अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| धीरः | = ज्ञानी पुरुष | सर्वदा | = नित्य |
| तु | = तो | केवलम् | = एक |
| भोज्यमानः | = भोगता हुआ | आत्मानम् | = आत्मा को |
| अपि | = भी | पश्यन् | = देखता हुआ |
| च | = और | न तुष्यति | = न तो प्रसन्न होता है |
| पीड्यमानः | = पीड़ित होता हुआ | + च | = और |
| अपि | = भी | न कुप्यति | = न कोप करता है ॥ |
भावार्थ ।
ज्ञानी को शाक और कोप भी न होना चाहिए । ज्ञानी पुरुष लोकों की दृष्टि में विषयों को भोक्ता हुआ भी, और लोकों करके निन्दित और पीड़ा को प्राप्त हुआ भी, सर्वदा सुख-दुःख के भोग से रहित केवल आत्मा को देखता हुआ न तो हर्ष को और न कोप को प्राप्त होता है । क्योंकि तोष और रोष आत्मा में नहीं रह सकते हैं । यदि ज्ञानी में भी तोष और रोष रहें, तो बड़ा आश्चर्य है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत् ।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येन्महाशयः ॥ १० ॥
पदच्छेदः ।
चेष्टमानम्, शरीरम्, स्वम्, पश्यति, अन्यशरीरवत्, संस्तवे, च, अपि, निन्दायाम्, कथम्, क्षुभ्येत्, महाशयः ॥
तीसरा प्रकरण । ८७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| चेष्टमानम् | = चेष्टा करते हुए | सः | = वह |
| स्वम् | = अपने | महाशयः | = महाशय पुरुष |
| शरीरम् | = शरीर को आत्मा से भिन्न | संस्तवे | = स्तुति में |
| च | = और | ||
| अन्यशरीरवत् | = अन्य शरीर की तरह | निन्दायाम अपि | = निन्दा की भी |
| +यः | = जो | कथम् | = कैसे |
| पश्यति | = देखता है | क्षुभ्येत् | = क्षोभ को प्राप्त होवेगा ।। |
भावार्थ ।
जैसे दूसरे का शरीर अपने आत्मा से भिन्न चेष्टा का आश्रय है, वैसे अपना शरीर भी अपने आत्मा से भिन्न चेष्टा का आश्रय है। इस प्रकार जो ज्ञानी देखता है, वह अपनी स्तुति में हर्ष को और निंदा में क्षोभ को कदापि प्राप्त नहीं होता है। यदि वह हर्ष और क्षोभ को प्राप्त होवे, तो वह ज्ञानवान् नहीं है ॥ १० ॥
मूलम् ।
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥ ११ ॥
पदच्छेदः ।
मायामात्रम्, इदम्, विश्वम्, पश्यन्, विगतकौतुकः, अपि, सन्निहिते, मृत्यौ, कथम्, त्रस्यति, धीरधीः ॥
८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| विगतकौतुकः = | दूर हो गई है अज्ञानता जिसकी, ऐसा | पश्यन् = | देखता हुआ |
| मृत्यौ सन्नि-हिते अपि = | मृत्यु के आने पर भी | ||
| धीरधीः = | धीर पुरुष | कथम् = | क्यों |
| इदम् विश्वम् = | इस विश्व को | त्रस्यति = | डरेगा ॥ |
| मायामात्रम् = | माया-रूप |
भावार्थ ।
यह जो दृश्यमान जगत् है, सो सब माया का कार्य है । और माया का कार्य होने से ही वह सब मिथ्या है । जो ज्ञानी उसको मिथ्या देखता है, वह फिर ऐसा विचार नहीं करता है कि कहाँ से ये शरीरादिक उत्पन्न होते हैं और नाश होकर किसमें लय हो जाते हैं । यदि ऐसा विचार करके वह मोह को प्राप्त होवे, तो वह ज्ञानी नहीं हो सकता है । जो विद्वान् अपने स्वरूप में अचल है, वह मृत्यु के समीप अपने पर भी भय को नहीं प्राप्त होता है ॥११॥
मूलम् ।
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १२ ॥
पदच्छेदः ।
निःस्पृहम्, मानसम्, यस्य, नैराश्ये, अपि, महात्मनः,
तस्य, आत्मज्ञानतृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥
तीसरा प्रकरण । ८९
