भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

सर्ग ३ ] सुन्दरकाण्ड २१५


ऋष्यमूकमाद्रामः शबर्या नोदितः सुधीः।<br>सुग्रीवो ऋष्यमूकस्थो दृष्टवान् रामलक्ष्मणौ ॥२७॥परम बुद्धिमान् भगवान् राम ऋष्यमूक पर्वतपर आये । उस पर्वतपर बैठे हुए सुग्रीवने जब (दूरहीसे) राम और लक्ष्मणको आते देखा तो मनमें भय मानकर मुझे उनका आशय जाननेके लिये भेजा । तब मैं ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रामजीके पास आया ॥ २७-२८ ॥ और उनका शुद्ध भाव जानकर उन्हें कन्धेपर चढ़ा सुग्रीवके पास ले गया तथा (राम और सुग्रीव) दोनोंकी मित्रता करा दी ॥ २९ ॥ सुग्रीवकी पत्नीको वालीने छीन लिया था । रघुनाथजीने उसे एक ही बाणसे मारकर सुग्रीवको वानरोंके राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया । तब सुग्रीवने आपकी खोजके लिये बड़े-बड़े वीर और पराक्रमी वानरोंको दिशा-विदिशाओंमें भेजा ॥ ३०-३१ ॥ उस समय मुझे चलता देख श्रीरघुनाथजीने मुझसे आदरपूर्वक कहा ॥ ३२॥ 'हे पवननन्दन ! मेरा सब काम तुम्हारे ऊपर निर्भर है । तुम सीताजीसे मेरी और लक्ष्मणकी सब कुशल कहना ॥ ३३ ॥ तथा अपनी पहचानके लिये मेरी यह उत्तम अँगूठी जिसपर मेरे नामके अक्षर खुदे हुए हैं, सीताजीको अति सावधानीसे दे देना' ॥ ३४ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने अपनी अँगुलीसे उतारकर वह अँगूठी मुझे दी । मैं उसे बड़ी सावधानीसे लाया हूँ । देवि ! आप यह अँगूठी देखिये" ॥ ३५ ॥ ऐसा कह हनुमान्जीने वह अँगूठी देवी जानकीजीको दे दी और नमस्कार कर हाथ जोड़े हुए दूर खड़े हो गये ॥ ३६ ॥ उस रामनामाङ्किता मुद्रिकाको देखकर सीताजी अति आनन्दित हुईं और उसे शिरसे लगाकर नेत्रोंसे आनन्दाश्रु बहाने लगीं ॥ ३७ ॥
भीतो मां प्रेषयामास ज्ञातुं रामस्य हृद्गतम् ।<br>ब्रह्मचारिवपुर्धृत्वा गतोऽहं रामसन्निधिम् ॥२८॥
ज्ञात्वा रामस्य सद्भावं स्कन्धोपरि विधाय तौ ।<br>नीत्वा सुग्रीवसमीपर्य सख्यं चाकरवं तयोः ॥२९॥
सुग्रीवस्य हृता भार्या वालिना तं रघूत्तमः ।<br>जघानेकेन बाणेन ततो राज्येऽभ्यषेचयत् ॥३०॥
सुग्रीवं वानराणां स प्रेषयामास वानरान् ।<br>दिग्भ्यो महाबलान्वीरान् भवत्याः परिमार्गणे ॥३१॥
गच्छन्तं राघवो दृष्ट्वा मामभाषत सादरम् ॥३२॥
त्वयि कार्यमशेषं मे स्थितं मारुतनन्दन ।<br>ब्रूहि मे कुशलं सर्वं सीतायै लक्ष्मणस्य च ॥३३॥
अङ्गुलीयकमेतन्मे परिज्ञानार्थमुत्तमम् ।<br>सीतायै दीयतां साधु मन्नामाक्षरमुद्रितम् ॥३४॥
इत्युक्त्वा प्रददौ मह्यं कराग्रादङ्गुलीयकम् ।<br>प्रयत्नेन मयानीतं देवि पश्याङ्गुलीयकम् ॥३५॥
इत्युक्त्वा प्रददौ देव्यै मुद्रिकां मारुतात्मजः ।<br>नमस्कृत्यः स्थितो दूराद्बद्धाञ्जलिपुटो हरिः ॥३६॥
दृष्ट्वा सीता प्रमुदिता रामनामाङ्कितां तदा ।<br>मुद्रिकां शिरसा धृत्वा स्रवदानन्दनेत्रजा ॥३७॥
कपे मे प्राणदाता त्वं बुद्धिमानसि राघवे ।<br>भक्तोऽसि प्रियकारी त्वं विश्वासोऽस्ति तवैव हि ॥३८॥तदनन्तर वे कहने लगीं—"कपिवर ! तुम मेरे प्राणदाता हो ! तुम बड़े ही बुद्धिमान् और रघुनाथजीके भक्त तथा प्रियकारी हो । मुझे निश्चय है उनको भी तुम्हारा ही पूर्ण विश्वास है ॥ ३८ ॥ यदि ऐसा न होता तो तुम पर-पुरुषको वे मेरे पास क्यों भेजते ? हनूमन् ! मेरी सारी आपदाएँ तुमने देख ही ली हैं ॥ ३९ ॥ रामको ये सब बातें सुना देना जिससे उन्हें मुझपर दया
नो चेन्मत्सन्निधिं चान्यं पुरुषं प्रेषयेत्कथम् ।<br>हनूमन्दृष्टमखिलं मम दुःखादिकं त्वया ॥३९॥
सर्वं कथय रामाय यथा मे जायते दया ।<br>मासद्वयावधि प्राणाः स्थास्यन्ति मम सत्तम ॥४०॥
२१६अध्यात्मरामायण[सर्ग ३

नागमिष्यति चेद्रामो भक्षयिष्यति मां खलः।<br>अतः शीघ्रं कपीन्द्रेण सुग्रीवेण समन्वितः ॥४१॥<br>वानरानीकपैरः सार्धं हत्वा रावणमाहवे।<br>सपुत्रं सबलं रामो यदि मां मोचयेत्प्रभुः ॥४२॥<br>तत्तस्य सदृशं वीर्यं वीर वर्ण्यं वर्णितम्।<br>यथा मां तारयेद्रामो हत्वा शीघ्रं दशाननम् ॥४३॥<br>तथा धत्स्व हनुमन्वाचा धर्ममवाप्नुहि। | उत्पन्न हो। हे साधुश्रेष्ठ ! अब मेरे प्राण दो ही मास और रहेंगे ॥४०॥ यदि इस बीचमें रघुनाथजी न आये तो यह दुष्ट मुझे खा जायगा। अतः यदि भगवान् राम वानरराज सुग्रीवके सहित अन्य वानर-यूथपोंको लेकर तुरन्त ही रावणको पुत्र और सेनाके सहित संग्राममें मारकर मुझे छुड़ायेंगे तो ही उनका यह पुरुषार्थ ठीक होगा। और तभी तुम इस वर्णन-किये पुरुषार्थका वर्णन करना। हे हनुमन् ! तुम भी ऐसी युक्तिसे उनसे सब बातें कहना जिससे वे शीघ्र ही रावणको मारकर मेरा उद्धार करें। ऐसा करके तुम भी वाचिक पुण्य प्राप्त करो।” हनूमानपि तामाह देवि दृष्टो यथा मया ॥४४॥<br>रामः सलक्ष्मणः शीघ्रमागमिष्यति सायुधः।<br>सुग्रीवेण ससैन्येन हत्वा दशमुखं बलात् ॥४५॥<br>समानेष्यति देवि त्वामयोध्यां नात्र संशयः। | तब हनुमान्जीने उनसे कहा—“देवि ! मैंने जैसा कुछ देखा है उससे तो यही प्रतीत होता है कि लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही अस्त्र-शस्त्र लेकर सेनायुक्त सुग्रीवके सहित आयेंगे और रावणको बलपूर्वक मारकर तुम्हें अयोध्या ले जायेंगे। देवि ! इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है।” तमाह जानकी रामः कथं वारिधिमाततम् ॥४६॥<br>तीर्त्वाऽऽयास्यत्यमेयात्मा वानरानीकपैरः सह। | इसपर जानकीजी कहने लगीं, “भगवान् राम् अमेयात्मा हैं, (उनके शरीरका कोई माप नहीं है, वे सर्वव्यापक हैं) किन्तु वानर-यूथपोंके साथ वे किस प्रकार समुद्रको पार करके यहाँ आयेंगे?” हनूमानाह मे स्कन्धावारुह्य पुरुषर्षभौ ॥४७॥<br>आयास्यतः ससैन्यश्च सुग्रीवो वानरेश्वरः।<br>विहायसा क्षणेनैव तीर्त्वा वारिधिमाततम् ॥४८॥<br>निर्दहिष्यति रक्षौघांस्त्वत्कृते नात्र संशयः।<br>अनुज्ञां देहि मे देवि गच्छामि त्वरयान्वितः॥४९॥<br>द्रष्टुं रामं सह भ्रात्रा त्वरयामि तवान्तिकम्।<br>देवि किञ्चिदभिज्ञानं देहि मे येन राघवः ॥५०॥<br>विश्वसेन्मां प्रयत्नेन ततो गन्ता समुत्सुकः। | हनुमान्जी बोले—“वे दोनों नरश्रेष्ठ मेरे कन्धों-पर चढ़कर आयेंगे और वानरराज सुग्रीव सेनासहित इस विस्तीर्ण समुद्रको आकाश-मार्गसे एक क्षणमें पार-कर तुम्हें प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण राक्षस-समूहको भस्म कर डालेंगे। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। हे देवि ! अब मुझे आज्ञा दो; मैं अभी-अभी अनुज-सहित भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये जाता हूँ और उन्हें तुरन्त तुम्हारे पास लानेका प्रयत्न करता हूँ। देवि ! मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे श्रीरघुनाथजी मेरा विश्वास करें। उसे लेकर मैं बड़ी सावधानीसे उत्सुकतापूर्वक उनके पास जाऊँगा।” ततः किञ्चिद्विचार्याथ सीता कमललोचना ॥५१॥<br>विमुच्य केशपाशान्ते स्थितं चूडामणिं ददौ।<br>अनेन विश्वसेद्रामस्त्वां कपीन्द्र सलक्ष्मणः ॥५२॥<br>अभिज्ञानार्थमन्यच्च वदामि तव सुव्रत। | तब कमललोचना सीताजीने कुछ सोच-विचारकर अपने केशपाशमें स्थित चूडामणिको निकाला और उसे हनुमान्जीको देकर कहा—“हे कपिवर ! इससे भगवान् राम और लक्ष्मण तुम्हारा विश्वास करेंगे॥४१-५२॥ हे सुव्रत ! उनको विश्वास दिलानेके

