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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ
३६८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ ऋतुगमनातिक्रमनिन्दा

अनु०—जो पुरुष ऋतुस्नान करने वाली पत्नी के निकट रहते हुए भी उससे मैथुन रत नहीं होता उसके पूर्वज उस मास में उसकी पत्नी के रजस्राव में ही पड़े रहते हैं ॥ २० ॥

ऋतुगमनातिक्रमनिन्दैषा ॥ २० ॥

ऋतौ नोपैति यो भार्यामनृतौ यश्च गच्छति ।
तुल्यमाहुस्तयोर्दोषमयोनौ यश्च सिञ्चति ॥ २१ ॥

अनु०—जो पुरुष ऋतुकाल में पत्नी से मैथुन नहीं करता, जो ऋतुकाल से भिन्न समय में पत्नी से मैथुन करता है, और जो पत्नी की योनि से भिन्न स्थान में अप्राकृतिक मैथुन द्वारा वीर्यपात करता है, इन सभी के दोष समान रूप से घोर होते हैं ॥ २१ ॥

त्रयाणामपि भ्रूणहत्यादोषस्तुल्यः सत्पुत्रोत्पत्तिनिरोधात् ॥ २१ ॥

भर्तुः प्रतिनिवेशेन या भार्या स्कन्दयेदृतुम् ।
तां ग्राममध्ये विख्याप्य भ्रूणघ्नीं निर्धमेदगृहात् ॥ २२ ॥

अनु०—जो पत्नी पति की इच्छा होने पर भी मैथुन से विरत रहती है और (ओषधि आदि द्वारा $^१$ रजोहानि कर सन्तानोत्पत्ति में बाधा पहुँचाती है, उसे गाँव के लोगों के समक्ष भ्रूणघ्नी घोषित कर घर से निकाल दे ॥ २२ ॥

प्रतिनिवेशः प्रतिकूलता अनिच्छा वा । स्कन्दयेत् गमयेत् शोषयेद्वा भर्तुर्द्वेषाद्रज औषधादिभिश्चाशोषयन्तीमित्यर्थः । ग्राममध्ये जनसन्निधौ निर्धमेत् प्रस्थापयेत् त्यजेत् । ऋत्वतिक्रमे भर्तुर्यथा भ्रूणहत्या तथाऽस्या अपीति निन्दैषा ॥ २२ ॥

ऋतुगमनातिक्रमे प्रायश्चित्तमाह—

ऋतुस्नातां न चेद्गच्छेन्नियतां धर्मचारिणीम् ।
नियमातिक्रमे तस्य प्राणायामशतं स्मृतम् ॥ २३ ॥

अनु०—जो पति मासिक धर्म के बाद स्नान करने वाली और धर्म पूर्ण आचरण करने वाली पत्नी से मैथुन के नियम का उल्लंघन करता है, उसके लिए प्रायश्चित्त के लिए सो प्राणायाम करने का विधान है ॥ २३ ॥

नियमातिक्रमः ऋतुगमनातिक्रमः । ऋत्वतिक्रमो वा । ऋज्वन्यत् ॥ २३ ॥


१. एतत्प्रकरणस्थानि १७–१८, २०, २३ सूत्राणि मानववासिष्ठैः संवदन्ति ।

प्रथमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३६९

प्रथमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३६९

प्राणायामान् पवित्राणि व्याहृतीः प्रणवं तथा ।
पवित्रपाणिरासीनो ब्रह्म नैत्यकमभ्यसेत् ॥ २४ ॥

**अनु०—**प्राणायाम, पुरुष सूक्त आदि पवित्र करने वाले मन्त्र और सूक्त, व्याहृतियाँ और प्रणव तथा वेद के अंश का प्रतिदिन हाथ में कुश लेकर और बैठकर जप करे ॥ २४ ॥

पवित्राणि पुरुषसूक्तादीनि । शरीरस्याऽहर्निशं पापसंचयोऽवश्यं भवतीति मत्वा नैत्यकं ब्रह्माऽभ्यसेदित्युक्तम् ॥ २४ ॥

किञ्च—

आवर्तयेत्सदा युक्तः प्राणायामान् पुनः पुनः ।
आकेशान्तान्नखाग्राच्च तपस्तप्यत उत्तमम् ॥
निरोधाज्जायते वायुर्वायोरग्निश्च जायते ।
तापेनाऽऽपोऽधिजायन्ते ततोऽन्तश्शुद्ध्यते त्रिभिः ॥

अनु० योगाभ्यास में लगकर सदैव बार-बार प्राणायाम की आवृत्ति करे । इससे वह केशों के अन्त तक और नखों के अग्र भाग तक उत्तम तप के आचरण से युक्त हो जाता है । प्राणवायु के निरोध से वायु उत्पन्न होता है और वायु से अग्नि उत्पन्न होता है । अग्नि से जल उत्पन्न होता है, तब इन तीनो से सूक्ष्म शरीर या अन्तरात्मा शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥

कोष्ठे वायुर्जायते । वायोरग्निः । अग्नेरापः तैस्त्रिभिरन्तस्सूक्ष्मशरीरं शुद्ध्यति ॥ २५ ॥

आवर्तयेत् सदा युक्त इत्युक्तम् , तत्प्रसङ्गादिदमाह--

योगेनाऽऽवाप्यते ज्ञानं योगो धर्मस्य लक्षणम् ।
योगमूला गुणास्सर्वे तस्माद्युक्तस्सदा भवेत् ॥ २६ ॥

**अनु०—**योग से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है । योग ही धर्म का सार है । सभी गुण योग से ही उत्पन्न होते हैं । अतएव सदैव योग का अभ्यास करना चाहिए ॥ २६ ॥

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः, तथोक्तम्—
प्राणायामास्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा ।
तर्कश्चैव समाधिश्च षडङ्गो योग उच्यते ॥ इति ॥

२७ बौ०ध०

३७० बौधायन-धर्मसूत्रम् [प्रणवव्याहृतीनां प्रशंसा

स एव धर्मस्य लक्षणं हेतुः धर्मोऽपूर्वम्। योगमूलाः योगकारणकाः गुणरूपादयः ॥ २६ ॥

अथ प्राणायामावयवभूतानां प्रणवव्याहृतीनां प्रशंसा— प्रणवाद्यास्तथा वेदाः प्रणवे पर्यवस्थिताः।
प्रणवो व्याहृतयश्चैव नित्यं ब्रह्म सनातनम् ॥
प्रणवे नित्ययुक्तस्य व्याहृतीषु च सप्तसु।
त्रिपदायां च गायत्र्यां न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २७ ॥

**अनु०—**वेद प्रणव से ही आरम्भ होते हैं। उनका अन्त भी प्रणव अर्थात् 'ओम्' से होता है। प्रणव और व्याहृतियाँ नित्य और सनातन ब्रह्म हैं। जो व्यक्ति नित्य ही ओंकार, सात व्याहृतियों तथा त्रिपदा गायत्री के उच्चारण में लगा हुआ है, उसके लिए कोई भी भय नहीं रह जाता ॥ २७ ॥

पर्यवस्थिताः परिसमाप्ताः व्याहृतयस्सप्त ॥ २७ ॥

एवमवयशः प्राणायामांस्तुत्वा तस्य सङ्क्षेपतो लक्षणं करोति — सव्याहृतिकां सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामस्स उच्यते ॥ २८ ॥

**अनु०—**यदि प्राणवायु को रोककर व्याहृतियों, ओंकार तथा शिरस् के साथ गायत्री मन्त्र का तीन बार जप करे तो एक प्राणायाम होता है ॥ २८ ॥