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यस्य=जिस | $\left.\begin{aligned}आत्मज्ञान- \ तृप्तस्य\end{aligned}\right}$= आत्म ज्ञान से तृप्त हुए की |
| महात्मनः=महात्मा का | तुलना=बराबरी |
| मानसम्=मन | केन=किसके साथ |
| नैराश्येअपि=मोक्ष में भी | जायते=हो सकती है ॥ |
| निःस्पृहम्=इच्छा-रहित है | |
| तस्य=उस |
भावार्थ ।
अब ज्ञानी की उत्कृष्टता को दिखाते हैं—
जिस विद्वान् का मन मोक्ष की भी इच्छा से रहित एवं संसार के किसी पदार्थ के लाभ अलाभ में हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है, जिसके सब मनोरथ समाप्त हो गये हैं और अपने आत्मा के आनन्द करके ही जो तृप्त है, उस विद्वान् की किसके साथ तुलना की जावे, किन्तु किसी के भी साथ उसकी तुलना नहीं हो सकती है, क्योंकि वह अतुल्य है ॥ १२ ॥
मूलम् ।
स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन ।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
स्वभावात्, एव, जानानः, दृश्यम्, एतत्, न, किञ्चन, इदम्, ग्राह्यम्, त्याज्यम्, सः, किम्, पश्यति, धीरधीः ॥
९० | अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| एतत् | =यह | किम् | =कैसे |
| दृश्यम् | =दृश्य | पश्यति | =देख सकता है कि |
| स्वभावात् | =स्वभाव से ही | इदम् | =यह |
| न किञ्चन | =कुछ नहीं है | ग्राह्यम् | = ग्रहण करने योग्य है |
| + इति | =ऐसा | ||
| जानानः | =जानने वाला है | च | =और |
| + यः | =जो | इदम् | =यह |
| सः धीरधीः | =वह ज्ञानी | त्याज्यम् | =त्यागने-योग्य है ॥ |
भावार्थ ।
यह जो दृश्यमान प्रपंच है, सो सब दृश्य होने से शुक्ति में रजत की तरह मिथ्या है। अर्थात् जैसे शुक्ति में रजत दृश्य भी है और मिथ्या भी है, वैसे यह प्रपंच भी दृश्य होने से मिथ्या है—इस अनुमान-प्रमाण करके यह जगत् मिथ्या सिद्ध होता है, ऐसा जिस विद्वान् ने निश्चय कर लिया है, वह धीर पुरुष ऐसा कब देखता है कि यह मेरे को ग्रहण करने-योग्य है, यह मेरे को त्यागने-योग्य है, किन्तु कदापि नहीं देखता है।
अब इस विषे हेतु को आगेवाला वाक्य करके कहते हैं ॥ १३ ॥
मूलम् ।
अन्तस्त्यक्त कषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ।
यदृच्छयाऽऽगतो भोगो न दुःखाय च तुष्टये ॥ १४ ॥
तीसरा प्रकरण । ९१
पदच्छेदः ।
अन्तस्त्यक्तकषायस्य, निर्द्वन्द्वस्य, निराशिषः, यदृच्छया, आगतः, भोगः, न, दुःखाय, च, तुष्टये ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अन्तस्त्यक्त-कषायस्य = | अन्तःकरण से त्याग दिया है विषय-वासना के कषाय को जिसने | यदृच्छया = | दैवयोग से |
| आगतः = | प्राप्त हुई | ||
| +एवं = | जो | भोगः = | वस्तु |
| निर्द्वन्द्वस्य = | द्वन्द्व से रहित है | न दुःखाय = | न दुःख के लिये है ॥ |
| +तथा = | जो | च = | और |
| निराशिषः = | आशा-रहित है, ऐसे पुरुष को | न तुष्टये = | न संतोष के लिये है ॥ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् ने अन्तःकरण के मलों को दूर कर दिया है, वह शीत उष्णादिक द्वन्द्वों से अर्थात् शीत और उष्णजन्य सुख-दुःखादि से भी रहित है । और नष्ट हो गई हैं सम्पूर्ण विषय-वासनाएँ जिसकी, ऐसा जो समचित्त विद्वान् है, उसको दैवयोग से प्राप्त हुए जो भोग हैं, उनको प्रारब्धवश भोगता हुआ भी हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ।
---:०:---