सर्ग ३ ] | सुन्दरकाण्ड | २१७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चित्रकूटगिरौ पूर्वमेकदा रहसि स्थितः ।<br>मदङ्के शिर आधाय निद्राति रघुनन्दनः ॥५३॥<br>ऐन्द्रः काकस्तदाऽऽगत्य नखैस्तुण्डेन चासकृत् ।<br>मत्पादाङ्गुष्ठमारक्तं विददारामिषाशया ॥५४॥<br>ततो रामः प्रबुद्ध्याथ दृष्ट्वा पादं कृतव्रणम् ।<br>केन भद्रे कृतं चैतद्विप्रियं मे दुरात्मना ॥५५॥<br>इत्युक्त्वा पुरतोऽपश्यद्वायसं मां पुनः पुनः ।<br>अभिद्रवन्तं रक्ताक्तनखतुण्डं चुकोप ह ॥५६॥<br>तृणमेकमुपादाय दिव्यास्त्रेणाभियोज्य तत् ।<br>चिक्षेप लीलया रामो वायसोपरि तज्ज्वलन्॥५७॥<br>अभ्यद्रवद्वायसञ्च भीतो लोकान् भ्रमन्पुनः ।<br>इन्द्रब्रह्मादिभिश्चापि न शक्यो रक्षितुं तदा ॥५८॥<br>रामस्य पादयोरग्रेऽपतद्भीत्या दयानिधेः ।<br>शरणागतमालोक्य रामस्तमिदमब्रवीत् ॥५९॥<br>अमोघमेतदस्त्रं मे दत्त्वैकाक्षमतो व्रज ।<br>सव्यं दत्त्वा गतः काक एवं पौरुषवानपि ॥६०॥<br>उपेक्षते किमर्थं मामिदानीं सोऽपि राघवः ।लिये एक बात और बतलाती हूँ—एक दिन चित्रकूट पर्वतपर श्रीरघुनाथजी एकान्तमें मेरी गोदमें शिर रखे सो रहे थे ॥५३॥ इसी समय इन्द्रका पुत्र (जयन्त) काक-वेषमें वहाँ आया और मांसके लोभसे मेरे पैरके लाल-लाल अँगूठेको अपनी चोंच तथा पञ्जोंसे फाड़ डाला ॥५४॥ तदनन्तर जब श्रीरामचन्द्रजी जागे तो मेरे पैरमें घाव हुआ देखकर बोले—“प्रिये ! किस दुरात्माने मेरा यह अप्रिय किया है ?” ॥५५॥ वे यह कह ही रहे थे कि उन्होंने अपने सामने उस कौएको बारम्बार मेरी ओर आते देखा । उसकी चोंच और पञ्जे रुधिरसे सने हुए थे। उसे देखकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ ॥५६॥ उन्होंने तुरन्त ही एक तृण उठाकर उसपर दिव्यास्त्रका प्रयोग किया और उसे लीलासे ही उस कौएकी ओर फेंक दिया । उसके तापसे सन्तप्त हो वह काक भयभीत होकर त्रिलोकीमें भटकता फिरा किन्तु जब इन्द्र, ब्रह्मा आदिसे भी उसकी रक्षा न हो सकी तो बहुत ही डरता-डरता दयानिधान भगवान् रामके चरणोंमें गिरा । उसे शरणागत देख श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा—॥५७–५९॥ “मेरा यह अस्त्र अमोघ है। (यह कभी व्यर्थ नहीं जा सकता)। अतः तू केवल अपनी एक आँख देकर यहाँसे चला जा। तब वह काक अपनी बायीं आँख देकर चला गया। जो ऐसे पुरुषार्थी हैं वे ही श्रीरघुनाथजी न जाने इस समय क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ?”
हनूमानपि तामाह श्रुत्वा सीतानुभाषितम् ॥६१॥<br>देवि त्वां यदि जानाति स्थितामत्र रघूत्तमः ।<br>करिष्यति क्षणाद्भस्म लङ्कां राक्षसमण्डिताम्॥६२॥सीताजीका यह कथन सुनकर हनुमान्जीने कहा—<br>“देवि ! जिस समय श्रीरघुनाथजीको तुम्हारे यहाँ होनेका पता चलेगा उस समय इस राक्षस-मण्डल-मण्डिता लंकाको वे एक क्षणमें ही भस्म कर डालेंगे” ॥६०-६२॥
जानकी प्राह तं वत्स कथं त्वं योत्स्यसेऽसुरैः ।<br>अतिसूक्ष्मवपुः सर्वे वानराश्च भवादृशाः ॥६३॥जानकीजीने कहा—"वत्स ! तुम अत्यन्त सूक्ष्म शरीरवाले हो, अतः राक्षसोंसे कैसे लड़ सकोगे ? और सब वानर भी तो तुम्हारे ही समान होंगे ? ॥६३॥
श्रुत्वा तद्वचनं देव्यै पूर्वरूपमदर्शयत् ।<br>मेरुमन्दरसङ्काशं रक्षोगणविभीषणम् ॥६४॥<br>दृष्ट्वा सीता हनूमन्तं महापर्वतसन्निभम् ।देवी जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जीने उन्हें अपना पूर्वरूप दिखलाया। जो मेरु और मन्दर पर्वतके समान अति विशाल और राक्षसोंको भय उत्पन्न करनेवाला था ॥६४॥ हनुमान्जीको महापर्वतके समान विशालकाय देखकर सीताजीको अपार
२१८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३
हर्षेण महताऽऽविष्टा प्राह तं कपिकुञ्जरम् ॥६५॥आनन्द हुआ और वे उन कपिश्रेष्ठसे कहने लगीं—॥ ६५ ॥ “हे महासत्त्व ! तुम बड़े ही सामर्थ्यवान्
समर्थोऽसि महासत्त्व द्रक्ष्यन्ति त्वां महाबलम् ।हो; अच्छा, अब तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके पास
राक्षस्यस्ते शुभः पन्था गच्छ रामान्तिकं द्रुतम् ॥६६॥जाओ । हे महावीर ! तुम्हें राक्षसियाँ देख लेंगी, (अतः अब तुम जाओ ) तुम्हारा मार्ग कल्याण-
बुभुक्षितः कपिः प्राह दर्शनात्पारणं मम ।मय हो ॥ ६६ ॥ हनुमान्जीको भूख लगी हुई थी ।
भविष्यति फलैः सर्वैस्तव दृष्टौ स्थितैर्हि मे ॥६७॥वे बोले—“देवि ! आपका दर्शन कर अब मुझे आपके सामने लगे हुए फलोंसे पारण करनेकी इच्छा होती
तथेत्युक्तः स जानक्या भक्षयित्वा फलं कपिः ।है” ॥ ६७ ॥ तब जानकीजीके ‘बहुत अच्छा’ कहने-
ततः प्रस्थापितोऽगच्छज्जानकीं प्रणिपत्य सः ।पर कपिवरने वे फल खाये और उनके विदा करनेपर
किञ्चिद्दूरमथो गत्वा खात्मन्येवान्वचिन्तयत् ॥६८॥उन्हें प्रणाम करके चल दिये । फिर कुछ दूर चलनेपर उन्होंने अपने मनमें सोचा ॥ ६८ ॥ ‘जो दूत अपने
कार्यार्थमागतो दूतः स्वामिकार्याविरोधतः ।स्वामीके कार्यके लिये आकर उसमें किसी प्रकारका
अन्यत्किञ्चिदसम्पाद्य गच्छत्यधम एव सः ॥६९॥विघ्न न करनेवाला कोई और कार्य न करके यों ही चला जाता है वह अधम ही है ॥ ६९ ॥ अतः
अतोऽहं किञ्चिदन्यच्च कृत्वा दृष्ट्वाऽथ रावणम् ।मैं कुछ और भी करूँगा और रावणसे मिलकर
सम्भाष्य च ततो रामदर्शनार्थं व्रजाम्यहम् ॥७०॥तथा बातचीत कर फिर श्रीरघुनाथजीके दर्शनार्थ जाऊँगा” ॥ ७० ॥
इति निश्चित्य मनसा वृक्षखण्डान्महाबलः ।मनमें ऐसा निश्चय कर महाबली हनुमान्जीने वृक्षों-
उत्पाट्याशोकवनिकां निर्वृक्षामकरोत्क्षणात् ॥७१॥को उखाड़कर अशोकवाटिकाको एक क्षणमें ही वृक्षहीन कर दिया ॥ ७१ ॥ जिसके नीचे श्रीसीताजी
सीताऽऽश्रयनगं त्यक्त्वा वनं शून्यं चकार सः ।बैठी थीं उस वृक्षको छोड़कर शेष समस्त वाटिकाको
उत्पाटयन्तं विपिनं दृष्ट्वा राक्षस्योषितः ॥७२॥उन्होंने उजाड़ डाला । उन्हें वन उजाड़ते देख
अपृच्छन् जानकीं कोऽसौ वानराकृतिरुद्भटः ॥७३॥राक्षसियोंने जानकीजीसे पूछा, “यह वानराकार विकट वीर कौन है ?” ॥ ७२-७३ ॥
जानक्युवाचजानकीजी बोलीं— इस राक्षसी मायाको आप ही
भवत्य एव जानन्ति मायां राक्षवनिर्मिताम् ।लोग जानें। दुःख और शोकसे आतुर मैं यह क्या जानूँ ?
नाहमेनं विजानामि दुःखशोकसमाकुला ॥७४॥॥ ७४ ॥ जानकीजीके इस प्रकार कहनेपर भयपीडिता
इत्युक्तास्त्वरितं गत्वा राक्षस्यो भयपीडिताः ।राक्षसियोंने रावणके पास जा उसे हनुमान्जीकी सारी
हनूमता कृतं सर्वं रावणाय न्यवेदयन् ॥७५॥करतूत कह सुनायी ॥७५॥ वे कहने लगीं— “देव ! एक
देव कश्चिन्महासत्त्वो वानराकृतिदेहभृत् ।बड़े पराक्रमी वानराकार प्राणीने सीताजीसे सम्भाषण
सीतया सह सम्भाष्य ह्यशोकवनिकां क्षणात् ।कर एक क्षणमें ही सारी अशोकवाटिका उजाड़ दी
उत्पाट्य चैत्यप्रासादं बभञ्जामितविक्रमः ॥७६॥है। उस महापराक्रमीने मन्दिरके प्रासादको भी तोड़ डाला और उसके सब रक्षकोंको मारकर इस समय
प्रासादरक्षिणः सर्वान्हत्वा तत्रैव तस्थिवान् ।भी वह वहीं बैठा हुआ है ।” वनविध्वंसका यह महान्
तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थाय वनभङ्गं महाऽप्रियम् ॥७७॥अप्रिय समाचार सुनकर राक्षसराज रावण तुरन्त उठा
सर्ग ३]सुन्दरकाण्ड२१९
किङ्करान्प्रेषयामास नियुतं राक्षसाधिपः ।<br>निर्भयश्चैत्यप्रासादप्रथमन्तरसंस्थितः ॥७८॥<br>हनुमान्पर्वताकारो लोहस्तम्भकृतायुधः ।<br>किञ्चिल्लाङ्गूलचलनो रक्तास्यो भीषणाकृतिः ॥७९॥<br>आपतन्तं महासङ्घं राक्षसानां ददर्श सः ।<br>चकार सिंहनादं च श्रुत्वा ते मुमुहुर्भृशम् ॥८०॥<br>हनूमन्तमथो दृष्ट्वा राक्षसा भीषणाकृतिम् ।<br>निजघ्नुर्विविधास्त्रौधैः सर्वराक्षसघातिनम् ॥८१॥<br>तत उत्थाय हनुमान्मुद्गरेण समन्ततः ।<br>निष्पिपेप क्षणादेव मशकानिव यूथपः ॥८२॥<br>निहतान्किङ्करान् श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः।<br>पञ्च सेनापतींस्तत्र प्रेषयामास दुर्मदान् ॥८३॥<br>हनूमानपि तान्सर्वांल्लोहस्तम्भेन चाहनत् ।<br>ततः क्रुद्धो मन्त्रिसुतान्प्रेषयामास सप्त सः ॥८४॥<br>आगतानपि तान्सर्वान्पूर्ववद्वानरेश्वरः ।<br>क्षणान्निःशेषतः हत्वा लोहस्तम्भेन मारुतिः॥८५॥<br>पूर्वस्थानमुपाश्रित्य प्रतीक्षन् राक्षसान् स्थितः ।<br>ततो जगाम बलवान्कुमारोऽक्षः प्रतापवान् ॥८६॥<br>तमुत्पपात हनुमान् दृष्ट्वाऽऽकाशे समुद्गरः ।<br>गगनात्त्वरितो मूर्ध्नि मुद्गरेण व्यताडयत् ॥८७॥<br>हत्वा तमक्षं निःशेषं बलं सर्वं चकार सः ॥८८॥<br>ततः श्रुत्वा कुमारस्य वधं राक्षसपुङ्गवः ।<br>क्रोधेन महताऽऽविष्ट इन्द्रजेतारमब्रवीत् ॥८९॥<br>पुत्र गच्छाम्यहं तत्र यत्रास्ते पुत्रहा रिपुः ।<br>हत्वा तमथवा बद्ध्वा आनयिष्यामि तेऽन्तिकम् ॥<br>इन्द्रजित्पितरं प्राह त्यज शोकं महामते ।<br>मयि स्थिते किमर्थं त्वं भाषसे दुःखितं वचः ॥९१॥और उसने दश लाख सेवकोंको भेजा। इधर, पर्वताकार हनुमान्जी लोहेके खम्भको शस्त्ररूपसे लिये हुए उस टूटे-फूटे मन्दिरके प्रथम भागमें बैठे थे। उनकी पूँछ कुछ-कुछ हिल रही थी, तथा मुख अरुणवर्ण और आकृति भयानक थी॥ ७६-७९॥ राक्षसोंके समूहको आया देख उन्होंने घोर सिंहनाद किया, जिसे सुनकर वे सब अत्यन्त स्तब्ध हो गये॥ ८०॥ फिर सम्पूर्ण राक्षसोंको मारनेवाले भीषणाकार हनुमान्जीको देखकर राक्षसोंने उनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े ॥ ८१॥ तदनन्तर, यूथपति गजराज जैसे मच्छरोंको मसल डालता है वैसे ही हनुमान्जीने उठकर अपने मुद्गरसे एक क्षणमें ही सबको चारों ओरसे पीस डाला ॥ ८२॥<br><br>अपने किङ्करोंका मरण सुनकर रावण क्रोधसे पागल हो गया और उसने वहाँ पाँच बड़े बाँके सेनापतियोंको (अपनी सेनाके साथ) भेजा॥ ८३॥ हनुमान्जीने अपने लोह-स्तम्भसे तुरन्त ही उन सबको मार डाला। तब उसने अति क्रोधित होकर सात मन्त्रिपुत्रोंको भेजा॥ ८४॥ वानराधीश पवननन्दनने, वहाँ आनेपर उन सबको भी पहलेकी भाँति एक क्षणमें ही उस लोह-स्तम्भसे मार डाला॥ ८५॥ और अपने पूर्व-स्थानमें ही बैठकर अन्य राक्षसोंके आनेकी बाट देखने लगे। तब अति बलवान् और प्रतापशाली राजकुमार अक्ष आया॥ ८६॥ उसे देखकर हनुमान्जी अपना मुद्गर लेकर आकाशमें उड़ गये और बड़े वेगसे ऊपरसे ही उसके मस्तकपर मुद्गरका प्रहार किया। इस प्रकार अक्षको मारकर उसकी सेनाका भी नामो-निशान मिटा दिया॥ ८७-८८॥<br><br>राजकुमार अक्षके वधका वृत्तान्त पाकर राक्षसराज रावण अत्यन्त क्रोधमें भरकर इन्द्रजित्से बोला— "बेटा! जहाँ मेरे पुत्रका मारनेवाला मेरा शत्रु है मैं वहाँ जाता हूँ और उसे मारकर या बाँधकर तेरे पास लाता हूँ" ॥ ८९-९०॥ इन्द्रजित्ने पितासे कहा—"हे महामते! शोक न कीजिये; मेरे रहते हुए आप ऐसे दुःखमय वचन क्यों बोलते हैं?॥ ९१॥ मैं उस

