ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ वह उनके लिये पुरुष ले आया। वे बोले—'यह सुन्दर बना है, निश्चय पुरुष ही सुन्दर रचना है।' उन (देवताओं) से ईश्वरने कहा— 'अपने-अपने आयतन (आश्रयस्थानों) में प्रवेश कर जाओ' ॥ ३ ॥ ताभ्यः पुरुषमानयत्स्वयोनि- | [ वह ] उनके लिये उनका भूतम् । ताः स्वयोनिं पुरुषं | योनिरूप पुरुष ले आया । अपने दृष्ट्वा अखिन्नाः सत्यः सुकृतं | योनिभूत उस पुरुषको देखकर वे शोभनं कृतमिदमधिष्ठानं बतेत्य- | खेदरहित हो इस प्रकार बोले—'यह ब्रुवन् । तस्मात्पुरुषो वाव पुरुष | अधिष्ठान सुन्दर बना है । अतः एव सुकृतं सर्वपुण्यकर्महेतुत्वात् । | सम्पूर्ण पुण्यकर्मोंका कारण होनेसे स्वयं वा स्वेनैवात्मना स्वमायाभिः | निश्चय पुरुष ही सुकृत है । अथवा कृतत्वात्सुकृतमित्युच्यते । | स्वयं अपने-आप अपनी ही मायासे रचा होनेके कारण 'सुकृत' ऐसा कहा जाता है । ता देवता ईश्वरोऽब्रवीदिष्ट- | ईश्वरने, यह समझकर कि इन्हें मासामिदमधिष्ठानमिति मत्वा, | यह आश्रयस्थान प्रिय है, क्योंकि सर्वे हि स्वयोनिषु रमन्ते, अतो | सभी अपनी योनिमें सन्तुष्ट रहा यथायतनं यस्य यद्वदनादिक्रिया- | करते हैं, उन देवताओंसे कहा— योग्यमायतनं तत्प्रविशतेति॥३॥ | 'जिसका जो आयतन है उस अपनी सम्भाषणादि क्रियाके योग्य आयतन- में तुम सब प्रविष्ट हो जाओ' ॥३॥ देवताओंका अपने-अपने आयतनोंमें प्रवेश तथास्त्वित्यनुज्ञां प्रतिलभ्ये- | 'ऐसा ही हो' इस प्रकार श्वरस्य नगर्यामिव बलाधिकृता- | राजाकी आज्ञा पाकर जिस प्रकार दयः— | नगरीमें सेनाध्यक्षादि [ प्रवेश कर जाते हैं उसी प्रकार ]—
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
अग्निर्वादभूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥ अग्निने वागिन्द्रिय होकर मुखमें प्रवेश किया, वायुने प्राण होकर नासिका-रन्ध्रोंमें प्रवेश किया, सूर्यने चक्षु-इन्द्रिय होकर नेत्रोंमें प्रवेश किया, दिशाओंने श्रवणेन्द्रिय होकर कानोंमें प्रवेश किया, ओषधि और वनस्पतियोंने लोम होकर त्वचा में प्रवेश किया, चन्द्रमाने मन होकर हृदयमें प्रवेश किया, मृत्युने अपान होकर नाभिमें प्रवेश किया तथा जलने वीर्य होकर लिङ्गमें प्रवेश किया ॥ ४ ॥
| [संस्कृत-भाष्य] | [हिन्दी-अनुवाद] |
|---|---|
| अग्निर्वागभिमानी वागेव भूत्वा स्वां योनिं मुखं प्राविशत्तथोक्तार्थमन्यत् । वायुर्नासिके आदित्योऽक्षिणी दिशः कर्णौ ओषधिवनस्पतयस्त्वचं चन्द्रमा हृदयं मृत्युर्नाभिमापः शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥ | वागिन्द्रियके अभिमानी अग्निने वाक् होकर अपने कारणस्वरूप मुखमें प्रवेश किया । इसी प्रकार औरोंका भी अर्थ समझना चाहिये । [ इस प्रकार ] वायुने नासिका में, सूर्यने नेत्रोंमें, दिशाओंने कानोंमें, ओषधि और वनस्पतियोंने त्वचा में, चन्द्रमाने हृदयमें, मृत्युने नाभिमें और जलने शिश्न (लिङ्ग) में प्रवेश किया ॥ ४ ॥ |
क्षुधा और पिपासाका विभाग
| [संस्कृत-भाष्य] | [हिन्दी-अनुवाद] |
|---|---|
| एवं लब्धाधिष्ठानासु देवतासु— | इस प्रकार देवताओंके आश्रय पा लेनेपर— |
४० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
४० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥ उस ( ईश्वर ) से क्षुधा-पिपासाने कहा—'हमारे लिये आश्रयकी योजना कीजिये।' तब [उसने] उनसे कहा—'तुम दोनोंको मैं इन देवताओंमें ही भाग दूँगा अर्थात् मैं तुम्हें इन्हींमें भागीदार करूँगा।' अतः जिस किसी देवताके लिये हवि दी जाती है उस देवताकी हविमें ये भूख-प्यास भी भागीदार होती ही हैं ॥ ५ ॥ निरधिष्ठाने सत्यौ अशनाया- | क्षुधा और पिपासाने आश्रयहीन पिपासे तमीश्वरमब्रूतामुक्तवत्यौ। | होनेके कारण उस ईश्वरसे कहा— आवाभ्यामधिष्ठानमभिप्रजानीहि | 'हमारे लिये अधिष्ठानका अभिप्रज्ञान- चिन्तय विधत्स्वेत्यर्थः । स | चिन्तन अर्थात् विधान करो।' ऐसा ईश्वर एवमुक्तस्ते अशनायापिपासे | कहे जानेपर उस ईश्वरने उन क्षुधा- अब्रवीत् । न हि युवयोर्भावरूप- | पिपासाओंसे कहा—'भावरूप होनेके त्वाच्चेतनावद्वस्त्वनाश्रित्यान्नात्तृ- | कारण तुम दोनोंका किसी चेतन त्वं संभवति । तस्मादेतास्वेवा- | वस्तुको आश्रय किये बिना अन्न ग्न्याद्यासु वां युवां देवतास्वध्या- | भक्षण करना सम्भव नहीं है। अतः मैं त्माधिदेवतास्वाभजामि वृत्ति- | इन अध्यात्म और अधिदैव अग्नि आदि | देवताओंमें ही तुम दोनोंको आभा- संविभागेनानुगृह्णामि । एतासु : | जित करता हूँ अर्थात् तुम्हारी वृत्ति- | का विभाग करके अनुगृहीत करता
