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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

द्विजवरो! इस अनुमान-प्रमाणके द्वारा इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि अन्तर्यामी परमात्मा सत्त्वस्वरूप आत्मामें स्थित हैं। इस तत्त्वको समझे बिना परम पुरुषको प्राप्त करना सम्भव नहीं है ।। ६ ।। क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्त्विकं वृत्तमिष्यते ।। ७ ।। क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, ज्ञान, त्याग तथा संन्यास—ये सात्त्विक बर्ताव बताये गये हैं ।। ७ ।। एतेनैवानुमानेन मन्यन्ते वै मनीषिणः । सत्त्वं च पुरुषश्चैव तत्र नास्ति विचारणा ।। ८ ।। मनीषी पुरुष इसी अनुमानसे उस सत्त्वस्वरूप आत्माका और परमात्माका मनन करते हैं। इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ।। ८ ।। आहुरेके च विद्वांसो ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः । क्षेत्रज्ञसत्त्वयोरैक्यमित्येतन्नोपपद्यते ।। ९ ।। ज्ञानमें भलीभाँति स्थित कितने ही विद्वान् कहते हैं कि क्षेत्रज्ञ और सत्त्वकी एकता युक्तिसंगत नहीं है ।। ९ ।। पृथग्भूतं ततः सत्त्वमित्येतदविचारितम् । पृथग्भावश्च विज्ञेयः सहजश्चापि तत्त्वतः ।। १० ।। उनका कहना है कि उस क्षेत्रज्ञसे सत्त्व पृथक् है, क्योंकि यह सत्त्व अविचारसिद्ध है। ये दोनों एक साथ रहनेवाले होनेपर भी तत्त्वतः अलग-अलग हैं—ऐसा समझना चाहिये ।। १० ।। तथैकत्वनानात्वमिष्यते विदुषां नयः । मशकोदुम्बरे चैक्यं पृथक्त्वमपि दृश्यते ।। ११ ।। इसी प्रकार दूसरे विद्वानोंका निर्णय दोनोंके एकत्व और नानात्वको स्वीकार करता है; क्योंकि मशक और उदुम्बरकी एकता और पृथक्ता देखी जाती है ।। ११ ।। मत्स्यो यथान्यः स्यादाप्सु सम्प्रयोगस्तथा तयोः । सम्बन्धस्तोयबिन्दूनां पर्णे कोकनदस्य च ।। १२ ।। जैसे जलसे मछली भिन्न है तो भी मछली और जल—दोनोंका संयोग देखा जाता है एवं जलकी बूँदोंका कमलके पत्तेसे सम्बन्ध देखा जाता है ।। १२ ।। गुरुरुवाच इत्युक्तवन्तस्ते विप्रास्तदा लोकपितामहम् । पुनः संशयमापन्नाः पप्रच्छुर्मुनिसत्तमाः ।। १३ ।।

गुरुने कहा—इस प्रकार कहनेपर उन मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मणोंने पुनः संशयमें पड़कर उस समय लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा ॥ १३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न ऋषय ऊचुः को वा स्विदिह धर्माणांमनुष्ठेयतमो मतः । व्याहतामिव पश्यामो धर्मस्य विविधां गतिम् ॥ १ ॥ ऋषियोंने पूछा—ब्रह्मन्! इस जगत्में समस्त धर्मोंमें कौन-सा धर्म अनुष्ठान करनेके लिये सर्वोत्तम माना गया है, यह कहिये; क्योंकि हमें धर्मके विभिन्न मार्ग एक-दूसरेसे आहत हुए-से प्रतीत होते हैं ॥ १ ॥ ऊर्ध्वं देहाद् वदन्त्येके नैतदस्तीति चापरे । केचित् संशयितं सर्वं निःसंशयमथापरे ॥ २ ॥ कोई तो कहते हैं कि देहका नाश होनेके बाद धर्मका फल मिलेगा। दूसरे कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है। कितने ही लोग सब धर्मोंको संशययुक्त बताते हैं और दूसरे संशयरहित कहते हैं ॥ २ ॥ अनित्यं नित्यमित्येके नास्त्यस्तीत्यपि चापरे । एकरूपं द्विधेत्येके व्यामिश्रमिति चापरे ॥ ३ ॥ कोई कहते हैं कि धर्म अनित्य है और कोई उसे नित्य कहते हैं। दूसरे कहते हैं कि धर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। कोई कहते हैं कि अवश्य है। कोई कहते हैं कि एक ही धर्म दो प्रकारका है तथा कुछ लोग कहते हैं कि धर्म मिश्रित है ॥ ३ ॥ मन्यन्ते ब्राह्मणा एव ब्रह्मज्ञास्तत्त्वदर्शिनः । एकमेके पृथक् चान्ये बहुत्वमिति चापरे ॥ ४ ॥ वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता तत्त्वदर्शी ब्राह्मण लोग यह मानते हैं कि एक ब्रह्म ही है। अन्य कितने ही कहते हैं कि जीव और ईश्वर अलग-अलग हैं और दूसरे लोग सबकी सत्ता भिन्न और बहुत प्रकारसे मानते हैं ॥ ४ ॥ देशकालावुभौ केचिन्नैतदस्तीति चापरे । जटाजिनधराश्चान्ये मुण्डाः केचिदसंवृताः ॥ ५ ॥ कितने ही लोग देश और कालकी सत्ता मानते हैं। दूसरे लोग कहते हैं कि इनकी सत्ता नहीं है। कोई जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले हैं, कोई सिर मुँडाते हैं और कोई दिगम्बर रहते हैं ॥ ५ ॥ अस्नानं केचिदिच्छन्ति स्नानमप्यपरे जनाः । मन्यन्ते ब्राह्मणा देवा ब्रह्मज्ञास्तत्त्वदर्शिनः ॥ ६ ॥

