिष्य सुतीक्ष्ण उन्हें लेनेके लिये स्वयं आगे आये और उनकी विधिवत् पूजा की । उस समय सुतीक्ष्णके नेत्र भक्तिवश भगव-द्दर्शनके लिये अति उतावले हो रहे थे ॥ २६ ॥ |
| सुतीक्ष्ण उवाच<br>त्वन्मन्त्रजाप्यहमनन्तगुणाममेय<br>सीतापते शिवविरिञ्चिसमाश्रिताङ्घ्रे ।<br>संसारसिन्धुतरणामलपोतपाद<br>रामाभिराम सततं तव दासदासः ॥२७॥ | **सुतीक्ष्ण बोले—**हे अनन्त-गुण अप्रमेय सीता-पते ! मैं आपका ही मन्त्र जपता हूँ । हे अभिराम राम ! आपके चरण संसार-सागरसे पार करनेके लिये सुदृढ पोत (जहाज) स्वरूप हैं; शिव और ब्रह्मा सर्वदा उनकी सेवा करते हैं। हे नाथ ! मैं सर्वदा आपके दासोंका दास हूँ ॥ २७ ॥ |
| मामद्य सर्वजगतामविगोचरस्त्वं<br>त्वन्मायया सुतकलत्रगृहान्धकूपे ।<br>मग्नं निरीक्ष्य मलपुद्गलपिण्डमोह-<br>पाशानुबद्धहृदयं स्वयमागतोऽसि ॥२८॥ | आप समस्त संसार-की इन्द्रियोंके अविषय हैं, तथापि इस मल-मूत्रके पुतले शरीरके मोह-पाशमें जिसका हृदय बँधा हुआ है ऐसे मुझ दीनको अपनी ही मायासे मोहित होकर पुत्र-कलत्र और गृह आदिके अन्धकूपमें पड़ा देखकर आप स्वयं ही मुझे अपना पुण्य-दर्शन देनेके लिये पधारे हैं ! ॥ २८ ॥ आप समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराज- |
| ११० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| त्वं सर्वभूतहृदयेषु कृतालयोऽपि<br>त्वन्मन्त्रजाप्यविमुखेषु तनोषि मायाम्<br>त्वन्मन्त्रसाधनपरेष्वपयाति माया<br>सेवानुरूपफलदोऽसि यथा महीपः ॥ २९ ॥ | मान हैं, तथापि जो लोग आपके मन्त्रजापसे विमुख हैं उन्हें आप अपनी मायासे मोहित करते हैं और जो उस मन्त्रके जापमें तत्पर हैं उनकी माया दूर हो जाती है। इस प्रकार राजाके समान आप सबको उनकी सेवाके अनुसार फल देनेवाले हैं ॥ २९ ॥ हे ईश ! वास्तवमें एकमात्र आप ही इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण हैं; तथापि मुग्धचित्त पुरुषोंको त्रिगुणमयी मायाके कारण ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आदि विविध रूपोंमें भासते हैं; जिस प्रकार जलके पात्रोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे सूर्य अनेक होकर भासता है ॥ ३० ॥ हे राम ! आप अज्ञान-से सर्वथा परे हैं। तथापि आपके चरणकमलोंको आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। (इससे विदित होता है कि) सबके साक्षी होनेसे आप असत्पुरुषोंको अगोचर होकर भी जिनका चित्त आपके मन्त्रजापसे शुद्ध हो गया है उनपर सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ ३१ ॥ हे राम ! आप रूपरहित हैं, तथापि अपने ही माया-विलाससे धारण किये आपके मनोहर मनुष्य-वेष-धारी स्वरूपको मैं देख रहा हूँ। आपका यह रूप करोड़ों कामदेवोंके समान कान्तिमान् है और कमनीय धनुर्बाण धारण किये है। आपका हृदय दयार्द्र तथा मुख मनोहर मुसकानयुक्त है ॥ ३२ ॥ जो सीताजीसे युक्त हैं, कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं, सर्वथा अजेय हैं, जिनके चरणकमल नित्य श्रीसुमित्रानन्दनसे सेवित हैं और जिनकी नीलकमलके समान आभा है उन अनन्तगुणसम्पन्न शान्तमूर्ति सौभाग्यस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ३३ ॥ हे राम ! जो लोग आपके स्वरूपको देश-काल आदि समस्त उपाधियोंसे रहित और चिद्घन प्रकाशस्वरूप जानते हैं, वे भले ही वैसा ही जानें; किन्तु मेरे हृदयमें तो, आज जो प्रत्यक्षरूपसे मुझे दिखायी दे रहा है, यही रूप भासमान होता रहे। इसके अतिरिक्त मुझे और किसी रूप की इच्छा नहीं है ॥ ३४ ॥ |
| विश्वस्य सृष्टिलयसंस्थितिहेतुरेक-<br>स्त्वं मायया त्रिगुणया विधिरीशविष्णू<br>भासीश मोहितधियां विविधाकृतिस्त्वं<br>यद्वद्रविः सलिलपात्रगतो ह्यनेकः ॥ ३० ॥ | |
| प्रत्यक्षतोऽद्य भवतश्चरणारविन्दं<br>पश्यामि राम तमसः परतः स्थितस्य ।<br>दृक्प्रत्यस्त्वमसतामविगोचरोऽपि<br>त्वन्मन्त्रपूतहृदयेषु सदा प्रसन्नः ॥ ३१ ॥ | |
| पश्यामि राम तव रूपमरूपिणोऽपि<br>मायाविडम्बनकृतं सुमनुष्यवेषम् ।<br>कन्दर्पकोटिसुभगं कमनीयचाप-<br>बाणं दयार्द्रहृदयं स्मितचारुवक्त्रम् ॥ ३२ ॥ | |
| सीतासमेतमजिनाम्बरमप्रधृष्यं<br>सौमित्रिणा नियतसेवितपादपद्मम् ।<br>नीलोत्पलद्युतिमनन्तगुणं प्रशान्तं<br>तद्भागधेयमनिशं प्रणमामि रामम् ॥ ३३ ॥ | |
| जानन्तु राम तव रूपमशेषदेश-<br>कालाद्युपाधिरहितं घनचित्रप्रकाशम् ।<br>प्रत्यक्षतोऽद्य मम गोचरमेतदेव<br>रूपं विभातु हृदये न परं विकाङ्क्षे ॥ ३४ ॥ | |
| इत्येवं स्तुवतस्तस्य रामः सस्मितमब्रवीत् ।<br>मुने जानामि ते चित्तं निर्मलं मदुपासनात् ॥ ३५ ॥<br>अतोऽहमागतो द्रष्टुं मदृते नान्यसाधनम् ।<br>मन्मन्त्रोपासका लोके मामेव शरणं गताः ॥ ३६ ॥ | सुतीक्ष्णके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे मुसकाकर कहा—"हे मुने ! मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारा चित्त मेरी उपासनासे निर्मल हो गया है ॥ ३५ ॥ और तुम्हारा मेरे अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है, इसीलिये मैं तुम्हें देखनेके लिये आया हूँ। संसारमें जो लोग मेरे मन्त्रकी उपासना करते हैं और |
अरण्यकाण्ड - सर्ग ३: मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट
सर्ग ३ ] अरण्यकाण्डे १११
| निरपेक्षा नान्यगतास्तेषां दृश्योऽहमन्वहम् ।<br>स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु त्वत्कृतं मत्प्रियं सदा ॥३७॥<br>सद्भक्तिर्मे भवेत्तस्य ज्ञानं च विमलं भवेत् ।<br>त्वं ममोपासनादेव विमुक्तोऽसीह सर्वतः ॥३८॥<br>देहान्ते मम सायुज्यं लप्स्यसे नात्र संशयः ।<br>गुरुं ते द्रष्टुमिच्छामि ह्यगस्त्यं मुनिनायकम् ।<br>किञ्चित्कालं तत्र वस्तुं मनो मे त्वरयत्यलम् ॥३९॥<br><br>सुतीक्ष्णोऽपि तथेत्याह श्वो गमिष्यसि राघव ।<br>अहमप्यागमिष्यामि चिराद्दृष्टो महामुनिः ॥४०॥<br>अथ प्रभाते मुनिना समेतो<br>रामः ससीतः सह लक्ष्मणेन ।<br>अगस्त्यसम्भाषणलोलमानसः<br>शनैरगस्त्यानुजमन्दिरं ययौ ॥४१॥ | मेरी ही शरणमें रहते हैं ॥ ३६ ॥ तथा नित्य निरपेक्ष और अनन्यगति रहते हैं, उन्हें मैं नित्यप्रति दर्शन देता हूँ। जो व्यक्ति तुम्हारे किये हुए इस मेरे प्रिय स्तोत्रका पाठ करता है ॥ ३७॥ उसे मेरी शुद्ध भक्ति और निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है, तुम केवल मेरी उपासनासे इस जीवितावस्थामें ही सब प्रकार मुक्त हो गये हो ॥ ३८ ॥ शरीर छूटनेपर तुम निस्सन्देह मेरा सायुज्यपद प्राप्त करोगे। अब मैं तुम्हारे गुरु मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीसे मिलना चाहता हूँ; मेरा चित्त उनके पास कुछ दिन रहनेके लिये उतावला हो रहा है” ॥ ३९ ॥<br><br>सुतीक्ष्णने कहा, “बहुत अच्छा, वहाँ कल चलिये । मैने भी मुनीश्वरको बहुत दिन हुए तब देखा था । अतः हे राघव ! मैं भी आपके साथ ही वहाँ चलूँगा” ॥ ४० ॥ प्रातःकाल होनेपर सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण मुनिको लेकर अगस्त्यजीसे वार्तालाप करनेके लिये उत्कण्ठित हो शनैः-शनैः उनके छोटे भाई ( अग्निजिह्व मुनि ) के आश्रमकी ओर चले ॥ ४१ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीय सर्ग
मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट ।
| श्रीमहादेव उवाच<br>अथ रामः सुतीक्ष्णेन जानक्या लक्ष्मणेन च ।<br>अगस्त्यस्यानुजस्थानं मध्याह्ने समपद्यत ॥ १ ॥<br>तेन सम्पूजितः सम्यग्भुक्त्वा मूलफलादिकम् ।<br>परेद्युः प्रातरुत्थाय जग्मुस्तेऽगस्त्यमण्डलम् ॥ २ ॥<br>सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं नानामृगगणैर्युतम् ।<br>पक्षिसङ्घैश्च विविधैर्नादितं नन्दनोपमम् ॥ ३ ॥ | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! उस दिन मध्याह्नके समय श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण, सीता और लक्ष्मणके साथ अगस्त्य मुनिके छोटे भाई अग्निजिह्व मुनिके आश्रममें पहुँचे ॥ १ ॥ उन्होंने उनकी भली प्रकार पूजा की फिर उनके दिये हुए कन्द-मूल-फल आदि खाकर, दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही अगस्त्य मुनिके आश्रमको चले ॥ २ ॥<br><br>वह आश्रम समस्त ऋतुओंके फल और पुष्पोंसे परिपूर्ण, विविध वन्य पशुओंसे सेवित तथा नाना प्रकारके पक्षियोंसे गुञ्जायमान नन्दनवनके समान सुशोभित |
| ११२ | अध्यात्मरामायणे | [ सर्ग ३ |
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ब्रह्मर्षिभिर्देवर्षिभिः सेवितं मुनिमन्दिरैः ।
सर्वतोऽलङ्कृतं साक्षाद्ब्रह्मलोकमिवापरम् ॥ ४ ॥
बहिरेवाश्रमस्याथ स्थित्वा रामोऽब्रवीन्मुनिम् ।
सुतीक्ष्ण गच्छ त्वं शीघ्रमागतं मां निवेदय ॥ ५ ॥
