अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
से दूर चले जाएं. (७) अध रात्रि तृष्टधूममशीर्षाणमहिं कृणु. हनू वृकस्य जम्भयास्तेन तं द्रुपदे जहि.. (८) हे रात्रि! प्यास उत्पन्न करने वाले तथा धुआं छोड़ने वाले सर्प को तुम बिना शीश वाला बनाओ अर्थात् मार डालो. दृढ़ दाढ़ों के कारण दूसरों का भक्षण करने वाले भेड़ियों को टूटी हुई ठोड़ी वाला बना कर नष्ट करो. हे सर्वत्र व्याप्त रात्रि उस भेड़िए को मारो. (८) त्वयि रात्रि वसामसि स्वपिष्यामसि जागृहि. गोभ्यो नः शर्म यच्छाश्वेभ्यः पुरुषेभ्यः.. (९) हे रात्रि! हम तुझ में निवास करते हैं. हम रात्रि के समय सोते हैं, पर तुम जाग्रत रहो. तुम हमारी गायों को, घोड़ों को तथा परिवारी जनों को सुख प्रदान करो. (९) सूक्त-४८ देवता—रात्रि अथो यानि च यस्मा ह यानि चान्तः परीणहि. तानि ते परि दद्मसि.. (१) मुझ से संबंधित जो बाहरी वस्तुएं गोचर तथा खुले प्रदेश में हैं तथा जो आसपास के घरों में विद्यमान हैं, मैं वे सभी वस्तुएं तुझे देता हूं. (१) रात्रि मातरुषसे नः परि देहि. उषा नो अह्वे परि ददात्वहस्तुभ्यं विभावरि.. (२) हे माता रात्रि! हमें उषाःकाल को प्रदान करो तथा उषाःकाल हमें दिन को प्रदान करे. हे रात्रि! दिन हमें तुम को प्रदान करें. (२) यत् किं चेदं पतयति यत् किं चेदं सरीसृपम्. यत् किं च पर्वतायासत्वं तस्मात् त्वं रात्रि पाहि नः.. (३) जो पक्षी आदि आकाश में संचरण करते हैं, जो धरती पर सरकने वाले सर्प आदि हैं, जो पर्वत संबंधी जीव—जंतु हैं, हे रात्रि उन से हमारी रक्षा करो. (३) सा पश्चात् पाहि सा पुरः सोत्तरादधरादुत. गोपाय नो विभावरि स्तोतारस्त इह स्मसि.. (४) हे पूर्व उक्त लक्षणों वाली रात्रि! तुम पश्चिम दिशा में, पूर्व दिशा में, उत्तर दिशा में तथा दक्षिण दिशा में हमारी रक्षा करो. हे रात्रि! हमारी रक्षा करो. हम इस समय तुम्हारी स्तुति ebook converter DEMO Watermarks*
करने वाले हों. (४) ये रात्रिमनुतिष्ठन्ति ये च भूतेषु जाग्रति. पशून् ये सर्वान् रक्षन्ति ते न आत्मसु जाग्रति ते नः पशुषु जाग्रति.. (५) जो मनुष्य रात्रि के समय अर्चनपूजन आदि अनुष्ठान करते हैं तथा जो भवन संबंधी प्राणियों के कारण जागते हैं, जो सभी पशुओं की रक्षा करते हैं, वे हमारे तथा हमारे पुत्र आदि की रक्षा के लिए जागते हैं, वे पशुओं की रक्षा के लिए भी जागें. (५) वेद वै रात्रि ते नाम घृताची नाम वा असि. तां त्वां भरद्वाजो वेद सा नो वित्ते ऽ धि जाग्रति.. (६) हे रात्रि! मैं तेरे नामों को जानता हूं. तू दीप्तिमती नाम वाली है. ऐसी तुझ रात्रि को भरद्वाज जानते हैं. वह रात्रि हमारे धन की रक्षा के लिए जागृत रहे. (६) सूक्त-४९ देवता—रात्रि इषिरा योषा युवतिर्दमूना रात्री देवस्य सवितुर्भर्गस्य. अश्वक्षभा सुहवा संभृतश्रीरा पप्रौ द्यावापृथिवी महित्वा.. (१) सब के द्वारा प्रार्थनीय, यौवन वाली तथा श्रेष्ठ मन वाली रात्रि सभी के प्रेरक सविता और भग देव की पत्नी है. यह अपने विषय में चक्षु आदि इंद्रियों का तिरस्कार करती है. यह उत्तम हवन करने योग्य तथा संपूर्ण कांति वाली रात्रि अपने महत्त्व से द्यावा और पृथ्वी को पूर्ण करती है. (१) अति विश्वान्यरुहद् गम्भीरो वर्षिष्ठमरुहन्त श्रविष्ठाः. उशती रात्र्यनु सा भद्राभि तिष्ठते मित्र इव स्वधाभिः.. (२) जिस में प्रवेश करना कठिन है, ऐसी रात्रि सभी चराचर वस्तुओं को व्याप्त कर के वर्तमान है. इस अतिशय अन्न वाली रात्रि की सब स्तुति करते हैं. यह वन, पर्वत, सागर आदि को व्याप्त कर के स्थित है. यजमान आदि के द्वारा प्रदत्त अन्न आदि साधनों से सूर्य जिस प्रकार अपने तेज से प्रतिक्षण विश्व को आक्रांत करते हैं, उसी प्रकार यह रात्रि भी जगत् पर छा जाती है. (२) वर्यै वन्दे सुभगे सुजात आजगन् रात्रि सुमना इह स्याम्. अस्मांस्त्रायस्व नर्याणि जाता अथो यानि गव्यानि पुष्ट्या.. (३) हे न रुकने वाले प्रभाव वाली, सभी के द्वारा स्तुति की गई, सौभाग्य वाली तथा भलीभांति उत्पन्न रात्रि! तुम आ गई हो. तुम्हारे आने पर मैं सुंदर मन वाला बनूं. मेरा पालन करो तथा उत्पन्न वस्तुओं को, मनुष्यों की हितकारी वस्तुओं को तथा पुष्ट करने वाली गाय ebook converter DEMO Watermarks*
आदि जो हितकारी वस्तुएं हैं, उन की रक्षा करो. (३) सिंहस्य रात्र्युशती पींपस्य व्याघ्रस्य द्वीपिनो वर्च आ ददे. अश्वस्य ब्रध्नं पूरुषस्य मायुं पुरु रूपाणि कृणुषे विभाती.. (४) इच्छा करती हुई यह रात्रि सिंह, हाथी, गैंडा, बाघ आदि के तेजों का अपहरण करती है. यह अश्व के वेग को तथा पुरुष के शब्द को खींच लेती है. हे रात्रि! तुम दीप्तिमती हो कर नाना प्रकार के रूप धारण करती हो. (४) शिवां रात्रिमनुसूर्यं च हिमस्य माता सुहवा नो अस्तु. अस्य स्तोमस्य सुभगे नि बोध येन त्वा वन्दे विश्वासु दिक्षु.. (५) हे रात्रि! मैं कल्याण करने वाली तेरी तथा सूर्य की वंदना करता हूं. तुषार की माता रात्रि हमारे उत्तम आह्वान का विषय हो. हे सौभाग्यशालिनी रात्रि! तुम इस समय किए जाते हुए हमारे स्तोत्र को जानो. इस स्तोत्र के द्वारा हम सभी दिशाओं में तेरी