चौथा प्रकरण (ज्ञाता-प्रशंसा)
चौथा प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया ।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
हन्त, आत्मज्ञस्य, धीरस्य, खेलतः, भोगलीलया, न, हि, संसार, वाहीकै, मूढैः, सह, समानता ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| हन्त = | यथार्थ है कि | समानता = | बराबरी |
| भोगलीलया = | भोगलीला से | संसारवाहीकैः = | संसार से लिप्त |
| खेलतः = | खेलते हुए | मूढैः सह = | मूढ़ पुरुषों के साथ |
| आत्मज्ञस्य = | आत्म-ज्ञानी | न हि = | कदापि नहीं हो सकती है ॥ |
| धीरस्य = | धीर पुरुष की |
भावार्थ ।
तृतीय प्रकरण में जो गुरु ने शिष्य की परीक्षा के लिये ज्ञानी के ऊपर आक्षेप किये हैं, अब उन आक्षेपों के उत्तरों को शिष्य कहता है—
प्रारब्ध से और वाधिताऽनुवृत्ति करके सम्पूर्ण व्यवहारों को करता हुआ भी ज्ञानी दोष को प्राप्त नहीं होता है । जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! जिस आत्मज्ञानी विद्वान् ने सबका अधिष्ठान अपने आत्मा को जान लिया है, वह
९३
विषयों करके विक्षेप को नहीं प्राप्त होता है, अर्थात् उसका चित्त विषयों के सम्बन्ध से विक्षेप को नहीं प्राप्त होता है । यदि विद्वान् प्रारब्धकर्म के वश से स्त्री आदि भोगों में प्रवृत्त भी हो जावे, तब भी मूढ़ बुद्धिवाले अज्ञानियों के साथ उसकी तुल्यता किसी प्रकार नहीं हो सकती है । क्योंकि विद्वान् विषयों को भोगता हुआ भी उनमें आसक्त नहीं होता है, और मूर्ख कर्मों में आसक्त हो जाता है । इसी वार्त्ता को 'गीता' में भी भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी ने कहा है— तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणागुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ १ ॥ हे महाबाहो ! तत्त्ववित् जो ज्ञानी है, सो इन्द्रियों के विषयों के विभाग को जानता है और इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में वर्तती हैं, मैं इनका भी साक्षी हूँ, किन्तु मेरा इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ १ ॥ एवं पञ्चदशीकार ने भी ज्ञानी और अज्ञानी का भेद दिखलाया है— ज्ञानिनोऽज्ञानिनश्चात्रं समे प्रारब्धकर्मणि । न क्लेशो ज्ञानिनो धैर्यान्मूढ़ः क्लिश्यत्यधैर्यतः ॥ १ ॥ प्रारब्ध कर्म के भोग में ज्ञानी और अज्ञानी दोनों तुल्य ही हैं । कष्ट होने पर भी ज्ञानी धीरता से क्लेश को प्राप्त होता है और अज्ञानी मूर्ख अधीरता के कारण क्लेश को प्राप्त होता है ॥ १ ॥
९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः ।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
यत्, पदम्, प्रेप्सवः, दीनाः, शक्राद्याः, सर्वदेवताः, अहो, तत्र, स्थितः, योगी, न, हर्षम्, उपगच्छति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यत् = | जिस | स्थितः = | स्थित होता हुआ भी |
| पदम् = | पद को | योगी = | योगी |
| प्रेप्सवः = | इच्छा करते हुए | हर्षम् = | हर्ष को |
| शक्राद्याः = | शक्रादि | न उपगच्छति = | नहीं प्राप्त होता है |
| सर्वदेवताः = | सब देवता | अहो = | यही आश्चर्य है ॥ |
| दीनाः = | दीन हो रहे हैं | ||
| तत्र = | उस पद पर |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**संसार विषे व्यवहार में स्थित हुआ भी ज्ञानी अज्ञानी के तुल्य क्यों नहीं हो सकता है ?
