भारतकोश
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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

८ स्वप्न अवस्था क्या है ? जाग्रत् अवस्था में जो देखे गये और सुने गये, तज्जनित वासना से निन्द्रा के समय जो प्रपञ्च की प्रतीति होती है, वही स्वप्नावस्था है। सूक्ष्म शरीर और स्वप्नावस्था का अभिमानी आत्मा 'तैजस' कहा जाता है ।।१७।। सुषुप्त्यवस्था का ? अहं किमपि न जानामि सुखेन मया निद्रानुभूयते इति यत्, तत् सुषुप्त्यवस्था । एतदवस्थाकारण- शरीराभिमान्यात्मा प्राज्ञ इत्युच्यते ।।१८।। सुषुप्ति अवस्था क्या है ? 'मैं कुछ नहीं जानता हूँ' 'सुखपूर्वक निद्रा का अनुभव मुझे होता है' ऐसा जिसका परामर्श होता है, वही 'सुषुप्ति अवस्था' है। इस सुषुप्ति अवस्था और कारण शरीर के अभिमानी आत्मा को 'प्राज्ञ' कहा जाता है ।।१८।। पञ्चकोशाः के ? अन्नमयः प्राणमयो मनोमयो विज्ञानमय आनन्दमयश्चेति ।। १६ ।। पञ्च कोश क्या है ? अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय, ये पञ्च कोश हैं ।। १६ ।। अन्नमयः कः ? अन्नरसेनेव भूत्वाऽन्नरसेनैवाभिवृद्धिं सम्प्राप्यान्नरूपपृथिव्यां यद्विलीयते, सोऽन्नमयः कोशः ।।२०।। अन्नमय कोश क्या है ? अन्न के रस से ही उत्पन्न होकर अन्नरस से ही वृद्धि को प्राप्त होकर जो अन्नरूप पृथ्वी में विलीन होता है, वह स्थूलशरीर अन्नमय कोश है ।।२०।। प्राणमयः कः ? प्राणादिपञ्चवायवो वागादीन्द्रियपञ्चकं च मिलित्वा प्राणमयः कोशः ।।२१।। प्राणमय कोश क्या है ? प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान; ये पञ्चप्राण और वागादि पञ्चकर्मेन्द्रियाँ इन को मिलाकर

६ प्राणमयकोश कहा गया है ॥२१॥ मनोमयः कः? मनश्च ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं च मिलित्वा मनोमयः कोशः।।२२।। मनोमय कोश क्या है? पञ्चज्ञानेन्द्रियों के सहित संकल्प-विकल्पात्मक मन, मनोमय कोश है ।।२२।। विज्ञानमयः कः? बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं च मिलित्वा विज्ञानमयः कोशः।।२३।। विज्ञानमय कोश क्या है? अन्तःकरण की निश्चयात्मिका वृत्तिरूप बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, दोनों मिलकर विज्ञानमय कोश है ।।२३।। आनन्दमयः कोशः कः? प्रियमोदादिवृत्तिमत् स्वस्वरूपाज्ञानं यदस्ति, तदानन्दमयः कोशः। एतत्कोशपञ्चकं च मदीयं शरीरं, मदीयाः प्राणाः, मदीयं मनो मदीया बुद्धिर्मदीयमज्ञानमिति मदीयत्वेनैव ज्ञायते। तद्यथा मदीयत्वेन ज्ञातं कुण्डल कटकगृ- हादिकं स्वस्माद्भिन्नं, तथा मदोयत्वेन ज्ञातमात्मा न भवति ।।२४।। आनन्दमय कोश क्या है? कारणशरीर भूत अविद्या में स्थित प्रिय, मोद तथा प्रमोद वृत्ति सहित मलिन सत्त्व को आनन्दमय कोश कहते हैं। ये पाँचों कोश-अन्नमय कोश स्थूल शरीर मेरा है, प्राण मेरे हैं, मन मेरा है, बुद्धि मेरी है और अज्ञान मेरा है, इस प्रकार आत्मीय रूप से जाने जाते हैं। जैसे कटककुण्डल आदि मेरे हैं, इस प्रकार मुझसे भिन्न हैं। वैसे ही पञ्चकोश मेरे हैं, इस रूप में जाना जाता है। इसलिए पञ्चकोश भिन्न है और