वंदना करते हैं. (५) स्तोमस्य नो विभावरि रात्रि राजेव जोषसे. आसाम सर्ववीरा भवाम सर्ववेदसो व्युच्छन्तीरनुषस:.. (६) हे प्रकाशित होती हुई रात्रि! जिस प्रकार राजा स्तोताओं के द्वारा की जाती हुई स्तुति को ध्यानपूर्वक सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को सावधान हो कर सुनो. अंधकार का विनाश करती हुई एवं उषा:काल के पश्चात आती हुई रात्रि की कृपा से हम वीर पुत्रों, पौत्रों और सेवकों वाले बनें तथा सभी प्रकार के धन से संपन्न हों. (६) शम्या ह नाम दधिषे मम दिप्सन्ति ये धना. रात्रीहि तानसुतपा य स्तेनो न विद्यते यत् पुनर्न विद्यते.. (७) हे रात्रि! तुम शम्या अर्थात् शत्रु के बल को शांत करने वाला नाम धारण करती हो. जो शत्रु मेरे धनों का अपहरण करने की इच्छा करते हैं, हे रात्रि! तुम उन शत्रुओं के प्राणों को संतप्त करती हुई आओ. मेरा विरोधी जो दिखाई दे रहा है, वह पुनः दिखाई न दे. (७) भद्रासि रात्रि चमसो न विष्टो विष्वङ् गोरूपं युवतिर्बिभर्षि. चक्षुष्मती मे उशती वपूंषि प्रति त्वं दिव्या न क्षाममुक्था:.. (८) हे रात्रि! तुम चम्मच के समान कल्याण रूपा हो. तुम सर्वत्र व्याप्त यौवन वाली गाय का रूप धारण करती हो. हमारा पोषण करने की कामना करती हुई एवं देखने की शक्ति से संपन्न तुम मेरे तथा मेरे पुत्र आदि के शरीरों की रक्षा करो. जिस प्रकार दिव्य पुरुष शरीर का त्याग नहीं करते, उसी प्रकार तुम धरती को मत छोड़ो. (८) यो अद्य स्तेन आयत्यघायुर्मर्त्यो रिपु:. ebook converter DEMO Watermarks*
रात्री तस्य प्रतीत्य प्र ग्रीवाः प्र शिरो हनत्.. (९) इस समय जो चोर, हिंसा करने वाला तथा मरणधर्मा शत्रु आता है, हे सुंदर रूप वाली रात्रि! मेरे समीप आने वाले शत्रु के समीप जा कर उस की जिह्वा और शीश को काट दो. (९) प्र पादौ न यथायति प्र हस्तौ न यथाशिषत्. यो मलिम्लुरुपायति स संपिष्टो अपायति. अपायति स्वपायति शुष्के स्थाणावपायति.. (१०) हे रात्रि! तुम मेरे शत्रु के पैरों को इस प्रकार काट दो कि वह फिर आने योग्य न रहे. तुम उस के हाथों को इस प्रकार काट दो जिस से वह मेरा आलिंगन न कर सके. जो चोर मेरे समीप आता है. उसे इस प्रकार पीस दो कि वह मुझ से दूर चला जाए. वह भलीभांति पूर्ण रूप से चला जाए. वह मेरे पास से जा कर सूखे खंभे का आश्रय प्राप्त करे. (१०) सूक्त-५० देवता—रात्रि अध रात्रि तृष्टधूममशीर्षाणमहिं कृणु. अक्षौ वृकस्य निर्जह्यास्तेन तं द्रुपदे जहि.. (१) हे रात्रि! जिस सर्प की धुएं के समान सांस कष्टदायक है, उस का सिर काट दो. भेड़िए को नेत्रहीन कर के वृक्ष के नीचे मार डालो. (१) ये ते रात्र्यनड्वाहस्तीक्ष्णशृङ्गाः स्वाशवः. तेभिर्नो अद्य पारयाति दुर्गाणि विश्वाहा.. (२) हे रात्रि! तुम्हारे वाहन जो नुकीले सींगों वाले तथा अत्यधिक शीघ्र चलने वाले बैल हैं, उन के द्वारा हमें सभी रात्रियों के सभी अनर्थों से पार कराओ. (२) रात्रिंरात्रिमरिष्यन्तस्तरेम तन्वा वयम्. गम्भीरमप्लवा इव न तरेयुररातयः.. (३) सभी रात्रियों में गमन करते हुए हम शरीर से पुनः पौत्र आदि के साथ रात्रि को पार करें. हमारे शत्रु नदी पार करने के साथ नाव आदि से हीन पुरुषों के समान रात्रि को पार न कर पाएं अर्थात् रात्रि में ही नष्ट हो जाएं. (३) यथा शाम्याकः प्रपतन्नपवान् नानुविद्यते. एवा रात्रि प्र पातय यो अस्माँ अभ्यघायति.. (४) जिस प्रकार सवां अन्न पकने पर गिरता हुआ सारहीन हो जाता है तथा बिलकुल नहीं बचता, हे रात्रि! जो हमारे प्रति हिंसा करने की इच्छा रखता है, उसे उसी प्रकार गिरा दो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
अप स्तेनं वासो गोअजमुत तस्करम्. अथो यो अर्वतः शिरो ऽ भिधाय निनीषति.. (५) जो चोर हमारे वस्त्र, गायें तथा बकरियां ले जाना चाहते हैं तथा जो हमारे घोड़ों के सिरों को रस्सी से बांध कर ले जाना चाहते हैं, उन्हें दूर भगाओ. (५) यदद्या रात्रि सुभगे विभजन्त्ययो वसु. यदेतदस्मात् भोजय यथेदन्यानुपायसि.. (६) हे सौभाग्यशालिनी रात्रि! आज जो चोर स्वर्ण आदि धातुओं का अपहरण करते हैं, उस धन को हमारे उपभोग का साधन बनाओ. इस से शत्रु द्वारा छीने गए हमारे घोड़े, हाथी भी हमें प्राप्त हो जाएं. (६) उषसे नः परि देहि सर्वान् रात्र्यनागसः. उषा नो अह्ने आ भजादहस्तुभ्यं विभावरि.. (७) हे रात्रि! हम सभी स्तुतिकर्ताओं तथा पशुओं, पुत्रों, मित्र आदि को रक्षण के लिए उषा को प्रदान करो. हे विभावरी! उषः हम सब को दिन प्रदान करे तथा दिन पुनः तुम्हें प्राप्त करे. (७) सूक्त-५१ देवता—आत्मा, सविता अयुतो ऽ हमयुतो म आत्मायुतं मे चक्षुरयुतं मे श्रोत्रमयुतो मे. प्राणो ऽ युतो मे ऽ पानो ऽ युतो मे व्यानो ऽ युतो ऽ हं सर्वः.. (१) कर्म का अनुष्ठान करने का इच्छुक मैं पूर्ण हूं. मेरा शरीर पूर्ण है, मेरी आत्मा पूर्ण है, मेरे नेत्र, कान, मेरी प्राण वायु, मेरी अपान वायु तथा मेरी व्यान वायु पूर्ण है. इस प्रकार मैं सभी दृष्टि से पूर्ण हूं. (१) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽ श्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रसूत आ रभे.. (२) हे कर्म! मैं सब के प्रेरक सविता देव की आज्ञा से, अश्विनीकुमारों की भुजाओं से तथा पूषा देव के हाथों से तेरा आरंभ करता हूं. (२) सूक्त-५२ देवता—काम कामस्तदग्रे समवर्तत मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्. स काम कामने बृहता सयोनी रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