कितने ही मनुष्य स्नान नहीं करना चाहते और दूसरे लोग जो शास्त्रज्ञ तत्त्वदर्शी ब्राह्मणदेवता हैं, वे स्नानको ही श्रेष्ठ मानते हैं ।। ६ ।। आहारं केचिदिच्छन्ति केचिच्चानशने रताः । कर्म केचित् प्रशंसन्ति प्रशान्तिं चापरे जनाः ।। ७ ।। कई लोग भोजन करना अच्छा मानते हैं और कई भोजन न करनेमें अभिरत रहते हैं। कई कर्म करनेकी प्रशंसा करते हैं और दूसरे लोग परम शान्तिकी प्रशंसा करते हैं ।। ७ ।। केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद् भोगान् पृथग्विधान् । धनानि केचिदिच्छन्ति निर्धनत्वमथापरे । उपास्यसाधनं त्वेके नैतदस्तीति चापरे ।। ८ ।। कितने ही मोक्षकी प्रशंसा करते हैं और कितने ही नाना प्रकारके भोगोंकी प्रशंसा करते हैं। कुछ लोग बहुत-सा धन चाहते हैं और दूसरे निर्धनताको पसंद करते हैं। कितने ही मनुष्य अपने उपास्य इष्टदेवकी प्राप्तिकी साधना करते हैं और दूसरे कितने ही ऐसा कहते हैं कि 'यह नहीं है' ।। ८ ।। अहिंसानिरताश्चान्ये केचिद् हिंसापरायणाः । पुण्येन यशसा चान्ये नैतदस्तीति चापरे ।। ९ ।। अन्य कई लोग अहिंसा-धर्मका पालन करनेमें रुचि रखते हैं और कई लोग हिंसाके परायण हैं। दूसरे कई पुण्य और यशसे सम्पन्न हैं। इनसे भिन्न दूसरे कहते हैं कि 'यह सब कुछ नहीं है' ।। ९ ।। सद्भावनिरताश्चान्ये केचित् संशयिते स्थिताः । दुःखादन्ये सुखादन्ये ध्यानमित्यपरे जनाः ।। १० ।। अन्य कितने ही सद्भावमें रुचि रखते हैं। कितने ही लोग संशयमें पड़े रहते हैं। कितने ही साधक कष्ट सहन करते हुए ध्यान करते हैं और दूसरे कई सुखपूर्वक ध्यान करते हैं ।। १० ।। यज्ञमित्यपरे विप्राः प्रदानमिति चापरे । तपस्त्वन्ये प्रशंसन्ति स्वाध्यायमपरे जनाः ।। ११ ।। अन्य ब्राह्मण यज्ञको श्रेष्ठ बताते हैं और दूसरे दानकी प्रशंसा करते हैं। अन्य कई तपकी प्रशंसा करते हैं तथा दूसरे स्वाध्यायकी प्रशंसा करते हैं ।। ११ ।। ज्ञानं संन्यासमित्येके स्वभावं भूतचिन्तकाः । सर्वमेके प्रशंसन्ति न सर्वमिति चापरे ।। १२ ।। कई लोग कहते हैं कि ज्ञान ही संन्यास है। भौतिक विचारवाले मनुष्य स्वभावकी प्रशंसा करते हैं। कितने ही सभीकी प्रशंसा करते हैं और दूसरे सबकी प्रशंसा नहीं करते ।। १२ ।। एवं व्युत्थापिते धर्मे बहुधा विप्रबोधिते ।

निश्चयं नाधिगच्छामः सम्मूढाः सुरसत्तम ॥ १३ ॥ सुरश्रेष्ठ ब्रह्मन्! इस प्रकार धर्मकी व्यवस्था अनेक ढंगसे परस्पर विरुद्ध बतलायी जानेके कारण हमलोग धर्मके विषयमें मोहित हो रहे हैं; अतः किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाते ॥ १३ ॥ इदं श्रेय इदं श्रेय इत्येवं व्युत्थितो जनः । यो हि यस्मिन् रतो धर्मे स तं पूजयते सदा ॥ १४ ॥ 'यही कल्याण-मार्ग है, यही कल्याण-मार्ग है'—इस प्रकारकी बातें सुनकर मनुष्य- समुदाय विचलित हो गया है। जो जिस धर्ममें रत है, वह उसीका सदा आदर करता है ॥ १४ ॥ तेन नोऽविहिता प्रज्ञा मनश्च बहुलीकृतम् । एतदाख्यातुमिच्छामः श्रेयः किमिति सत्तम ॥ १५ ॥ इस कारण हमलोगोंकी बुद्धि विचलित हो गयी है और मन भी बहुत-से संकल्प- विकल्पोंमें पड़कर चंचल हो गया है। श्रेष्ठ ब्रह्मन्! हम यह जानना चाहते हैं कि वास्तविक कल्याणका मार्ग क्या है? ॥ १५ ॥ अतः परं तु यद् गुह्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति । सत्त्वक्षेत्रज्ञयोश्चापि सम्बन्धः केन हेतुना ॥ १६ ॥ इसलिये जो परम गुह्य तत्त्व है, वह आपको हमें बतलाना चाहिये। साथ ही यह भी बतलाइये कि बुद्धि और क्षेत्रज्ञका सम्बन्ध किस कारणसे हुआ है? ॥ १६ ॥ एवमुक्तः स तैर्विप्रैर्भगवाँल्लोकभावनः । तेभ्यः शशंस धर्मात्मा याथातथ्येन बुद्धिमान् ॥ १७ ॥ लोकोंकी सृष्टि करनेवाले धर्मात्मा बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माजी उन ऋषियोंकी यह बात सुनकर उनसे उनके प्रश्नोंका यथार्थ रूपसे उत्तर देने लगे ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीता पर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्‌की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन ब्रह्मोवाच हन्त वः संप्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमाः । गुरुणा शिष्यमासाद्य यदुक्तं तन्निबोधत ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—श्रेष्ठ महर्षियो! तुमलोगोंने जो विषय पूछा है, उसे अब मैं कहूँगा। गुरुने सुयोग्य शिष्यको पाकर जो उपदेश दिया है, उसे तुमलोग सुनो ॥ १ ॥ समस्तमिह तच्छ्रुत्वा सम्यगेवावधार्यताम् । अहिंसा सर्वभूतानामेतत् कृत्यतमं मतम् ॥ २ ॥ एतत् पदमनुद्विग्नं वरिष्ठं धर्मलक्षणम् । उस विषयको यहाँ पूर्णतया सुनकर अच्छी प्रकार धारण करो। सब प्राणियोंकी अहिंसा ही सर्वोत्तम कर्तव्य है—ऐसा माना गया है। यह साधन उद्वेगरहित, सर्वश्रेष्ठ और धर्मको लक्षित करानेवाला है ॥ २ ½ ॥ ज्ञानं निःश्रेय इत्याहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः ॥ ३ ॥ तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । निश्चयको साक्षात् करनेवाले वृद्ध लोग कहते हैं कि ‘ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है।’ इसलिये परम शुद्ध ज्ञानके द्वारा ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३ ½ ॥ हिंसापराश्च ये केचिद् ये च नास्तिकवृत्तयः । लोभमोहसमायुक्तास्ते वै निरयगामिनः ॥ ४ ॥ जो लोग प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, नास्तिक-वृत्तिका आश्रय लेते हैं और लोभ तथा मोहमें फँसे हुए हैं, उन्हें नरकमें गिरना पड़ता है ॥ ४ ॥ आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः । तेऽस्मिल्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥ ५ ॥ जो लोग सावधान होकर सकाम कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे बार-बार इस लोकमें जन्म ग्रहण करके सुखी होते हैं ॥ ५ ॥ कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः । अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ ६ ॥

