भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

९३- विभीषणके पुत्रका मणिकुण्डलकी सहायताके लिये पितासे कहना

२६२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

उस समय गौतमीके दक्षिण-तटपर भगवान् योगेश्वरके सामने ब्राह्मणने वैश्यको गिरा दिया और उसकी आँखें निकाल लीं। फिर कहा—'वैश्य! प्रतिदिन धर्मकी प्रशंसा करनेसे ही तुम इस दशाको पहुँचे हो। तुम्हारा धन गया, आँखें गयीं और दोनों हाथ काट लिये गये। मित्र! अब तुमसे बिदा लेकर जाता हूँ। फिर कभी बातचीतमें इस तरह धर्मकी प्रशंसा न करना।' यों कहकर गौतम चला गया। उसके जानेपर वैश्यप्रवर मणिकुण्डल धन, बाहु और नेत्रसे रहित होनेके कारण शोकग्रस्त हो गया। तथापि वह निरन्तर धर्मका ही स्मरण करता था। अनेक प्रकारकी चिन्ता करते हुए वह भूतलपर निश्चेष्ट होकर पड़ा था। उसके हृदयमें उत्साह नहीं रह गया था। वह शोक-सागरमें डूबा हुआ था। दिन बीता, रजनीका आगमन हुआ और चन्द्रमण्डलका उदय हो गया। उस दिन शुक्ल पक्षकी एकादशी थी। एकादशीको वहाँ लङ्कासे विभीषण आया करते थे। उस दिन भी आये; उन्होंने पुत्र और राक्षसोंसहित गौतमी गङ्गामें स्नान किया और योगेश्वर भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजा की। विभीषणका पुत्र भी दूसरे विभीषणके ही समान धर्मात्मा था। उसे लोग वैभीषणि कहते थे। वैभीषणिने वैश्यको देखा और उससे वार्तालाप किया। वैश्यका यथावत् वृत्तान्त जानकर उस धर्मज्ञने अपने पिता लङ्कापति महात्मा विभीषणको बतलाया। लङ्केश्वरने अपने गुणाकर पुत्रसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—'बेटा! भगवान् श्रीराम मेरे गुरु—आराध्यदेव हैं और उनके आदरणीय भक्त हनुमान्‌जी मेरे सखा हैं। आजसे बहुत पहले एक कार्य आ पड़नेपर हनुमान्‌जी बहुत बड़ा पर्वत उठा लाये थे, जो सब प्रकारकी ओषधियोंका भण्डार था। उस समय दो ओषधियोंकी आवश्यकता थी—विशल्यकरणी और मृतसंजीवनी। उन दोनों ओषधियोंको लाकर उन्होंने भगवान् श्रीरामको अर्पित किया। जब उनकी आवश्यकता पूर्ण हो गयी, तब वे पुनः उस पर्वतको उठाकर हिमालयपर ले गये और वहीं रख आये। हनुमान्‌जी बड़े वेगसे जा रहे थे, इसलिये विशल्यकरणी नामकी ओषधि गौतमी गङ्गाके तटपर गिर पड़ी थी। जहाँ भगवान् योगेश्वरका स्थान है, वहीं वह ओषधि है। उसे ले आकर तुम भगवान्‌का स्मरण करते हुए इसके हृदयपर रख दो। उससे यह उदारबुद्धि वैश्य अपने सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लेगा।'

वैभीषणि बोला— पिताजी! मुझे शीघ्र ही वह ओषधि दिखा दीजिये। विलम्ब न कीजिये। दूसरोंकी पीड़ा दूर करनेसे बढ़कर तीनों लोकोंमें दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है।

विभीषणने 'बहुत अच्छा' कहकर पुत्रको वह ओषधि दिखा दी। उसने 'इषे त्वा०' इत्यादि मन्त्रको पढ़कर उस वृक्षकी एक शाखा तोड़ ली और उसे ले आकर वैश्यके हृदयपर रख दिया। उसका स्पर्श होते ही वैश्यके नेत्र और हाथ ज्यों-

  • चक्षुस्तीर्थका माहात्म्य * २६३

के-त्यों हो गये। मणि, मन्त्र और ओषधियोंके प्रभावको कोई नहीं जानता। वैश्यने धर्मका चिन्तन करते हुए गौतमी गङ्गामें स्नान किया और योगेश्वर भगवान् विष्णुको नमस्कार करके पुनः वहाँसे यात्रा की। उसने अपने साथ ओषधिकी टूटी हुई शाखा भी ले ली थी। देश-देशान्तरोंमें भ्रमण करता हुआ मणिकुण्डल एक राजधानीमें पहुँचा, जो महापुरके नामसे विख्यात थी। वहाँके महाबली राजा महाराजके नामसे प्रसिद्ध थे। राजाके कोई पुत्र नहीं था, एक पुत्री थी; उसकी भी आँखें नष्ट हो चुकी थीं। वह कन्या ही राजाके लिये पुत्र थी। राजाने यह निश्चय किया था कि ‘देवता, दानव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, गुणवान् या निर्गुण—कोई भी क्यों न हो, मैं उसीको यह कन्या दूँगा, जो इसकी आँखें अच्छी कर देगा। मुझे अपने राज्यके साथ ही कन्याका दान करना है।' महाराजने यह घोषणा सब ओर करा दी थी। वैश्यने वह घोषणा सुनकर कहा—'मैं निश्चय ही राजकुमारीकी खोयी हुई आँखें पुनः ला दूँगा।'

राजकर्मचारी शीघ्र ही वैश्यको लेकर गया और महाराजको उसने सब बातें बतायीं। वैश्यने उस काष्ठका स्पर्श कराया और राजकुमारीके नेत्र ठीक हो गये। यह देखकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'आप कौन हैं?' वैश्यने राजासे अपना सब हाल ठीक-ठीक कह सुनाया। फिर बोला—'ब्राह्मणोंके प्रसादसे तथा धर्म, तपस्या, दान, यज्ञ और दिव्य ओषधिके प्रभावसे मुझमें ऐसी शक्ति आयी है।' वैश्यका यह कथन सुनकर महाराजको अत्यन्त आश्चर्य हुआ। वे बोले—'अहो, ये महानुभाव कोई देवता ही होंगे। अन्यथा देवेतर मनुष्यमें ऐसी शक्ति कैसे देखी जाती। अतः इन्हें राज्यके साथ ही अपनी कन्या अवश्य दूँगा।' मनमें ऐसा संकल्प करके राजाने कन्यासहित राज्य वैश्यको दे दिया। मणिकुण्डल राज्यको पाकर भी मित्रके बिना संतुष्ट न हुआ। वह सोचने लगा—'मित्रके बिना न तो राज्य अच्छा है और न सुख ही अच्छा लगता है।' इस प्रकार वह सदा गौतम ब्राह्मणका ही चिन्तन किया करता था। इस पृथ्वीपर उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए साधुपुरुषोंका यही लक्षण है कि अहित करनेवालोंके प्रति भी उनके मनमें सदा कारुण्य ही भरी रहती है।*

एक दिन महाराज मणिकुण्डल वनमें गये थे। वहाँ उन्होंने अपने पूर्व मित्र गौतम ब्राह्मणको देखा। पापी जुआरियोंने उसका सब धन छीन लिया था। धर्मज्ञ मणिकुण्डलने अपने ब्राह्मण मित्रको साथ ले लिया, उसका विधिपूर्वक पूजन किया और धर्मका सब प्रभाव भी बतलाया। फिर समस्त पापोंकी निवृत्तिके लिये गौतमको गङ्गामें स्नान कराया। वैश्यके देशमें जो सगोत्र बन्धु-बान्धव थे, उनको तथा गौतम ब्राह्मणके बन्धु-बान्धव वृद्धकौशिक आदिको उन्होंने बुलवाया और सबके साथ देवपूजनपूर्वक गौतमीके तटपर यज्ञ किया। तदनन्तर शरीरका अन्त होनेपर वे स्वर्गलोकमें गये। वह स्थान मृतसंजीवनतीर्थ, चक्षुस्तीर्थ और योगेश्वरतीर्थ कहलाने लगा। वह स्मरणमात्रसे पुण्य देनेवाला, मनको प्रसन्न रखनेवाला और समस्त दुर्भावनाओंका नाश करनेवाला है।


* एतदेव सुजातानां लक्षणं भुवि देहिनाम्। कृपार्द्रं यन्मनो नित्यं तेषामप्यहितेषु हि॥ (१७०।८३)

६७- सामुद्र, ऋषिसत्र आदि तीर्थोंकी महिमा तथा गौतमी-माहात्म्यका उपसंहार

२६४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

सामुद्र, ऋषिसत्र आदि तीर्थोंकी महिमा तथा गौतमी-माहात्म्यका उपसंहार

ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! सामुद्रतीर्थ सब तीर्थोंका फल देनेवाला है। उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ, मन लगाकर सुनो। गौतमके विदा करनेपर पापनाशिनी गङ्गा जब तीनों लोकोंका उपकार करनेके लिये ब्रह्मगिरिसे पूर्व-समुद्रकी ओर चलीं, तब मार्गमें मैंने उनके जलको लेकर कमण्डलुमें धारण किया। परमात्मा शिवने उन्हें मस्तकपर चढ़ाया। वे भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हैं। ब्रह्मर्षि गौतमने मर्त्यलोकमें उनका अवतरण कराया है। वे स्मरणमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाली हैं और गुरुओंकी भी गुरु हैं। समुद्रने जब उन्हें अपनी ओर आते देखा, तब मन-ही-मन विचार किया—‘जो सम्पूर्ण जगत्की वन्दनीया और सबकी ईश्वरी हैं, जिन्हें ब्रह्मा तथा शिव आदि देवता भी मस्तक झुकाते हैं, उनके स्वागतमें मुझे कुछ दूर आगेतक जाना चाहिये। नहीं तो मेरे धर्ममें दोष आयेगा। जो अपने घर आते हुए महापुरुषको लेनेके लिये मोहवश स्वयं उपस्थित नहीं होता, उस पापीकी रक्षा करनेवाला दोनों लोकोंमें कोई नहीं है।’ यों विचारकर समुद्र मूर्तिमान् हो हाथ जोड़े विनीत भावसे गङ्गाजीके समीप आया और इस प्रकार बोला—‘देवि! तुम्हारा यह जल, जो आकाश, पाताल और मर्त्यलोकमें फैला हुआ है, मुझमें आकर मिले—इसके लिये मैं कुछ नहीं कहूँगा। मेरे भीतर रत्न, अमृत, पर्वत, राक्षस और असुर रहते हैं। इनको तथा अन्यान्य भयंकर जलजन्तुओंको भी मैं धारण करता हूँ। मेरे जलमें लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु सदा शयन करते हैं। इस चराचर जगत्में मेरे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। मैं तुम्हारे स्वागतमें यहाँतक आया हूँ। जो अपनेसे बड़ेके आनेपर अहंकारवश आगे बढ़कर उसका स्वागत नहीं करता, वह धर्म आदिसे भ्रष्ट होकर नरकमें पड़ता है।* भगवती गङ्गा! तुमसे एक प्रार्थना करता हूँ। तुम सात धाराओंमें आकर मुझसे मिलो। यदि एक ही धाराके रूपमें आकर मिलोगी तो मैं तुम्हारे दुःसह वेगको धारण न कर सकूँगा।’ समुद्रका यह वचन सुनकर गौतमी गङ्गाने कहा—‘तुम मेरी यह बात मानो; सप्तर्षियोंकी जो अरुन्धती आदि पत्नियाँ हैं उन सबको उनके पतियोंसहित ले आओ; तब मैं छोटे रूपमें हो जाऊँगी।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर समुद्र सप्तर्षियों और उनकी पत्नियोंको ले आया। तब गोदावरी देवी सात धाराओंमें विभक्त हो गयीं और उसी रूपमें उनका समुद्रसे