इस वर्तमान सृष्टि के पहले परमेश्वर के मन में काम भलीभांति व्याप्त हो गया. माया में विलीन अंतःकरण में वही काम बीज बना. हे काम! सारे संसार का निर्माण करने के लिए उत्पन्न किए गए तुम महान परमेश्वर के द्वारा समान कारण बने. हे काम! तुम यजमान को धन की अधिकता प्रदान करो. (१) त्वं काम सहसासि प्रतिष्ठितो विभुर्विभावा सख आ सखीयते. त्वमुग्रः पृतनासु सासहिः सह ओजो यजमानाय धेहि.. (२) हे काम! तुम अपने सामर्थ्य से प्रतिष्ठित हो. हे व्यापक एवं विशेष दीप्ति वाले! तुम हमारे प्रति मित्र के समान आचरण करते हो. हे काम! तुम क्रोधित होने पर शत्रु सेनाओं को सहन करते हो. तुम यजमान को ऐसा बल प्रदान करो जो शत्रु को पराजित करने में समर्थ हो. (२) दूराच्चकमानाय प्रतिपाणायाक्षये. आस्मा अशृण्वन्नाशाः कामेनाजनयन्त्स्वः.. (३) अति दुर्लभ फल की इच्छा करने वाले मुझ को सभी ओर से रक्षा करने के लिए तथा अनिष्ट के निवारण के लिए सभी दिशाएं काम के सहयोग से सुख उत्पन्न करें. (३) कामेन मा काम आगन् हृदयाद् हृदयं परि. यदमीषामदो मनस्तदैतूप मामिह.. (४) फल विषयक इच्छा से काम मेरे समीप आए. ब्राह्मणों का फल प्राप्त करने वाला मन भी मुझे प्राप्त हो. (४) यत्काम कामयमाना इदं कृण्मसि ते हविः. तन्नः सर्वं समृध्यतामथैतस्य हविषो वीहि स्वाहा.. (५) हे काम! जिस फल की इच्छा करते हुए हम तेरे लिए हवि प्रदान करते हैं, उस हवि का तुम भक्षण करो. यह हवि तुम्हें भलीभांति प्राप्त हो. हम ने जो कामना की है, यह सभी प्रकार से पूर्ण हो. (५) सूक्त—५३ देवता—काल कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः. तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा.. (१) सात किरणों अथवा रस्सियों वाला, हजार नेत्रों वाला, वृद्धावस्था रहित तथा अत्यधिक वीर्य से युक्त कालरूपी घोड़ा रथ को खींचता है. सभी लोक उस के चक्र अर्थात् पहिए हैं. विद्वान् पुरुष उस रथ पर सवार होते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः. स इमा विश्वा भुवनान्यज्जत् कालः स ईयते प्रथमो नु देवः.. (२) यह काल रूप परमात्मा क्रम से पहियों के समान सात ऋतुओं को धारण करता है. इस संवत्सर रूप काल की सात नाभियां हैं और इस के अक्ष अर्थात् अरे नष्ट न होने वाले हैं. वह संवत्सर रूप काल उन सात भुवनों तथा इन में रहने वाले प्राणियों को व्यक्त करता हुआ सब से पहले उत्पन्न एवं दिव्य है. (२) पूर्णः कुम्भो ऽ धि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तम्ः. स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यङ् कालं तमाहुः परमे व्योमन्.. (३) यह ब्रह्मांड रूप भरा हुआ कुंभ अर्थात् घड़ा संवत्सर रूपी काल पर रखा हुआ है. संत अर्थात् ज्ञानी पुरुष उस काल के दिवस, रात्रि आदि अनेक रूपों को देखते हैं. यह काल रूप परमात्मा सभी उपस्थित प्राणियों के सामने प्रकट होता है तथा उन्हें अपने में मिला लेता है. इस काल को आकाश के समान निर्लेप कहा जाता है. (३) स एव सं भुवनान्याभरत् स एव सं भुवनानि पर्यैत्. पिता सन्नभवत् पुत्र एषां तस्माद् वै नान्यत् परमस्ति तेजः.. (४) वही काल सब भुवनों को उत्पन्न करता है. वही काल सब भुवनों में व्याप्त होता है. वही काल इन भुवनों को उत्पन्न करने वाला पिता होता हुआ पुत्र भी होता है. उस काल के अतिरिक्त कोई भी तेज महान नहीं है. (४) कालोऽमूं दिवमजनयत् काल इमाः पृथिवीरुत. काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वि तिष्ठते.. (५) काल रूप परमात्मा ने इस द्युलोक अर्थात स्वर्ग को जन्म दिया. काल ने उन पृथ्वियों को उत्पन्न किया. काल में ही यह भूत, भविष्य एवं वर्तमान विश्व चेष्टा करता है. (५) कालो भूतिमसृजत काले तपति सूर्यः. काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्वि पश्यति.. (६) काल ने भवनों वाले संसार को उत्पन्न किया है. काल की प्रेरणा से ही सूर्य संसार को प्रकाशित करता है. सभी प्राणी काल में ही वर्तमान रहते हैं. चक्षु आदि इंद्रियां अपना काम करती हैं. (६) काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्. कालेन सर्वा नन्दन्त्यागतेन प्रजा इमाः.. (७) काल में मन, प्राण तथा नाम व्याप्त हैं. ये सब प्रजाएं वसंत आदि रूप काल के कारण ebook converter DEMO Watermarks*
