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भारतकोश
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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ
  • अध्याय ३६२ * ७९३

क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोषोंका समूह है। 'कौपीन' शब्द नहीं करनेयोग्य खोटे कर्म तथा गुह्यस्थानका वाचक है। 'मैथुन' शब्द संगति तथा रतिके अर्थमें आता है। 'प्रधान' कहते हैं—परमार्थबुद्धिको तथा 'प्रज्ञान' शब्द बुद्धि एवं चिह्न (पहचान)-का वाचक है। 'क्रन्दन' शब्द रोने और पुकारनेके अर्थमें आता है। 'वर्ष्मन्' शब्द देह और परिमाणका बोधक है। 'आराधन' शब्द साधन प्राप्ति तथा संतुष्ट करनेके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'रत्न' शब्दका स्वजातिमें श्रेष्ठ पुरुषके लिये भी प्रयोग होता है और 'लक्ष्मन्' शब्द चिह्न एवं प्रधानका बोध करानेवाला है। 'कलाप' शब्द आभूषण, मोरपंख, तरकस और संगठितके अर्थमें भी उपलब्ध होता है। 'तल्प' शब्द शय्या, अट्टालिका तथा स्त्रीरूप अर्थका बोधक है। 'डिम्भ' शब्द शिशु और मूर्खके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'स्तम्भ' शब्द खंभे तथा जडवत् निश्चेष्ट होनेके अर्थमें आता है। 'सभा' शब्द समिति तथा सदस्योंका भी वाचक है॥ १३–२९॥

'रश्मि' शब्द किरण तथा रस्सीका वाचक है। 'धर्म' शब्दका प्रयोग पुण्य और यमराज आदिके लिये होता है। 'ललाम' शब्द पूँछ, पुण्ड्र (तिलक), घोड़ा, आभूषण, श्रेष्ठता तथा ध्वजा इत्यादि अर्थोंमें आता है। 'प्रत्यय' शब्द अधीन, शपथ, ज्ञान, विश्वास तथा हेतुके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'समय' शब्दका अर्थ है—शपथ, आचार, काल, सिद्धान्त और संविद् (करार)। 'अत्यय' अतिक्रमण (उल्लङ्घन) और कठिनाई अर्थमें तथा 'सत्य' शब्द शपथ और सत्यभाषणके अर्थमें आता है। 'वीर्य' शब्द बल और प्रभावका तथा 'रूप्य' शब्द परमसुन्दर रूपका वाचक है। 'दुरोदर' शब्द पुँल्लिङ्ग होनेपर जुआ खेलनेवाले पुरुष और जुएमें लगाये जानेवाले दाँवका बोध करानेवाला होता है तथा नपुंसकलिङ्ग होनेपर जुएके अर्थमें आता है। 'कान्तार' शब्द बहुत बड़े जंगल और दुर्गम मार्गका वाचक है तथा पुँल्लिङ्ग और नपुंसक—दोनों लिङ्गोंमें उसका प्रयोग होता है। 'हरि' शब्द यम, वायु, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, विष्णु और सिंह आदि अनेकों अर्थोंका वाचक है। 'दर' शब्द स्त्रीलिङ्गको छोड़कर अन्य दो लिङ्गोंमें प्रयुक्त होता है। उसका अर्थ है—भय और खंदक। 'जठर' शब्द उदर एवं कठिन अर्थका बोधक है। 'उदार' शब्द दाता और महान् पुरुषके अर्थमें आता है। 'इतर' शब्द अन्य और नीचका वाचक है। 'मौलि' शब्दके तीन अर्थ हैं—चूडा, किरीट और बँधे हुए केश। 'बलि' शब्द कर (टैक्स या लगान) तथा उपहार (भेंट आदि)-के अर्थमें प्रयोग आता है। 'बल' शब्द सेना और स्थिरता आदिका बोधक है। 'नीवी' शब्द स्त्रीके कटिवस्त्रके बन्धनरूप अर्थमें तथा परिपण (पूँजी, मूलधन अथवा बंधक रखने)-के अर्थमें आता है। 'वृष' शब्द शुक्रल (अधिक वीर्यवान्), चूहा, श्रेष्ठ पुरुष, पुण्य (धर्म) तथा बैलके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'आकर्ष' शब्द पासा तथा चौसरकी बिछौंतके अर्थमें आता है। 'अक्ष' शब्द नपुंसकलिङ्ग होनेपर इन्द्रियके अर्थमें आता है तथा पुँल्लिङ्ग होनेपर पासा, कर्ष (सोलह मासेका एक माप), गाड़ीके पहिये, व्यवहार (आय-व्ययकी चिन्ता) और बहेड़ेके वृक्षके अर्थमें उपलब्ध होता है। 'उष्णीष' शब्द किरीट आदिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। स्त्रीलिङ्ग 'कर्षू' शब्द कुल्या अर्थात् छोटी नदीका वाचक है। 'अध्यक्ष' शब्द प्रत्यक्ष (द्रष्टा) और अधिकारीके अर्थमें आता है। 'विभावसु' शब्द सूर्य और अग्निका वाचक है। 'रस' शब्द विष, वीर्य, गुण, राग, द्रव तथा शृङ्गार आदि रसोंका बोध करानेवाला

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है। 'वर्चस्' शब्द तेज और पुरीष (मल)-का तथा 'आगस्' शब्द पाप और अपराधका वाचक है। 'छन्दस्' शब्द पद्य और इच्छाके तथा 'साधीयस्' शब्द साधु (उत्तम) और बाढ (निश्चय या हामी भरने)-के अर्थमें आता है। 'व्यूह' शब्द समूहका वाचक है। 'अहि' शब्द वृत्रासुरके अर्थमें भी आता है। तथा 'तमोपह' शब्द अग्नि, चन्द्रमा एवं सूर्यका बोध करानेवाला है॥ ३०-४१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशविषयक नानार्थ-वर्गका वर्णन' नामक तीन सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६२॥


तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय

भूमि, वनौषधि आदि वर्ग

अग्निदेव कहते हैं— अब मैं भूमि, पुर, पर्वत, वनौषधि तथा सिंह आदि वर्गोंका वर्णन करूँगा। भू, अनन्ता, क्ष्मा, धात्री, क्ष्मा, कु तथा धरित्री—ये भूमिके नाम हैं। मृत् और मृत्तिका—ये मिट्टीका बोध करानेवाले हैं। अच्छी मिट्टीको मृत्स्ना और मृत्सा कहते हैं। जगत्, त्रिविष्टप, लोक, भुवन और जगती—ये सब समानार्थ हैं। (अर्थात् ये सभी संसारके पर्यायवाची शब्द हैं।) अयन, वर्त्म (वर्त्मन्), मार्ग, अध्व (अध्वन्), पन्था (पथिन्) पदवी, सृति, सरणि, पद्धति, पद्या, वर्तनी और एकपदी—ये मार्गके वाचक हैं (इनमेंसे पद्या और एकपदी शब्द पगडंडीके अर्थमें आते हैं।) पूः (स्त्रीलिङ्ग 'पुर' शब्द), पुरी, नगरी, पत्तन, पुटभेदन, स्थानीय और निगम—ये सात नगरके नाम हैं। मूल नगर (राजधानी)-से भिन्न जो पुर होता है, उसे शाखानगर कहते हैं। वेश्याओंके निवास स्थानका नाम वेश और वेश्याजनसमाश्रय है। आपण, शब्द निषद्या (बाजार, हाट, दूकान)-के अर्थमें आता है। विपणि और पण्यवीथिका—ये दो बाजारकी गलीके नाम हैं। रथ्या, प्रतोली और विशिखा—ये शब्द गली तथा नगरके मुख्यमार्गका बोध करानेवाले हैं। खाईसे निकालकर जमा किये हुए मिट्टीके ढेरको चय और वप्र कहते हैं। वप्र शब्दका केवल स्त्रीलिङ्गमें प्रयोग नहीं होता। प्राकार, वरण, शाल और प्राचीर—ये नगरके चारों ओर बने हुए घेरे (चहारदिवारी)-के नाम हैं। भित्ति और कुड्य—ये दीवारके वाचक हैं। इनमें 'भित्ति' शब्द स्त्रीलिङ्ग है। एडूक ऐसी दीवारको कहते हैं, जिसके भीतर हड्डी लगायी गयी हो। वास और कुटी पर्यायवाची हैं। इनमें कुटी शब्द स्त्रीलिङ्ग है तथा कुट शब्दके रूपमें इसका पुँल्लिङ्गमें भी प्रयोग है। इसी प्रकार शाला और सभा पर्यायवाची वाचक हैं। चार शालाओंसे युक्त गृहको संजवन कहते हैं। मुनियोंकी कुटीका नाम पर्णशाला और उटज है। उटज शब्दका प्रयोग पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें होता है। चैत्य और आयतन—ये दोनों शब्द समान अर्थ और समान लिङ्गवाले हैं। (ये यज्ञस्थान, वृक्ष तथा मन्दिरके अर्थमें आते हैं।) वाजिशाला और मन्दुरा—ये घोड़ोंके रहनेकी जगहके नाम हैं। साधारण धनियोंके महलके नाम हर्म्य आदि हैं तथा देवताओं और राजाओंके महलको प्रासाद (मन्दिर) कहते हैं। द्वार, द्वार और प्रतीहार—ये दरवाजेके नाम हैं। आँगन आदिमें बैठनेके लिये बने हुए चबूतरेको वितर्दि एवं वेदिका कहते हैं। कबूतरों (तथा अन्य पक्षियों)-के रहनेके लिये बने हुए स्थानको कपोतपालिका और विटङ्क कहते हैं। 'विटङ्क'

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शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसक दोनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होता है। कपाट और अवर-ये दोनों समान लिङ्ग और समान अर्थमें आते हैं। इनका अर्थ है—किंवाड़। निःश्रेणि और अधिरोहणी-ये सीढ़ीके नाम हैं। सम्मार्जनी और शोधनी-ये दोनों शब्द झाडूके अर्थमें आते हैं। संकर तथा अवकर झाड़ूसे फेंकी जानेवाली धूलके नाम हैं। अद्रि, गोत्र, गिरि और ग्रावा-ये पर्वतके तथा गहन, कानन और वन-ये जंगलके बोधक हैं। कृत्रिम (लगाये हुए) वन अर्थात् वृक्ष-समूहको आराम तथा उपवन कहते हैं। यही कृत्रिम वन, जो केवल राजासहित अन्तःपुरकी रानियोंके उपभोगमें आता है, 'प्रमदवन' कहलाता है। वीथी, आलि, आवलि, पङ्क्ति, श्रेणी, लेखा और राजि-ये सभी शब्द पङ्क्ति (कतार)-के अर्थमें आते हैं। जिसमें फूल लगकर फल लगते हों, उस वृक्षका नाम 'वानस्पत्य' होता है तथा जिसमें बिना फूलके ही फल लगते हैं, उस गूलर (आदि) वृक्षको 'वनस्पति' कहते हैं॥ १-१३॥

