अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ३५७ * | ७७३ ---|---
आगम तथा 'शी' के दीर्घ ईकारके स्थानमें ह्रस्व आदेश होनेपर 'शिविर' शब्दकी सिद्धि होती है। 'शिविर' कहते हैं—सेनाकी छावनीको। अग्निपुराणके अनुसार गुप्त निवासस्थानको 'शिविर' कहते हैं॥ १–५॥
'अव्' धातुसे 'सितनिगमिमसि।' (७२) इत्यादि सूत्रके अनुसार 'तुट्' प्रत्यय होनेपर वकारके स्थानमें 'ऊठ्' होकर गुण होनेसे 'ओतु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'ओतु' कहते हैं—बिलावको। अभिधानमात्रसे उणादि प्रत्यय होते हैं। 'कृ' धातुसे 'न' प्रत्यय करनेपर गुण होता है और नकारका णकारादेश हो जानेपर 'कर्ण' शब्दकी सिद्धि होती है। 'कर्ण'का अर्थ है—कान अथवा कन्यावस्थामें कुन्तीसे उत्पन्न सूर्यपुत्र कर्ण। 'वस्' धातुसे 'तुन्' प्रत्यय, अगार अर्थमें उसका 'णित्व' होकर वृद्धि होनेसे 'वास्तु' शब्द बनता है। 'वास्तु' का अर्थ है—गृहभूमि। 'जीव' शब्दसे 'आतुकन्' प्रत्यय और वृद्धि होकर 'जैवातृक' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जैवातृक' का अर्थ है—चन्द्रमा। 'अनः शकटं वहति।'—इस लौकिक विग्रहमें 'वह' धातुसे 'क्विप्' प्रत्यय, 'अनस्'के सकारका डकार आदेश तथा 'वह' के वकारका सम्प्रसारण होनेपर 'अनडुह्' शब्द बनता है, उसके सुबन्तमें अनड्वान्, अनड्वाहौ इत्यादि रूप होते हैं। 'जीव्' धातुसे 'जीवेरातुः।' (८२)—इस सूत्रके अनुसार 'आतु' प्रत्यय करनेपर 'जीवातु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जीवातु' नाम है—संजीवन औषधका। प्रापणार्थक 'वह्' धातुसे 'वहिश्रिश्रुयुद्रुग्लाहात्वरिभ्यो नित्।' (५०१)—इस सूत्रके अनुसार 'नित्' प्रत्यय करनेपर विभक्तिकार्यके पश्चात् 'वह्निः'—इस रूपकी सिद्धि होती है। (इसी प्रकार श्रेणिः, श्रोणिः, योनिः, द्रोणिः, ग्लानिः, हानिः, तूर्णिः बाहुलकात् म्लानिः—इत्यादि पदोंकी सिद्धि होती है।) 'हृ' धातुसे 'इनच्' प्रत्यय होनेपर और अनुबन्धभूत चकारका लोप कर देनेपर 'ह्+इन', गुण तथा विभक्ति-कार्य=हरिणः—इस रूपकी सिद्धि होती है। 'श्यास्त्याह्वञ्विभ्य इनच्।' (२१३)—इस औणादिक सूत्रसे यहाँ 'इनच्' प्रत्यय हुआ है। 'हरिण' कहते हैं—मृगको। यह शब्द कामी तथा पात्रविशेषके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'अण्डन् कृसृभृवृञः।' (१३४)—इस सूत्रके अनुसार 'कृ' आदि धातुओंसे 'अण्डन्' प्रत्यय करनेपर क्रमशः—करण्डः, सरण्डः, भरण्डः, वरण्डः—ये रूप सिद्ध होते हैं। 'करण्ड' शब्द भाजन और भाण्डका वाचक है। मेदिनीकोशके अनुसार यह शहदके छत्तेके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'सरण्ड' शब्द चौपायेका वाचक है। कुछ विद्वान् 'सरण्ड' का अर्थ पक्षी मानते हैं। 'बाहुलकात् तृ प्लवनतरणयोः।' इस धातुसे भी 'अण्डन्' प्रत्यय होकर 'तरण्ड' पदकी सिद्धि होती है। 'तरण्ड' शब्द काठके बेड़ेके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग मछली फँसानेके लिये बनायी गयी बंसीके डोरेको भी 'तरण्ड' कहते हैं। 'वरण्ड' शब्द सामवेदके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग 'साम' और 'यजुष्'—दो वेदोंके लिये इसका प्रयोग मानते हैं। कुछ लोगोंके मतमें 'वरण्ड' शब्द मुखसम्बन्धी रोगका वाचक है। 'स्फायितञ्चिवञ्चि० (१७८)।' इत्यादि सूत्रसे वृद्ध्यर्थक 'स्फायि' धातुसे 'रक्' प्रत्यय होनेपर 'स्फार' पदकी सिद्धि होती है। 'स्फार' शब्दका अर्थ होता है—प्रभूत अर्थात् अधिक। 'मेदिनीकोश'के अनुसार 'स्फार' शब्द विकट अर्थमें आता है और करका या करवा आदि पात्रके भरते समय पानीमें जो बुलबुले उठते हैं, उनका वाचक भी 'स्फार' शब्द है। 'शुसिचिमीनां दीर्घश्च (१९३)।' इस सूत्रसे 'क्रन्' प्रत्यय और पूर्व ह्रस्वस्वरके स्थानमें दीर्घ कर देनेपर क्रमशः शूरः, सीरं, चीरं, मीरः—
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ये प्रयोग बनते हैं। ‘चीर’ शब्द गायके थन, वस्त्रविशेष तथा वल्कलके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘भी’ धातुसे ‘भियः क्रुकन्’—(१९९) इस सूत्रसे ‘क्रुकन्’ प्रत्यय करनेपर ‘भीरुकः’—इस पदकी सिद्धि होती है। इसके पर्यायवाची शब्द हैं—‘भीरु’ और ‘कातर’। ‘उच समवाये’—इस धातुसे ‘रन्’ प्रत्यय करनेपर ‘उग्रः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘उग्रः’ का अर्थ है—प्रचण्ड। ‘वहियूभ्यां षित्।’—इस सूत्रके अनुसार ‘षित् असच्’ प्रत्यय करनेपर ‘वाहसः’, ‘यावसः’—ये दो रूप सिद्ध होते हैं। ‘वाहसः’ का अर्थ है—अजगर और ‘यावसः’ का अर्थ है—तृणसमूह। ‘वर्तमाने पृषद्वृहन्महज्जगच्छत्रिवच्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘गम्’ धातुसे ‘अत्’ प्रत्ययका निपातन हुआ। ‘गम्’ के स्थानमें ‘जग’ आदेश हुआ। इस प्रकार ‘जगत्’ शब्दकी सिद्धि हुई। ‘जगत्’ का अर्थ है—भूलोक। ‘ऋतन्यञ्जिवन्यञ्ज्यर्षि०’ इत्यादि (४५०) सूत्रके अनुसार ‘कृश’ धातुसे ‘आनुक्’ प्रत्यय करनेपर ‘कृशानुः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘कृशानुः’ का अर्थ है—अग्नि। द्योतते इति ज्योतिः। ‘द्युतेरिसिन्नादेशश्च जः।’ (२७५)—इस सूत्रके अनुसार ‘द्युत्’, धातुसे ‘इसिन्’ प्रत्यय, द्यकारका जकारादेश तथा गुण होनेपर ‘ज्योतिः’ इस पदकी सिद्धि होती है। ‘ज्योतिः’ का अर्थ है—अग्नि और सूर्य। ‘अर्च’ धातुसे ‘कृदाधाराचिकलिभ्यः।’ (३२७)—इस सूत्रके अनुसार ‘क’ प्रत्यय होनेपर ‘अर्कः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘अर्क एवं अर्ककः’। स्वार्थे कः। ‘अर्कः’ पद सूर्यका वाचक है। ‘कृगृशृवृञ्जतिभ्यः ष्वरच्।’ (२८६)—इस सूत्रके अनुसार वरणार्थक ‘वृ’ धातुसे तथा याचनार्थक ‘चते’ धातुसे ‘ष्वरच्’ प्रत्यय करनेपर क्रमशः ‘वर्वरः’, ‘चत्वरम्’—इन दो पदोंकी सिद्धि होती है। ‘वर्वर’ का अर्थ है—प्राकृत जन अथवा कुटिल मनुष्य। ‘हसिमृग्रिण्वार्डमिदमिपूपूधूर्विभ्यस्तन्।’ (३७३) —इस सूत्रके अनुसार हिंसार्थक ‘धूर्वि’ धातुसे ‘तन्’ प्रत्यय करनेपर ‘धूर्त्तः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘धूर्त्त’ शब्दका अर्थ है—शठ। ‘चत्वरम्’का अर्थ है—चौराहा। ‘लित्वरचत्वरधीवर’ इत्यादि औणादिक सूत्रसे ‘चीवरम्’ इस पदका निपातन हुआ है। ‘चीवरम्’ का अर्थ है—चिथड़ा अथवा भिक्षुकका वस्त्र। स्नेहार्थक ‘ञिमिदा’ अथवा ‘मिद्’ धातुसे ‘अमिचिमिदिशसिभ्यः क्त्रः।’ (६१३)—इस सूत्रके अनुसार ‘क्त्र’ प्रत्यय हुआ। ककारका इत्यसंज्ञालोप हुआ—‘मिद्+त्र=मित्र। विभक्ति-कार्य करनेपर ‘मित्रः’—इस पदकी सिद्धि हुई। ‘मित्र’ का अर्थ है—सूर्य। नपुंसकलिङ्गमें इसका अर्थ—सुहृद् होता है। ‘कुवोह्रस्वश्च।’ इस सूत्रके अनुसार ‘पुनातीति’ इस लौकिक विग्रहमें ‘पू’ धातुसे ‘क्त्र’ प्रत्यय और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व होनेपर ‘पुत्र’ शब्दकी सिद्धि होती है। ‘पुत्र’ का अर्थ है—बेटा। ‘सुवः कित्।’ (३२८)—इस सूत्रके अनुसार प्राणिप्रसवार्थक ‘षूङ्’ धातुसे ‘नु’ प्रत्यय होता है और वह ‘कित्’ माना जाता है। धातुके आदि षकारको सकारादेश हो जाता है। इस प्रकार ‘सूनु’ शब्दकी सिद्धि होती है। विभक्तिकार्य होनेपर ‘सूनुः’ पद बनता है। ‘विश्वकोश’के अनुसार इसका अर्थ पुत्र और सूर्य है। ‘नप्तृनेष्टृत्वष्टृहोतृ०’ (२६०) इत्यादि सूत्रके अनुसार ‘पितृ’ शब्द निपातित होता है। ‘पातीति पिता’। ‘पा’ धातुसे ‘तृच्’ होकर आकारके स्थानमें इकार हो जाता है। पिता, पितरौ, पितरः इत्यादि इसके रूप हैं। जन्मदाता या बापको ‘पिता’ कहते हैं। विस्तारार्थक ‘तन्’ धातुसे ‘वृतनिभ्यां दीर्घश्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘तन्’ प्रत्यय तथा ह्रस्वके स्थानमें दीर्घ होनेपर ‘तात’ शब्दकी सिद्धि होती है। यहाँ अनुनासिक लोप हुआ है। ‘तात’
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शब्द कृपापात्र तथा पिताके लिये प्रयुक्त होता है। कुत्सितशब्दार्थक 'पर्द' धातुसे 'काकु' प्रत्यय होता है और वह 'नित्' माना जाता है। धातुके रेफका सम्प्रसारण और अकारका लोप हो जाता है। जैसा कि सूत्र है—‘पर्द्देर्नित् सम्प्रसारणमह्लोपश्च।’ (३६७) 'काकु' प्रत्ययके आदि ककारका 'लशक्वतद्धिते।' (१।३।८)—इस सूत्रसे लोप हो जाता है। इस प्रक्रियासे 'पृदाकु' शब्दकी सिद्धि होती है। पर्दते—कुत्सितं 'शब्दं करोति इति पृदाकुः।' इसका अर्थ है—सर्प, बिच्छू या व्याघ्र। 'हसिमृगृण्वाऽम्दि-मिलूपूथूर्विभ्यस्तन्।' (३७३) इस सूत्रके द्वारा 'गृ' धातुसे 'तन्' प्रत्यय और गुणादेश करनेपर 'गर्त' शब्दकी सिद्धि होती है। यह 'अवट' अर्थात् गड्ढेका वाचक है। 'भृमृशितॄ०' इत्यादि (७) सूत्रके अनुसार 'भृ' धातुसे 'अतच्' प्रत्यय तथा गुणादेश करनेपर 'भरत' शब्द निष्पन्न होता है। जो भरण-पोषण करे, वह 'भरत' है। 'नमतीति नटः'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जनिदाच्युसृवृमदि०' इत्यादि (५५४) सूत्रके द्वारा 'नम' धातुसे 'डट्' प्रत्यय करनेपर 'टि' लोप होनेके पश्चात् 'नट' शब्द बनता है। इसका अर्थ है—वेषधारी अभिनेता। ये थोड़े-से उणादि प्रत्यय यहाँ प्रदर्शित किये गये। इनके अतिरिक्त भी बहुत-से उणादि प्रत्यय होते हैं॥ ६–१२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'उणादिसिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५७॥
तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
तिङ्विभक्त्यन्त सिद्धरूपोंका वर्णन
कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन ! अब मैं 'तिङ्-विभक्ति' तथा 'आदेश'का संक्षेपसे वर्णन करूँगा। तिङ्-प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता—तीनोंमें होते हैं। सकर्मक तथा अकर्मक धातुसे कर्तामें आत्मनेपद तथा परस्मैपद—दोनों पदोंके 'तिङ्प्रत्यय' होते हैं। (सकर्मकसे कर्ता और कर्ममें तथा अकर्मकसे भाव और कर्तामें वे 'तिङ्' प्रत्यय हुआ करते हैं—यह विवेक कर्तव्य है) 'तिङादेश' सकर्मक धातुसे कर्म तथा कर्तामें बताये गये हैं। वर्तमानकालकी क्रियाके बोधके लिये धातुसे 'लट्' लकारका विधान कहा गया है। विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट (सत्कारपूर्वक व्यापार), सम्प्रश्न तथा प्रार्थना आदि अर्थका प्रतिपादन अभीष्ट हो तो धातुसे 'लिङ्' लकार होता है। 'विधि' आदि अर्थोंमें तथा आशीर्वादमें भी 'लोट्' लकारका प्रयोग होता है। अनद्यतन भूतकालका बोध करानेके लिये 'लङ्' लकार प्रयुक्त होता है। सामान्य भूतकालमें 'लुङ्', परोक्ष-भूतमें 'लिट्' अनद्यतन भविष्यमें 'लुट्' आशीर्वादमें 'लिङ्' शेष अर्थमें अर्थात् सामान्य भविष्यत् अर्थके बोधके लिये धातुसे 'लृट्' लकार होता है—क्रियार्था क्रिया हो तो भी, न हो तो भी। हेतुहेतुमद्भाव आदि 'लिङ्' का निमित्त होता है; उसके होनेपर भविष्यत् अर्थका बोध करानेके लिये धातुसे 'लृङ्' लकार होता है—क्रियाकी अतिपत्ति (असिद्धि) गम्यमान हो, तब। 'तङ्' प्रत्यय तथा 'शानच्', 'कानच्'—इनकी आत्मनेपद संज्ञा होती है। 'तिङ्' विभक्तियाँ अठारह हैं। इनमें पूर्वकी नौ विभक्तियाँ 'परस्मैपद' कही जाती हैं। वे प्रथमपुरुष आदिके भेदसे तीन भागोंमें बँटी हैं। 'तिप् तस् अन्ति'—ये तीन प्रथमपुरुष हैं।
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'सिप्, थस्, थ'—ये तीन मध्यमपुरुष हैं। तथा 'मिप्, वस्, मस्'—ये उत्तमपुरुष कहे गये हैं॥ १–५$\frac{१}{२}$॥
'त, आताम्, झ'—ये आत्मनेपदके प्रथमपुरुषसम्बन्धी प्रत्यय हैं। 'थास्, आथाम्, ध्वम्'—ये मध्यमपुरुष हैं। 'इ, वहि, महिङ्'—ये उत्तमपुरुष हैं। आत्मनेपदके नौ प्रत्यय 'तङ्' कहलाते हैं और दोनों पदोंके प्रत्यय 'तिङ्' शब्दसे समझे जाते हैं। क्रियावाची 'भू', वा आदि धातु कहे गये हैं। भू, एध्, पच्, नन्द्, ध्वंस्, स्रंस्, पद्, अद्, शीङ्, क्रीड्, हु, हा, धा, दिव्, स्वप्, नह्, षूञ्, तुद्, मृश्, मुच्, रुध्, भुज्, त्यज्, तन्, मन् और कृ—ये सब धातु शप् आदि विकरण होनेपर क्रियार्थबोधक होते हैं। 'क्रीड्, वृङ्, ग्रह्, चुर्, पा, नी तथा अचि'—ये तथा उपर्युक्त धातु 'नायक' (प्रधान) हैं। इन्हींके समान अन्य धातुओंके भी रूप होते हैं। 'भू' धातुसे क्रमशः 'तिङ्' प्रत्यय होनेपर 'भवति, भवतः, भवन्ति'—इत्यादि रूप होते हैं। इनका वाक्यमें प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये—'स भवति। तौ भवतः। ते भवन्ति। त्वं भवसि। युवां भवथः। यूयं भवथ। अहं भवामि। आवां भवावः। वयं भवामः।' ये 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें परस्मैपदी रूप हैं। 'भू' धातुका अर्थ है—'होना'। 'एध्' धातु 'वृद्धि' अर्थमें प्रयुक्त होता है। यह आत्मनेपदी धातु है। इसका 'लट्' लकारमें प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'एधते' रूप बनता है। वाक्यमें प्रयोग—'एधते कुलम्।' (कुलकी वृद्धि होती है)—इस प्रकार होता है। 'लट्' लकारमें 'एध्' धातुके शेष रूप इस प्रकार होते हैं—'द्वे एधेते'। (दो बढ़ते हैं)। यह द्विवचनका रूप है। बहुवचनमें 'एधन्ते' रूप होता है। इस प्रकार प्रथमपुरुषके एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप बताये गये। अब मध्यम और उत्तम पुरुषोंके रूप प्रस्तुत किये जाते हैं—'एधसे' यह मध्यमपुरुषका एकवचनान्त रूप है। वाक्यमें इसका प्रयोग इस प्रकार हो सकता है—'त्वं हि मेधया एधसे।' (निश्चय ही तुम बुद्धिसे बढ़ते हो।) 'एधेये, एधध्वे' ये दोनों मध्यमपुरुषके क्रमशः द्विवचनान्त और बहुवचनान्त रूप हैं। 'एधे, एधावहे, एधामहे'—ये उत्तमपुरुषमें क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप हैं। वाक्यमें प्रयोग—'अहं धिया एधे।' (मैं बुद्धिसे बढ़ता हूँ।) 'आवां मेधया एधावहे।' (हम दोनों मेधासे बढ़ते हैं।) 'वयं हरेर्भक्त्या एधामहे।' (हम श्रीहरिकी भक्तिसे बढ़ते हैं।) 'पाक' अर्थमें 'पच्' धातुका प्रयोग होता है। उसके 'पचति' इत्यादि रूप पूर्ववत् ('भू' धातुके समान) होते हैं। 'भू' धातुसे भावमें और 'अनु+भू' धातुसे कर्ममें 'यक्' प्रत्यय होनेपर क्रमशः 'भूयते' और 'अनुभूयते' रूप होते हैं। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रिया केवल एकवचनान्त ही होती है और सभी पुरुषोंमें कर्ता तृतीयान्त होनेके कारण एक ही क्रिया सबके लिये प्रयुक्त होती है। यथा—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' जहाँ कर्ममें प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म उक्त होनेके कारण उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और तदनुसार सभी पुरुषों तथा सभी वचनोंमें क्रियाके रूप प्रयोगमें लाये जाते हैं। यथा—'असौ अनुभूयते। तौ अनुभूयेते। ते अनुभूयन्ते। त्वम् अनुभूयसे। युवाम् अनुभूयेथे। यूयम् अनुभूयध्वे। अहम् अनुभूये। आवाम् अनुभूयावहे। वयम् अनुभूयामहे'॥ ६–१३॥
अर्थविशेषको लेकर धातुसे 'णिच्', 'सन्', 'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' होते हैं। इन्हें क्रमसे 'ण्यन्त', 'सन्नन्त', 'यङन्त' और 'यङ्लुगन्त' कहते हैं। जहाँ किसी क्रियाके कर्ताका कोई प्रेरक या प्रयोजक कर्ता होता है, वहाँ प्रयोजक
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कर्ताकी 'हेतु' संज्ञा होती है और प्रयोज्य कर्ता 'कर्म' बन जाता है। प्रयोजकके व्यापार प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे 'णिच्' प्रत्यय होता है। उसके होनेपर 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें 'भावयति' इत्यादि रूप होते हैं। उदाहरणके लिये—'ईश्वरो भवति, तं यज्ञदत्तो ध्यानादिना प्रेरयति इत्यस्मिन्नर्थे यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति इति प्रयोगो भवति' (ईश्वर होता है और यज्ञदत्त उसको ध्यानादिके द्वारा प्रेरित करता है—इस अर्थको व्यक्त करनेके लिये 'यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति' यह प्रयोग बनता है)।$^१$ जहाँ कोई धातु इच्छाक्रियाका कर्म बनता है तथा इच्छाक्रियाका कर्ता ही उस धातुका भी कर्ता होता है, वहाँ उस धातुसे इच्छाकी अभिव्यक्तिके लिये 'सन्' प्रत्यय होता है। 'भू' धातुके सन्नन्तमें 'बुभूषति' इत्यादि रूप होते हैं। यथा—'भवितुम् इच्छति बुभूषति।' (होना चाहता है।) वक्ता चाहे तो 'बुभूषति' कहे अथवा 'भवितुम् इच्छति'—इस वाक्यका प्रयोग करे। यह स्मरणीय है कि 'सन्' और 'यङ्' प्रत्यय परे रहनेपर धातुका द्वित्व हो जाता है। शेष कार्य व्याकरणकी प्रक्रियाके अनुसार होते हैं। जहाँ क्रियाका समभिहार हो, अर्थात् पुनः-पुनः या अतिशयरूपसे क्रियाका होना बताया जाय, वहाँ उक्त अभिप्रायका द्योतन या प्रकाशन करनेके लिये धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है। 'यङ्' और 'यङ्लुगन्त' में धातुका द्वित्व होनेपर पूर्वभागके, जिसे 'अभ्यास' कहते हैं, 'इक्' का 'गुण' हो जाता है। 'भू' धातुके 'यङन्त' में 'बोभूयते' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुनः पुनः अतिशयेन वा भवति'—इस अर्थमें 'बोभूयते' क्रियाका प्रयोग होता है। यथा—'वाद्यं बोभूयते।' (वाद्यवादन बार-बार या अधिक मात्रामें होता है)। 'यङ्लुगन्त' में 'भू' धातुके 'बोभोति' इत्यादि रूप होते हैं। अर्थ वही है, जो 'यङन्त' क्रियाका होता है। 'यङन्त' में आत्मनेपदीय प्रत्यय होते हैं और 'यङ्लुगन्त' में परस्मैपदीय ॥ १४ ॥