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१ भागिन्यौ यद्देवत्यो यो भागो | हूँ। मैं तुम्हें इन देवताओंमें ही भागी हविरादिलक्षणः स्यात्तस्यास्ते- | करता हूँ-अर्थात् जिस देवताका नैव भागेन भागिन्यौ भागवत्यौ | जो हवि आदि भाग है उसके उसी वां करोमीति सृष्ट्यादाइीश्वर | भागसे मैं तुम्हें उनकी भागिनी-भाग एवं व्यदधाद्यस्मात्तस्मादिदानी- | ग्रहण करनेवाली बनाता हूँ, मपि यस्यै कस्यै च देवतायै | क्योंकि सृष्टिके आदिमें ईश्वरने ऐसी अर्थाय हविर्गृह्यते चरुपुरोडाशा- | व्यवस्था कर दी थी इसलिये इस दिलक्षणं भागिन्यावेव भागव- | समय भी जिस किसी देवताके लिये त्यावेवास्यां देवतायामशनाया- | चरु पुरोडाशादि हवि ग्रहण की पिपासे भवतः ॥ ५ ॥ | जाती है ये क्षुधा-पिपासा भी उस | देवतामें भागिनी होती ही हैं ॥५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः समाप्तः ॥ २ ॥
तृतीय खण्ड
तृतीय खण्ड अन्नरचनाका विचार स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥ उस (ईश्वर) ने विचारा ये लोक और लोकपाल तो हो गये अब इनके लिये अन्न रचूँ ॥ १ ॥ स एवमीश्वर ईक्षत, कथम् ? | उस ईश्वरने इस प्रकार ईक्षण | किया-किस प्रकार ? [सो इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्च | बतलाते हैं-] मैंने इन लोक और | लोकपालोंकी रचना तो कर दी मया सृष्टा अशनायापिपासाभ्यां | और इन्हें क्षुधा-पिपासासे संयुक्त च संयोजिताः; अतो नैषां | भी कर दिया । अतः अन्नके बिना स्थितिरन्नमन्तरेण।तस्मादन्नमेभ्यो | इनकी स्थिति नहीं हो सकती; | इसलिये इन लोकपालोंके लिये मैं लोकपालेभ्यः सृजै सृज इति । | अन्न रचूँ । एवं हि लोके ईश्वराणामनुग्रहे | इस प्रकार लोकमें ईश्वरों | (समर्थों) की अपने लोगोंके ऊपर निग्रहे च स्वातन्त्र्यं दृष्टं स्वेषु । | अनुग्रह एवं निग्रह करनेकी तद्वन्महेश्वरस्यापि सर्वेश्वरत्वा- | स्वतन्त्रता देखी जाती है । इसी | प्रकार सर्वेश्वर होनेके कारण महेश्वर त्सर्वान्प्रति निग्रहानुग्रहेऽपि | (परमेश्वर) की भी सबके प्रति निग्रह स्वातन्त्र्यमेव ॥ १ ॥ | एवं अनुग्रहमें स्वतन्त्रता ही है ॥ १ ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ अन्नकी रचना सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २॥ उसने आपों (जलों) को लक्ष्य करके तप किया। उन अभितप्त आपोंसे एक मूर्ति उत्पन्न हुई, यह जो मूर्ति उत्पन्न हुई वही अन्न है ॥२॥ स ईश्वरोऽन्नं सिसृक्षुस्ता एव | अन्न रचनेकी इच्छावाले उस पूर्वोक्ता अप उद्दिश्याभ्यतपत् । | ईश्वरने उन पूर्वोक्त जलोंको ही ताभ्योऽभितप्ताभ्य उपादान- | उद्देश्य करके तप किया। उन भूताभ्यो मूर्तिर्घनरूपं धारण- | उपादानभूत अभितप्त जलोंसे ही समर्थं चराचरलक्षणमजायतोत्प- | धारण करनेमें समर्थ चराचरभूत न्नम्। अन्नं वै तन्मूर्तिरूपं या वै | घनरूप मूर्ति उत्पन्न हुई। यह जो सा मूर्तिरजायत ॥ २॥ | मूर्ति उत्पन्न हुई वह मूर्तिरूप | अन्न ही है ॥ २ ॥ ❧❧❧ अन्नका पलायन और उसके ग्रहणका उद्योग तदेनत्सृष्टं पराङ्त्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्ना- शक्नोद्वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥ [ लोकपालोंके आहारार्थ ] रचे गये उस इस अन्नने उनकी ओरसे मुँह फेरकर भागना चाहा। तब उस (आदिपुरुष) ने उसे वागिन्द्रिय- द्वारा ग्रहण करना चाहा, किन्तु वह उसे वाणीसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे वाणीसे ग्रहण कर लेता तो [ उससे परवर्ती पुरुष भी ] अन्नको बोलकर ही तृप्त हो जाया करते ॥ ३ ॥
