अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्याहिता द्यौः कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्युत्तरं दिवः.. (३) इस परमात्मा के किस अंग में भूमि स्थित रहती है? इस के किस अंग में अंतरिक्ष होता है? यह दृढ़ द्यौ इस के किस अंग में स्थित है? ऊंचा स्वर्ग इस के किस अंग में स्थित है? (३) क्व १ प्रेप्सन् दीप्यत ऊर्ध्वो अग्निः क्व १ प्रेप्सन् पवते मातरिश्वा. यत्र प्रेप्सन्तीरभियन्त्यावृतः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (४) ऊपर की ओर चलने वाली अग्नि, कहां जाने की इच्छा से प्रज्वलित होती है? वायु कहां जाने की इच्छा करती हुई चलती हैं? आवागमन के चक्कर में पड़े हुए प्राणी जहां जाने की इच्छा से गतिशील हैं, उस जगदाधार का वर्णन करो कि वह कौन है. (४) क्वार्धमासाः क्व यन्ति मासाः संवत्सरेण सह संविदानाः. यत्र यन्त्यृतवो यत्रार्तवाः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (५) संवत्सर के साथ मिलते हुए अर्धमास अर्थात् पक्ष एवं मास कहां चले जाते हैं? ये ऋतुएं और ऋतुओं से संबंधित पदार्थ कहां चले जाते हैं? उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह क्या है? (५) क्व १ प्रेप्सन्ती युवती विरूपे अहोरात्रे द्रवतः संविदाने. यत्र प्रेप्सन्तीरभियन्त्यापः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (६) परस्पर विरोधी रूप वाले युवा दिन और युवती रात कहां जाने की इच्छा से एकमत हो कर जाते हैं. जल जहां जाने की इच्छा से चले आ रहे हैं, उसी परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (६) यस्मिंस्तस्तब्ध्वा प्रजापतिर्लोकान्त्सर्वां अधारयत्. स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (७) जिस में स्थित रह कर प्रजापति समस्त लोकों को धारण करता है, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (७) यत् परममवमं यच्च मध्यमं प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम्. कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र यन्न प्राविशत् कियत् तद् बभूव.. (८) प्रजापति ने उत्तम, अधम और मध्यम के रूप में संसार की सभी वस्तुओं और प्राणियों को बनाया है. इस संसार के कितने पदार्थ प्रजापति में प्रवेश कर चुके हैं? जो प्रवेश नहीं करता, वह कौन है? (८) कियता स्कम्भः प्र विवेश भूतं कियद् भविष्यदन्वाशये ऽस्य. ebook converter DEMO Watermarks*
एकं यदङ्गमकृणोत् सहस्रधा कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र.. (९) कितने पदार्थ भूतकाल में प्रवेश कर चुके हैं अर्थात् नष्ट हो चुके हैं? इस के आशय अर्थात् उदर में कितने पदार्थ होंगे? अर्थात् भविष्य में कितने पदार्थ उत्पन्न होंगे. इस ने अर्थात् परमात्मा ने अपने एक अंश को हजारों रूपों में प्रकट किया है, उस में कितने पदार्थों ने प्रवेश किया? (९) यत्र लोकांश्च कोशांश्चापो ब्रह्म जना विदुः. असच्च यत्र सच्चान्तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (१०) ज्ञानी लोग जानते है कि जहां लोक और कोष निवास करते हैं तथा जहां जल एवं ब्रह्म स्थित हैं, सत्य और असत्य दोनों प्रकार के पदार्थ जहां स्थित हैं, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१०) यत्र तपः पराक्रम्य व्रतं धारयत्युत्तरम्. ऋतं च यत्र श्रद्धा चापो ब्रह्म समाहिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (११) जिस को आधार बना कर तपस्या का विधान किया जाता है एवं उत्तम वृत्तों का निर्वाह होता है, जिस में सत्य श्रद्धा जल एवं ब्रह्म व्याप्त हैं, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (११) यस्मिन् भूमिरन्तरिक्षं द्यौर्यस्मिन्नध्याहिता. यत्राग्निश्चन्द्रमाः सूर्यो वातस्तिष्ठन्त्यार्पिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (१२) जिस के आधार पर भूमि, आकाश और स्वर्ग टिके हुए हैं तथा अग्नि, चंद्रमा, सूर्य और वायु जिस में अर्पित हो कर स्थित है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१२) यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे सर्वे समाहिताः. स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (१३) जिस के अंग में सभी तैंतीस देव समाए हुए हैं, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१३) यत्र ऋषयः प्रथमजा ऋचः साम यजुर्मही. एकर्षिर्यस्मिन्नार्पितः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (१४) पूर्ववर्ती ऋषि, ऋचाएं, साममंत्र, यजुर्वेद के मंत्र तथा महती ब्रह्मविद्या जिस में स्थित है ebook converter DEMO Watermarks*