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आत्मा भिन्न है, ऐसा सिद्ध हो जाता है। यहाँ पर यह युक्ति सूचित है कि जो मेरा है, वह मुझसे भिन्न है। जैसे गृह, पुस्तक आदि मेरे हैं, अतः मुझसे भिन्न है। इस प्रकार आचार्यपाद ने यहाँ एक साथ सरलतम युक्ति के द्वारा सिद्ध कर दिया कि पाँचो कोश आत्मा से भिन्न और अनात्मा है। अब यहाँ शंका होती है कि मेरे माता-पिता, भाई-बन्धु आदि सब जीव है, अतः अनात्मा कैसे? तो इसका उत्तर है कि जैसे स्वप्न में मुझसे भिन्न मित्र-शत्रु, भाई-बन्धु दिखते हैं पर वास्तव में वहाँ कोई जीव नहीं। इसीलिये सिद्ध होता है कि आत्मा नहीं दिखता भिन्न-भिन्न देह ही दिखाई पड़ता है। आत्मा में कोई भेद नहीं है। साथ ही यह भी सूचित है कि जो भी दिखता है, वह सब स्वप्नदेह के समान मिथ्या है ।।२४।। तर्ह्यात्मा कः? सच्चिदानन्दस्वरूपः ।।२५।। आत्मा क्या है? आत्मा सच्चिदानन्दस्वरूप है।।२५।। सत् किम्? कालत्रयेऽपि यत्तिष्ठति, तत्सत्। चित् किम्? साधनान्तरनैरपेक्ष्येण स्वयं प्रकाशमानतयेतरपदार्थावभासकं यत्, तच्चित्। आनन्दः कः? सुखस्वरूपः। एवं सच्चिदा- नन्दस्वरूपं स्वात्मानं विजानीयात्।।२६।। सत् क्या है? तीनों काल में जो विद्यमान रहता हो, वह सत् है। चित् क्या है? अन्य साधन के बिना स्वयं प्रकाशमान होता हुआ जो अन्य सब पदार्थों का प्रकाशक हो, वह चित् है। आनन्द क्या है? सुखस्वरूप आनन्द है। इस प्रकार सच्चिदानन्दस्वरूप अपने आत्मा को जानें ।।२६।।

११ (पूर्वार्धं समाप्तम्) (उत्तरार्धम्) अथ चतुर्विंशतितत्त्वोत्पत्तिप्रकारं वक्ष्यामः ॥२७॥ अब २४ तत्त्वों की उत्पत्ति का प्रकार हम कहेगें ॥२७॥ ब्रह्मणस्तमोगुणप्रधानमायोपहितादाकाशः सम्भूतः आकाशा- द्वायुर्वायोस्तेजस्तेजस आपोऽद्भ्यः पृथिवी॥२८॥ तम प्रधान माया से उपहित ब्रह्म से आकाश उत्पन्न हुआ आकाशभावापन्न ब्रह्म से वायु की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार वायुभावापन्न ब्रह्म से अग्नि, अग्निभावापन्न ब्रह्म से जल और जलभावापन्न ब्रह्म से पृथ्‍वी की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार सारे भूत-भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति ब्रह्म से सिद्ध होती है ॥२८॥ तेषां पञ्चतत्त्वानां मध्य आकाशस्य सात्त्विकांशाच्छ्रोत्रेन्द्रियं सम्भूतम्। वायोः सात्त्विकांशात् त्वगिन्द्रियं सम्भूतम्। अग्नेः सात्त्विकांशाच्चक्षुरिन्द्रियं सम्भूतम्। जलस्य सात्त्विकांशा- द्रसनेन्द्रियं सम्भूतम्। पृथिव्याः सात्त्विकांशात् घ्राणेन्द्रियं सम्भूतम्। एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टिसात्त्विकांशादन्तःकरणं सम्भूतम्, तच्च वृत्तिभेदान्मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानीति चतुर्धा॥२६॥ इन पाँच तत्त्वों में से आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न हुई। वायु के सात्त्विक अंश से त्वगिन्द्रिय उत्पन्न हुई। अग्नि के सात्त्विक अंश से चक्षुरिन्द्रिय उत्पन्न हुई। जल के सात्त्विक अंश से रसनेन्द्रिय उत्पन्न हुई। पृथ्‍वी के सात्त्विक अंश से

१२ घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई। इन अपञ्चीकृत पञ्च तत्त्वों के समष्टि सात्त्विकांश से मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्तरूप चतुर्विध अन्तःकरण उत्पन्न हुआ ॥२६॥ संकल्पविकल्पात्मकं मनः निश्चयात्मिका बुद्धिः अहंकर्ता अहंकारः चिन्तनकर्तृ चित्तम्। मनसो देवता चन्द्रमा बुद्धेर्ब्रह्मा अहंकारस्य रुद्रः चित्तस्य वासुदेवः। संकल्प-विकल्पात्मक वृत्ति का नाम मन; निश्चयात्मिका वृत्ति का नाम बुद्धि, अभिमान करने वाली वृत्ति का नाम अहंकार तथा चिन्तन करने वाली वृत्ति का नाम चित्त है। मन के देवता चन्द्रमा, बुद्धि के देवता ब्रह्मा, अहंकार के देवता रुद्र और चित्त के देवता वासुदेव है। एतेषां पञ्चतत्त्वानां मध्य आकाशस्य राजसांशाद्वागिन्द्रियं सम्भूतं, वायो राजसांशात् पाणीन्द्रियं सम्भूतं, वह्नेः राजसांशात्पादेन्द्रियं सम्भूतं, जलस्य राजसांशात् उपस्थेन्द्रियं सम्भूतं, पृथिवीराजसांशात्पाय्विन्द्रियं सम्भूतम् ।।३०।। इन पञ्च तत्त्वों मे से आकाश के रजो अंश से वाक् इन्द्रिय उत्पन्न हुई, वायु के रजो अंश से हस्त इन्द्रिय उत्पन्न हुई, अग्नि के रजो अंश से पाद इन्द्रिय उत्पन्न हुई, जल के रजो अंश से उपस्थ इन्द्रिय उत्पन्न हुई और पृथ्वी के रजो अंश से गुदा इन्द्रिय उत्पन्न हुई ।।३०।। एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टिराजसांशात् प्राणपञ्चकं सम्भूतम् ।।३१।। इन अपञ्चीकृत पञ्च तत्त्वों के समष्टि रजो अंश से पञ्च प्राण उत्पन्न हुए हैं ।।३१।।