फलोंके पकनेपर जिनके पेड़ सूख जाते हैं, उन धान-जौ आदि अनाजोंको 'ओषधि' कहा जाता है। पलाश़ी, द्रु, द्रुम और अगम-ये सभी शब्द वृक्षके अर्थमें आते हैं। स्थाणु, ध्रुव तथा शङ्कु-ये तीन ठूंठ वृक्षके नाम हैं। इनमें स्थाणु शब्द वैकल्पिक पुँल्लिङ्ग है। अर्थात् उसका प्रयोग पुँल्लिङ्ग, नपुंसकलिंग-दोनोंमें होता है। प्रफुल्ल, उत्फुल्ल और संस्फुट-ये फूलसे भरे हुए वृक्षके लिये प्रयुक्त होते हैं। पलाश, छदन और पर्ण-ये पत्तेके नाम हैं। इध्म, एधस् और समिध्-ये समिधा (यज्ञकाष्ठ)-के वाचक हैं। इनमें समिध् शब्द स्त्रीलिङ्ग है। बोधिद्रुम और चलदल-ये पीपलके नाम हैं। दधित्थ, ग्राही, मन्मथ, दधिफल, पुष्पफल और दन्तशठ-ये कपित्थ (कैथ) नामक वृक्षका बोध करानेवाले हैं। हेमदुग्ध शब्द उदुम्बर (गूलर)-के और द्विपत्रक शब्द केविदार (कचनार)-के अर्थमें आता है। सप्तपर्ण और विशालत्वक्-ये छितवनके नाम हैं। कृतमाल, सुवर्णक, आरेवत, व्याधिघात, सम्पाक और चतुरङ्गुल-ये सभी शब्द सोनालु अथवा धनबहेड़ाके वाचक हैं। दन्तशठ-शब्द जम्बीर (जमीरी नीबू)-के अर्थमें आता है। तिक्तशाक-शब्द वरुण (या वरण)-का वाचक है। पुंनाग, पुरुष, तुङ्ग, केसर तथा देववल्लभ-ये नागकेसरके नाम हैं। पारिभद्र, निम्बतरु, मन्दार और पारिजात-ये बकायनके नाम हैं। वञ्जुल और चित्रकृत-ये तिनिश-नामक वृक्षके वाचक हैं। पीतन और कपीतन-ये आम्रातक (अमड़ा)-के अर्थमें आते हैं। गुडपुष्प और मधुद्रुम-ये मधूक (महुआ)-के नाम हैं। पीलु अर्थात् देशी अखरोटको गुडफल और स्रंसी कहते हैं। नादेयी और अम्बुवेतस्-ये पानीमें पैदा हुए बेंतके नाम हैं। शिग्रु, तीक्ष्णगन्धक, काक्षीर और मोचक-ये शोभाञ्जन अर्थात् सहिजनके नाम हैं। लाल फूलवाले सहिजनको मधुशिग्रु कहते हैं। अरिष्ट और फेनिल-ये दोनों समान लिङ्गवाले शब्द रीठेके अर्थमें आते हैं। गालव, शाबर, लोध्र, तिरीट, तिल्व और मार्जन-ये लोधके वाचक हैं। शेलु, श्लेष्मातक, शीत, उद्दाल और बहुवारक-ये लसोड़ेके नाम हैं। वैकङ्कत, श्रुवावृक्ष, ग्रन्थिल और व्याघ्रपाल-ये वृक्षविशेषके वाचक हैं। (यह वृक्ष विभिन्न स्थानोंपर टैंटी, कठेर और कंटाई आदि नामोंसे प्रसिद्ध है।) तिन्दुक, स्फूर्जक और काल (या कालस्कन्ध)-ये तेंदू वृक्षके वाचक हैं। नादेयी और भूमिजम्बुक-ये नागरङ्ग अर्थात् नारंगीके नाम हैं। पीलुक शब्द काकतिन्दुक अर्थात् कुचिलाके अर्थमें भी आता है। पाटलि, मोक्ष और मुष्कक-ये मोरवा या

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पाडलके नाम हैं। क्रमुक और पट्टिका—ये पठानी लोधके वाचक हैं। कुम्भी, कैडर्य और कट्फल—ये कायफलका बोध करानेवाले हैं। वीरवृक्ष, अरुष्कर, अग्निमुखी और भल्लातकी—ये शब्द भिलावा नामक वृक्षके वाचक हैं। सर्जक, असन, जीव और पीतसाल—ये विजयसारके नाम हैं। सर्ज और अश्वकर्ण—ये साल वृक्षके वाचक हैं। वीरद्रु (वीर-तरु), इन्द्रद्रु, ककुभ और अर्जुन—ये अर्जुन नामक वृक्षके पर्याय हैं। इङ्गुदी तपस्वियोंका वृक्ष है; इसीलिये इसे तापस-तरु भी कहते हैं। (कहीं-कहीं यह 'इंगुवा' तथा गोंदी वृक्षके नामसे भी प्रसिद्ध है।) मोचा और शाल्मलि—ये सेमलके नाम हैं। चिरबिल्व, नक्तमाल, करञ्ज और करञ्जक—ये 'कंजा' नामक वृक्षके अर्थमें आते हैं। ('करञ्जक' शब्द भृङ्गराज या भंगरइयाका भी वाचक है।) प्रकीर्य और पूतिकरञ्ज—ये कँटीले करञ्जके वाचक हैं। मर्कटी तथा अङ्गार-वल्लरी—ये करञ्जके ही भेद हैं। रोही, रोहितक, प्लीहशत्रु और दाडिमपुष्पक—ये रोहेड़ाके नाम हैं। गायत्री, बालतनय, खदिर और दन्तधावन—ये खैरा नामक वृक्षके वाचक हैं। अरिमेद और विट्खदिर—ये दुर्गन्धित खैराके तथा कदर—यह श्वेत खैराका नाम है। पञ्चाङ्गुल, वर्धमान, चञ्चु और गन्धर्वहस्तक—ये एरण्ड (रेड़)-के अर्थमें आते हैं। पिण्डीतक और मरुवक—ये मदन (मैनफल) नामक वृक्षके बोधक हैं। पीतदारु, दारु, देवदारु और पूतिकाष्ठ—ये देवदारुके नाम हैं। श्यामा, महिलाह्वया, लता, गोवन्दिनी, गुन्दा, प्रियङ्गु, फलिनी और फली—ये प्रियंगु (कँगनी या टाँग़ुन)-के वाचक हैं। मण्डूकपर्ण पत्रोर्ण, नट, कट्वङ्ग, टुण्टुक, श्योनाक, शुकनास, ऋक्ष, दीर्घवृन्त और कुटन्नट—ये शोणक (सोनापाठा)-का बोध करानेवाले हैं। पीतद्रु और सरल—ये सरल वृक्षके नाम हैं। निचुल, अम्बुज और इज्जल (या हिज्जल)—ये स्थलवेतस् अथवा समुद्र-फलके वाचक हैं। काकोदुम्बरिका और फल्गु—ये कटुम्बरी या कठूमरेके बोधक हैं। अरिष्ट, पिचुमर्दक और सर्वतोभद्र—ये निम्ब-वृक्षके वाचक हैं। शिरीष और कपीतन—ये सिरस वृक्षके अर्थमें आते हैं। वकुल और वञ्जुल—ये मौलिश्रीके नाम हैं। (बञ्जुल शब्द अशोक आदिके अर्थमें आता है।) पिच्छिला, अगरु और शिंशपा—ये शीशमके अर्थमें आते हैं। जया, जयन्ती और तर्कारी—ये जैत वृक्षके नाम हैं। कणिका, गणिकारिका, श्रीपर्ण और अग्निमन्थ—ये अरणीके वाचक हैं। (किसीके मतमें जयासे लेकर अग्निमन्थतक सभी शब्द अरणीके ही पर्याय हैं।) वत्सक और गिरिमल्लिका—ये कुटज वृक्षके अर्थमें आते हैं। कालस्कन्ध, तमाल और तापिच्छ—ये तमालके नाम हैं। तण्डुलीय और अल्पमारिष—ये चौंराईके बोधक हैं। सिन्धुवार और निर्गुण्डी—ये सेंदुवारिके नाम हैं। वही सेंदुवारि यदि जंगलमें पैदा हुई हो तो उसे आस्फीता (आस्फोटा या आस्फोटा ) कहते हैं। [किसी-किसीके मतमें वनमल्लिका (वन-वेला)-का नाम आस्फोटा या आस्फीता है।] गणिका, यूथिका और अम्बष्ठा—ये जूहीके अर्थमें आते हैं। ससला और नवमालिका—ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। अतिमुक्त और पुण्ड्रक—ये माधवी लताके नाम हैं। कुमारी, तरणि और सहा—ये घीकुँआरिके वाचक हैं। लाल घीकुँआरिको कुरबक और पीली घीकुँआरिको कुरण्टक कहते हैं। नीलझिण्टी और बाणा—ये दोनों शब्द नीली कटसरैयाके वाचक हैं। इनका पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग—दोनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। झिण्टी और सैरीयक—ये सामान्य कटसरैयाके वाचक हैं। वही लाल हो तो कुरबक और पीली हो तो

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सहचरी कहलाती है। यह शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग—दोनोंमें प्रयुक्त होता है। धूस्तूर (या धत्तूर), कितव और धूर्त—ये धतूरके नाम हैं। रुचक और मातुलुङ्ग—ये बीजपूर या बिजौरा नीबूके वाचक हैं। समीरण, मरुवक, प्रस्थपुष्प और फणिज्जक—ये मरुआ वृक्षके नाम हैं। कुठेरक और पर्णास—ये तुलसी वृक्षके पर्याय हैं। आस्फीत, वसुक और अर्क—ये आक (मदार)-के नाम हैं। शिवमल्ली और पाशुपती—ये अगस्त्य वृक्ष अथवा बृहत् मौलसिरीके वाचक हैं। वृन्दा (वन्दा), वृक्षादनी—जीवन्तिका और वृक्षरुहा—ये पेड़पर पैदा हुई लताके नाम हैं। गुडूची, तन्त्रिका, अमृता, सोमवल्ली और मधुपर्णी—ये गुरुचिके वाचक हैं। मूर्वा, मोरटी, मधूलिका, मधुश्रेणी, गोकर्णी तथा पीलुपर्णी—ये मूर्वा नामवाली लताके नाम हैं। पाठा, अम्बष्ठा, विद्धकर्णी, प्राचीना और वनतिक्तिका—ये पाठा नामसे प्रसिद्ध लताके वाचक हैं। कटु, कटम्भरा, चक्राङ्गी और शकुलादनी—ये कुटकीके नाम हैं। आत्मगुप्ता, प्रावृषायी, कपिकच्छु और मर्कटी—ये केवाँचके वाचक हैं। अपामार्ग, शैखरिक, प्रत्यक्पर्णी तथा मयूरक—ये अपामार्ग (चिचिड़ा)-का बोध करानेवाले हैं। फञ्जिका (या हञ्जिका), ब्राह्मणी और भार्गी—ये ब्रह्मनेटिके वाचक हैं। द्रवन्ती, शम्बरी तथा वृषा—ये आखुपर्णी या मूसाकानीके बोधक हैं। मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, समङ्गा और कालमेषिका—ये मजीठके नाम हैं। रोदनी, कच्छुरा, अनन्ता, समुद्रान्ता और दुरालभा—ये यवासा एवं कचूरके वाचक हैं। पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, कलशि, धावनि और गुहा—ये पिठवनके नाम हैं। निर्दिग्धिका, स्पृशी, व्याघ्री, क्षुद्रा और दुःस्पर्शा—ये भटकटैया (या भजकटया)-के अर्थमें आते हैं। अवल्गुज, सोमराजी, सुवल्लि, सोमवल्लिका, कालमेषी, कृष्णफला, वाकुची और पूतिफली—ये वकुचीके वाचक हैं। कणा, उष्णा और उपकुल्या—ये पिप्पलीके बोधक हैं। श्रेयसी और गजपिप्पली—ये गजपिप्पलीके वाचक हैं। चव्य और चविका—ये चव्य अथवा वचाके नाम हैं। काकचिञ्ची, गुञ्जा और कृष्णला—ये तीन गुञ्जा (घुँघुची)-के अर्थमें आते हैं। विश्वा, विषा और प्रतिविषा—ये 'अतीस'के बोधक हैं। वनशृङ्गाट और गोक्षुर—ये गोखुरूके वाचक हैं। नारायणी और शतमूली—ये शतावरीका बोध करानेवाले हैं। कालेयक, हरिद्रव, दार्वी, पचम्पचा और दारु—ये दारुहल्दीके नाम हैं। जिसकी जड़ सफेद हो, ऐसी वचा (बच)-का नाम हैमवती है। वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी और शतपर्विका—ये बचके अर्थमें आते हैं। आस्फोता और गिरिकर्णी—ये दो शब्द विष्णुक्रान्ता या अपराजिताके नाम हैं। सिंहास्य, वासक और वृष—ये अड़सेके अर्थमें आते हैं। मिशी, मधुरिका और छत्रा—ये वनसौंफके वाचक हैं। कोकिलाक्ष, इक्षुर और क्षुर—ये तालमखानाके नाम हैं। विडंग और कृमिघ्न—ये वायविडंगके वाचक हैं। वज्रद्रु, स्रुक्, स्नुही और सुधा—ये सेहुँड़के अर्थमें आते हैं। मृद्वीका, गोस्तनी और द्राक्षा—ये दाख या मुनक्काके नाम हैं। वला तथा वात्यालक—ये वरियारके वाचक हैं। काला और मसूरविदला—ये श्यामलता या श्यामत्रिधाराके अर्थमें आते हैं। त्रिपुटा, त्रिवृता और त्रिवृत्त—ये शुक्ल त्रिधाराके वाचक हैं। मधुक, क्लीतक, यष्टिमधुका और मधुयष्टिका—ये जेठी मधुके नाम हैं। विदारी, क्षीरशुक्ला, इक्षुगन्धा, क्रोष्ट्री और यासिता—ये भूमिकूष्माण्डके बोधक हैं। गोपी, श्यामा, शारिवा, अनन्ता तथा उत्पल शारिवा—ये श्यामालता अथवा गौरीसरके वाचक हैं। मोचा, रम्भा और कदली—ये केलेके नाम हैं। भण्टाकी और दुष्प्रधर्षिणी—ये भाँटेके अर्थमें