प्रसन्न रहती है. (७) काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्. कालो ह सर्वस्येश्वरो यः पितासीत् प्रजापतेः.. (८) काल में तप, काल में संसार का कारण हिरण्य गर्भ व्याप्त है. काल में ही अंगों सहित वेद व्याप्त था. काल ही सब का स्वामी है. काल ही प्रजाओं का ईश्वर और पिता था. (८) तेनेषितं तेन जातं तदु तस्मिन् प्रतिष्ठितम्. कालो ह बह्म भूत्वा बिभर्ति परमेष्ठिनम्.. (९) काल ने इस संसार को बनाने की इच्छा की. काल से उत्पन्न जगत् काल में ही प्रतिष्ठित हुआ. काल ही बल बन कर परमेष्ठी ब्रह्म को धारण करता है. (९) कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्. स्वयम्भूः कश्यपः कालात् तपः कालादजायत.. (१०) काल ने प्रजाओं को उत्पन्न किया. काल ने सृष्टि के आरंभ में प्रजापति को उत्पन्न किया. काल से ही स्वयं भू ब्रह्मा और कश्यप ऋषि उत्पन्न हुए. तेज भी काल से ही उत्पन्न हुआ. (१०) सूक्त—५४ देवता—काल कालादापः समभवत् कालाद् ब्रह्म तपो दिशः. कालेनोदेति सूर्यः काले नि विशते पुनः.. (१) काल से जलों की उत्पत्ति हुई. काल से ब्रह्म अर्थात् यज्ञ आदि कर्म, चांद्रायण आदि तप तथा पूर्व आदि दिशाएं उत्पन्न हुईं. काल के कारण ही सूर्य उदय होता है तथा काल में ही अस्त हो जाता है. (१) कालेन वातः पवते कालेन पृथिवी मही. द्यौर्मही काल आहिता.. (२) काल के कारण वायु चलती है. काल के कारण पृथ्वी महिमामयी है. द्युलोक काल से महिमामय है तथा काल के आश्रित है. (२) कालो ह भूतं भव्यं च पुत्रो अजनयत् पुरा. कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत.. (३) पहले काल से भूत, भविष्य, पुत्र तथा ऋचाएं उत्पन्न हुईं. काल से ही यजुर्वेद का जन्म हुआ. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
कालो यज्ञं समैरयद्देवेभ्यो भागमक्षितम्. काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः.. (४) काल ने यज्ञ को देवताओं के भाग के रूप में प्रकट किया. काल में गंधर्व, अप्सराएं एवं सब लोक प्रतिष्ठित हैं. (४) काले ऽ यमङ्गिरा देवो ऽ थर्वा चाधि तिष्ठतः. इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान् विधृतीश्च पुण्याः. सर्वांल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालःस ईयते परमो नु देवः.. (५) ये अंगिरा देव और अथर्वा ऋषि अधिष्ठित हैं. इस लोक को, परलोक को, पुण्यलोकों को, दुःखरहित लोकधारकों को, सभी कहे गए और बिना कहे गए लोकों को यह ब्रह्म रूप काल व्याप्त कर के उत्तम काल देव सभी स्थावर और जंगम जगत् को उत्पन्न करता है. (५) सूक्त—५५ देवता—अग्नि रात्रिंरात्रिम्प्रयातं भरन्तो ऽ श्वायेव तिष्ठते घासमस्मै. रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम (१) हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के साधन के रूप में गार्हपत्य आदि यज्ञशालाओं में वर्तमान हो. जिस प्रकार घोड़े को घास दी जाती है, उसी प्रकार तुम्हारे लिए हम यह खाने योग्य हवि रातदिन प्रदान करते हुए अन्न और धन से प्रसन्न होते हुए तुम्हारा सामीप्य प्राप्त करें तथा हमें नाश की प्राप्ति न हो. (१) या ते वसोर्वात इषुः सा त एषा तया नो मृड. रासस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम.. (२) हे निवास करने वाले अग्नि देव! तुम्हारी तथा अन्य देवों की जो कृपामयी बुद्धि है, अपनी इस बुद्धि से हमारी रक्षा करो. धन और अन्न से प्रसन्न होते हुए हम तुम्हारा सामीप्य प्राप्त करें और हम नाश को प्राप्त न हों. (२) सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातःप्रातः सौमनसस्य दाता. वसोर्वसोर्वसुदान एधि वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम.. (३) गृहपति द्वारा आधान की गई अग्नि सायं और प्रातः तथा सभी कालों में सुख को देने वाली हो. हे अग्नि! तुम सभी प्रकार के धनों को देने वाली बनो. तुम्हें हवि के द्वारा प्रदीप्त करते हुए हम पुत्र, मित्र आदि सभी के शरीरों को पुष्ट करें. (३) प्रातःप्रातर्गृहपतिर्नो अग्निः सायंसायं सौमनसस्य दाता. वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतंहिमा ऋधेम.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे गृहपति द्वारा आधान की गई अग्नि! तुम सायं और प्रातः हमें सुख देने वाली बनो. हे धन प्रदान करने वाली अग्नि! तुम वृद्धि प्रदान करो. हम तुम्हें हवि द्वारा दीप्त करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहें. (४) अपश्चा दग्धान्नस्य भूयासम्. अन्नादायान्नपतये रुद्राय नमो अग्नये. सभ्यः सभां मे पाहि ये च सभ्याः सभासदः.. (५) बटलोई के निचले भाग में जले हुए भोजन को प्राप्त करने वाला मैं न बनूं. तात्पर्य यह है कि मैं अधिक भोजन प्राप्त करूं. अन्न प्रदान करने वाले अग्नि और अन्न के स्वामी रुद्र के लिए नमस्कार है. हे सभा के योग्य अग्नि! तुम मेरी सभा अर्थात् पुत्र, मित्र, पशु आदि के समूह की रक्षा करो. जो उस समूह में स्थित रहने वाले हैं, हे अग्नि देव! उन की रक्षा करो. (५) त्वमिन्द्रा पुरुहूत विश्वमायुर्व्य श्रवत्. अहरहर्बलिमित्ते हरन्तो ऽ श्वायेव तिष्ठते घासमग्ने.. (६) हे बहुतों के द्वारा आह्वान किए गए इंद्र और ऐश्वर्य वाले अग्नि! तुम हमें संपूर्ण अन्न और जीवन प्राप्त कराओ. बंधे हुए घोड़े को जिस प्रकार घास प्राप्त कराई जाती है, उसी प्रकार तुम्हें प्रतिदिन हवि प्रदान करते हुए हम पूर्ण आयु प्राप्त करें. (६) सूक्त—५६ देवता—दुःस्वप्न नाशन यमस्य लोकादध्या बभूविथ प्रमदा