अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
श्वास और उच्छ्वास उस के रथ के घोड़े हैं. प्राण उस का सारथी है और वायु उस सारथी का चाबुक है. (७) कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (८) कीर्ति और यश उस के आगे चलने वाले हैं. कीर्ति उस के समीप आती है तथा यश उस के पास आता है. जो इस प्रकार जानता है, उसे कीर्ति और यश प्राप्त होते हैं. (८) स उदतिष्ठत् स दक्षिणां दिशमनु व्य चलत्.. (९) वह उठा और दक्षिण दिशा की ओर चला. (९) तं यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च यज्ञश्च यजमानश्च पशवश्चानुव्यचलन्.. (१०) यज्ञ करने वाले और न करने वाले, वामदेव से संबंधित, यज्ञ, यजमान उस के अत्यधिक अनुकूल हुए और पीछेपीछे चले. (१०) यज्ञायज्ञियाय च वै स वामदेव्याय च यज्ञाय च यजमानाय च पशुभ्यश्च वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (११) जो इस प्रकार के विद्वान् और व्रत का आचरण करने वाले का उपहास करता है, वह यज्ञ करने वाले तथा न करने वाले, वामदेव संबंधी का, यज्ञ का, यजमान का और पशुओं का अपराधी बनता है. (११) यज्ञायज्ञियस्य च वै स वामदेव्यस्य च यज्ञस्य च यजमानस्य च पशूनां च प्रियं धाम भवति तस्य दक्षिणायां दिशि.. (१२) जो उस का सत्कार करता है, वह यज्ञाज्ञिय, वामदेव्य, यज्ञ, यजमान और पशुओं का प्रिय होता है. उस का स्थान दक्षिण दिशा में होता है. (१२) उषाः पुंश्चली मन्त्रो मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवर्त्तौ कल्मलिर्मणिः.. (१३) उस की उषा स्त्री, मंत्र प्रशंसक, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरण कुंडल तथा तारे मणि के समान होते हैं. (१३) अमावास्या च पौर्णमासी च परिष्कन्दौ मनो विपथम्. मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः. कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (१४) अमावस्या और पूर्णमासी उस की रक्षा करने वाली होती हैं. मन उस का युद्ध संबंधी रथ ebook converter DEMO Watermarks*
होता है. श्वास एवं उच्छवाए उस के रथ के घोड़े हैं. प्राण उस का सारथी है. कीर्ति उस के निकट आती है तथा उस के पास यश मिलते हैं उसे कीर्ति एवं यश मिलते हैं. (१४) स उदतिष्ठत् स प्रतीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (१५) वह उठा और पूर्व दिशा में चल दिया. (१५) तं वैरुपं च वैराजं चापश्च वरुणश्च राजानुव्यचलन्.. (१६) जल, वरुण, वैरूप और वैराज उस के पीछेपीछे चले. (१६) वैरूपाय च वै स वैराजाय चाद्भ्यश्च वरुणाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (१७) जो इस प्रकार जानने वाले और व्रतधारी का अपमान करता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का अपराधी होता है. (१७) वैरूपस्य च वै स वैराजस्य चापां च वरुणस्य च राज्ञः प्रियं धाम भवति तस्य प्रतीच्यां दिशि.. (१८) जो यह बात जानता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का प्रिय धाम बनता है. (१८) इरा पुंश्चली हसो मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवर्तौ कल्मलिर्मणिः.. (१९) ऐसे व्यक्ति के लिए पश्चिम दिशा में भूमि स्त्री, हास्य प्रशंसा करने वाला, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरण कुंडल तथा तारे मणि होते हैं. (१९) अहश्च रात्री च परिष्कन्दौ मनो विपथम्. मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः. कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२०) दिन और रात उस के रक्षक होते हैं. श्वेसोच्छ्वास क्रम से उस के रथ के अश्व हैं. प्राण उस का सारथी है. वायु उस सारथी का चाबुक है. कीर्ति एवं यश उस के आगे चलने वाले हैं. कीर्ति तथा यश उस के समीप हैं जो यह जानता है, उसे यश और कीर्ति मिलते हैं. (२०) स उदतिष्ठत् स उदीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (२१) वह उठा और उत्तर दिशा की ओर चलने लगा. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*