अनिर्दिष्टविषये प्राणायामोऽपि प्रायश्चित्तमुच्यत इत्याह— सव्याहृतिकासप्रणवाः प्राणायामास्तु षोडश ।
अपि भ्रूणहनं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ २६ ॥

**अनु०—**प्रतिदिन व्याहृतियों और ओंकार के साथ सोलह बार प्राणायाम करने पर एक मास में विद्वान् ब्राह्मण की हत्या का पाप करने वाला भी पवित्र हो जाता है ॥ २९ ॥

अपिशब्दात्किं पुनरन्यानीति गम्यते ।

एतदाद्यं तपश्श्रेष्ठमेतद्धर्मस्य लक्षणम् । सर्वदोषोपघातार्थमेतदेव विशिष्यते एतदेव विशिष्यत इति ॥ ३० ॥

इति चतुर्थे प्रथमः खण्डः ॥

द्वितीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७१

द्वितीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७१

अनु०—यही सबसे उत्तम तप है, यही धर्म का श्रेष्ठ लक्षण है। सभी पापों को नष्ट करने के लिए यह प्राणायाम ही सबसे विशिष्ट रूप से पवित्र करने वाला है ॥ ३० ॥

दोषाः पापानि ॥ २८-३० ॥

इति गोविन्दस्वामिकृते बौधायनीयधर्मविवरणे चतुर्थप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ॥


चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः

द्वितीयः खण्डः

प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामो नानार्थानि पृथक्पृथक् ।
तेषु तेषु च दोषेषु गरीयांसि लघूनि च ॥ १ ॥
अनु०— हम विभिन्न दोषों के प्रायश्चित्तों का, दोषों के अनुसार बड़े और हल्के प्रायश्चित्तों का पृथक्-पृथक् विवेचन करेंगे ॥ १ ॥

यद्यत्र हि भवेद्युक्तं तद्धि तत्रैव निर्दिशेत् ।
भूयो भूयो गरीयस्तु लघुष्वल्पीयसस्तथा ॥ २ ॥
अनु०— दोष के अनुसार जो प्रायश्चित उचित हो उसी का निर्देश करना चाहिए। बड़े दोष के लिए बड़े प्रायश्चित्त और लघु दोषों के लिए लघु-प्रायश्चित्त करने चाहिए ॥ २ ॥

विधिना शास्त्रदृष्टेन प्रायश्चित्तानि निर्दिशेत् ।
प्रतिग्रहीष्यमाणस्तु प्रतिगृह्य तथैव च ॥ ३ ॥
अनु०— शास्त्र में बतायी गयी विधि के अनुसार प्रायश्चित्त करे ॥ ३ ॥

ऋचस्तरत्समन्द्यस्तु चतस्रः परिवर्तयेत् ॥ ४ ॥
अनु०— जिसको दान लेना हो या जिसने दान लिया हो वह तरत्समन्द्य नाम के ऋङ्मन्त्रों का बार-बार जप करे ॥ ४ ॥

'अभोज्यानां तु सर्वेषामभोज्यान्नस्य भोजने ।


१. अभोज्यानां तु सर्वेषां मार्जनं पावनं स्मृतम् ॥ इत्येवं सूत्रपाठो व्याख्यान-पुस्तकेषु, व्याख्याऽप्येतत्पाठानुकूलैव ॥

३७२बौधायन-धर्मसूत्रम्[ विविधप्रायश्चित्तानि

ऋग्भिस्तरत्समन्दीयैर्मार्जनं पापशोधनम् ॥ ५ ॥

अनु०— किन्तु जिन वस्तुओ का भोजन निषिद्ध है, उनका भोजन करने पर और जिन व्यक्तियों के अन्न का भोजन निषिद्ध है उनके अन्न का भोजन करने पर तरत्समन्दीय ऋचाओं के उच्चारण के साथ जल से मार्जन करने पर पाप से शुद्धि हो जाता है ॥ ५ ॥

प्रायश्चित्तेषु भूयो विधिना व्याख्यातमेतत् । पुनर्वचनप्रयोजनम् - पूर्वाध्यायनिर्दिष्टेषु प्रायश्चित्तेष्विह वक्ष्यमाणेषु यानि समानि तान्यविरोधीनि समुच्चीयन्ते, विरोधीनि तु विकल्प्यन्ते । प्रतिग्रहोष्यमाणस्त्विति अप्रतिग्राह्यमिति शेषः । परिवेदनम'वर्त्तनम् । ऋचः तरत्समन्द्योऽप्सि'ति केचित्पठन्ति । तरत्समन्दीत्यादिभिरेव मार्जनं उदकाञ्जलिना शिरस्यभिषेकः ॥१-५॥

भ्रूणहत्याविधिस्त्वन्यः तं तु वक्ष्याम्यतः परम् ।
विधिना येन मुच्यन्ते पातकेभ्योऽपि सर्वशः ॥ ६ ॥

अनु०— अब हम यहाँ से विद्वान् ब्राह्मण की हत्या के प्रायश्चित्त की विधि बताएगे जिस विधि से मनुष्य सभी प्रकार के पातको से सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ।६।

अयमन्यो भ्रूणहत्याविधिरित्यर्थः । तमावेष्टयति-विधिना येनेति ॥ ६ ॥

प्राणायामान् पवित्राणि व्याहृतीः प्रणवं तथा ।
जपेदघमर्षणं युक्तः पयसा द्वादश क्षपाः ॥ ७ ॥

अनु०— प्राणायाम, पवित्र करने वाले वैदिक मन्त्रादि, व्याहृतियों, ओंकार तथा अघमर्षण मन्त्रों का बारह रात्रियों तक योगाभ्यास करते हुए, तथा केवल दुग्धाहार करते हुए जप करे ॥ ७ ॥

जपेदिति प्राणायामादिषु प्रत्येकं संबध्यते । अत एव न तेषां समुच्चयः। युक्तो ब्रह्मचर्यादिभिः, योगयुक्तो वा । पयसा वर्तमानः द्वादशरात्रीनैरन्तर्येण जपेत् ॥ ७ ॥

त्रिरात्रं वायुभक्षो वा क्लिन्नवासाऽऽप्लुतश्शुचिः ॥ ८ ॥

अनु०— अथवा तीन रात्रियों तक गीले वस्त्रों को पहने हुए कोई आहार न कर केवल वायु पीकर रहते हुए ( जप करने पर ) शुद्धि हो जाती है ॥ ८ ॥

क्लिन्नवासाः आर्द्रवासाः ॥ एवंभूतो वा पूर्वोक्तानामन्यतमं जपेत् । शक्त्यपेक्षश्चाऽसौ विकल्पः ॥ ८ ॥

प्रतिषिद्धांस्तथाऽऽचारानभ्यस्याऽपि पुनः पुनः ।

द्वितीयः खण्डः] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७३

द्वितीयः खण्डः] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७३

वारुणीभिरुपस्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ९ ॥ इति ।

अनु०— किन्तु यदि उसने निषिद्ध कर्मों का बार-बार आचरण किया है तो वारुणी मन्त्रों से पूजा करके सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ९ ॥

अध्यस्य निश्चित्य । अपिशब्दात् कृत्वा च । प्रतिषिद्धाचाराः भस्मकेशादि-व्यवस्थानादायः । उपस्पर्शनमुदकाञ्जलिन शिरस्यभिषेकः ॥ ९ ॥

अथाऽवकीर्ण्यमावास्यायां निश्यग्निमुपसमाधाय दार्विहोमिकीं परिचेष्टां कृत्वा द्वे आज्याहुती जुहोति "कामावकीर्णोऽस्म्यवकीर्णोऽस्मि काम कामाय स्वाहा । कामाभिद्रुग्धोऽस्म्यभिद्रुग्धोऽस्मि काम कामाय स्वाहे"ति ॥ १० ॥

