भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

९८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । **प्रश्न—**यदि ज्ञानी कर्मों को करेगा, तो उसको पुण्य-पाप का भी सम्बन्ध जरूर होगा, यह कैसे हो सकता है कि वह कर्म तो करे पर उसको पुण्य-पाप का सम्बन्ध न हो ?
**उत्तर—**जिस विद्वान् ने दृश्यमान् सारे जगत् को अपना आत्मा जान लिया है, उसको प्रारब्धवश से कर्मों में वर्तमान को कौन वाक्य प्रवृत्त करने में वा निषेध करने में समर्थ है, किन्तु कोई भी नहीं है । 'शारीरक-भाष्य' में कहा है—
अविद्यावद्विषयोः वेदः ।
जैसे बन्दी-गण अर्थात् भाट लोग राजा के चरित्रों का वर्णन करते हैं, वैसे वेद भी ज्ञानवान् के चरित्रों का वर्णन करते हैं । इसी कारण ज्ञानवान् को पुण्य-पाप भी स्पर्श नहीं कर सकता है ॥ ४ ॥

मूलम् ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे ।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते, भूतग्रामे, चतुर्विधे, विज्ञस्य, एव, हि, सामर्थ्यम्, इच्छानिच्छाविवर्जने ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आब्रह्मस्तम्ब- पर्यन्ते=ब्रह्मा से चींटी पर्यन्तविज्ञस्य एव= ज्ञानी का ही
चतुर्विधे= चार प्रकार केइच्छानिच्छा- विवर्जने=इच्छा और अनिच्छा के त्याग में
$भूतग्रामे=जीवों के समूह में सेहि= निश्चय करके
सामर्थ्यम्= सामर्थ्य है ॥

चौथा प्रकरण । ९९

प्रश्न–ज्ञानी की प्रवृत्ति यदृच्छा से अर्थात् दैवेच्छा से होती है या अपनी इच्छा से होती है ? उत्तर–ज्ञानी की इच्छा से होती है, अपनी इच्छा से नहीं होती है । यद्यपि ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यंत इच्छा और अनिच्छा हटाई नहीं जा सकती है, तथापि ब्रह्मज्ञानी में इच्छा और अनिच्छा के हटाने की सामर्थ्य है, इसी वास्ते यदृच्छा करके भोगों में प्रवृत्त होकर या कर्मों में प्रवृत्त होकर विधि-निषेध का किंकर नहीं हो सकता है । शुकदेवजी ने भी कहा है— भेदाभेदौ सपदि गलितौ पुण्यपापे विशीर्णे मायामोहौ क्षयमुपगतौ नष्टसंदेहवृत्तेः । शब्दातीतं त्रिगुणरहितं प्राप्य तत्त्वावबोधं निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः ॥ १ ॥ अर्थात् जिस विद्वान् के आत्मज्ञान के प्रभाव से भेद और अभेद ये दोनों वृत्ति-ज्ञान शीघ्र ही नष्ट हो गये हैं, उसी के पुण्य और पाप भी नष्ट हो जाते हैं और माया और माया का कार्य मोह; ये दोनों जिसके नष्ट हो गये हैं और जो शब्द आदि विषयों से और तीनों गुणों से रहित है, और जो आत्म-तत्त्व को प्राप्त हुआ है, और जो तीनों गुणों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म के मार्ग में विचरता रहता है, उसके लिये न कोई विधि है, और न कोई निषेध है ॥ १ ॥ प्रश्न–अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाऽशुभम् ॥ १ ॥ अर्थात् किये हुए जो शुभ-अशुभ कर्म हैं, वे सब अवश्य ही सब जीवों को भोगने पड़ते हैं, तो फिर इन वाक्यों से क्या प्रयोजन है ?