४४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
४४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तदेतदन्नं लोकलोकपालाना- | लोक और लोकपालोंके निमित्त मर्थेऽभिमुखे सृष्टं तद्यथा मूष- | उनके सम्मुख निर्मित हुआ अन्न यह कादिर्मार्जारादिगोचरे सन्मम | मानकर कि अन्न भक्षण करनेवाला तो मृत्युरन्नाद इति मत्वा परागञ्च- | मेरी मृत्यु है, उसकी ओरसे मुख तीति पराङ् सदृत्तन्तीत्याजि- | मोड़कर, जिस प्रकार बिलाव आदिके घांसदतिगन्तुमैच्छत् पलायितुं | सामनेसे [उसे अपनी मृत्यु समझकर] प्रारभतेत्यर्थः । | चूहे आदि भागना चाहते हैं उसी तदन्नाभिप्रायं मत्वा स लोक- | प्रकार उन अन्न भक्षण करनेवालोंका लोकपालसंघातः कार्यकारण- | अतिक्रमण करके जानेकी इच्छा लक्षणः पिण्डः प्रथमजत्वाद् | करने लगा; अर्थात् उसने उनके अन्यांश्चान्नादानपश्यंस्तदन्नं | सामनेसे दौड़ना आरम्भ कर दिया। वाचा वदनव्यापारेणाजिघृक्षद् | अन्नके उस अभिप्रायको जान- ग्रहीतुमैच्छत् । तदन्नं नाशक्नोन्न | कर लोक और लोकपालोंके देह- समर्थोऽभवद्वाचा वदन- | इन्द्रियरूप संघात उस पिण्डने क्रियया ग्रहीतुमुपादातुम् । | प्रथमोत्पन्न होनेके कारण अन्य स प्रथमजः शरीरी यद्यदि | अन्नभोक्ताओंको न देखकर उस हैनद्वाचाग्रहैष्यदगृहीतवान्त्स्याद- | अन्नको वाणी अर्थात् बोलनेकी न्नं सर्वोऽपि लोकस्तत्कार्यभूतत्वा- | क्रियासे ग्रहण करना चाहा। किन्तु दभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत्तृ- | वह वदनक्रियासे उस अन्नको ग्रहण प्तोऽभविष्यत्, न चैतदस्ति; | करनेमें शक्त—समर्थ न हुआ। | वह सबसे पहले उत्पन्न हुआ देह- | धारी यदि इस अन्नको वाणीसे | ग्रहण कर लेता तो उसका कार्यभूत | होनेके कारण सम्पूर्ण लोक अन्नको | बोलकर ही तृप्त हो जाया | करता। परन्तु बात यह है नहीं,
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ अतो नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुमि- | अतः हमें जान पड़ता है कि वह त्यवगच्छामः पूर्वजोऽपि ॥३॥ | पूर्वोत्पन्न विराट् पुरुष भी उसे वाणीसे | ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं हुआ था॥३॥ ❧❧❧❧❧ समानमुत्तरम्— | आगेका प्रसंग भी इसीके समान | है— तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ४ ॥ फिर उसने इसे प्राणसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु इसे प्राणसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे प्राणसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नके उद्देश्यसे प्राणक्रिया करके तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥ तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैन- च्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५ ॥ उसने इसे नेत्रसे ग्रहण करना चाहा; परन्तु नेत्रसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे नेत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको देखकर ही तृप्त हो जाया करता ॥ ५ ॥ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥ उसने इसे श्रोत्रसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह श्रोत्रसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे श्रोत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको सुनकर ही तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥
४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धै- नत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७ ॥ उसने इसे त्वचासे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह त्वचासे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे त्वचासे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको स्पर्श करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ७ ॥ तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धै- नन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८ ॥ उसने इसे मनसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह मनसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे मनसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नका ध्यान करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ८ ॥ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥ उसने इसे शिश्न ( लिङ्ग ) से ग्रहण करना चाहा; परन्तु वह शिश्नसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे शिश्नसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नका विसर्जन करके ही तृप्त हो जाता ॥ ९ ॥ अपानद्वारा अन्नग्रहण तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वा- युरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥ फिर उसने इसे अपानसे ग्रहण करना चाहा और इसे ग्रहण कर लिया। वह यह [ अपान ] ही अन्नका ग्रह (ग्रहण करनेवाला) है। जो वायु अन्नायु (अन्नद्वारा जीवन धारण करनेवाला) प्रसिद्ध है वह यह [ अपान ] वायु ही है ॥ १० ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
तत्प्राणेन तच्चक्षुषा तच्छ्रोत्रेण | [ इसी प्रकार उसने ] उस अन्न- तत्त्वचा तन्मनसा तच्छिश्नेन | को प्राणसे, नेत्रसे, श्रोत्रसे, त्वचासे, तेन तेन करणव्यापारेणान्नं | मनसे, शिश्नसे एवं भिन्न-भिन्न ग्रहीतुमशक्नुवन्पश्चादपानेन | इन्द्रियोंके व्यापारसे ग्रहण करनेमें वायुना मुखच्छिद्रेण तदन्नमजि- | असमर्थ होकर अन्तमें उसे मुखके घृक्षत् । तदावयत्तदन्नमेवं जग्राह | छिद्रद्वारा अपानवायुसे ग्रहण करने- आशितवान् । तेन स एषोऽपान- | की इच्छा की । तब उसे ग्रहण कर वायुरन्नस्य ग्रहोऽन्नग्राहक इत्ये- | लिया; अर्थात् इस प्रकार इस अन्नको तत् । यद्वायुर्र्यो वायुरन्नायुः | भक्षण कर लिया। उसी कारणसे अन्नबन्धनोऽन्नजीवनो वै प्रसिद्धः | वह यह अपानवायु अन्नका ग्रह स एष यो वायुः ॥ ४-१० ॥ | अर्थात् अन्न ग्रहण करनेवाला है। | जो वायु अन्नायु-अन्नरूप बन्धन- | वाला अर्थात् अन्नरूप जीवनवाला | प्रसिद्ध है वह यह [ अपान ] वायु | ही है ॥ ४-१० ॥ ❖❖❖ परमात्माका शरीरप्रवेशसम्बन्धी विचार स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥ उस परमेश्वरने विचार किया 'यह (पिण्ड) मेरे बिना कैसे रहेगा ?' वह सोचने लगा 'मैं किस मार्गसे [ इसमें ] प्रवेश करूँ ?' उसने विचारा, 'यदि [ मेरे बिना ] वाणीसे बोल लिया जाय, यदि प्राणसे प्राणन क्रिया कर ली जाय, यदि नेत्रेन्द्रियसे देख लिया जाय, यदि कानसे सुना
४८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
४८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ जा सके, यदि त्वचासे स्पर्श कर लिया जाय, यदि मनसे चिन्तन कर लिया जाय, यदि अपानसे भक्षण कर लिया जाय और यदि शिश्नसे विसर्जन किया जा सके तो मैं कौन रहा ? [ अर्थात् यदि मेरे बिना ये सब इन्द्रियोंके व्यापार हो जाते तो मेरा तो कोई प्रयोजन ही न था; तात्पर्य यह कि राजाकी प्रेरणाके बिना नगरके कार्योंके समान मेरी प्रेरणाके बिना इनका होना असम्भव है ]' ॥ ११ ॥
[मूल शाङ्करभाष्य] स एवं लोकलोकपालसंघात- स्थितिमन्ननिमित्तां कृत्वा पुर- पौरतत्पालयितृस्थितिसमां स्वा- मीव ईक्षत—कथं नु केन प्रका- रेणेति वितर्कयन्निदं मदृते माम- न्तरेण पुरस्वामिनम्, यदिदं कार्यकरणसंघातकार्यं वक्ष्यमाणं कथं नु खलु मामन्तरेण स्यात्प- रार्थं सत् । यदि वाचाभिव्या- हृतमित्यादि केवलमेव वाग्व्य- वहरणादि तन्निरर्थकं न कथंचन भवेद्बलिस्तुत्यादिवत्; पौर- वन्द्यादिभिः प्रयुज्यमानं स्वाम्यर्थं सत्तत्स्वामिनमन्तरेणासत्येव स्वा- मिनि तद्वत् ।