तं श्यैतं च नौधसं च सप्तर्षयश्च सोमश्च राजानुव्यचलन्.. (२२) श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा सोम उस के पीछे चलने लगे. (२२) श्यैताय च वै स नौधसाय च सप्तर्षिभ्यश्च सोमाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (२३) जो इस प्रकार जानने वाले व्रात्य का अपमान करता है, वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा सोम का अपराधी बनता है. (२३) श्यैतस्य च वै स नौधसस्य च सप्तर्षीणां च सोमस्य च राज्ञः प्रियं धाम भवति तस्योदीच्यां दिशि.. (२४) जो यह बात जान लेता है वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा वरुण का प्रिय बनता है. उत्तर दिशा में उस का प्रिय स्थान होता है. (२४) विद्युत् पुंश्चली स्तनयित्नुर्मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवतौ कल्मलिर्मणिः.. (२५) उस के लिए बिजली स्त्री, गरजने वाला मेघ प्रशंसक, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात केश, किरणें, कुंडल तथा तारे मणि बन जाते हैं. (२५) श्रुतं च विश्रुतं च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.. (२६) ज्ञान और विज्ञान उस के रक्षक होते हैं तथा मन उस का युद्ध संबंधी रथ होता है. (२६) मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः.. (२७) श्वास और उच्छ्वास उस के रथ के घोड़े, प्राण सारथी और वायु उस का चाबुक बनता है. (२७) कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२८) जो इस बात को जानता है कीर्ति और यश उस के आगे चलने वाले होते हैं. कीर्ति उस के पास आती है और यश उस के समीप आता है. (२८) सूक्त-३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य सं संवत्सरमूर्ध्वो ऽ तिष्ठत् तं देवा अब्रुवन् व्रात्य किं नु तिष्ठसीति.. (१) वह एक वर्ष तक खड़ा रहा, तब देवताओं ने उस से पूछा—"हे व्रात्य! यह तप क्यों कर ebook converter DEMO Watermarks*
रहे हो?” (१) सो ऽ ब्रवीदासन्दीं मे सं भरन्त्विति.. (२) उस ने उत्तर दिया— “मेरे लिए आसंदी और बैठने की चौकी बनाओ.” (२) तस्मै व्रात्यायासन्दीं समभरन्.. (३) तब देवताओं ने उस के लिए आसंदी बनाई. (३) तस्या ग्रीष्मश्च वसन्तश्च द्वौ पादावास्तां शरच्च वर्षाश्च द्वौ.. (४) उस के दो पाए ग्रीष्म और वसंत ऋतुएं तथा शेष दो पाए शरद और वर्षा नामक ऋतुएं हुईं. (४) बृहच्च रथन्तरं चानूच्ये ३ आस्तां यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च तिरश्च्ये.. (५) बृहत् और रथंतर उस चौकी के बाजू अर्थात् अगलबगल के फलक या तख्ते थे. यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य उस के तिरछे फलक अर्थात् तख्ते थे. (५) ऋचः प्राञ्चस्तन्तवो यजूंषि तिर्यञ्चः.. (६) ऋग्वेद के मंत्र उसे बुनने के लिए लंबाई के तंतु और यजुर्वेद के मंत्र तिरछे तंतु थे. (६) वेद आस्तरणं ब्रह्मोपबर्हणम्.. (७) वेद उस का बिछौना था और ब्रह्म उस के ओढ़ने का वस्त्र था. (७) सामासाद उद्गीथो ऽ पश्रयः.. (८) सामवेद के मंत्र उस का गद्दा था और उद्गीथ उस का तकिया था. (८) तामासन्दीं व्रात्य आरोहत्.. (९) व्रात्य इस प्रकार की ज्ञानमयी चौकी पर चढ़ा. (९) तस्य देवजनाः परिष्कन्दा आसन्संकल्पाः प्रहाख्या ३ विश्वानि भूतान्युपसदः.. (१०) संकल्प उस के दूत बने तथा सभी प्राणी उस के साथ बैठने वाले हुए. (१०) विश्वान्येवास्य भूतान्युपसदो भवन्ति य एवं वेद.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
जो इस बात को जानता है, सभी प्राणी उस के मित्र हो जाते हैं। (११) सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य तस्मै प्राच्या दिशः. वासन्तौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् बृहच्च रथन्तरं चानुष्ठातारौ.. (१-२) देवताओं ने उस के लिए वसंत ऋतु के दो महीनों को पूर्व दिशा में रक्षक नियुक्त किया. बृहत्साम और रथंतर को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया। (१-२) वासन्तावेनं मासौ प्राच्या दिशो गोपायतो बृहच्च रथन्तरं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (३) जो यह बात जानता है, वसंत ऋतु के दो महीने, पूर्व दिशा की ओर से उस की रक्षा करते हैं. बृहत् साम और रथंतर उस के अनुकूल हो जाते हैं. (३) तस्मै दक्षिणाया दिशः ग्रैष्मौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानुष्ठातारौ.. (४-५) दक्षिण दिशा की ओर देवताओं ने ग्रीष्म ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक बनाया तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (४-५) ग्रैष्मावेनं मासौ दक्षिणाया दिशो गोपायतो यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (६) जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा की ओर से ग्रीष्म ऋतु के दो महीने उस की रक्षा करते हैं तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव उस के अनुकूल होते हैं. (६) तस्मै प्रतीच्या दिशः.. (७) वार्षिकौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् वैरूपं च वैराजं चानुष्ठातारौ.. (८) देवताओं ने पश्चिम दिशा में वर्षा ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा वैरूप और वैराज को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (७-८) वार्षिकावेनं मासौ प्रतीच्या दिशो गोपायतो वैरूपं च वैराजं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (९) जो इस बात को जानता है, वह पश्चिम दिशा की ओर से वर्षा ऋतु के दो महीनों द्वारा रक्षित रहता है तथा वैरूप और वैराज उस के अनुकूल रहते हैं. (९) तस्मा उदीच्या दिशः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