जो विद्वान् समत्वयोगमें स्थित हो श्रद्धाके साथ कर्तव्य-कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और उनके फलमें आसक्त नहीं होते, वे धीर और उत्तम दृष्टिवाले माने गये हैं ॥ ६ ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्यथा । संयोगो विप्रयोगश्च तन्निबोधत सत्तमाः ॥ ७ ॥ श्रेष्ठ महर्षियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि सत्त्व और क्षेत्रज्ञका परस्पर संयोग और वियोग कैसे होता है? इस विषयको ध्यान देकर सुनो ॥ ७ ॥ विषयो विषयित्वं च सम्बन्धोऽयमिहोच्यते । विषयी पुरुषो नित्यं सत्त्वं च विषयः स्मृतः ॥ ८ ॥ इन दोनोंमें यहाँ यह विषय-विषयीभाव सम्बन्ध माना गया है। इनमें पुरुष तो सदा विषयी और सत्त्व विषय माना जाता है ॥ ८ ॥ व्याख्यातं पूर्वकल्पेन मशकोदुम्बरं यथा । भुज्यमानं न जानीते नित्यं सत्त्वमचेतनम् । यस्त्वेवं तं विजानीते यो भुङ्क्ते यश्च भुज्यते ॥ ९ ॥ पूर्व अध्यायमें मच्छर और गूलरके उदाहरणसे यह बात बतायी जा चुकी है कि भोगा जानेवाला अचेतन सत्त्व नित्य-स्वरूप क्षेत्रज्ञको नहीं जानता, किंतु जो क्षेत्रज्ञ है वह इस प्रकार जानता है कि जो भोगता है वह आत्मा है और जो भोगा जाता है, वह सत्त्व है ॥ ९ ॥ नित्यं द्वन्द्वसमायुक्तं सत्त्वमाहुर्मनीषिणः । निर्द्वन्द्वो निष्कलो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ॥ १० ॥ मनीषी पुरुष सत्त्वको द्वन्द्वयुक्त कहते हैं और क्षेत्रज्ञ निर्द्वन्द्व, निष्कल, नित्य और निर्गुणस्वरूप है ॥ १० ॥ समं संज्ञानुगश्चैव स सर्वत्र व्यवस्थितः । उपभुङ्क्ते सदा सत्त्वमपः पुष्करपर्णवत् ॥ ११ ॥ वह क्षेत्रज्ञ समभावसे सर्वत्र भलीभाँति स्थित हुआ ज्ञानका अनुसरण करता है। जैसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रहकर जलको धारण करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ सदा सत्त्वका उपभोग करता है ॥ ११ ॥ सर्वैरपि गुणैर्विद्वान् व्यतिषक्तो न लिप्यते । जलबिन्दुर्यथा लोलः पद्मिनीपत्रसंस्थितः ॥ १२ ॥ एवमेवाप्यसंयुक्तः पुरुषः स्यान्न संशयः । जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी चंचल बूँद उसे भिगो नहीं पाती, उसी प्रकार विद्वान् पुरुष समस्त गुणोंसे सम्बन्ध रखते हुए भी किसीसे लिप्त नहीं होता। अतः क्षेत्रज्ञ पुरुष वास्तवमें असंग है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १२ १/२ ॥ द्रव्यमात्रभूत् सत्त्वं पुरुषस्येति निश्चयः ॥ १३ ॥

यथा द्रव्यं च कर्ता च संयोगोऽप्यनयोस्तथा । यह निश्चित बात है कि पुरुषके भोगनेयोग्य द्रव्यमात्रकी संज्ञा सत्त्व है तथा जैसे द्रव्य और कर्ताका सम्बन्ध है, वैसे ही इन दोनोंका सम्बन्ध है ॥ १३ १/२ ॥ यथा प्रदीपमादाय कश्चित् तमसि गच्छति । तथा सत्त्वप्रदीपेन गच्छन्ति परमैषिणः ॥ १४ ॥ जैसे कोई मनुष्य दीपक लेकर अन्धकारमें चलता है, वैसे ही परम तत्त्वको चाहनेवाले साधक सत्त्वरूप दीपकके प्रकाशमें साधनमार्गपर चलते हैं ॥ १४ ॥ यावद् द्रव्यं गुणस्तावत् प्रदीपः सम्प्रकाशते । क्षीणे द्रव्ये गुणे ज्योतिरन्तर्धानाय गच्छति ॥ १५ ॥ जबतक दीपकमें द्रव्य और गुण रहते हैं, तभीतक वह प्रकाश फैलाता है। द्रव्य और गुणका क्षय हो जानेपर ज्योति भी अन्तर्धान हो जाती है ॥ १५ ॥ व्यक्तः सत्त्वगुणस्त्वेवं पुरुषोऽव्यक्त इष्यते । एतद् विप्रा विजानीत हन्त भूयो ब्रवीमि वः ॥ १६ ॥ ब्रह्माजीका ऋषियोंको उपदेश

