अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
तस्मात् ते वृत्रहा पयः क्षीरं क्रुद्धो हरद् वशे.. (१०) हे वशा गौ! जब तू अनुकूल बन कर इंद्र के समीप जाती है, तब बैल तुझे समीप से बुलाता है. इस कारण इंद्र क्रोधित हो कर तेरे मधुर दूध को दुहता है. (१०) यत् ते क्रुद्धो धनपतिरा क्षीरपहरद् वशे. इदं तदद्य नाकस्त्रिषु पात्रेषु रक्षति.. (११) हे वशा गौ! जब क्रोध में भरा हुआ धनपति अर्थात् कुबेर तेरा दूध लेता है, तो उसे स्वर्ग तीन पात्रों में सुरक्षित रखता है. (११) त्रिषु पात्रेषु तं सोममा देव्य हरद् वशा. अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये.. (१२) जहां दीक्षा धारण करने वाला अथर्ववेदी यजमान स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठा था, वहां दिव्य गुणों वाली वशा गौ ने तीन पात्रों में सोमरस को भर दिया. (१२) सं हि सोमेनागत समु सर्वेण पद्धता. वशा समुद्रमध्यष्ठाद् गन्धर्वैः कलिभिः सह.. (१३) वह वशा गौ चरणों वाले सभी मनुष्यों के साथ सोमरस ले कर आई. वह गौ कलह करने वाले गंधर्वों के साथ सागर में प्रतिष्ठा पाती रही. (१३) सं हि वातेनागत समु सर्वैः पतत्रिभिः. वशा समुद्रे प्रानृत्यदृचः सामानि बिभ्रती.. (१४) ऋचाओं और सामवेद के मंत्रों को धारण करती हुई वशा गौ सभी पक्षियों के साथ वायु के पास गई और सागर पर नृत्य करने लगी. (१४) सं हि सूर्येणागत समु सर्वेण चक्षुषा. वशा समुद्रमत्यख्यद् भद्रा ज्योतींषि बिभ्रती.. (१५) सभी नेत्रों के साथ वशा गौ सूर्य से मिली. कल्याणकारिणी उस गौ ने प्रकाश को धारण करते हुए सागर से भी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की. (१५) अभीवृता हिरण्येन यदतिष्ठ ऋतावरि. अश्वः समुद्रो भूत्वा ऽ ध्यस्कन्दद् वशे त्वा.. (१६) हे ऋतावरी अर्थात् अधिक मात्रा में दूध देने वाली गौ! तू जब सोने के आभूषणों से ढकी हुई खड़ी थी, तो हे वशा गौ! सागर घोड़ा बन कर अर्थात् घोड़े के समान तेज चाल से तेरे समीप आ गया था. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*
तद् भद्राः समगच्छन्त वशा देष्ट्र्यथो स्वधा. अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये.. (१७) यज्ञ में दीक्षित अथर्ववेद के मंत्रों का ज्ञाता ब्राह्मण जहां स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठता है, वहां भद्र पुरुष अथवा कल्याणकारी तत्त्व एकत्र होते हैं, वहां वशा गौ अन्न देने वाली एवं यज्ञ के साधन के रूप में उपस्थित होती है. (१७) वशा माता राजन्यस्य वशा माता स्वधे तव. वशाया यज्ञ आयुधं ततश्चित्तमजायत.. (१८) हे वशा गौ! तू क्षत्रिय की माता है. हे स्वधा अर्थात् अन्न! वशा गौ तेरी माता है. यज्ञ वशा गौ का आयुध है. वशा गौ में ही चित्त अर्थात् बुद्धि उत्पन्न हुई है. (१८) ऊर्ध्वो बिन्दुरुदचरद् ब्रह्मणः ककुदादधि. ततस्त्वं जज्ञिषे वशे ततो होताजायत.. (१९) ब्रह्म के ककुद अर्थात् ऊपर वाले भाग से एक बूंद उछली. हे वशा गौ! तू उसी बूंद से उत्पन्न हुई है तथा उसी बूंद से हवन करने वाले होता उत्पन्न हुए हैं. (१९) आस्नस्ते गाथा अभवन्नुष्णिहाभ्यो बलं वशे. पाजस्याज्जज्ञे यज्ञ स्तनेभ्यो रश्मयस्तव.. (२०) हे वशा गौ! तेरे मुख से गाथाएं उत्पन्न हुईं तथा तेरी गरदन से बल की उत्पत्ति हुई. तेरे ऐन से यज्ञ उत्पन्न हुआ तथा तेरे थनों से किरणें उत्पन्न हुईं. (२०) ईर्माभ्यामयनं जातं सक्थिभ्यां च वशे तव. आन्त्रेभ्यो जज्ञिरे अत्रा उदरादधि वीरुधः.. (२१) हे वशा गौ! तेरे बाहुओं अर्थात् अगली टांगों और पिछले पैरों से तेरा चलना होता है. तेरी आंतों से अनेक पदार्थ उत्पन्न हुए तथा तेरे पेट से वृक्ष उत्पन्न हुए. (२१) यदुदरं वरुणस्यानुप्राविशथा वशे. ततस्त्वा ब्रह्मोदह्वयत् स हि नेत्रमवेत् तव.. (२२) हे वशा गौ! वरुण के उदर में तेरा प्रवेश हुआ. इस के पश्चात ब्रह्म ने तेरा आह्वान किया. वही तेरा नेत्र जानता है. (२२) सर्वे गर्भादवेपन्त जायमानादसूस्र्वः. ससूव हि तामाहुर्वशेति ब्रह्माभिः क्लृप्तः स ह्यस्या बन्धुः.. (२३) प्राणहीन उत्पन्न होने वाले गर्भ से सभी कांपने लगे. उस ने कहा कि हे वशा! तू बच्चे ebook converter DEMO Watermarks*
को जन्म दे. ब्राह्मणों ने उसी को वशा का बंधु निश्चित किया. (२३) युध एकः सं सृजति यो अस्या एक इद् वशी. तरांसि यज्ञा अभवन् तरसां चक्षुरभवद् वशा.. (२४) एक योद्धा इस के समीप आता है, जो एक मात्र एक गौ को वश में करने वाला है. यज्ञ ही पार करने वाले बने. वशा गौ ही पार करने वालों की आंख बनी. अर्थात् वशा गौ के पीछे चल कर ही सब ने दुःख को पार किया. (२४) वशा यज्ञं प्रत्यगृह्णाद् वशा सूर्यमधारयत्. वशायामन्तरविशदोदनो ब्रह्मणा सह.. (२५) वशा गौ ने यज्ञ को स्वीकार किया तथा सूर्य को धारण किया. ब्रह्म अर्थात् ज्ञान के साथ ओदन अर्थात् भात वशा गौ में प्रविष्ट हुआ. (२५) वशामेवामृतमाहुर्वशां मृत्युमुपासते. वशेदं सर्वमभवद्देवा मनुष्या ३ असुराः पितर ऋषयः.. (२६) वशा गौ को ही अमृत कहा गया है. मृत्यु समझ कर भी वशा गौ की उपासना की जाती है. वशा ही यह सब हुई जैसे—देव, मनुष्य, असुर, पितर और ऋषि. (२६) य एवं विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्. तथा हि यज्ञः सर्वपाद् दुहे दात्रे ऽ नपस्फुरन्.. (२७) जो इस बात को जानता है, वही वशा गौ का दान स्वीकार करेगा. यश सभी चरणों से गति करता हुआ अर्थात् स्थिर हो कर वशा गौ का दान देने वाले को सभी पुण्य फल प्रदान करता है. (२७) तिस्रो जिह्वा वरुणस्यान्तर्दीद्यत्यासनि. तासां या मध्ये राजति सा वशा दुष्प्रतिग्रहा.. (२८) वरुण के मुख में तीन जिह्वाएं दीप्त हैं. उन के मध्य में जो विराजमान है, वही वशा है. उस को दान के रूप में स्वीकार करना कठिन काम है. (२८) चतुर्धा रेतो अभवद् वशायाः. आपस्तुरीयममृतं तुरीयं यज्ञस्तुरीयं पशवस्तुरीयम्.. (२९) वशा गौ का वीर्य अर्थात् बल चार भागों में विभाजित हुआ. जल, अमृत, यज्ञ और पशु उस के चौथे भाग हैं. (२९) वशा द्यौर्वशा पृथिवी वशा विष्णुः प्रजापतिः. ebook converter DEMO Watermarks*