मर्त्यान् प्र युनक्षि धीरः. एकाकिना सरथं यासि विद्वान्त्स्वप्नं मिमानो असुरस्य योनौ.. (१) हे बुरे स्वप्न के अभिमानी क्रूर पिशाच! तू यमलोक से धरती पर आया है. तू निर्भय हो कर स्त्रियों और पुरुषों के समीप पहुंच जाता है. शरीरधारियों की आयु की वृद्धि और हानि जानता हुआ तू प्राण के आत्मीय स्थान हृदय में स्वप्न के कष्ट का निर्माण करता हुआ सहायक हीन रथ के द्वारा यमलोक प्राप्त कराता है. (१) बन्धस्त्वाग्रे विश्वचया अपश्यत् पुरा रात्र्या जनितोरेके अह्नि. ततः स्वप्नेदमध्या बभूविथ भिषग्भ्यो रूपमपगूहमानः.. (२) हे दुःस्वप्न के अभिमानी! सब के स्रष्टा और विधाता ने तुझे सृष्टि से पहले देखा था. मानस, स्थापत्य आदि ने तुझे दिवस और रात्रि के जन्म से पूर्व देखा था. हे स्वप्न! तुम इस जगत् को व्याप्त कर रहे हो. तुम चिकित्सकों से अपना रूप छिपाए रहते हो. तात्पर्य यह है कि चिकित्सक तुम्हारा प्रभाव समाप्त नहीं कर पाते. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
बृहद्गावासुरेभ्यो ऽ धि देवानुपावर्तत महिमानमिच्छन्. तस्मै स्वप्नाय दधुराधिपत्यं त्रयस्त्रिंशासः स्व रानशाना.. (३) सब को व्याप्त करने वाला स्वप्न असुरों के पास से चल कर देवों को प्राप्त हुआ था. स्वप्न देवों के पास महत्त्व प्राप्त करने के लिए गया था. तैंतीस देवताओं ने उस स्वप्न को अनिष्ट करने की शक्ति प्रदान की. (३) नैतां विदुः पितरो नोत देवा येषां जल्लिश्वरत्यन्तरेदम्. त्रिते स्वप्नमदधुराप्त्ये नर आदित्यासो वरुणेनानुशिष्टाः.. (४) देवों के द्वारा स्वप्न को जो अनिष्ट कारक शक्ति प्रदान की गई थी, उसे न पिता जानते हैं और न देव जानते हैं. आदित्यों ने दुःस्वप्न से बचने का उपाय वरुण से पूछा. वरुण ने आदित्यों को स्वप्न से बचने का उपाय बताया. आदित्यों ने जलों के पुत्र मित्र नामक ऋषि पर अनिष्ट फल सूचक स्वप्न को स्थापित कर दिया. (४) यस्य क्रूरमभजन्त दुष्कृतो ऽ स्वप्नेन सुकृतः पुण्यमायुः. स्वर्मदसि परमेण बन्धुना तप्यमानस्य मनसो ऽ धि जज्ञिषे.. (५) पापी पुरुष उस दुःस्वप्न का भयंकर फल प्राप्त करते हैं. उत्तम कर्म करने वाले दुःस्वप्न न देख कर पुण्य कर्म करने के लिए आयु प्राप्त करते हैं. हे बुरे स्वप्न! तुम स्वर्गलोक में सर्वश्रेष्ठ विधाता के साथ प्रसन्न रहते हो तथा मृत्यु के पास से संतप्त बुरे कर्म करने वाले पुरुष के मन में मृत्यु की सूचना देने के लिए उत्पन्न होते हो. (५) विद्म ते सर्वाः परिजाः पुरस्ताद् विद्म स्वप्न यो अधिपा इहा ते. यशस्विनो नो यशसेह पाह्याराद् द्विषेभिरप याहि दूरम्.. (६) हे स्वप्न! हम तेरे सभी परिजनों को जानते हैं तथा इस समय तेरा जो स्वामी है, उसे भी जानते हैं. तेरे परिजनों तथा स्वामी को जानने वाले हम यशस्वीजनों की इस प्रसंग में यज्ञ अथवा अन्न के लिए रक्षा करो. जो लोग हम से द्वेष करते हैं, तुम उन के साथ दूर देश में चले जाओ. (६) सूक्त—५७ देवता—दुःस्वप्ननाशन यथा कलां यथा शफं यथर्णं संनयन्ति. एवा दुष्ष्वप्न्यं सर्वमप्रिये सं नयामसि.. (१) जैसे ऋत्विज् मारे गए बलि पशु को काट कर टुकड़े योग्य अंगों का संस्कार करते हुए खुर आदि प्रयोग में न आने वाले अंगों को साथ ले कर अन्यत्र जाते हैं तथा जिस प्रकार ऋण देने वाले को मूल धन और ब्याज लौटाते हैं, उसी प्रकार बुरे स्वप्न के कारण जितने भी अनर्थ
हैं, उन्हें हम जलों के मध्य त्रित नाम के महर्षि पर धारण करते हैं. (१) सं राजानो अगुः समृणान्यगुः सं कुष्ठा अगुः सं कला अगुः. समस्मासु यद् दुष्वप्न्यं निर्द्विषते दुष्वप्न्यं सुवाम.. (२) जिस प्रकार राजा लोग दूसरे के राष्ट्र का विनाश करने के लिए एकत्र हो जाते हैं, जिस प्रकार एक ऋण के न चुकाने पर बहुत से ऋण हो जाते हैं, जिस प्रकार कुष्ठ रोग होने पर बहुत से रोग हो जाते हैं, जैसे पशुओं के खुर आदि अनुपयोगी अंग फेंकने से गड्ढे अथवा पुराने कुएं में एकत्र हो जाते हैं, उसी प्रकार हम अपने दुःस्वप्न को उस के पास भेजते हैं जो हम से द्वेष करता है. (२) देवानां पत्नीनां गर्भ यमस्य कर यो भद्रः स्वप्न. स मम यः पापस्तद् द्विषते प्र हिण्मः. मा तृष्ठानामसि कृष्णशकुनेर्मुखम्.. (३) हे स्वप्न! तुम अप्सराओं के गर्भ हो, यमराज के हाथ हो. तुम्हारा जो मंगलकारी अंश है, वह मुझे प्राप्त हो. तुम्हारा जो क्रूर अंश है, उसे मैं उस के पास में भेजता हूं जो मुझ से द्वेष करता है. हे कौए के मुख से उत्पन्न दुःस्वप्न! तुम मेरे लिए बाधक मत बनो. (३) तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स त्वं स्वप्नाश्व इव कायमध्व इव नीनाहम्. अनास्माकं देवपीयुं पियारूं वप यदस्मासु दुष्वप्न्यं यद् गोषु यच्च नो गृहे.. (४) हे स्वप्न! तुम किस लिए उत्पन्न हुए हो, यह सब हम जानते हैं. घोड़ा जिस प्रकार अपने धूलि धूसरित अंगों को कंपित करता है और अपनी काठी आदि को दूर फेंक देता है, उसी प्रकार मैं तुम्हें अपने शत्रु के पास तथा देवों के यज्ञों में बाधा डालने वाले के पास फेंकता हूं. हमारे शरीर में, हमारी गायों में और हमारे घरों में जो दुःस्वप्न का फल है, वह हमारे शत्रु और देव शत्रु अर्थात् यज्ञ कर्म में बाधा डालने वाले पर पहुंचे. (४) अनास्माकस्तद् देवपीयुः पियारूर्निष्कमिव प्रति मुञ्चताम्. नवारत्नीनपमया अस्माकं ततः परि. दुष्वप्न्यं सर्वं द्विषते निर्दयामसि.. (५) हे स्वप्न! तेरे अनिष्ट फल को हमारा तथा देवों का शत्रु अपने शरीर पर स्वर्ण के आभूषण के समान धारण करे. हमारे दुःस्वप्न का जो फल है, वह हम से नौ मुट्ठी दूर हट जाए. हम दुःस्वप्न के बुरे प्रभाव को अपने शत्रु की ओर भेजते हैं. (५) सूक्त—५८ देवता—मंत्रों में बताए गए ebook converter DEMO Watermarks*