शारदौ मासौ गोप्तारावकुर्वञ्छ्यैतं च नौधसं चानुष्ठातारौ.. (११) देवताओं ने उत्तर दिशा की ओर से शरद ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा श्येत और नौधस को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१०-११) शारदावेनं मासावुदीच्या दिशो गोपायतः श्यैतं च नौधसं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (१२) जो यह बात जानता है, उत्तर दिशा की ओर से उस की रक्षा शरद ऋतु के दो महीने करते हैं तथा नौधस और श्येत उस के अनुकूल बन जाते हैं. (१२) तस्मै ध्रुवाया दिशः.. (१३) हैमनौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् भूमिं चाग्निं चानुष्ठातारौ.. (१४) देवताओं ने ध्रुव दिशा अर्थात् पृथ्वी की अथवा नीचे की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा पृथ्वी और अग्नि को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१३-१४) हैमनावेनं मासौ ध्रुवाया दिशो गोपायतो भूमिश्चाग्निश्चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (१५) जो इस बात को जानता है, ध्रुव दिशा की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीने उस पुरुष की रक्षा करते हैं. पृथ्वी और अग्नि उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१५) तस्मा ऊर्ध्वाया दिशः.. (१६) शैशिरौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् दिवं चादित्यं चानुष्ठातारौ... (१७) देवताओं ने ऊर्ध्व दिशा अर्थात् ऊपर की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया और आकाश तथा सूर्य को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१६-१७) शैशिरावेनं मासावूर्ध्वाया दिशो गोपायतो द्यौश्चादित्यश्चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (१८) जो इस बात को जानता है. वह ऊपर की दिशा की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों के द्वारा रक्षित होता है. आकाश तथा सूर्य उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१८) सूक्त-५ देवता—रुद्र तस्मै प्राच्या दिशो अन्तर्देशाद् भवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
देवताओं ने पूर्व दिशा के कोने से उस की रक्षा के लिए धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१) भव एनमिष्वासः प्राच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (२) जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव, शर्व, ईशान उस के अनुकूल रहते हैं. (२) नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (३) जो इसे जानता है, उस के अनुकूल रहने वाले पुरुषों और पशुओं की वे हिंसा नहीं करते. (३) तस्मै दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशाच्छर्वमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (४) देवताओं ने दक्षिण दिशा की ओर से बाण चलाने वाले शर्व अर्थात् शिव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (४) शर्व एनमिष्वासो दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (५) जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा के कोण से शर्व, भव और ईशान उस के अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं. शर्व उन की हिंसा नहीं करते. (५) तस्मै प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशात् पशुपतिमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (६) देवताओं ने पश्चिम दिशा के कोने से बाण फेंकने वाले पशुपति को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (६) पशुपतिरेनमिष्वासः प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः. नास्य पशून् समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (७) जो इस बात को जानता है, पशुपति पश्चिम दिशा के कोने से उस के अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं, पशुपति उन की हिंसा नहीं करते हैं. (७) तस्मा उदीच्या दिशो अन्तर्देशादुग्रं देवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (८)