[भाष्यानुवाद] उस परमात्माने नगर, नगरनिवासी और उनके रक्षक [ राजकर्मचारी आदि ] की नियुक्तिके समान अन्नरूप निमित्तवाली लोक और लोकपालोंके संघातकी स्थिति कर नगरके स्वामीके समान विचार किया—'कथं नु' यानी किस प्रकारसे—इस प्रकार वितर्क करते हुए [ उसने सोचा ] यह जो आगे बतलाया जानेवाला कार्य ( भूत ) और करणों (इन्द्रियों) के संघातका कार्य ( व्यापार ) है वह परार्थ ( दूसरेके लिये ) होनेके कारण मेरे सिवा अर्थात् पुरके स्वामी- रूप मेरे बिना कैसे होगा ? जिस प्रकार अपने स्वामीके लिये प्रयुक्त पुरवासी और बन्दीजन आदिकी बलि (कर) एवं स्तुति आदि स्वामीके बिना अर्थात् स्वामीके अभावमें निरर्थक ही है उसी प्रकार [ मेरे बिना भी ] यह जो वाणीसे बोलना आदि है अर्थात् केवल वाग्व्यापारादि है वह निरर्थक ही होगा यानी किसी प्रकार न हो सकेगा।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
[वाम स्तम्भ / Left Column]
तस्मान्मया परेण स्वामिना- धिष्ठात्रा कृताकृतफलसाक्षिभूतेन भोक्त्रा भवितव्यं पुरस्येव राज्ञा। यदि नामैतत्संहतकार्यस्य परार्थत्वं परार्थिनं मां चेतनमन्त- रेण भवेत्पुरपौरकार्यमिव तत्स्वा- मिनम्, अथ कोऽहं किंस्वरूपः कस्य वा स्वामी ? यद्यहं कार्यकारणसंघातमनु- प्रविश्य वागाद्यभिव्याहतादिफलं नोपलभेय राजेव पुरमाविश्या- धिकृतपुरुषकृताकृतावेक्षणम्; न कश्चिन्मामयं सन्नेवंरूपश्चेत्यधि- गच्छेद्विचारयेत् । विपर्यये तु योऽयं वागाद्यभिव्याहतादीद- मिति वेद, स सन्वेदनरूपश्चे- त्यधिगन्तव्योऽहं स्याम्; यदर्थ-
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
अतः नगरके [अधिष्ठाता] राजाके समान इस देहरूप संघातके परम प्रभु और अधिष्ठाता मुझे भी इसके पाप- पुण्यके फलके साक्षी और भोक्ता- रूपसे स्थित होना चाहिये । यदि इस देहेन्द्रियसंघातका कार्य परार्थ (दूसरेके लिये) है और वह पुरस्वामी- के बिना पुर और पुरवासियोंके कार्य- के समान मुझ परार्थी अपने चेतन रक्षकके बिना हो सकता है तो मैं क्या रहा ? अर्थात् किस स्वरूपवाला अथवा किसका स्वामी रहा ? जिस प्रकार राजा नगरमें प्रवेश- कर वहाँके अधिकारी पुरुषोंके कार्य- अकार्यादिका निरीक्षण करता है उसी प्रकार यदि मैं भी इस भूत और इन्द्रियोंके संघातमें प्रवेश करके वाणी आदिके उच्चारणादि फलको ग्रहण न करूँगा तो कोई भी मुझे 'यह सत् है और ऐसे स्वरूपवाला है' ऐसा अधिगम—विचार नहीं कर सकेगा। इसके विपरीत अवस्थामें ही मैं इस प्रकार जाना जा सकता हूँ कि जिस प्रकार स्तम्भ और भित्ति आदिसे मिलकर बने हुए मन्दिर आदि संघात अपने अवयवोंके सहित किसी अन्य असंहत वस्तुके लिये
५० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
५० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ मिदं संहतानां वागादीनामभि- | होते हैं उसी प्रकार जिसके लिये व्याहतादि, यथा स्तम्भकुड्या- | इन संघातस्वरूप वाणी आदिके दीनां प्रासादादिसंहतानां स्वाव- | उच्चारणादि व्यापार हैं और जो इन यवैरसंहतपरार्थत्वं तद्वदिति । | वाणी आदिके उच्चारणादिको 'इदम्' इस प्रकार जानता है वह मैं सत् और चेतनस्वरूप हूँ। एवमीक्षित्वातः कतरेण | इस प्रकार विचारकर [ उसने प्रपद्या इति । प्रपदं च मूर्धा चास्य | सोचा ] अतः मैं किस द्वारसे प्रवेश संघातस्य प्रवेशमार्गौ । अनयोः | करूँ ? इस संघातमें प्रवेश करनेके कतरेण मार्गेणेदं कार्यकारण- | दो मार्ग हैं-पदाग्र और मूर्धा । संघातलक्षणं पुरं प्रपद्यै प्रपद्ये- | इनमेंसे मैं किस मार्गसे इस कार्य- येति ॥११॥ | करणके संघातस्वरूप पुरमें प्रवेश करूँ ? ॥ ११ ॥ परमात्मका मूर्द्धद्वारसे शरीरप्रवेश एवमीक्षित्वा न तावन्मद्- | इस प्रकार विचारकर परमेश्वरने भृत्यस्य प्राणस्य मम सर्वार्थाधि- | निश्चय किया-'मैं सम्पूर्ण कार्योंके कृतस्य प्रवेशमार्गेण प्रपदाभ्या- | अधिकारी अपने सेवक प्राणके प्रवेश- मधः प्रपद्ये । किं तर्हि पारि- | मार्ग निम्नदेशीय चरणाग्रोंसे तो शेष्यादस्य मूर्धानं विदार्य प्रपद्ये- | प्रवेश करूँगा नहीं। तो फिर यमिति लोक इवेक्षितकारी- | किससे करूँगा ? अतः पदाग्रको त्यागकर बचे हुए मूर्धाको ही विदीर्ण करके प्रवेश करूँगा। इस प्रकार सोच-समझकर काम करनेवाले लोगों- के समान- स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्दतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथा-