अगस्त्यमुनिवर्याय सीतया लक्ष्मणेन च ।
महाप्रसाद इत्युक्त्वा सुतीक्ष्णः प्रययौ गुरोः ॥ ६ ॥
आश्रमं त्वरया तत्र ऋषिसङ्घैस्समावृतम् ।
उपविष्टं रामभक्तैर्विशेषेण समायुतम् ॥ ७ ॥
व्याख्यातारममन्त्रार्थं शिष्येभ्यश्चातिभक्तितः ।
दृष्ट्वावागस्त्यं मुनिश्रेष्ठं सुतीक्ष्णः प्रययौ मुनेः ॥८॥
दण्डवत्प्रणिपत्याह विनयावनतः सुधीः ।
रामो दाशरथिर्ब्रह्मन् सीतया लक्ष्मणेन च ।
आगतो दर्शनार्थं ते बहिस्तिष्ठति साञ्जलिः ॥ ९ ॥
अगस्त्य उवाच
शीघ्रमानय भद्रं ते रामं मम हृदि स्थितम् ।
तमेव ध्यायमानोऽहं काङ्क्षमाणोऽत्र संस्थितः ॥१०॥
इत्युक्त्वा स्वयमुत्थाय मुनिभिः सहितो द्रुतम् ।
अभ्यगात्परया भक्त्या गत्वा राममथाब्रवीत् ॥११॥
आगच्छ राम भद्रं ते दिष्ट्या तेऽद्य समागमः ।
प्रियातिथिर्मम प्राप्तोऽस्यद्य मे सफलं दिनम् ॥१२॥
रामोऽपि मुनिमायान्तं दृष्ट्वा हर्षसमाकुलः ।
सीतया लक्ष्मणेनापि दण्डवत्पतितो भुवि ॥१३॥
द्रुतमुत्थाप्य मुनिराड्रागमालिङ्ग्य भक्तितः ।
तद्गात्रस्पर्शजाह्लादस्रवन्नेत्रजलाकुलः ॥१४॥
गृहीत्वा करमेकेन करेण रघुनन्दनम् ।
जगाम स्वाश्रमं हृष्टो मनसा मुनिपुङ्गवः ॥१५॥
सुखोपविष्टं सम्पूज्य पूजया बहुविस्तरम् ।
भोजयित्वा यथान्यायं भोज्यैर्वन्यैरनेकधा ॥१६॥
हिन्दी अनुवाद
था ॥ ३ ॥ वह ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंसे सेवित था । तथा उसके चारों ओर उन ऋषियोंके आश्रम सुशोभित थे । इस प्रकार वह साक्षात् दूसरे ब्रह्मलोकके समान जान पड़ता था ॥ ४ ॥ आश्रमके बाहर रहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुतीक्ष्ण मुनिसे कहा—"हे सुतीक्ष्ण ! तुम शीघ्र ही मुनिवर अगस्त्यजीके पास जाकर उन्हें सीता और लक्ष्मणके सहित मेरे आनेकी सूचना दो।" तब सुतीक्ष्ण 'बड़ी प्रसन्नताकी बात है' ऐसा कह शीघ्रतासे गुरुजीके आश्रममें गये । वहाँ जाकर सुतीक्ष्णने देखा कि मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य मुनिमण्डलीसे—विशेषतया रामभक्तोंसे घिरे हुए बैठे हैं और अत्यन्त भक्तिपूर्वक अपने शिष्योंको राममन्त्रकी व्याख्या सुना रहे हैं । यह देखकर सुतीक्ष्ण उनके पास गये ॥ ५-८ ॥ उन्हें विनयपूर्वक दण्डवत्-प्रणामकर सुबुद्धि सुतीक्ष्णने कहा—"ब्रह्मन् ! दशरथकुमार श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ आपके दर्शनोंके लिये आये हैं और अञ्जलि बाँधे आश्रमके बाहर खड़े हैं" ॥ ९ ॥
अगस्त्यजी बोले— वत्स ! तुम्हारा कल्याण हो ! तुम शीघ्र ही मेरे हृदयस्थित भगवान् रामको ले आओ । मैं उनके दर्शनोंकी इच्छासे उन्हींका ध्यान करता हुआ यहाँ रहता हूँ ॥ १० ॥ ऐसा कह वे शीघ्र ही मुनियोंके साथ उठकर स्वयं श्रीरामचन्द्रजीके पास आये और उनसे अत्यन्त भक्तिपूर्वक बोले—॥ ११ ॥ "हे राम ! आइये, आपका कल्याण हो । आज बड़े भाग्यसे आपका समागम हुआ है । आजका दिन सफल है, आज मुझे मेरे प्रिय अतिथि प्राप्त हुए हैं" ॥ १२ ॥
मुनीश्वरको आते देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताके सहित पृथिवीपर दण्डके समान लेट गये ॥ १३ ॥ तब मुनिराजने तुरन्त ही रामको उठाकर प्रेमपूर्वक हृदयसे लगा लिया और उनके शरीर-स्पर्शसे प्राप्त हुए आनन्दसे उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ १४ ॥
तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी एक हाथसे श्रीरघुनाथजीका हाथ पकड़कर उन्हें प्रसन्न-मनसे अपने आश्रममें ले आये ॥ १५ ॥ और उन्हें सुखपूर्वक आसनपर बैठाकर उनकी विधि-विधानसे बड़ी पूजा की तथा समयानुकूल नाना प्रकारके वन्य... ॥ १६ ॥
सर्ग ३ ] अरण्यकाण्ड ११३
सुखोपविष्टमेकान्ते रामं शशिनिभाननम् ।
कृताञ्जलिरुवाचेदमगस्त्यो भगवानृषिः ॥ १७॥
त्वदागमनमेवाहं प्रतीक्षन्समवस्थितः ।
यदा क्षीरसमुद्रान्ते ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ॥ १८॥
भूमेर्भारापनुत्त्यर्थं रावणस्य वधाय च ।
तदादि दर्शनाकाङ्क्षी तव राम तपश्चरन् ।
वसामि मुनिभिः सार्धं त्वामेव परिचिन्तयन् ॥ १९॥
सृष्टेः प्रागेक एवासीन्निर्विकल्पोऽनुपाधिकः ।
त्वदाश्रया त्वद्विषया माया ते शक्तिरुच्यते ॥ २०॥
त्वामेव निर्गुणं शक्तिरावृणोति यदा तदा ।
अव्याकृतमिति प्राहुर्वेदान्तपरिनिष्ठिताः ॥ २१॥
मूलप्रकृतिरित्येके प्राहुर्मायेति केचन ।
अविद्या संसृतिर्बन्ध इत्यादि बहुधोच्यते ॥ २२॥
त्वया संक्षोभ्यमाणा सा महत्तत्त्वं प्रसूयते ।
महत्तत्त्वादहङ्कारस्त्वया सञ्चोदितादभूत् ॥ २३॥
अहङ्कारो महत्तत्त्वसंवृतस्त्रिविधोऽभवत् ।
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्चेति भण्यते ॥ २४॥
तामसात्सूक्ष्मतन्मात्राण्यासन् भूतान्यतः परम् ।
स्थूलानि क्रमशो राम क्रमोत्तरगुणानि ह ॥ २५॥
राजसानीन्द्रियाण्येव सात्त्विका देवता मनः ।
तेभ्योऽभवत्सूत्ररूपं लिङ्गं सर्वगतं महत् ॥ २६॥
ततो विराट्समुत्पन्नः स्थूलाद् भूतकदम्बकात् ।
विराजः पुरुषात्सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २७॥
देवतिर्यङ्मनुष्याश्च कालकर्मक्रमेण तु ।
त्वं रजोगुणतो ब्रह्मा जगतः सर्वकारणम् ॥ २८॥
सत्त्वाद्द्विष्णुस्त्वमेवास्य पालकः सद्भिरुच्यते ।
लये रुद्रस्त्वमेवास्य त्वन्मायागुणभेदतः ॥ २९॥
इस प्रकार एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे हुए चन्द्रवदन श्रीरामचन्द्रजीसे भगवान् अगस्त्य मुनिने हाथ जोड़कर कहा—॥ १७ ॥ हे राम ! पूर्वकालमें जिस समय क्षीरसमुद्रके समीप ब्रह्माजीने आपसे भूमिके भार उतारनेके लिये रावणका वध करनेकी प्रार्थना की थी, तभीसे आपके दर्शनोंकी इच्छासे मैं तपस्या करता हुआ और आपहीका चिन्तन करता हुआ आपके आनेकी प्रतीक्षा में यहाँ मुनियोंके साथ रहता हूँ ॥ १८-१९॥ सृष्टि-के आरम्भमें विकल्प और उपाधिसे रहित आप अकेले ही थे, (उस समय और कुछ भी नहीं था)। आपके आश्रय रहनेवाली तथा आपहीको विषय करनेवाली माया आपकी ही शक्ति कही जाती है ॥ २० ॥ जिस समय यह माया-शक्ति आप निर्गुणको ढँक लेती है उस समय वेदान्तनिष्ठ पुरुष इसे 'अव्याकृत' कहते हैं ॥ २१ ॥ कोई इसे 'मूलप्रकृति' कहते हैं और कोई माया; तथा यही अविद्या, संसृति और बन्धन आदि अनेक नामोंसे पुकारी जाती है ॥ २२ ॥ आपके द्वारा क्षुभित होनेपर इस शक्तिसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है और महत्तत्त्वसे आपहीकी प्रेरणासे अहंकार प्रकट हुआ है ॥ २३ ॥ महत्तत्त्वसे ओतप्रोत वह अहंकार तीन प्रकारका हुआ; जो सात्त्विक, राजस और तामस कहलाता है ॥ २४ ॥ हे राम ! तामस अहंकारसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ हुईं और इन सूक्ष्म तन्मात्राओंसे इनके गुणानुसार क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाँच स्थूल भूत हुए ॥ २५ ॥ राजस अहंकारसे दश इन्द्रियाँ और सात्त्विक अहंकारसे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवता तथा मन उत्पन्न हुए; और इन सबसे मिलकर समष्टि-सूक्ष्म-शरीररूप हिरण्यगर्भ हुआ, जिसका दूसरा नाम सूत्रात्मा भी है ॥ २६॥ फिर स्थूल भूतसमूहसे विराट् उत्पन्न हुआ तथा विराट् पुरुषसे यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगम संसार प्रकट हुआ ॥ २७ ॥ हे जगदीश्वर ! कालक्रमसे आप ही देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि योनियोंमें प्रकट हुए हैं। अपने मायिक गुणोंके भेदसे आप ही रजोगुणद्वारा जगत्कर्ता ब्रह्माजी, सत्त्वगुणद्वारा जगत्की रक्षा करनेवाले विष्णु और तमोगुणसे उसका लय करनेवाले. भगवान् रुद्र हुए हैं, ऐसा सत्पुरुष कहते हैं ॥ २८-२९॥
| ११४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ३ |
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[मूल संस्कृत श्लोक]
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या वृत्तयो बुद्धिजैर्गुणैः ।
तासां विलक्षणो राम त्वं साक्षी चिन्मयोऽव्ययः ॥
सृष्टिलीलां यदा कर्तुमीहसे रघुनन्दन ।
अङ्गीकरोषि मायां त्वं तदा वै गुणवानिव ॥३१॥
राम माया द्विधा भाति विद्याऽविद्येति ते सदा ।
प्रवृत्तिमार्गनिरता अविद्यावशवर्तिनः ।
निवृत्तिमार्गनिरता वेदान्तार्थविचारकाः ॥३२॥
त्वद्भक्तिनिरता ये च ते वै विद्यामयाः स्मृताः ।
अविद्यावशगा ये तु नित्यं संसारिणश्च ते ।
विद्याभ्यासरता ये तु नित्यमुक्तास्त एव हि ॥३३॥
लोके त्वद्भक्तिनिरतास्त्वन्मन्त्रोपासकाश्च ये ।
विद्या प्रादुर्भवेत्तेषां नेतरेषां कदाचन ॥३४॥
अतस्त्वद्भक्तिसम्पन्ना मुक्ता एव न संशयः ।
त्वद्भक्त्यमृतहीनानां मोक्षः स्वप्नेऽपि नो भवेत् ३५
किं राम बहुनोक्तेन सारं किञ्चिद्रवीमि ते ।
साधुसङ्गतिरेवात्र मोक्षहेतुरुदाहृता ॥३६॥
साधवः समचित्ता ये निःस्पृहा विगतैषिणः ।
दान्ताः प्रशान्तास्त्वद्भक्ता निवृत्ताखिलकामनाः ॥