* महत्यभ्यागते कुर्यात्प्रत्युत्थानं न यो मदात् । स धर्मादिपरिभ्रष्टो निरयं तु समाप्नुयात्।
(१७२।११)

  • सामुद्र, ऋषिसत्र आदि तीर्थोंकी महिमा तथा गौतमी-माहात्म्यका उपसंहार * २६५

संगम हुआ। सप्तर्षियोंके नामपर वे सप्तगङ्गाके नामसे विख्यात हुईं। वहाँ भक्तिपूर्वक जो स्नान, दान, श्रवण, पाठ और स्मरण आदि शुभ कर्म किया जाता है, वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला होता है। पापकी हानि, भोग और मोक्षकी प्राप्ति तथा मनकी प्रसन्नताके लिये तीनों लोकोंमें सामुद्रतीर्थसे बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ नहीं है।

सामुद्रतीर्थके अतिरिक्त वहाँ ऋषिसत्रतीर्थ भी है, जहाँ सातों ऋषि तपस्याके लिये बैठे थे और जहाँ भीमेश्वर शिव विराजमान हैं। वहाँका वृत्तान्त इस प्रकार है। सात ऋषियोंने गङ्गाको सात धाराओंमें विभक्त किया। सबसे दक्षिणकी धारा वासिष्ठी कहलायी। उससे उत्तर वैश्वामित्री, उससे उत्तर वामदेवी, बीचकी धारा गौतमी, उससे उत्तर भारद्वाजी, उससे उत्तर आत्रेयी और अन्तिम धारा जामदग्नी है। उन सब ऋषियोंने मिलकर वहाँ बहुत बड़े सत्रका अनुष्ठान किया। इसी बीचमें देवताओंका प्रबल शत्रु विश्वरूप वहाँ आया और ब्रह्मचर्य तथा तपस्याके द्वारा उन ऋषियोंको प्रसन्न करके विनयपूर्वक पूछा—'मुनिवरो! यज्ञ अथवा तपस्या—जिस उपायसे भी मुझे बलवान् पुत्र प्राप्त हो, जिसे देवता भी परास्त न कर सकें, वह उपाय बतलाइये।'

तब परम बुद्धिमान् विश्वामित्रने कहा—'तात! कर्मसे नाना प्रकारके फल प्राप्त होते हैं। तीन कारणोंमें कर्म ही पहला कारण है। दूसरा कारण कर्ता है तथा तीसरे कारणके अन्तर्गत उपादान और बीज आदि अन्य उपकरण हैं। उपादान और बीजको विद्वानोंने कर्म नहीं माना है। जहाँ बहुत-से कारण उपस्थित हों, वहाँ कर्म ही प्रधान कारण सिद्ध होता है। क्योंकि कर्म करनेसे फलकी सिद्धि देखी जाती है और न करनेसे नहीं। अतः फलकी सिद्धि कर्मके ही अधीन है। कर्म भी दो प्रकारके जानने चाहिये—क्रियमाण और कृत। क्रियमाण कर्मका जो-जो साधन है, वह कर्तव्य बताया गया है। विद्वान् पुरुष कर्म करते हुए जो-जो भावना करता है, उसके अनुरूप ही फलकी सिद्धि होती है। यदि बिना भावनाके विधिपूर्वक कर्मका अनुष्ठान करता है तो उसे अन्य प्रकारका फल मिलता है। किंतु भावना करनेपर सम्पूर्ण फल उस भावनाके अनुरूप ही होता है; अतः तप, व्रत, दान, जप और यज्ञ आदि क्रियाएँ कर्मके अनुरूप भाव होनेसे ही अभीष्ट फल देती हैं। भाव भी तीन प्रकारका जानना चाहिये—सात्त्विक, राजस और तामस। जिस भावनाके अनुरूप कर्म होगा, वैसा ही फल मिलेगा। अतः फलकी प्राप्ति कर्मके अनुसार और भावनाके अनुरूप भी होती है; इसलिये कर्मोंकी स्थिति विचित्र है, यों समझकर विद्वान् पुरुषको अपनी इच्छाके अनुकूल भाव भी बनाना चाहिये। फिर उसके अनुरूप कर्म भी करना चाहिये। फल देनेवाला भी जब फल चाहनेवालोंको फल देनेमें प्रवृत्त होता है, तब उसके कर्म और भावनाके अनुसार ही फल देता है। कर्म धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका कारण है। यदि निष्कामभावसे कर्म हो तो वह मुक्तिदायक होता है और सकामभावसे होनेपर वही बन्धनका कारण बन जाता है। अपने भावके अनुसार ही कर्म बनता है तथा वही इस लोक और परलोकमें भाँति-भाँतिके फल देता है। भावके अनुकूल कर्म होता और तदनुसार भोग मिलता है; अतः भाव सबसे बढ़कर है। तुम भी भावके अनुसार कर्म करो। फिर जो चाहोगे, प्राप्त कर लोगे।'

बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिका कथन सुनकर विश्वरूपने तामस भावका आश्रय ले दीर्घकालतक तपस्या की। प्रधान-प्रधान ऋषियोंके मना करनेपर

९५- देवता आदिके द्वारा भगवान् शिव और विष्णुकी स्तुति

२६६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

भी उसने अपने क्रोधके अनुरूप देवताओंके लिये भयंकर कार्य किया। भयंकर कुण्ड खोदकर उसमें भयानक अग्निदेवको प्रज्वलित किया और उसीमें बैठकर मन-ही-मन अत्यन्त भयंकर रौद्रपुरुषका आत्मरूपसे चिन्तन किया। उसे इस प्रकार तपस्या करते देख आकाशवाणी हुई—‘भीमस्वरूप जगदीश्वर शिवकी महिमाको कौन जानता है। वे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं तो भी उसकी आसक्तिसे लिप्त नहीं होते।’ यों कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। मुनीश्वरगण भगवान् भीमेश्वरको नमस्कार करके अपने-अपने आश्रमको चले गये। विश्वरूप महाभीम (अत्यन्त भयंकर) था। उसके कर्म भी भयंकर थे। उसकी आकृति भी बड़ी भयानक थी। उसके हृदयका भाव भी भयंकर ही था। उसने भीमस्वरूप भगवान् रुद्रका ध्यान करके अग्निमें अपनी आहुति दे दी। तबसे उसके द्वारा आराधित भगवान् शङ्कर भीमेश्वर कहलाते हैं। वहाँ किया हुआ स्नान और दान निस्सन्देह मोक्ष देनेवाला होता है। जो सदा भक्तिपूर्वक इस प्रसङ्गका पाठ और श्रवण करता है तथा देवताओंके स्वामी भीमस्वरूप भगवान् शिवको प्रणाम करता है, उसे भगवान् शिव अपने सर्वपापापहारी चरणोंकी शरणमें लेकर मुक्ति प्रदान करते हैं। यों तो भगवती गोदावरी सर्वत्र और सदा ही सम्पूर्ण पापराशिका विनाश करनेवाली तथा परम पुरुषार्थ (मोक्ष) देनेवाली हैं, तथापि जहाँ वे समुद्रमें मिली हैं, वहाँ उनका माहात्म्य विशेषरूपसे बढ़ा हुआ है। जो पुण्यात्मा प्राणी गोदावरी-सागर-संगममें स्नान कर लेता है, वह अपने पूर्वजोंका दुःसह नरकसे उद्धार करके स्वयं भी भगवान् शिवके धाममें जाता है। जो वेदान्तद्वारा जानने योग्य तथा सबका उपास्य है, साक्षात् वह ब्रह्म ही भीमेश्वरके रूपमें प्रकट है। भीमेश्वरका दर्शन कर लेनेपर जीव फिर भयंकर दुःख देनेवाले संसारमें नहीं प्रवेश करते।

देवताओंकी भी वन्दनीया गङ्गा जब समुद्रमें मिलीं, तब सम्पूर्ण देवता और मुनि उनके पीछे-पीछे स्तुति करते हुए गये। वसिष्ठ, जाबालि, याज्ञवल्क्य, क्रतु, अङ्गिस, दक्ष, मरीचि, अन्यान्य वैष्णवगण, शातातप, शौनक, देवरात, भृगु, अग्निवेश, अत्रि, मरीचि, मनु, गौतम, कौशिक, तुम्बुरु, पर्वत, अगस्त्य, मार्कण्डेय, पिष्पल, गालव, योगीजन, वामदेव, आङ्गिरस तथा भार्गव—ये समस्त पुराणवेत्ता महर्षि प्रसन्नचित्तसे वैदिक मन्त्रोंद्वारा देवी गोदावरीकी स्तुति करते थे। गोदावरीको समुद्रमें मिली हुई देख भगवान् शिव और विष्णुने भी मुनियोंको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। देवताओं और पितरोंने भी सबकी पीड़ा दूर करनेवाले उन दोनों देवताओंका दर्शन और स्तवन किया। आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, लोकपाल—ये सब हाथ जोड़कर भगवान् शिव और विष्णुकी स्तुति करते थे। समुद्र और गङ्गाके सातों प्रसिद्ध संगमोंपर सदा भगवान् शिव