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आते हैं। स्थिरा, ध्रुवा और सालपर्णी-ये सरिवनके नाम हैं। शृङ्गी, ऋषभ और वृष-ये काकड़ासिंगीके वाचक हैं। (यह अष्टवर्गकी प्रसिद्ध ओषधि है) गाङ्गेरुकी और नागबला-ये बलाके भेद हैं। इन्हें हिंदीमें गुलसकरी और गंगेरन भी कहते हैं। मुषली और तालमूलिका-ये मूसलीके नाम हैं। ज्योत्स्नी, पटोलिका और जाली-ये तरोईके अर्थमें आते हैं। अजशृङ्गी और विषाणी-ये 'मेडासिंगी' के वाचक हैं। लाङ्गलिकी और अग्निशिखा-ये करियारीका बोध करानेवाले हैं। ताम्बूली तथा नागवल्ली-ये ताम्बूल या पानके नाम हैं। हरेणु, रेणिका और कौन्ती-ये रेणुका नामक गन्धद्रव्यके वाचक हैं। हीबेरी और दिव्यनागर-ये नेत्रबाला और सुगन्धबालाके नाम हैं। कालानुसार्य, वृद्ध, अश्मपुष्प, शीतशिव और शैलेय-ये शिलाजीतके वाचक हैं। तालपर्णी, दैत्या, गन्ध, कुटी और मुरा-ये मुरा नामक सुगन्धित द्रव्यका बोध करानेवाले हैं। ग्रन्थिपर्ण, शुक और बर्हि (या बर्ह) - ये गठिवनके अर्थमें आते हैं। बला, त्रिपुटा और त्रुटि-ये छोटी इलायचीके वाचक हैं। शिवा और तामलकी- ये भुईं आमलाके अर्थमें आते हैं। हनु और हृद्विलासिनी-ये नखी नामक गन्धद्रव्यके बोधक हैं। कुटन्नट, दाशपुर, वानेय और परिपेलव-ये मोथाके नाम हैं। तपस्विनी तथा जटामांसी-ये जटामाँसीके अर्थमें आते हैं। पृक्का (या स्पृक्का), देवी, लता और लघु या (लशू) -ये 'असवर्ग'के वाचक हैं। कर्पूरक और द्राविड़क-ये कर्पूरके नाम हैं। गन्धमूली और शठी शब्द भी कचूरके ही अर्थमें आते हैं। ऋक्षगन्धा, छगलान्त्रा, आवेगी तथा वृद्धदारक-ये विधाराके नाम हैं। तुण्डिकेरी, रक्तफला, बिम्बिका और पीलुपर्णी-ये कन्दूरीके वाचक हैं। चाङ्गेरी, चुक्रिका और अम्बष्ठा-ये अम्ललोड़िका (अम्लिलोना)-के बोधक हैं। स्वर्णक्षीरी और हिमावती-ये मकोयके नाम हैं। सहस्रवेधी, चुक्र, अम्लवेतस और शतवेधी-ये अम्लबेंतके अर्थमें आते हैं। जीवन्ती, जीवनी और जीवा-ये जीवन्तीके नाम हैं। भूमिनिम्ब और किरातक-ये चिरात्तिक्त या चिरायताके वाचक हैं। कूर्चशीर्ष और मधुरक-ये अष्टवर्गान्तक 'जीवक' नामक ओषधिके बोधक हैं। चन्द्र और कपिवृक्क-ये समानार्थक शब्द हैं। (चन्द्रशब्द कर्पूर और काम्पिल्य आदि अर्थोंमें आता है।) दद्रुघ्न और एडगज-ये चकवड़ नामक वृक्षके वाचक हैं। वर्षाभू और शोथहारिणी-ये गदहपुर्नाके अर्थमें आते हैं। कुनन्दती, निकुम्भस्त्रा, यमानी और वार्षिका-ये लताविशेषके वाचक हैं। लशुन, गृञ्जन, अरिष्ट, महाकंद और रसोन-ये लहसुनके नाम हैं। वाराही, वरदा (या वदरा) तथा गृष्टि- ये वराहीकंदके वाचक हैं। काकमाची और वायसी-ये समानार्थ शब्द हैं। शतपुष्पा, सितच्छत्रा, अतिच्छत्रा, मधुरामिसि, अवाकपुष्पी और कारवी- ये सौंफके नाम हैं। सरणा, प्रसारिणी, कटम्भरा और भद्रवला-ये कुब्जप्रसारिणी नामक ओषधिके वाचक हैं। कर्वूर और शटी-ये भी कचूरके अर्थमें आते हैं। पटोल, कुलक, तिक्तक और पटु-ये परवलके नाम हैं। कारवेल्ल और कटिल्लक-ये करैलाके अर्थमें आते हैं। कूष्माण्डक और कर्कारु-ये कोंहड़ाके वाचक हैं। उर्वारु और कर्कटी-ये दोनों स्त्रीलिङ्ग शब्द ककड़ीके वाचक हैं। इक्ष्वाकु तथा कटुतुम्बी-ये कड़वी लौकीके बोधक हैं। विशाला और इन्द्रवारुणी- ये इन्द्रायन (तूँबी) नामक लताके नाम हैं। अर्शोघ्न, सूरण और कंद-ये सूरन या ओलके वाचक हैं। मुस्तक और कुरुविन्द-ये दोनों शब्द भी मोथाके अर्थमें आते हैं। त्वक्सार,

  • अध्याय ३६४ * ७९९

कर्मार, वेणु, मस्कर और तेजन—ये वंश (बाँस)-के वाचक हैं। छत्रा, अतिच्छत्र और पालघ्न—ये पानीमें पैदा होनेवाले तृणविशेषके बोधक हैं। मालातृणक और भूस्तृण—ये भी तृणविशेषके ही नाम हैं। ताड़के वृक्षका नाम ताल और तृणराज है। घोण्टा, क्रमुक तथा पूग—ये सुपारीके अर्थमें आते हैं॥ १४—७०$\frac{१}{२}$॥

शार्दूल और द्वीषी—ये व्याघ्र (बाघ)-के वाचक हैं। हर्यक्ष, केशरी (केसरी) तथा हरि—ये सिंहके नाम हैं। कोल, पोत्री और वराह—ये सूअरके तथा कोफ, ईहामृग और वृक भेड़ियेके अर्थमें आते हैं। लूता, ऊर्णनाभि, तन्तुवाय और मर्कट—ये मकड़ीके नाम हैं। वृश्चिक और शूककीट बिच्छूके वाचक हैं। ('शूककीट' शब्द ऊन आदि चाटनेवाले कीड़ेके अर्थमें भी आता है।) सारङ्ग और स्तोक—ये समान लिङ्गमें प्रयुक्त होनेवाले शब्द पपीहाके वाचक हैं। कृकवाकु तथा ताम्रचूड—ये कुक्कुट (मुर्ग)-के नाम हैं। पिक और कोकिल—ये कोयलके बोधक हैं। करट और अरिष्ट—काक (कौए)-के अर्थमें आते हैं। वक और कङ्क—बगुलेके नाम हैं। कोक, चक्र और चक्रवाक—ये चकवाके तथा कादम्ब और कलहंस—ये मधुरभाषी हंस या बत्तकके वाचक हैं। पतङ्गिका और पुत्तिका—ये मधुका छाता लगानेवाली छोटी मक्खियोंके नाम हैं और सरधा तथा मधुमक्षिका—ये बड़ी मधुमक्खीके अर्थमें आते हैं। (इसीको सरँगवा माछी भी कहते हैं।) द्विरेफ, पुष्पालिह्, भृङ्ग, षट्पद, भ्रमर और अलि—ये भ्रमर (भौंरे)-के नाम हैं। केकी तथा शिखी—मोरके नाम हैं। मोरकी वाणीको 'केका' कहते हैं। शकुन्ति, शकुनि और द्विज—ये पक्षीके पर्याय हैं। स्त्रीलिङ्ग पक्षति-शब्द और पक्षमूल—ये पंखके वाचक हैं। चञ्चु और तोटि—ये चोंचके अर्थमें आते हैं। इन दोनोंका स्त्रीलिङ्गमें ही प्रयोग होता है। उड्डीन और संडीन—ये पक्षियोंके उड़नेके विभिन्न प्रकारोंके नाम हैं। कुलाय और नीड शब्द घोंसलेके अर्थमें आते हैं। पेषी (या पेशी), कोष और अण्ड—ये अण्डेके नाम हैं। इनमें प्रथम दो शब्द केवल पुंल्लिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं। पृथुक, शावक, शिशु, पोत, पाक, अर्भक और डिम्भ—ये शिशुमात्रके बोधक हैं। संदोह, व्यूहक और गण, स्तोम, ओघ, निकर, व्रात, निकुरम्ब, कदम्बक, संघात, संचय, वृन्द, पुञ्ज, राशि और कूट—ये सभी शब्द 'समूह' अर्थके वाचक हैं॥ ७१—७८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशविषयक भूमि, वनौषधि आदि वर्गका वर्णन' नामक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६३॥


तीन सौ चौंसठवाँ अध्याय

मनुष्य-वर्ग

अग्निदेव कहते हैं—अब मैं नाम-निर्देशपूर्वक मनुष्यवर्ग, ब्राह्मण-वर्ग, क्षत्रिय-वर्ग, वैश्य-वर्ग और शूद्रवर्गका क्रमशः वर्णन करूँगा। ना, नर, पञ्चजन और मर्त्य—ये मनुष्य एवं पुरुषके वाचक हैं। स्त्रीको योषित्, योषा, अबला और वधू कहते हैं। जो अपने अभीष्ट कामी पुरुषके साथ समागमकी इच्छासे किसी नियत संकेत-स्थानपर जाती है, उसे अभिसारिका कहते हैं।

