अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
सप्ततितमोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा राजा परिक्षित्का नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन वैशम्पायन उवाच ब्रह्मास्त्रं तु यदा राजन् कृष्णेन प्रतिसंहृतम् । तदा तद् वेश्म त्वत्पित्रा तेजसाभिविदीपितम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णने जब ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया, उस समय वह सूतिकागृह तुम्हारे पिताके तेजसे देदीप्यमान होने लगा ॥ १ ॥ ततो रक्षांसि सर्वाणि नेशुस्त्यक्त्वा गृहं तु तत् । अन्तरिक्षे च वागासीत् साधु केशव साध्विति ॥ २ ॥ फिर तो बालकोंका विनाश करनेवाले समस्त राक्षस उस घरको छोड़कर भाग गये। इसी समय आकाशवाणी हुई—'केशव! तुम्हें साधुवाद! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया' ॥ २ ॥ तदस्त्रं ज्वलितं चापि पितामहमगात् तदा । ततः प्राणान् पुनर्लेभे पिता तव नरेश्वर ॥ ३ ॥ साथ ही वह प्रज्वलित ब्रह्मास्त्र ब्रह्मलोकको चला गया। नरेश्वर! इस तरह तुम्हारे पिताको पुनर्जीवन प्राप्त हुआ ॥ ३ ॥ व्यचेष्टत च बालोऽसौ यथोत्साहं यथाबलम् । बभूवुर्मुदिता राजंस्ततस्ता भरतस्त्रियः ॥ ४ ॥ राजन्! उत्तराका वह बालक अपने उत्साह और बलके अनुसार हाथ-पैर हिलाने लगा, यह देख भरतवंशकी उन सभी स्त्रियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥ ब्राह्मणान् वाचयामासुर्गोविन्दस्यैव शासनात् । ततस्ता मुदिताः सर्वाः प्रशंसुर्जनार्दनम् ॥ ५ ॥ उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराया। फिर वे सब आनन्दमग्न होकर श्रीकृष्णके गुण गाने लगीं ॥ ५ ॥ स्त्रियो भरतसिंहानां नावं लब्ध्वेव पारगाः । कुन्ती द्रुपदपुत्री च सुभद्रा चोत्तरा तथा ॥ ६ ॥ स्त्रियश्चान्या नृसिंहानां बभूवुर्हृष्टमानसाः ।
जैसे नदीके पार जानेवाले मनुष्योंको नाव पाकर बड़ी खुशी होती है, उसी प्रकार भरतवंशी वीरोंकी वे स्त्रियाँ—कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा एवं नरवीरोंकी स्त्रियाँ उस बालकके जीवित होनेसे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं ।। ६१ १/२ ।। तत्र मल्ला नटाश्चैव ग्रन्थिकाः सौख्यशायिकाः ।। ७ ।। सूतमागधसंघाश्चाप्यस्तुवंस्तं जनार्दनम् । कुरुवंशस्तवख्याभिराशीर्भिर्भरतर्षभ ।। ८ ।। भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मल्ल, नट, ज्योतिषी, सुखका समाचार पूछनेवाले सेवक तथा सूतों और मागधोंके समुदाय कुरुवंशकी स्तुति और आशीर्वादके साथ भगवान् श्रीकृष्णका गुणगान करने लगे ।। ७-८ ।। उत्थाय तु यथाकालमुत्तरा यदुनन्दनम् । अभ्यवादयत प्रीता सह पुत्रेण भारत ।। ९ ।। भरतनन्दन! फिर प्रसन्न हुई उत्तरा यथासमय उठकर पुत्रको गोदमें लिये हुए यदुनन्दन श्रीकृष्णके समीप आयी और उन्हें प्रणाम किया ।। ९ ।। तस्य कृष्णो ददौ हृष्टो बहुरत्नं विशेषतः । तथान्ये वृष्णिशार्दूला नाम चास्याकरोत् प्रभुः ।। १० ।। पितुस्तव महाराज सत्यसंधो जनार्दनः । भगवान् श्रीकृष्णने भी प्रसन्न होकर उस बालकको बहुत-से रत्न उपहारमें दिये। फिर अन्य यदुवंशियोंने भी नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट कीं। महाराज! इसके बाद सत्यप्रतिज्ञ भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हारे पिताका इस प्रकार नामकरण किया ।। १० १/२ ।। परिक्षीणे कुले यस्माज्जातोऽयमभिमन्युजः ।। ११ ।। परिक्षिदिति नामास्य भवत्वित्यब्रवीत् तदा । 'कुरुकुलके परिक्षीण हो जानेपर यह अभिमन्युका बालक उत्पन्न हुआ है। इसलिये इसका नाम परिक्षित् होना चाहिये।' ऐसा भगवान्ने कहा ।। ११ १/२ ।। सोऽवर्धत यथाकालं पिता तव जनाधिप ।। १२ ।। मनःप्रह्लादनश्चासीत् सर्वलोकस्य भारत । नरेश्वर! इस प्रकार नामकरण हो जानेके बाद तुम्हारे पिता परिक्षित् कालक्रमसे बड़े होने लगे। भारत! वे सब लोगोंके मनको आनन्दमग्न किये रहते थे ।। १२ १/२ ।। मासजातस्तु ते वीर पिता भवति भारत ।। १३ ।। अथाजग्मुः सुबहुलं रत्नमादाय पाण्डवाः । वीर भरतनन्दन! जब तुम्हारे पिताकी अवस्था एक महीनेकी हो गयी, उस समय पाण्डवलोग बहुत-सी रत्नराशि लेकर हस्तिनापुरको लौटे ।। १३ १/२ ।। तान् समीपगतान् श्रुत्वा निर्ययुर्वृष्णिपुङ्गवाः ।। १४ ।।
