सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१८ देवता—अग्नि

हे अग्नि देव! तुम चक्षु हो, इसीलिए मुझे चक्षु अर्थात् देखने की शक्ति प्रदान करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (६)
परिपाणमसि परिपाणं मे दाः स्वाहा.. (७)
हे अग्नि देव! तुम सभी प्रकार से पालन करने वाले हो, इसीलिए मेरा पालन करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (७)
सूक्त-१८ देवता—अग्नि
भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा.. (१)
हे अग्नि देव! तुम शत्रु का विनाश करने वाले हो, इसीलिए मुझे शत्रु नाश की शक्ति
प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (१)
सपत्नक्षयणमसि सपत्नचातनं मे दाः स्वाहा.. (२)
हे अग्नि देव! तुम विरोधियों का नाश करने वाले हो, इसीलिए तुम मुझे विरोधियों का
विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (२)
अरायक्षयणमस्यरायचातनं मे दाः स्वाहा.. (३)
हे अग्नि देव! तुम दान न करने वालों का विनाश करने वाले हो, इसीलिए मुझे भी दान
न करने वालों का विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ
हो. (३)
पिशाचक्षयणमसि पिशाचचातनं मे दाः स्वाहा.. (४)
हे अग्नि देव! तुम मांस भक्षण करने वाले पिशाचों का नाश करने वाले हो, इसीलिए
मुझे भी पिशाचों का विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया
हुआ हो. (४)
सदान्वाक्षयणमसि सदान्वाचातनं मे दाः स्वाहा.. (५)
हे अग्नि देव! तुम आक्रोश करने वाली पिशाचियों का विनाश करने वाले हो, इसीलिए
मुझे भी पिशाचियों के विनाश की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो.
(५)
सूक्त-१९ देवता—अग्नि
ebook converter DEMO Watermarks*

अग्ने यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो तपाने की शक्ति है, उस से उस को संतप्त करो जो हम से द्वेष
करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (१)
अग्ने यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो संहार की शक्ति है, उस के द्वारा उस का संहार करो जो हम से
द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (२)
अग्ने यत् ते ते ऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस के द्वारा उन्हें जलाने के लिए दीप्त बनो जो हम
से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
अग्ने यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोकमग्न करने की शक्ति है, उस के द्वारा तुम उन्हें
शोक मग्न करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
अग्ने यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः..
(५)
हे अग्नि देव! तुम्हारा जो तेज है, उस से उन लोगों को तेजहीन बनाओ जो हम से द्वेष
करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं (५)
सूक्त-२० देवता—वायु
वायो यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे वायु देव! तुम्हारी जो संताप पहुंचाने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप पहुंचाओ जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
वायो यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे वायु देव! तुम्हारी जो छीनने की शक्ति है, उस का प्रयोग उन लोगों के प्रति करो जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (२)
वायो यत् ते ऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे वायु देव! तुम्हारा जो वेग है, उस का प्रयोग उन के प्रति करो जो हम से द्वेष रखते हैं

अथवा हम जिन से द्वेष रखते हैं. (३)
वायो यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे वायु देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोक मग्न करने की शक्ति है, उस का प्रयोग उन
लोगों के प्रति करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
वायो यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः..
(५)
हे वायु देव! तुम्हारा जो तेज है, उस के द्वारा उन्हें तेजहीन बनाओ, जो हम से द्वेष करते
हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (५)
सूक्त-२१ देवता—सूर्य
सूर्य यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे सूर्य देव! आप की जो तप्त करने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप पहुंचाओ, जो हम
से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
सूर्य यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे सूर्य देव! आप की जो सुख, शांति एवं शक्ति हरण करने वाली शक्ति है, उस से उन
लोगों की सुख, शांति एवं शक्ति का हरण करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से
द्वेष करते हैं. (२)
सूर्य यत् ते ऽ र्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे सूर्य देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस से उन्हें जलाओ जो हम से द्वेष करते हैं अथवा
हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
सूर्य यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे सूर्य देव! तुम्हारी जो शोक मग्न करने की शक्ति है, उस से उन्हें शोक मग्न करो जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
सूर्य यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (५)
हे सूर्य देव! आप का जो तेज है, उस से उन्हें तेजहीन बनाओ जो हम से द्वेष करते हैं
अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२२ देवता—चंद्र

सूक्त-२२ देवता—चंद्र
चन्द्र यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दूसरों को संतप्त करने की शक्ति है, उस से उन्हें संतप्त करो जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
चन्द्र यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो छीनने की शक्ति है, उस का प्रयोग उन लोगों के सुख, शांति एवं
शक्ति छीनने के लिए करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (२)
चन्द्र यत् ते ऽ र्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस से उन लोगों को दीप्तिहीन बनाओ, जो हम से
द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
चन्द्र यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोक मग्न करने की शक्ति है, उस के द्वारा उन्हें शोक
मग्न करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
चन्द्र यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (५)
हे चंद्र देव! तुम्हारा जो तेज है, उस से उन्हें तेजहीन करो, जो हम से द्वेष करते हैं
अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (५)
सूक्त-२३ देवता—आप अर्थात् जल
आपो यद् वस्तपस्तेन तं प्रति तपत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे जल देव! तुम्हारी जो दूसरों को संताप देने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप प्रदान
करो जो हम से द्वेष करते हैं और हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
आपो यद् वो हरस्तेन तं प्रति हरत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे जल देव! तुम्हारी जो हरण करने की शक्ति है, उस से उन की सुखशांति का हरण
करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (२)
आपो यद् वो ऽ र्चिस्तेन तं प्रत्यर्चत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे जल देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस के द्वारा उन लोगों को दीप्तिहीन बनाओ जो हम
से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
आपो यद् वः शोचिस्तेन तं प्रति शोचत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः..
(४)
हे जल देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोकमग्न करने की शक्ति है, उस से उन्हें शोकमग्न
करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
आपो यद् वस्तेजस्तेन तमतेजसं कृणुत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः..
(५)
हे जल देव! तुम्हारा जो तेज है, उस के द्वारा उन लोगों को तेजहीन बनाओ जो हम से
द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (५)
सूक्त-२४ देवता—आयुध
शेरभक शेरभ पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (१)
हे राक्षसों के गांव के मुखिया और राक्षसों के स्वामी! तुम ने हमारी ओर जो दरिद्रता
प्रदान करने वाली राक्षसी भेजी है तथा जो राक्षस भेजे हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तुम्हारे
जो आयुध हैं, वे भी लौट जाएं. तुम्हारे अनुचर चोर भी लौट जाएं. तुम हमारे जिस शत्रु के हो,
उसी के पास चले जाओ तथा उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले ने तुम्हें मेरे पास भेजा
है. तुम उसी को खाओ. तुम उसी का मांस भक्षण करो. (१)
शेवृधक शेवृध पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (२)
हे अपने आश्रितों का सुख बढ़ाने वाले एवं गांव के मुखिया के स्वामी! तुम ने हमारी
ओर जो दरिद्रता प्रदान करने वाली राक्षसी भेजी है तथा जो राक्षस भेजे हैं, वे हमारी ओर से
लौट जाएं. तुम्हारे जो आयुध हैं वे भी लौट जाएं. तुम्हारे अनुचर चोर भी लौट जाएं. तुम
हमारे जिस शत्रु के हो, उसी के पास चले जाओ तथा उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले
ने तुम्हें मेरे पास भेजा है, तुम उसी को खाओ. तुम उसी का मांस भक्षण करो. (२)
म्रोकानुम्रोक पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (३)
हे धन आदि छीन कर छिपे रूप में चलने वाले एवं उस का अनुसरण करने वाले चोरो!
ebook converter DEMO Watermarks*

