भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

* अध्याय ६९ * १३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

साथ मङ्गल कृत्य करे, व्यजन डुलावे एवं पूजन करे। फिर दीप, गन्ध तथा पुष्पादिसे यजन करे। हरिद्रा, कपूर, केसर और श्वेत चन्दन-चूर्णको देवमूर्ति तथा भक्तोंके सिरपर छोड़नेसे समस्त तीर्थोंके फलकी प्राप्ति होती है। आचार्य यात्राके लिये नियत देवमूर्तिकी रथपर स्थापना और अर्चना करके छत्र-चँवर तथा शङ्खनाद आदिके साथ राष्ट्रका पालन करनेवाली नदीके तटपर ले जाय॥ ११-१४॥

नदीमें नहलानेसे पूर्व वहाँ तटपर वेदीका निर्माण करे। फिर मूर्तिको यानसे उतारकर उसे वेदिकापर विन्यस्त करे। वहाँ चरु निर्मित करके उसकी आहुति देनेके पश्चात् पायसका होम करे। फिर वरुणदेवतासम्बन्धी मन्त्रोंसे तीर्थोंका आवाहन करे। ‘आपो हि ष्ठा०’ आदि मन्त्रोंसे उनको अर्घ्य प्रदान करके पूजन करे। देवमूर्तिको लेकर जलमें अघमर्षण करके ब्राह्मणों और महाजनोंके साथ स्नान करे। स्नानके पश्चात् मूर्तिको ले आकर वेदिकापर रखे। उस दिन देवताका वहाँ पूजन करके देवप्रासादमें ले जाय। आचार्य अग्निमें स्थित देवका पूजन करे। यह उत्सव भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है॥ १५-१९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘उत्सव-विधि-कथन’ नामक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥


उनहत्तरवाँ अध्याय

स्नपनोत्सवके विस्तारका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—ब्रह्मन्! अब मैं स्नपनोत्सवका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। प्रासादके सम्मुख मण्डपके नीचे मण्डलमें कलशोंका न्यास करे। प्रारम्भकालमें तथा सम्पूर्ण कर्मोंको करते समय भगवान् श्रीहरिका ध्यान, पूजन और हवन करे। पूर्णाहुतिके साथ हजार या सौ आहुतियाँ दे। फिर स्नान-द्रव्योंको लाकर कलशोंका विन्यास करे। कण्ठसूत्रयुक्त कुम्भोंका अधिवासन करके मण्डलमें रखे॥ १-३॥

चौकोर मण्डलका निर्माण करके उसे ग्यारह रेखाओंद्वारा विभाजित कर दे। फिर पार्श्वभागकी एक रेखा मिटा दे। इस तरह उस मण्डलमें चारों दिशाओंमें नौ-नौ कोष्ठकोंकी स्थापना करके उनको पूर्व आदिके क्रमसे शालिचूर्ण आदिसे पूरित करे। फिर विद्वान् मनुष्य कुम्भमुद्राकी रचना करके पूर्वादि दिशाओंमें स्थित नवकमें कलश लाकर रखे। पुण्डरीकाक्ष-मन्त्रसे उनमें दर्भ डाले। सर्वरत्नसमन्वित जलपूर्ण कुम्भको मध्यमें विन्यस्त करे। शेष आठ कुम्भोंमें क्रमशः यव, व्रीहि, तिल, नीवार, श्यामाक, कुलत्थ, मुद्ग और श्वेत सर्षप डालकर आठ दिशाओंमें स्थापित करे। पूर्वदिशावर्ती नवकमें घृतपूर्ण कुम्भ रखे। इसमें पलाश, अश्वत्थ, वट, बिल्व, उदुम्बर, प्लक्ष, जम्बू, शमी तथा कपित्थ वृक्षकी छालका क्वाथ डाले। आग्नेयकोणवर्ती नवकमें मधुपूर्ण घटका न्यास करे। इस कलशमें गोशृङ्ग, पर्वत, गङ्गाजल, गजशाला, तीर्थ, खेत और खलिहान—इन आठ स्थलोंकी मृत्तिका छोड़े॥ ४-१०॥

दक्षिणदिशावर्ती नवकमें तिल-तैलसे परिपूर्ण घट स्थापित करे। उसमें क्रमशः नारंगी, जम्बीरी नींबू, खजूर, मृत्तिका, नारिकेल, सुपारी, अनार और पनस (कटहल)-का फल डाल दे। नैर्ऋत्यकोणगत नवकमें क्षीरपूर्ण कलश रखे। उसमें कुङ्कुम, नागपुष्प, चम्पक, मालती, मल्लिका, पुंनाग, करवीर एवं कमल-कुसुमोंको प्रक्षिप्त करे। पश्चिमीय नवकमें नारिकेल-जलसे पूर्ण

१३८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

कलशमें नदी, समुद्र, सरोवर, कूप, वर्षा, हिम, निर्झर तथा देवनदीका जल छोड़े। वायव्यकोणवर्ती नवकमें कदलीजलपूरित कुम्भ रखे। उसमें सहदेवी, कुमारी, सिंही, व्याघ्री, अमृता, विष्णुकर्णी, दूर्वा, वच—इन दिव्य ओषधियोंको प्रक्षिप्त करे। पूर्वादि उत्तरवर्ती नवकमें दधिकलशका विन्यास करे। उसमें क्रमशः पत्र, इलायची, तज, कूट, सुगन्धवाला, चन्दनद्वय, लता, कस्तूरी, कृष्णागुरु तथा सिद्ध द्रव्य डाल दे। ईशानस्थ नवकमें शान्तिजलसे पूर्ण कुम्भ रखे। उसमें क्रमशः शुभ्र रजत, लौह, त्रपु, कांस्य, सीसक तथा रत्न डाले। प्रतिमाको घृतका अभ्यङ्ग तथा उद्वर्तन करके मूल-मन्त्रसे स्नान करावे। फिर उसका गन्धादिके द्वारा पूजन करे। अग्निमें होम करके पूर्णाहुति दे। सम्पूर्ण भूतोंको बलि प्रदान करे। ब्राह्मणोंको दक्षिणापूर्वक भोजन करावे। देवता और मुनि तथा बहुत-से भूपाल भी भगवद्विग्रहका अभिषेक करके ईश्वरत्वको प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार एक हजार आठ कलशोंसे स्नपनोत्सवका अनुष्ठान करे। इससे मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है। यज्ञके अवभृथ-स्नानमें भी पूर्णस्नान सम्पन्न हो जाता है। पार्वती तथा लक्ष्मीके विवाह आदिमें भी स्नपनोत्सव किया जाता है॥ ११—२३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नपनोत्सव-विधि-कथन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९॥

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सत्तरवाँ अध्याय

वृक्षोंकी प्रतिष्ठाकी विधि

**श्रीभगवान् कहते हैं—**ब्रह्मन्! अब मैं वृक्षप्रतिष्ठाका वर्णन करता हूँ, जो भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली है। वृक्षोंको सर्वोषधिजलसे लिप्त, सुगन्धित चूर्णसे विभूषित तथा मालाओंसे अलंकृत करके वस्त्रोंसे आवेष्टित करे। सभी वृक्षोंका सुवर्णमयी सूचीसे कर्णवेधन तथा सुवर्णमयी शलाकासे अञ्जन करे। वेदिकापर सात फल रखे। प्रत्येक वृक्षका अधिवासन करे तथा कुम्भ समर्पित करे। फिर इन्द्र आदि दिक्पालोंके उद्देश्यसे बलिप्रदान करे। वृक्षके अधिवासनके समय ऋग्वेद, यजुर्वेद या सामवेदके मन्त्रोंसे अथवा वरुणदेवता-सम्बन्धी तथा मत्तभैरव-सम्बन्धी मन्त्रोंसे होम करे। श्रेष्ठ ब्राह्मण वृक्षवेदीपर स्थित कलशोंद्वारा वृक्षों और यजमानको स्नान करावें। यजमान अलंकृत होकर ब्राह्मणोंको गो, भूमि, आभूषण तथा वस्त्रादिकी दक्षिणा दे तथा चार दिनतक क्षीरयुक्त भोजन करावे। इस कर्ममें तिल, घृत तथा पलाश-समिधाओंसे हवन करना चाहिये। आचार्यको दुगुनी दक्षिणा दे। मण्डप आदिका पूर्ववत् निर्माण करे। वृक्ष तथा उद्यानकी प्रतिष्ठासे पापोंका नाश होकर परम सिद्धिकी प्राप्ति होती है। अब सूर्य, शिव, गणपति, शक्ति तथा श्रीहरिके परिवारकी प्रतिष्ठाकी विधि सुनिये, जो भगवान् महेश्वरने कार्तिकेयको बतलायी थी॥ १—९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पादप-प्रतिष्ठा-विधिवर्णन' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७० ॥

* अध्याय ७२ *१३९

इकहत्तरवाँ अध्याय

गणपतिपूजनकी विधि

भगवान् महेश्वरने कहा—कार्तिकय! मैं विघ्नोंके विनाशके लिये गणपतिपूजाकी विधि बतलाता हूँ, जो सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाली है। 'गणंजयाय स्वाहा०'—हृदय, 'एकदंष्ट्राय हुं फट्'—सिर, 'अचलकर्णिने नमो नमः।'—शिखा, 'गजवक्त्राय नमो नमः।'—कवच, 'महोदराय चण्डाय नमः।'—नेत्र एवं 'सुदण्डहस्ताय हुं फट्।'—अस्त्र है। इन मन्त्रोंद्वारा अङ्गन्यास करे। गण, गुरु, गुरु-पादुका, शक्ति, अनन्त और धर्म—इनका मुख्य कमल-मण्डलके ऊर्ध्व तथा निम्न दलोंमें पूजन करे एवं कमलकर्णिकामें बीजकी अर्चना करे। तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामरूपिणी, उग्रा, तेजोवती, सत्या एवं विघ्ननाशिनी—इन नौ पीठशक्तियोंकी भी पूजा करे। फिर चन्दनके चूर्णका आसन समर्पित करे। 'यं' शोषकवायु, 'रं' अग्नि, 'लं' प्लव (पृथिवी) तथा 'वं' अमृतका बीज माना गया है।

'ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।'—यह गणेश-गायत्री-मन्त्र है। गणपति, गणाधिप, गणेश, गणनायक, गणक्रीड, वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, महोदर, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, धूम्रवर्ण तथा इन्द्र आदि दिक्पाल—इन सबका गणपतिकी पूजामें अङ्गरूपसे पूजन करे॥ १—८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गणपतिपूजा-विधिकथन' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१ ॥


बहत्तरवाँ अध्याय

स्नान, संध्या और तर्पणकी विधिका वर्णन

भगवान् महेश्वर कहते हैं—स्कन्द! अब मैं नित्य-नैमित्तिक आदि स्नान, संध्या और प्रतिष्ठासहित पूजाका वर्णन करूँगा। किसी तालाब या पोखरेसे अस्त्रमन्त्र (फट्)-के उच्चारणपूर्वक आठ अङ्गुल गहरी मिट्टी खोदकर निकाले। उसे सम्पूर्णरूपसे ले आकर उसी मन्त्रद्वारा उसका पूजन करे। इसके बाद शिरोमन्त्र (स्वाहा)-से उस मृत्तिकाको जलाशयके तटपर रखकर अस्त्रमन्त्रसे उसका शोधन करे। फिर शिखामन्त्र (वषट्)-के उच्चारणपूर्वक उसमेंसे तृण आदिको निकालकर, कवच-मन्त्र (हुम्)-से उस मृत्तिकाके तीन भाग करे। प्रथम भागकी जलमिश्रित मिट्टीको नाभिसे लेकर पैरतकके अङ्गोंमें लगावे। तत्पश्चात् उसे धोकर, अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित हुई दूसरे भागकी दीप्तिमती मृत्तिकाद्वारा शेष सम्पूर्ण शरीरको अनुलिप्त करके, दोनों हाथोंसे कान-नाक आदि इन्द्रियोंके छिद्रोंको बंद कर, साँस रोक मन-ही-मन कालाग्निके समान तेजोमय अस्त्रका चिन्तन करते हुए पानीमें डुबकी लगाकर स्नान करे। यह मल (शारीरिक मैल)-को दूर करनेवाला स्नान कहलाता है। इसे इस प्रकार करके जलके भीतरसे निकल आवे और संध्या करके विधि-स्नान करे॥ १—५$\frac{१}{२}$॥