वशाया दुग्धमपिबन्त्साध्या वसवश्च ये.. (३०) वशा गौ द्यौ, पृथ्वी, विष्णु और प्रजापति हैं. जो साध्य और वायु हैं, उन्होंने वशा गौ का दूध पिया. (३०) वशाया दुग्धं पीत्वा साध्या वसवश्च ये. ते वै ब्रध्नस्य विष्टपि पयो अस्या उपासते.. (३१) जो साध्य और वसु थे, वे वशा गौ का दूध पी कर स्वर्ग के स्थान में पहुंचे और सदा वशा गौ का दूध पीते हैं. (३१) सोममेनामेके दुहे घृतमेक उपासते. य एवं विदुषे वशां ददुस्ते गतास्त्रिदिवं दिवः.. (३२) कुछ ने इस वशा गौ से सोम का दोहन किया. कुछ ने इस के घृत की उपासना की अर्थात् घृत प्राप्त किया. जो इस प्रकार जानने वाले को वशा गौ का दान करते हैं, वे देवों के स्वर्ग में जाते हैं. (३२) ब्राह्मणेभ्यो वशां दत्त्वा सर्वाँल्लोकान्त्समश्रुते. ऋतं ह्यस्यामार्पितमपि ब्रह्माथो तपः.. (३३) मनुष्य ब्राह्मणों को वशा गौ दे कर सभी लोकों का सुख भोगता है. वशा गौ में सत्य, ज्ञान एवं तप आश्रित है. (३३) वशां देवा उप जीवन्ति वशां मनुष्या उत. वशेदं सर्वमभवद् यावत् सूर्यो विपश्यति.. (३४) देवगण एवं मनुष्य वशा गौ के सहारे जीवित रहते हैं. जहां तक सूर्य का प्रकाश है, वहां तक यह वशा गौ ही है. (३४) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१ देवता—ब्रह्मौदन
ग्यारहवां कांड सूक्त-१ देवता—ब्रह्मौदन अग्ने जायस्वादिर्तिनाथितेयं ब्रह्मौदनं पचति पुत्रकामा. सप्तऋषयो भूतकृतस्ते त्वा मन्थन्तु प्रजया सहेह.. (१) हे अग्नि देव! तुम अरणि मंथन से उत्पन्न हुए हो. यह देव माता अदिति पुत्र की कामना से इस ब्रह्मौदनासव नामक कर्म में ब्राह्मणों को खिलाने के हेतु भात पकाना चाहती है. मरीच आदि सप्त ऋषि पृथ्वी आदि को बनाने वाले हैं. वे इस देवयज्ञ में मंथन के द्वारा तुम्हें यजमान के पुत्र, पौत्र आदि के साथ उत्पन्न करें. (१) कृणुत धूमं वृषणः सखायोऽद्रोघाविता वाचमच्छ. अयम्अग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवा असहन्त दस्यून्.. (२) हे कामना पूर्ण करने वाले एवं जगत् के मित्र सप्त ऋषियो! तुम अरणि मंथन के द्वारा धुआं उत्पन्न करो. ये अग्नि देव स्तुति रूपी ऋचाएं सुन कर उत्तम चरित्र वाले यजमानों की शत्रुओं से रक्षा करते हैं. देवों सहित ये अग्नि देवशत्रु सेनाओं को पराजित करते हैं. अग्नि की सहायता से देवों ने राक्षसों को पराजित किया था. (२) अग्ने ऽ जनिष्ठा महते वीर्याय ब्रह्मौदनाय पक्तवे जातवेदः. सप्त ऽ ऋषयो भूतकृतस्ते त्वा ऽ जीजनन्नस्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (३) हे उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव! तुम परम सामर्थ्य के लिए अरणि मंथन से उत्पन्न होते हो. पृथ्वी आदि की रचना करने वाले सप्त ऋषियों ने तुम्हें ब्रह्मौदन पकाने के लिए उत्पन्न किया था. तुम इस पत्नी को पुत्र, पौत्र आदि वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (३) समिद्धो अग्ने समिधा सामिध्यस्व विद्वान् देवान् यज्ञियाँ एह वक्षः. तेभ्यो हविः श्रपयं जातवेद उत्तमं नाकमधि रोहयेमम् .. (४) हे प्रज्वलित अग्नि! तुम समिधाओं के द्वारा अधिक दीप्त बनो एवं यज्ञ के योग्य देवों को जानते हुए उन्हें यहां लाओ. हे जातवेद अग्नि! उन देवों के निमित्त ब्रह्मौदन रूपी हवि पकाते हुए तुम इस यजमान को उत्तम स्वर्गलोक में पहुंचाओ. (४) त्रेधा भागो निहितो यः पुरा वो देवानां पितॄणां मर्त्यानाम्. ebook converter DEMO Watermarks*
अंशान्जानीध्वं वि भजामि तान् वो यो देवानां स इमां पारयाति.. (५) तुम्हारे लिए अर्थात् अग्नि आदि देवों के लिए, पितरों के लिए और मनुष्यों के लिए पहले जो भाग तीन से विभाजित किए गए हैं, हे देव! पितर एवं मनुष्य! उन भागों को जानो. मैं तुम्हारे लिए उन भागों को अलगअलग करता हूं. उन में देवों का जो भाग है, वह अग्नि में हवि के रूप में हवन किया जा रहा है. वह देव भाग इस यजमान पत्नी को इष्ट फल प्रदान करे. (५) अग्ने सहस्वानभिमूरभीदसि नीचो न्युब्ज द्विषतः सपत्नान्. इयं मात्रा मीयमाना मिता च सजातांस्ते बलिहृतः कृणोतु .. (६) हे अग्नि देव! तुम सामर्थ्य वाले होने के कारण शत्रुओं को पराजित करते हो. तुम बुरे कर्म करने वाले हमारे शत्रुओं को नीचे की ओर मुंह कर के गिराओ. हे यजमान! कारीगर के द्वारा बनाई गई यह शाला तुझे भेंट लाने वाले पुत्र, पौत्र आदि से संपन्न करे. (६) साकं सजातैः पयसा सहैध्युदुब्जैनां महते वीर्याय. ऊर्ध्वो नाकस्याधि रोह विष्टपं स्वर्गो लोक इति यं वदन्ति .. (७) हे यजमान! तू समान जन्म वाले पुरुषों के साथ कर्मफल के सहित वृद्धि को प्राप्त हो एवं इस पत्नी को अधिक वीर्य प्राप्त करने हेतु स्वाभिमानी बने. हे यजमान! तू देहांत के पश्चात उस स्वर्ग में पहुंच, जिसे उत्तम कर्मों का फल कहा जाता