१३ एतेषां पञ्चतत्त्वानां तमोगुणप्रधानानां पञ्चीकरणेन पञ्चमहाभूतानि भवन्ति। इन तमोगुण प्रधान पञ्च तत्त्वों के पञ्चीकरण के द्वारा पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति होती है पञ्चीकरणं कथम् ? एतेषु भूतेष्वेकमेकं भूतं द्विधा समं विभज्यैकमेकमर्द्धं तूष्णीं व्यवस्थाप्यापरमपरमर्द्धं चतुर्द्धा समं विभज्य स्वार्द्धभिन्नेष्वर्द्धेषु स्वभागचतुष्टयसंयोजनं पञ्चीकरणं भवति। एतेभ्यः पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतेभ्यश्चतुर्विधस्थूलशरीरं, ब्रह्माण्डं, ब्रह्माण्डमध्ये चतुर्दशभुवनानि सम्भूतानि।।३२।। प्रश्न- पञ्चीकरण किस प्रकार होता है ? उत्तर- एक-एक भूत के दो-दो समान विभाग कर एक-एक अर्धभाग को पृथक् सुरक्षित रखकर दूसरे-दूसरे आधे भाग को चार भागों में विभक्त कर अपने से भिन्न अर्ध भागों में अपने चार भागों को मिलाना पञ्चीकरण होता हैं। इन्हीं पञ्चीकृत पञ्च-महाभूतों से चतुर्विध स्थूल शरीर (जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज), ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत चतुर्दश भुवन का भेद-प्रभेद उत्पन्न होता हैं। चतुर्दश भुवनों में से भूः, भुवः, स्व, महः, जनः, तपः और सत्यं- ये उपर के सात लोक हैं तथा अतल, वितल, सुतलं, तलातल, रसातल, महातल, और पाताल-ये नीचे के सात लोक (भुवन) हैं ।।३२।। स्थूलशरीराभिमानि जीवनामकं ब्रह्मप्रतिबिम्बं भवति। स एव जीव आत्मन्येव प्रकृत्या जीवेश्वरभेददृष्टिं कल्पयति। कथमिति चेत्? अविद्योपाधिः सन्नात्मा जीव इत्युच्यते।।३३।।

१४ स्थूल शरीर में अभिमान करने वाला ब्रह्मप्रतिबिम्ब जीव नामवाला होता है। वही जीव अविद्या के कारण अपने में ही जीव-ईश्वर भेददृष्टि का आरोप करता है। कैसे ? तो इसका उत्तर है- अविद्या उपाधि वाला आत्मा जीव नाम से कहा जाता है।।३३।। मायोपाधिः सन्नात्मा ईश्वर इत्युच्यते। एवमुपाधिभेदाज्जी- वेश्वरभेददृष्टिर्यावत्पर्यन्तं तिष्ठति, तावत्पर्यन्तं जन्म- मरणादिरूपसंसारो न् निवर्तते। तस्मात् कारणाज्जीव एव ईश्वर ईश्वर एव जीव इतीतराभेददृष्टिं जानीयात् ।।३४।। माया उपाधि वाले चेतन को ईश्वर कहा गया है। इस प्रकार उपाधिभेद से जीव-ईश्वर में भेददृष्टि जब तक रहती है, जब तक जन्म मरणरूपी संसार निवृत्त नहीं होता। इसीलिए जीव-ईश्वर में 'जीव ही ईश्वर' 'ईश्वर ही जीव' इस प्रकार अभेद दृष्टि करनी चाहिए ।।३४।। ननु साहङ्कारस्य किञ्चिज्ज्ञस्य जीवस्य निरहङ्कारस्य सर्वज्ञ- स्येश्वरस्य च कथमभेदबुद्धिः स्यादुभयोर्विरुद्धधर्माक्रा- न्तत्वादिति चेत् ? न। स्थूलसूक्ष्मशरीराभिमानी त्वम्पदवाच्योऽर्थः, उपाधिविनिर्मुक्तं समाधिदशासम्पन्नं शुद्धचैतन्यं च त्वंपदल- क्ष्योऽर्थः । एवं सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट ईश्वरस्तत्पदवाच्यः, उपाधिशून्यं शुद्धचैतन्यं च तत्पदलक्ष्यम्। एवं च लक्ष्यार्थमादाय जीवेश्वरयोरभेदे बाधकाभावः ।।३५।। अहंकारयुक्त अल्पज्ञ जीव और अहंकार रहित सर्वज्ञ ईश्वर का तत्त्वमसि इस महावाक्य से अभेदज्ञान कैसे हो सकेगा, क्योंकि ये जीव और ईश्वर दोनों विरुद्ध धर्म से आक्रान्त है ?