  • सामुद्र, ऋषिसत्र आदि तीर्थोंकी महिमा तथा गौतमी-माहात्म्यका उपसंहार * २६७

और विष्णु स्थित रहते हैं। वहाँ महादेवजी गौतमेश्वरके नामसे विख्यात हैं। लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु भी वहाँ नित्य निवास करते हैं। मैंने जो वहाँ शिवकी स्थापना की है, वह शिवलिङ्ग ब्रह्मेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। देवताओंसहित मैंने अपने लिये कारण उपस्थित होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके उपकारके लिये भगवान् विष्णुका भी स्तवन किया था। वे विष्णु वहाँ चक्रपाणिके नामसे विख्यात हैं। वहीं ऐन्द्रतीर्थ भी है और उसीको हयग्रीवतीर्थ भी कहते हैं। वहाँ सोमतीर्थ भी है, जहाँ भगवान् शिव सोमेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हैं। एक समय इन्द्रने बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करके मेरे प्रसादसे अपना मनोरथ सिद्ध किया था। तबसे मैं भी वहीं सब लोगोंका उपकार करनेके लिये रहता हूँ, विष्णु और शिव तो वहाँ हैं ही। अग्निने जहाँ यज्ञ किया, वह स्थान आग्नेयतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। तदनन्तर आदित्यतीर्थ है, जहाँ वेदमय आदित्य प्रतिदिन मध्याह्नकालमें दूसरा रूप धारण करके मेरा, शिवका तथा विष्णुका दर्शन एवं उपासना करनेके लिये आते हैं। वहाँ मध्याह्नकालमें सब लोग वन्दनीय हैं, क्योंकि न मालूम सूर्य वहाँ किस रूपमें आ जायें। उसके सिवा पर्वतश्रेष्ठ इन्द्रगोपपर एक दूसरा तीर्थ भी है। वहाँ किसी कारणवश गिरिराज हिमालयने महान् शिवलिङ्गकी स्थापना की थी, अतः उसे अद्रितीर्थ कहते हैं। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला तथा शुभ है। इस प्रकार गौतमी गङ्गा ब्रह्मगिरिसे निकलकर जहाँ समुद्रमें मिली हैं, वहाँतकके कुछ तीर्थोंका मैंने संक्षेपसे वर्णन किया है। गौतमी गङ्गा वेद और पुराणोंमें भी प्रसिद्ध हैं। ऋषियोंद्वारा भी उनकी बड़ी ख्याति हुई है। सम्पूर्ण विश्वने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया है। उनका प्रभाव अत्यन्त महान् है। नारद! किसमें इतनी शक्ति है, जो गोदावरीकी महिमाका पूरा-पूरा वर्णन कर सके। जो भक्तिपूर्वक उनके गुणगानमें प्रवृत्त हो यथाकथंचित् उनकी महिमाका दिग्दर्शन कराता है, उसके ऐसा करनेमें निःसंदेह कोई अपराध नहीं है; इसलिये मैंने भी लोक-कल्याणके उद्देश्यसे अत्यन्त प्रयास करके गङ्गाके माहात्म्यको संक्षेपसे सूचित किया है। कौन गोदावरीके प्रत्येक तीर्थका प्रभाव बता सकता है। कहीं, किसी स्थानपर, किसी विशेष समयमें कोई उत्तम तीर्थ प्रकट होते हैं; परंतु गौतमीमें सर्वत्र और सदा ही तीर्थोंका वास है। वे मनुष्योंके लिये सब जगह और सब समय पवित्र हैं। उनके गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है। उनके लिये तो केवल नमस्कार करना ही उचित जान पड़ता है।

**नारदजीने कहा—**सुरेश्वर! आप गङ्गाको तीनों देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाली बताते हैं। ब्रह्मर्षि गौतमद्वारा लायी हुई लोकपावनी गङ्गा परम पवित्र और कल्याणमयी हैं। उनके आदि, मध्य और अन्तमें दोनों तटोंपर भगवान् विष्णु, शिव तथा आप व्याप्त हैं। उनकी महिमा सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती, आप पुनः संक्षेपसे उनका महत्त्व बतलाइये।

**ब्रह्माजी बोले—**बेटा! गङ्गा पहले मेरे कमण्डलुमें थीं, फिर भगवान्‌के चरणोंसे प्रकट हुईं। उसके बाद महादेवजीके जटा-जूटमें निवास करने लगीं। महर्षि गौतमने अपने ब्रह्मतेजके प्रभावसे यत्नपूर्वक भगवान् शिवकी आराधना की, जिससे ये ब्रह्मगिरिपर आयीं और वहाँसे चलकर पूर्व-समुद्रमें जा मिलीं। भगवती गोदावरी सर्वतीर्थमयी हैं। वे मनुष्योंको मनोवाञ्छित फल देती हैं। उनका प्रभाव सबसे बढ़कर है। मैं तीनों लोकोंमें कोई भी तीर्थ गोदावरीसे बड़ा नहीं मानता। उन्हींके प्रभावसे मनकी सारी अभिलाषा पूर्ण होती है। आज भी

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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


उनकी महिमाका यथावत् वर्णन कोई नहीं कर सकता। सब लोग भक्तिसे सदा उनकी वन्दना करते हैं। वे वस्तुतः साक्षात् ब्रह्म हैं। नारद! मुझे तो यही सबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात जान पड़ती है कि मेरी वाणीमें गङ्गाके गुणोंका वर्णन सुनकर भी तीनों लोकोंमें रहनेवाले सब प्राणियोंकी बुद्धि उन्हींकी ओर क्यों नहीं लग जाती।

नारदजीने कहा— भगवन्! आप धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके ज्ञाता और उपदेशक हैं। आपके वचनोंमें रहस्योंसहित छन्द (वेद), पुराण, स्मृति और धर्मशास्त्र आदि समस्त वाङ्मय प्रतिष्ठित है। अतः आप बताइये—तीर्थ, दान, यज्ञ, तप, देव-पूजन, मन्त्र-जप और सेवामें सबसे श्रेष्ठ क्या है? भगवन्! आप जैसा कहेंगे, वैसा ही होगा। उसके विपरीत कोई बात नहीं हो सकती। अतः मेरे इस संशयका निवारण कीजिये।

ब्रह्माजी बोले— नारद! सुनो, मैं रहस्यमय उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ। चार प्रकारके तीर्थ हैं। चार ही युग हैं। तीन गुण, तीन पुरुष और तीन ही सनातन देवता हैं। स्मृतियोंसहित वेद चार बताये गये हैं। पुरुषार्थ भी चार ही हैं और वाणीके भी चार ही भेद हैं। ये सब समान हैं। धर्म सर्वत्र एक ही है। क्योंकि वह सनातन है। साध्य और साधनके भेदसे उसके अनेक रूप माने गये हैं। धर्मके दो आश्रय हैं—देश और काल। कालके आश्रित जो धर्म है, वह सदा घटता-बढ़ता रहता है। युगोंके अनुसार उसमें एक-एक चरणकी न्यूनता होती जाती है। कालाश्रित धर्म भी देशमें सदा प्रतिष्ठित रहता है। युगोंका क्षय होनेपर भी देशाश्रित धर्मकी हानि नहीं होती। जो धर्म दोनों आश्रयोंसे हीन है, उसका अभाव हो जाता है। अतः देशके आश्रित रहनेवाला धर्म अपने चारों चरणोंके साथ प्रतिष्ठित होता है। देशाश्रित धर्म भिन्न-भिन्न देशोंमें तीर्थरूपसे स्थित रहता है। सत्ययुगमें धर्म देश और काल दोनोंके आश्रित होता है। त्रेतामें उसके एक चरणकी, द्वापरमें दो चरणोंकी और कलियुगमें उसके तीन चरणोंकी हानि होती है। द्वापर और कलिमें क्रमशः आधे और चौथाई रूपमें शेष रहकर धर्म चालू रहता है। कलिमें उसकी संकटमयी स्थिति होती है। जो इस प्रकार धर्मको जानता है, उसके धर्मकी हानि नहीं होती।

जो घरसे तीर्थयात्राके लिये निकलना चाहता है, उसके सामने अनेक प्रकारके विघ्न आते हैं; परंतु जो उन विघ्नोंके मस्तकपर पैर रखकर गङ्गाजीके पास नहीं पहुँचता, उसने अपने जीवनमें क्या फल पाया। गौतमीके प्रभावका कौन वर्णन कर सकता है। साक्षात् सदाशिव भी उसके वर्णनमें असमर्थ हैं। मैंने संक्षेपसे इतिहाससहित गङ्गाके माहात्म्यका प्रतिपादन किया है। चराचर जगत्में धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका जो भी साधन है, वह सब इस विस्तृत इतिहासमें मौजूद है। इसमें वेदोक्त श्रुतियोंका सम्पूर्ण रहस्य बताया गया है। जगत्के कल्याणके लिये जो उत्तम साधन, जो उत्तम नामवाला प्राचीन तीर्थ देखा गया है, उसीका वर्णन किया गया है। जो इस माहात्म्यका एक श्लोक अथवा एक पद भी भक्तिपूर्वक पढ़ता और सुनता है अथवा 'गङ्गा-गङ्गा' यों उच्चारण करता है, वह पुण्यका भागी होता है। गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य कलिके कलङ्कका विनाश करनेवाला, सब प्रकारकी सिद्धि और मङ्गल देनेवाला है। संसारमें यह समादरके योग्य है। इसके पढ़ने और सुननेसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। जो सौ योजन दूरसे भी 'गङ्गा-गङ्गा' का उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। तीनों लोकोंमें साढ़े तीन

६८- अनन्त वासुदेवकी महिमा तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके माहात्म्यका उपसंहार

  • अनन्त वासुदेवकी महिमा तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके माहात्म्यका उपसंहार * २६१

करोड़ तीर्थ हैं। वे सभी बृहस्पतिके सिंहराशिमें स्थित होनेपर गौतमी गङ्गामें स्नान करनेके लिये आते हैं।^१ बेटा! ये गौतमी मेरी आज्ञासे सदा सब मनुष्योंको स्नान करनेपर मोक्ष प्रदान करेंगी। हजार अश्वमेध और सौ वाजपेय-यज्ञ करनेपर जो फल मिलता है, वह इस माहात्म्यके श्रवणमात्रसे प्राप्त हो जाता है। नारद! जिसके घरमें यह मेरा कहा हुआ पुराण मौजूद है, उसे कलिकालका कोई भय नहीं है। यह उत्तम पुराण जिस किसी मनुष्यके सामने कहने योग्य नहीं है। श्रद्धालु, शान्त एवं वैष्णव महात्माके सामने ही इसका कीर्तन करना चाहिये। यह भोग और मोक्ष देनेवाला तथा पापोंका नाश करनेवाला है। इसके श्रवणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। जो अपने हाथसे लिखकर यह पुस्तक ब्राह्मणोंको देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर फिर कभी गर्भमें नहीं आता।


अनन्त वासुदेवकी महिमा तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके माहात्म्यका उपसंहार