यहाँ पृष्ठ पर दिए गए संपूर्ण पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

इस प्रकार सत्त्वगुण तो व्यक्त है और पुरुष अव्यक्त माना गया है। ब्रह्मर्षियो! इस तत्त्वको समझो। अब मैं तुमलोगोंसे आगेकी बात बताता हूँ ।। १६ ।। सहस्रेणापि दुर्मेधा न बुद्धिमधिगच्छति । चतुर्थेनाप्यथांशेन बुद्धिमान् सुखमेधते ।। १७ ।। जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे हजार उपाय करनेपर भी ज्ञान नहीं होता और जो बुद्धिमान् है वह चौथाई प्रयत्नसे भी ज्ञान पाकर सुखका अनुभव करता है ।। १७ ।। एवं धर्मस्य विज्ञेयं संसाधनमुपायतः । उपायज्ञो हि मेधावी सुखमत्यन्तमश्नुते ।। १८ ।। ऐसा विचारकर किसी उपायसे धर्मके साधनका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि उपायको जाननेवाला मेधावी पुरुष अत्यन्त सुखका भागी होता है ।। १८ ।। यथाध्वानमपाथेयः प्रपन्नो मनुजः क्वचित् । क्लेशेन याति महता विनश्येदन्तरापि च ।। १९ ।। जैसे कोई मनुष्य यदि राह-खर्चका प्रबन्ध किये बिना ही यात्रा करता है तो उसे मार्गमें बहुत क्लेश उठाना पड़ता है अथवा वह बीचहीमें मर भी सकता है ।। १९ ।। तथा कर्मसु विज्ञेयं फलं भवति वा न वा । पुरुषस्यात्मनिःश्रेयः शुभाशुभनिदर्शनम् ।। २० ।। ऐसे ही (पूर्वजन्मोंके पुण्योंसे हीन पुरुष) योगमार्गके साधनमें लगनेपर योगसिद्धिरूप फल कठिनतासे पाता है अथवा नहीं भी पाता। पुरुषका अपना कल्याण-साधन ही उसके पूर्वजन्मके शुभाशुभ-संस्कारोंको बतानेवाला है ।। २० ।। यथा च दीर्घमध्वानं पद्भ्यामेव प्रपद्यते । अदृष्टपूर्वं सहसा तत्त्वदर्शनवर्जितः ।। २१ ।। जैसे पहले न देखे हुए दूरके रास्तेपर जब मनुष्य सहसा पैदल ही चल पड़ता है (तो वह अपने गन्तव्य स्थानपर नहीं पहुँच पाता), यही दशा तत्त्वज्ञानसे रहित अज्ञानी पुरुषकी होती है ।। २१ ।। तमेव च यथाध्वानं रथेनेहाशुगामिना । गच्छत्यश्वप्रयुक्तेन तथा बुद्धिमतां गतिः ।। २२ ।। ऊर्ध्वं पर्वतमारुह्य नान्त्ववेक्षेत भूतलम् । किंतु उसी मार्गपर घोड़े जुते हुए शीघ्रगामी रथके द्वारा यात्रा करनेवाला पुरुष जिस प्रकार शीघ्र ही अपने लक्ष्य स्थानपर पहुँच जाता है तथा वह ऊँचे पर्वतपर चढ़कर नीचे पृथिवी की ओर नहीं देखता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंकी गति होती है ।। २२ १/२ ।। रथेन रथिनं पश्य क्लिश्यमानमचेतनम् ।। २३ ।। यावद् रथपथस्तावद् रथेन स तु गच्छति । क्षीणे रथपदे विद्वान् रथमुत्सृज्य गच्छति ।। २४ ।।

देखो, रथके द्वारा जानेवाला भी मूर्ख मनुष्य ऊँचे पर्वतके पास पहुँचकर कष्ट पाता रहता है, किंतु बुद्धिमान् मनुष्य जहाँतक रथ जानेका मार्ग है वहाँतक रथसे जाता है और जब रथका रास्ता समाप्त हो जाता है तब वह उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता है ॥ २३-२४ ॥ एवं गच्छति मेधावी तत्त्वयोगविधानवित् । परिज्ञाय गुणज्ञश्च उत्तरादुत्तरोत्तरम् ॥ २५ ॥ इसी प्रकार तत्त्व और योगविधिको जाननेवाला बुद्धिमान् एवं गुणज्ञ पुरुष अच्छी तरह समझ-बूझकर उत्तरोत्तर आगे बढ़ता जाता है ॥ २५ ॥ यथार्णवं महाघोरमप्लवः सम्प्रगाहते । बाहुभ्यामेव सम्मोहाद् वधं वाञ्छत्यसंशयम् ॥ २६ ॥ जैसे कोई पुरुष मोहवश बिना नावके ही भयंकर समुद्रमें प्रवेश करता है और दोनों भुजाओंसे ही तैरकर उसके पार होनेका भरोसा रखता है तो निश्चय ही वह अपनी मौत बुलाना चाहता है (उसी प्रकार ज्ञान-नौकाका सहारा लिये बिना मनुष्य भवसागरसे पार नहीं हो सकता) ॥ २६ ॥ नावा चापि यथा प्राज्ञो विभागज्ञः स्वरित्रया । अश्रान्तः सलिले गच्छेच्छीघ्रं संतरते हृदम् ॥ २७ ॥ तीर्णो गच्छेत् परं पारं नावमुत्सृज्य निर्ममः । व्याख्यातं पूर्वकल्पेन यथा रथपदातिनोः ॥ २८ ॥ जिस तरह जलमार्गके विभागको जाननेवाला बुद्धिमान् पुरुष सुन्दर डाँडवाली नावके द्वारा अनायास ही जलपर यात्रा करके शीघ्र समुद्रसे तर जाता है एवं पार पहुँच जानेपर नावकी ममता छोड़कर चल देता है; (उसी प्रकार संसार-सागरसे पार हो जानेपर बुद्धिमान् पुरुष पहलेके साधन-सामग्रीकी ममता छोड़ देता है।) यह बात रथपर चलनेवाले और पैदल चलनेवालेके दृष्टान्तसे पहले भी कही जा चुकी है ॥ २७-२८ ॥ स्नेहात् सम्मोहमापन्नो नावि दाशो यथा तथा । ममत्वेनाभिभूतः संस्तत्रैव परिवर्तते ॥ २९ ॥ परंतु स्नेहवश मोहको प्राप्त हुआ मनुष्य ममतासे आबद्ध होकर नावपर सदा बैठे रहनेवाले मल्लाहकी भाँति वहीं चक्कर काटता रहता है ॥ २९ ॥ नावं न शक्यमारुह्य स्थले विपरिवर्तितुम् । तथैव रथमारुह्य नाप्सु चर्या विधीयते ॥ ३० ॥ एवं कर्म कृतं चित्रं विषयस्थं पृथक् पृथक् । यथा कर्म कृतं लोके तथैतानुपपद्यते ॥ ३१ ॥ नौकापर चढ़कर जिस प्रकार स्थलपर विचरण करना सम्भव नहीं है तथा रथपर चढ़कर जलमें विचरण करना सम्भव नहीं बताया गया है, इसी प्रकार किये हुए विचित्र कर्म