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ स्त्रयः स्वप्नाः; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥ वह इस सीमा ( मूर्द्धा ) को ही विदीर्णकर इसीके द्वारा प्रवेश कर गया । वह यह द्वार 'विदृत्ति' नामवाला है; यह नान्दन ( आनन्द- प्रद ) है । यह आवसथ [ नेत्र ], यह आवसथ [ कण्ठ ], यह आवसथ [ हृदय ] इस प्रकार इसके तीन आवसथ ( वासस्थान ) और तीन स्वप्न हैं ॥ १२ ॥
| [संस्कृत-भाष्यम्] | [हिन्दी-भाष्यार्थ] |
|---|---|
| स स्रष्टेश्वर एतमेव मूर्द्धसी- | वह सृष्टिकर्ता ईश्वर इस मूर्ध- |
| मानं केशविभागावसानं विदार्य- | सीमाको ही, जिसका केशोंका विभाग |
| च्छिद्रं कृत्वैतया द्वारा मार्गेणेमं | ही अवसान है, विदीर्ण कर अर्थात् |
| लोकं कार्यकारणसंघातं प्रापद्यत | उसमें छिद्र कर · उसीके द्वारा-उस |
| प्रविवेश । सेयं हि प्रसिद्धा द्वाः | मार्गसे ही इस लोक अर्थात् भूत |
| मूर्ध्नि तैलादिधारणकाले अन्त- | और इन्द्रियोंके संघातमें प्रवेश कर |
| स्तद्रसादिसंवेदनात् । सैषा | गया । वही प्रसिद्ध द्वार है, क्योंकि |
| विदृत्तिर्विदारितत्वाद्विदॄत्तिर्नाम | शिरमें तैल आदि धारण करते समय |
| प्रसिद्धा द्वाः । | भीतर उसके रसादिका अनुभव होता |
| है । विदीर्ण किया जानेके कारण | |
| वह द्वार 'विदृत्ति' अर्थात् विदृति नाम- | |
| से प्रसिद्ध है । | |
| इतराणि तु श्रोत्रादिद्वाराणि | इससे भिन्न जो श्रोत्रादि द्वार हैं |
| भृत्यादिस्थानीयसाधारणमार्ग- | वे भृत्यादिरूप साधारण मार्ग होनेके |
| त्वान्न समृद्धीनि नानन्दहेतूनि । | कारण समृद्ध अर्थात् आनन्दके हेतु |
| इदं तु द्वारं परमेश्वरस्यैव केवल- | नहीं हैं । किन्तु यह मार्ग तो केवल |
| स्येति तदेतन्नान्दनं नन्दनमेव । | परमेश्वरका ही है । अतः यह |
| नान्दन ( आनन्दप्रद ) है । नन्दनको | |
| ही यहाँ नान्दन कहा है । |
५२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
५२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत] नान्दनमिति दैर्घ्यं छान्दसम् । नन्दत्यनेन द्वारेण गत्वा पर- स्मिन्ब्रह्मणीति । तस्यैवं सृष्ट्वा प्रविष्टस्य जीवे- नात्मना राज्ञ इव पुरं त्रय आवसथाः । जागरितकाल इन्द्रियस्थानं दक्षिणं चक्षुः, स्वप्न- कालेऽन्तर्मनः, सुषुप्तिकाले हृदयाकाश इत्येतत् । वक्ष्यमाणा वा त्रय आवसथाः; पितृशरीरं मातृगर्भाशयः स्वं च शरीरमिति । त्रयः स्वप्ना जाग्रत्स्वप्नसुषु- प्स्याख्याः । ननु जागरितं प्रबोधरूपत्वान्न स्वप्नः; नैवम्, स्वप्न एव । कथम् ? परमार्थ- स्वात्मप्रबोधाभावात्स्वप्नवदसद्व- स्तुदर्शनाच्च । अयमेवावसथश्चक्षु- र्दक्षिणं प्रथमः, मनोऽन्तरं द्वितीयः, हृदयाकाशस्तृतीयः ।
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद] 'नान्दनम्' इस पद [के नकार] में दीर्घ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है। तात्पर्य यह है कि इस मार्गसे जाकर पुरुष परब्रह्ममें आनन्द प्राप्त करने लगता है। पुरमें प्रविष्ट हुए राजाके समान इस प्रकार रचना करके उसमें जीवरूपसे प्रवेश करनेवाले उस ईश्वरके तीन आवसथ हैं—(१) जाग्रत्कालमें इन्द्रियोंका स्थान दक्षिण नेत्र, (२) स्वप्नकालमें मनके भीतर और (३) सुषुप्तिमें हृदयाकाशके अन्दर । अथवा आगे बतलाये जानेवाले पितृदेह, मातृ- गर्भाशय और अपना ही शरीर—ये ही तीन आवसथ हैं। तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक तीन स्वप्न हैं। यदि कहो कि प्रबोधरूप होनेके कारण जाग्रत् स्वप्न नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है; वह भी स्वप्न ही है। किस प्रकार ? क्योंकि उस समय परमार्थ आत्मस्वरूपके बोधका अभाव होता है और स्वप्नके समान असत् वस्तुएँ दिखलायी दिया करती हैं। [उन आवसथोंमें] यह दक्षिण नेत्र ही प्रथम है, मनका अन्तर्भाग द्वितीय है और हृदयाकाश तृतीय है।