**मुनि बोले—**देव! भगवान्‌की यह कथा सुननेसे हमें तृप्ति नहीं होती। आप पुनः परम गोपनीय रहस्यका वर्णन कीजिये। अनन्त वासुदेवकी महिमाका आपने भलीभाँति वर्णन नहीं किया। अब हम उसीको सुनना चाहते हैं। आप विस्तारपूर्वक बतलायें।

**ब्रह्माजीने कहा—**मुनिवरो! अनन्त वासुदेवका माहात्म्य सारसे भी अत्यन्त सारतर वस्तु है। वह इस पृथ्वीपर दुर्लभ है। विप्रगण! आदिकल्पकी बात है, मैंने देवशिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माको बुलाकर कहा—'तुम पृथ्वीपर भगवान् वासुदेवकी शिलामयी प्रतिमा बनाओ, जिसका दर्शन करके इन्द्र आदि देवता और मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् वासुदेवकी आराधना करें और उनकी कृपासे निर्भय होकर रहें।' मेरी बात सुनकर विश्वकर्माने तत्काल ही एक सुन्दर और सुदृढ़ प्रतिमा बनायी, जिसके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे। भगवान्‌का वह विग्रह सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और अत्यन्त प्रभावशाली था। नेत्र कमलदलके समान विशाल थे। वक्षः-स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। हृदयदेश वनमालासे आवृत हो रहा था। मस्तकपर मुकुट और भुजाओंमें अङ्गद शोभा पाते थे। कंधे मोटे जान पड़ते थे। कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे। श्याम अङ्गपर पीताम्बरकी अपूर्व शोभा थी। इस प्रकार वह प्रतिमा दिव्य थी। स्थापनाका समय आनेपर स्वयं मैंने ही गूढ़ मन्त्रोंद्वारा उसे स्थापित किया।^२ उस समय देवराज इन्द्र ऐरावतपर सवार हो समस्त देवताओंके साथ मेरे लोकमें


१. गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥
तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानि भुवनत्रये। तानि स्नातुं समायान्ति गङ्गायां सिंहगे गुरौ॥
(१७५। ८२-८३)

२. चकार प्रतिमां शुद्धां शङ्खचक्रगदाधराम्॥
सर्वलक्षणसंयुक्तां पुण्डरीकायतेक्षणाम्। श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्तामत्युग्रां प्रतिमोत्तमाम्॥
वनमालावृतोरस्कां मुकुटाङ्गदधारिणीम्। पीतवस्त्रां सुपीनांसां कुण्डलाभ्यामलंकृताम्॥
एवं सा प्रतिमा दिव्या गुह्यमन्त्रैस्तदा स्वयम्। प्रतिष्ठाकालमासाद्य मयासौ निर्मिता पुरा॥
(१७६। ८-११)

२७० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

आये। उन्होंने स्नान-दान आदिके द्वारा भगवत्प्रतिमाको प्रसन्न किया और उसे लेकर वे अपनी अमरावती पुरीमें चले गये। वहाँ इन्द्रभवनमें उसे पधराकर उन्होंने मन, वाणी और शरीरको संयममें रखते हुए दीर्घकालतक भगवान्‌की आराधना की और उन्हींके प्रसादसे वृत्र एवं नमुचि आदि क्रूर राक्षसों तथा भयंकर दानवोंका संहार करके तीनों लोकोंका राज्य भोगा।

द्वितीय युग त्रेता आनेपर महापराक्रमी राक्षसराज रावण बड़ा प्रतापी हुआ। उसने दस हजार वर्षोंतक निराहार और जितेन्द्रिय रहकर अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करते हुए भारी तपस्या की, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर थी। उस तपस्यासे संतुष्ट होकर मैंने रावणको वरदान दिया—‘तुम्हें सम्पूर्ण देवताओं, दैत्यों, नागों और राक्षसोंमेंसे कोई नहीं मार सकेगा। शापके भयंकर प्रहारसे भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी। तुम यमदूतोंसे भी अवध्य रहोगे।’ ऐसा वर पाकर वह राक्षस सम्पूर्ण यक्षों और उनके राजा धनाध्यक्ष कुबेरको भी परास्त करके इन्द्रको भी जीतनेके लिये उद्यत हुआ। उसने देवताओंके साथ बड़ा भयंकर संग्राम किया। उसके पुत्रका नाम मेघनाद था। मेघनादने इन्द्रको जीत लिया, अतः वह इन्द्रजित्‌के नामसे प्रसिद्ध हुआ। तदनन्तर बलवान् रावणने अमरावतीपुरीमें प्रवेश करके देवराज इन्द्रके सुन्दर भवनमें भगवान् वासुदेवकी प्रतिमा देखी, जो अञ्जनके समान श्यामवर्ण और समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी। पद्मपत्रके समान विशाल नेत्र, वनमालासे ढके हुए वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका सुन्दर चिह्न, मस्तकपर मुकुट, भुजाओंमें भुजबंध, हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म, शरीरपर पीताम्बर, चार भुजाएँ तथा अङ्गोंमें समस्त आभूषण शोभा दे रहे थे। वह प्रतिमा समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाली थी। रावणने यहाँ रखे हुए ढेर-के-ढेर रत्नोंको तो छोड़ दिया और उस सुन्दर प्रतिमाको तुरंत ही पुष्पक विमानसे लङ्कामें भेज दिया।

वहाँ रावणके छोटे भाई धर्मात्मा विभीषण नगराध्यक्ष थे। वे सदा भगवान् नारायणके भजनमें लगे रहते थे। देवराजकी भूमिसे आयी हुई उस दिव्य प्रतिमाको देखकर उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। विभीषणने प्रसन्नचित्तसे मस्तक झुकाकर भगवान्‌को प्रणाम किया और कहा—‘आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरी तपस्याका फल मिल गया।’ यों कहकर धर्मात्मा विभीषण बारंबार भगवान्‌को प्रणाम करके अपने बड़े भाईके पास गये और हाथ जोड़कर बोले—‘राजन्! आप वह प्रतिमा देकर मुझपर कृपा कीजिये। मैं उसकी आराधना करके भवसागरसे पार होना चाहता हूँ।’ भाईकी बात सुनकर रावणने कहा—‘वीर! तुम प्रतिमा ले लो, मैं उसे लेकर क्या करूँगा। मैं तो ब्रह्माजीकी आराधना करके तीनों लोकोंपर विजय पा रहा हूँ।’ विभीषण बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने वह कल्याणमयी प्रतिमा ले ली और उसके द्वारा एक सौ आठ वर्षोंतक भगवान् विष्णुकी आराधना की। इससे उन्होंने अणिमा आदि आठों सिद्धियोंके साथ अजर-अमर रहनेका वरदान प्राप्त कर लिया।

रावण बड़ा पापी और क्रूर राक्षस था। उसने देवता, गन्धर्व, किंनर, लोकपाल, मनुष्य, मुनि और सिद्धोंको भी युद्धमें जीतकर उनकी स्त्रियोंको हर लिया और लङ्का नगरीमें लाकर रखा। फिर सीताके लिये मोहित होकर उसने उनको भी हर लानेका प्रयत्न किया। श्रीरामके सम्मुख जानेमें उसे भय होता था; इसलिये मारीचको सुवर्णमय

  • अनन्त वासुदेवकी महिमा तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके माहात्म्यका उपसंहार * २७१

मृगके रूपमें भेजकर उन्हें आश्रमसे दूर हटा दिया और सीताको अकेली पाकर हर लिया। इसका पता लगनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने रावणको मार डालनेका निश्चय किया। इस कार्यमें सुग्रीव सहायक हुए। सुग्रीवका वालीके साथ वैर था, अतः श्रीरामने वालीको मारकर सुग्रीवको किष्किन्धाके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और अङ्गदको युवराज बनाया। फिर हनुमान्, नल, नील, जाम्बवान्, पनस, गवय, गवाक्ष और पाठीन आदि असंख्य महाबली वानरोंके साथ कमलनयन श्रीरामने लङ्काकी यात्रा की। उन्होंने समुद्रमें पर्वतोंकी बड़ी-बड़ी चट्टानें डालकर पुल बँधाया और विशाल सेनाके साथ समुद्रको पार किया। रावणने राक्षसोंको साथ लेकर भगवान् श्रीरामके साथ घोर संग्राम किया। परम पराक्रमी श्रीरघुनाथजीने महोदर, प्रहस्त, निकुम्भ, कुम्भ, नरान्तक, यमान्तक, मालाढ्य, माल्यवान्, इन्द्रजित्, कुम्भकर्ण तथा रावणको मारकर विदेहकुमारी सीताको अग्निपरीक्षाद्वारा शुद्ध प्रमाणित किया और विभीषणको राज्य दे भगवान् वासुदेवकी प्रतिमाको साथ लेकर वे पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए और अनायास ही पूर्वजोंद्वारा पालित अयोध्या नगरीमें जा पहुँचे। भक्तवत्सल श्रीरघुनाथजीने अपने छोटे भाई भरत और शत्रुघ्नको भिन्न-भिन्न राज्योंपर अभिषिक्त किया और स्वयं सम्राट्की भाँति समस्त भूमण्डलके राज्यपर आसीन हुए। उन्होंने अपने पुरातन स्वरूप श्रीविष्णुकी उस प्रतिमाका आराधन करते हुए समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका ग्यारह हजार वर्षोंतक पालन किया। उसके बाद वे अपने वैष्णव धाममें प्रवेश कर गये। उस समय श्रीरामने वह प्रतिमा समुद्रको दे दी और कहा—'अपने जल और रत्नोंके साथ तुम इस प्रतिमाकी भी रक्षा करना।'

द्वापर आनेपर जब जगदीश्वर भगवान् विष्णु पृथ्वीकी प्रार्थनासे कंस आदिका वध करनेके लिये बलभद्रजीके साथ वसुदेवजीके कुलमें अवतीर्ण हुए, उस समय नदियोंके स्वामी समुद्रने उस परम दुर्लभ पुण्यमय पुरुषोत्तमक्षेत्रमें सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये उक्त प्रतिमाको प्रकट किया, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाली थी। तबसे उस मुक्तिदायक क्षेत्रमें ही देवाधिदेव अनन्त वासुदेव विराजमान हैं, जो मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले हैं। जो लोग मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सर्वेश्वर भगवान् अनन्त वासुदेवकी भक्तिपूर्वक शरण लेते हैं, वे परमपदको प्राप्त होते हैं। भगवान् अनन्तका एक बार दर्शन, भक्तिपूर्वक पूजन और प्रणाम करके मनुष्य राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंसे दसगुना फल पाता है। वह समस्त भोग-सामग्रीसे सम्पन्न छोटी-छोटी घंटियोंसे सुशोभित, सूर्यके समान तेजस्वी और इच्छानुसार चलनेवाले विमानसे वैकुण्ठधाममें जाता है। उस समय दिव्याङ्गनाएँ उसकी सेवामें रहती हैं और गन्धर्व उसके यशका गान करते हैं। वह अपने साथ कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंका भी उद्धार कर देता है। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने भगवान् अनन्तके सम्बन्धमें कुछ निवेदन किया। कौन ऐसा मनुष्य है, जो सौ वर्षोंमें भी उनके गुणोंका वर्णन कर सके।