है. (७) इयं मही प्रति गृह्णातु चर्म पृथिवी देवी सुमनस्यमाना. अथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम् .. (८) देवगण की यह भूमि बिछे हुए चर्म को स्वीकार करे एवं हमारे प्रति कोमल हृदय बन कर दया करे. पृथ्वी की कृपा के कारण हम यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में पहुंचें. (८) एतौ ग्रावाणौ सयुजा युङ्ग्धि चर्मणि निर्भिन्ध्यंशून् यजमानाय साधु. अवघ्नती नि जहि य इमां पृतन्यव ऊर्ध्वं प्रजामुद्धरन्त्युदूह.. (९) हे ऋत्विज्! सामने रखे हुए एवं लोहे के समान दृढ़ उलूखल और मूसल को एक साथ मिला कर बिछे हुए बैल के चमड़े पर रख लो तथा यजमान के लिए सोमलता के अंशों से बने हुए धानों को कूटो. हे पत्नी! उलूखल और मूसल से धान को कूटती हुई तू हमारी संतान को सेना की सहायता से मारने के इच्छुक शत्रुओं को बाधा पहुंचा. तू मूसल उठाती हुई हमारी संतान को उन्नत स्थान प्राप्त करो. (९) गृहाण ग्रावाणौ सकृतौ वीर हस्त आ ते देवा यज्ञिया यज्ञमगुः. त्रयो वरा यतमां स्त्वं वृणीषे तास्ते समृद्धीरिह राधयामि.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वीर अध्वर्यु! अपने हाथ में उत्तम कर्म वाले उलूखल और मूसल नाम के दो पत्थर ग्रहण करो. प्रसिद्ध एवं यज्ञ के योग्य देव तुम्हारे यज्ञ में आए हैं. हे यजमान! तू यज्ञ कर्म की समृद्धि, सांसारिक सुखों की समृद्धि और परलोक की समृद्धि— इन तीन वरों की कामना करता है. मैं इस यज्ञ के द्वारा इन तीन समृद्धियों की साधना करता हूं. (१०) इयं ते धीतिरिदमु ते जनित्रं गृह्णातु त्वामदितिः शूरपुत्रा. परा पुनीहि य इमां पृतन्यवो ऽ स्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (११) हे सूप! चावलों से भूसी को अलग करना तेरा कार्य है और यही तेरे जन्म का कारण है. शूर पुत्रों वाली देवमाता अदिति इस कार्य के लिए तुझे हाथ में लें. जो शत्रु इस पत्नी की हिंसा करने के लिए सेना ले कर आए हैं, उन की हिंसा करने के लिए तू चावलों से भूसी को अलग कर. तू इस पत्नी के लिए वीर पुत्रों एवं पौत्रों से युक्त धन अधिक मात्रा में प्रदान कर. (११) उपश्वसे द्रुवये सीदता यूयं वि विच्यध्वं यज्ञियासस्तुषैः. श्रिया समानानति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि.. (१२) हे चावलों! मैं स्थिर एवं उत्तम फल वाले कर्म के निमित्त तुम्हें अधिक बना रहा हूं. इसीलिए तुम सूप में बैठ जाओ. यज्ञ में उपयोग के योग्य तुम भूसी से अलग हो जाओ. हम भी तुम्हारे कारण उत्पन्न संपत्ति से अपने समान जन्म वाले पुरुषों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो जाएं और द्वेष करने वाले शत्रुओं को अपने पैरों में गिराएं. (१२) परेहि नारि पुनरेहि क्षिप्रमपां त्वा गोष्ठो ऽ ध्यरुक्षद् भराय. तासां गृह्णीताद् यतमा यज्ञिया असन् विभाज्य धीरीतरा जहीतात्.. (१३) हे नारी! तू मुझ से विमुख हो कर जल भरने जा और जल ले कर शीघ्र लौट आ. उस समय गायों के जल पीने का जलाशय जल भरने के हेतु तेरे शीष पर चढ़े अर्थात् उस जलाशय से जल ले कर तू जल पात्र सिर पर रख ले. जलाशय के जलों में जो जल यज्ञ के योग्य हैं, उन्हें ग्रहण करना. हे बुद्धिमती! तू यज्ञ के योग्य जलों को अलग कर के त्याग देना. (१३) एमा अगुर्योषितः शुम्भमाना उत्तिष्ठ नारि तवसं रभस्व. सुपत्नी पत्या प्रजया प्रजावत्या त्वागन् यज्ञः प्रति कुम्भं गृभाय.. (१४) हे पत्नी! शोभन अलंकारों से युक्त ये नारियां जल भरने के लिए आ गई हैं. तू भी उठ कर जल भरने के लिए तैयार हो जा. तू उत्तम पति के कारण श्रेष्ठ पत्नी एवं संतान के कारण प्रजावती है. यज्ञ तुझे जल के रूप में प्राप्त हुआ है. तू जल से भरा हुआ घड़ा ले कर आ जा. (१४) ऊर्जो भागो निहितो यः पुरा व ऋषिप्रशिष्टाप आ भरैताः. ebook converter DEMO Watermarks*
अयं यज्ञो गातुविन्नाथवित् प्रजाविदुग्रः पशुविद् वीरविद् वो अस्तु.. (१५) हे जलो! तुम्हारा जो बलकारक अंश ब्रह्मा ने बनाया था, वही इस यज्ञ में लाया जाता है. हे पत्नी! ये जल मंत्रों एवं ब्रह्मा के द्वारा अनुमति प्राप्त हैं. इन्हें तू घड़े में भर. यह तैयार किया जाता हुआ ब्रह्मौदनासव नामक यज्ञ तेरे लिए स्वर्ग के मार्ग को प्राप्त कराने वाला, चाहे गए स्वर्ग आदि फल को देने वाला, पुत्र, पौत्रों का दाता, गाय, घोड़े आदि पशुओं को प्राप्त कराने वाला एवं अनेक सेवकों को प्रदान करने वाला हो. (१५) अग्ने चरुर्यज्ञियस्त्वाध्यरुक्षच्छुचिस्तपिष्ठस्तपसा तपैैनम्. आर्षेया दैवा अभिसङ्गत्त्य भागमिमं तपिष्ठा ऋतुभिस्तपन्तु.. (१६) हे अग्नि! यज्ञ के योग्य चरु अर्थात् हवि पकाने की बटलोई तुम्हारे ऊपर स्थित हो. तुम अपने तेज से इस शुद्ध एवं तपी हुई बटलोई को अधिक तपाओ. गोत्र प्रवर्तक ऋषियों को जानने वाले ब्राह्मण एवं इंद्रादि देव अपनाअपना भाग पा कर इस बटलोई से संतुष्ट हों और इसे अधिक तपाएं. (१६) शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा आपश्चरुमव सर्पन्तु शुभ्राः. अदुः प्रजां बहुलान् पशून् नः पक्तौदनस्य सुकृतामेतु लोकम्.. (१७) शुद्ध और पवित्र स्त्रियां यज्ञ के योग्य इन श्वेत रंग के जलों को बटलोई में डालें. वे जल हमें पुत्र आदि रूप संतान और गाय, भैंस आदि पशु प्रदान करें. ब्रह्मौदन को पकाने वाला यजमान पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग को जाए. (१७) ब्रह्मणा शुद्धा उत पूता घृतेन सोमस्यांशवस्तण्डुला