हृदय-मन्त्र (नमः)-के उच्चारणपूर्वक अङ्कुशमुद्राद्वारा$^१$ सरस्वती आदि तीर्थोंमेंसे किसी एक तीर्थका भावनाद्वारा आकर्षण करके, फिर संहारमुद्राद्वारा$^२$ उसे अपने समीपवर्ती जलाशयमें स्थापित करे। तदनन्तर शेष (तीसरे भागकी)


१. मध्यमा अँगुलीको सीधी रखकर तर्जनीको बिचले पोरतक उसके साथ सटाकर कुछ सिकोड़ ले—यही अङ्कुश-मुद्रा है।
२. अधोमुख वामहस्तपर ऊर्ध्वमुख दाहिना हाथ रखकर अंगुलियोंको परस्पर ग्रथित करके घुमावे—यह संहार-मुद्रा है। (मन्त्रमहार्णव)

१४० * अग्निपुराण *


संध्यादेवी—सायंकाल [ अग्नि० अ० ७२ ]

संध्यादेवी—मध्याह्न

संध्यादेवी—प्रातःकाल

* अध्याय ७२ * १४१

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मिट्टी लेकर नाभितक जलके भीतर प्रवेश करे और उत्तराभिमुख हो, बायीं हथेलीपर उसके तीन भाग करे। दक्षिणभागकी मिट्टीको अङ्गन्यास-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा (अर्थात् ॐ हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हुम्, नेत्रत्रयाय वौषट् तथा अस्त्राय फट् — इन छः मन्त्रोंद्वारा) एक बार अभिमन्त्रित करे। पूर्वभागकी मिट्टीको ‘अस्त्राय फट्’ — इस मन्त्रका सात बार जप करके अभिमन्त्रित करे तथा उत्तरभागकी मिट्टीका ‘ॐ नमः शिवाय’ — इस मन्त्रका दस बार जप करके अभिमन्त्रण करे। इस तरह पूर्वोक्त मृत्तिकाके तीन भागोंका क्रमशः अभिमन्त्रण करना चाहिये। तत्पश्चात् पहले उन मृत्तिकाओंमेंसे थोड़ा-थोड़ा-सा भाग लेकर सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े। छोड़ते समय ‘अस्त्राय हुं फट्।’ का जप करता रहे। इसके बाद ‘ॐ नमः शिवाय।’ — इस शिव-मन्त्रका तथा ‘ॐ सोमाय स्वाहा।’ इस सोम-मन्त्रका जप करके जलमें अपनी भुजाओंको घुमाकर उसे शिवतीर्थस्वरूप बना दे तथा पूर्वोक्त अङ्गन्यास-सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करते हुए उसे मस्तकसे लेकर पैरतकके सारे अङ्गोंमें लगावे ॥ ६—९ ॥

तदनन्तर अङ्गन्यास-सम्बन्धी चार मन्त्रोंका पाठ करते हुए दाहिनेसे आरम्भ करके बायें-तकके हृदय, सिर, शिखा और दोनों भुजाओंका स्पर्श करे तथा नाक, कान आदि सारे छिद्रोंको बंद करके सम्मुखीकरण-मुद्राद्वारा भगवान् शिव, विष्णु अथवा गङ्गाजीका स्मरण करते हुए जलमें गोता लगावे। ‘ॐ हृदयाय नमः।’ ‘शिरसे स्वाहा।’ ‘शिखायै वषट्।’ ‘कवचाय हुम्।’ ‘नेत्रत्रयाय वौषट्।’ तथा ‘अस्त्राय फट्।’ — इन षडङ्ग-सम्बन्धी मन्त्रोंका उच्चारण करके, जलमें स्थित हो, बायें और दायें हाथ दोनोंको मिलाकर, कुम्भमुद्राद्वारा अभिषेक करे। फिर रक्षाके लिये पूर्वादि दिशाओंमें जल छोड़े। सुगन्ध और आँवला आदि राजोचित उपचारसे स्नान करे। स्नानके पश्चात् जलसे बाहर निकलकर संहारिणी-मुद्राद्वारा उस तीर्थका उपसंहार करे। इसके बाद विधि-विधानसे शुद्ध, संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित तथा निवृत्ति आदिके द्वारा शोधित भस्मसे स्नान करे ॥ १०—१४ $\frac{१}{२}$ ॥

‘ॐ अस्त्राय हुं फट्।’ — इस मन्त्रका उच्चारण करके, सिरसे पैरतक भस्मद्वारा मलस्नान करके फिर विधिपूर्वक शुद्ध स्नान करे। ईशान, तत्पुरुष, अघोर, गुह्यक या वामदेव तथा सद्योजात-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा क्रमशः मस्तक, मुख, हृदय, गुह्याङ्ग तथा शरीरके अन्य अवयवोंमें उद्वर्तन (अनुलेप) लगाना चाहिये। तीनों संध्याओंके समय, निशीथकालमें, वर्षाके पहले और पीछे, सोकर, खाकर, पानी पीकर तथा अन्य आवश्यक कार्य करके आग्नेय स्नान करना चाहिये। स्त्री, नपुंसक, शूद्र, बिल्ली, शव और चूहेका स्पर्श हो जानेपर भी आग्नेय स्नानका विधान है। चुल्लूभर पवित्र जल पी ले, यही ‘आग्नेय-स्नान’ है। सूर्यकी किरणोंके दिखायी देते समय यदि आकाशसे जलकी वर्षा हो रही हो तो पूर्वाभिमुख हो, दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर, ईशान-मन्त्रका उच्चारण करते हुए, सात पग चलकर उस वर्षाके जलसे स्नान करे। यह ‘माहेन्द्र-स्नान’ कहलाता है। गौओंके समूहके मध्यभागमें स्थित हो उनकी खुरोंसे खुदकर ऊपरको उड़ी हुई धूलसे इष्टदेव-सम्बन्धी मूलमन्त्रका जप करते हुए अथवा कवच-मन्त्र (हुम्)-का जप करते हुए जो स्नान किया जाता है, उसे ‘पावनस्नान’ कहते हैं॥ १५—२० $\frac{१}{२}$ ॥

सद्योजात आदि मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक जो जलसे अभिषेक किया जाता है, उसे ‘मन्त्रस्नान’ कहते हैं। इसी प्रकार वरुणदेवता और अग्निदेवता-

१४२ * अग्निपुराण *


सम्बन्धी मन्त्रोंसे भी यह स्नान-कर्म सम्पन्न किया जाता है। मन-ही-मन मूल-मन्त्रका उच्चारण करके प्राणायामपूर्वक मानसिक स्नान करना चाहिये। इसका सर्वत्र विधान है। विष्णुदेवता आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्योंमें उन-उन देवताओंके मन्त्रोंसे ही स्नान करावे॥ २१-२३॥

कार्तिकेय! अब मैं विभिन्न मन्त्रोंद्वारा संध्या-विधिको सम्यग् वर्णन करूँगा। भलीभाँति देख-भालकर ब्रह्मतीर्थसे तीन बार जलका मन्त्रपाठपूर्वक आचमन करे। आचमन-कालमें आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व—इन शब्दोंके अन्तमें 'नमः' सहित 'स्वाहा' शब्द जोड़कर मन्त्रपाठ करना चाहिये। यथा 'ॐ आत्मतत्त्वाय नमः स्वाहा।' 'ॐ विद्यातत्त्वाय नमः स्वाहा।' 'ॐ शिवतत्त्वाय नमः स्वाहा।'—इन मन्त्रोंसे आचमन करनेके पश्चात् मुख, नासिका, नेत्र और कानोंका स्पर्श करे। फिर प्राणायामद्वारा सकलीकरणकी क्रिया सम्पन्न करके स्थिरतापूर्वक बैठ जाय। इसके बाद मन्त्र-साधक पुरुष मन-ही-मन तीन बार शिवसंहिताकी आवृत्ति करे और आचमन एवं अङ्गन्यास करके प्रातःकाल ब्राह्मी संध्याका इस प्रकार ध्यान करे— ॥ २४-२६ ॥

संध्यादेवी प्रातःकाल ब्रह्मशक्तिके रूपमें उपस्थित हैं। हंसपर आरूढ़ हो कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति लाल है। वे चार मुख और चार भुजाएँ धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथोंमें कमल और स्फटिकाक्षकी माला तथा बायें हाथोंमें दण्ड एवं कमण्डलु शोभा पाते हैं।$^{१}$ मध्याह्नकालमें वैष्णवी शक्तिके रूपमें संध्याका ध्यान करे। वे गरुड़की पीठपर बिछे हुए कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। वे अपने बायें हाथोंमें शङ्ख और चक्र धारण करती हैं तथा दायें हाथोंमें गदा एवं अभयकी मुद्रासे सुशोभित हैं।$^{२}$ सायंकालमें संध्यादेवीका रुद्रशक्तिके रूपमें ध्यान करे। वे वृषभकी पीठपर बिछे हुए कमलके आसनपर बैठी हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे मस्तकपर अर्धचन्द्रके मुकुटसे विभूषित हैं। दाहिने हाथोंमें त्रिशूल और रुद्राक्ष धारण करती हैं और बायें हाथोंमें अभय एवं शक्तिसे सुशोभित हैं।$^{३}$ ये संध्याएँ कर्मोंकी साक्षिणी हैं। अपने-आपको उनकी प्रभासे अनुगत समझे। इन तीनके अतिरिक्त एक चौथी संध्या है, जो केवल ज्ञानीके लिये है। उसका आधी रातके आरम्भमें बोधात्मक साक्षात्कार होता है ॥ २७-३० ॥

ये तीन संध्याएँ क्रमशः हृदय, बिन्दु और ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित हैं। चौथी संध्याका कोई रूप नहीं है। वह परमशिवमें विराजमान है; क्योंकि वह शिव सबसे परे हैं, इसलिये इसे 'परमा संध्या' कहते हैं। तर्जनी अँगुलीके मूलभागमें पितरोंका, कनिष्ठाके मूलभागमें प्रजापतिका, अङ्गुष्ठके मूलभागमें ब्रह्माका और हाथके अग्रभागमें देवताओंका तीर्थ है। दाहिने हाथकी हथेलीमें अग्निका, बायीं हथेलीमें सोमका तथा अँगुलियोंके सभी पर्वों एवं संधियोंमें ऋषियोंका तीर्थ है। संध्याके ध्यानके पश्चात् शिव-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा तीर्थ (जलाशय)-को शिवस्वरूप बनाकर 'आपो हि ष्ठा०' इत्यादि संहिता-मन्त्रोंद्वारा उसके जलसे मार्जन करे। बायें हाथपर तीर्थके जलको गिराकर उसे रोके रहे और दाहिने हाथसे मन्त्रपाठपूर्वक क्रमशः सिरका सेचन करना 'मार्जन' कहलाता है ॥ ३१-३५ ॥


१. हंसपद्मासनां रक्तां चतुर्वक्त्रां चतुर्भुजाम्। अब्जाक्षमालिनीं दक्षे वामे दण्डकमण्डलूम्॥ (अग्नि० ७२। २७)
२. तार्क्ष्यपद्मासनां ध्यायेन्मध्याह्ने वैष्णवीं सिताम्। शङ्खचक्रधरां वामे दक्षिणे सगदाभयाम्॥ (अग्नि० ७२। २८)
३. रौद्रीं ध्यायेद् वृषाब्जस्थां त्रिनेत्रां शशिभूषिताम्। त्रिशूलाक्षधरां दक्षे वामे साभयशक्तिकाम्॥ (अग्नि० ७२। २९)

* अध्याय ७२ *
१४३

इसके बाद अघमर्षण करे। दाहिने हाथके दोनेमें रखे हुए बोधरूप शिवमय जलको नासिकाके समीप ले जाकर बायीं—इडा नाड़ीद्वारा साँसको खींचकर रोके और भीतरसे काले रंगके पाप-पुरुषको दाहिनी—पिङ्गला नाडीद्वारा बाहर निकालकर उस जलमें स्थापित करे। फिर उस पापयुक्त जलको हथेलीद्वारा वज्रमयी शिलाकी भावना करके उसपर दे मारे। इससे अघमर्षणकर्म सम्पन्न होता है। तदनन्तर कुश, पुष्प, अक्षत और जलसे युक्त अर्घ्याञ्जलि लेकर, उसे ‘ॐ नमः शिवाय स्वाहा।’—इस मन्त्रसे भगवान् शिवको समर्पित करे और यथाशक्ति गायत्रीमन्त्रका जप करे॥ ३६—३८॥

