भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
४० भोजप्रबन्धः राज्ञा प्रवेशितास्ते दृष्टराजसंसदो मिलिताः सन्तः सहैव कवित्वं पठन्ति स्म। राजा तच्छ्रुत्वोत्तरार्धं कालिदासेन कृतमिति ज्ञात्वा विप्रानाह—'येन पूर्वार्धं कारितं तन्मुखात्कवित्वं कदाचिदपि न करणी- यम्। उत्तरार्धस्य किञ्चिद्दीयते, न पूर्वार्धस्य।' इत्युक्त्वा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। राजा के द्वारा सभा में बुला लिये गये वे पंडित राजसभा को देखकर एक साथ ही कविता पढ़ने लगे। राजा ने सुनकर जान लिया कि उत्तरार्द्ध कालि- दास कृत है और ब्राह्मणों से कहा—'जिसने श्लोक का पूर्वार्द्ध बनाया है, उसके मुख से फिर कभी कविता न की जानी चाहिए। उत्तरार्द्ध के लिए कुछ दिया जाता है, पूर्वार्द्ध के लिए नहीं।' ऐसा कह कर प्रत्यक्षर लाख- लाख दिया। तेषु च दक्षिणामादाय गतेषु कालिदासं वीक्ष्य राजा प्राह--'कवे उत्तरार्धं त्वया कृतम्' इति। कविराह— 'अधरस्य मधुरिमाणं कुचकाठिन्यं दृशोश्च तैक्ष्ण्यं च। कवितायां परिपाकं ह्यनुभवरसिको विजानाति' ॥ ८८ ॥ दक्षिणा लेकर उनके चले जाने पर कालिदास को देखकर राजा ने कहा—'कवि, उत्तरार्द्ध तुमने किया था ?' कवि ने कहा— अधर की माधुरी, कुच की कठोरता, नेत्रों का तीखापन और काव्य की परिपक्वता अनुभवी, रसिक व्यक्ति ही समझता है। राजा च—'सुकवे, सत्यं वदसि। अपूर्वो भाति भारत्याः काव्यामृतफले रसः। चवणे सर्वसामान्ये स्वादुवित्केवलः कविः ॥ ८६ ॥ सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य जगत्समस्तं त्रयः पदार्था हृदयं प्रविष्टाः। इक्षोर्विकारा मतयः कवीनां मुग्धाङ्गनापाङ्गतरङ्गितानि' ॥६०॥ राजा ने कहा--हे सुकवि, सत्य कहते हो-- भारती [वाणी] के 'काव्यरूपी अमृत फल का रस अपूर्व ही होता है; उसे चबाकर खा तो सभी सकते हैं, पर उसका स्वादवेत्ता कवि ही होता है।
समस्त जगती को वार-वार छान डालने पर केवल तीन ही पदार्थ हृदय में प्रविष्ट हुए—गन्ने का रस, कवियों की मनीषा और मुग्धा रमणियों के कटाक्षों की ऊर्मिमाला। ---:०:--- ६—कविर्लक्ष्मीधरः कुविन्दश्च ततः कदाचिद् द्वारपालकः प्रणम्य भोजं प्राह—'राजन्, द्रविड- देशात्कोऽपि लक्ष्मीधरनामा कविर्द्वारमध्यास्ते' इति। राजा 'प्रवेशय' इत्याह। प्रविष्टमिव सूर्यमिव विभ्राजमानं चिरादप्यविदितवृत्तान्तं प्रेक्ष्य राजा विचारयामास। आह च.... 'आकारमात्रविज्ञानसम्पादितमनोरथाः (१)। धन्यास्ते ये न शृण्वन्ति दीनाः क्वाप्यर्थिनां गिरः' ॥ ६१ ॥ तब फिर कभी द्वारपाल प्रणाम करके भोज से बोला—राजन्, द्रविड देश से कोई लक्ष्मीधर नाम का कवि आया है और द्वार पर उपस्थित है। राजा ने कहा—भीतर ले आओ। उसके प्रविष्ट होते ही सूर्य के तुल्य दीप्तिमान्, बहुत समय से जिसका समाचार नहीं ज्ञात हुआ हो ऐसे, उसे देखकर राजा विचारने लगा और बोला—वे मनुष्य धन्य हैं, जो कभी याचकों की दीन वाणी नहीं सुनते, आकृति देखकर ही सब समझकर याचकों के मनोरथ पूर्ण कर देते हैं। स चागत्य तत्र राजानं 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः प्राह— 'देव, इयं ते पण्डितमण्डिता सभा। त्वं च साक्षाद्विष्णुरसि। ततः किं नाम पाण्डित्यं तथापि किञ्चिद्वच्मि— भोजप्रतापं तु विधाय धात्रा शेषैर्निंरस्तैः परमाणुभिः किम्। हरेः कवेऽभूत्पवित्रम्बरे च भानुः पयोधेरुदरे कृशानुः ॥ ६२ ॥ इति। ततस्तेन परिषच्चमत्कृता। राजा च तस्य प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। वह आकर और राजा से 'कल्याण हो' यह कह कर राजा की आज्ञा से बैठ गया और बोला—'देव, यह आपकी सभा पंडितों से सुशोभित है और (१) आकारमात्रविज्ञानेन सम्पादिता मनोरथा येषान्ते इत्यर्थः।
