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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१७ देवता—अपामार्ग, वनस्पति

तानु ते सर्वाननुसंदिशामि.. (९) हे अमुक शत्रु, अमुक गोत्र वाले एवं अमुक के पुत्र, मैं तुझे वरुण के इन सभी पाशों से बांधता हूं. (९) सूक्त-१७ देवता—अपामार्ग, वनस्पति ईशानां त्वा भेषजानामुज्जेष आरभामहे. चक्रे सहस्रवीर्य सर्वस्मा ओषधे त्वा.. (१) हे सहदेवी! तू जड़ीबूटियों की स्वामिनी है. मैं शत्रु द्वारा किए गए अभिचार के दोष को शांत करने के लिए तेरा स्पर्श करता हूं. मैं अभिचार से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिए तुझे सामर्थ्य वाली बनाता हूं. (१) सत्यजितं शपथयावनीं सहमानां पुनःसराम्. सर्वाः समह्व्योषधीरिरतो नः पारयादिति.. (२) वास्तव में अभिचार आदि दोषों को दूर करने वाली सत्यजित, दूसरे के आक्रोश को मिटाने वाली शपथ योगिनी, सब को पराजित करने वाली सहमाना, बारबार व्याधि का विनाश करने वाली पुनःसरा नामक जड़ीबूटी को अन्य जड़ीबूटियां अभिचार दोष का नाश करने के लिए प्राप्त होती हैं. (२) या शशाप शपनेन याघं मूरमादधे. या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा.. (३) जिस पिशाची ने आक्रोश में भर कर हमें शाप दिया है, जिस ने मूर्च्छा प्रदान करने वाला पाप हमारी ओर भेजा है और जो शरीर के रक्त आदि का हरण करने के लिए मेरे पुत्र आदि का आलिंगन करती है, वह मेरे ऊपर अभिचार करने वाले शत्रु के पुत्र को खा जाए. (३) यां ते चक्रुराम पात्रे यां चक्रुर्नीललोहिते. आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुस्तया कृत्याकृतो जहि.. (४) हे कृत्या नाम की राक्षसी! अभिचार करने वालों ने तुझे मिट्टी के बिना पके पात्र में धुआं उगलती हुई नीली और लाल ज्वालाओं वाली अग्नियों में तथा बिना पके मांस में अभिमंत्रित किया है, तू उन का विनाश कर. (४) दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभ्वमराय्यः. दुर्णीम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन्नाशयामसि.. (५) हम अभिचार द्वारा सताए हुए इस पुरुष से बुरे स्वप्न संबंधी भय को, दुष्ट जीवन वाले ebook converter DEMO Watermarks*

लोगों संबंधी भय को, राक्षसों संबंधी भय को और महान अभिचार से उत्पन्न भय के कारण को नष्ट करते हैं. दरिद्रता के कारण पाप लक्ष्मियां, छेदिका, भेदिका आदि दुष्ट नामों वाली जो पिशाचियां हैं, मैं उन्हें भी इस के शरीर से दूर भगाता हूं. (५) क्षुधामारं तृष्णामारमगोतामनपत्यताम्. अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे.. (६) हे अपामार्ग! हम तेरी सहायता से भूख की पीड़ा से पुरुष को मारने वाले एवं प्यास की अधिकता से पुरुष की मृत्यु करने वाले अभिचार का विनाश करते हैं. हम तेरी सहायता से गायों के अभाव को और संतानहीनता को भी समाप्त करते हैं. (६) तृष्णामारं क्षुधामारमथो अक्षपराजयम्. अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे.. (७) हे अपामार्ग! हम तेरी सहायता से प्यास की पीड़ा से पुरुष को मारने वाले, भूख की पीड़ा से पुरुष को मारने वाले अभिचार एवं जुए में पराजय को दूर भगाना चाहते हैं. (७) अपामार्ग ओषधीनां सर्वासानेक इद वशी. तेन ते मृज्म आस्थितमथ त्वमगदश्वर.. (८) हे अभिचार के दोष से गृहीत पुरुष! एकमात्र अपामार्ग ही सब जड़ीबूटियों को वश में करने वाला है. हम अपामार्ग की सहायता से तुझ में अभिचार द्वारा उत्पन्न रोग आदि को दूर करते हैं. इस के पश्चात तू रोग रहित हो कर विचरण कर. (८) सूक्त-१८ देवता—अपामार्ग, वनस्पति समं ज्योतिः सूर्येणाह्ना रात्री समावती. कृणोमि सत्यमूतये ऽ रसाः सन्तु कृत्वरीः.. (१) सूर्य से उस का ज्योतिर्मंडल कभी अलग नहीं होता. रात्रि दिन के समान विस्तार वाली होती है, उसी प्रकार मैं यथार्थ कर्म करता हूं. मैं अभिचार से पीड़ित पुरुष की रक्षा के लिए विनाश करने वाली कृत्याओं को कार्य करने में असमर्थ बनाता हूं. (१) यो देवाः कृत्यां कृत्वा हरादविदुषो गृहम्. वत्सो धारुरिव मातरं तं प्रत्यगुप पद्यताम्.. (२) हे देवो! जो मनुष्य मंत्रों और ओषधि के द्वारा पीड़ा पहुंचाने वाली कृत्या के निर्माण हेतु उस के घर जाता है. जिस प्रकार बछड़ा गाय के पीछेपीछे जाता है, उसी प्रकार वह कृत्या अभिचार करने वाले पुरुष के समीप जाए. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

