भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

राजाके साथ युद्ध होना युक्त नहीं है।' ब्रह्मन्! इतना कहकर मनस्विनी कपिला चुप हो गयी। तब मनस्वी मुनिने सेनाको सुसज्जित किया और उस सारी सेनाको साथ लेकर वे युद्धस्थलको प्रस्थित हुए। उधर राजा भी युद्धके लिये आ डटा। उसने मुनिवर जमदग्निको प्रणाम किया। फिर दोनों सेनाओंमें अत्यन्त दुष्कर युद्ध होने लगा। उस युद्धमें कपिलाकी सेनाने बलपूर्वक राजाकी सारी सेनाको जीत लिया और खेल-ही-खेलमें राजाके विचित्र रथको चूर-चूर कर दिया। फिर हँसते-हँसते राजाके कवच और धनुषको भी छिन्न-भिन्न कर डाला। इस प्रकार राजा कार्तवीर्य कपिलाकी सेनाको जीतनेमें असमर्थ हो गया। उन सेनाओंने शस्त्रोंकी वर्षासे राजाको हथियार रख देनेके लिये विवश कर दिया। तत्पश्चात् बाणों तथा शस्त्रोंकी वर्षासे राजा मूर्च्छित हो गया। उस समय राजाकी कुछ सेना तो मर चुकी थी और कुछ भाग खड़ी हुई। मुने! जब कृपासागर मुनिवर जमदग्निने देखा कि मेरा अतिथि बना हुआ राजराजेश्वर कार्तवीर्य मूर्च्छित हो गया है, तब कृपापरवश हो उन्होंने उस सेनाको लौटा लिया। फिर तो वह कृत्रिम सेना जाकर कपिलाके शरीरमें विलीन हो गयी। तदनन्तर कृपालु मुनिने शीघ्र ही राजाको अपनी चरण-धूलि देकर 'तुम्हारी जय हो' ऐसा शुभाशीर्वाद प्रदान किया और अपने कमण्डलुके जलके छींटे देकर उसे चैतन्य कराया। होशमें आनेपर वह राजा युद्धभूमिमें उठकर खड़ा हो गया और भक्तिपूर्वक हाथ जोड़े हुए उसने मुनिवरको सिर झुकाकर प्रणाम किया। तब मुनिने राजाको शुभाशीष देकर हृदयसे लगा लिया और पुनः उसे स्नान कराकर यत्नपूर्वक भोजन कराया; क्योंकि ब्राह्मणोंका हृदय सदा मक्खनके समान कोमल होता है; परंतु दूसरोंका हृदय सदा छुरेकी धारके सदृश तेज, असाध्य और दारुण होता है।

तत्पश्चात् मुनिवरने राजासे कहा—'नरेश! अब तुम अपने घर लौट जाओ।'

तब राजाने कहा—महाबाहो! युद्ध कीजिये अथवा मेरी अभीष्ट गौ मुझे समर्पित कीजिये।

नारायण कहते हैं—नारद! भूपालके वचनको सुनकर मुनिवरने श्रीहरिका स्मरण करके जो हितकर, सत्य और नीतिका साररूप था, ऐसा वचन कहना आरम्भ किया।

मुनिने कहा—महाभाग! अपने घर जाओ और सनातनधर्मकी रक्षा करो; क्योंकि धर्मके सुरक्षित रहनेपर सारी सम्पत्तियाँ सदा स्थिररूपसे निवास करती हैं—यह पूर्णतया निश्चित है। राजन्! तुम्हें भोजनसे वञ्चित देखकर मैं अपने घर लाया और विधिपूर्वक यथाशक्ति तुम्हारा आदर-सत्कार किया। इस समय तुम्हें मूर्च्छित देखकर मैंने चरणधूलि और शुभाशीर्वाद दिया, जिससे तुम्हारी मूर्च्छा दूर हुई; अतः तुम्हारा ऐसा कहना उचित नहीं है।

उस वचनको सुनकर राजाने मुनिवरको प्रणाम किया और एक-दूसरे रथपर सवार हो 'युद्ध कीजिये'—ऐसे ललकारा। तब मुनि भी

५५- परशुरामका शिवजीसे अपना अभिप्राय प्रकट करना और शिवजीका उन्हें गुह्यमन्त्र और 'त्रैलोक्यविजय' कवच प्रदान करना

गणपतिखण्ड ३६५

कवच धारण करके उससे युद्ध करनेके लिये उद्यत हो गये। क्रोधके कारण राजाकी बुद्धि मारी गयी थी; अतः वह मुनिके साथ जूझने लगा। मुनिने कपिलाद्वारा दी गयी शक्ति और शस्त्रके बलसे राजाको शस्त्रहीन करके मूर्च्छित कर दिया। तब कमललोचन राजा कार्तवीर्य पुनः होशमें आकर क्रोधपूर्वक मुनिके साथ लोहा लेने लगा। उस नृपश्रेष्ठने समरभूमिमें आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, तब मुनिने वारुणास्त्रद्वारा उसे हँसते-हँसते शान्त कर दिया। फिर राजाने रणभूमिमें मुनिके ऊपर वारुणास्त्र फेंका, तब मुनिने लीलापूर्वक वायव्यास्त्रद्वारा उसे शान्त कर दिया। तब राजाने युद्धस्थलमें वायव्यास्त्र चलाया; मुनिने उसे उसी क्षण गान्धर्वास्त्रद्वारा निवारण कर दिया। फिर नरेशने रणके मुहानेपर नागास्त्र छोड़ा, मुनिवरने उसे हर्षपूर्वक तत्काल ही गारुडास्त्रद्वारा प्रतिहत कर दिया। तब नृपवरने, जो सैकड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् एवं दसों दिशाओंको उद्दीप्त करनेवाला था, उस माहेश्वर नामक महान् अस्त्रका प्रयोग किया। नारद! तब मुनिने बड़े यत्नके साथ त्रिलोकव्यापी दिव्य वैष्णवास्त्रद्वारा उसका निवारण कर दिया और फिर यत्नपूर्वक नारायणास्त्र चलाया। उस अस्त्रको देखकर महाराज कार्तवीर्य उसे नमस्कार करके शरणागत हो गया। तब प्रलयाग्निके समान वह अस्त्र वहाँ ऊपर-ही-ऊपर घूमकर क्षणभरतक दसों दिशाओंको प्रकाशित करके स्वयं अन्तर्धान हो गया। फिर मुनिने रणके मुहानेपर जृम्भणास्त्र छोड़ा। उस अस्त्रके प्रभावसे राजाको निद्राने आ घेरा और वह मृतक-तुल्य होकर सो गया। तब राजाको निद्रित देखकर मुनिने उसी क्षण अर्धचन्द्रद्वारा उस भूपालके सारथि, रथ और धनुषबाणको छिन्न-भिन्न कर दिया। क्षुरप्रसे मुकुट, छत्र और कवच काट डाला तथा भाँति-भाँतिके अस्त्र-प्रयोगसे उसके अस्त्र, तरकस और घोड़ोंकी धज्जियाँ उड़ा दीं। फिर युद्धस्थलमें हँसते हुए मुनिने खेल-ही-खेलमें नागास्त्रद्वारा राजाके सभी मन्त्रियोंको बाँधकर कैद कर लिया; फिर लीलापूर्वक उत्तम मन्त्रका प्रयोग करके उस राजाको जगाया और उन बँधे हुए सभी मन्त्रियोंको उसे दिखाया। राजाको दिखाकर मुनिने तत्काल ही उन्हें बन्धन-मुक्त कर दिया और नरेशको आशीर्वाद देकर कहा—'राजन्! अब अपने घर जाओ।' परंतु राजा क्रोधसे भरा हुआ था। उसने उठकर त्रिशूल उठा लिया और यत्नपूर्वक उसे मुनिवर जमदग्निपर चला दिया। तब मुनिने उसपर शक्तिसे प्रहार किया। इसी बीच उस युद्धस्थलमें ब्रह्माने आकर उत्तम नीतिद्वारा उन दोनोंमें परस्पर प्रेम स्थापित करा दिया। तब मुनिने संतुष्ट होकर रणक्षेत्रमें ब्रह्माके चरणोंमें प्रणिपात किया और राजा ब्रह्मा तथा मुनिको नमस्कार करके अपने घरको प्रस्थान कर गया। फिर मुनि और ब्रह्मा अपने-अपने भवनको चले गये। इस प्रकार इसका वर्णन तो कर दिया, अब आगे तुमसे कुछ और कहूँगा। (अध्याय २५-२६)


जमदग्नि-कार्तवीर्य-युद्ध, कार्तवीर्यद्वारा दत्तात्रेयदत्त शक्तिके प्रहारसे जमदग्निका वध, रेणुकाका विलाप, परशुरामका आना और क्षत्रियवधकी प्रतिज्ञा करना, भृगुका आकर उन्हें सान्त्वना देना

नारायण कहते हैं— नारद! राजा घर लौट तो गया पर उसके मनमें युद्धकी लगी रही; इससे उसने लाखों सेना संग्रह करके फिर जमदग्निके आश्रमपर जाकर आश्रमको घेर लिया। राजाकी विशाल सेनाको देखकर जमदग्निके आश्रमवासी भयसे मूर्च्छित हो गये। महर्षिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक

३६६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बाणोंका एक ऐसा जाल बिछाया कि उससे आश्रमभूमि पूरी ढक गयी। सारी सेना उसीमें आबद्ध हो गयी। तब राजाने रथसे उतरकर महर्षिको नमस्कार किया। महर्षिने उसे आशीर्वाद दिया। राजाने फिर आक्रमण किया। यों कई बार राजा आक्रमण करता रहा, मूर्च्छित होता रहा, पर क्षमाशील मुनिने उसका वध नहीं किया। बड़ा घोर युद्ध हुआ। अन्तमें राजा कार्तवीर्यने दत्तात्रेय मुनिके द्वारा प्राप्त एक पुरुषका नाश करनेवाली अमोघ शक्तिका प्रयोग किया। वह भगवान् विष्णुकी शक्ति थी। उसने मुनिके हृदयको बींध डाला। मुनिने उसके आघातसे जीवनविसर्जन कर दिया। शक्ति भगवान् विष्णुके पास चली गयी।

जगत्‌में हाहाकार मच गया। कपिला गौ 'तात-तात' पुकारती हुई गोलोकको प्रस्थान कर गयी। तदनन्तर राजा कार्तवीर्यार्जुन ब्रह्महत्या-जनित पापका प्रायश्चित्त करके अपनी राजधानीको लौट गया।

इधर पतिव्रता महर्षिपत्नी रेणुका पतिके मरणसे अत्यन्त दुःखी होकर रोने लगीं। वे अपने पुत्र परशुरामको पुकारने लगीं। उस समय योगी परशुराम पुष्करमें थे। वे उसी क्षण मानस-गतिसे चलकर माताके पास आ पहुँचे। उन्होंने माताको प्रणाम किया और पिताकी अन्त्येष्टि-क्रियाकी तैयारी की। सारी बातें सुनकर माताके युद्ध न करनेका अनुरोध करनेपर भी भार्गव परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन करनेकी प्रतिज्ञा कर ली और राजा कार्तवीर्यार्जुनके वध करनेका प्रण कर लिया। फिर विलाप करती हुई पति-शोकपीड़िता माताको समझाते हुए बोले!