**उत्तर—**अज्ञानी को लाभ और अलाभ में सुख और दुःख होते हैं, परन्तु ज्ञानवान् को नहीं होते हैं । इसी से उनकी तुल्यता नहीं बन सकती है ।
जनकजी कहते हैं कि हे गुरो ! इन्द्र से आदि लेकर सब देवता जिसे आत्मपद की प्राप्ति की इच्छा करते हुए बड़ी दीनता को प्राप्त होते हैं, और जिस पद की अप्राप्ति होने में बड़े शोक को प्राप्त होते हैं, उस आत्म-पद में स्थित हुआ
चौथा प्रकरण । ९५
भी योगी विषय-भोग की प्राप्ति होने से, न तो वह हर्ष को प्राप्त होता है, और न विषयों के न प्राप्त होने से या नष्ट होने पर वह शोक को प्राप्त होता है । क्योंकि आत्म सुख से अधिक और सुख नहीं है, वह उसको नित्य प्राप्त है ॥ २ ॥
मूलम् ।
तज्जस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते ।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानाऽपि संगतिः ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
तज्जस्य, पुण्यपापाभ्याम्, स्पर्शः, हि, अन्तः, न, जायते,
न, हि, आकाशस्य, धूमेन, दृश्यमाना, अपि संगतिः ।
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तज्जस्य = | उस पद को जानने- वाले के | हि = | क्योंकि |
| आकाशस्य = | आकाश का | ||
| अन्तः = | अन्त:करण का | संगतिः = | सम्बन्ध |
| पुण्यपा-<br>पाभ्याम् = | पुण्य और पाप के साथ | दृश्यमाना = | देखा जाता हुआ |
| अपि = | भी | ||
| स्पर्शः = | सम्बन्ध | धूमेन = | धूम के साथ |
| न जायते = | नहीं होता है | न = | नहीं है ॥ |
भावार्थ ।
ज्ञानवान् विधि-वाक्यों का किङ्कर नहीं होता है, इसी वास्ते उसको पुण्य-पाप भी स्पर्श नहीं करते हैं । जिस विद्वान् ने तत्पद और त्वम्पद के अर्थ को महाकाव्यों द्वारा भोग-त्यागलक्षणा करके अभेद अर्थ को निश्चय कर लिया है, उसके अन्तःकरण के धर्म जो पुण्य और पाप हैं, उनके साथ उसका
९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
सम्बन्ध किसी प्रकार नहीं होता है । क्योंकि वह पुण्य और पाप को अन्तःकरण का धर्म मानता है अपने आत्मा का नहीं । जो अपने में पुण्य और पाप मानता है, उसी को पुण्य-पाप भी लगते हैं । इसमें एक दृष्टांत कहते हैं—
एक पण्डित किसी ग्राम को जाते थे । रास्ते में खेत के किनारे, एक वृक्ष के नीचे बैठकर, सुस्ताने लगे । उस खेत में एक जाट हल जोतता था । जब उसके बैल हल के आगे चलते-चलते खड़े हो जाते थे, तब वह जाट बैलों को गालियाँ देता था कि ‘तेरे खसम की लड़की को ऐसा करूँ।’ ‘तेरे खसम के मुख में पेशाब करूँगा ।’ इत्यादि...