अमा कृत्वा पाप्मानं यस्तेनान्यं जिघांसति. अश्मानस्तस्यां दग्धायां बहुलाः फट् करिक्रति.. (३) जो शत्रु अनुकूल के समान साथ रह कर कृत्या निर्माण रूपी पाप करता है और उस के द्वारा उस मनुष्य को मारना चाहता है, जिस के प्रति उस का द्वेष होता है. उस कृत्या के प्रतिकार के द्वारा प्रभावहीन होने पर मेरे मंत्रों के सामर्थ्य से उत्पन्न पाषाण कृत्या बनाने वाले शत्रु की हिंसा करें. (३) सहस्रधामन् विशिखान् विग्रीवाञ्छायया त्वम्. प्रति स्म चकृषे कृत्यां प्रियां प्रियावते हर.. (४) हे हजार स्थानों में होने वाली सहदेवी! तू हमारे शत्रुओं के केशों एवं ग्रीवा को काट कर उन का विनाश कर. तू हमारे शत्रुओं का हित करने वाली कृत्या को उन्हीं की ओर लौटा दे, जिन्होंने उस का निर्माण किया है. (४) अनयाहमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम्. यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु.. (५) इस सहदेवी नाम की जड़ीबूटी के द्वारा मैं ने सभी कृत्याओं को दूषित एवं प्रभावहीन बना दिया है. मेरे शत्रुओं ने जिस कृत्या को मेरे खेतों में, मेरी गोशाला में और वायु संचार वाले स्थान में गाड़ दिया है, उन सभी कृत्याओं को मैं प्रभावहीन कर चुका हूं. (५) यश्चकार न शशाक कर्तुं शश्रे पादमङ्गुरिम्. चकार भद्रमस्मभ्यमात्मने तपनं तु सः.. (६) जिस शत्रु ने कृत्या का निर्माण किया है तथा उस के द्वारा मेरे एक पैर और एक उंगली को नष्ट करना चाहता है, वह मेरी हिंसा न कर सके. उस के द्वारा किया गया अभिचार कर्म मेरे मंत्र और जड़ीबूटी के प्रभाव से मेरा मंगल करे तथा कृत्या निर्माण करने वाले को जला दे. (६) अपामार्गो ऽ प मार्ष्टु क्षेत्रियं शपथश्च यः. अपाह यातुधानीरप सर्वा अराय्यः.. (७) अपामार्ग जड़ी मातापिता से होने वाले संक्रामक रोग के रूप में हम को प्राप्त क्षय, कुष्ठ, अपस्मार आदि को दूर करे. यह हमारे शत्रुओं द्वारा दिए हुए पापों को, पिशाचियों को और दरिद्रता को भी दूर करे. (७) अपमृज्य यातुधानानप सर्वा अराय्यः. अपामार्ग त्वया वयं सर्वं मृज्महे.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अपामार्ग! तुम सभी यक्षों, राक्षसों और दरिद्रता उत्पन्न करने वाली पिशाचियों को मुझ से दूर करो. हम यक्ष, राक्षस एवं पिशाचियों द्वारा किए हुए सभी दुःखों को तुम्हारे द्वारा प्रभावहीन करते हैं. (८) सूक्त-१९ देवता—अपामार्ग वनस्पति उतो अस्यबन्धुकृदुतो असि नु जामिकृत्. उतो कृत्याकृतः प्रजां नडमिवा च्छिन्धि वार्षिकम्.. (१) हे अपामार्ग अथवा सहदेवी! तू शत्रुओं और विरोधियों का विनाश करने में समर्थ है. तू कृत्या का प्रयोग करने वाले के पुत्र, पौत्र आदि को वर्षा ऋतु में उत्पन्न होने वाली नड नाम की घास के समान काट कर नष्ट कर दे. (१) ब्राह्मणेन पर्युक्तासि कण्वेन नार्षदेन. सेनेवैषि त्विषीमती न तत्र भयमस्ति यत्र प्राप्नोष्याषधे.. (२) हे सहदेवी अथवा अपामार्ग निषाद के पुत्र कर्ण नामक मंत्रद्रष्टा ब्राह्मण ने तेरा प्रयोग किया है. यजमान की रक्षा के लिए तू सेना के समान गमन करती है. तू जिस देश में प्राप्त होती है, वहां अभिचार संबंधी भय नहीं रहता. (२) अग्रमेष्योषधीनां ज्योतिषेवाभिदीपयन्. उत त्रातासि पाकस्याथो हन्तासि रक्षसः.. (३) हे सहदेवी अथवा अपामार्ग! तू सभी जड़ीबूटियों में उसी प्रकार श्रेष्ठ है, जिस प्रकार प्रकाश करने वालों में सूर्य! तू दुर्बल की रक्षक और उसे बाधा पहुंचाने वाले राक्षस की विनाशक है. (३) यददो देवा असुरांस्त्वयाग्रे निरकुर्वत. ततस्त्वमध्योषधे ऽ पामार्गो अजायथाः.. (४) हे ओषधि! प्राचीन काल में इंद्र आदि देवों ने तेरे द्वारा ही राक्षसों को पराजित किया था. इसी कारण तू ने अपामार्ग नाम प्राप्त किया था. (४) विभिन्दती शतशाखा विभिन्दम् नाम ते पिता. प्रत्यग् वि भिन्धि त्वं तं यो अस्मां अभिदासति.. (५) हे अपामार्ग! तू सैकड़ों शाखाओं वाली हो कर विभिंदती नाम प्राप्त करती है. तूझे उत्पन्न करने वाला विभिंद कहलाता है. जो शत्रु हमारा विनाश करना चाहता है, तू उस की विरोधी बन कर उस का विनाश कर. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

असद् भूम्याः समभवत् तद् यामेति महद् व्यचः. तद् वै ततो विधूपायत् प्रत्यक् कर्तारमृच्छतु.. (६) हे ओषधि! तेरे पास से निकल कर महान् तेज जिस भूमि तक जाता है, वहां गाड़ी गई कृत्या किसी को हानि नहीं पहुंचा सकती. तू अपने स्थान से निकल कर विशेष रूप से प्रज्वलित होती हुई कृत्या के निर्माण करने वाले को पीड़ा पहुंचा. (६) प्रत्यङ् हि संबभूविथ प्रतीचीनफलस्त्वम्. सर्वान् मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया वधम्.. (७) हे आत्माभिमुख फल देने वाले अपामार्ग! तू शत्रु के विनाश को मुझ से दूर कर के उसी के पास भेज दे. शत्रु द्वारा मेरे प्रति किए गए हिंसा साधनों और कृत्या को तू मुझ से दूर कर. (७) शतेन मा परि पाहि सहस्रेणाभि रक्ष मा. इन्द्रस्ते वीरुधां पत उग्र ओज्मानमा दधत्.. (८) हे सहदेवी अथवा अपामार्ग! तू सैकड़ों और हजारों उपायों से मेरी रक्षा कर और मुझे कृत्या के दोष से छुड़ा. हे लतारूपी जड़ीबूटियों की स्वामिनी! महा तेजस्वी इंद्र तेरा तेज मुझ में स्थापित करें. (८) सूक्त-२० देवता—जड़ीबूटी आ पश्यति प्रति पश्यति परा पश्यति पश्यति. दिवमन्तरिक्षमाद् भूमिं सर्वं तद् देवि पश्यति.. (१) हे सदापुष्पा नाम की जड़ीबूटी! यह पुरुष तेरी मणि को धारण करने वाला होने से आने वाले भय के कारण को, वर्तमान भय के कारण को तथा भविष्य काल में होने वाले भय के कारण को देखता है और दूर करना जानता है. यह स्वर्ग, अंतरिक्ष एवं पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी प्राणियों को मणि धारण के कारण देखता है. (१) तिस्रो दिवस्तिस्रः पृथिवीः षट् चेमाः प्रदिशः पृथक्. त्वयाहं सर्वा भूतानि पश्यानि देव्योषधे.. (२) हे सदापुष्पा जड़ीबूटी! तेरी मणि को धारण करने के प्रभाव से मैं तीन स्वर्गों, तीन पृथ्वियों, छह प्रदिशाओं, अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे तथा इन सब में रहने वाले सभी प्राणियों को जानता हूं. (२) दिव्यस्य सुपर्णस्य तस्य हासि कनीनिका. सा भूमिमा रुरोहिथ वह्यं श्रान्ता वधूरिव.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