वृष्णिवंशके प्रमुख वीरोंने जब सुना कि पाण्डव लोग नगरके समीप आ गये हैं, तब वे उनकी अगवानीके लिये बाहर निकले ।। १४ ।। अलंचक्रुश्च माल्यौघैः पुरुषा नागसाह्वयम् । पताकाभिर्विचित्राभिर्ध्वजैश्च विविधैरपि ।। १५ ।। पुरवासी मनुष्योंने फूलोंकी मालाओं, वन्दनवारों, भाँति-भाँतिकी ध्वजाओं तथा विचित्र-विचित्र पताकाओंसे हस्तिनापुरको सजाया था ।। १५ ।। वेश्मानि समलंचक्रुः पौराश्चापि जनेश्वर । देवतायतनानां च पूजाः सुविविधास्तथा ।। १६ ।। संदिदेशाथ विदुरः पाण्डुपुत्रप्रियेप्सया । राजमार्गाश्च तत्रासन् सुमनोभिरलंकृताः ।। १७ ।। नरेश्वर! नागरिकोंने अपने-अपने घरोंकी भी सजावट की थी। विदुरजीने पाण्डवोंका प्रिय करनेकी इच्छासे देवमन्दिरोंमें विविध प्रकारसे पूजा करनेकी आज्ञा दी। हस्तिनापुरके सभी राजमार्ग फूलोंसे अलंकृत किये गये थे ।। १६-१७ ।। शुशुभे तत्पुरं चापि समुद्रौघनिभस्वनम् । नर्तकैश्चापि नृत्यद्भिर्गायकानां च निःस्वनैः ।। १८ ।। नाचते हुए नर्तकों और गानेवाले गायकोंके शब्दोंसे उस नगरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ समुद्रकी जलराशिकी गर्जनाके समान कोलाहल हो रहा था ।। १८ ।। आसीद् वैश्रवणस्येव निवासस्तत्पुरं तदा । वन्दिभिश्च नरै राजन् स्त्रीसहायैश्च सर्वशः ।। १९ ।। तत्र तत्र विविक्तेषु समन्तादुपशोभितम् । पताका धूयमानाश्च समन्तान्मातरिश्वना ।। २० ।। अदर्शयन्निव तदा कुरून् वै दक्षिणोत्तरान् । राजन्! उस समय वह नगर कुबेरकी अलकापुरीके समान प्रतीत होता था। वहाँ सब ओर एकान्त स्थानोंमें स्त्रियोंसहित बंदीजन खड़े थे, जिनसे उस पुरीकी शोभा बढ़ गयी थी। उस समय हवाके झोंकेसे नगरमें सब ओर पताकाएँ फहरा रही थीं, जो दक्षिण और उत्तर कुरु नामक देशोंकी शोभा दिखाती थीं ।। १९-२०३/२ ।। अघोषयंस्तदा चापि पुरुषा राजधूर्गताः । सर्वराष्ट्रविहारोऽद्य रत्नाभरणलक्षणः ।। २१ ।। राज-काज सँभालनेवाले पुरुषोंने सब ओर यह घोषणा करा दी कि आज समूचे राष्ट्रमें उत्सव मनाया जाय और सब लोग रत्नोंके आभूषण या उत्तमोत्तम गहने-कपड़े पहनकर इस उत्सवमें सम्मिलित हों ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि पाण्डवागमने सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें पाण्डवोंका आगमनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच तान् समीपगतान् श्रुत्वा पाण्डवान् शत्रुकर्शनः । वासुदेवः सहामात्यः प्रययौ ससुहृद्गणः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंके समीप आनेका समाचार सुनकर शत्रुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण अपने मित्रों और मन्त्रियोंके साथ उनसे मिलनेके लिये चले ॥ १ ॥ ते समेत्य यथान्यायं प्रत्युद्याता दिदृक्षया । ते समेत्य यथाधर्मं पाण्डवा वृष्णिभिः सह ॥ २ ॥ विविशुः सहिता राजन् पुरं वारणसाह्वयम् । उन सब लोगोंने पाण्डवोंसे मिलनेके लिये आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और सब यथायोग्य एक-दूसरेसे मिले। राजन्! धर्मानुसार पाण्डव वृष्णियोंसे मिलकर सब एक साथ हो हस्तिनापुरमें प्रविष्ट हुए ॥ २ १/२ ॥ महतस्तस्य सैन्यस्य खुरनेमिस्वनेन ह ॥ ३ ॥ द्यावापृथिव्योः खं चैव सर्वमासीत् समावृतम् । उस विशाल सेनाके घोड़ोंकी टापों और रथके पहियोंकी घरघराहटके तुमुल घोषसे पृथ्वी और स्वर्गके बीचका सारा आकाश व्याप्त हो गया था ॥ ३ १/२ ॥ ते कोशानग्रतः कृत्वा विविशुः स्वपुरं तदा ॥ ४ ॥ पाण्डवाः प्रीतमनसः सामात्याः ससुहृद्गणाः । वे खजानेको आगे करके अपनी राजधानीमें घुसे। उस समय मन्त्रियों एवं सुहृदोंसहित समस्त पाण्डवोंका मन प्रसन्न था ॥ ४ १/२ ॥ ते समेत्य यथान्यायं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ५ ॥ कीर्तयन्तः स्वनामानि तस्य पादौ ववन्दिरे । वे यथायोग्य सबसे मिलकर राजा धृतराष्ट्रके पास गये। अपना-अपना नाम बताते हुए उनके चरणोंमें प्रणाम करने लगे ॥ ५ १/२ ॥ धृतराष्ट्रादनु च ते गान्धारीं सुबलात्मजाम् ॥ ६ ॥