अब मैं तर्पणकी विधिका वर्णन करूँगा। देवताओंके लिये देवतीर्थसे उनके नाममन्त्रके उच्चारणपूर्वक तर्पण करे। ‘ॐ हूं शिवाय स्वाहा।’ ऐसा कहकर शिवका तर्पण करे। इसी प्रकार अन्य देवताओंको भी उनके स्वाहायुक्त नाम लेकर जलसे तृप्त करना चाहिये। ‘ॐ हां हृदयाय नमः। ॐ हीं शिरसे स्वाहा। ॐ हूं शिखायै वषट्। ॐ हैं कवचाय हुम्। ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ हः अस्त्राय फट्।’—इन वाक्योंको क्रमशः पढ़कर हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र एवं अस्त्र-विषयक न्यास करना चाहिये। आठ देवगणोंको उनके नामके अन्तमें ‘नमः’ पद जोड़कर तर्पणार्थ जल अर्पित करना चाहिये। यथा—‘ॐ हां आदित्येभ्यो नमः। ॐ हां वसुभ्यो नमः। ॐ हां रुद्रेभ्यो नमः। ॐ हां विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ हां मरुद्भ्यो नमः। ॐ हां भृगुभ्यो नमः। ॐ हां अङ्गिरोभ्यो नमः।’ तत्पश्चात् जनेऊको कण्ठमें मालाकी भाँति धारण करके ऋषियोंका तर्पण करे॥ ३९—४१॥

‘ॐ हां अत्रये नमः। ॐ हां वसिष्ठाय नमः। ॐ हां पुलस्तये नमः। ॐ हां क्रतवे नमः। ॐ हां भरद्वाजाय नमः। ॐ हां विश्वामित्राय नमः। ॐ हां प्रचेतसे नमः। ॐ हां मरीचये नमः।’—इन मन्त्रोंको पढ़ते हुए अत्रि आदि ऋषियोंको (ऋषितीर्थसे) एक-एक अञ्जलि जल दे। तत्पश्चात् सनकादि मुनियोंको (दो-दो अञ्जलि) जल देते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्य पढ़े—‘ॐ हां सनकाय वषट्। ॐ हां सनन्दनाय वषट्। ॐ हां सनातनाय वषट्। ॐ हां सनत्कुमाराय वषट्। ॐ हां कपिलाय वषट्। ॐ हां पञ्चशिखाय वषट्। ॐ हां ऋभवे वषट्।’—इन मन्त्रोंद्वारा जुड़े हाथोंकी कनिष्ठिकाओंके मूलभागसे जलाञ्जलि देनी चाहिये॥ ४२—४४॥

‘ॐ हां सर्वेभ्यो भूतेभ्यो वषट्’—इस मन्त्रसे वषट्स्वरूप भूतगणोंका तर्पण करे। तत्पश्चात् यज्ञोपवीतको दाहिने कंधेपर करके दुहरे मुड़े हुए कुशके मूल और अग्रभागसे तिलसहित जलकी तीन-तीन अञ्जलियाँ दिव्य पितरोंके लिये अर्पित करे। ‘ॐ हां कव्यवाहनाय स्वधा। ॐ हां अनलाय स्वधा। ॐ हां सोमाय स्वधा। ॐ हां यमाय स्वधा। ॐ हां अर्यम्णे स्वधा। ॐ हां अग्निष्वात्तेभ्यः स्वधा। ॐ हां बर्हिषदभ्यः स्वधा। ॐ हां आज्यपेभ्यः स्वधा। ॐ हां सोमपेभ्यः स्वधा।’—इत्यादि मन्त्रोंका उच्चारण कर विशिष्ट देवताओंकी भाँति दिव्य पितरोंको जलाञ्जलिसे तृप्त करना चाहिये॥ ४५—४६½॥

‘ॐ हां ईशानाय पित्रे स्वधा।’ कहकर पिताको, ‘ॐ हां पितामहाय स्वधा।’ कहकर पितामहको तथा ‘ॐ हां शान्तप्रपितामहाय स्वधा।’ कहकर प्रपितामहको भी तृप्त करे। इसी प्रकार समस्त प्रेत-पितरोंका तर्पण करे। यथा—‘ॐ हां पितृभ्यः स्वधा। ॐ हां पितामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां प्रपितामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां वृद्धप्रपितामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां मातृभ्यः स्वधा। ॐ हां मातामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां प्रमातामहेभ्यः

१४४ * अग्निपुराण *


स्वधा। ॐ हां वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां सर्वेभ्यः पितृभ्यः स्वधा। ॐ हां सर्वेभ्यः ज्ञातिभ्यः स्वधा। ॐ हां सर्वाचार्येभ्यः स्वधा। ॐ हां दिग्भ्यः स्वधा। ॐ हां दिक्पतिभ्यः स्वधा। ॐ हां सिद्धेभ्यः स्वधा। ॐ हां मातृभ्यः स्वधा। ॐ हां ग्रहेभ्यः स्वधा। ॐ हां रक्षोभ्यः स्वधा।'— इन वाक्योंको पढ़ते हुए क्रमशः पितरों, पितामहों, वृद्धप्रपितामहों, माताओं, मातामहों, प्रमातामहों, वृद्धप्रमातामहों, सभी पितरों, सभी ज्ञातिजनों, सभी आचार्यों, सभी दिशाओं, दिक्पतियों, सिद्धों, मातृकाओं, ग्रहों और राक्षसोंको जलाञ्जलि दे॥४७—५१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नान आदिकी विधिका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥७२॥


तिहत्तरवाँ अध्याय

सूर्यदेवकी पूजा-विधिका वर्णन

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द! अब मैं करन्यास और अङ्गन्यासपूर्वक सूर्यदेवताके पूजनकी विधि बताऊँगा। 'मैं तेजोमय सूर्य हूँ'—ऐसा चिन्तन करके अर्घ्य-पूजन करे। लाल रंगके चन्दन या रोलीसे मिश्रित जलको ललाटके निकटतक ले जाकर उसके द्वारा अर्घ्यपात्रको पूर्ण करे। उसका गन्धादिसे पूजन करके सूर्यके अङ्गोंद्वारा रक्षावगुण्ठन करे। तत्पश्चात् जलसे पूजा-सामग्रीका प्रोक्षण करके पूर्वाभिमुख हो सूर्यदेवकी पूजा करे। 'ॐ आं हृदयाय नमः।' इस प्रकार आदिमें स्वर-बीज लगाकर सिर आदि अन्य सब अङ्गोंमें भी न्यास करे। पूजा-गृहके द्वारदेशमें दक्षिणकी ओर 'दण्डी' का और वामभागमें 'पिङ्गल' का पूजन करे। ईशानकोणमें 'गं गणपतये नमः।' इस मन्त्रसे 'गणेश' की और अग्निकोणमें गुरुकी पूजा करे। पीठके मध्यभागमें कमलाकार आसनका चिन्तन एवं पूजन करे। पीठके अग्नि आदि चारों कोणोंमें क्रमशः विमल, सार, आराध्य तथा परम सुखकी और मध्यभागमें प्रभूतासनकी पूजा करे। उपर्युक्त प्रभूत आदि चारोंके वर्ण क्रमशः श्वेत, लाल, पीले और नीले हैं तथा उनकी आकृति सिंहके समान है। इन सबकी पूजा करनी चाहिये॥१—५॥

पीठस्थ कमलके भीतर 'रां दीप्तायै नमः।' इस मन्त्रद्वारा दीप्ताकी, 'रीं सूक्ष्मायै नमः।' इस मन्त्रसे सूक्ष्माकी, 'रूं जयायै नमः।' इससे जयाकी, 'रैं भद्रायै नमः।' इससे भद्राकी, 'रैं विभूतये नमः।' इससे विभूतिकी, 'रों विमलायै नमः।' इससे विमलाकी, 'रौं अमोघायै नमः।' इससे अमोघाकी तथा 'रं विद्युतायै नमः।' इससे विद्युताकी पूर्व आदि आठों दिशाओंमें पूजा करे और मध्य-भागमें 'रः सर्वतोमुख्यै नमः।' इस मन्त्रसे नवीं पीठशक्ति सर्वतोमुखीकी आराधना करे। तत्पश्चात् 'ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाय सौराय योगपीठात्मने नमः।' इस मन्त्रके द्वारा सूर्यदेवके आसन (पीठ)-का पूजन करे। तदनन्तर 'खखोल्काय नमः।' इस षडक्षर मन्त्रके आरम्भमें 'ॐ हं खं' जोड़कर नौ अक्षरोंसे युक्त ('ॐ हं खं खखोल्काय नमः।'—इस) मन्त्रद्वारा सूर्यदेवके विग्रहका आवाहन करे। इस प्रकार आवाहन करके भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये॥६—७$\frac{१}{२}$॥

अञ्जलिमें लिये हुए जलको ललाटके निकटतक ले जाकर रक्त वर्णवाले सूर्यदेवका ध्यान करके उन्हें भावनाद्वारा अपने सामने स्थापित करे। फिर 'हां ह्रीं सः सूर्याय नमः।' ऐसा कहकर उक्त जलसे सूर्यदेवको अर्घ्य दे। इसके बाद

  • अध्याय ७३ * १४५

‘बिम्बमुद्रा’$^१$ दिखाते हुए आवाहन आदि उपचार अर्पित करे। तदनन्तर सूर्यदेवकी प्रीतिके लिये गन्ध (चन्दन-रोली) आदि समर्पित करे। तत्पश्चात् ‘पद्ममुद्रा’$^२$ और ‘बिम्बमुद्रा’ दिखाकर अग्नि आदि कोणोंमें हृदय आदि अङ्गोंकी पूजा करे। अग्निकोणमें ‘ॐ आं हृदयाय नमः।’ इस मन्त्रसे हृदयकी, नैर्ऋत्यकोणमें ‘ॐ भूः अर्काय शिरसे स्वाहा।’ इससे सिरकी, वायव्यकोणमें ‘ॐ भुवः सुरेशाय शिखायै वषट्।’ इससे शिखाकी, ईशानकोणमें ‘ॐ स्वः कवचाय हुम्।’ इससे कवचकी, इष्टदेव और उपासकके बीचमें ‘ॐ हां नेत्रत्रयाय वौषट्।’ से नेत्रकी तथा देवताके पश्चिमभागमें ‘वः अस्त्राय फट्।’ इस मन्त्रसे अस्त्रकी पूजा करे।$^३$ इसके बाद पूर्वादि दिशाओंमें मुद्राओंका प्रदर्शन करे॥ ८—११$\frac{१}{२}$॥

हृदय, सिर, शिखा और कवच—इनके लिये पूर्वादि दिशाओंमें धेनुमुद्राका प्रदर्शन करे। नेत्रोंके लिये गोशृङ्गकी मुद्रा दिखाये। अस्त्रके लिये त्रासनीमुद्राकी योजना करे। तत्पश्चात् ग्रहोंको नमस्कार और उनका पूजन करे। ‘ॐ सों सोमाय नमः।’ इस मन्त्रसे पूर्वमें चन्द्रमाकी, ‘ॐ बुं बुधाय नमः।’ इस मन्त्रसे दक्षिणमें बुधकी, ‘ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ इस मन्त्रसे पश्चिममें बृहस्पतिकी और ‘ॐ भं भार्गवाय नमः।’ इस मन्त्रसे उत्तरमें शुक्रकी पूजा करे। इस तरह पूर्वादि दिशाओंमें चन्द्रमा आदि ग्रहोंकी पूजा करके, अग्नि आदि कोणोंमें शेष ग्रहोंका पूजन करे। यथा—‘ॐ भौं भौमाय नमः।’ इस मन्त्रसे अग्निकोणमें मङ्गलकी, ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः।’ इस मन्त्रसे नैर्ऋत्यकोणमें शनैश्चरकी, ‘ॐ रां राहवे नमः’ इस मन्त्रसे वायव्यकोणमें राहुकी तथा ‘ॐ कें केतवे नमः।’ इस मन्त्रसे ईशानकोणमें केतुकी गन्ध आदि उपचारोंसे पूजा करे। खखोल्की (भगवान् सूर्य)-के साथ इन सब ग्रहोंका पूजन करना चाहिये॥ १२—१४॥