कहीं-कहीं 'नाम' या 'सुबन्त' शब्दसे 'क्यच्' आदि प्रत्यय होनेपर उस शब्दकी 'धातु' संज्ञा होती है और उसके धातुके ही समान रूप चलते हैं। ऐसे प्रकरणको 'नामधातु' कहते हैं। जो इच्छाका कर्म हो और इच्छा करनेवालेका सम्बन्धी हो, ऐसे 'सुबन्त' से इच्छा-अर्थमें विकल्पसे 'क्यच्' प्रत्यय होता है। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति।' (अपने लिये पुत्र चाहता है)—इस अर्थमें 'पुत्रम्' इस 'सुबन्त' पदसे 'क्यच्' प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप होनेपर 'पुत्र अम् य' हुआ। 'सनाद्यन्ता धातवः।' (३।१।३२) से धातुसंज्ञा होकर 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।' (२।४।७०) से 'अम्' का लोप हो गया। पुत्र=य—इस स्थितिमें 'क्यचि च।' (७।४।३३)—इस सूत्रके अनुसार 'अकार' के स्थानमें 'ईकार' हो गया। इस प्रकार 'पुत्रीय' से 'तिप्' 'शप्' आदि कार्य होनेपर 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। इसी अर्थमें 'काम्यच्' प्रत्यय भी होता है और 'पुत्र' शब्दसे 'काम्यच्' प्रत्यय होनेपर 'पुत्रकाम्यति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पटत् भवति इति पटपटायते।' यहाँ 'अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्।' (५।४।५७)—इस सूत्रके अनुसार 'भू' के योगमें 'डाच्' प्रत्यय होनेपर 'पटत् डा' इस स्थितिमें 'डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्।' इस वार्तिकसे द्वित्व होकर 'नित्यमाम्रेडितं डाचि।' इस वार्तिकसे पररूप हुआ तो टि-लोपके अनन्तर 'पटपटा+भू'—यह अवस्था प्राप्त हुई। इसके बाद 'लोहितादिडाब्भ्यः क्यष्।' (३।१।१३)—इस सूत्रसे 'भवति' इस अर्थमें 'क्यष्' प्रत्यय हुआ तो 'पटपटा+क्यष्' बना। फिर अनुबन्धलोप, धातु संज्ञा तथा धातुसम्बन्धी कार्य होनेसे 'पटपटायते'—यह रूप सिद्ध हुआ। इसका अर्थ
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है कि 'पटपट' की आवाज होती है। 'घटं करोति।'- इस अर्थमें 'तत्करोति तदाचष्टे' के अनुसार 'घटयति' रूप बनता है। 'सन्नन्त' से 'णिच्' प्रत्यय किया जाय तो 'भू' धातुके सन्नन्त रूप 'बुभूषति' की जगह 'बुभूषयति' रूप बनेगा। प्रयोग- 'गुरुः शिष्यं बुभूषयति' ॥ १५ ॥
'भू' धातुके 'विधिलिङ्' लकारमें क्रमशः ये रूप होते हैं- 'भवेत्, भवेताम्, भवेयुः। भवेः, भवेतम्, भवेत। भवेयम्, भवेव, भवेम'। 'एध्' धातुके 'विधिलिङ्' में इस प्रकार रूप बनते हैं- एधेत, एधेयाताम्, एधेरन्। एधेथाः, एधेयाथाम्, एधेध्वम्। एधेय, एधेवहि, एधेमहि।' वाक्यप्रयोग- 'ते मनसा एधेरन्' (वे मनसे बढ़ें- उन्नति करें)। 'त्वं श्रिया एधेथाः।' (तुम लक्ष्मीके द्वारा बढ़ो इत्यादि)। 'भू' धातुके 'लोट्' लकारमें ये रूप होते हैं- 'भवतु, भवतात्, भवताम्, भवन्तु। भव-भवतात्, भवतम्, भवत। भवानि, भवाव, भवाम।' 'एध्' धातुके 'लोट्' लकारमें ये रूप जानने चाहिये- 'एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्। एधस्व, एधेथाम्, एधध्वम्। एधै, एधावहै, एधामहै।' 'पच्' धातुके भी आत्मनेपदमें ऐसे ही रूप होते हैं। यथा उत्तमपुरुषमें - 'पचै, पचावहै, पचामहै।' 'अभि' पूर्वक 'नदि' धातुका 'लङ्' लकारमें प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'अभ्यनन्दत्'- यह रूप होता है। 'पच्' धातुके 'लङ्' लकारमें - 'अपचत्, अपचताम्, अपचन्' इत्यादि रूप होते हैं। 'भू' धातुके 'लङ्' लकारमें 'अभवत्, अभवताम्, अभवन्' इत्यादि रूप होते हैं। 'पच्' धातुके 'लङ्' लकारके उत्तमपुरुषमें - 'अपचम्, अपचाव, अपचाम'-ये रूप होते हैं। 'एध्' धातुके 'लङ्' लकारमें-ऐधत, ऐधेताम्, ऐधन्त। ऐधथाः, ऐधेथाम्, ऐधध्वम्। ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि-ये रूप होते हैं। 'भू' धातुके 'लुङ्' लकारमें अभूत्, अभूताम्, अभूवन्। अभूः, अभूतम्, अभूत। अभूवम्, अभूव, अभूम'-ये रूप होते हैं। 'एध्' धातुके 'लुङ्' लकारमें ऐधिष्ट, ऐधिषाताम्, ऐधिषत। ऐधिष्ठाः, ऐधिषाथाम्, ऐधिध्वम्। ऐधिषि, ऐधिष्वहि, ऐधिष्महि'-ये रूप जानने चाहिये। वाक्यप्रयोग- 'नरौ ऐधिषाताम्' (दो मनुष्य बढ़ें)।
'भू' धातुके 'परोक्षलिट्' में 'बभूव, बभूवतुः, बभूवुः। बभूविथ, बभूवथुः, बभूव। बभूव, बभूविव, बभूविम।' -ये रूप होते हैं। 'पच्' धातुके आत्मनेपदी 'लिट्' लकारमें प्रथमपुरुषके रूप इस प्रकार हैं- 'पेचे, पेचाते, पेचिरे।' 'एध्' धातुके 'लिट्' लकारमें इस प्रकार रूप समझने चाहिये- 'एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे। एधाञ्चकृषे, एधाञ्चक्राथे, एधाञ्चकृढ्वे। एधाञ्चक्रे, एधाञ्चकृवहे, एधाञ्चकृमहे।' 'पच्' धातुके 'परोक्षलिट्' में प्रथमपुरुषके रूप बताये गये हैं। मध्यम और उत्तम पुरुषके रूप इस प्रकार होते हैं- 'पेचिषे, पेचाथे पेचिध्वे। पेचे, पेचिवहे, पेचिमहे।' 'भू' धातुके 'अनद्यतन भविष्य लुट्' लकारमें इस प्रकार रूप जानने चाहिये- 'भविता, भवितारौ, भवितारः। भवितासि, भवितास्थः, भवितास्थ। भवितास्मि, भवितास्वः, भवितास्मः।' वाक्यप्रयोग- 'हरादयो भवितारः।' (हर आदि होंगे।) 'वयं भवितास्मः।' (हम होंगे।) 'पच्' धातुके 'लुट्' लकारमें 'परस्मैपदीय' रूप इस प्रकार हैं- 'पक्ता, पक्तारौ, पक्तारः, पक्तासि। (शेष भूधातुकी तरह)। वाक्यप्रयोग- 'त्वं शुभौदनं पक्तासि।' (तुम अच्छा भात राँधोगे।) 'पच्' धातुके 'लुट्' लकारमें 'आत्मनेपदीय' रूप इस प्रकार हैं- प्रथमपुरुषमें तो 'परस्मैपदीय' रूपके समान ही होते हैं, मध्यम और उत्तम पुरुषमें- 'पक्तासे, पक्तासाथे, पक्ताध्वे। पक्ताहे, पक्तास्वहे, पक्तास्महे।' वाक्यप्रयोग- 'अहं पक्ताहे।' (मैं पकाऊँगा।) 'वयं हरेश्चरुं पक्तास्महे।' (हम श्रीहरिके लिये चरु पकावेंगे या तैयार करेंगे।) 'आशीर्लिङ्'
* अध्याय ३५९ * ७७९
में ‘भू’ धातुके रूप इस प्रकार जानने चाहिये— ‘भूयात्, भूयास्ताम्, भूयासुः। भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त। भूयासम्, भूयास्व, भूयास्म। वाक्यप्रयोग— ‘सुखं भूयात्।’ (सुख हो।) ‘हरिशङ्करौ भूयास्ताम्।’ (विष्णु और शिव हों।) ‘ते भूयासुः।’ (वे हों।) ‘त्वं भूयाः।’ (तुम होओ।) ‘युवाम् ईश्वरौ भूयास्तम्।’ (तुम दोनों ईश्वर—ऐश्वर्यशाली होओ।) ‘यूयं भूयास्त।’ (तुम सब होओ।) ‘अहं भूयासम्।’ (मैं होऊँ।) ‘वयं सर्वदा भूयास्म।’ ‘यक्ष्’ धातुके आत्मनेपदी आशिष्-लिङ् में इस प्रकार रूप होते हैं—‘यक्षीष्ट, यक्षीयास्ताम्, यक्षीरन्। यक्षीष्ठाः, यक्षीयास्थाम्, यक्षीध्वम्। यक्षीय, यक्षीवहि, यक्षीमहि।’ इसी प्रकार ‘एध्’ धातुके ‘आशीर्लिङ्’ में ये रूप जानने चाहिये—‘एधिषीष्ट, एधिषीयास्ताम्, एधिषीरन्। एधिषीष्ठाः, एधिषीयास्थाम्, एधिषीध्वम्। एधिषीय, एधिषीवहि, एधिषीमहि। ‘यक्ष्’ धातुके ‘लृङ्’ लकारमें ये रूप होते हैं—‘अयक्ष्यत, अयक्ष्येताम्, अयक्ष्यन्त। अयक्ष्यथाः, अयक्ष्येथाम्, अयक्ष्यध्वम्। अयक्ष्ये, अयक्ष्यावहि, अयक्ष्यामहि।’ ‘एध्’ धातुके ‘लृङ्’ लकारके रूप इस प्रकार हैं—‘ऐधिष्यत, ऐधिष्येताम्, ऐधिष्यन्त। ऐधिष्यथाः, ऐधिष्येथाम्, ऐधिष्यध्वम्। ऐधिष्ये, ऐधिष्यावहि, ऐधिष्यामहि।’ वाक्यप्रयोग—काचिद् बाधा नाभाविष्यच्चेद् वयम् अरेः ऐधिष्यामहि। (यदि कोई बाधा न पड़े तो हम अवश्य शत्रुसे बढ़ जायँ।) ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें ‘भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति’— इत्यादि रूप होते हैं। ‘एध्’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें— ‘एधिष्यते, एधिष्येते, एधिष्यन्ते। एधिष्यसे, एधिष्येथे, एधिष्यध्वे। एधिष्ये, एधिष्यावहे, एधिष्यामहे।’ ये रूप होते हैं॥ १६—२९॥
इसी प्रकार ‘णिजन्त’ वि-पूर्वक ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें—‘विभावयिष्यति, विभावयिष्यतः, विभावयिष्यन्ति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘यङ्लुगन्त’ ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें ‘बोभविष्यति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘नामधातु’ में घटं करोति, पटं करोति’ इत्यादि अर्थमें जिनके ‘घटयति, पटयति’ इत्यादि रूप कह आये हैं, उन्हींके ‘विधिलिङ्’ में ‘घटयेत्, पटयेत्’ इत्यादि रूप होते हैं। इसी तरह ‘पुत्रीयति’ और ‘पुत्रकाम्यति’ इत्यादि नामधातु-सम्बन्धिनी क्रियाओंके रूपोंकी ऊहा कर लेनी चाहिये॥ ३०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘तिङ्-विभक्त्यन्त सिद्ध रूपोंका वर्णन’ नामक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५८॥
तीन सौ उनसठवाँ अध्याय
कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूप
कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन! यह जानना चाहिये कि ‘कृत्’ प्रत्यय भाव, कर्म तथा कर्ता—तीनोंमें होते हैं। वे इस प्रकार हैं— ‘अच्’, ‘अप्’, ‘ल्युट्’, ‘क्तिन्’, भावार्थक ‘घञ्’ करणार्थक ‘घञ्,’, ‘युच्’, ‘अ’ तथा ‘तव्य’ आदि। ‘अच्’ प्रत्यय होनेपर ‘विनी+अच्’ (गुण, अयादेश और विभक्तिकार्य)=विनयः। (ऋदोरप्) उत्कृ+अप्=उत्करः। प्रकृ+अप्=प्रकरः। दिव+अच्=देवः। भद्र+अच्=भद्रः। श्रीकृ+अप्=श्रीकरः।’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘ल्युट्’ प्रत्यय होनेपर शुभ+ल्युट् (लकार, टकारकी इत्संज्ञा, लघूपध गुण) ‘युवोरनाकौ।’ (७। १। १) से अनादेश=‘शोभनम्’—इस रूपकी सिद्धि होती है। ‘वृध्’ धातुसे ‘क्तिन्’ प्रत्यय करनेपर ‘वृध्+क्ति’
७८० * अग्निपुराण *