सुन्दरकाण्ड - सर्ग ४: हनुमान् और रावणका संवाद तथा लङ्कादहन

२२०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४
बद्ध्वाऽऽनेष्ये द्रुतं तात वानरं ब्रह्मपाशतः ।<br>इत्युक्त्वा रथमारुह्य राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ॥९२॥<br>जगाम वायुपुत्रस्य समीपं वीरविक्रमः ।<br>ततोऽतिगर्जितं श्रुत्वा स्तम्भमुद्यम्य वीर्यवान् ॥९३॥<br>उत्पपात नभोदेशं गरुत्मानिव मारुतिः ।<br>ततो भ्रमन्तं नभसि हनूमन्तं शिलीमुखैः ॥९४॥<br>विद्ध्वा तस्य शिरोभागमिषुभिश्चाष्टभिः पुनः ।<br>हृदयं पादयुगलं पद्भिरेकेन वालधिम् ॥९५॥<br>भेदयित्वा ततो घोरं सिंहनादमथाकरोत् ।<br>ततोऽतिहर्षाद्धनुमांस्तम्भमुद्यम्य वीर्यवान् ॥९६॥<br>जघान सारथिं सार्धं रथं चाचूर्णयत्क्षणात् ।<br>ततोऽन्यं रथमादाय मेघनादो महाबलः ॥९७॥<br>शीघ्रं ब्रह्मास्त्रमादाय बद्ध्वा वानरपुङ्गवम् ।<br>निनाय निकटं राज्ञो रावणस्य महाबलः ॥९८॥वानरको शीघ्र ही ब्रह्मपाशमें बाँधकर लिये आता हूँ।”<br>ऐसा कह वह महापराक्रमी वीर रथपर चढ़ा और<br>बहुत-से राक्षसोंके साथ पवनपुत्र हनुमान्‌के पास पहुँचा।<br>तब, वीर्यवान् हनुमान्‌जी भयङ्कर सिंहनाद सुन हाथमें<br>स्तम्भ लिये गरुड़के समान आकाशमें उड़ गये।<br>उन्हें आकाशमें उड़ते देख इन्द्रजित्‌ने आठ<br>बाणोंसे उनके शिरको बींधा, फिर छः बाणोंसे<br>उनके हृदय और दोनों चरणोंको तथा एकसे उनकी<br>पूँछको बींधकर वह घोर सिंहनाद करने लगा। तब महा-<br>बलवान् हनुमान्‌जीने भी अति प्रसन्नतासे स्तम्भ उठाकर<br>एक क्षणमें ही उसके सारथीको मार डाला और घोड़ोंके<br>सहित उसके रथको चूर्ण कर दिया। तब महाबली<br>मेघनाद (इन्द्रजित्) ने दूसरे रथपर चढ़कर तुरन्त<br>ही वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌जीको ब्रह्मपाशसे बाँध लिया और<br>उन्हें राक्षसराज रावणके पास ले गया ॥९२-९८॥
यस्य नाम सततं जपन्ति ये-<br>  ऽज्ञानकर्मकृतबन्धनं क्षणात् ।<br>सद्य एव परिमुच्य तत्पदं<br>  यान्ति कोटिरविभासुरं शिवम् ॥९९॥<br>तस्यैव रामस्य पदाम्बुजं सदा<br>  हृत्पद्ममध्ये सुनिधाय मारुतिः ।<br>सदैव निर्मुक्तसमस्तबन्धनः<br>  किं तस्य पाशैरितरैश्च बन्धनैः ॥१००॥जिनके नामका निरन्तर जप करनेवाले भक्तजन<br>एक क्षणमें ही अज्ञानकृत बन्धनको काटकर करोड़ों<br>सूर्योंके समान प्रकाशमान उनके परम कल्याणमय<br>पदको तत्काल प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं भगवान् रामके<br>चरणकमलोंको सदा अपने हृदयकमलमें धारण करनेसे<br>हनुमान्‌जी सदा ही समस्त बन्धनोंसे छूटे हुए हैं।<br>उनका ब्रह्मपाश अथवा और किसी बन्धनसे क्या<br>हो सकता है ? ॥९९-१००॥
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इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


चतुर्थ सर्ग

हनुमान् और रावणका संवाद तथा लङ्कादहन ।

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श्रीमहादेव उवाच<br>यान्तं कपीन्द्रं धृतपाशबन्धनं<br>  विलोकयन्तं नगरं बिभीतवत् ।<br>अताडयन्मुष्टितलैः सुकोपन्नाः<br>  पौराः समन्तादनुयान्त ईक्षितुम् ॥ १ ॥श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! ब्रह्मपाशसे बँधे<br>हुए श्रीहनुमान्‌जी जब डरे हुएके समान नगर देखते जा<br>रहे थे, उस समय उन्हें देखनेके लिये इधर-उधरसे<br>इकट्ठे हुए पुरवासी उनके पीछे-पीछे चलते हुए<br>उन्हें क्रोधपूर्वक घूँसोंसे मारने लगे ॥ १ ॥ ब्रह्माजीके
सर्ग ४ ]सुन्दरकाण्ड२२१