परशुरामने कहा—माता! जो पिताकी आज्ञा भङ्ग करनेवाले तथा पिताके हिंसकका वध नहीं करता, वह महान् मूर्ख है। उसे निश्चय ही रौरव नरकमें जाना पड़ता है। आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें हथियार लेकर मारनेके लिये आनेवाला, धनका अपहरण करनेवाला, क्षेत्रका विनाश करनेवाला, स्त्रीको चुरानेवाला, पिताका वध करनेवाला, बन्धुओंकी हिंसा करनेवाला, सदा अपकार करनेवाला, निन्दक और कटु वचन कहनेवाला—ये ग्यारह वेदविहित घोर पापी हैं। ये मार डालने योग्य हैं।

इसी बीच वहाँ स्वयं महर्षि भृगु आ पहुँचे। वे मनस्वी मुनि अत्यन्त भयभीत थे और उनका हृदय दुःखी था। उन्हें देखकर रेणुका और परशुराम उनके चरणोंपर गिर पड़े। तब भृगुमुनि उन दोनोंसे ऐसी वेदोक्त बात कहने लगे जो परलोकके लिये हितकारिणी थी।

भृगुजी बोले—बेटा! तुम तो मेरे वंशमें उत्पन्न और ज्ञानसम्पन्न हो; फिर विलाप कैसे कर रहे हो। इस संसारमें सभी चराचर प्राणी जलके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर हैं। पुत्र! सत्यके सार तथा सत्यके बीज तो श्रीकृष्ण ही हैं। तुम उन्हींका स्मरण करो। वत्स! जो बीत गया, सो गया; क्योंकि बीती हुई बात पुनः लौटती नहीं। जो होनेवाला है, वह होता ही है और आगे भी जो होनेवाला होगा वह होकर ही रहेगा; क्योंकि

गणपतिखण्ड ३६७

निषेकजन्य (प्रारब्धजन्य) कर्म सत्य (अटल) होता है। भला, कर्मफलभोगको कौन हटा सकता है ? वत्स ! श्रीकृष्णने जिस प्रकारके भूत, वर्तमान और भविष्यकी रचना की है, उनके द्वारा निरूपित उस कर्मको कौन निवारण कर सकता है ? बेटा ! मायाका कारण, मायावियोंके पाञ्चभौतिक शरीर और संकेतपूर्वक नाम—ये प्रातःकालके स्वप्नसदृश निरर्थक हैं। परमात्माके अंशभूत आत्माके चले जानेपर भूख, निद्रा, दया, शान्ति, क्षमा, कान्ति, प्राण, मन तथा ज्ञान सभी चले जाते हैं। जैसे राजाधिराजके पीछे नौकर-चाकर चलते हैं, उसी प्रकार बुद्धि तथा सारी शक्तियाँ उसीका अनुगमन करती हैं; अतः तुम यत्नपूर्वक श्रीकृष्णका भजन करो। बेटा ! कौन किसके पितर हैं और कौन किसके पुत्र हैं। ये सभी इस दुस्तर भवसागरमें कर्मरूपी लहरियोंसे प्रेरित हो रहे हैं। पुत्र ! ज्ञानीलोग विलाप नहीं करते, अतः अब तुम भी रुदन मत करो; क्योंकि रोनेके कारण आँसुओंके गिरनेसे मृतकोंको निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है।* भाई-बन्धु आदि कुटुम्बके लोग जिस सांकेतिक नामका उच्चारण करके रुदन करते हैं, उसे वे सौ वर्षोंतक रोते रहनेपर भी नहीं पा सकते—यह निश्चित है; क्योंकि त्वचा आदि पृथ्वीके अंशको पृथ्वी, जलांशको जल, शून्यांशको आकाश, वायुके अंशको वायु तथा तेजांशको तेज ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार सभी अंश अपने-अपने अंशीमें विलीन हो जाते हैं; फिर रोनेसे कौन वापस आयेगा। मरनेके बाद तो नाम, शास्त्र, ज्ञान, यश और कर्मकी कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। इसलिये जो वेदविहित पारलौकिक कर्म है, इस समय तुम वही करो; क्योंकि जो परलोकके लिये हितकारी हो, वही वास्तवमें पुत्र है और वही बन्धु है। भृगुके उस वचनको सुनकर महासाध्वी रेणुकाने उसी क्षण शोकका परित्याग कर दिया और मुनिसे कहना आरम्भ किया। (अध्याय २७)


रेणुका-भृगु-संवाद, रेणुकाका पतिके साथ सती होना, परशुरामका पिताकी अन्त्येष्टि क्रिया करके ब्रह्माके पास जाना और अपनी प्रतिज्ञा सुनाना, ब्रह्माका उन्हें शिवजीके पास भेजना

रेणुकाने पूछा—ब्रह्मन् ! अब मैं अपने प्राणनाथका अनुगमन करना चाहती हूँ। दूसरोंको मान देनेवाले ये मेरे पतिदेव आज मेरे ऋतुकालके चौथे दिन मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! बतलाइये, अब इस विषयमें कैसी व्यवस्था करनी चाहिये। मेरे कई जन्मोंका पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप सहसा उपस्थित हुए हैं।

भृगुने कहा—अहो महासति ! तुम अपने पुण्यात्मा पतिका अनुगमन करो; क्योंकि ऋतुका चौथा दिन पतिके सभी कार्योंमें शुद्ध माना जाता है। जो भक्तिदाता है, वही पुत्र है; जो अनुगमन करती है, वही स्त्री है; जो दान देता है, वही बन्धु है; जो गुरुकी अर्चना करता है, वही शिष्य है; जो रक्षा करे, वही अभीष्ट देवता है; जो प्रजाका पालन करे, वही राजा है; जो अपनी पत्नीकी बुद्धिको धर्ममें नियोजित करता है, वही स्वामी है; जो धर्मोपदेशक तथा हरिभक्ति प्रदान करनेवाला


* ज्ञानिनो मा रुदन्त्येव मा रोदीः पुत्र साम्प्रतम्। रोदनाश्रुप्रपतानामृतानां नरकं ध्रुवम्॥ (२७।६२)

३६८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है, वही गुरु है—ये सभी वेदों तथा पुराणोंमें निश्चितरूपसे प्रशंसनीय कहे गये हैं।*

रेणुकाने पूछा—मुने! भारतवर्षमें कैसी नारियाँ अपने पतिके साथ सती हो सकती हैं और कैसी नहीं हो सकतीं? तपोधन! यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।

भृगुने कहा—रेणुके! जिनके बच्चे छोटे हों, जो गर्भिणी हों, जिन्होंने ऋतुकालको देखा ही न हो, जो रजस्वला, कुलटा, कुष्ठरोगसे ग्रस्त, पतिकी सेवा न करनेवाली, पति-भक्तिरहित और कटुवादिनी हों—ये यदि दैववश सती भी हो जायँ तो वे अपने पतिको नहीं प्राप्त होतीं। पतिव्रताएँ चितामें शयन करनेवाले पतिको पहले संस्कारसे शुद्ध हुई आग देकर पीछे उसका अनुगमन करती हैं। यदि वे सचमुच पतिव्रता होती हैं तो अपने पतिको पा लेती हैं। जो अपने प्रियतमका अनुगमन करती हैं, वे उसीको पतिरूपमें पाती हैं और प्रत्येक जन्ममें उसीके साथ स्वर्गमें पुण्यका उपभोग करती हैं। पतिव्रते! गृहस्थोंकी यह व्यवस्था तो मैंने तुम्हें बतला दी। अब तीर्थमें मरनेवाले ज्ञानियों तथा वैष्णवोंके विषयमें श्रवण करो। जो साध्वी नारी जहाँ-जहाँ अपने वैष्णव पतिका अनुगमन करती है, वहाँ-वहाँ वह स्वामीके साथ वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी संनिधि प्राप्त करती है। नारद! कृष्णभक्तिपरायण जीवन्मुक्त भक्तोंके तीर्थमें अथवा अन्यत्र मरनेमें कोई विशेषता नहीं है; क्योंकि उन्हें दोनों जगह समान फल मिलता है। इसलिये यदि स्त्री अथवा पुरुष भगवान् नारायण तथा कमलालया लक्ष्मीका भजन करे तो उस भजनके प्रभावसे महाप्रलय होनेपर भी उन दोनोंका नाश नहीं होता। वहाँ रेणुकासे इतना कहकर भृगुमुनि परशुरामसे समयोचित तथा वेदविहित वचन बोले।

"महाभाग वत्स! यहाँ आओ और इस अमाङ्गलिक शोकको त्याग दो। भृगुनन्दन! अपने पिताको दक्षिण सिर करके उत्तान कर दो, नया वस्त्र और यज्ञोपवीत पहनाओ और आँसू रोककर दक्षिणाभिमुख हो बैठ जाओ। फिर भक्तिपूर्वक अरणीसे उत्पन्न हुई अग्नि हाथमें लो और पृथ्वीपर जो-जो तीर्थ हैं, उन सबका स्मरण करो। गया आदि तीर्थ, पुण्यमय पर्वत, कुरुक्षेत्र, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा, यमुना, कौशिकी, सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली चन्द्रभागा, गण्डकी, काशी, पनसा, सरयू, पुष्पभद्रा, भद्रा, नर्मदा, सरस्वती, गोदावरी, कावेरी, स्वर्णरेखा, पुष्कर, रैवत, वराह, श्रीशैल, गन्धमादन, हिमालय, कैलास, सुमेरु, रत्नपर्वत, वाराणसी, प्रयाग, पुण्यमय वन वृन्दावन, हरिद्वार और बदरी—इनका बारंबार स्मरण करो। फिर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुगन्धित पुष्प देकर और वस्त्रसे आच्छादित करके पिताके शवको चिताके ऊपर स्थापित करो। तात! फिर सोनेकी सलाईसे कान, आँख, नाक और मुखमें निर्मन्थन करके उसे आदरसहित ब्राह्मणको दान कर दो। तत्पश्चात्, तिलसहित ताँबेका पात्र, गौ, चाँदी और सोना दक्षिणासहित दान करके स्वस्थचित्त हो दाह-कर्म करो। 'ॐ जो जानकारीमें अथवा अनजानमें पाप-कर्म करके मृत्यु-कालके वशीभूत हो पञ्चत्वको प्राप्त हुआ। ॐ धर्म-अधर्मसे युक्त तथा लोभ-मोहसे समावृत उस मनुष्यके सारे शरीरको जलाता हूँ; वह दिव्य लोकोंमें जाय।' इस मन्त्रको पढ़कर पिताकी प्रदक्षिणा करो और फिर 'ॐ तुम हमारे कुलमें उत्पन्न हुए हो, मैं


* स पुत्रो भक्तिदाता यः सा च स्त्री यानुगच्छति। स बन्धुर्दानदाता यः स शिष्यो गुरुमर्चयेत्॥
सोऽभीष्टदेवो यो रक्षेत् स राजा पालयेत् प्रजाः। स च स्वामी प्रियां धर्मे मतिं दातुमिहेश्वरः॥
स गुरुर्धर्मदाता यो हरिभक्तिप्रदायकः। एते प्रशंस्या वेदेषु पुराणेषु च निश्चितम्॥
(२८।७—९)

गणपतिखण्ड ३६९

पुनः तुम्हारा होकर उत्पन्न होऊँ, तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हो स्वाहा' इस प्रकार उच्चारण करो तथा श्रीहरिका स्मरण करते हुए इसी मन्त्रसे पिताका दाह करो।* हे भृगुनन्दन! पहले तुम भाइयोंके साथ सिरमें आग लगाओ।'' तब भृगुमुनिके आज्ञानुसार परशुरामने अपने गोत्रवालोंके साथ वह सारा कार्य सम्पन्न किया।

तदनन्तर रेणुकाने वहाँ अपने पुत्र परशुरामको छातीसे लगा लिया और परिणाममें सुखदायक कुछ वचन कहे—'बेटा! इस भवसागरमें विरोध न करना सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल है और विरोध नाशका कारण तथा समस्त उपद्रवोंका हेतु है। अतः भयंकर क्षत्रियोंके साथ विरोध न करना ही उचित है; किंतु मेरे सुनते-सुनते तुमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूर्ण करना चाहिये। इसके लिये तुम दिव्य मन्त्रोंके ज्ञाता भृगु और ब्रह्माके साथ विचार करके जैसा उचित हो वैसा करना। सज्जनोंद्वारा आलोचित कर्म शुभकारक होता है।' यों कहकर रेणुका परशुरामको छोड़कर अपने पतिका आलिङ्गन करके श्रीहरिका स्मरण करते हुए परशुरामकी ओर निहारती हुई चितामें सो गयी। तब भाइयोंके साथ परशुरामने चितामें आग लगा दी। फिर भाइयों और पिताके शिष्योंके साथ वे विलाप करने लगे। इतनेमें ही सती रेणुका 'राम, राम, राम' यों उच्चारण करके परशुरामके देखते-देखते जलकर राख हो गयी। तब अपने स्वामीका नाम सुनकर वहाँ श्रीहरिके दूत आ पहुँचे। वे सभी रथपर सवार थे। उनके शरीरका रंग श्याम था। सुन्दर चार भुजाएँ थीं, जिनमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे। उनके गलेमें वनमाला लटक रही थी और वे किरीट, कुण्डल तथा रेशमी पीताम्बरसे विभूषित थे। वे उस रेणुकाको रथमें बिठाकर ब्रह्मलोकमें गये और जमदग्निको लेकर श्रीहरिके संनिकट जा पहुँचे। वहाँ वैकुण्ठमें वे दोनों पति-पत्नी निरन्तर श्रीहरिकी परिचर्या, जो मङ्गलोंकी मङ्गल है, करते हुए श्रीहरिके संनिकट रहने लगे।