इस प्रकार मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाले परम दुर्लभ पुरुषोत्तमक्षेत्र तथा अनन्त वासुदेवके माहात्म्यका वर्णन किया गया। पुरुषोत्तमक्षेत्रमें शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और पीताम्बर धारण करनेवाले कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं, जिन्होंने कंस और केशीका संहार किया था। जो लोग वहाँ देव-दानव-वन्दित श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका दर्शन करते हैं, वे धन्य हैं। भगवान्

२७२* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

श्रीकृष्ण तीनों लोकोंके स्वामी तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंके दाता हैं। जो सदा उनका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं। जो सदा श्रीकृष्णमें अनुरक्त रहते हैं, रातको सोते समय श्रीकृष्णका चिन्तन करते हैं और फिर सोकर उठनेके बाद श्रीकृष्णका स्मरण करते हैं, वे शरीर त्यागनेके बाद श्रीकृष्णमें ही प्रवेश करते हैं—ठीक वैसे ही जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम किया हुआ हविष्य अग्निमें लीन हो जाता है।१ अतः मुनिवरो! मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको पुरुषोत्तमक्षेत्रमें सदा यत्नपूर्वक कमलनयन श्रीकृष्णका दर्शन करना चाहिये। जो मनीषी पुरुष शयन और जागरणकालमें श्रीकृष्ण, बलभद्र तथा सुभद्राका दर्शन करते हैं, वे श्रीहरिके धाममें जाते हैं। जो हर समय भक्तिपूर्वक पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, रोहिणीनन्दन बलभद्र और सुभद्रादेवीका दर्शन करते हैं, वे भगवान् विष्णुके लोकमें जाते हैं। जो वर्षाके चार महीनोंमें पुरुषोत्तमक्षेत्रके भीतर निवास करते हैं, उन्हें सारी पृथ्वीकी तीर्थयात्रासे भी अधिक फल प्राप्त होता है। जो इन्द्रियोंको जीतकर और क्रोधको वशीभूत करके सदा पुरुषोत्तमक्षेत्रमें ही निवास करते हैं, वे तपस्याका फल पाते हैं। मनुष्य अन्य तीर्थोंमें दस हजार वर्षोंतक तपस्या करके जो फल पाता है, उसे पुरुषोत्तमक्षेत्रमें एक ही मासमें प्राप्त कर लेता है। तपस्या, ब्रह्मचर्यपालन तथा आसक्ति-त्यागसे जो फल मिलता है, उसे मनीषी पुरुष वहाँ सदा ही पाते रहते हैं। सब तीर्थोंमें स्नान-दान करनेका जो पुण्य फल बताया गया है, वह मनीषी पुरुषोंको यहाँ सर्वदा प्राप्त होता है। विधिपूर्वक तीर्थसेवन तथा व्रत और नियमोंके पालनसे जो फल बताया गया है, उसे वहाँ इन्द्रियसंयमपूर्वक पवित्रतासे रहनेवाला पुरुष प्रतिदिन प्राप्त करता है। नाना प्रकारके यज्ञोंसे मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह जितेन्द्रिय पुरुषको वहाँ प्रतिदिन मिला करता है। जो पुरुषोत्तमक्षेत्रमें कल्पवृक्ष (अक्षयवट)-के पास जाकर शरीरत्याग करते हैं, वे निःसंदेह मुक्त हो जाते हैं। जो मानव बिना इच्छाके भी वहाँ प्राणत्याग करता है, वह भी दुःखसे मुक्त हो दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेता है। कृमि, कीट, पतङ्ग आदि तथा पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हुए जीव भी वहाँ देहत्याग करनेपर परमगतिको प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य एक बार भी श्रद्धापूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन कर लेता है, वह सहस्रों पुरुषोंमें उत्तम है। भगवान् प्रकृतिसे परे और पुरुषसे भी उत्तम हैं। इसलिये वे वेद, पुराण तथा इस लोकमें पुरुषोत्तम कहलाते हैं। जो पुराण और वेदान्तमें परमात्मा कहे गये हैं, वे ही सम्पूर्ण जगत्‌का उपकार करनेके लिये पुरुषोत्तमरूपसे विराजमान हैं।२ पुरुषोत्तमक्षेत्रके भीतर मार्गमें, श्मशानभूमिमें, घरके मण्डपमें, सड़कों और गलियोंमें—जहाँ कहीं इच्छा या अनिच्छासे भी शरीरत्याग करनेवाला मनुष्य मोक्षका भागी होता है। पुरुषोत्तमतीर्थके समान किसी तीर्थका माहात्म्य न हुआ है और न होगा। मैंने उस क्षेत्रके गुणोंका एक अंशमात्र यहाँ बताया है। कौन पुरुष सौ वर्षोंमें भी उसके समस्त गुणोंका


१. कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति रात्रौ च कृष्णं पुनरुत्थिता ये।
ते भिन्नदेहाः प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशम्॥ (१७७।५)
२. प्रकृतेः स परो यस्मात् पुरुषादपि चोत्तमः। तस्माद् वेदे पुराणे च लोकेऽस्मिन् पुरुषोत्तमः॥
योऽसौ पुराणे वेदान्ते परमात्मेत्युदाहृतः। आस्ते विश्वोपकाराय तेनासौ पुरुषोत्तमः॥
(१७७।२२-२३)

६९- कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा

* कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा * २७३


वर्णन कर सकता है। मुनिवरो! यदि तुम सनातन मोक्ष पाना चाहते हो तो आलस्य छोड़कर उस पवित्र तीर्थमें निवास करो।

व्यासजी कहते हैं—अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर मुनियोंने वहाँ निवास किया और परमपद प्राप्त कर लिया। द्विजवरो! यदि आपलोग भी मोक्ष प्राप्त करना चाहते हों तो परम उत्तम पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करें।


कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा

व्यासजी कहते हैं—मुनिवरो! पुरुषोत्तमक्षेत्र सम्पूर्ण जीवोंके लिये सुखदायी है। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका फल देनेवाला है। उस तीर्थमें कण्डु नामके एक महातेजस्वी मुनि रहा करते थे, जो परम धार्मिक, सत्यवादी, पवित्र, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने इन्द्रियोंको जीतकर क्रोधपर अधिकार प्राप्त कर लिया था। वे वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् थे और भगवान् पुरुषोत्तमकी आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त कर चुके थे। उनके सिवा और भी बहुत-से मुनि वहाँ उत्तम व्रतका पालन करते हुए सिद्ध हो चुके हैं।

मुनियोंने पूछा—साधुशिरोमणे! कण्डु कौन थे और उन्होंने किस प्रकार वहाँ परमगति प्राप्त की? हम उनका चरित्र सुनना चाहते हैं, बताइये।

व्यासजी बोले—मुनीश्वरो! कण्डुमुनिकी कथा बड़ी मनोहर है। मैं संक्षेपसे ही कहूँगा, सुनो। गोमती नदीके परम मनोरम एकान्त तटपर, जहाँ कन्द, मूल, फल, समिधा, पुष्प और कुश आदिकी अधिकता थी, कण्डुमुनिका आश्रम था। वहाँ सभी ऋतुओंके फल और फूल सुलभ थे। केलोंका उद्यान उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहा था। वहाँ कण्डुमुनिने व्रत, उपवास, नियम, स्नान, मौन और संयम आदिके द्वारा बड़ी भारी एवं अत्यन्त अद्भुत तपस्या की। वे ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निका ताप सहते, वर्षामें खुली वेदीपर सोते और हेमन्त-ऋतुमें भीगे वस्त्र धारण करके कठोर तपस्या करते थे। मुनिकी तपस्याका बढ़ता हुआ प्रभाव देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और विद्याधरोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे कहने लगे—'इनका महान् धैर्य अद्भुत है। इनकी कठोर तपस्या नितान्त आश्चर्यजनक है।' उन्हें तपस्यामें स्थित देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उनके भयसे व्याकुल हो आपसमें परामर्श करने लगे। वे उनकी तपस्यामें विघ्न डालना चाहते थे। त्रिभुवनके स्वामी इन्द्र देवताओंका अभिप्राय जानकर एक सुन्दरी अप्सरासे बोले—'प्रम्लोचे! तुम शीघ्र कण्डुमुनिके आश्रमपर जाओ। मुनि वहाँ तपस्या करते हैं। उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये ही तुम्हें भेजा जाता है। सुन्दरी! तुम शीघ्र ही उनके चित्तमें क्षोभ उत्पन्न कर दो।'

प्रम्लोचा बोली—सुरश्रेष्ठ! मैं सदा आपकी आज्ञाका पालन करती हूँ। किंतु इस कार्यमें तो मेरे जीवनका ही संदेह है। मैं मुनिवर कण्डुसे बहुत डरती हूँ। वे ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें स्थित हैं। अत्यन्त उग्र हैं। उनकी तपस्या बहुत तीव्र है। वे अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी हैं। मुझे अपनी तपस्यामें विघ्न डालने आयी हुई जानकर परम तेजस्वी कण्डुमुनि कुपित हो उठेंगे और दुःसह शाप दे देंगे।