८०० * अग्निपुराण *


कुलटा, पुंश्चली और असती—ये व्यभिचारिणी स्त्रीके नाम हैं। नग्निका और कोटवी शब्द नंगी स्त्रीका बोध करानेवाले हैं। (रजोधर्म होनेके पूर्व अवस्थावाली कन्याको भी ‘नग्निका’ कहते हैं।) अर्धवृद्धा (अधबुढ़) स्त्रीको (जो गेरुवाँ वस्त्र धारण करनेवाली और पति-विहीना हो) कात्यायनी कहते हैं। दूसरेके घरमें रहकर (स्वाधीन वृत्तिसे केश-प्रसाधन आदि कलाके द्वारा) जीवन-निर्वाह करनेवाली स्त्रीका नाम सैरन्ध्री है। अन्तःपुरकी वह दासी, जो अभी बूढ़ी न हुई हो—जिसके सिरके बाल सफेद न हुए हों, असिक्नी कहलाती है। रजस्वला स्त्रीको मलिनी कहते हैं। वारस्त्री, गणिका और वेश्या—ये रंडियोंके नाम हैं। भाइयोंकी स्त्रियाँ परस्पर याता कहलाती हैं। पतिकी बहनको ननान्दा कहते हैं। सात पीढ़ीके अंदरके मनुष्य सपिण्ड और सनाभि कहे जाते हैं। समानोदर्य, सोदर्य, सगर्भ और सहज—ये समानार्थक शब्द सगे भाईका बोध करानेवाले हैं। सगोत्र, बान्धव, ज्ञाति, बन्धु, स्व तथा स्वजन—ये भी समान अर्थके बोधक हैं। दम्पती, जम्पती, भार्यापती, जायापती—ये पति-पत्नीके वाचक हैं। गर्भाशय, जरायु, उल्व और कलल—ये चार शब्द गर्भको लपेटनेवाली झिल्लीके नाम हैं। कलल-शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें आता है। (यह शुक्र और शोणितके संयोगसे बने हुए गर्भाशयके मांस-पिण्डका भी वाचक है।) गर्भ और भ्रूण—ये दोनों शब्द गर्भस्थ बालकके लिये प्रयुक्त होते हैं। क्लीब, षण्ड (षण्ढ) और नपुंसक—ये पर्यायवाची शब्द हैं। डिम्भ-शब्द उत्तान सोनेवाले नवजात शिशुओंके अर्थमें आता है। बालकको माणवक कहते हैं। लंबे पेटवाले पुरुषके अर्थमें पिचण्डिल और बृहत्कुक्षि शब्दोंका प्रयोग होता है। जिसकी नाक कुछ झुकी हुई हो, उसको अवभ्रट कहते हैं। जिसका कोई अङ्ग कम या विकृत हो वह विकलाङ्ग और पोगण्ड कहलाता है। आरोग्य और अनामय—ये नीरोगताके वाचक हैं। बहरेको एड और वधिर तथा कुबड़ेको कुब्ज और गड़ुल कहते हैं। रोग आदिके कारण जिसका हाथ खराब हो जाय, उसको तथा लूले मनुष्यको कुनि (या कुणि) कहा जाता है। क्षय, शोष और यक्ष्मा—ये राजयक्ष्मा (थाइसिस, टीबी या तपेदिक)-के नाम हैं। प्रतिश्याय और पीनस—ये जुकामके अर्थमें आते हैं। स्त्रीलिङ्ग-क्षुत्, पुँल्लिङ्ग-क्षव और नपुंसक-क्षुत शब्द छींकके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। कास और क्षवथु—ये खाँसीके नाम हैं। इनका प्रयोग पुँल्लिङ्गमें होता है। शोथ, श्वयथु और शोफ—ये सूजनके अर्थमें आते हैं। पादस्फोट और विपादिका—ये बिवाईके नाम हैं। किलास और सिध्म—सेहुएँको कहते हैं। कच्छू, पाम, पामा और विचर्चिका—ये खुजलीके वाचक हैं। कोठ और मण्डलकम उस कोढ़को कहते हैं, जिसमें गोलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं। सफेद कोढ़को कुष्ठ और श्वित्र कहते हैं। दुर्नामक और अर्शस्—ये बवासीरके नाम हैं। मल-मूत्रके निरोधको अनाह और विबन्ध कहते हैं। ग्रहणी और प्रवाहिका—ये संग्रहणी रोगके नाम हैं। बीज, वीर्य, इन्द्रिय और शुक्र—ये वीर्यके पर्याय हैं। पलल, क्रव्य और आमिष—ये मांसके अर्थमें आते हैं। बुक्का और अग्रमांस—ये छातीके मांस (हृत्पिण्ड)-का बोध करानेवाले हैं। (‘बुक्का’ शब्द केवल हृदयका भी वाचक है।) हृदय और हृत्—ये मनके पर्याय हैं। मेदस्, वपा और वसा—ये मेदाके नाम हैं। गलेके पीछेकी नाड़ीको मन्या कहते हैं। नाडी, धमनि और शिरा—ये नाड़ीके वाचक हैं। तिलक और क्लोम—ये शरीरमें रहनेवाले काले तिलके अर्थमें आते हैं।

  • अध्याय ३६४ * ८०१

मस्तिष्क दिमागको और दूषिका आँखोंकी कीचड़को कहते हैं। अन्त्र और पुरीतत्—ये आँतके अर्थमें आते हैं। गुल्म और प्लीहा—बरवट (तिल्ली)—को कहते हैं। प्लीहा 'प्लीहन्' शब्दका पुँल्लिङ्गरूप है। अङ्ग-प्रत्यङ्गकी संधियोंके बन्धनको स्नायु और वस्रसा कहते हैं। कालखण्ड और यकृत्—जिगर या कलेजेके नाम हैं। कर्पर और कपाल शब्द ललाटके वाचक हैं। 'कपाल' शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें आता है। कीकस, कुल्य और अस्थि—ये हड्डीके नाम हैं। रक्त-मांससे रहित शरीरकी हड्डीको कङ्काल कहते हैं। पीठकी हड्डी (मेरुदण्ड)—का नाम कशेरुका है। 'करोटि' शब्द स्त्रीलिङ्ग है और यह मस्तककी हड्डी (खोपड़ी)—के अर्थमें आता है। पँसलीकी हड्डीको पर्शुका कहते हैं। अङ्ग, प्रतीक, अवयव, शरीर, वर्ष्म तथा विग्रह—ये शरीरके पर्याय हैं। कट और श्रोणिफलक—ये चूतड़के अर्थमें आते हैं। 'कट' शब्द पुँल्लिङ्ग है। कटि, श्रोणि और ककुद्मती—ये कमरका बोध करानेवाले हैं। (किन्हीं-किन्हींके मतमें उपर्युक्त पाँचों ही शब्द पर्यायवाची हैं।) स्त्रीकी कमरके पिछले भागको नितम्ब और अगले भागको जघन कहते हैं। 'जघन' शब्द नपुंसकलिङ्ग है। नितम्बके ऊपर जो दो गड्ढे-से होते हैं, उन्हें कूपक एवं ककुन्दर कहते हैं। 'ककुन्दर' शब्द केवल नपुंसकलिङ्ग है। कटिके मांस-पिण्डका नाम स्फिच् और कटिप्रोथ है। 'स्फिच्' शब्दका प्रयोग स्त्रीलिङ्गमें होता है। नीचे बताये जानेवाले भग और लिङ्ग—दोनोंको उपस्थ कहा जाता है। भग और योनि—ये स्त्री-चिह्नके बोधक पर्यायवाची शब्द हैं। शिश्न, मेढ्र, मेहन और शेफस्—ये पुरुषचिह्न (लिङ्ग)—के वाचक हैं। पिचण्ड, कुक्षि, जठर, उदर और तुन्द—ये पेटके अर्थमें आते हैं। कुच और स्तन पर्यायवाची शब्द हैं। कुचोंके अग्रभागका नाम चूचुक है। नपुंसकलिङ्ग क्रोड तथा भुजान्तर शब्द गोदीके वाचक हैं। स्कन्ध, भुजशिरस् और अंस—ये कंधेके अर्थमें आते हैं। 'अंस' शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग है। कंधेकी संधियों अर्थात् हँसलीकी हड्डीको जत्रु कहते हैं। पुनर्भव, कररुह, नख और नखर—ये नखोंके नाम हैं। इनमें 'नखर' और 'नख' शब्द स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य दो लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। अँगूठेसे लेकर तर्जनीतक फैलाये हुए हाथको प्रादेश, अँगूठेसे मध्यमातकको ताल और अनामिकातक फैलाये हुए हाथको गोकर्ण कहते हैं। इसी प्रकार अँगूठेसे कनिष्ठिका अँगुलीतक फैले हुए हाथका नाम वितस्ति (बालिस्त या बित्ता) है। इसकी लंबाई बारह अंगुलकी होती है। जब हाथकी सभी अँगुलियाँ फैली हों, तब उसे चपेट, तल और प्रहस्त कहते हैं। मुट्ठी बँधे हुए हाथका नाम रत्नि है। (कोहनीसे लेकर मुट्ठी बँधे हुए हाथतकके मापको भी 'रत्नि' कहते हैं।) कोहनीसे कनिष्ठा अँगुलीतककी लंबाईका नाम अरत्नि है। शङ्खके समान आकारवाली ग्रीवाका नाम कम्बुग्रीवा और त्रिरेखा है। गलेकी घाँटीको अवटु, घाटा और कृकाटिका कहते हैं। ओठसे नीचेके हिस्सेका नाम चिबुक है। गण्ड और गल्ल गालके वाचक हैं। गालोंके निचले भागको हनु कहते हैं। नेत्रोंके दोनों प्रान्तोंको अपाङ्ग कहा जाता है। उन्हें दिखानेकी चेष्टाको कटाक्ष कहा जाता है। चिकुर, कुन्तल और वाल—ये केशके वाचक हैं। प्रतिकर्म और प्रसाधन शब्द सँवारने और शृङ्गार करनेके अर्थमें आते हैं। आकल्प, वेश और नेपथ्य—ये शब्द प्रत्यक्ष नाटक आदिके खेलमें भिन्न-भिन्न वेष धारण करनेके अर्थमें आते हैं। मस्तकपर धारण किये जानेवाले रत्नका नाम चूडामणि और शिरोरत्न है। हारके बीच-बीचमें पिरोये हुए रत्नको तरल कहते हैं।

८०२ * अग्निपुराण *


कर्णिका और तालपत्र—ये कानके आभूषणके नाम हैं। लम्बन और ललन्तिका गलेमें नीचेतक लटकनेवाले हारको कहते हैं। मञ्जीर और नूपुर—ये पैरके आभूषण हैं। किङ्किणी और क्षुद्रघण्टिका घुँघुरूके नाम हैं। दैर्घ्य, आयाम और आनाह—ये वस्त्र आदिकी लंबाईके बोधक हैं। परिणाह और विशालता—ये चौड़ाई (पनहा या अर्ज) के अर्थमें आते हैं। पुराने वस्त्रको पटच्चर कहते हैं। संख्यान और उत्तरीय—ये चादर या दुपट्टेके अर्थमें आते हैं। फूल आदिसे बालोंका शृङ्गार करने या कपोल आदिपर पत्रभङ्ग आदि बनानेको रचना और परिस्पन्द कहते हैं। प्रत्येक उपचारकी पूर्णताका नाम आभोग है। ढक्कनदार पेटीको समुद्गक और सम्पुटक कहते हैं। प्रतिग्राह और पतद्ग्रह—ये पीकदानके नाम हैं॥ १—२९ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशगत मनुष्य-वर्गका वर्णन' नामक तीन सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६४ ॥


तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय

ब्रह्म-वर्ग

अग्निदेव कहते हैं—वंश, अन्ववाय, गोत्र, कुल, अभिजन और अन्वय—ये वंशके नाम हैं। मन्त्रकी व्याख्या करनेवाले ब्राह्मणको आचार्य कहते हैं। जिसने यज्ञमें व्रतकी दीक्षा ग्रहण की हो, वह आदेष्टा, यष्टा और यजमान कहलाता है। समझ-बूझकर आरम्भ करनेका नाम उपक्रम है। एक गुरुके यहाँ साथ-साथ विद्या पढ़नेवाले छात्र परस्पर सतीर्थ्य और एकगुरु कहलाते हैं। सभ्य, सामाजिक, सभासद और सभास्तार—ये यज्ञके सदस्योंके नाम हैं। ऋत्विक् और याजक—ये यज्ञ करानेवाले ऋत्विजोंके वाचक हैं। यजुर्वेदके ज्ञाता ऋत्विज्को अध्वर्यु, सामवेदके जाननेवालेको उद्गाता और ऋग्वेदके ज्ञाताको होता कहते हैं। चषाल और यूपकटक—ये यज्ञीय स्तम्भपर लगाये जानेवाले काठके छल्लेके नाम हैं। स्थण्डिल और चत्वर—ये दोनों शब्द समान लिङ्ग और समान अर्थके बोधक हैं। खौलाये हुए दूधमें दही मिला देनेसे जो हवनके योग्य वस्तु तैयार होती है, उसे आमिक्षा कहते हैं। दही मिलाये हुए घीका नाम पृषदाज्य है। परमान्न और पायस—ये खीरके वाचक हैं। जो पशु यज्ञमें अभिमन्त्रित करके मारा गया हो, उसको उपाकृत कहते हैं। परम्पराक, शमन और प्रोक्षण—ये शब्द यज्ञीय पशुका वध करनेके अर्थमें आते हैं। पूजा, नमस्या, अपचिति, सपर्य्या, अर्चा और अर्हणा—ये समानार्थक शब्द हैं। वरिवस्या, शुश्रूषा, परिचर्या और उपासना—ये सेवाके नाम हैं। नियम और व्रत—ये एक-दूसरेके पर्यायवाची शब्द हैं। इनमें 'व्रत' शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिंग—दोनोंमें प्रयुक्त होता है। उपवास आदिके रूपमें किये जानेवाले व्रतका नाम पुण्यक है। जिसका प्रथम या प्रधानरूपसे विधान किया गया हो, उसे 'मुख्यकल्प' कहते हैं और उसकी अपेक्षा अधम या अप्रधानरूपसे जिसकी विधि हो, उसका नाम अनुकल्प है। कल्पके अर्थमें विधि और क्रम—इन शब्दोंका प्रयोग समझना चाहिये। वस्तुका पृथक्-पृथक् ज्ञान (अथवा जड़-चेतन या द्रष्टा-दृश्यके पार्थक्यका निश्चय) विवेक कहलाता है। (श्रावणीपूर्णिमा आदिके दिन)

* अध्याय ३६६ * ८०३


संस्कारपूर्वक वेदका स्वाध्याय आरम्भ करना उपकरण या उपाकर्म कहलाता है। भिक्षु, परिव्राट्, कर्मन्दी, पाराशरी तथा मस्करी—संन्यासीके पर्यायवाची शब्द हैं। जिनकी वाणी सदा सत्य होती है, वे ऋषि और सत्यवचा कहलाते हैं। जिसने वेदाध्ययन और ब्रह्मचर्यके व्रतको विधिवत् समाप्त कर लिया है, किंतु अभी दूसरे आश्रमको स्वीकार नहीं किया है, उसको स्नातक कहते हैं। जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है, वे ‘यती’ और ‘यति’ कहलाते हैं। शरीर-साध्य नित्यकर्मका नाम यम है तथा जो कर्म अनित्य एवं कभी-कभी आवश्यकतानुसार किये जानेयोग्य होता है, वह (जप, उपवास आदि) नियम कहलाता है। ब्रह्मभूय, ब्रह्मत्व और ब्रह्मसायुज्य—ये ब्रह्मभावकी प्राप्तिके नाम हैं॥ १–११॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘कोशगत ब्रह्मवर्गका वर्णन’ नामक तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६५ ॥


तीन सौ छाछठवाँ अध्याय

क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्ग

अग्निदेव कहते हैं—मूर्धाभिषिक्त, राजन्य बाहुज, क्षत्रिय और विराट्—ये क्षत्रियके वाचक हैं। जिस राजाके सामने सभी सामन्त-नरेश मस्तक झुकाते हैं, उसे अधीश्वर कहते हैं। जिसका समुद्रपर्यन्त समूची भूमिपर अधिकार हो, उस सम्राट्का नाम चक्रवर्ती और सार्वभौम है तथा दूसरे राजाओंको (जो छोटे-छोटे मण्डलोंके शासक हैं, उन्हें) मण्डलेश्वर कहते हैं। मन्त्रीके तीन नाम हैं—मन्त्री, धीसचिव और अमात्य। महामात्र और प्रधान—ये सामान्य मन्त्रियोंके वाचक हैं। व्यवहारके द्रष्टा अर्थात् मामले-मुकदमेमें फैसला देनेवालेको प्राड्विवाक और अक्षदर्शक कहते हैं। सुवर्णकी रक्षा जिसके अधिकारमें हो वह भौरिक और कनकाध्यक्ष कहलाता है। अध्यक्ष और अधिकृत—ये अधिकारीके वाचक हैं। इन दोनोंका समान लिङ्ग है। जिसे अन्तःपुरकी रक्षाका अधिकार सौंपा गया हो, उसका नाम अन्तर्वशिक¹ है। सौविदल, कञ्चुकी, स्थापत्य और सौविद—ये रनिवासकी रक्षामें नियुक्त सिपाहियोंके नाम हैं। अन्तःपुरमें रहनेवाले नपुंसकोंको षण्ढ और वर्षवर कहते हैं। सेवक, अर्थी और अनुजीवी—ये सेवा करनेवालेके अर्थमें आते हैं। अपने राज्यकी सीमापर रहनेवाला राजा शत्रु होता है और शत्रुकी राज्य-सीमापर रहनेवाला नरेश अपना मित्र होता है। शत्रु और मित्र दोनोंकी राज्यसीमाओंके बाद जिसका राज्य हो, वह (न शत्रु, न मित्र) उदासीन² होता है। विजिगीषु राजाके पृष्ठभागमें रहनेवाले राजाको पाणिग्राह कहते हैं। चर, स्पश और प्रणिधि—ये गुप्तचरके नाम हैं। भविष्यकालको आयति कहते हैं। तत्काल और तदात्व—ये वर्तमान कालके वाचक हैं। भावी कर्मफलको उदर्क कहते हैं। आग लगने या पानीकी बाढ़ आदिके कारण होनेवाले


१. ‘अन्तर्वशिक’के स्थानमें ‘अन्तर्वेष्मिक’ नाम भी प्रयुक्त होता है।
२. रामोक्त नीतिके उपदेशानुसार विजिगीषुके सम्मुखवर्ती पाँच राज्य क्रमशः शत्रु, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र तथा अरिमित्र-मित्र होते हैं; आगे भी ऐसा ही क्रम है। दोनों पार्श्वगत राज्योंमें क्रमशः मध्यम तथा उदासीन होते हैं।

८०४ * अग्निपुराण *

भयको अदृष्टभय कहते हैं। अपने या शत्रुके राज्यमें रहनेवाले सैनिकों या चोरों आदिके कारण जो संकट उपस्थित होता है, उसका नाम दृष्टभय है। भरे हुए घड़ेको भद्रकुम्भ और पूर्णकुम्भ कहते हैं। सोनेके गडुए या झारीका नाम भृङ्गार और कनकालुका है। मतवाले हाथीको प्रभिन्न, गर्जित और मत्त कहते हैं। हाथीकी सूँड़से निकलनेवाले जलकणको वमथु और करशीकर कहते हैं। सृणि और अङ्कुश—ये दो हाथीको हाँकनेके काममें लाये जानेवाले लोहेके काँटेका बोध कराते हैं। इनमें सृणि तो स्त्रीलिङ्ग और अङ्कुश पुँल्लिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग है। परिस्तोम और कुथ हाथीकी गद्दी और झूलके वाचक हैं। स्त्रियोंके बैठनेयोग्य पर्देवाली गाड़ीको कर्णीरथ और प्रवहण कहते हैं। दोला और प्रेङ्खा—ये झूला अथवा डोलीके नाम हैं। इनका स्त्रीलिङ्गमें प्रयोग होता है। आधोरण, हस्तिपक, हस्त्यारोह और निषादी—ये हाथीवानके अर्थमें आते हैं। लड़नेवाले सिपाहियोंको भट और योद्धा कहते हैं। कञ्चुक और वारण—ये कवच (बख्तर)-के नाम हैं। इनका प्रयोग स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य लिङ्गोंमें होता है। शीर्षण्य और शिरस्त्र—ये सिरपर रखे जानेवाले टोपके नाम हैं। तनुत्र, वर्म और दंशन—ये भी कवचके अर्थमें आते हैं। आमुक्त, प्रतिमुक्त, पिनद्ध और अपिनद्ध—ये पहने हुए कवचके वाचक हैं। सेनाकी मोर्चाबंदीका नाम व्यूह और बल-विन्यास है। चक्र और अनीक—ये नपुंसकलिङ्ग शब्द सेनाके वाचक हैं। जिस सेनामें एक हाथी, एक रथ, तीन घोड़े और पाँच पैदल हों, उसे पत्ति कहते हैं। पत्तिके समस्त अङ्गोंको लगातार सात बार तीन गुना करते जायें तो उत्तरोत्तर उसके ये नाम होंगे—सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी। हाथी आदि सभी अङ्गोंसे युक्त दस अनीकिनी सेनाको अक्षौहिणी* कहते हैं। धनुष, कोदण्ड और इष्वास—ये धनुषके नाम हैं। धनुषके दोनों कोणोंको कोटि और अटनी कहते हैं। उसके मध्य भागका नाम नस्तक (या लस्तक) है। प्रत्यञ्चाको मौर्वी, ज्या, शिञ्जिनी और गुण कहते हैं। पृषत्क, बाण, विशिख, अजिह्मग, खग और आशुग—ये वाचक पर्याय शब्द हैं॥ १-१६॥

तूण, उपासङ्ग, तूणीर, निषङ्ग और इषुधि—ये तरकसके नाम हैं। इनमें इषुधि शब्द पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों लिङ्गोंमें आता है। असि, ऋष्टि, निस्त्रिंश, करवाल और कृपाण—ये तलवारके वाचक हैं। तलवारकी मुष्टिको सरु कहते हैं। ईली और करपालिका (करवालिका)—ये गुप्तीके नाम हैं। कुठार और सुधिति (या स्वधिति)—ये कुल्हाड़ीके अर्थमें आते हैं। इनमें कुठार शब्दका प्रयोग पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें होता है। छुरीको क्षुरिका और असिपुत्रिका कहते हैं। प्रास और कुन्त भालेके नाम हैं। सर्वला और तोमर गँड़ासेके अर्थमें आते हैं। तोमर शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें प्रयुक्त होता है। (यह बाण-विशेषका भी बोधक है)। जो प्रातःकाल मङ्गल-गान करके राजाको जगाते हैं, उन्हें वैतालिक और बोधकर कहते हैं। स्तुति


* सेनामुख आदि विभागोंमें हाथी, रथ आदिकी संख्या जाननेके लिये यह नक्शा दिया जा रहा है—

सेनापत्तिसेनामुखगुल्मगणवाहिनीपृतनाचमूअनीकिनीअक्षौहिणी
हाथी और रथ२७८१२४३७२९२१८७२१८७०
घोड़े२७८१२४३७२९२१८७
पैदल१५४५१३५४०५१२१५३६४५१०९३५०
  • अध्याय ३६६ * ८०५

करनेवालोंका नाम मागध और वन्दी है। जो शपथ लेकर संग्रामसे पीछे पैर नहीं हटाते, उन योद्धाओंको संशप्तक कहते हैं। पताका और वैजयन्ती—ये पताकाके नाम हैं। केतन और ध्वज—ये ध्वजाके वाचक हैं और इनका प्रयोग नपुंसकलिङ्ग तथा पुँल्लिङ्गमें भी होता है। 'मैं पहले' 'मैं पहले' ऐसा कहते हुए जो योद्धाओंकी युद्ध आदिमें प्रवृत्ति होती है, उसे अहम्पूविका कहते हैं। इसका प्रयोग स्त्रीलिङ्गमें होता है। 'मैं समर्थ हूँ' ऐसा कहकर जो परस्पर अहंकार प्रकट किया जाता है, उसका नाम अहमहमिका है। शक्ति, पराक्रम, प्राण, शौर्य, स्थान (स्थामन्) सहस् और बल—ये सभी शब्द बलके वाचक हैं। मूर्च्छाके तीन नाम हैं—मूर्च्छा, कश्मल और मोह। विपक्षीको अच्छी तरह रगड़ने या कष्ट पहुँचानेको अवमर्द तथा पीडन कहते हैं। शत्रुको धर दबानेका नाम अभ्यवस्कन्दन तथा अभ्यासादन है। जीतको विजय और जय कहते हैं। निर्वासन, संज्ञपन, मारण और प्रतिघातन—ये मारनेके नाम हैं। पञ्चता और कालधर्म—ये मृत्युके अर्थमें आते हैं। दिष्टान्त, प्रलय और अत्यय—इनका भी वही अर्थ है॥ १७-२२$\frac{१}{२}$॥