कुन्तीं च राजशार्दूल तदा भरतसत्तम । नृपश्रेष्ठ! भरतभूषण! धृतराष्ट्रसे मिलनेके बाद वे सुबलपुत्री गान्धारी और कुन्तीसे मिले ॥ ६ १/२ ॥ विदुरं पूजयित्वा च वैश्यापुत्रं समेत्य च ॥ ७ ॥ पूज्यमानाः स्म ते वीरा व्यरोचन्त विशाम्पते । प्रजानाथ! फिर विदुरका सम्मान करके वैश्यापुत्र युयुत्सुसे मिलकर उन सबके द्वारा सम्मानित होते हुए वीर पाण्डव बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७ १/२ ॥ ततस्तत् परमाश्चर्यं विचित्रं महदद्भुतम् ॥ ८ ॥ शुश्रुवुस्ते तदा वीराः पितुस्ते जन्म भारत । भरतनन्दन! तत्पश्चात् उन वीरोंने तुम्हारे पिताके जन्मका वह आश्चर्यपूर्ण विचित्र, महान् एवं अद्भुत वृत्तान्त सुना ॥ ८ १/२ ॥ तदुपश्रुत्य तत् कर्म वासुदेवस्य धीमतः ॥ ९ ॥ पूजार्हं पूजयामासुः कृष्णं देवकिनन्दनम् । परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णका वह अलौकिक कर्म सुनकर पाण्डवोंने उन पूजनीय देवकीनन्दन श्रीकृष्णका पूजन किया अर्थात् उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ९ १/२ ॥ ततः कतिपयाहस्य व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १० ॥ आजगाम महातेजा नगरं नागसाह्वयम् । तस्य सर्वे यथान्यायं पूजांचक्रुः कुरूद्वहाः ॥ ११ ॥ इसके थोड़े दिनों बाद महातेजस्वी सत्यवतीनन्दन व्यासजी हस्तिनापुरमें पधारे। कुरुकुलतिलक समस्त पाण्डवोंने उनका यथोचित पूजन किया ॥ १०-११ ॥ सह वृष्ण्यन्धकव्याघ्रैरुपासांचक्रिरे तदा । तत्र नानाविधाकाराः कथाः समभिकीर्त्य वै ॥ १२ ॥ युधिष्ठिरो धर्मसुतो व्यासं वचनमब्रवीत् । फिर वृष्णि एवं अन्धकवंशी वीरोंके साथ वे उनकी सेवामें बैठ गये। वहाँ नाना प्रकारकी बातें करके धर्मपुत्र युधिष्ठिरने व्यासजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १२ १/२ ॥ भवत्प्रसादाद् भगवन् यदिदं रत्नमाहृतम् ॥ १३ ॥ उपयोक्तुं तदिच्छामि वाजिमेधे महाक्रतौ । 'भगवन्! आपकी कृपासे जो वह रत्न लाया गया है, उसका अश्वमेध नामक महायज्ञमें मैं उपयोग करना चाहता हूँ ॥ १३ १/२ ॥ तमनुज्ञातुमिच्छामि भवता मुनिसत्तम । त्वदधीना वयं सर्वे कृष्णस्य च महात्मनः ॥ १४ ॥
'मुनिश्रेष्ठ! मैं चाहता हूँ कि इसके लिये आपकी आज्ञा प्राप्त हो जाय, क्योंकि हम सब लोग आप और महात्मा श्रीकृष्णके अधीन हैं' ।। १४ ।। व्यास उवाच अनुजानामि राजंस्त्वां क्रियतां यदनन्तरम् । यजस्व वाजिमेधेन विधिवत् दक्षिणावता ।। १५ ।। व्यासजीने कहा—राजन्! मैं तुम्हें यज्ञके लिये आज्ञा देता हूँ। अब इसके बाद जो भी आवश्यक कार्य हो, उसे आरम्भ करो। विधिपूर्वक दक्षिणा देते हुए अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करो ।। १५ ।। अश्वमेधो हि राजेन्द्र पावनः सर्वपाप्मनाम् । तेनेष्ट्वा त्वं विपाप्मा वै भविता नात्र संशयः ।। १६ ।। राजेन्द्र! अश्वमेधयज्ञ समस्त पापोंका नाश करके यजमानको पवित्र बनानेवाला है। उसका अनुष्ठान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है ।। १६ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः स तु धर्मात्मा कुरुराजो युधिष्ठिरः । अश्वमेधस्य कौरव्य चकाराहरणे मतिम् ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन! व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा कुरुराज युधिष्ठिरने अश्वमेधयज्ञ आरम्भ करनेका विचार किया ।। १७ ।। समनुज्ञाप्य तत् सर्वं कृष्णद्वैपायनं नृपः । वासुदेवमथाभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ।। १८ ।। श्रीकृष्णद्वैपायन व्याससे सब बातोंके लिये आज्ञा ले प्रवचनकुशल राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर इस प्रकार बोले— ।। १८ ।। देवकी सुप्रजा देवी त्वया पुरुषसत्तम । यद् ब्रूयां त्वां महाबाहो तत् कृथास्त्वमिहाच्युत ।। १९ ।। 'पुरुषोत्तम! महाबाहु अच्युत! आपको ही पाकर देवकीदेवी उत्तम संतानवाली मानी गयी हैं। मैं आपसे जो कुछ कहूँ, उसे आप यहाँ सम्पन्न करें ।। १९ ।। त्वत्प्रभावाजितान् भोगानश्रीम यदुनन्दन । पराक्रमेण बुद्ध्या च त्वयेयं निर्जिता मही ।। २० ।। 'यदुनन्दन! हम आपके ही प्रभावसे प्राप्त हुई इस पृथ्वीका उपभोग कर रहे हैं। आपने ही अपने पराक्रम और बुद्धिबलसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीको जीता है ।। २० ।। दीक्षयस्व त्वमात्मानं त्वं हि नः परमो गुरुः । त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम् ।। २१ ।।