४२ भोजप्रबन्धः आप तो साक्षात् विष्णु है । सो पंडिताई की तो बात ही क्या है--फिर भी कुछ कह रहाहूँ-- विधाता ने राजा भोज के प्रताप का निर्माण कर क्या थोड़े से शेष रहे परमाणुओं से इंद्र के हाथ का वज्र, आकाश मण्डल में सूर्य और समुद्र के उदर में स्थित वडवाग्नि का निर्माण किया है ? ( अर्थात् भोज के प्रताप के संमुख ये तेजस्वी वस्तुएँ नगण्य हैं । ) । तो इससे राजसभा चमत्कृत हो गयी । राजा ने उसे प्रत्यक्षर लक्ष दिया । पुनः कविराह—‘देव, मया सकुटुम्बेनात्र निवासाशया समागतम् । क्षमी दाता गुणग्राही स्वामी पुण्येन लभ्यते । अनुकूलः शुचिर्दक्षः कविर्विद्वान्सुदुर्लभः ॥ ६३ इति । ततो राजा मुख्यामात्यं प्राह—‘अस्मै गृहं दीयताम्’ इति । पुनः कवि ने कहा—'देव, मैं यहाँ बस जाने की आशा से कुटुंब सहित आया हूँ । क्षमा-शील, दानी और गुणों का ग्राहक स्वामी पुण्य से प्राप्त होता है, किंतु हितकारी, पवित्र, चतुर, कवि और विद्वान् स्वामी तो अति दुर्लभ है ।' तब राजाने मुख्य मंत्री से कहा--'इन्हें घर दो ।' ततो निखिलमपि नगरं विलोक्य कमपि मूर्खममात्यो नापश्यत्, यं निरस्य विदुषे गृहं दीयते । तत्र सर्वत्र भ्रमन्कस्याचित्कुविन्दस्य गृहं वीक्ष्य कुविन्दं प्राह—‘कुविन्द, गृहान्निःसर । तव गृहं विद्वानेष्यति’ इति । तदनंतर समस्त नगर को देख डालने पर भी मुख्य मंत्री को कोई मूर्ख दृष्टि गोचर नहीं हुआ, जिसको हटा कर विद्वान् को घर दिया जाता । तब सर्वत्र घूमते हुए किसी कपड़े बुनने वाले [जुलाहे] का घर देख कर मंत्री ने उससे कहा--'हे बुनकर, तुम घर छोड़ दो । तुम्हारे घर में विद्वान् आयेगा ।' ततः कुविन्दो राजभवनमासाद्य राजानं प्रणम्य प्राह - देव, भवदमात्यो मां मूर्खं कृत्वा गृहान्निःसारयति, त्वं तु पश्य मूर्खः पण्डितो वेति ।
भोजप्रबन्धः ४३ काव्यं करोमि नहि चारुतरं करोमि यत्नात्करोमि यदि चारुतरं करोमि । भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ हे साहसाङ्क कवयामि वयामि यामि ॥ ६४ ॥ तब बुनकर राज भवन में पहुँच कर राजा को प्रणाम करके बोला— 'महाराज, आपका मंत्री मुझे मूर्ख समझ कर घर से निकाल रहा है, तो तू देख कि मैं मूर्ख हूँ या पंडित— काव्य रचता हूँ, पर सुंदर नहीं रचता और यदि प्रयत्नपूर्वक रचता हूँ तो सुंदर भी रच लेता हूँ। राजाओं की मुकुट मणियों से सुशोभित चरण पीठ वाले हे महावीर, मैं कविता करता हूँ और बुनाई करता हूँ; और (अब) जाता हूँ।' ततो राजा त्वङ्कारवादेन वदन्तं कुविन्दं प्राह—'ललिता ते पद- पङ्क्तिः, कवितामाधुर्यं च शोभनम्, परन्तु कवित्वं विचार्य वक्तव्यम्' इति। ततः कुपितः कुविन्दः प्राह—'देव अत्रोत्तरं भाति किन्तु न वदामि। राजधर्मः पृथग्विद्वद्धर्मात्' इति। राजा प्राह—'अस्ति चेदुत्तरं ब्रूहि' इति। तब राजा ने 'तू' शब्द से संबोधित करने वाले बुनकर से कहा—'तेरे पद की पंक्ति ललित है, कवितामाधुरी भी सुंदर है, परंतु काव्य विचार करके सुनाना चाहिए।' तब कुपित हो बुनकर बोला—'महाराज, मुझे इसका उत्तर आता है, परंतु कह नहीं रहा हूँ। राजा का धर्म विद्वान् के धर्म से भिन्न है।' राजा ने कहा—'यदि है तो उत्तर दे।' कुविन्दः प्राह--'देव, कालिदासाहतेऽन्यं कविं न मन्ये । कोऽस्ति ते सभायां कालिदासाहते कवितातत्त्वविद्विद्वान् । यत्सारस्वतवैभवं गुरुकृपापीयूषपाकोद्भवं तल्लभ्यं कविनेव नैव हठतः पाठप्रतिष्ठाजुषाम् । कासारे दिवसं वसन्नपि पयःपूरं परं पङ्किलं कुर्वाणः कमलाकरस्य लभते किं सौरभ (१) सौरिभः ॥ ६५ ॥ (१) “लुलायो महिषो वाहद्विपत्कासरसैरभाः” इत्यमरात् महि इत्यर्थः ।
४४ भोजप्रबन्धः अयं मे वाग्गुम्फो विशदपदवैदग्ध्यमधुरः स्फुरद्वन्धोवन्ध्यः परहृदि कृतार्थः कविहृदि । कटाक्षो वामाक्ष्या दरदलितनेत्रान्तगलितः कुमारे निःसारः स तु किमपि यूनः सुखयति ॥६६॥ इति । बुनकर बोला—'देव, मैं कालिदास के अतिरिक्त किसी को कवि नहीं मानता । तेरी सभा में काव्य के मर्म को जानने वाला विद्वान् कालिदास के अतिरिक्त कौन है ? गुरु-कृपारूपी अमृतपाक से उत्पन्न जो सरस्वती वैभव (काव्य) है, वह कवि को ही प्राप्त होता है, हठपूर्वक कविता पाठ करके प्रतिष्ठा पालने वालों को नहीं । तालाब में दिन भर लोट कर भी केवल सलिल-प्रवाह गँदला करने वाला भैंसा क्या कमलों की सुगंध प्राप्त कर पाता है ? उत्तम पदों की विद्वत्तापूर्ण योजना से मधुर, छंदो लालित्य प्रकट करता मेरा काव्यबंध कवि के हृदय को आकृष्ट कर कृतार्थ होता है, अतिरिक्त जन के निकट वह व्यर्थ होता है । अधखुले नयनों की कोर से अद्भुत तिरछे नयनों वाली सुंदरी का कटाक्ष बालक के निकट सारहीन रहता है किंतु तरुण को वह आनंद देता है । विद्वज्जनवन्दिता सीता प्राह-- विपुलहृदयाभियोग्ये खिद्यति काव्ये जडो न मौर्थ्ये स्वे । निन्दति कञ्चुकमेव प्रायः शुष्कस्तनी नारी ॥ ६७ ॥ विद्वानों द्वारा पूजित सीता ने कहा--मूर्ख अपनी मूर्खता पर तो खिन्न नहीं होता, सहृदयों द्वारा गम्य सत्काव्य पर खिन्न होता है । शुष्क स्तन वाली स्त्री प्रायः चोली की ही निंदा किया करती है । ततः कुविन्दः प्राह-- [L25: बाल्ये सुतानां स्तुतौ कवीनां समरे भटानाम् । हुंकारयुक्ता हि गिरः प्रशस्ताः कस्ते प्रभो मोहभरः स्मर स्वम् ॥ ६८ ॥ ततो राजा 'साधु भोः कुविन्द' इत्युक्त्वा तस्याञ्चरलक्षं ददौ । 'मा भैषीः, इति पुनः कुविन्दं प्राह ।