अलग-अलग स्थानपर पहुँचानेवाले हैं। संसारमें जिनके द्वारा जैसा कर्म किया गया है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है ।। ३०-३१ ।। यन्नैव गन्धिनो रस्यं न रूपस्पर्शशब्दवत् । मन्यन्ते मुनयो बुद्धया तत् प्रधानं प्रचक्षते ।। ३२ ।। जो गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्दसे युक्त नहीं है तथा मुनिलोग बुद्धिके द्वारा जिसका मनन करते हैं, वह 'प्रधान' कहलाता है ।। ३२ ।। तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान् । महत्प्रधानभूतस्य गुणोऽहंकार एव च ।। ३३ ।। प्रधानका दूसरा नाम अव्यक्त है। अव्यक्तका कार्य महत्तत्त्व है और प्रकृतिसे उत्पन्न महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है ।। ३३ ।। अहंकारात् तु सम्भूतो महाभूतकृतो गुणः । पृथक्त्वेन हि भूतानां विषया वै गुणाः स्मृताः ।। ३४ ।। अहंकारसे पञ्च महाभूतोंको प्रकट करनेवाले गुणकी उत्पत्ति हुई है। पञ्च महाभूतोंके कार्य हैं रूप, रस आदि विषय। वे पृथक्-पृथक् गुणोंके नामसे प्रसिद्ध हैं ।। ३४ ।। बीजधर्म तथाव्यक्तं प्रसवात्मकमेव च । बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति नः श्रुतम् ।। ३५ ।। अव्यक्त प्रकृति कारणरूपा भी है और कार्यरूपा भी। इसी प्रकार महत्तत्त्वके भी कारण और कार्य दोनों ही स्वरूप सुने गये हैं ।। ३५ ।। बीजधर्मस्त्वहंकारः प्रसवश्च पुनः पुनः । बीजप्रसवधर्माणि महाभूतानि पञ्च वै ।। ३६ ।। अहंकार भी कारणरूप तो है ही, कार्यरूपमें भी बारम्बार परिणत होता रहता है। पञ्च महाभूतों (पञ्चतन्मात्राओं)-में भी कारणत्व और कार्यत्व दोनों धर्म हैं। वे शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि वे बीजधर्मी हैं ।। ३६ ।। बीजधर्मिण इत्याहुः प्रसवं च प्रकुर्वते । विशेषाः पञ्चभूतानां तेषां चित्तं विशेषणम् ।। ३७ ।। उन पाँचो भूतोंके विशेष कार्य शब्द आदि विषय हैं। उन विषयोंका प्रवर्तक चित्त है ।। ३७ ।। तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते । त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणाः ।। ३८ ।। पञ्चमहाभूतोंमेंसे आकाशमें एक ही गुण माना गया है। वायुके दो गुण बतलाये जाते हैं। तेज तीन गुणोंसे युक्त कहा गया है। जलके चार गुण हैं ।। ३८ ।। पृथ्वी पञ्चगुणा ज्ञेया चरस्थावरसंकुला । सर्वभूतकरी देवी शुभाशुभनिदर्शिनी ।। ३९ ।।

पृथ्‍वीके पाँच गुण समझने चाहिये। यह देवी स्थावर-जंगम प्राणियोंसे भरी हुई, समस्त जीवोंको जन्म देनेवाली तथा शुभ और अशुभका निर्देश करनेवाली है ।। ३९ ।। शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः । एते पञ्च गुणा भूमेर्विज्ञेया द्विजसत्तमाः ।। ४० ।। विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध—ये ही पृथ्वीके पाँच गुण जानने चाहिये ।। ४० ।। पार्थिवश्च सदा गन्धो गन्धश्च बहुधा स्मृतः । तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान् ।। ४१ ।। इनमें भी गन्ध उसका खास गुण है। गन्ध अनेक प्रकारकी मानी गयी है। मैं उस गन्धके गुणोंका विस्तारके साथ वर्णन करूँगा ।। ४१ ।। इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरोऽम्लः कटुस्तथा । निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च ।। ४२ ।। एवं दशविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्ध इत्युत । इष्ट (सुगन्ध), अनिष्ट (दुर्गन्ध), मधुर, अम्ल, कटु, निहारी (दूरतक फैलनेवाली), मिश्रित, स्निग्ध, रूक्ष और विशद—ये पार्थिव गन्धके दस भेद समझने चाहिये ।। ४२ १/२ ।। शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं द्रवश्चाणां गुणाः स्मृताः ।। ४३ ।। रसज्ञानं तु वक्ष्यामि रसस्तु बहुधा स्मृतः । शब्द, स्पर्श, रूप, रस—ये जलके चार गुण माने गये हैं (इनमें रस ही जलका मुख्य गुण है)। अब मैं रस-विज्ञानका वर्णन करता हूँ। रसके बहुत-से भेद बताये गये हैं ।। ४३ १/२ ।। मधुरोऽम्लः कटुस्तिक्तः कषायो लवणस्तथा ।। ४४ ।। एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः । मीठा, खट्टा, कड़ुआ, तीता, कसैला और नमकीन—इस प्रकार छः भेदोंमें जलमय रसका विस्तार बताया गया है ।। ४४ १/२ ।। शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ।। ४५ ।। ज्योतिषश्च गुणो रूपं रूपं च बहुधा स्मृतम् । शब्द, स्पर्श और रूप—ये तेजके तीन गुण कहे गये हैं। इनमें रूप ही तेजका मुख्य गुण है। रूपके भी कई भेद माने गये हैं ।। ४५ १/२ ।। शुक्लं कृष्णं तथा रक्तं नीलं पीतारुणं तथा ।। ४६ ।। ह्रस्वं दीर्घं कृशं स्थूलं चतुरस्रं तु वृत्तवत् । एवं द्वादशविस्तारं तेजसो रूपमुच्यते ।। ४७ ।। विज्ञेयं ब्राह्मणैर्वृद्धैर्धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः ।