(ककारकी इत्संज्ञा, तकारका धकारादेश, पूर्व धकारका जश्त्वेन दकार और विभक्तिकार्य)= ‘वृद्धिः’। स्तु+क्तिन्=‘स्तुतिः’। मन्+क्तिन्= ‘मतिः’—ये पद सिद्ध होते हैं। ‘भू’ धातुसे ‘घञ्’ प्रत्यय होनेपर भू+घञ्=‘भावः’—यह पद बनता है। णिजन्त ‘कृ’ धातुसे ‘ण्यासश्रन्थो युच्’ (३।३।१०७)—इस सूत्रके अनुसार ‘युच्’ प्रत्यय करनेपर कारि+यु (णिलोप, अनादेश)= ‘कारणा’। ‘भावि+युच्’= ‘भावना’ इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। प्रत्ययान्त धातुसे स्त्रीलिङ्गमें ‘अ’ प्रत्यय होता है। उसके होनेपर ‘चिकित्स+अ, चिकीर्ष+अ= चिकित्सा, चिकीर्षा’ इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। धातुसे ‘तव्य’ और ‘अनीय’ प्रत्यय भी होते हैं। कृ+तव्य=कर्तव्यम्। कृ+अनीय=करणीयम् —इत्यादि पदोंकी सिद्धि होती है। ‘अचो यत्।’ (३।१।९७) सूत्रके अनुसार ‘अजन्त’ धातुसे ‘यत्’ प्रत्यय होता है। उसके होनेपर दा+यत् (‘ईद्यति।’ सूत्रसे ‘आ’ के स्थानमें ‘ईकारादेश’, गुण और विभक्तिकार्य)= देयम्। ध्यै+यत् (‘आदेच उपदेशेऽशिति।’ से ‘ऐ’ के स्थानमें आ, ‘ईद्यति’ से ‘आ’ के स्थानमें ‘ई’ (विभक्तिकार्य) =ध्येयम्—ये पद सिद्ध होते हैं। ‘ऋहलोर्ण्यत्’ (३।१।१२४)—इस सूत्रके अनुसार ण्यत् प्रत्यय होनेपर कृ+ण्यत् (‘चुटू’ १।३।७१) सूत्रसे णकारकी तथा ‘हलन्त्यम्।’ (१।३।३) सूत्रसे तकारकी इत्संज्ञा। ‘अचोञ्णिति।’ (७।२।११५) से ‘वृद्धि’ तथा विभक्तिकार्य)= ‘कार्यम्’—यह पद सिद्ध होता है। यहाँतक ‘कृत्यसंज्ञक’ प्रत्यय कहे गये हैं॥ १-४॥
‘क्त’ आदि प्रत्यय कर्तामें होते हैं—यह जाननेयोग्य बात है। वे कहीं-कहीं भाव और कर्ममें भी होते हैं। कर्तामें ‘गम्’ धातुसे ‘क्त’ प्रत्यय होनेपर ‘गतः’—यह रूप बनता है। प्रयोगमें (‘स ग्रामं गतः, स ग्रामे गतः।’ इत्यादि वाक्य होते हैं। इस वाक्यका अर्थ है—वह गाँवको गया)। कर्ममें ‘क्त’ प्रत्ययका उदाहरण है—‘त्वया गुरुः आश्लिष्टः।’ (तुमने गुरुका आलिङ्गन किया।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय होनेसे कर्मभूत ‘गुरु’ उक्त हो गया। अतः उसमें प्रथमा विभक्ति हुई। ‘त्वम्’ यह कर्ता अनुक्त हो गया। अतः उसमें तृतीया विभक्ति हुई। ‘आश्लिष्+क्त’ (ककारकी इत्संज्ञा, ‘त’ के स्थानमें ‘ष्टुत्व’ के नियमसे ‘टकार’ हुआ। तदनन्तर विभक्तिकार्य करनेपर)=‘आश्लिष्टः’ पद सिद्ध हुआ। वर्तमानार्थबोधक ‘लट्’ लकारमें धातुसे ‘शतृ’ और ‘शानच्’ प्रत्यय भी होते हैं। परस्मैपदमें ‘शतृ’ और आत्मनेपदमें ‘शानच्’ होता है। ‘भू’ धातुसे ‘शतृ’ प्रत्यय करनेपर ‘भवन्’ और ‘एध्’ धातुसे ‘शानच्’ प्रत्यय करनेपर ‘एधमानः’—ये पद सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण धातुओंसे ‘ण्वुल्’ और ‘तृच्’ प्रत्यय होते हैं। ‘भू’ धातुसे कर्ता अर्थमें ‘ण्वुल्’ करनेपर ‘भावकः’ और ‘तृच्’ प्रत्यय करनेपर ‘भविता’— ये पद सिद्ध होते हैं। ‘भू’ धातुसे ‘क्विप्’ प्रत्यय भी हुआ करता है। ‘स्वयम्+भू+क्विप्=स्वयम्भूः’—इस पदकी सिद्धि होती है। भूतार्थ-बोधके लिये ‘लिट्’ लकारमें धातुसे ‘क्वसु’ और ‘कानच्’ प्रत्यय होते हैं। परस्मैपदमें ‘क्वसु’ और आत्मनेपदमें ‘कानच्’ होता है। ‘भू’ धातुसे ‘क्वसु’ करनेपर ‘बभूविवान्’ और ‘पच्’ धातुसे ‘क्वसु’ प्रत्यय करनेपर ‘पेचिवान्’— ये पद सिद्ध होते हैं। इन शब्दोंकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—‘स बभूव इति बभूविवान्।’ (वह हुआ था।) ‘स पपाच इति पेचिवान्।’ (उसने पकाया था।) ‘आत्मनेपदीय पच्’ धातुसे ‘कानच्’ प्रत्यय करनेपर ‘पेचानः’ पद बनता है। ‘श्रद्+धा’—इस धातुसे ‘लिट्’ लकारमें ‘कानच्’ प्रत्यय करनेपर ‘श्रद्दधानः’—यह पद सिद्ध होता है। ‘स पेचे इति पेचानः। स श्रद्दधे इति श्रद्दधानः’। ‘कर्मण्यण्’ से ‘अण्’ प्रत्यय करनेपर ‘कुम्भकारः’ आदि पद सिद्ध होते हैं। भूत और वर्तमान अर्थमें भी ‘उणादि’
* अध्याय ३६० * ७८१
प्रत्यय होते हैं। 'ववौ वाति इति वा वायुः।' वा+उण् (युगागम एवं विभक्तिकार्य)=वायुः। 'पा+उण्=पायुः।' 'कृ+ उण्= कारुः।' इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। 'बहुलं छन्दसि' इस नियमके अनुसार सभी 'कृत्' प्रत्यय वेदमें बाहुल्येन उपलब्ध होते हैं। वहाँ कहीं प्रवृत्ति, कहीं अप्रवृत्ति, कहीं वैकल्पिक विधान और कहीं कुछ और ही विधि दृष्टिगोचर होती है॥ ५-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूपोंका संक्षिप्त वर्णन' नामक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५९॥
तीन सौ साठवाँ अध्याय
स्वर्ग-पाताल आदि वर्ग
अग्निदेव कहते हैं—कात्यायन! स्वर्ग आदिके नाम और लिङ्ग जिनके स्वरूप हैं, उन शुद्ध स्वरूप श्रीहरिका मैं वर्णन करता हूँ—स्वः [अव्यय], स्वर्ग, नाक, त्रिदिव [पुंल्लिङ्ग], द्यो, दिव्—ये दो स्त्रीलिङ्ग और त्रिविष्टप [नपुंसक]—ये सब 'स्वर्गलोक'के नाम हैं। देव, वृन्दारक और लेख—ये (पुँल्लिङ्ग शब्द) देवताओंके नाम हैं। 'रुद्र' आदि* शब्द गणदेवताके वाचक हैं। विद्याधर, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किंनर, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध और भूत—ये सब 'देवयोनि'के अन्तर्गत हैं। देवद्विट्, असुर और दैत्य—ये असुरोंके तथा सुगत और तथागत—ये बुद्धके नाम हैं। ब्रह्मा, आत्मभू और सुरज्येष्ठ—ये ब्रह्माजीके; विष्णु, नारायण और हरि—ये भगवान् विष्णुके; रेवतीश, हली और राम—ये बलभद्रजीके तथा काम, स्मर और पञ्चशर—ये कामदेवके नाम हैं। लक्ष्मी, पद्मालया और पद्मा—ये लक्ष्मीजीके तथा शर्व, सर्वेश्वर और शिव—ये भगवान् शंकरके नाम हैं। उनकी बँधी हुई जटाके दो नाम हैं—कपर्द और जटाजूट। उनके धनुषके भी दो नाम हैं—पिनाक और अजगव। शिवजीके पार्षद प्रमथ कहलाते हैं। मृडानी, चण्डिका और अम्बिका—ये पार्वतीजीके; द्वैमातुर और गजास्य (गजानन)—ये गणेशजीके तथा सेनानी, अग्निभू और गुह—ये स्वामी कार्तिकेयजीके नाम हैं। आखण्डल, शुनासीर, सुत्रामा और दिवस्पति—ये इन्द्रके तथा पुलोमजा, शची और इन्द्राणी—ये उनकी प्रियतमा शची देवीके नाम हैं। इन्द्रके महलका नाम वैजयन्त, पुत्रका नाम जयन्त और पाकशासनि तथा हाथीके नाम ऐरावत, अभ्रमातङ्ग, ऐरावण और अभ्रमुवल्लभ हैं। ह्रादिनी (स्त्रीलिङ्ग), पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिंगमें प्रयुक्त होनेवाला वज्र, कुलिश (नपुंसक), भिदुर (नपुंसक) और पवि (पुँल्लिङ्ग)—ये सब इन्द्रके वज्रके नाम हैं। व्योम-यान (नपुं०) तथा विमान (पुँल्लि० नपुं०)—ये आकाशमें विचरनेवाले देववाहनोंके नाम हैं। पीयूष, अमृत और सुधा—ये अमृतके नाम हैं। (इनमें सुधा तो स्त्रीलिङ्ग और शेष दोनों नाम नपुंसकलिंग हैं।) देवताओंकी सभा 'सुधर्मा' कहलाती है। देवताओंकी नदी गङ्गाका नाम स्वर्गङ्गा और सुरदीर्घिका है। उर्वशी आदि अप्सराओंको अप्सरा और स्वर्वेश्या कहते हैं। इनमें अप्सरस् शब्द स्त्रीलिङ्ग एवं बहुवचनमें प्रयुक्त होता है। हाहा, हूहू आदि गन्धर्वोंके नाम हैं। अग्नि, वह्नि, धनंजय, जातवेदा, कृष्णवर्त्मा, आश्रयाश, पावक, हिरण्यरेताः, सप्तार्चि,
* आदि शब्दसे वसु और आदित्य आदि नामोंको ग्रहण करना चाहिये। रुद्र ११, वसु ८ और आदित्य १२ हैं।
७८२ * अग्निपुराण *
शुक्ल, आशुशुक्षणि, शुचि और अप्पित—ये अग्निके नाम हैं तथा और्व, वाडव और वडवानल—ये समुद्रके भीतर जलनेवाली आगके नाम हैं। आगकी ज्वालाके पाँच नाम हैं—ज्वाल, कील, अर्चिष्, हेति और शिखा। इनमें पहले दो शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होते हैं। अर्चिष् नपुंसकलङ्ग है तथा हेति और शिखा स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं। आगकी चिनगारीके दो नाम हैं—स्फुलिङ्ग और अग्निकण। इनमें पहला तीनों लिङ्गोंमें और दूसरा केवल पुँल्लिङ्गमें प्रयुक्त होता है। धर्मराज, परेतराट्, काल, अन्तक, दण्डधर और श्राद्धदेव—ये यमराजके नाम हैं। रक्षस, कौणप, अश्रप, क्रव्याद, यातुधान और नैर्ऋति—ये राक्षसोंके नाम हैं। प्रचेता, वरुण और पाशी—ये वरुणके तथा श्वसन, स्पर्शन, अनिल, सदागति, मातरिश्वा, प्राण, मरुत् और समीरण—ये वायुके नाम हैं। जव, रंहस् और तरस्—ये वेगके वाचक हैं। (इनमें पहला पुँल्लिङ्ग और शेष दोनों शब्द नपुंसकलङ्ग हैं।) लघु, क्षिप्र, अर, द्रुत, सत्वर, चपल, तूर्ण, अविलम्बित और आशु—ये शीघ्रताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। (क्रियाविशेषण होनेपर इन सबका नपुंसकलङ्ग एवं एकवचनमें प्रयोग होता है।) सतत, अनारत, अश्रान्त, संतत, अविरत, अनिश, नित्य, अनवरत और अजस्र—ये निरन्तरके वाचक हैं। (ये भी प्रायः क्रियाविशेषणमें ही प्रयुक्त होते हैं, केवल 'नित्य' शब्दका ही अन्य विशेषणोंमें भी प्रयोग होता है।) अतिशय, भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ, बाढ और दृढ—ये अतिशय (अधिकमात्रा)-के वाचक हैं। गुह्यकेश, यक्षराज, राजराज और धनाधिप—ये कुबेरके नाम हैं। किंनर, किम्पुरुष, तुरंगवदन और मयु—ये किंनरोंके वाचक शब्द हैं। निधि और शेवधि—ये दोनों पुँल्लिङ्ग शब्द निधिके वाचक हैं। व्योम, अभ्र, पुष्कर, अम्बर, द्यो, दिव्, अन्तरिक्ष और ख—ये आकाशके पर्याय हैं। (इनमें द्यो और दिव् शब्द स्त्रीलिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं और शेष सब नपुंसकलङ्गमें।) काष्ठा, आशा, ककुभ् और दिश—ये दिशा-अर्थके बोधक हैं। अभ्यन्तर और अन्तराल शब्द मध्यके तथा चक्रवाल और मण्डल शब्द गोलाकार मण्डल एवं समुदायके वाचक हैं। तडित्वान्, वारिद, मेघ, स्तनयित्नु और बलाहक—ये मेघके पर्याय हैं॥ १—२१॥