नारद! इधर परशुरामने ब्राह्मणों तथा भृगुजीके सहयोगसे माता-पिताकी शेष क्रिया समाप्त करके ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान दिया। फिर गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, सुवर्णनिर्मित पलंगसहित मनोरम दिव्य शय्या, जल, अन्न, चन्दन, रत्नदीप, चाँदीका पहाड़, सुवर्णके आधारसहित स्वर्णनिर्मित उत्तम आसन, सुवासित ताम्बूल, छत्र, पादुका, फल, मनोहर माला, फल-मूल-जल और मनोहर मिष्टान्न तथा धन ब्राह्मणोंको देकर वे ब्रह्मलोकको चल पड़े। ब्रह्मलोकमें पहुँचकर परशुरामने भक्तिभावसे अव्ययात्मा ब्रह्माजीको नमस्कार करके रोते हुए सारी घटना कह सुनायी। कृपामय ब्रह्माजीने सारी बातें सुनकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिया और अपने हृदयसे लगा लिया। भृगुवंशी परशुरामकी बहुत-से जीवोंका विनाश करनेवाली, दुष्कर एवं भयंकर प्रतिज्ञाको सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माको महान् विस्मय हुआ। वे 'प्रारब्धवश सब कुछ घटित हो सकता है' ऐसा मनमें विचारकर परशुरामसे परिणाममें सुखदायक वचन बोले।

**ब्रह्माने कहा—**वत्स! बहुसंख्यक जीवोंका विनाश करनेवाली तुम्हारी प्रतिज्ञा दुष्कर है; क्योंकि यह सृष्टि भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे उत्पन्न होती है। बेटा! उन्हीं परमेश्वरकी आज्ञासे


* ॐ कृत्वा तु दुष्कृतं कर्म जानता वाप्यजानता। मृत्युकालवशं प्राप्य नरं पञ्चत्वमागतम्॥
ॐ धर्माधर्मसमायुक्तं लोभमोहसमावृतम्। दहेयं सर्वगात्राणि दिव्यान् लोकान् स गच्छतु॥
इमं मन्त्रं पठित्वा तु तातं कृत्वा प्रदक्षिणम्। मन्त्रेणानेन देहाग्नि जनकाय हरिं स्मरन्॥
ॐ अस्मत्कुले त्वं जातोऽसि त्वदीयो जायतां पुनः। असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहेति वद साम्प्रतम्॥
(२८। ३२-३५)

३७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मैंने बड़े कष्टसे इस सृष्टिकी रचना की है; किंतु तुम्हारी निर्दयतापूर्ण घोर प्रतिज्ञा सृष्टिका लोप कर देनेवाली है। तुम एक क्षत्रियके अपराधसे पृथ्वीको इक्कीस बार भूपरहित कर देना चाहते हो और क्षत्रिय-जातिको समूल नष्ट करनेकी तुमने ठान ली है। किंतु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र— यह चार प्रकारकी सृष्टि नित्य है, जो श्रीहरिकी ही आज्ञासे पुनः-पुनः आविर्भूत और तिरोहित होती रहती है। अन्यथा किसी प्राक्तन कर्मानुसार तुम्हारी प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। तुम्हें अपनी कार्यसिद्धिके लिये बड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। अतः वत्स! तुम शिवलोकमें जाओ और शंकरकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि भूतलपर बहुत-से नरेश शंकरके भक्त हैं। जब वे शक्तिस्वरूपा पार्वती और शंकरके दिव्य कवचको धारण करके खड़े होंगे, तब महेश्वरकी आज्ञाके बिना उन्हें मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? अतः जो विजयका कारण एवं शुभकारक है, उस उपायको तुम यत्नपूर्वक करो; क्योंकि उपायपूर्वक आरम्भ किये गये कार्य ही सिद्ध होते हैं। इसलिये तुम शंकरसे श्रीकृष्णके मन्त्र और कवचको ग्रहण करो। वह वैष्णव तेज परम दुर्लभ है। उसके प्रभावसे तुम शैव और शाक्त दोनों तेजोंपर विजय पा सकोगे। जगदीश्वर शिव तुम्हारे जन्म-जन्मान्तरके गुरु हैं। अतः मुझसे मन्त्र ग्रहण करना तुम्हारे लिये युक्त नहीं है; क्योंकि जो उपयुक्त होता है, वही विधि है। कर्मभोगसे ही मन्त्र, स्वामी, स्त्री, गुरु और देवता प्राप्त होते हैं। जो जिनके हैं, वे उनके पास स्वयं ही उपस्थित होते हैं, यह ध्रुव है। भृगुनन्दन! तुम त्रैलोक्यविजय नामक श्रेष्ठ कवच ग्रहण करके इक्कीस बार पृथ्वीको भूपरहित कर डालोगे। दानी शंकर तुम्हें दिव्य पाशुपतास्त्र प्रदान करेंगे। उस दिये हुए मन्त्रके बलसे तुम क्षत्रियसमुदायको जीत लोगे। (अध्याय २८)


परशुरामका शिवलोकमें जाकर शिवजीके दर्शन करके उनकी स्तुति करना

नारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर परशुरामने ब्रह्माकी बात सुनकर उन जगद्गुरुको प्रणाम किया और उनसे वरदान पाकर वे सफलमनोरथ हो शिवलोकको चले। वायुके आधारपर टिका हुआ वह मनोहर लोक एक लाख योजन ऊँचा तथा ब्रह्मलोकसे विलक्षण है। उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। उसके दक्षिणभागमें वैकुण्ठ और वामभागमें गौरीलोक है। नीचेकी ओर ध्रुवलोक है, जो सम्पूर्ण लोकोंसे परे कहा जाता है। उन सबके ऊपर पचास करोड़ योजनके विस्तारवाला गोलोक है। उससे ऊपर दूसरा लोक नहीं है। वही सर्वोपरि कहा जाता है। मनके समान वेगशाली योगीन्द्र परशुरामने उस शिवलोकको देखा। वह महान् अद्भुत लोक उपमान और उपमेयसे रहित अर्थात् अनुपम, श्रेष्ठ योगीन्द्रों, सिद्धों, विद्याविशारदों, करोड़ों कल्पोंकी तपस्यासे पवित्र शरीरवाले पुण्यात्माओंसे निषेवित, मनोरथ पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्षोंके समूहोंसे परिवेष्टित, असंख्य कामधेनुओंके समुदायोंसे सुशोभित, पारिजात-वृक्षोंकी वनावलीसे विशेष शोभायमान, दस हजार पुष्पोद्यानोंसे युक्त, सदा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न, बहुमूल्य मणियोंद्वारा रचित सुन्दर मणिवेदियों तथा सैकड़ों दिव्य राजमार्गोंद्वारा बाहर-भीतर विभूषित और नाना प्रकारकी पच्चीकारीसे युक्त उत्तम मणियोंके कलशोंसे उज्ज्वल दीखनेवाले अमूल्य मणियोंद्वारा निर्मित सौ करोड़ भवनोंसे युक्त था।

उसके रमणीय मध्यभागमें उन्हें शंकरजीका भवन दीख पड़ा। उस परम मनोहर भवनके चारों ओर बहुमूल्य मणियोंकी चहारदीवारीका निर्माण

गणपतिखण्ड ३७१

हुआ था। वह इतना ऊँचा था कि आकाशका स्पर्श कर रहा था। उसका रंग दूध और जलके समान उज्ज्वल था। उसमें सोलह दरवाजे थे तथा वह सैकड़ों ऐसे मन्दिरोंसे सुशोभित था, जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा रत्नोंकी सीढ़ियोंसे विभूषित थे। उनमें हीरे जड़े हुए रत्नोंके खंभे और किवाड़ लगे थे। वे मणियोंकी जालियोंसे सुशोभित, उत्तम रत्नोंके कलशोंसे प्रकाशित, नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे चित्रित अतएव परम मनोहर थे। वहाँ उस भवनके आगे परशुरामने सिंहद्वारका दर्शन किया, जिसमें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए किवाड़ लगे थे। उसका भीतरी भाग पद्मराग एवं महामरकत मणियोंद्वारा रचित वेदियोंसे सदा बाहर-भीतर सुशोभित रहता था। नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित होनेके कारण वह अत्यन्त सुहावना लग रहा था। उसके द्वारपर दो भयंकर द्वारपाल नियुक्त थे, जिन्हें परशुरामने देखा। उनकी आकृति बेडौल थी, दाँत और मुख बड़े विकराल थे। तीन बड़े-बड़े नेत्र थे, जिनमें कुछ पीलिमा और ललाई छायी हुई थी। वे जले हुए पर्वतके समान काले और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। शरीर उत्तम बाघम्बर तथा विभूतिसे विभूषित थे। त्रिशूल और पट्टिश धारण किये हुए वे दोनों ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें देखकर परशुरामका मन भयग्रस्त हो गया। फिर भी वे डरते-डरते कुछ कहनेको उद्यत हुए। उन्होंने विनीत होकर बड़ी नम्रताके साथ उन दोनों महाबली उच्छृंखलोंके सामने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मणकी बात सुनकर उन दोनोंके मनमें दयाका संचार हो आया, तब उन श्रेष्ठ अनुचरोंने दूतद्वारा महात्मा शंकरकी आज्ञा लेकर परशुरामको भीतर प्रवेश करनेका आदेश दिया। परशुराम उनकी आज्ञा पाकर श्रीहरिका स्मरण करते हुए भवनके अंदर प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने एक-एक करके सोलह दरवाजोंको देखा, जो नाना प्रकारकी चित्रकारीसे चित्रित होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर थे तथा उनपर द्वारपाल नियुक्त थे। उन्हें देखकर परशुरामको महान् आश्चर्य हुआ। आगे बढ़नेपर उन्हें शंकरजीकी सभा दिखायी पड़ी, जो बहुत-से सिद्धगणोंसे व्याप्त, महर्षियोंद्वारा सेवित तथा पारिजात-पुष्पोंके गन्धसे युक्त वायुद्वारा सुवासित थी। उस सभामें उन्होंने देवेश्वर शंकरके दर्शन किये। वे रत्नाभरणोंसे सुसज्जित हो रत्नसिंहासनपर विराजमान थे। उनके ललाटपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था। वे बाघाम्बर पहने तथा त्रिशूल और पट्टिश धारण किये हुए थे। उनका शरीर विभूतिसे सुशोभित था। वे सर्पका यज्ञोपवीत पहने थे तथा महान् कल्याणस्वरूप, कल्याण करनेवाले, कल्याणके कारण, कल्याणके आश्रयस्थान, आत्मामें रमण करनेवाले, पूर्णकाम और करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली थे। उनका मुख प्रसन्न था, जिसपर मन्द मुस्कानकी अद्भुत छटा बिखर रही थी, वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये अधीर हो रहे थे। वे सनातन ज्योतिःस्वरूप, लोकोंके लिये अनुग्रहके मूर्त रूप, जटाधारी, सतीकी हड्डियोंसे शोभित, तपस्याओंके फल देनेवाले तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता थे। उनका वर्ण शुद्ध स्फटिकके सदृश उज्ज्वल था। उनके पाँच मुख और तीन नेत्र थे। वे तत्त्वमुद्राद्वारा शिष्योंको गुह्य ब्रह्मका उपदेश कर रहे थे। योगीन्द्र उनके स्तवनमें तथा बड़े-बड़े सिद्ध उनकी सेवामें नियुक्त थे। श्रेष्ठ पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा निरन्तर उनकी सेवा कर रहे थे। वे बुढ़ापा और मृत्युका हरण करनेवाले, गुणातीत, स्वेच्छामय, परिपूर्णतम परब्रह्मके ध्यानमें निमग्न थे, जो ज्योतीरूप सबके आदि, प्रकृतिसे परे और परमानन्दमय हैं। उन श्रीकृष्णका ध्यान करते समय उनके शरीरमें रोमाञ्च हो रहा था तथा वे आँखोंमें आँसू भरे उत्तम स्वरसे उनकी गुणावलीका गान कर रहे थे और भूतेश्वर, रुद्रगण तथा क्षेत्रपाल उन्हें घेरे हुए थे। उन्हें देखकर परशुरामने