ब्रह्मास्त्रमेनं क्षणमात्रसङ्गमं<br>कृत्वा गतं ब्रह्मवरेण सत्वरम् ।<br>ज्ञात्वा हनूमानपि फल्गुरज्जुभि-<br>र्धृतो ययौ कार्यविशेषगौरवात् ॥ २ ॥<br>सभान्तरस्थस्य च रावणस्य तं<br>पुरो निधायाह बलारिजित्तदा ।<br>बद्धो मया ब्रह्मवरेण वानरः<br>समागतोऽनेन हता महासुराः ॥ ३ ॥<br>यद्युक्तमत्रार्य विचार्य मन्त्रिभि-<br>र्विधीयतामेष न लौकिको हरिः ।<br>ततो विलोक्याह स राक्षसेश्वरः<br>प्रहस्तमग्रे स्थितमञ्जनाद्रिभम् ॥ ४ ॥<br>प्रहस्त पृच्छैनमसौ किमागतः<br>किमत्र कार्यं कुत एव वानरः ।<br>वनं किमर्थं सकलं विनाशितं<br>हताः किमर्थं मम राक्षसा बलात् ॥ ५ ॥<br>ततः प्रहस्तो हनुमन्तमादरा-<br>त्पप्रच्छ केन प्रहितोऽसि वानर ।<br>भयं च ते माऽस्तु विमोक्ष्यसे मया<br>सत्यं वदस्वाखिलराजसन्निधौ ॥ ६ ॥ | वरके प्रभावसे ब्रह्मास्त्र हनुमान्जीके शरीरका क्षण-भरके लिये स्पर्श कर तुरन्त चला गया । यह बात जानकर भी श्रीहनुमान्जी विशेष कार्य सम्पादन करनेके लिये तुच्छ रस्सियोंसे ही बँधे हुए रावणके पास चले गये ॥ २ ॥ तब इन्द्रजित् उन्हें सभामें स्थित रावणके सामने ले गया और बोला—"मैं इस वानरको ब्रह्माके वरके प्रभावसे बाँध लाया हूँ; इसीने हमारे बड़े-बड़े वीर राक्षस मारे हैं ॥ ३ ॥ महाराज ! मन्त्रियोंके साथ विचारकर इसके लिये जैसा उचित समझें वैसा विधान करें। यह कोई साधारण वानर नहीं है।" तब राक्षसराज रावणने सामने बैठे हुए कज्जलगिरिके समान कृष्णवर्ण प्रहस्तसे कहा—॥ ४ ॥ "प्रहस्त ! इस बन्दरसे पूछो तो सही, यह यहाँ क्यों आया है ? इसका क्या कार्य है ? यह कहाँसे आया है ? इसने मेरा सारा वन क्यों उजाड़ डाला ? और मेरे राक्षस वीरोंको बलात्कारसे क्यों मारा ?" ॥ ५॥ तब प्रहस्तने हनुमान्जीसे आदरपूर्वक पूछा—"वानर ! तुम्हें किसने भेजा है ? तुम डरो मत; राजराजेश्वरके सामने सब बात सच-सच बतला दो; फिर मैं तुम्हें छुड़ा दूँगा ॥ ६ ॥ ततोऽतिहर्षात्पवनात्मजो रिपुं<br>निरीक्ष्य लोकत्रयकण्टकासुरम् ।<br>वक्तुं प्रचक्रे रघुनाथसत्कथां<br>क्रमेण रामं मनसा स्मरन्मुहुः ॥ ७ ॥<br>शृणु स्फुटं देवगणाद्यमित्र हे<br>रामस्य दूतोऽहमशेषहृत्स्थितेः ।<br>यस्याखिलेशस्य हृताऽधुना त्वया<br>भार्या स्वनाशाय शुनेव सद्गविः ॥ ८ ॥<br>स राघवोऽभ्येत्य मतङ्गपर्वतं<br>सुग्रीवमैत्रीमनलस्य सन्निधौ ।<br>कृत्वैकवाणेन निहत्य वालिनं<br>सुग्रीवमेवाधिपतिं चकार तम् ॥ ९ ॥<br>स वानराणामधिपो महाबली<br>महाबलैर्वानरयूथकोटिभिः ।<br>रामेण सार्धं सह लक्ष्मणेन भो<br>प्रवर्षणेऽमर्षयुतोऽवतिष्ठते ॥१०॥ | तब अपने शत्रु त्रिलोकीके कण्टकरूप राक्षसराज रावणको देखकर पवननन्दन हनुमान्जीने हृदयमें बार-म्बार श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण कर अति हर्षित हो क्रमसे रघुनाथजीकी सुन्दर कथा कहनी आरम्भ की ॥७॥ वे कहने लगे—"हे देवादिंके शत्रु रावण ! तुम साफ-साफ सुनो; कुत्ता जिसप्रकार हविको चुरा ले जाता है उसी प्रकार तुमने अपना नाश करानेके लिये जिन अखिलेश्वरकी साध्वी भार्याको हर लिया है मैं उन्हीं सर्वान्तर्यामी भगवान् रामका दूत हूँ ॥ ८ ॥ उन श्रीरघुनाथजीने मतङ्गपर्वतपर आकर अग्निके साक्ष्यमें सुग्रीवसे मित्रता की और एक ही बाणसे वालीको मारकर सुग्रीवको वानरोंका राजा बना दिया ॥ ९॥ हे रावण ! इस समय वे महाबली वानरराज और भी करोड़ों महाशूरवीर वानरयूथोंके साथ राम और लक्ष्मणके सहित अति क्रोधयुक्त हो प्रवर्षण पर्वतपर विराजमान हैं ॥ १० ॥ उन्होंने श्रीजानकीजीको ढूँढनेके लिये दशों

२२२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४
सञ्चोदितास्तेन महाहरीश्वरा<br>धरासुतां मार्गयितुं दिशो दश ।<br>तत्राहमेकः पवनात्मजः कपिः<br>सीतां विचिन्वञ्छनकैः समागतः ॥११॥<br>दृष्टा मया पद्मपलाशलोचना<br>सीता कपित्वाद्विपिनं विनाशितम् ।<br>दृष्ट्वा ततोऽहं रभसा समागता-<br>न्मां हन्तुकामान् धृतचापसायकान् ॥१२॥<br>मया हतास्ते परिरक्षितं वपुः<br>प्रियो हि देहोऽखिलदेहिनां प्रभो ।<br>ब्रह्मास्त्रपाशेन निबध्य मां ततः<br>समागमन्मेघनिनादनामकः ॥१३॥<br>स्पृष्ट्वैव मां ब्रह्मवरप्रभावत-<br>स्त्यक्त्वा गतं सर्वमवैमि रावण ।<br>तथाप्यहं बद्ध इवागतो हितं<br>प्रवक्तुकामः करुणार्द्रधीः ॥१४॥<br>विचार्य लोकस्य विवेकतॊ गतिं<br>न राक्षसीं बुद्धिमुपैहि रावण ।<br>दैवीं गतिं संसृतिमोक्षहेतुकीं<br>समाश्रयात्यन्तहिताय देहिनः ॥१५॥<br>त्वं ब्रह्मणो ह्युत्तमवंशसम्भवः<br>पौलस्त्यपुत्रोऽसि कुबेरबान्धवः ।<br>देहात्मबुद्ध्यापि च पश्य राक्षसो<br>नास्यात्मबुद्ध्या किमु राक्षसो नहि ॥१६॥<br>शरीरबुद्धीन्द्रियदुःखसन्तति-<br>र्न ते न च त्वं तव निर्विकारतः ।<br>अज्ञानहेतोश्च तथैव सन्तते-<br>रसत्त्वमस्याः स्वपतो हि दृश्यवत् ॥१७॥<br>इदं तु सत्यं तव नास्ति विक्रिया<br>विकारहेतुर्न च तेऽद्वयत्वतः ।<br>यथा नभः सर्वगतं न लिप्यते<br>तथा भवान्देहगतोऽपि सूक्ष्मकः ।<br>देहेन्द्रियप्राणशरीरसङ्गत-<br>स्त्वात्मेति बुद्ध्वाऽखिलबन्धभागभवेत् ॥१८॥दिशाओंमें बड़े-बड़े वानरेश्वर भेजे हैं। उन्हींमेंसे एक वानर मैं वायुका पुत्र हूँ, मैं सीताजीको धीरे-धीरे ढूँढता हुआ यहाँ आया हूँ ॥ ११ ॥ मैं कमलदललोचना जानकीजीका दर्शन कर चुका हूँ, फिर अपने वानर-स्वभावसे मैंने वन उजाड़ दिया, और जब मैंने राक्षसोंको बड़े वेगसे धनुष-बाण आदि लेकर अपनेको मारनेके लिये आते देखा, तो उन्हें मारकर अपनी शरीर-रक्षा की, क्योंकि हे राजन् ! अपना शरीर तो सभी देहधारियोंको प्यारा होता है। फिर वह मेघनाद नामक राक्षस मुझे ब्रह्मपाशमें बाँधकर यहाँ ले आया ॥ १२-१३ ॥ हे रावण ! मैं यद्यपि यह जानता था कि ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे वह ब्रह्मपाश मुझे छूते ही चला गया, तथापि करुणावश तुम्हारे हितकी बात बतानेके लिये मैं बँधे हुएके समान यहाँ चला आया ॥ १४ ॥ हे रावण ! तुम विवेकपूर्वक संसारकी गतिका विचार करो; राक्षसी बुद्धिको अङ्गीकार मत करो और संसार-बन्धनसे छुटानेवाली प्राणियोंकी अत्यन्त हितकारिणी दैवी गतिका आश्रय लो ॥ १५ ॥ तुम ब्रह्माजीके अति उत्तम वंशमें उत्पन्न हुए हो तथा पुलस्त्यनन्दन विश्रवाके पुत्र और कुबेरके भाई हो; अतः देखो, तुम तो देहात्मबुद्धिसे भी राक्षस नहीं हो; फिर आत्मबुद्धिसे राक्षस नहीं हो—इसमें तो कहना ही क्या है ? ॥ १६ ॥ (तुम वास्तवमें कौन हो सो मैं बतलाता हूँ—) तुम सर्वथा निर्विकार हो; इसलिये शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों और दुःखादि—ये न तुम्हारे (गुण) हैं और न तुम स्वयं हो। इन सबका कारण अज्ञान है और स्वप्नदृश्यके समान ये सब असत् हैं ॥ १७ ॥ यह बिलकुल सत्य है कि तुम्हारे आत्म-स्वरूपमें कोई विकार नहीं है क्योंकि अद्वितीय होनेसे उसमें कोई विकारका कारण ही नहीं है। जिस प्रकार आकाश सर्वत्र होनेसे भी (किसी पदार्थके गुण-दोषसे) लिप्त नहीं होता उसी प्रकार तुम देहमें रहते हुए भी सूक्ष्मरूप होनेसे उसके सुख-दुःखादि विकारोंसे लिप्त नहीं होते । 'आत्मा देह, इन्द्रिय, प्राण और शरीरसे मिला हुआ है' ऐसी बुद्धि ही सारे बन्धनोंका कारण होती है ॥ १८ ॥ और 'मैं चिन्मात्र अजन्मा अविनाशी
सर्ग ४ ]सुन्दरकाण्ड२२३