हे सदापुष्पा जड़ीबूटी! तू दिव्य गरुड़ की कनीनिका अर्थात् आंख की पुतली के समान है. तू गरुड़ के नेत्र से निकल कर धरती पर उसी प्रकार उगी है, जिस प्रकार थकान के कारण चलने में असमर्थ वधू सवारी पर बैठ जाती है. (३) तां मे सहस्राक्षो देवो दक्षिणे हस्त आ दधत्. तयाहं सर्वं पश्यामि यश्च शूद्र उतार्थः.. (४) हजार आंखों वाले इंद्र देव ने उस सदा पुष्पा को मेरे दाहिने हाथ में धारण कराया है. तेरे प्रभाव से मैं सब को देखता और वश में करता हूं, चाहे वह शूद्र हो अथवा आर्य अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य. (४) आविष्कृणुष्व रूपाणि मात्मानमप गूहथाः. अथो सहस्रचक्षो त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः.. (५) हे ओषधि! तू अपने राक्षस, पिशाच आदि को दूर करने वाले रूप को प्रकाशित कर तथा अपने स्वरूप को मत छिपा. हे जड़ीबूटी! हमारी रक्षा के लिए उन राक्षसों की प्रतीक्षा कर जो छिपे हुए रूप से यह खोजते हुए घूमते हैं कि यह क्या है, यह क्या है? (५) दर्शय मा यातुधानान् दर्शय यातुधान्यः. पिशाचान्त्सर्वान् दर्शयेति त्वा रभ ओषधे.. (६) हे सदापुष्पा जड़ी! मुझे राक्षसों एवं राक्षसियों के दर्शन कराओ. वे गूढ़ रूप से मुझे बाधा न पहुंचा सकें. मैं तुम्हें इसीलिए धारण करता हूं कि तुम मुझे सभी पिशाचों को दिखाओ. (६) कश्यपस्य चक्षुरसि शुन्याश्च चतुरक्ष्याः. वीध्रे सूर्यमिव सर्पन्तं मा पिशाचं तिरस्करः.. (७) हे सदापुष्पा जड़ी! तू महर्षि कश्यप एवं चार आंखों वाली देवशुनी सरमा की आंख है अर्थात् उन की आंख के समान आकृति वाली है. अंतरिक्ष में सूर्य जिस प्रकार विचरण करते हैं, उसी प्रकार चलतेफिरते पिशाचों को तू मुझ से मत छिपा. (७) उदग्रभं परिपाणाद् यातुधानं किमीदिनम्. तेनाहं सर्वं पश्याम्युत शूद्रमुतार्यम्.. (८) खोज करने के लिए घूमते हुए राक्षसों को मैं ने अपनी रक्षा की दृष्टि से वश में कर लिया है. उस पिशाच की सहायता से मैं शूद्र एवं ब्राह्मण जाति वाले ग्रह को देखता हूं. (८) यो अन्तरिक्षेण पतति दिवं यश्चातिसर्पति. भूमिं यो मन्यते नाथं तं पिशाचं प्र दर्शय.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

जो पिशाच अंतरिक्ष से गिरता है, जो स्वर्गलोक से ऊपर गमन करता है और धरती को अपने अधिकार में मानता है, उस पिशाच को भी मुझे दिखा, जिस से मैं उस का निराकरण कर सकूं. (९) सूक्त-२१ देवता—गाएं आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे. प्रजा ऽ वती: पुरुरूपा इह स्युरिन्द्राय पूर्वीरुषसो दुहाना:.. (१) गाएं हमारी ओर आएं, हमारा कल्याण करें, हमारी गोशाला में बैठें तथा हमें दूध आदि दे कर प्रसन्न करें. श्वेत, कृष्ण आदि अनेक वर्णों की गाएं अधिक संतान वाली हो कर यजमान के घर में समृद्ध बनें तथा अधिक समय तक इंद्र के निमित्त दूध देती रहें. (१) इन्द्रो यज्वने गृणते च शिक्षत उपेद् ददाति न स्वं मुषायति. भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने खिल्ये नि दधाति देवयुम्.. (२) इंद्र स्तुति करने वाले यजमानों को गाय प्राप्त करने का उपाय बताते हैं तथा उन्हें बहुत सी गाएं प्रदान करते हैं. इंद्र उस यजमान के धन का अपहरण नहीं करते. वे उस स्तोता और यजमान के धन को अधिक मात्रा में बढ़ाते हुए उसे स्वर्ग में स्थान दिलाते हैं, जिस में दुःख नहीं होता. (२) न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासाममित्रो व्यथिरा दधर्षति. देवांश्च याभिर्यजते ददाति च ज्योगित् ताभि: सचते गोपत्ति: सह.. (३) इंद्र के द्वारा दी गई गाएं नष्ट न हों तथा उन्हें चोर न चुरा सकें. शत्रुओं के आयुध उन गायों को पीड़ा न पहुंचाएं. जिन गायों के दूध और घी के द्वारा यज्ञ किया जाता है और जिन्हें यज्ञ की दक्षिणा के रूप में दिया जाता है, उन गायों के साथ यजमान अधिक समय तक रहे, उन से वियुक्त न हो. (३) न ता अर्वा रेणुककाटो ऽ श्रुते न संस्कृतत्रमुप यन्ति ता अभि. उरुगायमभयं तस्य ता अनु गावो मर्तस्य वि चरन्ति यज्वन:.. (४) हिंसक एवं कमर के टुकड़े करने वाले बाघ आदि दुष्ट पशु उन गायों तक न पहुंचें. वे गाएं मांस पकाने वाले के समीप न जाएं एवं यजमान के भय रहित स्थान को प्राप्त हों. (४) गावो भगो गाव इन्द्रो म इच्छाद् गाव: सोमस्य प्रथमस्य भक्ष:. इमा या गाव: स जनास इन्द्र इच्छामि हृदा मनसा चिदिन्द्रम्.. (५) गाएं ही पुरुष का धन और सौभाग्य हैं. इंद्र ऐसी इच्छा करें, जिस से मुझे गाएं मिल सकें. छाना गया सोमरस गायों के दूध और दही में ही सिद्ध किया जाता है. हे मनुष्यो! ये जो ebook converter DEMO Watermarks*