इष्टप्राप्तिविपत्त्योश्च समाः सङ्गविवर्जिताः ।
संन्यस्ताखिलकर्माणः सर्वदा ब्रह्मतत्पराः ॥३८॥
यमादिगुणसम्पन्नाः सन्तुष्टा येनकेनचित् ।
सत्सङ्गमो भवेद्यर्हि त्वत्कथाश्रवणे रतिः ॥३९॥
समुदेति ततो भक्तिस्त्वयि राम सनातने ।
त्वद्भक्तावुपपन्नायां विज्ञानं विपुलं स्फुटम् ॥४०॥
उदेति मुक्तिमार्गोऽयमाद्यश्चतुरसेवितः ।
तस्माद्राघव सद्भक्तिस्त्वयि मे प्रेमलक्षणा ॥४१॥
[हिन्दी अनुवाद]
हे राम ! बुद्धिके सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंसे ही प्राणीकी क्रमशः जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएँ होती हैं, पर आप इन तीनोंसे सर्वथा पृथक्, इनके साक्षी, चिन्स्वरूप और अविनाशी हैं ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! जिस समय आप संसार-रूपी लीलाका विस्तार करना चाहते हैं उस समय मायाको अंगीकार कर गुणवान्-से हो जाते हैं ॥ ३१ ॥ हे राम ! आपकी यह माया सदा विद्या और अविद्या दो रूपसे भासती है । जो लोग प्रवृत्ति-मार्गमें लगे रहते हैं वे अविद्याके वशीभूत हैं और जो वेदान्तार्थका विचार करनेवाले, निवृत्ति-परायण और आपकी भक्तिमें निरत हैं वे विद्वान् समझे जाते हैं । इनमेंसे जो अविद्याके वशीभूत हैं वे सदा जन्म-मरणरूप संसारमें फँसे रहते हैं और जो विद्याभ्यासी हैं वे ही नित्यमुक्त हैं ॥ ३२-३३ ॥ संसारमें जो लोग आपकी भक्तिमें तत्पर और आपहीके मन्त्रकी उपासना करनेवाले होते हैं उन्हींके अन्तःकरणमें विद्याका प्रादुर्भाव होता है और किसीको नहीं ॥ ३४ ॥ अतः जो पुरुष आपकी भक्तिसे सम्पन्न हैं वे निस्सन्देह मुक्त ही हैं, आपकी भक्तिरूप अमृतके बिना स्वप्नमें भी मोक्ष नहीं हो सकता ॥ ३५ ॥ हे राम ! और अधिक क्या कहूँ ? इस विषयमें जो सार बात है वह तुम्हें बताये देता हूँ—संसारमें साधुसंग ही मोक्षका मुख्य कारण कहा गया है ॥ ३६ ॥ संसारमें जो लोग सम्पद्-विपद्में समान-चित्त, स्पृहारहित, पुत्र-वित्तादिकी ईषणाओंसे रहित, इन्द्रियोंका दमन करने-वाले, शान्तचित्त, आपके भक्त, सम्पूर्ण कामनाओंसे शून्य, इष्ट तथा अनिष्टकी प्राप्तिमें समान रहनेवाले, संगहीन, समस्त कर्मोंका त्याग करनेवाले, सर्वदा ब्रह्म-परायण रहनेवाले, यम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेवाले होते हैं वे ही साधु कहलाते हैं । जिस समय ऐसे साधु पुरुषोंका संग होता है तो आपके कथा-श्रवणमें प्रेम हो जाता है ॥ ३७-३९ ॥ हे राम ! तदनन्तर आप सनातन पुरुषमें भक्ति हो जाती है, तथा आपकी भक्ति हो जानेपर आपका स्फुट तथा प्रचुर ज्ञान प्राप्त होता है । यही चतुर-जनसेवित मुक्तिका आद्य मार्ग है । अतः हे राघव ! आपमें मेरी सर्वदा प्रेमलक्षणा भक्ति बनी रहे और हे हरे !
सर्ग ३ ] अरण्यकाण्ड ११५
सदा भूयाद्धरे सङ्गस्त्वद्भक्तेषु विशेषतः ।
अद्य मे सफलं जन्म भवत्सन्दर्शनादभूत् ॥४२॥
अद्य मे क्रतवः सर्वे बभूवुः सफलाः प्रभो ।
दीर्घकालं मया तप्तमनन्यमतिना तपः ।
तस्यैह तपसो राम फलं तव यदर्चनम् ॥४३॥
सदा मे सीतया सार्धं हृदये वस राघव ।
गच्छतस्तिष्ठतो वापि स्मृतिः स्यान्मे सदा त्वयि ॥
मुझे अधिकतर आपके भक्तोंका संग प्राप्त हो । हे नाथ ! आज आपके दर्शनोंसे मेरा जन्म सफल हो गया ॥ ४०–४२ ॥ हे प्रभो ! आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ सफल हो गये । मैंने बहुत समयसे अनन्य भावसे तपस्या की है । हे राम ! आज जो मैंने आपकी प्रत्यक्ष पूजा की यह उस तपस्याका ही फल है ॥ ४३ ॥ हे राघव ! सीताके सहित आप सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करें; मुझे चलते-फिरते सदा आपका स्मरण बना रहे ॥४४॥
इति स्तुत्वा रमानाथमगस्त्यो मुनिसत्तमः ।
ददौ चापं महेन्द्रेण रामार्थे स्थापितं पुरा ॥४५॥
अक्षय्यौ बाणतूणीरौ खड्गो रत्नविभूषितः ।
जहि राघव भूभारभूतं राक्षसमण्डलम् ॥४६॥
यदर्थमवतीर्णोऽसि मायया मनुजाकृतिः ।
इतो योजनयुग्मे तु पुण्यकाननमण्डितः ॥४७॥
अस्ति पञ्चवटीनाम्ना आश्रमो गौतमीतटे ।
नेतव्यस्तत्र ते कालः शेषो रघुकुलोद्वह ॥४८॥
तत्रैव बहुकार्याणि देवानां कुरु सत्पते ॥४९॥
लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुति कर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीने उन्हें पूर्वकालमें रामहीके लिये इन्द्रका दिया हुआ धनुष, बाणोंसे भरे हुए कभी खाली न होनेवाले दो तरकश तथा एक रत्नजटित खड्ग दिया और कहा—"हे राघव ! पृथिवीके भाररूप राक्षसोंका संहार करो ॥ ४५-४६ ॥ जिसके लिये आपने माया-मानव-रूपसे अवतार लिया है । यहाँसे दो योजनकी दूरीपर गौतमी नदीके किनारे पवित्र वनसे सुशोभित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है । हे रघुनाथजी ! आप अपना शेष काल वहीं व्यतीत करें । हे सत्पते ! वहीं रहकर आप देवताओंके बहुत-से कार्य सिद्ध करें" ॥ ४७–४९ ॥
श्रुत्वा तदागस्त्यसुभाषितं वचः
स्तोत्रं च तत्त्वार्थसमन्वितं विभुः ।
मुनिं समाभाष्य मुदान्वितो ययौ
प्रदर्शितं मार्गमशेषविद्वरिः ॥५०॥
तदनन्तर सर्वज्ञ भगवान् राम अगस्त्यजीका यह मनोहर भाषण और तत्त्वार्थगर्भित स्तोत्र सुन उनसे बातचीत कर प्रसन्नतापूर्वक उनके दिखाये हुए मार्गसे चले ॥ ५० ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
अरण्यकाण्ड - सर्ग ४: पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश
| ११६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
|---|
चतुर्थ सर्ग
पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश।
| श्रीमहादेव उवाच | |
|---|---|
| मार्गे व्रजन्ददर्शाथ शैलशृङ्गमिव स्थितम् ।<br>वृद्धं जटायुषं रामः किमेतदिति विस्मितः ॥१॥ | श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! मार्गमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीने पर्वत-शिखरके समान बैठे हुए वृद्ध जटायुको देखा। उसे देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि 'यह क्या है ?' ॥ १ ॥ तब वे लक्ष्मणजीसे बोले—"सौमित्रे ! मेरा धनुष लाओ। देखो, सामने यह राक्षस बैठा है; मैं ऋषियोंको भक्षण करनेवाले इस दुष्टको अभी मारे डालता हूँ" ॥ २ ॥ |
| धनुरानय सौमित्रे राक्षसोऽयं पुरः स्थितः ।<br>इत्याह लक्ष्मणं रामो हनिष्याम्यृषिभक्षकम् ॥२॥ | |
| तच्छ्रुत्वा रामवचनं गृध्रराड् भयपीडितः ।<br>वधार्होऽहं न ते राम पितुस्तेऽहं प्रियः सखा ॥३॥ | रामका यह वचन सुन गृध्रराजने भयसे व्यथित होकर कहा—"राम ! मैं तुम्हारेद्वारा मारे जाने योग्य नहीं हूँ । मैं तुम्हारे पिताका प्रिय सखा जटायु नामक गृध्र हूँ । तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो तुम्हारा हितकारी हूँ ॥ ३-४ ॥ तुम्हारी ही हित-कामनासे मैं पञ्चवटीमें रहूँगा। किसी समय जब आपके साथ लक्ष्मणजी भी मृगयाके लिये वनमें चले जायँगे तो मैं जनकनन्दिनी सीताजीकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करूँगा।" गृध्रराजके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने स्नेहपूर्वक कहा— ॥५-६॥ "हे गृध्रराज महाराज ! ठीक है, इस पासके वनमें ही रहते हुए आप समीपवर्ती होकर अवश्य हमारा हित-साधन करें" ॥ ७ ॥ |
| जटायुर्नाम भद्रं ते गृध्रोऽहं प्रियकृत्तव ॥४॥ | |
| पञ्चवट्यामहं वत्स्ये तवैव प्रियकाम्यया ।<br>मृगयायां कदाचित्तु प्रयाते लक्ष्मणेऽपि च ॥५॥ | |
| सीता जनककन्या मे रक्षितव्या प्रयत्नतः ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं रामः सस्नेहमब्रवीत् ॥६॥ | |
| साधु गृध्र महाराज तथैव कुरु मे प्रियम् ।<br>अत्रैव मे समीपस्थो नातिदूरे वने वसन् ॥७॥ | |
| इत्यामन्त्रितमालिङ्ग्य ययौ पञ्चवटीं प्रभुः ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया रघुनन्दनः ॥८॥ | इस प्रकार अपनी सम्मति दे भगवान् राम जटायुको आलिङ्गनकर भाई लक्ष्मण और सीताके सहित पञ्चवटीको गये ॥ ८ ॥ गौतमीके तटपर पहुँचकर उन्होंने बुद्धिमान् लक्ष्मणजीसे पञ्चवटीमें एक विशाल कुटी बनवायी ॥ ९ ॥ वहाँ वे सब गङ्गाके उत्तर तटपर कदम्ब, पनस और आम्र आदि फलवाले वृक्षोंसे युक्त एक रोग-रहित जन्य-शून्य एकान्त स्थानमें बस गये। श्रीरामचन्द्रजी बुद्धिमान् लक्ष्मणके सहित जनकात्मजा सीताका मनोरंजन करते हुए उस देवलोकके समान सुरम्य स्थानमें दूसरे इन्द्रके समान सुखपूर्वक रहने लगे। राम-सेवामें जिनका चित्त लगा हुआ है वे लक्ष्मणजी नित्यप्रति उन्हें कन्द-मूल-फल लाकर देते और रात्रिके समय धनुष-बाण लेकर चारों ओर घूमकर रक्षा करते हुए जागा करते ॥१०-१३॥ वे |
| गत्वा ते गौतमीतीरं पञ्चवट्यां सुविस्तरम् ।<br>मन्दिरं कारयामास लक्ष्मणेन सुबुद्धिना ॥९॥ | |