'दशार्हनन्दन! आप ही इस यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करें; क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। आपके यज्ञानुष्ठान पूर्ण कर लेनेपर निश्चय ही हमारे सब पाप नष्ट हो जायेंगे ।। २१ ।। त्वं हि यज्ञोऽक्षरः सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापतिः । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ।। २२ ।। 'आप ही यज्ञ, अक्षर, सर्वस्वरूप, धर्म, प्रजापति एवं सम्पूर्ण भूतोंकी गति हैं—यह मेरी निश्चित धारणा है' ।। २२ ।। वासुदेव उवाच त्वमेवैतन्महाबाहो वक्तुमर्हस्यरिंदम । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ।। २३ ।। भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाबाहो! शत्रुदमन नरेश! आप ही ऐसी बात कह सकते हैं। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके अवलम्ब हैं ।। २३ ।। त्वं चाद्य कुरुवीराणां धर्मेण हि विराजसे । गुणीभूताः स्म ते राजंस्त्वं नो राजा गुरुर्मतः ।। २४ ।। राजन्! समस्त कौरववीरोंमें एकमात्र आप ही धर्मसे सुशोभित होते हैं। हमलोग आपके अनुयायी हैं और आपको अपना राजा एवं गुरु मानते हैं ।। २४ ।। यजस्व मदनुज्ञातः प्राप्य एष क्रतुस्त्वया । युनक्तु नो भवान् कार्ये यत्र वाञ्छसि भारत ।। २५ ।। इसलिये भारत! आप हमारी अनुमतिसे स्वयं ही इस यज्ञका अनुष्ठान कीजिये तथा हमलोगोंमेंसे जिसको जिस कामपर लगाना चाहते हों, उसे उस कामपर लगनेकी आज्ञा दीजिये ।। २५ ।। सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वं कर्तास्मि तेऽनघ । भीमसेनार्जुनौ चैव तथा माद्रवतीसुतौ । इष्टवन्तो भविष्यन्ति त्वयीष्टवति पार्थिवे ।। २६ ।। निष्पाप नरेश! मैं आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप जो कुछ कहेंगे, वह सब करूँगा। आप राजा हैं, आपके द्वारा यज्ञ होनेपर भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवको भी यज्ञानुष्ठानका फल मिल जायगा ।। २६ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णव्यासानुज्ञायामेकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्ण और व्यासकी युधिष्ठिरको यज्ञ करनेके लिये आज्ञाविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।
द्विसप्ततितमोऽध्यायः व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । व्यासमामन्त्र्य मेधावी ततो वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥ यदा कालं भवान् वेत्ति हयमेधस्य तत्त्वतः । दीक्षयस्व तदा मां त्वं त्वय्यायत्तो हि मे क्रतुः ॥ २ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर मेधावी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने व्यासजीको सम्बोधित करके कहा—'भगवन्! जब आपको अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करनेका ठीक समय जान पड़े तभी आकर मुझे उसकी दीक्षा दें; क्योंकि मेरा यज्ञ आपके ही अधीन है' ॥ १-२ ॥ व्यास उवाच अहं पैलोऽथ कौन्तेय याज्ञवल्क्यस्तथैव च । विधानं यद् यथाकालं तत् कर्तारो न संशयः ॥ ३ ॥ व्यासजीने कहा—कुन्तीनन्दन! जब यज्ञका समय आयेगा, उस समय मैं, पैल और याज्ञवल्क्य—ये सब आकर तुम्हारे यज्ञका सारा विधि-विधान सम्पन्न करेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥ चैत्र्यां हि पौर्णमास्यां तु तव दीक्षा भविष्यति । सम्भाराः सम्भ्रियन्तां च यज्ञार्थं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥ पुरुषप्रवर! आगामी चैत्रकी पूर्णिमाको तुम्हें यज्ञकी दीक्षा दी जायगी, तबतक तुम उसके लिये सामग्री संचित करो ॥ ४ ॥ अश्वविद्याविदश्चैव सूता विप्राश्च तद्विदः । मेध्यमश्वं परीक्षन्तां तव यज्ञार्थसिद्धये ॥ ५ ॥ अश्वविद्याके ज्ञाता सूत और ब्राह्मण यज्ञार्थकी सिद्धिके लिये पवित्र अश्वकी परीक्षा करें ॥ ५ ॥ तमुत्सृज यथाशास्त्रं पृथिवीं सागराम्बराम् । स पर्यैतु यशो दीप्तं तव पार्थिव दर्शयन् ॥ ६ ॥
पृथ्वीनाथ! जो अश्व चुना जाय, उसे शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ो और वह तुम्हारे दीप्तिमान् यशका विस्तार करता हुआ समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वीपर भ्रमण करे॥ ६॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पाण्डवः पृथिवीपतिः। चकार सर्वं राजेन्द्र यथोक्तं ब्रह्मवादिना॥ ७॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र! यह सुनकर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने 'बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्मवादी व्यासजीके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया॥ ७॥ सम्भाराश्चैव राजेन्द्र सर्वे संकल्पिताऽभवन्। स सम्भारान् समाहृत्य नृपो धर्मसुतस्तदा॥ ८॥ न्यवेदयदमेयात्मा कृष्णद्वैपायनाय वै। राजेन्द्र! उन्होंने मनमें जिन-जिन सामानोंको एकत्र करनेका संकल्प किया था, उन सबको जुटाकर धर्मपुत्र अमेयात्मा राजा युधिष्ठिरने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीको सूचना दी॥ ८ १/२ ॥ ततोऽब्रवीन्महातेजा व्यासो धर्मात्मजं नृपम्॥ ९॥ यथाकालं यथायोगं सज्जाः स्म तव दीक्षणे। तब महातेजस्वी व्यासने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! हमलोग यथासमय उत्तम योग आनेपर तुम्हें दीक्षा देनेको तैयार हैं॥ ९ १/२ ॥ स्फ्यश्च कूर्चश्च सौवर्णो यच्चान्यदपि कौरव॥ १०॥ तत्र योग्यं भवेत् किंचिद् रौक्मं तत् क्रियतामिति। 'कुरुनन्दन! इस बीचमें तुम सोनेके 'स्फ्य' और 'कूर्च' बनवा लो तथा और भी जो सुवर्णमय सामान आवश्यक हों, उन्हें तैयार करा डालो॥ १० १/२ ॥ अश्वश्चोत्सृज्यतामद्य पृथ्व्यामथ यथाक्रमम्। सुगुप्तं चरतां चापि यथाशास्त्रं यथाविधि॥ ११॥ 'आज शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको क्रमशः सारी पृथ्वीपर घूमनेके लिये छोड़ना चाहिये तथा ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे वह सुरक्षितरूपसे सब ओर विचर सके'॥ ११॥ युधिष्ठिर उवाच अयमश्वो यथा ब्रह्मन्नुत्सृष्टः पृथिवीमिमाम्। चरिष्यति यथाकामं तत्र वै संविधीयताम्॥ १२॥ पृथिवीं पर्यटन्तं हि तुरगं कामचारिणम्। कः पालयेदिति मुने तद् भवान् वक्तुमर्हति॥ १३॥
युधिष्ठिरने कहा—ब्रह्मन्! यह घोड़ा उपस्थित है। इसे किस प्रकार छोड़ा जाय, जिससे यह समूची पृथ्वीपर इच्छानुसार घूम आवे। इसकी व्यवस्था आप ही कीजिये तथा मुने! यह भी बताइये कि भूमण्डलमें इच्छानुसार घूमनेवाले इस घोड़ेकी रक्षा कौन करे? ।। १२-१३ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः स तु राजेन्द्र कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । भीमसेनादवरजः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ।। १४ ।। जिष्णुः सहिष्णुर्धृष्णुश्च स एनं पालयिष्यति । शक्तः स हि महीं जेतुं निवातकवचान्तकः ।। १५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र! युधिष्ठिरके इस तरह पूछनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने कहा—'राजन्! अर्जुन सब धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे विजयमें उत्साह रखनेवाले, सहनशील और धैर्यवान् हैं; अतः वे ही इस घोड़ेकी रक्षा करेंगे। उन्होंने निवातकवचोंका नाश किया था। वे सम्पूर्ण भूमण्डलको जीतनेकी शक्ति रखते हैं ।। १४-१५ ।। तस्मिन् ह्यस्त्राणि दिव्यानि दिव्यं संहननं तथा । दिव्यं धनुश्चेषुधी च स एनमनुयास्यति ।। १६ ।। 'उनके पास दिव्य अस्त्र, दिव्य कवच, दिव्य धनुष और दिव्य तरकस हैं; अतः वे ही इस घोड़ेके पीछे-पीछे जायँगे ।। १६ ।। स हि धर्मार्थकुशलः सर्वविद्याविशारदः । यथाशास्त्रं नृपश्रेष्ठ चारयिष्यति ते हयम् ।। १७ ।। 'नृपश्रेष्ठ! वे धर्म और अर्थमें कुशल तथा सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण हैं, इसलिये आपके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका शास्त्रीय विधिके अनुसार संचालन करेंगे ।। १७ ।। राजपुत्रो महाबाहुः श्यामो राजीवलोचनः । अभिमन्योः पिता वीरः स एनं पालयिष्यति ।। १८ ।। 'जिनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं, श्याम वर्ण है, कमल-जैसे नेत्र हैं, वे अभिमन्युके वीर पिता राजपुत्र अर्जुन इस घोड़ेकी रक्षा करेंगे ।। १८ ।। भीमसेनोऽपि तेजस्वी कौन्तेयोऽमितविक्रमः । समर्थो रक्षितुं राष्ट्रं नकुलश्च विशाम्पते ।। १९ ।। 'प्रजानाथ! कुन्तीकुमार भीमसेन भी अत्यन्त तेजस्वी और अमितपराक्रमी हैं। नकुलमें भी वे ही गुण हैं। ये दोनों ही राज्यकी रक्षा करनेमें पूर्ण समर्थ हैं (अतः वे ही राज्यके कार्य देखें) ।। १९ ।। सहदेवस्तु कौरव्य समाधास्यति बुद्धिमान् । कुटुम्बतन्त्रं विधिवत् सर्वमेव महायशाः ।। २० ।।