भोजप्रबन्धः ४५ तब बुनकर ने कहा— 'हे स्वामी, आपको ऐसा मोह कैसे उत्पन्न हुआ ? स्मरण कीजिए— बाल्यावस्था में पुत्रों की, सुरतकाल में स्त्रियों की, स्तुति करते समय कवियों की और युद्ध में योद्धाओं की एकवचन युक्त 'तू'--वाली बोली ही प्रशंसनीय होती है।' तब राजा ने सुंदर; हे कुविंद, सुंदर'--ऐसा कह कर उसे प्रत्यक्षर एक लाख दिया और फिर उस बुनकर से कहा—'जा, निर्भय रह ।' ---: ० :--- ७—रात्रौ राज्ञो नगर-भ्रमणम् एवक्रमेणातिक्रान्ते कियत्यपि काले बाणः पण्डितवरः परं राज्ञा मान्यमानोऽपि प्राक्तनकर्मतो दारिद्र्यमनुभवति । एवं स्थिते नृपतिः कदाचिद्रात्रावेकाकी प्रच्छन्नवेषः स्वपुरे चरन्बाणगृहमेत्यातिष्ठत् । तदा (१) निशीथे बाणो दारिद्र्याद्व्याकुलतया कान्तां वक्ति-'देवि, राजा कियद्वारं मम मनोरथमपूरयत् । अद्यापि पुनः प्रार्थितो दास्येव । परन्तु निरन्तरप्रार्थनारसे मूर्खस्यापि जिह्वा जडीभवति।' इत्युक्त्वा मुहूर्तार्धं मौनेन स्थितः । इसी प्रकार धीरे-धीरे कुछ समय व्यतीत होने पर राजा के द्वारा परम संमानित होने पर भी पंडितवर बाण पूर्व जन्म के कर्म के कारण दरिद्रता भोग रहे थे। ऐसी ही दशा में कभी रात में अकेले वेष बदल कर अपनी नगरी में घूमते-फिरते राजा बाण के घर पहुँच रुक गये। तभी रात में दरि- द्रता के कारण व्याकुल बाण ने पत्नी से कहा—'राजा ने कितनी बार मेरा मनोरथ पूर्ण किया। आज भी फिर प्रार्थना करने पर देता ही है। किंतु निरन्तर प्रार्थना में लगे रहते मूर्ख की जीभ जड़ हो जाती है। ऐसा कह कर आधे मुहूर्त तक चुप बैठा रहा। पुनः पठति— हर हर पुरहर परुषं क हलाहलफल्गु याचनावचसोः । एकैव तव रसज्ञा तदुभयरसतारतम्यज्ञा ॥ ६६ ॥ देवि, (१) अर्द्धरात्रे ।
४६ भोजप्रबन्धः दारिद्र्यस्यापरा मूर्तिर्याच्ञा न द्रविणाल्पता । अपि कौपीनवाञ्छंभुस्तथापि परमेश्वरः ॥ १०० ॥ सेवा सुखानां व्यसनं धनानां याच्ञा गुरूणां कुनृपः प्रजानाम् । प्रनष्टशीलस्य सुतः कुलानां मूलावघातः कठिनः कुठारः ॥ १०१ ॥ तत्सत्यपि दारिद्र्ये राज्ञो वक्तुं मया स्वयमशक्यम् । यच्छन्क्षणमपि जलदो वल्लभतामेति सर्वलोकस्य । नित्यप्रसारितकरः करोति सूर्योऽपि सन्तापम् ॥ १०२ ॥ किं च देवि, वैश्वदेवावसरे प्राप्ताः क्षुधार्ताः पश्चाद्यान्तीति तदेव मे हृदयं दुनोति । दारिद्यानलसन्तापः शान्तः सन्तोषवारिणा । याचकाशाविघातान्तर्दाहः केनोपशाम्यते ॥ १०३ ॥ पुनः पढ़ने लगा-- हे त्रिपुरारि शिव शंकर, हलाहल विष और व्यर्थ चले जाते याचना के वचन-इन दोनों में कौन अधिक तीक्ष्ण है, यह दोनों के तार तम्य-न्यूनाधिकता-को जानने वाली तुम्हारी रसना [जीभ] ही बता सकती है। हे देवि, दरिद्रता की दूसरी मूर्ति याचना होती है, धन की न्यूनता नहीं; शिव शंभु कौपीन धारी ही है, फिर भी परमेश्वर [कहे जाते] है। चाकरी सुखों को, व्यसन धनको, याचना गौरव को, कुनृपति प्रजा को और शीलहीन व्यक्ति का पुत्र कुल को जड़ से काटने वाला कठोर कुल्हाड़ा होता है। सो दरिद्रता होने पर भी मेरा राजा से स्वयम् कुछ कहना असंभव है। क्षण भर भी दान करता जलद-बादल संपूर्ण लोक का प्रिय हो जाता है और सदा कर [किरण रूपी हाथ] फैलाये सूर्य भी संतापकारी होता है। परंतु हे देवि, गृहस्थ कर्म बलिवैश्वदेव के अवसर पर आये भूख से पीडित जन भी [मेरे द्वार से] वापस चले जाते हैं, वही मेरे हृदय को पीडित करता है।