१५ यह कथन ठीक नहीं है क्योंकि स्थूल सूक्ष्म शरीर अभिमानी चेतन त्वंपद का वाच्यार्थ है। उपाधि से सर्वथा मुक्त समाधिदशासम्पन्न शुद्ध चैतन्य त्वंपद का लक्ष्यार्थ है। इसी प्रकार सर्वज्ञत्वादि धर्म से विशिष्ट ईश्वर तत्पद का वाच्यार्थ है और उपाधिशून्य शुद्ध चैतन्य तत्पद का लक्ष्यार्थ है। इस प्रकार चैतन्यरूप लक्ष्यार्थ को लेकर जीव और ईश्वर का अभेद होने से कोई बाधक नहीं है। लोक में भी मुख्यार्थ को लेने पर यदि विरोध उपस्थित होता है तो लक्षणा की जाती है। लक्षणा का बीज, तात्पर्य की अनुपपत्ति को माना गया है (तात्पर्य का संभव नहीं हो पाना ही तात्पर्य-अनुपपत्ति है।) लक्षणा ३ प्रकार की होती है, जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा (भाग-त्याग लक्षणा)। जिसमें वाच्यार्थ को छोड़कर लक्ष्यार्थ को लिया जाता है, उसे जहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे 'गंगायां घोषः' (गंगा में अहीरों की बस्ती) यहाँ गंगा का अर्थ 'प्रवाह' न लेकर लक्ष्यार्थ तीर लिया जाता है। जिसमें वाच्यार्थ को न छोड़ते हुए लक्ष्यार्थ को भी लिया जाता है, उसे अजहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे 'छत्रिणो यान्ति' कहने पर छाताधारी पुरुषों के साथ छातारहित पुरुषों का भी ग्रहण किया जाता है। जिसमें विरुद्ध अंशों को छोड़कर अविरुद्ध अंश मात्र का ग्रहण किया जाता है, उसे जहदजहल्लक्षणा या भाग-त्याग लक्षणा कहते हैं। जैसे- 'सोऽयं' देवदत्तः' में विरुद्ध-अंश तद्देश-एतद्देश, तत्काल-एतत्काल आदि को छोड़कर अविरुद्ध अंश व्यक्ति मात्र को लेकर वाक्यार्थ- बोध होता है। इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों में भाग-त्याग

इस प्रकार वेदान्त वाक्यों और सद्गुरू के उपदेश से सभी

१६ लक्षणा से उपाधि और औपाधिक धर्मों को छोड़ने पर शुद्ध-चिन्मात्र का बोध होता है ।।३५।। एवं वेदान्तवाक्यैः सद्गुरूपदेशेन सर्वेष्वपि भूतेषु येषां ब्रह्मबुद्धिरुत्पन्ना ते जीवन्मुक्ता इत्युच्यन्ते ।।३६।। इस प्रकार वेदान्त वाक्यों और सद्गुरू के उपदेश से सभी भूतों में जिनकी ब्रह्म बुद्धि उत्पन्न हो गई है; वे जीवन्मुक्त कहे जाते हैं ।।३६।। ननु जीवन्मुक्तः कः? यथा देहोऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं क्षत्रियोऽहं वैश्योऽहं शूद्रोऽहमस्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं ब्राह्मणो न क्षत्रियो न वैश्यो न शूद्रो न पुरुषः, किन्त्वसङ्गः सच्चिदानन्दस्वरूपः स्वप्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी चिदाका- शरूपोऽहमस्मीति दृढनिश्चयरूपापरोक्षज्ञानवान् ।३७।। शङ्का- जीवन्मुक्त कौन है ? समाधान- जैसे मैं देह हूँ, पुरुष हूँ, ब्राह्मण हूँ, क्षत्रिय हूँ, वैश्य हूँ और शूद्र हूँ; ऐसा दृढ़ निश्चय है। ठीक वैसे ही मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नहीं हूँ, पुरुष नहीं हूँ किन्तु असङ्ग सच्चिदानन्दस्वरूप, स्वप्रकाशरूप, सर्वान्तर्यामी, चिदाकाशस्वरूप हूँ; ऐसा दृढ़निश्चयरूप अपरोक्ष ज्ञानी जीवन्मुक्त है ।।३७।। ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तः । कर्माणि कतिविधानि? आगामिसञ्चितप्रार- ब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति ।३८।। 'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसे अपरोक्षज्ञान द्वारा सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से वह ज्ञानी सर्वथा मुक्त हो जाता है। कर्म कितने प्रकार के होते हैं ? आगामी, सञ्चित और प्रारब्ध भेद से तीन प्रकार के कर्म होते