तुम ने हमारी ओर दरिद्रता प्रदान करने वाली जो राक्षसी और राक्षस भेजे हैं, वे हमारी ओर
से लौट जाएं. तुम्हारे जो आयुध हैं वे भी लौट जाएं. तुम्हारे अनुचर चोर भी लौट जाएं. तुम
हमारे जिस शत्रु के हो उसी के पास चले जाओ तथा उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले
ने तुम्हें मेरे पास भेजा है, तुम उसी को खाओ. तुम उस का मांस भक्षण करो. (३)
सर्पानुसर्प पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (४)
हे कुटिल चलने वाले राक्षसों के स्वामी एवं उस के अनुचर! तुम ने हमारी ओर दरिद्रता
प्रदान करने वाली राक्षसी और राक्षस भेजे हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तुम्हारे जो आयुध
हैं, वे भी लौट जाएं. तुम्हारे अनुचर चोर भी चले जाएं. तुम हमारे जिस शत्रु के हो, उसी के
पास चले जाओ तथा उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले ने तुम्हें हमारे पास भेजा है, तुम
उसी को खाओ. तुम उसी का मांस भक्षण करो. (४)
जूर्णि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (५)
हे प्राणियों के शरीर को वृद्ध बनाने वाली राक्षसी! तूने हमारी ओर दरिद्रता प्रदान करने
वाली जो राक्षसियां भेजी हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तेरे जो आयुध हैं वे भी लौट जाएं.
तेरे अनुचर चोर भी लौट जाएं. तू हमारे जिस शत्रु की है, उसी के पास चली जा तथा उसे खा
डाल. जिस प्रयोग करने वाले ने तुझे मेरे पास भेजा है, तू उसी को खा. तू उसी का मांस
भक्षण कर. (५)
उपब्दे पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (६)
हे क्रूर शब्द करने वाली राक्षसी! तुम ने हमारी ओर दरिद्रता प्रदान करने वाली जो
राक्षसियां भेजी हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तुम्हारे जो आयुध हैं, वे भी लौट जाएं. तुम्हारे
अनुचर चोर भी चले जाएं. तुम हमारे जिस शत्रु की हो, उसी के पास चली जाओ तथा उसे
खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले ने तुम्हें मेरे पास भेजा है, तुम उसी को खाओ. तुम उसी
का मांस भक्षण करो. (६)
अर्जुनि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (७)
हे अर्जुन वृक्ष के समान रंग वाली राक्षसी! तुम ने मेरी ओर दरिद्रता प्रदान करने वाली
जो राक्षसी भेजी है, वह हमारी ओर से लौट जाए. तुम्हारे जो आयुध हैं, वे भी लौट जाएं.
तुम्हारे अनुचर चोर भी चले जाएं. तुम हमारे जिस शत्रु की हो, उसी के पास चली जाओ तथा
उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले ने तुम्हें मेरे पास भेजा है, तुम उसी को खाओ. तुम
ebook converter DEMO Watermarks*

उसी का मांस भक्षण करो. (७)
भरूजि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (८)
हे शरीर का अपहरण करने हेतु आने वाली राक्षसी! तुम ने हमारी ओर दरिद्रता प्रदान
करने वाली जो राक्षसियां भेजी हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तुम्हारे जो आयुध हैं, वे भी
लौट जाएं. तुम्हारे अनुचर चोर भी चले जाएं. तुम हमारे जिस शत्रु की हो, उसी के पास
वापस लौट जाओ तथा उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले ने तुम्हें मेरे पास भेजा है, तुम
उसी को खा डालो. तुम उसी का मांस भक्षण करो. (८)
सूक्त-२५ देवता—पृश्निपर्णी
शं नो देवी पृश्निपर्ण्यशं निर्ऋत्या अकः.
उग्रा हि कण्वजम्भनी तामभक्षि सहस्वतीम्.. (१)
चमकती हुई पृश्निपर्णी नाम की जड़ीबूटी हमें सुख प्रदान करे तथा रोग उत्पन्न करने
वाली पाप देवता निर्ऋति को दुःख दे. मैं ने अत्यधिक शक्तिशाली, पापनाशिनी एवं रोग को
पराजित करने वाली जड़ी पृश्निपर्णी को खाया है. (१)
सहमानेयं प्रथमा पृश्निपर्ण्यजायत.
तयाहं दुर्नाम्नां शिरो वृश्चामि शकुनेरिव.. (२)
रोगों को पराजित करने वाली पृश्निपर्णी सभी जड़ीबूटियों में प्रमुख बन कर उत्पन्न हुई
है. इस के द्वारा मैं दाद, खुजली, कोढ़ आदि रोगों के कारण को इस प्रकार समाप्त करता हूं,
जिस प्रकार खड्ग से पक्षी का सिर काटा जाता है. (२)
अरायमस्कृग्वावानं यश्च स्फातिं जिहीर्षति.
गर्भादं कण्वं नाशय पृश्निपर्णि सहस्व च.. (३)
हे पृश्निपर्णी नामक जड़ी! मेरे शरीर के रक्त को गिराने वाले कुष्ठ आदि रोगों को, शरीर
वृद्धि को रोकने वाले संग्रहणी आदि रोगों को तथा गर्भ को नष्ट करने वाले रोग के उत्पादक
कण्व नामक पाप को नष्ट करो एवं मेरे शत्रुओं को पराजित करो. (३)
गिरिमेनाँ आ वेशय कण्वान् जीवितयोपनान्.
तांस्त्वं देवि पृश्निपर्ण्यग्निरिवानुदहन्निहि.. (४)
हे पृश्निपर्णी नाम की बूटी! प्राणों का नाश करने वाले एवं कुष्ठ आदि रोगों को उत्पन्न
करने वाले पाप कण्व को पर्वत की गुफा में घुसा दो. जिस प्रकार अग्नि वन में रहने वाले
पशुओं को जला देती है, उसी प्रकार तू पर्वत की गुफा में घुसे हुए पापों को जलाती हुई जा.
ebook converter DEMO Watermarks*