हुत्वा प्रयताञ्जलिः कवातिर्यङ् ङग्निमुपतिष्ठेत—"सं मा सिञ्चन्तु मरुतस्सम्मिन्द्रस्सं बृहस्पतिः । सं माऽयमग्निस्सिञ्चत्वायुषा च बलेन चाऽऽयुष्मन्तं करोतु मे"ति । प्रति हाऽस्मै मरुतः प्राणान् दधाति प्रतीन्द्रो बलं प्रति बृहस्पतिर्ब्रह्मवर्चसं प्रत्यग्निरितरत्सर्वं सर्वतनुर्भूत्वा सर्वमायुरेति । त्रिराममन्त्रयेत । त्रिसत्या हि देवा इति विज्ञायते ॥ ११ ॥

अनु०— ब्रह्मचर्य व्रत को भंग करने वाला ब्रह्मचारी अमावस्या की रात्रि की अग्नि का उपसमाधान करे और दार्विहोम की आरम्भिक क्रियाएं कर निम्नलिखित मन्त्रों से घृत की दो आहुतियों से हवन करे "कामावकीर्णोऽस्म्यवकीर्णोऽस्मि काम कामाय स्वाहा। कामाभिद्रुग्धोऽस्म्यभिद्रुग्धोऽस्मि काम कामाय स्वाहा।" (काम, मैंने व्रत का भंग किया है, मैं अवकीर्णी हूँ, काम के लिए स्वाहा। काम, मैं ने दुष्कर्म किया है, मैं दुष्कर्मी हूँ काम को स्वाहा) ॥ १० ॥

अनु०— हवन करने के बाद अञ्जलि बांधकर कुछ तिरछे बैठकर निम्नलिखित मन्त्र से अग्नि की आराधना करे—'सं मा सिञ्चन्तु मरुतस्सम्मिन्द्रस्सं बृहस्पतिः। सं माऽयमग्निसिञ्चत्वायुषा च बलेन चाऽऽयुष्मन्तं करोतु मे' (मरुत, इन्द्र, बृहस्पति और यह अग्नि मुझे आयु और बल से युक्त करें मुझे आयुष्मान् बनायें)। उसमें मरुत् प्राणों का आधान करते हैं, इन्द्र उसे बल देता है, बृहस्पति ब्रह्म का तेज देता है, अग्नि अन्य सभी कुछ प्रदान करता है। इस प्रकार उसका शरीर सम्पूर्ण बन जाता है और वह पूर्ण जीवन प्राप्त करता है। तीन आवृत्ति कर देवों की प्रार्थना करे, क्योंकि देवता तीन बार कहने पर सत्य के रूप में ग्रहण करते हैं, ऐसा वेद में कहा गया है ॥ ११ ॥

३७४बौधायन-धर्मसूत्रम्[ विविधप्रायश्चित्तानि

दार्विहोमिकमित्यत्राऽऽज्यसंस्कारमात्रं न पुनस्थालीपाकप्रयोगोऽपि। प्रयताञ्जलिः सम्पुटिताञ्जलिः क्वातिर्यङ्ङनाऽत्यन्ताभिमुखो नाऽपि पृष्ठतः कुर्वन्। उक्तमेतत् 'क्वातिर्यङ्ङवोपतिष्ठेत् नैनं प्रत्यङ् न पराङ्' इति। अभिमन्त्रणमभिवीक्ष्याऽभिवदनं, त्रिषत्या हि देवा इति विज्ञायते ॥ १०,११ ॥

योऽपूत इव मन्येत आत्मानमुपपातकैः ।
स हुत्वैतेन विधिना सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ १२ ॥

अनु०—जो स्वयं को उपपातकों से दूषित-जैसा अनुभव करता हो वह इसी विधि से हवन करने पर सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥

उपपातकंप्रायश्चित्ते कृतेऽपि मनसो यद्यलाघवं भवति तदाऽनेन प्रायश्चित्तेनाऽधिक्रियते एतेनैव विधिना सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते। विधिनेत्यभिमन्त्रणान्तरमाह। वरोऽपि दक्षिणेति ॥ १२ ॥

अपि वाऽनाद्यापेयप्रतिषिद्धभोजनेषु दोषवच्च कर्म कृत्वाऽपि सन्धिपूर्वमनभिसन्धिपूर्वं वा शूद्रायां च रेतस्सिक्त्वाऽयोनौ वाऽब्लिङ्गाभिर्वारुणीभिश्चोपस्पृश्य प्रयतो भवति ॥ १३ ॥

अनु०—यदि न खाने योग्य भोजन खा लिया हो, या न पीने योग्य वस्तु पी ली हो, कोई दोषयुक्त कर्म जान बूझकर या अनजान में किया हो, शूद्रा स्त्री से मैथुनरत हुआ हो अथवा अप्राकृतिक मैथुन से वीर्यपात किया हो तो स्नान कर अब्ब्लिङ्ग और वरुण के मन्त्रों का पाठ करने पर शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥

अनाद्यं केशकीटादिभिरुपहतम्। अपेयं मद्यम्, मद्यभाण्डस्थितोदकादि। प्रतिषिद्धभोजनं चिकित्सकादिभोजनम्, दोषवत्कर्म अभिचारादि। शूद्रायां योढा द्विजातिभिः। चशब्दात्सवर्णामपि चलितायाम्। अयोनः खट्-वादि। चशब्दाद्रोगाद्युपहतायां स्वभार्यायामपि। पर्वणि के चिदिच्छन्ति। एतेषु निमित्तेषु पूर्वोक्तं प्रायश्चित्तम् ॥ १३ ॥

उपदर्शनायैतदेव परमतेन द्रढयितुमाह —

अथाप्युदाहरन्ति—

अनाद्यप्राशनापेयप्रतिषिद्धभोजनेऽ ¹विशुद्धधर्माचरिते च कर्मणि।
मतिप्रवृत्तोऽपि च पातकोपमैः विशुद्ध्यतेऽथाऽपि च सर्वपातकैः ॥ १४ ॥


१. विरुद्धधर्माचरिते इति क. पु.

द्वितीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७५

द्वितीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७५

अनु०— यहाँ निम्नलिखित उद्धृत करते हैं—
न खाने योग्य अन्न खा लेने पर, अपेय पदार्थ का पानकर लेने पर अथवा निषिद्ध अन्न खाने पर, निषिद्ध कर्म करने पर या प्रतिषिद्ध क्रिया का अनुष्ठान करने पर, जान बूझकर भी पातकों के समान दोषों से और सभी पातकों से भी शुद्धि हो जाती है ॥ १४ ॥

अविशुद्धधर्माचरिते इति पदच्छेदः। छद्मना चरित इत्यर्थः। पातकोपमानि 'अनृतं च समुत्कर्षवति' इत्येवमादीन्येकविंशतिः। सर्वपातकरिति प्रशंसा-र्थमुक्तम्। न पुनः प्रायश्चित्तमेतत् ॥ १४ ॥

त्रिरात्रं वाऽप्युपवसन् त्रिरह्नोऽभ्युपेयादपः ।
प्राणानात्मनि संयम्य त्रिः पठेद्घमर्षणम् ॥ १५ ॥

अनु०— तीन दिन और तीन रात्रि उपवास करे, दिन में तीन बार स्नान करे और प्राणवायु को रोक कर तीन बार अघमर्षण मन्त्र का जप करे ॥ १५ ॥