एवं एक ऋषि जिस में समाया हुआ है, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१४) यत्रामृतं च मृत्युश्च पुरुषे ऽ धि समाहिते. समुद्रो यस्य नाड्य १: पुरुषे ऽ धि समाहिता: स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१५) जिस आदि पुरुष में अमृत और मृत्यु स्थित हैं तथा सागर जिस आदि पुरुष की नाड़ियों में समाया हुआ है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१५) यस्य चतस्र: प्रदिशो नाड्य १ स्तिष्ठन्ति प्रथमा:. यज्ञो यत्र पराक्रान्त: स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१६) जिस आदि पुरुष के शरीर में प्रथम कल्पित पूर्व, पश्चिम आदि चार दिशाएं नाड़ियों के रूप में स्थित है तथा यज्ञ जहां पराक्रम करता है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१६) ये पुरुषे ब्रह्म विदुस्ते विदु: परमेष्ठिनम्. यो वेद परमेष्ठिनं यश्च वेद प्रजापतिम्. ज्येष्ठं ये ब्राह्मणं विदुस्ते स्कम्भमनुसंविदु:.. (१७) जो इस आदि पुरुष में ब्रह्म को स्थित जानते हैं, वे परमेष्ठी को जानते हैं. जो परमेष्ठी एवं प्रजापति को जानता है तथा जो उत्तम ब्राह्मण को जानता है, वह परमात्मा को भलीभांति जानता है. (१७) यस्य शिरो वैश्वानरश्चक्षुरङ्गिरसो ऽ भवन्. अङ्गानि यस्य यातव: स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१८) जिस का शीश वैश्वानर अग्नि और नेत्र अंगिरस हुए, जिस के अंग ही राक्षस बने, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१८) यस्य ब्रह्म मुखमाहुजिह्वां मधुकशामुत. विराजमूधो यस्याहु: स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१९) ब्रह्म जिस का मुख कहा गया है, मधुकशा जिस की जीभ बताई गई है एवं विराट् ऐन कहा गया है, उस ब्रह्म के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१९) यस्मादृचो अपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन्. सामानि यस्य लोमान्यथर्वा ऽ ङ्गिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (२०) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस से ऋचाएं बनीं एवं जिस से यजुर्वेद के मंत्र बने, सामवेद के मंत्र जिस के रोम एवं अथर्ववेद के मंत्र जिस का मुख है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (२०) असच्छाखां प्रतिष्ठन्तीं परममिव जना विदुः. उतो सन्मन्यन्ते ऽ वरे ये ते शाखामुपासते.. (२१) असत् अर्थात् निराकार से उत्पन्न हुई शाखा स्थित है. मनुष्य उसी को सब से श्रेष्ठ तत्त्व मानते हैं तथा उस शाखा की उपासना करते हैं. (२१) यत्रादित्याश्च रुद्राश्च वसवश्च समाहिताः. भूतं च यत्र भव्यं च सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (२२) जिस में बारह आदित्य, एकादश रुद्र और आठ वसु समाए हुए हैं, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है. (२२) यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा निधिं रक्षन्ति सर्वदा. निधिं तमद्य को वेद यं देवा अभिरक्षथ.. (२३) तैंतीस देवता सदा जिस की निधि अर्थात् खजाने की रक्षा करते हैं, हे देवो! जिस की निधि की तुम रक्षा करते हो, आज उसे कौन जानता है? (२३) यत्र देवा ब्रह्मविदो ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते. यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स ब्रह्मा वेदिता स्यात्.. (२४) उस ब्रह्म को जानने वाले देव ज्येष्ठ ब्रह्म की उपासना करते हैं, जो उस ब्रह्म को निश्चित रूप से जानता है, वह ब्रह्म हो सकता है. (२४) बृहन्तो नाम ते देवा ये ऽ सतः परि जज्ञिरे. एकं तदङ्गं स्कम्भस्यासदाहुः परो जनाः.. (२५) वे बृहत् नाम के देव हैं, जो असत् अर्थात् प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं. लोक उन्हें श्रेष्ठ कहता है. (२५) यत्र स्कम्भः प्रजनयन् पुराणं व्यवर्तयत्. एकं तदङ्गं स्कम्भस्य पुराणमनुसंविदुः.. (२६) जहां परमात्मा पुराण पुरुष को उत्पन्न करता हुआ विस्तृत करता है, उस परमात्मा के एक अंग को ज्ञानी जन पुराण के नाम से ही जानते हैं. (२६) यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे. ebook converter DEMO Watermarks*
तान् वै त्रयस्त्रिंशद् देवानेके ब्रह्मविदो विदुः.. (२७) जिस के शरीर के अवयवों में तैंतीस देवता अलगअलग निवास करते हैं, उन तैंतीस देवों को केवल वे ही जानते हैं जो ब्रह्म के ज्ञाता हैं. (२७) हिरण्यगर्भं परममनत्युद्यं जना विदुः. स्कम्भस्तदग्रे प्रासिञ्चद्धिरण्यं लोके अन्तरा.. (२८) लोग हिरण्यगर्भ को महान और श्रेष्ठ जानते हैं. परमात्मा ने ही इस संसार के मध्य उस हिरण्यगर्भ को बनाया था. (२८) स्कम्भे लोकाः स्कम्भे तपः स्कम्भे ऽ ध्यृतमाहितम्. स्कम्भं त्वा वेद प्रत्यक्षमिन्द्रे सर्वं समाहितम्.. (२९) उस परमात्मा में समस्त लोक, तप और ऋत अर्थात् सत्य समाया हुआ है. हे परमात्मा! मैं तुझे प्रत्यक्ष रूप से जानता हूं. इंद्र में ही यह सब समाया हुआ है. (२९) इन्द्रे लोका इन्द्रे तप इन्द्रे ऽ ध्यृतमाहितम्. इन्द्रं त्वा वेद प्रत्यक्षं स्कम्भे सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (३०) इंद्र में समस्त लोक, तप और ऋत अर्थात् सत्य समाया हुआ है. हे इंद्र! मैं तुझे प्रत्यक्ष रूप से जानता हूं. परमात्मा में ही यह सब समाया हुआ है. (३०) नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरोषसः. यदजः प्रथमं संबभूव स ह तत् स्वराज्यमियाय यस्मान्नान्यत् परमस्ति भूतम्.. (३१) सूर्योदय से पूर्व एवं उषा काल से पूर्व श्रद्धालु जन नाम के द्वारा नाम का हवन करते हैं अर्थात् परमात्मा के नाम के द्वारा उस के महत्त्व का वर्णन करते हैं. इस प्रकार प्रयत्नशील जो अजन्मा आत्मा अर्थात् भक्त परमात्मा के साथ संयोग प्राप्त करता है, वह स्वराज्य को प्राप्त करता है अर्थात् जन्ममरण के बंधन से मुक्ति पा जाता है. उस परमात्मा की अपेक्षा कोई तत्त्व श्रेष्ठ नहीं है. (३१) यस्य भूमिः प्रमा ऽ न्तरिक्षमुतोदरम्. दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३२) धरती जिस के पैरों का नाम है, अंतरिक्ष जिस का उदर है तथा जिस ने स्वर्ग को अपना शीश बनाया है, उस ज्येष्ठ ब्रह्म को मेरा नमस्कार है. (३२) यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः. ebook converter DEMO Watermarks*