मूलमन्त्रका$^४$ जप करके, अर्घ्यपात्रमें जल लेकर सूर्यको समर्पित करनेके पश्चात् उनकी स्तुति करे। इस तरह स्तुतिके पश्चात् सामने मुँह किये खड़े हुए सूर्यदेवको नमस्कार करके कहे—‘प्रभो! मेरे अपराधों और त्रुटियोंको आप क्षमा करें।’ इसके बाद ‘अस्त्राय फट्।’ इस मन्त्रसे अणुसंहारका समाहरण करके ‘शिव! सूर्य! (कल्याणमय सूर्यदेव!)’—ऐसा कहते हुए संहारिणी-शक्ति या मुद्राके द्वारा सूर्यदेवके उपसंहृत तेजको अपने हृदय-कमलमें स्थापित कर दे तथा सूर्यदेवका निर्माल्य उनके पार्षद चण्डको अर्पित कर दे। इस प्रकार जगदीश्वर सूर्यका पूजन करके उनके जप, ध्यान और होम करनेसे साधकका सारा मनोरथ सिद्ध होता है॥ १५—१७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘सूर्यपूजाकी विधिका वर्णन’ नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७३॥


१. पद्माकारौ करौ कृत्वा प्रतिश्लिष्टे तु मध्यमे। अङ्गुल्यौ धारयेत्तस्मिन् बिम्बमुद्रेति सोच्यते॥
२. हस्तौ तु सम्मुखौ कृत्वा संनतोन्नताङ्गुली। तलान्तर्मिलिताङ्गुष्ठौ मुद्रैषा पद्मसंज्ञिता॥
३. मन्त्रमहार्णवमें हृदयादि अङ्गोंके पूजनका क्रम इस प्रकार दिया गया है—
अग्निकोणे—ॐ सत्यतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा हृदयाय नमः हृदयश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। निर्ऋतिकोणे—ॐ ब्रह्मतेजो ज्वालामणे हुं फट् स्वाहा शिरसे स्वाहा शिरःश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। वायव्ये—ॐ विष्णुतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा शिखायै वषट् शिखाश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ऐशान्ये—ॐ रुद्रतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा कवचाय हुं कवचश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। पूज्य-पूजकयोर्मध्ये—ॐ अग्नितेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट् नेत्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। देवता पश्चिमे—ॐ सर्वतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा अस्त्राय फट् अस्त्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। यहाँ मूलकी व्याख्यामें भी इसी क्रमसे संगति लगाते हुए अर्थ किया गया है।
४. ‘शारदातिलक’ के अनुसार सूर्यका दशाक्षर मूलमन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य्य आदित्य श्रीं।’ इति दशाक्षरो मन्त्रः। किन्तु इस ग्रन्थमें ‘ॐ हं खं’ इन बीजोंके साथ ‘खखोल्काय नमः।’ इस षडक्षर मन्त्रका उल्लेख है। अतः इसीको यहाँ मूल मन्त्र समझना चाहिये।

१४६ * अग्निपुराण *


चौहत्तरवाँ अध्याय

शिवपूजाकी विधि

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द! अब मैं शिव-पूजाकी विधि बताऊँगा। आचमन (एवं स्नान आदि) करके प्रणवका जप करते हुए सूर्यदेवको अर्घ्य दे। फिर पूजा-मण्डपके द्वारको ‘फट्’ इस मन्त्रद्वारा जलसे सींचकर आदिमें ‘हां’ बीजसहित नन्दी* आदि द्वारपालोंका पूजन करे। द्वारपर उदुम्बर वृक्षकी स्थापना या भावना करके उसके ऊपरी भागमें गणपति, सरस्वती और लक्ष्मीजीकी पूजा करे। उस वृक्षकी दाहिनी शाखापर या द्वारके दक्षिण भागमें नन्दी और गङ्गाका पूजन करे तथा वाम शाखापर या द्वारके वाम भागमें महाकाल एवं यमुनाजीकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् अपनी दिव्य दृष्टि डालकर दिव्य विघ्नोंका उत्सारण (निवारण) करे। उनके ऊपर या उनके उद्देश्यसे फूल फेंके और यह भावना करे कि ‘आकाशचारी सारे विघ्न दूर हो गये।’ साथ ही, दाहिने पैरकी एड़ीसे तीन बार भूमिपर आघात करे और इस क्रियाद्वारा भूतलवर्ती समस्त विघ्नोंके निवारणकी भावना करे। तत्पश्चात् यज्ञमण्डपकी देहलीको लाँघे। वाम शाखाका आश्रय लेकर भीतर प्रवेश करे। दाहिने पैरसे मण्डपके भीतर प्रविष्ट हो उदुम्बरवृक्षमें अस्त्रका न्यास करे तथा मण्डपके मध्य भागमें पीठकी आधारभूमिमें ‘ॐ हां वास्तवधिपतये ब्रह्मणे नमः।’ इस मन्त्रसे वास्तुदेवताकी पूजा करे॥ १—५॥

निरीक्षण आदि शस्त्रोंद्वारा शुद्ध किये हुए गडुओंको हाथमें लेकर, भावनाद्वारा भगवान् शिवसे आज्ञा प्राप्त करके साधक मौन हो गङ्गा आदि नदीके तटपर जाय। वहाँ अपने शरीरको पवित्र करके गायत्री-मन्त्रका जप करते हुए वस्त्रसे छाने हुए जलके द्वारा जलाशयमें उन गडुओंको भरे, अथवा हृदय-बीज (नमः)-का उच्चारण करके जल भरे। तत्पश्चात् पूजाके लिये गन्ध, अक्षत, पुष्प आदि सब द्रव्योंको अपने पास एकत्र करके भूतशुद्धि आदि कर्म करे। फिर उत्तराभिमुख हो आराध्यदेवके दाहिने भागमें—शरीरके विभिन्न अङ्गोंमें मातृकान्यास करके, संहार-मुद्राद्वारा अर्घ्यके लिये जल लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक मस्तकसे लगावे और उसे देवतापर अर्पित करनेके लिये अपने पास रख ले। इसके बाद भोग्य कर्मोंके उपभोगके लिये पाणिकच्छपिका (कूर्ममुद्रा)-का प्रदर्शन करके द्वादश दलोंसे युक्त हृदयकमलमें अपने आत्माका चिन्तन करे॥ ६—१०॥

तदनन्तर शरीरमें शून्यका चिन्तन करते हुए पाँच भूतोंका क्रमशः शोधन करे। पैरोंके दोनों अँगूठोंको पहले बाहर और भीतरसे छिद्रमय (शून्यरूप) देखे। फिर कुण्डलिनी-शक्तिको मूलाधारसे उठाकर हृदयकमलसे संयुक्त करके इस प्रकार चिन्तन करे—‘हृदयरन्ध्रमें स्थित अग्नितुल्य तेजस्वी ‘हूं’ बीजमें कुण्डलिनी-शक्ति विराज रही है।’ उस समय चिन्तन करनेवाला साधक प्राणवायुका अवरोध (कुम्भक) करके उसका रेचक (निःसारण) करनेके पश्चात्, ‘हुं फट्’ के उच्चारणपूर्वक क्रमशः उत्तरोत्तर चक्रोंका भेदन करता हुआ उस कुण्डलिनीको हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य एवं ब्रह्मरन्ध्रमें ले जाकर स्थापित करे। इन ग्रन्थियोंका भेदन करके कुण्डलिनीके साथ हृदयकमलसे ब्रह्मरन्ध्रमें आये ‘हूं’ बीजस्वरूप जीवको वहीं मस्तकमें (मस्तकवर्ती ब्रह्मरन्ध्रमें या सहस्रारचक्रमें) स्थापित कर दे। हृदयस्थित ‘हूं’ बीजसे सम्पुटित हुए उस जीवमें


* नारदपुराणके अनुसार नन्दी, भृङ्गी, रिटि, स्कन्द, गणेश, उमा-महेश्वर, नन्दी-वृषभ तथा महाकाल—ये शैव द्वारपाल हैं।

  • अध्याय ७४ * १४७

पूरक प्राणायामद्वारा चैतन्यभाव जाग्रत् किया गया है। शिखाके ऊपर 'हूं' का न्यास करके शुद्ध बिन्दुस्वरूप जीवका चिन्तन करे। फिर कुम्भक-प्राणायाम करके उस एकमात्र चैतन्य-गुणसे युक्त जीवको शिवके साथ संयुक्त कर दे॥ ११-१५॥

इस तरह शिवमें लीन होकर साधक सबीज रेचक प्राणायामद्वारा शरीरगत भूतोंका शोधन करे। अपने शरीरमें पैरसे लेकर बिन्दु-पर्यन्त सभी तत्त्वोंका विलोम-क्रमसे चिन्तन करे। बिन्दुरूप जीवको बिन्द्वन्त लीन करके पृथ्वी और वायुका एक-दूसरेमें लय करे। साथ ही अग्नि एवं जलका भी परस्पर विलय करे। इस प्रकार दो-दो विरोधी भूतोंका परस्पर शोधन (लय) करना चाहिये। आकाशका किसीसे विरोध नहीं है; इस भूत-शुद्धिका विशेष विवरण सुनो—भूमण्डलका स्वरूप चतुष्कोण है। उसका रंग सुवर्णके समान पीला है। वह कठोर होनेके साथ ही वज्रके चिह्नसे तथा 'हां'¹ इस आत्मीय बीज (भूबीज)-से युक्त है। उसमें 'निवृत्ति' नामक कला है। (शरीरमें पैरसे लेकर घुटनेतक भूमण्डलकी स्थिति है।) इसी तरह पैरसे लेकर मस्तक-पर्यन्त क्रमशः पाँचों भूतोंका चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार पाँच गुणोंसे युक्त वायुभूत भूमण्डलका चिन्तन करे॥ १६-१९॥

जलका स्वरूप अर्धचन्द्राकार है। वह द्रवस्वरूप है, चन्द्रमण्डलमय है। उसकी कान्ति या वर्ण उज्ज्वल है। वह दो कमलोंसे चिह्नित है। 'ह्रीं'² इस बीजसे युक्त है। 'प्रतिष्ठा' नामक कलाके स्वरूपको प्राप्त है। वह वामदेव तथा तत्पुरुष-मन्त्रोंसे संयुक्त जलतत्त्व चार गुणोंसे युक्त है। उसे इस प्रकार (घुटनेसे नाभितक जलका) चिन्तन करते हुए उस जल-तत्त्वका वह्निस्वरूपमें लीन करके शोधन करे। अग्निमण्डल त्रिकोणाकार है। उसका वर्ण लाल है। (नाभिसे हृदयतक उसकी स्थिति है।) वह स्वस्तिकके चिह्नसे युक्त है। उसमें 'हूं'³ बीज अङ्कित है। वह विद्याकला-स्वरूप है। उसका अघोर मन्त्र है तथा वह तीन गुणोंसे युक्त एवं जलभूत है—इस प्रकार चिन्तन करते हुए अग्नितत्त्वका शोधन करे। वायुमण्डल षट्कोणाकार है। (शरीरमें हृदयसे लेकर भौंहोंके मध्य भागतक उसकी स्थिति है।) वह छः बिन्दुओंसे चिह्नित है। उसका रंग काला है। वह 'हैं'⁴ बीज एवं सद्योजात-मन्त्रसे युक्त और शान्तिकला-स्वरूप है। उसमें दो गुण हैं तथा वह पृथ्वीभूत है। इस प्रकार चिन्तन करते हुए वायुतत्त्वका शोधन करे॥ २०-२४॥