यह सुनकर इन्द्रने कहा—'सुन्दरी! मैं कामदेव,

२७४

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

ऋतुराज वसन्त और दक्षिण समीरको तुम्हारी सहायतामें देता हूँ। इन सबके साथ उस स्थानपर जाओ, जहाँ वे महामुनि रहते हैं।' इन्द्रका यह कथन सुनकर मनोहर नेत्रोंवाली प्रम्लोचा कामदेव आदिके साथ आकाशमार्गसे कण्डुमुनिके आश्रमपर गयी। वहाँ पहुँचकर उसने एक बहुत सुन्दर वन देखा। तीव्र तपस्यामें लगे हुए पापरहित मुनिवर कण्डु भी आश्रमपर ही दिखायी दिये। प्रम्लोचा और कामदेव आदिने देखा—वह वन नन्दनवनके समान रमणीय था। सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले सुन्दर पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। नाना प्रकारके पक्षी वृक्षोंपर बैठकर अपने श्रवणसुखद कलरवोंसे उस वनको मुखरित कर रहे थे। अप्सराने क्रमशः सम्पूर्ण वनका निरीक्षण किया। उस परम अद्भुत मनोहर काननकी शोभा देख उसके नेत्र आश्चर्य-चकित हो उठे। उसने वायु, कामदेव और वसन्तसे कहा—'अब आपलोग पृथक्-पृथक् मेरी सहायता करें।' उन्होंने 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकृति दे दी। तब प्रम्लोचा बोली—'अब मैं मुनिके पास जाऊँगी। जो इन्द्रियरूपी अश्वोंसे जुटे हुए देहरूपी रथके सारथि बने हुए हैं, उन्हें आज कामबाणसे आहत करके ऐसी दशाको पहुँचा दूँगी कि मनरूपी बागडोर उनके काबूसे बाहर हो जायगी। इस प्रकार उन्हें मैं अयोग्य सारथि सिद्ध कर दिखाऊँगी।' यों कहकर वह उस स्थानकी ओर चल दी, जहाँ मुनि निवास करते थे। मुनिकी तपस्याके प्रभावसे वहाँके हिंसक जीव भी शान्त हो गये थे। नदीके तटपर, जहाँ कोयलकी मीठी तान सुनायी देती थी, वह ठहर गयी। थोड़ी देरतक तो वह खड़ी रही, फिर उसने संगीत छेड़ दिया। इसी समय वसन्तने भी अपना पराक्रम दिखाया। समय नहीं होनेपर भी समस्त काननमें मधु-ऋतुकी मनोहर शोभा छा गयी। कोकिलकी काकलीसे माधुर्यकी वर्षा होने लगी। मलयवायु मनोहर सुगन्ध लिये मन्द-मन्द गतिसे बहने लगी और छोटे-बड़े सभी वृक्षोंके पवित्र पुष्प धीरे-धीरे भूतलपर गिरने लगे। कामने अपने फूलोंका बाण संभाला और मुनिके समीप जाकर उनके मनको विचलित कर दिया। संगीतकी मधुर ध्वनि सुनकर मुनिके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कामबाणसे अत्यन्त पीड़ित हो जहाँ सुन्दरी अप्सरा गीत गा रही थी, गये। मुनिने अप्सराको देखा और अप्सराने भी मुनिपर दृष्टिपात किया। उनके नेत्र आश्चर्यसे खिल गये। चादर खिसककर गिर पड़ी। मुनिके मनमें विकलता छा गयी। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे पूछने लगे—'सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी हो? तुम्हारी मुसकान बड़ी मनोहर है। सुभ्रू! तुम मेरे मनको मोहे लेती हो। सुमध्यमे! अपना सच्चा परिचय दो।'

प्रम्लोचा बोली—मुने! मैं आपकी सेविका हूँ और फूल लेनेके लिये यहाँ आयी हूँ। शीघ्र आज्ञा दीजिये। मैं आपकी क्या सेवा करूँ?

अप्सराकी यह बात सुनकर मुनिका धैर्य छूट गया। उन्होंने मोहित होकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे साथ लेकर अपने आश्रममें प्रवेश किया। यह देख कामदेव, वायु और वसन्त कृतकृत्य हो जैसे आये थे, उसी प्रकार स्वर्गको लौट गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने इन्द्रसे प्रम्लोचा और मुनिकी सारी चेष्टा कह सुनायी। सुनकर इन्द्र और सम्पूर्ण देवताओंका चित्त प्रसन्न हो गया। कण्डुने अप्सराके साथ आश्रममें प्रवेश करते ही अपना रूप कामदेवके समान मनोहर एवं तरुण बना लिया। दिव्य वस्त्र और आभूषण धारण कर लिये। देखनेमें उनकी अवस्था सोलह वर्षोंकी जान पड़ती थी। मुनिकी वह शक्ति

९६- प्रम्लोचा और कण्डुमुनि

* कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा * २७५

देखकर प्रम्लोचाको बड़ा आश्चर्य हुआ। 'अहो, इनकी तपःशक्ति अद्भुत है!' यों कहकर वह बहुत प्रसन्न हुई। कण्डुमुनि स्नान, संध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजन, व्रत, उपवास, नियम और ध्यान—सब छोड़कर रात-दिन उसीके साथ विहार करने लगे। इसीमें वे आनन्द मानते थे। उनका हृदय कामदेवके वशीभूत हो गया था। अतः वे अपनी तपस्याकी हानि नहीं समझ पाते थे। इस प्रकार कण्डुमुनि उसके साथ सांसारिक विषयभोगमें आसक्त हो सौसे कुछ अधिक वर्षोंतक मन्दराचलकी गुफामें पड़े रहे। एक दिन प्रम्लोचाने महाभाग कण्डुमुनिसे कहा—'ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्गमें जाना चाहती हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे जानेकी आज्ञा दें।' मुनिका मन तो उसीमें आसक्त हो रहा था। उसके इस प्रकार पूछनेपर वे बोले—'कल्याणी! कुछ दिन और ठहरो।' तब उसने पुनः सौ वर्षोंसे कुछ अधिक कालतक उन कण्डुमुनिके साथ विषय भोगा। तदनन्तर उसने पुनः जानेकी आज्ञा माँगी, किंतु मुनिने स्वीकार नहीं किया। अतः उसे लगभग दो सौ वर्षोंतक और ठहरना पड़ा। वह जब-जब उनसे देवलोकमें जानेकी आज्ञा माँगती, तब-तब वे उसे यही उत्तर देते—कुछ दिन और ठहरो। प्रम्लोचा एक तो मुनिके शापसे डरती थी। दूसरे उसमें दक्षिणा नायिकाकी स्वाभाविक उदारता थी और तीसरे वह प्रणयभङ्गकी पीड़ाको जानती थी। इसलिये मुनिको छोड़ न सकी। महर्षि कामभोगमें आसक्त हो दिन-रात उसके साथ रमण करते रहे। किंतु तृप्ति न हुई। उसके प्रति नित्य नूतन प्रेम बढ़ता गया।

एक दिन कण्डुमुनि बड़ी उतावलीके साथ आश्रमसे बाहर जाने लगे। अप्सराने पूछा—'कहाँ चले?' मुनिने उत्तर दिया—'शुभे! दिन बीत चला है। संध्योपासन कर लूँ, नहीं तो कर्मका लोप हो जायगा।' प्रम्लोचाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने हँसकर पूछा—'सब धर्मोंके ज्ञाता महात्माजी! क्या आज ही आपका दिन बीता है? आपकी यह बात सुनकर किसको आश्चर्य न होगा।'

मुनि बोले—कल्याणी! अभी प्रातःकाल ही तो तुम इस नदीके सुन्दर तटपर आयी हो। उसी समय मैंने तुम्हें देखा, परिचय पूछा और तुम मेरे साथ आश्रममें आयी। अब वह दिन बीता है और यह संध्याका समय उपस्थित हुआ है। फिर यह परिहास किसलिये? सच्ची बात बताओ।

प्रम्लोचाने कहा—ब्रह्मन् ! यह ठीक है कि मैं प्रातःकालमें ही आयी थी; इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। किंतु आज तबसे सैकड़ों वर्ष बीत गये।

यह सुनकर मुनिको बड़ा भय हुआ। उन्होंने विशाल नेत्रोंवाली अप्सरासे पूछा—'भीरु! बताओ

२७६

* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

तो सही, तुम्हारे साथ निरन्तर रमण करते हुए अबतक मेरा कितना समय बीता है?'

**प्रम्लोचा बोली—**मुने! मेरे साथ आपके नौ सौ सात वर्ष, छः महीने और तीन दिन बीते हैं।

**ऋषिने कहा—**शुभे! क्या यह सत्य कहती हो अथवा परिहासकी बात है? मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे साथ एक ही दिन रहा हूँ।

**प्रम्लोचा बोली—**ब्रह्मन्! आपके समीप मैं झूठ कैसे बोलूँगी। विशेषतः ऐसे अवसरपर, जब कि आप धर्म-मार्गका अनुसरण करते हुए पूछ रहे हैं।

अप्सराकी बात सुनकर मुनिको बड़ा कष्ट हुआ। वे स्वयं ही अपनी निन्दा करते हुए बोले—'हाय, मुझ दुराचारीको धिक्कार है। हाय, मेरी तपस्या नष्ट हो गयी। ब्रह्मवेत्ताओंका जो धन है, वह चला गया और मेरा विवेक भी छिन गया। जान पड़ता है, मनुष्योंको मोहमें डालनेके लिये ही किसीने युवती नारीकी सृष्टि की है। मुझे तो अपने मनको जीतकर क्षुधा-पिपासा, राग-द्वेष और जरा-मृत्यु—इन छहों ऊर्मियोंसे अतीत परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। इसके विपरीत जिसने मेरी ऐसी दुर्गति की है, उस कामरूपी महान् ग्रहको धिक्कार है। यह काम नरकग्राममें ले जानेवाला मार्ग है। इसने आज मेरे सम्पूर्ण वेदोंके स्वाध्याय, व्रत और समस्त साधनोंपर पानी फेर दिया।'

इस प्रकार स्वयं ही अपनी निन्दा करके वे धर्मके ज्ञाता मुनि पास ही बैठी हुई उस अप्सरासे बोले—'पापिनी! तेरी जहाँ इच्छा हो, चली जा। तुझे जो करना था, उसे तूने पूरा कर लिया। मैं तुझे अपने क्रोधकी प्रचण्ड आगसे जो भस्म नहीं करता, इसमें एक कारण है—सत्पुरुषोंकी मैत्री सात पग एक साथ चलनेसे ही हो जाती है। मैं तो तेरे साथ चिरकालतक निवास कर चुका हूँ। अथवा तेरा क्या दोष है? तेरी क्या हानि करूँ? सारा दोष तो मेरा ही है, क्योंकि मैं ही ऐसा अजितेन्द्रिय निकला! तू तो इन्द्रका प्रिय करनेके लिये आयी थी और मेरी तपस्याका सत्यानाश कर चुकी। अपने कटाक्षके महामोहमय मन्त्रसे तूने मुझे घृणित बना दिया। अरी, अब जा! जा! चली जा!!'