गाएं दिखाई देती हैं, वे ही इंद्र हैं. इस हेतु मैं गायों के दूध, घी आदि हवि के द्वारा हृदय और ज्ञान से इंद्र का यज्ञ करना चाहता हूं. (५) यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित् कृणुथा सुप्रतीकम्. भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद् वो वय उच्यते सभासु.. (६) हे गायो! तुम अपने दूध, घी आदि से दुर्बल मनुष्य को भी मोटाताजा बनाओ तथा अशोभन अंग वाले को शोभन अवयवों वाला बनाओ. हे कल्याणी वाणी वाली गाय! हमारे घर को अलंकृत बनाओ. तुम्हारे दूध, दही, घी आदि से बना भोजन सभाओं में अधिक प्रशंसा पाता है. (६) प्रजावतीः सूयवसे रुशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः. मा व स्तेन ईशत माघशंसः परि वो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु .. (७) हे गाय! तुम उत्तम घास वाली भूमि में चलती हुई स्वच्छ जल पियो और उत्तम संतान वाली बनो. चोर तुम्हें न चुरा सके. बाघ आदि दुष्ट पशु तुम्हारी हिंसा न करें. रुद्र का आयुध तुम्हारा स्पर्श न करे. (७) सूक्त-२२ देवता—इंद्र, क्षत्रिय राजा इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियं म इमं विशामेकवृषं कृणु त्वम्. निरमित्रानक्ष्णुह्यस्य सर्वांस्तान् रन्धयास्मा अहमुत्तरेषु.. (१) हे इंद्र! मेरे इस क्षत्रिय राजा को पुत्र, पौत्र, वाहन आदि से समृद्ध बनाओ. इस राजा को तुम वीर्य वालों में प्रमुख बनाओ. जो इस के शत्रु राजा हैं, उन सब को तुम प्राण हीन कर दो. तुम सभी को इस के वश में करो. मैं भी इसे अपने मंत्रों के सामर्थ्य से इंद्र आदि लोकपालों में से एक बनाता हूं. (१) एमं भज ग्रामे अश्वेषु गोषु निष्टं भज यो अमित्रो अस्य. वर्ष्म क्षत्राणामयमस्तु राजेन्द्र शत्रुं रन्धय सर्वमस्मै.. (२) हे इंद्र! इस राजा को जनसमूह से, घोड़ों से और गायों से संयुक्त करो, इस का जो शत्रु है, उसे जन समूह आदि से अलग करो. यह राजा अन्य क्षत्रियों के शीश पर वर्तमान हो अर्थात् सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय बने. इस के सभी शत्रुओं को तुम इस के वश में करो. (२) अयमस्तु धनपतिर्धनानामयं विशां विशपतिरस्तु राजा. अस्मिन्निन्द्र महि वर्चांसि धेह्यवर्चसं कृणुहि शत्रुमस्य.. (३) हे इंद्र! यह राजा धनपतियों में उत्तम धनपति तथा प्रजातियों में उत्तम प्रजापालक हो. इस राजा में महान तेज और वीर्य धारण करो तथा इस राजा के शत्रुओं को तेजहीन बनाओ. ebook converter DEMO Watermarks*

(३) अस्मै द्यावापृथिवी भूरि वामं दुहाथां घर्मदुघे इव धेनू. अयं राजा प्रिय इन्द्रस्य भूयात् प्रियो गवामोषधीनां पशूनाम्.. (४) हे द्यावा और पृथ्वी! मेरे इस राजा के लिए धर्मदुघा गौ के समान अधिक मात्रा में धन प्रदान करो. यह राजा इंद्र का अत्यधिक प्रिय हो जाए तथा उस के कारण मैं गायों, जड़ीबूटियों और पशुओं का प्रिय बनूं. (४) युनज्मि त उत्तरावन्तमिन्द्रं येन जयन्ति न पराजयन्ते. यस्त्वा करदेकवृषं जनानामुत राज्ञामुत्तमं मानवानाम्.. (५) हे राजन्! मैं अतिशय उत्कर्ष वाले इंद्र को तुम्हारा मित्र बनाता हूं. उन इंद्र की प्रेरणा से तुम्हारे योद्धा विजयी होंगे, कभी पराजित नहीं होंगे. जिस इंद्र ने तुम्हें अन्य मनुष्यों के मध्य गायों में सांड के समान उत्तम बनाया है, उसी ने तुम्हें मनुष्यों और राजाओं में श्रेष्ठ बनाया है. (५) उत्तरस्त्वमधरे ते सपत्ना ये के च राजन् प्रतिशत्रवस्ते. एकवृष इन्द्रसखा जिगीवाञ्छत्रूयतामा भरा भोजनानि.. (६) हे राजन्! तुम श्रेष्ठ बनो तथा तुम्हारे विरोधी निम्नतम बनें. वे विरोधी तुम्हारे प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं. तुम सर्व प्रमुख एवं इंद्र के मित्र बन कर सभी पर विजय प्राप्त करो. जो तुम्हारे शत्रुओं के समान आचरण करते हैं, तुम उन के भोगसाधन धनों को छीन लो. (६) सिंहप्रतीको विशो अद्धि सर्वा व्याघ्रप्रतीको ऽ व बाधस्व शत्रून्. एकवृष इन्द्रसखा जिगीवाञ्छत्रूयतामा खिदा भोजनानि.. (७) हे राजन्! तुम सिंह के समान पराक्रमी बन कर सभी प्रजाओं पर शासन करो तथा बाघ के समान आक्रमणकारी बन कर सभी शत्रुओं को बाधा पहुंचाओ. तुम सर्व प्रमुख एवं इंद्र के मित्र बन कर सभी पर विजय प्राप्त करो. जो तुम्हारे शत्रुओं के समान आचरण करते हैं, तुम उन के भोग साधन धनों को छीन लो. (७) सूक्त-२३ देवता—अग्नि अग्नेर्मन्वे प्रथमस्य प्रचेतसः पाञ्चजन्यस्य बहुधा यमिन्धते. विशोविशः प्रविशिवांसमीमहे स नो मुञ्चत्वंहसः.. (१) मैं मुख्य विशेष ज्ञानी एवं देवयज्ञ, पितृयज्ञ, सूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और बृह्तयज्ञ नामक पांच यज्ञ करने वाले अग्नि देव का महत्त्व जानता हूं. उन्हें अनेक प्रकार से प्रज्वलित किया जाता है. सभी प्रजाओं में जठराग्नि के रूप में प्रवेश करने वाले अग्नि देव से मैं याचना करता ebook converter DEMO Watermarks*

हूं कि वह मुझे पाप से बचाएं. (१) यथा हव्यं वहसि जातवेदो यथा यज्ञं कल्पयसि प्रजानन्. एवा देवेभ्यः सुमतिं न आ वह स नो मुञ्चत्वंहसः.. (२) हे जातवेद अग्नि! तुम जिस प्रकार चरु, पुरोडाश आदि हव्य को देवों तक पहुंचाते हो तथा जिस प्रकार ज्ञान रखते हुए यज्ञ पूर्ण करते हो, उसी प्रकार हमारे विषय में देवों की उत्तम बुद्धि को लाओ. इस प्रकार के अग्नि हमें पाप से छुड़ाएं. (२) यामन्द्यामन्नुपयुक्तं वहिष्ठं कर्मन्कर्मन्नाभागममग्निमीड़े. रक्षोहणं यज्ञवृधं घृताहुतं स नो मुञ्चत्वंहसः (३) होम के आधार पर होने के कारण अनेक फल प्राप्त कराने में नियुक्त, ढोने वालों में श्रेष्ठ, अनेक यज्ञ कर्मों के द्वारा सेवनीय, राक्षसों के विनाश कर्ता, यज्ञों की वृद्धि करने वाले एवं घृत की आहुतियों से दीप्त अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. इस प्रकार के अग्नि मुझे पाप से छुड़ाएं. (३) सुजातं जातवेदसमग्निं वैश्वानरं विभुम्. हव्यवाहं हवामहे स नो मुञ्चत्वंहसः.. (४) शोभन जन्म वाले, उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता, संसार के मनुष्यों के हितैषी, व्यापक एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि का मैं आह्वान करता हूं. वह पाप से मेरी रक्षा करें. (४) येन ऋषयो बलमद्योतयन् युजा येनासुराणामयुवन्त मायाः. येनाग्निना पणीनिन्द्रो जिगाय स नो मुञ्चत्वंहसः.. (५) ऋषियों ने जिन मित्र बने हुए अग्नि की सहायता से अपना सामर्थ्य बढ़ाया, देवों ने जिन की सहायता से असुरों की माया को नष्ट किया तथा जिन अग्नि की सहायता से इंद्र ने पणियों को पराजित किया, वे अग्नि मुझे पाप से बचाए. (५) येन देवा अमृतमन्वविन्दन् येनौषधीर्मधुमतीरकृण्वन्. येन देवाः स्व १ राभरन्त्स नो मुञ्चत्वंहसः.. (६) जिस अग्नि की सहायता से देवों ने अमृत प्राप्त किया, जिन अग्नि की सहायता से जड़ीबूटियों ने मधुर रस प्राप्त किया तथा जिन की सहायता से स्वर्ग प्राप्त किया जाता है, वह अग्नि देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (६) यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते यज्जातं जनितव्यं च केवलम्. स्तौम्यग्निं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२४ देवता—इंद्र