३७२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बड़े आदरके साथ सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् शिवजीके वामभागमें कार्तिकेय, दाहिनी ओर गणेश्वर, सामने नन्दीश्वर, महाकाल और वीरभद्र तथा उनकी गोदमें उनकी प्रियतमा पत्नी गिरिराजनन्दिनी गौरीको देखा। उन सबको भी परशुरामने बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर नमस्कार किया। उस समय शिवजीका दर्शन करके परशुराम परम संतुष्ट हुए। शोकसे पीड़ित तो वे थे ही; अतः आँखोंमें आँसू भरकर अत्यन्त कातर हो हाथ जोड़कर शान्तभावसे दीन एवं गद्गदवाणीके द्वारा शिवजीकी स्तुति करने लगे।

परशुराम बोले—ईश! मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, परंतु स्तवन करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। आप अक्षर और अक्षरके कारण तथा इच्छारहित हैं, तब मैं आपकी क्या स्तुति करूँ? मैं मन्दबुद्धि हूँ; मुझमें शब्दोंकी योजना करनेका ज्ञान तो है नहीं और चला हूँ देवेश्वरकी स्तुति करने। भला, जिनका स्तवन करनेकी शक्ति वेदोंमें नहीं है, उन आपकी स्तुति करके कौन पार पा सकता है? आप मन, बुद्धि और वाणीके अगोचर, सारसे भी साररूप, परात्पर, ज्ञान और बुद्धिसे असाध्य, सिद्ध, सिद्धोंद्वारा सेवित, आकाशकी तरह आदि, मध्य और अन्तसे हीन तथा अविनाशी, विश्वपर शासन करनेवाले, तन्त्ररहित, स्वतन्त्र, तन्त्रके कारण, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, साधन करनेमें अत्यन्त सुगम और दयाके सागर हैं। दीनबन्धो! मैं अत्यन्त दीन हूँ। करुणासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। आज मेरा जन्म सफल तथा जीवन सुजीवन हो गया; क्योंकि भक्तगण जिन्हें स्वप्नमें भी नहीं देख पाते, उन्हींको इस समय मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। जिनकी कलासे इन्द्र आदि देवगण तथा जिनके कलांशसे चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, जल और वायुके रूपमें विराजमान हैं, उन महेश्वरको मैं अभिवादन करता हूँ। जो स्त्रीरूप, नपुंसकरूप और पुरुषरूप धारण करके जगत्‌का विस्तार करते हैं, जो सबके आधार और सर्वरूप हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। हिमालयकन्या देवी पार्वती ने कठोर तपस्या करके जिनको प्राप्त किया है। दीर्घ तपस्याके द्वारा भी जिनका प्राप्त होना दुर्लभ है; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सबके लिये कल्पवृक्षरूप हैं और अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करते हैं, जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं और जो भक्तोंके बन्धु हैं; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो लीलापूर्वक क्षणभरमें अनन्त विश्व-सृष्टियोंका संहार करनेवाले हैं; उन भयंकर रूपधारी महेश्वरको मेरा प्रणाम है। जो कालरूप, कालके काल, कालके कारण और कालसे उत्पन्न होनेवाले हैं तथा जो अजन्मा एवं बारंबार जन्म धारण करनेवाले आदि सब कुछ हैं; उन महेश्वरको मैं मस्तक झुकाता हूँ। यों कहकर भृगुवंशी परशुराम शंकरजीके चरण-कमलोंपर गिर पड़े। तब शिवजीने परम प्रसन्न होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिये। नारद! जो भक्तिभावसहित इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे पूर्णतया मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है।*

(अध्याय २९)


* परशुराम उवाच—
ईश त्वां स्तोतुमिच्छामि सर्वथा स्तोतुमक्षमम्। अक्षराक्षरबीजं च किं वा स्तौमि निरीहकम्॥
न योजनां कर्तुमीशो देवेशं स्तौमि मूढधीः। वेदा न शक्ता यं स्तोतुं कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः॥
बुद्धेर्वाङ्मनसोः पारं सारात्सारं परात्परम्। ज्ञानबुद्धेरसाध्यं च सिद्धं सिद्धैर्निषेवितम्॥

गणपतिखण्ड ३७३

परशुरामका शिवजीसे अपना अभिप्राय प्रकट करना, उसे सुनकर भद्रकालीका कुपित होना, परशुरामका रोने लगना, शिवजीका कृपा करके उन्हें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र एवं शस्त्रास्त्र प्रदान करना

[ तदनन्तर महादेवजीके पूछनेपर ] परशुरामने कहा—'दयानिधान! मैं भृगुवंशी जमदग्निका पुत्र परशुराम हूँ। आपका दास हूँ। आपके शरणागत हूँ। आप मेरी रक्षा करें।' इसके बाद सारी

घटना विस्तारसे सुनाकर परशुरामने कहा कि मैंने पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियशून्य करने तथा मेरे पिताका वध करनेवाले कार्तवीर्यको मारनेकी प्रतिज्ञा की है। आप मेरी प्रतिज्ञाको पूर्ण करें।

इस बातको सुनकर भगवती पार्वती और भद्रकालीने क्रुद्ध होकर परशुरामकी भर्त्सना की। तब परशुराम भगवती गौरी और कालिकाके क्रोधभरे वचन सुनकर उच्चस्वरसे रोने लगे और प्राण-विसर्जनके लिये तैयार हो गये। तब दयासागर भक्तानुग्रहकारी प्रभु महादेवने ब्राह्मण-बालकको रोते देखकर स्नेहार्द्रचित्तसे अत्यन्त विनयपूर्ण वचनोंके द्वारा गौरी और कालिकाका क्रोध शान्त किया और उन दोनोंकी तथा अन्यान्य सबकी अनुमति लेकर परशुरामसे कहना आरम्भ किया।

शंकरजीने कहा—हे वत्स! आजसे तुम मेरे लिये एक श्रेष्ठ पुत्रके समान हुए; अतः मैं तुम्हें ऐसा गुह्य मन्त्र प्रदान करूँगा, जो त्रिलोकीमें दुर्लभ है। इसी प्रकार एक ऐसा परम अद्भुत कवच बतलाऊँगा, जिसे धारण करके तुम मेरी कृपासे अनायास ही कार्तवीर्यका वध कर डालोगे। विप्रवर! तुम इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे शून्य भी कर दोगे और सारे जगत्में तुम्हारी कीर्ति


यमाकाशमिवाद्यन्तमध्यहीनं तथाव्ययम्। विश्वतन्त्रमतन्त्रं च स्वतन्त्रं तन्त्रबीजकम्॥
ध्यानासाध्यं दुराराध्यमतिसाध्यं कृपानिधिम्। त्राहि मां करुणासिन्धो दीनबन्धोऽतिदीनकम्॥
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्। स्वप्नादृष्टं च भक्तानां पश्यामि चक्षुषाधुना॥
शक्रादयः सुरगणाः कलया यस्य सम्भवाः। चराचराः कलांशेन तं नमामि महेश्वरम्॥
यं भास्करस्वरूपं च शशिरूपं हुताशनम्। जलरूपं वायुरूपं तं नमामि महेश्वरम्॥
स्त्रीरूपं क्लीबरूपं च पुंरूपं च बिभर्ति यः। सर्वाधारं सर्वरूपं तं नमामि महेश्वरम्॥
देव्या कठोरतपसा यो लब्धो गिरिकन्यया। दुर्लभस्तपसां यो हि तं नमामि महेश्वरम्॥
सर्वेषां कल्पवृक्षं च वाञ्छाधिकफलप्रदम्। आशुतोषं भक्तबन्धुं तं नमामि महेश्वरम्॥
अनन्तविश्वसृष्टीनां संहर्तारं भयंकरम्। क्षणेन लीलामात्रेण तं नमामि महेश्वरम्॥
यः कालः कालकालश्च कालबीजं च कालजः। अजः प्रजश्च यः सर्वस्तं नमामि महेश्वरम्॥
इत्येवमुक्त्वा स भृगुः पपात चरणाम्बुजे। आशिषं च ददौ तस्मै सुप्रसन्नो बभूव सः॥
जामदग्न्यकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिसंयुतः। सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति॥
(२९। ४३–५७)

३७४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

व्यास हो जायगी—इसमें संशय नहीं है।

नारद! इतना कहकर शंकरजीने परशुरामको परम दुर्लभ मन्त्र और ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक परम अद्भुत कवच प्रदान किया। फिर स्तोत्र, पूजाका विधान, पुरश्चरणपूर्वक मन्त्रसिद्धिका अनुष्ठान, नियमका ठीक-ठीक क्रम, सिद्धिस्थान और कालकी संख्या आदि बतलायी। उसी समय उन्हें सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्ग भी पढ़ा दिये। तत्पश्चात् शिवजीने परशुरामको नागपाश, पाशुपतास्त्र, अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र, नारायणास्त्र, वायव्यास्त्र, वारुणास्त्र, गान्धर्वास्त्र, गारुडास्त्र, जृम्भणास्त्र, गदा, शक्ति, परशु, अमोघ उत्तम त्रिशूल, विधिपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंके मन्त्र, शस्त्रास्त्रोंके संहार और संधान, अक्षय धनुष, आत्मरक्षाका उपाय, संग्राममें विजय पानेका क्रम, अनेक प्रकारके मायायुद्ध, मन्त्रपूर्वक हुंकार, अपनी सेनाकी रक्षा तथा शत्रुसेनाके विनाशका ढंग, युद्धसंकटके समय नाना प्रकारके अनुपम उपाय, संसारको मोहित करनेवाली तथा बुढ़ापा और मृत्युका हरण करनेवाली विद्या भी सिखायी। परशुरामने चिरकालतक गुरुकुलमें ठहरकर सम्पूर्ण विद्याओंको सीखा। फिर तीर्थमें जाकर मन्त्रसिद्धि प्राप्त की। इसके बाद शिव आदिको नमस्कार करके वे अपने आश्रमको लौट आये।

(अध्याय ३०)


शिवजीका प्रसन्न होकर परशुरामको त्रैलोक्यविजय नामक कवच प्रदान करना

नारदने पूछा— भगवन्! अब मेरी यह सुननेकी इच्छा है कि भगवान् शंकरने दयावश परशुरामको कौन-सा मन्त्र तथा कौन-सा स्तोत्र और कवच दिया था? उस मन्त्रके आराध्य देवता कौन हैं? कवच धारण करनेका क्या फल है? तथा स्तोत्रपाठसे किस फलकी प्राप्ति होती है? वह सब आप बतलाइये।

नारायण बोले— नारद! उस मन्त्रके आराध्य देव गोलोकनाथ गोपगोपीश्वर सर्वसमर्थ परिपूर्णतम स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। शंकरने रत्नपर्वतके निकट स्वयंप्रभा नदीके तटपर पारिजात वनके मध्य स्थित आश्रममें लोकोंके देवता माधवके समक्ष परशुरामको ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक परम अद्भुत कवच, विभूतियोगसे सम्भूत महान् पुण्यमय ‘स्तवराज’ नामवाला स्तोत्र और सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला ‘मन्त्रकल्पतरु’ नामक मन्त्र प्रदान किया था।