विश्, भूमिस्पृश् और वैश्य—ये शब्द वैश्यजातिका बोध करानेवाले हैं। वृत्ति, वर्तन और जीवन—ये जीविकाके वाचक हैं। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य—ये वैश्यकी जीविका-वृत्तियाँ हैं। ब्याज (सूद)-से चलायी जानेवाली जीविकाका नाम कुसीद-वृत्ति है। ब्याजके लिये धन देनेको उद्धार और अर्थप्रयोग कहते हैं। अनाजकी बालका नाम 'कणिश' है। जौ आदिके तीखे अग्रभागको किशारु तथा सस्यशूक कहते हैं। तृण आदिके गुच्छका नाम स्तम्ब है। धान्य, व्रीहि और स्तम्बकरि—ये अनाजके वाचक हैं। अनाजके डंठलोंसे होनेवाले भूसेको कडंगर और बुष कहते हैं। शमीधान्य अर्थात् फली या छीमीसे निकलनेवाले अनाजके अंदर उड़द, चना और मटर आदिकी गणना है तथा शूकधान्यमें जौ आदिकी गिनती है। तृणधान्य अर्थात् तीनाको नीवार कहते हैं। सूपका नाम है—शूर्प और प्रस्फोटन। सन या वस्त्रके बने हुए झोले अथवा थैलेको स्यूत और प्रसेव कहते हैं। कण्डोल और पिट टोकरीके तथा कट और किलिञ्जक चटाईके नाम हैं। इन दोनोंका एक ही लिङ्ग है। रसवती, पाकस्थान और महानस—ये रसोईघरके अर्थमें आते हैं। रसोईके अध्यक्षका नाम पौरोगव है। रसोई बनानेवालेको सूपकार, बल्लव, आरालिक, आन्धसिक, सूद, औदनिक तथा गुण कहते हैं। नपुंसकलिङ्ग अम्बरीष तथा पुँल्लिङ्ग भ्राष्ट्रशब्द भाड़के वाचक हैं। कर्करी, आलु तथा गलन्तिका—ये कठौतेके नाम हैं। बड़े घड़े या माटको आलिञ्जर एवं मणिक कहते हैं। काले जीरेका नाम सुषवी है। आरनाल और कुल्माष—ये काँजीके नाम हैं। वाहीक, हिङ्गु तथा रामठ—ये हींगके अर्थमें आते हैं। निशा, हरिद्रा और पीता—ये हल्दीके वाचक हैं। खाँड़को मत्स्यण्डि तथा फाणित कहते हैं। दूधके विकार अर्थात् खोवा या मावाका नाम कूर्चिका और क्षीरविकृति है। स्निग्ध, मसृण और चिक्कण—ये तीनों शब्द चिकनेके अर्थमें आते हैं। पृथुक और चिपिटक—ये चिउड़ाके वाचक हैं। भूने हुए जौको धाना कहते हैं। यह स्त्रीलिङ्ग शब्द है। जेमन, लेह (लेप) और आहार—ये भोजनका बोध करानेवाले हैं। माहेयी, सौरभी और गौ—ये गायके पर्याय हैं। कंधेपर जुआ ढोनेवाले बैलको युग्य और प्रसङ्ग्य तथा गाड़ी खींचनेवालेको शाकट कहते हैं। बहुत दिनोंकी ब्यायी हुई गायका नाम

८०६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

वष्क्यणी (बकेना) तथा थोड़े दिनोंकी बयायी हुईका नाम धेनु है। साँड़से लगी हुई गौको संधिनी कहते हैं। गर्भ गिरानेवाली गायकी 'वेहद्' संज्ञा है॥ २३—३३॥

पण्याजीव तथा आपणिक व्यापारीके अर्थमें आते हैं। न्यास और उपनिधि—ये धरोहरके वाचक हैं। ये दोनों शब्द पुँल्लिङ्ग हैं। बेचनेका नाम है विपण और विक्रय। संख्यावाचक शब्द एकसे लेकर 'दश' शब्दके श्रवण होनेतक (अर्थात् एकसे अष्टादशतक) केवल संख्येय द्रव्यका बोध करानेके लिये प्रयुक्त होते हैं, अतः उनका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। जैसे— एकः पटः, एका स्त्री, एकं पुष्पम् इत्यादि; परंतु 'पञ्चन्' से 'दशन्' शब्दतकके रूप तीनों लिङ्गोंमें समान होते हैं। यथा—दश स्त्रियः, दश पुरुषाः, दश पुष्पाणि इत्यादि। इसी प्रकार अष्टादशतक समझना चाहिये। संख्यामात्रका बोध करानेके लिये इन शब्दोंका प्रयोग नहीं होता; अतएव 'विप्राणां शतम्' इत्यादिके समान 'विप्राणां दश' यह प्रयोग नहीं हो सकता। विंशति आदि सभी संख्यावाची शब्द संख्या और संख्येय दोनों अर्थोंमें आते हैं तथा वे नित्य एक वचनान्त माने जाते हैं। (यथा संख्येयमें—विंशतिः पटाः। संख्यामात्रमें—विंशतिः पटानाम् इत्यादि। परंतु इनकी एकवचनान्तता केवल संख्येय अर्थमें ही मानी गयी है।) संख्यामात्रमें ये द्विवचन और बहुवचन भी होते हैं (यथा दो बीस, तीन बीस आदिके अर्थमें—द्वे विंशती, त्रयो विंशतयः— इत्यादि)। ऊनविंशतिसे लेकर नवनवतितक सभी संख्याशब्द स्त्रीलिङ्ग हैं (अतएव 'विंशत्या पुरुषैः' इत्यादि प्रयोग होते हैं)। 'पङ्क्ति' से लेकर शत, सहस्र आदि शब्द क्रमशः दसगुने अधिक हैं (यथा पङ्क्तिः (१०), शतम् (१००), सहस्रम् (१०००), अयुतम् (१००००) इत्यादि)। मान तीन प्रकारके होते हैं—तुलामान, अङ्गुलिमान और प्रस्थमान। पाँच गुंजे (रत्ती)—का एक माषक (माशा) होता है॥ ३४—३६॥

सोलह माषकका एक अक्ष होता है, इसीको कर्ष भी कहते हैं। कर्ष पुँल्लिङ्ग भी है और नपुंसकलिङ्ग भी। चार कर्षका एक पल होता है। एक अक्ष सोनेको 'सुवर्ण' और बिस्त कहते हैं तथा एक पल सुवर्णका नाम 'कुरुबिस्त' है। सौ पलकी एक 'तुला' होती है, यह स्त्रीलिङ्ग शब्द है। बीस तुलाको 'भार' कहते हैं। चाँदीके रुपयेका नाम कार्षापण और कार्षिक है। ताँबेके पैसेको 'पण' कहते हैं। द्रव्य, वित्त, स्वापतेय, रिक्थ, ऋक्थ, धन और वसु—ये धनके वाचक हैं। स्त्रीलिङ्ग रीति शब्द और पुँल्लिङ्ग आरकूट—ये पीतलके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। ताँबाका नाम—ताम्रक, शुल्ब तथा औदुम्बर है। तीक्ष्ण, कालायस और आयस—ये लोहेके अर्थमें आते हैं। क्षार और काँच—ये काँचके नाम हैं। चपल, रस, सूत और पारद—ये पाराके वाचक हैं। भैंसेके सींगका नाम गरल (या गवल) है। त्रपु, सीसक और पिच्चट—ये सीसाके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं।* हिण्डीर, अब्धिकफ तथा फेन—ये समुद्रफेनके वाचक हैं। मधूच्छिष्ट और सिक्थक—ये मोमके नाम हैं। रंग और वंग— राँगाके, पिचु और तूल—रुईके तथा कूलटी (कुनटी) और मनःशिला—मैनसिलके नाम हैं। यवक्षार और पाक्य—पर्यायवाची शब्द हैं। त्वक्क्षीरा और वंशलोचना—वंशलोचनके वाचक हैं॥ ३७—४२॥

वृषल, जघन्यज और शूद्र—ये शूद्रजातिके


* अमरकोशमें इस श्लोकके 'त्रपु' और 'पिच्चट' शब्दको राँगेके अर्थमें लिया गया है तथा सीसकके नाग, योगेष्ट और वप्र—ये तीन पर्याय अन्य दिये गये हैं।

* अध्याय ३६७ *८०७

नाम हैं। चाण्डाल एवं अन्त्यज जातियाँ वर्णसंकर कहलाती हैं। शिल्पकर्मके ज्ञाताको कारु और शिल्पी कहते हैं (इनमें बढ़ई, थवई आदि सभी आ जाते हैं।) समान जातिके शिल्पियोंके एकत्रित हुए समुदायको श्रेणि कहते हैं। यह स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होता है। चित्र बनानेवालेको रङ्गाजीव और चित्रकार कहते हैं। त्वष्टा, तक्षा और वर्धकि—ये बढ़ईके नाम हैं। नाडिन्धम और स्वर्णकार—ये सुनारके वाचक हैं। नाई (हजाम)–का नाम है नापित तथा अन्तावसायी। बकरी बेंचनेवाले गडरियेका नाम जाबाल और अजाजीव है। देवाजीव और देवल—ये देवपूजासे जीविका चलानेवालेके अर्थमें आते हैं। अपनी स्त्रियोंके साथ नाटक दिखाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले नटको जायाजीव और शैलूष कहते हैं। रोजाना मजदूरी लेकर गुजर करनेवाले मजूरका नाम भृतक और भृतिभुक् है। | विवर्ण, पामर, नीच, प्राकृत, पृथग्जन, विहीन, अपसद और जाल्म—ये नीचके वाचक हैं। दासको भृत्य, दासेर और चेटक भी कहते हैं। पटु, पेशल और दक्ष—ये चतुरके अर्थमें आते हैं। मृगयु और लुब्धक—ये व्याधके नाम हैं। चाण्डालको चाण्डाल और दिवाकीर्ति कहते हैं। पुताई आदिके काममें पुस्त शब्दका प्रयोग होता है। पञ्चालिका और पुत्रिका—ये पुतली या गुड़ियाके नाम हैं। वर्कर शब्द जवान पशुमात्रके अर्थमें आता है (साथ ही वह बकरेका भी वाचक है)। गहना रखनेके डब्बेको या कपड़े रखनेकी पेटीको मञ्जूषा, पेटक तथा पेडा कहते हैं। तुल्य और साधारण—ये समान अर्थके वाचक हैं। इनका सामान्यतः तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। प्रतिमा और प्रतिकृति—ये पत्थर आदिकी मूर्तिके वाचक हैं। इस प्रकार ब्राह्मण आदि वर्गोंका वर्णन किया गया॥ ४३–४९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशगत क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रवर्गका वर्णन' नामक तीन सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६६ ॥