जिस अग्नि के शासन में सारा जगत् वर्तमान है, अंतरिक्ष में ग्रह, नक्षत्र आदि प्रकाशित हैं, उत्पन्न हुए और उत्पन्न होने वाले सभी प्राणी जिन के शासन में हैं, मैं उन अग्नि की स्तुति करता हूं तथा फल की कामना से बार-बार हवन करता हूं. ऐसे अग्नि देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२४ देवता—इंद्र इन्द्रस्य मन्महे शश्वदिदस्य मन्महे वृत्रघ्न स्तोमा उप मेम आगुः. यो दाशुषः सुकृतो हवमेति स नो मुञ्चत्वंहसः.. (१) मैं बारबार इंद्र का महत्त्व स्वीकार करता हूं. वृत्र की हत्या करने वाले इंद्र के ये स्तोत्र मेरे समीप आ कर मुझे स्तोता बनाते हैं. जो इंद्र चरु, पुरोडाश आदि देने वाले एवं उत्तम यज्ञ करने वाले यजमान का आह्वान स्वीकार करते हैं, वह इंद्र मुझे पाप से बचाएं. (१) य उग्रीणामुग्रबाहुर्ययुर्यो दानवानां बलमारुरोज. येन जिताः सिन्धवो येन गावः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (२) जो इंद्र ऊपर हाथ उठा कर शत्रु सेनाओं को भगा देते हैं, जिन्होंने दानवों के बल को सभी ओर से नष्ट कर दिया है, जिन इंद्र ने मेघों में स्थित जलों को जीता था तथा जिन्होंने पणियों के द्वारा चुराई हुई गाएं प्राप्त कीं, वह हमें पाप से छुड़ाएं. (२) यश्चर्षणिप्रो वृषभः स्वर्विद् यस्मै ग्रावाणः प्रवदन्ति नृम्णम्. यस्याध्वरः सप्तहोता मदिष्ठः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (३) जो इंद्र मनुष्यों को मनचाहा फल दे कर पूर्ण करने वाले, बैल के समान शक्तिशाली और स्वर्ग प्राप्त करने वाले हैं, जिन इंद्र के लिए पत्थर सोमरस प्रदान करते हैं एवं सात होताओं से युक्त जिन इंद्र से संबंधित सोमयाग प्रसन्न करने वाला होता है, वह हमें पाप से बचाएं. (३) यस्य वशास ऋषभास उक्षणो यस्मै मीयन्ते स्वरवः स्वर्विदे. यस्मै शुक्रः पवते ब्रह्मशुम्भितः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (४) जिन इंद्र के यज्ञ के निमित्त बांझ गाएं, बैल एवं सांड़ लाए जाते हैं, स्वर्ग प्राप्त करने वाले जिन इंद्र के निमित्त यज्ञों में गांठों वाले खंभे गाड़े जाते हैं तथा जिन इंद्र के निमित्त निचोड़ने के साधनों से युक्त एवं निर्मल सोमरस छाना जाता है, वह इंद्र हमें पाप से बचाएं. (४) यस्य जुष्टिं सोमिनः कामयन्ते यं हवन्त इषुमन्तं गविष्टी. यस्मिन्नर्कः शिश्रिये यस्मिन्नोजः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (५) सोमरस वाले यजमान जिन की प्रीति की कामना करते हैं तथा जिन आयुध धारी इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

को पणियों द्वारा चुराई गई गायों की खोज के लिए बुलाया जाता है तथा जिन इंद्र के विषय में अर्चना के साधन मंत्र आश्रित हैं, वह इंद्र हमें पाप से बचाएं. (५) यः प्रथमः कर्मकृत्याय जज्ञे यस्य वीर्यं प्रथमस्यानुबुद्धम्. येनोद्यतो वज्रो ऽ भ्यायताहिं स नो मुञ्चत्वंहसः.. (६) जो इंद्र प्रमुख रूप से ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने के लिए उत्पन्न हुए थे, जिन प्रमुख इंद्र का वृत्र हनन संबंधी शौर्य कर्म प्रसिद्ध है तथा जिन के द्वारा उठाया गया वज्र सभी ओर हिंसा करता है, वह इंद्र देव मुझे पाप से बचाएं. (६) यः सङ्ग्रामान् नयति सं युधे वशी यः पुष्टानि संसृजति द्वयानि. स्तौमीन्द्रं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः.. (७) जो स्वतंत्र इंद्र प्रहार करने के लिए युद्ध करते हैं, जो पुष्ट स्त्रीपुरुषों के जोड़े बनाते हैं, मैं फल की कामना से उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं और उन के निमित्त बारबार हवन करता हूं. वह मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२५ देवता—वायु, सविता वायोः सवितुर्विदथानि मन्महे यावात्मन्वद् विशथो यौ च रक्षथः. यौ विश्वस्य परिभू बभूवथुस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१) वायु और सविता के वेदों में वर्णन किए गए कर्मों को मैं जानता हूं. हे वायु एवं सविता देव! तुम दोनों स्थावर और संगम जीवों में प्रवेश करते हो एवं रक्षा करते हो. तुम दोनों विश्व की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हो. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१) ययोः सङ्ख्याता वरिमा पार्थिवानि याभ्यां रजो युपितमन्तरिक्षे. ययोः प्रायं नान्वानशे कश्चन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२) जिन वायु और सविता देव के महत्त्व जनों के द्वारा भलीभांति प्रसिद्ध हैं, जिन दोनों के द्वारा आकाश में जल को धारण किया जाता है तथा कोई अन्य देव जिन वायु और सविता के उत्तम गमन को प्राप्त नहीं कर पाता, वे दोनों हमें पाप से मुक्त करें. (२) तव व्रते नि विशन्ते जनासस्त्वय्युदिते प्रेरते चित्रभानो. युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षथस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३) हे सविता! तुम से संबंधित कर्म में लोग नियम से लगे रहते हैं. हे विचित्र दीप्ति वाले सूर्य! तुम्हारे निकलने पर सभी लोग अपनेअपने काम में लग जाते हैं. तुम दोनों अर्थात् वायु और सविता लोकों की रक्षा करते हो. तुम दोनों हमें पाप से बचाओ. (३)