देवों ने पश्चिम दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले पशुपति को इस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (८) उग्र एनं देव इष्वास उदीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः. नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (९) देवों ने उत्तर दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले उग्रदेव को इस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (९) तस्मै ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशाद् रुद्रमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१०) जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले उग्रदेव उत्तर दिशा के कोने से इस के पक्ष में रहते हैं, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो पुरुष और पशु इस के अनुकूल होते हैं, उग्रदेव उन की हिंसा नहीं करते. (१०) रुद्र एनमिष्वासो ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (११) ध्रुव दिशा के कोने से देवों ने धनुष धारण करने वाले रुद्र को इस का अनुष्ठान करने वाला बनाया है. (११) तस्मा ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशान्महादेवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१२) बाण धारण करने वाले रुद्र ध्रुव दिशा में इस की रक्षा करते हैं. जो इस बात को जानता है, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो मनुष्य और पशु इस के अनुकूल होते हैं. रुद्र उन की हिंसा नहीं करते. (१२) महादेव एनमिष्वास ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः. नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१३) देवताओं ने ऊपर की दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले महादेव को तेरा अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. जो इस बात को जानता है, महादेव ऊपर की दिशा के कोने से उस की रक्षा करते हैं. जो पुरुष और पशु इस के अनुकूल होते हैं, उन की महादेव हिंसा नहीं करते हैं. (१३) तस्मै सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्य ईशानमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
देवताओं ने उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करने के लिए धनुष धारण करने वाले ईशान को अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (१४) ईशान एनमिष्वासः सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्यो ऽ नुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (१५) नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१६) जो इस बात को जानता है, ईशान उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करते हैं. जो पुरुष एवं पशु उस के अनुकूल होते हैं, ईशान भव और शर्व उन की हिंसा नहीं करते. (१५-१६) सूक्त-६ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स ध्रुवां दिशमनु व्यचलत्.. (१) वह व्रात्य ध्रुव दिशा की ओर चल पड़ा. (१) तं भूमिश्चाग्निश्चौषधयश्च वनस्पतयश्च वानस्पत्याश्च वीरुधश्चानुव्य चलन्.. (२) पृथ्वी, अग्नि, ओषधि, वनस्पति तथा ओषधियां उस के पीछे चले. (२) भूमेरश्च वै सो ३ ग्नेश्चौषधीनां च वनस्पतीनां च वानस्पत्यानां च वीरुधां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३) जो इस बात को जानता है, वह पृथ्वी, अग्नि, ओषधि एवं वनस्पतियों का प्रिय होता है. (३) स ऊर्ध्वां दिशमनु व्यचलत्.. (४) वह ऊपर की दिशा की ओर चला. (४) तमृतं च सत्यं च सूर्यश्च चन्द्रश्च नक्षत्राणि चानुव्यचलन्.. (५) ऋतु, सत्य, सूर्य, चंद्र और नक्षत्र उस के पीछे चले. (५) ऋतस्य च वै स सत्यस्य च सूर्यस्य च चन्द्रस्य च नक्षत्राणां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (६) जो इस बात को जानता है वह सूर्य, चंद्रमा तथा नक्षत्र का प्रिय स्थान होता है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
स उत्तमां दिशमनु व्यचलत्.. (७) वह उत्तर दिशा की ओर चला. (७) तमृचश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म चानुव्यचलन्.. (८) साम, यजु, ऋचाएं और ब्रह्म उस के पीछे चले. (८) ऋचां च वै स साम्नां च यजुषां च ब्रह्मणश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (९) जो इस बात को जानता है, वह साम, यजु, ऋचा और ब्रह्म का प्रिय धाम होता है. (९) स बृहतीं दिशमनु व्यचलत्.. (१०) उस ने बृहती दिशा में गमन किया. (१०) तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्य चलन्.. (११) पुराण, इतिहास तथा मनुष्यों की प्रशंसात्मक गाथाएं उस के पीछेपीछे चलीं. (११) इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१२) इस बात को जो जानता है, वह पुराण, इतिहास तथा गाथाओं का प्रिय धाम बनता है. (१२) स परमां दिशमनु व्यचलत्.. (१३) उस ने परम दिशा की ओर प्रस्थान किया. (१३) तमाहवनीयश्च गार्हपत्यश्च दक्षिणाग्निश्च यज्ञश्च यजमानश्च पशवश्चानुव्य चलन्.. (१४) आहवनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिण अग्नियां उस के पीछेपीछे चलीं. (१४) आहवनीयस्य च वै स गार्हपत्यस्य च दक्षिणाग्नेश्च यज्ञस्य च यजमानस्य च पशूनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१५) जो इस बात को जानता है, आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिण नाम की अग्नियों का वह प्रिय धाम बनता है. (१५) सो ऽ नादिष्टां दिशमनु व्यचलत्.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*