आकाशका स्वरूप व्योमाकार, नाद-बिन्दुमय, गोलाकार, बिन्दु और शक्तिसे विभूषित तथा शुद्ध स्फटिक मणिके समान निर्मल है। (शरीरमें भ्रूमध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतक उसकी स्थिति है।) वह 'हौं फट्'⁵ इस बीजसे युक्त है। शान्त्यतीतकलामय⁶ है। एक गुणसे युक्त तथा परम विशुद्ध है। इस प्रकार चिन्तन करते हुए आकाश-तत्त्वका शोधन करे। तदनन्तर अमृतवर्षी मूलमन्त्रसे सबको परिपुष्ट करे। तत्पश्चात् आधारशक्ति, कूर्म, अनन्त (पृथ्वी)-की पूजा करे। फिर पीठ (चौकी)-के अग्निकोणवाले पायेमें धर्मकी, नैर्ऋत्य कोणवाले पायेमें ज्ञानकी, वायव्यकोणमें वैराग्यकी और ऐशान्यकोणमें ऐश्वर्यकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद पीठकी पूर्वादिशाओंमें क्रमशः अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्यकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद पीठके मध्यभागमें कमलकी पूजा करे। इस प्रकार मन-ही-मन इस पीठवर्ती कमलमय


१. अन्य तन्त्रोंके अनुसार पृथ्वीका अपना बीज 'लं' है। २. जलका बीज 'वं' है। यही ग्रन्थान्तरोंसे सिद्ध है। ३. अग्निका मुख्य बीज 'रं' है। ४. वायुका बीज 'यं' है। ५. आकाशका बीज 'हं' है—यही सर्वसम्मत है। ६. शान्त्यतीतकलाके भीतर इन्धिका, दीपिका, रेचिका और मोचिका—ये चार कलाएँ आती हैं।

१४८ * अग्निपुराण *

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आसनका ध्यान करके उसपर देवमूर्ति सच्चिदानन्दघन भगवान् शिवका आवाहन करे। उस शिवमूर्तिमें शिवस्वरूप आत्माको देखे और फिर आसन, पादुकाद्वय तथा नौ पीठशक्ति—इन बारहोंका ध्यान करे। फिर शक्तिमन्त्रके अन्तमें 'वौषट्' लगाकर उसके उच्चारणपूर्वक पूर्वोक्त आत्ममूर्तिको दिव्य अमृतसे आप्लावित करके उसमें सकलीकरण करे। हृदयसे लेकर हस्त-पर्यन्त अङ्गोंमें तथा कनिष्ठिका आदि अँगुलियोंमें हृदय (नमः) मन्त्रोंका जो न्यास है, इसीको 'सकलीकरण' माना गया है॥ २५-३०॥

तत्पश्चात् 'हुं फट्'—इस मन्त्रसे प्राकारकी भावनाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था करके उसके बाहर, नीचे और ऊपर भी भावनात्मक शक्तिजालका विस्तार करे। इसके बाद महामुद्राका^१ प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् पूरक प्राणायामके द्वारा अपने हृदय-कमलमें विराजमान शिवका ध्यान करके भावमय पुष्पोंद्वारा उनके पैरसे लेकर सिरतकके अङ्गोंमें पूजन करे। वे भावमय पुष्प आनन्दामृतमय मकरन्दसे परिपूर्ण होने चाहिये। फिर शिव-मन्त्रोंद्वारा नाभिकुण्डमें स्थित शिवस्वरूप अग्निको तृप्त करे। वही शिवानल ललाटमें बिन्दुरूपसे स्थित है; उसका विग्रह मङ्गलमय है—इस प्रकार चिन्तन करे॥ ३१-३३॥

स्वर्ण, रजत एवं ताम्रपात्रोंमेंसे किसी एक पात्रको अर्घ्यके लिये लेकर उसे अस्त्रबीज (फट्)—के उच्चारणपूर्वक जलसे धोये। फिर बिन्दुरूप शिवसे प्रकट होनेवाले अमृतकी भावनासे युक्त जल एवं अक्षत आदिके द्वारा हृदय-मन्त्र (नमः)—के उच्चारणपूर्वक उसे भर दे। फिर हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र—इन छः अङ्गोंद्वारा (अथवा इनके बीज-मन्त्रोंद्वारा) उस अर्घ्यपात्रका पूजन करके उसे देवता-सम्बन्धी मूलमन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्)—से उसकी रक्षा करके कवच-बीज (हुम्)—के द्वारा उसे अवगुण्ठित कर दे। इस प्रकार अष्टाङ्ग अर्घ्यकी रचना करके, धेनुमुद्राके द्वारा उसका अमृतीकरण करके उस जलको सब ओर सींचे। अपने मस्तकपर भी उस जलकी बूँदोंसे अभिषेक करे। वहाँ रखी हुई पूजा-सामग्रीका भी अस्त्र-बीजके उच्चारणपूर्वक उक्त जलसे प्रोक्षण करे। तदनन्तर हृदयबीजसे अभिमन्त्रित करके 'हुम्' बीजसे पिण्डों (अथवा मत्स्यमुद्रा^२)—द्वारा उसे आवेष्टित या आच्छादित करे॥ ३४-३७॥

इसके बाद अमृता^३ (धेनुमुद्रा)—के लिये धेनुमुद्राका प्रदर्शन करके अपने आसनपर पुष्प अर्पित करे (अथवा देवताके निज आसनपर पुष्प चढ़ावे)। तत्पश्चात् पूजक अपने मस्तकमें तिलक लगाकर मूलमन्त्रके द्वारा आराध्यदेवको पुष्प अर्पित करे। स्नान, देवपूजन, होम, भोजन, यज्ञानुष्ठान, योग, साधन तथा आवश्यक जपके समय धीरबुद्धि साधकको सदा मौन रहना चाहिये।^४ प्रणवका


१. अन्योन्यग्रथिताङ्गुष्ठा प्रसारिकराङ्गुली। महामुद्रेयमुदिता परमीकरणी बुधैः॥ (वामकेश्वर तन्त्रान्तर्गत मुद्रानिघण्टु ३१-३२)
—दोनों अँगूठोंको परस्पर ग्रथित कर हाथोंकी अन्य सब अँगुलियोंको फैलाये रखना—यह 'महामुद्रा' कही गयी है। इसका परमीकरणमें प्रयोग होता है।
२. बायें हाथके पृष्ठभागपर दाहिने हाथकी हथेली रखे और दोनों अँगूठोंको फैलाये रखे। यही 'मत्स्यमुद्रा' है।
३. अमृतीकरणकी विधि यह है—
'वं' इस अमृत-बीजका उच्चारण करके धेनुमुद्राको दिखाये। धेनुमुद्राका लक्षण इस प्रकार है—
वामाङ्गुलीनां मध्येपु दक्षिणाङ्गुलिकास्तथा। संयोज्य तर्जनीं दक्षां वाममध्यमया तथा॥
दक्षमध्यमया वामां तर्जनीं च नियोजयेत्। वामयानामया दक्षकनिष्ठां च नियोजयेत्॥
दक्षयानामया वामां कनिष्ठां च नियोजयेत्। विहिताधोमुखी चैषा धेनुमुद्रा प्रकीर्तिता॥
'बायें हाथकी अँगुलियोंके बीचमें दाहिने हाथकी अँगुलियोंको संयुक्त करके दाहिनी तर्जनीको बायीं मध्यमासे जोड़े। दाहिने हाथकी मध्यमासे बायें हाथकी तर्जनीको मिलावे। फिर बायें हाथकी अनामिकासे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका और दाहिने हाथकी अनामिकासे बायें हाथकी कनिष्ठिकाको संयुक्त करे। तत्पश्चात् इन सबका मुख नीचेकी ओर करे—यही 'धेनुमुद्रा' कही गयी है।'
४. स्नाने देवार्चने होमे भोजने यागयोगयोः। आवश्यक्ये जपे धीरः सदा वाचंयमो भवेत्॥ (अग्नि० ७४। ३९)

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* अध्याय ७४ * १४९

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नाद-पर्यन्त उच्चारण करके मन्त्रका शोधन करे। फिर उत्तम संस्कारयुक्त देव-पूजा आरम्भ करे। मूलगायत्री (अथवा रुद्र-गायत्री)-से अर्घ्य-पूजन करके रखे और वह सामान्य अर्घ्य देवताको अर्पित करे॥ ३८-४०॥

ब्रह्मपञ्चक (पञ्चगव्य और कुशोदकसे बना हुआ ब्रह्मकूर्च$^१$) तैयार करके पूजित शिवलिङ्गसे पुष्प-निर्माल्य ले ईशानकोणकी ओर 'चण्डाय नमः।' कहकर चण्डको समर्पित करे। तत्पश्चात् उक्त ब्रह्मपञ्चकसे पिण्डिका (पिण्डी या अर्घा) और शिवलिङ्गको नहलाकर 'फट्'-का उच्चारण करके उन्हें जलसे नहलाये। फिर 'नमो नमः' के उच्चारणपूर्वक पूर्वोक्त अर्घ्यपात्रके जलसे उस लिङ्गका अभिषेक करे। यह लिङ्ग-शोधनका प्रकार बताया गया है॥ ४१-४२॥

आत्मा (शरीर और मन), द्रव्य (पूजनसामग्री), मन्त्र तथा लिङ्गकी शुद्धि हो जानेपर सब देवताओंका पूजन करे। वायव्यकोणमें 'ॐ हां गणपतये नमः।'$^२$ कहकर गणेशजीकी पूजा करे और ईशानकोणमें 'ॐ हां गुरुभ्यो नमः।' कहकर गुरु, परम गुरु, परात्पर गुरु तथा परमेष्ठी गुरु-गुरुपंक्तिकी पूजा करे॥ ४३॥

तत्पश्चात् कूर्मरूपी शिलापर स्थित अङ्कुर-सदृश आधारशक्तिका तथा ब्रह्मशिलापर आरूढ़ शिवके आसनभूत अनन्तदेवका 'ॐ हां अनन्तासनाय नमः।' मन्त्रद्वारा पूजन करे। शिवके सिंहासनके रूपमें जो मञ्च या चौकी है, उसके चार पाये हैं, जो विचित्र सिंहकी-सी आकृतिसे सुशोभित होते हैं। वे सिंह मण्डलाकारमें स्थित रहकर अपने आगेवालेके पृष्ठभागको ही देखते हैं तथा सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग-इन चार युगोंके प्रतीक हैं। तत्पश्चात् भगवान् शिवकी आसन-पादुकांकी पूजा करे। तदनन्तर धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यकी पूजा करे। वे अग्नि आदि चारों कोणोंमें स्थित हैं। उनके वर्ण क्रमशः कपूर, कुङ्कुम, सुवर्ण और काजलके समान हैं। इनका चारों पायोंपर क्रमशः पूजन करे। इसके बाद (ॐ हां अधश्छदनाय नमोऽधः', ॐ हां ऊर्ध्वच्छदनाय नम ऊर्ध्वे। ॐ हां पद्मासनाय नमः।-ऐसा कहकर) आसनपर विराजमान अष्टदल कमलके नीचे-ऊपरके दलोंकी, सम्पूर्ण कमलकी तथा 'ॐ हां कर्णिकायै नमः।' के द्वारा कर्णिकाके मध्यभागकी पूजा करे। उस कमलके पूर्व आदि आठ दलोंमें तथा मध्यभागमें नौ पीठ-शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। वे शक्तियाँ चँवर लेकर खड़ी हैं। उनके हाथ वरद एवं अभयकी मुद्राओंसे सुशोभित हैं॥ ४४-४७॥