चिन्मात्रमेवाहमजोऽहमक्षरो<br>ह्यानन्दभावोऽहमिति प्रमुच्यते ।<br>देहोऽप्यनात्मा पृथिवीविकारजो<br>न प्राण आत्माऽनिल एष एव सः ॥१९॥<br>मनोऽप्यहङ्कारविकार एव नो<br>न चापि बुद्धिः प्रकृतेर्विकारजा ।<br>आत्मा चिदानन्दमयोऽविकारवा-<br>न्देहादिसङ्घाद्व्यतिरिक्त ईश्वरः ॥२०॥<br>निरञ्जनो मुक्त उपाधितः सदा<br>ज्ञात्वैवमात्मानमितो विमुच्यते ।<br>अतोऽहमात्यन्तिकमोक्षसाधनं<br>वक्ष्ये शृणुष्वावहितो महामते ॥२१॥<br>विष्णोर्हि भक्तिः सुविशोधनं धिय-<br>स्ततो भवेज्ज्ञानमतीव निर्मलम् ।<br>विशुद्धतत्त्वानुभवो भवेत्ततः<br>सम्यग्विदित्वा परमं पदं व्रजेत् ॥२२॥<br>अतो भजस्वाद्य हरिं रमापतिं<br>रामं पुराणं प्रकृतेः परं विभुम् ।<br>विसृज्य मौर्ख्यं हृदि शत्रुभावनां<br>भजस्व रामं शरणागतप्रियम् ।<br>सीतां पुरस्कृत्य सपुत्रबान्धवो<br>रामं नमस्कृत्य विमुच्यसे भयात् ॥२३॥<br>रामं परात्मानमभावयन् जनो<br>भक्त्या हृदिस्थं सुखरूपमद्वयम् ।<br>कथं परं तीरमवाप्नुयाज्जनो<br>भवाम्बुधेर्दुःखतरङ्गमालिनः ॥२४॥<br>नो चेत्त्वमज्ञानमयेन वह्निना<br>ज्वलन्तमात्मानमरक्षिताऽरिवत् ।<br>नयस्यधोऽधः स्वकृतैश्च पातकै-<br>र्विमोक्षशङ्का न च ते भविष्यति ॥२५॥<br>श्रुत्वाऽमृतास्वादसमानभाषितं<br>तद्वायुसूनोर्दशकन्धरोऽसुरः ।<br>अमृष्यमाणोऽतिरुषा कपीश्वरं<br>जगाद रक्तान्तविलोचनो ज्वलन् ॥२६॥ | तथा आनन्दस्वरूप ही हूँ' इस बुद्धिसे जीव मुक्त हो जाता है। पृथिवीका विकार होनेसे देह भी अनात्मा है और प्राण वायुरूप ही है, अतः यह भी आत्मा नहीं है ॥ १९ ॥ अहंकारका कार्य मन अथवा प्रकृतिके विकारसे उत्पन्न हुई बुद्धि भी आत्मा नहीं है। आत्मा तो चिदानन्दस्वरूप, अविकारी तथा देहादि संघातसे पृथक् और उसका स्वामी है ॥२०॥ वह निर्मल और सर्वदा उपाधिरहित है; उसका इस प्रकार ज्ञान होते ही मनुष्य संसारसे मुक्त हो जाता है। अतः हे महामते ! मैं तुम्हें आत्यन्तिक मोक्षका साधन बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २१ ॥ भगवान् विष्णुकी भक्ति, बुद्धिको अत्यन्त शुद्ध करनेवाली है, उसीसे अत्यन्त निर्मल आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञानसे शुद्ध आत्मतत्त्वका अनुभव होता है और उससे दृढबोध हो जानेसे मनुष्य परमपद प्राप्त करता है ॥ २२ ॥ इसलिये तुम प्रकृतिसे परे, पुराणपुरुष, सर्वव्यापक आदि-नारायण, लक्ष्मीपति, हरि भगवान् रामका भजन करो। अपने हृदयमें स्थित शत्रुभावरूप मूर्खताको छोड़ दो, और शरणागतवत्सल रामका भजन करो। सीताजीको आगेकर अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके सहित भगवान् रामकी शरण जाकर उन्हें नमस्कार करो। इससे तुम भयसे छूट जाओगे ॥ २३ ॥ जो पुरुष अपने हृदयमें स्थित अद्वितीय सुखरूप परमात्मा रामका भक्तिपूर्वक ध्यान नहीं करता वह दुःख-तरङ्गावलिसे पूर्ण इस संसार-समुद्रका पार कैसे पा सकता है ? ॥ २४ ॥ यदि तुम भगवान् रामका भजन न करोगे तो अज्ञानरूपी अग्निसे जलते हुए अपने-आपको शत्रुके समान सुरक्षित नहीं रख सकोगे और उसे अपने किये हुए पापोंसे उत्तरोत्तर नीचेकी ओर ही ले जाओगे; फिर तुम्हारे मोक्षकी कोई सम्भावना न रहेगी" ॥ २५ ॥<br>पवनसुतके इस अमृतसदृश मधुर भाषणको सुनकर राक्षसराज रावण उसे सहन न कर सका और अत्यन्त क्रोधसे नेत्र लाल कर मन-ही-मन जलता हुआ हनुमान्जी-से बोला—॥२६॥ "अरे दुष्टबुद्धे ! तू वानरोंमें अधम है। मेरे सामने इस प्रकार निर्भयके समान कैसे प्रलाप कर

२२४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

मूल श्लोक (संस्कृत):

कथं ममाग्रे विलपस्यभीतवत्
प्लवङ्गमानामधमोऽसि दुष्टधीः ।
क एष रामः कतमो वनेचरो
निहन्मि सुग्रीवयुतं नराधमम् ॥२७॥

त्वां चाद्य हत्वा जनकात्मजां ततो
निहन्मि रामं सहलक्ष्मणं ततः ।
सुग्रीवमग्रे बलिनं कपीश्वरं
सवानरं हन्म्यचिरेण वानर ।
श्रुत्वा दशग्रीववचः स मारुति-
श्चिंवृद्धकोपेन दहन्निवासुरम् ॥२८॥

न मे समा रावणकोटयोऽधम
रामस्य दासोऽहमपारविक्रमः ।
श्रुत्वाऽतिकोपेन हनूमतो वचो
दशाननो राक्षसमेवमब्रवीत् ॥२९॥

पार्श्वे स्थितं मारय खण्डशः कपिं
पश्यन्तु सर्वेऽसुरमित्रबान्धवाः ।
निवारयामास ततो विभीषणो
महासुरं सायुधमुद्यतं वधे ।
राजन्यधार्हो न भवेत्कथञ्चन
प्रतापयुक्तैः परराजवानरः ॥३०॥

हतेऽस्मिन्वानरे दूते वार्तां को वा निवेदयेत् ।
रामाय त्वं यमुद्दिश्य वधाय समुपस्थितः ॥३१॥

अतो वधसमं किञ्चिदन्यच्चिन्तय वानरे ।
सचिह्नो गच्छतु हरिर्यं दृष्ट्वाऽऽस्यास्यति द्रुतम् ॥३२॥

रामः सुग्रीवसहितस्ततो युद्धं भवेत्तव ।
विभीषणवचः श्रुत्वा रावणोऽप्येतदब्रवीत् ॥३३॥

वानराणां हि लाङ्गले महामानो भवेत्किल ।
अतो वस्त्रादिभिः पुच्छं वेष्टयित्वा प्रयत्नतः ॥३४॥

वह्निना योजयित्वैनं भ्रामयित्वा पुरेऽभितः ।
विसर्जयत पश्यन्तु सर्वे वानरयूथपाः ॥३५॥

तथेति शणपट्टैश्च वस्त्रैरन्यैरनेकंशः ।
तैलाक्तैर्वेष्टयामासुर्लाङ्गूलं मारुतेर्दृढम् ॥३६॥

पुच्छाग्रे किञ्चिदनलं दीपयित्वाऽथ राक्षसाः ।
रज्जुभिः सुदृढं बद्ध्वा धृत्वा तं बलिनोऽसुराः ॥३७॥
समन्ताद् भ्रामयामासुश्चोरोऽयमिति वादिनः ।


हिन्दी अनुवाद:

रहा है ? यह राम और वनचर सुग्रीव हैं क्या चीज़ ! उस नराधमको तो सुग्रीवके सहित मैं ही मार डालूँगा ॥ २७ ॥ ऐ वानर ! पहले तो आज तुझे ही मारूँगा, फिर जानकीका वध करूँगा, तदनन्तर लक्ष्मणके सहित रामको मारूँगा और उनसे पहले उस बड़े बली वानरराज सुग्रीवको उसकी वानरसेनाके सहित कुछ ही देरमें मार डालूँगा ।” रावणके ये वचन सुनकर हनुमान्जी अपने बढ़े हुए क्रोधसे उसे जलाते हुए-से बोले—॥२८॥ “अरे अधम ! मेरी समानता तो करोड़ रावण भी नहीं कर सकते; जानता नहीं, मैं भगवान् रामका दास हूँ, मेरे पराक्रमका कोई ठिकाना नहीं है ।” हनुमान्जीके ये वचन सुनकर रावणने अत्यन्त क्रोधपूर्वक अपनी बगलमें खड़े हुए एक राक्षससे कहा— “अरे ! इस वानरके टुकड़े-टुकड़े करके मार डाल, जिससे सब राक्षस, मित्र तथा बन्धुगण इस कौतुकको देखें ।” तब विभीषणने, हथियार लेकर मारनेके लिये तैयार हुए उस प्रचण्ड राक्षसको रोककर कहा— “राजन् ! प्रतापी पुरुषोंको अन्य राज्यके वानर-दूतको किसी प्रकार भी न मारना चाहिये ॥ २९-३० ॥ यदि यह वानर-दूत मारा गया तो जिनका वध करनेके लिये आप उद्यत हुए हैं उन रामको यह समाचार कौन सुनावेगा ? ॥ ३१ ॥ अतः, इस वानरके लिये वधके समान ही कोई और दण्ड निश्चय कीजिये, जिसका चिह्न लेकर यह वानर जाय और उसे देखकर सुग्रीवके सहित राम तुरन्त ही आयें और फिर उनसे आपका युद्ध हो ।” विभीषणका कथन सुनकर रावण भी यों बोला—॥३२-३३॥ “वानरोंको पूँछपर बड़ी ममता होती है । अतः इसकी पूँछको वस्त्रादिसे खूब लपेट दो और फिर उसमें आग लगाकर इसे नगरमें चारों ओर घुमाकर छोड़ दो, जिससे समस्त वानरयूथपति इसकी वह दुर्दशा देखें” ॥ ३४-३५ ॥