भोजप्रबन्धः ४७ दरिद्रता रूपी आग की जलन तो संतोष के जल से शांत हो गयी है, किंतु माँगनेवालों की आशा नष्ट कर देने से जो अंतर्दाह है, उसका उपशमन किसके द्वारा हो ? राजा चैतस्सर्वं श्रुत्वा 'नेदानीं किमपि दातुं योग्यः । प्रातरेव वाणां पूर्णमनोरथं करिष्यासि ।' इति निष्क्रान्तो राजा— 'कृतो यैर्न च वाग्मी च व्यसनी तं न यैः पदम् । यैरात्मसदृशो नार्थी किं तैः काव्यैर्बलैर्धनैः' ॥ १०४ ॥ राजा ने यह सब सुनकर विचारा कि इस समय तो मैं इसे कुछ देने योग्य हूँ नहीं, प्रातः काल इसका मनोरथ पूर्ण करूँगा—और चला गया— जिस काव्य ने मनुष्य को वक्तृत्व कला में निपुण नहीं बनाया, जिस बल ने किसी को अधीन—स्ववश—नहीं किया और जिस धन ने याचक को अपने समान ( धनी ) नहीं कर दिया, वह काव्य, बल और धन व्यर्थ है । एवं पुरे परिभ्रममाणे राजनि वर्त्मनि चोरद्वयं गच्छति । तयोरेकः प्राह शकुन्तः—'सखे, स्फारान्धकारविततेऽपि जगत्यञ्जनवशात्सर्वं परमा- णुप्रायमपि वस्तु सर्वत्र पश्यामि । परन्तु सम्भारगृहानीतकनकजातमपि न मे सुखाय' इति । जब राजा इस प्रकार नगर में भ्रमण करते फिर रहे थे, तो मार्ग में दो चोर जा रहे थे । उनमें से एक शकुंत नामक चोर बोला--'मित्र, जगत् में घोर अँधेरा फैला होने पर भी अंजन लगा होने के कारण परमाणु जैसी भी छोटी सब वस्तुएँ सर्वत्र देख पा रहा हूँ किंतु कोषागार से चुरा लिया हुआ स्वर्ण भी मुझे सुख नहीं दे रहा है ।' द्वितीयो मरालनामा चोर आह—'आहृतं सम्भारगृहात्कनकजात- मपि न हितमिति कस्माद्धेतोरुच्यते' इति । ततः शकुन्तः प्राह—'सर्वतो नगररक्षकाः परिभ्रमन्ति । सर्वोऽपि जागरिष्यत्येषां भेरीपटहादीनां निनादेन । तस्मादाहृतं विभज्य स्वस्वभागगतं धनमादाय शीघ्रमेव गन्तव्यम्' इति । दूसरे मराल नाम के चोर ने कहा—'खजाने से चुरा लाया गया सोना भी अच्छा नहीं लगता—ऐसा किस कारण से कहते हो ?' तो शकुंत बोला--
४८ भोजप्रबन्धः 'चारों ओर नगर रक्षक घूम रहे हैं। इन नगाड़ों और पटहों के शब्द से सब जग जायेंगे। सो चुराये [ माल ] को बाँट कर अपने-अपने भाग में आये धन को लेकर शीघ्र ही चला जाना उचित होगा।' मरालः प्राह—'सखे, त्वमनेन कोटिद्वयपरिमितमणिकनकजातेन किं करिष्यसि' इति। मराल ने पूछा—'मित्र, तू इस दो करोड़ परिमाण के मणि और सोने से क्या करेगा ? शकुन्तः—'एतद्धनं कस्मैचिद्द्विजन्मने दास्यामि यथायं वेदवेदा- ङ्गपारगोऽन्यं न प्रार्थयति।' शकुंत—यह धन किसी ब्राह्मण को दे दूँगा कि वह वेद और वेदांग का पारंगत होकर किसी और से न माँगेगा। मरालः—'सखे चारु। ददतो युध्यमानस्य पठतः पुलकोऽथ चेत्। आत्मनश्च परेषां च तद्दानं पौरुषं स्मृतम् ॥ १०५ ॥ अनेन दानेन तव कथं पुण्यफलं भविष्यति।' मराल—'मित्र, सुंदर। दान करते, युद्ध करते और काव्य पाठ करते समय यदि अपने और दूसरो के रोंगटे खड़े हो जायँ तभी वह दान, पराक्रम और पाठ कहा जाता है। तो इस [ चोरी के ] दान से तुमको पुण्यफल कैसे मिलेगा?' शकुन्तः—'अस्माकं पितृपैतामहोऽयं धर्मः, यच्चौर्येण वित्तम् नीयते' शकुंत—'चोरी से धनार्जन तो हमारे बाप-दादा से चला आया धर्म है।' मरालः—'शिरश्छेदमङ्गीकृत्यार्जितं द्रव्यं निखिलमपि कथं दीयते।' मराल—'सिर कटाना स्वीकार करके कमाया हुआ सब धन क्यों दान करते हो?' शकुन्तः--मूर्खो नहि ददात्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया। प्राज्ञस्तु वितरत्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया' ॥ १०६ ॥ शकुंत--'मूर्ख मनुष्य दरिद्रता की शंका से धन-दान नहीं करता और बुद्धिमान् पुरुष भविष्य में आनेवाली दरिद्रता के निवारणार्थ धन वितरण कर देता है।'
भोजप्रबन्धः ४६ मरालः—'किञ्चिद्वेदमयं पात्रं किञ्चित्पात्रं तपोमयम्। पात्राणामुत्तमं पात्रं शूद्रान्नं यस्य नोदरे' ॥ १०७ ॥ मराल—वेद पाठी कुछ दान का पात्र होता है और कुछ तपस्वी दान के योग्य होता है, दान पाने का उत्तम पात्र वह है, जिसके पेट में निकृष्ट अन्न नहीं होता।' शकुन्तः—'अनेन वित्तेन किं करिष्यति भवान्।' शकुन्त—'आप इस धन का क्या करेंगे?' मरालः—सखे, काशीवासी कोऽपि विप्रवटुरत्रागात्। तेनास्मत्पितुः पुरः काशीवासफलं व्यावर्णितम्। ततोऽस्मत्तातॊ बाल्यादारभ्य चौर्यं कुर्वाणो दैववशात्स्वपापान्निवृत्तो वैराग्यात्सकुटुम्बः काशीमेष्यति। तद- र्थमिदं द्रविणजातम्।' मराल—'मित्र, एक काशी का रहनेवाला ब्राह्मण विद्यार्थी यहाँ आया। उसने मेरे पिता के संमुख काशीवास के फल का वर्णन किया। सो बचपन से चोरी करनेवाले मेरे पिता दैववश अपने पाप से निवृत्त हो वैराग्य के कारण सकुटुम्ब काशी जायेंगे। यह सब धन उसी निमित्त है।' शकुन्तः—'महद्भाग्यं तव पितुः। तथा हि— वाराणसीपुरीवासवासनावासितात्मना। किं शुना समतां याति वराकः पाकशासनः ॥ १०८ ॥ ऊपरं कर्मसस्यानां क्षेत्रं वाराणसी पुरी। यत्र सँल्लभ्यते मोक्षः समं चाण्डालपण्डितैः ॥ १०६ ॥ मरणं मङ्गलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्। कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते ॥ ११० ॥ शकुंत—'तेरा पिता बड़ा भाग्यशाली है। जैसा कि है— वाराणसी नगरी में निवास करने की इच्छा जिसके हृदय में व्याप्त है, उस कुत्ते की समता में क्या बेचारा इन्द्र आ सकता है ? वाराणसी नगरी कर्म रूपी खेती के लिए ऊसर हैं (कर्म फल के बंधन से मुक्त), जहाँ कि चंडाल और ब्राह्मण-दोनों ही समान रूप में मोक्ष प्राप्त करते है। ४ भोज०
५० भोजप्रबन्धः जहाँ मृत्यु प्राप्त होना मंगल है, भस्म आभूषण है और जहाँ कौपीन ही पटांबर है, उस काशी की समता किससे हो सकती है ?' एवमुभयोः संवादं श्रुत्वा राजा तुतोष। अचिन्तयच्च मनसि- 'कर्मणां गतिः सर्वथैव विचित्रा उभयोरपि पवित्रा मतिः' इति। ततो राजा विनिवृत्त्य भवनान्तरे पितृपुत्रावपश्यत्। तत्र पिता पुत्रं प्राह--'इदानीं परिज्ञातशास्त्रतत्त्वोऽपि नृपतिः कार्पण्येन किमपि न प्रयच्छति। किंतु-- अर्थिनि कवयति कवयति पठति च पठति स्तवोन्मुखे स्तौति। पश्चाद्यामीत्युक्ते मौनी दृष्टिं निमीलयति' ।। १११ ।। राजाप्येतच्छ्रुत्वा तत्समीपं प्राप्य 'मैवं वद्' इति स्वगात्रात्सर्वाभरणा- न्युत्तार्य ददौ तस्मै। इस प्रकार दोनों का वार्तालाप सुन कर राजा संतुष्ट हुआ और मन में सोचने लगा-'कर्मगति सब प्रकार से विचित्र होती है। दोनों की ही मति पवित्र है।' तदनन्तर राजा ने उस स्थान से हट कर एक अन्य गृह में पिता-पुत्र को देखा। वहाँ पिता ने कहा-'आजकल शास्त्रमर्म का परिज्ञानी भी राजा कृपणता के कारण कुछ देता नहीं, परं च- याचक (कवि) के कविता करने पर कविता कर देता है, काव्यपाठ करने पर स्वयम् भी पढ़ देता है और प्रशंसा करने पर प्रशंसा कर देता है, किन्तु बाद में कवि के 'जाता हूँ' कहने पर चुपचाप आँखें मूंद लेता है। राजा यह सुन उसके समीप जाकर बोला कि ऐसा न कहो, और अपने शरीर से सब आभूषण उतार कर उसे दे दिये। ---: o :--- ८-क्रीडाचन्द्रः ततो गृहमासाद्य कालान्तरे सभामुपविष्टः कालिदासं प्राह-'सखे, 'कवीनां मानसं नौमि तरन्ति प्रतिभाम्भसि।' ततः कविराह- 'यत्र हंसवयांसीव भुवनानि चतुर्दश' ।। ११२ ।।
भोजप्रबन्धः ५१ ततो राजा प्रत्यक्षरमुक्ताफललक्षं ददौ। फिर घर पहुँच कर कुछ समय पश्चात् सभा में बैठा राजा कालिदास से बोला—‘मित्र, ‘कवियों के मानसरूपी मन को नमस्कार, जिसके प्रतिभा-जल में तिरते हैं। तब कवि ने कहा (पूर्ति कर दी)— ‘चौदहों भुवन हंस के बच्चों जैसे!’ तब राजा ने प्रत्यक्षर लाख-लाख मोती दिये। ततः प्रविशति द्वारपालः-- 'देव, कोऽपिकौपीनावशेषो विद्वान्द्वारि तिष्ठति' इति। राजा—'प्रवेशय।' ततः प्रवेशितः कविरागत्य 'स्व- स्ति' इत्युक्त्वाऽनुक्त एवोपविष्टः प्राह-- इह निवसति मेरुः शेखरो भूधराणा- मिह हि निहितभाराः सागराः सप्त चैव। इदमसुलमनन्तं भूतलं भूरिभूतो- द्भवधरणसमर्थं स्थानमस्मद्विधानाम् ॥ ११३ ॥ तदनन्तर द्वारपाल ने प्रवेश किया (और कहा)—'देव, कौपीन मात्र धारण किये एक विद्वान् द्वार पर प्रतीक्षा कर रहा है।' राजा ने कहा— 'भीतर ले आओ।' तब प्रवेशित कवि ने आकर कहा—'स्वस्ति' और बिना किसी के कहे ही बैठ गया और बोला— 'इस ओर पर्वतों में श्रेष्ठ सुमेरु स्थित है और इधर ही पूर्ण भार युक्त सातों समुद्र हैं, यह अतुलनीय, अन्त हीन, प्रभूत प्राणियों की उत्पत्ति और उनका पालन-पोषण करने में समर्थ भूतल हम जैसे व्यक्तियों का स्थान है।' राजा--'महाकवे, किं ते नाम ? अभिधत्स्व। राजा—'महाकवे, तुम्हारा नाम क्या है ? बताओ।' कविः—'नामग्रहणं नोचितं पण्डितानाम्। तथापि वदामो यदि जानासि। नहि स्तनन्धयी बुद्धिर्गम्भीरं गाहते वचः। तलं तोयनिधेर्द्रष्टुं यष्टिरस्ति न वैष्णवी ॥ ११४ ॥