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३ 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 अयमावसथ इत्युक्तानुकीर्त- | अयमावसथः [ ऐसा जो तीन नमेव। तेषु ह्ययमावसथेषु पर्याये- | वार कहा गया है ] यह पूर्वकथित- | का ही अनुकीर्तन है । उन णात्मभावेन वर्तमानोऽविद्यया | आवसथोंमें क्रमशः आत्मभावसे | रहनेवाला यह जीव दीर्घकालतक दीर्घकालं गाढप्रसुप्तः स्वाभावि- | स्वाभाविक अविद्यासे गाढ निद्रामें | सोता रहता है और अनेकों शत- क्या न प्रबुध्यतेऽनेकशतसहस्रा- | सहस्र अनर्थोंकी प्राप्तिसे होनेवाले | दुःखरूप मुद्गरोंके आघातके अनुभव- नर्थसंनिपातजदुःखमुद्गराभिघा- | से भी नहीं जगता ॥ १२ ॥ तानुभवैरपि ॥१२॥ | ❧ जीवका मोह और उसकी निवृत्ति ❧ स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिष- दिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् । इदम- दर्शमिती ३ ॥ १३ ॥ [ इस प्रकार शरीरमें प्रवेश करके जीवरूपसे ] उत्पन्न हुए उस परमेश्वरने भूतोंको [ तादात्म्यभावसे ] ग्रहण किया । और [ गुरुकृपासे बोध होनेपर ] 'यहाँ [ मेरे सिवा ] अन्य कौन है' ऐसा कहा । और मैंने इसे ( अपने आत्मस्वरूपको ) देख लिया है इस प्रकार उसने इस पुरुषको ही पूर्णतम ब्रह्मरूपसे देखा ॥ १३ ॥ स जातः शरीरे प्रविष्टो जी- | उसने उत्पन्न होकर—जीवभावसे | शरीरमें प्रविष्ट होकर भूतोंको वात्मना भूतान्यभिव्यैख्यद्व्या- | व्याकृत किया [ अर्थात् उन्हें | तादात्म्यरूपसे ग्रहण किया ] । फिर करोत् । स कदाचित्परमकारु- | किसी समय परम कारुणिक आचार्य- | के द्वारा अपने कर्णमूलमें—जिसका णिकेनाचार्येणात्मज्ञानप्रबोधकृ- | शब्द आत्मज्ञानका दृढ़ बोध कराने-
५४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
५४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
च्छब्दिकायां वेदान्तमहावाक्य- | वाला है ऐसी-वेदान्तवाक्यरूप महा- भेर्यां तत्कर्णमूले ताड्यमानाया- | भेरीके बजाये जानेपर उसने, जिस- मेतमेव सृष्ट्यादिकर्तृत्वेन प्रकृतं | का सृष्टि आदिके कर्तृत्वरूपसे प्रकरण चला हुआ है उस पुरुष- [ शरीर- पुरुषं पुरि शयानमात्मानं ब्रह्म | रूप ] पुरमें शयन करनेवाले आत्मा- को ततम-इसमें एक तकारका लोप वृहत्ततमं तकारेणैकेन लुप्तेन | हुआ है अतः तततम-व्याप्ततम तततमं व्याप्ततमं परिपूर्णमाका- | अर्थात् आकाशके समान परिपूर्ण महान् ब्रह्मरूपसे जाना-साक्षात्कार शवत्प्रत्यबुध्यतापश्यत् । कथम् ? | किया । किस प्रकार साक्षात्कार किया [ सो बतलाते हैं-] 'अहो ! इदं ब्रह्म ममात्मनः स्वरूपमदर्शं | मैंने अपने आत्माके स्वरूपको ही इस ब्रह्मरूपसे देखा है' इस प्रकार । दृष्टवानस्मि, अहो इति, विचार- | यहाँ 'इती' पदमें जो प्लुत उच्चारण है वह विचार प्रदर्शित करनेके लिये णार्था प्लुतिः पूर्वम् ॥१३॥ | है ॥ १३ ॥
'इन्द्र' शब्दकी व्युत्पत्ति
यस्मादिदमित्येव यत्साक्षाद- | क्योंकि जो [ जीवरूपसे ] सबके भीतर रहनेवाला है उस ब्रह्मको परोक्षाद्ब्रह्म सर्वान्तरमपश्यत् | 'इदम् ( यह )' इस प्रकार साक्षात् अपरोक्षरूपसे देखा था परोक्ष- परोक्षेण- | रूपसे नहीं-
तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ इसलिये उसका नाम 'इदन्द्र' हुआ, वह 'इदन्द्र' नामसे प्रसिद्ध है। 'इदन्द्र' होनेपर ही [ ब्रह्मवेत्ता लोग ] उसे परोक्षरूपसे 'इन्द्र' कहकर पुकारते हैं, क्योंकि देवगण परोक्षप्रिय ही होते हैं, देवता परोक्ष- प्रिय ही होते हैं ॥ १४ ॥ तस्मादिदं पश्यतीतीदन्द्रो | इसलिये जो इसे देखता है वह नाम परमात्मा । इदन्द्रो ह वै | परमात्मा 'इदन्द्र' नामवाला है । नाम प्रसिद्धो लोक ईश्वरः । | लोकमें ईश्वर 'इदन्द्र' नामसे तमेवमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इति | प्रसिद्ध है। इस प्रकार 'इदन्द्र' होने- परोक्षेण परोक्षाभिधानेनाचक्षते | पर भी ब्रह्मवेत्ता व्यवहारके लिये ब्रह्मविदः संव्यवहारार्थं; पूज्यत- | उसे 'इन्द्र' इस परोक्ष नामसे मत्वात्प्रत्यक्षनामग्रहणभयात् । | पुकारते हैं, क्योंकि पूज्यतम होनेके तथा हि परोक्षप्रियाः परोक्षनाम- | कारण उसका प्रत्यक्ष नाम लेनेमें ग्रहणप्रिया इव एव हि यस्मा- | उन्हें भय है। जब कि देवता लोग देवाः; किमुत सर्वदेवानामपि | भी परोक्षप्रिय अर्थात् अपना परोक्ष देवो महेश्वरः । द्विर्वचनं प्रकृता- | नाम ग्रहण किया जाना ही प्रिय ध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥१४॥ | माननेवाले हैं तब सम्पूर्ण देवताओंके | भी देव महेश्वरका तो कहना ही | क्या है ? प्रकृत अध्यायकी समाप्ति | सूचित करनेके लिये यहाँ दो बार | कहा गया है ॥ १४ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयः खण्डः समाप्तः ॥ ३ ॥ उपनिषत्क्रमेण प्रथमः, आरण्यकक्रमेण चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।
द्वितीय अध्याय
द्वितीय अध्याय
प्रथम खण्ड
प्रस्तावना
अस्मिंश्चतुर्थेऽध्याय एष वा- | इस (पूर्वोक्त) चौथे* अध्यायमें (अतीताध्याय-) क्यार्थः—जगदुत्प- | यह वाक्यार्थ विवक्षित है—† (विषयावलोकनम्) त्तिस्थितिप्रलयकृद- | जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय संसारी सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्व- | करनेवाले असंसारी सर्वशक्तिमान् वित्सर्वमिदं जगत्स्वतोन्यद्वस्त्व- | सर्वज्ञने अपनेसे भिन्न किसी अन्य न्तरमनुपादायैव आकाशादि- | वस्तुको ग्रहण किये बिना ही इस क्रमेण सृष्ट्वा स्वात्मप्रबोधनार्थं | सम्पूर्ण जगत्की आकाशादिक्रमसे सर्वाणि च प्राणादिमच्छरीराणि | रचना कर अपनेको स्वयं ही स्वयं प्रविवेश। प्रविश्य च स्व- | जाननेके लिये सम्पूर्ण प्राणादियुक्त मात्मानं यथाभूतमिदं ब्रह्मास्मीति | शरीरमें स्वयं ही प्रवेश किया। और साक्षात्प्रत्यबुध्यत। तस्मात्स एव | प्रवेश करके 'मैं यह ब्रह्म हूँ' सर्वशरीरेष्वेक एवात्मा नान्य | इस प्रकार अपने यथार्थ स्वरूपका इति। अन्योऽपि “सम आत्मा | साक्षात् बोध प्राप्त किया। अतः ब्रह्मास्मीत्येवं विद्यात्” इति। | समस्त शरीरोंमें एकमात्र वही आत्मा | है, उससे भिन्न नहीं। [ इसके | सिवा ] “[ सम्पूर्ण भूतोंमें ] जो सम | आत्मा ब्रह्म है वह मैं हूँ—ऐसा जाने'
* आरण्यकके क्रमसे यहाँ चौथी संख्या कही गयी है। † पूर्व अध्यायमें आत्माकी एकता, लोक तथा लोकपालोंकी सृष्टि और क्षुधा-पिपासासे संयोग आदि अनेक विषयोंका वर्णन है उनमें विवक्षित अभिप्रायका प्रतिपादन किया जाता है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७ “आत्मा वा इदमेक एवाग्र | “निश्चय पहले एक आत्मा ही था” आसीत्” (१।१।१) इति “ब्रह्म | तथा “[ उसने ] ब्रह्मको [ आकाशके ततमम्” (१ । ३ । १३) इति | समान ] अतिशय व्याप्त [ जाना ]” । चोक्तम् । अन्यत्र च । | ऐसा भी कहा है और [ ऐसा | ही ] अन्य उपनिषदोंमें भी | कहा है। सर्वगतस्य सर्वात्मनो बालाग्र- | पूर्व०-उस सर्वगत सर्वात्माके [ प्रवेशश्रुति-विचारः ] मात्रमप्यप्रविष्टं | लिये तो बालका अग्रभाग भी अप्रविष्ट नास्तीति कथं सी- | नहीं है; फिर वह चींटीके बिलप्रवेश- मानं विदार्य प्रापद्यत पिपीलि- | के समान मूर्धसीमाको विदीर्णकर केव सुषिरम् । | किस प्रकार मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट | हुआ ? नन्वत्यल्पमिदं चोद्यं बहु | सिद्धान्ती-तुम्हारा यह प्रश्न तो | अल्प है । अभी तो उपर्युक्त कथनमें चात्र चोदयितव्यम् । अकरणः | बहुत कुछ पूछनेयोग्य बातें हैं। सन्नीक्षत । अनुपादाय किंचि- | ‘उसने इन्द्रियहीन होकर भी ईक्षण | किया । किसी उपादानके बिना ही ल्लोकानसृजत । अद्भ्यः पुरुषं | लोकोंकी रचना की। जलमेंसे पुरुष समुद्धृत्यामूर्छयत् । तस्याभिध्या- | निकालकर उसे अवयवयोजनाद्वारा | पुष्ट किया। अभिध्यानके द्वारा उसका नान्मुखादि निर्भिन्नं मुखादि- | मुख प्रकट हुआ तथा मुखादिसे भ्यश्चाग्न्यादयो लोकपालास्तेषां | अग्नि आदि लोकपाल प्रकट हुए । | उनका क्षुधा-पिपासादिसे संयोग चाशनायापिपासादि संयोजनं त- | कराना, उनका आयतनके लिये दायतनप्रार्थनं तदर्थं गवादि- | प्रार्थना करना, उसके लिये गौ आदि ऐतरेयो० ३—