अपेतो वायो सविता च दुष्कृतमप रक्षांसि शिमिदां च सेधतम्. सं हू ३ र्जया सृजथः सं बलेन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४) हे वायु एवं सविता देव! तुम मेरे पाप को मुझ से दूर करो. उपद्रवकारी राक्षसों तथा जलती हुई कृत्या राक्षसी को यहां से दूर भगाओ. तुम ऊर्जा और बल से मेरा सृजन करो तथा मुझे पाप से बचाओ. (४) रयिं मे पोषं सवितोत वायुस्तनू दक्षमा सुवतां सुशेवम्. अयक्षमतातिं मह इह धत्तं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५) सविता और वायु मेरे लिए धन और पुष्टि को प्रेरित करें. ये दोनों मेरे शरीर में सुख एवं बल प्रदान करें. इस यजमान के शरीर में ये दोनों रोगहीनता तथा तेज धारण करें और हमें पाप से बचाएं. (५) प्र सुमतिं सवितर्वाय ऊतये महस्वन्तं मत्सरं मादयाथः. अर्वाग् वामस्य प्रवतो नि यच्छतं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६) हे सविता एवं वायु देव! हमारी रक्षा के लिए हमें उत्तम बुद्धि प्रदान करो तथा दीप्तिशाली एवं मादक सोमरस को पी कर प्रसन्न बनो. तुम दोनों उत्तम धन को हमारी ओर प्रेरित करो तथा हमें पाप से छुड़ाओ. (६) उप श्रेष्ठा न आशिषो देवयोर्धामन्नस्थिरन्. स्तौमि देवं सवितारं च वायुं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७) वायु और सविता देव के तेज के विषय में हमारी उत्तम एवं फलदायक प्रार्थनाएं उपस्थित हैं. हम धन आदि गुणों से युक्त वायु एवं सविता देव की स्तुति करते हैं. ये दोनों हमें पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२६ देवता—द्यावा, पृथिवी मन्वे वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ सचेतसौ ये अप्रथेथाममिता योजनानि. प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां ते नो मुञ्चतमंहसः.. (१) हे द्यावा पृथ्वी! तुम दोनों शोभन भोगों वाले एवं समान चित्त वाले हो. मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं. तुम दोनों अनंत योजन विस्तार वाले हो. तुम दोनों निवास करने वाले देव मनुष्यों अथवा धनों के उत्तम स्थान बनते हों. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१) प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां प्रवृद्धे देवी सुभगे ऊरूची. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (२)

सभी प्राणियों के आधार बने हुए द्यावा पृथ्वी सारे जगत् में प्रविष्ट हैं. हे दिव्य, उत्तम सौभाग्य वाले एवं व्याप्त द्यावा पृथ्वी! मेरे सुख के कारण बनो एवं मुझे पाप से बचाओ. (२) असन्तापे सुतपसौ हुवे ऽ हमुर्वी गम्भीरे कविभिर्नमस्ये. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (३) संताप रहित, उत्तम ताप वाले, गंभीर एवं विद्वानों द्वारा नमस्कार के योग्य द्यावा पृथ्वी, मेरे सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (३) ये अमृतं बिभृथो ये हवींषि ये स्त्रोत्या बिभृथो ये मनुष्यान्. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (४) जो द्यावा पृथ्वी अमृत को धारण करते हैं तथा जो चरु, पुरोडाश आदि को, नदियों को एवं मनुष्यों को धारण करते हैं, वे मेरे लिए सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (४) ये उस्रिया बिभृथो ये वनस्पतीन् ययोर्वा विश्वा भुवनान्यन्तः. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (५) जो द्यावा पृथ्वी सभी गायों को धारण करते हैं, जो सभी वृक्षों को धारण करते हैं तथा जिन दोनों के मध्य समस्त भवन हैं, वे द्यावा पृथ्वी, मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (५) ये कीलालेन तर्पयथो ये घृतेन याभ्यामृते न किं चन शक्नुवन्तिः. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (६) जो द्यावा पृथ्वी अन्न एवं घृत के द्वारा समस्त विश्व को तृप्त करते हैं, जिन दोनों के बिना मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकते, वे द्यावा पृथ्वी मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (६) यन्मेदमभिशोचति येनयेन वा कृतं पौरुषेयान्न दैवात्. स्तौमि द्यावापृथिवी नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चतमंहसः.. (७) यह पाप और उस का फल मुझे सभी ओर से जलाता है एवं इसी के कारण बारबार पाप किए जाते हैं. पुरुषों से प्रेरित पाप के समान देव कर्मों से संबंधित पाप भी मुझे जलाता है. मैं फल की कामना से द्यावा पृथ्वी की स्तुति करता हूं. ये दोनों मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२७ देवता—मरुत् मरुतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु. आशूनिव सुयमानह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

मैं उनचास मरुतों का माहात्म्य जानता हूं. वे मरुत मुझे अपना कहें. अन्न के लाभ का अवसर आने पर वे इस अन्न की मेरे लिए रक्षा करें. मैं घोड़ों की लगाम के समान संयमित मरुतों को अपनी रक्षा के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से छुड़ाएं. (१) उत्समक्षितं व्यचन्ति ये सदा य आसिञ्चन्ति रसमोषधीषु. पुरो दधे मरुतः पृश्निमातृंस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२) जो मरुत सदैव वर्षा की धाराओं से युक्त एवं विनाश रहित मेघ को आकाश में फैलाते हैं तथा गेहूं, जौ, वृक्ष आदि में रस सींचते हैं. मध्यमा वाणी जिन की माता हैं, ऐसे मरुतों को मैं अपने सामने रखता हूं. वे मुझे पाप से बचाएं. (२) पयो धेनूनां रसमोषधीनां जवमर्वतां कवयो य इन्वथ. शग्मा भवन्तु मरुतो नः स्योनास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (३) हे मरुतो! तुम क्रांतदर्शी हो कर गायों के दूध को, जड़ीबूटियों के रस को तथा घोड़ों के वेग को बढ़ाते हो. सभी कार्य करने में समर्थ वे मरुत् हमारे लिए सुखकारी हों तथा हमें पाप से बचाएं. (३) अपः समुद्राद् दिवमुद् वहन्ति दिवस्पृथिवीमभि ये सृजन्ति. ये अद्भििरीशाना मरुतश्चरन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४) जो मरुत् सागर के जल को मेघों के द्वारा अंतरिक्ष में पहुंचाते हैं, इस के पश्चात उसी जल को अंतरिक्ष से धरती पर छोड़ते हैं, उन्हीं जलों के स्वामी बन कर जो मरुत् विचरण करते हैं, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (४) ये कीलालेन तर्पयन्ति ये घृतेन ये वा वयो मेदसा संसृजन्ति. ये अद्भििरीशाना मरुतो वर्षयन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (५) मरुत् वर्षा से उत्पन्न अन्न के द्वारा एवं जलों के द्वारा जनों को तृप्त करते हैं. जो पक्षियों को चरबी से युक्त करते हैं, जो मरुत् मेघों के ईश बन कर विचरण करते हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (५) यदीदिदं मरुतो मारुतेन यदि देवा दैव्येनेद्गार. यूयमीशिध्वे वसवस्तस्य निष्कृतेस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (६) हे मरुतो! यदि मेरा दुःख अथवा दुःख का कारण पाप मुझे मरुत् संबंधी अपराध के कारण प्राप्त हुआ है, हे इंद्र आदि देवो! यदि मुझे यह दुःख देव संबंधी अपराध के कारण प्राप्त हुआ है तो हे मरुतो! इस दुःख अथवा पाप को मिटाने में तुम समर्थ हो. तुम मुझे पाप से छुड़ाओ. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२८ देवता—भव, शर्व