उनके नाम इस प्रकार हैं-वामा, ज्येष्ठा,


१. ब्रह्मकूर्चकी विधि इस प्रकार है-पलाश या कमलके पत्तेमें अथवा ताँबे या सुवर्णके पात्रमें पञ्चगव्य संग्रह करना चाहिये। गायत्री-मन्त्रसे गोमूत्रका, 'गन्धद्वारां०' (श्रीसूक्त) इस मन्त्रसे गोबरका, 'आप्यायस्व०' (शु० यजु० १२।११२) इस मन्त्रसे दूधका, 'दधिक्राव्णो०' (शु० यजु० २३।३२) इस मन्त्रसे दहीका, 'तेजोऽसि शुक्रं०' (शु० यजु० २२।१९) इस मन्त्रसे घीका और 'देवस्य त्वा०' (शु० यजु० ६।३०) इस मन्त्रसे कुशोदकका संग्रह करे। चतुर्दशीको उपवास करके अमावस्याको उपर्युक्त वस्तुओंका संग्रह करे। गोमूत्र एक पल होना चाहिये, गोबर आधे अँगूठेके बराबर हो, दूधका मान सात पल और दहीका तीन पल है। घी और कुशोदक एक-एक पल बताये गये हैं। इस प्रकार इन सबको एकत्र करके परस्पर मिला दे। तत्पश्चात् सात-सात पत्तोंके तीन कुश लेकर जिनके अग्रभाग कटे न हों, उनसे उस पञ्चगव्यकी अग्निमें आहुति दे। आहुतिसे बचे हुए पञ्चगव्यको प्रणवसे आलोडन और प्रणवसे ही मन्थन करके, प्रणवसे ही हाथमें ले तथा फिर प्रणवका ही उच्चारण करके उसे पी जाय। इस प्रकार तैयार किये हुए पञ्चगव्यको 'ब्रह्मकूर्च' कहते हैं। स्त्री-शूद्रोंको ब्राह्मणके द्वारा पञ्चगव्य बनवाकर प्रणव-उच्चारणके बिना ही पीना चाहिये। सर्वसाधारणके लिये ब्रह्मकूर्च-पानका मन्त्र यह है-
यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम्। ब्रह्मकूर्चो दहेत्सर्वं प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम्॥ (वृद्धशातातप० १२)
अर्थात् 'देहधारियोंके शरीरमें चमड़े और हड्डीतकमें जो पाप विद्यमान है, वह सब ब्रह्मकूर्च इस प्रकार जला दे, जैसे प्रज्वलित आग इन्धनको जला डालती है।'
२. प्रचलित 'गं' आदि स्वबीजके स्थानपर 'हां' बीज सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्डक्रमावली' में भी मिलता है।

१५० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

रौद्री, काली, कलविकारिणी$^१$, बलविकारिणी$^२$, बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी तथा मनोन्मनी—इन सबका क्रमशः पूजन करना चाहिये। वामा आदि आठ शक्तियोंका कमलके पूर्व आदि आठ दलोंमें तथा नवीं मनोन्मनीका कमलके केसर-भागमें क्रमशः पूजन किया जाता है। यथा—'ॐ हां वामायै नमः।' इत्यादि। तदनन्तर पृथ्वी आदि अष्ट मूर्तियों एवं विशुद्ध विद्यादेहका चिन्तन एवं पूजन करे। (यथा—पूर्वमें 'ॐ सूर्यमूर्तये नमः।' अग्निकोणमें 'ॐ चन्द्रमूर्तये नमः।' दक्षिणमें 'ॐ पृथ्वीमूर्तये नमः।' नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ जलमूर्तये नमः।' पश्चिममें 'ॐ वह्निमूर्तये नमः।' वायव्यकोणमें 'ॐ वायुमूर्तये नमः।' उत्तरमें 'ॐ आकाशमूर्तये नमः।' और ईशानकोणमें 'ॐ यजमानमूर्तये नमः।') तत्पश्चात् शुद्ध विद्याकी और तत्त्वव्यापक आसनकी पूजा करनी चाहिये। उस सिंहासनपर कर्पूर-गौर, सर्वव्यापी एवं पाँच मुखोंसे सुशोभित भगवान् महादेवको प्रतिष्ठित करे। उनके दस भुजाएँ हैं। वे अपने मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करते हैं। उनके दाहिने हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि, शूल, खट्वाङ्ग और वरद-मुद्रा हैं तथा अपने बायें हाथोंमें वे डमरू, बिजौरा नीबू, सर्प, अक्षसूत्र और नील कमल धारण करते हैं$^३$॥ ४८–५१॥

आसनके मध्यमें विराजमान भगवान् शिवकी वह दिव्य मूर्ति बत्तीस लक्षणोंसे सम्पन्न है, ऐसा चिन्तन करके स्वयं-प्रकाश शिवका स्मरण करते हुए 'ॐ हां हां हां शिवमूर्तये नमः।' कहकर उसे नमस्कार करे। ब्रह्मा आदि कारणोंके त्यागपूर्वक मन्त्रको शिवमें प्रतिष्ठित करे। फिर यह चिन्तन करे कि ललाटके मध्यभागमें विराजमान तथा तारापति चन्द्रमाके समान प्रकाशमान बिन्दुरूप परमशिव हृदयादि छः अङ्गोंसे संयुक्त हो पुष्पाञ्जलिमें उतर आये हैं। ऐसा ध्यान करके उन्हें प्रत्यक्ष पूजनीय मूर्तिमें स्थापित कर दे। इसके बाद 'ॐ हां ह्रौं शिवाय नमः।'—यह मन्त्र बोलकर मन-ही-मन आवाहनी$^४$-मुद्राद्वारा मूर्तिमें भगवान् शिवका आवाहन करे। फिर स्थापनी-मुद्राद्वारा$^५$ वहाँ उनकी स्थापना और संनिधापिनी-मुद्राद्वारा$^६$ भगवान् शिवको समीपमें विराजमान करके संनिरोधनी-मुद्राद्वारा$^७$ उन्हें उस मूर्तिमें अवरुद्ध करे। तत्पश्चात् 'निष्ठुरायै कालकल्यायै (कालकान्त्यै अथवा कालकान्तायै) फट्।' का उच्चारण करके खड्ग-मुद्रासे भय दिखाते हुए विघ्नोंको मार भगावे। इसके बाद लिङ्ग-मुद्राका$^८$ प्रदर्शन करके नमस्कार करे॥ ५२–५६॥

इसके बाद 'नमः' बोलकर अवगुण्ठन करे। आवाहनका अर्थ है सादर सम्मुखीकरण—इष्टदेवको अपने सामने उपस्थित करना। देवताको अर्चा-विग्रहमें बिठाना ही उसकी स्थापना है।


१. अन्य तन्त्र-ग्रन्थोंमें 'कलविकरिणी' नाम मिलता है। २. अन्यत्र 'बलविकरिणी' नाम मिलता है। ३. न्यसेत् सिंहासने देवं शुक्लं पञ्चमुखं विभुम्। दशबाहुं च खण्डेन्दुं दधानं दक्षिणैः करैः॥ शक्त्यृष्टिशूलखट्वाङ्गवरदं वामकैः करैः। डमरुं बीजपूरं च नागाक्षं सूत्रकोत्पलम्॥ (अग्नि० ७४। ५०-५१) ४. दोनों हाथोंकी अञ्जलि बनाकर अनामिका अँगुलियोंके मूलपर्वपर अँगूठेको लगा देना—यह आवाहनकी मुद्रा है। ५. यह आवाहनी मुद्रा ही अधोमुखी (नीचेकी ओर मुखवाली) कर दी जाय तो 'स्थापिनी (बिठानेवाली) मुद्रा' कहलाती है। ६. अँगूठोंको ऊपर उठाकर दोनों हाथोंकी संयुक्त मुट्ठी बाँध लेनेपर 'संनिधापिनी (निकट सम्पर्कमें लानेवाली) मुद्रा' बन जाती है। ७. यदि मुट्ठीके भीतर अँगूठेको डाल दिया जाय तो 'संनिरोधिनी (रोक रखनेवाली) मुद्रा' कहलाती है। ८. दोनों हाथोंकी अञ्जलि बाँधकर अनामिका और कनिष्ठिका अँगुलियोंको परस्पर सटाकर लिङ्गाकार खड़ी कर ले। दोनों मध्यमाओंका अग्रभाग बिना खड़ी किये परस्पर मिला दे। दोनों तर्जनियोंको मध्यमाओंके साथ सटाये रखे और अँगूठोंको तर्जनियोंके मूलभागमें लगा ले। यह अर्घासहित शिवलिङ्गकी मुद्रा है।

  • अध्याय ७४ * १५१

‘प्रभो! मैं आपका हूँ’—ऐसा कहकर भगवान्‌से निकटतम सम्बन्ध स्थापित करना ही ‘संनिधान’ या ‘संनिधापन’ कहलाता है। जबतक पूजन-सम्बन्धी कर्मकाण्ड चालू रहे, तबतक भगवान्‌की समीपताको अक्षुण्ण रखना ही ‘निरोध’ है और अभक्तोंके समक्ष जो शिवतत्त्वका अप्रकाशन या संगोपन किया जाता है, उसीका नाम ‘अवगुण्ठन’ है। तदनन्तर सकलीकरण करके ‘हृदयाय नमः’, ‘शिरसे स्वाहा’, ‘शिखायै वषट्’, ‘कवचाय हुम्’, ‘नेत्राभ्यां वौषट्’, ‘अस्त्राय फट्’—इन छः मन्त्रोंद्वारा हृदयादि अङ्गोंकी अङ्गीके साथ एकता स्थापित करे—यही ‘अमृतीकरण’ है। चैतन्यशक्ति भगवान् शंकरका हृदय है, आठ प्रकारका ऐश्वर्य उनका सिर है, वशित्व उनकी शिखा है तथा अभेद्य तेज भगवान् महेश्वरका कवच है। उनका दुःसह प्रताप ही समस्त विघ्नोंका निवारण करनेवाला अस्त्र है। हृदय आदिको पूर्वमें रखकर क्रमशः ‘नमः’, ‘स्वधा’, ‘स्वाहा’ और ‘वौषट्’ का क्रमशः उच्चारण करके पाद्य आदि निवेदन करे॥ ५७-६१ $\frac{१}{२}$ ॥

पाद्यको आराध्यदेवके युगल चरणारविन्दोंमें, आचमनको मुखारविन्दमें तथा अर्घ्य, दूर्वा, पुष्प और अक्षतको इष्टदेवके मस्तकपर चढ़ाना चाहिये। इस प्रकार दस संस्कारोंसे परमेश्वर शिवका संस्कार करके गन्ध-पुष्प आदि पञ्च-उपचारोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। पहले जलसे देवविग्रहका अभ्युक्षण (अभिषेक) करके राई-लोन आदिसे उबटन और मार्जन करना चाहिये। तत्पश्चात् अर्घ्यजलकी बूँदों और पुष्प आदिसे अभिषेक करके गडुओॅंमें रखे हुए जलके द्वारा धीरे-धीरे भगवान्‌को नहलावे। दूध, दही, घी, मधु और शक्कर आदिको क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात—इन पाँच* मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित करके उनके द्वारा बारी-बारीसे स्नान करावे। उनको परस्पर मिलाकर पञ्चामृत बना ले और उससे भगवान्‌को नहलावे। इससे भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है। पूर्वोक्त दूध-दही आदिमें जल और धूप मिलाकर उन सबके द्वारा इष्ट देवता-सम्बन्धी मूल-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको स्नान करावे॥ ६२-६६॥

तदनन्तर जौके आटेसे चिकनाई मिटाकर इच्छानुसार शीतल जलसे स्नान करावे। अपनी शक्तिके अनुसार चन्दन, केसर आदिसे युक्त जलद्वारा स्नान कराकर शुद्ध वस्त्रसे इष्टदेवके श्रीविग्रहको अच्छी तरह पोंछे। उसके बाद अर्घ्य निवेदन करे। देवताके ऊपर हाथ न घुमावे। शिवलिङ्गके मस्तकभागको कभी पुष्पसे शून्य न रखे। तत्पश्चात् अन्यान्य उपचार समर्पित करे। (स्नानके पश्चात् देवविग्रहको वस्त्र और यज्ञोपवीत धारण कराकर) चन्दन-रोली आदिका अनुलेप करे। फिर शिव-सम्बन्धी मन्त्र बोलकर पुष्प अर्पण करते हुए पूजन करे। धूपके पात्रका अस्त्र-मन्त्र (फट्)-से प्रोक्षण करके शिव-मन्त्रसे धूपद्वारा पूजन करे। फिर अस्त्र-मन्त्रद्वारा पूजित घण्टा बजाते हुए गुग्गुलका धूप जलावे। फिर ‘शिवाय नमः।’ बोलकर अमृतके समान


* ये पाँच मन्त्र इस प्रकार हैं—
(१) ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदा शिवोम्॥
(२) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
(३) ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥
(४) ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥
(५) ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥

१५२ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

सुस्वादु जलसे भगवान्‌को आचमन करावे। इसके बाद आरती उतारकर पुनः पूर्ववत् आचमन करावे। फिर प्रणाम करके देवताकी आज्ञा ले भोगाङ्गोंकी पूजा करे॥ ६७—७१॥