(४)
पराच एनान् प्र णुद कण्वान् जीवितयोपनान्.
तमांसि यत्र गच्छन्ति तत् क्रव्यादो अजीगमम्.. (५)
हे पृश्निपर्णी! प्राणों का नाश करने वाले एवं कोढ़ आदि रोगों को उत्पन्न करने वाले
कण्व नामक पापों को पीछे की ओर जाने को विवश कर. मैं भी कुष्ठ आदि रोगों को वहां
भेजता हूं, जहां सूर्योदय के बाद अंधकार चला जाता है. (५)
सूक्त-२६ देवता—पशुगण
एह यन्तु पशवो ये परेयुर्वायुर्येषां सहचारं जुजोष.
त्वष्टा येषां रूपधेयानि वेदास्मिन् तान् गोष्ठे सविता नि यच्छतु.. (१)
जो पशु कभी न लौटने के लिए चले गए हैं, वे मेरी इस गोशाला में आ जाएं. वायु जिन
की रक्षा के लिए साथ चलती है एवं त्वष्टा जिन के गर्भाशय के बछड़ों का रूप जानते हैं, उन
समस्त पशुओं को सविता देव इस गोशाला में इस प्रकार स्थापित करें कि वे कभी न भागें.
(१)
इमं गोष्ठं पशवः सं स्रवन्तु बृहस्पतिरा नयतु प्रजानन्.
सिनीवाली नयत्वाग्रमेशामाजग्मुषो अनुमते नि यच्छ.. (२)
गाय आदि पशु मेरी इस गोशाला में आएं. उन्हें यहां लाने का ढंग जानते हुए बृहस्पति
देव उन्हें यहां लाएं. हे सिनीवाली अर्थात् पूर्णिमा और अमावस्या की देवियो! तुम इन पशुओं
के पीछे चलती हो. तुम गोशाला में आए हुए इन पशुओं को रोको. (२)
सं सं स्रवन्तु पशवः समाश्वाः समु पूरुषाः.
सं धान्यस्य या स्फातिः संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (३)
गाय आदि पशु, घोड़े, सेवक आदि पुरुष तथा गेहूं, जौ आदि अन्नों की वृद्धि मेरे पास
आए. इस के निमित्त मैं घृत से हवन करता हूं. (३)
सं सिञ्चामि गवां क्षीरं समाज्येन बलं रसम्.
संसिक्ता अस्माकं वीरा ध्रुवा गावो मयि गोपतौ.. (४)
मैं पहली बार बच्चा देने वाली गाय के ताजा दूध में घी मिलाता हूं तथा घी में शक्ति देने
वाला अन्न और जल मिलाता हूं. मेरे पुत्र, पौत्र आदि घी से शरीर चुपड़ कर दृढ़ गात्र वाले
बनें. इस के निमित्त मुझ गोस्वामी के पास गाएं स्थित रहें. (४)
आ हरामि गवां क्षीरमाहार्षं धान्यं १ रसम्.
ebook converter DEMO Watermarks*

आहृता अस्माकं वीरा आ पत्नीरिदमस्तकम्.. (५)
मैं गायों का दूध लाता हूं तथा अन्न एवं जल भी लाता हूं. मैं पुत्र, पौत्र एवं पत्नी को ले
आया हूं. इन सब से मेरा घर पूर्ण रहे. (५)
सूक्त-२७ देवता—ओषधि, इंद्र, रुद्र
नेच्छत्रुः प्राशं जयति सहमानाभिमूरसि.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (१)
हे ग्वारपाठा नामक जड़ी! तुम्हारा सेवन करने वाले वक्ता को उस का विरोधी न जीत
सके. तुम्हारा स्वभाव शत्रु को सहन करने का है, इसीलिए तुम प्रतिवादी को पराजित कर
देती हो. मुझ प्रश्न पूछने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन को तुम पराजित करो. हे
ओषधि! मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (१)
सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (२)
हे ग्वारपाठा नामक जड़ी! सुंदर पंखों वाले गरुड़ ने विष दूर करने के लिए तुम्हें खोज
कर प्राप्त किया था. आदि वाराह ने अपनी थूथन से तुम्हें खोदा था. मुझ प्रश्न पूछने वाले से
जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन्हें तुम पराजित करो. हे ओषधि! मेरे विरोधी वक्ताओं का
गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (२)
इन्द्रो ह चक्रे त्वा बाहावसुरेभ्य स्तरीतवे.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (३)
हे ग्वारापाठा नामक जड़ी! इंद्र ने असुरों की हिंसा करने के लिए तुम्हें अपनी भुजाओं
में धारण किया था. मुझ प्रश्न पूछने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन्हें तुम पराजित
करो तथा मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (३)
पाटामिन्द्रो व्याश्नादसुरेभ्य स्तरीतवे.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (४)
इंद्र ने असुरों की हिंसा करने के लिए ग्वारपाठा नाम की जड़ी को खाया था. हे
ग्वारपाठा! मुझ प्रश्न पूछने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन्हें तुम पराजित करो तथा
मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से बोल न सकें. (४)
तयाहं शत्रून्त्साक्ष इन्द्रः सालावृकाँ इव.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*