पण्डित ने जब उसको बैलों के प्रति भी गालियाँ देते देखा, तब विचार करने लगे कि इन बैलों का खसम तो यह पुरुष आप ही है और यह अपने को ही ये गाँलियाँ दे रहा है, परन्तु इस वार्ता को यह समझता नहीं है, अतएव इसको समझा देना चाहिए ।
तब पण्डित ने उस जाट से कहा कि तू जो बैलों को गालियाँ दे रहा है, ये गालियाँ किसको लगती हैं । तब जाट ने कहा कि जो साला गालियों को समझता है, उसी को लगती हैं । यह सुनकर पण्डितजी चुप होकर चले गये । जाट का तात्पर्य यह था कि मैं तो समझता नहीं हूँ और तू समझता है, अतएव ये गालियाँ तेरे को ही लगती हैं ॥
दाष्ट्रान्त ।
अज्ञानी पाप और पुण्य को अपने में मानता है इस वास्ते अज्ञानी को ही पाप और पुण्य लगते हैं । ज्ञानी अपने
चौथा प्रकरण । ९७
में नहीं मानता है, किन्तु उनको अन्तःकरण का धर्म मानता है, इस वास्ते उसको पाप-पुण्य नहीं लगते हैं । अथवा जिसको पाप-पुण्य का विशेष ज्ञान होता है, उसी को पाप-पुण्य लगते हैं । बालक को या पागल को पाप-पुण्य का ज्ञान नहीं होता है, इस वास्ते उनको भी पाप-पुण्य नहीं लगते हैं । ज्ञानवान् को भी पाप-पुण्य का ज्ञान नहीं होता है क्योंकि वह अपने आत्मानन्द में मग्न रहता है, अतएव उसको भी पाप-पुण्य नहीं लगते हैं । इसी पर और दृष्टान्त कहते हैं—
जैसे आकाश का धूम के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, वैसे आत्मवित् का भी पुण्य और पाप के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना ।
यदृच्छया वर्त्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
आत्मा, एव, इदम्, जगत्, सर्वम्, ज्ञातम्, येन, महात्मना, यदृच्छया, वर्त्तमानम्, तम्, निषेद्धुम्, क्षमेत्, कः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| येन महात्मना = | जिस महात्मा करके | यदृच्छया = | प्रारब्धवश से |
| तम् = | उस | ||
| इदम् सर्वम् = | यह सम्पूर्ण | वर्त्तमानम् = | वर्तमान ज्ञानी को |
| जगत् = | संसार | निषेद्धुम् = | निषेध करने को |
| आत्मा एव = | आत्मा ही | कः = | कौन |
| ज्ञातम् = | जाना गया है | क्षमेत् = | समर्थ है ॥ |
९८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
**प्रश्न—**यदि ज्ञानी कर्मों को करेगा, तो उसको पुण्य-पाप का भी सम्बन्ध जरूर होगा, यह कैसे हो सकता है कि वह कर्म तो करे पर उसको पुण्य-पाप का सम्बन्ध न हो ?