तब राक्षसोंने 'बहुत अच्छा' कह हनुमान्जीकी पूँछ सनके पट्टोंसे और तेलमें भीगे हुए नाना प्रकारके चिथड़ोंसे बड़ी दृढ़तासे लपेटी; और पूँछके सिरेपर थोड़ी-सी आग लगाकर उन्हें दृढ़तापूर्वक रस्सीसे बाँधकर कुछ बलवान् राक्षस उन्हें मारते और बारम्बार तुरही

सर्ग ४ ] सुन्दरकाण्ड २२५


तूर्यघोषैर्घोषयन्तस्ताडयन्तो मुहुर्मुहुः ॥३८॥ हनूमताऽपि तत्सर्वं सोढं किञ्चिच्चिकीर्षुणा । गत्वा तु पश्चिमद्वारसमीपं तत्र मारुतिः ॥३९॥ सूक्ष्मो बभूव बन्धेभ्यो निःसृतः पुनरप्यसौ । बभूव पर्वताकारस्तत उत्प्लुत्य गोपुरम् ॥४०॥ तत्रैकं स्तम्भमादाय हत्वा तान् रक्षिणः क्षणात् । विचार्य कार्यशेषं स प्रासादाग्राद्गृहद्गृहम् ॥४१॥ उत्प्लुत्योत्प्लुत्य सन्दीप्तपुच्छेन महता कपिः । ददाह लङ्कामखिलां साट्टप्रासादतोरणाम् ॥४२॥ हा तात पुत्र नाथेति क्रन्दमानाः समन्ततः । व्याप्ताःप्रासादशिखरेऽप्यारूढा दैत्ययोषितः॥४३॥ देवता इव दृश्यन्ते पतन्त्यः पावकेऽखिलाः । विभीषणगृहं त्यक्त्वा सर्वं भस्मीकृतं पुरम् ॥४४॥ तत उत्प्लुत्य जलधौ हनूमान्मारुतात्मजः । लाङ्गूलं मज्जयित्वान्तः स्वस्थचित्तो बभूव सः ॥४५॥ वायोः प्रियसखित्वाच्च सीतया प्रार्थितोऽनलः । न ददाह हरेः पुच्छं बभूवात्यन्तशीतलः ॥४६॥ यन्नामसंस्मरणधूतसमस्तपापा- स्तापत्रयानलमपीह तरन्ति सद्यः । तस्यैव किं रघुवरस्य विशिष्टदूतः सन्तप्यते कथमसौ प्रकृतानलेन ॥४७॥

बजाकर यह कहते हुए कि 'यह चोर है' नगरमें सब ओर घुमाने लगे ॥ ३६-३८ ॥ हनुमान्‌जीने भी कुछ कौतुक करनेकी इच्छासे यह सब सहन कर लिया । जिस समय वे पश्चिमद्वारपर पहुँचे उस समय तुरन्त ही सूक्ष्मरूप होकर उन बन्धनोंमेंसे निकल गये और फिर पर्वताकार हो उछलकर द्वारके कँगूरेपर चढ़ गये ॥ ३९-४० ॥ वहाँसे उन्होंने एक स्तम्भ उखाड़कर एक क्षणमें ही उन समस्त रक्षकोंको मार डाला और फिर अपना शेष कार्य निश्चय कर उस प्रासादके अग्रभागसे एक घरसे दूसरे घरपर छलाँग मारते हुए अपनी जलती हुई लम्बी पूँछसे महल, अटारी और बन्दनवारादिसे युक्त समस्त लंकापुरीमें आग लगा दी ॥ ४१-४२ ॥ उस समय 'हा तात ! हा पुत्र ! हा नाथ !' कहकर सब ओर फैली हुई, महलोंके ऊपर भी चढ़ी हुई तथा अग्निमें गिरती हुई समस्त दैत्यस्त्रियाँ देवताओंके समान मालूम होती थीं। इस प्रकार हनुमान्‌जीने विभीषणके घरको छोड़कर और सारा नगर भस्म कर डाला ॥ ४३-४४ ॥ तदनन्तर पवनात्मज हनुमान्‌जी उछलकर समुद्रमें कूद पड़े और अपनी पूँछ बुझाकर स्वस्थचित्त हो गये ॥ ४५ ॥ सीताजीकी प्रार्थनासे तथा वायुका प्रिय मित्र होनेके कारण अग्निने हनुमान्‌जीकी पूँछ नहीं जलायी । उनके लिये वह अत्यन्त शीतल हो गया ॥ ४६ ॥

जिनके नाम-स्मरणसे मनुष्य समस्त पापोंसे छूटकर तुरन्त ही तापत्रयरूप अग्निको पार कर जाते हैं उन्हीं श्रीरघुनाथजीके विशिष्ट दूतको यह प्राकृत अग्नि भला किस प्रकार ताप पहुँचा सकता था ? ॥ ४७ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

सुन्दरकाण्ड - सर्ग ५: हनुमान्‌जीका सीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको सन्देश सुनाना

२२६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५


पञ्चम सर्ग

हनुमान्‌जीका सीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको उनका सन्देश सुनाना।

श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीहनुमान्‌जीने सीताजीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके कहा—"देवि ! आप मुझे आज्ञा दीजिये; अब मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाता हूँ; वे शीघ्र ही भाई लक्ष्मणसहित आपसे मिलनेके लिये यहाँ आयेंगे।" ऐसा कह पवननन्दन हनुमान्‌जीने जानकीजीकी तीन परिक्रमाएँ कर उन्हें प्रणाम किया और जानेके लिये कुछ दूर चलकर बोले—"देवि ! मैं जाता हूँ, आपका शुभ हो, आप शीघ्र ही सुग्रीव और करोड़ों अन्य वानरोंके सहित भगवान् राम और लक्ष्मणको देखेंगी।" तब दुःखसे दुर्बल हुई जानकीने हनुमान्‌जीसे कहा—"तुम्हें देखकर मैं अपना दुःख भूल गयी थी। अब तुम जा रहे हो; अब, श्रीरामचन्द्रजीका समाचार सुने बिना मैं कैसे रहूँगी"? ॥ १-५ ॥
ततः सीतां नमस्कृत्य हनुमानब्रवीद्वचः।<br>आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसन्निधिम् ॥ १ ॥<br>गच्छामि रामस्त्वां द्रष्टुमागमिष्यति सानुजः।<br>इत्युक्त्वा त्रिःपरिक्रम्य जानकीं मारुतात्मजः॥२॥<br>प्रणम्य प्रस्थितो गन्तुमिदं वचनमब्रवीत् ।<br>देवि गच्छामि भद्रं ते तूर्णं द्रक्ष्यसि राघवम् ॥ ३ ॥<br>लक्ष्मणं च ससुग्रीवं वानरायुतकोटिभिः ।<br>ततः प्राह हनूमन्तं जानकी दुःखकर्शिता ॥ ४ ॥<br>त्वां दृष्ट्वा विस्मृतं दुःखमिदानीं त्वं गमिष्यसि ।<br>इतः परं कथं वर्ते रामवार्ताश्रुतिं विना ॥ ५ ॥

मारुतिरुवाच

यद्येवं देवि मे स्कन्धमारोह क्षणमात्रतः ।<br>रामेण योजयिष्यामि मन्यसे यदि जानकि ॥ ६ ॥**हनुमान्‌जी बोले—**हे देवि ! यदि ऐसी बात है और आप स्वीकार करें तो हे जनकनन्दिनी ! आप मेरे कन्धेपर चढ़ लीजिये, मैं एक क्षणमें ही श्रीरामचन्द्रजीसे आपको मिला दूँगा ॥ ६ ॥

सीतोवाच

रामः सागरमाशोष्य बद्ध्वा वा शरपञ्जरैः ।<br>आगत्य वानरैः सार्धं हत्वा रावणमाहवे ॥ ७ ॥<br>मां नयेद्यदि रामस्य कीर्तिर्भवति शाश्वती ।<br>अतो गच्छ कथं चापि प्राणान्सन्धारयाम्यहम् ॥८॥**सीताजीने कहा—**यदि श्रीरामचन्द्रजी समुद्रको सुखाकर या उसे बाणोंसे बाँधकर यहाँ वानरोंके साथ आयें और रावणको युद्धमें मारकर मुझे ले जायँ तो इससे उन्हें अमर कीर्ति प्राप्त होगी। इसलिये तुम जाओ, मैं जैसे-तैसे प्राण धारण करूँगी ॥ ७-८ ॥
इति प्रस्थापितो वीरः सीतया प्रणिपत्य ताम् ।<br>जगाम पर्वतस्याग्रे गन्तुं पारं महोदधेः ॥ ९ ॥<br>तत्र गत्वा महासत्त्वः पादाभ्यां पीडयन् गिरिम् ।<br>जगाम वायुवेगेन पर्वतश्च महीतलम् ॥१०॥<br>गतो महीसमानत्वं त्रिंशद्योजनमुच्छ्रितः।<br>मारुतिर्गगनान्तस्थो महाशब्दं चकार सः ॥११॥<br>तं श्रुत्वा वानराः सर्वे ज्ञात्वा मारुतिमागतम् ।<br>हर्षेण महताऽऽविष्टाः शब्दं चक्रुर्महास्वनम् ॥१२॥सीताजीसे इस प्रकार विदा हो वीरवर हनुमान् उन्हें प्रणाम कर महासागरके पार जानेके लिये पर्वत-शिखरपर चढ़ गये ॥ ९ ॥ वहाँ पहुँचकर महावीर हनुमान्‌जी पर्वतको अपने पैरोंसे दबाकर वायुवेगसे चले और (उनके दबानेसे) वह तीस योजन ऊँचा पर्वत पृथिवीमें घुसकर समतल हो गया। हनुमान्‌जीने आकाशमें जाते समय बड़ा घोर शब्द किया ॥ १०-११ ॥ उसे सुनकर सब वानरगण, यह जानकर कि हनुमान्‌जी लौट रहे हैं, बड़े आनन्दमें भरकर घोर शब्द करने लगे ॥ १२ ॥ (वे आपसमें कहने लगे—)

सर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२७


[संस्कृत श्लोक]

शब्देनैव विजानीमः कृतकार्यः समागतः ।
हनूमानेव पश्यध्वं वानरा वानरर्षभम् ॥१३॥

एवं ब्रुवत्सु वीरेषु वानरेषु स मारुतिः ।
अवतीर्य गिरेर्मूर्ध्नि वानरानिदमब्रवीत् ॥१४॥