ग्वारपाठे को धारण कर के अथवा खा कर मैं अपने विरोधी वक्ताओं को उसी प्रकार
निरुत्तर कर दूंगा, जिस प्रकार इंद्र ने जंगली कुत्तों का रूप धारण करने वाले असुरों को
हराया था. हे ग्वारापाठा! मुझ प्रश्न करने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न करते हैं, उन्हें तुम
पराजित करो तथा मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (५)
रुद्र जलाषभेषज नीलशिखण्ड कर्मकृत्.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (६)
हे सुखकर जड़ीबूटियों वाले, नीले रंग के विखंड अर्थात् मोर के पंखों के मुकुट से युक्त
एवं अपने उपासकों के दुष्कर्मों को काटने वाले रुद्र! मेरे द्वारा सेवन की जाती हुई ग्वारपाठा
नाम की जड़ी को मेरे विरोधी वक्ताओं का तिरस्कार करने योग्य बनाओ. हे ग्वारपाठा! मुझ
प्रश्न करने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन्हें तुम पराजित करो तथा मेरे विरोधी
वक्ताओं का मुंह सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (६)
तस्य प्राशं त्वं जहि यो न इन्द्राभिदासति.
अधि नो ब्रूहि शक्तिभिः प्राशि मामुत्तरं कृधि.. (७)
हे इंद्र! जो विरोधी वक्ता अपनी युक्तियों से मेरा तिरस्कार करता है, तुम उस के उस प्रश्न
को समाप्त कर दो, जो मेरे प्रतिकूल हो. तुम अपनी शक्तियों से मुझे अधिक बोलने वाला
बनाओ तथा मुझ प्रश्न पूछने वाले को उत्तर देने वाले से श्रेष्ठ बनाओ. (७)
सूक्त-२८ देवता—जरिमा, आयु आदि
तुभ्यमेव जरिमन् वर्धतामयं मेममन्ये मृत्यवो हिंसिषुः शतं ये.
मातेव पुत्रं प्रमना उपस्थे मित्र एनं मित्रियात् पात्वंहसः.. (१)
हे स्तुति किए जाते हुए अग्नि देव! तुम्हारी सेवा के लिए ही यह कुमार रोग आदि से
रहित हो कर बढ़े. जो असंख्य हिंसक रोग एवं पिशाच हैं, वे भी इस बालक की हिंसा न करें.
माता जिस प्रकार पुत्र को गोद में ले कर उस की रक्षा करती है, उसी प्रकार मित्र नाम के देव
पाप से इस बालक की रक्षा करें. (१)
मित्र एनं वरुणो वा रिशादा जरामृत्युं कृणुतां संविदानौ.
तदग्निर्होता वयुनानि विद्वान् विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति.. (२)
हिंसकों का भक्षण करने वाले मित्र एवं वरुण एक मत हो कर इस बालक को
वृद्धावस्था के द्वारा मरने वाला बनाएं. देवों का आह्वान करने वाले एवं जानने योग्य बालकों
को जानने वाले अग्नि देव समस्त प्रादुर्भाव के स्थानों को पा कर इस के लिए दीर्घ आयु का
वचन दें अर्थात् इस की आयु बढ़ाएं. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

त्वमीशिषे पशूनां पार्थिवानां ये जाता उत वा ये जनित्राः.
मेमं प्राणो हासीन्मो अपानो मेमं मित्रा वधिषुर्भो अमित्राः.. (३)
हे अग्नि देव! पृथ्वी पर जो पशु उत्पन्न हो चुके हैं और जो उत्पन्न होने वाले हैं, तुम उन
के स्वामी हो. प्राण और अपान वायु इस बालक का त्याग न करें. मित्र एवं शत्रु इस का वध न
करें. (३)
द्यौष्ट्वा पिता पृथिवी माता जरामृत्युं कृणुतां संविदाने.
यथा जीवा अदितेरुपस्थे प्राणापानाभ्यां गुपितः शतं हिमाः.. (४)
हे बालक! द्यौ तेरा पिता और पृथ्वी तेरी माता है. ये दोनों एकमत हो कर तुझे दीर्घ आयु
प्रदान करें, जिस से तू पृथ्वी की गोद में प्राण और अपान वायु से सुरक्षित हो कर सौ वर्ष तक
जीवित रहे. (४)
इममग्न आयुषे वर्चसे नय प्रियं रेतो वरुण मित्र राजन्.
मातेवास्मा अदिते शर्म यच्छ विश्वे देवा जरदष्टिर्यथासत्.. (५)
हे अग्नि देव! इस बालक को दीर्घ जीवन प्रदान करो एवं तेजस्वी बनाओ. हे तेजस्वी
वरुण एवं मित्र देव! इसे पुत्र उत्पन्न करने योग्य वीर्य प्रदान करो. हे अदिति! तुम माता के
समान इस बालक को सुख प्रदान करो. हे समस्त देवो! यह ऐसा हो कि इस का शरीर
वृद्धावस्था को प्राप्त करे. (५)
सूक्त-२९ देवता—अग्नि, सूर्य आदि
पार्थिवस्य रसे देवा भगस्य तन्वो ३ बले.
आयुष्यमस्मा अग्निः सूर्यो वर्च आ धाद् बृहस्पतिः.. (१)
पृथ्वी संबंधी पदार्थों के रस को पीने वाले पुरुष को इंद्र आदि देव भग देवता के समान
बली बनाएं. सूर्य इस पुरुष को दीर्घ आयु प्रदान करें. सब के प्रेरक आदित्य एवं बृहस्पति इसे
तेज प्रदान करें. (१)
आयुरस्मै धेहि जातवेदः प्रजां त्वष्टरधिनिधेह्यस्मै.
रायस्पोषं सवितरा सुवास्मै शतं जीवाति शरदस्तवायम्.. (२)
हे जातवेद अग्नि! इसे सौ वर्ष की दीर्घ आयु प्रदान करो. हे त्वष्टा देव! इस के लिए
अधिक संतान स्थापित करो. हे सब के प्रेरक सविता देव! इस के लिए धन की अधिकता को
प्रेरित करो. आप सब का यह पुत्र सौ वर्ष तक जीवित रहे. (२)
आशीर्ण ऊर्जमुत सौप्रजास्त्वं दक्षं धत्तं द्रविणं सचेतसौ.
जयं क्षेत्राणि सहसायमिन्द्र कृण्वानो अन्यानधरान्तसत्पनान्.. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*