अग्निकोणमें चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हृदयका, ईशानकोणमें सुवर्णके समान कान्तिवाले सिरका, नैर्ऋत्यकोणमें लाल रंगकी शिखाका तथा वायव्यकोणमें काले रंगके कवचका पूजन करे। फिर अग्निवर्ण नेत्र और कृष्ण-पिङ्गल अस्त्रका पूजन करके चतुर्मुख ब्रह्मा और चतुर्भुज विष्णु आदि देवताओंको कमलके दलोंमें स्थित मानकर इन सबकी पूजा करे। पूर्व आदि दिशाओंमें दाढ़ोंके समान विकराल, वज्रतुल्य अस्त्रका भी पूजन करे॥ ७२-७३॥

मूल स्थानमें 'ॐ हां हूं शिवाय नमः।' बोलकर पूजन करे। 'ॐ हां हृदयाय नमः, हीं शिरसे स्वाहा।' बोलकर हृदय और सिरकी पूजा करे। 'हूं शिखायै वषट्' बोलकर शिखाकी, 'हैं कवचाय हुम्।' कहकर कवचकी तथा 'हः अस्त्राय फट्।' बोलकर अस्त्रकी पूजा करे। इसके बाद परिवारसहित भगवान् शिवको क्रमशः पाद्य, आचमन, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, करोद्वर्तन, ताम्बूल, मुखवास (इलायची आदि) तथा दर्पण अर्पण करे। तदनन्तर देवाधिदेवके मस्तकपर दूर्वा, अक्षत और पवित्रक चढ़ाकर हृदय (नमः)-से अभिमन्त्रित मूलमन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। तत्पश्चात् कवचसे आवेष्टित एवं अस्त्रके द्वारा सुरक्षित अक्षत-कुश, पुष्प तथा उद्भव नामक मुद्रासे भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रार्थना करे—॥ ७४—७७$\frac{१}{२}$॥

'प्रभो! गुह्यसे भी अति गुह्य वस्तुकी आप रक्षा करनेवाले हैं। आप मेरे किये हुए इस जपको ग्रहण करें, जिससे आपके रहते हुए आपकी कृपासे मुझे सिद्धि प्राप्त हो$^१$'॥ ७८$\frac{१}{२}$॥

भोगकी इच्छा रखनेवाला उपासक उपर्युक्त श्लोक पढ़कर, मूल मन्त्रके उच्चारणपूर्वक दाहिने हाथसे अर्घ्य-जल ले भगवान्‌के वरकी मुद्रासे युक्त हाथमें अर्घ्य निवेदन करे। फिर इस प्रकार प्रार्थना करे—'देव! शंकर! हम कल्याणस्वरूप आपके चरणोंकी शरणमें आये हैं। अतः सदा हम जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म करते आ रहे हैं, उन सबको आप नष्ट कर दीजिये—निकाल फेंकिये। हूं क्षः। शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं, शिव ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं, शिवकी सर्वत्र जय हो। जो शिव हैं, वही मैं हूँ$^२$'॥ ७९—८१$\frac{१}{२}$॥

इन दो श्लोकोंको पढ़कर अपना किया हुआ जप आराध्यदेवको समर्पित कर दे। तत्पश्चात् जपे हुए शिव-मन्त्रका दशांश भी जपे (यह हवनकी पूर्तिके लिये आवश्यक है।) फिर अर्घ्य देकर भगवान्‌की स्तुति करे। अन्तमें अष्टमूर्तिधारी आराध्यदेव शिवकी परिक्रमा करके उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करे। नमस्कार और शिव-ध्यान करके चित्रमें अथवा अग्नि आदिमें भगवान् शिवके उद्देश्यसे यजन-पूजन करना चाहिये॥ ८२—८४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिव-पूजाकी विधिका वर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७४॥


१. गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे येन त्वत्प्रसादात् त्वयि स्थिते॥ (अग्नि० पु० ७४-७८$\frac{१}{२}$॥)
२. यत्किंचित्कुर्महे देव सदा सुकृतदुष्कृतम्॥
तन्मे शिवपदस्थस्य हूं क्षः क्षेपय शंकर। शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत्॥
शिवो जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽहमेव च। (अग्नि० ७४।८०-८२)

  • अध्याय ७५ * १५३

पचहत्तरवाँ अध्याय

शिवपूजाके अङ्गभूत होमकी विधि

भगवान् महेश्वर कहते हैं— स्कन्द! पूजनके पश्चात् अपने शरीरको वस्त्र आदिसे आवृत करके हाथमें अर्घ्यपात्र लिये उपासक अग्निशालामें जाय और दिव्यदृष्टिसे यज्ञके समस्त उपकरणोंकी कल्पना (संग्रह) करे। उत्तराभिमुख हो कुण्डको देखे। कुशोंद्वारा उसका प्रोक्षण एवं ताडन (मार्जन) करे। ताडन तो अस्त्र-मन्त्र (फट्)-से करे; किंतु उसका अभ्युक्षण कवच-मन्त्र (हुम्)-से करना चाहिये। खड्गसे कुण्डका खात उद्धार, पूरण और समता करे। कवच (हुम्)-से उसका अभिषेक तथा शरमन्त्र (फट्)-से भूमिको कूटनेका कार्य करे। सम्मार्जन, उपलेपन, कलात्मक रूपकी कल्पना, त्रिसूत्री-परिधान तथा अर्चन भी सदा कवच-मन्त्रसे ही करना चाहिये। कुण्डके उत्तरमें तीन रेखा करे। एक रेखा ऐसी खींचे, जो पूर्वाभिमुखी हो और ऊपरसे नीचेकी ओर गयी हो। कुश अथवा त्रिशूलसे रेखा करनी चाहिये। अथवा उन सभी रेखाओंमें उलट-फेर भी किया जा सकता है॥ १—५॥

अस्त्र-मन्त्र (फट्)-का उच्चारण करके वज्रीकरणकी क्रिया करे। 'नमः' का उच्चारण करके कुशोंद्वारा चतुष्पथका न्यास करे। कवच-मन्त्र (हुम्) बोलकर अक्षपात्रका और हृदय-मन्त्र (नमः)-से विष्टरका स्थापन करे। 'वागीश्वर्यै नमः।' 'ईशाय नमः'—ऐसा बोलकर वागीश्वरी देवी तथा ईशका आवाहन एवं पूजन करे। इसके बाद अच्छे स्थानसे शुद्धपात्रमें रखी हुई अग्निको ले आवे। उसमेंसे 'क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरम्०' (शु० यजु० ३५।१९) इत्यादि मन्त्रके उच्चारणपूर्वक क्रव्यादके अंशभूत अग्निकणको निकाल दे। फिर निरीक्षण आदिसे शोधित औदर्य, ऐन्दव तथा भौत —इन त्रिविध अग्नियोंको एकत्र करके, 'ॐ हूं वह्निचैतन्याय नमः।' का उच्चारण करके अग्निबीज (रं)-के साथ स्थापित करे॥ ६—८ $\frac{१}{२}$॥

संहिता-मन्त्रसे अभिमन्त्रित, धेनुमुद्राके प्रदर्शनपूर्वक अमृतीकरणकी क्रियासे संस्कृत, अस्त्र-मन्त्रसे सुरक्षित तथा कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठित एवं पूजित अग्निको कुण्डके ऊपर प्रदक्षिणा-क्रमसे तीन बार घुमाकर, 'यह भगवान् शिवका बीज है'—ऐसा चिन्तन करके ध्यान करे कि 'वागीश्वरदेवने इस बीजको वागीश्वरीके गर्भमें स्थापित किया है।' इस ध्यानके साथ मन्त्र-साधक दोनों घुटने पृथ्वीपर टेककर नमस्कारपूर्वक उस अग्निको अपने सम्मुख कुण्डमें स्थापित कर दे। तत्पश्चात् जिसके भीतर बीजस्वरूप अग्निका आधान हो गया है, उस कुण्डके नाभिदेशमें कुशोंद्वारा परिसमूहन करे। परिधान-सम्भार, शुद्धि, आचमन एवं नमस्कारपूर्वक गर्भाग्निका पूजन करके उस गर्भज अग्निकी रक्षाके लिये अस्त्र-मन्त्रसे भावनाद्वारा ही वागीश्वरीदेवीके पाणिपल्लवमें कङ्कण (या रक्षासूत्र) बाँधे॥ ९—१३ $\frac{१}{२}$॥

सद्योजात-मन्त्रसे गर्भाधानके उद्देश्यसे अग्निका पूजन करके हृदय-मन्त्रसे तीन आहुतियाँ दे। फिर भावनाद्वारा ही तृतीय मासमें होनेवाले पुंसवन-संस्कारकी सिद्धिके लिये वामदेवमन्त्रद्वारा अग्निकी पूजा करके, 'शिरसे स्वाहा।' बोलकर तीन आहुतियाँ दे। इसके बाद उस अग्निपर जलबिन्दुओंसे छींटा दे। तदनन्तर छठे मासमें होनेवाले सीमन्तोन्नयन-संस्कारकी भावना करके, अघोर-मन्त्रसे अग्निका पूजन करके 'शिखायै वषट्।' का उच्चारण करते हुए तीन आहुतियाँ

१५४ * अग्निपुराण *


दे तथा शिखा-मन्त्रसे ही मुख आदि अङ्गोंकी कल्पना करे। मुखका उद्घाटन एवं प्रकटीकरण करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् दसवें मासमें होनेवाले जातकर्म एवं नरकर्मकी भावनासे तत्पुरुष-मन्त्रद्वारा दर्भ आदिसे अग्निका पूजन एवं प्रज्वलन करके गर्भमलको दूर करनेवाला स्नान करावे तथा ध्यानद्वारा देवीके हाथमें सुवर्ण-बन्धन करके हृदय-मन्त्रसे पूजन करे। फिर सूतककी तत्काल निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे अभिषेक करे॥ १४—१९॥

कुण्डका बाहरकी ओरसे अस्त्र-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक कुशोंद्वारा ताडन या मार्जन करे। फिर ‘हुम्’ का उच्चारण करके उसे जलसे सींचे। तत्पश्चात् कुण्डके बाहर मेखलाओंपर अस्त्र-मन्त्रसे उत्तर और दक्षिण दिशाओंमें पूर्वाग्र तथा पूर्व और पश्चिम दिशाओंमें उत्तराग्र कुशाओंको बिछावे। उनपर हृदय-मन्त्रसे परिधि-विष्टर (आठों दिशाओंमें आसनविशेष) स्थापित करे। इसके बाद सद्योजातादि पाँच मुख-सम्बन्धी मन्त्रोंसे तथा अस्त्र-मन्त्रसे नालच्छेदनके उद्देश्यसे पाँच समिधाओंके मूलभागको घीमें डुबोकर उन पाँचोंकी आहुति दे। तदनन्तर ब्रह्मा, शंकर, विष्णु और अनन्तका दूर्वा और अक्षत आदिसे पूजन करे। पूजनके समय उनके नामके अन्तमें ‘नमः’ जोड़कर उच्चारण करे। यथा—‘ब्रह्मणे नमः।’ ‘शंकराय नमः।’ ‘विष्णवे नमः।’ ‘अनन्ताय नमः।’ फिर कुण्डके चारों ओर बिछे हुए पूर्वोक्त आठ विष्टरोंपर पूर्वाद दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशानका आवाहन और स्थापन करके यह भावना करे कि उन सबका मुख अग्निदेवकी ओर है। फिर उन सबकी अपनी-अपनी दिशामें पूजा करे। पूजाके समय उनके नाम मन्त्रके अन्तमें ‘नमः’ जोड़कर बोले। यथा—‘इन्द्राय नमः।’ इत्यादि॥ २०—२३ $\frac{१}{२}$ ॥