तिग्ममनीकं विदितं सहस्वन् मारुतं शर्धः पृतनासूग्रम्. स्तौमि मरुतो नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (७) तीक्ष्ण समय बना हुआ प्रसिद्ध एवं पराजित करने वाला मरुतों का बल सेनाओं को दुःसह होता है. उन्हीं मरुतों की मैं स्तुति करता हूं एवं उन्हें सुख प्राप्ति के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से बचाएं. (७) सूक्त-२८ देवता—भव, शर्व भवाशर्वौ मन्वे वां तस्य वित्तं ययोर्वामिदं प्रदिशि यद् विरोचते. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१) हे भव और शर्व! मैं तुम्हारा महत्त्व जानता हूं. मेरे द्वारा कहा जाता हुआ अपना महत्त्व तुम जानो. तुम दोनों के शासन में यह सारा विश्व प्रकाशित होता है. भव और शर्व शत्रुओं को अपने वज्र से संयुक्त करते हैं, इस समय क्या उत्पन्न हुआ है, ऐसी खोज करने वाले राक्षसों को भी अपने आयुध से मारो. जो भव और शर्व इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (१) ययोरभ्यध्व उत यद् दूरे चिद् यौ विदिताविषुभृतामसिष्ठौ. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२) जिन भव और शर्व के मार्ग के समीप अथवा दूर जो कुछ भी है, वह उन्हीं के अधिकार में है, जो भव और शर्व सब के द्वारा ज्ञात, वपुषधारी और बाण फेंकने में कुशल है, जो इस संसार के दो पैरों वाले मनुष्य तथा चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (२) सहस्राक्षौ वृत्रहणा हुवे ऽ हं दूरेगव्यूती स्तुवन्नेम्युग्रौ. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३) मैं हजार आंखों वाले वृत्र का व्रत करता हूं एवं दूर देश में वर्तमान भव और शर्व का आह्वान करता हूं. मैं उन्हीं शक्तिशालीयों की प्रशंसा करता हूं जो भव और शर्व इस संसार के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (३) यावारेभाथे बहु साकमग्रे प्र चेदसाष्टमभिभां जनेषु. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४) हे भव और शर्व! तुम ने सृष्टि के आदि में बहुत से प्राणियों के समूह का निर्माण किया है. इस के पश्चात उन में वीर्य की पर्याप्त मात्रा में रचना कर, जो भव और शर्व इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

ययोर्वधान्नापपद्यते कश्चनान्तर्देवेषूत मानुषेषु. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५) जिन भव और शर्व के हनन साधन आयुधों से देवों और मनुष्यों के मध्य कोई नहीं बचता तथा जो इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (५) यः कृत्याकृन्मूलकृद् यातुधानो नि तस्मिन् धत्तं वज्रमुग्रौ. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६) हे भव और शर्व! जो शत्रु कृत्या राक्षसी के द्वारा दूसरों का विनाश करता है एवं जो राक्षस वंशवृद्धि के मूल आधार संतान का विनाश करता है, इन दोनों प्रकार के शत्रुओं पर अपना वज्र छोड़ो. जो भव और शर्व इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (६) अधि नो ब्रूतं पृतनासूग्रौ सं वज्रेण सृजतं यः किमीदी. स्तौमि भवाशर्वौ नाथितो जोहवीमि तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७) हे पराजित न होने वाले भव और शर्व! हमारे विषय में पक्षपात के वचन कहो एवं संग्रामों में हमारे बल को पराजित न होने वाला बनाओ. मैं द्यावा और पृथ्वी की स्तुति करता हूं. मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२९ देवता—मित्र, वरुण मन्वे वां मित्रावरुणावृतावृधौ सचेतसौ द्रुह्वणो यौ नुदेथे. प्र सत्यावानमवथो भरेषु तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१) हे ऋत् अर्थात् सत्य, जल अथवा यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं समान ज्ञान वाले मित्र और वरुण! मैं तुम दोनों के महत्त्व की स्तुति करता हूं. तुम द्रोह करने वालों का हनन कर देते हो. तुम सत्यप्रतिज्ञ पुरुष की संग्राम में रक्षा करते हो. ऐसे मित्र और वरुण मुझे पाप से बचाएं. (१) सचेतसौ द्रुह्वणो यौ नुदेथे प्र सत्यावानमवथो भरेषु. यौ गच्छथो नृचक्षसौ बभ्रुणा सुतं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२) हे समान ज्ञान वाले मित्र और वरुण! तुम दोनों द्रोह करने वालों का पतन करते हो और सत्यप्रतिज्ञ जनों की युद्ध में रक्षा करते हो. तुम दोनों पीले रंग के रथ के द्वारा चल कर निचोड़े गए सोमरस को प्राप्त करते हो एवं मनुष्यों के कर्मों के साक्षी हो. तुम दोनों हमें पाप से बचाओ. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