यज्ञिया इमे. अपः प्र विशत प्रति गृह्णातु वश्चरुरिमं पक्त्वा सुकृतामेत लोकम्.. (१८) ये चावल मंत्र के द्वारा शुद्ध तथा जल के द्वारा धोए गए एवं अमृत के अंश हैं. यज्ञ के योग्य ये चावल बटलोई में भरे हुए जल में प्रवेश करें. हे चावल! बटलोई तुम्हें स्वीकार करे. यजमान इस ब्रह्मौदन को पका कर पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त हो. (१८) उरुः प्रथस्व महता महिम्ना सहस्रपृष्ठः सुकृतस्य लोके. पितामहाः पितरः प्रजोपजा ऽ हं पक्ता पञ्चदशस्ते अस्मि.. (१९) हे भात! तू पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में अतिशय विस्तीर्ण हो और हजारों अवयवों वाला बन कर फैल. हमारे पिता, पितामह आदि सात पुरुष तेरे द्वारा तृप्त हों एवं हमारे पुत्र, पौत्र आदि सात पीढ़ियां तेरे द्वारा प्रसन्न हों. ब्रह्मौदन को पकाने वाला मैं तेरे लिए पंद्रहवां हूं. (१९) सहस्रपृष्ठः शतधारो अक्षतो ब्रह्मौदनो देवयानः स्वर्गः. ebook converter DEMO Watermarks*
अमूंस्त आ दधामि प्रजया रेषयैनान् बलिहाराय मृडतान्मह्यमेव.. (२०) हे यजमान! तेरे द्वारा किया जाता हुआ यह ब्रह्मौदनासव नाम का यज्ञ हजार शरीर वाला, अमृतमयी सौ धाराओं से युक्त, देवों तक पहुंचाने वाला तथा पल के रूप में स्वर्ग प्राप्त कराने वाला है. यह ब्रह्मौदन खाए जाने पर भी कभी समाप्त नहीं होता है. हे ब्रह्मौदन! मैं अपने सजातीय पुरुषों को तेरे सामने खड़ा करता हूं. इन्हें पुत्र, सेवक आदि प्रजा के रूप में मेरी अपेक्षा हीन बना. यह सब यज्ञ केवल तुझे ही सुखी और उत्तम बनाए. (२०) उदेहि वेदिं प्रजया वर्धयैनां नुदस्व रक्षः प्रतरं धेह्येनाम्. श्रिया समानानति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि.. (२१) हे पके हुए भात! अग्नि से उठ कर यज्ञ वेदी पर आओ. इस पत्नी को पुत्र, पौत्र रूपी प्रजा के द्वारा बढ़ाओ. यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षसों को इस स्थान से भगाओ तथा इस पत्नी को उत्तम बनाने के लिए इस का पोषण करो. (२१) अभ्यावर्तस्व पशुभिः सहैनां प्रत्यडेनां देवताभिः सहैधि. मा त्वा प्रापच्छपथो मा ऽ भिचारः स्वे क्षेत्रे अनमीवा वि राज.. (२२) हे यजमान एवं यजमान पत्नी! दूसरों के द्वारा किया हुआ आक्रोश तुम तक न पहुंचे. दूसरों के द्वारा किया हुआ मारण संबंधी जादू टोना भी तुम्हें प्राप्त न हो. तुम इस स्थान में निरोग हो कर निवास करो. हे ब्रह्मौदन! पत्नी, यजमान, आदि को गाएं, भैंसे आदि पशुओं के साथ प्राप्त हों तथा तुम यज्ञ के योग्य इन देवों के साथ यजमान के सामने खड़े होओ. (२२) ऋतेन तष्टा मनसा हितैषा ब्रह्मौदनस्य विहिता वेदिरग्रे. अंसद्रीं शुद्रामुप धेहि नारि तत्रौदनं सादय दैवानाम्.. (२३) ब्रह्मा ने इस वेदी का निर्माण किया. हिरण्यगर्भ ने इसे स्थापित किया एवं ब्रह्मौदन को पकाने के लिए महर्षियों ने इस वेदी की कल्पना की. हे पत्नी! तू देवों, पितरों और मनुष्यों के भागों को धारण करने वाली इस वेदी के समीप बैठ तथा देवों के इस भाग को पका. (२३) अदितेर्हस्तां सुचमेतां द्वितीयां सप्तऋषयो भूतकृतो यामकृण्वन्. सा गात्राणि विदुष्योदनस्य दर्विर्वेद्यामध्येनं चिनोतु.. (२४) प्राणियों की सृष्टि करने वाले सप्त ऋषियों ने देव माता अदिति के द्वितीय हाथ के रूप में होम के साधन इस करछुली को बनाया था. यह करछुली पके हुए भात के शरीरों को जानती हुई वेदी के ऊपर इस भात को स्थापित करे. (२४) शृतं त्वा हव्यमुप सीदन्तु दैवा निःसृप्याग्नेः पुनरेनान् प्र सीद. सोमेन पूतो जठरे सीद ब्रह्मणामार्षेयास्ते मा रिषन् प्राशितारः.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे पके हुए एवं हवन के योग्य भात! देव तुम्हारे समीप बैठें. तुम अग्नि के समीप से निकल कर इन्हें प्रसन्न करो. दूध, दही, रूप, अमृत से पवित्र तुम ब्राह्मणों के पेट में बैठो. अपनेअपने गोत्र और प्रवर को जानने वाले ये ब्राह्मण तुम्हें खा कर नष्ट न हों अर्थात् तुम इन की हिंसा मत करना. (२५) सोम राजन्तसंज्ञानमा वपैभ्यः सुब्राह्मणा यतमे त्वोपसीदान्. ऋषीनार्षेयांस्तपसो ऽ धि जातान् ब्रह्मोदने सुहवा जोहवीमि.. (२६) हे राजा सोम रूपी ब्रह्मोदन! इन खाने वाले ब्राह्मणों को उत्तम ज्ञान दो. इन में जो उत्तम ब्राह्मण तुम्हारे समीप बैठे हैं, उन्हें भी उत्तम ज्ञान प्राप्त कराओ. तप से उत्पन्न एवं शोभन आह्वान वाली पत्नी मैं ज्ञानी ऋषियों को ब्रह्मोदन के निमित्त बारबार बुलाती हूं. (२६) शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा ब्राह्मणां हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि. यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हमिन्द्रो मरुत्वान्तस ददादिदं मे.. (२७) पाप रहित एवं अपने संसर्ग से अन्यों को भी पवित्र करने वाले एवं यज्ञ के योग्य इन जलों को मैं धोने के प्रयोजन से ब्राह्मणों के हाथ में डालता हूं. हे जलो! मैं जिस अभिलाषा से इस समय तुम्हें सब ओर छिड़कता हूं, मरुतों से मुक्त इंद्र मेरी वह कामना पूरी करें. (२७) इदं मे ज्योतिरमृतं हिरण्यं पक्वं क्षेत्रात् कामदुघा म एषा. इदं धनं नि दधे ब्राह्मणेपु कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः.. (२८) यह स्वर्ण मेरे स्वर्ग के मार्ग की कभी न बुझने वाली ज्योति है. यह पकाया हुआ अन्न मेरी कामधेनु है. मैं दक्षिणा के रूप में दिया जाता हुआ धन ब्राह्मणों में