अग्निं यश्चक्र आस्यं १ तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३३) सूर्य एवं बारबार नवीन होने वाला चंद्रमा जिस के नेत्र हैं तथा अग्नि को जिस ने अपना मुख बनाया है, उस श्रेष्ठ ब्रह्म के लिए मेरा नमस्कार है. (३३) यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरङ्गिरसो ऽ भवन्. दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३४) वायु जिस के प्राण और अपान तथा अंगिरस जिस के नेत्र बने थे तथा दिशाओं को जिस ने अपनी प्रज्ञा का साधन बनाया था, उस ज्येष्ठ के लिए मेरा नमस्कार है. (३४) स्कम्भो दाधार द्यावापृथिवी उभे इमे स्कम्भो दाधारोर्व१न्तरिक्षम्. स्कम्भो दाधार प्रदिशः षडुर्वीः स्कम्भ इदं विश्वं भुवनमा विवेश.. (३५) परमात्मा ने स्वर्ग और पृथिवी दोनों को धारण किया है. उसी ने अंतरिक्ष अर्थात् आकाश को धारण किया है. उसी परमात्मा ने छः विशाल दिशाओं —अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे की दिशाओं को धारण किया है. वही परमात्मा इस सारे संसार में समाया हुआ है. (३५) यः श्रमात् तपसो जातो लोकान्तसर्वान्त्समानशे. सोमं यश्चक्रे केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३६) जो तपस्या रूपी श्रम से उत्पन्न हो कर समस्त लोकों में व्याप्त रहता है तथा जिस ने एक मात्र सोमलता को ही उत्तम जड़ी बनाया है, उस श्रेष्ठ परमात्मा के लिए मेरा नमस्कार है. (३६) कथं वातो नेलयति कथं न रमते मनः. किमापः सत्यं प्रेप्सन्तीर्नेलयन्ति कदा चन.. (३७) वायु स्थिर क्यों नहीं रहती तथा मन शांत क्यों नहीं रहता? सत्य की अभिलाषा करते हुए जल कभी अस्थिर क्यों नहीं होते? (३७) महत् यक्षं भुवनस्य मध्ये तपसि क्रान्तं सलिलस्य पृष्ठे. तस्मिञ्छ्रयन्ते य उ के च देवा वृक्षस्य स्कन्धः परित इव शाखाः.. (३८) संसार के मध्य महान यक्ष, अर्थात् परमात्मा है. संताप अर्थात् गरमी देने वाला वह परमात्मा जल के ऊपर वर्तमान है. ऐसा सुना जाता है कि सभी देव उस में इस प्रकार व्याप्त हैं, जिस प्रकार वृक्ष की शाखाएं उस में व्याप्त रहती हैं. (३८) यस्मै हस्ताभ्यां पादाभ्यां वाचा श्रोत्रेण चक्षुषा. ebook converter DEMO Watermarks*
यस्मै देवाः सदा बलिं प्रयच्छन्ति विमिते ऽ मितं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (३९) जिस असीमित परमात्मा के लिए देवगण हाथों, पैरों, वाणी, कानों और आंखों के द्वारा सदा उपहार प्रदान करते हैं, उसी परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (३९) अप तस्य हतं तमो व्यावृतः स पाप्मना. सर्वाणि तस्मिन्ज्योतींषि यानि त्रीणि प्रजापतौ.. (४०) जो परमात्मा को जान लेता है, उस का अज्ञान मिट जाता है तथा उस का पाप नष्ट हो जाता है. प्रजापति में जो तीन ज्योतियां हैं, वे उसे प्राप्त हो जाती हैं. (४०) यो वेतसं हिरण्ययं तिष्ठन्तं सलिले वेद. स वै गुह्यः प्रजापतिः.. (४१) जल में सोने का बेंत ठहरा हुआ है. जो इस बात को जानता है, वही गुप्त प्रजापति है. (४१) तन्त्रमेके युवती विरूपे अभ्याक्रामं वयत: षण्मयूखम्. प्रान्या तन्तूंस्तिरते धत्ते अन्या नाप वृञ्जाते न गमातो अन्तम्.. (४२) एक दूसरे से भिन्न रूप वाली दो युवतियां लगातार घूमती हैं तथा छः खूटियों वाला एक ताना पूरती हैं. उन में से एक धागों को फैलाती है और दूसरी उन्हें संभाल कर रखती है अर्थात् समेटती है. वे दोनों न विश्राम करती हैं और न अंत को प्राप्त होती हैं. तात्पर्य यह है कि रात और दिन ही वे युवतियां हैं. छः ऋतुएं छः खूंटे तथा समय ही अनंग धागा है. (४२) तयोरहं परिनृत्यन्त्योरिव न वि जानामि यतरा परस्तात्. पुमानेनद् वयत्युद् गृणत्ति पुमानेनद् वि जभाराधि नाके.. (४३) उन नृत्य करती हुई दो स्त्रियों अर्थात् दिन और रात में कौन सी दूसरी है, यह मैं नहीं जानता. उस वस्त्र को एक पुरुष बुनता है तथा दूसरा उधेड़ता है. इसे वह स्वर्ग में धारण करता है. (४३) इमे मयूखा उप तस्तभुर्दिवं सामानि चक्रुस्तसराणि वातवे.. (४४) ये खूटियां अर्थात् छः ऋतुएं स्वर्ग को धारण करती है तथा वस्त्र बुनने के लिए सामवेद के मंत्रों को धागा बनाए हुए हैं. (४४) सूक्त-८ देवता—अध्यात्म यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति. ebook converter DEMO Watermarks*
स्व १ र्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (१) जो इन भूत, भविष्य तथा वर्तमान कालों को व्याप्त कर के स्थित है तथा जिस का स्वरूप केवल प्रकाशमय है, उसी ज्येष्ठ ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूं. (१) स्कम्भेनेमे विष्टभिते द्यौश्च भूमिश्च तिष्ठतः. स्कम्भ इदं सर्वमात्मन्वद् यत् प्राणन्निमिषच्च यत्.. (२) परमात्मा के द्वारा धारण की हुई भूमि और स्वर्ग अपने स्थान पर स्थित हैं. जो सांस लेते हैं और जो पलक झपकाते हैं, वे सब आत्मा के समान परमात्मा में व्याप्त हैं. (२) तिस्रो ह प्रजा अत्यायमायन् न्य १ न्या अर्कमभितो ऽ विशन्त. बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानो हरितो हरिणीरा विवेश.. (३) तीन प्रकार की प्रजाएं अतिक्रमण करती हुई परमेश्वर को प्राप्त होती हैं. एक प्रकार की अर्थात् सतोगुणी प्रजाएं सूर्य में प्रविष्ट होती हैं. दूसरे प्रकार की अर्थात् रजोगुणी प्रजाएं रजौलोक को नापती हुई स्थित रहती हैं. तीसरी अर्थात् तमोगुणी प्रजाएं