| तत्र ते न्यवसन्सर्वे गङ्गाया उत्तरे तटे ।<br>कदम्बपनसाम्रादिफलवृक्षसमाकुले ॥१०॥ | |
| विविक्ते जनसम्बाधवर्जिते नीरुजस्थले ।<br>विनोदयन् जनकजां लक्ष्मणेन विपश्चिता ॥११॥ | |
| अध्युवास सुखं रामो देवलोक इवापरः ।<br>कन्दमूलफलादीनि लक्ष्मणेाऽनुदिनं तयोः ॥१२॥ | |
| आनीय प्रददौ रामसेवातातपरमानसः ।<br>धनुर्बाणधरो नित्यं रात्रौ जागर्ति सर्वतः ॥१३॥ |
सर्ग ४ ] अरण्यकाण्डे ११७
| स्नानं कुर्वन्त्यनुदिनं त्रयस्ते गौतमीजले ।<br>उभयोर्मध्यगा सीता कुरुते च गमागमौ ॥ १४ ॥ | तीनों ही नित्यप्रति गौतमीमें स्नान किया करते थे । उस समय सीताजी उन दोनोंके बीचमें रहकर आया-जाया करती थीं ॥ १४ ॥ |
| आनीय सलिलं नित्यं लक्ष्मणः प्रीतमानसः ।<br>सेवृतेऽहरहः प्रीत्या एवमासन् सुखं त्रयः ॥ १५ ॥ | लक्ष्मणजी प्रसन्नचित्तसे नित्यप्रति जल लाकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते थे। इस प्रकार वे तीनों वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १५॥ |
| एकदा लक्ष्मणो राममेकान्ते समुपास्थितम् ।<br>विनयावनतो भूत्वा पप्रच्छ परमेश्वरम् ॥ १६ ॥ | एक दिन लक्ष्मणजीने एकान्तमें बैठे हुए परमात्मा श्रीरामके पास जाकर नम्रतापूर्वक पूछा-॥ १६ ॥ |
| भगवन् श्रोतुमिच्छामि मोक्षस्यैकान्तिकीं गतिम् ।<br>त्वत्तः कमलपत्राक्ष सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि ॥ १७ ॥ | "भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे मोक्षका अन्यभिचारी निश्चित साधन सुनना चाहता हूँ; अतः हे कमलनयन ! आप उसका संक्षेपसे वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥ |
| ज्ञानं विज्ञानसहितं भक्तिवैराग्यवृंहितम् ।<br>आचक्ष्व मे रघुश्रेष्ठ वक्ता नान्योऽस्ति भूतले ॥ १८ ॥ | हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे भक्ति और वैराग्यसे सना हुआ विज्ञानयुक्त ज्ञान सुनाइये; संसारमें आपके अतिरिक्त इस विषयका सुनानेवाला और कोई नहीं है ॥" ॥ १८॥ |
| श्रीराम उवाच | श्रीरामजी बोले— |
| शृणु वक्ष्यामि ते वत्स गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।<br>यद्विज्ञाय नरो जहात्सद्यो वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १९ ॥ | वत्स ! सुन, मैं तुझे गुह्यसे भी गुह्य परम रहस्य सुनाता हूँ जिसके जान लेनेपर मनुष्य तुरन्त ही विकल्पजनित ( संसाररूप ) भ्रमसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥ |
| आदौ मायास्वरूपं ते वक्ष्यामि तदनन्तरम् ।<br>ज्ञानस्य साधनं पश्चाज्ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् ॥ २० ॥ | प्रथम मैं तुमसे मायाका स्वरूप कहूँगा, तत्पश्चात् ज्ञानका साधन बताऊँगा और फिर विज्ञानके सहित ज्ञानका वर्णन करूँगा ॥ २० ॥ |
| ज्ञेयं च परमात्मानं यज्ज्ञात्वा मुच्यते भयात् ।<br>अनात्मनि शरीरादावात्मबुद्धिस्तु या भवेत् ॥ २१ ॥ | इनके अतिरिक्त ज्ञेय परमात्माका भी स्वरूप बतलाऊँगा जिसके जान लेनेपर मनुष्य संसार-भयसे मुक्त हो जाता है । शरीरादि अनात्मपदार्थोंमें जो आत्मबुद्धि होती है उसीको माया कहते हैं । |
| सैव माया तयैवासौ संसारः परिकल्प्यते ।<br>रूपे द्वे निश्चिते पूर्वं मायायाः कुलन्दन ॥ २२ ॥ | उसीके द्वारा इस संसारकी कल्पना हुई है । हे कुलन्दन ! मायाके पहले-पहल दो रूप माने गये हैं ॥ २१-२२ ॥ |
| विक्षेपावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ।<br>लिङ्गाद्यद्ब्रह्मपर्यन्तं स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ २३ ॥ | एक विक्षेप, दूसरा आवरण। इनमेंसे पहली विक्षेप-शक्ति ही महत्तत्त्वसे लेकर ब्रह्मातक समस्त संसारकी स्थूल और सूक्ष्म भेदसे कल्पना करती है ॥ २३ ॥ |
| अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमावृत्य तिष्ठति ।<br>मायया कल्पितं विश्वं परमात्मनि केवले ॥ २४ ॥ | और दूसरी आवरण-शक्ति सम्पूर्ण ज्ञानको आवरण करके स्थित रहती है । यह सम्पूर्ण विश्व रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान शुद्ध परमात्मामें मायासे कल्पित है; विचार करनेपर यह कुछ भी नहीं ठहरता । |
| रज्जौ भुजङ्गवद् भ्रान्त्या विचारे नास्ति किञ्चन ।<br>श्रूयते दृश्यते यद्यत्स्मर्यते वा नरैः सदा ॥ २५ ॥ | मनुष्य जो कुछ सर्वदा सुनते, देखते और स्मरण करते हैं, वह सब स्वप्न और मनोरथोंके समान असत्य हैं। |
| असदेव हि तत्सर्वं यथा स्वप्नमनोरथौ ।<br>देह एव हि संसारवृक्षमूलं दृढं स्मृतम् ॥ २६ ॥ | शरीर ही इस संसाररूप वृक्षकी दृढ़ मूल है ॥ २४-२६ ॥ उसीके कारण पुत्र- |
| ११८ | अध्यात्मरामायणं | [ सर्ग ४ |
|---|
तन्मूलः पुत्रदारादिबन्धः किं तेऽन्यथात्मनः॥२७॥
देहस्तु स्थूलभूतानां पञ्च तन्मात्रपञ्चकम् ।
अहंकारश्च बुद्धिश्च इन्द्रियाणि तथा दश ॥२८॥
चिदाभासो मनश्चैव मूलप्रकृतिरेव च ।
एतत्क्षेत्रमिति ज्ञेयं देह इत्यभिधीयते ॥२९॥
एतैर्विलक्षणो जीवः परमात्मा निरामयः ।
तस्य जीवस्य विज्ञाने साधनान्यपि मे शृणु ॥३०॥
जीवश्च परमात्मा च पर्यायो नात्र भेदधीः ।
मानाभावस्तथा दम्भहिंसादिपरिवर्जनम् ॥३१॥
पराक्षेपादिसहनं सर्वत्रावक्रता तथा ।
मनोवाक्कायसद्भक्त्या सद्गुरोः परिसेवनम् ॥३२॥
बाह्याभ्यन्तरसंशुद्धिः स्थिरता सत्क्रियादिषु ।
मनोवाक्कायदण्डश्च विषयेषु निरीहता ॥३३॥
निरहङ्कारता जन्मजराद्यालोचनं तथा ।
असक्तिः स्नेहशून्यत्वं पुत्रदारधनादिषु ॥३४॥
इष्टानिष्टागमे नित्यं चित्तस्य समता तथा ।
मयि सर्वात्मके रामे ह्यनन्यविषया मतिः ॥३५॥
जनसम्बाधरहितशुद्धदेशनिषेवणम् ।
प्राकृतैर्जनसङ्गैश्च ह्यरतिः सर्वदा भवेत् ॥३६॥
आत्मज्ञाने सदोद्योगो वेदान्तार्थालोकनम् ।
उक्तैरेतैर्भवेज्ज्ञानं विपरीतैर्विपर्ययः ॥३७॥
बुद्धिप्राणमनोदेहाहंकृतिभ्यो विलक्षणः ।
चिदात्माऽहं नित्यशुद्धो बुद्ध एवेति निश्चयम्॥३८॥
येन ज्ञानेन संवित्ते तज्ज्ञानं निश्चितं च मे ।
विज्ञानं च तदैवैतत्साक्षादनुभवेद्यदा ॥३९॥
आत्मा सर्वत्र पूर्णः स्याच्चिदानन्दात्मकोऽव्ययः ।
बुद्ध्याद्युपाधिरहितः परिणामादिवर्जितः ॥४०॥
कलत्रादिका बन्धन है, नहीं तो आत्माका इनसे क्या सम्बन्ध है ॥ २७ ॥ पाँच स्थूल भूत, पञ्च तन्मात्राएँ, अहंकार, बुद्धि, दश-इन्द्रियाँ, चिदाभास, मन और मूल-प्रकृति इन सबके समूहको क्षेत्र समझना चाहिये; इसीको शरीर भी कहते हैं ॥ २८-२९ ॥ निरामय परमात्मा-रूप जीव इन सबसे पृथक् है । अब मैं उस जीवको जाननेके कुछ साधन भी बताता हूँ ( सावधान होकर ) सुनो ॥ ३० ॥
जीव और परमात्मा यह पर्याय शब्द हैं—दोनोंका अभिप्राय एक ही है; अतः इसमें भेद-बुद्धि नहीं करनी चाहिये । अभिमानसे दूर रहना, दम्भ और हिंसा आदिका त्याग करना ॥ ३१ ॥ दूसरोंके किये हुए आक्षेपादिको सहन करना, सर्वत्र सरल भाव रखना, मन, वचन और शरीरके द्वारा सच्ची भक्तिसे सद्गुरुकी सेवा करना ॥ ३२ ॥ बाह्य और आन्तरिक शुद्धि रखना, सत्कर्मोंमें तत्पर रहना, मन, वाणी और शरीरका संयम करना, विषयोंमें प्रवृत्त न होना ॥ ३३ ॥ अहंकारशून्य रहना, जन्म, मृत्यु, रोग और बुढ़ापे आदिके कष्टोंका विचार करना, पुत्र, स्त्री और धन आदिमें राग तथा स्नेह न करना ॥ ३४ ॥ इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें चित्तको सदा समान रखना, मुझ सर्वात्मा राममें अनन्य बुद्धि रखना ॥ ३५॥ जनसमूहसे शून्य पवित्र देशमें रहना, संसारी लोगोंसे सर्वदा उदासीन रहना ॥ ३६ ॥ आत्मज्ञानका सदा उद्योग करना तथा वेदान्तके अर्थका विचार करना—इन उक्त साधनोंसे तो ज्ञान प्राप्त होता है और इनके विपरीत आचरण करनेसे विपरीत फल ( अज्ञान ) मिलता है ॥ ३७ ॥
जिस शुद्ध ज्ञानसे ऐसा बोध होता है कि मैं बुद्धि, प्राण, मन, देह और अहंकार आदिसें विलक्षण नित्य शुद्ध बुद्ध चेतन आत्मा हूँ वही मेरे मतसे निश्चित ज्ञान है । जिस समय इसका साक्षात् अनुभव होता है उस समय इसीको विज्ञान कहते हैं ॥ ३८-३९ ॥ आत्मा सर्वत्र पूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, अविनाशी, बुद्धि आदि उपाधियोंसे शून्य तथा परिणामादि विकारोंसे रहित है ॥ ४० ॥ यह अपने प्रकाशसे देह आदि
सर्ग ४ ] अरण्यकाण्ड १११
स्वप्रकाशेन देहादीन् भासयन्ननपावृतः ।
एक एवाद्वितीयश्च सत्यज्ञानादिलक्षणः ॥४१॥
असङ्गः स्वप्रभो द्रष्टा विज्ञानेनावगम्यते ।
आचार्यशास्त्रोपदेशादैक्यज्ञानं यदा भवेत् ॥४२॥
आत्मनोर्जीवपरयोर्मूलाविद्या तदैव हि ।
लीयते कार्यकारणैः सहैव परमात्मनि ॥४३॥
साऽवस्था मुक्तिरित्युक्ता ह्युपचारोऽयमात्मनि ।
इदं मोक्षस्वरूपं ते कथितं रघुनन्दन ॥४४॥
ज्ञानविज्ञानवैराग्यसहितं मे परात्मनः ।
किन्त्वेतद्दुर्लभं मन्ये मद्भक्तिविमुखात्मनाम् ॥४५॥
चक्षुष्मतामपि यथा रात्रौ सम्यङ् न दृश्यते ।