वह अनादिष्ट दिशा की ओर चल पड़ा. (१६) तमृतवश्चार्तवाश्च लोकाश्च लौक्याश्च मासाश्चार्धमासाश्चाहोरात्रे चानुव्य चलन्.. (१७) ऋतुएं, पदार्थ, लोक, मास, पक्ष, दिवस और रात्रि उस के पीछेपीछे चलने लगे. (१७) ऋतूनां च वै स आर्तवानां च लोकानां च लौक्यानां च मासानां चार्धमासानां चाहोरात्रयोश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१८) जो इस बात को जानता है, वह पुरुष ऋतुओं, पदार्थों, लोक, मासों, पक्षों, दिवसों और रात्रियों का प्रिय धाम बनता है. (१८) सो ऽ नावॄत्तां दिशमनु व्यचलत् ततो नावत्स्यैन्नमन्यत.. (१९) वह अनावृत दिशा की ओर चला. (१९) तं दितिश्चादितिश्चेडा चेन्द्राणी चानुव्यचलन्.. (२०) इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति उस के पीछेपीछे चलीं. (२०) दितेश्च वै सो ऽ दितेश्चेडायाश्चेन्द्राण्याश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (२१) जो इस बात को जानता है. वह पुरुष इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति का प्रिय धाम बनता है. (२१) स दिशो ऽ नु व्य चलत् तं विराडनु व्यचलत् सर्वे च देवाः सर्वाश्च देवताः.. (२२) उस ने दिशाओं की ओर गमन किया. विराट्, अदिति देव और देवता उस के पीछेपीछे चलने लगे. (२२) विराजश्च वै स सर्वेषां च देवानां सर्वासां च देवतानां. प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (२३) जो इस बात को जानता है, वह विराट और सभी देवों का प्रिय धाम होता है. (२३) स सर्वानन्तर्देशाननु व्यचलत्.. (२४) वह सभी अंतर्दिशाओं की ओर चला. (२४) तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चानुव्यचलन्.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-७ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
प्रजापति, परमेष्ठी पिता और पितामह उस के पीछे चले. (२५) प्रजापतेश्च वै स परमेष्ठिनश्च पितुश्च पितामहस्य च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (२६) जो पुरुष इस बात को जानता है, वह प्रजापति, परमेष्ठी, पिता और पितामह का प्रिय धाम होता है. (२६) सूक्त-७ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स महिमा सद्भूत्वान्तं पृथिव्या अगच्छत् स समुद्रो ऽ भवत्.. (१) वह बड़ा समर्थ और गतिशाली हो कर पृथ्वी के अंत तक गया है और वह सागर बन गया. (१) तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चापश्च श्रद्धा च वर्षं भूत्वानुव्य वर्तयन्त.. (२) उस के साथ प्रजापति, परमेष्ठी, पिता, पितामह श्रद्धा और वृष्टि हो कर रहने लगे. (२) ऐनमापो गच्छन्त्यैनं श्रद्धा गच्छन्त्यैनं वर्षं गच्छति य एवं वेद.. (३) जो इस बात को जानता है, जल उसे प्राप्त होते हैं. उसे श्रद्धा और वर्षा प्राप्त होती है. (३) तं श्रद्धा च यज्ञश्च लोकश्चान्नं चान्नाद्यं च भूत्वाभिपर्यावर्तन्त.. (४) श्रद्धा, यज्ञ, लोक अन्न और खानपान उस के चारों ओर रहने लगे. (४) ऐनं श्रद्धा गच्छत्यैनं यज्ञो गच्छत्यैनं लोको गच्छत्यैनमन्नं गच्छत्यैनमन्नाद्यं गच्छति य एवं वेद.. (५) जो यह जानता है, उसे श्रद्धा प्राप्त होती है, उसे लोक प्राप्त होते हैं. उस को अन्न प्राप्त होता है और उस को खानपान प्राप्त होता है. (५) सूक्त-८ देवता—अध्यात्म, व्रात्य सो ऽ रज्यत ततो राजन्यो ऽ जायत.. (१) वह अनुरक्त हुआ. उस के बाद वह राजा बन गया. (१) स विशः सबन्धूनन्नमन्नाद्यमभ्युदतिष्ठत्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-९ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