बादलोंकी घटाका नाम है कादम्बिनी और मेघमाला तथा स्तनित और गर्जित—ये (नपुंसकलङ्ग) शब्द मेघगर्जनाके वाचक हैं। शम्पा, शतह्रदा, ह्लादिनी, ऐरावती, क्षणप्रभा, तडित्, सौदामिनी (सौदामनी), विद्युत्, चञ्चला और चपला—ये बिजलीके पर्याय हैं। स्फूर्जथु और वज्र-निर्घोष—ये दो बिजलीकी गड़गड़ाहटके नाम हैं। वर्षाकी रुकावटको वृष्टिघात और अवग्रह कहते हैं। धारा-सम्पात और आसार—ये दो मुसलाधार वृष्टिके नाम हैं। जलके छींटों या फुहारोंको शीकर कहते हैं। वर्षाके साथ गिरनेवाले ओलोंका नाम करका है। जब मेघोंकी घटासे दिन छिप जाय तो उसे दुर्दिन कहते हैं। अन्तर्धा, व्यवधा, पुँल्लिङ्गमें प्रयुक्त होनेवाला अन्तर्धि तथा (नपुंसकलङ्ग) अपवारण, अपिधान, तिरोधान, पिधान और आच्छादन—ये आठ अन्तर्धान (अदृश्य होने)-के नाम हैं। अब्ज, जैवात्रिक, सोम, ग्लौः, मृगाङ्क, कलानिधि, विधु तथा कुमुद-बन्धु—ये चन्द्रमाके पर्याय हैं। चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलका नाम है—बिम्ब और मण्डल। इनमें बिम्ब शब्दका पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलङ्गमें तथा मण्डल-शब्दका तीनों लिङ्गोंमें
* अध्याय ३६० * ७८३
प्रयोग होता है। चन्द्रमाके सोलहवें भागको कला कहते हैं। भित्त, शकल और खण्ड—ये टुकड़ेके वाचक हैं। चाँदनीको चन्द्रिका, कौमुदी और ज्योत्स्ना कहते हैं। प्रसाद और प्रसन्नता—ये निर्मलता और हर्षके बोधक हैं। लक्षण, लक्ष्म और चिह्न—ये चिह्नके तथा शोभा, कान्ति, द्युति और छवि—ये शोभाके नाम हैं। उत्तम शोभाको सुषमा कहते हैं। तुषार, तुहिन, हिम, अवश्याय, नीहार, प्रालेय, शिशिर और हिम—ये पालेके वाचक हैं। नक्षत्र, ऋक्ष, भ, तारा, तारका और उडु—ये नक्षत्रके पर्याय हैं। इनमें उडु शब्द विकल्पसे स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक होता है। गुरु, जीव और आङ्गिरस—ये बृहस्पतिके; उशना, भार्गव और कवि—ये शुक्राचार्यके तथा विधुंतुद, तम और राहु—ये तीन राहुके नाम हैं। राशियोंके उदयको लग्न कहते हैं। मरीचि और अत्रि आदि* सप्तर्षि 'चित्रशिखण्डी' के नामसे प्रसिद्ध हैं। हरिदश्व, ब्रध्न, पूषा, द्युमणि, मिहिर और रवि—ये सूर्यके नाम हैं। परिवेष, परिधि, उपसूर्य्यक और मण्डल—ये उत्पात आदिके समय दिखायी देनेवाले सूर्यमण्डलके घेरेका बोध करानेवाले हैं। किरण, उस्र, मयूख, अंशु, गभस्ति, घृणि, धृष्णि, भानु, कर, मरीचि और दीधिति—ये ग्यारह सूर्यकी किरणोंके नाम हैं। इनमें मरीचि शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होता है तथा दीधिति शब्दका प्रयोग केवल स्त्रीलिङ्गमें होता है। प्रभा, रुक्, रुचि, त्विट्, भा, आभा, छवि, द्युति, दीप्ति, रोचिष् और शोचिष्—ये प्रभाके नाम हैं। इनमें रोचिष् और शोचिष्—ये दो शब्द केवल नपुंसकलिंगमें प्रयुक्त होते हैं (शेष सभी स्त्रीलिङ्ग हैं)। प्रकाश, द्योत और आतप—ये तीन धूप या घामके नाम हैं। कोष्ण, कवोष्ण, मन्दोष्ण और कदुष्ण—ये थोड़ी गरमीका बोध करानेवाले हैं। यद्यपि स्वरूपसे ये नपुंसकलिंग हैं, तथापि जब थोड़ी गरमी रखनेवाली किसी वस्तुके विशेषण होते हैं तो विशेष्यके अनुसार इनका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। तिग्म, तीक्ष्ण और खर—ये अधिक गर्मीके वाचक हैं। ये भी पूर्ववत् गुणबोधक होनेपर नपुंसकमें और गुणवान्के विशेषण होनेपर विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। दिष्ट, अनेहा और काल—ये समयके पर्याय हैं। घस्र, दिन और अहन्—ये दिनके, सायं शब्द सायंकालका और संध्या तथा पितृप्रसू—ये दो संध्याके नाम हैं। प्रत्यूष, अहर्मुख, कल्य, उषस् और प्रत्यूषस्—ये प्रभातकालके वाचक हैं। दिनके प्रथम भागको प्राह्ण, अन्तिम भागको अपराह्न और मध्यभागको मध्याह्न कहते हैं—इन तीनोंका समुदाय त्रिसंध्य कहलाता है। शर्वरी, यामी (यामिनी) और तमी—ये रात्रिके वाचक हैं। अँधेरी रातको तमिस्रा और चाँदनी रात्रिको ज्योत्स्नी कहते हैं। आगामी और वर्तमान—इन दो दिनोंसहित बीचकी रात्रिका बोध करानेके लिये पक्षिणी शब्दका प्रयोग किया जाता है। आधी रातके दो नाम हैं—अर्धरात्र और निशीथ। रात्रिके प्रारम्भको प्रदोष और रजनीमुख कहते हैं। प्रतिपदा और पूर्णिमा या अमावास्याके बीचमें जो संधिका समय है उसे पर्वसंधि कहते हैं। दोनों पञ्चदशियों अर्थात् पूर्णिमा और अमावास्याको पक्षान्त कहा जाता है। पूर्णिमाके दो नाम हैं—पौर्णमासी तथा पूर्णिमा। यदि पूर्णिमाको चन्द्रोदयके समय प्रतिपद्का योग लग जानेसे एक कलासे हीन चन्द्रमाका उदय हो तो उस पूर्णिमाकी 'अनुमति' संज्ञा है तथा पूर्ण
* आदि पदसे अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठका ग्रहण होता है।
७८४ * अग्निपुराण *
चन्द्रमाके उदय लेनेपर उसे 'राका' कहते हैं। अमावस्या, अमावास्या दर्श और सूर्येन्दुसंगम—ये चार अमावास्याके नाम हैं। यदि सबेरे चतुर्दशीका योग होनेसे अमावास्याके प्रातःकाल चन्द्रमाका दर्शन हो जाय तो उस अमावास्याको 'सिनीवाली' कहते हैं। किंतु चन्द्रोदयकालमें अमावस्याका योग हो जानेसे यदि चन्द्रमाकी कला बिलकुल न दिखायी दे तो वह अमा 'कुहू' कहलाती है॥ २२-४०॥
संवर्त, प्रलय, कल्प, क्षय और कल्पान्त—ये पाँच प्रलयके नाम हैं। कलुष, वृजिन, एनस्, अघ, अंहस्, दुरित और दुष्कृत शब्द पापके वाचक हैं। धर्म शब्दका प्रयोग पुंल्लिङ्ग और नपुंसक दोनोंमें होता है। इसके पर्याय हैं—पुण्य, श्रेयस्, सुकृत और वृष। (इनमें आरम्भके तीन नपुंसक और वृष शब्द पुंल्लिङ्ग है।) मुत्, प्रीति, प्रमद, हर्ष, प्रमोद, आमोद, सम्मद, आनन्धु, आनन्द, शर्म, शात और सुख—ये सुख एवं हर्षके नाम हैं। स्वःश्रेयस, शिव, भद्र, कल्याण, मङ्गल, शुभ, भावुक, भविक, भव्य, कुशल और क्षेम—ये कल्याण-अर्थका बोध करानेवाले हैं। ये सभी शब्द केवल स्त्रीलिङ्गमें नहीं प्रयुक्त होते। दैव, दिष्ट, भागधेय, भाग्य, नियति और विधि—ये भाग्यके नाम हैं। इनमें नियति-शब्द स्त्रीलिङ्ग है (और विधि पुंल्लिङ्ग तथा आरम्भके चार शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं)। क्षेत्रज्ञ, आत्मा और पुरुष—ये आत्माके पर्याय हैं। प्रकृति या मायाके दो नाम हैं—प्रधान और प्रकृति। इनमें प्रकृति स्त्रीलिङ्ग है और प्रधान नपुंसकलिङ्ग। हेतु, कारण और बीज—ये कारणके वाचक हैं। इनमें पहला पुंल्लिङ्ग और शेष दो शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं। कार्यकी उत्पत्तिमें प्रधान हेतुके दो नाम हैं—निदान और आदिकारण। चित्त, चेतस्, हृदय, स्वान्त, हृत्, मानस और मनस्—ये चित्तके पर्याय हैं। बुद्धि, मनीषा, धिषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, मति, प्रेक्षा, उपलब्धि, चित्, संवित्, प्रतिपत्, ज्ञप्ति और चेतना—ये बुद्धिके वाचक शब्द हैं। धारणाशक्तिसे युक्त बुद्धिको 'मेधा' कहते हैं और मानसिक व्यापारका नाम संकल्प है। संख्या, विचारणा और चर्चा—ये विचारके, विचिकित्सा और संशय संदेहके तथा अध्याहार, तर्क और ऊह—ये तर्क-वितर्कके नाम हैं। निश्चित विचारको निर्णय और निश्चय कहते हैं। 'ईश्वर और परलोक नहीं है'—ऐसे विचारको मिथ्या-दृष्टि और नास्तिकता कहते हैं। भ्रान्ति, मिथ्यामति और भ्रम—ये तीन भ्रमात्मक ज्ञानके वाचक हैं। अङ्गीकार, अभ्युपगम, प्रतिश्रव और समाधि—ये स्वीकार अर्थका बोध करानेवाले हैं। मोक्षविषयक बुद्धिको ज्ञान और शिल्प एवं शास्त्रके बोधको विज्ञान कहते हैं। मुक्ति, कैवल्य, निर्वाण, श्रेयस्, निःश्रेयस, अमृत, मोक्ष और अपवर्ग—ये मोक्षके वाचक शब्द हैं। अज्ञान, अविद्या और अहम्मति—ये तीन अज्ञानके पर्याय हैं। इनमें पहला नपुंसक और शेष दो शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। एक-दूसरेकी रगड़से प्रकट हुई मनोहारिणी गन्धके अर्थमें 'परिमल' शब्दका प्रयोग होता है। वही गन्ध जब अत्यन्त मनोहर हो तो उसे 'आमोद' कहते हैं। घ्राणेन्द्रियको तृप्त करनेवाली उत्तम गन्धका नाम 'सुरभि' है। शुभ्र, शुक्ल, शुचि, श्वेत, विशद, श्येत, पाण्डर, अवदात, सित, गौर, वलक्ष, धवल और अर्जुन—ये श्वेत वर्णके वाचक हैं। कुछ पीलापन लिये हुए सफेदीको हरिण, पाण्डुर और पाण्डु कहते हैं। यह रंग भी बहुत हलका हो तो उसे धूसर कहते हैं। नील, असित, श्याम, काल, श्यामल और मेचक—ये कृष्णवर्ण (काले रंग) के बोधक हैं। पीत, गौर तथा हरिद्राभ—ये पीले रंगके और पालाश, हरित तथा हरित्—ये हरे रंगके वाचक हैं। रोहित, लोहित और रक्त—ये लाल रंगका बोध करानेवाले हैं। रक्त कमलके समान जिसकी
- अध्याय ३६० * ७८५
शोभा हो, उसे 'शोण' कहते हैं। जिसकी लालिमा जान न पड़ती हो, उस हलकी लालीका नाम 'अरुण' है। सफेदी लिये हुए लाली अर्थात् गुलाबी रंगको 'पाटल' कहते हैं। जिसमें काले और पीले—दोनों रंग मिले हों वह 'श्याव' और 'कपिश' कहलाता है। जहाँ कालेके साथ लाल रंगका मेल हो, उसे धूम्र तथा धूमल कहते हैं। कडार, कपिल, पिङ्ग, पिशङ्ग, कद्रु तथा पिङ्गल—ये भूरे रंगके वाचक हैं। चित्र, किर्मीर, कल्माष, शबल, एत और कर्बुर—ये चितकबरे रंगका बोध करानेवाले हैं॥ ४१—५६ $\frac{१}{२}$ ॥