**उत्तर—**जिस विद्वान् ने दृश्यमान् सारे जगत् को अपना आत्मा जान लिया है, उसको प्रारब्धवश से कर्मों में वर्तमान को कौन वाक्य प्रवृत्त करने में वा निषेध करने में समर्थ है, किन्तु कोई भी नहीं है । 'शारीरक-भाष्य' में कहा है—
अविद्यावद्विषयोः वेदः ।
जैसे बन्दी-गण अर्थात् भाट लोग राजा के चरित्रों का वर्णन करते हैं, वैसे वेद भी ज्ञानवान् के चरित्रों का वर्णन करते हैं । इसी कारण ज्ञानवान् को पुण्य-पाप भी स्पर्श नहीं कर सकता है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे ।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते, भूतग्रामे, चतुर्विधे, विज्ञस्य, एव, हि, सामर्थ्यम्, इच्छानिच्छाविवर्जने ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| आब्रह्मस्तम्ब- पर्यन्ते=ब्रह्मा से चींटी पर्यन्त | विज्ञस्य एव= ज्ञानी का ही |
| चतुर्विधे= चार प्रकार के | इच्छानिच्छा- विवर्जने=इच्छा और अनिच्छा के त्याग में |
| $भूतग्रामे=जीवों के समूह में से | हि= निश्चय करके |
| सामर्थ्यम्= सामर्थ्य है ॥ |
चौथा प्रकरण । ९९
प्रश्न–ज्ञानी की प्रवृत्ति यदृच्छा से अर्थात् दैवेच्छा से होती है या अपनी इच्छा से होती है ? उत्तर–ज्ञानी की इच्छा से होती है, अपनी इच्छा से नहीं होती है । यद्यपि ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यंत इच्छा और अनिच्छा हटाई नहीं जा सकती है, तथापि ब्रह्मज्ञानी में इच्छा और अनिच्छा के हटाने की सामर्थ्य है, इसी वास्ते यदृच्छा करके भोगों में प्रवृत्त होकर या कर्मों में प्रवृत्त होकर विधि-निषेध का किंकर नहीं हो सकता है । शुकदेवजी ने भी कहा है— भेदाभेदौ सपदि गलितौ पुण्यपापे विशीर्णे मायामोहौ क्षयमुपगतौ नष्टसंदेहवृत्तेः । शब्दातीतं त्रिगुणरहितं प्राप्य तत्त्वावबोधं निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः ॥ १ ॥ अर्थात् जिस विद्वान् के आत्मज्ञान के प्रभाव से भेद और अभेद ये दोनों वृत्ति-ज्ञान शीघ्र ही नष्ट हो गये हैं, उसी के पुण्य और पाप भी नष्ट हो जाते हैं और माया और माया का कार्य मोह; ये दोनों जिसके नष्ट हो गये हैं और जो शब्द आदि विषयों से और तीनों गुणों से रहित है, और जो आत्म-तत्त्व को प्राप्त हुआ है, और जो तीनों गुणों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म के मार्ग में विचरता रहता है, उसके लिये न कोई विधि है, और न कोई निषेध है ॥ १ ॥ प्रश्न–अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाऽशुभम् ॥ १ ॥ अर्थात् किये हुए जो शुभ-अशुभ कर्म हैं, वे सब अवश्य ही सब जीवों को भोगने पड़ते हैं, तो फिर इन वाक्यों से क्या प्रयोजन है ?
१०० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
उत्तर—ये सब वाक्य अज्ञानी के प्रति हैं ज्ञानी के प्रति नहीं, ऐसा वेद में भी कहा है । तथाच श्रुतिः— तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति, सुहृदः साधुकृत्यं द्विषन्तः पापकृत्यम् १ अर्थात् जो विद्वान् शुभ अशुभ कर्मों को करते हैं, उसके द्रव्य को उसके पुत्र लेते हैं, और उसके मित्र उसके पुण्य कर्मों को लेते हैं, और उसके द्वेषी पाप कर्मों को ले लते हैं, वह आप पुण्य-पाप से रहित होकर मुक्त हो जाता है ॥ तस्य तावदेव चि यावन्न विमोक्ष्ये । अर्थात् केवल उतना ही काल उस विद्वान् के मोक्ष में विलंब है, जितने काल तक वह प्रारब्ध-कर्म के भोग से नहीं छूटता है । अथ संपत्स्ये । जब वह प्रारब्ध-कर्मों से छूट जाता है, तब वह शरीर-रूपी उपाधि से रहित होकर ब्रह्म से अभेद को प्राप्त हो जाता है । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परम साम्यमुपैति । शरीर त्यागते ही विद्वान् पुण्य-पाप से रहित होकर और भावी जन्म कर्म से रहित होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है। न तस्य प्राणः उत्क्रामन्ति । और उस विद्वान् के प्राण लोकान्तर में गमन नहीं करते हैं— अत्रैव समबलीयंन्ते । इसी जगह अपने कारण में लय हो जाते हैं। इस तरह के अनेक श्रुति-वाक्य हैं, जो विद्वान् के कर्मों के फल को
चौथा प्रकरण । १०१
निषेध करते हैं, और गीता में भी भगवान् ने कहा है कि ज्ञान-रूपी अग्नि करके उसके सब कर्म दग्ध हो जाते हैं ॥
**प्रश्न—**कारण के नाश होने से कार्य का भी नाश हो जाता है । जैसे तन्तुओं के नाश होने से पट का भी नाश हो जाता है, वैसे ही आत्म-ज्ञान करके, अज्ञान के नाश होने से अज्ञान का कार्य जो विद्वान् का शरीर है, उसका भी नाश हो जाना चाहिए ?