५२ भोजप्रबन्धः देव, आकर्णय-- च्युतामिन्दोर्लेखां रतिकलहभग्नं च वलयं समं चक्रीकृत्य प्रहसितमुखी शैलतनया । अवोचद्यं पश्येत्यवतु गिरिशः सा च गिरिजा स चक्रीडाचन्द्रो दशनकिरणापूरिततनुः ॥ ११५ ॥ कवि--'पंडितों को अपना नाम लेना उचित नहीं होता, तथापि बताता हूँ, यदि समझ सको। दूध पीते बच्चों की बुद्धि गंभीर वचन की थाह नहीं पा पाती, जलनिधि के तल को देखने के लिए बांस की लाठी नहीं होती। देव, सुनिए-- रतिकलह में गिरी चंद्रमा की कला और टूटे कंगन को जोड़ गोलाकार चक्र जैसा बनाकर हँसती हुई पर्वतपुत्री ने शिव से कहा--'यह देखो ! ( तो देखनेवाले ) वह कैलाशशायी शिव और वह गिरिसुता और वह दंतकांति समान किरणों से परिपूरित क्रीडाचन्द्र आपकी रक्षा करे।' कालिदासः--'सखे क्रीडाचन्द्र, चिराद्दृष्टोऽसि । कथमीदृशी ते दशा मण्डले विराजत्यपि राजनि बहुधनवति ?' कालिदास ( ने कहा )--'मित्र क्रीडाचन्द्र, बहुत समय बाद दीखे हो प्रभूत धनवान् राजाओं के रहने पर भी तुम्हारी यह कैसी दशा है ?' क्रीडाचन्द्रः-- धन्निनोऽप्यदानविभवा गण्यन्ते धुरि महादरिद्राणाम् । हन्ति न यतः पिपासामतः समुद्रोऽपि मरुरेव ॥ ११६ ॥ क्रीडाचन्द्र--'जो अपनी सम्पत्ति का दान नहीं करते, ऐसे धनी भी महा- दरिद्रों में ऊँचे स्थान पर गिने जाते हैं । क्योंकि प्यास नहीं बुझाता इसलिये समुद्र भी मरुस्थल ही है । किं च-- उपभोग( १ )कातराणां पुरुषाणामर्थसञ्चयपराणाम् । कन्यामणिरिव संदने तिष्ठत्यर्थः परस्यार्थे ॥ ११७ ॥
( १ ) उपभोगे कातराः भीता । उपभोगमकुर्वाणा इति यावत् ।
भोजप्रबन्धः ५३ सुवर्णमणिकेयूराडम्बरैरन्यभूभृतः । कलयैव पदं भोज तेषामाप्नोति सारवित् ॥ ११८ ॥ सुधामयानीव सुधां गलन्ति विदग्धसंयोजनमन्तरेण । काव्यानि निर्व्याजमनोहराणि वाराङ्गनाङ्गमिव यौवनानि ॥ ११९ ॥ ज्ञायते जातु नामापि न राज्ञः कवितां विना । कवेस्तद्व्यतिरेकेण न कीर्तिः स्फुरति क्षितौ ॥ १२० ॥ और भी है—उपभोग करने में डरनेवाले (कंजूस), धन इकट्ठा करने में लगे हुए पुरुषों का धन घर में कन्यारूपी मणि के समान दूसरे के लिए ही रहता है । हे भोज, अन्य राजा स्वर्ण, मणि और केयूर के आडम्बरों के कारण जिस स्थान को प्राप्त करते हैं, उनके उस स्थान को तत्त्ववेत्ता कला के द्वारा ही प्राप्त कर लेते हैं । अमृत से परिपूर्ण-जैसे स्वभावतया मनोहर काव्य, मर्मज्ञ विद्वान् के संयोग के बिना अपने अमृतरस को वाराङ्गनाओं के यौवन की भाँति व्यर्थ गला देते हैं । कविता के बिना राजाओं का नाम भी नहीं जाना जाता और राजा से व्यतिरिक्त हो (राज के अभाव में) कवि का यश धरती पर नहीं फैलता ।' मयूरः— 'ते वन्द्यास्ते महात्मानस्तेषां लोके स्थिरं यशः । यैर्निबद्धानि काव्यानि ये च काव्ये प्रकीर्तिताः' ॥ १२१ ॥ मयूर—जिन्होंने काव्य-रचना की और जिनका काव्य में वर्णन हुआ वे वंदनीय हैं वे महात्मा हैं और उन्हीं का यश संसार में स्थिर हैं । वररुचिः— 'पदव्यक्तिव्यक्तीकृतसहृदयाबन्धललिते कवीनां मार्गेऽस्मिन्स्फुरति बुधमात्रस्य धिषणा । न च क्रीडालेशव्यसनपिशुनोऽयं कुलवधू- कटाक्षाणां पन्थाः स खलु गणिकानामविषयः' ॥ १२२ ॥
२. भोज का राज्याभिषेक व धारा नगरी समृद्धि
५४ भोजप्रबन्धः वररुचि-पदों द्वारा व्यक्त, सहृदयजन के आस्वादन के निमित्त साधारणी कृत प्रसंग-योजना के कारण ललित चरण रखे जाने से बन गये चिह्नों के कारण सज्जनों के लिए जिसमें दिशा का निर्देश स्पष्ट है, ऐसे मार्ग के समान कवियों के इस मार्ग में ( काव्य में ) पंडितों की ही बुद्धि स्फुरित होती है । यह पंथ कुलकामिनीयों के कटाक्षों का पंथ है, जो थोड़े से क्रीडाविलास का व्यसनी होने पर भी निन्दनीय नहीं माना जाता । यह गणिकाओं का विषय नहीं है । भाव यह है कि काव्य का रस, रसिक सहृदय पंडितों द्वारा ही संवेद्य होता है । उसकी एक मर्यादित, सुनिश्चित योजना है, कुलकामिनीयों के मर्यादित कटाक्ष-विलास के समान । वह काव्य जिस तिसके प्रति किये गये वारवनिताओं के कटाक्ष की भाँति नहीं होता । राजा क्रीडाचन्द्राय विंशतिगजेन्द्रान्ग्रामपञ्चकं च ददौ । ततो राजानं कविः स्तौति— 'कङ्कणं नयनद्वन्द्वे तिलकं करपल्लवे । अहो भूषणवैचित्र्यं भोजप्रत्यर्थियोषिताम्' ॥ १२३ ॥ तुष्टो राजा पुनरक्षरं लक्षं ददौ । राजा ने क्रीडाचंद्र को बीस हाथी और पाँच गाँव दिये । तब कविने राजा की प्रशंसा की— भोज के शत्रुओं की स्त्रियों के आभूषण पहिनने की रीति अनोखी है— दोनों नेत्रों में उन्होंने कंगन पहिने हैं (आंसू) और करपल्लवों में तिलक (मृतपतियों के तर्पण के निमित्त तिल) । भावार्थ यह कि शत्रु-स्त्रियाँ आँखों में आँसू भरे हाथ में तिल लेकर मृतपतियों का तर्पण कर रही हैं । ये आंसू नेत्रों के कंगन हैं और हाथ के तिल तिलक । संतुष्ट होकर राजाने पुनः प्रत्यक्षर लाख मुद्राएँ दीं । --:०:-- ६--रामेश्वरकवेरन्यसभाकवीनाञ्च सत्कारः ततः कदाचित्कोऽपि जराजीर्णसर्वाङ्गसन्धिः पण्डितो रामेश्वर- नामा सभामभ्यगात् । स चाह—