सब का हरण करती हुई हरे रंग में अर्थात् अंधकार में प्रवेश करती हैं. (३) द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत. तत्राहतास्त्रीणि शतानि शङ्कवः षष्टिश्च खीला अविचाचला ये.. (४) बारह अरे तथा तीन नेमियां एक पहिए से संबंधित हैं. बारह मास, बारह अरे तथा शीत, ग्रीष्म, वर्षा, तीन ऋतुएं तीन नेमियां हैं. ये समय रूपी पहिए में स्थित हैं. इस बात को कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता. उस पहिए में तीन सौ साठ खूंटियां तथा इतनी ही कीलें लगाई गई हैं जो स्थिर हैं. वर्ष के दिन और रात ही खूंटियां और कीलें हैं. (४) इदं सवितर्वि जानीहि षड् यमा एक एकजः. तस्मिन् हापित्वमिच्छन्ते य एषामेक एकजः.. (५) हे सविता देव! तुम यह जानो कि ये एक से एक बने हुए छः जोड़े हैं. इन में जो एकएक से बने जोड़े हैं, वे उस में समाहित होना चाहते हैं. तात्पर्य दो-दो मासों वाली छः ऋतुओं के वर्ष अथवा काल में समाहित होने से है. (५) आविः सन्निहितं गुहा जरन्नाम महत् पदम्. तत्त्रेदं सर्वमार्पितमेजत् प्राणत् प्रतिष्ठितम्.. (६) प्रकट होने वाला एवं संचार करने वाला महत्त्व पद गुफा में है. यह शरीर ही गुफा है और आत्मा उस में संचार करने वाला महत्त्व पद है. वह महत्त्व पद अर्थात् आत्मा गतिशील एवं सांस लेने वाला है तथा उसी में यह सारा विश्व समाहित और प्रतिष्ठित है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
एकचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा. अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं क्व १ तद् बभूव.. (७) बीच की नाभि वाला एक पहिया है. इस में आगेपीछे से हजार अरे लगे हुए हैं. यह पहिया लगातार चल रहा है. इस के आधे भाग से संसार उत्पन्न हुआ है तथा इस का शेष भाग कहां है? सूर्य ही एक नाभि वाला एक पहिया है. उस की हजार किरणें हजार अरे हैं. दिन उस का आधा भाग है, जिस के कारण संसार गतिशील रहता है. शेष आधा भाग अर्थात् रात्रि में वह सूर्य न जाने कहां चला जाता है? (७) पञ्चवाही वहत्यग्रमेषां प्रष्टयो युक्ता अनुसंवहन्ति. अयातमस्य ददृशे न यातं परं नेदीयो ऽ वरं दवीय:.. (८) इन में जो आगे चलने वाला है, वह पंचवाही (पांच के द्वारा उठाया जाने वाला). इस में जुड़े हुए घोड़े इसे ठीक से ले कर चलते हैं. इस का न आना दिखाई देता है और न जाना. यह अत्यंत दूर और अत्यधिक समीप है. तात्पर्य यह है कि प्राण, अपान पांच वायुएं जीवन को गतिशील रखती हैं. इंद्रियां ही शरीर को आगे बढ़ाने वाले घोड़े हैं. शरीर में आत्मा का आना और जाना दृष्टिगोचर नहीं होता है. यह आत्मा अत्यंत समीप और अत्यधिक दूर है. (८) तिर्यग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम्. तदासत ऋषय: सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवु:.. (९) एक चमचा है, जिस का मुख नीचे की ओर है और जड़ अर्थात् पकड़ने वाला भाग ऊपर की ओर है. उस में अनेक रूपों वाला यशस्वी छिपा हुआ है. वहां सात ऋषि एक साथ बैठे हैं. वे ही अनेक रूपों वाले के रक्षक बनें. (९) या पुरस्ताद् युज्यते या च पश्चाद् या विश्वतो युज्यते या च सर्वतः. यया यज्ञः प्राङ् तायते तां त्वा पृच्छामि कतमा सर्चाम्.. (१०) ऋचाओं के मध्य वह कौन सी ऋचा है जो आगे से और पीछे से जुड़ी हुई है. जो चारों ओर से तथा सभी प्रकार जुड़ी हुई है. जिस की सहायता से पूर्व की ओर यज्ञ विस्तृत किया गया, मैं तुम से उसी के विषय में पूछता हूं. (१०) यदेजति पतति यच्च तिष्ठति प्राणदप्राणन्निमिषच्च यद् भुवत्. तद् दाधार पृथिवीं विश्वरूपं तत् संभूय भवत्येकमेव.. (११) जो कांपता है, गिरता है और स्थित रहता है; जो सांस लेता है, सांस नहीं लेता तथा सत् है, उसी विश्व रूप ने पृथ्वी को धारण किया है. वह सब से मिल कर एक रूप हो जाता है. (११) अनन्तं विततं पुरुत्रा ऽ नन्तमन्तवच्चा समन्ते. ebook converter DEMO Watermarks*
ते नाकपालश्चरति विचिन्वन् विद्वान् भूतमृत भव्यमस्य.. (१२) एक तत्त्व अंतहीन तथा चारों ओर विस्तृत है. दूसरा अंतहीन तथा अंत वाला है. ये दोनों परस्पर मिले हुए हैं. स्वर्ग सुख का इच्छुक उन्हें खोजता फिरता है. वही सब जानता है तथा भूत और भविष्य उसी के कर्म हैं. यहां पहला परमात्मा और दूसरा आत्मा है. (१२) प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते. अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः.. (१३) प्रजापति दिखाई न देता हुआ गर्भ में संचरण करता है तथा अनेक रूपों में जन्म लेता है. उस के आधे भाग से सारा विश्व उत्पन्न हुआ है. उस का शेष भाग श्रद्धा है, वही उस की पहचान है. (१३) ऊर्ध्वं भरन्तमुदकं कुम्भेनेवोदहार्यम्. पश्यन्ति सर्वे चक्षुषा न सर्वे मनसा विदुः.. (१४) घड़े की सहायता से कुएं के जल को ऊपर निकालते हुए को सभी आंख से देखते हैं, परंतु मन से नहीं जान पाते. (१४) दूरे पूर्णेन वसति दूर ऊनेन हीयते. महद् यक्षं भुवनस्य मध्ये तस्मै बलिं राष्ट्रभृतो भरन्ति.. (१५) अपने को पूर्ण मानने वाले से वह बहुत दूर रहता है तथा अपने को हीन मानने वाले से भी दूर भागता है. ऐसा महान देव अर्थात् परमात्मा संसार के मध्य व्याप्त है. राष्ट्र का भरणपोषण करने वाला उस की सेवा करता है. (१५) यतः सूर्य उदेत्यस्तं यत्र च गच्छति. तदेव मन्ये ऽ हं ज्येष्ठं तदु नात्येति किं चन.. (१६) सूर्य जहां से उदय होता है और जहां अस्त होता है, मैं उसी को सब से बड़ा मानता हूं. कोई भी उस का अतिक्रमण नहीं करता अर्थात् कोई भी उस से महान नहीं है. (१६) ये अर्वाङ् मध्य उत वा पुराणं वेदं विद्वांसमभितो वदन्ति. आदित्यमेव ते परि वदन्ति सर्वे अग्नि द्वितीयं त्रिवृतं च हंसम्.. (१७) जो पुराण, ज्ञानी एवं विद्वान् उस के पीछे, बीच में अथवा चारों ओर बताते हैं, वे सब सूर्य की ही प्रशंसा करते हैं. वे अग्नि को दूसरा और हंस को तीसरा बताते हैं. (१७) सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्. स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*