वह प्रजाओं के, बंधुओं के अन्न के और खानपान के अनुकूल व्यवहार करने लगा. (२) विशां च वै स सबन्धूनां चान्नस्य चान्नाद्यस्य च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३) जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह प्रजाओं, अन्नों और खानपान का प्रिय धाम होता है. (३) सूक्त-९ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स विशो ऽ नु व्य चलत्.. (१) उस ने प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार किया. (१) तं सभा च समितिश्च सेना च सुरा चानुव्यचलन्.. (२) इस से समिति, सभा, सेना और सुख उस के अनुकूल हुए. (२) सभायाश्च वै स समितेश्च सेनायाश्च सुरायाश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३) इस बात को जानने वाला सभा, समिति, सेनाओं की सुरानुकूलता प्राप्त करता है. (३) सूक्त-१० देवता—अध्यात्म, व्रात्य तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो राज्ञो ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१) श्रेयांसमेनमात्मनो मानयेत् तथा क्षत्राय ना वृश्चते तथा राष्ट्राय ना वृश्चते.. (२) ऐसा विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस राजा का अतिथि हो, राजा उस का सम्मान करे. ऐसा करने से व्रात्य राष्ट्र को तथा क्षत्र शक्ति को नष्ट नहीं करता. (१-२) अतो वै ब्रह्म च क्षत्रं चोदतिष्ठतां ते अब्रूतां कं प्र विशावेति.. (३) इस के बाद ब्रह्म बल और क्षात्र शक्ति को हम किस में प्रवेश करें. (३) अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्रा विशत्विन्द्रं क्षत्रं तथा वा इति.. (४) ब्रह्मबल बृहस्पति में और क्षात्र बल इंद्र में प्रवेश करे. (४) अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्राविशदिन्द्रं क्षत्रम्.. (५)
तब ब्रह्म बल बृहस्पति में और क्षात्र बल इंद्र में प्रविष्ट हुए. (५) इयं वा उ पृथिवी बृहस्पतिर्द्यौरिवेन्द्रः.. (६) आकाश ही इंद्र है और पृथ्वी ही बृहस्पति है. (६) अयं वा उ अग्निर्ब्रह्मासावादित्यः क्षत्रम्.. (७) आदित्य क्षत्र बल है और अग्नि ब्रह्म बल है. (७) ऐनं ब्रह्म गच्छति ब्रह्मवर्चसी भवति.. (८) यः पृथिवीं बृहस्पतिमग्निं ब्रह्म वेद.. (९) जो पृथ्वी, बृहस्पति और अग्नि को ब्रह्म जानता है, वह ब्रह्म बल और ब्रह्मवर्चस को प्राप्त करता है. (८-९) ऐनमिन्द्रियं गच्छतीन्द्रियवान् भवति.. (१०) य आदित्यं क्षत्रं दिवमिन्द्रं वेद.. (११) जो आदित्य को क्षत्र और द्युलोक को इंद्र जानता है, उसे इंद्रियां प्राप्त होती हैं. (१०-११) सूक्त-११ देवता—अध्यात्म, व्रात्य तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१) स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्य क्वा ऽ वात्सीर्व्रात्योदकं व्रात्य तर्पयन्तु व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्तु व्रात्य यथा ते वशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति.. (२) इस प्रकार का विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस घर में अतिथि हो, उसे स्वयं आसन दे कर कहे —हे व्रात्य! तुम कहां निवास करते हो? यह जल है. हमारे घर के व्यक्ति तुम्हें संतुष्ट करें. तुम्हें जो प्रिय हो, जैसा तुम्हारा वश हो और जैसा तुम्हारा काम हो उसी प्रकार का रहे. (१-२) यदेनमाह व्रात्य क्वा ऽ वात्सीरिति पथ एव तेन देवयानानव रुन्ध्धे.. (३) यह कहने पर कि हे व्रात्य! तुम कहां रहोगे? देवयान मार्ग ही खुल जाता है. (३) यदेनमाह व्रात्योदकमित्यप एव तेनाव रुन्ध्धे.. (४) व्रात्य से यह कहने वाला कि हे व्रात्य! यह जल है, अपने लिए जल को ही खोल लेता ebook converter DEMO Watermarks*
है. (४) यदेनमाह व्रात्य तर्पयन्विति प्राणमेव तेन वर्षीयांसं कुरुते.. (५) यह कहने वाला कि हमारे व्यक्ति तुम्हें तृप्त करें, अपने ही प्राणों को सींचता है. (५) यदेनमाह व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्त्विति प्रियमेव तेनाव रुन्द्धे.. (६) ऐसा जानने वाला व्यक्ति प्रिय पुरुष को प्राप्त होता हुआ प्रिय पुरुष का भी प्रिय हो जाता है. (६) ऐनं प्रियं गच्छति प्रियः प्रियस्य भवति य एवं वेद.. (७) यह कहने वाला कि जैसा तुम्हारा वक्ष है वैसा ही हो, अपने हेतु वक्ष को खोल लेता है. (७) यदेनमाह व्रात्य यथा ते वशस्तथास्त्विति वशमेव तेनाव रुन्द्धे.. (८) यह कहने वाला कि जैसा तुम्हारी इच्छा है, वैसा ही हो, अपने लिए इच्छाओं को ही खोल लेता है. (८) ऐनं वशो गच्छति वशी वशिनां भवति य एवं वेद.. (९) इस बात को जानने वाला वश को प्राप्त करता है. वह वश में करने वालों को भी वश में कर लेता है. (९) यदेनमाह व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति निकाममेव तेनाव रुन्द्धे.. (१०) यह कहने वाला कि तुम्हारा निवास जैसा है, वैसा ही हो, अपने लिए कामनाओं का द्वार खोल लेता है. (१०) ऐनं निकामो गच्छति निकामे निकामस्य भवति य एवं वेद.. (११) इस प्रकार जानने वाला अभीष्ट को प्राप्त करता है. (११) सूक्त-१२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्य उद्धृतेष्वग्निष्वाधिश्रिते ऽ ग्निहोत्रे ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१) स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्याति सृज होष्यामीति.