हमारे आशीर्वाद सत्य हों. हे द्यावा पृथ्वी! इसे अन्न दो तथा उत्तम संतान वाला बनाओ.
तुम दोनों एकमत हो कर इसे बल एवं धन प्रदान करो. हे इंद्र देव! यह पुरुष अपने बल से
शत्रुओं को विजय और खेतों को अपने अधिकार में करता हुआ अपने शत्रुओं को पराजित
करे. (३)
इन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टो मरुद्भिरुग्रः प्रहितो न आगन्.
एष वां द्यावापृथिवी उपस्थे मा क्षुधन्मा तृषत्.. (४)
इंद्र से जीवन प्राप्त कर के, वरुण की अनुमति ले कर तथा मरुतों से बल प्राप्त कर के
भेजा हुआ यह हमारे समीप आया है. हे द्यावा पृथ्वी! तुम्हारी गोद में वर्तमान यह पुरुष न
कभी भूखा रहे और न कभी प्यास से व्याकुल हो. (४)
ऊर्जमस्मा ऊर्जस्वती धत्तं पयो अस्मै पयस्वती धत्तम्.
ऊर्जमस्मै द्यावापृथिवी अधातां विश्वे देवा मरुत् ऊर्जमापः.. (५)
हे शक्तिशालिनी द्यावा पृथ्वी! इस भूखे को बलकारक अन्न दो. हे जलपूर्ण द्यावा पृथ्वी!
इस प्यासे की रोग निवृत्ति के लिए जल प्रदान करो. प्रार्थना करने पर द्यावा पृथ्वी इसे अन्न दें.
विश्वे देव, मरुदगण एवं जल देवता इसे बल प्रदान करें. (५)
शिवाभिष्ठे हृदयं तर्पायम्यनमीवो मोदिषीष्ठाः सुवर्चाः.
सवासिनौ पिबतां मन्थमेतमश्विनो रूपं परिधाय मायाम्.. (६)
हे प्यासे पुरुष! मैं तेरे नीरस हृदय को सुखकारी जलों से तृप्त करता हूं. इस के पश्चात
तू रोग रहित, उत्तम तेज युक्त एवं प्रसन्न हो जाएगा. एक मत धारण करने वाले अश्विनीकुमार
मायारूप बना कर इस सत्तू को पीने के लिए शक्ति तैयार करें. (६)
इन्द्र एतां ससृजे विद्धो अग्र ऊर्जां स्वधामजरां सा त एषा.
तया त्वं जीव शरदः सुवर्चा मा त आ सुस्रोद् भिषजस्ते अक्रन्.. (७)
प्राचीन काल में वृत्रासुर के द्वारा घायल इंद्र ने प्यास से व्याकुल हो कर बलकारक अन्न
एवं वृद्धावस्था का विनाश करने वाला यह सत्तू बनाया था. वही अन्न और सत्तू तुझे दिया जा
रहा है. इस के द्वारा तू उत्तम तेज वाला बन कर सौ वर्ष तक जीवित रह. पिया हुआ सत्तू तेरे
शरीर में रह कर बल प्रदान करे. देवों के वैद्य अश्विनीकुमारों ने तेरे लिए यह ओषधि तैयार की
है. (७)
सूक्त-३० देवता—अश्विनीकुमार आदि
यथेदं भूम्या अधि तृणं वातो मथायति.
एवा मथ्नामि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे स्त्री! धरती के ऊपर पड़े हुए तिनके को वायु जिस प्रकार भ्रमित करती है, मैं तेरे मन
को उसी प्रकार चंचल बना दूंगा. इस से तू मुझे चाहने वाली बन जाएगी तथा मेरे पास से
कहीं अन्यत्र नहीं जा सकेगी. (१)
सं चेन्नयाथो अश्विना कामिना सं च वक्षथ:.
सं वां भगासो अग्मत सं चित्तानि समु व्रता.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मेरी चाही गई स्त्री को मेरे समीप ले आओ तथा मुझ कामी पुरुष से
मिला दो. हम दोनों के भाग्य एक साथ मिल जाएं. हमारे मन और कर्म भी समान हों. (२)
यत् सुपर्णा विवक्षवो अनमीवा विवक्षव:.
तत्र मे गच्छताद्भवं शल्य इव कुल्मलं यथा.. (३)
शोभन पंखों वाले कबूतर आदि पक्षी जो स्त्री विषयक बात कहने के इच्छुक होते हैं,
रोग रहित कामीजन भी वही बात कहना चाहते हैं. उस विषय में किया जाता हुआ मेरा
आह्वान उस कामिनी के लिए मैल भरे बाण के समान हो. अर्थात् वह मेरी बात सुन कर मेरे
वश में हो जाए. (३)
यदन्तरं तद् बाह्यं यद् बाह्यं तदन्तरम्.
कन्यानां विश्वरूपाणां मनो गृभायौषधे.. (४)
जो अर्थ मन में होता है, वही वाणी के द्वारा प्रकट होता है. बाहर वाणी के द्वारा जो बात
कही जाती है, वही मनुष्य के मन में रहती है. हे जड़ीबूटी! सर्व गुण संपन्न कन्या के मन को
ग्रहण करो. अर्थात् तुम्हारा लेपन करने से उस कन्या का मन मेरे वश में हो जाए. (४)
एयमगन् पतिकाम जनिकामो S हमागमम्.
अश्वः कनिक्रदद् यथा भगेनाहं सहागमम्.. (५)
पति की अभिलाषा करती हुई यह स्त्री मेरे समीप आई थी. मैं ने भी पत्नी की कामना
से इसे प्राप्त किया था. घोड़ा जिस प्रकार हिनहिनाता हुआ घोड़ी के पास जाता है, उसी
प्रकार मैं इस नारी से मिला हूं. (५)
सूक्त-३१ देवता—मही
इन्द्रस्य या मही दृषत् क्रिमेर्विश्वस्य तर्हणी.
तया पिनष्मि सं क्रिमीन् दृषदा खल्वाँ इव.. (१)
सभी कीड़ों को मारने वाली जो इंद्र की शिला है, उसी शिला के द्वारा मैं शरीर के भीतर
स्थित कीटाणुओं को उसी प्रकार मारता हूं, जिस प्रकार सिलबट्टे से चने पीसे जाते हैं. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