ऐसी शंका किसी नैयायिक की है। इसके समाधान को कहते हैं—
**उत्तर—**कारण अज्ञान के नाश-समकाल ही विद्वान् के शरीर इन्द्रियादिकों का भी नाश हो जाता है अर्थात् ज्ञान-रूपी अग्नि करके विद्वान् के देहादिक सब भस्म हो जाते हैं, पर दग्ध हुए भी उसके काम को देते हैं । जैसे 'महाभारत' में ब्रह्मास्त्र करके अर्जुन का रथ भस्म हो गया था, तथापि कृष्णजी की शक्ति से वह भस्म हुआ भी रथ चलता-फिरता था वैसे आत्म-ज्ञान करके कारण के सहित देहादिक विद्वान् के भस्म हुए भी प्रारब्ध रूपी शक्ति करके अपने-अपने कार्य को करते हैं । अथवा नैयायिक के मत में कारण के नाश से एक क्षण पीछे कार्य का नाश होता है । जैसे तन्तुओं के नाश से एक क्षण पीछे पट का नाश होता है वैसे ही अज्ञान रूपी कारण के नाश के एक क्षण पीछे विद्वान् के देहादिकों का भी नाश होता है ।
यदि कहो कि देहादिक तो ज्ञान की उत्पत्ति के पीछे अनेक वर्षों तक रहते हैं, सो नहीं । जैसे अल्पकाल तक रहने-
१०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
वाले पट का नाश भी अल्प है, वैसे ही अनादिकाल के अज्ञान के कार्य जो देहादिक हैं, उनके नाश के लिये दीर्घकाल लगता है। पूर्वोक्त युक्ति और प्रमाणों से सिद्ध होता है कि ज्ञानी के ऊपर विधि-निषेध-वाक्यों की आज्ञा नहीं है, किन्तु अज्ञानी के ऊपर ही है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम् । यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित् ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
आत्मानम्, अद्वयम्, कश्चित्, जानाति, जगदीश्वरम्, यत्, वेत्ति, तत्, सः, कुरुते, न, भयम्, तस्य, कुत्रचित् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| कश्चित्=कोई एक | जानाति=जानता है |
| आत्मानम्=आत्मा अर्थात् जीव को | यत=जिस कर्म को करने योग्य |
| च=और | वेत्ति=जानता है |
| जगदीश्वरम्=ईश्वर को | तत्=उसको |
| अद्वयम्=अद्वैत | सः=वह |
| कुरुते=करता है | भयम्=भय |
| तस्य=उस आत्म-ज्ञानी को | कुत्रचित्=कहीं |
| न=नहीं है ॥ |
भावार्थ ।
अद्वैत ज्ञान करके द्वैत का बाध हो जाता है। और द्वैत के बाध होने से भय का कारण अज्ञान विद्वान् को नहीं
चौथा प्रकरण । १०३
रहता है । तत्पद और त्वपद के लक्ष्यार्थ का भागत्याग लक्षणा करके, और महावाक्यों करके अभेदता से जो जानता है, वही अद्वैत ज्ञान है । जिसको अद्वैत ज्ञान प्राप्त है, वह विद्वान् है, वही बाधितानुवृत्ति करके सम्पूर्ण व्यवहारों को करता भी है; पर उसको किसी का भय नहीं होता है । क्योंकि उसके भय का—द्वैतज्ञान का—बाध हो गया है । इसी वार्ता को श्रुति भगवती भी कहती है— द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ १ ॥ अर्थात् द्वैत से ही निश्चय करके भय होता है । उदरमन्तरं कुरुतेऽथ तस्य भयं भवति । जो थोड़ा सा भी भेद करता है, उसको भय होता है । अन्योऽसावहमन्योस्मि न स वेद यथा पशुः । जो अपने से ब्रह्म को भिन्न जानकर उपासना करता है, वह पशु की तरह ब्रह्म को नहीं जानता है । ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति । ब्रह्मवित् ब्रह्मरूप ही होता है । तरति शोकमात्मवित् । आत्मवित् संसार-रूपी शोक से तर जाता है । इन श्रुति वाक्य से भी सिद्ध होता है कि विद्वान् को किसी दूसरे का भी भय नहीं होता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में कोई भी दूसरा नहीं है ॥ ६ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ।
—:०:—
पाँचवाँ प्रकरण (लय-चिन्तन)
पाँचवाँ प्रकरण।
—:०:—
मूलम् ।
न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि ।
संघातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
न, ते, सङ्गः, अस्ति, केन, अपि, किम्, शुद्धः, त्यक्तुम्, इच्छसि, संघातविलयम्, कुर्वन्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ते | = तेरा | त्यक्तम् | = त्यागना |
| केन अपि | = किसी के साथ भी | इच्छसि | = चाहता है |
| संग | = संग | एवम् एव | = इस प्रकार ही |
| न | = नहीं | संघातविलयम् | = देहाभिमान का त्याग |
| अस्ति | = है | कुर्वन् | = करता हुआ |
| अतः | = इसलिये | लयम् | = मोक्ष को |
| शुद्धः | = तू शुद्ध है | व्रज | = प्राप्त हो ॥ |
| किम् | = किसको |
भावार्थ ।
चतुर्थ प्रकरण में शिष्य की परीक्षा के लिए उपदेश किया था, अब उसकी दृढ़ता के लिये चार श्लोकों करके लय का उपदेश करते हैं—
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! तू शुद्धबुद्ध-स्वरूप है, तेरा देह गेहादिकों के साथ अहंकार और ममत्व का
पाँचवाँ प्रकरण । १०५
आस्पद-रूप करके सम्बन्ध नहीं है। जब तू असंग है, और शुद्ध है, तब फिर तेरे विषे त्याग और ग्रहण कहाँ है, इस-वास्ते अब तू देह-संघात को लय कर, अर्थात् 'मैं देह हूँ, या 'मेरा यह देह है'—ऐसे अहंकार को भी दूर करके अपने स्वरूप में स्थित हो ॥ १ ॥
मूलम् ।
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः । इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
उदेति, भवतः, विश्वम्, वारिधेः, इव, बुद्बुदः, इति, ज्ञात्वा, एकम्, आत्मानम्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भवतः= | तुझसे | एकम्= | एक |
| विश्वम्= | संसार | आत्मानम्= | आत्मा को |
| उदेति= | उत्पन्न होता है | एवम् एव= | ऐसा |
| इव= | जैसे | ज्ञात्वा= | ज्ञान करके |
| वारिधेः= | समुद्र से | लयम्= | शान्ति को |
| बुद्बुदः= | बुद्बुद | व्रज= | प्राप्त हो ॥ |
| इति= | इस प्रकार |
भावार्थ ।
जैसे समुद्र में अनेक बुद्बुदे और तरंग उत्पन्न होते हैं, फिर समुद्र में ही लय हो जाते हैं, समुद्र से भिन्न नहीं हैं,