अनन्तरोक्तेन विकल्पः। त्रिरात्रं त्रिषवणं स्नानम् ॥ १५ ॥

एतस्यैव विशेष उच्यते —

'यथाऽश्वमेधावभृथ एवं तन्मनुरब्रवीत् ॥ १६ ॥

अनु०— जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ के अन्त का अवभृथ स्नान होता है उसी प्रकार उपर्युक्त प्राणायाम और अघमर्षण मन्त्र का जप भी है ॥ १६ ॥

विज्ञायते च—

^२चरणं पवित्रं विततं पुराणं येन पूतस्तरति दुष्कृतानि ।
तेन पवित्रेण शुद्धेन पूता अतिपाप्मानमरातिं तरेमेति ॥ १७ ॥
इति चतुर्थप्रश्ने द्वितीयः खण्डः ॥

अनु०— ऐसा ज्ञात है—यह अघमर्षण सूक्त पाप को हटाने वाला, पवित्र करने वाला, विस्तीर्ण और प्राचीन है। उस पवित्र और शुद्ध करने वाले अघमर्षण सूक्त से पवित्र होकर हम भी अपने शत्रु पाप को जीते ॥ १७ ॥

चरणं चलनं पापस्य पवित्रं पवनहेतुः विततं विस्तीर्णं सर्वशास्त्रेषु पुराणं पुरातनं तदेतदघमर्षणसूक्तम् । तदावेष्टयति—येन सूक्तेन पूतो मनुष्यस्तरति दुष्कृतानि पपानि। वयमपि तेन पूताः पाप्मानं शत्रुमत्तितरमेति प्रार्थना ॥ १६ ॥ १७ ॥

इति चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ॥


१ See मनु. १२. २० ९. : ६०.
२. महानारायणोपनिषदि पठितोऽयं मन्त्रः See. तै. आ. १०. ११

३७६ | बौधायनधर्मसूत्रम् | [ रहस्यप्रायश्चित्तानि

चतुर्थप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः

तृतीयः खण्डः

अधुना रहस्यप्रायश्चित्तान्याह—

प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामोऽविख्यातानि विशेषतः ।
समाहितानां युक्तानां प्रमादेषु कथं भवेत् ॥ १ ॥

**अनु०—**अब हम विशेषतः उन प्रायश्चित्तों का विवेचन करेंगे जो अविख्यात हैं और हम यह बतायेंगे कि अपने कर्त्तव्य में तत्पर रहने वाले व्यक्तियों के प्रमाद का प्रायश्चित्त किस प्रकार हो ॥ १ ॥

अविख्यातानि अविख्यातदोषाणि । यावता विना यत्पापं कर्तुं न शक्यते तद्रूपतिरिक्तम् अविख्यातदोषमुच्यते । यद्वा—अविख्यातानि अन्यैर्धर्मशास्त्रकारैरदृष्टानि । अथवा—प्रायश्चित्तान्येव अविख्यातानि अन्यैः पुरुषैः । आत्मन इवाऽस्मिन् पुरुषे निमित्ते सत्येतत्प्रायश्चित्तमित्यनवगतानि । अत एव—विशेषतः विशिष्टपुरुषाणां विदुषामित्यर्थः । तानेव विशिनष्टि—समाहितानामिति । समाहिता अविक्षिप्तचित्ताः, युक्ताश्शास्त्रचोदितेषु कर्मसु निरताः । प्रमादेषु अबुद्धिपूर्वककृतेषु । तथा च वसिष्ठः—

आहिताग्नेर्विनीतस्य वृद्धस्य विदुषश्च यत् ।
रहस्योक्त प्रायश्चित्तं पूर्वोक्तमितरस्य तु ॥

कथं भवेदित्याशङ्कायां वक्ष्याम इति शेष ॥ १ ॥

ॐपूर्वाभिर्व्याहृतीभिस्सर्वाभिस्सर्वपातकेष्वाचामेत् ॥ २ ॥

**अनु०—**पहले ओंकार का उच्चारण करते हुए तथा सभी व्याहृतियों का उच्चारण करते हुए सभी पातकों को दूर करने के लिए आचमन करें ॥ २ ॥

प्रतिव्याहृति प्रणवसम्बन्धः कर्तव्यः । एकैकया वा आचमनम् । ततः परिमार्जनं चक्षुराद्युपस्पर्शनं च ॥ २ ॥

एवं विशिष्टं प्रशस्याऽऽचमनं अवयवशः प्रशंसितुमाह—

यत्प्रथममाचामति तेनर्ग्वेदं प्रीणाति, यद्द्वितीयं तेन यजुर्वेदं, यत्तृतीयं तेन सामवेदम् ॥ ३ ॥ यत्प्रथमं परिमाष्टि तेनाऽथर्ववेदं यद्द्वितीयं तेनेतिहासपुराणम् ॥ यत्सव्यं पाणिं प्रोक्षति पादौ शिरो हृदयं नासिके चक्षुषी श्रोत्रे नाभिं चोपस्पृशति तेनौषधिवनस्पतयः सर्वाश्च देवताः प्रीणाति तस्मादाचमनादेव सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ५ ॥

तृतीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३७७

तृतीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३७७

अनु०—पहली बार आचमन करने पर ऋग्वेद को प्रसन्न करता है, दूसरी बार आचमन करने पर यजुर्वेद को और तीसरी बार आचमन करने पर सामवेद को प्रसन्न करता है । पहली बार ओठों को पोछने पर अथर्ववेद को प्रसन्न करता है, दूसरी बार पोंछने पर इतिहास-पुराण को प्रसन्न करता है । जब बायें हाथ को पोंछता है, पैर, सिर, हृदय, नासिका, दोनों नेत्रों, दोनों कानों, नाभि का स्पर्श करता है, उससे ओषधियों, वनस्पतियों, सभी देवों को प्रसन्न करता है, इस कारण आचमन द्वारा ही वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ३-५ ॥

'इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्' इति श्रुतिः। ऋग्वेदाद्यभिमानिन्यो देवताः प्रीता भवन्त्याचमननेनैवाप्नोति ताः देवताः। ननु कथमेतदाचमनं भवति ? नाऽयं पर्यनुयोगस्य विषयः, नहि वचनस्याऽतिभारोऽस्तीत्युक्तत्वात् । यथाऽऽस्यगतेन सुराविन्दुना पतितः, न पयोविन्दुना, तदपि हि वचनावगम्यमेव, तस्माददोषः ॥ ४ ॥

अष्टौ वा समिध आदध्यात्—"देवकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। पितृकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। आत्मकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। यद्दिवा च नक्तं चैनश्चकृम तस्याऽवयजनमसि स्वाहा। यत्स्वपन्तश्च जाग्रतश्चैनश्चकृम तस्याऽवयजनमसि स्वाहा। यद्विद्वांसश्चाविद्वांसश्चैनश्चकृम तस्याऽवयजनमसि स्वाहा। एनस एनसोऽवयजनमसि स्वाहे"ति ॥ ६॥ एतैरष्टाभिर्हुत्वा सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ७ ॥

अनु०—अथवा निम्नलिखित आठ मन्त्रों से अग्नि पर आठ समिध् रखे तुम देवों के पापों को दूर करने वाले हो, स्वाहा। मनुष्य कृत पाप को दूर करने वाले हो, स्वाहा ! पितृकृत पाप को दूर करने वाले हो, स्वाहा। मेरे किए हुए पाप को दूर करनेवाले हो, स्वाहा। मैंने दिन में और रात में जो पाप किए है उसको दूर करनेवाले हो स्वाहा। मैंने सोते हुए, जागते हुए जो पाप किए हैं उस को दूर करनेवाले होस्वाहा। मैंने जानबूझकर और अनजाने में जो पाप किया है उसको तुम दूर करने वाले हो, स्वाहा। तुम प्रत्येक पाप को दूर करने वाले हो, स्वाहा। इन आठ मन्त्रों से हवन कर सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ६-७ ॥