१७ हैं ॥३८॥ आगामि कर्म किम् ? ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं पुण्यपापरूपं कर्म यदस्ति, तदागामि कर्मेत्यभिधीयते। आगामी कर्म क्या है? ज्ञान उत्पत्ति के बाद ज्ञानी के शरीरादि से किये गये पुण्य पाप कर्म जो है; उसे आगामी कर्म कहते हैं॥३६॥ सञ्चितं कर्म किम् ? अनन्तकोटिजन्मनां बीजभूतं सद्यत् कर्मजातं पूर्वोपार्जितं तिष्ठति, तत् सञ्चितं ज्ञेयम्॥४०॥ सञ्चित कर्म क्या है? अनन्त कोटि जन्मों के बीजभूत होते हुए पूर्व उपार्जित जो कर्म समुदाय है, उसे सञ्चित कर्म समझना चाहिए॥४०॥ प्रारब्धं कर्म किम् ? इदं शरीरमुत्पाद्येहलोक एव सुखदुःखादिप्रदं यत्कर्म तत्प्रारब्धं, भोगेन नष्टं भवति। प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षय इति न्यायात्॥४१॥ प्रारब्ध कर्म क्या है? इस शरीर को उत्पन्न कर इस लोक में ही सुख-दुःखादि को देने वाले जो कर्म है; वे प्रारब्ध कर्म है, जो भोग से नष्ट होते हैं। "प्रारब्ध कर्मों का नाश भोग से ही होता है" ऐसा शास्त्रवचन है। 'सुखदुःखादि' यहाँ 'आदि' पद से सुख-दुःख साधन का ग्रहण होता है ॥४१॥ सञ्चितं कर्म ब्रह्मैवाहमिति निश्चयात्मकज्ञानेन नश्यति। ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन' इति भगवद्वचनात्। किञ्चागामिकर्मणो नलिनीदलगतजलवत् ज्ञानिनां सम्बन्धो नास्ति।४२।। 'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसे निश्चयात्मक ज्ञान द्वारा सञ्चित कर्म

१८ नष्ट हो जाते हैं। कमलपत्र पर निर्लिप्त जल की भाँति ज्ञानियों का आगामी कर्म के साथ सम्बन्ध नहीं होता ।।४२।। किञ्च ये ज्ञानिनं स्तुवन्ति भजन्त्यर्चयन्ति च, तान प्रति ज्ञानिकृतागामिपुण्यं गच्छति । ये च ज्ञानिनं निन्दन्ति द्विषन्ति दुःखप्रदानं कुर्वन्ति, तान्प्रति ज्ञानिकृतं सर्वमागामिक्रियमाणपदवाच्यं कर्म पापात्मकं गच्छति। तथा च श्रुतिः “सुहृदः पुण्यकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्यां गृहणन्तीति”। तथा चात्मवित् संसारं तीर्त्वा ब्रह्मानन्दमिहैव प्राप्नोति। “तरति शोकमात्मविदि”त्यादिश्रुतेः। तनुं त्यजतु वा काश्यां श्वपचस्य गृहेऽथवा। ज्ञानसम्प्राप्तिसमये मुक्तोऽसौ विगताशयः॥ इति स्मृतेश्च।४३।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्य- पादशिष्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ तत्त्वबोधः समाप्तः।। जो ज्ञानी की स्तुति करते हैं, सेवा करते हैं तथा पूजा करते हैं; ज्ञानियों का किया हुआ आगामी पुण्य कर्म उन्हीं के पास चला जाता है और जो ज्ञानी की निन्दा करते हैं, द्वेष करते हैं तथा दुःख देते हैं, उनके प्रति ज्ञानियों का किया हुआ सम्पूर्ण आगामी क्रियमाणपदवाच्य पापरूप कर्म चला जाता है। 'ज्ञानी के पुण्य कर्मों को सुहृद् ग्रहण करते हैं और पाप कर्मों को द्वेषी (द्वेष करने वाले) ग्रहण करते हैं” ऐसी ही श्रुति है। पुण्य-पाप जाने का अभिप्राय उनको ज्ञानीकृत पुण्य अथवा पापों के अनुरूप फल प्राप्त होता है। तथा आत्मज्ञानी संसार को पार कर यहाँ पर ही ब्रह्मानन्द को प्राप्त

१६ कर लेता है। "आत्मज्ञानी शोक की पार कर जाता है।" ऐसी श्रुति है। "ज्ञानी काशी में शरीर छोड़े अथवा चाण्डाल के घर में शरीर छोड़े; विशुद्ध आशय वाला वह तत्त्ववेत्ता तो ज्ञानसम्प्राप्तिकाल में ही मुक्त हो चुका है।" ऐसी स्मृति भी हैं। ।।४३।। ।। इति ॐ शम् ।। इस प्रकार कैलास पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती जी द्वारा विरचित तत्त्वबोध व्याख्या सम्पन्न हुई।। समरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥

२० ।। श्रीमदभिनवचन्द्रेश्वरो विजयतेतराम् ।। ॐ श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्यविरचितः आत्मबोधः जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य भगवान् ने उत्तम अधिकारियों के लिये प्रस्थानत्रयी (प्रस्थान-परमतत्त्व की प्राप्तिका साधन। गीता दशोपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र, ये तीन प्रस्थान हैं।) की रचना करके, उसको जानने में असमर्थ मन्दबुद्धि वालें जिज्ञासुओं पर कृपा करने के लिए सर्व वेदान्त सिद्धान्त रूपी धन संयुक्त 'आत्मबोध' नामक प्रकरण ग्रन्थ की रचना की प्रतिज्ञा ग्रन्थ के आदि में करते हैं- ॐ तपोभिः क्षीणपापानां शांतानां वीतरागिणाम् । मुमुक्षूणामपेक्ष्योऽयमात्मबोधो विधीयते ।।१।। व्याख्या- कृच्छ्रचान्द्रायण, नित्य और नैमित्तिक आदि कर्मों को शास्त्रों में 'तप' शब्द से कहा गया है। ऐसे तप का फलाभिसंधि से रहित होकर अनुष्ठान करने से जिनके पाप (अन्तःकरण के रागादि दोष) क्षीण हो गये हैं। अत एव जो शान्त हैं तथा जिनसे राग अर्थात् ऐहिक और पारलौकिक भोगों की आकाङ्क्षा निवृत्त हो गयी है, ऐसे संसार रूपी ग्रन्थि -भेदन में तत्पर साधनचतुष्टय संपन्न मुमुक्षुओं के लिए

२१ विधिमुखेन 'आत्मबोध' का प्रतिपादन किया जाता है ।।१।। शङ्का- जब तप, मन्त्र, कर्मयोग आदि अनेक साधन वर्तमान है तो मोक्ष के लिये प्रधान रूप से बोध को ही क्यों कहा जाता है। इस विषय में कहते हैं- बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षैकसाधनम्। पाकस्य वह्निवज्ज्ञानं बिना मोक्षो न सिद्ध्यति।।२।। तप, मन्त्र, कर्मयोगादि साधन ज्ञान के माध्यम से परंपरया मोक्ष की सिद्धि करते हैं। जबकि ज्ञान मोक्ष का साक्षात् साधन है। ज्ञान तो उत्पत्ति मात्र से ही सम्पूर्ण अज्ञान को नाश करके मुमुक्षुओं को स्वाराज्य में अभिषिक्त कर देता है। इसलिए अन्य साधनों की अपेक्षा ज्ञान की प्रधानता कही गयी है। इस बात को दृष्टान्त द्वारा दृढ़ करते हैं कि जैसे काष्ठ, जल, पात्र आदि साधन होने पर भी वह्नि के बिना पाकक्रिया नहीं होती। ठीक उसी प्रकार ज्ञान के बिना मोक्ष की सिद्धि नहीं होती। ।।२।। विलक्षण शक्ति से युक्त होने से कोई कर्म ही अज्ञान को नष्ट कर देगा, अतः आत्मज्ञान से क्या लाभ? ऐसी आशङ्का का निराकरण करते हुए कहते हैं- अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याऽविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसङ्घवत्।।३।। कर्म और अज्ञान में विरोध न होने से अज्ञानात्मक कर्म, अन्तः- करणमलिनता रूपी काम क्रोध के कारण अज्ञान का नाश करने में समर्थ नहीं है। किन्तु ज्ञान प्रकाशस्वरूप होने से अज्ञान का नाश करने में समर्थ हैं। जैसे तेजःपुञ्ज अन्धकार का नाश करता है, ठीक वैसे ही ।।३।।

२२ प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न आत्मा उपलब्ध होता है, फिर आत्मा में कैवल्य (अद्वितीयत्व) कैसे है, ऐसी शङ्का होने पर उत्तर देते हैं- अविच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः। स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ।।४।। परिपूर्ण, अद्वितीय आत्मा में अज्ञान से परिकल्पित उत्तम-अधम शरीरों के तादात्म्याध्यास से परिच्छिन्नता भासती है। अत- अविवेक से ही भेद का भान हो रहा है, तात्त्विकदृष्टि से नहीं। आत्मानात्मविवेक से अज्ञान नष्ट होने पर अद्वितीय आत्मा प्रकाशमान होता है, जैसे मेघमण्डल के हटने पर आदित्य ।।४।। शङ्का- आत्मा में अभेदबुद्धि युक्तिसंगत नहीं हैं, वृत्त्यात्मक ज्ञान (अखण्डाकार वृत्ति) से भी आत्मा में भेद सिद्ध होता है, इस पर कहते हैं- अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्धि निर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत् ।।५।। चिरकाल के अभ्यास से दृढ़ीभूत ज्ञान, अज्ञान नाश के द्वारा अज्ञान के कार्य अन्तःकरणादि का पूर्णरूपेण नाश करके कर्तृत्वादि आध्यासिक धर्मों का नाश करके जीव को निर्मल बनाकर अन्त में स्वयं भी नष्ट हो जाता है। वृत्ति अज्ञान का कार्य होने से, वृत्ति में प्रतिबिम्बित ज्ञान आत्माभासरूप होने से आत्मा में ही लीन हो जाता है। तब आत्मा प्रकाशित होता है। जैसे निर्मली बीज का चूर्ण (कतकरज) सम्पूर्ण जल को निर्मल बनाकर स्वयं भी नष्ट हो जाता है। ।।५।। अपरोक्ष रूप से अनुभव में आ रहा संसार अत्यन्त