पदं दीपसमेतानां दृश्यते सम्यगेव हि ॥४६॥
एवं मद्भक्तियुक्तानामात्मा सम्यक् प्रकाशते ।
मद्भक्तेः कारणं किञ्चिद्वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः ॥४७॥
मद्भक्तसङ्गो मत्सेवा मद्भक्तानां निरन्तरम् ।
एकादश्युपवासादि मम पर्वानुमोदनम् ॥४८॥
मत्कथाश्रवणे पाठे व्याख्याने सर्वदा रतिः ।
मत्पूजापरिनिष्ठा च मम नामानुकीर्तनम् ॥४९॥
एवं सततयुक्तानां भक्तिरव्यभिचारिणी ।
मयि सञ्जायते नित्यं ततः किमवशिष्यते ॥५०॥
अतो मद्भक्तियुक्तस्य ज्ञानं विज्ञानमेव च ।
वैराग्यं च भवेच्छीघ्रं ततो मुक्तिमवाप्नुयात् ॥५१॥
कथितं सर्वमेतत्ते तव प्रश्नानुसारतः ।
अस्मिन्मनः समाधाय यस्तिष्ठेत्स तु मुक्तिभाक् ॥५२॥
न वक्तव्यमिदं यत्नान्मद्भक्तिविमुखाय हि ।
उपाधियोंको प्रकाशित करता हुआ भी स्वयं आवरण-शून्य, एक, अद्वितीय और सत्य ज्ञान आदि लक्षणोंवाला तथा संगरहित, स्वप्रकाश और सबका साक्षी है—ऐसा विज्ञानसे जाना जाता है। जिस समय मनुष्यको आचार्य और शास्त्रके उपदेशसे जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान होता है उसी समय मूला अविद्या अपने कार्य और साधनोंके सहित परमात्मामें लीन हो जाती है ॥ ४१-४३ ॥ अविद्याकी इस लयावस्थाको ही मोक्ष कहते हैं, आत्मामें यह (बन्ध और मोक्ष) केवल उपचारमात्र है (वास्तवमें आत्माकी बन्धावस्था और मुक्तावस्था नहीं है वह तो सदा ही मुक्त है) हे रघुनन्दन लक्ष्मण ! तुम्हें मैंने यह ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यके सहित परमात्मारूप अपना मोक्षस्वरूप सुनाया । किन्तु जो लोग मेरी भक्तिसे विमुख हैं उनके लिये मैं इसे अत्यन्त दुर्लभ मानता हूँ ॥ ४४-४५ ॥
जिस प्रकार नेत्र होते हुए भी लोग रात्रिके समय अन्धकारमें भली प्रकार नहीं देख सकते, दीपक होनेपर ही उस समय मार्ग दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही आत्माका सम्यक् साक्षात्कार होता है । अब मैं अपनी भक्तिके कुछ वास्तविक उपाय बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४६-४७ ॥
"मेरे भक्तका संग करना, निरन्तर मेरी और मेरे भक्तोंकी सेवा करना, एकादशी आदिका व्रत करना, मेरे पर्व दिनोंको मनाना ॥ ४८ ॥ मेरी कथाके सुनने, पढ़ने और उसकी व्याख्या करनेमें सदा प्रेम करना, मेरी पूजामें तत्पर रहना, मेरा नाम-कीर्तन करना" ॥ ४९ ॥ इस प्रकार जो निरन्तर मुझमें लगे रहते हैं उनकी मुझमें अविचल भक्ति हो जाती है। फिर बाकी ही क्या रहता है ? ॥ ५० ॥ अतः ( यह निश्चित बात है कि) मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषको ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य आदिकी शीघ्र प्राप्ति होती है और फिर वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥
इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नानुसार यह सम्पूर्ण रहस्य तुम्हें सुना दिया । जो व्यक्ति अपने चित्तको इसमें समाहित करके रहता है वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥ अतः हे लक्ष्मण ! मेरी भक्तिसे विमुख पुरुषोंसे
अरण्यकाण्ड - सर्ग ५: शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध
१२० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५]
[चतुर्थ सर्ग (समाप्ति)]
संस्कृत:
मद्भक्ताय प्रदातव्यमाहूयापि प्रयत्नतः ॥५३॥
य इदं तु पठेन्नित्यं श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
अज्ञानपटलध्वान्तं विधूयपरिमूच्यते ॥५४॥
भक्तानां मम योगिनां सुविमल-
स्वान्तातिशान्तात्मनां
मत्सेवाभिरतात्मनां च विमल-
ज्ञानात्मनां सर्वदा ।
सङ्गं यः कुरुते सदोद्यतमति-
स्तत्सेवनानन्यधी-
र्मोक्षस्तस्य करे स्थितोऽहमर्निशं
दृश्यो भवे नान्यथा ॥५५॥
हिन्दी अनुवाद:
इसे सावधानीपूर्वक न कहना चाहिये और मेरे भक्तोंको (इस प्रकारका मौका न लगे तो) प्रयत्नपूर्वक बुलाकर भी यह रहस्य सुनाना चाहिये ॥ ५३ ॥
जो पुरुष इसे श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदैव पढ़ेगा वह अज्ञानान्धकार-रूप परदेको हटाकर मुक्त हो जायगा ॥ ५४ ॥
जो पुरुष मेरी सेवामें अनुरक्त-चित्त, निर्मल-हृदय, शान्तात्मा, विमलज्ञानसम्पन्न और मेरे परम भक्त योगिजनोंका संग अनन्य बुद्धिसे सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहकर करता है, मुक्ति उसके सदैव करतलगत रहती है और मैं सर्वदा उसकी दृष्टिके सम्मुख विराजमान रहता हूँ । इसके अतिरिक्त और किसी उपायसे मेरा दर्शन नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चम सर्ग
शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
|---|---|
| तस्मिन् काले महारण्ये राक्षसी कामरूपिणी ।<br>विचचार महासत्त्वा जनस्थाननिवासिनी ॥१॥ | हे पार्वति ! उस समय उस घोर वनमें जनस्थानकी रहनेवाली एक महाबलवती इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी वृमा करती थी ॥ १ ॥ |
| एकदा गौतमीतीरे पञ्चवट्याः समीपतः ।<br>पद्मवज्राङ्कुशाङ्कानि पदानि जगतीपतेः ॥२॥<br>दृष्ट्वा कामपरीतात्मा पादसौन्दर्यमोहिता ।<br>पश्यन्ती सा शनैरायाद्राघवस्य निवेशनम् ॥३॥ | एक दिन पञ्चवटीके पास गौतमी नदीके तीरपर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीके पद्म, वज्र और अंकुश आदिके चिह्नोंसे युक्त चरण-चिह्नोंको देखकर वह उनके सौन्दर्यसे मोहित होकर कामासक्त हुई उन्हें देखती-देखती धीरे-धीरे रघुनाथजीके आश्रममें चली आयी ॥ २-३ ॥ |
| तत्र सा तं रमानाथं सीतया सह संस्थितम् ।<br>कन्दर्पसदृशं रामं दृष्ट्वा कामविमोहिता ॥४॥<br>राक्षसी राघवं प्राह कस्य त्वं कः किमाश्रमे ।<br>युक्तो जटावल्कलाद्यैः साध्यं किं तेऽत्र मे वद ॥५॥ | वहाँ आकर कामदेवके समान अति सुन्दर लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीताजीके साथ बैठे देखकर वह कामातुरा राक्षसी रघुनाथजीसे बोली— "तुम किसके पुत्र हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? इस आश्रममें जटा-वल्कलादि धारण कर क्यों रहते हो ? यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो ? सो मुझे बताओ ॥ ४-५ ॥ मैं राक्षसराज महात्मा रावणकी... |
| सर्ग ५] | अरण्यकाण्ड | १२१ |
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| अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी ।<br>भगिनी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य महात्मनः ॥ ६ ॥<br>खरेण सहिता भ्रात्रा वसाम्यत्रैव कानने ।<br>राज्ञा दत्तं च मे सर्वं मुनिभक्षा वसाम्यहम् ॥ ७ ॥<br>त्वां तु वेदितुमिच्छामि वद मे वदतां वर ।<br>तामाह रामनामाहमयोध्याधिपतेः सुतः ॥ ८ ॥<br>एषा मे सुन्दरी भार्या सीता जनकनन्दिनी ।<br>स तु भ्राता कनीयान्मे लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ ९ ॥<br>किं कृत्यं ते मया ब्रूहि कार्यं भुवनसुन्दरि ।<br>इति रामवचः श्रुत्वा कामार्ता साऽब्रवीदिदम् ॥ १० ॥<br>एहि राम मया सार्धं रमस्व गिरिकानने ।<br>कामार्ताऽहं न शक्नोमि त्यक्तुं त्वां कमलेक्षणम् ॥ ११ ॥ | वहिन कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखा हूँ ॥ ६ ॥ मैं अपने भाई खरके साथ इसी वनमें रहती हूँ । राजाने मुझे इस सम्पूर्ण वनका अधिकार सौंप दिया है, अतः मैं मुनियोंको खाती हुई यहाँ रहती हूँ ॥ ७ ॥ हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, अतः तुम मुझे अपना नाम-धाम आदि बताओ । तब भगवान्ने उससे कहा— "मैं अयोध्यापति राजा दशरथका राम नामक पुत्र हूँ ॥ ८ ॥ यह सुन्दरी मेरी भार्या जनकनन्दिनी सीता है तथा वह अति सुन्दर कुमार मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ ९ ॥ हे त्रिभुवनसुन्दरि ! बताओ, मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ ?" रामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कामातुरा शूर्पणखा बोली—॥ १० ॥ "राम ! चलो (किसी) गिरि-गुहामें चलकर मेरे साथ रमण करो। इस समय मैं कामातुरा हूँ, अतः आप कमलनयनको छोड़ नहीं सकती" ॥ ११ ॥ |
| रामः सीतां कटाक्षेण पश्यन् सस्मितमब्रवीत् ।<br>भार्या ममैषा कल्याणी विद्यते ह्यनपायिनी ॥ १२ ॥<br>त्वं तु सापत्न्यदुःखेन कथं स्थास्यसि सुन्दरि ।<br>बहिरास्ते मम भ्राता लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ १३ ॥<br>तवानुरूपो भविता पतिस्तेनैव सञ्चर ।<br>इत्युक्ता लक्ष्मणं प्राह पतिर्मे भव सुन्दर ॥ १४ ॥<br>भ्रातुराज्ञां पुरस्कृत्य सङ्गच्छाद्योऽद्य माचिरम् । | तब रामचन्द्रजीने नेत्रोंसे सीताजीकी ओर संकेत करके मुसकाकर कहा— "हे सुन्दरि ! मेरी तो यह मंगलमयी भार्या जीवित है ॥ १२ ॥ इसके रहते हुए तुम जन्मभर सौतकी डाहसे जलती हुई किस प्रकार सुखपूर्वक रह सकोगी ? बाहर मेरा अत्यन्त सुन्दर छोटा भाई लक्ष्मण विराजमान है ॥ १३ ॥ वह तुम्हारा योग्य पति होगा, तुम उसीके साथ (वन-पर्वतादिमें) विहार करो।" रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर शूर्पणखाने लक्ष्मणजीसे जाकर कहा— "हे सुन्दर ! तुम मेरे पति हो जाओ ॥ १४ ॥ तथा अपने भाईकी आज्ञा मानकर चलो, आज हम और तुम परस्पर संगमन करें, देरी न करो।" |