अवयजनं निरसनम् ॥ ६, ७ ॥


१. महानारायणोपनिषद्गता इमेऽष्टौ मन्त्राः। अत्रापि द्राविडपाठ एव स्वीकृतस्सूत्रकारेण See. तै. आ, १०. ५९. ॥

३०८बौधायन-धर्मसूत्रम्[महादोषनाशकरमन्त्रप्रतीकाः

अथाऽप्युदाहरन्ति—

अघमर्षणं देवकृतं शुद्धवत्यस्तरत्समाः । कूष्माण्ड्यः पावमान्यश्च विरजा मृत्युलाङ्गलम् । दुर्गा व्याहृतयो रुद्रा महादोषविनाशना महादोषविनाशना इति ॥ ८ ॥

इति चतुर्थप्रश्ने तृतीयः खण्डः ॥

**अनु०—**यहाँ निम्नलिखित उद्धृत करते हैं—
अघमर्षण, देवकृत, शुद्धवती, तरत्समा, कूष्माण्डी, पावमानी, विरजा, मृत्युलाङ्गल, दुर्गा, ( 'जातवेदसे' आदि तैत्तिरीय आरण्यक १०.१.११ ), व्याहृतियाँ, 'नमस्ते रुद्र' आदि एकादश अनुवाक—ये सभी महादोष को नष्ट करने वाले होते हैं ॥ ८ ॥

**टि०—**जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः । स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः । तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः ॥ तै० आ० १०.१११.
अघमर्षणं 'ऋतं च सत्यं च' इत्यादि । विरजाः ^२'प्राणापान' इत्यादि-विरजाशब्दवन्तोऽष्टावनुवाकाः । मृत्युलाङ्गलं 'वेदाहमेतम्' इति द्वितीयः पाठः । दुर्गा^३ 'जातवेदसे इ'त्येषा । 'कात्यायनाय'^४ इति च । रुद्राः 'नमस्ते रुद्र' इत्येकादशाऽनुवाकाः । अन्यत्प्रसिद्धम् । महादोषाः महापातकानि ॥८॥

इति गोविन्दस्वामिकृते बौधायनीयधर्मसूत्रविवरणे
चतुर्थप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ॥


१. See P. 167 ।
२. 'प्राणापान' इत्यादयोऽनुवाकास्सप्त २६० पृष्ठे टिप्पण्यां लिखिताः । अनन्तरोऽनुवाकः "उत्तिष्ठ पुरुष हरी लोहित पिङ्गलाक्षि देहि देहि ददापयित्वा मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयास९ स्वाहा" इत्यष्टमः ( तै. आर. १० द्राविड-पाठे. ६०, ) ।
३. जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः । स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः ॥ तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः ॥ ( तै० आ० १०.१.११ )
४. कात्यायनाय विद्महे कन्याकुमारि धीमहि । तन्नो दुर्गिः प्रचोदयात् ॥ ( तै० आ० १०.१.७ ) ।

चतुर्थः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ३७९

चतुर्थः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ३७९

चतुर्थोऽध्यायः

चतुर्थः खण्डः

प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामोऽविख्यातानि विशेषतः ।
समाहितानां युक्तानां प्रमादेषु कथं भवेत् ॥

**अनु०—**अब हम विशेषतः उन प्रायश्चित्तों का विवेचन करेंगे जो अविख्यात हैं और यह बतायेंगे कि अपने कर्तव्य में तत्पर रहने वाले व्यक्तियों के प्रमाद का प्रायश्चित्त किस प्रकार हो ॥ १ ॥

व्याख्यातश्श्लोकः। पुनःपाठः पूर्वोक्तानामन्यतमेनेह वक्ष्यमाणानामन्यतमस्य समुच्चयार्थः ॥ १ ॥

“ऋतं च सत्यं चे”त्येतदघमर्षणं त्रिरन्तर्जले पठन् सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ २ ॥

**अनु०—**जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर तीन बार 'ऋतं च सत्यं च' इत्यादि अघमर्षण मन्त्रों का जप करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥

यथाविध्यधीयीत ऋष्यादिज्ञानपूर्वकमिति, तथोत्तरेष्वपि मन्त्रेषु द्रष्टव्यम् । अघमर्षणानामानुष्टुभं वृत्तम् ॥ २ ॥

^१ “आयं गौः पृश्निरक्रमी” दित्येतामृचं त्रिरन्तर्जले पठन् सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

**अनु०—**जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर तीन बार “आयं गौः पृश्निरक्रमी दसन्दन्मातरं पुनः । पितरं च प्रयन्त्सुवः” ( तैत्तिरीय संहिता १.५.३ ) पाठ करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ३ ॥

सर्पराजार्षं गायत्रं सूर्य आत्मा देवता ॥ ३ ॥

^२ “द्रुपदादिवेन्मुमुचान” इत्येतामृचं त्रिरन्तर्जले पठन् सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ४ ॥


१. आयं गौः पृश्निरक्रमीदसन्दन्मातरं पुनः । पितरं च प्रयन्त्सुवः ॥ ( तै० सं० १.५.३. ) ।
२. द्रुपदादिवेन्मुमुचानः । स्विन्नस्स्नात्वी मलादिव । पूतं पवित्रेणेवाऽज्यमापश्शुन्धन्तु मैनसः ॥

३८०बौधायन-धर्मसूत्रम्[अविज्ञातप्रायश्चित्तानि

अनु०— जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर तीन बार "द्रुपदादिवेन्मुमुचानः । स्विन्नस्स्नात्वी मलादिव । पूतं पवित्रेणेवाऽज्यमापश्शुन्धन्तु मैनसः" पाठ करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

वामदेवः काण्डर्षिर्वा अनुष्टुप्छन्दः आपो देवता ॥ ४ ॥

$^३$"हँसश्शुचिष दि"त्येतामृचं त्रिरन्तर्जले पठन् सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ५ ॥

अनु०— जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर तीन बार "हंसश्शुचिषदसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसहत सद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् (तैत्तिरीय संहिता, ४.२.१) पाठ करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥

वामदेवजगतौसूर्या ऋषिच्छन्दोदेवताः ॥ ५ ॥

अपि वा सावित्रीं गायत्रीं पच्छोऽर्द्धर्चशस्ततः समस्तामित्येतामृचं त्रिरन्तर्जले पठन् सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ६ ॥

अनु०— जो जल में खड़ा होकर सवितृ देवता के गायत्री मन्त्र के प्रत्येक चरण का अलग-अलग, अर्द्धर्च-अर्द्धर्च का अलग-अलग और फिर सम्पूर्ण मन्त्र का तीन बार पाठ करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ६ ॥

विश्वामित्रार्षं गायत्रीच्छन्दस्सविर्तो देवता ॥ ६ ॥

अपि वा व्याहृतीर्व्यस्ताः समस्ताश्चेति त्रिरन्तर्जले पठन् सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ७ ॥ अपि वा प्रणवमेव त्रिरन्तर्जले पठन् सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ८ ॥

अनु०— जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर तीन बार व्याहृतियों का अलग-अलग और एक साथ उच्चारण करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ७ ॥

अनु०— जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर ओंकार का ही तीन बार उच्चारण करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

विवृते एते च सूत्रे ॥ ७, ८ ॥


३. हंसश्शुचिषदसुरन्तरिक्षमद्धोता वेदिषदतिथिर्दु'रोणसत् । नृषद्वरसद्दतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ ( तै० सं० ४. २, १ ) ।