इसके बाद उन सब देवताओंको भगवान् शिवकी यह आज्ञा सुनावे—‘देवताओ! तुम सब लोग विघ्नसमूहका निवारण करके इस बालक (अग्नि)-का पालन करो।’ तदनन्तर ऊर्ध्वमुख स्रुक् और स्रुवको लेकर उन्हें बारी-बारीसे तीन बार अग्निमें तपावे। फिर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे उनका स्पर्श करावे। कुशसे स्पर्श कराये हुए स्थानोंमें क्रमशः आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व—इन तीनोंका न्यास करे। न्यास-वाक्य इस प्रकार हैं—‘ॐ हां आत्मतत्त्वाय नमः।’ ‘ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वाय नमः।’ ‘ॐ हूँ शिवतत्त्वाय नमः।’॥ २४—२६ $\frac{१}{२}$ ॥

तत्पश्चात् स्रुक्में ‘नमः’ के साथ शक्तिका और स्रुवमें शिवका न्यास करे। यथा—‘शक्त्यै नमः।’ ‘शिवाय नमः।’ फिर तीन आवृत्तिमें फैले हुए रक्षासूत्रसे स्रुक् और स्रुव दोनोंके ग्रीवाभागको आवेष्टित करे। इसके बाद पुष्पादिसे उनका पूजन करके अपने दाहिने भागमें कुशोंके ऊपर उन्हें रख दे। फिर गायका घी लेकर, उसे अच्छी तरह देख-भालकर शुद्ध कर ले और अपने स्वरूपके ब्रह्ममय होनेकी भावना करके, उस घीके पात्रको हाथमें लेकर हृदय-मन्त्रसे कुण्डके ऊपर अग्निकोणमें घुमाकर, पुनः अपने स्वरूपके विष्णुमय होनेकी भावना करे। तत्पश्चात् घृतको ईशानकोणमें रखकर कुशाग्रभागसे घी निकाले और ‘शिरसे स्वाहा।’ एवं ‘विष्णवे स्वाहा।’ बोलकर भगवान् विष्णुके लिये उस घृतबिन्दु की आहुति दे। अपने स्वरूपके रुद्रमय होनेकी भावना करके, कुण्डके नाभिस्थानमें घृतको रखकर उसका आप्लावन करे॥ २७—३१ $\frac{१}{२}$ ॥

(फैलाये हुए अँँगूठेसे लेकर तर्जनीतककी

  • अध्याय ७५ * १५५

लंबाईको 'प्रादेश' कहते हैं।) प्रादेश बराबर लंबे दो कुशोंको अङ्गुष्ठ तथा अनामिका—इन दो अँगुलियोंसे पकड़कर उनके द्वारा अस्त्र (फट्)—के उच्चारणपूर्वक अग्निके सम्मुख घीको प्रवाहित करे। इसी प्रकार हृदय-मन्त्र (नमः)-का उच्चारण करके अपने सम्मुख भी घृतका आप्लावन करे। 'नमः' के उच्चारणपूर्वक हाथमें लिये हुए कुशके दग्ध हो जानेपर उसे शस्त्र-क्षेप (फट्के उच्चारण)-के द्वारा पवित्र करे। एक जलते हुए कुशसे उसकी नीराजना (आरती) करके फिर दूसरे कुशसे उसे जलावे। उस जले हुए कुशको अस्त्र-मन्त्रसे पुनः अग्निमें ही डाल दे। तत्पश्चात् घृतमें एक प्रादेश बराबर कुश छोड़े, जिसमें गाँठ लगायी गयी हो। फिर घीमें दो पक्षों तथा इडा आदि तीन नाड़ियोंकी भावना करे। इडा आदि तीनों भागोंसे क्रमशः स्रुवद्वारा घी लेकर उसका होम करे। 'स्वा' का उच्चारण करके स्रुवावस्थित घीको अग्निमें डाले और 'हा' का उच्चारण करके हुतशेष घीको उसे डालनेके लिये रखे हुए पात्रविशेषमें छोड़ दे। अर्थात् 'स्वाहा' बोलकर क्रमशः दोनों कार्य (अग्निमें हवन और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप) करे॥ ३२-३६॥

प्रथम इडाभागसे घी लेकर 'ॐ हामग्नये स्वाहा।' इस मन्त्रका उच्चारण करके घीका अग्निमें होम करे और हुतशेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप करे। इसी प्रकार दूसरे पिङ्गलाभागसे घी लेकर 'ॐ हां सोमाय स्वाहा।' बोलकर घीमें आहुति दे और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप करे। फिर 'सुषुम्णा' नामक तृतीय भागसे घी लेकर 'ॐ हामग्नीषोमाभ्यां स्वाहा।' बोलकर स्रुवाद्वारा घी अग्निमें डाले और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेपण करे। तत्पश्चात् बालक अग्निके मुखमें नेत्रत्रयके स्थानविशेषमें तीनों नेत्रोंका उद्घाटन करनेके लिये घृतपूर्ण स्रुवद्वारा निम्नाङ्कित मन्त्र बोलकर अग्निमें चौथी आहुति दे—'ॐ हामग्नये स्विष्टकृते स्वाहा'॥ ३७-३९॥

तत्पश्चात् (पहले अध्यायमें बताये अनुसार) 'ॐ हां हृदयाय नमः।' इत्यादि छहों अङ्ग-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा घीको अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्राद्वारा जगावे। फिर कवच-मन्त्र (हुम्)-से अवगुण्ठित करके शरमन्त्र (फट्)-से उसकी रक्षा करे। इसके बाद हृदय-मन्त्रसे घृतबिन्दुका उत्क्षेपण करके उसका अभ्युक्षण एवं शोधन करे। साथ ही शिवस्वरूप अग्निके पाँच मुखोंके लिये अभिघार-होम, अनुसंधान-होम तथा मुखोंके एकीकरण-सम्बन्धी होम करे। अभिघार-होमकी विधि यों है—'ॐ हां सद्योजाताय स्वाहा। ॐ हां वामदेवाय स्वाहा। ॐ हां अघोराय स्वाहा। ॐ हां तत्पुरुषाय स्वाहा। ॐ हां ईशानाय स्वाहा।'—इन पाँच मन्त्रोंद्वारा सद्योजातादि पाँच मुखोंके लिये अलग-अलग क्रमशः घीकी एक-एक आहुति देकर उन मुखोंको अभिघारित-घीसे आप्लावित करे। यही मुखाभिघार-सम्बन्धी होम है। तत्पश्चात् दो-दो मुखोंके लिये एक साथ आहुति दे; यही मुखानुसंधान होम है। यह होम निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे सम्पन्न करे—'ॐ हां सद्योजातवामदेवाभ्यां स्वाहा। ॐ हां वामदेवाघोराभ्यां स्वाहा। ॐ हां अघोरतत्पुरुषाभ्यां स्वाहा। ॐ हां तत्पुरुषेशानाभ्यां स्वाहा।'॥ ४०-४४ $\frac{३}{२}$॥

तदनन्तर कुण्डमें अग्निकोणसे वायव्यकोणतक तथा नैर्ऋत्यकोणसे ईशानकोणतक घीकी अविच्छिन्न धाराद्वारा आहुति देकर उक्त पाँचों मुखोंकी एकता करे। यथा—'ॐ हां सद्योजातवामदेवाघोर-तत्पुरुषेशानेभ्यः स्वाहा।' इस मन्त्रसे पाँचों मुखोंके लिये एक ही आहुति

१५६ * अग्निपुराण *

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देनेसे उन सबका एकीकरण होता है। इस प्रकार इष्टमुखमें सभी मुखोंका अन्तर्भाव होता है, अतः वह एक ही मुख उन सभी मुखोंका आकार धारण करता है-उन सबके साथ उसकी एकता हो जाती है। इसके बाद कुण्डके ईशानकोणमें अग्निकी पूजा करके, अस्त्र-मन्त्रसे तीन आहुतियाँ देकर अग्निका नामकरण करे- "हे अग्निदेव! तुम सब प्रकारसे शिव हो, तुम्हारा नाम 'शिव' है।" इस प्रकार नामकरण करके नमस्कारपूर्वक, पूजित हुए माता-पिता वागीश्वरी एवं वागीश्वर अथवा शक्ति एवं शिवका अग्निमें विसर्जन करके उनके लिये विधिपूर्वक पूर्णाहुति दे। मूल- मन्त्रके अन्तमें 'वौषट्' पद जोड़कर (यथा- ॐ नमः शिवाय वौषट्।- ऐसा कहकर) शिव और शक्तिके लिये विधिपूर्वक पूर्णाहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् हृदय-कमलमें अङ्ग और सेनासहित परम तेजस्वी शिवका पूर्ववत् आवाहन करके पूजन करे और उनकी आज्ञा लेकर उन्हें पूर्णतः तृप्त करे॥ ४५-४९$\frac{१}{२}$॥

यज्ञाग्नि तथा शिवका अपने साथ नाड़ीसंधान करके अपनी शक्तिके अनुसार मूल-मन्त्रसे अङ्गोंसहित दशांश होम करे। घी, दूध और मधुका एक-एक 'कर्ष' (सोलह माशा) होम करना चाहिये। दहीकी आहुतिकी मात्रा एक 'सितुही' बतायी गयी है। दूधकी आहुतिका मान एक 'पसर' है। सभी भक्ष्य पदार्थों तथा लावाकी आहुतिकी मात्रा एक-एक 'मुट्ठी' है। मूलके तीन टुकड़ोंकी एक आहुति दी जाती है। फलकी आहुति उसके अपने ही प्रमाणके अनुसार दी जाती है, अर्थात् एक आहुतिमें छोटा हो या बड़ा एक फल देना चाहिये। उसे खण्डित नहीं करना चाहिये। अन्नकी आहुतिका मान आधा ग्रास है। जो सूक्ष्म किसमिस आदि वस्तुएँ हैं, उन्हें एक बार पाँचकी संख्यामें लेकर होम करना चाहिये। ईंखकी आहुतिका मान एक 'पोर' है। लताओंकी आहुतिका मान दो-दो अङ्गुलका टुकड़ा है। पुष्प और पत्रकी आहुति उनके अपने ही मानसे दी जाती है, अर्थात् एक आहुतिमें पूरा एक फूल और पूरा एक पत्र देना चाहिये। समिधाओंकी आहुतिका मान दस अङ्गुल है॥ ५०-५४॥

कपूर, चन्दन, केसर और कस्तूरीसे बने हुए दक्ष-कर्दम (अनुलेपविशेष)-की मात्रा एक कलाय (मटर या केराव)-के बराबर है। गुग्गुलकी मात्रा बेरके बीजके बराबर होनी चाहिये। कंदोंके आठवें भागसे एक आहुति दी जाती है। इस प्रकार विचार करके विधिपूर्वक उत्तम होम करे। इस तरह प्रणव तथा बीज-पदोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा होम-कर्म सम्पन्न करना चाहिये॥ ५५-५६॥

तदनन्तर घीसे भरे हुए स्रुक्‌के ऊपर अधोमुख स्रुवको रखकर स्रुक्‌के अग्रभागमें फूल रख दे। फिर बायें और दायें हाथसे उन दोनोंको शङ्खकी मुद्रासे पकड़े। इसके बाद शरीरके ऊपरी भागको उन्नत रखते हुए उठकर खड़ा हो जाय। पैरोंको समभावसे रखे। स्रुक् और स्रुव दोनोंके मूलभागको अपनी नाभिमें टिका दे। नेत्रोंको स्रुक्‌के अग्र- भागपर ही स्थिरतापूर्वक जमाये रखे। ब्रह्मा आदि कारणोंका त्याग करते हुए भावनाद्वारा सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे निकलकर ऊपर उठे। स्रुक्- स्रुवके मूलभागको नाभिसे ऊपर उठाकर बायें स्तनके पास ले आवे। अपने तन-मनसे आलस्यको दूर रखे तथा (ॐ नमः शिवाय वौषट्। - इस प्रकार) मूल-मन्त्रका वौषट्-पर्यन्त अस्पष्ट (मन्द स्वरसे) उच्चारण करे और उस घीको जौकी-सी पतली धाराके साथ अग्निमें होम दे॥ ५७-६०$\frac{१}{२}$॥

इसके बाद आचमन, चन्दन और ताम्बूल आदि देकर भक्तिभावसे भगवान् शिवके ऐश्वर्यकी वन्दना करते हुए उनके चरणोंमें उत्तम (साष्टाङ्ग) प्रणाम करे। फिर अग्निकी पूजा करके 'ॐ हः अस्त्राय फट्।' के उच्चारणपूर्वक संहारमुद्राके