इस प्रकार मुनिवर कण्डुने जब क्रोधपूर्वक उसे फटकारा, तब वह काँपती हुई आश्रमसे बाहर निकली और आकाशमार्गसे जाने लगी। उसके अङ्ग-अङ्गसे पसीनेकी बूँदें निकल रही थीं और वह वृक्षोंके पल्लवोंसे उन्हें पोंछती जाती थी। ऋषिने उसके उदरमें जो गर्भ स्थापित किया था, वह पसीनेके रूपमें ही बाहर निकल गया। वृक्षोंने उन स्वेद-बिन्दुओंको ग्रहण किया और वायुने इन सबको एकत्रित करके एक गर्भका रूप दिया। फिर चन्द्रमाने अपनी अमृतमयी किरणोंसे उस गर्भको धीरे-धीरे पुष्ट किया। उससे मारिषा नामकी कन्या उत्पन्न हुई, जो वृक्षोंकी पुत्री कहलायी। उसके नेत्र बड़े मनोहर थे। वही प्राचेतसोंकी पत्नी और दक्षकी जननी हुई।

इधर महर्षि कण्डु तपस्या क्षीण होनेपर श्रीविष्णुके निवास-स्थान पुरुषोत्तमक्षेत्रको गये। वहाँ सम्पूर्ण देवताओंसे सुशोभित श्रीहरिका दर्शन किया। ब्राह्मण आदि चारों वर्णों और आश्रमोंके लोग भगवान्‌की सेवामें उपस्थित थे। पुरुषोत्तमक्षेत्र और भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करके मुनिने अपनेको कृतकृत्य माना और वहाँ अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मपारस्तोत्रका जप करते हुए वे भगवान्‌की आराधना करने लगे।

९७- कण्डुमुनिके द्वारा ब्रह्मपारस्तोत्रका जप

* कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा * २७७

**मुनि बोले—**व्यासजी! हम परम कल्याणमय ब्रह्मपारस्तोत्रको श्रवण करना चाहते हैं, जिसका जप करते हुए कण्डुमुनिने भगवान् विष्णुकी आराधना की थी।

**व्यासजीने कहा—**भगवान् विष्णु सबके परम पार (अन्तिम प्राप्य) हैं; वे अपार भवसागरसे पार उतारनेवाले, पर-शब्द-वाच्य, आकाश आदि पञ्च महाभूतोंसे परे और परमात्मस्वरूप हैं। वेदोंकी भी पहुँचसे परे होनेके कारण उन्हें ब्रह्मपार कहते हैं। वे दूसरोंके लिये पारस्वरूप हैं—उन्हें पाकर सब प्राणी सदाके लिये पार हो जाते हैं। वे परके भी पर—इन्द्रिय, मन आदिके भी अगोचर हैं। सबके पालक और सबकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। वे कारणमें स्थित होते हुए भी स्वयं ही कारणरूप हैं। कारणके भी कारण हैं। परम कारणभूत प्रकृतिके कारण भी वे ही हैं। कार्योंमें भी उन्हींकी स्थिति है। इस प्रकार कर्म और कर्ता आदि अनेक रूप धारण करके वे सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा करते हैं। ब्रह्म ही प्रभु है, ब्रह्म ही सर्वस्वरूप है, ब्रह्म ही प्रजापति तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाला है। वह ब्रह्म अविनाशी, नित्य और अजन्मा है। वही क्षय आदि सम्पूर्ण विकारोंके सम्पर्कसे रहित भगवान् विष्णु है। वे भगवान् पुरुषोत्तम ही अविनाशी, अजन्मा एवं नित्य ब्रह्म हैं। उनके प्रभावसे मेरे राग आदि समस्त दोष नष्ट हो जायँ।

मुनिके उस ब्रह्मपारस्तोत्रका जप सुनकर और उनकी सुदृढ़ पराभक्तिको जानकर भक्तवत्सल भगवान् पुरुषोत्तम बड़े प्रसन्न हुए और उनके पास जाकर बोले—'मुने! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। सुव्रत! तुम कोई वर माँगो।' देवाधिदेव भगवान् चक्रपाणिके ये वचन सुनकर मुनिने सहसा आँखें खोल दीं और देखा, भगवान् सामने खड़े हैं। उनका श्रीअङ्ग तीसीके फूलकी भाँति श्याम है। नेत्र पद्मपत्रके समान विशाल हैं। हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा शोभा पाते हैं। माथेपर मुकुट और भुजाओंमें भुजबन्ध सुशोभित हैं। चार भुजाएँ हैं। अङ्ग-अङ्गसे उदारता टपकती है। सुन्दर शरीरपर पीताम्बर शोभा दे रहा है। श्रीवत्स-चिह्नसे युक्त वक्षःस्थल वनमालासे विभूषित है। श्रीहरि समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त दिखायी देते हैं। उनके अङ्गोंमें सब प्रकारके रत्नमय आभूषण शोभा पाते हैं। श्रीअङ्गमें दिव्य चन्दन लगा है और दिव्य हार उनकी शोभा बढ़ा रहा है।* इस प्रकार भगवान्‌की झाँकी देखकर


* अतसीपुष्पसंकाशं पद्मपत्रायतेक्षणम्। शङ्खचक्रगदापाणिं मुकुटाङ्गदधारिणम्॥
चतुर्बाहुमुदाराङ्गं पीतवस्त्रधरं शुभम्। श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्तं वनमालाविभूषितम्॥
सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वरत्नविभूषितम्। दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गं दिव्यमाल्यविभूषितम्॥
(१७८। १२४—१२६)

९८- भगवान् विष्णुका कण्डुमुनिको प्रत्यक्ष दर्शन देना

२७८

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

कण्डुमुनिके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा—'आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरी तपस्याका फल मिल गया।' यों कहकर मुनिने भगवान्‌की स्तुति आरम्भ की।

कण्डु बोले— नारायण! हरे! श्रीकृष्ण! श्रीवत्साङ्क! जगत्पते! जगद्बीज! जगद्धाम! जगत्साक्षिन्! आपको नमस्कार है। अव्यक्त विष्णो! आप ही सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। प्रकृति और पुरुष दोनोंसे उत्तम होनेके कारण आपको पुरुषोत्तम कहते हैं। कमलनयन गोविन्द! जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। आप हिरण्यगर्भ, लक्ष्मीपति, पद्मनाभ और सनातन पुरुष हैं। यह पृथ्वी आपके गर्भमें है। आप ध्रुव और ईश्वर हैं। हृषीकेश! आपको नमस्कार है। आप अनादि, अनन्त और अजेय हैं। विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ! आपकी जय हो। श्रीकृष्ण! आप अजित और अखण्ड हैं। श्रीनिवास! आपको नमस्कार है। आप ही बादल और धूम—वर्षा और गर्मी करनेवाले हैं। आपका पार पाना कठिन है। आप बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होते हैं। दुःख और पीड़ाओंका नाश करनेवाले हरे! जलमें शयन करनेवाले नारायण! आपको नमस्कार है। अव्यक्त परमेश्वर! आप सम्पूर्ण भूतोंके पालक और ईश्वर हैं। भौतिक तत्त्वोंसे आप कभी क्षुब्ध होनेवाले नहीं हैं। सम्पूर्ण प्राणी आपमें ही निवास करते हैं। आप सब भूतोंके आत्मा हैं। सम्पूर्ण भूत आपके गर्भमें स्थित हैं। आपको नमस्कार है। आप यज्ञ, यज्वा, यज्ञधर, यज्ञधाता और अभय देनेवाले हैं। यज्ञ आपके गर्भमें स्थित है। आपका श्रीअङ्ग सुवर्णके समान कान्तिमान् है। पृश्निगर्भ! आपको नमस्कार है। आप क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपालक, क्षेत्री, क्षेत्रहन्ता, क्षेत्रकर्ता, जितेन्द्रिय, क्षेत्रात्मा, क्षेत्ररहित और क्षेत्रके स्रष्टा हैं। आपको नमस्कार है। गुणालय, गुणावास, गुणाश्रय, गुणावह, गुणभोक्ता, गुणाराम और गुणत्यागी—ये सब आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है। आप ही श्रीविष्णु हैं। आप ही श्रीहरि और चक्री कहलाते हैं। आप ही श्रीविष्णु और आप ही जनार्दन हैं। आप ही वषट्कार कहे गये हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानके प्रभु भी आप ही हैं। आप भूतोंके उत्पादक और अव्यक्त हैं। सबकी उत्पत्तिके कारण होनेसे आप 'भव' कहलाते हैं। आप सम्पूर्ण प्राणियोंके भरण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही भूतभावन देवता हैं। आपको अजन्मा और ईश्वर कहते हैं।

आप विश्वकर्मा हैं, श्रीविष्णु हैं, शम्भु हैं और वृषभकी आकृति धारण करनेवाले हैं। आप ही शंकर, आप ही शुक्राचार्य, आप ही सत्य, आप ही तप और आप ही जनलोक हैं। आप विश्वविजेता, कल्याणमय, शरणागतपालक, अविनाशी, शम्भु, स्वयम्भू, ज्येष्ठ और परायण (परम आश्रय) हैं। आदित्य, ओंकार, प्राण, अन्धकारनाशक सूर्य,

  • कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा * २७१

मेघ, सर्वत्र विख्यात तथा देवताओंके स्वामी ब्रह्मा भी आप ही हैं। ऋक्, यजुः और साम भी आप ही हैं। आप ही सबके आत्मा माने गये हैं। आप ही अग्नि, आप ही वायु, आप ही जल और आप ही पृथ्वी हैं। स्रष्टा, भोक्ता, होता, हविष्य,यज्ञ, प्रभु, विभु, श्रेष्ठ, लोकपति और अच्युत भी आप ही हैं। आप सबके द्रष्टा और लक्ष्मीवान् हैं। आप ही सबका दमन करनेवाले और शत्रुओंके नाशक हैं। आप ही दिन और आप ही रात्रि हैं, विद्वान् पुरुष आपको ही वर्ष कहते हैं। आप ही काल हैं। कला, काष्ठा, मुहूर्त्त, क्षण और लव—सब आपके ही स्वरूप हैं। आप ही बालक, आप ही वृद्ध तथा आप ही पुरुष, स्त्री और नपुंसक हैं। आप विश्वकी उत्पत्तिके स्थान हैं। आप ही सबके नेत्र हैं। आप ही स्थाणु (स्थिर रहनेवाले) और आप ही शुचिश्रवा (पवित्र यशवाले) हैं। आप सनातन पुरुष हैं। आपको कोई जीत नहीं सकता। आप इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्र और सबसे उत्तम हैं। आप सम्पूर्ण विश्वको सुख देनेवाले हैं। वेदोंके अङ्ग भी आप ही हैं। आप अविनाशी, वेदोंके भी वेद (ज्ञेय तत्त्व), धाता, विधाता और समाहित रहनेवाले हैं। आप जलराशि समुद्र हैं। आप ही उसके मूल हैं। आप ही धाता और आप ही वसु हैं। आप वैद्य, आप धृतात्मा और आप इन्द्रियातीत हैं। आप सबसे आगे चलनेवाले और गाँवके नेता हैं। आप ही गरुड़ और आप ही आदिमान् हैं। आप ही संग्रह (लघु) और आप ही परम महान् हैं। अपने मनको वशमें रखनेवाले और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भी आप ही हैं। आप यम और नियम हैं। आप प्रांशु (उन्नत शरीरवाले) और चतुर्भुज हैं। अन्न, अन्तरात्मा और परमात्मा भी आप ही कहलाते हैं। आप गुरु और गुरुतम हैं, वाम और दक्षिण हैं। आप ही पीपल एवं अन्य वृक्ष हैं। व्यक्त जगत् और प्रजापति भी आप ही हैं। आपकी नाभिसे सुवर्णमय कमल प्रकट हुआ है। आप दिव्य शक्तिसे सम्पन्न हैं। आप ही चन्द्रमा और आप ही प्रजापति हैं। आपके स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। आप ही यम और आप ही दैत्योंके नाशक श्रीविष्णु हैं। आप ही संकर्षण देव हैं। आप ही कर्ता और आप ही सनातन पुरुष हैं। आप तीनों गुणोंसे रहित हैं।