धारण करता हूं तथा मेरे पिता, पितामह आदि के द्वारा अभिलषित जो स्वर्गलोक है, मैं उस का मार्ग बनाता हूं. (२८) अग्नौ तुषाना वप जातवेदसि परः कम्बूकां अप मृड्ढि दूरम्. एतं शुश्रुम गृहराजस्य भागमथो विद्म निर्ऋतेर्भागधेयम्.. (२९) हे ऋत्विज्! ब्रह्मोदन से अलग की गई भूसी को जातवेद अग्नि में डालो तथा कंबूकों अर्थात् फलकणों को पैर से दूर मसल दो. इस कंबूक को मैं ने गृहपति अर्थात् वास्तु देवता का भाग सुना है. इसे मैं पाप देवता निर्ऋति का भाग जानता हूं. (२९) श्राम्यतः पचतो विद्धि सुन्वतः पन्थां स्वर्गमधि रोहयैनम्. येन रोहात् परमापद्य यद् वय उत्तमं नाकं परमं व्योम.. (३०) हे ब्रह्मोदन! इन दीक्षा रूप तप करने वालों को, ब्रह्मोदन पकाने वालों को एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमानों को जानो तथा स्वर्ग के मार्ग पर स्थापित करो. उस मार्ग से चल कर यजमान उत्तम एवं दुःख रहित स्वर्ग में स्थित हो. उत्तम पक्षी बाज के समान ये जिस प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*
स्वर्ग में पहुंच सके, वैसा करो. (३०) बभ्रेरध्वर्यो मुखमेतद् वि मृड्ढ्याज्याय लोकं कृणुहि प्रविद्वान्. घृतेन गात्रानु सर्वा नि मृड्ढि कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः.. (३१) हे अध्वर्यु! ऋत्विज् का भरणपोषण करने वाले पके हुए भात का मुंह शुद्ध करो. हे विद्वान् अध्वर्यु! ओदन में घी डालने के लिए गड्ढा बनाओ. इस के पश्चात बटलोई के भाग के सभी अंगों को घी से चिकना करो. इस ओदन के द्वारा मैं पूर्वजों के अभिलषित स्वर्ग का मार्ग बनाऊंगा. (३१) बभ्रे रक्षः समदमा वपैभ्यो ऽ ब्राह्मणा यतमे त्वोपसीदान्. पुरीषिणः प्रथमानाः पुरस्तादार्षेयास्ते मा रिषन् प्राशितारः.. (३२) हे भरणशील ब्रह्मौदन! ब्राह्मणों के अतिरिक्त क्षत्रिय आदि जो तुझे खाने के लिए बैठें, उन्हें तू वह पीड़ा पहुंचा जो राक्षस पहुंचाते हैं. पूर्व में जो ऋषि गोत्र एवं प्रवर के ज्ञाता, प्रजा पशु आदि के पूरक एवं लोक में पुत्र, पौत्र आदि के द्वारा समृद्ध भृगु अंगिरा आदि के मंत्रों को जानने वाले ब्राह्मण तुझे खाते हैं, वे तुझे खा कर कष्ट प्राप्त न करें. (३२) आर्षेयेषु नि दध ओदन त्वा नानार्षेयाणामप्यस्त्यत्र. अग्निर्मे गोप्ता मरुतश्च सर्वे विश्वे देवा अभि रक्षन्तु पक्वम्.. (३३) हे भात! मैं तुम्हें ऋषि आदि को जानने वाले ब्राह्मणों में धारण करता हूं और इस प्रकार के ब्राह्मणों को तुम्हें खिलाता हूं. इस ब्रह्मौदन में ऋषि, गोत्र आदि न जानने वाले ब्राह्मणों की संभावना भी नहीं है. अग्नि देव मेरे रक्षक हैं. सभी अर्थात् उनचास मरुत् एवं विश्वे देव मेरे द्वारा पकाए हुए भात की रक्षा करें. (३३) यज्ञं दुहानं सदमित् प्रपीनं पुमांसं धेनुं सदनं रयीणाम्. प्रजामृतत्वमुत दीर्घमायू रायश्च पोषैरुप त्वा सदेम.. (३४) यह ब्रह्मौदन यज्ञों को उत्पन्न करने वाला, सदैव बढ़े हुए ऊधस्क अर्थात् एन वाला पुरुष रूपी धेनु है. हे भात! संपत्तियों के गृह रूप तुझ को खाते हुए हम पुत्र, पौत्र आदि के द्वारा अमरता, दीर्घ आयु, धन एवं समृद्धि प्राप्त करें. (३४) वृषभो ऽ सि स्वर्ग ऋषीनार्षेयान् गच्छ. सुकृतां लोके सीद तत्र नौ संस्कृतम्.. (३५) हे ब्रह्मौदन! तुम कामनाओं के पूरक एवं स्वर्गलोक में पहुंचाने वाले हो. तुम मंत्र जानने वाले ऋषियों के पास जाओ. उन के द्वारा खाए जाने पर तुम हमें पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग में पहुंचाओ. वहां हमारा और तुम्हारा संस्कार होगा. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*
समाचिनुष्वानुसंप्रयाह्यग्ने पथः कल्पय देवयानान्. एतैः सुकृतैरनु गच्छेम यज्ञं नाके तिष्ठन्तमधि सप्तरश्मौ.. (३६) हे ब्रह्मोदन! तुम अपने सभी अंगों को समूह बनाते हुए वहां जाओ, जहां तुम्हें जाना है. हे अग्नि देव! तुम भी इस ओदन के जाने हेतु देवों के जाने योग्य मार्ग बनाओ. इन देव मार्गों एवं पुण्य कर्मों के कारण हम स्वर्ग के ऊपर सूर्य मंडल में स्थित यज्ञ को प्राप्त होंगे. (३६) येन देवा ज्योतिषा द्यामुदायन् ब्रह्मोदनं पक्त्वा सुकृतस्य लोकम्. तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं स्वरारोहन्तो अभि नाकमृत्तमम्.. (३७) इंद्र आदि देव जिस ज्योति के द्वारा ब्रह्मोदनासव नामक यज्ञ पूर्ण कर के स्वर्ग को गए, वह स्वर्ग पुण्य कर्म करने वालों का लोक है. उसी देवयान मार्ग से हम भी पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्गलोक को जीतेंगे. उत्तम एवं सुखकारक लोक को लक्ष्य कर के हम स्वर्ग में पहुंचेंगे. (३७) सूक्त-२ देवता—मंत्रों में उक्त भव आदि भवाशर्वौ मृडतं माभि यातं भूतपती पशुपती नमो वाम्. प्रतिहितामायतां मा वि स्राष्टं मा नो हिंसिष्टं द्विपदो मा चतुष्पदः.. (१) हे संसार की सृष्टि करने वाले भव एवं संसार की हिंसा करने वाले शर्व! हमें सुखी करो तथा हमारी रक्षा के लिए हमारे सामने आओ. प्राणियों एवं पशुओं के पालक तुम दोनों को नमस्कार है. अपने धनुष की डोरी पर रखा हुआ बाण हमारी ओर मत छोड़ो. हमारे मनुष्यों एवं पशुओं की हिंसा मत करो. (१) शुने क्रोष्ट्रे मा शरीराणि कर्तमलिक्लवेभ्यो गृध्रेभ्यो ये च कृष्णा अविष्यवः. मक्षिकास्ते पशुपते वयांसि ते विघसे मा विदन्त.. (२) हे भव एवं शर्व! तुम हमारे शरीर को कुत्ते और सियार के खाने योग्य मत बनाओ. कातर न होने वाले गिद्धों एवं मांस की इच्छा करने वाले कौओं को भी हमारे शरीर मत खाने दो. हे पशुपति रुद्र! मक्खियां और तुम्हारे पक्षी भी भोजन की इच्छा से हमारे शरीरों को प्राप्त न करें. (२) क्रन्दाय ते प्राणाय याश्च ते भव रोपयः. नमस्ते रुद्र कृण्मः सहस्राक्षायामर्त्य.. (३) हे भव! हम तुम्हारे शब्द और प्राण वायु को नमस्कार करते हैं. हम तुम्हारे मोहक शरीरों को नमस्कार करते हैं. हे रुद्र! हे सहस्राक्ष एवं मृत्यु रहित! हम तुम्हें नमस्कार करते हैं. (३) पुरस्तात् ते नमः कृण्म उत्तरादधरादुत. ebook converter DEMO Watermarks*