पाप का विनाश करने वाला यह हंस जब स्वर्ग की ओर गमन करता है तो इस के दोनों पंख हजार दिनों तक फैले रहते हैं. यह सभी देवों को अपनी छाती पर बैठा कर सारे संसार को देखता हुआ जाता है. (१८) सत्येनोर्ध्वस्तपति ब्रह्मणा ऽ र्वाङ् वि पश्यति. प्राणेन तिर्यङ् प्राणति यस्मिन्ज्येष्ठमधि श्रितम्.. (१९) वह सत्य की सहायता से ऊपर तपता है तथा वेद मंत्रों के द्वारा नीचे की ओर देखता है. वह प्राण वायु में तिरछी सांस लेता है, उसी में वह सब से महान परमात्मा स्थित है. (१९) यो वै ते विद्यादरणी याभ्यां निर्मथ्यते वसु. स विद्वान्ज्येष्ठं मन्येत स विद्याद् ब्राह्मणं महत्.. (२०) जो उन दोनों अणियों को जानता है, जिस के द्वारा धन का मंथन किया जाता है, वही विद्वान् परमात्मा को सब से महान मानता है और वही महान वेद मंत्रों को जानता है. (२०) अपादग्रे समभवत् सो अग्रे स्व १ राभरत्. चतुष्पाद् भूत्वा भोग्यः सर्वमादत्त भोजनम्.. (२१) सब से पहले चरणहीन आत्मा उत्पन्न हुआ. उस ने आगे चल कर आनंद को अपने में पूर्ण किया. उस ने चार चरणों वाला अर्थात् अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चतुर्वर्ग बन कर समस्त भोजन को स्वीकार किया अर्थात् सारे भोग भोगे. (२१) भोग्यो भवदथो अन्नमदद् बहु. यो देवमुत्तरावन्तमुपासातै सनातनम्.. (२२) पहले भोग्य अर्थात् भोजन करने वाला उत्पन्न हुआ. इस के पश्चात उस ने बहुत सा अन्न खाया. वही सनातन एवं श्रेष्ठ देव की उपासना करता है. वही भोग्य हुआ और अधिक मात्रा में अन्न खाने लगा, जो सनातन एवं सर्वश्रेष्ठ देव परमात्मा की उपासना करता है. (२२) सनातनमेनमाहुरुताद्य स्यात् पुनर्भवः. अहोरात्रे प्र जायेते अन्यो अन्यस्य रूपयोः.. (२३) इस सूर्य को सनातन कहा गया है. वह आज भी पुनः नवीन है. उसी परमात्मा से दिन और रात उत्पन्न होते हैं जो एकदूसरे से भिन्न रूप वाले हैं. (२३) शतं सहस्रमयुतं न्यर्बुदमसंख्येयं स्वमस्मिन् निविष्टम्. तदस्य घ्न्त्यभिपश्यत एव तस्माद् देवो रोचत एष एतत्.. (२४) सौ, एक हजार, दस हजार, एक अरब एवं अनगिनती दिवस इसी सूर्य में व्याप्त हैं. वे ebook converter DEMO Watermarks*
दिवस इस के देखतेदेखते ही आघात करते हैं. इसी कारण यह देव अर्थात् सूर्य इस विश्व को प्रकाशित करता है. (२४) बालादेकमणीयस्कमुतैकं नेव दृश्यते. ततः परिष्वजीयसी देवता सा मम प्रिया.. (२५) आत्मतत्त्व एक है. यह बाल से भी सूक्ष्म होने के कारण दिखाई नहीं देता. इस आत्मा का आलिंगन करने वाला देवता अर्थात् परमात्मा मुझे प्रिय है. (२५) इयं कल्याण्य १ जरा मर्त्यस्यामृता गृहे. यस्मै कृता शये स यश्चकार जजार सः.. (२६) यह कल्याणी आत्मा वृद्धावस्था से रहित है तथा मरणशील शरीर रूपी घर में रह कर भी अमर है. जिस आत्मा के लिए शरीर का निर्माण हुआ है, वह इस में शयन करती है. वह शरीर ही वृद्ध होता है. (२६) त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी. त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः.. (२७) हे आत्मा! तू स्त्री है, तू ही पुरुष है. तू ही कुमार है और तू ही कुमारी है. वृद्ध होने पर तू ही डंडे के सहारे चलता है तथा तू ही उत्पन्न होने पर सभी ओर मुख वाला बनता है. (२७) उतैषां पितोत वा पुत्र एषामुतैषां ज्येष्ठ उत वा कनिष्ठः. एको ह देवो मनसि प्रविष्टः प्रथमो जातः स उ गर्भे अन्तः.. (२८) इन समस्त जीवों में पिता और पुत्र के रूप में एवं बड़े और छोटे के रूप में एक ही देव है जो मन में प्रविष्ट है. वह सब से पहले उत्पन्न हुआ था. वही गर्भ में स्थित होता है. (२८) पूर्णात् पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते. उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते.. (२९) पूर्ण अर्थात् परमात्मा से ही पूर्ण अर्थात समस्त विश्व अलग होता है अर्थात् जन्म लेता है. उसी पूर्ण के द्वारा यह विश्व सिंचित होता है अर्थात् पालन किया जाता है. आज हम उस तत्त्व को जानें, जहां से वह सींचा जाता है अर्थात् जो इस विश्व का पालन करता है. (२९) एषा सनत्नी सनमेव जातैषा पुराणी परि सर्वं बभूव. मही देव्यु १ षसो विभाती सैकैनेकेन मिषता वि चष्टे.. (३०) यह सनातन शक्ति वाला आकर्षण सनातन परमात्मा के साथ ही उत्पन्न हुआ है. वही पुराण शक्ति सब कुछ बन गई है. वही महती, दिव्य शक्ति उषाओं को प्रकाशित करती है तथा ebook converter DEMO Watermarks*