दृष्टमदृष्टमतृहंमथो कुरूरुमतृहम्.
अल्गण्डून्त्सर्वान्छ्छुनान् क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि.. (२)
मैं आंखों से दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले कीटाणुओं को मारता हूं. इस के
अतिरिक्त शरीर के अंतर्गत जाल के समान स्थित कीटाणुओं का भी मैं विनाश करता हूं. मैं
अपने मंत्र के बल से अलगंडू एवं शल्ग नाम के कीटाणुओं को तथा अन्य सभी कीटाणुओं
को नष्ट करता हूं. (२)
अल्गण्डून् हन्मि महता वधेन दूना अदूना अरसा अभूवन्.
शिष्टानशिष्टान् नि तिरामि वाचा यथा क्रिमीणां नकिरुच्छिषातै.. (३)
मैं हवन के साधन अन्न और जड़ीबूटियों के द्वारा रक्त तथा मांस को दूषित करने वाले
अलगंडू नाम के कीटाणुओं का वध करता हूं. मेरी जड़ीबूटी और मेरे मंत्र के द्वारा संतप्त
अथवा असंतप्त वे कीटाणु निर्जीव हो जाएं. मैं बचे हुए और पहले न मरे हुए कीटाणुओं को
अपने मंत्र के द्वारा इस प्रकार मारता हूं, जिस से अनेक प्रकार के कीटाणुओं में से एक भी न
बचे. (३)
अन्वान्त्र्यं शीर्षण्य १ मथो पार्श्वेयं क्रिमीन्.
अवस्कवं व्यध्वरं क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि.. (४)
क्रम से आंतों में होने वाले, सिर में होने वाले, तथा पसलियों में स्थित कीटाणुओं को मैं
मंत्र के द्वारा नष्ट करता हूं. ये कीटाणु शरीर में प्रवेश करने वाले एवं भांतिभांति के मार्गों से
गमन करने वाले हैं. (४)
ये क्रिमयः पर्वतेषु वनेष्वोषधीषु पशुष्वप्स्व १ न्तः.
ये अस्माकं तन्वमाविविशुः सर्वं तद्धन्मि जनिम क्रिमीणाम्.. (५)
जो कीटाणु पर्वतों में, वनों में, ओषधियों में, पशुओं में तथा जल में स्थित हैं, वे घाव के
द्वारा अथवा अन्न पान के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश कर चुके हैं. मैं इन सभी प्रकार के
कीटाणुओं की उत्पत्ति समाप्त करता हूं. (५)
सूक्त-३२ देवता—आदित्य
उद्यन्नादित्यः क्रिमीन् हन्तु निम्रोचन् हन्तु रश्मिभिः.
ये अन्त क्रिमयो गविः.. (१)
उदय होते हुए तथा अस्त होते हुए सूर्य अपनी फैलने वाली किरणों के द्वारा उन
कीटाणुओं का विनाश करे जो गाय के शरीर के भीतर स्थित हैं. (१)
विश्वरूपं चतुरक्षं क्रिमिं सारङ्गमर्जुनम्.
ebook converter DEMO Watermarks*

शृणाम्यस्य पृष्टीरपि वृश्चामि यच्छिरः.. (२)
मैं नाना आकारों वाले, चार आंखों वाले, चितकबरे रंग के एवं धवल वर्ण के कीटाणुओं
का विनाश करता हूं. मैं उन कीटाणुओं की पीठ और शीश का भी विनाश करता हूं. (२)
अत्रिवद् वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत्.
अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनष्म्यहं क्रिमीन्ः.. (३)
हे कीटाणुओ! मैं तुम्हें उसी प्रकार पुनः उत्पन्न न होने के लिए नष्ट करता हूं, जिस
प्रकार अग्नि, कण्व और जमदग्नि ऋषि ने मंत्र की शक्ति से तुम्हारा विनाश किया था. मैं
अगस्त्य ऋषि के मंत्र द्वारा सभी कीटाणुओं का विनाश करता हूं. (३)
हतो राजा क्रिमीणामुतैषां स्थपतिर्हतः.
हतो हतमाता क्रिमिर्हतभ्राता हतस्वसा.. (४)
कीटाणुओं का राजा मारा गया एवं इन का सचिव भी मारा गया. जिन कीटाणुओं की
माता, भाई और बहनें भी मारी गई थीं, वे नष्ट हो गए. (४)
हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेशसः.
अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हताः.. (५)
इन कीटाणुओं के कुल के निवास स्थान नष्ट हो गए एवं इन के घरों के आसपास के घर
भी नष्ट हो गए. इस के अतिरिक्त जो कीटाणु बीज अवस्था में थे, वे भी नष्ट हो गए. (५)
प्र ते शृणामि शृङ्गे याभ्यां वितुदायसि.
भिनद्मि ते कुषुम्भं यस्ते विषधानः.. (६)
हे कीटाणु! मैं तेरे उन सींगों को तोड़ता हूं, जिन के द्वारा तू व्यथा पहुंचाता है. मैं तेरे
कुषुंभ नामक अंग विशेष को भी विदीर्ण करता हूं जो विष को धारण करने वाला है. (६)
सूक्त-३३ देवता—यक्ष्मा का विनाश
अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि.
यक्ष्मं शीर्षम्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते.. (१)
हे यक्ष्मा रोग से पीड़ित पुरुष! मैं तेरी आंखों से, नाक से, कानों से तथा ठोड़ी से यक्ष्मा
रोग को बाहर निकालता हूं. मैं तेरे सिर में से, मस्तिष्क से तथा जीभ से यक्ष्मा रोग को बाहर
निकालता हूं. (१)
ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यत्.
ebook converter DEMO Watermarks*