अभीवर्गाद् दिवस्पर्यन्तरिक्षाय ते नमः.. (४) हे रुद्र! हम तुम्हें सामने से, उत्तर दिशा से एवं दक्षिण दिशा से नमस्कार करते हैं. प्रकाशपूर्ण आकाश के ऊपर वाले भाग में वर्तमान तुम्हारे लिए नमस्कार है. (४) मुखाय ते पशुपते यानि चक्षूंषि ते भव. त्वचे रूपाय संदृशे प्रतीचीनाय ते नमः.. (५) हे पशुपति! तुम्हारे मुख को नमस्कार है. हे भव! तुम्हारे तीन नेत्रों को नमस्कार है. तुम्हारे चर्म को, रूप को एवं सम्यक दर्शन की शक्ति को नमस्कार है. (५) अङ्गेभ्यस्त उदराय जिह्वाया आस्याय ते. दद्भ्यो गन्धाय ते नमः.. (६) हे पशुपति! तुम्हारे हाथ, पैर आदि अंगों को नमस्कार है. तुम्हारी जीभ को, मुख को, दांतों को और तुम्हारी गंध ग्राहक इंद्रिय नाक को नमस्कार है. (६) अस्त्रा नीलशिखण्डेन सहस्राक्षेण वाजिना. रुद्रेणार्धकघातिना तेन मा समरामहि.. (७) हम अस्त्र फेंकने वाले, नीले रंग के शिखंड अर्थात् मोर के पंखों से युक्त, हजार आंखों वाले, वेगशाली एवं सेना के आधे भाग का वध करने वाले रुद्र के द्वारा दुःखी न हों. (७) स नो भवः परि वृणक्तु विश्वत आप इवाग्निः परि वृणक्तु नो भवः. मा नो ऽ भि मांस्त नमो अस्त्वस्मै.. (८) बताए हुए प्रभाव वाले भव हमें सभी उपद्रवों से बचाएं. जिस प्रकार जलती हुई अग्नि जल का परित्याग करती है, उसी प्रकार भव हमें त्याग दें. वे हमें बाधा न पहुंचाएं. इस भव के लिए नमस्कार है. (८) चतुर्नमो अष्टकृत्वो भवाय दश कृत्वः पशुपते नमस्ते. तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः.. (९) शर्व को चार बार और भव को आठ बार नमस्कार है. हे पशुपति! तुम्हें दस बार नमस्कार है. हे पशुपति! भिन्नभिन्न जाति वाले पांच पशु अर्थात् गाय, घोड़े, पुरुष, बकरियां और भेड़ें तुम्हारे ही हैं. इन की रक्षा करो. (९) तव चतस्रः प्रदिशस्तव द्यौस्तव पृथिवी तवेदमुरुग्रोवं १ न्तरिक्षम्. तवेदं सर्वमात्मन्वद् यत् प्राणत् पृथिवीमनु.. (१०) हे अतिशय बलशाली रुद्र! पूर्व आदि चार दिशाएं तुम्हारे अधिकार में हैं. द्यौ, पृथ्वी, विशाल अंतरिक्ष तथा आत्मा के द्वारा भोक्ता के रूप में वर्तमान सारे शरीर तुम्हारे अधिकार ebook converter DEMO Watermarks*
में है. पृथ्वी पर जितने सांस लेने वाले हैं, वे भी तुम्हारे अधिकार में हैं. इन सब पर कृपा करने के लिए तुम्हें नमस्कार है. (१०) उरुः कोशो वसुधानस्तवायं यस्मिन्निमा विश्वा भुवनान्यन्तः. स नो मृड पशुपते नमस्ते परः क्रोष्टारो अभिभाः श्वानः परो यन्त्वघरुदो विकेश्यः.. (११) हे पशुपति! विस्तीर्ण एवं पापपुण्य रूप कर्मों को धारण करने वाला यह कोष ब्रह्मांड एवं कटाह तुम्हारा है. सभी इसी कोष के अंदर विद्यमान हैं. हे पशुपति! तुम हमें सुखी बनाओ. तुम्हें नमस्कार है. तुम्हारी कृपा से हमें पराजित करने वाले सियार एवं कुत्ते हम से दूर देश में चले जाएं. अमंगल पूर्ण रोदन करने वाली पिशाचियां भी हम से दूर चली जाएं. (११) धनुर्बिभर्षि हरितं हिरण्ययं सहस्रघ्नि शतवधं शिखण्डिन्. रुद्रस्येषुश्चरति देवहेतिस्तस्यै नमो यतमस्यां दिशी ३ तः.. (१२) हे रुद्र! तुम विश्व के संहार के लिए धनुष धारण करते हो. जो हरे रंग का, स्वर्ण निर्मित, एक बार में एक हजार जनों को तापित करने वाला तथा सौ प्राणियों का वध करने वाला है. हे मोरपंख से निर्मित मुकुट वाले रुद्र! तुम्हारे उस धनुष के लिए नमस्कार है. रुद्र देव का बाण बिना रुके सर्वत्र जाता है. यह देवों का हनन साधन है. यह बाण जिस दिशा में है, उसी दिशा में इस बाण को नमस्कार है. (१२) यो ३ भियातो निलयते त्वां रुद्र निचिकीर्षति. पश्चादनुप्रयुङ्क्ते तं विद्धस्य पदनीरिव.. (१३) हे रुद्र! जिस पुरुष पर तुम आक्रमण करते हो, वह तुम्हारे सामने नहीं ठहर पाता एवं तुम्हारी हिंसा करने की इच्छा करता है. हे देव! इस प्रकार के अपकारी पुरुष को तुम उस के अपराध के अनुसार उसी प्रकार दंड देते हो, जिस प्रकार घायल व्यक्ति के पद चिन्हों के अनुसार पहुंच कर शत्रु उस पर वार करता है. (१३) भवारुद्रौ सयुजा संविदानावुभावुग्रौ चरतो वीर्याय. ताभ्यां नमो यतमस्यां दिशी ३ तः.. (१४) भव और रुद्र मित्र बने हुए, एक मत को प्राप्त एवं शत्रुओं द्वारा अपराजेय हो कर अपना शौर्य प्रकट करने के लिए सर्वत्र घूमते हैं. इन दोनों के लिए नमस्कार है. हमारे निवास स्थान से वे जिस दिशा में वर्तमान हों, वहीं उन को नमस्कार है. (१४) नमस्ते S स्वायते नमो अस्तु परायते. नमस्ते रुद्र तिष्ठत आसीनायोत ते नमः.