१०० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उत्तर—ये सब वाक्य अज्ञानी के प्रति हैं ज्ञानी के प्रति नहीं, ऐसा वेद में भी कहा है । तथाच श्रुतिः— तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति, सुहृदः साधुकृत्यं द्विषन्तः पापकृत्यम् १ अर्थात् जो विद्वान् शुभ अशुभ कर्मों को करते हैं, उसके द्रव्य को उसके पुत्र लेते हैं, और उसके मित्र उसके पुण्य कर्मों को लेते हैं, और उसके द्वेषी पाप कर्मों को ले लते हैं, वह आप पुण्य-पाप से रहित होकर मुक्त हो जाता है ॥ तस्य तावदेव चि यावन्न विमोक्ष्ये । अर्थात् केवल उतना ही काल उस विद्वान् के मोक्ष में विलंब है, जितने काल तक वह प्रारब्ध-कर्म के भोग से नहीं छूटता है । अथ संपत्स्ये । जब वह प्रारब्ध-कर्मों से छूट जाता है, तब वह शरीर-रूपी उपाधि से रहित होकर ब्रह्म से अभेद को प्राप्त हो जाता है । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परम साम्यमुपैति । शरीर त्यागते ही विद्वान् पुण्य-पाप से रहित होकर और भावी जन्म कर्म से रहित होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है। न तस्य प्राणः उत्क्रामन्ति । और उस विद्वान् के प्राण लोकान्तर में गमन नहीं करते हैं— अत्रैव समबलीयंन्ते । इसी जगह अपने कारण में लय हो जाते हैं। इस तरह के अनेक श्रुति-वाक्य हैं, जो विद्वान् के कर्मों के फल को

चौथा प्रकरण । १०१

निषेध करते हैं, और गीता में भी भगवान् ने कहा है कि ज्ञान-रूपी अग्नि करके उसके सब कर्म दग्ध हो जाते हैं ॥

**प्रश्न—**कारण के नाश होने से कार्य का भी नाश हो जाता है । जैसे तन्तुओं के नाश होने से पट का भी नाश हो जाता है, वैसे ही आत्म-ज्ञान करके, अज्ञान के नाश होने से अज्ञान का कार्य जो विद्वान् का शरीर है, उसका भी नाश हो जाना चाहिए ?

ऐसी शंका किसी नैयायिक की है। इसके समाधान को कहते हैं—

**उत्तर—**कारण अज्ञान के नाश-समकाल ही विद्वान् के शरीर इन्द्रियादिकों का भी नाश हो जाता है अर्थात् ज्ञान-रूपी अग्नि करके विद्वान् के देहादिक सब भस्म हो जाते हैं, पर दग्ध हुए भी उसके काम को देते हैं । जैसे 'महाभारत' में ब्रह्मास्त्र करके अर्जुन का रथ भस्म हो गया था, तथापि कृष्णजी की शक्ति से वह भस्म हुआ भी रथ चलता-फिरता था वैसे आत्म-ज्ञान करके कारण के सहित देहादिक विद्वान् के भस्म हुए भी प्रारब्ध रूपी शक्ति करके अपने-अपने कार्य को करते हैं । अथवा नैयायिक के मत में कारण के नाश से एक क्षण पीछे कार्य का नाश होता है । जैसे तन्तुओं के नाश से एक क्षण पीछे पट का नाश होता है वैसे ही अज्ञान रूपी कारण के नाश के एक क्षण पीछे विद्वान् के देहादिकों का भी नाश होता है ।

यदि कहो कि देहादिक तो ज्ञान की उत्पत्ति के पीछे अनेक वर्षों तक रहते हैं, सो नहीं । जैसे अल्पकाल तक रहने-

१०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

वाले पट का नाश भी अल्प है, वैसे ही अनादिकाल के अज्ञान के कार्य जो देहादिक हैं, उनके नाश के लिये दीर्घकाल लगता है। पूर्वोक्त युक्ति और प्रमाणों से सिद्ध होता है कि ज्ञानी के ऊपर विधि-निषेध-वाक्यों की आज्ञा नहीं है, किन्तु अज्ञानी के ऊपर ही है ॥ ५ ॥

मूलम् ।

आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम् । यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित् ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

आत्मानम्, अद्वयम्, कश्चित्, जानाति, जगदीश्वरम्, यत्, वेत्ति, तत्, सः, कुरुते, न, भयम्, तस्य, कुत्रचित् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
कश्चित्=कोई एकजानाति=जानता है
आत्मानम्=आत्मा अर्थात् जीव कोयत=जिस कर्म को करने योग्य
=औरवेत्ति=जानता है
जगदीश्वरम्=ईश्वर कोतत्=उसको
अद्वयम्=अद्वैतसः=वह
कुरुते=करता हैभयम्=भय
तस्य=उस आत्म-ज्ञानी कोकुत्रचित्=कहीं
=नहीं है ॥