वह प्रत्येक प्राणी के साथ अलगअलग दिखाई देती है. (३०) अविर्वे नाम देवतर्तेनास्ते परीवृता. तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितस्रजः.. (३१) वही रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति है और सत्य से घिरी हुई है. उसी के रूप से वे सारे वृक्ष हरेभरे हैं और हरे पत्तों से ढके रहते हैं. (३१) अन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्तं न पश्यति. देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति.. (३२) समीप से आए हुए को वह छोड़ता नहीं है तथा समीप होने पर भी वह दिखाई नहीं देता है. उस देव अर्थात् परमात्मा का काव्य देखो जो कभी न मरता है और न वृद्ध होता है. (३२) अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्. वदन्तीर्यत्र गच्छन्ति तदाहुर्ब्राह्मणं महत्.. (३३) वह परमात्मा अपूर्व है अर्थात् उस से पहले कोई नहीं था. उस ने ही इन वाणियों को प्रेरित किया है जो वास्तविकता का वर्णन करती हैं. वर्णन करती हुई वाणियां जहां पहुंचती हैं, उसी को महान ब्राह्मण अर्थात वेद मंत्रों का समूह कहा गया है. (३३) यत्र देवाश्च मनुष्याश्चारा नाभाविव श्रिताः. अपां त्वा पुष्पं पृच्छामि यत्र तन्मायया हितम्.. (३४) मैं जल के उस कमल के विषय में पूछता हूं, जिस में सभी मनुष्य और देव इस प्रकार आश्रित हैं, जिस प्रकार कमल में उस की पंखुड़ियां रहती हैं. माया से ढका हुआ वह कहां रहता है? (३४) येभिर्वात इषितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशः सध्रीचीः. य आहुतिमत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे त आसन्.. (३५) जिन देवों से प्रेरित हो कर वायु चलती है तथा जो पांच परस्पर मिली हुई दिशाओं अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊपर को प्रदान करता है. जो देव आहुति को अत्यधिक महान मानते हैं, जलों के नेता वे देव कौन हैं. (३५) इमामेषां पृथिवीं वस्त एको ऽ न्तरिक्षं पर्येको बभूव. दिवमेषां ददते यो विधर्ता विश्वा आशाः प्रति रक्षन्त्येके.. (३६) इन में से एक इस पृथ्वी पर निवास करता है तथा अंतरिक्ष में व्याप्त रहता है, जो धारण करता है एवं इन जीवों को स्वर्ग प्रदान करता है. कुछ अर्थात् शेष देव ऐसे हैं जो सभी ebook converter DEMO Watermarks*
दिशाओं की रक्षा करते हैं. (३६) यो विद्यात् सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः. सूत्रं सूत्रस्य यो विद्यात् स विद्याद् ब्राह्मणं महत्.. (३७) जिस में सारी प्रजाएं पिरोई हुई हैं तथा जो इस फैले हुए सूत्र अर्थात् धागे को जानता है. संसार रूपी विस्तृत सूत्र के कारण बने हुए सूत्र अर्थात् परमात्मा को जो जानता है, वही महान ब्रह्म को जानता है अथवा वही विशाल वेद मंत्रों का ज्ञाता है. (३७) वेदाइं सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः. सूत्रं सूत्रस्याहं वेदाथो यद् ब्राह्मणं महत्.. (३८) मैं उस विस्तृत धागे अर्थात् परमात्मा को जानता हूं, जिस में ये सारी प्रजाएं पिरोई हुई हैं. मैं इस संसार रूपी विस्तृत सूत्र के मूल कारण को जानता हूं, जो महान ब्रह्म अथवा विशाल वेद मंत्रों का समूह हैं. (३८) यदन्तरा द्यावापृथिवी अग्निरैत् प्रदहन् विश्वादाव्यः. यत्रातिष्ठन्नेकपत्नीः परस्तात् क्वे वासीन्मातरिश्वा तदानीम्.. (३९) इस संसार को जलाने वाली अग्नि द्यावा और पृथ्वी के मध्य आती है. वहीं पोषण करने वाली देवियां निवास करती हैं. उस समय मातरिश्वा अर्थात् वायु कहां रहती है? (३९) अप्सवा सीन्मातरिश्वा प्रविष्टः प्रविष्टा देवाः सलिलान्यासन्. बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानः पवमानो हरित आ विवेश.. (४०) उस समय वायु जलों में प्रविष्ट थी तथा देवगण भी जलों में ही प्रवेश किए हुए थे. पृथ्वी का निर्माण करने वाला महान ब्रह्म उस समय कहां स्थित था? उस समय वायु ने दिशाओं में प्रवेश किया. (४०) उत्तरेणेव गायत्रीममृते ऽ धि वि चक्रमे. साम्ना ये साम संविदुरजस्तद् ददृशे क्व.. (४१) जो साम मंत्रों के द्वारा परमात्मा को जानने वाले हैं, उन्होंने अंत में गायत्री रूप अमृत में प्रवेश किया. वह अजन्मा कहां दिखाई दिया था अर्थात् कहीं नहीं. (४१) निवेशनः संगमनो वसूनां देव इव सविता सत्यधर्मा. इन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्.. (४२) सत्य धर्म वाले सविता उसी दिव्य परमात्मा के समान हैं. वे ही समस्त धनों के संगम हैं अर्थात् पुण्यात्मा जन उन्हीं में प्रवेश करते हैं. धनों के समूह में अर्थात् पुण्यात्माओं में इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*
प्रवेश नहीं करते. (४२) पुण्डरीकं नवद्वारं त्रिभिर्गुणेभिरावृतम्. तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः.. (४३) नौ द्वारों वाला कमल तीनों अर्थात् रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण से घिरा हुआ है. उस में जो आत्मा वाला दिव्य दल है, उसे ब्रह्मज्ञानी जानते हैं. (४३) अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः. तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम्.. (४४) वह परमात्मा कामना रहित, धीर, मरण रहित, स्वयं उत्पन्न होने वाला तथा रस से तृप्त है. वह कहीं से भी कम नहीं है अर्थात् सर्वथा पूर्ण है. उसी धीर, जरा अर्थात् वृद्धावस्था से रहित तथा युवा आत्मा को जानने वाला मृत्यु से नहीं डरता. (४४) सूक्त-९ देवता—शतौदना गौ अघायतामपि नह्या मुखानि सपत्नेषु वज्रमर्पयैतम्. इन्द्रेण दत्ता प्रथमा शतौदना भ्रातृव्यघ्नी यजमानस्य गातुः.. (१) यह धेनु पापियों के मुखों को बंद करे और शत्रुओं पर इस वज्र को गिराए. इंद्र के द्वारा दी हुई यह सब से पहली शतौदना गाय शत्रु विनाशिनी एवं यजमान का मार्गदर्शन करने वाली है. (१) वेदिष्टे चर्म भवतु बर्हिर्लोमानि यानि ते. एषा त्वा रशनाग्रभीद् ग्रावा त्वैषो ऽ धि नृत्यतु.. (२) हे शतौदना गौ! तेरे रोम कुशों के रूप में हैं और यज्ञ वेदी तेरा चर्म है. यह रस्सी तुझे बांध रही है. यह पत्थर तेरे ऊपर नृत्य करे. (२) बालास्ते प्रोक्षणीः सन्तु जिह्वा सं मार्ष्ट्वर्घ्ये. शुद्धा त्वं यज्ञिया भूत्वा दिवं प्रेहि शतौदने.. (३) हे हिंसा के अयोग्य गौ! तेरे बाल यज्ञ का प्रोक्षणी नामक पात्र बनें तथा तेरी जीभ यज्ञ वेदी का मार्जन करे अर्थात् सफाई करे. हे शतौदना गौ! तू इस प्रकार शुद्ध और यज्ञ के योग्य बन कर स्वर्ग को गमन कर. (३) यः शतौदनां पचति कामप्रेण स कल्पते. प्रीता ह्यस्यार्त्विजः सर्वे यन्ति यथायथम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