यावङ्गिरसमवथो यावगस्तिं मित्रावरुणा जमदग्निमत्रिम्. यौ कश्यपमवथो यौ वसिष्ठं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३) हे मित्र और वरुण! तुम अगस्त्य, अंगिरस, जमदग्नि एवं अत्रि ऋषि की रक्षा करते हो. जिन मित्र और वरुण ने कश्यप और वसिष्ठ ऋषियों की रक्षा की, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (३) यौ श्यावाश्वमवथो वध्रयश्वं मित्रावरुणा पुरुमीढमत्रिम्. यौ विमदमवथः सप्तवध्रिं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४) जिन मित्र और वरुण ने श्यावाश्व, वध्रयश्व पुरुषमीढ एवं अत्रि की रक्षा की, जिन मित्र और वरुण ने विमद और सप्तवधि ऋषि की रक्षा की, वे हमें पाप से बचाएं. (४) यौ भरद्वाजमवथो यौ गविष्ठिरं विश्वामित्रं वरुण मित्र कुत्सम्. यौ कक्षीवन्तमवथः प्रोत कण्वं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५) हे मित्र और वरुण! तुम ने भरद्वाज, गविष्ठिर, विश्वामित्र एवं कुत्स ऋषि की रक्षा की. जिन मित्र और वरुण ने कक्षीवान तथा कण्व ऋषि की रक्षा की, वे हमें पाप से बचाएं. (५) यौ मेधातिथिमवथो यौ त्रिशोकं मित्रावरुणावुशनां काव्यं यौ. यौ गोतममवथः प्रोत मुद्गलं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६) जिन मित्र और वरुण ने मेधातिथि, त्रिशक तथा शुक्राचार्य के पुत्र उशना ऋषि की रक्षा की, जिन्होंने गोतम एवं मुद्गल ऋषि की रक्षा की, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (६) ययो रथः सत्यवर्त्मर्जुरश्मिर्मिथुया चरन्तमभियाति दूषयन्. स्तौमि मित्रावरुणौ नाथितो जोहवीमि तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७) जिन मित्र और वरुण का सत्यमार्ग पर चलने वाला एवं रस्सियों से युक्त रथ निषिद्ध मार्ग पर चलते हुए पुरुष को बाधा पहुंचाता हुआ सामने आता है, मैं ऐसे मित्र और वरुण की स्तुति करता हूं एवं सुख की इच्छा से उन के निमित्त बारबार हवन करता हूं. वे दोनों मुझे पाप से बचाएं. (७) सूक्त-३० देवता—वाक् अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः. अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा.. (१) अंभृण महर्षि की ब्रह्मवादिनी पुत्री वाक् ने स्वयं को ब्रह्म समझ कर स्तुति की है. मैं रुद्रों और वसुओं के साथ संचरण करती हूं. मैं आदित्यों और विश्वे देवों के साथ संचरण करती हूं. मित्र और वरुण को मैं ही धारण करती हूं. इंद्र, अग्नि तथा दोनों अश्विनीकुमारों को भी मैं ने ebook converter DEMO Watermarks*

ही धारण किया है. (१) अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्. तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तः.. (२) मैं ही दिखाई देने वाले विश्व का नियंत्रण करने वाली, उपासकों को फल के रूप में धन दिलाने वाली, परब्रह्म का साक्षात्कार करने वाली तथा यज्ञ के योग्य देवों में प्रमुख हूं. अनेक भाग से प्रपंचों में स्थित मुझ को उपासकों को फल देने वाले देव बहुत से साधनों में निर्धारित करते हैं. (२) अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवानामुत मानुषाणाम्. यं कामये तन्तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्.. (३) मैं ही स्वयं अनुभव किए गए ब्रह्म के विषय में लोकहित की दृष्टि से कह रही हूं. वह ब्रह्म देवों और मनुष्यों का प्रिय है. मैं जिसजिस पुरुष की रक्षा करना चाहती हूं, उसउस को बलवान बना देती हूं. मैं उसे ब्रह्म, ऋषि और उत्तम बुद्धि वाला बना देती हूं. (३) मया सो ऽ न्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्. अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धेयं ते वदामि.. (४) भोग करने वाला जो मनुष्य अन्न खाता है, वह मुझ शक्तिरूपा के द्वारा ही अन्न खाता है. जो मनुष्य विश्व को देखता है, सांस लेता है अथवा सुनता है, ये सब व्यापार शक्ति स्थानों में मैं ही करती हूं. मुझे न मानते हुए वे संसार में क्षीण होते हैं. हे सखा! मेरी कही हुई बात सुन. मैं तुझे श्रद्धा के योग्य ब्रह्म का उपदेश करती हूं. (४) अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ. अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश.. (५) मैं ब्राह्मणों के द्वेषी एवं हिंसकों को मारने के लिए महादेव का धनुष तानती हूं अर्थात् उस की डोरी खींचती हूं. मैं ही स्तोता जन के लिए संग्राम करती हूं तथा द्यावा और पृथ्वी में मैं ही प्रविष्ट हूं. (५) अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्. अहं दधामि द्रविणा हविष्मते सुप्राव्या ३ यजमानाय सुन्वते.. (६) निचोड़ने योग्य सोमरस को अथवा शत्रुओं का विनाश करने एवं स्वर्ग में स्थित सोम को मैं ही धारण करती हूं. त्वष्टा, पूषा और भव को भी मैं ही धारण करती हूं. हवि लिए हुए, देवों को हवि प्राप्त कराने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के लिए यज्ञ के फल के रूप में धन मैं ही धारण करती हूं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्व १ न्तः समुद्रे. ततो वि तिष्ठे भुवनानि विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि.. (७) इस दिखाई देने वाले प्रपंच के ऊपरी भाग अर्थात् सत्यलोक में वर्तमान इस प्रपंच के जनक को मैं जानती हूं. इस जगत् के कारण रूप मेरा उत्पत्ति स्थान सागर के जलों में स्थित हैं. तेज का कारण होने से मैं भुवनों को प्रकाशित करती हूं. मैं इस देह से स्वर्ग का स्पर्श करती हूं. (७) अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा. परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावत्ती महिम्ना सं बभूव.. (८) सभी भूतों को कारण के रूप में उत्पन्न करती हुई मैं वायु के समान वर्तमान हूं. इस आकाश और इस पृथ्वी से भिन्न रहने वाली मैं अपनी महिमा से इस प्रकार की हुई हूं. (८) सूक्त-३१ देवता—मन्यु त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणा हृषितासो मरुत्वन्. तिग्मेषव आयुधा संशिशाना उप प्र यन्तु नरो अग्निरूपा:.. (१) हे क्रोध के अभिमानी देव मन्यु! तेरे द्वारा रथ वाले शत्रु को पीड़ित करते हुए, प्रसन्न एवं क्रोध में भरे, तेज बाणों वाले तथा आयुधों की धार तेज करते हुए हमारे मनुष्य तेरी कृपा से वायु के समान वेग वाले एवं अग्नि के समान अपराजित बन कर शत्रु के पास जाएं. (१) अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि. हत्वाय शत्रून् वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व.. (२) हे मन्यु! तुम आग के समान दीप्त हो कर शत्रुओं को पराजित करो. हे सहनशील मन्यु! तुम हमारी सेना के सेनापति बन कर बुलाए जाने पर आओ और हमारे शत्रुओं को मार कर उन का धन हमें प्रदान करो. तुम शक्ति का प्रदर्शन करते हुए संग्रामकारी शत्रुओं का वध करो. (२) सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मै रुजन् मृणन् प्रमृणन् प्रेहि शत्रून्. उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्रे वशी वशं नयासा एकज त्वम्.. (३) हे मन्यु! इस राजा के शत्रु की सेना के हाथी, घोड़े आदि को कुचलते हुए एवं नष्ट करते हुए शत्रुओं को पराजित करने के लिए आओ. हे अधिक शक्तिशाली मन्यु! तुम्हारे बल को कोई रोक नहीं सकता. हे बिना सहायक के कार्य करने वाले एवं सब को वश में करने वाले मन्यु! तुम सभी जनों को स्वाधीन बनाते हो. (३) एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशंविशं युद्धाय सं शिशाधि. ebook converter DEMO Watermarks*