यक्ष्मं दोषण्य १ संसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते.. (२)
हे यक्ष्मा रोग से पीड़ित पुरुष! मैं तेरी गरदन से, रक्त से पूर्ण नाड़ियों से, हंसली एवं
सीने की हड्डियों से, संधियों से, कंधों से तथा भुजाओं से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं.
मैं बाहुओं में होने वाले यक्ष्मा रोग को भी नष्ट करता हूं. (२)
हृदयात् ते परि क्लोम्नो हलीक्ष्णात् पार्श्वभ्याम्.
यक्ष्मं मतस्नाभ्यां प्लीह्नो यकन्स्ते वि वृहामसि.. (३)
हे रोगी! मैं तेरे हृदय से, हृदय के समीपवर्ती मांस पिंड क्लोम से, क्लोम से संबंधित
हलक्षण नामक मांस पिंड से, दोनों ओर स्थित गुरदों से, तिल्ली से एवं हृदय के समीपवर्ती
यकृत से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (३)
आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोरुदरादधि.
यक्ष्मं कुक्षिभ्यां प्लाशेर्नाभ्या वि वृहामि ते.. (४)
हे यक्ष्मा रोग से पीड़ित पुरुष! मैं तेरी आंखों से, गुदा से, बड़ी आंत से, पेट से, दोनों
कोखों से, अनेक छिद्रों वाले मलाशय से तथा नाभि से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (४)
ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पार्ष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्.
यक्ष्मं भसद्यं १ श्रोणिभ्यां भासदं भंससो वि वृहामि ते.. (५)
हे रोगी पुरुष! मैं तेरी जंघाओं से, घुटनों से, घुटनों के नीचे वाले भागों से, पैरों के पंजों
से, कमर से, नितंबों से तथा गुरदों में स्थित यक्ष्मा रोग को वहां से बाहर निकालता हूं. (५)
अस्थिभ्यस्ते मज्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः.
यक्ष्मं पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते.. (६)
हे रोगी पुरुष! मैं हड्डियों से, चरबी से, शिराओं से, धमनियों से, हाथों से, हाथों की
उंगलियों से तथा नाखूनों से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (६)
अङ्गेअङ्गे लोम्निलोम्नि यस्ते पर्वणिपर्वणि.
यक्ष्मं त्वचस्यं ते वयं कश्यपस्य वीबर्हेण विष्वञ्चं वि वृहामसि.. (७)
हे यक्ष्मा रोगी पुरुष! तेरे अंगअंग में, रोमरोम में तथा जोड़जोड़ में जो यक्ष्मा रोग है, उसे
मैं कश्यप महर्षि के मंत्रों के सूक्त के द्वारा बाहर निकालता हूं. (७)
सूक्त-३४ देवता—विश्वकर्मा
य ईशे पशुपतिः पशूनां चतुष्पदामुत यो द्विपदाम्.
ebook converter DEMO Watermarks*

निष्क्रीतः स यज्ञियं भागमेतु रायस्पोषा यजमानं सचन्ताम्.. (१)
जो पशुपति रुद्र चार पैरों वाले पशुओं और दो पैरों वाले मनुष्यों के स्वामी हैं, उन के
पास से प्राप्त किया हुआ यह यज्ञ के योग्य पशु यज्ञ का भाग बने एवं यजमान को धन की
समृद्धियां प्राप्त हों. (१)
प्रमुञ्चन्तो भुवनस्य रेतो गातुं धत्त यजमानाय देवा:.
उपाकृतं शशमानं यदस्थात् प्रियं देवानामप्येतु पाथः.. (२)
हे देवो! इस मारे जाते हुए पशु को त्याग कर जाते हुए चक्षु, प्राण आदि इसे यजमान के
लिए वीर्य के द्वारा पुण्य लोकों में जाने का मार्ग बनाएं. इस पशु में देवों का प्रिय जो मांस है,
वह भी इसे प्राप्त हो. (२)
ये बध्यमानमनु दीध्याना अन्वैक्षन्त मनसा चक्षुषा च.
अग्निष्टानग्रे प्र मुमोक्तु देवो विश्वकर्मा प्रजया संराणः.. (३)
इस यज्ञीय पशु के समूह के जो पशु इसे मारा जाता हुआ देख कर दुखी होते हैं और
दुखी मन से इसे प्रेम भरे नेत्रों द्वारा देखते हैं, अग्नि देव उन सब के लिए प्रेम का फंदा खोल
दें. अपनी सृष्टि के साथ शब्द करते हुए विश्वकर्मा भी इसे मुक्त करें. (३)
ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपा विरूपाः सन्तो बहु धैकरूपाः.
वायुष्टानग्रे प्र मुमोक्तु देवः प्रजापतिः प्रजया संराणः.. (४)
जो ग्रामीण पशु सभी रूपों से युक्त एवं विविध रूप वाले हो कर भी प्रायः एक रूप
वाले हैं, उन सब को वायु देव सब से पहले मुक्त करें. अपनी प्रजा के साथ एकमत होते हुए
प्रजापति भी बाद में इस पशु को मुक्त कराएं. (४)
प्रजानन्तः प्रति गृह्णन्तु पूर्वे प्राणमङ्गेभ्यः पर्याचरन्तम्.
दिवं गच्छ प्रति तिष्ठा शरीरैः स्वर्गं याहि पथिभिर्देवयानैः.. (५)
हे पशु! इस यज्ञ में तेरे माहात्म्य को जानते हुए अंतरिक्ष में स्थित देव तेरे अंगों की सेवा
करते हुए सभी ओर से निकल कर सामने आते हुए तेरे प्राणों को ग्रहण करें. इस के पश्चात
तुम देवों के द्वारा गृहीत हो कर स्वर्ग में जाओ तथा वहां दिव्य भोगों के प्रति स्थित बनो. इस
यज्ञ के बाद तुम देवों के मार्ग से स्वर्ग में जाओ. (५)
सूक्त-३५ देवता—विश्वकर्मा
ये भक्षयन्तो न वसून्यानृधुर्यान्नग्नयो अन्वतप्यन्त धिष्ण्याः.
या तेषामवया दुरिष्टिः स्विष्टिं नस्तां कृणवद् विश्वकर्मा.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