भावार्थ ।

अद्वैत ज्ञान करके द्वैत का बाध हो जाता है। और द्वैत के बाध होने से भय का कारण अज्ञान विद्वान् को नहीं

चौथा प्रकरण । १०३

रहता है । तत्पद और त्वपद के लक्ष्यार्थ का भागत्याग लक्षणा करके, और महावाक्यों करके अभेदता से जो जानता है, वही अद्वैत ज्ञान है । जिसको अद्वैत ज्ञान प्राप्त है, वह विद्वान् है, वही बाधितानुवृत्ति करके सम्पूर्ण व्यवहारों को करता भी है; पर उसको किसी का भय नहीं होता है । क्योंकि उसके भय का—द्वैतज्ञान का—बाध हो गया है । इसी वार्ता को श्रुति भगवती भी कहती है— द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ १ ॥ अर्थात् द्वैत से ही निश्चय करके भय होता है । उदरमन्तरं कुरुतेऽथ तस्य भयं भवति । जो थोड़ा सा भी भेद करता है, उसको भय होता है । अन्योऽसावहमन्योस्मि न स वेद यथा पशुः । जो अपने से ब्रह्म को भिन्न जानकर उपासना करता है, वह पशु की तरह ब्रह्म को नहीं जानता है । ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति । ब्रह्मवित् ब्रह्मरूप ही होता है । तरति शोकमात्मवित् । आत्मवित् संसार-रूपी शोक से तर जाता है । इन श्रुति वाक्य से भी सिद्ध होता है कि विद्वान् को किसी दूसरे का भी भय नहीं होता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में कोई भी दूसरा नहीं है ॥ ६ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ।

—:०:—

पाँचवाँ प्रकरण (लय-चिन्तन)

पाँचवाँ प्रकरण।

—:०:—

मूलम् ।

न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि ।
संघातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

न, ते, सङ्गः, अस्ति, केन, अपि, किम्, शुद्धः, त्यक्तुम्, इच्छसि, संघातविलयम्, कुर्वन्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ते= तेरात्यक्तम्= त्यागना
केन अपि= किसी के साथ भीइच्छसि= चाहता है
संग= संगएवम् एव= इस प्रकार ही
= नहींसंघातविलयम्= देहाभिमान का त्याग
अस्ति= हैकुर्वन्= करता हुआ
अतः= इसलियेलयम्= मोक्ष को
शुद्धः= तू शुद्ध हैव्रज= प्राप्त हो ॥
किम्= किसको

भावार्थ ।

चतुर्थ प्रकरण में शिष्य की परीक्षा के लिए उपदेश किया था, अब उसकी दृढ़ता के लिये चार श्लोकों करके लय का उपदेश करते हैं—
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! तू शुद्धबुद्ध-स्वरूप है, तेरा देह गेहादिकों के साथ अहंकार और ममत्व का

पाँचवाँ प्रकरण । १०५

आस्पद-रूप करके सम्बन्ध नहीं है। जब तू असंग है, और शुद्ध है, तब फिर तेरे विषे त्याग और ग्रहण कहाँ है, इस-वास्ते अब तू देह-संघात को लय कर, अर्थात् 'मैं देह हूँ, या 'मेरा यह देह है'—ऐसे अहंकार को भी दूर करके अपने स्वरूप में स्थित हो ॥ १ ॥

मूलम् ।

उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः । इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

उदेति, भवतः, विश्वम्, वारिधेः, इव, बुद्बुदः, इति, ज्ञात्वा, एकम्, आत्मानम्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भवतः=तुझसेएकम्=एक
विश्वम्=संसारआत्मानम्=आत्मा को
उदेति=उत्पन्न होता हैएवम् एव=ऐसा
इव=जैसेज्ञात्वा=ज्ञान करके
वारिधेः=समुद्र सेलयम्=शान्ति को
बुद्बुदः=बुद्बुदव्रज=प्राप्त हो ॥
इति=इस प्रकार