शुक्ल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, छोटा, बड़ा, मोटा, दुबला, चौकोना और गोल —इस प्रकार तैजस् रूपका बारह प्रकारसे विस्तार सत्यवादी धर्मज्ञ वृद्ध ब्राह्मणोंके द्वारा जानने योग्य कहा जाता है ।। ४६-४७ १/२ ।। शब्दस्पर्शौ च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरुच्यते ।। ४८ ।। वायोश्चापि गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः । शब्द और स्पर्श—ये वायुके दो गुण जानने योग्य कहे जाते हैं। इनमें भी स्पर्श ही वायुका प्रधान गुण है। स्पर्श भी कई प्रकारका माना गया है ।। ४८ १/२ ।। रूक्षः शीतस्तथैवोष्णः स्निग्धो विशद एव च ।। ४९ ।। कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो दारुणो मृदुः । एवं द्वादशविस्तारो वायव्यो गुण उच्यते ।। ५० ।। विधिवद् ब्राह्मणैः सिद्धैर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः ।। ५१ ।। रूखा, ठंडा, गरम, स्निग्ध, विशद, कठिन, चिकना, श्लक्ष्ण (हलका), पिच्छिल, कठोर और कोमल—इन बारह प्रकारोंसे वायुके गुण स्पर्शका विस्तार तत्त्वदर्शी धर्मज्ञ सिद्ध ब्राह्मणोंद्वारा विधिवत् बतलाया गया है ।। ४९—५१ ।। तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव च स्मृतः । आकाशका शब्दमात्र एक ही गुण माना गया है। उस शब्दके बहुत-से गुण हैं। उनका विस्तारके साथ वर्णन करता हूँ ।। ५१ १/२ ।। तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान् ।। ५२ ।। षडजर्षभः स गान्धारो मध्यमः पञ्चमस्तथा । अतः परं तु विज्ञेयो निषादो धैवतस्तथा । इष्टश्चानिष्टशब्दश्च संहतः प्रविभागवान् ।। ५३ ।। एवं दशविधो ज्ञेयः शब्द आकाशसम्भवः । षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, निषाद, धैवत, इष्ट (प्रिय), अनिष्ट (अप्रिय) और संहत (श्लिष्ट)—इस प्रकार विभागवाले आकाशजनित शब्दके दस भेद हैं ।। आकाशमुत्तमं भूतमहंकारस्ततः परः ।। ५४ ।। अहंकारात् परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा ततः परः । तस्मात् तु परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।। ५५ ।। आकाश सब भूतोंमें श्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ अहंकार, अहंकारसे श्रेष्ठ बुद्धि, उस बुद्धिसे श्रेष्ठ आत्मा, उससे श्रेष्ठ अव्यक्त प्रकृति और प्रकृतिसे श्रेष्ठ पुरुष है ।। ५४-५५ ।। परापरज्ञो भूतानां विधिज्ञः सर्वकर्मणाम् । सर्वभूतात्मभूतात्मा गच्छत्यात्मानमव्ययम् ।। ५६ ।। जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंकी श्रेष्ठता और न्यूनताका ज्ञाता, समस्त कर्मोंकी विधिका जानकार और सब प्राणियोंको आत्मभावसे देखनेवाला है, वह अविनाशी परमात्माको

प्राप्त होता है ।। ५६ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्यसंवादविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५० ।।

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी

महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार

ब्रह्मोवाच भूतानामथ पञ्चानां यथैषामीश्वरं मनः । नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मन एव च ॥ १ ॥ ब्रह्माजीने कहा— महर्षियो! जिस प्रकार इन पाँचों महाभूतोंकी उत्पत्ति और नियमन करनेमें मन समर्थ है, उसी प्रकार स्थितिकालमें भी मन ही भूतोंका आत्मा है ॥ १ ॥ अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा । बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञश्च स उच्यते ॥ २ ॥ उन पञ्चमहाभूतोंका नित्य आधार भी मन ही है। बुद्धि जिसके ऐश्वर्यको प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है ॥ २ ॥ इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते सदश्वानिव सारथिः । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा ॥ ३ ॥ जैसे सारथि अच्छे घोड़ोंको अपने काबूमें रखता है, उसी प्रकार मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर शासन करता है। इन्द्रिय, मन और बुद्धि—ये सदा क्षेत्रज्ञके साथ संयुक्त रहते हैं ॥ ३ ॥ महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम् । समारुह्य स भूतात्मा समन्तात् परिधावति ॥ ४ ॥ जिसमें इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हुए हैं, जिसका बुद्धिरूपी सारथिके द्वारा नियन्त्रण हो रहा है, उस देहरूपी रथपर सवार होकर वह भूतात्मा (क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ लगाता रहता है ॥ ४ ॥ इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च । बुद्धिसंयमनो नित्यं महान् ब्रह्ममयो रथः ॥ ५ ॥ ब्रह्ममय रथ सदा रहनेवाला और महान् है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथि और बुद्धि चाबुक है ॥ ५ ॥ एवं यो वेत्ति विद्वान् वै सदा ब्रह्ममयं रथम् । स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ॥ ६ ॥ इस प्रकार जो विद्वान् इस ब्रह्ममय रथकी सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियोंमें धीर है और कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ६ ॥ अव्यक्तादि विशेषान्तं सहस्थावरजङ्गमम् ।

सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम् ।। ७ ।। नदीपर्वतजालैश्च सर्वतः परिभूषितम् । विविधाभिस्तथा चाद्भिः सततं समलंकृतम् ।। ८ ।। आजीवं सर्वभूतानां सर्वप्राणभृतां गतिः । एतद् ब्रह्मवनं नित्यं तस्मिंश्चरति क्षेत्रवित् ।। ९ ।। यह जगत् एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन—इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है ।। ७—९ ।। लोकेऽस्मिन् यानि सत्त्वानि त्रसानि स्थावराणि च । तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद् भूतकृता गुणाः । गुणेभ्यः पञ्चभूतानि एष भूतसमुच्चयः ।। १० ।। इस लोकमें जो स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे ही पहले प्रकृतिमें विलीन होते हैं, उसके बाद पाँच भूतोंके कार्य लीन होते हैं और कार्यरूप गुणोंके बाद पाँच भूत लीन होते हैं। इस प्रकार यह भूतसमुदाय प्रकृतिमें लीन होता है ।। १० ।। देवा मनुष्या गन्धर्वाः पिशाचासुरराक्षसाः । सर्वे स्वभावतः सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात् ।। ११ ।। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर, राक्षस सभी स्वभावसे रचे गये हैं; किसी क्रियासे या कारणसे इनकी रचना नहीं हुई है ।। ११ ।। एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुनः पुनः । तेभ्यः प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पञ्चसु । प्रलीयन्ते यथाकालमूर्यः सागरे यथा ।। १२ ।। विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये मरीचि आदि ब्राह्मण समुद्रकी लहरोंके समान बारंबार पञ्चमहाभूतोंसे उत्पन्न होते हैं। और उत्पन्न हुए वे फिर समयानुसार उन्हींमें लीन हो जाते हैं ।। १२ ।। विश्वसृग्भ्यस्तु भूतेभ्यो महाभूतास्तु सर्वशः । भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत् परां गतिम् ।। १३ ।। इस विश्वकी रचना करनेवाले प्राणियोंसे पञ्च महाभूत सब प्रकार पर है। जो इन पञ्च महाभूतोंसे छूट जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।। १३ ।। प्रजापतिरिदं सर्वं मनसैवासृजत् प्रभुः । तथैव देवानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ।। १४ ।।

शक्तिसम्पन्न प्रजापतिने अपने मनके ही द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की है तथा ऋषि भी तपस्यासे ही देवत्वको प्राप्त हुए हैं ॥ १४ ॥ तपसश्चानुपूर्व्येण फलमूलाशनस्तथा । त्रैलोक्यं तपसा सिद्धाः पश्यन्तीह समाहिताः ॥ १५ ॥ फल-मूलका भोजन करनेवाले सिद्ध महात्मा यहाँ तपस्याके प्रभावसे ही चित्तको एकाग्र करके तीनों लोकोंकी बातोंको क्रमशः प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं ॥ १५ ॥ औषधान्यगदादीनि नानाविद्याश्च सर्वशः । तपसैव प्रसिद्ध्यन्ति तपोमूलं हि साधनम् ॥ १६ ॥ आरोग्यकी साधनभूत ओषधियाँ और नाना प्रकारकी विद्याएँ तपसे ही सिद्ध होती हैं। सारे साधनोंकी जड़ तपस्या ही है ॥ १६ ॥ यद्दुरापं दुराम्नायं दुराधर्षं दुरन्वयम् । तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ १७ ॥ जिसको पाना, जिसका अभ्यास करना, जिसे दबाना और जिसकी संगति लगाना नितान्त कठिन है, वह तपस्याके द्वारा साध्य हो जाता है; क्योंकि तपका प्रभाव दुर्लङ्घ्य है ॥ १७ ॥ सुरापो ब्रह्महा स्तेयी भ्रूणहा गुरुतल्पगः । तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात् ततः ॥ १८ ॥ शराबी, ब्रह्महत्यारा, चोर, गर्भ नष्ट करनेवाला और गुरुपत्नीकी शय्यापर सोनेवाला महापापी भी भलीभाँति तपस्या करके ही उस महान् पापसे छुटकारा पा सकता है ॥ १८ ॥ मनुष्याः पितरो देवाः पशवो मृगपक्षिणः । यानि चान्यानि भूतानि त्रसानि स्थावराणि च ॥ १९ ॥ तपःपरायणा नित्यं सिद्ध्यन्ते तपसा सदा । तथैव तपसा देवा महामाया दिवं गताः ॥ २० ॥ मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने चराचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्यामें संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं। तपस्याके बलसे ही महामायावी देवता स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः । अहंकारसमायुक्तास्ते सकाशे प्रजापतेः ॥ २१ ॥ जो लोग आलस्य त्यागकर अहंकारसे युक्त हो सकाम कर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे प्रजापतिके लोकमें जाते हैं ॥ २१ ॥ ध्यानयोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहंकृताः । आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम् ॥ २२ ॥

जो अहंता-ममतासे रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यानयोगके द्वारा महान् उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं ।। २२ ।। ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा । सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः ।। २३ ।। जो ध्यानयोगका आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुष सुखकी राशिभूत अव्यक्त परमात्मामें प्रवेश करते हैं ।। २३ ।। ध्यानयोगमादुपागम्य निर्ममा निरहंकृताः । अव्यक्तं प्रविशन्तीह महतां लोकमुत्तमम् ।। २४ ।। किंतु जो ध्यानयोगसे पीछे लौटकर अर्थात् ध्यानमें असफल होकर ममता और अहंकारसे रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषोंके उत्तम अव्यक्त लोकमें लीन होता है ।। २४ ।। अव्यक्तादेव सम्भूतः समसंज्ञां गतः पुनः । तमोरजोभ्यां निर्मुक्तः सत्त्वमास्थाय केवलम् ।। २५ ।। फिर स्वयं भी उसकी समताको प्राप्त होकर अव्यक्तसे ही प्रकट होता है और केवल सत्त्वका आश्रय लेकर तमोगुण एवं रजोगुणके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ।। २५ ।। निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वं सृजति निष्कलम् । क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद् यस्तं वेद स वेदवित् ।। २६ ।। जो सब पापोंसे मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्माको क्षेत्रज्ञ समझना चाहिये। जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवेत्ता है ।। चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः । यच्चित्तं तन्मयो वश्यं गुह्यमेतत् सनातनम् ।। २७ ।। मुनिको उचित है कि चिन्तनके द्वारा चेतना (सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है—यह सनातन गोपनीय रहस्य है ।। २७ ।। अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम् । निबोधत तथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत ।। २८ ।। अव्यक्तसे लेकर सोलह विशेषोंतक सभी अविद्याके लक्षण बताये गये हैं। ऐसा समझना चाहिये कि यह गुणोंका ही विस्तार है ।। २८ ।। द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ।। २९ ।। दो अक्षरका पद ‘मम’ (यह मेरा है—ऐसा भाव) मृत्युरूप है और तीन अक्षरका पद ‘न मम’ (यह मेरा नहीं है—ऐसा भाव) सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है ।। २९ ।। कर्म केचित् प्रशंसन्ति मन्दबुद्धिरता नराः ।