जो शतौदना गौ का पालन करता है, वह अपनी कामनाएं पूर्ण करता है. उस के संतुष्ट हुए सभी ऋत्विज् जहां से आते हैं, वहीं चले जाते हैं. (४) स स्वर्गमा रोहति यत्रादस्त्रिदिवं दिवः. अपूपनाभिं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्... (५) वह उस स्वर्ग में पहुंचता है जो अंतरिक्ष में स्थित है तथा जो पुए बना कर शतौदना गौ को देता है. (५) स तांल्लोकान्त्समाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवाः. हिरण्यज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्.. (६) जो स्वर्ण से अलंकृत कर के शतौदना गौ का दान करता है, वह उन लोकों को प्राप्त करता है, जो दिव्य एवं पार्थिव अर्थात् पृथ्वी से संबंधित हैं. (६) ये ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः. ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति मैभ्यो भैषीः शतौदने.. (७) हे शतौदना गौ! तेरी शांति करने वाले एवं तेरे पालन कर्ता तेरे रक्षक होंगे. तू उन से भयभीत मत हो. (७) वसवस्त्वा दक्षिणत उत्तरान्मरुतस्त्वा. आदित्याः पश्चाद् गोप्स्यन्ति साग्निष्टोममति द्रव.. (८) हे शतौदना गौ! आठ वसु, दक्षिण की ओर, उनचास मरुत् उत्तर की ओर तथा आदित्य पीछे से तेरी रक्षा करेंगे. तू अग्निष्टोम यज्ञ के पार जा. (८) देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये. ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति सातिरात्रमति द्रव.. (९) हे शतौदना गौ! देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, और अप्सराएं—ये सभी तेरी रक्षा करेंगे. तू अतिशय नामक यज्ञ कर्म के पार जा. (९) अन्तरिक्षं दिवं भूमिमादित्यान् मरुतो दिशः. लोकान्त्स सर्वान्नाप्नोति यो ददाति शतौदनाम्.. (१०) जो शतौदना गौ का दान करता है, वह अंतरिक्ष को, स्वर्ग को, भूमि को, आदित्यों को, मरुतों को, दिशाओं को तथा सभी लोकों को प्राप्त करता है. (१०) घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति. पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीर्दिवं प्रेहि शतौदने.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
घी टपकाती हुई, सौभाग्यशालिनी एवं दिव्य गुणयुक्त शतौदना गौ देवों के समीप जाएगी. हे हिंसा के अयोग्य शतौदना गौ! तू अपने पालने वाले की हिंसा मत कर और स्वर्ग को जा. (११) ये देवा दिविषदो अन्तरिक्षसदश्च ये ये चेमे भूम्यामधि. तेभ्यस्त्वं धुक्ष्व सर्वदा क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१२) हे शतौदना गौ! जो देव स्वर्ग में स्थित हैं, जो अंतरिक्ष में हैं एवं जो पृथ्वी पर निवास करते हैं, तू उन के लिए सदा मीठा दूध, दही और घी प्रदान कर. (१२) यत् ते शिरो यत् ते मुखं यौ कर्णौ ये च ते हनू. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१३) हे शतौदना गौ! तेरा जो शीश, तेरा जो मुख, तेरे जो दो कान एवं तेरी ठोड़ी है—ये सब अंग तेरे दानदाता को दही, मधुर दूध एवं घी देते रहें. (१३) यौ त ओष्ठौ ये नासिके ये शृङ्गे ये च ते ऽ क्षिणी. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१४) हे शतौदना गौ! तेरे जो दोनों होंठ, तेरी नाक, तेरे जो दोनों सींग तथा जो दोनों आंखें हैं, वे तेरे दानदाता को सदा दही, मधुर दूध एवं घी देते रहें. (१४) यत् ते क्लोमा यद् हृदयं पुरीतत् सहकण्ठिका. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१५) हे शतौदना गौ! तेरा क्लोम, हृदय, मलाशय और गला तेरे दानदाता को सदा दही, मधुर दूध और घी देते रहें. (१५) यत् ते यकृद् ये मतस्ने यदान्त्रं याश्च ते गुदाः. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१६) हे शतौदना गौ! तेरा जिगर, तेरी आंतें तथा तेरी गुदा तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१६) यस्ते प्लाशिर्यो वनिष्ठुर्यौ कुक्षी यच्च चर्म ते. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१७) हे शतौदना गौ! तेरी जो तिल्ली, गुदा, दोनों आंखें और तेरा चमड़ा है, ये सब तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१७) यत् ते मज्जा यदस्थि यन्मांसं यच्च लोहितम्. ebook converter DEMO Watermarks*