दृष्टा सीता मया लङ्का धर्षिता च सकानना ।
सम्भाषितो दशग्रीवस्ततोऽहं पुनरागतः ॥१५॥

इदानीमेव गच्छामो रामसुग्रीवसन्निधिम् ।
इत्युक्ता वानराः सर्वे हर्षेणालिङ्ग्य मारुतिम् ॥१६॥

केचिच्चुचुम्बुर्लाङ्गूलं ननृतुः केचिदुत्सुकाः ।
हनूमता समेतास्ते जग्मुः प्रस्रवणं गिरिम् ॥१७॥

गच्छन्तो ददृशुर्वीरा वनं सुग्रीवरक्षितम् ।
मधुसंज्ञं तदा प्राहुरङ्गदं वानरर्षभाः ॥१८॥

क्षुधिताः स्मो वयं वीर देह्यनुज्ञां महामते ।
भक्षयामः फलान्यद्य पिवामोऽमृतवन्मधु ॥१९॥

सन्तुष्टा राघवं द्रष्टुं गच्छामोऽद्यैव सानुजम् ॥२०॥

अङ्गद उवाच
हनूमान्कृतकार्योऽयं पिवतैतत्प्रसादतः ।
जक्षध्वं फलमूलानि त्वरितं हरिसत्तमाः ॥२१॥

ततः प्रविश्य हरयः पातुमारभिरे मधु ।
रक्षिणस्ताननादृत्य दधिमुखेन नोदितान् ॥२२॥

पिवतस्ताडयामासुर्वानरान्वानरर्षभाः ।
ततस्तान्मुष्टिभिः पादैश्चूर्णयित्वा पपुर्मधु ॥२३॥

ततो दधिमुखः क्रुद्धः सुग्रीवस्य स मातुलः ।
जगाम रक्षिभिः सार्धं यत्र राजा कपीश्वरः ॥२४॥

गत्वा तमब्रवीद्देव चिरकालाभिरक्षितम् ।
नष्टं मधुवनं तेऽद्य कुमारेण हनूमता ॥२५॥

श्रुत्वा दधिमुखेनोक्तं सुग्रीवो हृष्टमानसः ।


[हिन्दी अनुवाद]

"इस सिंहनादसे ही मालूम होता है कि हनुमान्‌जी कार्य सिद्ध करके लौटे हैं । हे वानरगण ! देखो, देखो, ये कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जी ही तो हैं" ॥१३॥ वानर वीरोंके इस प्रकार कहते-कहते हनुमान्‌जी उस गिरिशिखरपर उतर आये और उनसे यों कहने लगे ॥१४॥ "मैने सीताजीको देखा, अशोकवनसहित लंकाका विध्वंस किया और रावणसे भी बातचीत की । उसके पश्चात् मैं यहाँ आया हूँ ॥१५॥ अब हम इसी समय राम और सुग्रीवके पास चलेंगे ।" हनुमान्‌जीके इस प्रकार कहनेपर सब वानरोंने अत्यन्त हर्षसे उन्हें गले लगाया, किन्हींने उनकी पूँछ चूमीं और कोई अति उत्साहसे नाचने लगे । तदनन्तर हनुमान्‌जीके साथ वे सब प्रस्रवण पर्वतपर गये ॥१६-१७॥

जिस समय वे वीर वानरगण जा रहे थे उनकी दृष्टि सुग्रीवद्वारा सुरक्षित मधुवनपर पड़ी । उसे देखकर वे अंगदजीसे बोले ॥१८॥ "हे वीर ! हमें बड़ी भूख लगी है । अतः हे महामते ! हमें आज्ञा दीजिये जिससे आज हम इस वनके फल खाकर अमृततुल्य मधु पियें ॥१९॥ उसके पश्चात् हम तृप्त होकर भाई लक्ष्मणसहित रघुनाथजीके दर्शन करनेके लिये चलेंगे" ॥२०॥

अंगदजी बोले—हनुमान्‌जीने कार्य सिद्ध किया है, अतः हे वानरश्रेष्ठगण ! इनकी कृपासे तुम शीघ्र ही फल-मूल खाओ और मधु-पान करो ॥२१॥

अंगदजीकी आज्ञा पा वानरगण उस वनमें घुसकर दधिमुखके भेजे हुए वनरक्षकोंकी उपेक्षाकर मधु पीने लगे ॥२२॥ जब उन वानरोंने उन्हें मधुपान करते देखकर मारा तो वे उन्हें लात और घूँसोंसे कुचलकर मधु पीते रहे ॥२३॥ तब सुग्रीवका मामा दधिमुख अन्य वनरक्षकोंके साथ अति क्रुद्ध हो जहाँ वानरराज सुग्रीव थे वहाँ गया ॥२४॥ वहाँ पहुँचकर वह बोला—"राजन् ! तुमने चिरकालसे जिस मधुवनकी रक्षा की थी उसे आज युवराज अंगद और हनुमान्‌ने उजाड़ डाला" ॥२५॥ दधिमुखकी बात सुनकर सुग्रीव प्रसन्न होकर कहने लगे—"इसमें सन्देह नहीं पवनकुमार सीताजीको देख आये

२२८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५

दृष्ट्वाऽऽगतो न सन्देहः सीतां पवननन्दनः ॥२६॥ नो चेन्मधुवनं द्रष्टुं समर्थः को भवेन्मम । तत्रापि वायुपुत्रेण कृतं कार्यं न संशयः ॥२७॥

श्रुत्वा सुग्रीववचनं हृष्टो रामस्तमब्रवीत् । किमुच्यते त्वया राजन्यचः सीताकथान्वितम् ॥२८॥

सुग्रीवस्त्वब्रवीद्वाक्यं देव दृष्टाऽवनीसुता । हनूमत्प्रमुखाः सर्वे प्रविष्टा मधुकाननम् ॥२९॥

भक्षयन्ति स्म सकलं ताडयन्ति स्म रक्षिणः । अकृत्वा देवकार्यं ते द्रष्टुं मधुवनं मम ॥३०॥

न समर्थास्ततो देवी दृष्टा सीतेति निश्चितम् । रक्षिणो वो भयं माऽस्तु गत्वा ब्रूत ममाज्ञया ॥३१॥

वानरानङ्गदप्रमुखानिनयध्वं ममान्तिकम् । श्रुत्वा सुग्रीववचनं गत्वा ते वायुवेगतः ॥३२॥

हनुमत्प्रमुखानुचुर्गच्छतेश्वरशासनात् । द्रष्टुमिच्छति सुग्रीवः सरामो लक्ष्मणान्वितः ॥३३॥

युष्मानतीव हृष्टास्ते त्वरयन्ति महाबलाः । तथेत्यम्बरमासाद्य ययुस्ते वानरोत्तमाः ॥३४॥

हनूमन्तं पुरस्कृत्य युवराजं तथाऽङ्गदम् । रामसुग्रीवयोग्रे निपेतुर्भुवि सत्वरम् ॥३५॥

हनूमान् राघवं प्राह दृष्टा सीता निरामया । साष्टाङ्गं प्रणिपत्याग्रे रामं पश्चाद्धरीश्वरम् ॥३६॥

कुशलं प्राह राजेन्द्र जानकी त्वां शुचान्विता । अशोकवनिकामध्ये शिंशपामूलमाश्रिता ॥३७॥

राक्षसीभिः परिवृता निराहारा कृशा प्रभो । हा राम राम रामेति शोचन्ती मलिनाम्बरा ॥३८॥

एकवेणी मया दृष्टा शनैराश्वासिता शुभा ।


हैं; नहीं तो, मेरे मधुवनकी ओर देखनेकी भला किसे सामर्थ्य थी ? और उनमें भी निस्सन्देह यह कार्य किया हनुमान्‌जीने ही है"॥ २६-२७ ॥

सुग्रीवके वचन सुनकर भगवान् रामने प्रसन्न हो उनसे पूछा—"राजन् ! यह सीता-सम्बन्धी तुम क्या बात कह रहे हो ?" ॥ २८ ॥ सुग्रीवने कहा—"भगवन् ! मालूम होता है भूमिसुता जानकीजीका पता लग गया है, क्योंकि हनुमान् आदि समस्त वानरगण मधुवनमें घुसकर उसके फल खा रहे हैं और उसके रक्षकोंको मारते हैं। बिना आपका कार्य किये तो वे मेरे मधुवनकी ओर देख भी नहीं सकते थे। अतः यह निश्चय होता है कि वे देवी जानकीजीसे मिल आये हैं। रक्षको ! तुम डरो मत, उन्हें जाकर मेरी आज्ञा सुनाओ और उन अंगदादि वानरोंको मेरे पास ले आओ।" सुग्रीवकी आज्ञा सुनकर वे वायुवेग से चले और हनुमान् आदिसे कहा—"महाराजकी आज्ञा है, आपलोग तुरन्त वहाँ जाइये क्योंकि राम और लक्ष्मणके सहित महाराज सुग्रीव आपलोगोंसे मिलना चाहते हैं। हे महावीरगण ! आपलोगोंसे प्रसन्न होकर वे आपको बहुत शीघ्र बुला रहे हैं।" तब वे वानरश्रेष्ठ 'बहुत अच्छा' कह आकाशमें चढ़कर चलने लगे। वे सब वानरगण हनुमान् और युवराज अंगदको आगे कर चले और तुरन्त ही राम और सुग्रीवके सामने पृथिवीपर उतर आये ॥ २९–३५ ॥

हनुमान्‌जीने पहले श्रीरघुनाथजीको और फिर वानरराज सुग्रीवको साष्टाङ्ग प्रणाम कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"मैं सीताजीको सकुशल देख आया हूँ ॥ ३६ ॥ हे राजेन्द्र ! शोकमग्ना जानकीजीने आपको अपना कुशल-समाचार सुनानेके लिये कहा है। वे अशोक-वाटिकाके बीचमें शिंशपा वृक्षके तले बैठी हैं, और हे प्रभो ! सदा राक्षसियोंसे घिरी रहती हैं, अन्न-जल छोड़ देनेके कारण वे अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं, और निरन्तर 'हा राम ! हा राम !' कहकर शोक करती रहती हैं, उनके वस्त्र मलिन हो गये हैं तथा बालोंकी मिलकर एक वेणी हो गयी है—ऐसी अवस्था-

सर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२९


[ संस्कृत मूल ]

वृक्षशाखान्तरे स्थित्वा सूक्ष्मरूपेण ते कथाम् ॥ ३९ ॥
जन्मारभ्य तदात्यर्थं दण्डकागमनं तथा ।
दशाननेन हरणं जानक्या रहिते त्वयि ॥ ४० ॥
सुग्रीवेण यथा मैत्री कृत्वा वालिनिबर्हणम् ।
मार्गणार्थं च वैदेह्याः सुग्रीवेण विसर्जिताः ॥ ४१ ॥
महाबला महासत्त्वा हरयो जितकाशिनः ।
गताः सर्वत्र सर्वे वै तत्रैकोऽहमिहागतः ॥ ४२ ॥
अहं सुग्रीवसचिवो दासोऽहं राघवस्य हि ।
दृष्टा यज्जानकी भाग्यात्प्रयासः फलितोऽद्य मे ॥ ४३ ॥