घृतस्य जूतिः समना सदेवा संवत्सरं हविषा वर्धयन्ती. श्रोत्रं चक्षुः प्राणो ऽ च्छिन्नो नो अस्त्वच्छिन्ना वयमायुषो वर्चसः.. (१) परमात्मा के स्वरूप के विषय में जो ज्ञान है, वह सभी प्राणियों के हृदयों तथा सभी प्राणियों की इंद्रियों में स्थित है. परमात्मा से संबंधित ज्ञान परमात्मा को हवि के द्वारा बढ़ाता हुआ हमारे कानों और आंखों को स्वस्थ करे. हम जीवन के तेज से युक्त रहें. (१) उपास्मान् प्राणो ह्वयतामुप वयं प्राणं हवामहे. वर्चो जग्राह पृथिव्य १ न्तरिक्षं वर्चः सोमो बृहस्पतिर्विधत्ता.. (२) शरीर को धारण करने वाली प्राण वायु मानस यज्ञ करने वाले हम को दीर्घ जीवन की अनुमति प्रदान करे. हम प्राण वायु को अपने शरीर में चिरकाल तक स्थित रहने के लिए बुलाते हैं. पृथ्वी और अंतरिक्ष ने हमें देने के लिए ही तेज ग्रहण किया है. हे सोम! बृहस्पति एवं अग्नि अथवा सूर्य हमें देने के लिए तेज ग्रहण करें. (२) वर्चसो द्यावापृथिवी संग्रहणी बभूवभुर्वर्चो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम. यशसं गावो गोपतिमुप तिष्ठन्त्यायतीर्यशो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम.. (३) हे आकाश और पृथ्वी! तुम हमें तेज प्रदान करने वाली बनो. हम तेज ग्रहण कर के पृथ्वी पर संचरण करें. गायों के स्वामी मेरे अधिकार में अन्न और गाएं स्थित हैं. हम आती हुई गायों को ग्रहण कर के पृथ्वी पर संचरण करें. (३) व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्मा सीव्यध्वं बहुला पृथूनि. पुरः कृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वः सुस्रोच्चमसो दृंहता तम्.. (४) हे इंद्रियो! तुम शरीर में स्थान बनाओ, क्योंकि यह शरीर अपनेअपने विषयों में तुम्हारा रक्षक है. तुम अपने विस्तृत विषयों को अधिकार में करो. यह शरीर तुम्हारा चमस अर्थात् तुम्हारे भोग का साधन है. इस का विनाश न हो. तुम इस शरीर को दृढ़ करो. (४) यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि. इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा देवा यन्तु सुमनस्यमानाः.. (५) चक्षु आदि इंद्रियों को मैं मानस यज्ञ में हवन करता हूं. यह यज्ञ विश्वकर्मा देव ने विस्तृत किया है. उत्तम हृदय वाले देव इस मानस यज्ञ को प्राप्त करें. (५) ये देवानामृत्विजो ये च यज्ञिया येभ्यो हव्यं क्रियते भागधेयम्. इमं यज्ञं सह पत्नीभिरेत्य यावन्तो देवास्तविषा मादयन्ताम्.. (६) देवताओं में जो समय-समय पर यज्ञ करने वाले अर्थात् ऋत्विज् हैं तथा जो यज्ञ के ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—५९ देवता—अग्नि
योग्य हैं, इन दोनों के भाग के रूप में हवि प्रदान किया जाता है. जितने महान देव हैं, वे अपनीअपनी पत्नियों, इंद्राणी आदि के साथ इस यज्ञ में आ कर हवि प्राप्त करें तथा तृप्त हों. (६) सूक्त—५९ देवता—अग्नि त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मर्त्येष्वा. त्वं यज्ञेष्वीड्यः.. (१) हे अग्नि! तुम यज्ञकर्मों का पालन करने वाली हो. तुम मनुष्यों में जठराग्नि के रूप में सभी ओर व्याप्त हो. तुम दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञों की स्तुति के योग्य हो. (१) यद् वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टारासः. अग्निष्टद् विश्वादा पृणातु विद्वान्त्सोमस्य यो ब्राह्मणाँ आविवेश.. (२) हे देवो! अपने व्रतों को न जानने वाले हम जानने वालों को नष्ट करते हैं. उस लुप्त कर्म को जानती हुई अग्नि पूर्ण करे. वह अग्नि सोम के संबंध से ब्राह्मणों के सम्मुख जाती है. (२) आ देवानामपि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनुप्रवोढुम्. अग्निर्विद्वान्त्स यजात् स इद्धोता सो ऽ ध्वरान्त्स ऋतून् कल्पयाति.. (३) जिस मार्ग पर चल कर देवों को प्राप्त किया जाता है, हम उस मार्ग पर चलें. हम जो अनुष्ठान कर सकते हैं, उसे करने के हेतु देवों के मार्ग पर गमन करें. जानने वाली अग्नि उस मार्ग को देवों को प्राप्त कराएं. वही अग्नि देवों और मनुष्यों का आह्वान करने वाली है. अग्नि यज्ञों तथा ऋतुओं को सुरक्षित करें. (३) सूक्त—६० देवता—याग आदि वाङ्म आसन्नसोः प्राणश्चक्षुरक्ष्णोः श्रोत्रं कर्णयोः. अपलिताः केशा अशोणा दन्ता बहु बाह्वोर्बलम्.. (१) मेरे मुख में वाणी हो. मेरी नासिका में प्राण रहें. मेरी आंखों में देखने की शक्ति रहे. मेरे कानों में सुनने की शक्ति हो. मेरे केश श्वेत न हों. मेरे दांत कभी न टूटें. मेरी भुजाओं में अधिक बल रहे. (१) ऊर्वोरोजो जङ्घयोर्जवः पादयोः. प्रतिष्ठा अरिष्टानि मे सर्वात्मानिभृष्टः.. (२) मेरे उरुओं में ओज रहे, जंघाओं में वेग रहे तथा चरणों में चलने की शक्ति रहे. मेरी आत्मा अहिंसित रहे तथा मेरे सभी अंग पाप रहित हों. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—६१ देवता—ब्रह्मणस्पति तनूस्तन्वा मे सहे दतः सर्वमायुरशीय. स्योनं मे सीद पुरुः पृणस्व पवमानः स्वर्गे.. (१) मैं जीवनभर अपने दांतों से खाता रहूं. मैं शत्रुओं को अपने शरीर से दबाने में समर्थ रहूं. हे अग्नि! तुम मेरे घर में सुख से प्रतिष्ठित रहो. तुम स्वर्ग में भी मुझे सुख से संपन्न बनाओ. (१) सूक्त—६२ देवता—ब्रह्मणस्पति प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु. प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये.. (१) हे अग्नि! तुम मुझे देवों का प्रिय बनाओ. मुझे राजाओं का भी प्रिय करो. मैं सभी देखने वालों का, शूद्रों का और आर्यों का प्रिय बनूं. अर्थात् सब का प्रिय बनूं. (१) सूक्त—६३ देवता—ब्रह्मणस्पति उत् तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवान् यज्ञेन बोधय. आयुः प्राणं प्रजां पशून् कीर्तिं यजमानं च वर्धय.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! उठो और देवों को मेरे यज्ञों का ज्ञान कराओ. तुम इस यजमान की आयु, प्राण, प्रजा, पशु तथा कीर्ति को बढ़ाओ. तुम इस यजमान की वृद्धि करो. (१) सूक्त—६४ देवता—अग्नि अग्ने समिधमाहार्षं बृहते जातवेदसे. स मे श्रद्धां च मेधां च जातवेदाः प्र यच्छतु.. (१) मैं महान और जातवेद अग्नि के लिए प्रज्वलित होने का साधन समिधाएं लाया हूं. समिधाओं से वृद्धि को प्राप्त जातवेद अग्नि मुझे श्रद्धा और बुद्धि प्रदान करें. (१) इध्मेन त्वा जातवेदः समिधा वर्धयामसि. तथा त्वमस्मान् वर्धय प्रजया च धनेन च.. (२) हे जातवेद अग्नि! हम प्रज्वलित होने के साधन समिधाओं के द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम हमें प्रजा और धन से बढ़ाओ. (२) यदग्ने यानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि. ebook converter DEMO Watermarks*
सर्वं तदस्तु मे शिवं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (३) हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए जो यज्ञ के योग्य और यज्ञ के अयोग्य काष्ठ (लकड़ी) प्रदान करता हूं, वह सब मेरे लिए कल्याणकारी हो अर्थात् उन से मेरा कल्याण हो. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम मेरे द्वारा दिए गए काष्ठ (लकड़ी) को स्वीकार करो. (३) एतास्ते अग्ने समिधस्त्वमिद्धः समिद् भव. आयुरस्मासु धेह्यामृतत्वमाचार्याय.. (४) हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए ये समिधाएं लाया हूं. उन समिधाओं के द्वारा तुम प्रज्वलित होओ. तुम हम सब में आयु और जीवन का आधान करो. तुम हमारे उपाध्याय के लिए अमृत प्रदान करो. (४) सूक्त—६५ देवता—सूर्य, जातवेद, वज्र हरिः सुपर्णो दिवमारुहो ऽ र्चिषा ये त्वा दिप्सन्ति दिवमुत्पतन्तम्. अव तां जहि हरसा जातवेदो ऽ बिभ्यदुग्रो ऽ र्चिसा दिवमा रोह सूर्य.. (१) हे सूर्य! तुम अंधकार का नाश करने वाले तथा उत्तम पालन वाले हो. तुम अपने तेज से द्युलोक अर्थात् आकाश पर बढ़ते हो. आकाश पर चढ़ते हुए तुम को जो शत्रु तिरस्कृत करना चाहते हैं, हे जातवेद सूर्य! उन्हें तुम अपने शत्रु विनाशक तेज से नष्ट करो. इस के पश्चात शत्रुओं से भयभीत न होते हुए तुम अपने तेज से आकाश में स्थित बनो. (१) सूक्त—६६ देवता—सूर्य, जातवेद अयोजाला असुरा मायिनो ऽ यस्मयैः पाशैरङ्किनो ये चरन्ति. तांस्ते रन्धयामि हरसा जातवेदः सहस्रऋष्टिः सपत्नान् प्रमृणन् पाहि वज्रः.. (१) हे जातवेद सूर्य! जो मायावी असुर लोहे का जाल ले कर तथा लोहे के बने फंदे हाथ में ले कर उत्तम कर्म करने वालों को मारने के लिए घूमते हैं, उन्हें मैं तुम्हारे तेज के द्वारा अपने वश में करता हूं. हे हजार संख्या वाले आयुधों से युक्त तथा वज्रधारी! तुम शत्रुओं को अधिक मात्रा में नष्ट करो तथा हमारा पालन करो. (१) सूक्त—६७ देवता—सूर्य पश्येम शरदः शतम्.. (१) हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक देखते रहें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
जीवेम शरदः शतम्.. (२) हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक जीवित रहें. (२) बुध्येम शरदः शतम्.. (३) हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक बुद्धि युक्त रहें. (३) रोहेम शरदः शतम्.. (४) हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक वृद्धि करते रहें. (४) पूषेम शरदः शतम्.. (५) हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक पुष्ट रहें. (५) भवेम शरदः शतम्.. (६) हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक पुत्र आदि से युक्त रहें. (६) भूयेम शरदः शतम्.. (७) हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक संतान वाले रहें. (७) भूयसीः शरदः शतात्.. (८) हे सूर्य देव! हम सौ वर्षों से भी अधिक समय तक जीवित रहें. (८) सूक्त—६८ देवता—मंत्र में बताए गए अव्यसश्च व्यचसश्च बिलं वि ष्यामि मायया. ताभ्यामुद्धृत्य वेदमथ कर्माणि कृण्महे.. (१) मैं सभी के शरीरों में व्याप्त व्यान वायु और व्यक्तिगत रूप से व्याप्त प्राण वायु के मूल आधार को कर्म के द्वारा विस्तृत करता हूं. हम उन व्यान और प्राण वायु के द्वारा अक्षरात्मक वेद को परा, पश्यंती और वैखरी वाणियों के क्रम से प्रत्यक्ष कर के यज्ञ कर्म करते हैं. (१) सूक्त—६९ देवता—आप अर्थात् जल जीवा स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (१) हे देवगण! आप आयु वाले हैं. आप की कृपा से मैं भी आयु वाला बनूं. मैं पूर्ण आयु ebook converter DEMO Watermarks*