| इत्याह राक्षसी घोरा लक्ष्मणं काममोहिता ॥ १५ ॥<br>तामाह लक्ष्मणः साध्वि दासोऽहं तस्य धीमतः ।<br>दासी भविष्यसि त्वं तु ततो दुःखतरं नु किम् ॥ १६ ॥<br>तमेव गच्छ भद्रं ते स तु राजाऽखिलेश्वरः ।<br>तच्छ्रुत्वा पुनरप्यागाद्राघवं दुष्टमानसा ॥ १७ ॥ | उस काममोहिता राक्षसीने जब लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥ तो वे उससे बोले, "साध्वि ! मैं तो उन बुद्धिमान् भगवान् रामका दास हूँ । मुझे अपना पति बनानेसे तुम्हें भी उनकी दासी बनना पड़ेगा । तुम्हारे लिये इससे अधिक दुःखकी और क्या बात होगी ? ॥ १६ ॥ तुम्हारा कल्याण हो, तुम उन्हींके पास जाओ, वे महाराज सबके स्वामी हैं।" यह सुनकर वह दुष्टचित्ता राक्षसी फिर रघुनाथजीके पास आयी ॥ १७ ॥ और क्रोधपूर्वक |
१६
| १२२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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| क्रोधाद्राम किमर्थं मां भ्रामयस्यानवस्थितः ।<br>इदानीमेव तां सीतां भक्षयामि तवाग्रतः ॥१८॥ | बोली—"हे राम ! तुम बड़े चञ्चलचित्त हो, मुझे क्यों इधर-उधर घुमा रहे हो ? मैं अभी तुम्हारे सामने ही इस सीताको खाये जाती हूँ" ॥१८॥ |
| इत्युक्त्वा विकटाकारा जानकीमनुधावति ।<br>ततो रामाज्ञया खड्गमादाय परिगृह्य ताम् ॥१९॥<br>चिच्छेद नासां कर्णौ च लक्ष्मणो लघुविक्रमः ।<br>ततो घोरध्वनिं कृत्वा रुधिराक्तवपुर्द्रुतम् ॥२०॥<br>क्रन्दमाना पपाताग्रे खरस्य परुषाक्षरा ।<br>किमेतदिति तामाह खरः खरतराक्षरः ॥२१॥<br>केनैवं कारितासि त्वं मृत्योर्वक्त्रानुवर्तिना ।<br>वद मे तं वधिष्यामि कालकल्पमपि क्षणात् ॥२२॥ | ऐसा कह वह विकट रूप धारण कर जानकीजीकी ओर दौड़ी। तब लक्ष्मणजीने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे उसे पकड़कर बड़ी फुर्तीसे खड्ग लेकर उसके नाक-कान काट डाले। तदनन्तर वह घोर शब्द करती हुई रुधिरमें लथपथ हो बड़ी शीघ्रतासे जाकर गिरी और कठोर शब्द करती खरके सामने गिर पड़ी। उसे देखकर तीक्ष्ण ध्वनिवाले खरने कहा—"यह क्या बात है ॥१९-२१॥ अरी, मृत्युके मुखमें जानेवाले किस दुष्टने तेरी यह दशा की है ? तू बतला तो सही, वह कालके समान भी बली क्यों न हो, मैं उसे क्षणभरमें ही मार डालूँगा" ॥२२॥ |
| तमाह राक्षसी रामः सीतालक्ष्मणसंयुतः ।<br>दण्डकं निर्भयं कुर्वन्नास्ते गोदावरीतटे ॥२३॥<br>मामेवं कृतवांस्तस्य भ्राता तेनैव चोदितः ।<br>यदि त्वं कुलजातोऽसि वीरोऽसि जहि तौ रिपू ॥२४॥<br>तयोस्तु रुधिरं पास्ये भक्षयैतौ सुदुर्मदौ ।<br>नो चेत्प्राणान्परित्यज्य यास्यामि यमसादनम् ॥२५॥ | तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा—"यहाँ सीता और लक्ष्मणके सहित राम दण्डकारण्यको निर्भय करता हुआ गोदावरीके तटपर रहता है ॥२३॥ उसीकी प्रेरणासे उसके भाई लक्ष्मणने मेरी यह गति की है। यदि तुम बड़े कुलीन और वीर हो तो उन दोनों शत्रुओंको मार डालो ॥२४॥ तुम उन दोनों मदोन्मत्तोंको खा जाओ और मैं उन दोनोंका रुधिर पीऊँगी। नहीं तो अपने प्राणोंको छोड़कर यमलोकको चली जाऊँगी" ॥२५॥ |
| तच्छ्रुत्वा त्वरितं प्रागात्खरः क्रोधेन मूर्च्छितः ।<br>चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥२६॥<br>चोदयामास रामस्य समीपं वधकाङ्क्षया ।<br>खरश्च त्रिशिराश्चैव दूषणश्चैव राक्षसः ॥२७॥<br>सर्वे रामं ययुः शीघ्रं नानाप्रहरणोद्यताः ।<br>श्रुत्वा कोलाहलं तेषां रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥२८॥ | शूर्पणखाका यह कथन सुनकर खर क्रोधसे अधीर हो तुरन्त (युद्धके लिये) चला और रामको मारनेके लिये उसने बड़े पराक्रमी चौदह सहस्र राक्षस उनके पास भेजे। राक्षसराज खर, दूषण और त्रिशिरा—ये सभी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर रामके पास आये। उनका कोलाहल सुन श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—॥२६-२८॥ |
| श्रूयते विपुलः शब्दो नूनमायान्ति राक्षसाः ।<br>भविष्यति महद्युद्धं नूनमद्य मया सह ॥२९॥<br>सीतां नीत्वा गुहां गत्वा तत्र तिष्ठ महाबल ।<br>हन्तुमिच्छाम्यहं सर्वान् राक्षसान् घोररूपिणः ॥३०॥ | "लक्ष्मण ! देखो, बड़ा कोलाहल सुनायी पड़ रहा है, मालूम होता है निश्चय ही राक्षसगण आ रहे हैं; अवश्य ही आज मेरे साथ उनका घोर युद्ध होगा ॥२९॥ अतः हे महाबल ! तुम सीताको लेकर किसी पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। आज मैं इन समस्त घोररूप राक्षसोंका वध करना चाहता हूँ ॥३०॥ |
सर्ग ५ ] । अरण्यकाण्ड । १२३
| अत्र किञ्चिन्न वक्तव्यं शापितोऽसि ममोपरि।<br>तथेति सीतामादाय लक्ष्मणो गह्वरं ययौ ॥३१॥ | तुम्हें मेरी सौगन्ध है, इस विषयमें तुम और कुछ न कहना।” तब लक्ष्मणजी 'जो आज्ञा' कह सीताजीको लेकर एक गिरिगुहामें चले गये ॥ ३१ ॥ |
| रामः परिकरं बद्ध्वा धनुरादाय निष्ठुरम् ।<br>तूणीरावक्षयशरौ बद्ध्वायत्तोऽभवत्प्रभुः ॥३२॥ | तब श्रीरामचन्द्रजीने अपनी कमर कसी और कठोर धनुष तथा दो अक्षय बाणवाले तरकश बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ३२ ॥ |
| तत आगत्य रक्षांसि रामस्योपरि चिक्षिपुः ।<br>आयुधानि विचित्राणि पाषाणान्पादपानपि ॥३३॥ | तदनन्तर राक्षसगण वहाँ आकर रामके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, पत्थर और वृक्षादिकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥ |
| तानि चिच्छेद रामोऽपि लीलया तिलशः क्षणात् ।<br>ततो बाणसहस्रेण हत्वा तान् सर्वराक्षसान् ॥३४॥<br>खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ।<br>जघान प्रहरार्धेन सर्वानैव रघूत्तमः ॥३५॥ | श्रीरामचन्द्रजीने एक क्षणमात्रमें लीलासे ही उन अस्त्र-शस्त्रादिको तिल-तिल करके काट डाला । फिर सहस्रों बाणोंसे उन सम्पूर्ण राक्षसोंको मारकर खर, दूषण और त्रिशिराको भी मार डाला । इस प्रकार रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने आधे पहरमें ही उन समस्त राक्षसोंका संहार कर दिया ॥ ३४-३५॥ |
| लक्ष्मणोऽपि गुहामध्यात्सीतामादाय राघवे ।<br>समर्प्य राक्षसान्दृष्ट्वा हतान्विस्मयमाययौ ॥३६॥ | तब श्रीलक्ष्मणजीने गुहामेंसे सीताजीको लाकर श्रीरघुनाथजीको सौंप दिया । उस समय सम्पूर्ण राक्षसोंको मरे हुए देख वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३६ ॥ |
| सीता रामं समालिङ्ग्य प्रसन्नमुखपङ्कजा ।<br>शस्त्रव्रणानि चाङ्गेषु ममार्ज जनकात्मजा ॥३७॥ | जनकनन्दिनी श्रीसीताजीने प्रसन्नमुखसे श्रीरामचन्द्रजीका आलिंगन किया और उनके शरीरमें हुए घावोंपर हाथ फेरने लगीं ॥ ३७ ॥ |
| साऽपि दुद्राव दृष्ट्वा तान्हतान् राक्षसपुङ्गवान् ।<br>लङ्कां गत्वा सभामध्ये क्रोशन्ती पादसन्निधौ ॥३८॥<br>रावणस्य पपातोर्व्यां भगिनी तस्य रक्षसः ।<br>दृष्ट्वा तां रावणः प्राह भगिनीं भयविह्वलाम् ॥३९॥ | उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राक्षसोंको मरे देख राक्षसराज रावणकी बहिन शूर्पणखा दौड़ती हुई लंकामें पहुँची और राजसभामें पहुँचकर रोती हुई रावणके पैरोंके समीप पृथ्वीपर गिर पड़ी। अपनी बहिनको इस प्रकार भयभीत देखकर रावण बोला-॥३८-३९॥ “अरी |
| उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्से त्वं विरूपकरणं तव ।<br>कृतं शक्रेण वा भद्रे यमेन वरुणेन वा ॥४०॥<br>कुबेरेणाथवा ब्रूहि भस्मीकुर्यां क्षणेन तम् । | वत्से ! उठ, खड़ी हो । बता तो सही तुझे किसने विरूपा किया है ? हे भद्रे ! यह इन्द्रका काम है, अथवा यम, वरुण और कुबेरमेंसे किसीने किया है ? बता, एक क्षणमें ही मैं उसे भस्म कर डालूँगा।” |
| राक्षसी तमुवाचेदं त्वं प्रमत्तो विमूढधीः ॥४१॥<br>पानासक्तः स्त्रीविजितः षण्ढः सर्वत्र लक्ष्यसे ।<br>चारचक्षुर्विहीनस्त्वं कथं राजा भविष्यसि ॥४२॥ | तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा-"तुम बड़े ही उन्मत्त और मूढबुद्धि हो ॥ ४०-४१ ॥ तुम मद्यपानमें आसक्त, स्त्रीके वशीभूत और सब प्रकार नपुंसक-जैसे दिखायी पड़ते हो । तुम्हारे चर (खुफिया पुलिस) रूप नेत्र नहीं है; फिर तुम राजा |
| १२४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