आप ज्येष्ठ, वरिष्ठ और सहिष्णु हैं। लक्ष्मीके पति हैं। आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप अव्यक्त देवता हैं। आपके सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। आप विराट् और देवताओंके स्वामी हैं। देवदेव! तथापि आप दस अंगुलके होकर रहते हैं। जो भूत है, वह आपका ही स्वरूप बताया गया है। आप ही अन्तर्यामी पुरुष, इन्द्र और उत्तम देवता हैं। जो भविष्य है, वह भी आप ही हैं। आप ही ईशान, आप ही अमृत और आप ही मर्त्य हैं। यह सम्पूर्ण संसार आपसे ही अङ्कुरित होता है, अतः आप परम महान् और सबसे उत्तम हैं। देव! आप सबसे ज्येष्ठ हैं, पुरुष हैं और आप ही दस प्राणवायुओंके रूपमें स्थित हैं। आप विश्वरूप होकर चार भागोंमें स्थित हैं। अमृतस्वरूप होकर नौ भागोंके साथ द्युलोकमें रहते हैं और नौ भागोंसहित सनातन पौरुषेय रूप धारण करके अन्तरिक्षमें निवास करते हैं। आपके दो भाग पृथ्वीमें स्थित हैं और चार भाग भी यहाँ हैं। आपसे यज्ञोंकी उत्पत्ति होती है, जो जगत्में वृष्टि करनेवाले हैं। आपसे ही विराट्की उत्पत्ति हुई, जो सम्पूर्ण जगत्के हृदयमें अन्तर्यामी पुरुषरूपसे विराजमान हैं। वह विराट् पुरुष अपने तेज, यश और ऐश्वर्यके कारण सम्पूर्ण भूतोंसे विशिष्ट है। आपसे ही देवताओंका आहारभूत हवनीय घृत

२८० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


उत्पन्न हुआ। ग्राम्य और जंगली ओषधियाँ तथा पशु एवं मृग आदि भी आपसे ही प्रकट हुए हैं। देवदेव! आप ध्येय और ध्यानसे परे हैं। आपने ही ओषधियोंको उत्पन्न किया है। आप ही सात मुखोंवाले देदीप्यमान विग्रहसे युक्त काल हैं। यह स्थावर और जङ्गम तथा चर और अचर सम्पूर्ण जगत् आपसे ही प्रकट हुआ है और आपमें ही स्थित है। आप अनिरुद्ध, वासुदेव, प्रद्युम्न तथा दैत्यनाशक संकर्षण हैं। देव! आप सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ और समस्त विश्वके परम आश्रय हैं। कमलनयन! मेरी रक्षा कीजिये। नारायण! आपको नमस्कार है। भगवन्! विष्णो! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। सर्वलोकेश्वर! आपको नमस्कार है। कमलालय! आपको नमस्कार है। गुणालय! आपको नमस्कार है। गुणाकर! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। सुरोत्तम! आपको नमस्कार है। जनार्दन! आपको नमस्कार है। सनातन! आपको नमस्कार है।

योगिगम्य परमेश्वर! आपको नमस्कार है। योगके आश्रयस्थान! आपको नमस्कार है। गोपते! श्रीपते! मरुत्पते! श्रीविष्णो! आपको नमस्कार है। जगत्पते! आप जगत्को उत्पन्न करनेवाले और ज्ञानियोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। दिवस्पते! आपको नमस्कार है। महीपते! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप मधु दैत्यका वध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। कैटभको मारनेवाले नारायण! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है। पीठपर वेदोंको धारण करनेवाले महामत्स्यरूप अच्युत! आपको नमस्कार है। आप समुद्रके जलको मथ डालनेवाले और लक्ष्मीको आनन्द देनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। विशाल नासिकावाले अश्वमुख भगवान् हयग्रीव! महापुरुषविग्रह! आप मधु और कैटभका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप पृथ्वीको ऊपर उठानेके लिये विशाल कच्छपका शरीर धारण करनेवाले हैं, आपने अपनी पीठपर मन्दराचलको धारण किया था। महाकूर्मस्वरूप आप भगवान्को नमस्कार है। पृथ्वीका उद्धार करनेवाले महावराहको नमस्कार है। भगवन्! आपने ही पहले-पहल वराहरूप धारण किया था, अतः आप आदिवराह कहलाते हैं। आप विश्वरूप और विधाता हैं, आपको नमस्कार है। आप अनन्त, सूक्ष्म, मुख्य, श्रेष्ठ, परमाणुस्वरूप तथा योगिगम्य हैं। आपको नमस्कार है। जो परम कारण (प्रकृति)-के भी कारण हैं, योगीश्वर-मण्डलके आश्रयस्थान हैं, जिनके स्वरूपका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है, जो क्षीरसागरके भीतर निवास करनेवाले महान् सर्प—शेषनागकी सुन्दर शय्यापर शयन करते हैं तथा जिनके कानोंमें सुवर्ण एवं रत्नोंके बने हुए दिव्य कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, उन आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है।

कण्डुमुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! तुम मुझसे जो कुछ पाना चाहते हो, उसे शीघ्र कहो।'

कण्डु बोले—जगन्नाथ! यह संसार अत्यन्त दुस्तर और रोमाञ्चकारी है। इसमें दुःखोंकी ही अधिकता है। यह अनित्य और केलेके पत्तेकी भाँति सारहीन है। इसमें न कहीं आश्रय है, न अवलम्ब। यह जलके बुलबुलोंकी भाँति चञ्चल है। इसमें सब प्रकारके उपद्रव भरे हुए हैं। यह दुस्तर होनेके साथ ही अत्यन्त भयानक है। मैं आपकी मायासे मोहित होकर चिरकालसे इस संसारमें भटक रहा हूँ, किंतु कहीं भी शान्ति नहीं पाता। मेरा मन विषयोंमें आसक्त है। देवेश! इस संसारके भयसे पीड़ित होकर आज मैं आपकी

७०- मुनियोंका भगवान्‌के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर

* मुनियोंका भगवान्‌के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर * २८१


शरणमें आया हूँ। श्रीकृष्ण ! आप इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। सुरेश्वर ! मैं आपकी कृपासे आपके ही सनातन परम पदको प्राप्त करना चाहता हूँ, जहाँ जानेसे फिर इस संसारमें नहीं आना पड़ता।

श्रीभगवान् बोले— मुनिश्रेष्ठ ! तुम मेरे भक्त हो। सदा मेरी ही आराधना करते रहो। तुम्हें मेरे प्रसादसे अभीष्ट मोक्षपदकी प्राप्ति होगी। विप्रवर ! मेरे भक्त क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र तथा अन्त्यज भी परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं; फिर तुम-जैसे तपोनिष्ठ ब्राह्मणकी तो बात ही क्या है ! चाण्डाल भी यदि उत्तम श्रद्धासे युक्त एवं मेरा भक्त हो तो उसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है; फिर औरोंकी तो चर्चा ही क्या है।*

व्यासजी कहते हैं— यों कहकर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर मुनिवर कण्डु बहुत प्रसन्न हुए और समस्त कामनाओंका त्याग करके स्वस्थचित्त हो गये। समस्त इन्द्रियोंको वशमें करके ममता और अहंकारसे रहित हो एकाग्रचित्तसे भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करने लगे। भगवान्‌के निर्लेप, निर्गुण, शान्त और सन्मात्र स्वरूपका चिन्तन करते हुए उन्होंने दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लिया। जो महात्मा कण्डुकी कथाको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें जाता है। मुनिवरो ! इस प्रकार मैंने इस कर्मभूमि तथा मोक्षदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रका वर्णन किया, जहाँ साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। जो मनुष्य संसारजनित दुःखोंका नाश और मोक्ष प्रदान करनेवाले वरदायक भगवान् श्रीपुरुषोत्तमका भक्तिपूर्वक दर्शन, स्तवन और ध्यान करते हैं, वे समस्त दोषोंसे मुक्त हो भगवान्‌के अविनाशी धाममें जाते हैं।

मुनियोंका भगवान्‌के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर

मुनि बोले— पुरुषश्रेष्ठ व्यासजी ! आपने भारतवर्ष तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके अद्भुत गुणोंका वर्णन किया। उस क्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको सुनकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हमारे मनमें बहुत दिनोंसे एक संदेह है। उसका निवारण करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। हम भूतलपर श्रीकृष्ण, बलदेव और सुभद्राके अवतारका रहस्य सुनना चाहते हैं। वीरवर श्रीकृष्ण और बलभद्र किसलिये अवतीर्ण हुए थे ? वे वसुदेवके पुत्र होकर नन्दके घरमें क्यों रहे ? यह मर्त्यलोक सर्वथा निःसार है। इसमें अधिकतर दुःख ही भरा है। यह पानीके बुलबुलेकी भाँति अत्यन्त चञ्चल—क्षणभङ्गुर है। इसकी भयंकरता इतनी बढ़ी हुई है कि उसका विचार आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसे संसारमें उन्हें जन्म ग्रहण करनेकी क्या आवश्यकता थी ? इस भूतलपर अवतीर्ण हो उन्होंने जो-जो लीलाएँ कीं, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उनका सम्पूर्ण चरित्र अद्भुत और अलौकिक है। भगवान् सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी एवं सुरश्रेष्ठ हैं और पृथ्वीको उत्पन्न करनेवाले तथा अविनाशी परमात्मा हैं। उन्होंने अपने दिव्य स्वरूपको मनुष्योंके बीचमें कैसे प्रकट किया ? जो भगवान् सम्पूर्ण जङ्गम


* मद्भक्ताः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्रान्त्यजातिजाः। प्राप्नुवन्ति परां सिद्धिं किं पुनस्त्वं द्विजोत्तम॥
श्वपाकोऽपि च मद्भक्तः सम्यक् श्रद्धासमन्वितः। प्राप्नोत्यभिमतं सिद्धिमन्येषां तत्र का कथा॥ (१७८।१८५-१८६)