२३ असत् (मिथ्या) कैसे हो सकता है। संसार को मिथ्या मानने पर प्रत्यक्ष प्रमाण से विरोध उपस्थित होगा। ऐसी आशंका होने पर स्वप्न-दृष्टान्त से संसार को मिथ्या सिद्ध करते हैं- संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः। स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्‌भवेत् ।।६।। रागद्वेषादि से परिपूर्ण यह संसार अज्ञानदशा में सत्य के समान भासित होता है। श्रवणादि से आत्मज्ञान होने पर यह असत्य ही हो जाता है। जैसे निद्रा दोष के कारण मिथ्या स्वप्न सत्य के समान भासता है और जागरण काल में मिथ्या सिद्ध होता है, तद्वद् ।।६।। एक अन्य दृष्टान्त से जगत् के मिथ्यात्व को दृढ़ करते हैं- तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा। यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम् ।।७।। जैसे शुक्तिगत नीलपृष्ठ, त्रिकोण आदि विषयक विशेष ज्ञान जब तक नहीं होता तब तक शुक्ति में रजतज्ञान सत्य के समान मालूम पड़ता है। ठीक उसी प्रकार सर्वाधिष्ठान, सच्चिदानन्द स्वरूप, अद्वितीय ब्रह्म का ज्ञान जब तक नहीं होता तब तक जगद्रूप से परिणत संसार भी भ्रान्ति से सत्य जैसा ही लगता है। ।।७।। 'ब्रह्म में ही सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च माया से कल्पित है' इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं- सच्चिदात्मन्यनुस्यूते नित्ये विष्णौ प्रकल्पिताः। व्यक्तयो विविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत् ।।८।। सच्चिदानन्द, नित्य, सर्वत्र, अनुगत, व्यापक परमात्मा जो कि सबका उपादान है, उसमें देव, तिर्यक्, मनुष्य, स्थावर तथा

२४ जङ्गम आदि सभी विशेष अभिव्यक्तियाँ, सुवर्ण में कटक, कुण्डल और मुकट आदि के समान कल्पित है। अर्थात् कल्पित की अधिष्ठानातिरिक्त सत्ता न होने से ब्रह्म से अभिन्न हैं। ।।८।। उपर्युक्त अर्थ को आकाश दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं- यथाऽऽकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः। तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे सति केवलः।।९।। 'हृषीकम्' इन्द्रियों को कहते हैं। अतः मनः आदि सभी इन्द्रियों के प्रेरक या नियामक परमात्मा को 'हृषीकेश' कहा जाता है। ऐसे सर्वगत परमात्मा अपनी माया से परिकल्पित नाना प्रकार की उपाधियों में प्रतिबिम्बित होकर नाना (भिन्न) के समान भासित होते हैं। किन्तु ब्रह्मैक्यज्ञान होने पर, देहादि उपाधियों के नष्ट होने पर केवल एक आत्मस्वरूप से ही परिशिष्ट होकर भासते हैं। जैसे एक ही आकाश मठ, घट आदि उपाधियों में नाना (भिन्न) के समान भासित होता है और उपाधियों के विलय होने पर एक के समान ही भासता हैं, तद्वद् ।।६।। शङ्का- सभी देहों में तत्तद् जाति आदि से सम्बद्ध आत्मा नित्य मुक्त कैसे है? इस विषय में बताते हैं- नानोपाधिवशादेव जातिनामाश्रमादयः। आत्मन्यारोपितास्तोये रसवर्णादिभेदवत्।।१०।। नाना उपाधि संयुक्त आत्मा में जाति, वर्ण, नाम, रूप आदि आरोपित हैं अर्थात् मायाकल्पित हैं। वास्तव में सत्य नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसे स्वाभाविक रूप से मधुर जल कड़वा, तीखा, मधुर, लाल और पीले आदि द्रव्यों से संयुक्त होकर वैसा ही हो जाता है, स्वरूपतः नहीं ।।१०।।

२५ अब ज्ञानस्वरूप आत्मा की अविद्यापरिकल्पित तीन उपाधियों में से प्रथम उपाधि को कहते हैं- पञ्चीकृतमहाभूतसम्भवं कर्मसञ्चितम् । शरीरं सुखदुःखानां भोगायतनमुच्यते ।।११।। अपञ्चीकृत पाँच भूतों में प्रत्येक को दो भाग में विभक्त करके, उनमें से प्रत्येक के आधे भाग को पुनः चार टुकड़ों में विभक्त करके, अपने अर्ध भाग को छोड़कर अन्यों के अर्ध भाग में एक-एक टुकड़े को मिला देने से पञ्चीकरण होता है। इस प्रकार से पञ्चीकृत पञ्च पृथिवी आदि स्थूल महाभूतों से उत्पन्न होने वाला तथा प्रारब्ध कर्मों से सञ्चित स्थूल शरीर प्रत्यगात्मा के सुख-दुःख भोग (अनुभव) का आयतन (भोगस्थान) कहा जाता है। ।।११।। अब प्रत्यगात्मा के भोग साधन सूक्ष्मशरीर को बताते हैं- पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसन्वितम् । अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम् ।।१२।। अञ्चीकृत पञ्च महाभूतों से उत्पन्न पञ्च प्राण, अन्तःकरण की संकल्पात्मिका वृत्ति रूपी मन, निश्चयात्मिका वृत्ति रूपी बुद्धि, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, इन सत्रह तत्त्वों से युक्त सूक्ष्म अङ्गों वाला लिङ्गशरीर प्रत्यगात्मा का भोग साधन कहा जाता है। ।।१२।। कार्योपाधि का कथन करके अब प्रत्यगात्मा की कारणोपाधि को कहते हैं- अनाद्यविद्याऽनिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते। उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत्।।१३।।