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खरश्च निहतः सङ्ख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा ।<br>चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां महात्मनाम् ॥४३॥<br>निहतानि क्षणेनैव रामेणासुरशत्रुणा ।<br>जनस्थानमशेषेण मुनीनां निर्भयं कृतम् ।<br>न जानासि विमूढस्त्वमत एव मयोच्यते ॥४४॥ | कैसे रह सकोगे ? ॥४२॥ युद्धमें खर मारा गया तथा दूषण और त्रिशिरा आदि चौदह सहस्र मुख्य-मुख्य राक्षसोंको असुरशत्रु रामने एक क्षणमें ही मार डाला और सारे जनस्थानको मुनीश्वरोंके लिये सर्वथा निर्भय कर दिया । इतना उत्पात हो जानेपर भी तुम्हें अभीतक कुछ पता ही नहीं है इसीलिये मैं कहती हूँ कि 'तुम मूढ़ हो' ॥४३-४४॥ रावण उवाच | **रावण बोला—**अरी तू बता तो, वह राम कौन है ? उसने किसलिये और किस प्रकार इन राक्षसोंको मारा ? तू सब बात विस्तारपूर्वक कह, मैं उसका मूलोच्छेद कर डालूँगा ॥४५॥ को वा रामः किमर्थं वा कथं तेनासुरा हताः ।<br>सम्यक्कथय मे तेषां मूलघातं करोम्यहम् ॥४५॥ | शूर्पणखोवाच | **शूर्पणखा बोली—**एक दिन जनस्थानसे मैं गौतमीके किनारे जा रही थी, वहाँ पूर्वकालमें मुनिजनोंसे सेवित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है ॥४६॥ उस आश्रममें मैंने जटा-वल्कलादिसे सुशोभित धनुर्बाणधारी कमलनयन शोभाधाम रामको देखा ॥४७॥ उसका छोटा भाई लक्ष्मण भी उसीके समान रूपवान् है तथा उसकी विशाललोचना भार्या भी रूपमें साक्षात् दूसरी लक्ष्मी-जैसी ही है ॥४८॥ हे राजन् ! देव, गन्धर्व, नाग और मनुष्य आदिमेंसे किसीकी भी स्त्री ऐसी रूपवती न देखी है और न सुनी है । वह शुभलक्षणा अपनी कान्तिसे सम्पूर्ण वनको प्रकाशित कर रही थी ॥४९॥ हे अनघ ! उसे तुम्हारी पत्नी बनानेके लिये मैंने लानेका प्रयत्न किया था, इसीसे रामके भाई लक्ष्मणने मेरी नाक काट डाली ॥५०॥ फिर रामकी प्रेरणासे महाबली लक्ष्मणने मेरे कान भी काट लिये । तब मैं अत्यन्त दुःखसे रोती हुई खरके पास गयी ॥५१॥ उसने भी अपने राक्षस-सेनापतियोंके साथ तुरन्त जाकर रामसे युद्ध ठाना; किन्तु उस बलशाली रामने एक क्षणमें ही वे समस्त भीमविक्रम राक्षस नष्ट कर दिये । हे प्रभो ! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यदि रामके मनमें आ जाय तो वह निस्सन्देह आधे निमेषमें ही सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर सकता है । किन्तु यदि उसकी स्त्री सीता तुम्हारी भार्या हो जाय तो तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा ॥५२–५४॥ जनस्थानादहं याता कदाचिद्गौतमीतटे ।<br>तत्र पञ्चवटी नाम पुरा मुनिजनाश्रया ॥४६॥<br>तत्राश्रमे मया दृष्टो रामो राजीवलोचनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान् जटावल्कलमण्डितः ॥४७॥<br>कनीयाननुजस्तस्य लक्ष्मणोऽपि तथाविधः ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी रूपिणी श्रीरिवापरा ॥४८॥<br>देवगन्धर्वनागानां मनुष्याणां तथाविधा ।<br>न दृष्टा न श्रुता राजन्द्योतयन्ती वनं शुभा ॥४९॥<br>आनेतुमहमद्युक्ता तां भार्यार्थं तदानघ ।<br>लक्ष्मणो नाम तद्भ्राता चिच्छेद मम नासिकाम्॥५०॥<br>कर्णौ च नोदितस्तेन रामेण स महाबलः ।<br>ततोऽहमतिदुःखेन रुदती खरमन्वगाम् ॥५१॥<br>सोऽपि रामं समासाद्य युद्धं राक्षसयूथपैः ।<br>ततः क्षणेन रामेण तेनैव बलशालिना ॥५२॥<br>सर्वे तेन विनष्टा वै राक्षसा भीमविक्रमाः ।<br>यदि रामो मनः कुर्यात्त्रैलोक्यं निमिषार्धतः ॥५३॥<br>भस्मीकुर्यान्न सन्देह इति भाति मम प्रभो ।<br>यदि सा तव भार्या स्यात्सफलं तव जीवितम् ॥५४॥ |
सर्ग ५ ]
अरण्यकाण्ड
१२५
| अतो यतस्व राजेन्द्र यथा ते वल्लभा भवेत् ।<br>सीता राजीवपत्राक्षी सर्वलोकैकसुन्दरी ॥५५॥<br>साक्षाद्रामस्य पुरतः स्थातुं त्वं न क्षमः प्रभो ।<br>मायया मोहयित्वा तु प्राप्स्यसे तां रघूत्तमम् ॥५६॥ | अतः हे राजेन्द्र ! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे सम्पूर्ण लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी कमलनयनी सीता तुम्हारी प्राणप्रिया हो जाय ॥५५॥ हे प्रभो ! तुम रामके सामने साक्षात् न ठहर सकोगे, इसलिये उन रघुश्रेष्ठको किसी प्रकार मायाजालसे मोहित कर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो ॥५६॥ |
| श्रुत्वा तत्सूक्तवाक्यैश्च दानमानादिभिस्तथा ।<br>आश्वास्य भगिनीं राजा प्रविवेश स्वकं गृहम् ।<br>तत्र चिन्तापरो भूत्वा निद्रां रात्रौ न लब्धवान् ५७ | यह सुनकर राक्षसराज रावणने सुन्दर वाक्यों और दान-मानादिसे बहिन शूर्पणखाको धैर्य बँधाकर अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया, किन्तु वहाँ चिन्ताके कारण उसे रात्रिको नींद नहीं आयी ॥५७॥ वह सोचने लगा— |
| एकेन रामेण कथं मनुष्य-<br>मात्रेण नष्टः सबलः खरो मे ।<br>भ्राता कथं मे बलवीर्यदर्प-<br>युतो विनष्टो वत राघवेण ॥५८॥ | ‘बड़े आश्चर्यकी बात है, अकेले मनुष्यमात्र रघुवंशी रामने बल-वीर्य और साहससम्पन्न मेरे भाई खरको दल-बलके सहित कैसे मार डाला ? ॥५८॥ |
| यद्वा न रामो मनुजः परेशो<br>मां हन्तुकामः सबलं बलौघैः ।<br>सम्प्राथितोऽयं द्रुहिणेन पूर्वं<br>मनुष्यरूपोऽद्य रघोः कुलेऽभूत् ॥५९॥ | अथवा यह राम मनुष्य नहीं हैं, साक्षात् परमात्माने ही पूर्वकालमें की हुई ब्रह्माकी प्रार्थनासे मेरी बल-वीर्य-सम्पन्न सेनाके सहित मुझे मारनेके लिये इस समय रघुवंशमें मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥५९॥ |
| वध्यो यदि स्यां परमात्मनाहं<br>वैकुण्ठराज्यं परिपालयेहम् ।<br>नो चेदिदं राक्षसराज्यमेव<br>भोक्ष्ये चिरं राममतो व्रजामि ॥६०॥ | किन्तु मुझे रामके पास अवश्य चलना चाहिये, क्योंकि यदि उन परमात्माद्वारा मैं मारा गया तब तो मैं वैकुण्ठका राज्य भोगूँगा नहीं तो चिरकालपर्यन्त राक्षसोंका राज्य तो भोगूँगा ही' ॥६०॥ |
| इत्थं विचिन्त्याखिलराक्षसेन्द्रो<br>रामं विदित्वा परमेश्वरं हरिम् ।<br>विरोधयुद्धचैव हरिं प्रयामि<br>द्रुतं न भक्त्या भगवान्प्रसीदेत् ॥६१॥ | सम्पूर्ण राक्षसोंके स्वामी रावणने इस प्रकार विचारकर भगवान् रामको साक्षात् परमात्मा हरि जानकर यह निश्चय किया कि मैं विरोध-बुद्धिसे ही उनके पास जाऊँगा क्योंकि भक्तिके द्वारा भगवान् (मुझसे) शीघ्र प्रसन्न नहीं हो सकते ॥६१॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥५॥
अरण्यकाण्ड - सर्ग ६: रावणका मारीचके पास जाना
| १२६ | अध्यात्मरामायणं | [ सर्ग ६ |
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षष्ठ सर्ग
रावणका मारीचके पास जाना ।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! रात्रिके समय इस प्रकार विचारकर प्रातःकाल होनेपर रावण रथमें सवार हुआ और अपने मन-ही-मन एक कार्य निश्चय कर वह समुद्रके दूसरे तटपर मारीचके घर गया । वहाँ मारीच मुनियोंके समान जटा-वल्कलादि धारण-कर प्राकृत गुणोंके प्रकाशक निर्गुण भगवान्का ध्यान कर रहा था । समाधि भंग होनेपर उसने रावणको अपने घर आया देखा ॥ १–३ ॥ |
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| विचिन्त्यैवं निशायां स प्रभाते रथमास्थितः ।<br>रावणो मनसा कार्यमेकं निश्चित्य बुद्धिमान् ॥१॥<br>ययौ मारीचसदनं परं पारमुदन्वतः ।<br>मारीचस्तत्र मुनिवज्जटावल्कलधारकः ॥२॥<br>ध्यायन् हृदि परात्मानं निर्गुणं गुणभासकम् ।<br>समाधिविरमेऽपश्यद्रावणं गृहमागतम् ॥३॥ | |
| द्रुतमुत्थाय चालिङ्ग्य पूजयित्वा यथाविधि ।<br>कृतातिथ्यं सुखासीनं मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥४॥ | रावणको देखते ही वह शीघ्रतासे उठ खड़ा हुआ और उससे गले मिलकर उसकी विधिपूर्वक पूजा की । तथा आतिथ्य-सत्कारके अनन्तर जब रावण स्वस्थ होकर बैठा तो मारीच उससे बोला—॥ ४ ॥ |
| समागमनमेतत्ते रथेनैकेन रावण ।<br>चिन्तापर इवाभासि हृदि कार्यं विचिन्तयन् ॥५॥ | “हे रावण ! इस समय तुम अकेले ही रथमें बैठकर आये हो और तुम्हारा चित्त किसी कार्यके विचारमें चिन्ताग्रस्त-सा प्रतीत होता है ॥ ५ ॥ |
| ब्रूहि मे नहि गोप्यं चेत्करवाणि तव प्रियम् ।<br>न्याय्यं चेद् ब्रूहि राजेन्द्र वृजिनं मां स्पृशेन्न हि ॥६॥ | यदि गोपनीय न हो तो मुझे वह कार्य बताइये । हे राजेन्द्र ! यदि उसके करनेमें मुझे पाप न लगे और वह न्यायानुतूल हो तो कहो, मैं तुम्हारा वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा” ॥ ६ ॥ |
| रावण उवाच | **रावण बोला—**कहते हैं राजा दशरथ अयोध्यापुरी-का अधिपति है, उसका ज्येष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी राम है ॥ ७ ॥ |
| अस्ति राजा दशरथः साकेताधिपतिः किल ।<br>रामनामा सुतस्तस्य ज्येष्ठः सत्यपराक्रमः ॥७॥ | |