इत्युदीरितमाकर्ण्य सीता विस्फारितेक्षणा ।
केन वा कर्णपीयूषं श्रावितं मे शुभाक्षरम् ॥ ४४ ॥
यदि सत्यं तदायातु मदर्शनपथं तु सः ।
ततोऽहं वानराकारः सूक्ष्मरूपेण जानकीम् ॥ ४५ ॥
प्रणम्य प्राञ्जलिर्भूत्वा दूरादेव स्थितः प्रभो ।
पृष्टोऽहं सीतया कस्त्वमित्यादि बहुविस्तरम् ॥ ४६ ॥
मया सर्वं क्रमेणैव विज्ञापितमरिन्दम ।
पश्चान्मयार्पितं देव्यै भवद्दत्ताङ्गुलीयकम् ॥ ४७ ॥
तेन मामतिविश्वस्ता वचनं चेदमब्रवीत् ।
यथा दृष्टोऽस्मि हनुमन्पीड्यमाना दिवानिशम् ४८
राक्षसीनां तर्जनैस्तत्सर्वं कथय राघवे ।
मयोक्तं देवि रामोऽपि त्वच्चिन्तापरिनिष्ठितः ॥ ४९ ॥
परिशोचत्यहोरात्रं त्वद्वार्ता नाधिगम्य सः ।
इदानीमेव गत्वाऽहं स्थितिं रामाय ते ब्रुवे ॥ ५० ॥
रामः श्रवणमात्रेण सुग्रीवेण सलक्ष्मणः ।
वानरानीकपः सार्धमागमिष्यति तेऽन्तिकम् ॥ ५१ ॥
रावणं सकुलं हत्वा नेष्यति त्वां स्वकं पुरम् ।
अभिज्ञां देहि मे देवि यथा मां विश्वसेद्विभुः ॥ ५२ ॥
इत्युक्ता सा शिरोरत्नं चूडापाशे स्थितं प्रियम् ।


[ हिन्दी अनुवाद ]

में मैंने सीताजीको देखा और धीरे-धीरे उन्हें ढाँढ़स-बँधाया। वहाँ जाकर पहले मैंने सूक्ष्मरूपसे वृक्षके पत्तोंमें छिपे-छिपे संक्षेपमें आपकी सब कथा सुनायी, जिस प्रकार जन्मसे लेकर आपका दण्डकारण्यमें आना हुआ, आपकी अनुपस्थितिमें रावणने सीताजीको हरा, तथा जिस प्रकार सुग्रीवसे मित्रता कर आपने वालीको मारा— (वह सब सुनाकर फिर मैंने कहा कि) सुग्रीवद्वारा सीताजीकी खोजके लिये भेजे हुए बड़े बलवान्, पराक्रमी और विजयशाली वानरगण सब दिशाओंमें गये हैं और उनमेंसे एक मैं सुग्रीवका मन्त्री और रघुनाथजीका दास यहाँ आया हूँ। आज भाग्यवश मैने जानकीजीको देख लिया अतः मेरा प्रयास सफल हो गया ॥ ३७–४३ ॥

"मेरा यह कथन सुनकर सीताजीके नेत्र खिल गये और वे कहने लगीं— 'मुझे ये कर्णामृतरूप शुभ संवाद किसने सुनाया है? यदि यह सब सत्य है (—मुझे भ्रम नहीं हुआ है) तो इस संवादको सुनानेवाला मेरे सामने आवे।' हे प्रभो! तब मैं सूक्ष्मरूपसे बन्दरके आकारमें उनके सामने उपस्थित हुआ और दूरहीसे प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब जानकीजीने मुझसे 'तुम कौन हो?' इत्यादि बहुत-सी बातें पूछीं ॥ ४४–४६ ॥ और हे शत्रुदमन! मैंने उन्हें क्रमशः सब बातें बतला दीं। इसके पश्चात् मैंने उन्हें आपकी दी हुई अँगूठी निवेदन की ॥ ४७ ॥ इससे उन्हें मुझपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे मुझसे इस प्रकार कहने लगीं— 'हनुमन्! जिस प्रकार इन राक्षसियोंके त्राससे तुमने मुझे अहर्निश दुःख उठाते देखा है वह सब ज्यों-का-त्यों रघुनाथजीको सुना देना।' मैंने कहा— 'देवि! रघुनाथजी भी तुम्हारी ही चिन्तासे ग्रस्त रहते हैं, और तुम्हारा समाचार न मिलनेसे रात-दिन तुम्हारी ही चिन्ता करते रहते हैं। मैं अभी जाकर उन्हें तुम्हारी स्थिति सुनाऊँगा ॥ ४८–५० ॥ और रघुनाथजी उसे सुनते ही सुग्रीव, लक्ष्मण और अन्यान्य वानर सेनापतियोंके साथ तुम्हारे पास आयेंगे ॥ ५१ ॥ तथा रावणको कुटुम्बसहित मारकर तुम्हें अपनी राजधानी अयोध्याको ले जायेंगे। हे देवि! तुम मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे भगवान् मेरा विश्वास करें' ॥ ५२ ॥ मेरे इस प्रकार कहनेपर उन्होंने अपने केशपाशमें स्थित अपनी प्रिया चूडामणि दी और पहले

२३०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

दत्त्वा काकेन यद्वृत्तं चित्रकूटगिरौ पुरा ॥५३॥ तदप्याहाश्रुपूर्णाक्षी कुशलं ब्रूहि राघवम् । लक्ष्मणं ब्रूहि मे किञ्चिद्दुरुक्तं भाषितं पुरा ॥५४॥ तत्क्षमस्वाज्ञभावेन भाषितं कुलनन्दन । तारयेन्मां यथा रामस्तथा कुरु कृपान्वितः ॥५५॥

इत्युक्त्वा रुदती सीता दुःखेन महताऽऽवृता । मयाऽप्याश्वासिता राम वदता सर्वमेव ते ॥५६॥ ततः प्रस्थापितो राम त्वत्समीपमिहागतः । तदागमनवेलायामशोकवनिकां प्रियाम् ॥५७॥ उत्पाट्य राक्षसांस्तत्र बहून्हत्वा क्षणादहम् । रावणस्य सुतं हत्वा रावणेनाभिभाष्य च ॥५८॥ लङ्कामशेषतो दग्ध्वा पुनरप्यगमं क्षणात् ।

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रामोऽत्यन्तप्रहृष्टधीः ॥५९॥ हनूमंस्ते कृतं कार्यं देवैरपि सुदुष्करम् । उपकारं न पश्यामि तव प्रत्युपकारिणः ॥६०॥ इदानीं ते प्रयच्छामि सर्वस्वं मम मारुते । इत्यालिङ्ग्य समाकृष्य गाढं वानरपुङ्गवम् ॥६१॥ सार्द्रनेत्रो रघुश्रेष्ठः परां प्रीतिमवाप सः । हनूमन्तमुवाचेदं राघवो भक्तवत्सलः ॥६२॥ परिरम्भो हि मे लोके दुर्लभः परमात्मनः । अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुङ्गव ॥६३॥

यत्पादपङ्कजयुगलं तुलसीदलाद्यैः संपूज्य विष्णुपदवीमतुलां प्रयान्ति । तेनैव किं पुनरसौ परिरब्धमूर्तिं रामेण वायुतनयः कृतपुण्यपुञ्जः ॥६४॥

चित्रकूट पर्वतपर काकके साथ जो कुछ हुआ था वह सब भी सुनाया तथा नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"रघुनाथजीसे मेरी कुशल कहना और लक्ष्मणजीसे कहना कि हे कुलन्दन ! मैंने पहले तुमसे जो कुछ कठोर वचन कहे थे उन अज्ञानवश कहे हुए वाक्योंके लिये मुझे क्षमा करें। इसके सिवा जिस प्रकार रघुनाथजी कृपा करके मेरा उद्धार करें वही चेष्टा करना" ॥५३–५५॥

"ऐसा कहकर सीताजी महान् दुःखमें भरकर रोने लगीं; मैंने भी उन्हें आपका सब वृत्तान्त सुनाकर ढाँढस बँधाया और फिर उनसे विदा होकर आपके पास चला आया। आती-बार मैंने रावणकी प्रिय अशोक वाटिका उजाड़ दी और एक क्षणमें ही बहुतसे राक्षस मार डाले। रावणके पुत्रको भी मारा और रावणसे वार्तालाप कर लंकाको सब ओरसे जलाकर फिर क्षणभरमें ही यहाँ चला आया।"

हनुमान्जीके ये वचन सुन श्रीरामचन्द्रजी अति प्रसन्न होकर कहने लगे–॥५६-५९॥ "हनुमन् ! तुमने जो कार्य किया है वह देवताओंसे भी होना कठिन है, मैं इसके बदलेमें तुम्हारा क्या उपकार करूँ—सो नहीं जानता ॥६०॥ लो, मैं अभी तुम्हें अपना सर्वस्व सौंपता हूँ।" ऐसा कह उन्होंने वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको खींचकर गाढ़ आलिङ्गन किया ॥ ६१ ॥ उनके नेत्रोंमें जल भर आया और हृदयमें परम प्रेम उमड़ने लगा। तब भक्तवत्सल रघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा–॥ ६२ ॥ "संसारमें मुझ परमात्माका आलिङ्गन मिलना अत्यन्त दुर्लभ है, हे वानरश्रेष्ठ ! (तुम्हें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है) अतः तुम मेरे परम भक्त और प्रिय हो" ॥ ६३ ॥

हे पार्वति ! जिनके चरणारविन्दयुगलका तुलसीदल आदिसे पूजन कर भक्तजन अतुलनीय विष्णुपद प्राप्त करते हैं उन्हीं रामने जिनके शरीरका आलिङ्गन किया उन पवित्र कर्म करनेवाले पवनपुत्रके विषयमें क्या कहा जाय ? ॥ ६४ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

समाप्तमिदं सुन्दरकाण्डम्

युद्धकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

युद्धकाण्ड

यस्यातिवीर्याम्बुधिवीचिराजौ वंश्यैरहो वैश्रवणो विलीनः ।
तं बैरिविध्वंसनशीललीलं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

॥ श्रीराम ॥

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राम-रावण-युद्ध


ततः पावकसङ्काशैः शरैः काञ्चनभूषणैः। अभ्यवर्षद्रणे रामो दशग्रीवं समाहितः॥ (अ० रा० युद्ध० ११।१८)