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे रुद्र! हमारे सम्मुख आते हुए तुम्हें नमस्कार है और हमारी ओर पीठ कर के जाते हुए तुम्हें नमस्कार है. खड़े हुए एवं अपने स्थान पर बैठे हुए तुम्हें नमस्कार है. (१५) नमः सायं नमः प्रातर्नमो रात्र्या नमो दिवा. भवाय च शर्वाय चोभाभ्यामकरं नमः.. (१६) हे रुद्र! तुम्हें सायंकाल, प्रातःकाल, रात्रि में एवं दिन में नमस्कार है. हे भव और शर्व! मैं तुम दोनों को नमस्कार करता हूं. (१६) सहस्राक्षमतिपश्यं पुरस्ताद् रुद्रमस्यन्तं बहुधा विपश्चितम्. मोपाराम जिह्वयेयमानम्.. (१७) हजार नेत्रों वाले, क्रांतदर्शी, सामने की ओर बाण चलाने वाले, मेधावी एवं भक्षण के लिए सारे संसार को अपनी जीभ के अग्र भाग से व्याप्त करने वाले रुद्र के सामने हम न जाएं. (१७) श्यावाश्वं कृष्णमसितं मृणन्तं भीमं रथं केशिनः पादयन्तम्. पूर्वे प्रतीमो नमो अस्त्वस्मै.. (१८) काले रंग वाले, काले वस्त्रों वाले, हिंसक एवं भयंकर रुद्र ने केशी नामक असुर के रथ को तोड़ कर धरती पर डाल दिया था. अन्य स्तोताओं के पूर्ववर्ती हम रुद्र को अपना रक्षक जानते हैं. ऐसे रुद्र को नमस्कार है. (१८) मा नो ऽ भि स्रा मत्यं देवहेतिं मा नः क्रुधः पशुपते नमस्ते. अन्यत्रास्मद् दिव्यां शाखां वि धूनु.. (१९) हे रुद्र! अपने दैवी बाण को हम मरणधर्माओं पर मत चलाओ. हे पशुपति! हमारे प्रति क्रोध न करो. तुम्हारे लिए नमस्कार है. शाखा के समान विस्तृत अपने दिव्य बाण को हमारी अपेक्षा अन्यत्र छोड़ो. (१९) मा नो हिंसीरधि नो ब्रूहि परि णो वृङ्ग्धि मा क्रुधः. मा त्वया समरामहि.. (२०) हे रुद्र! हमारी हिंसा मत करो. हमारे प्रति पक्षपात के वचन अधिक मात्रा में बोलो. हमें तुम अपने आयुध का लक्ष्य मत बनाओ एवं हमारे प्रति क्रोध मत करो. हम कभी भी तुम से न मिलें. (२०) मा नो गोषु पुरुषेषु मा गृधो नो अजाविषु. अन्यत्रोग्र वि वर्तय पियारूणां प्रजां जहि.. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे रुद्र! हमारी गायों, पुत्र, भृत्य आदि को मारने की इच्छा मत करो. हमारी बकरियों एवं भेड़ों की हिंसा करने की बात मत सोचो. हे शक्तिशाली रुद्र! अपना आयुध हमें छोड़ कर अन्यत्र चलाओ तथा देव हिंसकों की संतान का वध करो. (२१) यस्य तक्मा कासिका हेतिरेकमश्वस्येव वृषणः क्रन्द एति. अभिपूर्वं निर्णयते नमो अस्त्वस्मै.. (२२) ज्वर एवं खांसी जिन रुद्र के आयुध हैं, वे गर्भाधान में समर्थ घोड़े के समान शब्द करते हुए अपकारी पुरुष के पास जाते हैं. रुद्र के वे आयुध अपराधी के अपराध का विचार कर के क्रम से नाश करते हैं. ऐसे रुद्र को मेरा नमस्कार है. (२२) यो ३ न्तरिक्षे तिष्ठति विष्टभितो ऽ यज्वनः प्रमृणन् देवीपीयून्. तस्मै नमो दशभिः शक्वरीभिः.. (२३) जो रुद्र अंतरिक्ष में स्थित हो कर यज्ञ न करने वालों एवं देव हिंसकों की हत्या करते हैं, उन के लिए मेरा हाथ जोड़ कर नमस्कार है. (२३) तुभ्यमारण्याः पशवो मृगा वने हिता हंसाः सुपर्णाः शकुना वयांसि. तव यक्षं पशुपते अप्स्व १ न्तस्तुभ्यं क्षरन्ति दिव्या आपो वृधे.. (२४) हे पशुपति! वन में जन्म लेने वाले हरिण, सिंह आदि पशु एवं हंस आदि नर पक्षी तुम्हारे लिए बनाए गए हैं. तुम उन्हीं को स्वीकार करो और हमारे पशुओं का वध मत करो. तुम्हारा पूज्य स्वरूप जलों के भीतर वर्तमान है, इसलिए तुम्हारे स्नान के हेतु दिव्य जल बहते हैं. तुम हमारे उपयोग के जल को मत छुओ. (२४) शिंशुमारा अजगराः पुरीकया जषा मत्स्या रजसा येभ्यो अस्यसि. न ते दूरं न परिष्ठास्ति ते भव सद्यः सर्वान् परि पश्यसि भूमिं पूर्वस्माद्धंस्युत्तरस्मिन् त्समुद्रे.. (२५) हे रुद्र! मगर, अजगर, झष, मत्स्य आदि जलचर तुम्हारे हेतु हैं, जिन की ओर तुम अपने तेज से आयुध चलाते हो. तुम सारी भूमि को एक क्षण में ही देख लेते हो और पूर्व दिशा में वर्तमान सागर से उत्तर दिशा में स्थित सागर तक एक क्षण में ही पहुंच जाते हो. (२५) मा नो रुद्र तक्मना मा विषेण मा नः सं स्रा दिव्येनाग्निना. अन्यत्रास्मद् विद्युतं पातयैताम्.. (२६) हे रुद्र! ज्वर के द्वारा, विष के द्वारा एवं बिजली रूपी दिव्य तेज के द्वारा हमारा स्पर्श मत करो. तुम अपने प्रकाश युक्त आयुध को हमें छोड़ कर अन्यत्र गिराओ. (२६) भवो दिवो भव ईशे पृथिव्या भव आ पप्र उर्व १ न्तरिक्षम्. ebook converter DEMO Watermarks*
तस्मै नमो यतमस्यां दिशी ३ तः.. (२७) भव द्युलोक और पृथ्वी के स्वामी हैं. ये विस्तृत अंतरिक्ष को अपने तेज से पूर्ण करते हैं. ये भव और जिस दिशा में भी विद्यमान हैं, उन त्रिलोकव्यापी को उसी दिशा में नमस्कार है. (२७) भव राजन् यजमानाय मृड पशूनां हि पशुपतिर्बभूथ. यः श्रद्दधाति सन्ति देवा इति चतुष्पदे द्विपदे ऽ स्य मृड.. (२८) हे सब के स्वामी भव! यजमान को सुखी बनाओ. हे गाय, अश्व आदि पशुओं के पालको! जो मनुष्य ऐसी श्रद्धा करता है कि इंद्र आदि देव मेरे रक्षक हैं, उस मनुष्य की संतान और पशुओं की रक्षा करो. (२८) मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा नो वहन्तमुत मा नो वक्ष्यतः. मा नो हिंसीः पितरं मातरं च स्वां तन्वं रुद्र मा रीरिषो नः.. (२९) हे रुद्र! हमारे संबंधी वृद्ध की हिंसा मत करो. हमारे शिशु की तथा भार वहन के योग्य युवक की हिंसा मत करो. भार ढोने वाले सेवकों की भी हिंसा मत करो. हे रुद्र! हमारे मातापिता की तथा हमारे अपने शरीर की भी हिंसा मत करो. (२९) रुद्रस्यैलबकारेभ्यो ऽ संसूक्तगिलेभ्यः. इदं महास्येभ्यः श्वभ्यो अकरं नमः.. (३०) मैं रुद्र को प्रेरणा देने वाले कर्म करने वालों को नमस्कार करता हूं. मैं अशोभन वचन बोलने वाले रुद्र गणों को तथा शिकार के सहायक विशाल मुख वाले कुत्तों को नमस्कार करता हूं. (३०) नमस्ते घोषिणीभ्यो नमस्ते केशिनीभ्यः. नमो नमस्कृताभ्यो नमः सम्भुञ्जतीभ्यः. नमस्ते देव सेनाभ्यः स्वस्ति नो अभयं च नः.. (३१) हे रुद्र! घोष करती हुई एवं बिखरे हुए केशों वाली तुम्हारी सेनाओं को नमस्कार है. तुम्हारी चंडेश्वर सेनाओं को नमस्कार है, जिन्हें सब प्रणाम करते हैं. तुम्हारी एक साथ भोजन करती हुई सेनाओं को नमस्कार है. हे देव, तुम्हारी कृपा से हमें कुशल और निर्भयता प्राप्त हो. (३१) सूक्त-३ देवता—बृहस्पति का भोजन तस्यौदनस्य बृहस्पतिः शिरो ब्रह्म मुखम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