‘कुरुनन्दन! महायशस्वी बुद्धिमान् सहदेव कुटुम्ब-पालनसम्बन्धी समस्त कार्योंकी देखभाल करेंगे’ ॥ २० ॥ तत् तु सर्वं यथान्यायमुक्तः कुरुकुलोद्वहः । चकार फाल्गुनं चापि संदिदेश हयं प्रति ॥ २१ ॥ व्यासजीके इस प्रकार बतलानेपर कुरुकुलतिलक युधिष्ठिरने सारा कार्य उसी प्रकार यथोचित रीतिसे सम्पन्न किया और अर्जुनको बुलाकर घोड़ेकी रक्षाके लिये इस प्रकार आदेश दिया ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर उवाच एह्यर्जुन त्वया वीर हयोऽयं परिपाल्यताम् । त्वमर्हो रक्षितुं ह्येनं नान्यः कश्चन मानवः ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर बोले—वीर अर्जुन! यहाँ आओ, तुम इस घोड़ेकी रक्षा करो; क्योंकि तुम्हीं इसकी रक्षा करनेके योग्य हो। दूसरा कोई मनुष्य इसके योग्य नहीं है ॥ २२ ॥ ये चापि त्वां महाबाहो प्रत्युद्यान्ति नराधिपाः । तैर्विग्रहो यथा न स्यात् तथा कार्यं त्वयानघ ॥ २३ ॥ महाबाहो! निष्पाप अर्जुन! अश्वकी रक्षाके समय जो राजा तुम्हारे सामने आवें, उनके साथ भरसक युद्ध न करना पड़े, ऐसी चेष्टा तुम्हें करनी चाहिये ॥ २३ ॥ आख्यातव्यश्च भवता यज्ञोऽयं मम सर्वशः । पार्थिवेभ्यो महाबाहो समये गम्यतामिति ॥ २४ ॥ महाबाहो! मेरे इस यज्ञका समाचार तुम्हें समस्त राजाओंको बताना चाहिये और उनसे यह कहना चाहिये कि आपलोग यथासमय यज्ञमें पधारें ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा स धर्मात्मा भ्रातरं सव्यसाचिनम् । भीमं च नकुलं चैव पुरगुप्तौ समादधत् ॥ २५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! अपने भाई सव्यसाची अर्जुनसे ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने भीमसेन और नकुलको नगरकी रक्षाका भार सौंप दिया ॥ २५ ॥ कुटुम्बतन्त्रे च तदा सहदेवं युधां पतिम् । अनुमान्य महीपालं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ॥ २६ ॥ फिर महाराज धृतराष्ट्रकी सम्मति लेकर युधिष्ठिरने योद्धाओंके स्वामी सहदेवको कुटुम्ब-पालन-सम्बन्धी कार्यमें नियुक्त कर दिया ॥ २६ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि यज्ञसामग्रीसम्पादने द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसामग्रीका सम्पादनविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७२ ।।
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण
वैशम्पायन उवाच दीक्षाकाले तु सम्प्राप्ते ततस्ते सुमहर्त्विजः। विधिवद् दीक्षयामासुरश्वमेधाय पार्थिवम्॥ १॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब दीक्षाका समय आया, तब उन व्यास आदि महान् ऋत्विजोंने राजा युधिष्ठिरको विधिपूर्वक अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा दी॥ १॥ कृत्वा स पशुबन्धांश्च दीक्षितः पाण्डुनन्दनः। धर्मराजो महातेजाः सहर्त्विग्भिर्व्यरोचत॥ २॥ पशुबन्ध-कर्म करके यज्ञकी दीक्षा लिये हुए महातेजस्वी पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर ऋत्विजोंके साथ बड़ी शोभा पाने लगे॥ २॥
अश्वमेधयज्ञके लिये छोड़े हुए घोड़ेका अर्जुनके द्वारा अनुगमन
हयश्च हयमेधार्थं स्वयं स ब्रह्मवादिना । उत्सृष्टः शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा ॥ ३ ॥ अमिततेजस्वी ब्रह्मवादी व्यासजीने अश्वमेधयज्ञके लिये चुने गये अश्वको स्वयं ही शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ा ॥ ३ ॥ स राजा धर्मराड् राजन् दीक्षितो विबभौ तदा । हेममाली रुक्मकण्ठः प्रदीप्त इव पावकः ॥ ४ ॥ राजन्! यज्ञमें दीक्षित हुए धर्मराज राजा युधिष्ठिर सोनेकी माला और कण्ठमें सोनेकी कण्ठी धारण किये प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४ ॥ कृष्णाजिनी दण्डपाणिः क्षौमवासाः स धर्मजः । विबभौ द्युतिमान् भूयः प्रजापतिरिवाध्वरे ॥ ५ ॥ काला मृगचर्म, हाथमें दण्ड और रेशमी वस्त्र धारण किये धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अधिक कान्तिमान् हो यज्ञमण्डपमें प्रजापतिकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ५ ॥ तथैवास्यर्त्विजः सर्वे तुल्यवेषा विशाम्पते । बभूवुरर्जुनश्चापि प्रदीप्त इव पावकः ॥ ६ ॥ प्रजानाथ! उनके समस्त ऋत्विज् भी उन्हींके समान वेश-भूषा धारण किये सुशोभित होते थे। अर्जुन भी प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान् हो रहे थे ॥ ६ ॥ श्वेताश्वः कृष्णसारं तं ससाराश्वं धनंजयः । विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ ७ ॥ भूपाल जनमेजय! श्वेत घोड़ेवाले अर्जुनने धर्मराजकी आज्ञासे उस यज्ञसम्बन्धी अश्वका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ७ ॥ विक्षिपन् गाण्डिवं राजन् बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार च ॥ ८ ॥ पृथिवीपाल! राजन्! अर्जुनने अपने हाथोंमें गोधाके चमड़ेके बने दस्ताने पहन रखे थे। वे गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ अश्वके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ ८ ॥ आकुमारं तदा राजन्नागमत् तत्पुरं विभो । द्रष्टुकामं कुरुश्रेष्ठं प्रयास्यन्तं धनंजयम् ॥ ९ ॥ जनमेजय! प्रभो! उस समय यात्रा करते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको देखनेके लिये बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा हस्तिनापुर वहाँ उमड़ आया था ॥ ९ ॥ तेषामन्योन्यसम्मर्दादूष्मेव समजायत । दिदृक्षूणां हयं तं च तं चैव हयसारिणम् ॥ १० ॥ यज्ञके घोड़े और उसके पीछे जानेवाले अर्जुनको देखनेकी इच्छासे लोगोंकी इतनी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी कि आपसकी धक्का-मुक्कीसे सबके बदनमें पसीने निकल
आये ॥ १० ॥ ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रति पूरयन् । बभूव प्रेक्षतां नृणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ ११ ॥ महाराज! उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयका दर्शन करनेवाले लोगोंके मुखसे जो शब्द निकलता था, वह सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें गूँज रहा था ॥ ११ ॥ एष गच्छति कौन्तेय तुरगश्चैव दीप्तिमान् । यमन्वेति महाबाहुः संस्पृशन् धनुरुत्तमम् ॥ १२ ॥ (लोग कहते थे—) 'ये कुन्तीकुमार अर्जुन जा रहे हैं और वह दीप्तिमान् अश्व जा रहा है, जिसके पीछे महाबाहु अर्जुन उत्तम धनुष धारण किये जा रहे हैं' ॥ १२ ॥ एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः । स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ॥ १३ ॥ उदारबुद्धि अर्जुनने परस्पर वार्तालाप करते हुए लोगोंकी बातें इस प्रकार सुनीं —'भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सुखसे जाओ और पुनः कुशलपूर्वक लौट आओ' ॥ १३ ॥ अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन् । नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत् प्रदृश्यते ॥ १४ ॥ एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः । स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम् ॥ १५ ॥ निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम् । नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे—'इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु उनका यह धनुष दिखायी देता है। यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव धनुष है। अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो। उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो। ये निर्भय मार्गपर आगे बढ़ते रहें। ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन करेंगे' ॥ १४-१५ १/२ ॥ एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ शुश्राव मधुरा वाचः पुनः पुनरुदारधीः । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उदारबुद्धि अर्जुन स्त्रियों और पुरुषोंकी कही हुई मीठी-मीठी बातें बारंबार सुनते थे ॥ १६ १/२ ॥ याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि ॥ १७ ॥ प्रायात् पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः । याज्ञवल्क्य मुनिके एक विद्वान् शिष्य, जो यज्ञकर्ममें कुशल तथा वेदोंमें पारंगत थे, विघ्नकी शान्तिके लिये अर्जुनके साथ गये ॥ १७ १/२ ॥ ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः ॥ १८ ॥
अनुजग्मुर्महात्मानं क्षत्रियाश्च विशाम्पते । विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ १९ ॥ महाराज! प्रजानाथ! उनके सिवा और भी बहुत-से वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणों और क्षत्रियोंने धर्मराजकी आज्ञासे विधिपूर्वक महात्मा अर्जुनका अनुसरण किया ॥ १८-१९ ॥ पाण्डवैः पृथिवीमश्वो निर्जितामस्त्रतेजसा । चचार स महाराज यथादेशं च सत्तम ॥ २० ॥ महाराज! साधुशिरोमणे! पाण्डवोंने अपने अस्त्रके प्रतापसे जिस पृथ्वीको जीता था, उसके सभी देशोंमें वह अश्व क्रमशः विचरण करने लगा ॥ २० ॥ तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन् पाण्डवस्य ह । तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च ॥ २१ ॥ वीर! उन देशोंमें अर्जुनको जो बड़े-बड़े अद्भुत युद्ध करने पड़े, उनकी कथा तुम्हें सुना रहा हूँ ॥ २१ ॥ स हयः पृथिवीं राजन् प्रदक्षिणमवर्तत । ससारोत्तरतः पूर्वं तन्निबोध महीपते ॥ २२ ॥ अवमृद्नन् स राष्ट्राणि पार्थिवानां हयोत्तमः । शनैस्तदा परिययौ श्वेताश्वश्च महारथः ॥ २३ ॥ पृथिवीनाथ! वह घोड़ा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करने लगा। सबसे पहले वह उत्तर दिशाकी ओर गया। फिर राजाओंके अनेक राज्योंको रौंदता हुआ वह उत्तम अश्व पूर्वकी ओर मुड़ गया। उस समय श्वेतवाहन महारथी अर्जुन धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ तत्र संगणना नास्ति राज्ञामयुतशस्तदा । येऽयुध्यन्त महाराज क्षत्रिया हतबान्धवाः ॥ २४ ॥ महाराज! महाभारत-युद्धमें जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, ऐसे जिन-जिन क्षत्रियोंने उस समय अर्जुनके साथ युद्ध किया था, उन हजारों नरेशोंकी कोई गिनती नहीं है ॥ २४ ॥ किराता यवना राजन् बहवोऽसिधनुर्धराः । म्लेच्छाश्चान्ये बहुविधाः पूर्वं ये निकृता रणे ॥ २५ ॥ राजन्! तलवार और धनुष धारण करनेवाले बहुत-से किरात, यवन और म्लेच्छ, जो पहले महाभारत-युद्धमें पाण्डवोंद्वारा परास्त किये गये थे, अर्जुनका सामना करनेके लिये आये ॥ २५ ॥ आर्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टनरवाहनाः । समीयुः पाण्डुपुत्रेण बहवो युद्धदुर्मदाः ॥ २६ ॥ हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों और वाहनोंसे युक्त बहुत-से रणदुर्मद आर्य नरेश भी पाण्डुपुत्र अर्जुनसे भिड़े थे ।। एवं वृत्तानि युद्धानि तत्र तत्र महीपते ।
अर्जुनस्य महीपालैर्नानादेशसमागतैः ॥ २७ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानोंमें नाना देशोंसे आये हुए राजाओंके साथ अर्जुनको अनेक बार युद्ध करने पड़े ॥ २७ ॥ यानि तूभयतो राजन् प्रतप्तानि महान्ति च । तानि युद्धानि वक्ष्यामि कौन्तेयस्य तवानघ ॥ २८ ॥ निष्पाप नरेश! जो युद्ध दोनों पक्षके योद्धाओंके लिये अधिक कष्टदायक और महान् थे, अर्जुनके उन्हीं युद्धोंका मैं यहाँ तुमसे वर्णन करूँगा ॥ २८ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरणविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा त्रिगतोंकी पराजय
वैशम्पायन उवाच त्रिगर्तैरभवद् युद्धं कृतवैरैः किरीटिनः । महारथसमाज्ञातैर्हतानां पुत्रनप्तृभिः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! कुरुक्षेत्रके युद्धमें जो त्रिगर्त वीर मारे गये थे, उनके महारथी पुत्रों और पौत्रोंने किरीटधारी अर्जुनके साथ वैर बाँध लिया था। त्रिगर्तदेशमें जानेपर अर्जुनका उन त्रिगर्तोंके साथ घोर युद्ध हुआ था ॥ १ ॥ ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम् । विषयान्तं ततो वीरा दंशिताः पर्यवारयन् ॥ २ ॥ रथिनो बद्धतूणीराः सदश्वैः समलंकृतैः । परिवार्य हयं राजन् ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमुः ॥ ३ ॥ ‘पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है’ यह जानकर त्रिगर्तवीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन्! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे ॥ २-३ ॥ ततः किरीटी संचिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम् । वारयामास तान् वीरान् सान्त्वपूर्वमरिंदमः ॥ ४ ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले अर्जुन यह जान गये कि वे क्या करना चाहते हैं। उनके मनोभावका विचार करके वे उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए युद्धसे रोकने लगे ॥ ४ ॥ तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा । तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान् किरीटी न्यवारयत् ॥ ५ ॥ किंतु वे सब उनकी बातकी अवहेलना करके उन्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे। तमोगुण और रजोगुणके वशीभूत हुए उन त्रिगर्तोंको किरीटीने युद्धसे रोकनेकी पूरी चेष्टा की ॥ ५ ॥ तानब्रवीत् ततो जिष्णुः प्रहसन्निव भारत । निवर्तध्वमधर्मज्ञाः श्रेयो जीवितमेव च ॥ ६ ॥ भारत! तदनन्तर विजयशील अर्जुन हँसते हुए-से बोले—‘धर्मको न जाननेवाले पाप्पात्माओ! लौट जाओ। जीवनकी रक्षामें ही तुम्हारा कल्याण है’ ॥ ६ ॥ स हि वीरः प्रयास्यन् वै धर्मराजेन वारितः । हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्याः पार्थिवा इति ॥ ७ ॥