महादेवजीने कहा— भृगुवंशी महाभाग वत्स! तुम प्रेमके कारण मुझे पुत्रसे भी अधिक प्रिय हो; अतः आओ कवच ग्रहण करो। राम! जो ब्रह्माण्डमें परम अद्भुत तथा विजयप्रद है, श्रीकृष्णके उस ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक कवचका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें श्रीकृष्णने गोलोकमें स्थित वृन्दावन नामक वनमें राधिकाश्रममें रासमण्डलके मध्य यह कवच मुझे दिया था। यह अत्यन्त गोपनीय तत्त्व, सम्पूर्ण मन्त्रसमुदायका विग्रहस्वरूप, पुण्यसे भी बढ़कर पुण्यतर परमोत्कृष्ट है और इसे स्नेहवश मैं तुम्हें बता रहा हूँ। जिसे पढ़कर एवं धारण करके मूलप्रकृति भगवती आद्याशक्तिने शुम्भ, निशुम्भ, महिषासुर और रक्तबीजका वध किया था। जिसे धारण करके मैं लोकोंका संहारक और सम्पूर्ण तत्त्वोंका जानकार हुआ हूँ तथा पूर्वकालमें जो दुरन्त और अवध्य थे, उन त्रिपुरोंको खेल-ही-खेलमें दग्ध कर सका हूँ। जिसे पढ़कर और धारण करके ब्रह्माने इस उत्तम सृष्टिकी रचना की है। जिसे धारण करके भगवान् शेष सारे विश्वको धारण करते हैं। जिसे धारण करके कूर्मराज शेषको

५६- पुष्करमें परशुरामकी तपस्या और श्रीकृष्णसे वर प्राप्ति

गणपतिखण्ड ३७५


लीलापूर्वक धारण किये रहते हैं। जिसे धारण करके स्वयं सर्वव्यापक भगवान् वायु विश्वके आधार हैं। जिसे धारण करके वरुण सिद्ध और कुबेर धनके स्वामी हुए हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके स्वयं इन्द्र देवताओंके राजा बने हैं। जिसे धारण करके तेजोराशि स्वयं सूर्य भुवनमें प्रकाशित होते हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके चन्द्रमा महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हुए हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके महर्षि अगस्त्य सातों समुद्रोंको पी गये और उसके तेजसे वातापि नामक दैत्यको पचा गये। जिसे पढ़कर एवं धारण करके पृथ्वीदेवी सबको धारण करनेमें समर्थ हुई हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके गङ्गा स्वयं पवित्र होकर भुवनोंको पावन करनेवाली बनी हैं। जिसे धारण करके धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्म लोकोंके साक्षी बने हैं। जिसे धारण करके सरस्वतीदेवी सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिष्ठात्रीदेवी हुई हैं। जिसे धारण करके परात्परा लक्ष्मी लोकोंको अन्न प्रदान करनेवाली हुई हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके सावित्रीने वेदोंको जन्म दिया है। भृगुनन्दन! जिसे पढ़ एवं धारणकर वेद धर्मके वक्ता हुए हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके अग्नि शुद्ध एवं तेजस्वी हुए हैं और जिसे धारण करके भगवान् सनत्कुमारको ज्ञानियोंमें सर्वश्रेष्ठ स्थान मिला है। जो महात्मा, साधु एवं श्रीकृष्णभक्त हो, उसीको यह कवच देना चाहिये; क्योंकि शठ एवं दूसरेके शिष्यको देनेसे दाता मृत्युको प्राप्त हो जाता है।

इस त्रैलोक्यविजय कवचके प्रजापति ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। स्वयं रासेश्वर देवता हैं और त्रैलोक्यकी विजयप्राप्तिमें इसका विनियोग कहा गया है। यह परात्पर कवच तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। 'ॐ श्रीकृष्णाय नमः' सदा मेरे सिरकी रक्षा करे। 'कृष्णाय स्वाहा' यह पञ्चाक्षर सदा कपालको सुरक्षित रखे। 'कृष्ण' नेत्रोंकी तथा 'कृष्णाय स्वाहा' पुतलियोंकी रक्षा करे। 'हरये नमः' सदा मेरी भृकुटियोंको बचावे। 'ॐ गोविन्दाय स्वाहा' मेरी नासिकाकी सदा रक्षा करे। 'गोपालाय नमः' मेरे गण्डस्थलोंकी सदा सब ओरसे रक्षा करे। 'ॐ गोपाङ्गनेशाय नमः' सदा मेरे कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ कृष्णाय नमः' निरन्तर मेरे दोनों ओठोंकी रक्षा करे। 'ॐ गोविन्दाय स्वाहा' सदा मेरी दन्तपङ्क्तिकी रक्षा करे। 'ॐ कृष्णाय नमः' दाँतोंके छिद्रोंकी तथा 'क्लीं' दाँतोंके ऊर्ध्वभागकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीकृष्णाय स्वाहा' सदा मेरी जिह्वाकी रक्षा करे। 'रासेश्वराय स्वाहा' सदा मेरे तालुकी रक्षा करे। 'राधिकेशाय स्वाहा' सदा मेरे कण्ठकी रक्षा करे। 'गोपाङ्गनेशाय नमः' सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'ॐ गोपेषाय स्वाहा' सदा मेरे कंधोंकी रक्षा करे। 'नमः किशोरवेशाय स्वाहा' सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। 'मुकुन्दाय नमः' सदा मेरे उदरकी तथा 'ॐ ह्रीं क्लीं कृष्णाय स्वाहा' सदा मेरे हाथ-पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ विष्णवे नमः' सदा मेरी दोनों भुजाओंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं भगवते स्वाहा' सदा मेरे नखोंकी रक्षा करे। 'ॐ नमो नारायणाय' सदा नख-छिद्रोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ह्रीं पद्मनाभाय नमः' सदा मेरी नाभिकी रक्षा करे। 'ॐ सर्वेशाय स्वाहा' सदा मेरे कङ्गालकी रक्षा करे। 'ॐ गोपीरमणाय स्वाहा' सदा मेरे नितम्बकी रक्षा करे। 'ॐ गोपीरमणनाथाय स्वाहा' सदा मेरे पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा' सदा मेरे सर्वाङ्गोंकी रक्षा करे। 'ॐ केशवाय स्वाहा' सदा मेरे केशोंकी रक्षा करे। 'नमः कृष्णाय स्वाहा' सदा मेरे ब्रह्मरन्ध्रकी रक्षा करे। 'ॐ माधवाय स्वाहा' सदा मेरे रोमोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा' मेरे सर्वस्वकी सदा रक्षा करे। परिपूर्णतम श्रीकृष्ण पूर्व दिशामें सर्वदा मेरी रक्षा करें। स्वयं गोलोकनाथ अग्निकोणमें मेरी रक्षा करें। पूर्णब्रह्मस्वरूप दक्षिण दिशामें सदा

३७६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मेरी रक्षा करें। श्रीकृष्ण नैर्ऋत्यकोणमें मेरी रक्षा करें। श्रीहरि पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें। गोविन्द वायव्यकोणमें नित्य-निरन्तर मेरी रक्षा करें। रसिकशिरोमणि उत्तर दिशामें सदा मेरी रक्षा करें। वृन्दावनविहारकृत् सदा ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें। वृन्दावनीके प्राणनाथ ऊर्ध्वभागमें मेरी रक्षा करें। महाबली बलिहारी माधव सदैव मेरी रक्षा करें। नृसिंह जल, स्थल तथा अन्तरिक्षमें सदा मुझे सुरक्षित रखें। माधव सोते समय तथा जाग्रत्-कालमें सदा मेरा पालन करें तथा जो सबके अन्तरात्मा, निर्लेप और सर्वव्यापक हैं, वे भगवान् सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

वत्स! इस प्रकार मैंने 'त्रैलोक्यविजय' नामक कवच, जो परम अनोखा तथा समस्त मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है, तुम्हें बतला दिया। मैंने इसे श्रीकृष्णके मुखसे श्रवण किया था। इसे जिस-किसीको नहीं बतलाना चाहिये। जो विधिपूर्वक गुरुका पूजन करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह भी विष्णुतुल्य हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। वह भक्त जहाँ रहता है, वहाँ लक्ष्मी और सरस्वती निवास करती हैं। यदि उसे कवच सिद्ध हो जाता है तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है और उसे करोड़ों वर्षोंकी पूजाका फल प्राप्त हो जाता है। हजारों राजसूय, सैकड़ों वाजपेय, दस हजार अश्वमेध, सम्पूर्ण महादान तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा—ये सभी इस त्रैलोक्यविजयकी सोलहवीं कलाकी भी समानता नहीं कर सकते। व्रत-उपवासका नियम, स्वाध्याय, अध्ययन, तपस्या और समस्त तीर्थोंमें स्नान—ये सभी इसकी एक कलाको भी नहीं पा सकते। यदि मनुष्य इस कवचको सिद्ध कर ले तो निश्चय ही उसे सिद्धि, अमरता और श्रीहरिकी दासता आदि सब कुछ मिल जाता है। जो इसका दस लाख जप करता है, उसे यह कवच सिद्ध हो जाता है और जो सिद्धकवच होता है, वह निश्चय ही सर्वज्ञ हो जाता है। परंतु जो इस कवचको जाने बिना श्रीकृष्णका भजन करता है, उसकी बुद्धि अत्यन्त मन्द है; उसे करोड़ों कल्पोंतक जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। वत्स! इस कवचको धारण करके तुम आनन्दपूर्वक निःशङ्क होकर अनायास ही इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर डालो। बेटा! प्राणसंकटके समय राज्य दिया जा सकता है, सिर कटाया जा सकता है और प्राणोंका परित्याग भी किया जा सकता है; परंतु ऐसे कवचका दान नहीं करना चाहिये*। (अध्याय ३१)


* महादेव उवाच—

वत्सागच्छ महाभाग भृगुवंशसमुद्भव। पुत्राधिकोऽसि प्रेम्णा मे कवचं ग्रहणं कुरु॥
शृणु राम प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डे परमाद्भुतम्। त्रैलोक्यविजयं नाम श्रीकृष्णस्य जयावहम्॥
श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके राधिकाश्रये। रासमण्डलमध्ये च मह्यं वृन्दावने वने॥
अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। पुण्यात् पुण्यतरं चैव परं स्नेहाद् वदामि ते॥
यद् धृत्वा पठनाद् देवी मूलप्रकृतिरीश्वरी। शुम्भं निशुम्भं महिषं रक्तबीजं जघान ह॥
यद् धृत्वाहं च जगतां संहर्ता सर्वतत्त्ववित्। अवध्यं त्रिपुरं पूर्वं दुरन्तमवलीलया॥
यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मा ससृजे सृष्टिमुत्तमाम्। यद् धृत्वा भगवान् शेषो विधत्ते विश्वमेव च॥
यद् धृत्वा कूर्मराजश्च शेषं धत्तेऽवलीलया। यद् धृत्वा भगवान् वायुर्विश्वाधारो विभुः स्वयं॥
यद् धृत्वा वरुणः सिद्धः कुबेरश्च धनेश्वरः। यद् धृत्वा पठनादिन्द्रो देवानामधिपः स्वयं॥
यद् धृत्वा भाति भुवने तेजोराशिः स्वयं रविः। यद् धृत्वा पठनाच्चन्द्रो महाबलपराक्रमः॥
अगस्त्यः सागरान् सप्त यद् धृत्वा पठनात् पपौ। चकार तेजसा जीर्णं दैत्यं वातापिसंज्ञकम्॥
यद् धृत्वा पठनाद् देवी सर्वाधारा वसुन्धरा। यद् धृत्वा पठनात् पूता गङ्गा भुवनपावनी॥

गणपतिखण्ड ३७७


शिवजीका परशुरामको मन्त्र, ध्यान, पूजाविधि और स्तोत्र प्रदान करना

**परशुरामने कहा—**नाथ! जो सम्पूर्ण अङ्गोंकी रक्षा करनेवाला, सुखदायक, मोक्षप्रद, सारसर्वस्व तथा शत्रुओंके संहारका कारण है, वह कवच तो मुझे प्राप्त हो गया। सामर्थ्यशाली भगवन्! अब मुझ अनाथको मन्त्र, स्तोत्र और पूजाविधि प्रदान कीजिये; क्योंकि आप शरणागतके पालक हैं।

**महादेवजी बोले—**भृगुनन्दन! 'ॐ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा' यह सप्तदशाक्षर महामन्त्र सभी मन्त्रोंमें मन्त्रराज है। मुनिवर! पाँच लाख जप करनेसे यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। उस समय जपका दशांश हवन, हवनका दशांश अभिषेक, अभिषेकका दशांश तर्पण और तर्पणका दशांश मार्जन करनेका विधान है तथा सौ मोहरें इस पुरश्चरणकी दक्षिणा बतायी गयी हैं। मुने!