विराट् के रूप में कल्पित ओदन अर्थात् भात का शीश बृहस्पति और मुख ब्रह्म है. (१) द्यावापृथिवी श्रोत्रे सूर्याचन्द्रमसावक्षिणी सप्तऋषयः प्राणापानाः.. (२) द्यावा पृथिवी उस ओदन के दोनों कान, सूर्य, चंद्रमा दोनों आंखें और सात ऋषि उस के प्राण तथा अपान वायु हैं. (२) चक्षुर्मुसलं काम उलूखलम्.. (३) इस प्रकार की महिमा वाले ओदन का मूसल चक्षु और उलूखल कान हैं. (३) दितिः शूर्पमदितिः शूर्पग्राही वातो ऽ पाविनक्.. (४) असुरों की माता इस का सूप हैं, देव माता अदिति उस सूप को पकड़ने वाली हैं और वायु चावलों और भूसी का विवेचन करने वाले हैं. (४) अश्वाः कणा गावस्तण्डुला मशकास्तुषाः.. (५) ओदन संबंधी कण अश्व, चावल गाय और भूसी मशक अर्थात् मच्छर हैं. (५) कब्रु फलीकरणः शरो ऽ भ्रम्.. (६) इस ओदन का फलीकरण ही कब्रु नामक प्राणी है, जिस के सिर और भौंहों में भेद नहीं होता. आकाश में घूमता हुआ मेरु ही उस का सिर है. (६) श्याममयो ऽ स्य मांसानि लोहितमस्य लोहितम्.. (७) खनित्र अथवा फावड़े का काले रंग का लोहा इस विराट् रूप ओदन का मांस और लाल रंग का तांबा इस का रक्त है. (७) त्रपु भस्म हरितं वर्णः पुष्करमस्य गन्धः.. (८) ओदन पकाने के पश्चात होने वाली राख जस्ता है, सोना इस ओदन का रंग है और कमल इस की गंध है. (८) खलः पात्रं स्फ्यावंसावीषे अनूक्ये.. (९) खल अर्थात् खलिहान इस ओदन का पात्र तथा अनाज भरने की गाड़ी के फूले हुए भाग इस के कंधे और गाड़ी की हरसें इस ओदन के कंधों और शरीर के बीच के जोड़ है. (९) आन्त्राणि जत्रवो गुदा वरत्राः.. (१०)
सभी प्राणियों से संबंधित जो आंतें हैं, वे ही बैलों को गाड़ी में जोड़ने की रस्सियां हैं. समस्त प्राणियों के शरीर की गुदा गाड़ी और जुए को जोड़ने हेतु चमड़े की रस्सियां हैं. (१०) इयमेव पृथिवी कुम्भी भवति राध्यमानस्यौदनस्य द्यौरपिधानम्.. (११) यह दिखाई देती हुई पृथ्वी पकाए जाते हुए पूर्वोक्त ओदन को पकाने की बटलोई है तथा द्युलोक उसे ढकने का पात्र है. (११) सीता: पर्शव: सिकता ऊबध्यम्.. (१२) खेत में हल चलाने से बनने वाली रेखाएं इस ओदन की पसली की हड्डियां हैं तथा नदियों की बालू इस के पेट के भीतर के आधे पके हुए तृण हैं. (१२) ऋतं हस्तावनेजनं कुल्योपसेचनम्.. (१३) लोक में विद्यमान समस्त जल इस ओदन के हाथ धुलाने के लिए हैं तथा छोटी नदियां इस ओदन को मिलाने का साधन हैं. (१३) ऋचा कुम्भ्यधिहितार्त्विज्येन प्रेषिता.. (१४) विराट् रूप ओदन को पकाने वाली बटलोई ऋग्वेद में अग्नि पर रखी है और यजुर्वेद ने इस में आग जलाई है. (१४) ब्रह्मणा परिगृहीता साम्ना पर्यूढा.. (१५) इस ओदन को पकाने वाली बटलोई अथर्ववेद ने पकड़ी है और सामवेद ने इसे चारों ओर से अंगारों से घेर दिया है. (१५) बृहदायवनं रथन्तरं दर्वि:.. (१६) बृहत् साम पानी में डाले गए चावलों को मिलाने का काठ है तथा रथंतर साम बटलोई से भात निकालने की करछुलीस है. (१६) ऋतव: पक्तार आर्तवा: समिन्धते.. (१७) वसंत आदि ऋतुएं इस ओदन को पकाने वाली हैं और ऋतुओं संबंधी रातदिन अग्नि को जलाते हैं. (१७) चरुं पञ्चबिलमुखं घर्मो ३ भीन्धे.. (१८) गाय, अश्व, पुरुष, बकरी, भेड़ की उत्पत्ति का कारण विराट् ही चरु अर्थात् ओदन ebook converter DEMO Watermarks*
पकाने का पात्र है. सूर्य की धूप उसे गरम करती है. (१८) ओदनेन यज्ञवचः सर्वे लोकाः समाप्याः.. (१९) इस प्रकार महा प्रभाव से पके हुए ओदन के द्वारा यज्ञों से प्राप्त होने वाले सभी लोग पाए जा सकते हैं. (१९) यस्मिन्तसमुद्रो द्यौर्भूमिस्त्रयो ऽ वरपरं श्रिताः.. (२०) इस ओदन में सागर, द्यौ और भूमि ऊपरनीचे स्थित है. (२०) यस्य देवा अकल्पन्तोच्छिष्टे षडशीतयः.. (२१) यज्ञ से बचे हुए इस ओदन के अंश से चार सौ अस्सी देव शक्तिशाली बनें. (२१) तं त्वौदनस्य पृच्छामि यो अस्य महिमा महान्.. (२२) शिष्य ने प्रश्न किया—‘हे गुरु! मैं आप के इस ओदन की उस महिमा को पूछता हूं, जो अत्यधिक है.’ (२२) स य ओदनस्य महिमानं विद्यात्.. (२३) वह प्रसिद्ध गुरु है, जो इस ओदन की महिमा जाने. (२३) नाल्प इति ब्रूयान्नानुपसेचन इति नेदं च किं चेति.. (२४) गुरु ओदन की महिमा के उपदेश के समय महिमा की अल्पता का उपदेश न करे. वह ओदन दूध, घी, आदि से रहित है, ऐसा भी न कहे. वह ओदन सामने रखा है अथवा वह अनिर्दिष्ट है, ऐसा भी न कहे. (२४) यावद् दाता ऽ भिमनस्येत तन्नाति वदेत्.. (२५) ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला मन से जितना फल पाना चाहे, गुरु उस से अधिक फल न बताए. (२५) ब्रह्मवादिनो वदन्ति पराञ्चमोदनं प्राशी ३: प्रत्यञ्चा ३ मिति.. (२६) वेद के विचारक महर्षि परस्पर कहते हैं कि हे देवदत्त! तुम ने इस ओदन को पराङ्मुख हो कर खाया है अथवा आत्माभिमुख हो कर खाया है. (२६) त्वमोदनं प्राशी३स्त्वामोदना ३ इति.. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*