अर्थात् सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (१) उपजीवा स्थोप जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (२) हे देवगण! आप अधिक जीवन वाले हैं. आप की कृपा से मैं भी अधिक जीवन वाला बनूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (२) संजीवा स्थ सं जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (३) हे देवगण! आप जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं करते हैं. मैं भी आप की कृपा से जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ न करूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (३) जीवला स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (४) हे इंद्र! तुम सभी ऐश्वर्यों के प्रकाशक हो. मैं भी तुम्हारी कृपा से पूर्ण ऐश्वर्य का प्रकाशक बनूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (४) सूक्त—७० देवता—मंत्र में कथित इंद्र आदि इन्द्र जीव सूर्य जीव देवा जीवा जीव्यासमहम्. सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (१) हे इंद्र! तुम जीवित रहो. हे सूर्य! तुम जीवित रहो. हे इंद्र आदि देवो! तुम जीवित रहो. मैं भी आप की कृपा से जीवित रहूं. मैं पूर्ण आयु अर्थात् सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (१) सूक्त—७१ देवता—गायत्री स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्. आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्. मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्.. (१) वेद का अध्ययन करने वाले अथवा गायत्री का जप करने वाले मैं ने इच्छाओं को पूर्ण करने वाली, पापों से छुड़ाने वाली एवं वेदों की माता सावित्री की स्तुति की है. ब्राह्मणों को पवित्र करने वाली सावित्री हमें प्रेरित करे. वह सावित्री देवी मुझे आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति और ब्रह्म तेज दे कर ब्रह्म लोक को गमन करे. (१) सूक्त—७२ देवता—परमात्मा और देव यस्मात् कोशादुदभराम वेदं तस्मिन्नन्तरव दध्म एनम्. कृतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेह.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हम ने मूल आधार रूप कोश से वेदों का उद्धार किया है, हम ने वेदों का उद्धार यज्ञ कार्य के हेतु किया है. हम वेदों को उसी स्थान पर स्थापित करते हैं. परमात्मा की शक्ति रूप वेदों से हम ने जो यज्ञादि कर्म किए हैं, हे देवो! उस मन चाहे कर्म के फल के द्वारा तुम मेरा पालन करो. (१)
सूक्त—१ देवता—यज्ञ
बीसवां कांड सूक्त—१ देवता—यज्ञ इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे. स पाहि मध्वो अन्धसः.. (१) हे कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र! हम यजमान निचोड़े हुए सोम को पीने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. तुम मधुर सोम का पान करो. (१) मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः.. स सुगोपातमो जनः.. (२) हे अतिशय तेज युक्त मरुतो! तुम आकाश से आ कर जिस यजमान की यज्ञशाला में सोमपान करते हो, उस गृह का स्वामी यजमान अपने आश्रितों की रक्षा वालों में श्रेष्ठ बन जाता है. (२) उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे. स्तोमैर्विधेमाग्नये.. (३) गर्भधारण करने में समर्थ बैल और बांझ बकरी जिस का भोजन है तथा सोम जिस के ऊपर स्थित है, ऐसे अग्नि देव की हम वेद मंत्रों द्वारा स्तुति करते हैं. (३) सूक्त—२ देवता—मरुत्, अग्नि, इंद्र, द्रविणोदा मरुतः पोत्रात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबन्तु.. (१) मरुद्गण होता के सुंदर स्तोत्रों वाले तथा सुंदर मंत्रों से युक्त यज्ञ कर्म में संस्कार किए गए अर्थात् कूटे और निचोड़े गए सोम का पान करें. (१) अग्निराग्नीध्रात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबतु.. (२) अग्नि देव! अग्नि को प्रज्वलित करने वाले ऋत्विज् के कर्म से प्रसन्न होते हुए सोम रस का पान करें. यह कर्म सुंदर स्तोत्रों और सुंदर मंत्रों वाला है. (२) इन्द्रो ब्रह्मा ब्राह्मणात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबतु.. (३) ब्रह्मात्मा इंद्र! ब्राह्मण नाम के ऋत्विज् की सुंदर स्तुतियों से पूर्ण यज्ञ कर्म में संस्कार ebook converter DEMO Watermarks*