व्याहार, उक्ति तथा लपित—ये वचनके समानार्थक शब्द हैं। व्याकरणके नियमोंसे च्युत—अशुद्ध शब्दको 'अपभ्रंश' तथा 'अपशब्द' कहते हैं। सुबन्त पदोंका समुदाय ('चैत्रेण शयितव्यम्' इत्यादि), तिङन्त पदोंका समूह ('पश्य पश्य गच्छति' इत्यादि), सुबन्त और तिङन्त—दोनों पदोंका समुदाय ('चैत्रः पचति' इत्यादि) अथवा कारकसे अन्वित क्रियाका बोध करानेवाला पद-समूह ('घटमानय') इत्यादि—ये सभी 'वाक्य' कहलाते हैं। पूर्वकालमें बीती हुई सच्ची घटनाओंका वर्णन करनेवाले ग्रन्थको 'इतिहास' तथा 'पुरावृत्त' कहते हैं। (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—इन) पाँच लक्षणोंसे युक्त व्यासादि मुनियोंके ग्रन्थका नाम 'पुराण' है। सच्ची घटनाको लेकर लिखी हुई पुस्तक 'आख्यायिका' कहलाती है। कल्पित प्रबन्धको 'कथा' कहते हैं। संग्रहके वाचक दो शब्द हैं—समाहार तथा संग्रह। अबूझ पहेलीको 'प्रवह्लिका' और 'प्रहेलिका' कहते हैं। पूर्ण करनेके लिये दी हुई संक्षिप्त पदावलीका नाम 'समस्या' और 'समासार्था' है। वेदार्थके स्मरणपूर्वक लिखे हुए धर्मशास्त्रको 'स्मृति' और 'धर्मसंहिता' कहते हैं। आख्या, आह्वा और अभिधान—ये नामके वाचक हैं। 'वार्ता' और 'वृत्तान्त'—दोनों समानार्थक शब्द हैं। हूति, आकारणा और आह्वान—ये पुकारनेके अर्थमें आते हैं। वाणीके आरम्भको 'उपन्यास' और 'वाङ्मुख' कहते हैं। विवाद और व्यवहार मुकदमेबाजीका नाम है। प्रतिवाक्य और उत्तर—ये दोनों समानार्थक शब्द हैं। उपोद्घात और उदाहार—ये भूमिकाके नाम हैं। झूठा कलङ्क लगानेको मिथ्याभिशंसन और अभिशाप कहते हैं। यश और कीर्ति—ये सुयशके नाम हैं। प्रश्न, पृच्छा और अनुयोग—इनका पूछनेके अर्थमें प्रयोग होता है। एक ही शब्दके दो-तीन बार उच्चारण करनेको 'आम्रेडित' कहते हैं। परायी निन्दाके अर्थमें कुत्सा, निन्दा और गर्हण शब्दका प्रयोग होता है। साधारण बातचीतको आभाषण और आलाप कहते हैं। पागलोंकी तरह कहे हुए असम्बद्ध या निरर्थक वचनका नाम प्रलाप है। बारंबार किये जानेवाले वार्तालापको अनुलाप कहते हैं। शोकयुक्त उद्गारका नाम विलाप और परिदेवन है। परस्पर विरुद्ध बातचीतको विप्रलाप और विरोधोक्ति कहते हैं। दो व्यक्तियोंके पारस्परिक वार्तालापका नाम संलाप है। सुप्रलाप और सुवचन—ये उत्तम वाणीके वाचक हैं। सत्यको छिपानेके लिये जिस वाणीका प्रयोग किया जाता है, उसे अपलाप तथा निह्नव कहते हैं। अमङ्गलमयी वाणीका नाम उशती है। हृदयमें बैठनेवाली युक्तियुक्त बातको संगत और हृदयंगम कहते हैं। अत्यन्त मधुर वाणीमें जो सान्त्वना दी जाती है, उसे सान्त्व कहते हैं। जिन बातोंका परस्पर कोई सम्बन्ध न हो, वे अबद्ध और निरर्थक कहलाती हैं। निष्ठुर और परुष शब्द कठोर वाणीके तथा अश्लील और ग्राम्य शब्द गंदी बातोंके बोधक हैं। प्रिय लगनेवाली वाणीको सूनृत कहते हैं। सत्य, तथ्य, ऋत और सम्यक्—ये यथार्थ वचनका बोध करानेवाले हैं। नाद, निस्वान, निस्वन, आरव, आराव, संराव और विराव—ये अव्यक्त शब्दके वाचक हैं। कपड़ों
७८६ * अग्निपुराण *
और पत्तोंसे जो आवाज होती है, उसे मर्मर कहते हैं। आभूषणोंकी ध्वनिका नाम शिञ्जित है। वीणाके स्वरको निक्वण और क्वाण कहते हैं तथा पक्षियोंके कलरवका नाम वाशित है। एक समूहकी आवाजको कोलाहल और कलकल कहते हैं। गीत और गान—ये दोनों समान अर्थके बोधक हैं। प्रतिश्रुत् और प्रतिध्वान—ये प्रतिध्वनिके वाचक हैं। इनमें पहला स्त्रीलिङ्ग (और दूसरा नपुंसकलिङ्ग) है। वीणाके कण्ठसे निषाद आदि स्वर प्रकट होते हैं॥ ५७–६९॥
मधुर एवं अस्फुट ध्वनिको ‘कल’ कहते हैं और सूक्ष्म कलका नाम काकली है। गम्भीर स्वरको ‘मन्द्र’ तथा बहुत ऊँची आवाजको ‘तार’ कहते हैं। कल, मन्द्र और तार—इन तीनों शब्दोंका तीनों ही लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। गाने और बजानेकी मिली हुई लयको एकताल कहते हैं। वीणाके तीन नाम हैं—वीणा, वल्लकी और विपञ्ची। सात तारोंसे बजनेवाली वीणाका (जिसे हिंदीमें सतार या सितार कहते हैं) परिवादिनी नाम है। (बाजोंके चार भेद हैं—तत, आनद्ध, सुषिर और घन। इनमें) वीणा आदि बाजेको तत, ढोल और मृदङ्ग आदिको आनद्ध, बाँसुरी आदिको सुषिर और काँसकी झाँझ आदिको घन कहते हैं। इन चारों प्रकारके बाजोंका नाम वाद्य, वादित्र और आतोद्य है। ढोलके दो नाम हैं—मृदङ्ग और मुरज। उसके तीन भेद हैं—अङ्क्य, आलिङ्ग्य और ऊर्ध्व। सुयशका ढिंढोरा पीटनेके लिये जो डंका होता है, उसे यशःपटह और ढक्का कहते हैं। भेरीके अर्थमें आनक और दुन्दुभि शब्दोंका प्रयोग होता है। आनक और पटह—ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। झर्झरी (झाँझ) और डिण्डिम (ढिंढोरा) आदि बाजोंके भेद हैं। मर्दल और पणव—ये दोनों समानार्थक हैं (इन्हें भी एक प्रकारका बाजा ही समझना चाहिये)।
जिससे गाने-बजानेकी क्रिया और कालका विवेक हो, उस गतिका नाम ‘ताल’ है। गीत और वाद्य आदिका समान अवस्थामें होना ‘लय’ कहलाता है। ताण्डव, नाट्य, लास्य और नर्तन—ये सब ‘नृत्य’ के वाचक हैं। नृत्य, गान और वाद्य—इन तीनोंको ‘तौर्यत्रिक’ एवं ‘नाट्य’ कहते हैं। नाटकमें राजाको भट्टारक और देव कहा जाता है तथा उनके साथ जिसका अभिषेक हुआ हो, उस महारानीको देवी कहते हैं। शृङ्गार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स तथा रौद्र—ये आठ रस हैं। इनमें शृङ्गार-रसके तीन नाम हैं—शृङ्गार, शुचि और उज्ज्वल। वीर-रसके दो नाम हैं—उत्साहवर्धन और वीर। करुणका बोध करानेवाले सात शब्द हैं—कारुण्य, करुणा, घृणा, कृपा, दया, अनुकम्पा तथा अनुक्रोश। हस, हास और हास्य—ये हास्यरसके तथा बीभत्स और विकृत शब्द बीभत्स-रसके वाचक हैं। ये दोनों शब्द तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। अद्भुतका बोध करानेवाले चार शब्द हैं—विस्मय, अद्भुत, आश्चर्य और चित्र। भैरव, दारुण, भीष्म, घोर, भीम, भयानक, भयंकर और प्रतिभय—ये भयानक अर्थका बोध करानेवाले हैं। रौद्रका पर्याय है—उग्र। ये अद्भुत आदि चौदह शब्द तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं।
दर, त्रास, भीति, भी, साध्वस और भय—ये भयके वाचक हैं। रति आदि मानसिक विकारोंको भाव कहते हैं। भावको व्यक्त करनेवाले रोमाञ्च आदि कार्योंका नाम अनुभाव है। गर्व, अभिमान और अहंकार—ये घमंडके नाम हैं। ‘मेरे समान दूसरा कोई नहीं है’ ऐसी भावनाको मान और चित्तसमुन्नति कहते हैं। अनादर, परिभव, परिभाव और तिरस्क्रिया—ये अपमानके वाचक हैं। व्रीडा, लज्जा, त्रपा और ह्री—ये लाजका बोध करानेवाले हैं। दूसरेके धनको लेनेकी इच्छाका नाम अभिध्यान
* अध्याय ३६० * ७८७
है। कौतूहल, कौतुक, कुतुक और कुतूहल—ये चार कौतुकके पर्याय हैं। विलास, विब्बोक, विभ्रम, ललित, हेला और लीला—ये शृङ्गार और भावसे प्रकट होनेवाली स्त्रियोंकी चेष्टाएँ 'हाव' कहलाती हैं। द्रव, केलि, परिहास, क्रीडा, लीला तथा कूर्दन—ये खेल-कूद और हँसी-परिहासके वाचक हैं। दूसरोंपर आक्षेप करते हुए जो उनकी हँसी उड़ायी जाती है, उसका नाम 'आच्छुरितक' है। मन्द मुस्कानको 'स्मित' कहते हैं॥ ७०–८५॥
नीचेके लोकका नाम अधोभुवन और पाताल है। छिद्र, श्वभ्र, वपा और सुषि—ये छिद्रके वाचक हैं। पृथ्वीके भीतर जो छेद (खंदक आदि) होता है, उसे गर्त और अवट कहते हैं। तमिस्र, तिमिर और तम—ये अन्धकारके वाचक हैं। सर्प, पृदाकु, भुजग, दन्दशूक और बिलेशय—ये साँपोंके नाम हैं। विष, क्ष्वेड और गरल—ये जहरका बोध करानेवाले हैं। निरय् और दुर्गति—ये नरकके नाम हैं। इनमें दुर्गति शब्द स्त्रीलिङ्ग है। पयस्, कीलाल, अमृत, उदक, भुवन और वन—ये जलके पर्याय हैं। भङ्ग, तरंग, ऊर्मि, कल्लोल और उल्लोल—ये लहरके नाम हैं। पृषत्, बिन्दु और पृषत—ये जलकी बूँदोंके नाम हैं। कूल, रोध और तीर—ये तटके वाचक हैं। जलसे तुरंतके बाहर हुए किनारेको 'पुलिन' कहते हैं। जम्बाल, पङ्क और कर्दम—ये कीचड़के नाम हैं। तालाब या नदी आदिके भर जानेपर जो अधिक जल बहने लगता है, उसे 'जलोच्छ्वास' और 'परीवाह' कहते हैं। सूखी हुई नदी आदिके भीतर जो गहरे गड्ढेमें बचा हुआ जल रहता है, उसका नाम 'कूपक' और 'विदारक' है। नदी पार करनेके लिये जो उतराई या खेवा दिया जाता है, उसे आतर एवं तरपण्य कहते हैं। काठकी बनी हुई बाल्टी या जल रखनेके पात्रका नाम द्रोणी है (इससे नावका पानी बाहर निकालते हैं)। मैले जलको 'कलुष' और 'आविल', साफ पानीको 'अच्छ' और 'प्रसन्न' तथा गहरे जलको 'गम्भीर' और 'अगाध' कहते हैं। दाश और कैवर्त—ये मल्लाहके नाम हैं। शम्बूक और जलशुक्ति—ये सीपके वाचक हैं। सौगन्धिक और कह्लार—ये श्वेत कमलके वाचक हैं। नील कमलको इन्दीवर कहते हैं। उत्पल और कुवलय—ये कमल और कुमुद आदिके साधारण नाम हैं। श्वेत उत्पलको कुमुद और कैरव कहते हैं। कुमुदकी जड़का नाम शालूक (सेरुकी) है। पद्म, तामरस और कञ्ज—ये कमलके पर्याय हैं। नील उत्पलका नाम कुवलय और रक्त उत्पलका नाम कोकनद बताया गया है। पद्मकंद अर्थात् कमलकी जड़का नाम करहाट और शिफाकंद है। कमलके केसरको किञ्जल्क और केसर कहते हैं। ये दोनों शब्द स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। स्त्रीलिङ्ग खनिशब्द और आकर—ये खानके वाचक हैं। बड़े-बड़े पर्वतोंके आसपास जो छोटे-छोटे पर्वत होते हैं, उन्हें पाद और प्रत्यन्तपर्वत कहते हैं। पर्वतके निकटकी नीची भूमि (तराई)-को उपत्यका तथा पहाड़के ऊपरकी जमीनको अधित्यका कहते हैं। इस प्रकार मैंने स्वर्ग और पाताल आदि वर्गोंका वर्णन किया। अब अनेक अर्थवाले शब्दोंको श्रवण कीजिये॥८६–९५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें कोशविषयक 'स्वर्ग-पाताल आदि वर्गोंका वर्णन' नामक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६० ॥