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस के घर में ऐसा विद्वान् व्रतधारी अतिथि बन कर उस समय आए, जब अग्नियां प्रदीप्त हो गई हों और अग्निहोम चल रहा हो तो गृहस्थ स्वयं उस के सामने जा कर कहे कि हे व्रती! तुम आज्ञा दो, मैं हवन करूंगा. (१-२) स चातिसृजेज्जुहुयान्न चातिसृजेन्न जुहुयात्.. (३) अतिथि विद्वान् आज्ञा दे, तभी हवन करे. यदि वह आज्ञा न दे तो हवन न करे. (३) स य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति.. (४) प्र पितृयाणं पन्थां जानाति प्र देवयानम्.. (५) जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, वह पितृयान और देवयान मार्ग पर जाता है. (४-५) न देवेष्वा वृश्चते हुतमस्य भवति.. (६) पर्यस्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति.. (७) जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, उस का अग्नि होम सफल होता है तथा देवों इस का कोई दोष नहीं होता. इस लोक के उस गृहस्थ का आश्रम सुरक्षित रहता है. (६-७) अथ य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो जुहोति.. (८) न पितृयाणं पन्थां जानाति न देवयानम्.. (९) जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा के बिना हवन करता है, वह न पितृयान मार्ग को जानता है और न देवयान मार्ग का उसे ज्ञान होता है. (८-९) आ देवेषु वृश्चते अहुतमस्य भवति.. (१०) उस का हवन विफल होता है और वह देवों का अपराधी होता है. (१०) नास्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो जुहोति.. (११) इस लोक में उस का आधार नहीं रहता, जो ऐसे विद्वान् की आज्ञा के बिना हवन करता है. (११) सूक्त-१३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
ये पृथिव्यां पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (२) जिस के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य रात्रि में अतिथि होता है, वह उस के आने के फल से पृथ्वी के सभी पुण्य लोकों पर विजय प्राप्त करता है. (१-२) तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो द्वितीयां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (३) ये३न्तरिक्षे पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (४) जिस गृहस्थ के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य रात्रि में निवास करता है, वह गृहस्थ उस के फल के रूप में अंत में स्थित सभी पुण्य लोकों को जीत लेता है. (३-४) तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यस्तृतीयां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (५) ये दिवि पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (६) यदि ऐसा विद्वान् व्रात्य अतिथि के रूप में गृहस्थ के घर में तीसरी रात्रि में भी निवास करता है तो उस के फल से वह गृहस्थ आकाश में स्थित समस्त पुण्य लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (५-६) तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यश्चतुर्थीं रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (७) ये पुण्यानां पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे. (८) जिस गृहस्थ के घर में ऐसा व्रात्य चौथी रात निवास करता है तो उस के फल के रूप में वह गृहस्थ पुण्यात्माओं के सभी लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (७-८) तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो ऽ परिमिता रात्रीरतिथिर्गृहे वसति.. (९) य एवापरिमिताः पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (१०) जिस गृहस्थ के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य अनेक रातों तक निवास करता है तो उस के फल के रूप में वह गृहस्थ अनेक पुण्य लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (९-१०) अथ यस्याव्रात्यो व्रात्यब्रुवो नामबिभ्रत्यतिथिर्गृहानागच्छेत्.. (११) कर्षेदेनं न चैनं कर्षेत्.. (१२) जिस के घर अपनेआप को व्रात्य बताने वाला कोई अव्रात्य आए तो क्या गृहस्थ उसे अपने घर से भगा दे. नहीं, उस को भी भगाना नहीं चाहिए. (११-१२) अस्यै देवताया उदकं याचामीमां देवतां वासय इमामिमां देवतां परि वेवेष्मीत्येनं परि वेविष्यात्.. (१३) मैं इस देवता को अपने घर में निवास देता हूं. मैं इस से जल ग्रहण करने की प्रार्थना करता हूं. मैं इस देवता के लिए भोजन परोसता हूं. ऐसा स्वीकार करता हुआ उस के लिए ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