तीन सौ सड़सठवाँ अध्याय

सामान्य नाम-लिङ्ग

अग्निदेव कहते हैं—मुनिवर! अब मैं सामान्यतः नामलिङ्गोंका वर्णन करूँगा (इस प्रकरणमें आये हुए शब्द प्रायः ऐसे होंगे, जो अपने विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त हो सकते हैं), आप उन्हें ध्यान देकर सुनें। सुकृति, पुण्यवान् और धन्य—ये शब्द पुण्यात्मा और सौभाग्यशाली पुरुषके लिये आते हैं। जिनकी अभिलाषा, आशय या अभिप्राय महान् हो, उन्हें महेच्छ और महाशय कहते हैं। (जिनके हृदय शुद्ध, सरल, कोमल, दयालु एवं भावुक हों, वे | हृदयालु, सहृदय और सुहृदय कहलाते हैं।) प्रवीण, निपुण, अभिज्ञ, विज्ञ, निष्णात और शिक्षित—सुयोग्य एवं कुशलके अर्थमें आते हैं। वदान्य, स्थूललक्ष, दानशौण्ड और बहुप्रद—ये अधिक दान करनेवालेके वाचक हैं। कृती, कृतज्ञ और कुशल—ये भी प्रवीण, चतुर एवं दक्षके ही अर्थमें आते हैं। आसक्त, उद्युक्त और उत्सुक—ये उद्योगी एवं कार्यपरायण पुरुषके लिये प्रयुक्त होते हैं। अधिक धनवान्‌को इभ्य और आढ्य कहते हैं। परिवृढ, अधिभू, नायक

८०८ * अग्निपुराण *


और अधिप—ये स्वामीके वाचक हैं। लक्ष्मीवान्, लक्ष्मण तथा श्रील—ये शोभा और श्रीसे सम्पन्न पुरुषके अर्थमें आते हैं। स्वतन्त्र, स्वैरी और अपावृत शब्द स्वाधीन अर्थके बोधक हैं। खलपू और बहुकर—खलिहान या मैदान साफ करनेवाले पुरुषके अर्थमें आते हैं। दीर्घसूत्र और चिरक्रिय—ये आलसी तथा बहुत विलम्बसे काम पूरा करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। बिना विचारे काम करनेवालेको जाल्म और असमीक्ष्यकारी कहते हैं। जो कार्य करनेमें ढीला हो, वह कुण्ठ कहलाता है। कर्मशूर और कर्मठ—ये उत्साहपूर्वक कर्म करनेवालेके वाचक हैं। खानेवालेको भक्षक, घस्मर और अद्मर कहते हैं। लोलुप, गर्धन और गृध्नु—ये लोभीके पर्याय हैं। विनीत और प्रश्रित—ये विनययुक्त पुरुषका बोध करानेवाले हैं। धृष्णु और वियात—ये धृष्टके लिये प्रयुक्त होते हैं। प्रतिभाशाली पुरुषके अर्थमें निभृत और प्रगल्भ शब्दका प्रयोग होता है। भीरुक और भीरु—डरपोकके, बन्दारु और अभिवादक प्रणाम करनेवालेके, भूष्णु, भविष्णु और भविता होनेवालेके तथा ज्ञाता, विदुर और विन्दुक—ये जानकारके वाचक हैं। मत्त, शौण्ड, उत्कट और क्षीब—ये मतवालेके अर्थमें आते हैं (क्षीब शब्द नान्त भी होता है, इसके क्षीबा, क्षीबाणौ, क्षीबाणः इत्यादि रूप होते हैं)। चण्ड और अत्यन्त कोपन—ये अधिक क्रोध करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। देवताओंका अनुसरण करनेवालेको देवद्र्यङ् और सब ओर जानेवालेको विष्वग्द्र्यङ् कहते हैं। इसी प्रकार साथ चलनेवाला सध्र्यङ् और तिरछा चलनेवाला तिर्यङ् कहलाता है। वाचोयुक्ति पटु, वाग्मी और वावदूक—ये कुशल वक्ताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। बहुत अनाप-शनाप बकनेवालेको जल्पाक, वाचाल, वाचाट और बहुगर्ह्यवाक् कहते हैं। अपध्वस्त और धिक्कृत—ये धिक्कारे हुए पुरुषके वाचक हैं। कीलित और संयत शब्द बद्ध (बँधे हुए)-का बोध करानेवाले हैं॥ १—१०॥

रवण और शब्दन—ये आवाज करनेवालेके अर्थमें आते हैं। (नाटक आदिके आरम्भमें जो मङ्गलके लिये आशीर्वादयुक्त स्तुतिका पाठ किया जाता है, उसका नाम नान्दी है।) नान्दीपाठ करनेवालेको नान्दीवादी और नान्दीकर कहते हैं। व्यसनार्त और उपरक्त—ये पीड़ितके अर्थमें आते हैं। विहस्त और व्याकुल—ये शोकाकुल पुरुषका बोध करानेवाले हैं। नृशंस, क्रूर, घातक और पाप—ये दूसरोंसे द्रोह करनेवाले निर्दय मनुष्यके वाचक हैं। ठगको धूर्त और वञ्चक कहते हैं। वैदेह (वैधेय) और वालिश—ये मूर्खके वाचक हैं। कृपण और क्षुद्र—ये कदर्य (कंजूस)-के अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। मार्गण, याचक और अर्थी—ये याचना करनेवालेके अर्थमें आते हैं। अहंकारीको अहंकारवान् और अहंयु तथा शुभके भागीको शुभान्वित और शुभंयु कहते हैं। कान्त, मनोरम और रुच्य—ये सुन्दर अर्थके वाचक हैं। हृद्य, अभीष्ट और अभीप्सित—ये प्रियके समानार्थक शब्द हैं। असार, फल्गु तथा शून्य—ये निस्सार अर्थका बोध करानेवाले हैं। मुख्य, वर्य, वरेण्यक, श्रेयान्, श्रेष्ठ और पुष्कल—ये श्रेष्ठके वाचक हैं। प्राग्र्य, अग्र्य, अग्रीय तथा अग्रिय शब्द भी इसी अर्थमें आते हैं। वड्र, उरु और विपुल—ये विशाल अर्थके बोधक हैं। पीन, पीवन्, स्थूल और पीवर—ये स्थूल या मोटे अर्थका बोध करानेवाले हैं। स्तोक, अल्प, क्षुल्लक, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, दभ्र, कृश, तनु, मात्रा, त्रुटि, लव और कण—ये स्वल्प या सूक्ष्म अर्थके वाचक हैं। भूयिष्ठ, पुरुह और पुरु—ये अधिक अर्थके बोधक हैं। अखण्ड, पूर्ण और सकल—ये

  • अध्याय ३६७ * ८०९

समग्रके वाचक हैं। उपकण्ठ, अन्तिक, अभितः, संनिधि और अभ्यास—ये समीपके अर्थमें आते हैं। अत्यन्त निकटको नेदिष्ठ कहते हैं। बहुत दूरके अर्थमें दविष्ठ शब्दका प्रयोग होता है। वृत्त, निस्तल और वर्तुल—ये गोलाकारके वाचक हैं। उच्च, प्रांशु, उन्नत और उदग्र—ये ऊँचेके अर्थमें आते हैं। ध्रुव, नित्य और सनातन—ये नित्य अर्थके बोधक हैं। आविद्ध, कुटिल, भुग्न, वेल्लित और वक्र—ये टेढ़ेका बोध करानेवाले हैं। चञ्चल और तरल—ये चपलके अर्थमें आते हैं। कठोर, जरठ और दृढ़—ये समानार्थक शब्द हैं। प्रत्यग्र, अभिनव, नव्य, नवीन, नूतन और नव—ये नयेके अर्थमें आते हैं। एकतान और अनन्यवृत्ति—ये एकाग्रचित्तवाले पुरुषके बोधक हैं। उच्छण्ड और अविलम्बित—ये फुर्तीके वाचक हैं। उच्चावच और नैकभेद—ये अनेक प्रकारके अर्थमें आते हैं। सम्बाध और कलित—ये संकीर्ण एवं गहनके बोधक हैं। तिमित, स्तिमित और क्लिन्न—ये आर्द्र या भीगे हुएके अर्थमें आते हैं। अभियोग और अभिग्रह—ये दूसरेपर किये हुए दोषारोपणके नाम हैं। स्फाति शब्द वृद्धिके और प्रथा शब्द ख्यातिके अर्थमें आता है। समाहार और समुच्चय—ये समूहके वाचक हैं। अपहार और अपचय—ये ह्रासका बोध करानेवाले हैं। विहार और परिक्रम—ये घूमनेके अर्थमें आते हैं। प्रत्याहार और उपादान—ये इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। निर्हार तथा अभ्यवकर्षण—ये शरीरमें धँसे हुए शस्त्रादिको युक्तिपूर्वक निकालनेके अर्थमें आते हैं। विघ्न, अन्तराय और प्रत्यूह—ये विघ्नका बोध करानेवाले हैं। आस्या, आसना और स्थिति—ये बैठनेकी क्रियाके बोधक हैं। संनिधि और संनिकर्ष—ये समीप रहनेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। किलेमें प्रवेश करनेकी क्रियाको संक्रम और दुर्गसंचार कहते हैं। उपलम्भ और अनुभव—ये अनुभूतिके नाम हैं। प्रत्यादेश और निराकृति—ये दूसरेके मतका खण्डन करनेके अर्थमें आते हैं। परिरम्भ, परिष्वङ्ग, संश्लेष और उपगूहन—ये आलिङ्गनके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। पक्ष* और हेतु आदिके द्वारा निश्चित होनेवाले ज्ञानका नाम अनुमा या अनुमान है। बिना हथियारकी लड़ाई तथा भयभीत होनेपर किये हुए शब्दका नाम डिम्ब, भ्रमर (या डमर) तथा विप्लव है। शब्दके द्वारा जो परोक्ष अर्थका ज्ञान होता है, उसे शाब्दज्ञान कहते हैं। समानता देखकर जो उसके तुल्यवस्तुका बोध होता है, उसका नाम उपमान है। जहाँ कोई कार्य देखकर कारणका निश्चय किया जाय, अर्थात् अमुक कारणके बिना यह कार्य नहीं हो सकता—इस प्रकार विचार करके जो दूसरी वस्तु अर्थात् कारणका ज्ञान प्राप्त किया जाय, उसे अर्थापत्ति कहते हैं। प्रतियोगीका ग्रहण न होनेपर जो ऐसा कहा जाता है कि 'अमुक वस्तु पृथ्वीपर नहीं है, उसका नाम अभाव है। इस प्रकार मनुष्योंका ज्ञान बढ़ानेके लिये मैंने नाम और लिङ्ग-स्वरूप श्रीहरिका वर्णन किया है॥ ११—२८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशगत सामान्य नामलिङ्गोंका कथन' नामक तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६७॥


* जहाँ साध्यका संदेह हो अर्थात् जहाँ किसी वस्तुको सिद्ध करनेकी चेष्टा की जा रही हो—उसको 'पक्ष' कहते हैं तथा साध्यको सिद्ध करनेके लिये जो युक्ति दी जाती है, उसे 'हेतु' कहते हैं। जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वात्' (पर्वतपर आग है; क्योंकि वहाँ धुँआ उठता है)। यहाँ वह्नि साध्य, पर्वत पक्ष और धूम हेतु है।