७८८ * अग्निपुराण *
तीन सौ एकसठवाँ अध्याय
अव्यय-वर्ग
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठजी ! ‘आङ्’ अव्यय ईषत् (स्वल्प), अभिव्याप्ति तथा मर्यादा (सीमा) अर्थमें प्रयुक्त होता है। साथ ही धातुसे उसका संयोग होनेपर जो विभिन्न अर्थ प्रकाशित होते हैं, उन सभी अर्थोंमें उसका प्रयोग समझना चाहिये। ‘आ’ प्रगृह्यसंज्ञक अव्यय है। इसका वाक्य और स्मरण अर्थमें प्रयोग होता है। ‘आः’ अव्यय कोप और पीड़ाका भाव द्योतित करनेके लिये प्रयुक्त होता है। ‘कु’ पाप, कुत्सा (घृणा) और ईषत् अर्थमें तथा ‘धिक्’ फटकार और निन्दाके अर्थमें आता है। ‘च’ अव्ययका प्रयोग समुच्चय$^१$, समाहार$^२$ अर्थमें होता है। अन्वाचय$^३$, इतरेतरयोग$^४$ और ‘स्वस्ति’ आशीर्वाद, क्षेम और पुण्य आदिके अर्थमें तथा ‘अति’ अधिकता एवं उल्लङ्घनके अर्थमें आता है। ‘स्वित्’ प्रश्न और वितर्कका भाव व्यक्त करनेमें तथा ‘तु’ भेद और निश्चयके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘सकृत्’का एक ही साथ और एक बारके अर्थमें तथा ‘आरात्’का दूर और समीपके अर्थमें प्रयोग होता है। ‘पश्चात्’ अव्यय पश्चिम दिशा और पीछेके अर्थमें तथा ‘उत’ शब्द ‘अपि’के अर्थ (समुच्चय और प्रश्न)-में एवं विकल्प अर्थमें आता है। ‘शश्वत्’ पुनः और सदाके अर्थमें तथा ‘साक्षात्’ प्रत्यक्ष एवं तुल्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘बत’ अव्ययका प्रयोग खेद, दया, संतोष, विस्मय और सम्बोधनका भाव व्यक्त करनेमें होता है। ‘हन्त’ पद हर्ष, अनुकम्पा, वाक्यके आरम्भ और विषादके अर्थमें आता है। ‘प्रति’ का प्रतिनिधि, वीप्सा एवं लक्षण आदिके अर्थमें प्रयोग किया जाता है। ‘इति’ शब्द हेतु, प्रकरण, प्रकाश आदि और समाप्तिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘पुरस्तात्’ पद पूर्व दिशा, प्रथम और पुरा (पूर्वकाल)-के अर्थमें आता है। ‘अग्रतः’ (आगे)-के अर्थमें भी इसका प्रयोग होता है। ‘यावत्’ और ‘तावत्’ पद समग्र, अवधि (सीमा), माप और अवधारणके अर्थमें आते हैं। ‘अथो’ एवं ‘अथ’ शब्दका प्रयोग मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न और समग्रताके अर्थमें होता है। ‘वृथा’ शब्द निरर्थक और अविधि अर्थका द्योतक है। ‘नाना’ शब्द अनेक और उभय अर्थमें आता है। ‘नु’ प्रश्न और विकल्पमें तथा ‘अनु’ पश्चात् एवं सादृश्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘ननु’ शब्द प्रश्न, निश्चय, अनुज्ञा, अनुनय और सम्बोधनमें तथा ‘अपि’ शब्द निन्दा, समुच्चय, प्रश्न, शङ्का तथा सम्भावनामें प्रयुक्त होता है। ‘वा’ शब्द उपमा और विकल्पमें तथा ‘सामि’ पद आधे एवं निन्दाके अर्थमें आता है। ‘अमा’ शब्द साथ एवं समीपका तथा ‘कम्’ जल और मस्तकका बोध करानेवाला है। ‘एवम्’ पद इव और इत्थंके अर्थमें तथा ‘नूनम्’ तर्क तथा वस्तुके निश्चय करनेमें प्रयुक्त होता है। ‘जोषम्’का अर्थ है मौन और सुख। ‘किम्’ अव्यय प्रश्न और निन्दाके अर्थमें आता है। ‘नाम’ पद प्राकाश्य
१. आपसमें अनपेक्षित अनेक शब्दोंका एक क्रियामें अन्वय होना ‘समुच्चय’ कहलाता है। जैसे ‘ईश्वरं’ ‘गुरुं च भजस्व’। (ईश्वर और गुरुको भजो) यहाँ ‘ईश्वरम्’ और ‘गुरुम्’—इन दो पदोंका एक ही भजन-क्रियामें अन्वय है। २. समूहको ‘समाहार’ कहते हैं। जैसे ‘संज्ञापरिभाषम्’ (संज्ञा और परिभाषाओंका समूह)। ३. एक प्रधान कार्यके साथ-साथ दूसरे अप्रधान कार्यका भी साधन करना ‘अन्वाचय’ है। जैसे किसीसे कहा जाय—‘भिक्षामट गां चानय’ (भिक्षा माँगने जाओ, गाय भी लेते आना)। यहाँ मुख्य कार्य है—भिक्षा माँगना; उसके साथ गाय लानेका कार्य गौण है। ४. परस्पर अपेक्षा रखनेवाले अनेक पदोंका एक क्रियामें अन्वय ‘इतरेतर-योग’ कहलाता है। जैसे—‘धवखदिरौ छिन्धि’ (धव और खदिरको काटो)। यहाँ धव और खदिर—दोनोंका साहचर्य अपेक्षित है।
- अध्याय ३६१ * ७८९
(प्रकाशित होने), सम्भावना, क्रोध, स्वीकार तथा निन्दा अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'अलम्' शब्द भूषण, पर्याप्ति, सामर्थ्य तथा निवारणका वाचक है। 'हुम्' वितर्क और प्रश्न अर्थमें तथा 'समया' निकट और मध्यके अर्थमें आता है। 'पुनर्' अव्यय प्रथमको छोड़कर द्वितीय, तृतीय आदि जितनी बार कोई कार्य हो, उन सबके लिये प्रयुक्त होता है। साथ ही भेद-अर्थमें भी इसका प्रयोग देखा जाता है। 'निर्' निश्चय और निषेधके अर्थमें आता है। 'पुरा' शब्द बहुत पहलेकी बीती हुई तथा निकट भविष्यमें आनेवाली बातको व्यक्त करनेके लिये प्रयुक्त होता है। 'उररी', 'ऊरी', 'ऊररी'—ये तीन अव्यय विस्तार और अङ्गीकारके अर्थमें आते हैं। 'स्वर्' अव्यय स्वर्ग और परलोकका वाचक है। 'किल'का प्रयोग वार्ता और सम्भावनाके अर्थमें आता है। मना करने, वाक्यको सजाने तथा जिज्ञासाके अवसरपर 'खलु'का प्रयोग होता है। 'अभितस्' अव्यय समीप, दोनों ओर, शीघ्र, सम्पूर्ण तथा सम्मुख अर्थका बोध कराता है। 'प्रादुस्' शब्द नाम अव्ययके अर्थमें तथा व्यक्त या प्रकट होनेमें प्रयुक्त होता है। 'मिथस्' शब्द परस्पर तथा एकान्तका वाचक है। 'तिरस्' शब्द अन्तर्धान होने तथा तिरछे चलनेके अर्थमें आता है। 'हा' पद विषाद, शोक और पीड़ाको व्यक्त करनेवाला है। 'अहह' अथवा 'अहहा' अद्भुत एवं खेदके अर्थमें तथा हेतु और निश्चय अर्थमें प्रयुक्त होता है॥ १-१८॥
चिराय, चिररात्राय और चिरस्य इत्यादि* अव्यय चिरकालके बोधक हैं। मुहुः, पुनः-पुनः, शश्वत्, अभीक्ष्ण और असकृत्—ये सभी अव्यय समान अर्थके वाचक हैं—इन सबका बारंबारके अर्थमें प्रयोग होता है। स्राक्, झटिति, अञ्जसा, अह्नाय, सपदि, द्राक् और मङ्क्षु—ये शीघ्रताके अर्थमें आते हैं। बलवत् और सुष्ठु—ये दोनों शब्द अतिशय तथा शोभन अर्थके वाचक हैं। किमुत, किम् और किम्भूत—ये विकल्पका बोध करानेवाले हैं। तु, हि, च, स्म, ह, वै—ये पादपूर्तिके लिये प्रयुक्त होते हैं। अतिका प्रयोग पूजनके अर्थमें भी आता है। दिवा शब्द दिनका वाचक है तथा दोषा और नक्तम् शब्द रात्रिके अर्थमें आते हैं। साचि और तिरस् पद तिर्यक् (तिरछे) अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। प्याट्, पाट्, अङ्ग, हे, है, भोः—ये सभी शब्द सम्बोधनके अर्थमें आते हैं। समया, निकषा और हिरुक्—ये तीनों अव्यय समीप अर्थके वाचक हैं। सहसा अतर्कित अर्थमें आता है। (अर्थात् जिसके बारेमें कोई सम्भावना न हो, ऐसी वस्तु जब एकाएक सामने उपस्थित होती है तो उसे सहसा उपस्थित हुई कहते हैं। ऐसे ही स्थलोंमें सहसाका प्रयोग होता है।) पुरः, पुरतः और अग्रतः—ये सामनेके अर्थमें आते हैं। स्वाहा पद देवताओंको हविष्य अर्पण करनेके अर्थमें आता है। 'श्रौषट्' और 'वौषट्'का भी यही अर्थ है। 'वषट्' शब्द इन्द्रका और स्वधा शब्द पितरोंका भाग अर्पण करनेके लिये प्रयुक्त होता है। किंचित्, ईषत् और मनाक्—ये अल्प अर्थके वाचक हैं। प्रेत्य और अमुत्र—ये दोनों जन्मान्तरके अर्थमें आते हैं। यथा और तथा समताके एवं अहो और हो—ये आश्चर्यके बोधक हैं। तूष्णीम् और तूष्णीकम् पद मौन अर्थमें, सद्यः और सपदि शब्द तत्काल अर्थमें, दिष्ट्या और समुपजोषम्—ये आनन्द अर्थमें तथा
* आदि शब्दसे 'चिरम्', 'चिरेण', 'चिरात्' तथा 'चिरे'—इन पदोंका ग्रहण होता है।
७९० * अग्निपुराण *
अन्तरा शब्द भीतरके अर्थमें आता है। अन्तरेण पद भी मध्य अर्थका वाचक है। प्रसह्य शब्द हठका बोध करानेवाला है। साम्प्रतम् और स्थाने शब्द उचितके अर्थमें तथा ‘अभीक्ष्णम्’ और शश्वत् पद सर्वदा—निरन्तरके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। नहि, अ, नो और न—ये अभाव अर्थके बोधक हैं। मास्म, मा और अलम्—इनका निषेधके अर्थमें प्रयोग होता है। चेत् और यदि पद दूसरा पद उपस्थित करनेके लिये प्रयुक्त होते हैं तथा अद्धा और अञ्जसा—ये दोनों पद वास्तवके अर्थमें आते हैं। प्रादुस् और आविर्—इनका अर्थ है प्रकट होना। ओम्, एवम् और परमम्—ये शब्द स्वीकृति या अनुमति देनेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। समन्ततः, परितः, सर्वतः और विष्वक्—इनका अर्थ है चारों ओर। ‘कामम्’ शब्द अकाम अनुमतिके अर्थमें आता है। ‘अस्तु’ पद असूया (दोषदृष्टि) तथा स्वीकृतिका भाव सूचित करनेवाला है। किसी बातके विरोधमें कुछ कहना हो तो वहाँ ‘ननु’ का प्रयोग होता है। ‘कच्चित्’ शब्द किसीकी अभीष्ट वस्तुकी जिज्ञासाके लिये प्रश्न करनेके अवसरपर प्रयुक्त होता है। निःषमम् और दुःषमम्—ये दोनों पद निन्द्य अर्थका बोध कराते हैं। यथास्वम् और यथायथम् पद यथायोग्य अर्थके वाचक हैं। मृषा एवं मिथ्या शब्द असत्यके और यथातथम् पद सत्यके अर्थमें आता है। एवम्, तु, पुनः, वै और वा—ये निश्चय अर्थके