भावार्थ ।

जैसे समुद्र में अनेक बुद्बुदे और तरंग उत्पन्न होते हैं, फिर समुद्र में ही लय हो जाते हैं, समुद्र से भिन्न नहीं हैं,

१०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

वैसे ही मन के संकल्प से यह जगत् उत्पन्न हुआ है और मन के ही लय होने से जगत् लय हो जाता है । देवीभागवत में कहा है—

शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।
बन्धमोक्षौ मनस्संस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १ ॥

आत्मा सदैव शुद्ध और मुक्त है, वह कदापि बंध को नहीं प्राप्त होता है बंध और मोक्ष दोनों मन के धर्म हैं । मन के शान्त होने से बंध और मोक्ष का नाम भी नहीं रहता है । आत्मा में मन के लय करने से सारा जगत् लय को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥

मूलम् ।

प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि ।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

प्रत्यक्षम्, अपि, अवस्तुत्वात्, विश्वम्, न, अस्ति, अमले, त्वयि, रज्जुसर्पं, इव, व्यक्तम्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
व्यक्तम् =दृश्यमानरज्जुसर्पं =रज्जु सर्पं
विश्वम् =संसारइव =सदृश भी
प्रत्यक्षम् अपि =प्रत्यक्ष होता हुआ भीन अस्ति =नहीं है
अवस्तुत्वात् =वास्तव मेंएवम् एव =इसी लिये
अमले =मल रहितलयम् =शान्ति को
त्वयि =तुझ विषेव्रज =( तू ) प्राप्त हो ॥

पाँचवाँ प्रकरण । १०७

भावार्थ ।

प्रश्न—प्रत्यक्ष प्रमाण करके रज्जु विषे सर्पादिकों का भेद प्रतीत होता है, उनका कैसे लय हो सकता है ? क्योंकि जो वस्तु प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय है, उसका लय नहीं होता है ?

उत्तर—प्रत्यक्ष प्रमाण का जो विषय है, उसका भी बाध शास्त्र करके हो जाता है । जैसे चन्द्रमा का मंडल प्रत्यक्ष प्रमाण से तो एक बित्ता भर का दिखाई देता है, परन्तु ज्योतिष-शास्त्र में वह दश हजार योजन का लिखा है । उस शास्त्र करके बित्ता भर का नहीं माना जाता है । वैसे ही प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय जो जगत् है, वह भी श्रुति-वाक्यों करके बाधित हो जाता है, क्योंकि जगत् वास्तव में तीनों कालों में नहीं है, और जैसे स्वप्न की सृष्टि और गंधर्व- नगरादिक तीनों कालों में नहीं हैं, वैसे ही यह जगत् भी वास्तव में तीनों कालों में नहीं है । ऐसा चिन्तन ही जगत् के लय का हेतु है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः । समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

समदुःखसुखः, पूर्णः, आशानैराश्ययोः, समः, समजीवित्- मृत्युः, सन्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥

१०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
समदुःखसुखः=तुल्य है दुःख और सुख जिसकोसमजीवितः= मृत्युःतुल्य है जीना और मरना जिसको
पूर्णः=जो पूर्ण हैएवम् एव=ऐसा
आशानैराश्ययोः=आशा और निराशा मेंसन्=होता हुआ
लयम्=ब्रह्म-दृष्टि को
समः=जो बराबर हैव्रज=(तू) प्राप्त हो ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू आत्मानंद करके पूर्ण है । दैवयोग से शरीर में उत्पन्न हुए जो सुख दुःख हैं, उनमें भी तू पूर्ण है, आशा और निराशा में भी तू सम है, जीने और मरने में भी तू सम है, तू निर्विकार है, सुख दुःखादि सब अनात्मा के धर्म हैं, और मिथ्या हैं । क्योंकि इनके धर्मी जो देहादिक हैं, वे भी सव मिथ्या हैं । उत्पत्ति से पूर्व जो देहादिक नहीं थे, और नाश से उत्तर भो नहीं रहते हैं, वे बीच में भी प्रतीतिमात्र हैं । जो वस्तु उत्पत्ति से पूर्व और नाश से उत्तर न हो, वह बीच में भो वास्तविक नहीं होती है, केवल प्रतीतमात्र ही होती है । जैसे स्वप्न के पदार्थ और रज्जु विषे सर्पादिक मिथ्या हैं, वैसे यह जगत् भी मिथ्या है । वास्तव में, तीनों कालों में नहीं है, केवल ब्रह्म ही ब्रह्म है ॥