| विवासयामास सुतं वनं वनजनप्रियम् ।<br>भार्यया सहितं भ्रात्रा लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥८॥ | उस अपने मुनिजनप्रिय पुत्रको दशरथने स्त्री और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित वनमें भेज दिया है ॥ ८ ॥ |
| स आस्ते विपिने घोरे पञ्चवट्याश्रमे शुभे ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी सीता लोकविमोहिनी ॥९॥ | इस समय वह घोर दण्डकारण्यके पञ्चवटी नामक शुभ आश्रममें रहता है । सुना है, उसकी भार्या विशाल-नयना सीता त्रिलोकीको मोहित करनेवाली है ॥ ९ ॥ |
| रामो निरपराधान्मे राक्षसान् भीमविक्रमान् ।<br>खरं च हत्वा विपिने सुखमास्तेऽतिनिर्भयः ॥१०॥ | वह राम, मेरे बड़े पराक्रमी निरपराध राक्षसोंको भाई खरके सहित मारकर उस तपोवनमें निर्भयता-पूर्वक बड़े आनन्दसे रहता है ॥ १० ॥ |
| भगिन्याः शूर्पणखाया निर्दोषायाश्च नासिकाम् ।<br>कर्णौ चिच्छेद दुष्टात्मा वने तिष्ठति निर्भयः ॥११॥ | मेरी बहिन शूर्पणखाने उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था किन्तु उस दुष्टने उसके नाक-कान काट डाले और अब निर्भयतापूर्वक उस वनमें रहता है ॥ ११ ॥ |
| अतस्त्वया सहायेन गत्वा तत्राणवल्लभाम् ।<br>आनयिष्यामि विपिने रहिते राघवेण ताम् ॥१२॥ | इसलिये अब तुम्हारी सहायतासे मैं रामके तपोवनमें न रहनेपर उसकी प्राणप्रिया सीताको ले आना चाहता हूँ ॥ १२ ॥ |
सर्ग ६ ] अरण्यकाण्ड १२७
| त्वं तु मायामृगो भूत्वा ह्याश्रमादपनेष्यसि ।<br>रामं च लक्ष्मणं चैव तदा सीतां हराम्यहम् ॥ १३॥<br>त्वं तु तावत्सहायं मे कृत्वा स्थास्यसि पूर्ववत् ।<br>इत्येवं भाषमाणं तं रावणं वीक्ष्य विस्मितः ॥ १४॥<br>केनेदमुपदिष्टं ते मूलघातकरं वचः ।<br>स एव शत्रुर्बध्यश्च यस्तवन्नाशं प्रतीक्षते ॥ १५॥<br>रामस्य पौरुषं स्मृत्वा चित्तमद्यापि रावण ।<br>बालोऽपि मां कौशिकस्य यज्ञसंरक्षणाय सः ॥ १६॥<br>आगतस्तिग्मपुङ्खेन पातयामास सागरे ।<br>योजनानां शतं रामस्तदादि भयविह्वलः ॥ १७॥<br>स्मृत्वा स्मृत्वा तदेवाहं रामं पश्यामि सर्वतः ॥ १८॥<br>दण्डकेऽपि पुनरप्यहं वने<br>$\hspace{1em}$पूर्ववैरमनुचिन्तयन् हृदि ।<br>तीक्ष्णशृङ्गमृगरूपमेकदा<br>$\hspace{1em}$मादृशैर्बहुभिरानृतोऽभ्ययाम् ॥ १९॥<br>राघवं जनकजासमन्वितं<br>$\hspace{1em}$लक्ष्मणेन सहितं त्वरान्वितः ।<br>आगतोऽहमथ हन्तुमुद्यतो<br>$\hspace{1em}$मां विलोक्य शरमेकमाक्षिपत् ॥ २०॥<br>तेन विद्धहृदयोऽहमुद्भ्रमन्<br>$\hspace{1em}$राक्षसेन्द्र पतितोऽस्मि सागरे ।<br>तत्प्रभृत्यहमिदं समाश्रितः<br>$\hspace{1em}$स्थानमूर्जितमिदं भयार्दितः ॥ २१॥<br>राममेव सततं विभावये<br>$\hspace{1em}$भीत भीत इव भोगराशितः ।<br>राजरत्नरमणीरथादिकं<br>$\hspace{1em}$श्रोत्रयोर्यदि गतं भयं भवेत् ॥ २२॥<br>राम आगत इहेति शङ्कया<br>$\hspace{1em}$बाह्यकार्यमपि सर्वमत्यजम् ।<br>निद्रया परिगतो यदा स्वपे<br>$\hspace{1em}$राममेव मनसाऽनुचिन्तयन् ॥ २३॥<br>स्वप्नदृष्टगतराघवं तदा<br>$\hspace{1em}$बोधितो विगतनिद्र आस्थितः । | तुम मायासे मृगरूप होकर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे दूर ले जाना। उसी समय मैं सीताको हर लाऊँगा ॥ १३ ॥ इस प्रकार मेरी सहायता करके तुम फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आ रहना ।<br>$\hspace{1em}$रावणको इस प्रकार कहते देख मारीचने विस्मित होकर कहा—॥ १४ ॥ "रावण ! ये सर्वनाश करने-वाली बातें तुम्हें किसने बतायी हैं ? इस प्रकार जो कोई तुम्हारा नाश करना चाहता है, निश्चय ही वह तुम्हारा शत्रु है और वध करने योग्य है ॥ १५ ॥ हे रावण ! उनके बाल्यकालके पौरुषको याद करके, जब वे विश्वामित्रजीकी यज्ञ-रक्षाके लिये आये थे और उन्होंने एक बाणसे ही मुझे सौ योजन दूर समुद्रके तटपर फेंक दिया था, आजतक मेरा हृदय भयसे व्याकुल हो जाता है। बारम्बार उसी बातका स्मरण हो आनेसे मुझे सब ओर राम-ही-राम दिखलायी देने लगते हैं ॥ १६–१८ ॥ एक दिन अपने पूर्व-वैरका स्मरण कर मैं दण्डकारण्यमें भी अपने-जैसे बहुत-से मृगोंके साथ मिलकर एक तीखे सींगोंवाले मृगका रूप बनाकर गया था ॥ १९ ॥ जब मैं बड़ी फुर्तीसे सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीको मारनेकी इच्छासे आगे बढ़ा तो मुझे देखकर उन्होंने केवल एक बाण छोड़ दिया ॥ २० ॥ हे राक्षसेन्द्र ! उसीसे हृदय विंध जानेके कारण मैं आकाशमें चक्कर काटता हुआ समुद्रमें आकर गिरा। तबसे मैं भयभीत होकर इस पवित्र स्थानमें आश्रम बनाकर बड़ी सावधानीसे रहता हूँ ॥ २१ ॥ राज, रत्न, रमणी और रथ आदि (भोग-सामग्रियोंके प्रथम अक्षर 'र') के कानोंमें पड़ते ही मुझे (रामकी याद आ जानेसे) भय उत्पन्न हो जाता है, इसलिये मैं भोग-समुदायसे भयभीत होकर निरन्तर 'राम' का ही ध्यान करता रहता हूँ ॥ २२ ॥ 'यहाँ राम न आ गये हों' इस आशंकासे मैंने समस्त बाह्य कार्य छोड़ दिये हैं। जिस समय मैं निद्राके वशीभूत होकर सोता हूँ उस समय मन-ही-मन रामका ही स्मरण करता रहता हूँ ॥ २३ ॥ इस प्रकार स्वप्नमें देखे हुए श्रीरघुनाथजीको जब निद्रा टूटनेपर जागता हूँ तब भी नहीं भूलता। अतः हे रावण ! तुम भी |
अरण्यकाण्ड - सर्ग ७: मारीचवध और सीताहरण
| १२८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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तद्भवानपि विमुच्य चाग्रहं
राघवं प्रति गृहं प्रयाहि भोः ॥२४॥
रक्ष राक्षसकुलं चिरागतं
तत्स्मृतौ सकलमेव नश्यति।
तव हितं वदतो मम भाषितं
परिगृहाण परात्मनि राघवे ॥२५॥
त्यज विरोधमतिं भज भक्तितः
परमकारुणिको रघुनन्दनः।
अहमशेषमिदं मुनिवाक्यतो-
ऽशृणवमादियुगे परमेश्वरः ॥२६॥
ब्रह्मणाऽर्थित उवाच तं हरिः
किं तवेप्सितमहं करवाणि तत्।
ब्रह्मणोक्तमरविन्दलोचन
त्वं प्रयाहि भुवि मानुषं वपुः।
दशरथात्मजभावमञ्जसा
जहि रिपुं दशकन्धरं हरे ॥२७॥
अतो न मानुषो रामः साक्षान्नारायणोऽव्ययः।
मायामानुषवेषेण वनं यातोऽतिनिर्भयः ॥२८॥
भूभारहरणार्थाय गच्छ तात गृहं सुखम्।
श्रुत्वा मारीचवचनं रावणः प्रत्यभाषत ॥२९॥
परमात्मा यदा रामः प्रार्थितो ब्रह्मणा किल।
मां हन्तुं मानुषो भूत्वा यत्नादिह समागतः ॥३०॥
करिष्यत्यचिरादेव सत्यसङ्कल्प ईश्वरः।
अतोऽहं यत्नतः सीतामानेष्याम्येव राघवात् ॥३१॥
वधे प्राप्ते रणे वीर प्राप्स्यामि परमं पदम्।
यद्वा रामं रणे हत्वा सीतां प्राप्स्यामि निर्भयः ॥३२॥
तदुत्तिष्ठ महाभाग विचित्रमृगरूपधृक्।
रामं सलक्ष्मणं शीघ्रमाश्रमादतिदूरतः ॥३३॥
आक्रम्य गच्छ त्वं शीघ्रं सुखं तिष्ठ यथा पुरा।
अतः परं चेद्यत्किञ्चिद्व्यापसे माद्विभीषणम् ॥३४॥
हनिष्याम्यसिनाऽनेन त्वामत्रैव न संशयः। | श्रीरामघवसे हठ छोड़कर अपने घर चले जाओ ॥ २४ ॥ और चिरकालसे बढ़े हुए अपने राक्षस-वंशकी रक्षा करो। श्रीरामचन्द्रजीसे बैर न करो, उनका तो (वैर-भावसे) स्मरण करनेसे भी सर्वस्व नष्ट हो जाता है। मैं तुम्हारे हितके लिये जो कुछ कहता हूँ वह मानो। तुम परमात्मा श्रीरघुनाथजीसे विरोध-बुद्धि छोड़ दो और भक्तिभावसे उनका भजन करो, क्योंकि श्रीरामचन्द्र-जी बड़े दयालु हैं। मैंने मुनीश्वरोंके मुखसे ये सभी बातें सुनी हैं कि सत्ययुगमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर परमात्मा श्रीहरिने कहा था कि तुम अपना मनोरथ बताओ, मैं उसे पूर्ण करूँगा। तब ब्रह्माजीने भगवान्से कहा—"हे कमललोचन हरे! आप मनुष्य-रूपसे पृथिवीमें अवतार लीजिये और शीघ्र ही दशरथ-नन्दन श्रीराम होकर देवद्रोही दशाननका वध कीजिये ॥२५-२७॥ अतः तुम निश्चय मानो, राम मनुष्य नहीं हैं; वे साक्षात् अव्ययपुरुष श्रीनारायण हैं, मायासे मनुष्यरूप होकर वे निर्भयतापूर्वक पृथिवीका भार उतारनेके लिये वनमें आये हैं। अतः हे तात! तुम सुखपूर्वक घर लौट जाओ।"<br><br>मारीचके ये वचन सुनकर रावण बोला—॥२८-२९॥ “यदि ब्रह्माकी प्रार्थनासे परमात्मा ही राम होकर मनुष्यरूपसे मुझे प्रयत्नपूर्वक मारनेके लिये यहाँ आये हैं, तो वे शीघ्र ही अवश्य वैसा ही करेंगे, क्योंकि ईश्वर सत्य-संकल्प हैं। इसलिये मैं अवश्य यत्नपूर्वक रघुनाथ-जीके पाससे सीताको ले आऊँगा ॥ ३०-३१॥ हे वीर! यदि मैं युद्धमें उनके हाथसे मारा गया तो परमपद प्राप्त करूँगा और यदि मैंने ही रामको रणक्षेत्रमें मार डाला तो निर्भयतापूर्वक सीताको पाऊँगा ॥ ३२ ॥ अतः हे महाभाग! उठो और शीघ्र ही विचित्र मृगरूप धारण कर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे अति दूर ले जाओ, फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आकर सुखपूर्वक रहो। यदि मुझे भयभीत करनेके लिये अब और कुछ कहोगे तो निश्चय मानो, मैं अभी इसी खड्गसे तुम्हें यहीं मार डालूँगा।"