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८१

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८१

अधुना च शास्त्रसम्बन्धसम्प्रदायनियमं करोति—

तदेतद्धर्मशास्त्रं नाऽभक्ताय नाऽपुत्राय नाऽशिष्याय नाऽसंवत्सरो- षित्वाय दद्यात् ॥ ९ ॥

अनु०—इस धर्म शास्त्र का उपदेश श्रद्धाहीन व्यक्ति को, पुत्र से भिन्न व्यक्ति को, शिष्य से भिन्न व्यक्ति को, और एक वर्ष से कम समय तक साथ में निवास करने वाले व्यक्ति को नहीं देना चाहिए ॥ ९ ॥

स तु शिष्यो भवति यमुपनीय वेदमध्यापयति । अन्योऽपि पुत्रात् शिष्यः यो धर्मशास्त्रसङ्ग्रहार्थं संवत्सरावमं शुश्रूषापुरस्सरमुषितवान् स संवत्सरोषितः, तस्मै ॥ ९ ॥

अथैतदन्यद्विधीयते—

सहस्रं दक्षिणा ऋषभैकादशं गुरुप्रसादो वा गुरुप्रसादो वा ॥ १० ॥
इति चतुर्थप्रश्ने चतुर्थः खण्डः ॥

अनु०—इस शास्त्र के उपदेश की दक्षिणा एक सहस्र पण अथवा दस गायें और एक साँड़ है अथवा गुरु की सेवा मात्र ही दक्षिणा होती है ॥ १० ॥

धर्मशास्त्रोपदेष्ट्रे सहस्रं शतस्वर्णं वा ऋषभैकादशं वेत्यध्याहारः । ऋषभ एकादशो भवति यस्य गोगणस्येति विग्रहः । विनयापेक्षया शक्त्यपेक्षया वा विकल्पः । गुरुप्रसादो वा अकस्मादेव यस्मिंश्चित्तप्रसादो भवति दद्यादेव तस्मै ॥ १० ॥

इति चतुर्थप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ॥


चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः

पञ्चमः खण्डः

एवं तावत्पुरुषार्थतया जपहोमेष्टिमन्त्राणि प्रायश्चित्तान्युक्तानि । अथेदानीं क्रत्वर्थतया, तानि चात्र शुद्धयर्थतया वक्तव्यानि । तेषां च सारूप्यमित्यत आह—

अथाऽतस्संप्रवक्ष्यामि सामर्ग्यजुरथर्वणाम् ।
कर्मभिर्यैरवाप्नोति क्षिप्रं कामान् मनोगतान् ॥

३८२बौधायन-धर्मसूत्रम्[शीघ्रफलदायककर्माणि

¹जपहोमेष्टियन्त्राद्यैः शोधयित्वा स्वविग्रहम् ।
साधयेत्सर्वकर्माणि नाऽन्यथा सिद्धिमश्नुते ॥ २ ॥

अनु०—अब मैं साम, ऋक्, यजु और अथर्वण से संबद्ध जिन कर्मों से मनुष्य शीघ्र अपने मन की इच्छाओं को कर सकता है, उन कर्मों का विवेचन करूँगा ॥१॥

अनु०—जप, होम, इष्टि, संयम के अभ्यास आदि द्वारा अपने शरीर को पवित्र कर सभी कर्मों को सम्पन्न करे, अन्यथा अपने प्रयोजन में सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता ॥ २ ॥

अथशब्द आनन्तर्ये प्रकाशरहस्यप्रायश्चित्तानन्तरम् । यद्वा—मङ्गलार्थवाची, यस्मान्मङ्गलवाक्यानि जपादीनि अतस्तानि सम्प्रवक्ष्यामि । तानि विशि-नष्टि--यैः जपादिभिश्रुद्धोऽनुष्ठितैः सामवेदादिविहितैः कर्मभिर्मनोगतान-भिप्रेतान् कामान् फलान्यवाप्नोतीति ॥ १, २ ॥

एवं पापविशेषं समुदाहृत्य यद्विधीयते तत्रैवमुक्तम् । कर्माथी जपादि चिकीर्षोर्नियमानाह त्रिभिश्लोकैः—

जपहोमेष्टियन्त्राणि करिष्यन्नादितो द्विजः ।
शुक्लपुण्यदिनर्क्षेषु केशश्मश्रूणि वापयेत् ॥ ३ ॥
स्नायात्त्रिषवणं पायादात्मानं क्रोधतोऽनृतात् ।
स्त्रीशूद्रैर्नाऽभिभाषेत ब्रह्मचारी हविर्व्रतः ॥ ३ ॥
गोविप्रपितृदेवेभ्यो नमस्कुर्वन् दिवाऽस्वपन् ।
जपहोमेष्टियन्त्रस्थो दिवास्थानो निशासनः ॥ ५ ॥

अनु०—जो द्विज जप, होम, इष्ट और इन्द्रियादि के संयम का अभ्यास करने के लिए तैयारी कर रहा हो, वह सबसे पहले शुक्ल पक्ष में किसी शुभ दिन को शुभ नक्षत्र में केशों और दाढ़ी-मूँछ की मुँड़ा डाले ॥ ३-५ ॥

अनु०—वह व्यक्ति प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल तीनों सवनों में स्नान करे; क्रोध और असत्यभाषण से अपने को बचाए । स्त्रियों और शूद्रों से स्वयं संबोधित कर भाषण न करे, ब्रह्मचारी रहे और यज्ञ के योग्य हवि के अन्न का ही भोजन करे ॥ ४ ॥

अनु०—गायों, ब्राह्मणों, पितृ, देवों को नमस्कार करे और दिन में न सोये । जब तक जप, होम, इष्टि या संयम का अभ्यास करे तब तक दिन में खड़ा रहे और रात को बैठकर बिताये ॥ ५ ॥


१. श्लोकोऽयं ख. ग. पुस्तकेयोर्नाऽस्ति ।

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८३

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८३

जपो रुद्रैकादशिन्यादेः । होमो गणहोमादिः इष्टिः^१ मृगारादिका । यन्त्राणि यमनादिन्द्रियाणां कृच्छ्रादीन्युच्यन्ते । करिष्यन् कर्तुमध्यक्षवसितः । द्विजग्रहणं यन्त्राध्यायनिर्दिष्टेषु शूद्रपर्युदासार्थम् । शुक्ले पक्षे पुण्यदिने द्वितीयादिषु च तिथिषु पुण्येषु च ऋक्षेषु रोहिण्यादिषु । श्मश्रुग्रहणं लोमनखानामपि प्रदर्शनार्थम् । वपनं च शिखावर्जं ‘एवं भ्रूवक्षिशिखावर्जम्’ इति पर्युदासात् । यत्र पुनश्शृङ्गग्राहिकया विधीयते यथा गोघ्नप्रायश्चित्ते ‘सशिखं वपनं कृत्वा’ इति, तत्र भवति । न च शिखावपनात्कथमाचमनादि कर्तव्यमित्याशङ्कनीयम् । तस्य शास्त्रार्थत्वात्, शिरःकपालधारणवत् । त्रिश्वणं प्रातर्मध्यान्दिने सायं । क्रोधादनृताच्चाऽऽत्मानं पायाद्रक्षेत् वर्जयेदित्यर्थः । क्रोधग्रहणं हर्षलोभमोहादीनामन्येषामपि भूतदाहोयानां प्रदर्शनार्थम्, अनृतग्रहणं च पैशुन्यात्मस्तवनादीनाम् । अभिभाषण अन्यत्र यथार्थमन्तर्भवंत्येवं संवादेषु सम्भाषेत,^१) ब्रह्मचारी अप्रस्कन्दितरेताः अन्यत्र स्वप्नात् । तत्राऽपि च—