भोजन परोसना आदि कार्य करे. (१३) तस्यामेवास्य तद् देवतायां हुतं भवति य एवं वेद.. (१४) जो इस बात को जानता है, उस की आहुति देवताओं के लिए दी जाने पर उत्तम आहुति बन जाती है. (१४) सूक्त-१४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स यत् प्राचीं दिशमनु व्यचलन्मारुतं शर्धो भूत्वानुव्य चलन्मनो ऽ न्नादं कृत्वा.. (१) जब वह पूर्व दिशा की ओर चला, तब उस ने बलशाली हो कर अपनी आयु के अनुकूल आचरण करते हुए अपने मन को अन्नाद अर्थात् अन्न खाने वाला बनाया. (१) मनसान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२) जो मनुष्य इस बात को जानता है, वह अन्नाद मन से अन्न को खाता है. (२) स यद् दक्षिणां दिशमनु व्यचलदिन्द्रो भूत्वानुव्य चलद् बलमन्नादं कृत्वा.. (३) जब वह दक्षिण दिशा की ओर गया, तब वह अपने बल को अन्नाद बताता हुआ इंद्र बन कर गमनशील हुआ. (३) बलेनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (४) इस बात को जानने वाला अन्नाद बल से अन्न का सेवन करता है. (४) स यत् प्रतीचीं दिशमनु व्यचलद् वरुणो राजा भूत्वानुव्य चलदपो ऽ न्नादी: कृत्वा.. (५) जब वह पश्चिम दिशा की ओर चला, तब वह जल को अन्नाद बताता हुआ वरुण बन कर गतिशील हुआ. (५) अद्भिरन्नादिभिरन्नमत्ति य एवं वेद.. (६) इस बात को जानने वाला अन्नाद जल से अन्न का भक्षण करता है. (६) स यदुदीचीं दिशमनु व्यचलत् सोमो राजा भूत्वानुव्य चलत् सप्तर्षिभिर्हुत आहुतिमन्नादीं कृत्वा.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
जब वह उत्तर दिशा की ओर चला, तब वह सप्तर्षियों द्वारा दी गई आहुति को अन्नाद बना कर तथा सोम हो कर चला. (७) आहुत्यान्नाद्यान्नमत्ति य एवं वेद.. (८) इस बात को जानने वाला अन्नाद आहुति से अन्न का भक्षण करता है. (८) स यद् ध्रुवां दिशमनु व्यचलद् विष्णुर्भूत्वानुव्यचलद् विराजमन्नादीं कृत्वा.. (९) जब वह ध्रुव दिशा की ओर चला, तब विराट् को अन्नाद बता कर स्वयं विष्णु रूप में चला. (९) विराजान्नाद्यान्नमत्ति य एवं वेद.. (१०) इस बात को जानने वाला अन्नाद विराट के द्वारा अन्न का भक्षण करता है. (१०) स यत् पशूननु व्यचलद् रुद्रो भूत्वानुव्य चलदोषधीरन्नादीः कृत्वा.. (११) जब वह पशुओं की ओर चला तब ओषधियों को अन्नाद बनाते हुए उस ने रुद्र के रूप में गमन किया. (११) ओषधीभिरन्नादीभिरन्नमत्ति य एवं वेद.. (१२) इस बात को जानने वाला अन्नाद ओषधियों से अन्न को खाता है. (१२) स यत् पितॄननु व्यचलद् यमो राजा भूत्वानुव्य चलत् स्वधाकारमन्नादं कृत्वा.. (१३) जब वह पितरों की ओर चला, तब उस ने स्वधा को अन्नाद बनाया और वह हो स्वयं यमराजा बन कर चला. (१३) स्वधाकरेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (१४) इस बात को जानने वाला स्वधाकार अन्नाद से अन्न को खाता है. (१४) यन्मनुष्या ३ ननु व्यचलदग्निर्भूत्वानुव्य चलत् स्वाहाकारमन्नादं कृत्वा.. (१५) जब वह मनुष्यों की ओर चला, तब स्वाहा को अन्नाद बना कर अग्नि होता हुआ चला. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
स्वाहाकारेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (१६) इस बात को जानने वाला स्वाहाकार अन्नाद के द्वारा अन्न का सेवन करता है. (१६) स यदूर्ध्वां दिशमनु व्यचलद् बृहस्पतिर्भूत्वानुव्य चलद् वषट्कारमन्नादं कृत्वा.. (१७) जब वह ऊर्ध्व दिशा की ओर चला, तब वषट्कार को अन्नाद बना कर बृहस्पति बनता हुआ चला. (१७) वषट्कारेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (१८) इस बात को जानने वाला वषट्कार रूप अन्नाद के द्वारा अन्न का भक्षण करता है. (१८) स यद् देवाननु व्यचलदीशानों भूत्वानुव्य चलन्मन्युमन्नादं कृत्वा.. (१९) जब वह देवता की ओर चला, तब यज्ञ को अन्नाद बना कर ईशान बनता हुआ चला. (१९) मन्युनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२०) इस बात को जानने वाला अन्नाद यज्ञ के द्वारा अन्न को खाता है. (२०) स यत् प्रजा अनु व्यचलत् प्रजापतिर्भूत्वानुव्य चलत् प्राणमन्नादं कृत्वा.. (२१) जब वह प्रजाओं की ओर चला, तब प्राण को अन्नाद बना कर प्रजापति के रूप में चला. (२१) प्राणेनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२२) इस बात को जानने वाला अन्नाद प्राण के द्वारा अन्न का भोजन करता है. (२२) स यत् सर्वानन्तर्देशाननु व्यचलत् परमेष्ठी भूत्वानुव्य चलद् ब्रह्मान्नादं कृत्वा.. (२३) जब वह सब अंतर्देशों की ओर चला, तब ब्रह्म को अन्नाद बना कर प्रजापति बनाता हुआ चला. (२३) ब्रह्मणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२४) ebook converter DEMO Watermarks*