सर्वं खल्विदं ब्रह्म ॥

यह संपूर्ण जगत् निश्चय करके ब्रह्म-रूप ही है, ऐसे चिंतन का नाम ही लयचिंतन है ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां पंचमं प्रकरणं समाप्तम् ॥

छठा प्रकरण (लय-माहात्म्य)

छठा प्रकरण ।

---:o:---

मूलम् ।

आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत् ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

आकाशवत्, अनन्तः, अहम्, घटवत्, प्राकृतम्, जगत्,
इति, ज्ञानम्, तथा एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आकाशवत्=आकाशवत्एतस्य=इसका
अहम्=मैंन त्याग=न त्याग है
अनन्तः=अनन्य हूँ=और
जगत्=संसारन ग्रहः=न ग्रहण है
घटवत्=घटवत्=और
प्राकृतम्=प्रकृतिजन्य हैन लयः=न लय है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=ऐसा ज्ञान है ॥

भावार्थ ।

शिष्य की परीक्षा के वास्ते पाँचवें प्रकरण द्वारा गुरु ने लययोग-रूप चिंतन का उपदेश किया । अब इस छठे प्रकरण में गुरु अपने अनुभव को दिखाता हुआ लयादिकों के असंभव को दिखाता है—

लय चिंतन-रूप योग भी मेरे में नहीं बनता है । लय उसका होता है, जो उत्पतिवाला पदार्थ है । जिसकी उत्पत्ति

११० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

ही तीनों कालों में नहीं है, उसका लय भी नहीं है। जैसे बंध्या का पुत्र और शशे के सींग की उत्पत्ति नहीं है और न उसका लय है, वैसे ही जगत् भी तीनों कालों में न उत्पन्न हुआ है, न होगा, और न वर्तमान काल में है। तब उसका लयचिंतन कैसे हो सकता है, किन्तु कदापि नहीं हो सकता है।

प्रश्न—यदि जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ है, तब प्रतीत क्यों होता है ?

उत्तर—मांडूक्य-कारिका में कहा है—

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ १ ॥ स्वप्नमाये यथा दृष्टे गंधर्वनगरं तथा । तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥ २ ॥

अर्थात् जो वस्तु उत्पत्ति से पहले नहीं है, और नाश से उत्तर भी नहीं है, वह वर्तमान काल में भी नहीं है, परन्तु मिथ्या होकर सत्य की तरह वर्तमान काल में प्रतीत होती है ॥ १ ॥

जैसे स्वप्न के हाथी-घोड़े, और इन्द्रजाली करके रचे हुए पदार्थ, और गन्धर्वनगर; ये सब बिना हुए ही प्रतीत होते हैं, वैसे यह जगत् भी बिना हुए ही प्रतीत होता है। ज्ञानियों ने ऐसा अनुभव करके वेदान्त-शास्त्र द्वारा देखा है कि केवल अद्वैत अनंत-स्वरूप आत्मा ही सत्य है, और सारा प्रपंच प्रतीतिमात्र ही है, वास्तव में नहीं है।

छठा प्रकरण । १११

प्रश्न-अनंत-स्वरूप आत्माका देहादिकों में निवास कैसे हो सकता है ? बड़ी वस्तु छोटी वस्तु के भीतर नहीं आ सकती है ? उत्तर-जैसे घटमठादिक आकाश के निवास के स्थान हैं, और भेदक भी हैं, वैसे ही देहादिक भी अनंत-स्वरूप आत्मा के निवास का स्थान है, और भेदक भी है । वास्तव में तो यह जगत् मिथ्या माया का कार्य होने से मिथ्या है । इस प्रकार वेदान्त करके सिद्ध जो ज्ञान है, वही अनुभवरूप होकर जगत् के मिथ्यात्व में प्रमाण है, इस वास्ते लयचिंतनादिक भी जगत् के नहीं बन सकते हैं ॥ १ ॥