यद् धृत्वा जगतां साक्षी धर्मो धर्मभृतां वरः। सर्वविद्याधिदेवी सा यच्च धृत्वा सरस्वती ॥
यद् धृत्वा जगतां लक्ष्मीरन्नदात्री परात्परा। यद् धृत्वा पठनाद् वेदान् सावित्री प्रसुषाव च ॥
वेदाश्च धर्मवक्तारो यद् धृत्वा पठनाद् भृगो। यद् धृत्वा पठनाच्छुद्धस्तेजस्वी हव्यवाहनः ॥
सनत्कुमारो भगवान् यद् धृत्वा ज्ञानिनां वरः। दातव्यं कृष्णभक्ताय साधवे च महात्मने ॥
शठाय परशिष्याय दत्त्वा मृत्युमवाप्नुयात्। त्रैलोक्यविजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ॥
ऋषिश्च्छन्दश्च गायत्री देवो रासेश्वरः स्वयम्। त्रैलोक्यविजयप्राप्तौ विनियोगः प्रकीर्तितः ॥
परात्परं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम्। प्रणवो मे शिरः पातु श्रीकृष्णाय नमः सदा ॥
सदा पायात् कपालं कृष्णाय स्वाहेति पञ्चाक्षरः। कृष्णेति पातु नेत्रे च कृष्णस्वाहेति तारकम् ॥
हरये नम इत्येवं भ्रूलतां पातु मे सदा। ॐ गोविन्दाय स्वाहेति नासिकां पातु संततम् ॥
गोपालाय नमो गण्डौ पातु मे सर्वतः सदा। ॐ नमो गोपाङ्गनेशाय कर्णौ पातु सदा मम ॥
ॐकृष्णाय नमः शश्वत् पातु मेऽधरयुग्मकम्। ॐ गोविन्दाय स्वाहेति दन्तावलिं मे सदावतु ॥
ॐ कृष्णाय दन्तरन्ध्रं दन्तोर्ध्वं क्लीं सदावतु। ॐ श्रीकृष्णाय स्वाहेति जिह्विकां पातु मे सदा ॥
रासेश्वराय स्वाहेति तालुकं पातु मे सदा। राधिकेशाय स्वाहेति कण्ठं पातु सदा मम ॥
नमो गोपाङ्गनेशाय वक्षः पातु सदा मम। ॐ गोपेशाय स्वाहेति स्कन्धं पातु सदा मम ॥
नमः किशोरवेशाय स्वाहा पृष्ठं सदावतु। उदरं पातु मे नित्यं मुकुन्दाय नमः सदा ॥
ॐ ह्रीं क्लीं कृष्णाय स्वाहेति करौ पादौ सदा मम। ॐ विष्णवे नमो बाहुयुग्मं पातु सदा मम ॥
ॐ ह्रीं भगवते स्वाहा नखरं पातु मे सदा। ॐ नमो नारायणायेति नखरन्ध्रं सदावतु ॥
ॐ ह्रीं ह्रीं पद्मनाभाय नाभिं पातु सदा मम। ॐ सर्वेशाय स्वाहेति कङ्कालं पातु मे सदा ॥
ॐ गोपीरमणाय स्वाहा नितम्बं पातु मे सदा। ॐ गोपीरमणनाथाय पादौ पातु सदा मम ॥
ॐ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा सर्वं सदावतु। ॐ केशवाय स्वाहेति मम केशान् सदावतु ॥
नमः कृष्णाय स्वाहेति ब्रह्मरन्ध्रं सदावतु। ॐ माधवाय स्वाहेति लोमानि मे सदावतु।

ॐ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा सर्वं सदावतु ॥

परिपूर्णतमः कृष्णः प्राच्यां मां सर्वदावतु। स्वयं गोलोकनाथो मामाग्नेय्यां दिशि रक्षतु ॥
पूर्णब्रह्मस्वरूपश्च दक्षिणे मां सदावतु। नैर्ऋत्यां पातु मां कृष्णः पश्चिमे पातु मां हरिः ॥
गोविन्दः पातु मां शश्वद् वायव्यां दिशि नित्यशः। उत्तरे मां सदा पातु रसिकानां शिरोमणिः ॥
ऐशान्यां मां सदा पातु वृन्दावनविहारकृत्। वृन्दावनीप्राणनाथः पातु मामूर्ध्वदेशतः ॥
सदैव माधवः पातु बलिहारी महाबलः। जले स्थले चान्तरिक्षे नृसिंहः पातु मां सदा ॥
स्वप्ने जागरणे शश्वत् पातु मां माधवः सदा। सर्वान्तरात्मा निर्लिप्तो रक्ष मां सर्वतो विभुः ॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥
मया श्रुतं कृष्णवक्त्रात् प्रवक्तव्यं न कस्यचित्। गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत् तु यः ॥

३७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जिस पुरुषको यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है, उसके लिये विश्व करतलगत हो जाता है। वह समुद्रोंको पी सकता है, विश्वका संहार करनेमें समर्थ हो जाता है और इसी पाञ्चभौतिक शरीरसे वैकुण्ठमें जा सकता है। उसके चरणकमलकी धूलिके स्पर्शमात्रसे सारे तीर्थ पवित्र हो जाते हैं और पृथ्वी तत्काल पावन हो जाती है। मुने! जो भोग और मोक्षका प्रदाता है, सर्वेश्वर श्रीकृष्णका वह सामवेदोक्त ध्यान मेरे मुखसे श्रवण करो। जो रत्ननिर्मित सिंहासनपर आसीन हैं; जिनका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है; नेत्र नीले कमलकी शोभा छीने लेते हैं; मुख शारदीय पूर्णिमाके चन्द्रमाको मात कर रहा है, उसपर मन्द मुस्कानकी मनोहर छटा छायी हुई है। जो करोड़ों कामदेवोंकी भाँति सुन्दर, लीलाके धाम, मनोहर और रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित हैं। जिनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें चन्दनकी खौर लगी है। जो श्रेष्ठ पीताम्बर धारण किये हुए हैं। मुस्कराती हुई गोपियाँ सदा जिनकी ओर निहार रही हैं। जो प्रफुल्ल मालती-पुष्पोंकी माला तथा वनमालासे विभूषित हैं। जो सिरपर ऐसी कलँगी धारण किये हुए हैं, जिसमें कुन्द-पुष्पोंकी बहुतायत है, जो कर्पूरसे सुवासित है और चन्द्रमा एवं ताराओंसे युक्त आकाशकी प्रभाका उपहास कर रही है। जिनके सर्वाङ्गमें रत्नोंके भूषण सुशोभित हैं। जो राधाके वक्षःस्थलमें विराजमान रहते हैं। सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र और देवेन्द्र जिनकी सेवामें लगे रहते हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश और श्रुतियाँ जिनका स्तवन करती रहती हैं; उन श्रीकृष्णका मैं भजन करता हूँ।

जो मनुष्य इस ध्यानसे श्रीकृष्णका ध्यान करके उन्हें षोडशोपचार समर्पित कर भक्तिपूर्वक उनका भलीभाँति पूजन करता है, वह सर्वज्ञत्व प्राप्त कर लेता है। (पूजनकी विधि यों है—) पहले भगवान्‌को भक्तिपूर्वक अर्घ्य, पाद्य, आसन, वस्त्र, भूषण, गौ, अर्घ्य, मधुपर्क, परमोत्तम यज्ञसूत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुनः आचमन, अनेक प्रकारके पुष्प, सुवासित ताम्बूल, चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, मनोहर दिव्य शय्या, माला और तीन पुष्पाञ्जलि निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर षडङ्गकी पूजा करके फिर गणकी विधिवत् पूजा करे। तत्पश्चात् श्रीदामा, सुदामा, वसुदामा, हरिभानु, चन्द्रभानु, सूर्यभानु और सुभानु—इन सातों श्रेष्ठ पार्षदोंका भक्तिभावसहित पूजन करे। फिर जो गोपीश्वरी, मूलप्रकृति, आद्याशक्ति, कृष्णशक्ति और कृष्णद्वारा पूज्य हैं, उन राधिकाकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। विद्वान्‌को चाहिये कि वह गोप और गोपियोंके समुदाय, मुझ शान्तस्वरूप महादेव, ब्रह्मा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी, विग्रहधारी सम्पूर्ण देवता और देवषट्ककी पञ्चोपचारद्वारा


कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः। स च भक्तो वसेद् यत्र लक्ष्मीर्वाणी वसेत्ततः॥
यदि स्यात् सिद्धकवचो जीवन्मुक्तो भवेत्तु सः। निश्चितं कोटिवर्षाणां पूजायाः फलमाप्नुयात्॥
राजसूयसहस्राणि वाजपेयशतानि च। अश्वमेधायुतान्येव नरमेधायुतानि च॥
महादानानि यान्येव प्रादक्षिण्यं भुवस्तथा। त्रैलोक्यविजयस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
व्रतोपवासनियमं स्वाध्यायाध्ययनं तपः। स्नानं च सर्वतीर्थेषु नास्यार्हन्ति कलामपि॥
सिद्धित्वममरत्वं च दास्यत्वं श्रीहरेरपि। यदि स्यात् सिद्धकवचः सर्वं प्राप्नोति निश्चितम्॥
स भवेत् सिद्धकवचो दशलक्षं जपेत्तु यः। यो भवेत् सिद्धकवचः सर्वज्ञः स भवेद् ध्रुवम्॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कृष्णं सुमन्दधीः। कोटिकल्पप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
गृहीत्वा कवचं वत्स महीं निःक्षत्रियां कुरु। त्रिःसप्तकृत्वो निःशङ्कः सदानन्दोऽवलीलया॥
राज्यं देयं शिरो देयं प्राणा देयाश्च पुत्रक। एवंभूतं च कवचं न देयं प्राणसंकटे॥
(३१।७–५७)

गणपतिखण्ड ३७९

सम्यक्-रूपसे पूजा करे। तत्पश्चात् इसी क्रमसे श्रीकृष्णका पूजन करे। फिर गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती—इन छः देवोंकी भलीभाँति अर्चना करके इष्टदेवकी पूजा करे। विघ्ननाशके लिये गणेशका, व्याधिनाशके लिये सूर्यका, आत्मशुद्धिके लिये अग्निका, मुक्तिके लिये विष्णुका, ज्ञानके लिये शंकरका और परमैश्वर्यकी प्राप्तिके लिये दुर्गाका पूजन करनेपर यह फल मिलता है। यदि इनका पूजन न किया जाय तो विपरीत फल प्राप्त होता है। तदनन्तर भक्तिभावसहित इष्टदेवका परिहार करके भक्तिपूर्वक सामवेदोक्त स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। (वह स्तोत्र बतलाता हूँ) उसे श्रवण करो।