२६ सद् असद् शब्दों से अनिर्वचनीय (कहने योग्य नहीं) अनादि अविद्या ही प्रत्यगात्मा की कारणोपाधि है। स्थूल और सूक्ष्म प्रपञ्च का कारण होने से उसे ऐसा कहा जाता है। अनृत, दुःख तथा जड़ से विलक्षण सत्, चिद् और आनन्द रूप से प्रकाशित होने से प्रत्यगात्मा कारणोपाधिवाला है। प्रति-प्रतिकूलेन अञ्चति प्रकाशते इति प्रत्यग्। प्रत्यगात्मा ही कारणोपाधिवाला है। इन तीनों ही उपाधियों के साक्षी आत्मा को उनसे विलक्षण ही जानना चाहिए ।।१३।। शङ्का- अन्नमय आदि पाँच कोशों में तादात्म्य भाव से स्थित आत्मा को नित्य मुक्त क्यों कहा जाता है? इस विषय में कहते हैं- पञ्चकोशादियोगेन तत्तन्मय इव स्थितः। शुद्धात्मा नीलवस्त्रादियोगेन स्फटिको यथा ।।१४।। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय, ये पाँच कोश हैं। इन पाँच कोशों में मिथ्या तादात्म्य करके आत्मा तत्तन्मय जैसे होकर स्थित है। जैसे शुद्ध स्फटिक नील, पीतादि वस्त्रों के सम्बन्ध से नीलादिरूप विशिष्ट भासित होता है। इसी प्रकार शुद्ध आत्मा पाँच कोशों और उनके क्षुधा-पिपासा आदि धर्मों से तादात्म्य करके कोशादि से विशिष्ट जानने में आता हैं। वस्तुतः आत्मा में कोई लेप नहीं है। ।।१४।। आत्मस्वरूप ज्ञान के लिए पञ्च कोशों से आत्मा के विवेचन का प्रकार बताते हैं- वपुस्तुषादिभिः कोशैर्युक्तं युक्त्यवघाततः। आत्मानमान्तरं शुद्धं विविच्यात्तण्डुलं यथा।।१५।।

२७ जैसे भूसी आदि (तुषादि) युक्त चावल को अवघात (कुटाई) से पृथक् करके शुद्ध कर लिया जाता है। वैसे ही अन्नमयादि पाँच कोशो से आवृत आत्मा को युक्तियों से विविक्त करके जान लेना चाहिए। निम्नलिखित युक्तियों से (अनुमान से) आत्मा, स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से भिन्न सिद्ध होता है। स्थूलदेहो नात्मा कार्यभूतत्वात् घटवत्। सूक्ष्मदेहोऽपि अनात्मा देहत्वात् स्थूलदेहवत्। इस प्रकार अनुमानरूपी युक्तियों से आत्मा को पञ्च कोशों से पृथक् जान लेना चाहिए ।।१५।। शंका- आत्मा सर्वगत है तो सर्वत्र दिखाई क्यों नहीं पड़ता? समाधन करते हैं- सदा सर्वगतोऽप्यात्मा न सर्वत्रावभासते। बुद्धावेवावभासेत स्वच्छेषु प्रतिबिम्बवत्।।१६।। आत्मा सदा ही सर्वत्र विराजमान होने पर भी जड़ बाह्येन्द्रियों के द्वारा प्रकाशित नहीं होता। रागादि से रहित बुद्धि में ही उसका प्रकाशन होता है, सर्वत्र नहीं। जैसे प्रतिबिम्ब स्वच्छ दर्पण आदि में ही दिखाई देता है, सर्वत्र नहीं। ठीक उसी तरह ।।१६।। अब राजा के दृष्टान्त से देह में स्थित आत्मा की उदासीनता को दिखाते हैं- देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्रकृतिभ्यो विलक्षणम्। तद्वृत्तिसाक्षिणं विद्यादात्मानं राजवत्सदा।।१७।। जड़स्वरूप परिणामस्वरूप तथा दृश्यस्वरूप देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और प्रकृति से आत्मा को विलक्षण और अन्तःकरणवृत्तियों का साक्षी जानना चाहिए। जैसे राजा अपने नगर में स्थित होकर