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१८) हे शतौदना गौ! तेरी चरबी, तेरी हड्डियां, मांस और रक्त तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१८) यौ ते बाहू ये दोषण्ी यावंसौ या च ते ककुत्. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१९) हे शतौदना गौ! तेरी दोनों भुजाएं, दोनों पिंडलियां, दोनों कंधे और ठाट तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१९) यास्ते ग्रीवा ये स्कन्धा या: पृष्टीर्याश्च पर्शव:. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२०) हे शतौदना गौ! तेरी जो गरदन, तेरे जो कंधे, जो पीठ और जो पसलियां हैं, वे तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२०) यौ त ऊरू अष्ठीवन्तौ ये श्रोणी या च ते भसत्. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२१) हे शतौदना गौ! तेरे पैर, तेरे घुटने, तेरे कूल्हे और प्रजनन अंग सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२१) यत् ते पुच्छं ये ते बाला यदूधो ये च ते स्तना:. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२२) हे शतौदना गौ! तेरी जो पूंछ, तेरे जो बाल, तेरा जो ऐन एवं जो थन हैं, वे तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२२) यास्ते जङ्घा या: कुष्ठिका ऋच्छरा ये च ते शफा:. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२३) हे शतौदना गौ! तेरी जो जंघाएं, जो घुटने, कूल्हे और खुर हैं, वे सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२३) यत् ते चर्म शतौदने यानि लोमान्यघ्न्ये. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२४) हे शतौदना गौ! तेरा जो चमड़ा है, हे हिंसा के अयोग्य! तेरे जो बाल हैं, वे सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२४) ebook converter DEMO Watermarks*
क्रोडौ ते स्तां पुरोडाशावाज्येनाभिघारितौ. तौ पक्षौ देवि कृत्वा सा पक्तारं दिवं वह.. (२५) हे शतौदना गौ! तेरे पिछले दोनों भाग घी से सिंचित हैं एवं पुरोडाश हैं. हे देवी! उन्हें पंख बना कर तू पालनकर्ता को स्वर्ग में ले जा. (२५) उलूखले मुसले यश्च चर्मणि यो वा शूर्पे तण्डुलः कणः. यं वा वातो मातरिश्वा पवमानो ममाथाग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (२६) जो ओखली और मूसल हैं, जो चमड़े, जो सूप, चावल और चावलों के टूटे हुए भाग हैं तथा जिन को पवित्र करने वाली वायु ने मथा है, उन्हें होता अग्नि की उत्तम आहुति बनाएं. (२६) अपो देवीर्मधुमतीर्घृतश्रुतो ब्रह्मणां हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि. यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हं तन्मे सर्वं सं पद्यतां वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (२७) मधु से युक्त एवं घी टपकाने वाले जल हम ब्राह्मणों के हाथों में अलग-अलग डालते हैं. जिस कामना से हम ब्राह्मणों के हाथों को धुलाते हैं, हमारी वह कामना पूर्ण हो तथा हम धनों के स्वामी बनें. (२७) सूक्त-१० देवता—वशा गौ नमस्ते जायमानायै जाताया उत ते नमः. बालेभ्यः शफेभ्यो रूपाया ऽ घ्न्ये ते नमः.. (१) हे हिंसा न करने योग्य गौ! तुझ जन्म लेती हुई को एवं उत्पन्न होती हुई को नमस्कार है. तेरे बालों के लिए, खुरों के लिए तथा रूप के लिए नमस्कार है. (१) यो विद्यात् सप्त प्रवतः सप्त विद्यात् परावतः. शिरो यज्ञस्य यो विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्.. (२) जो वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को जानता हो तथा यज्ञ का शीश जानता हो, वही वशा गौ का दान स्वीकार करे. (२) वेद़ाहं सप्त प्रवतः सप्त वेद परावतः. शिरो यज्ञस्याहं वेद सोमं चास्यां विचक्षणम्.. (३) मैं वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को जानता हूं. मैं यज्ञ के शीश को जानता हूं तथा वशा गौ में होने वाले प्रकाशशील सोम को भी ebook converter DEMO Watermarks*
जानता हूं. (३) यया द्यौर्यया पृथिवी ययापो गुपिता इमाः. वशां सहस्रधारां ब्रह्मणाच्छावदामसि.. (४) जिस के द्वारा द्यौ, जिस के द्वारा पृथ्वी तथा जिस के द्वारा ये जल सुरक्षित हैं, दूध की हजार धाराएं बहाने वाली वशा की हम वेद मंत्रों द्वारा प्रशंसा करते हैं (४) शतं कंसाः शतं दोग्धारः शतं गोप्तारो अधि पृष्ठे अस्याः. ये देवास्तस्यां प्राणन्ति ते वशां विदुरेकधा.. (५) इस वशा गौ की पीठ पर दुग्ध पात्र लिए हुए सौ दूध काढ़ने वाले एवं सौ रक्षक हैं. जो देव इस गौ के कारण सांस लेते हैं अर्थात् जीवित हैं, एकमात्र वे ही इस गौ को जानते हैं. (५) यज्ञपदीराक्षीरा स्वधाप्राणा महीलुका. वशा पर्जन्यपत्नी देवां अप्येति ब्रह्मणा.. (६) जिस वशा गौ को यज्ञ में स्थान प्राप्त है, जो अत्यधिक दूध देती है, स्वधा जिस के प्राण हैं तथा जो धरती पर परम प्रसिद्ध है, उस का वर्षा के कारण उत्पन्न घास से पालनपोषण होता है, वह वशा गौ यज्ञ के द्वारा देवों को तृप्त करती है. (६) अनु त्वाग्निः प्राविशदनु सोमो वशे त्वा. ऊधस्ते भद्रे पर्जन्यो विद्युतस्ते स्तना वशे.. (७) हे वशा गौ! अग्नि ने तुझ में प्रवेश किया था तथा सोम भी तुझ में प्रविष्ट हुआ था. पर्जन्य अर्थात् बादल ने तेरे एन में और बिजली ने तेरे थनों में निवास किया था. (७) अपस्त्वं धुक्षे प्रथमा उर्वरा अपरा वशे. तृतीयं राष्ट्रं धुक्षे ऽ नं क्षीरं वशे त्वम्.. (८) हे वशा गौ! सब से पहले तू जलों को दोहन के रूप में प्रदान करती है. इस के पश्चात भूमि को उपजाऊ बना कर हमें अन्न देती है. तीसरे तू राष्ट्र को शक्तिरूपी क्षीर प्रदान करती है. (८) यदादित्यैर्हूयमानोपातिष्ठ ऋतावरि. इन्द्रः सहस्रं पात्रान्तसोमं त्वापाययद् वशे.. (९) हे ऋतावरी अर्थात् दूध देने वाली गौ! तू आदित्यों द्वारा बुलाए जाने पर समीप आई थी. हे वशा गौ! तब इंद्र ने हजारों पात्र ले कर तुझे सोमरस पिलाया था. (९) यदनूचीन्द्रमैरात् त्व ऋषभो ऽ ह्वयत्. ebook converter DEMO Watermarks*