ये तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते ॥ ३० ॥ कुछ मन्द-बुद्धियुक्त पुरुष (स्वर्गादि फल प्रदान करनेवाले) काम्य-कर्मोंकी प्रशंसा करते हैं, किंतु वृद्ध महात्माजन उन कर्मोंको उत्तम नहीं बतलाते ॥ ३० ॥ कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान् षोडशात्मकः । पुरुषं ग्रसतेऽविद्या तद् ग्राह्यममृताशिनाम् ॥ ३१ ॥ क्योंकि सकाम कर्मके अनुष्ठानसे जीवको सोलह विकारोंसे निर्मित स्थूल शरीर धारण करके जन्म लेना पड़ता है और वह सदा अविद्याका ग्रास बना रहता है। इतना ही नहीं, कर्मठ पुरुष देवताओंके भी उपभोगका विषय होता है ॥ ३१ ॥ तस्मात् कर्मसु निःस्नेहा ये केचित् पारदर्शिनः । विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममयः स्मृतः ॥ ३२ ॥ इसलिये जो कोई पारदर्शी विद्वान् होते हैं, वे कर्मोंमें आसक्त नहीं होते; क्योंकि यह पुरुष (आत्मा) ज्ञानमय है, कर्ममय नहीं ॥ ३२ ॥ य एवममृतं नित्यमग्राह्यं शश्वदक्षरम् । वश्यात्मानमसंश्लिष्टं यो वेद न मृतो भवेत् ॥ ३३ ॥ जो इस प्रकार चेतन आत्माको अमृतस्वरूप, नित्य, इन्द्रियातीत, सनातन, अक्षर, जितात्मा एवं असंग समझता है, वह कभी मृत्युके बन्धनमें नहीं पड़ता ॥ ३३ ॥ अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम् । य एवं विन्देदात्मानमग्राह्यममृताशनम् । अग्राह्योऽमृतो भवति स एभिः कारणैर्ध्रुवः ॥ ३४ ॥ जिसकी दृष्टिमें आत्मा अपूर्व (अनादि), अकृत (अजन्मा), नित्य, अचल, अग्राहा और अमृताशी है, वह इन गुणोंका चिन्तन करनेसे स्वयं भी अग्राह्य (इन्द्रियातीत), निश्चल एवं अमृतस्वरूप हो जाता है ॥ ३४ ॥ आयोज्य सर्वसंस्कारान् संयम्यात्मानमात्मनि । स तद् ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद् भूयो न विद्यते ॥ ३५ ॥ जो चित्तको शुद्ध करनेवाले सम्पूर्ण संस्कारोंका सम्पादन करके मनको आत्माके ध्यानमें लगा देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है ॥ ३५ ॥ प्रसादे चैव सत्त्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात् । लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात् स्वप्नदर्शनम् ॥ ३६ ॥ सम्पूर्ण अन्तःकरणके स्वच्छ हो जानेपर साधकको शुद्ध प्रसन्नता प्राप्त होती है। जैसे स्वप्नसे जगे हुए मनुष्यके लिये स्वप्न शान्त हो जाता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धिका लक्षण है ॥ ३६ ॥ गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः ।

प्रवृत्तयश्च याः सर्वाः पश्यन्ति परिणामजाः ।। ३७ ।। ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त महात्माओंकी यही परम गति है; क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियोंको शुभाशुभ फल देनेवाली समझते हैं ।। ३७ ।। एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः । एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद् वृत्तमनिन्दितम् ।। ३८ ।। यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है ।। ३८ ।। समेन सर्वभूतेषु निःस्पृहेण निराशिषा । शक्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना ।। ३९ ।। जो सम्पूर्ण भूतोंमें समानभाव रखता है, लोभ और कामनासे रहित है तथा जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि रहती है, वह ज्ञानी पुरुष ही इस परम गतिको प्राप्त कर सकता है ।। ३९ ।। एतद् वः सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमाः । एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ ।। ४० ।। ब्रह्मर्षियो! यह सब विषय मैंने विस्तारके साथ तुम लोगोंको बता दिया। इसीके अनुसार आचरण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी ।। ४० ।। गुरुरुवाच इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा । कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन् ।। ४१ ।। गुरुने कहा—बेटा! ब्रह्माजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर उन महात्मा मुनियोंने इसीके अनुसार आचरण किया। इससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई ।। ४१ ।। त्वमप्येतन्महाभाग मयोक्तं ब्रह्मणो वचः । सम्यगाचर शुद्धात्मंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ।। ४२ ।। महाभाग! तुम्हारा चित्त शुद्ध है, इसलिये तुम भी मेरे बताये हुए ब्रह्माजीके उत्तम उपदेशका भलीभाँति पालन करो। इससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त होगी ।। ४२ ।। वासुदेव उवाच इत्युक्तः स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम् । चकार सर्वं कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान् ।। ४३ ।। श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन! गुरुदेवके ऐसा कहनेपर उस शिष्यने समस्त उत्तम धर्मोंका पालन किया। इससे वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया ।। ४३ ।। कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह । तत् पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति ।। ४४ ।।