हम ने भोजन करते हुए पृथ्वी में धनों को गाड़ दिया है. पवित्र स्थानों में अग्नियों को
जानते हुए विश्वकर्मा हमारे यज्ञ को सफल बनाएं. जो लोग हवन नहीं करते हैं अथवा दोष
पूर्ण यज्ञ करते हैं, वे मेरे यज्ञ की सफलता देख कर शोक करें. (१)
यज्ञपतिमुषय एनसाहुर्निर्भक्तं प्रजा अनुतप्यमानम्.
मथव्यान्स्तोकानप यान् रराध सं नष्टेभिः सृजतु विश्वकर्मा.. (२)
ऋषियों ने ऐसे यजमान को पाप युक्त बताया है, जो दुर्गति वाला हो तथा जिस की
प्रजाएं उस के साथसाथ दुःखी हों. उस यजमान ने सोमरस की बूंदों को चुरा कर जो अपराध
किया है, विश्वकर्मा सोमरस की उन बूंदों से हमारे यजमान को मिलाएं. (२)
अदान्यान्सोमपान् मन्यमानो यज्ञस्य विद्वान्समये न धीरः.
यदेनश्चकृवान् बद्ध एष तं विश्वकर्मन् प्र मुञ्चा स्वस्तये.. (३)
यज्ञ का स्वरूप जानने के गर्व से मोहित तथा अपने अतिरिक्त सोम पीने वाले पंडितों
को भी अज्ञानी समझने वाला उसी प्रकार पाप करता है, जिस प्रकार संग्राम में अपने को
महाबली समझने वाला और शत्रु योद्धाओं का तिरस्कार करने वाला बंदी बन कर कष्ट उठाता
है. हे विश्वकर्मा! उस पापी को कल्याण प्राप्ति के लिए पाप से छुड़ाओ. (३)
घोरा ऋषयो नमो अस्त्वेभ्यश्चक्षुर्यदेषां मनसश्च सत्यम्.
बृहस्पतये महिष द्युमन्नमो विश्वकर्मन् नमस्ते पाह्य १ स्मान्.. (४)
जो क्रूर ऋषि अर्थात् प्राण, चक्षु आदि हैं, उन के लिए नमस्कार है. इन प्राणों और
अंतःकरण के मध्य में जो यथार्थदर्शी नेत्र हैं, उन के लिए भी नमस्कार है. बृहस्पति देव के
लिए भी इसी प्रकार का दीप्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण नमस्कार है. हे विश्वकर्मा, आप को
नमस्कार है, आप हमारी रक्षा करें. (४)
यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि.
इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा देवा यन्तु सुमनस्यमानाः.. (५)
यज्ञ के नेत्र, यज्ञ के आदि रूप एवं मुख रूप अग्नि के प्रति मैं वाणी, कान तथा मन के
द्वारा हवन करता हूं. विश्वकर्मा के द्वारा विस्तृत इस यज्ञ में समस्त देव एकमत हो कर आएं.
(५)
सूक्त-३६ देवता—अग्नि आदि
आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सह नो भगेन.
जुष्टा वरेषु समनेषु वल्गुरोषं पत्या सौभगमस्त्वस्यै.. (१)
हे अग्नि देव! हमारी मान्यता के अनुसार, सर्व लक्षणों से युक्त एवं कन्या चाहने वाला

वर हमें प्राप्त हो तथा सौभाग्य के कारण हमारी इस कुमारी को वर प्राप्त हो, यह कुमारी
समान हृदय वाले वर को पा कर स्वयं प्रसन्न हो और उसे भी प्रसन्न करे. पति के साथ निवास
स्थान इस के लिए सौभाग्यदायक हो. (१)
सोमजुष्टं ब्रह्मजुष्टमर्यम्णा संभृतं भगम्.
धातुर्देवस्य सत्येन कृणोमि पतिवेदनम्.. (२)
सोमदेव के द्वारा सेवित, ब्रह्म से अथवा गंधर्व से युक्त, विवाह की अग्नि से स्वीकृत
कन्या रूपी भाग्य को देवों की आज्ञा के अनुसार यथार्थ वचन से मैं मनुष्य अर्थात् वर को
प्राप्त कराता हूं. (२)
इयमग्ने नारी पतिं विदेष्ट सोमो हि राजा सुभगां कृणोति.
सुवाना पुत्रान् महिषी भवाति गत्वा पतिं सुभगा वि राजतु.. (३)
हमारी यह कन्या पति को प्राप्त करे, जिस से सोम राजा इसे सौभाग्यशालिनी बनाएं.
विवाह के पश्चात यह पुत्रों को जन्म देती हुई श्रेष्ठ पत्नी सिद्ध हो. इस प्रकार यह पति को पा
कर सौभाग्ययुक्त एवं सुशोभित हो. (३)
यथाखरो मघवंच्छारुरेषप्रियो मृगाणां सुषदा बभूव.
एवा भगस्य जुष्टेयमस्तु नारी सम्प्रिया पत्याविराधयन्ती.. (४)
जिस प्रकार प्रशंसनीय भोज्य पदार्थों से युक्त, शोभन एवं पशुओं के आवास वाला यह
प्रदेश प्रिय एवं सुखद होता है, उसी प्रकार यह कन्या पति के साथ प्रसन्नता देने वाली वस्तुएं
बनाती हुई सुख समृद्धि प्राप्त करे. (४)
भगस्य नावमा रोह पूर्णामनुपदस्वतीम्.
तयोपप्रतारय यो वरः प्रतिकाम्यः.. (५)
हे कन्या! तू भाग्य के साधनों से पूर्ण एवं विनाशरहित नाव पर सवार हो. इस नाव के
सहारे तू अपने मनचाहे पति को प्राप्त कर. (५)
आ क्रन्दय धनपते वरमामनसं कृणु.
सर्वं प्रदक्षिणं कृणु यो वरः प्रतिकाम्यः.. (६)
हे धनपति कुबेर! पति के द्वारा यह कहलवाओ कि यह कन्या मेरी पत्नी बने. इस वर
को कन्या की ओर अभिमुख करो तथा सभी प्राणियों को इस के विवाह के अनुकूल कार्य
करने वाला बनाओ. यह कन्या अपना मनचाहा पति प्राप्त करे. (६)
इदं हिरण्यं गुल्गुल्वयमौक्षो अथो भगः.
एते पतिभ्यस्त्वामदुः प्रतिकामय वेत्तवे.. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

सोने के आभूषण, धूपन का द्रव्य गूगल, लेपन का द्रव्य तथा औक्ष अलंकारों के
अधिष्ठाता देव भग ने तुझे गंधर्व तथा अग्नि द्वारा अभिलषित पति को प्राप्त करने के हेतु दिए
हैं. (७)
आ ते नयतु सविता नयतु पतिर्यः प्रतिकाम्यः.
त्वमस्यै धेह्योषधे.. (८)
हे कन्या! सब के प्रेरक सविता देव तेरे लिए मनचाहे वर को लाएं. वह भी तुझ से
विवाह कर के तुझे अपने घर ले जाए. हे जड़ीबूटी! तुम इस कुमारी के लिए पति प्रदान करो.
(८)