**महादेवजीने कहा—**जो परब्रह्म, परम धाम, परम ज्योति, सनातन, निर्लिप्त और सबके कारण हैं, उन परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो स्थूलसे स्थूलतम, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम, सबके देखनेयोग्य, अदृश्य और स्वेच्छाचारी हैं, उन उत्कृष्ट देवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो साकार, निराकार, सगुण, निर्गुण, सबके आधार, सर्वस्वरूप और स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं; उन प्रभुको मेरा अभिवादन है। जिनका रूप अत्यन्त सुन्दर है, जो उपमारहित हैं और अत्यन्त कराल रूप धारण करते हैं; उन सर्वव्यापी भगवान्‌को मैं सिर झुकाता हूँ। जो कर्मके कर्मरूप, समस्त कर्मोंके साक्षी, फल और फलदाता हैं; उन सर्वस्वरूपको मेरा नमस्कार है। जो पुरुष अपनी कलासे विभिन्न मूर्ति धारण करके सृष्टिका रचयिता, पालक और संहारक हैं तथा जो कलांशसे नाना प्रकारकी मूर्ति धारण करते हैं; उनके चरणोंमें मैं प्रणिपात करता हूँ। जो मायाके वशीभूत होकर स्वयं प्रकृतिरूप हैं और स्वयं पुरुष हैं तथा स्वयं इन दोनोंसे परे हैं; उन परात्परको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जो अपनी मायासे स्त्री, पुरुष और नपुंसकका रूप धारण करते हैं तथा जो देव स्वयं माया और स्वयं मायेश्वर हैं; उन्हें मेरा प्रणाम है। जो सम्पूर्ण दुःखोंसे उबारनेवाले, सभी कारणोंके कारण और समस्त विश्वोंको धारण करनेवाले हैं, सबके कारणस्वरूप हैं; उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तेजस्वियोंमें सूर्य, सम्पूर्ण जातियोंमें ब्राह्मण और नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं; उन जगदीश्वरको मेरा अभिवादन है। जो रुद्रों, वैष्णवों और ज्ञानियोंमें शंकर हैं तथा जो नागोंमें शेषनाग हैं; उन जगत्पतिको मैं मस्तक झुकाता हूँ। जो प्रजापतियोंमें ब्रह्मा, सिद्धोंमें स्वयं कपिल और मुनियोंमें सनत्कुमार हैं; उन जगद्गुरुको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। जो देवताओंमें विष्णु, देवियोंमें स्वयं प्रकृति, मनुओंमें स्वायम्भुव मनु, मनुष्योंमें वैष्णव और नारियोंमें शतरूपा हैं; उन बहुरूपियेको मैं नमस्कार करता हूँ। जो ऋतुओंमें वसन्त, महीनोंमें मार्गशीर्ष और तिथियोंमें एकादशी हैं; उन सर्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सरिताओंमें सागर, पर्वतोंमें हिमालय और सहनशीलोंमें पृथ्वीरूप हैं; उन सर्वरूपको मेरा प्रणाम है। जो पत्रोंमें तुलसीपत्र, लकड़ियोंमें चन्दन और वृक्षोंमें कल्पवृक्ष हैं; उन जगत्पतिको मेरा अभिवादन है। जो पुष्पोंमें पारिजात, अन्नोंमें धान और भक्ष्य पदार्थोंमें अमृत हैं; उन अनेक रूपधारीको मैं सिर झुकाता हूँ। जो गजराजोंमें ऐरावत, पक्षियोंमें गरुड और गौओंमें कामधेनु हैं; उन सर्वरूपको मैं नमन करता हूँ। जो तैजस पदार्थोंमें सुवर्ण, धान्योंमें यव और पशुओंमें सिंह हैं; उन श्रेष्ठ रूपधारीके समक्ष मैं नत होता हूँ। जो यक्षोंमें कुबेर, ग्रहोंमें बृहस्पति और दिक्पालोंमें महेन्द्र हैं; उन श्रेष्ठ परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो शास्त्रोंमें वेदसमुदाय, सद्सद्विवेकशील बुद्धिमानोंमें सरस्वती और अक्षरोंमें अकार हैं; उन प्रधान देवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मन्त्रोंमें विष्णुमन्त्र, तीर्थोंमें स्वयं गङ्गा और इन्द्रियोंमें मन

३८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


हैं; उन सर्वश्रेष्ठको मेरा नमस्कार है। जो शस्त्रोंमें सुदर्शनचक्र, व्याधियोंमें वैष्णव-ज्वर और तेजोंमें ब्रह्मतेज हैं; उन वरणीय प्रभुको मेरा प्रणाम है। जो बलवानोंमें निषेक-कर्मफलभोग, शीघ्र चलनेवालोंमें मन और गणना करनेवालोंमें काल हैं; उन विलक्षण देवको मैं अभिवादन करता हूँ। जो गुरुओंमें ज्ञानदाता, बन्धुओंमें मातृरूप और मित्रोंमें जन्मदाता-पितृरूप हैं; उन साररूप परमेश्वरको मैं मस्तक झुकाता हूँ। जो शिल्पियोंमें विश्वकर्मा, रूपवानोंमें कामदेव और पत्नियोंमें पतिव्रता हैं; उन नमनीय प्रभुको मेरा अभिवादन है। जो प्रिय प्राणियोंमें पुत्ररूप, मनुष्योंमें नरेश्वर और यन्त्रोंमें शालग्राम हैं; उन विशिष्टको मैं नमस्कार करता हूँ। जो कल्याणबीजोंमें धर्म, वेदोंमें सामवेद और धर्मोंमें सत्यरूप हैं; उन विशिष्टको मैं प्रणाम करता हूँ। जो जलमें शीतलता, पृथ्वीमें गन्ध और आकाशमें शब्दरूपसे विद्यमान हैं; उन वन्दनीयको मैं अभिवादन करता हूँ। जो यज्ञोंमें राजसूययज्ञ और छन्दोंमें गायत्री छन्द हैं तथा जो गन्धर्वोंमें चित्ररथ हैं; उन परम महनीयको मैं सिर झुकाता हूँ। जो गव्य पदार्थोंमें दूधस्वरूप, पवित्रोंमें अग्नि और पुण्य प्रदान करनेवालोंमें स्तोत्र हैं; उन शुभदायकको मैं प्रणिपात करता हूँ। जो तृणोंमें कुशरूप और शत्रुओंमें रोगरूप हैं तथा जो गुणोंमें शान्तरूप हैं; उन विचित्र रूपधारीको मैं नमन करता हूँ। जो तेजोरूप, ज्ञानरूप, सर्वरूप और महान् हैं; उन सबके द्वारा अनिर्वचनीय सर्वव्यापी स्वयं प्रभुको मेरा नमस्कार है। जो सर्वाधारस्वरूपोंमें वायु और नित्यरूपधारियोंमें आत्माके समान हैं तथा जो आकाशकी भाँति व्यास हैं; उन सर्वव्यापकको मेरा प्रणाम है। जो वेदोंद्वारा अवर्णनीय हैं, अतः विद्वान् जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा जिनका गुणगान वाक्-शक्तिके बाहर है; भला, उनका स्तवन करके कौन पार पा सकता है? जिनकी स्तुति करनेमें वेद समर्थ नहीं हैं तथा सरस्वती जड-सी हो जाती हैं, मन-वाणीसे परे उन भगवान्का कौन विद्वान् स्तवन कर सकता है? जो शुद्ध तेजःस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह और अत्यन्त सुन्दर हैं; उन श्याम-रूपधारी प्रभुको मेरा अभिवादन है। जिनके दो भुजाएँ हैं, मुखपर मुरली सुशोभित है, किशोर-अवस्था है, जो आनन्दपूर्वक मुस्करा रहे हैं, गोपाङ्गनाएँ निरन्तर जिनकी ओर निहारा करती हैं; उन्हें मेरा प्रणाम स्वीकार हो। जो रत्ननिर्मित सिंहासनपर विराजमान हैं और राधाद्वारा दिये गये पानको चबा रहे हैं; उन मनोहर रूपधारी ईश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो रत्नोंके आभूषणोंसे भलीभाँति सुसज्जित हैं तथा जिनपर पार्षदप्रवर गोपकुमार श्वेत चँवर डुला रहे हैं; उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। जो रमणीय वृन्दावनके भीतर रासमण्डलके मध्य स्थित होकर रासक्रीडाके उल्लाससे समुत्सुक हैं; उन रसिकेश्वरको मेरा प्रणाम है। जो शतशृङ्गकी चोटियोंपर, महाशैलपर, गोलोकमें रत्नपर्वतपर तथा विरजा नदीके रमणीय तटपर विहार करनेवाले हैं; उन्हें मेरा नमस्कार है। जो परिपूर्णतम, शान्त, राधाके प्रियतम, मनको हरण करनेवाले, सत्यरूप और ब्रह्मस्वरूप हैं, उन अविनाशी श्रीकृष्णको मैं अभिवादन करता हूँ।

जो मनुष्य भारतवर्षमें श्रीकृष्णके इस स्तोत्रका तीनों काल पाठ करता है, वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्षका दाता हो जाता है। इस स्तोत्रकी कृपासे श्रीहरिमें उसकी भक्ति सुदृढ़ हो जाती है। उसे श्रीहरिकी दासता मिल जाती है और वह इस लोकमें निश्चय ही विष्णु-तुल्य जगत्पूज्य हो जाता है। वह शान्तिलाभ करके समस्त सिद्धोंका ईश्वर हो जाता है और अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा भूतलपर अपने तेज और यशसे सूर्यकी तरह प्रकाशित होता है। वह जीवन्मुक्त,

५७- परशुरामका राजराजेश्वर कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतयुक्त वचन कहना

गणपतिखण्ड ३८१

श्रीकृष्णभक्त, सदा नीरोग, गुणवान्, विद्वान्, पुत्रवान् और धनी हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। वह निश्चय ही छहों विषयोंका जानकार, दसों बलोंसे सम्पन्न, मनके सदृश वेगशाली, सर्वज्ञ, सर्वस्व दान करनेवाला और सम्पूर्ण सम्पदाओंका दाता हो जाता है तथा श्रीकृष्णकी कृपासे वह निरन्तर कल्पवृक्षके समान बना रहता है। वत्स! इस प्रकार मैंने इस स्तोत्रका वर्णन कर दिया। अब तुम पुष्करमें जाओ और वहाँ मन्त्र सिद्ध करो। तत्पश्चात् तुम्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति होगी। मुनिश्रेष्ठ! यों श्रीकृष्णकी कृपासे तथा मेरे आशीर्वादसे तुम सुखपूर्वक पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे शून्य करो*।
(अध्याय ३२)


* महादेव उवाच—
परं ब्रह्म परं धाम परं ज्योतिः सनातनम्। निर्लिप्तं परमात्मानं नमामि सर्वकारणम्॥
स्थूलात् स्थूलतमं देवं सूक्ष्मात् सूक्ष्मतमं परम्। सर्वदृश्यमदृश्यं च स्वेच्छाचारं नमाम्यहम्॥
साकारं च निराकारं सगुणं निर्गुणं प्रभुम्। सर्वाधारं च सर्वं च स्वेच्छारूपं नमाम्यहम्॥
अतीवकमनीयं च रूपं निरुपमं विभुम्। करालरूपमत्यन्तं बिभ्रतं प्रणमाम्यहम्॥
कर्मणः कर्मरूपं तं साक्षिणं सर्वकर्मणाम्। फलं च फलदातारं सर्वरूपं नमाम्यहम्॥
स्रष्टा पाता च संहर्ता कलया मूर्तिभेदतः। नानामूर्तिः कलांशेन यः पुमांस्तं नमाम्यहम्॥
स्वयं प्रकृतिरूपश्च मायया च स्वयं पुमान्। तयोः परं स्वयं शश्वत् तं नमामि परात्परम्॥
स्त्रीपुंनपुंसकं रूपं यो बिभर्ति स्वमायया। स्वयं माया स्वयं मायी यो देवस्तं नमाम्यहम्॥
तारणं सर्वदुःखानां सर्वकारणकारणम्। धारणं सर्वविश्वानां सर्वबीजं नमाम्यहम्॥
तेजस्विनां रवियों हि सर्वजातिषु ब्राह्मणः। नक्षत्राणां च यश्चन्द्रस्तं नमामि जगत्प्रभुम्॥
रुद्राणां वैष्णवानां च ज्ञानिनां यो हि शंकरः। नागानां यो हि शेषश्च तं नमामि जगत्पतिम्॥
प्रजापतीनां यो ब्रह्मा सिद्धानां कपिलः स्वयम्। सनत्कुमारो मुनिषु तं नमामि जगद्गुरुम्॥
देवानां यो हि विष्णुश्च देवीनां प्रकृतिः स्वयम्।
स्वायम्भुवो मनूनां यो मानवेषु च वैष्णवः। नारीणां शतरूपा च बहुरूपं नमाम्यहम्॥
ऋतूनां यो वसन्तश्च मासानां मार्गशीर्षकः। एकादशी तिथीनां च नमामि सर्वरूपिणम्॥
सागरः सरितां यश्च पर्वतानां हिमालयः। वसुन्धरा सहिष्णूनां तं सर्वं प्रणमाम्यहम्॥
पत्राणां तुलसीपत्रं दारुरूपेषु चन्दनम्। वृक्षाणां कल्पवृक्षो यस्तं नमामि जगत्पतिम्॥
पुष्पाणां पारिजातश्च शस्यानां धान्यमेव च। अमृतं भक्ष्यवस्तूनां नानारूपं नमाम्यहम्॥
ऐरावतो गजेन्द्राणां वैनतेयश्च पक्षिणाम्। कामधेनुश्च धेनूनां सर्वरूपं नमाम्यहम्॥
तेजसानां सुवर्णं च धान्यानां यव एव च। यः केशरी पशूनां च वररूपं नमाम्यहम्॥
यक्षाणां च कुबेरो यो ग्रहाणां च बृहस्पतिः। दिक्पालानां महेन्द्रश्च तं नमामि परं वरम्॥
वेदसंघश्च शास्त्राणां पण्डितानां सरस्वती। अक्षराणामकारो यस्तं प्रधानं नमाम्यहम्॥
मन्त्राणां विष्णुमन्त्रश्च तीर्थानां जाह्नवी स्वयम्। इन्द्रियाणां मनो यो हि सर्वश्रेष्ठं नमाम्यहम्॥
सुदर्शनं च शस्त्राणां व्याधीनां वैष्णवो ज्वरः। तेजसां ब्रह्मतेजश्च वरेण्यं तं नमाम्यहम्॥
निषेकश्च बलवतां मनश्च शीघ्रगामिनाम्। कालः कलयतां यो हि तं नमामि विलक्षणम्॥
ज्ञानदाता गुरूणां च मातृरूपश्च बन्धुषु। मित्रेषु जन्मदाता यस्तं सारं प्रणमाम्यहम्॥
शिल्पीनां विश्वकर्मा यः कामदेवश्च रूपिणाम्। पतिव्रता च पत्नीनां नमस्यं तं नमाम्यहम्॥
प्रियेषु पुत्ररूपो यो नृपरूपो नरेषु च। शालग्रामश्च यन्त्राणां तं विशिष्टं नमाम्यहम्॥
धर्मः कल्याणबीजानां वेदानां सामवेदकः। धर्मीणां सत्यरूपो यो विशिष्टं तं नमाम्यहम्॥
जले शैत्यस्वरूपो यो गन्धरूपश्च भूमिषु। शब्दरूपश्च गगने तं प्रणम्यं नमाम्यहम्॥