स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजश्शुक्रमकामतः ।
स्नात्वाऽर्कमर्चयित्वा त्रिः^२ पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥

इति द्रष्टव्यम् । हविर्व्रतः ‘यदन्नैकैकं ग्रासम्’ इत्यादि, तद्विषयं क्षारलवणवर्जं व्रतयेत् । पितृग्रहणं^३ दण्डापूपिकान्यायेन मातुरप्युपलक्षणार्थम् । नमस्कारश्च कायप्रणतिपूर्वकम् । दिवाऽस्वपन् निद्रामकुर्वन् दिवास्थानः तिष्ठेदहनि । निशासनः रात्रावासीत ॥ ५ ॥

प्रथमं तावद्यन्त्राण्याह बहुवृत्तान्तत्वात्—

प्राजापत्यो भवेत्कृच्छ्रो दिवा रात्रावयाचितम् ।
क्रमशॊ वायुभक्षश्च द्वादशाहं त्र्यहं त्र्यहम् ॥ ६ ॥


१. (१) अग्नयेऽंहोमुचेऽष्टाकपाल २) इन्द्रायांहोमुच एकादशकपालो (३) मित्रावरुणाभ्यामागोगुग्भ्यां (४) पयस्या वायोसावित्र आगोगुग्भ्यां (५) चक्ररश्विभ्यामागोगुग्भ्यां (६) धाना मरुद्भ्य एनोमुग्भ्यः (७) सप्तकपालो विश्वेभ्यो देवेभ्य एनोमुग्भ्यो (८) द्वादशकपालोऽनुमत्यै चरु (९) रनये वैश्वानराय द्वादशकपालो (१०) द्यावापृथिवीभ्यामङ् होमुग्भ्यां द्विकपालः॥ ( तै. सं. ७.५.२२ ) इति विहिता दशहविष्केष्टिमृगारेष्टिरित्युच्यते । See. आप. श्रौ २०. २३. २.
तत्र प्रथमे अंहोंमुगग्निर्देवता, अष्टाकपालः पुरोडाशो द्रव्यम् । द्वितीये इन्द्रोऽहोमुक् देवता । एकादशकपालः पुरोडाशो द्रव्यम् । ‘अंहः’ पापं, तस्मात् मोचयतीत्यंहोमुक् इष्टिरियमश्वमेधप्रकरणे तदङ्गत्वेन विहिताऽपि स्वातन्त्र्येण पापक्षयार्थत्वेनाऽपि विहितत्वात् तदयं पृथगप्यनुष्ठीयते ।

३८४बौधायन-धर्मसूत्रम्[ प्राजापत्यकृच्छ्रः

अनु०—( प्रजापति द्वारा बताया गया या आचरित ) प्राजापत्य कृच्छ्र नाम का व्रत तीन तीन दिन क्रमशः केवल दिन में भोजन करने, केवल रात्रि में भोजन करने बिना माँगे मिले हुए अन्न का भोजन करने और कुछ भी आहार न करने पर कुल बारह दिन का होता है ॥ ६ ॥

प्राजापत्यस्तद्देवत्यस्तेन आचरितो वा । स कथं भवेदित्याह—द्वादशाहं चतुर्धा कृत्वा त्र्यहं त्र्यहं सम्पाद्य आद्ये त्र्यहे दिवाऽश्नीयात् । द्वितीये रात्रौ, तृतीये अयाचितम्, चतुर्थे वायुभक्ष इति अयाचितमिति याचनाप्रतिषेधः । एवं प्राजापत्यः कृच्छ्रः क्लेशात्मको नियमेन स्मृत्यन्तरोक्तेतिकर्तव्यताको नाऽत्र ग्राह्यः। यथा गौतमेन प्राजापत्येऽभिहितं' 'रौरवयौधाजये नित्यं प्रयुञ्जीत' इत्यादि । तद्यदि सर्वं, नित्यत्वाध्येतृच्छन्दोगव्यतिरिक्तानामधि- कारो न स्यात् । न ह्यन्यस्य सामानि सन्ति । न च प्रायश्चित्तार्थेन ग्रहणं युक्तम्, प्रतिषेधात् । स्त्रीबालादेरप्यधिकारार्थं सकलधर्मशास्त्रोक्तस्त्रिवर्णसा- धारणलक्षण एव विधिर्द्रष्टव्यः ॥ ६ ॥

अहरेकं तथा नक्तमज्ञातं वायुभक्षणम् ।
त्रिवृदेष परावृत्तो बालानां कृच्छ्र उच्यते ॥ ७ ॥

**अनु०—**यदि एक दिन केवल दिन में भोजन करे, दूसरे दिन केवल रात्रि में भोजन करे, तीसरे दिन बिना माँगे ही मिले आहार का भोजन करे और चौथे दिन निराहार केवल वायु का भक्षण कर रहे। इसी क्रम में तीन बार करने पर कुल बारह दिनों का बालकों का कृच्छ्र व्रत बताया गया है ॥ ७ ॥

अयमपि प्राजापत्यविशेष एव ॥ ७ ॥


१. सूतदाहीयाः आपस्तम्बीये धर्मसूत्रेऽध्यात्मपटले प्रसिद्धाः, तत्र द्रष्टव्याः ।
२. ऋगियं ११४ पृष्ठे टिप्पण्यां द्रष्टव्या ।
३. केनचित् पुरुषेण कस्मिंश्चिद्दण्डे बह्वीरपूपिकाः प्रोताः कृत्वा ताः क्वचिन्न्या- सीकृत्य देशान्तरं गत्वा पुनः प्रतिनिवृत्य न्यासरक्षिता पृष्टः भवदीयं दण्डं मुषिका अभक्षयन्नित्यवोचत् । तेन च निश्चितम्—यदा दाण्डोऽपि मुषिकेण भक्षितः, तदा किमु वक्तव्यं अपूपा भक्षिता इति । अयमेव दण्डापूपिकान्यायः ।
४. पुनानस्सोम धारयाऽऽपो वसानो अर्षीति ।
आरत्नधा योनिमृतस्य सदित्सुत्सो देवो हिरण्मयः ॥ १ ॥
दुहान ऊधर्दिव्यं मधुप्रियं प्रत्नंसधस्थमासदत् ।
आपृच्छयं धरुणं वाज्यर्षसि नृभिर्धोतो विचक्षणः ॥ २ ॥
( सा. सं. उ. १. १. १. )
इति ऋग्द्वयमुक्थ्यरूपेण प्रग्रथ्य तत्र गीयमाने सामनी रौरवयौधाजपसंज्ञके ।

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः २८५

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः २८५

कृच्छ्रातिकृच्छ्रस्तृतीय इति वक्ष्यति –

एकैकं ग्रासमश्नीयात्पूर्वोक्तेन त्र्यहं त्र्यहम् ।
वायुभक्षस्त्र्यहं चाऽन्यदतिकृच्छ्रस्स उच्यते ॥ ८ ॥

**अनु०—**यदि पूर्वोक्त क्रम से तीन-तीन दिन क्रमशः दिन में, और रात्रि को बिना माँगे ही मिले हुए भोजन का (मोर के अण्डे के बराबर) केवल एक ग्रास खाकर रहे और अन्त में तीन दिन वायु का आहार कर रहे, तो वह अतिकृच्छ्र नाम का दूसरा व्रत कहा जाता है ॥ ८ ॥