वाचक हैं। ‘प्राक्’ शब्द बीती बातका बोध करानेवाला है। नूनम् और अवश्यम्—ये दो अव्यय निश्चयके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। ‘संवत्’ शब्द वर्षका, ‘अर्वाक्’ शब्द पश्चात् कालका, आम् और एवम् शब्द हामी भरनेका तथा स्वयम् पद अपनेसे—इस अर्थका बोध करानेवाला है। ‘नीचैस्’ अल्प अर्थमें, ‘उच्चैस्’ महान् अर्थमें, ‘प्रायस्’ बाहुल्य अर्थमें तथा ‘शनैस्’ मन्द अर्थमें आता है। ‘सना’ शब्द नित्यका, ‘बहिस्’ शब्द बाह्यका, ‘स्म’ शब्द भूतकालका, ‘अस्तम्’ शब्द अदृश्य होनेका, ‘अस्ति’ शब्द सत्ताका, ‘ऊ’ क्रोधभरी उक्तिका तथा ‘अपि’ शब्द प्रश्न तथा अनुनयका बोधक है। ‘उम्’ तर्कका, ‘उषा’ रात्रिके अन्तका, ‘नमस्’ प्रणामका, ‘अङ्ग’ पुन-अर्थका, ‘दुष्ठु’ निन्दाका तथा ‘सुष्ठु’ शब्द प्रशंसाका वाचक है। ‘सायम्’ शब्द संध्याकालका, ‘प्रगे’ और ‘प्रातर्’ शब्द प्रभातकालका, ‘निकषा’ पद समीपका, ‘ऐषमः’ शब्द वर्तमान वर्षका, ‘परुत्’ शब्द गतवर्षका और ‘परारि’ शब्द उसके भी पहलेके गतवर्षका बोध करानेवाला है। ‘आजके दिन’ इस अर्थमें ‘अद्य’का प्रयोग देखा जाता है। पूर्व, उत्तर, अपर, अधर, अन्य, अन्यतर और इतर शब्दसे ‘पूर्वेऽह्नि’ (पहले दिन) आदिके$^१$ अर्थमें ‘पूर्वेद्युः’ आदि$^२$ अव्ययपद निष्पन्न होते हैं। ‘उभयद्युः’ और ‘उभयेद्युः’—ये ‘दोनों दिन’के अर्थमें आते हैं। ‘परस्मिन्नहनि’ (दूसरे दिन)—के अर्थमें ‘परेद्यवि’का प्रयोग होता है। ‘ह्यस्’ बीते हुए दिनके अर्थमें, ‘श्वस्’ आगामी दिनके अर्थमें तथा ‘परश्वस्’ शब्द उसके बाद आनेवाले दिनके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘तदा’ ‘तदानीम्’ शब्द ‘तस्मिन् काले’ (उस समय)—के अर्थमें आते हैं। ‘युगपत्’ और ‘एकदा’का अर्थ है—एक ही समयमें।
१. यहाँ ‘आदि’ शब्दसे उत्तर आदि शब्दोंका ग्रहण होता है—जैसे उत्तरस्मिन्नह्नि, अपरस्मिन्नह्नि, अन्यस्मिन्नहनि, अन्यतरस्मिन्नहनि तथा इतरस्मिन्नहनि।
२. ‘आदि’ शब्दसे ‘उत्तरेद्युः’, ‘अपरेद्युः’, ‘अवेद्युः’, ‘अन्येद्युः’, ‘अन्यतरेद्युः’ तथा ‘इतरेद्युः’—इन अव्यय-पदोंका ग्रहण करना चाहिये।
* अध्याय ३६२ * ७९१
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'सर्वदा' और 'सदा'—ये हमेशाके अर्थमें आते हैं। एतर्हि, सम्प्रति, इदानीम्, अधुना तथा साम्प्रतम्—इन पदोंका प्रयोग 'इस समय' के अर्थमें होता है ॥ १९-३८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें कोशविषयक 'अव्ययवर्गका वर्णन' नामक तीन सौ एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६१ ॥
तीन सौ बासठवाँ अध्याय
नानार्थ-वर्ग
अग्निदेव कहते हैं—'नाक' शब्द आकाश और स्वर्गके अर्थमें तथा 'लोक' शब्द संसार, जन-समुदायके अर्थमें आता है। 'श्लोक' शब्द अनुष्टुप् छन्द और सुयश अर्थमें तथा 'सायक' शब्द बाण और तलवारके अर्थमें प्रयुक्त होता है। आनक, पटह और भेरी—ये एक दूसरेके पर्याय हैं। 'कलङ्क' शब्द चिह्न तथा अपवादका वाचक है। 'क' शब्द यदि पुल्लिंगमें हो तो वायु, ब्रह्मा और सूर्यका तथा नपुंसकमें हो तो मस्तक और जलका बोधक होता है। 'पुलाक' शब्द कदन्न, संक्षेप तथा भातके पिण्ड अर्थमें आता है। 'कौशिक' शब्द इन्द्र, गुग्गुल, उल्लू तथा साँप पकड़नेवाले पुरुषोंके अर्थमें प्रयुक्त होता है। बंदरों और कुत्तोंको 'शालावृक' कहते हैं। मापके साधनका नाम 'मान' है। 'सर्ग' शब्द स्वभाव, त्याग, निश्चय, अध्ययन और सृष्टिके अर्थमें उपलब्ध होता है। 'योग' शब्द कवचधारण, साम आदि उपायोंके प्रयोग, ध्यान, संगति (संयोग) और युक्ति अर्थका बोधक होता है। 'भोग' शब्द सुख और स्त्री (वेश्या या दासी) आदिको उपभोगके बदले दिये जानेवाले धनका वाचक है। 'अब्ज' शब्द शङ्ख और चन्द्रमाके अर्थमें भी आता है। 'करट' शब्द हाथीके कपोल और कौवेका वाचक है। 'शिपिविष्ट' शब्द बुरे चमड़ेवाले (कोढ़ी) मनुष्यका बोध करानेवाला है। 'रिष्ट' शब्द क्षेम, अशुभ तथा अभावके अर्थमें आता है। 'अरिष्ट' शब्द शुभ और अशुभ दोनों अर्थोंका वाचक है। 'व्युष्टि' शब्द प्रभातकाल और समृद्धिके अर्थमें तथा 'दृष्टि' शब्द ज्ञान, नेत्र और दर्शनके अर्थमें आता है। 'निष्ठा'का अर्थ है—निष्पत्ति (सिद्धि), नाश और अन्त तथा 'काष्ठा'का उत्कर्ष, स्थिति तथा दिशा अर्थमें प्रयोग होता है। 'इडा' और 'इला' शब्द गौ तथा पृथ्वीके वाचक हैं। 'प्रगाढ' शब्द अत्यन्त एवं कठिनाईका बोध करानेवाला है। 'वाढम्' पद अत्यन्त और प्रतिज्ञाके अर्थमें आता है। 'दृढ' शब्द समर्थ एवं स्थूलका वाचक है तथा इसका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। 'व्यूढ' का अर्थ है—विन्यस्त (सिलसिलेवार रखा हुआ या व्यूहके आकारमें खड़ा किया हुआ) तथा संहत (संगठित)। 'कृष्ण' शब्द व्यास, अर्जुन तथा भगवान् विष्णुके अर्थमें आता है। 'पण' शब्द जुआ आदिमें दाँवपर लगाये हुए द्रव्य, कीमत और धनके अर्थमें भी प्रयुक्त होता है। 'गुण' शब्द धनुषकी प्रत्यञ्चाका, द्रव्योंका आश्रय लेकर रहनेवाले रूप-रस आदि गुणोंका, सत्त्व, रज और तमका, शुक्ल, नील आदि वर्णोंका तथा संधि-विग्रह आदि छः प्रकारकी नीतियोंका बोध करानेवाला है। 'ग्रामणी' शब्द श्रेष्ठ (मुखिया) तथा गाँवके स्वामीका वाचक है। 'घृणा' शब्द जुगुप्सा और
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दया—दोनों अर्थोंमें आता है। ‘तृष्णा’का अर्थ है—इच्छा और प्यास। ‘विपणि’ शब्द बाजार या बनियेके दूकानके अर्थमें आता है। ‘तीक्ष्ण’ शब्द नपुंसकलिंगमें प्रयुक्त होनेपर विष, युद्ध तथा लोहेका वाचक होता है और प्रखर या प्रचण्डके अर्थमें उसका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। ‘प्रमाण’ शब्द कारण, सीमा, शास्त्र, इयत्ता (निश्चित माप) तथा प्रामाणिक पुरुषके अर्थमें आता है। ‘करुण’ शब्द क्षेत्र और गात्रका तथा ‘ईरिण’ शब्द शून्य (निर्जन) एवं ऊसरभूमिका वाचक है॥ १—१२॥
‘यन्ता’ पद हाथीवान और सारथिका वाचक है। ‘हेति’ शब्दका प्रयोग आगकी ज्वालाके अर्थमें होता है। ‘श्रुत’ शब्द शास्त्र एवं अवधारण (निश्चय)-का तथा ‘कृत’ शब्द सत्ययुग और पर्याप्त अर्थका बोधक है। ‘प्रतीत’ शब्द विख्यात तथा दृष्टके अर्थमें और ‘अभिजात’ शब्द कुलीन एवं विद्वान्के अर्थमें आता है। ‘विविक्त’ शब्द पवित्र और एकान्तका तथा ‘मूच्छित’ शब्द मूढ़ (संज्ञाशून्य) और फैले हुए या उन्नतिको प्राप्त हुएका बोध करानेवाला है। ‘अर्थ’ शब्द अभिधेय (शब्दसे निकलनेवाले तात्पर्य), धन, वस्तु, प्रयोजन और निवृत्तिका वाचक है। ‘तीर्थ’ शब्द निदान (उपाय), आगम (शास्त्र), महर्षियोंद्वारा सेवित जल तथा गुरुके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘ककुद्’ शब्द स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य लिङ्गोंमें प्रयुक्त होता है। यह प्रधानता, राजचिह्न तथा बैलके अङ्गविशेषका बोध करानेवाला है। ‘संविद्’ शब्द स्त्रीलिङ्ग है। इसका ज्ञान, सम्भाषण, क्रियाके नियम, युद्ध और नाम अर्थमें प्रयोग होता है। ‘उपनिषद्’ शब्द धर्म और रहस्यके अर्थमें तथा ‘शरद्’ शब्द ऋतु और वर्षके अर्थमें आता है। ‘पद’ शब्द व्यवसाय (निश्चय), रक्षा, स्थान, चिह्न, चरण और वस्तुका वाचक है। ‘स्वादु’ शब्द प्रिय एवं मधुर अर्थका तथा ‘मृदु’ शब्द तीखेपनसे रहित एवं कोमल अर्थका बोध करानेवाला है। ‘स्वादु’ और ‘मृदु’—दोनों शब्द तीनों ही लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। ‘सत्’ शब्द सत्य, साधु, विद्यमान, प्रशस्त तथा पूज्य अर्थमें उपलब्ध होता है। ‘विधि’ शब्द विधान और दैवका वाचक है। ‘प्रणिधि’ शब्द याचना और चर (दूत)-के अर्थमें आता है। ‘वधू’ शब्द जाया, पतोहू तथा स्त्रीका बोधक है। ‘सुधा’ शब्द अमृत, चूना तथा शहदके अर्थमें आता है। ‘श्रद्धा’ शब्द आदर, विश्वास एवं आकाङ्क्षाके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘समुन्नद्ध’ शब्द अपनेको पण्डित माननेवाले और घमंडीके अर्थमें आता है। ‘ब्रह्मबन्धु’ शब्दका प्रयोग ब्राह्मणकी अवज्ञामें प्रयुक्त होता है। ‘भानु’ शब्द किरण और सूर्य—दोनों अर्थोंमें प्रयुक्त होता है। ‘ग्रावन्’ शब्दका अभिप्राय पहाड़ और पत्थर—दोनोंसे है। ‘पृथग्जन’ शब्द मूर्ख और नीचके अर्थमें आता है। ‘शिखरिन्’ शब्दका अर्थ वृक्ष और पर्वत तथा ‘तनु’ शब्दका अर्थ शरीर और त्वचा (छाल) है। ‘आत्मन्’ शब्द यत्न, धृति, बुद्धि, स्वभाव, ब्रह्म और शरीरके अर्थमें भी आता है। ‘उत्थान’ शब्द पुरुषार्थ और तन्त्रके तथा ‘व्युत्थान’ शब्द विरोधमें खड़े होनेके अर्थका बोधक है। ‘निर्यातन’ शब्द वैरका बदला लेने, दान देने तथा धरोहर लौटानेके अर्थमें भी आता है। ‘व्यसन’ शब्द विपत्ति, अधःपतन तथा काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले दोषोंका बोध करानेवाला है। शिकार, जुआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन्दा करना, स्त्रियोंमें आसक्त होना, मदिरा पीना, नाचना, गाना, बाजा बजाना तथा व्यर्थ घूमना—यह कामसे उत्पन्न होनेवाले दस दोषोंका समुदाय है। चुगली, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता तथा दण्डकी कठोरता—यह