३८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पुष्करमें जाकर परशुरामका तपस्या करना, श्रीकृष्णद्वारा वर-प्राप्ति, आश्रमपर मित्रोंके साथ उनका विजय-यात्रा करना और शुभ शकुनोंका प्रकट होना, नर्मदातटपर रात्रिमें परशुरामको स्वप्नमें शुभ शकुनोंका दिखलायी देना श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर भृगुवंशी परशुराम हर्षपूर्वक शिव, दुर्गा तथा भद्रकालीको प्रणाम करके पुष्करतीर्थमें गये और वहाँ मन्त्र सिद्ध करने लगे। उन्होंने एक महीनेतक अन्न-जलका परित्याग कर दिया और भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान करते हुए वायुको अवरुद्ध कर दिया। फिर आँखें खोलकर देखा तो उनको आकाश एक अद्भुत तेजसे व्याप्त दिखायी पड़ा। उस तेजसे दसों दिशाएँ उदीप्त हो रही थीं और सूर्यका तेज प्रतिहत हो गया था। उस तेजोमण्डलके मध्य उन्हें एक रत्ननिर्मित विमान दीख पड़ा, जिसपर एक अत्यन्त सुन्दर श्रेष्ठ पुरुष दृष्टिगोचर हो रहे थे। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले थे तथा उनका मुख मन्द मुसकानसे खिल रहा था। परशुरामने उन ईश्वरको दण्डकी भाँति लेटकर सिरसे प्रणाम किया और वर माँगा—'भगवन् ! मैं इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे रहित कर दूँ, आपके चरणकमलोंमें मेरी अनपायिनी सुदृढ़ भक्ति हो और मैं निरन्तर आपके पादारविन्दका दास बना रहूँ—यह वर मुझे प्रदान कीजिये।' तब श्रीकृष्ण उन्हें वह वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये और परशुराम उन क्रतूनां राजसूयो यो गायत्री छन्दसां च यः। गन्धर्वाणां चित्ररथस्तं गरिष्ठं नमाम्यहम्॥ क्षीरस्वरूपो गव्यानां पवित्राणां च पावकः। पुण्यदानां च यः स्तोत्रं तं नमामि शुभप्रदम्॥ तृणानां कुशरूपो यो व्याधिरूपश्च वैरिणाम्। गुणानां शान्तरूपो यश्चित्ररूपं नमाम्यहम्॥ तेजोरूपो ज्ञानरूपः सर्वरूपश्च यो महान्। सर्वानिर्वचनीयं च तं नमामि स्वयं विभुम्॥ सर्वाधारेषु यो वायुर्यथात्मा नित्यरूपिणाम्। आकाशो व्यापकानां यो व्यापकं तं नमाम्यहम्॥ वेदानिर्वचनीयं यन्न स्तोतुं पण्डितः क्षमः। यदनिर्वचनीयं च को वा तत्स्तोतुमीश्वरः॥ वेदा न शक्ता यं स्तोतुं जडीभूता सरस्वती। तं च वाङ्मनसोः पारं को विद्वान् स्तोतुमीश्वरः॥ शुद्धतेजःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम्। अतीवकमनीयं च श्यामरूपं नमाम्यहम्॥ द्विभुजं मुरलीवक्त्रं किशोरं सस्मितं मुदा। शश्वद् गोपाङ्गनाभिश्च वीक्ष्यमाणं नमाम्यहम्॥ राधया दत्तताम्बूलं भुक्तवन्तं मनोहरम्। रत्नसिंहासनस्थं च तमीशं प्रणमाम्यहम्॥ रत्नभूषणभूषाढ्यं सेवितं श्वेतचामरैः। पार्षदप्रवरैर्गोपकुमारैस्तं नमाम्यहम्॥ वृन्दावनान्तरे रम्ये रासोल्लाससमुत्सुकम्। रासमण्डलमध्यस्थं नमामि रसिकेश्वरम्॥ शतशृङ्गे महाशैले गोलोके रत्नपर्वते। विरजापुलिने रम्ये प्रणमामि विहारिणम्॥ परिपूर्णतमं शान्तं राधाकान्तं मनोहरम्। सत्यं ब्रह्मस्वरूपं च नित्यं कृष्णं नमाम्यहम्॥ श्रीकृष्णस्य स्तोत्रमिदं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। धर्मार्थकाममोक्षाणां स दाता भारते भवेत्॥ हरिदास्यं हरौ भक्तिं लभेत् स्तोत्रप्रसादतः। इह लोके जगत्पूज्यो विष्णुतुल्यो भवेद् ध्रुवम्॥ सर्वसिद्धेश्वरः शान्तोऽप्यन्ते याति हरेः पदम्। तेजसा यशसा भाति यथा सूर्यो महीतले॥ जीवन्मुक्तः कृष्णभक्तः स भवेन्नात्र संशयः। अरोगी गुणवान् विद्वान् पुत्रवान् धनवान् सदा॥ षड्विज्ञो दशबलो मनोयायी भवेद् ध्रुवम्। सर्वज्ञः सर्वदर्शैव स दाता सर्वसम्पदाम्। कल्पवृक्षसमः शश्वद् भवेत् कृष्णप्रसादतः ॥ इत्येवं कथितं स्तोत्रं त्वं वत्स गच्छ पुष्करम्। तत्र कृत्वा मन्त्रसिद्धिं पश्चात् प्राप्स्यसि वाञ्छितम्॥ त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां कुरु पृथ्वीं यथासुखम्। ममाशिषा मुनिश्रेष्ठ श्रीकृष्णस्य प्रसादतः॥ (३२। २७—७६)

गणपतिखण्ड ३८३ शब्द और विजयसूचक बादलोंकी गड़गड़ाहट सुनायी पड़ी। उसी समय आकाशवाणी भी हुई कि 'तुम्हारी विजय होगी।' इस तरह अनेक प्रकारके शुभ शब्दोंको सुनते हुए भगवान् परशुरामने यात्रा आरम्भ की। चलते ही उन्होंने अपने आगे ब्राह्मण, वन्दी, ज्योतिषी और भिक्षुकको देखा। फिर नाना प्रकारके आभूषणोंसे सजी हुई एक पति-पुत्रसम्पन्ना सती नारी हाथमें प्रज्वलित दीपक लिये हुए मुस्कराती हुई सामने आयी। चलते- चलते परशुरामने अपने दाहिनी ओर यात्राके समय मङ्गलकी सूचना देनेवाले शव, शृगाली, जलसे पूर्ण घट, नीलकण्ठ, नेवला, कृष्णसार मृग, हाथी, सिंह, घोड़ा, गैंडा, द्विप, चमरी गाय, परात्परको नमस्कार करके अपने आश्रमको राजहंस, चक्रवाक, शुक, कोयल, मोर, खंजन, लौट आये। उस समय उनका दाहिना अङ्ग सफेद चील, चकोर, कबूतर, बगुलोंकी पंक्ति, फड़कने लगा, जो शुभ मङ्गलोंका सूचक था। बत्तख, चातक, गौरैया, बिजली, इन्द्रधनुष, सूर्य, रातमें उन्हें वाञ्छासिद्धिको प्रकट करनेवाला सूर्यकी प्रभा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित उत्तम स्वप्न भी दीख पड़ा। इससे उनका मन मछली, शङ्ख, सुवर्ण, माणिक्य, चाँदी, मोती, रात-दिन प्रसन्न और संतुष्ट रहने लगा। वे हीरा, मूँगा, दही, लावा, सफेद धान, सफेद स्वजनोंसे सारा वृत्तान्त पूर्णतया बतलाकर फूल, कुंकुम, पानका पत्ता, पताका, छत्र, दर्पण, आनन्दपूर्वक आश्रममें निवास करने लगे। श्वेत चँवर, सवत्सा गौ, रथारूढ़ भूपाल, दूध, तदनन्तर महाबली परशुरामने अपने शिष्योंको, घी, राशि-राशि अमृत, खीर, शालग्राम, पका पिताके शिष्योंको, भाइयोंको तथा बन्धु-बान्धवोंको हुआ फल, स्वस्तिक, शक्कर, मधु, बिलाव, बुला-बुलाकर उनके साथ तरह-तरहकी साँड़, भेड़ा, पर्वतीय चूहा, मेघाच्छन्न सूर्यका सलाह की और उनसे अपना पूर्वापरका वृत्तान्त उदय, चन्द्रमण्डल, कस्तूरी, पंखा, जल, हल्दी, कहकर शुभ मुहूर्तमें वे उन्हींके साथ विजययात्राके तीर्थकी मिट्टी, पीली या सफेद सरसों, दूब, लिये उद्यत हुए। ब्राह्मणका बालक और कन्या, मृग, वेश्या, भौंरा, उस समय परशुरामको मङ्गल शकुन दिखायी कपूर, पीला वस्त्र, गोमूत्र, गोबर, गौके खुरकी पड़ने लगे और जयकी सूचना देनेवाले शब्द धूलि, गोपदसे चिह्नित गोष्ठ, गौओंका मार्ग सुनायी दिये। तब उन्होंने मन-ही-मन सबका (डहर), रमणीय गोशाला, सुन्दर गोगति, भूषण, विचार करके निश्चय कर लिया कि मेरी विजय देवप्रतिमा, प्रज्वलित अग्नि, महोत्सव, ताँबा, होगी और शत्रुओंका संहार होगा। यात्राके स्फटिक, वैद्य, सिंदूर, माला, चन्दन, सुगन्ध, हीरा अवसरपर सहसा मुनिको अपने सामने मयूरकी और रत्न देखा। उन्हें सुगन्धित वायुका आघ्राण बोली, सिंहकी गर्जना, घण्टा और दुन्दुभीकी और ब्राह्मणोंका शुभाशीर्वाद प्राप्त हुआ। इस ध्वनि, संगीत, कल्याणकारी नवीन सांकेतिक प्रकार माङ्गलिक अवसर जानकर वे हर्षपूर्वक आगे