मूलम् । महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः । इति ज्ञानं तथैतस्य त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥

पदच्छेदः । महोदधिः, इव, अहम्, सः, प्रपञ्चः, वीचिसन्निभः, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंएतस्यत्यागः=इसका त्याग है
महोदधिः इव=समुद्र सदृश हूँच=और
सः=यहन=
प्रपञ्चः=संसारग्रहः लयः=ग्रहण और लय है
वीचिसन्निभः=तरंगों के तुल्य है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=यह ज्ञान है अर्थात् इस प्रकार के विचार को ज्ञान कहते हैं ॥
न=

११२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न--**घटाकाश के दृष्टांत से तो देह और आत्मा के भेद की शंका उत्पन्न होती है । जैसे आकाश से घट भिन्न है, और घट से आकाश भिन्न है, वैसे आत्मा से देह भिन्न है, और देह से आत्मा भिन्न है, दोनों के भिन्न-भिन्न होने से ही द्वैत साबित हुआ, अद्वैत आत्मा तो साबित न हुआ ?

**उत्तर--**जनकजी कहते हैं कि आत्मा महान् समुद्र की तरह है, उसमें प्रपंच लहरों की तरह है । इस प्रकार का अनुभव-रूप ज्ञान ही अद्वैत में प्रमाण है ॥ २ ॥

मूलम् ।

अहं सः शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

अहम्, सः, शुक्तिसंकाशः, रूप्यवत्, विश्वकल्पना, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सः=वहतथा=इसका कारण
अहम्=मैंएतस्य=इसका
शुक्तिसंकाशः=शुक्ति के तुल्य हूँन त्यागः=न त्याग है
विश्वकल्पना=विश्व की कल्पनान लयः=न लय है
रूप्यवत्=रजत के समान हैइति ज्ञानम्=यही ज्ञान है ॥

५५२

भावार्थ ।

**प्रश्न—**जैसे सब बीचियाँ समुद के विकार हैं और समुद्र विकार है, वैसे आपके दृष्टान्त से देह आत्मा का विकार है, और आत्मा विकारी सिद्ध होता है ?

**उत्तर—**अष्टावक्रजी कहते हैं कि विकार-विकारीभाव सावयव पदार्थों में होते हैं, निरवयव पदार्थ में नहीं होते हैं, इसलिये तुम्हारा दृष्टान्त सार्थक नहीं है, अतएव मेरे दृष्टान्त को सुनो—

जैसे शुक्ति सत्य-रूप है और उसमें रजत मिथ्या है, वैसे ही देहादिक समग्र प्रपंच का अधिष्ठान-रूप मैं ही सत्य हूँ और सारा प्रपंच मेरे में कल्पित रजत की तरह मिथ्या है। इसी कारण द्वैत तीनों कालों में सिद्ध नहीं हो सकता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

अहम्, वा, सर्वभूतेषु, सर्वभूतानि, अथो, मयि, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंसर्वभूतानि=सब भूत
वा=निश्चय करकेमयि=मुझमें
सर्वभूतेषु=सब भूतों में हूँ+सन्ति=हैं
अथो=औरतथा=इस कारण से

११४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

एतस्य=इसका<br>न त्यागः=न त्याग है<br>न ग्रहः=न ग्रहण है<br>=औरन लयः=न लय है<br>इति ज्ञानम्= $\Big{$ इस प्रकार का ज्ञान है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**शुक्ति में रजत के दृष्टांत करके भी आत्मा को परिच्छिन्नता की शंका होती है, क्योंकि जैसे शुक्ति परिच्छिन्न और एकदेशवर्ती है, वैसे ही आत्मा भी परिच्छिन्न और एकदेशवर्ती सिद्ध होगा ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं, कि मैं ही सम्पूर्ण भूतों में व्यापक-रूप करके मणियों में सूत की तरह वर्तता हूँ, मैं ही सबका अधिष्ठान-रूप होकर सत्ता और स्फूर्ति का देनेवाला हूँ, मेरे में ही सारा जगत् आकाश में नीलता की तरह अध्यस्त है । इस प्रकार का दान्त वाक्यों करके सिद्ध ज्ञान अर्थात् अनुभव आत्मा के अद्वैत होने में प्रमाण है । और जब मैं हूँ, तो मेरे में ग्रहण, त्याग और लय चिंतनादिक भी नहीं बनते हैं ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां षष्ठं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥

—:०:—

सातवाँ प्रकरण (शान्त-स्थिति / आत्मविश्रांति)

सातवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः ।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वपोतः, इतः, भ्रमति, स्वान्तवातेन, न, मम, अस्ति, असहिष्णुता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मयि अनन्त-महाम्भोधौ =मुझ अनन्त महासमुद्र मेंभ्रमति =भ्रमती है
+ परन्तु =परन्तु
विश्वपोतः =विश्व-रूपी नौकामम =मुझको
स्वान्तवातेन =मन-रूपी पवन करकेअसहिष्णुता =असहनशीलता
इतः ततः =इधर-उधर सेन अस्ति =नहीं है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि लय चिंतन नहीं होगा, तो सांसारिक विक्षेप भी बने रहेंगे और वे कदापि दूर नहीं होंगे ?

**उत्तर—**वे बने रहें, मेरी क्या हानि है । अनन्त महान् समुद्र-रूपी मुझ आत्मा में यह विश्व-रूपी नौका मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती है, उसका भ्रमण करना मेरे को असहन नहीं है । जैसे समुद्र में पवन करके इधर-उधर

११६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भ्रमती हुई नौका समुद्र को क्षुब्ध नहीं कर सकती है, वैसे मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती हुई विश्व-रूपी नौका भी समुद्र-रूपी आत्मा को क्षुब्ध नहीं कर सकती है ॥ १ ॥

मूलम् । मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ २ ॥

पदच्छेदः । मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, जगद्वीचिः, स्वभावतः, उदेतु, वा, अस्तम्, आयातु, न, मे, वृद्धिः, न, च, क्षतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$\left.\begin{aligned} &मयि अनन्त- \ &महाम्भोधौ = \end{aligned}\right}$$\left{\begin{aligned} &मुझ अनन्त \ &महासमुद्र में \end{aligned}\right.$आयातु = प्राप्त हो
जगद्वीचिः = जगत्-रूपी कल्लोलमे = मेरी
स्वभावतः = स्वभाव सेन = न
उदेतु = उदय होंवृद्धिः = वृद्धि है
वा = और चाहेच = और
अस्तम् = लय कोन = न
क्षति = हानि है ॥

भावार्थ । पूर्ववाले वाक्य करके जगत् के व्यवहार को अनिष्टता का अभाव कहा । अब इस वाक्य करके जगत् की उत्पत्ति आदिकों को भी अनिष्टता का अभाव कथन करते हैं ।

सातवाँ प्रकरण ११७

जनकजी कहते हैं कि विनाश से रहित व्यापक आत्मा- रूप समुद्र में जगत्-रूपी अनेक लहरें उदय होती हैं, और फिर अस्त हो जाती हैं। उनके उदय होने से आत्मा की वृद्धि नहीं होती है और उनके अस्त होने से आत्मा की कोई हानि नहीं होती है। जैसे समुद्र की लहरों के उदय और अस्त होने से समुद्र की कुछ भी हानि नहीं है ॥ २ ॥

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना । अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वम्, नाम, विकल्पना, अतिशान्तः, निराकारः, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मयि=मुझअहम्=मैं
अनन्त- महाम्भोधौ=अनन्त महा- समुद्र मेंअतिशान्तः=अत्यन्त शान्त हूँ
निराकारः=निराकार हूँ
नाम=निश्चय करकेच=और
विश्वम्=संसारएतत् एव=इसी आत्मा के
विकल्पना=कल्पना मात्र हैंआस्थितः=आश्रय हूँ ॥

समुद्र और लहर के दृष्टान्त से किसी को ऐसा भ्रम न हो जावे कि आत्मा का विकार जगत् है, इस भ्रम के दूर करने के लिये जनकजी दूसरी रीति से कहते हैं।