भोजप्रबन्धः ५५ पञ्चाननस्य सुकवेर्गजमांसैर्नृपश्रिया । पारणा जायते क्वापि सर्वत्रैवोपनासिनः ॥ १२४ ॥ वाहानां पण्डितानां च परेवामपरो जनः । कवीन्द्राणां गजेन्द्राणां ग्राहको नृपतिः परः ॥ १२५ ॥ तदनंतर कभी वृद्धावस्थाके कारण जिसके अंगों के सब जोड़ शिथिल हो चले हैं, ऐसा कोई रामेश्वर नाम का पंडित सभा में पहुँचा और बोला— सब स्थानों पर उपासे ( भूखे ) रहजानेवाले पंचानन सिंह की पारणा ( व्रतांत भोजन ) हाथी के मांस से और कविकी पारणा ( तृप्ति ) राज-संपत्ति से होती है । घोड़ों और अन्य पंडितों का ग्राहक अन्य जन हो सकता है किन्तु कवि- राजों और गजराजों का ग्राहक राजा ही होता है । एवं हि— सुवर्णैः पट्टचैलैश्च शोभा स्याद्वारयोषिताम् । पराक्रमेण दानेन राजन्ते राजनन्दनाः । १२६ ॥ इत्याकर्ण्य राजा रामेश्वरपण्डिताय सर्वाभरणान्युत्तार्य लक्षद्वयं प्रायच्छत् । ततः स्तौति कविः— भोज त्वत्कीर्तिकान्ताया नभोभालस्थितं महत् । कस्तूरीतिलकं राजन्गुणाकर विराजते ॥ १२७ ॥ बुधाग्रे न गुणान्ब्रूयात्साधु वेत्ति यतः स्वयम् । मूर्खाग्रेऽपि च न ब्रूयाद्बुधप्रोक्तं न वेत्ति सः ॥ १२८ ॥ तेन चमत्कृताः सर्वे । ऐसे ही—स्वर्णाभूषणों और पाटांबरों से वेश्याओं की शोभा होती है; राजपुत्र तो पराक्रम और दान से सुशोभित होते हैं। यह सुनकर राजाने रामेश्वर पंडित को उतार कर सारे आभूषण और दो लाख दिये । तब कवि ने स्तुति की—हे गुणों के भांडार भोजराज, आपकी कीर्तिरुपी सुंदरी पत्नी का विशाल तिलक आकाशरूपी माथे पर स्थित हो सुशोभित हो रहा है अर्थात् आपका यश नभोमंडल तक फैला है ।
५६ भोजप्रबन्धः
बुद्धिमान के संमुख स्वगुण कीर्तन उचित नहीं होता, क्यों कि वह तो स्वयं भली भाँति जानता ही है। मूर्ख के आगे भी गुणकथन उचित नहीं क्यों कि वह बुद्धिमान का कहा समझेगा ही नहीं। उसने सब को चमत्कृत कर दिया । रामेश्वरकविः-- 'ख्यातिं गमयति सुजनः सुकविर्विदधाति केवलं काव्यम् । पुष्णाति कमलमम्भो लक्ष्म्या तु रविर्नियोजयति' ॥ १२६॥ ततस्तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। कवि रामेश्वर ने सुनाया-- सुकवि तो केवल काव्य रचता है, सज्जन उससे प्रसिद्धि प्राप्त करता है। जल कमल का केवल पोषण करता है परंतु सूर्य उसे लक्ष्मी (शोभा, विकास) से युक्त करता है। तब संतुष्ट राजा ने प्रत्यक्षर एक लाख मुद्राएँ दी। राजेन्द्रं कविः प्राह्- 'कवित्वं न शृणोत्येव कृपणः कीर्तिवर्जितः । नपुंसकः किं कुरुते पुरःस्थितमृगीदृशा' ॥ १३०॥ कविराज भोज से बोला- यशोहीन कृपण, काव्य सुनता ही नहीं, नपुंसक पुरुष संमुख बैठी मृगनयना के साथ क्या करता है ? सीता प्राह— 'हता दैवेन कवयो वराकास्ते गजा अपि । शोभा न जायते तेषां मण्डलेन्द्रगृहं विना' ॥ १३१ ॥ सीता ने कहा-- भाग्य ने उन बेचारे कवियों और हाथियों को भी मार डाला (जिन्हे राजाश्रय नहीं मिला) । मंडलाधीश के घर को छोड़ उनकी शोभा नहीं होती। कालिदासः-- 'अदातृमानसं क्वापि न स्पृशन्ति कवेर्गिरः । दुःखायैवातिवृद्धस्य विलासास्तरुणीकृताः' ॥ १३२॥
भोजप्रबन्धः ५७ कालिदास--कवि की वाणी: ( कविता ) न देनेवाले दाता के मन को छू भी नहीं पाती है। तरुणी के द्वारा किये गए विलास बहुत बूढ़े पुरुष को दुःख ही देते हैं। राजा प्रतिपण्डितं लक्षं दत्तवान् । राजा ने प्रत्येक पंडित को लाख-लाख मुद्राएँ दीं। --:o:-- १०--कालिदासस्य कलङ्कनिवारणम्, ततः कदाचिद्राजा समस्तादपि कविमण्डलादधिकं कालिदासमव- लोक्यायान्तं परं वेश्यालोलत्वेन चेतसि खेदत्वं चक्रे । तदा सीता विद्वद्वृन्दवन्दिता तदभिप्रायं ज्ञात्वा प्राह--'देव' दोषमपि गुणवति जने दृष्ट्वा गुणरागिणो न खिद्यन्ते । प्रीत्यैव शशिनि पतितं पश्यति लोकः कलङ्कमपि ॥ १३३ ॥ तुष्टो राजा सीतायै लक्षं ददौ । तदनंतर कभी राजा ने संपूर्ण कविमंडली से भी अधिक महत्त्व शाली कालिदास को आता देखकर परन्तु मन में उनकी वेश्यालोलुपता विचारकर थोड़ी-सी खिन्नता का अनुभव किया। तब विद्वज्जनद्वारा वंदिता सीता ने राजा का अभिप्राय समझ कर कहा-- गुणानुरागी मनुष्य गुणवान व्यक्ति में दोष भी देख कर खिन्न नहीं होते, संसार चंद्रमा में लगे कलंक को उसके प्रति प्रीति के कारण ही देख लेता है। तब संतुष्ट हो राजा ने सीता को लाख लिये । तथापि कालिदासं यथापूर्वं न मानयति यदा, तदा स च कालि- दासो राज्ञोऽभिप्रायं विदित्वा तुलामिषेण प्राह- 'प्राप्य प्रमाणपदवीं को नामास्ते तुलेऽवलेपस्ते । नयसि गरिष्ठमधस्तात्तदितरमुच्चैस्तरांकुरुषे' ॥ १३४ ॥ तो भी राजा पहिले के समान कालिदास का संमान नहीं करता यह बात समझ कर कालिदास ने तुला ( तराजू ) के व्याज से कहा--
५८ भोजप्रबन्धः हे तुले, प्रमाण का पद ( छोटा-बड़ा बताने का काम, मूल्यांकन ) को प्राप्त करके यह तेरी कैसी उद्धतता है कि तू भारी ( गौरवास्पद ) को नीचे ले जाती है ( निम्न घोषित करती है ) और हल्के ( सारहीन ) को ऊपर ( संमाननीय ) उठा देती है । पुनराह-- 'यस्यास्ति सर्वत्र गतिः स कस्मात्स्वदेशरागेण हि याति खेदम् । तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणाः क्षारं जलं कापुरुषाः पिबन्ति' ॥१३५॥ फिर कहा--जिसकी गति सर्वत्र समान है ( जो सब स्थानों में मान पाने योग्य है ), वह स्वदेश-प्रेम के कारण क्यों कष्ट उठाये ? 'यह पिता का कुआ है--' ऐसा विचार कर कायर जन ही खारा जल पिया करते हैं। ततो राज्ञा कृतामवज्ञां मनसि विदित्वा कालिदासो दुर्मना निज- वेश्म ययौ। अवज्ञास्फुटितं प्रेम समीकर्तुं क ईश्वरः । सन्धिं न याति स्फुटितं लाक्षालेपेन मौक्तिकम् ॥ १३६ ॥ तदनंतर राजा द्वारा की गयी अवज्ञा ( अवहेलना ) को मन ही मन समझ दुःखी कालिदास अपने घर चला गया । अवहेलना से भग्न प्रेम को जोड़ने में कौन समर्थ होता है ? टूटा मोती लाख लगाने से नहीं जुड़ता । ततो राजापि खिन्नः स्थितः । ततो लीलावती खिन्नं दृष्ट्वा राजानं विषादकारणमपृच्छत् । राजा च रहसि सर्वं तस्यै प्राह। सा च राजमुखेन कालिदासावज्ञां ज्ञात्वा पुनः प्राह--'देव प्राणनाथ, सर्वज्ञोऽसि । स्नेहो हि वरमघटितो न वरं सञ्जातविघटितस्नेहः । हतनयनो हि त्रिपादी न विषादी भवति (१)जात्यन्धः ॥१३७॥ तब राजा भी खिन्न रहने लगा। तदनन्तर राजा को खिन्न देखकर रानी लीलावती ने विषाद का कारण पूछा । एकांत में राजा ने उसे सब कुछ बताया । राजा के मुख से कालिदास की अवहेलना हुई जानकर उसने फिर कहा-- 'देव. प्राणनाथ, आप सर्वज्ञ हैं। ( १ ) जन्मान्ध इति यावत् ।
प्रेम यदि उत्पन्न ही न हो तो अच्छा है परन्तु उत्पन्न होकर टूटा स्नेह अच्छा नहीं। जिसकी आँखें न रहे, दुःखी वही होता है, जो जन्मान्ध है, वह नहीं। परन्तु कालिदासः कोऽपि भारत्याः पुरुषावतारः । तत्सर्वभावेन सम्मान- यैनं विद्वद्भिः । पश्य— दोषाकरोऽपि कुटिलोऽपि कलङ्कितोऽपि मित्रावसानसमये विहितोद्योऽपि । चन्द्रस्तथापि हरव (१)ल्लभतामुपैति नैवाश्रितेषु गुणदोषविचारणा स्यात् ॥ १३८ ॥ परंतु कालिदास तो वाग्देवता का नर रूप में एक अवतार है। तो उसका सब विद्वानों से अधिक सम्मान कीजिए। देखिए--, दोषा रात्रि का करने वाला इस प्रकार ) दोषों का भांडार होने पर भी, वक्र होने पर भी, कलंक युक्त होने पर भी और मित्र (सूर्य) के अस्त होने के समय स्वयम् उदित होने वाला होकर भी (मित्र की अवनति से स्वम् उन्नति कर लेने के दोष से युक्त होकर भी) चंद्रमा ने शिव के प्रेम को प्राप्त कर लिया है। (इससे सिद्ध है) आश्रित जनों के गुण-दोष का विचार नहीं किया जाता। राजा-प्रिये, सर्वमेतत्सत्यमेव' इत्यङ्गीकृत्य 'श्वः कालिदासं प्रातरेव सन्तोषयिष्यामि' इत्यवोचत् । अन्येद्यु राजा दन्तधावनादिविधिं विधाय निर्वार्तितनित्यकृत्यः सभां प्राप । पण्डिताः कवयश्च गायका अन्ये प्रकृतयश्च सर्वे समाजग्मुः । कालिदासमेकमनागतं वीक्ष्य राजा स्वसेवकमेकं तदाकारणाय वेश्यागृहं प्रेषयामास । राजा ने स्वीकारा और कहा—'प्रिये, यह सब सत्य है। कल सबेरे ही कालिदास को संतुष्ट करूँगा।' दूसरे दिन दतुअन आदि करके नित्य कर्म से निपट राजा सभा में पहुँचा। पंडित, कवि, गायक और अन्य सब सामंत-सभासद आ गये। एक (१) महेशनुरागतामित्यर्थः ।