शिख्यण्डपरिमितान्नो ग्रासः पाणिपूरान्नो वा पूर्वोक्तेन ‘दिवा रात्रौ’ इत्यादिना । अन्यदिति प्रायश्चित्तविशेषणत्वान्नपुंसकलिङ्गमदोषः । ‘अतिकृच्छ्रोऽम्बुनाऽशनः’ इति यदा पाठस्तदोदकपानमात्रमभ्युपगच्छतीति गम्यते ॥ ८ ॥

अम्बुभक्षस्त्र्यहानेतान्वायुभक्षस्ततः परम् ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रस्तृतीयो विज्ञेयस्सोऽतिपावनः ॥ ९ ॥

**अनु०—**यदि तीन-तीन दिन प्रथम तीन कालों में केवल जल पीकर रहे और उसके बाद अन्तिम तीन दिन केवल वायु-भक्षण करते हुए बिताये तो वह कृच्छ्रातिकृच्छ्र नाम का अत्यन्त पावन तीसरा व्रत होता है ॥ ९ ॥

अम्बुभक्षवचनादशनधर्मेणोदकपानमिष्यते । एवमन्त्ये त्र्यहे तदपि नाऽस्तीति वायुभक्ष इत्युक्तम् । तृतीयत्वमस्य निर्देशापेक्षया¹ ‘षष्ठीं चितिम्’ इति यथा । प्रत्येकमेव शुद्धिहेतुत्वात् ॥ ९ ॥

त्र्यहं त्र्यहं पिबेदुष्णं पयस्सर्पिः कुशोदकम् ।
वायुभक्षस्त्र्यहं चाऽन्यत् तप्तकृच्छ्रस्स उच्यते ॥ १० ॥

**अनु०—**यदि तीन-तीन दिन क्रमशः उष्ण दूध, उष्ण घृत और कुश के साथ उबाले गये उष्ण जल का पान करता है तथा अन्तिम तीन दिन वायु का भक्षण कर व्रत करता है, तो वह तप्त कृच्छ्र नाम का व्रत कहलाता है ॥ १० ॥

उष्णशब्दः पय आदिभिस्त्रिभिः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । प्रतित्र्यहं पयआदीनि क्रमेण भवेयुः । अत्र सकृदेव स्नानम् । कुत एतत् ? मनुवचनात् —


१. ‘योऽग्निं चित्वा न प्रतितिष्ठति पञ्च पूर्वाश्चितयो भवन्त्यथ षष्ठीं चितिञ्चिनुते’ इत्युक्तम् । अत्राऽस्याश्चितेः पूर्वापेक्षया भेदेऽपि पूर्वोक्तचितिपञ्चकापेक्षया षष्ठीत्वमिति पूर्वमीमांसायां पञ्चमाध्याये निर्णीतम्, तदनुसंहितमत्र ।

२८ बौ०ध०

३८६ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ सान्तपनकृच्छ्रः

तप्तकृच्छ्रं चरन्विप्रो जलक्षीरघृतानिजान् । प्रातस्त्र्यहं पिबेदुष्णान् सकृत्स्नायी समाहितः ॥ १० ॥

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥ ११ ॥

**अनु०—**यदि एक-एक दिन क्रमशः गोमूत्र, गाय का गोबर, दूध दही, घृत, कुशोदक ग्रहण करे तथा एक दिन-रात्रि उपवास करे, तो वह सान्तपन कृच्छ्र नाम का व्रत होता है ॥ ११ ॥

साप्ताहिकोऽयं सान्तपनः। एकैकस्मिन्नहनि गोमूत्रादीनि क्रमेण भवेयुः तेषु च दधिव्यतिरिक्तानि कथिनानि कार्याणि ॥

तत्राऽयं केषां चित्पाठः—

गायत्र्या $^१$गृह्य गोमूत्रं $^२$गन्धद्वारेति गोमयम् । $^३$आप्यायस्वेति च क्षीरं $^४$दधिक्राव्णोति वै दधि ॥ $^५$शुक्रमसि ज्योतिरसीत्याज्यं $^६$देवस्य त्वा कुशोदकमिति ॥१२॥

**अनु०—**गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते हुए गाय का मूत्र ग्रहण करे, गन्ध-द्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टांकरीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्' मन्त्र द्वारा गोबर ग्रहण करे।

'आप्यायस्व समेतु ते विश्वतस्तोम वृष्णियम्। भवा वाजस्य सङ्गथे। (तैत्तिरीय संहिता ३. २. ५) मन्त्र से दूध ग्रहण करें।

'दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभिनो मुखाकरत्प्रण आयूंषि तारिषत्॥ (तैत्तिरीय संहिता १.५.११)


१. आदाय इति ग० । २. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ३. आप्यायस्व समेतु ते विश्वतस्तोम वृष्णियम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥ तै० सं० ३. २. ५. ४. दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखाकरत्प्रण आयूंषि तारिषत् ॥ तै० सं० १. ५. ११. ५. शुक्रमसि ज्योतिरसि तेजोऽसि । तै० १. १. १० ६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ॥

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८७

पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८७

मन्त्र से दधि ग्रहण करे । 'शुक्रमसि ज्योतिरसि तेजोऽसि' (तैत्तिरीय संहिता १. १. १०) मन्त्र से घृत ग्रहण करे तथा 'देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्' मन्त्र से कुशोदक ग्रहण करे ॥ १२ ॥ तथा—

गोमूत्रभागस्तस्यार्धं शकृत्क्षीरस्य त्रयम् ।
द्वयं दध्नो घृतस्यैकः एकश्च कुशवारिणः ।
एवं सान्तपनः कृच्छ्रः श्वपाकमपि शोधयेत् ॥१३॥

**अनु०—**गोमूत्र का अंश जितना हो उसके आधा अंश गोबर, तीन भाग दूध, दो भाग दही, एक भाग घृत और एक भाग कुशोदक मिलावे । इस प्रकार सान्तपन नाम कृच्छ्र व्रत चण्डाल तक को भी शुद्ध कर देता है ॥ १३ ॥

**टि०—**गोविन्द स्वामी ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है कि घृत और कुशोदक बराबर परिमाण में होना चाहिए, उससे दूना दधि और तिगुना दूध, चौगुना गोबर और पाँच गुना गोमूत्र हो इन छहों को मिलाकर एक दिन पान करे और दूसरे दिन उपवास करे तो दो रात्रियों का सान्तपन कृच्छ्र व्रत होता है ।

एतदुक्तं भवति-घृतं कुशोदकं च तुल्यपरिमाणम् । घृताद्विगुणं दधि, तस्मादेव त्रिगुणं क्षीरम् । तस्मादेव चतुर्गुणः शकृत् । पञ्चगुणं गोमूत्रमिति । गमूत्रादिषट्कमेकीकृत्यैकस्मिन्नेवाह्नि पीत्वाऽपरेद्युरुपवासः । एवं द्विरात्रस्सान्तपनो भवति । आह च याज्ञवल्क्यः—

कुशोदकं दधि क्षीरं गोमूत्रं गोशकृद्धृतम् ।
प्राश्याऽपरेऽह्न्युपवसेत्कृच्छ्रं सान्तपनं चरन् ॥ इति ॥

अयमपरस्सान्तपनप्रकारः—

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं ¹दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
पञ्चरात्रं तदाहारः पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥ १४ ॥

**अनु०—**गाय का मूत्र, गोबर, दूध, दही, घृत तथा कुशोदक इनका पाँच (दिन (और रात्रि आहार करने वाला पञ्चगव्य से शुद्ध हो जाता है ॥ १४ ॥
पञ्चगव्यविधानेनेति शेषः ॥ १४ ॥

यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापप्रणाशनः ॥ १५ ॥


१. अपश्चै व घृतं तथा इति ग पु० ।