८१० * अग्निपुराण *


तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय

नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत प्रलयका वर्णन

**अग्निदेव कहते हैं—**मुनिवर! 'प्रलय' चार प्रकारका होता है—नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यन्तिक। जगत्‌में उत्पन्न हुए प्राणियोंकी जो सदा ही मृत्यु होती रहती है, उसका नाम 'नित्य प्रलय' है। एक हजार चतुर्युग बीतनेपर जब ब्रह्माजीका दिन समाप्त होता है, उस समय जो सृष्टिका लय होता है, वह 'ब्राह्म लय'के नामसे प्रसिद्ध है। इसीको 'नैमित्तिक प्रलय' भी कहते हैं। पाँचों भूतोंका प्रकृतिमें लीन होना 'प्राकृत प्रलय' कहलाता है तथा ज्ञान हो जानेपर जब आत्मा परमात्माके स्वरूपमें स्थित होता है, उस अवस्थाका नाम 'आत्यन्तिक प्रलय' है। कल्पके अन्तमें जो नैमित्तिक प्रलय होता है, इसके स्वरूपका मैं आपसे वर्णन करता हूँ। जब चारों युग एक हजार बार व्यतीत हो जाते हैं, उस समय यह भूमण्डल प्रायः क्षीण हो जाता है, तब सौ वर्षोंतक यहाँ बड़ी भयंकर अनावृष्टि होती है। उससे भूतलके सम्पूर्ण जीव-जन्तुओंका विनाश हो जाता है। तदनन्तर जगत्‌के स्वामी भगवान् विष्णु सूर्यकी सात किरणोंमें स्थित होकर पृथ्वी, पाताल और समुद्र आदिका सारा जल पी जाते हैं। इससे सर्वत्र जल सूख जाता है। तत्पश्चात् भगवान्‌की इच्छासे जलका आहार करके पुष्ट हुई वे ही सातों किरणें सात सूर्यके रूपमें प्रकट होती हैं। वे सातों सूर्य पातालसहित समस्त त्रिलोकीको जलाने लगते हैं।$^१$ उस समय यह पृथ्वी कछुएक़ी पीठके समान दिखायी देती है। फिर भगवान् शेषके श्वासोंसे 'कालाग्नि रुद्र'का प्रादुर्भाव होता है और वे नीचेके समस्त पातालोंको भस्म कर डालते हैं। पातालके पश्चात् भगवान् विष्णु भूलोकको, फिर भुवर्लोकको तथा सबके अन्तमें स्वर्गलोकको भी दग्ध कर देते हैं। उस समय समस्त त्रिभुवन जलते हुए भाड़-सा प्रतीत होता है। तदनन्तर भुवर्लोक और स्वर्ग—इन दो लोकोंके निवासी अधिक तापसे संतप्त होकर 'महर्लोक'में चले जाते हैं तथा महर्लोकसे जनलोकमें जाकर स्थित होते हैं। शेषरूपी भगवान् विष्णुके मुखोच्छ्वाससे प्रकट हुए कालाग्निरुद्र जब सम्पूर्ण जगत्‌को जला डालते हैं, तब आकाशमें नाना प्रकारके रूपवाले बादल उमड़ आते हैं, उनके साथ बिजलीकी गड़गड़ाहट भी होती है। वे बादल लगातार सौ वर्षोंतक वर्षा करके बढ़ी हुई आगको शान्त कर देते हैं। जब सप्तर्षियोंके स्थानतक पानी पहुँच जाता है, तब विष्णुके मुखसे निकली हुई साँससे सौ वर्षोंतक प्रचण्ड वायु चलती रहती है, जो उन बादलोंको नष्ट कर डालती है। फिर ब्रह्मारूपधारी भगवान् उस वायुको पीकर एकार्णवके जलमें शयन करते हैं। उस समय सिद्ध और महर्षिगण जलमें स्थित होकर भगवान्‌की स्तुति करते हैं और भगवान् मधुसूदन अपने 'वासुदेव' संज्ञक आत्माका चिन्तन करते हुए, अपनी ही दिव्य मायामयी योगनिद्राका आश्रय ले एक कल्पतक सोते रहते हैं। तदनन्तर जागनेपर वे ब्रह्माके रूपमें स्थित होकर पुनः जगत्‌की सृष्टि करते हैं। इस प्रकार जब ब्रह्माजीके दो परार्द्धकी आयु समाप्त हो जाती है, तब यह सारा स्थूल प्रपञ्च प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ १—१५॥

इकाई-दहाईके क्रमसे एकके बाद दसगुने स्थान नियत करके यदि गुणा करते चले जायँ तो अठारहवें स्थानतक पहुँचनेपर जो संख्या बनती है, उसे 'परार्द्ध' कहते हैं*। परार्द्धका दूना समय

* अध्याय ३६९ * ८११

व्यतीत हो जानेपर 'प्राकृत प्रलय' होता है। उस समय वर्षाके एकदम बंद हो जाने और सब ओर प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित होनेके कारण सब कुछ भस्म हो जाता है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी विकारों (कार्यों)-का नाश हो जाता है। भगवान्‌के संकल्पसे होनेवाले उस प्राकृत प्रलयके प्राप्त होनेपर जल पहले पृथ्वीके गन्ध आदि गुणको ग्रस लेता है—अपनेमें लीन कर लेता है। तब गन्धहीन पृथ्वीका प्रलय हो जाता है—उस समय जलमें घुल-मिलकर वह जलरूप हो जाती है। उसके बाद रसमय जलकी स्थिति रहती है। फिर तेजस्तत्त्व जलके गुण रसको पी जाता है। इससे जलका लय हो जाता है। जलके लीन हो जानेपर अग्नितत्त्व प्रज्वलित होता रहता है। तत्पश्चात् तेजके प्रकाशमय गुण रूपको वायुतत्त्व ग्रस लेता है। इस प्रकार तेजके शान्त हो जानेपर अत्यन्त प्रबल एवं प्रचण्ड वायु बड़े वेगसे चलने लगती है। फिर वायुके गुण स्पर्शको आकाश अपनेमें लीन कर लेता है। गुणके साथ ही वायुका नाश होनेपर केवल नीरव आकाशमात्र रह जाता है। तदनन्तर भूतादि (तामस अहंकार) आकाशके गुण शब्दको ग्रस लेता है तथा तैजस अहंकार इन्द्रियोंको अपनेमें लीन कर लेता है। इसके बाद महत्तत्त्व अभिमान स्वरूप भूतादि एवं तैजस अहंकारको ग्रस लेता है। इस तरह पृथ्वी जलमें लीन होती है, जल तेजमें समा जाता है, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें और आकाशका अहंकारमें लय होता है। फिर अहंकार महत्तत्त्वमें प्रवेश कर जाता है। ब्रह्मन्! उस महत्तत्त्वको भी प्रकृति ग्रस लेती है। प्रकृतिके दो स्वरूप हैं—'व्यक्त' और 'अव्यक्त'। इनमें व्यक्त प्रकृतिका अव्यक्त प्रकृतिमें लय होता है। एक, अविनाशी और शुद्धस्वरूप जो पुरुष है, वह भी परमात्माका ही अंश है, अतः अन्तमें प्रकृति और पुरुष—ये दोनों परमात्मामें लीन हो जाते हैं। परमात्मा सत्स्वरूप ज्ञेय और ज्ञानमय है। वह आत्मा (बुद्धि आदि)-से सर्वथा परे है। वही सबका ईश्वर—'सर्वेश्वर' कहलाता है। उसमें नाम और जाति आदिकी कल्पनाएँ नहीं हैं॥ १६—२७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नित्य, नैमित्तिक तथा प्राकृत प्रलयका वर्णन' नामक तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६८॥


तीन सौ उनहत्तरवाँ अध्याय

आत्यन्तिक प्रलय एवं गर्भकी उत्पत्तिका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठजी! अब मैं 'आत्यन्तिक प्रलय' का वर्णन करूँगा। जब जगत्‌के आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक संतापोंको जानकर मनुष्यको अपनेसे भी वैराग्य हो जाता है, उस समय उसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे इस सृष्टिका आत्यन्तिक प्रलय होता है (यही जीवात्माका मोक्ष है)। आध्यात्मिक संताप 'शारीरिक' और 'मानसिक' भेदसे दो प्रकारका


*इन अठारह संख्याओंमें यदि एकको भी गिन लें, अर्थात् एकके बाद सत्रह शून्य लगावें तो वर्तमान गणनाके अनुसार यह संख्या एक शंखके बराबर होती है और यदि एकके बाद अठारह शून्य लगाये जायें तो यह संख्या महाशंखके बराबर होती है। यह शंख और महाशंख ही 'परार्द्ध' है।

८१२ * अग्निपुराण *


होता है। ब्रह्मन्! शारीरिक तापके भी अनेकों भेद हैं, उन्हें श्रवण कीजिये। जीव भोगदेहका परित्याग करके अपने कर्मोंके अनुसार पुनः गर्भमें आता है। वसिष्ठजी! एक 'आतिवाहिक' संज्ञक शरीर होता है, वह केवल मनुष्योंको मृत्युकाल उपस्थित होनेपर प्राप्त होता है। विप्रवर! यमराजके दूत मनुष्यके उस आतिवाहिक शरीरको यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं। मुने! दूसरे प्राणियोंको न तो आतिवाहिक शरीर मिलता है और न वे यमलोकके मार्गसे ही ले जाये जाते हैं। तदनन्तर यमलोकमें गया हुआ जीव कभी स्वर्गमें और कभी नरकमें जाता है। जैसे रहट नामक यन्त्रमें लगे हुए घड़े कभी पानीमें डूबते हैं और कभी ऊपर आते हैं, उसी तरह जीवको कभी स्वर्ग और कभी नरकमें चक्कर लगाना पड़ता है। ब्रह्मन्! यह लोक कर्मभूमि है और परलोक फलभूमि। यमराज जीवको उसके कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों तथा नरकोंमें डाला करते हैं। यमराज ही जीवोंद्वारा नरकोंको परिपूर्ण बनाये रखते हैं। यमराजको ही इनका नियामक समझना चाहिये। जीव वायुरूप होकर गर्भमें प्रवेश करते हैं। यमदूत जब मनुष्यको यमराजके पास ले जाते हैं, तब वे उसकी ओर देखते हैं। (उसके कर्मोंपर विचार करते हैं—) यदि कोई धर्मात्मा होता है तो उसकी पूजा करते हैं और यदि पापी होता है तो अपने घरपर उसे दण्ड देते हैं। चित्रगुप्त उसके शुभ और अशुभ कर्मोंका विवेचन करते हैं। धर्मके ज्ञाता वसिष्ठजी! जबतक बन्धु-बान्धवोंका अशौच निवृत्त नहीं होता, तबतक जीव आतिवाहिक शरीरमें ही रहकर दिये हुए पिण्डोंको भोजनके रूपमें अपने साथ ले जाता है। तत्पश्चात् प्रेतलोकमें पहुँचकर प्रेतदेह (आतिवाहिक शरीर)-का त्याग करता है और दूसरा शरीर (भोगदेह) पाकर वहाँ भूख-प्याससे युक्त हो निवास करता है। उस समय उसे वही भोजनके लिये मिलता है, जो श्राद्धके रूपमें उसके निमित्त कच्चा अन्न दिया गया होता है। प्रेतके निमित्त पिण्डदान किये बिना उसको आतिवाहिक शरीरसे छुटकारा नहीं मिलता, वह उसी शरीरमें रहकर केवल पिण्डोंका भोजन करता है। सपिण्डीकरण श्राद्ध करनेपर एक वर्षके पश्चात् वह प्रेतदेहको छोड़कर भोगदेहको प्राप्त होता है। 'भोगदेह' दो प्रकारके बताये गये हैं— शुभ और अशुभ। भोगदेहके द्वारा कर्मजनित बन्धनोंको भोगनेके पश्चात् जीव मर्त्यलोकमें गिरा दिया जाता है। उस समय उसके त्यागे हुए भोगदेहको निशाचर खा जाते हैं। ब्रह्मन्! यदि जीव भोगदेहके द्वारा पहले पुण्यके फलस्वरूप स्वर्गका सुख भोग लेता है और पाप भोगना शेष रह जाता है तो वह पापियोंके अनुरूप दूसरा भोगशरीर धारण करता है। परंतु जो पहले पापका फल भोगकर पीछे स्वर्गका सुख भोगता है, वह भोग समाप्त होनेपर स्वर्गसे भ्रष्ट होकर पवित्र आचार-विचारवाले धनवानोंके घरमें जन्म लेता है। वसिष्ठजी! यदि जीव पुण्यके रहते हुए पहले पाप भोगता है तो उसका भोग समाप्त होनेपर वह पुण्यभोगके लिये उत्तम (देवोचित) शरीर धारण करता है। जब कर्मका भोग थोड़ा-सा ही शेष रह जाता है तो जीवको नरकसे भी छुटकारा मिल जाता है। नरकसे निकला हुआ जीव पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनिमें ही जन्म लेता है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है॥ १-१८॥

(मानवयोनिके) गर्भमें प्रविष्ट हुआ जीव पहले महीनेमें कलल (रज-वीर्यके मिश्रित बिन्दु)-के रूपमें रहता है, दूसरे महीनेमें वह घनीभूत